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"क्या उसने कभी किसी खास आदमी का ज़िक्र किया? कोई बॉयफ्रेंड? कोई... मेंटोर?" राज ने शब्दों का चुनाव बहुत ध्यान से किया।
लीना ने कुछ देर सोचा। "नाम तो कभी नहीं लिया। बस कहती थी कि एक बहुत 'पावरफुल' आदमी है जो उसकी मदद कर रहा है। उसे फिल्मों में लॉन्च करने वाला है। वह कहती थी कि वह उसका 'गॉडफादर' है।"
"और जाने से पहले वाली रात? क्या कुछ अजीब हुआ?"
"हाँ," लीना की आवाज़ काँप गई। "वह रात वह बहुत देर से आई। शायद सुबह के दो बजे होंगे। वह नशे में थी, लेकिन बहुत खुश थी। वह नाच रही थी और कह रही थी, 'लीना, मेरी लॉटरी लग गई! मुझे वो मौका मिल गया है जो मेरी ज़िंदगी बदल देगा।'
मैंने पूछा कैसा मौका, तो वह हँसने लगी।
कहने लगी, 'एक बार सब फाइनल हो जाए, तो सबसे पहले तुझे बताऊँगी। फिर हम दोनों इस नरक से निकल जाएँगे।' वह बहुत उत्साहित थी। मैंने उसे इतना खुश कभी नहीं देखा था।"
"और फिर?"
"फिर वह सो गई। अगली सुबह जब मैं उठी, तो वह अपना सामान पैक कर रही थी। वह बहुत शांत थी, रात के उत्साह का कोई नामोनिशान नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा डर था। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उसने कहा, 'कुछ नहीं, बस अब मुझे जाना होगा।' वह मुझसे नज़रें भी नहीं मिला रही थी। उसने एक छोटा सा बैग उठाया और चली गई। बस इतना कहा कि फोन करेगी।"
यह कहानी का सबसे अहम मोड़ था। एक रात का नशा और उत्साह, और अगली सुबह का डर और खामोशी। इन दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ था, जिसने सब कुछ बदल दिया।
"लीना, क्या आपको लगता है कि वह किसी खतरे में थी?" राज ने सीधा सवाल किया।
लीना की आँखों का डर अब और गहरा हो गया। वह फुसफुसाई, "मुझे नहीं पता। लेकिन उसके जाने के कुछ दिनों बाद, एक काली गाड़ी हमारी गली के बाहर कई बार आकर रुकी। मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन... अब जब आप पूछ रहे हैं... मुझे लगता है कि कोई मुझ पर नज़र रख रहा था। शायद इसीलिए मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। मैं डर गई थी।"
अब तस्वीर साफ हो रही थी। कविता को एक "बड़ा मौका" मिला था, जिसके बाद वह या तो अपनी मर्ज़ी से या किसी मजबूरी में गायब हो गई। और जो लोग इसके पीछे थे, वे यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कोई इस राज़ की तह तक न पहुँचे। लीना का डर बेवजह नहीं था।
राज को अपना अगला कदम पता था - 'रिदम डांस अकादमी'। लेकिन उससे पहले, उसे इस डरी हुई लड़की की सुरक्षा का सोचना था। सूरज ढल रहा था। कमरे में अँधेरा भर रहा था और उसके साथ बढ़ रहा था लीना का डर।
वह अपने घुटनों को छाती से लगाकर बैठ गई, जैसे दुनिया के हर खतरे से खुद को बचाना चाहती हो। राज जानता था कि आज रात वह उसे इस हाल में अकेला नहीं छोड़ सकता।
राज अपनी कुर्सी से उठा। कमरे में अँधेरा इतना बढ़ गया था कि अब दोनों के चेहरे साफ नहीं दिख रहे थे, बस उनकी परछाइयाँ दीवार पर नाच रही थीं।
"लीना, आपको डरने की ज़रूरत नहीं है। मैं यहाँ हूँ," राज ने कहा। उसकी आवाज़ में एक अधिकार और एक आश्वासन था। "मैं कुछ देर और रुकता हूँ। आप बत्तियाँ जला लीजिए और कुछ खाने का इंतज़ाम कीजिए।"
लीना ने काँपते हाथों से लाइट जलाई। कमरे की पीली रोशनी में उसका डरा हुआ चेहरा और साफ नज़र आने लगा। उसने चुपचाप उठकर किचन के प्लेटफार्म पर रखे पैकेट से मैगी निकाली। दोनों ने खामोशी में खाना खाया। बाहर की दुनिया का शोर अब कम हो गया था, और कमरे की खामोशी और ज़्यादा भारी लगने लगी थी।
"मैं कल सुबह तक आपके लिए किसी सुरक्षित जगह का इंतज़ाम कर दूँगा," राज ने कहा। "तब तक आपको यहाँ अकेले रहने की ज़रूरत नहीं है।"
वह जाने के लिए उठा। वह पेशेवर था। लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े की ओर बढ़ा, लीना ने पीछे से उसकी कलाई पकड़ ली। उसका स्पर्श ठंडा था, और उसमें एक कातरता थी।
"मत जाओ," उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट जैसी थी। "प्लीज़... आज रात यहीं रुक जाओ। मुझे बहुत डर लग रहा है।"
राज रुक गया। उसने पलटकर लीना की आँखों में देखा। उन आँखों में सिर्फ डर नहीं था। उनमें अकेलापन था, एक गहरी थकान थी, और एक अनकही प्यास थी। इस शहर ने उसे डरा दिया था, और वह किसी ऐसे इंसान का साथ चाहती थी जो उसे महफूज़ महसूस करा सके। राज ने अपने पेशेवर सिद्धांतों और अपनी इंसानियत के बीच एक पल के लिए संघर्ष किया। और इंसानियत जीत गई।
उसने धीरे से सिर हिलाया। "ठीक है। मैं यहीं हूँ।"
उस एक वाक्य ने कमरे का पूरा माहौल बदल दिया। लाइट बंद हो गई। सिर्फ खिड़की से सड़क की पीली रोशनी अंदर आ रही थी। दोनों बिस्तर के दो किनारों पर लेटे थे, एक-दूसरे को पीठ दिए हुए। हवा में दोनों की साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
तभी बाहर गली में किसी बाइक के हॉर्न की तेज़ आवाज़ आई। लीना डरकर सिहर उठी और चीखते-चीखते बची। वह अनजाने में ही खिसककर राज के करीब आ गई और उसका मज़बूत बाजू पकड़ लिया। उसकी पकड़ में मौत जैसी दहशत थी।
"शांत," राज फुसफुसाया और करवट बदलकर उसकी ओर हो गया। उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। "मैं यहीं हूँ। कोई तुम्हें कुछ नहीं करेगा।"
राज उसे सिर्फ़ सांत्वना दे रहा था, लेकिन उसके मज़बूत जिस्म की गर्मी और उसकी गहरी आवाज़ ने लीना के अंदर कुछ और ही जगा दिया। उसका काँपता हुआ शरीर अब भी काँप रहा था, लेकिन अब वजह सिर्फ डर नहीं थी।
लीना ने कुछ देर सोचा। "नाम तो कभी नहीं लिया। बस कहती थी कि एक बहुत 'पावरफुल' आदमी है जो उसकी मदद कर रहा है। उसे फिल्मों में लॉन्च करने वाला है। वह कहती थी कि वह उसका 'गॉडफादर' है।"
"और जाने से पहले वाली रात? क्या कुछ अजीब हुआ?"
"हाँ," लीना की आवाज़ काँप गई। "वह रात वह बहुत देर से आई। शायद सुबह के दो बजे होंगे। वह नशे में थी, लेकिन बहुत खुश थी। वह नाच रही थी और कह रही थी, 'लीना, मेरी लॉटरी लग गई! मुझे वो मौका मिल गया है जो मेरी ज़िंदगी बदल देगा।'
मैंने पूछा कैसा मौका, तो वह हँसने लगी।
कहने लगी, 'एक बार सब फाइनल हो जाए, तो सबसे पहले तुझे बताऊँगी। फिर हम दोनों इस नरक से निकल जाएँगे।' वह बहुत उत्साहित थी। मैंने उसे इतना खुश कभी नहीं देखा था।"
"और फिर?"
"फिर वह सो गई। अगली सुबह जब मैं उठी, तो वह अपना सामान पैक कर रही थी। वह बहुत शांत थी, रात के उत्साह का कोई नामोनिशान नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा डर था। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उसने कहा, 'कुछ नहीं, बस अब मुझे जाना होगा।' वह मुझसे नज़रें भी नहीं मिला रही थी। उसने एक छोटा सा बैग उठाया और चली गई। बस इतना कहा कि फोन करेगी।"
यह कहानी का सबसे अहम मोड़ था। एक रात का नशा और उत्साह, और अगली सुबह का डर और खामोशी। इन दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ था, जिसने सब कुछ बदल दिया।
"लीना, क्या आपको लगता है कि वह किसी खतरे में थी?" राज ने सीधा सवाल किया।
लीना की आँखों का डर अब और गहरा हो गया। वह फुसफुसाई, "मुझे नहीं पता। लेकिन उसके जाने के कुछ दिनों बाद, एक काली गाड़ी हमारी गली के बाहर कई बार आकर रुकी। मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन... अब जब आप पूछ रहे हैं... मुझे लगता है कि कोई मुझ पर नज़र रख रहा था। शायद इसीलिए मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। मैं डर गई थी।"
अब तस्वीर साफ हो रही थी। कविता को एक "बड़ा मौका" मिला था, जिसके बाद वह या तो अपनी मर्ज़ी से या किसी मजबूरी में गायब हो गई। और जो लोग इसके पीछे थे, वे यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कोई इस राज़ की तह तक न पहुँचे। लीना का डर बेवजह नहीं था।
राज को अपना अगला कदम पता था - 'रिदम डांस अकादमी'। लेकिन उससे पहले, उसे इस डरी हुई लड़की की सुरक्षा का सोचना था। सूरज ढल रहा था। कमरे में अँधेरा भर रहा था और उसके साथ बढ़ रहा था लीना का डर।
वह अपने घुटनों को छाती से लगाकर बैठ गई, जैसे दुनिया के हर खतरे से खुद को बचाना चाहती हो। राज जानता था कि आज रात वह उसे इस हाल में अकेला नहीं छोड़ सकता।
राज अपनी कुर्सी से उठा। कमरे में अँधेरा इतना बढ़ गया था कि अब दोनों के चेहरे साफ नहीं दिख रहे थे, बस उनकी परछाइयाँ दीवार पर नाच रही थीं।
"लीना, आपको डरने की ज़रूरत नहीं है। मैं यहाँ हूँ," राज ने कहा। उसकी आवाज़ में एक अधिकार और एक आश्वासन था। "मैं कुछ देर और रुकता हूँ। आप बत्तियाँ जला लीजिए और कुछ खाने का इंतज़ाम कीजिए।"
लीना ने काँपते हाथों से लाइट जलाई। कमरे की पीली रोशनी में उसका डरा हुआ चेहरा और साफ नज़र आने लगा। उसने चुपचाप उठकर किचन के प्लेटफार्म पर रखे पैकेट से मैगी निकाली। दोनों ने खामोशी में खाना खाया। बाहर की दुनिया का शोर अब कम हो गया था, और कमरे की खामोशी और ज़्यादा भारी लगने लगी थी।
"मैं कल सुबह तक आपके लिए किसी सुरक्षित जगह का इंतज़ाम कर दूँगा," राज ने कहा। "तब तक आपको यहाँ अकेले रहने की ज़रूरत नहीं है।"
वह जाने के लिए उठा। वह पेशेवर था। लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े की ओर बढ़ा, लीना ने पीछे से उसकी कलाई पकड़ ली। उसका स्पर्श ठंडा था, और उसमें एक कातरता थी।
"मत जाओ," उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट जैसी थी। "प्लीज़... आज रात यहीं रुक जाओ। मुझे बहुत डर लग रहा है।"
राज रुक गया। उसने पलटकर लीना की आँखों में देखा। उन आँखों में सिर्फ डर नहीं था। उनमें अकेलापन था, एक गहरी थकान थी, और एक अनकही प्यास थी। इस शहर ने उसे डरा दिया था, और वह किसी ऐसे इंसान का साथ चाहती थी जो उसे महफूज़ महसूस करा सके। राज ने अपने पेशेवर सिद्धांतों और अपनी इंसानियत के बीच एक पल के लिए संघर्ष किया। और इंसानियत जीत गई।
उसने धीरे से सिर हिलाया। "ठीक है। मैं यहीं हूँ।"
उस एक वाक्य ने कमरे का पूरा माहौल बदल दिया। लाइट बंद हो गई। सिर्फ खिड़की से सड़क की पीली रोशनी अंदर आ रही थी। दोनों बिस्तर के दो किनारों पर लेटे थे, एक-दूसरे को पीठ दिए हुए। हवा में दोनों की साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
तभी बाहर गली में किसी बाइक के हॉर्न की तेज़ आवाज़ आई। लीना डरकर सिहर उठी और चीखते-चीखते बची। वह अनजाने में ही खिसककर राज के करीब आ गई और उसका मज़बूत बाजू पकड़ लिया। उसकी पकड़ में मौत जैसी दहशत थी।
"शांत," राज फुसफुसाया और करवट बदलकर उसकी ओर हो गया। उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। "मैं यहीं हूँ। कोई तुम्हें कुछ नहीं करेगा।"
राज उसे सिर्फ़ सांत्वना दे रहा था, लेकिन उसके मज़बूत जिस्म की गर्मी और उसकी गहरी आवाज़ ने लीना के अंदर कुछ और ही जगा दिया। उसका काँपता हुआ शरीर अब भी काँप रहा था, लेकिन अब वजह सिर्फ डर नहीं थी।