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Adultery thriller खून की होली

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"क्या उसने कभी किसी खास आदमी का ज़िक्र किया? कोई बॉयफ्रेंड? कोई... मेंटोर?" राज ने शब्दों का चुनाव बहुत ध्यान से किया।

लीना ने कुछ देर सोचा। "नाम तो कभी नहीं लिया। बस कहती थी कि एक बहुत 'पावरफुल' आदमी है जो उसकी मदद कर रहा है। उसे फिल्मों में लॉन्च करने वाला है। वह कहती थी कि वह उसका 'गॉडफादर' है।"

"और जाने से पहले वाली रात? क्या कुछ अजीब हुआ?"

"हाँ," लीना की आवाज़ काँप गई। "वह रात वह बहुत देर से आई। शायद सुबह के दो बजे होंगे। वह नशे में थी, लेकिन बहुत खुश थी। वह नाच रही थी और कह रही थी, 'लीना, मेरी लॉटरी लग गई! मुझे वो मौका मिल गया है जो मेरी ज़िंदगी बदल देगा।'

मैंने पूछा कैसा मौका, तो वह हँसने लगी।

कहने लगी, 'एक बार सब फाइनल हो जाए, तो सबसे पहले तुझे बताऊँगी। फिर हम दोनों इस नरक से निकल जाएँगे।' वह बहुत उत्साहित थी। मैंने उसे इतना खुश कभी नहीं देखा था।"

"और फिर?"

"फिर वह सो गई। अगली सुबह जब मैं उठी, तो वह अपना सामान पैक कर रही थी। वह बहुत शांत थी, रात के उत्साह का कोई नामोनिशान नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा डर था। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उसने कहा, 'कुछ नहीं, बस अब मुझे जाना होगा।' वह मुझसे नज़रें भी नहीं मिला रही थी। उसने एक छोटा सा बैग उठाया और चली गई। बस इतना कहा कि फोन करेगी।"

यह कहानी का सबसे अहम मोड़ था। एक रात का नशा और उत्साह, और अगली सुबह का डर और खामोशी। इन दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ था, जिसने सब कुछ बदल दिया।

"लीना, क्या आपको लगता है कि वह किसी खतरे में थी?" राज ने सीधा सवाल किया।

लीना की आँखों का डर अब और गहरा हो गया। वह फुसफुसाई, "मुझे नहीं पता। लेकिन उसके जाने के कुछ दिनों बाद, एक काली गाड़ी हमारी गली के बाहर कई बार आकर रुकी। मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन... अब जब आप पूछ रहे हैं... मुझे लगता है कि कोई मुझ पर नज़र रख रहा था। शायद इसीलिए मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। मैं डर गई थी।"

अब तस्वीर साफ हो रही थी। कविता को एक "बड़ा मौका" मिला था, जिसके बाद वह या तो अपनी मर्ज़ी से या किसी मजबूरी में गायब हो गई। और जो लोग इसके पीछे थे, वे यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कोई इस राज़ की तह तक न पहुँचे। लीना का डर बेवजह नहीं था।

राज को अपना अगला कदम पता था - 'रिदम डांस अकादमी'। लेकिन उससे पहले, उसे इस डरी हुई लड़की की सुरक्षा का सोचना था। सूरज ढल रहा था। कमरे में अँधेरा भर रहा था और उसके साथ बढ़ रहा था लीना का डर।

वह अपने घुटनों को छाती से लगाकर बैठ गई, जैसे दुनिया के हर खतरे से खुद को बचाना चाहती हो। राज जानता था कि आज रात वह उसे इस हाल में अकेला नहीं छोड़ सकता।

राज अपनी कुर्सी से उठा। कमरे में अँधेरा इतना बढ़ गया था कि अब दोनों के चेहरे साफ नहीं दिख रहे थे, बस उनकी परछाइयाँ दीवार पर नाच रही थीं।

"लीना, आपको डरने की ज़रूरत नहीं है। मैं यहाँ हूँ," राज ने कहा। उसकी आवाज़ में एक अधिकार और एक आश्वासन था। "मैं कुछ देर और रुकता हूँ। आप बत्तियाँ जला लीजिए और कुछ खाने का इंतज़ाम कीजिए।"

लीना ने काँपते हाथों से लाइट जलाई। कमरे की पीली रोशनी में उसका डरा हुआ चेहरा और साफ नज़र आने लगा। उसने चुपचाप उठकर किचन के प्लेटफार्म पर रखे पैकेट से मैगी निकाली। दोनों ने खामोशी में खाना खाया। बाहर की दुनिया का शोर अब कम हो गया था, और कमरे की खामोशी और ज़्यादा भारी लगने लगी थी।

"मैं कल सुबह तक आपके लिए किसी सुरक्षित जगह का इंतज़ाम कर दूँगा," राज ने कहा। "तब तक आपको यहाँ अकेले रहने की ज़रूरत नहीं है।"

वह जाने के लिए उठा। वह पेशेवर था। लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े की ओर बढ़ा, लीना ने पीछे से उसकी कलाई पकड़ ली। उसका स्पर्श ठंडा था, और उसमें एक कातरता थी।

"मत जाओ," उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट जैसी थी। "प्लीज़... आज रात यहीं रुक जाओ। मुझे बहुत डर लग रहा है।"

राज रुक गया। उसने पलटकर लीना की आँखों में देखा। उन आँखों में सिर्फ डर नहीं था। उनमें अकेलापन था, एक गहरी थकान थी, और एक अनकही प्यास थी। इस शहर ने उसे डरा दिया था, और वह किसी ऐसे इंसान का साथ चाहती थी जो उसे महफूज़ महसूस करा सके। राज ने अपने पेशेवर सिद्धांतों और अपनी इंसानियत के बीच एक पल के लिए संघर्ष किया। और इंसानियत जीत गई।

उसने धीरे से सिर हिलाया। "ठीक है। मैं यहीं हूँ।"

उस एक वाक्य ने कमरे का पूरा माहौल बदल दिया। लाइट बंद हो गई। सिर्फ खिड़की से सड़क की पीली रोशनी अंदर आ रही थी। दोनों बिस्तर के दो किनारों पर लेटे थे, एक-दूसरे को पीठ दिए हुए। हवा में दोनों की साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।

तभी बाहर गली में किसी बाइक के हॉर्न की तेज़ आवाज़ आई। लीना डरकर सिहर उठी और चीखते-चीखते बची। वह अनजाने में ही खिसककर राज के करीब आ गई और उसका मज़बूत बाजू पकड़ लिया। उसकी पकड़ में मौत जैसी दहशत थी।

"शांत," राज फुसफुसाया और करवट बदलकर उसकी ओर हो गया। उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। "मैं यहीं हूँ। कोई तुम्हें कुछ नहीं करेगा।"

राज उसे सिर्फ़ सांत्वना दे रहा था, लेकिन उसके मज़बूत जिस्म की गर्मी और उसकी गहरी आवाज़ ने लीना के अंदर कुछ और ही जगा दिया। उसका काँपता हुआ शरीर अब भी काँप रहा था, लेकिन अब वजह सिर्फ डर नहीं थी।
 
राज के जिस्म से आती मर्दाना महक, उसके हाथ का भारीपन, यह सब उसके अंदर एक ऐसी आग सुलगा रहा था जो महीनों से बुझी पड़ी थी। वह एक औरत थी, और महीनों के संघर्ष और अकेलेपन ने उसकी जिस्मानी ज़रूरतों को दबा दिया था। आज, डर के उस चरम क्षण में, वह सारी दबी हुई इच्छाएँ सतह पर आ गईं।

वह खिसककर राज के और करीब आ गई, इतनी करीब कि उसके नर्म स्तन राज के सीने से छू रहे थे। राज एक पल के लिए चौंक गया। वह लीना के इरादों को समझ रहा था। वह उसे पीछे धकेल सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसे लीना के जिस्म की सिहरन अपने जिस्म में महसूस हो रही थी।

लीना ने हिम्मत करके अपना चेहरा ऊपर उठाया और अँधेरे में उसके होंठों को तलाशने लगी। जब उसके काँपते हुए होंठ राज के होंठों से मिले, तो यह एक विस्फोट जैसा था। यह चुंबन सांत्वना का नहीं था, यह भूख का था।

लीना उसे ऐसे चूम रही थी जैसे वह ज़िंदगी का आखिरी कतरा पी रही हो। उसकी जीभ राज के मुँह में अपना रास्ता बना रही थी, एक ऐसी बेताबी के साथ जिसने राज को भी हैरान कर दिया।

राज ने जवाब दिया। उसने लीना को अपनी बाँहों में भर लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। उसका एक हाथ लीना के बालों में था, और दूसरा उसकी पीठ को सहला रहा था, उसकी टी-शर्ट के अंदर फिसलकर उसकी नंगी त्वचा को छू रहा था। लीना की त्वचा रेशम जैसी मुलायम थी, लेकिन डर और उत्तेजना से गर्म हो रही थी।

उनके चुंबन गहरे और जंगली होते गए। कपड़े अब एक बाधा लग रहे थे। राज ने उसकी टी-शर्ट को ऊपर उठाया और उसे उसके सिर से निकाल दिया। पीली रोशनी में, उसके छोटे, सुडौल स्तन साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उनकी निपल्स सख्त हो चुकी थीं, जैसे वे राज के स्पर्श के लिए तड़प रही हों।

राज ने अपना मुँह उसके होंठों से हटाकर उसकी गर्दन पर ले गया। वह उसकी गर्दन को चूमता, चूसता और हल्के से काटता रहा। लीना की आहें अब सिसकियों में बदल रही थीं। उसका डर अब पूरी तरह से वासना में बदल चुका था।

"राज..." उसने हाँफते हुए कहा, "मुझे... मुझे डर लग रहा है।"

"मैं तुम्हारे डर को खत्म कर दूँगा," राज ने उसकी एक निपल को अपने मुँह में लेते हुए कहा।

लीना का शरीर बिजली के झटके की तरह कड़क गया। यह एहसास उसके लिए नया था। किसी ने उसे इस तरह से कभी नहीं चाहा था। राज उसकी निपल को अपनी जीभ से सहला रहा था, उसे धीरे-धीरे चूस रहा था। लीना की उंगलियाँ चादर को नोंच रही थीं।

राज का हाथ नीचे की ओर बढ़ा, उसके पजामे के नाड़े को खोला और उसे नीचे सरका दिया। वह अब उसके सामने पूरी तरह से नग्न थी। राज ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा। उसका शरीर दुबला था, लेकिन उसमें एक खूबसूरती थी। यह कामिनी के भरे हुए जिस्म जैसा नहीं था, यह एक संघर्ष करती हुई लड़की का शरीर था, लेकिन यह असली था।

राज ने अपनी उंगलियाँ उसके स्त्रीत्व के केंद्र पर रखीं। लीना नमी से गीली हो चुकी थी। जैसे ही राज की उंगलियों ने उसके दाने को छुआ, उसके मुँह से एक तेज़ आह निकली। वह अपनी कमर को ऊपर उठाने लगी, और ज़्यादा माँगने लगी।

"रुको मत... प्लीज़..." वह गिड़गिड़ा रही थी।

राज ने अपने कपड़े उतारे। उसका लिंग पूरी तरह से खड़ा हो चुका था, तनाव से फड़क रहा था। लीना ने अँधेरे में उसकी तरफ देखा और एक पल के लिए उसकी आँखों में फिर से डर आया, लेकिन इस बार यह डर किसी अनजाने सुख का था।

राज उसके ऊपर आया, अपने वज़न को अपनी कोहनियों पर संतुलित करते हुए। "तैयार हो?" उसने पूछा।

लीना ने जवाब में सिर्फ अपनी टाँगें और फैला दीं।

राज ने धीरे-धीरे खुद को उसके अंदर धकेला। लीना बहुत तंग थी। उसके अंदर आग की तरह गर्मी थी। जैसे ही राज पूरी तरह से उसके अंदर समा गया, दोनों के मुँह से एक गहरी आह निकली। एक पल के लिए वे दोनों स्थिर रहे, एक-दूसरे के जिस्म की गहराई को महसूस करते हुए।

फिर राज ने चलना शुरू किया। पहले धीरे-धीरे, एक लयबद्ध गति में। हर धक्के के साथ, लीना की आहें तेज़ होती जा रही थीं। यह सिर्फ़ संभोग नहीं था। यह एक अनुष्ठान था। राज अपने हर धक्के से उसके डर को बाहर निकाल रहा था, और लीना अपनी हर आह के साथ अपनी दबी हुई इच्छाओं को आज़ाद कर रही थी।

उनकी गति तेज़ होती गई। बिस्तर चरमराने लगा। कमरे में अब सिर्फ़ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़, उनकी हाँफती हुई साँसें और लीना की बेकाबू सिसकियाँ थीं।

"और ज़ोर से... राज... और..." वह चिल्ला रही थी।

राज ने उसे उसकी कमर से पकड़ा और अपनी पूरी ताकत से धक्के लगाने लगा। वह उसके अंदर इतनी गहराई तक जा रहा था, जहाँ कोई डर नहीं पहुँच सकता था। लीना का शरीर अब उसके नियंत्रण में नहीं था। वह चरमसुख की लहरों पर सवार थी।

अचानक, लीना का शरीर अकड़ गया। उसके मुँह से एक लंबी, दबी हुई चीख निकली और वह काँपने लगी। उसका अंदरूनी हिस्सा राज के लिंग को भींच रहा था, उसे अपने अंदर निचोड़ रहा था। इस एहसास ने राज को भी बर्दाश्त की हद से आगे धकेल दिया। लीना के चरमसुख की लहरों के साथ ही, राज भी एक गहरी दहाड़ के साथ उसके अंदर स्खलित हो गया।

कुछ पल तक दोनों उसी स्थिति में पड़े रहे। उनके शरीर पसीने से तर थे, उनकी साँसें किसी मैराथन धावक की तरह चल रही थीं। कमरे में वीर्य और स्त्री-रस की मिली-जुली गंध भर गई थी।

धीरे-धीरे, वे शांत हुए। राज उसके बगल में लेट गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया। लीना ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन यह डर के आँसू नहीं थे। यह एक ऐसे तूफान के बाद की शांति थी जिसने उसकी आत्मा को साफ कर दिया था।

"अब डर नहीं लग रहा," वह फुसफुसाई।

राज ने कुछ नहीं कहा, बस उसके बालों को सहलाता रहा। वह जानता था कि यह रात उन दोनों को हमेशा के लिए बदल देगी। यह केस अब सिर्फ़ एक नौकरी नहीं था। यह अब एक जुनून बन गया था। उसे कविता को ढूँढ़ना था, और उसे लीना को हर कीमत पर सुरक्षित रखना था। उसने एक गवाह के जिस्म में पनाह ली थी, और अब उस जिस्म की हिफाज़त उसका धर्म था।

◆◆◆
 
जब राज की आँख खुली, तो कमरे में सुबह की पहली पीली रोशनी खिड़की के गंदे शीशे से छनकर आ रही थी। एक पल के लिए उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ है। यह उसके अपने अपार्टमेंट की जानी-पहचानी खामोशी नहीं थी।

फिर उसे अपने सीने पर एक हल्का सा बोझ महसूस हुआ और रात की सारी घटनाएँ एक-एक करके उसके दिमाग में कौंध गईं। लीना किसी मासूम बच्ची की तरह उसके सीने पर सिर रखे सो रही थी। उसके चेहरे पर अब डर नहीं, बल्कि एक गहरा सुकून था। उसकी साँसें एक लय में चल रही थीं।

राज बिना हिले-डुले छत को घूरता रहा। रात के अँधेरे में जो हुआ, वह ज़रूरत और डर का नतीजा था। लेकिन सुबह की रोशनी हर चीज़ को उसकी असलियत दिखा देती है। उसने एक और रेखा पार कर ली थी। लीना एक गवाह थी, एक डरी हुई लड़की जिसने उस पर भरोसा किया था।

राज ने उसके डर को वासना की आग में जलाकर राख कर दिया था। उसे कोई अफ़सोस नहीं था। वह जानता था कि वह कोई संत नहीं है। वह एक ऐसा इंसान था जो नतीजों में विश्वास रखता था, चाहे उन तक पहुँचने का रास्ता कितना भी घुमावदार क्यों न हो।

उसने बहुत धीरे से लीना का सिर अपने सीने से उठाकर तकिये पर रखा और बिस्तर से उतर गया। कमरे में रात के उन्माद की गंध फैली हुई थी - पसीने, वीर्य और स्त्री-रस की एक तीखी, आदिम महक। राज ने अपने कपड़े पहने। जब लीना की आँख खुली, तो वह शर्म और एक अजीब सी तृप्ति के मिले-जुले भाव से राज को देख रही थी।

"मैं तुम्हारे लिए एक सुरक्षित जगह का इंतज़ाम कर रहा हूँ," राज ने बिना किसी भूमिका के कहा। उसकी आवाज़ में अब रात वाली नरमी नहीं थी, बल्कि एक पेशेवर ठंडक थी। "जब तक मैं वापस न आऊँ, तुम यहीं रहना और किसी के लिए दरवाज़ा मत खोलना।"

लीना ने सिर्फ़ सिर हिलाया। वह जानती थी कि वह अब सिर्फ़ एक गवाह नहीं थी, वह किसी न किसी तरह से इस आदमी से जुड़ चुकी थी।

लीना के कमरे से बाहर निकलकर राज ने एक गहरी साँस ली। उसका शरीर थका हुआ था, लेकिन उसका दिमाग़ तेज़ चल रहा था। अब उसका अगला निशाना था 'रिदम डांस अकादमी'। वह जानता था कि वह एक ऐसी दुनिया में क़दम रखने जा रहा है जहाँ इंसानियत की नहीं, बल्कि जिस्म और पैसे की बोली लगती है। और ऐसी दुनिया में शिकार करने के लिए, शिकारी जैसा ही बनना पड़ता है।

उसने शेट्टी की मदद से एक पुरानी होंडा सिटी और कुछ महंगे दिखने वाले कपड़े किराए पर लिए। जब उसने शीशे में खुद को देखा, तो उसे एक जासूस नहीं, बल्कि एक अमीर, अय्याश और थोड़ा ख़तरनाक दिखने वाला बिज़नेसमैन नज़र आया।

उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो शिकार को अपनी ओर खींचती थी। वह जानता था कि आज उसे अपने जिस्म को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना होगा। इस सोच ने उसके अंदर घिन नहीं, बल्कि एक अजीब सा नशा पैदा किया। वह इस खेल के लिए तैयार था।

रिदम डांस अकादमी जुहू की एक शांत गली में स्थित थी। बाहर कोई बड़ा बोर्ड नहीं था, बस एक छोटी सी पीतल की प्लेट पर खुदा हुआ था - 'RDA'। गेट पर दो भीमकाय बाउंसर खड़े थे। राज ने गाड़ी रोकी, तो एक वैले पार्किंग वाला तुरंत आकर दरवाज़ा खोलने के लिए खड़ा हो गया। राज ने उसे एक सौ का नोट थमाया और आत्मविश्वास के साथ अंदर की ओर बढ़ गया।

अंदर का नज़ारा वैसा ही था जैसा उसने कल्पना की थी, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा भव्य और कामुक। पूरा हॉल मंद नीली और गुलाबी रोशनी में नहाया हुआ था। हवा में महंगे परफ्यूम और सिगार का धुआँ घुला हुआ था। मखमली सोफों पर अधेड़ उम्र के, अमीर दिखने वाले आदमी बैठे व्हिस्की पी रहे थे।

हॉल के बीच में एक छोटा सा डांस फ्लोर था, जहाँ पाँच-छह जवान लड़कियाँ बहुत ही कम और पारदर्शी कपड़ों में संगीत पर अपने जिस्मों को ऐसे लहरा रही थीं कि देखने वालों की साँसें अटक जाएँ। यह एक सोने का पिंजरा था, जहाँ खूबसूरत तितलियों को पैसों के दम पर नचाया जा रहा था।

राज ने बार की तरफ जाकर एक महंगी स्कॉच का ऑर्डर दिया और एक कोने की टेबल पर जाकर बैठ गया। यहाँ से उसे पूरा हॉल नज़र आ रहा था। तभी उसकी नज़र उस औरत पर पड़ी जो इस पूरे सोने के पिंजरे की रानी मक्खी लग रही थी। उम्र चालीस के आसपास, लेकिन उसका कसा हुआ शरीर किसी तीस साल की औरत को भी मात दे रहा था।

उसने एक काले रंग की डिज़ाइनर साड़ी पहनी हुई थी, जो इतनी महीन थी कि उसके अंदर के सुडौल जिस्म की हर बनावट का अंदाज़ा लगाया जा सकता था। उसका ब्लाउज सिर्फ़ नाम के लिए था, जो उसकी गहरी दरार और भरे हुए स्तनों को मुश्किल से ढँक पा रहा था।

वह हर टेबल पर जा रही थी, अपने ग्राहकों से हँसकर बात कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी शातिर चमक थी जो बता रही थी कि इस पूरी सल्तनत पर उसी का आरके चलता है। वह एक ऐसी मकड़ी थी जो अपने रेशमी जाल में शिकार को फँसाकर उसका रस चूस लेती थी। यह मैडम रुखसाना थी।

राज ने जानबूझकर किसी भी लड़की में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। उसकी नज़रें सिर्फ़ एक जगह टिकी थीं - रुखसाना पर। वह उसके चलने के अंदाज़, उसकी कमर के घुमाव, और उसके बात करने के तरीके को देख रहा था। वह एक ऐसी औरत थी जो अपनी कामुकता को अपनी सबसे बड़ी ताक़त मानती थी।

उसकी यह तरकीब काम कर गई। कुछ देर बाद, रुखसाना खुद चलकर उसकी टेबल पर आई।

"आप यहाँ नए लग रहे हैं," उसकी आवाज़ शहद में डूबी हुई थी, लेकिन उसमें एक खनक थी।

"आपकी तारीफ़ सुनी थी, तो खुद को रोक नहीं पाया," राज ने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा।

रुखसाना मुस्कुराई। "यहाँ तारीफ़ करने वाले बहुत हैं, मिस्टर...?"

"शर्मा। आरके शर्मा," राज ने कहा, उसकी नज़रों को अपने ऊपर महसूस करते हुए।

"मि... शर्मा, क्या आपको हमारी पेशकश पसंद आई?" रुखसाना ने लड़कियों की ओर इशारा किया।

राज हँसा। "बच्चियाँ हैं। मुझे खिलौनों से खेलने का शौक़ नहीं है। मुझे... तजुर्बा पसंद है।" उसका इशारा साफ़ था।

रुखसाना की आँखों में एक पल के लिए हैरानी और फिर एक गहरी दिलचस्पी उभरी। आज तक किसी ने उससे इस तरह बात करने की हिम्मत नहीं की थी।

"तजुर्बे की क़ीमत बहुत ज़्यादा होती है, मिस्टर शर्मा।"

"मैं क़ीमत की परवाह नहीं करता," राज ने अपनी व्हिस्की का गिलास उठाते हुए कहा। "बस सौदा खरा होना चाहिए।"

रुखसाना की मुस्कुराहट अब और गहरी और रहस्यमयी हो गई। "आप मेरे साथ मेरे ऑफिस में चलिए। वहाँ हम आराम से... सौदे पर बात कर सकते हैं।"
 
मैडम रुखसाना का ऑफिस उसकी अपनी शख्सियत की तरह ही आलीशान और ख़तरनाक था। दीवारों पर डार्क वुड पैनलिंग थी। एक बड़ी सी महोगनी की मेज़, जिसके पीछे एक आलीशान लेदर की कुर्सी रखी थी।

रुखसाना ने खुद बार से एक क्रिस्टल के गिलास में अपने लिए वाइन डाली और राज की तरफ देखा। "आप क्या लेंगे?"

"वही जो मैं पी रहा था," राज ने कहा।

रुखसाना ने उसके लिए ड्रिंक बनाया और गिलास लेकर उसकी कुर्सी के पीछे आकर खड़ी हो गई। उसने गिलास राज को नहीं दिया, बल्कि उसके कंधे पर अपना एक हाथ रख दिया। उसके नाखून राज की शर्ट के ऊपर से उसकी त्वचा पर हल्के से चुभ रहे थे।

"तो बताइए, मिस्टर शर्मा। आप किस सौदे की बात कर रहे थे?" वह राज के कान में फुसफुसाई। उसकी गर्म साँसें राज की गर्दन पर एक सिहरन पैदा कर गईं।

"मुझे एक लड़की चाहिए," राज ने बिना हिले-डुले कहा। "नाम है कविता मेहरा। सुना है, पहले वह आपके कलेक्शन का सबसे कीमती हीरा थी।"

कविता का नाम सुनते ही रुखसाना का हाथ एक पल के लिए रुका। फिर वह हँसी, एक ऐसी हँसी जिसमें कोई गर्मी नहीं थी। "पुरानी बातें हो गईं, मिस्टर शर्मा। वह हीरा अब मेरे पास नहीं है।"

"मैं जानता हूँ," राज ने कहा। "लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि वह हीरा अब किसके ताज में लगा है।"

उसने अपनी जेब से नोटों की एक मोटी गड्डी निकाली और मेज़ पर रख दी।

रुखसाना ने गड्डी को देखा और फिर से हँस पड़ी। वह राज के सामने आकर मेज़ के किनारे पर बैठ गई, उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसक गया था, जिससे उसकी चिकनी जाँघों की झलक दिख रही थी।

"आप बहुत भोले हैं, मिस्टर शर्मा।

आपको लगता है कि मेरा हर राज़ इतनी आसानी से बिक जाता है?"

उसने गड्डी को छुआ तक नहीं। इसके बजाय, उसने अपना पैर उठाया और राज की टाँगों के बीच, उसके लिंग के ठीक ऊपर रख दिया। उसकी सैंडल की नुकीली एड़ी राज के पैंट पर एक उत्तेजक दबाव बना रही थी।

"कुछ राज़ की क़ीमत जिस्म से चुकानी पड़ती है," वह फुसफुसाई, और उसकी आँखों में एक भूखी चमक थी। "पहले मुझे यह देखना होगा कि आप क़ीमत चुकाने के क़ाबिल भी हैं या नहीं।"

राज का जिस्म तन गया। रुखसाना का यह सीधा हमला अप्रत्याशित था। लेकिन वह पीछे नहीं हटा। उसने अपना हाथ बढ़ाकर रुखसाना के पैर को उसकी जाँघ से पकड़ लिया।

"मैं हर तरह की क़ीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ," राज ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा। "बस यह याद रखना कि जब मैं वसूलता हूँ, तो पूरा वसूलता हूँ।"

राज के इस जवाब ने रुखसाना को और उत्तेजित कर दिया। उसे चुनौती पसंद थी। वह अपनी मेज़ से उठी और ऑफिस से सटे अपने निजी कमरे का दरवाज़ा खोला। "तो फिर आ जाओ। देखते हैं किसमें कितना दम है।"

रुखसाना का निजी कमरा किसी शाही बेडरूम जैसा था। एक बड़ा सा गोल बिस्तर, जिस पर सिल्क की काली चादरें बिछी थीं। मंद रोशनी और हवा में एक कामुक इत्र की महक। यह एक ऐसा चक्रव्यूह था जहाँ जिस्म और वासना के अलावा और किसी चीज़ की कोई जगह नहीं थी।

"कपड़े उतारो," रुखसाना ने आदेश दिया, जब वह खुद सोफे पर बैठकर वाइन पीने लगी। "मैं अपना सौदा खरीदने से पहले उसे अच्छी तरह देखना चाहती हूँ।"

यह एक अपमान था, एक चुनौती। राज एक पल के लिए रुका, और फिर मुस्कुराया। उसने धीरे-धीरे अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। उसने अपना ब्लेज़र उतारा, फिर शर्ट के बटन खोले। वह हर हरकत को धीरे-धीरे कर रहा था, जैसे वह भी इस खेल का मज़ा ले रहा हो। जब वह पूरी तरह नग्न हुआ, तो रुखसाना ने उसे सिर से पाँव तक देखा।

"हम्म... बुरा नहीं है," उसने कहा। "अब यहाँ आओ।"

राज बिस्तर की तरफ बढ़ा। रुखसाना ने उसे बिस्तर पर घुटनों के बल बैठने का इशारा किया। वह अब भी पूरी तरह से कपड़े पहने हुए थी, और राज उसके सामने एक जानवर की तरह नग्न था।

यह सत्ता का खेल था, और अभी सत्ता पूरी तरह से रुखसाना के हाथ में थी।

"मैंने सुना है तुम बहुत कुछ जानते हो," उसने राज के लिंग को देखते हुए कहा, जो अब धीरे-धीरे सख्त हो रहा था। "मुझे दिखाओ कि तुम्हारी ज़ुबान और क्या-क्या कर सकती है।"

यह आदेश साफ़ था। राज बिना कुछ कहे उसके पैरों के पास बैठ गया। उसने रुखसाना की साड़ी को ऊपर उठाया, उसकी पैंटी को नीचे खिसकाया और अपना चेहरा उसकी जाँघों के बीच ले गया।

जैसे ही राज की जीभ ने उसके योनि के केंद्र को छुआ, रुखसाना के मुँह से एक गहरी आह निकल गई। राज कोई नौसिखिया नहीं था। वह जानता था कि एक औरत को कैसे पागल किया जाता है।

उसकी जीभ एक कुशल कलाकार की तरह अपना काम कर रही थी। वह रुखसाना के दाने को चूस रहा था, उसे अपनी जीभ की नोक से सहला रहा था। रुखसाना, जो हमेशा नियंत्रण में रहती थी, अब बेकाबू हो रही थी। उसका जिस्म काँप रहा था, उसकी उंगलियाँ राज के बालों को नोंच रही थीं।

"आह... हाँ... वहीं... रुको मत..." वह सिसक रही थी।

राज उसे उसके चरमसुख के किनारे तक ले जाकर पीछे हट जाता। वह उसे तड़पा रहा था, उसे अपनी सत्ता का एहसास करा रहा था। जब रुखसाना तड़पकर लगभग गिड़गिड़ाने लगी, तब राज ने अपनी गति बढ़ाई और अपनी पूरी जीभ उसके अंदर डाल दी। रुखसाना एक जंगली जानवर की तरह चीख पड़ी और उसका शरीर चरमसुख की लहरों में ऐंठने लगा।

जब वह शांत हुई, तो वह हाँफ रही थी। उसकी आँखों में अब सत्ता का नशा नहीं, बल्कि एक गहरी वासना थी।

"अब मेरी बारी," यह कहकर उसने राज को बिस्तर पर धकेल दिया और खुद उसके ऊपर आ गई। उसने अपने कपड़े उतारे। उसका भरा हुआ, कसा हुआ जिस्म किसी देवी की मूर्ति जैसा लग रहा था।

उसने राज के लिंग को अपने हाथ में पकड़ा। "यह मेरा बदला लेगा," वह मुस्कुराई और उसे अपने मुँह में ले लिया।

रुखसाना का मुखमैथुन किसी कला से कम नहीं था। वह राज के लिंग को ऐसे चूस रही थी जैसे वह ज़िंदगी का अमृत हो।

लेकिन राज अब और इंतज़ार करने के मूड में नहीं था। उसने रुखसाना को अपनी कमर से पकड़ा और एक झटके में उसे पलटकर उसके नीचे आ गया। रुखसाना हैरान रह गई। सत्ता अब पलट चुकी थी।

"मैंने कहा था, मैं पूरा वसूलता हूँ," राज ने उसके कानों में फुसफुसाते हुए कहा और बिना किसी चेतावनी के अपना लिंग उसकी गर्म, गीली गुफा में उतार दिया।

रुखसाना चीख पड़ी। यह चीख दर्द की नहीं, बल्कि एक ऐसे सुख की थी जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी। राज अब किसी जानवर की तरह उस पर टूट पड़ा था।

उसके धक्के गहरे, तेज़ और जंगली थे। वह रुखसाना के जिस्म को अपनी मर्दानगी से रौंद रहा था। यह संभोग नहीं था, यह एक युद्ध था। दो ताकतवर जिस्म एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश कर रहे थे।

कमरे में सिर्फ़ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़, गालियाँ और आहें गूँज रही थीं। उन्होंने कई बार अपनी पोजीशन बदली। हर बार राज एक नए तरीके से उसे अपनी ताकत का एहसास कराता। वह उसे किसी खिलौने की तरह इस्तेमाल कर रहा था, और रुखसाना, जो हमेशा दूसरों को इस्तेमाल करती थी, आज इस खेल का मज़ा ले रही थी।

घंटों बाद, जब वे दोनों पूरी तरह से थककर, पसीने में लथपथ बिस्तर पर गिरे, तो कमरे में एक गहरी खामोशी थी। दोनों के जिस्म पर दाँतों और नाखूनों के निशान थे।

रुखसाना ने अपनी साँसों को काबू में करते हुए कहा, "तुम... तुम जानवर हो।"

"और तुम एक जंगली बिल्ली," राज ने कहा।

कुछ देर की खामोशी के बाद, रुखसाना उठी और उसने सिगरेट जलाई।

"पनवेल," उसने धुआँ छोड़ते हुए कहा। "विक्रम सिंह राठौड़ का फार्महाउस पनवेल में है। वह अपनी नई लड़कियों को वहीं रखता है। कविता ने उसके ड्रग्स के धंधे का कोई राज़ जान लिया था। वह भागने की कोशिश कर रही थी। राठौड़ ने उसे उसी फार्महाउस में कहीं कैद कर रखा है... या शायद... मार दिया है।"

उसने राज को एक पता दिया। "वहाँ जाना अपनी मौत को दावत देना है। वह जगह एक किला है।"

राज उठा और अपने कपड़े पहनने लगा। उसका शरीर दर्द कर रहा था, लेकिन उसे अपना इनाम मिल गया था।

"तुम्हारा असली नाम आरके शर्मा नहीं है, है ना?" रुखसाना ने पूछा।

राज ने कोई जवाब नहीं दिया, बस दरवाज़े की तरफ बढ़ गया।

"एक बात याद रखना, जासूस," रुखसाना ने पीछे से कहा। "अगर तुम उस किले से ज़िंदा वापस आ गए, तो यह बिस्तर हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करेगा।"

राज बाहर निकल आया। उसके मुँह में महंगी शराब और वासना का स्वाद था। उसका जिस्म थका हुआ था, लेकिन उसका दिमाग़ पहले से ज़्यादा तेज़ था। उसने एक और सौदा किया था, एक और जिस्म को फ़तह किया था, और अब वह अपने असली शिकार के और क़रीब पहुँच गया था।

◆◆◆
 
मैडम रुखसाना के वासना से भरे चक्रव्यूह से बाहर निकलकर राज जब अपने अपार्टमेंट पहुँचा, तो सुबह के चार बज रहे थे। उसका जिस्म बुरी तरह से थका हुआ था, लेकिन उसका दिमाग़ किसी रेस के घोड़े की तरह दौड़ रहा था।

रुखसाना के साथ जो हुआ, वह एक सौदा था, एक ज़रूरी गंदगी जिसमें उसे उतरना पड़ा। लेकिन उस सौदे ने उसे उसके शिकार के और क़रीब पहुँचा दिया था - विक्रम सिंह राठौड़।

राज ने दरवाज़ा खोला और सीधा शॉवर के नीचे जाकर खड़ा हो गया। वह गर्म पानी को अपने जिस्म पर बहने देता रहा, जैसे वह सिर्फ़ रुखसाना के इत्र की महक को ही नहीं, बल्कि उस पूरी रात के एहसास को भी अपने ऊपर से धो डालना चाहता हो। रुखसाना एक ज़हरीले फूल की तरह थी, खूबसूरत, नशीली, लेकिन जानलेवा। राज जानता था कि वह इस खेल में सिर्फ़ एक प्यादा था, असली खिलाड़ी तो राठौड़ था।

शॉवर से निकलकर उसने कॉफ़ी का एक बड़ा मग बनाया और अपने लैपटॉप पर बैठ गया। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसने विक्रम सिंह राठौड़ का नाम इंटरनेट पर खोजना शुरू किया।

कुछ फ़िल्मी पार्टियों की तस्वीरें और दो-चार बिज़नेस आर्टिकल के अलावा कुछ ख़ास नहीं मिला। पब्लिक में उसकी छवि एक अमीर और सफल फ़िल्म फाइनेंसर की थी। लेकिन राज जानता था कि असली कहानी इन चमकते हुए पन्नों के पीछे छिपी थी।

उसने अपने कुछ पुराने संपर्कों को फ़ोन लगाना शुरू किया। पहला फ़ोन उसने 'नक़वी' को किया, जो एक क्राइम रिपोर्टर था और अंडरवर्ल्ड की हर छोटी-बड़ी ख़बर रखता था।

"नक़वी, राज बोल रहा हूँ।"

"हाँ, जासूस, बोल। इतनी सुबह कैसे याद किया? कोई नई लाश मिली है क्या?" नक़वी की आवाज़ में हमेशा एक तरह की सनसनी रहती थी।

"लाश तो नहीं, लेकिन एक ज़िंदा शैतान के बारे में जानना है। विक्रम सिंह राठौड़।"

फ़ोन पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। "राज, किस पचड़े में पड़ गया है तू? उस आदमी का नाम लेना भी ख़तरनाक है। उसके हाथ बहुत ऊपर तक हैं... पॉलिटिक्स, पुलिस, अंडरवर्ल्ड... हर जगह। उसे कोई छू नहीं सकता।"

"उसका पनवेल वाला फार्महाउस... उसके बारे में क्या जानते हो?"

"उसे राठौड़ का 'किला' कहते हैं," नक़वी ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।

"परिंदा भी पर नहीं मार सकता। सुना है, उसके सारे काले धंधे वहीं से चलते हैं। नई लड़कियाँ, ड्रग्स, सब कुछ। लेकिन आज तक कोई सबूत नहीं मिला। जो भी ज़्यादा जानने की कोशिश करता है, वह... गायब हो जाता है।"

नक़वी से बात करके यह तो साफ़ हो गया था कि फार्महाउस पर सीधे हमला करना बेवकूफ़ी होगी। राज को और जानकारी चाहिए थी।

वह अभी अपनी अगली चाल सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी सुबह कौन हो सकता था? उसने अपनी मेज़ की दराज़ से अपनी पुरानी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और चुपचाप दरवाज़े की ओर बढ़ा।

"कौन है?"

कोई जवाब नहीं आया। बस दोबारा दस्तक हुई, इस बार और ज़ोर से।

राज ने एक गहरा साँस लिया और एक झटके में दरवाज़ा खोल दिया।

सामने दो भीमकाय आदमी खड़े थे। दोनों ने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट पहनी हुई थी। उनके चेहरे भावहीन थे और आँखें किसी मुर्दे की तरह ठंडी।

"राज शर्मा?" एक ने पूछा। उसकी आवाज़ पत्थर जैसी थी।

"हाँ, कहिए।"

"तुम्हारे लिए एक पैग़ाम है," दूसरे ने कहा और बिना किसी चेतावनी के एक ज़ोरदार घूँसा राज के पेट में मारा।

राज दर्द से दोहरा हो गया। इससे पहले कि वह सँभल पाता, दोनों उस पर टूट पड़े। राज ने अपनी फ़ौजी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए जवाबी हमला किया। उसने एक को लात मारकर गिरा दिया, लेकिन दूसरा ज़्यादा ताक़तवर था। उसने राज को पकड़ लिया और पहले वाले ने उसके चेहरे पर कई घूँसे मारे।

यह लड़ाई ज़्यादा देर नहीं चली। उनका मक़सद राज को मारना नहीं, सिर्फ़ डराना था। उन्होंने राज को ज़मीन पर गिरा दिया।

"राठौड़ साहब के मामलों से दूर रहो," पहले वाले ने ज़मीन पर पड़े राज के ऊपर झुककर कहा। "यह पहली और आख़िरी चेतावनी है। अगली बार बात करने के लिए तुम्हारी ज़ुबान नहीं होगी।"

यह कहकर वे दोनों ऐसे चले गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।

राज ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था। उसके होंठ से ख़ून बह रहा था और उसके पेट और पसलियों में तेज़ दर्द हो रहा था। उसका छोटा सा अपार्टमेंट तहस-नहस हो चुका था। ख़तरा अब सिर्फ़ एक आहट नहीं था, वह उसके दरवाज़े पर दस्तक देकर, उसे ज़ख़्मी करके जा चुका था।

अपमान और ग़ुस्से की एक लहर उसके जिस्म में दौड़ गई। दर्द से ज़्यादा उसे इस बात का गुस्सा था कि कोई उसके घर में घुसकर उसे इस तरह पीट गया। उसे इस दर्द, इस ग़ुस्से को बाहर निकालने के लिए एक ज़रिया चाहिए था।

उसने काँपते हाथों से अपना फ़ोन उठाया और एक नंबर मिलाया।

"हैलो?" दूसरी तरफ़ से एक नींद भरी, मीठी आवाज़ आई।

"कामिनी," राज की आवाज़ दर्द से कराह रही थी। "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।"

घंटे भर के अंदर कामिनी राज के अपार्टमेंट में थी। दरवाज़ा खुला पाकर और अंदर की हालत देखकर वह एक पल के लिए सहम गई। फिर उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे राज पर पड़ी। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँख के पास नीला पड़ गया था और वह अपनी पसलियों को पकड़कर बैठा था।

"हे भगवान, राज! यह सब क्या है?" वह भागकर उसके पास आई।

"कुछ नहीं। बिज़नेस का एक छोटा सा साइड इफ़ेक्ट," राज ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन दर्द से उसके चेहरे पर शिकन आ गई।

कामिनी का चेहरा चिंता और एक अजीब से उत्साह के मिले-जुले भाव से भर गया। उसे राज की यह ख़तरनाक दुनिया एक तरफ़ तो डराती थी, लेकिन दूसरी तरफ़ उसे अपनी ओर खींचती भी थी।

"रुको, मैं फर्स्ट-एड बॉक्स लाती हूँ," यह कहकर वह अंदर भागी।

वह वापस आई तो उसके हाथ में डिटॉल, रुई और मरहम की ट्यूब थी। वह किसी नर्स की तरह उसके सामने बैठ गई।

"शर्ट उतारो," उसने आदेश दिया।

राज ने दर्द से कराहते हुए अपनी शर्ट उतारी। उसकी छाती और पसलियों पर नीले-काले निशान पड़ गए थे।

"उफ़... इन लोगों ने तुम्हें बहुत बुरी तरह पीटा है," कामिनी ने धीरे से एक निशान पर अपनी उँगली फिराते हुए कहा।

उसका स्पर्श रुई से भी ज़्यादा मुलायम था।

उसने रुई को डिटॉल में डुबोया और बहुत धीरे-धीरे उसके होंठ के घाव को साफ़ करने लगी। डिटॉल की जलन से राज की आँखों में पानी आ गया, लेकिन कामिनी का चेहरा इतना क़रीब था कि उसे जलन से ज़्यादा एक अलग तरह का नशा महसूस हो रहा था। कामिनी की गर्म साँसें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं और उसकी आँखों में राज के लिए एक गहरी हमदर्दी और चाहत थी।
 
जब उसने घाव साफ़ कर दिया, तो वह नीचे की ओर झुकी और बहुत धीरे से उस घाव पर फूँक मारी। फिर उसने अपनी जीभ निकालकर उस घाव को हल्के से चाट लिया।

"यह सबसे अच्छा एंटीसेप्टिक है," वह शरारत से मुस्कुराई।

राज का जिस्म तन गया। दर्द और वासना का यह कॉकटेल उसके ख़ून में आग लगा रहा था।

कामिनी अब उसकी पसलियों पर मरहम लगा रही थी। उसकी उँगलियाँ राज के जिस्म पर ऐसे फिसल रही थीं जैसे वे किसी वाद्य यंत्र के तार छेड़ रही हों। वह जानबूझकर हर निशान पर थोड़ा ज़्यादा वक़्त लगा रही थी, उसे अपनी छुअन से तड़पा रही थी।

"लगता है तुम्हें फिर से मेरे ख़ास 'इलाज' की ज़रूरत पड़ गई," वह फुसफुसाई, और उसका चेहरा राज के चेहरे के और क़रीब आ गया। "तुम्हारे जिस्म में बहुत दर्द और तनाव भर गया है। मुझे उसे बाहर निकालना होगा।"

राज ने अपना एक हाथ बढ़ाकर उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। "तो इंतज़ार किसका कर रही हो, डॉक्टर?"

कामिनी हँसी, और उसकी हँसी किसी संगीत की तरह थी। "मरीज़ इतना बेताब हो रहा है।"

यह कहकर वह नीचे झुकी और जहाँ उसने अपनी जीभ से चाटा था, उसी जगह पर अपने होंठ रख दिए। यह चुंबन गहरा, भूखा और उन्मादी था। यह सिर्फ़ एक चुंबन नहीं था, यह एक वादा था - एक ऐसी रात का वादा जो दर्द को मिटाकर जिस्म में सिर्फ़ और सिर्फ़ जुनून भर देगी।

वह चुंबन किसी बाँध के टूटने जैसा था। राज का सारा ग़ुस्सा, सारा अपमान और दर्द उस एक चुंबन में पिघलकर वासना बन गया। उसने कामिनी को अपनी गोद में खींच लिया और उसे ऐसे चूमने लगा जैसे वह सदियों का प्यासा हो। कामिनी भी पूरी तरह से उसका साथ दे रही थी, उसकी जीभ राज की जीभ से लड़ रही थी, एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश कर रही थी।

"बेडरूम में," राज ने हाँफते हुए कहा और उसे अपनी गोद में उठाए हुए ही बेडरूम की तरफ़ बढ़ गया। हर क़दम पर उसकी पसलियों में दर्द की एक लहर उठती, लेकिन कामिनी के जिस्म का भार और उसके होंठों का स्वाद उस दर्द पर हावी हो रहा था।

उसने कामिनी को बिस्तर पर फेंका और उसके ऊपर आ गया। उनके कपड़े कैसे उतरे, उन्हें पता ही नहीं चला। वे एक-दूसरे के जिस्म पर भूखे जानवरों की तरह टूट पड़े थे। राज कामिनी के हर इंच को चूम रहा था, काट रहा था, उस पर अपने अधिकार के निशान छोड़ रहा था। वह उन गुंडों से मिले ज़ख़्मों का बदला कामिनी के जिस्म से ले रहा था।

"आराम से, मेरे शेर," कामिनी ने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ाते हुए कहा।

"तुम्हें चोट लगी है।"

"तुम मेरा इलाज हो," राज ने उसकी गर्दन और स्तनों के बीच की घाटी में अपना चेहरा छिपाते हुए कहा। उसने कामिनी के एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे किसी बच्चे की तरह चूसने लगा।

कामिनी की आहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। उसे राज का यह जंगली रूप पसंद था। वह जानती थी कि वह ज़ख़्मी है, और ज़ख़्मी शेर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है।

जब भी राज का हाथ या जिस्म का कोई हिस्सा उसकी चोट से टकराता, उसके मुँह से दर्द की एक सिसकी निकल जाती। और दर्द का वह एहसास जैसे उसकी हवस को और बढ़ा देता। वह कामिनी को और ज़ोर से पकड़ लेता, उसके अंदर और गहराई तक जाने की कोशिश करता।

कामिनी ने इस खेल को एक नया मोड़ दिया। वह उसके ऊपर आ गई।

"अब तुम आराम करो," उसने राज की आँखों में देखते हुए कहा। "इलाज मैं करूँगी।"

उसने राज के लिंग को अपने हाथ में पकड़ा और धीरे-धीरे उस पर बैठ गई।

राज की आँखें सुख से बंद हो गईं।

कामिनी अब पूरी तरह से नियंत्रण में थी। वह अपनी कमर को बहुत धीरे-धीरे, एक लय में घुमा रही थी। उसके लंबे बाल किसी काले झरने की तरह राज के सीने पर फैल गए थे।

"मैं तुम्हारा सारा दर्द चूस लूँगी," वह फुसफुसाई और नीचे झुककर उसे चूमने लगी।

वह जानती थी कि राज की पसलियों में दर्द है, इसलिए वह अपने जिस्म को ऐसे चला रही थी कि उस पर कम से ज़्यादा दबाव पड़े। वह एक कुशल नर्तकी की तरह थी, जो दर्द और जुनून के संगीत पर नाच रही थी।

राज ने अपनी आँखें खोलीं और उसे देखा। पसीने की बूँदें कामिनी के माथे से फिसलकर उसकी छाती पर गिर रही थीं। उसकी आँखें वासना से भरी हुई थीं। वह किसी देवी की तरह लग रही थी, एक ऐसी देवी जो दर्द हरकर सुख प्रदान करती हो।

लेकिन राज ज़्यादा देर तक निष्क्रिय नहीं रह सकता था। उसने कामिनी की कमर को पकड़ा और एक झटके में उसे पलट दिया।

"नहीं," वह गुर्राया। "आज मैं तुम्हें बताऊँगा कि दर्द में कितना मज़ा आता है।"

यह कहकर उसने अपनी पूरी ताक़त से धक्के लगाने शुरू कर दिए। यह संभोग अब इलाज नहीं, बल्कि एक जंग बन चुका था, एक ऐसी जंग जिसमें दोनों जीतना चाहते थे।
 
कमरे का माहौल किसी तूफ़ान के केंद्र जैसा हो गया था। बिस्तर चरमरा रहा था, दीवारें उनकी कामुक चीखों से गूँज रही थीं। राज और कामिनी एक-दूसरे के जिस्म में ऐसे खो गए थे जैसे दुनिया में और कुछ बाकी ही न हो। राज का ग़ुस्सा अब पूरी तरह से हवस में बदल चुका था। वह कामिनी के जिस्म के हर कोने को फ़तह कर लेना चाहता था।

"राज... बस... मैं और नहीं..." कामिनी हाँफते हुए बोली, लेकिन उसकी आँखों की चमक और उसके जिस्म की अकड़न बता रही थी कि वह झूठ बोल रही है।

"चुप रहो!" राज ने उसकी गर्दन को हल्के से चूसते हुए कहा। "अभी तो बस शुरुआत हुई है।"

उसने कामिनी को बिस्तर के किनारे पर पेट के बल लिटा दिया और पीछे से उसके अंदर प्रवेश कर गया। यह पोज़िशन और भी ज़्यादा गहरी और पाशविक थी। राज उसके कूल्हों को पकड़कर किसी जंगली जानवर की तरह उसे पेल रहा था। कामिनी अपना चेहरा तकिये में छिपाकर सिसक रही थी, उसकी सिसकियों में दर्द और सुख का एक अजीब सा संगम था।

राज को महसूस हो रहा था कि वह अपने चरम पर पहुँचने वाला है। उसके जिस्म की सारी ताक़त, सारा ग़ुस्सा, सारा दर्द अब उसके लिंग के सिरे पर जमा हो गया था।

"मेरे साथ, कामिनी... अभी!" वह चिल्लाया।

और फिर दोनों के जिस्म एक साथ अकड़ गए। राज एक गहरी दहाड़ के साथ कामिनी के अंदर स्खलित हो गया, और उसी पल कामिनी का जिस्म भी चरमसुख की लहरों में काँप उठा।

एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया। दोनों पसीने में लथपथ, बेजान से एक-दूसरे पर पड़े थे। राज का सिर कामिनी की पीठ पर था, और उसकी साँसें किसी तूफ़ान के बाद की हवा की तरह चल रही थीं।

उन्हें लगा था कि सब खत्म हो गया। लेकिन राख के नीचे चिंगारी अभी बाकी थी।

कुछ मिनटों की खामोशी के बाद, राज ने अपना सिर उठाया। उसके जिस्म का दर्द अब काफ़ी कम हो गया था, जैसे संभोग ने किसी पेनकिलर का काम किया हो। लेकिन उसके दिमाग़ में राठौड़ के गुंडों के चेहरे घूम रहे थे। उसका अपमान अभी भी ताज़ा था। उसे और चाहिए था। उसे सिर्फ़ जिस्मानी राहत नहीं, बल्कि अपनी मर्दानगी का पूरा एहसास चाहिए था।

उसने धीरे से कामिनी के बालों को सहलाना शुरू किया। फिर वह उसके कान को चूमने लगा।

कामिनी मुस्कुराई। "अभी भी मन नहीं भरा, ज़ख़्मी शेर?"

"यह मेरे ग़ुस्से को शांत करने के लिए काफ़ी नहीं था," राज ने कहा और कामिनी को अपनी ओर पलटा लिया।

इस बार उनका मिलना अलग था। इसमें पहली बार वाली जंगली और ग़ुस्सा नहीं था। यह धीमा, गहरा और ज़्यादा कामुक था। वे एक-दूसरे को ऐसे खोज रहे थे

जैसे वे पहली बार मिल रहे हों। राज का हर स्पर्श, हर चुंबन अब सिर्फ़ हवस नहीं, बल्कि एक तरह का अधिकार जता रहा था। वह कामिनी के जिस्म के ज़रिए अपनी टूटी हुई हिम्मत को वापस जोड़ रहा था।

वे घंटों तक एक-दूसरे में खोए रहे। उन्होंने कई बार प्यार किया, हर बार एक नए अंदाज़ में, एक नई गहराई के साथ। उन्होंने एक-दूसरे के जिस्म के हर राज़ को खोला, हर इच्छा को पूरा किया।

जब आख़िरी बार वे एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह किसी ज्वालामुखी के फटने जैसा था। यह सिर्फ़ वीर्य का स्खलन नहीं था, यह राज की आत्मा का शुद्धिकरण था। वह अपने सारे दर्द, सारे अपमान और सारी हताशा को कामिनी के जिस्म की आग में जलाकर राख कर चुका था।

रात ढल चुकी थी। कामिनी उसकी बाँहों में सो रही थी। राज की आँखों में नींद नहीं थी। उसके जिस्म का दर्द अब एक मीठी सी थकावट में बदल गया था। लेकिन उसका दिमाग़... उसका दिमाग़ अब बर्फ़ की तरह ठंडा और किसी रेज़र की तरह तेज़ था।

उस रात के उन्माद ने उसे तोड़कर फिर से जोड़ दिया था। वह अब पहले से ज़्यादा ख़तरनाक और ज़्यादा केंद्रित था।

उसने अँधेरे में घूरते हुए क़सम खाई। विक्रम सिंह राठौड़ ने उसे ज़ख़्मी करके बहुत बड़ी ग़लती कर दी थी। अब यह जासूस सिर्फ़ अपनी क्लाइंट के लिए नहीं, बल्कि अपने ज़ख़्मों के इंतक़ाम के लिए भी लड़ेगा। कामिनी अपने घर चली गई और राज ने सोचा कि यह जगह उसके लिए अब सुरक्षित नहीं है।

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कामिनी के जाने के बाद, रात के अँधेरे को चीरती हुई राज की बाइक आख़िरकार 'शर्मा जी का ढाबा' के सामने आकर रुकी। ढाबा बंद हो चुका था, लेकिन पीछे बने छोटे से क्वार्टर की एक खिड़की से हल्की सी रोशनी छनकर आ रही थी। राज का जिस्म दर्द से टूट रहा था।

कामिनी के साथ गुज़री रात ने उसके ग़ुस्से को शांत कर दिया था, लेकिन उसके ज़ख़्म अभी भी ताज़ा थे। उसका अपना अपार्टमेंट अब सुरक्षित नहीं था। उसे एक ऐसी जगह की ज़रूरत थी जहाँ वह कुछ देर के लिए दुनिया की नज़रों से ओझल होकर अपनी अगली चाल सोच सके।

और इस पूरे शहर में अनुराधा जी के ढाबे से ज़्यादा महफ़ूज़ उसे कोई और जगह महसूस नहीं होती थी।

उसने हिम्मत करके क्वार्टर के दरवाज़े पर दस्तक दी। कुछ पल की खामोशी के बाद, अंदर से अनुराधा की सख़्त आवाज़ आई, "कौन है इस वक़्त?"

"मैं हूँ, राज," उसकी अपनी आवाज़ उसे थकी हुई और टूटी हुई लगी।

दरवाज़े का बोल्ट खुलने की आवाज़ आई और दरवाज़ा खुला। सामने अनुराधा जी खड़ी थीं, एक साधारण सी सूती साड़ी में। उनके चेहरे पर नींद और हैरानी के भाव थे। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र राज के ज़ख़्मी चेहरे और सूजे हुए होंठों पर पड़ी, उनके चेहरे के सारे भाव एक गहरी, शांत चिंता में बदल गए।

उन्होंने कुछ नहीं पूछा। न कोई सवाल, न कोई ताना। बस दरवाज़े से एक तरफ़ हट गईं और उसे अंदर आने का इशारा किया।

कमरा साफ़-सुथरा और सादगी से भरा था। अनुराधा की अपनी शख्सियत की तरह। उन्होंने राज को एक कुर्सी पर बैठने को कहा और खुद अंदर किचन से पानी लेने चली गई।

"किससे दुश्मनी मोल ले ली इस बार?" उन्होंने उसे पानी देते हुए कहा। उनकी आवाज़ में डाँट नहीं, बल्कि एक हक़ वाली परवाह थी।

राज ने उसे सब कुछ बता दिया। कविता के केस से लेकर, रुखसाना के क्लब और राठौड़ के गुंडों के हमले तक। वह बोलता रहा और अनुराधा खामोशी से सुन रही थी। अनुराधा ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा, उसका स्पर्श किसी माँ की तरह नर्म, लेकिन किसी मरहम की तरह असरदार था। उसके हाथों में वह जादू था जो दर्द को सोख लेता था।

जब उसने राज के चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले लिया, उसकी आँखें राज की आँखों में झाँक रही थीं।

"तुम पागल हो, राज," वह फुसफुसाई।

"तुम्हें पता है तुम आग से खेल रहे हो?"

"मैं एक जासूस हूँ, अनुराधा जी। आग से खेलना मेरा काम है," राज ने कहा।

"मैं तुम्हारी बॉस या क्लाइंट नहीं हूँ, राज। मुझे अनुराधा कहो," उसने कहा, और उसकी पकड़ राज के चेहरे पर और मज़बूत हो गई। "और मुझे तुम्हारी परवाह है। मैं तुम्हें इस तरह किसी और के हाथों पिटते हुए नहीं देख सकती।"

उसकी आँखों में आँसू छलक आए। राज ने अपनी ज़िंदगी में अनुराधा को कभी इतना कमज़ोर या भावुक नहीं देखा था। वह हमेशा एक चट्टान की तरह मज़बूत नज़र आती थी। उसका यह रूप देखकर राज के अंदर कुछ पिघल गया।

उसने अपना हाथ बढ़ाकर अनुराधा के गाल पर रखा और उसके आँसू को पोंछ दिया।

"मुझे कुछ नहीं होगा," उसने कहा।

"मुझे पता है," अनुराधा ने कहा। "लेकिन शायद मैं यह नहीं जानती कि अगर तुम्हें कुछ हो गया... तो मेरा क्या होगा।"

और इन्हीं शब्दों के साथ, सालों से उन दोनों के बीच दबी हुई एक अनकही भावना सतह पर आ गई। अनुराधा नीचे झुकी, और उसके होंठ राज के ज़ख़्मी होंठों से मिल गए।

यह चुंबन किसी हवस की शुरुआत नहीं था, यह दो तन्हा रूहों का मिलन था, जो एक-दूसरे की ताक़त और कमज़ोरी, दोनों से प्यार करते थे। इस एक चुंबन के साथ, एक नया अध्याय शुरू हो चुका था, एक ऐसा अध्याय जो सिर्फ़ जिस्मों का नहीं, बल्कि आत्माओं का भी था।

वह चुंबन गहरा होता गया। अनुराधा के आँसुओं का खारा स्वाद राज के मुँह में घुल रहा था, और उसके होंठों की नरमी उसके ज़ख़्मों पर मरहम का काम कर रही थी। यह कामिनी की शरारत भरी प्यास या रुखसाना की ठंडी हवस जैसा नहीं था। यह कुछ और था... यह सम्मान था, समर्पण था।

अनुराधा ने खुद को पीछे किया और उसकी आँखों में देखा। "आज रात तुम यहीं रुकोगे।" यह कोई सवाल नहीं था, यह एक आदेश था, एक ऐसा आदेश जिसे राज खुशी-खुशी मानने के लिए तैयार था।

वह उसका हाथ पकड़कर उसे अपने छोटे से, सादे बेडरूम में ले गई। बिस्तर करीने से लगा हुआ था, और कमरे में मसालों और ताज़गी की एक मिली-जुली महक थी, जो अनुराधा की अपनी महक थी।

उसने राज को बिस्तर पर बिठाया और खुद उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने कुछ कहा नहीं, बस धीरे-धीरे राज के जूते और फिर उसके मोज़े उतारे।

उसका हर स्पर्श एक पूजा की तरह था।

फिर वह उठी और अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया। "तुम्हारे जिस्म को आराम की ज़रूरत है," उसने कहा और गर्म पानी और तौलिया ले आई। उसने बहुत धीरे-धीरे राज के पूरे शरीर को, उसके ज़ख़्मों को बचाते हुए, पोंछना शुरू किया।

राज किसी बच्चे की तरह खामोश बैठा था, अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी को इस तरह अपनी परवाह करते हुए देख रहा था।

जब उसका शरीर साफ़ हो गया, तो अनुराधा ने अपनी साड़ी के पल्लू से उसका चेहरा पोंछा।

"अब मेरी बारी," राज ने उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ते हुए कहा।
 
अनुराधा मुस्कुराई। उसने अपनी साड़ी के हुक खोले और वह रेशमी कपड़ा किसी झरने की तरह ज़मीन पर ढेर हो गया। पेटीकोट और ब्लाउज़ में, उसका भरा हुआ, कसा हुआ शरीर किसी प्राचीन मंदिर की मूर्ति की तरह लग रहा था।

यह किसी युवा लड़की का अपरिपक्व शरीर नहीं था, यह एक औरत का शरीर था, जिसने ज़िंदगी को जिया था, जिसने संघर्ष किया था। और आज, यह शरीर सिर्फ़ राज का था।

राज ने उसे अपनी ओर खींचा और उसके ब्लाउज़ के बटन खोल दिए। अनुराधा ने कोई प्रतिरोध नहीं किया, बस अपनी आँखें बंद कर लीं। राज ने उसके शरीर के हर इंच को ऐसे चूमा जैसे वह किसी पवित्र ग्रंथ को पढ़ रहा हो। वह उसके पेट पर पड़े स्ट्रेच मार्क्स को चूम रहा था, उसकी पीठ के तिल को चूम रहा था। वह उसके शरीर की हर कहानी को अपने होठों से पढ़ रहा था।

जब वे दोनों पूरी तरह से नग्न थे, तो अनुराधा उसके ऊपर आ गई। "तुम्हें चोट लगी है," उसने कहा। "आज रात, मैं तुम्हें अपनी दुनिया की सैर कराऊँगी।"

यह कहकर वह धीरे-धीरे राज के लिंग पर बैठ गई। राज के मुँह से एक गहरी, संतुष्टि भरी आह निकल गई। अनुराधा की योनि गर्म और गीली थी, और वह उसे अपने अंदर ऐसे समा रही थी जैसे वह उसी के लिए बनी हो।

उसने अपनी कमर को घुमाना शुरू किया। उसकी गति में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। यह एक धीमा, गहरा और रूहानी मिलन था। राज नीचे लेटा हुआ बस अपनी आँखों से उसे देख रहा था। अनुराधा की आँखें बंद थीं, उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी।

उसके स्तन हर हरकत के साथ हल्के-हल्के हिल रहे थे। राज ने अपना हाथ बढ़ाकर उसके एक स्तन को अपनी हथेली में भर लिया। वह किसी पके हुए फल की तरह नर्म और भारी था। इस संभोग में वासना से ज़्यादा सुकून था, एक ऐसा सुकून जो राज ने पहले कभी महसूस नहीं किया था।

कुछ देर बाद, जब उनके जिस्मों की पहली प्यास बुझ गई, तो वे एक-दूसरे की बाँहों में लेटे थे। कमरे में रात की खामोशी और उनकी साँसों की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं था।

"तुम राठौड़ के बारे में कुछ और जानती हो, है ना?" राज ने अनुराधा के बालों को सहलाते हुए पूछा।

अनुराधा ने एक गहरी साँस ली। "हाँ," वह फुसफुसाई। "बहुत साल पहले, जब मैंने यह ढाबा नया-नया शुरू किया था... तब वह इतना बड़ा आदमी नहीं था। वह हफ़्ता वसूली के लिए गुंडे भेजता था। मैंने पैसे देने से इनकार कर दिया था।"

राज का हाथ रुक गया।

"उसने मेरे ढाबे में आग लगवा दी थी," अनुराधा की आवाज़ में एक पुराना दर्द था। "सब कुछ जलकर राख हो गया था। मैं भी उस आग में मरते-मरते बची। मेरे चेहरे पर यह निशान..." उसने अपने आईब्रो के पास एक हल्के से निशान की ओर इशारा किया, "...उसी आग की देन है।"

राज ने नीचे झुककर उस निशान को चूम लिया। "तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"

"यह मेरा अतीत था, राज। मैं उसे दोबारा नहीं जीना चाहती थी। लेकिन आज, तुम्हें इस हालत में देखकर... वह सारी आग मेरे अंदर फिर से जल उठी है।"

उसने राज का चेहरा अपने हाथों में लिया। "उस शैतान को खत्म कर दो, राज। सिर्फ़ कविता के लिए नहीं, सिर्फ़ उन हज़ारों लड़कियों के लिए नहीं जिन्हें वह अपनी हवस का शिकार बनाता है... बल्कि मेरे लिए भी। मेरे उस जले हुए ढाबे के लिए। मेरे इस निशान के लिए।"

उसकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि आग थी। एक ऐसी आग जिसने राज के अंदर के बारूद में भी आग लगा दी।

उसने अनुराधा को अपनी नीचे खींचा और उसे दीवानों की तरह चूमने लगा। अब यह संभोग सुकून का नहीं, बल्कि एक क़सम का था, एक संकल्प का था।

"मैं उसे खत्म कर दूँगा, अनुराधा," उसने उसके कानों में गुर्राते हुए कहा। "मैं उसे तुम्हारी आँखों के सामने घुटनों पर ला दूँगा।"

उनका दूसरा मिलन पहले वाले से बिलकुल अलग था। यह जंगली, उन्मादी और आग से भरा था। अब राज के ज़ख़्मों का दर्द गायब हो चुका था। अब उसके जिस्म में सिर्फ़ एक ही एहसास था - इंतक़ाम।

वह अनुराधा को ऐसे ले रहा था जैसे वह राठौड़ के साम्राज्य को अपनी मर्दानगी से रौंद रहा हो। उसके हर धक्के में एक वादा था, एक क़सम थी। और अनुराधा भी पूरी तरह से उसका साथ दे रही थी। वह अपनी योनि को उसके लिंग पर ऐसे भींच रही थी जैसे वह अपनी सारी ताक़त राज को दे रही हो।

वे एक-दूसरे के जिस्म पर अपनी सत्ता नहीं, बल्कि अपना दर्द और अपना ग़ुस्सा साझा कर रहे थे। यह दो योद्धाओं का मिलन था, जो एक बड़ी लड़ाई से पहले एक-दूसरे की आत्माओं को एक कर रहे थे।

जब आख़िरी बार वे एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह सिर्फ़ एक जिस्मानी स्खलन नहीं था। यह एक भावनात्मक विस्फोट था। राज अनुराधा के अंदर दहाड़ रहा था, और अनुराधा उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ाकर चीख रही थी।

यह दो जिस्मों का नहीं, बल्कि दो संकल्पों का मिलन था, जो एक होकर एक ज्वालामुखी बन गए थे।
 
जब सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, तो वे दोनों एक-दूसरे की बाँहों में सो रहे थे। राज की नींद खुली तो उसने अनुराधा को अपने पास सोते हुए देखा। उसके चेहरे पर एक मासूमियत और एक शांति थी। रात के तूफ़ान ने सब कुछ धोकर साफ़ कर दिया था।

वह उठा और बाहर ढाबे के किचन में जाकर दो कप चाय बनाकर ले आया। जब अनुराधा की आँख खुली, तो राज चाय का कप लिए उसके पास बैठा था।

वे दोनों खामोशी से चाय पीते रहे। अब कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। रात ने उनके बीच के सारे फासले और सारे पर्दे हटा दिए थे। वे अब सिर्फ़ दोस्त या प्रेमी नहीं थे, वे अब एक-दूसरे के हमराज़ थे, एक टीम थे।

"तो अब क्या प्लान है?" अनुराधा ने पूछा।

"मैं आज रात उस फार्महाउस में घुसूँगा," राज ने कहा।

"अकेले? यह ख़ुदकुशी होगी।"

"मेरे पास एक आइडिया है," राज ने कहा। "राठौड़ हर हफ्ते अपने फार्महाउस पर एक प्राइवेट पार्टी रखता है, जिसमें वह नए 'टैलेंट' को अपने बड़े क्लाइंट्स के सामने पेश करता है। मुझे उस पार्टी में एक वेटर बनकर अंदर घुसना होगा।"

"यह बहुत ख़तरनाक है, राज।"

"मेरे लिए नहीं," राज मुस्कुराया। "क्योंकि इस बार मेरे साथ तुम हो।"

अनुराधा ने उसकी आँखों में देखा। उसे पता था कि वह राज को रोक नहीं सकती। और शायद वह रोकना चाहती भी नहीं थी।

"ठीक है," उसने कहा। "इस काम में गीता तुम्हारी मदद कर सकती है। वह शहर के सबसे बड़े कैटरर को जानती है जो ऐसी पार्टियों में खाना सप्लाई करता है। शायद वह तुम्हारी एंट्री करवा सके।"

राज को एक नई उम्मीद की किरण दिखाई दी। वह अनुराधा की ओर झुका और उसके माथे को चूम लिया।

"शुक्रिया," उसने कहा।

"शुक्रिया नहीं," अनुराधा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। "बस ज़िंदा वापस आना। क्योंकि अब... मुझे तुम्हारा इंतज़ार रहेगा।"

राज ने उसके हाथ को चूमा। वह अनुराधा के पास एक ज़ख़्मी और भटका हुआ इंसान बनकर आया था। और अब, वह एक नए मक़सद, एक नई ताक़त और एक नई साथी के साथ जा रहा था। यह रात सिर्फ़ वासना की रात नहीं थी, यह एक योद्धा के पुनर्जन्म की रात थी।

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