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अचानक सलीम में एक हैरतंगेज़ बदलाव पैदा हो गया। उसकी भौंहें तन गयीं। कुछ देर पहले जो होंट मुस्कुरा रहे थे, भिंच कर रह गये। आँखों की शरारत-भरी शोख़ी एक बहुत ही ख़ौफ़नाक क़िस्म की चमक में बदल गयी। वह अब तक एक हँसमुख नौजवान था। ऐसा मालूम हुआ जैसे उसके चेहरे पर से एक गहरी नक़ाब हट गयी हो। वह एक ख़ूँख़ार भेड़िये की तरह हाँफ रहा था।
‘‘इन रस्सियों को खोल दो, सुअर के बच्चे।’’ वह चीख़ कर बोला। ‘‘वरना मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूँगा।’’
‘‘धीरज रखो...धीरज...मेरे प्यारे बच्चे।’’ प्रोफ़ेसर ने मुड़ कर कहा। ‘‘कल तक मैं ज़रूर तुमसे ख़फ़ा था। मुझे इसका अफ़सोस है, लेकिन तुम इस वक़्त मेरी गिरफ़्त में हो... क़ातिल... साज़िशी...तुम बहुत ख़तरनाक होते जा रहे हो। ऐसी सूरत में तुम्हारी निगरानी की ज़रूरत है।’’
‘‘तुम दीवाने हो....बिलकुल दीवाने।’’ सलीम ने तेज़ी से कहा।
‘‘शायद ऐसा ही हो...!’’ प्रोफ़ेसर ने लापरवाही से कहा। ‘‘लेकिन मैं इतना दीवाना भी नहीं कि तुम्हारी साज़िशों को न समझ सकूँ। तुम अब तक मुझे एक बेजान औज़ार की तरह इस्तेमाल करते आये हो, लेकिन आज की रात मेरी है...क्या समझे।’’
सलीम के जिस्म से पसीना फूट पड़ा। ग़ुस्से की जगह ख़ौफ़ ने ले ली। वह अब तक प्रोफ़ेसर को पागल समझता था और जिधर उसे ले जाना चाहता था, वह बग़ैर समझे-बूझे चला जाता था, लेकिन फिर भी वह हमेशा होशियार रहा। उसने आज तक अपने असली प्लान की भनक भी प्रोफ़ेसर के कान में न पड़ने दी थी। फिर उसे उसके प्लान का पता कैसे चला? वह ख़ौफ़ज़दा ज़रूर था, लेकिन नाउम्मीद नहीं। क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के दूसरे पहलू की जानकारी प्रोफ़ेसर के अलावा किसी और को नहीं थी और प्रोफ़ेसर तो पागल था।’’
‘‘तुम क़त्ल की बात करते हो।’’ सलीम ने सुकून के साथ कहा। ‘ख़ुदा की क़सम अगर तुमने यह रस्सी फ़ौरन ही न ख़ोल दी तो मैं अपनी उस धमकी को पूरा कर दिखाऊँगा, जो अकसर तुम्हें देता रहा हूँ। मैं पुलिस को ख़बर दे दूँगा कि तुम क़ातिल हो। अपने असिस्टेंट के क़ातिल....!’’
‘‘मैं....!’’ प्रोफ़ेसर ने शरारती लहजे में कहा। ‘‘यह मैं आज एक नयी और दिलचस्प ख़बर सुन रहा हूँ। मैंने यह क़त्ल कब किया था।’’
‘‘कब किया था...!’’ सलीम ने कहा। ‘‘इतनी जल्दी भूल गये। क्या तुमने अपने असिस्टेंट नईम को अपने बनाये हुए ग़ुब्बारे में बिठा कर नहीं उड़ाया था, जिसका आज तक पता नहीं चल सका।’’
‘‘इन रस्सियों को खोल दो, सुअर के बच्चे।’’ वह चीख़ कर बोला। ‘‘वरना मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूँगा।’’
‘‘धीरज रखो...धीरज...मेरे प्यारे बच्चे।’’ प्रोफ़ेसर ने मुड़ कर कहा। ‘‘कल तक मैं ज़रूर तुमसे ख़फ़ा था। मुझे इसका अफ़सोस है, लेकिन तुम इस वक़्त मेरी गिरफ़्त में हो... क़ातिल... साज़िशी...तुम बहुत ख़तरनाक होते जा रहे हो। ऐसी सूरत में तुम्हारी निगरानी की ज़रूरत है।’’
‘‘तुम दीवाने हो....बिलकुल दीवाने।’’ सलीम ने तेज़ी से कहा।
‘‘शायद ऐसा ही हो...!’’ प्रोफ़ेसर ने लापरवाही से कहा। ‘‘लेकिन मैं इतना दीवाना भी नहीं कि तुम्हारी साज़िशों को न समझ सकूँ। तुम अब तक मुझे एक बेजान औज़ार की तरह इस्तेमाल करते आये हो, लेकिन आज की रात मेरी है...क्या समझे।’’
सलीम के जिस्म से पसीना फूट पड़ा। ग़ुस्से की जगह ख़ौफ़ ने ले ली। वह अब तक प्रोफ़ेसर को पागल समझता था और जिधर उसे ले जाना चाहता था, वह बग़ैर समझे-बूझे चला जाता था, लेकिन फिर भी वह हमेशा होशियार रहा। उसने आज तक अपने असली प्लान की भनक भी प्रोफ़ेसर के कान में न पड़ने दी थी। फिर उसे उसके प्लान का पता कैसे चला? वह ख़ौफ़ज़दा ज़रूर था, लेकिन नाउम्मीद नहीं। क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के दूसरे पहलू की जानकारी प्रोफ़ेसर के अलावा किसी और को नहीं थी और प्रोफ़ेसर तो पागल था।’’
‘‘तुम क़त्ल की बात करते हो।’’ सलीम ने सुकून के साथ कहा। ‘ख़ुदा की क़सम अगर तुमने यह रस्सी फ़ौरन ही न ख़ोल दी तो मैं अपनी उस धमकी को पूरा कर दिखाऊँगा, जो अकसर तुम्हें देता रहा हूँ। मैं पुलिस को ख़बर दे दूँगा कि तुम क़ातिल हो। अपने असिस्टेंट के क़ातिल....!’’
‘‘मैं....!’’ प्रोफ़ेसर ने शरारती लहजे में कहा। ‘‘यह मैं आज एक नयी और दिलचस्प ख़बर सुन रहा हूँ। मैंने यह क़त्ल कब किया था।’’
‘‘कब किया था...!’’ सलीम ने कहा। ‘‘इतनी जल्दी भूल गये। क्या तुमने अपने असिस्टेंट नईम को अपने बनाये हुए ग़ुब्बारे में बिठा कर नहीं उड़ाया था, जिसका आज तक पता नहीं चल सका।’’