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Diler mujrim ibne safi

अचानक सलीम में एक हैरतंगेज़ बदलाव पैदा हो गया। उसकी भौंहें तन गयीं। कुछ देर पहले जो होंट मुस्कुरा रहे थे, भिंच कर रह गये। आँखों की शरारत-भरी शोख़ी एक बहुत ही ख़ौफ़नाक क़िस्म की चमक में बदल गयी। वह अब तक एक हँसमुख नौजवान था। ऐसा मालूम हुआ जैसे उसके चेहरे पर से एक गहरी नक़ाब हट गयी हो। वह एक ख़ूँख़ार भेड़िये की तरह हाँफ रहा था।

‘‘इन रस्सियों को खोल दो, सुअर के बच्चे।’’ वह चीख़ कर बोला। ‘‘वरना मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूँगा।’’

‘‘धीरज रखो...धीरज...मेरे प्यारे बच्चे।’’ प्रोफ़ेसर ने मुड़ कर कहा। ‘‘कल तक मैं ज़रूर तुमसे ख़फ़ा था। मुझे इसका अफ़सोस है, लेकिन तुम इस वक़्त मेरी गिरफ़्त में हो... क़ातिल... साज़िशी...तुम बहुत ख़तरनाक होते जा रहे हो। ऐसी सूरत में तुम्हारी निगरानी की ज़रूरत है।’’

‘‘तुम दीवाने हो....बिलकुल दीवाने।’’ सलीम ने तेज़ी से कहा।

‘‘शायद ऐसा ही हो...!’’ प्रोफ़ेसर ने लापरवाही से कहा। ‘‘लेकिन मैं इतना दीवाना भी नहीं कि तुम्हारी साज़िशों को न समझ सकूँ। तुम अब तक मुझे एक बेजान औज़ार की तरह इस्तेमाल करते आये हो, लेकिन आज की रात मेरी है...क्या समझे।’’

सलीम के जिस्म से पसीना फूट पड़ा। ग़ुस्से की जगह ख़ौफ़ ने ले ली। वह अब तक प्रोफ़ेसर को पागल समझता था और जिधर उसे ले जाना चाहता था, वह बग़ैर समझे-बूझे चला जाता था, लेकिन फिर भी वह हमेशा होशियार रहा। उसने आज तक अपने असली प्लान की भनक भी प्रोफ़ेसर के कान में न पड़ने दी थी। फिर उसे उसके प्लान का पता कैसे चला? वह ख़ौफ़ज़दा ज़रूर था, लेकिन नाउम्मीद नहीं। क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के दूसरे पहलू की जानकारी प्रोफ़ेसर के अलावा किसी और को नहीं थी और प्रोफ़ेसर तो पागल था।’’

‘‘तुम क़त्ल की बात करते हो।’’ सलीम ने सुकून के साथ कहा। ‘ख़ुदा की क़सम अगर तुमने यह रस्सी फ़ौरन ही न ख़ोल दी तो मैं अपनी उस धमकी को पूरा कर दिखाऊँगा, जो अकसर तुम्हें देता रहा हूँ। मैं पुलिस को ख़बर दे दूँगा कि तुम क़ातिल हो। अपने असिस्टेंट के क़ातिल....!’’

‘‘मैं....!’’ प्रोफ़ेसर ने शरारती लहजे में कहा। ‘‘यह मैं आज एक नयी और दिलचस्प ख़बर सुन रहा हूँ। मैंने यह क़त्ल कब किया था।’’

‘‘कब किया था...!’’ सलीम ने कहा। ‘‘इतनी जल्दी भूल गये। क्या तुमने अपने असिस्टेंट नईम को अपने बनाये हुए ग़ुब्बारे में बिठा कर नहीं उड़ाया था, जिसका आज तक पता नहीं चल सका।’’
 
प्रोफ़ेसर ख़ामोश हो गया। उसके चेहरे पर अजीब क़िस्म की मुस्कुराहट नाच रही थी। ‘‘और हाँ, इसी हादसे के बाद से मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया और तुम्हें इस बात का पता चल गया था। लिहाज़ा तुमने मुझे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया और मुझसे नाजायज़ कामों में मदद लेते रहे। मुझसे रुपये ऐंठते रहे। लेकिन बरख़ुरदार, शायद तुम्हें इसका पता नहीं कि मैं हाल ही में एक सरकारी जासूस से मिल चुका हूँ। तुम डर क्यों रहे हो ? मैंने तुम्हारे बारे में उससे कुछ नहीं कहा। मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ, नईम मेरे ग़ुब्बारे के टूटने से मरा नहीं, बल्कि वह इस वक़्त भी मद्रास के किसी घटिया-से शराबख़ाने में नशे से चूर औंधा पड़ा होगा और मुझे इसका भी पता है कि उसने ज़िन्दा होने के जो ख़त मुझे लिखे थे, वे तुमने रास्ते ही से ग़ायब कर दिये। बहुत दिन हुए, तुम्हें उसके ज़िन्दा होने का सुबूत मिल गया था, लेकिन तुम मुझे पागल समझ कर रुपये ऐंठने के लिए अँधेरे ही में रखना चाहते थे। कहो मियाँ सलीम, कैसी रही! क्या अब मैं तुम्हें वे बातें भी बताऊँ जो मैं तुम्हारे बारे में जानता हूँ।’’

कुँवर सलीम सहम कर रह गया था। उसे ऐसा मालूम हो रहा था जैसे प्रोफ़ेसर का पागलपन किसी नये मोड़ पर पहुँच गया है। जिसे वह अब तक केचुआ समझता रहा, वह आज फन उठाये उस पर झपटने की कोशिश कर रहा है।

‘‘ख़ैर, प्रोफ़ेसर, छोड़ो इन बेकार की बातों को।’’ सलीम ने कोशिश करके हँसते हुए कहा। ‘‘मेरी रस्सियाँ खोल दो...आदमी बनो। तुम मेरे अच्छे दोस्त हो। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें इससे भी बड़ी दूरबीन ख़रीद दूँगा। इतनी बड़ी कि सचमुच एक शीशे का गुम्बद मालूम होगी।’’

‘‘ठहरो सलीम, ठहरो...!’’ प्रोफ़ेसर ने दूरबीन के शीशे पर झुक कर कहा। ‘‘मैं ज़रा बीमार के कमरे में देख लूँ। हाँ, तो अभी ऑपरेशन शुरू नहीं हुआ। ऐसे ख़तरनाक ऑपरेशनों में काफ़ी तैयारी की ज़रूरत होती है। मुझे यक़ीन है कि नौजवान डॉक्टर नवाब साहब की जान बचाने में कामयाब हो जायेगा। लेकिन सलीम, यह तो बड़ी बुरी बात है। अगर नवाब साहब दस-बीस बरस और ज़िन्दा रहे तो क्या होगा। तुम्हारी विरासत तुम तक जल्द न पहुँच सकेगी।’’

‘‘इससे क्या होता है।’’ सलीम ने कहा। ‘‘मैं हर हाल में उनका वारिस हूँ और फिर मुझे इसकी ज़रूरत ही क्या है। क्या मैं कम दौलतमन्द हूँ।’’

‘‘ख़ैर... ख़ैर...तुम्हारी दौलत का हाल तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ; इसीलिए तो एक बेबस बूढ़े से रुपये ऐंठते रहे। सुनो बेटे, मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम्हारी तंगहाली अब नवाब साहब की मौत की ख़्वाहिश रखती है, इसीलिए मैंने तुम्हें इस वक़्त तकलीफ़ दी है। मुझे उम्मीद है कि तुम एक अच्छे बच्चे की तरह इसका ख़याल न करोगे। क्या तुमने आज डॉक्टर तौसीफ़ को इसीलिए शहर नहीं भेज दिया था कि नौजवान डॉक्टर सचमुच पैदल आने पर मजबूर हो जाये।’’

‘‘क्या बकवास है।’’ सलीम ने दूसरी तरफ़ मुँह फेरते हुए कहा।

‘‘और फिर तुम एक रस्सी ले कर पेड़ पर चढ़ गये।’’ प्रोफ़ेसर बोलता रहा। ‘‘क्या तुम समझते हो कि मैं कुछ नहीं जानता। मैं यह भी जानता हूँ कि डॉक्टर शौकत बच कैसे गये, लेकिन मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा। तुम मुझे अँधेरे की चमगादड़ समझते हो और तुम्हारा ख़याल भी दुरुस्त है। अँधेरा मुझ पर सूरज की तरह रोशन रहता है। मैं इससे भी ज़्यादा जानता हूँ। मैं क्या नहीं जानता।’’

‘‘तुम कुछ नहीं जानते।’’ सलीम ने मुर्दा आवाज़ में कहा। ‘‘यह सिर्फ़ तुम्हारा ख़याल है।’’

‘‘तुम इसे ख़याल कह रहे हो, लेकिन यह सौ फ़ीसदी सच है। देखो सलीम, हम दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं। क्या मैं यह नहीं जानता कि डॉक्टर शौकत को क़त्ल कर देने की एक वजह और भी है, जिसका ताल्लुक़ ऑपरेशन से नहीं।’’

‘‘क्या...!’’ सलीम एकदम चौंक कर चीख़ा।

‘‘ठीक ठीक।’’ प्रोफ़ेसर ने सिर हिलाया। ‘‘तुम्हारी चीख़ ही इक़बाल-ए-जुर्म है। ‘‘क्या तुमने उस ख़ंजरबाज़ नेपाली को रुपये दे कर उसे क़त्ल करने के लिए राज़ी नहीं किया था। उस बेवकूफ़ ने धोखे में एक बेगुनाह औरत का क़त्ल कर दिया।’’

‘‘यह झूठ है....यह झूठ है।’’ सलीम बेसब्री से बोला। ‘‘लेकिन तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ। यह सिर्फ़ शक है...बिलकुल शक...!’’

‘‘मुझे यह सब कैसे मालूम हुआ, क्योंकि दुनिया में तुम्हीं एक बड़े चालाक नहीं हो। मुझे यह भी मालूम है कि उस दिन तुमने एक रिपोर्टर पर गोली चलायी थी और वह राइफ़ल मेरे हाथ में दे कर ख़ुद भाग गये थे। महज़ इसलिए कि मुझे पागल ख़याल करते हुए उस वाक़ये को महज़ इत्तफ़ाक़ समझा जाये। और कहो तो यह भी बता दूँ कि तुम उस रिपोर्टर को क्यों मारना चाहते हो। तुम उसे पहचान गये थे। तुम्हें यक़ीन हो गया था कि उसे तुम्हारी हरकतों का पता हो गया है। उस वक़्त तो वह बच गया था, लेकिन आखिरकार उसे तुम्हारी ही गोलियों से ज़ख़्मी होना पड़ा...क्यों है न सच।’’
 
‘‘न जाने तुम किसकी बातें कर रहे हो।’’ सलीम ने सँभलते हुए कहा।

‘‘इन्स...पेक्...टर... फ़री...दी की।’’ प्रोफ़ेसर ने उसकी आँखों में देखते हुए रुक-रुक कर कहा।

सलीम के हाथ-पैर ढीले पड़ गये। वह सुस्त पड़ गया।

‘‘तुम्हारी धमकियाँ मेरा अब कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। मैं अब तुम्हारे गाल पर इस तरह चाँटा मार सकता हूँ।’’

प्रोफ़ेसर ने उठ कर उसके गाल पर हल्की-सी चपत लगाते हुए कहा। ‘‘क्यों न मैं इन सब बातों की ख़बर नजमा और उसकी माँ को दे दूँ। पुलिस को तो मैं इसी वक़्त ख़बर कर दूँगा, लेकिन तुम यह सोचते होगे कि पुलिस मेरी बातों का ऐतबार न करेगी, क्योंकि मैं पागल हूँ।’’

‘‘नहीं-नहीं, प्रोफ़ेसर, तुम जीत गये। तुम मुझसे ज़्यादा चालाक हो।’’ सलीम ने आख़री पाँसा फेंका। ‘‘इस रस्सी को काट दो। मैं तुम्हारे लिए एक बड़ी शानदार लेबोरेटरी बनवा दूँगा।’’

‘‘तुम्हारा दिमाग़ किसी वक़्त भी चालबाज़ियों से बाज़ नहीं आता। अच्छा, मैं तुमसे दोस्ती कर लूँगा, मगर इस शर्त पर कि तुम इस मीनार में किसी राज़ को राज़ न रखोगे। इसके बाद यह यक़ीन रखो कि तुम्हारे सब राज़ मरते दम तक मेरे सीने में दफ़्न रहेंगे। मैं इसीलिए तुमसे यह सब उगलवा रहा हूँ कि तुमने मुझे बहुत दिनों तक ब्लैकमेल किया है। अच्छा, पहले यह बताओ कि वाक़ई तुमने उस नेपाली से डॉक्टर शौकत को क़त्ल कराने की साज़िश की थी।’’

‘‘मेरे ख़याल से तुम भी उतना जानते हो, जितना मैं...हाँ मैंने उसके लिए रुपया दिया था।’’

‘‘फिर तुम्हीं ने उसे क़त्ल भी कर दिया। इसलिए कि कहीं वह नाम न बता दे।’’

‘‘हाँ...लेकिन ठहरो...!’’

‘‘इन्स्पेक्टर फ़रीदी का क़त्ल करने के लिए तुमने ही गोली या गोलियाँ चलायी थीं।’’

‘‘हाँ...लेकिन तुम तो इस तरह सवाल कर रहे हो जैसे जैसे...!’’

‘‘तुमने डॉक्टर शौकत के गले में रस्सी का फन्दा भी डाला था।’’ प्रोफ़ेसर ने हाथ उठा कर उसे बोलने से रोक दिया।

‘‘फिर तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो चला।’’ सलीम ने कहा। ‘‘हाँ, मैंने फन्दा तो डाला था।’’ लेकिन फिर उसने कहा। ‘‘तुमने अभी कहा है कि हम दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं। इस रस्सी को काट दो। मैं तुमसे बिलकुल डरा हुआ नहीं हूँ, इसलिए कि अब हम दोनों दोस्त हैं।

‘‘तुम्हारे हवाई क़िले बहुत ज़्यादा मज़बूत मालूम नहीं होते।’’ प्रोफ़ेसर ने कहा। लेकिन इस बार उसकी आवाज़ बदली हुई थी। सलीम चौंक पड़ा...सिकुड़ा-सिकुड़ाया...प्रोफ़ेसर तन कर खड़ा हो गया। उसने अपने सिर पर बँधा हुआ मफ़लर खोल दिया। चेस्टर के कॉलर नीचे गिरा दिये और मोमबत्ती ताक़ पर से उठा कर अपने चेहरे के क़रीब ला कर बोला।

‘‘लो बेटा, देख लो। मैं हूँ तुम्हारा बाप इन्स्पेक्टर फ़रीदी।’’

‘‘अरे...!’’ सलीम के मुँह से निकल गया और उसे अपना सिर घूमता हुआ महसूस होने लगा, लेकिन वह फ़ौरन ही सँभल गया। उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह ख़ुद पर काबू पाने की कोशिश कर रहा है।

‘‘तुम कौन हो...मैं तुम्हें नहीं जानता और इस हरकत का क्या मतलब।’’ सलीम ने गरज कर कहा।
 
‘‘शोर नहीं, शोर नहीं।’’ फ़रीदी ने हाथ उठा कर कहा। ‘‘तुमसे ज़्यादा मुझे कौन पहचान सकता है? जबकि तुम मेरे जनाज़े में भी शरीक थे। इसकी तो मैं तारीफ़ करूँगा सलीम! तुम बहुत होशियार हो। अगर मैं अपने मकान से एक जनाज़ा निकलवाने का इन्तज़ाम न करता तो तुम्हें मेरी मौत का हरगिज़ यक़ीन न होता। अख़बारों में मेरी मौत की ख़बर सुन कर शायद तुम रात ही को शहर आ गये थे। मेरे लिए हस्पताल से एक मुर्दा हासिल कर लेना कोई मुश्किल काम न था और शायद तुमने दूसरे दिन क़ब्रिस्तान तक मेरी लाश का पीछा किया। मैं क़बूल करता हूँ कि तुम एक अच्छे साज़िशी ज़रूर हो, लेकिन अच्छे जासूस नहीं। तुमने यह भी न सोचा कि पाँच गोलियाँ खाने के बाद बाहोशो-हवास पन्द्रह मील का सफ़र तय करना अगर नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर है। उस रात तुमने सार्जेंट हमीद के घर के भी चक्कर काटे थे, लेकिन शायद उस वक़्त तुम वहाँ मौजूद न थे जब वह नेपाली के भेस में राजरूप नगर इसलिए आया था कि डॉक्टर तौसीफ़ को इस बात की ख़बर पुलिस को करने से रोक दे कि मैं उससे मिल चुका हूँ और राजरूप नगर से वापसी पर यह हादसा पेश आया। मैंने एक बार रिपोर्टर के भेस में मिल कर सख़्त ग़लती की थी। इसलिए कि तुम मुझे पहचानते थे और क्यों न पहचानते, जबकि मेरा कई बार पीछा कर चुके थे। उस रात भी तुमने मेरी पीछा किया था। जब मैं नेपाली के क़त्ल के बाद घर वापस आ रहा था...फिर तुमने कुबड़े के भेस में सार्जेंट हमीद को ग़लत राह पर लगाने की कोशिश की। हाँ, तो मैं कह रहा था कि तुम्हें शक हो गया कि मैं तुम्हें अपराधी समझता हूँ, लिहाज़ा वापसी में तुमने मुझ पर गोली चलायी और राइफ़ल प्रोफ़ेसर के हाथ में दे कर फ़रार हो गये। प्रोफ़ेसर से बातचीत करते वक़्त मैंने अच्छी तरह अन्दाज़ा लगा लिया था कि गोली चलाना तो दरकिनार वह उस राइफ़ल का इस्तेमाल तक नहीं जानता था। तुमने मुझे क़स्बे की तरफ़ मुड़ते देखा, इस मौक़े को ग़नीमत जान कर तुम वहाँ से दो मील के फ़ासले पर झाड़ियों में जा छुपे और तुम उसी ताँगे पर गये थे जो सड़क पर खड़ा था। तुमने ख़ुद ही मदद के लिए चीख़ कर मेरा ध्यान अपनी तरफ़ करना चाहा। फिर तुमने गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। उसी वक़्त मेरे ज़ेहन में यह नया प्लान आया जिसका नतीजा यह है कि आज तुम एक चूहेदानी में फँसे हुए चूहे की तरह बेबस नज़र आ रहे हो।’’

इन्स्पेक्टर फ़रीदी इतना कह कर सिगरेट सुलगाने के लिए रुक गया।

‘‘न जाने तुम कौन हो और क्या बक रहे हो...!’’ सलीम ने झुँझला कर कहा। ‘‘ख़ैरियत इसी में है कि मुझे खोल दो...वरना अच्छा न होगा...!’’

‘‘अभी तक तो अच्छा ही हो रहा है....!’’ फ़रीदी ने कन्धे उचका कर कहा और झुक कर दूरबीन में देखने लगा।

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क़ातिल फ़रार

‘‘तो तुम नहीं खोलोगे मुझे...देखो, मैं कहे देता हूँ...!’’

‘‘बस-बस, ज़्यादा शोर मचाने की ज़रूरत नहीं। मुझे डॉक्टर शौकत का कारनामा देखने दो...!’’

‘‘देखो मिस्टर....!’’ सलीम तेज़ी से बोला। ‘‘पहली बात तो मुझे यक़ीन नहीं कि तुम सरकारी जासूस हो और अगर हो भी तो मुझे इससे क्या करना। आखिर तुमने मुझे किस क़ानून के तहत यहाँ बाँध रखा है।’’

‘‘इसलिए कि तुमने अपना जुर्म अभी-अभी क़बूल किया है। क्या यह तुम्हें बाँध रखने के लिए काफ़ी नहीं?’’

‘‘क्या बेवकूफ़ों की-सी बातें करते हो।’’ सलीम ने क़हक़हा लगा कर कहा। ‘‘क्या तुम उसे सच समझे हो।?’



‘‘झूठ समझने की कोई वजह नहीं।’’ फ़रीदी ने दूरबीन पर झुकते हुए कहा।

‘‘होश की दवा लो, मिस्टर जासूस...!’’ सलीम बोला। ‘‘कुछ देर पहले मैं एक पागल आदमी से बात कर रहा था। अगर मैं उसकी हाँ-में-हाँ न मिलाता तो वह मेरे साथ न जाने क्या बर्ताव करता। मैं उसके ज़ुल्म अच्छी तरह जानता हूँ।

इसलिए जान बचाने के लिए और कोई चारा नहीं था। वाह, मेरे भोले जासूस, वाह....! ख़ैर, जो हुआ सो हुआ...मुझे फ़ौरन खोल दो। इन्सान ही से ग़लती होती है। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारे अफ़सरों से तुम्हारी शिकायत न करूँगा।’’

फ़रीदी उसे बेबसी से देख रहा था और सलीम के होंटों पर शरारत-भरी मुस्कुराहट खेल रही थी।

‘‘ख़ैर, ख़ैर, कोई बात नहीं।’’ फ़रीदी सँभल कर बोला। ‘‘लेकिन आज तुमने डॉक्टर शौकत को क़त्ल करने की जो कोशिशें की हैं, वे ख़ुद मैंने देखी हैं। डॉक्टर शौकत की कार मैंने बिगाड़ी थी। मैं यह पहले से जानता था कि इस वक़्त कोठी में कोई कार मौजूद नहीं थी। मैं दरअसल चाहता था कि वह पैदल आये। सिर्फ़ यह देखने के लिए कि असली साज़िश रचने वाला कौन है। क्या तुम कार का बहाना करके वहाँ से नहीं टल गये थे...क्या तुमने प्रोफ़ेसर को ज़हरीली सुई दे कर उसे शौकत से हाथ मिलाने के बहाने चुभो देने के लिए नहीं कहा था। जब तुमने उसके गले में रस्सी का फन्दा डाला था तब भी मैं तुमसे थोड़ी ही दूर के फ़ासले पर मौजूद था और मैंने ही शौकत को बचाया था।’’

‘‘न जाने तुम कौन-सी अली बाबा चालीस चोर की कहानी सुना रहे हो।’’ सलीम ने उकता कर कहा।

‘‘अक़्लमन्द आदमी, ज़रा सोचो तो आखिर मैं डॉक्टर शौकत की जान क्यों लेना चाहूँगा। जबकि वह मेरे लिए बिलकुल अजनबी है। तुम कहोगे कि मैंने ऐसा सिर्फ़ इसलिए किया कि चचा जान बच न सकें, लेकिन ऐसा सोचना बेवकूफ़ी होगी। अगर ऐसा होता तो मैं पहले ही उनको ख़त्म कर देता और किसी को ख़बर तक न होती।’’

‘‘क्या कहा? शौकत तुम्हारे लिए अजनबी है?’’ फ़रीदी ने मुस्कुराते हुए कहा। ‘‘तुम उसके लिए अजनबी हो सकते हो, लेकिन वह तुम्हारे लिए नहीं। क्या मैं बताऊँ कि तुम उसकी जान क्यों लेना चाहते हो?’’

फ़रीदी के शब्दों का असर ज़बर्दस्त था। सलीम फ़िर सुस्त पड़ गया। उसकी आँखों से ख़ौफ़ झलकने लगा। लेकिन थोड़ी देर बाद उसने ख़ौफ़ पर क़ाबू पा लिया।

‘‘आखिर तुम क्या चाहते हो...?’’ उसने फ़रीदी से कहा।

‘‘तुमको क़ानून के हवाले करना।’’

‘‘लेकिन किस जुर्म में?’’

‘‘तुमने अभी-अभी जो अपने जुर्म क़बूल किये हैं।’’
 
‘‘अच्छा, चलो, यही सही।’’ वह बोला। ‘‘लेकिन तुम्हारे पास क्या सुबूत है कि मैंने इक़बाले-जुर्म किया है।

अदालत में तुम किसे गवाह की हैसियत से पेश करोगे जबकि यहाँ मेरे और तुम्हारे सिवा कोई तीसरा नहीं है। देखो मिस्टर फ़रीदी, मुझे झाँसा देना आसान काम नहीं। तुम इस तरह अदालत में मेरे ख़िलाफ़ मुक़दमा चला कर कामयाब नहीं हो सकते।’’

‘‘तब तो मुझसे बड़ी ग़लती हुई।’’ फ़रीदी ने हाथ मलते हुए बेबसी से कहा। ‘‘काश, मैं सार्जेंट हमीद को भी यहाँ लाया होता।’’

सलीम ने ज़ोरदार क़हक़हा लगाया और बोला। ‘‘अभी कच्चे हो, मिस्टर जासूस।’’

‘‘उफ़, मेरे ख़ुदा।’’ फ़रीदी ने बौखला कर कहना शुरू किया। ‘‘लेकिन तुमने अभी मेरे सामने इक़बाले-जुर्म किया है कि...तुम...क़ क़ क़... क़ातिल हो...!

‘‘हकलाओ नहीं प्यारे।’’ सलीम हँसता हुआ बोला। ‘‘लो, मैं एक बार फिर इक़बाले-जुर्म करता हूँ कि मैंने ही शौकत को क़त्ल करने या कराने की कोशिश की थी। मैंने ही नेपाली को भी क़त्ल किया था। मैंने तुम पर भी गोलियाँ चलायी थीं। लेकिन फिर क्या? तुम मेरा क्या कर सकते हो। मैं एक ऊँचे ख़ानदान का आदमी हूँ। राजरूप नगर का होने वाला नवाब...तुम्हारी बकवास पर किसे यक़ीन आयेगा।’’

‘‘बहुत अच्छे बरख़ुरदार...! फ़रीदी ने हँसते हुए कहा। ‘‘बहुत अक़्लमन्द हो, लेकिन साफ़ है कि अब तुमने जो इक़बाले-जुर्म किया है, वह पागल प्रोफ़ेसर के सामने नहीं, बल्कि डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के इन्स्पेक्टर फ़रीदी के सामने किया है।’’

‘‘तो फिर उससे क्या...मैं हज़ार बार इक़बाले-जुर्म कर सकता हूँ। क्योंकि यहाँ हम दोनों के सिवा और कौन है। कहो तो एक बार फिर दोहरा दूँ।’’ सलीम ने क़हक़हा लगा कर कहा।

‘‘बस-बस, काफ़ी है।’’ फ़रीदी ने जले हुई सिग्रेट का टुकड़ा फेंकते हुए कहा। ‘‘तुम फ़रीदी को नहीं जानते। इधर देखो, इस अलमारी में....लेकिन नहीं, तुम्हें नहीं दिखायी देगा। ठहरो, मैं मोमबत्ती उठाता हूँ। देखो बेटा सलीम...यह एक बेहद ताक़तवर ट्रांसमीटर है और अभी हाल ही की ईजाद है। एक छोटी-सी बैटरी इसे चलाने के लिए काफ़ी होती है। क्या समझे ? इसके ज़रिये मेरी और तुम्हारी आवाज़ें धीरे-धीरे डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के दफ़्तर तक पहुँच रही होंगी और इनको रिकॉर्ड कर लिया गया है। मैं अच्छी तरह जानता था कि तुम मामूली मुजरिम नहीं हो। इसलिए मैंने पहले ही इसका इन्तज़ाम कर लिया था। अब कहो, कौन जीता...?’’ फ़रीदी ने क़हक़हा लगाया और सलीम निढाल हो कर रह गया। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें थीं। उसे अपना दिल सिर के उस हिस्से में धड़कता महसूस हो रहा था, जहाँ चोट लगी थी। लेकिन उसके ज़ेहन ने अभी तक हार क़बूल न की थी। सिग्रेट का जलता हुआ टुकड़ा उसके क़रीब ही पड़ा था। उसने फ़रीदी की नज़र बचा कर उसे पैर से धीरे-धीरे अपनी तरफ़ खिसकाना शुरू किया। अब सिग्रेट का जलता हुआ हिस्सा रस्सी के एक बल से लगा हुआ उसे धीरे-धीरे जला रहा था। सलीम ने अपने दोनों पैर समेट कर रस्सी के सामने कर लिये। रस्सी सूखी थी और आग ने अपना काम शुरू कर दिया था। फ़रीदी इस बात से बेख़बर दूरबीन पर झुका हुआ था। अचानक सलीम सोफ़े समेत दूसरी तरफ़ पलट गया। फ़रीदी चौंक कर उसकी तरफ़ झपटा। लेकिन इससे पहले कि फ़रीदी कुछ कर सके सलीम रस्सी की गिरफ़्त से आज़ाद हो चुका था।

फ़रीदी उस पर टूट पड़ा, लेकिन सलीम को हराना आसान काम न था...थोड़ी देर बाद दोनों गुथे हुए हाँफ रहे थे। सलीम को सुस्त पा कर फ़रीदी को जेब से पिस्तौल निकालने का मौक़ा मिल गया। लेकिन सलीम ने इस फुर्ती के साथ उससे पिस्तौल छीन लिया जैसे वह इसका इन्तज़ार ही कर रहा था। इसी कशमकश में पिस्तौल चल गया। फ़रीदी ने चीख़ मारी और गिरते-गिरते उसका सिर दूरबीन से टकरा गया। वह लगभग बेहोश हो कर ज़मीन पर औंधा पड़ा था। सलीम खड़ा हाँफ रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे। अचानक वह ट्रांसमीटर के सामने खड़ा हो कर बुरी तरह खाँसने लगा। ऐसा मालूम होता था जैसे उस पर खाँसी का दौरा पड़ा हो। फिर भर्रायी हुई आवाज़ में बोलने लगा।

‘‘मैं इन्स्पेक्टर फ़रीदी बोल रहा हूँ। अभी सलीम मेरी गिरफ़्त से निकल गया था। काफ़ी जद्दो-जेहद के बाद मैंने उसके पैर में गोली मार दी। अब वह फिर मेरी क़ैद में है। मैं उसे पुलिस के हवाले करने जा रहा हूँ। बाक़ी रिपोर्ट कल आठ बजे सुबह।’’

अब सलीम ने ट्रांसमीटर का तार बैटरी से अलग कर दिया। उसके पुर्ज़े-पुर्ज़े इधर-उधर बिखर गये। वह तेज़ी से सीढ़ियाँ तय करता हुआ नीचे उतर रहा था।

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ख़ौफ़नाक लम्हे

इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने अपनी मौत की ख़बर छपवाने में बड़े एहितयात से काम लिया था। राजरूप नगर के जंगलों में दुश्मन से मुक़ाबला करते वक़्त अचानक उसके ज़ेहन में यह ख़याल आया था। वह इस तरह चीख़ कर भागा था जैसे वह ज़ख़्मी हो गया हो। वह हस्पताल गया और वहाँ उसने चीफ़ इन्स्पेक्टर को बुलवा कर उसे सारा हाल बताया और उससे माफ़ी माँगी। यह चीज़ मुश्किल न थी। चीफ़ इन्स्पेक्टर ने पुलिस कमिश्नर से राय करके पुलिस हस्पताल के इंचार्ज कर्नल तिवारी से सब मामले तय कर लिये, लेकिन उसे यह न बताया गया कि ड्रामा खेलने का असली मक़सद क्या है। सिविल हस्पताल से ख़ुफ़िया तरीक़े पर एक लाश हासिल की गयी। फिर उस पर इन्स्पेक्टर फ़रीदी का मेकअप किया गया। यही वजह थी कि सलीम आसानी से धोखा खा गया। इन सब बातों से फ़ुर्सत पाने के बाद इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने भेस बदल कर अपना काम शुरू कर दिया।

तीसरे दिन अचानक कर्नल तिवारी के ट्रांसफ़र का हुक्म आ गया और उसे इतना ही टाइम मिल सका कि उसने डॉक्टर तौसीफ़ को एक ख़त लिख दिया। इन्स्पेक्टर फ़रीदी को अब तक सलीम पर महज़ शक था। उसकी तहक़ीक़ात का रुख ज़्यादातर प्रोफ़ेसर ही की तरफ़ रहा। इस सिलसिले में उसे इस बात का पता चला कि सलीम प्रोफ़ेसर को धोखे में रख कर अपना हथियार बनाये हुए है। प्रोफ़ेसर के सिलसिले में उसने एक बिलकुल ही नयी बात मालूम की जिसका पता सलीम को भी न था। वह यह कि प्रोफ़ेसर नाजायज़ तौर पर कोकीन हासिल किया करता था...जिस तरीक़े से कोकीन उस तक पहुँचा करती थी, वह बहुत दिलचस्प था। उसे एक हफ़्ते में एक पैकेट कोकीन मिला करती थी। कोकीन बेचने वालों के गिरोह का एक आदमी हर हफ़्ते एक पैकेट कोकीन उसके लिए ला कर पुरानी कोठी के बाग़ीचे में छुपा दिया करता था। वहीं उसके दाम भी रखे हुए मिल जाते थे। दो–एक बार उसे मालियों ने टोका भी, लेकिन उसने उन्हें यह कह कर टाल दिया कि वह दवा के लिए बीर बहूटी तलाश कर रहा है। फ़रीदी ने फ़िलहाल इस गिरोह को पकड़वाने की कोशिश न की, क्योंकि उसके सामने इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण मामला था। डॉक्टर शौकत के राजरूप नगर जाने से एक दिन पहले ही उसने कोठी के एक माली को भारी रक़म दे कर मिला लिया था। इसलिए कोठी के लोगों के बारे में सब कुछ जान लेने में कोई ख़ास दिक़्क़त न हुई। ऑपरेशन वाली रात को सार्जेंट हमीद भी वहाँ आ गया... फ़रीदी ने उसे प्रोफ़ेसर को बहला-फुसला कर माली के झोंपड़े तक लाने के लिए तैनात कर दिया। इसके लिए पूरी स्कीम पहले ही बन चुकी थी। हमीद प्रोफ़ेसर को कोकीन देने का लालच दिला कर माली के झोंपड़े तक लाया। यहाँ उसे कोकीन में कोई तेज़ क़िस्म की नशीली चीज़ दी गयी जिसके असर से प्रोफ़ेसर बहुत जल्द बेहोश हो गया। उसके बाद इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने उसके कपड़े ख़ुद पहन लिए और ट्रांसमीटर को गठरी में बाँध कर झोंपड़े से निकल गया। झोंपड़े से बाहर जिसने उछल– कूद मचायी थी, वह इन्स्पेक्टर फ़रीदी ही था।

जब फ़रीदी को गये हुए काफ़ी समय बीत गया तो हमीद का दिल घबराने लगा। उसने सोचा कि कहीं कोई हादसा न पेश आ गया हो। फ़रीदी ने उसे बेहोश प्रोफ़ेसर को सोता छोड़ कर कहीं जाने की इजाज़त न दी थी, लेकिन उसका दिल न माना। वह प्रोफ़ेसर को सोता छोड़ कर पुरानी कोठी की तरफ़ रवाना हो गया। मीनार में वह उस वक़्त दाख़िल हुआ जब सलीम जा चुका था। ट्रांसमीटर चूर–चूर हो कर फ़र्श पर बिखरा हुआ पड़ा था और फ़रीदी अभी तक उसी तरह पड़ा था। हमीद वहाँ का नज़ारा देख लगभग चीख़ते-चीख़ते रुक–सा गया। उसने दौड़ कर फ़रीदी को उठाने की कोशिश की। वह बेहोश था...बाहर से कहीं कोई चोट न मालूम होती थी। थोड़ी देर बाद कराह कर उसने करवट बदली। हमीद उसे हिलाने लगा...वह चौंक कर उठ बैठा।

‘‘तुम...!’’ उसने आँखें मलते हुए कहा। ‘‘वह मरदूद कहाँ गया....?’’

‘‘कौन...?’’

‘‘वही सलीम...!’’ फ़रीदी ने हाथ मलते हुए कहा। ‘‘अफ़सोस, हाथ में आ कर निकल गया।’’ फिर उसने जल्दी-जल्दी सारी बातें हमीद को बताना शुरू की।

‘‘उसने तो अपने हिसाब से मुझे मार ही डाला था।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘लेकिन जैसे ही उसने गोली चलायी...मैंने फिर एक बार उसे धोखा देने की कोशिश की। लेकिन बुरा हो इस दूरबीन का जिसकी वजह से सब किया-धरा ख़ाक में मिल गया। अगर मेरा सिर उससे न टकरा जाता तो फिर मैंने पाला मार लिया था। अरे! इस ट्रांसमीटर को क्या हुआ...तोड़ दिया कमबख़्त ने। ऐसा बहादुर अपराधी आज तक मेरी नज़रों से नहीं गुज़रा...!

‘‘आइए...तो चलिए, उसे तलाश करें।’’ हमीद ने कहा।

‘‘पागल हो गये हो...अब तुम उसकी परछाईं को भी नहीं पा सकते। वह मामूली दिमाग़ का आदमी नहीं।’’ फ़रीदी ने उठते हुए कहा। ‘‘देखूँ तो ऑपरेशन का क्या रहा...!’’

उसने दूरबीन के शीशे से आँख लगा दी। थोड़ी देर तक ख़ामोश रहा।

‘‘अरे...!’’ वह चौंक कर बोला। ‘‘यह पाइप के सहारे दीवार पर कौन चढ़ रहा है? सलीम...इसका क्या मतलब...अरे, वह तो खिड़की के क़रीब पहुँच गया...यह उसने जेब से क्या चीज़ निकाली...हैं...यह नलकी कैसी...अरे लो, ग़ज़ब! वह नलकी को होंटों में दबा रहा है... क़त्ल-क़त्ल...हमीद अब डॉक्टर शौकत इतनी ख़ामोशी से क़त्ल हो जायेगा कि उसके क़रीब खड़ी नर्स को भी इसकी ख़बर न होगी। उफ़ क्या किया जाये...जितनी देर में हम वहाँ पहुँचेंगे, वह अपना काम कर चुका होगा। कमबख़्त पिस्तौल भी तो अपने साथ लेता गया।’’

‘‘पिस्तौल मेरे पास है...! हमीद ने कहा।

‘‘लेकिन बेकार...इतनी दूर से पिस्तौल किस काम का...ओह! क्या किया जाय। उसकी नलकी में वह ज़हरीली सुई है। अभी वह एक फूँक मारेगा और सुई निकल कर डॉक्टर शौकत के जा लगेगी। उफ़, मेरे ख़ुदा...अब क्या होगा। वह शायद निशाना ले रहा है। ओह! ठीक याद आ गया...मैंने वह राइफ़ल नीचे देखी थी। ठहरो...मैं अभी आया!’’ फ़रीदी यह कह कर दौड़ता हुआ नीचे चला गया। वापसी पर उसके हाथ में वही छोटी–सी हवाई राइफ़ल थी जो उसने प्रोफ़ेसर के हाथ में देखी थी। उसने उसे खोल कर देखा। उसकी मैगज़ीन में कई कारतूस बाक़ी थे।

‘‘हटो...हटो...खिड़की से जल्दी हटो।’’ उसने खिड़की से निशाना लिया। बीमार के कमरे से आती हुई रोशनी में सलीम का निशाना साफ़ नज़र आ रहा था। फ़रीदी ने राइफ़ल चला दी। सलीम उछल कर एक धमाके के साथ ज़मीन पर आ गिरा...

‘‘वह मारा...!’’ उसने राइफ़ल फेंक कर ज़ीने की तरफ़ दौड़ते हुए कहा। हमीद भी उसके पीछे था। ये लोग उस वक़्त पहुँचे जब बेगम साहिबा, नजमा, डॉक्टर तौसीफ़ और कई कर्मचारी वहाँ इकट्ठे हो चुके थे। औरतों की चीख़–पुकार सुन कर डॉक्टर शौकत भी नीचे आ गया था।
 
फ़रीदी ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर पूछा। ‘‘कहो डॉक्टर, ऑपरेशन कैसा रहा...’’

शौकत चौंक कर दो क़दम पीछे हट गया।

‘‘तुम...!’’ उसने मुँह फाड़े हुए हैरत से कहा।

‘‘हाँ–हाँ, मैं भूत नहीं। बताओ, ऑपरेशन कैसा रहा।’’

‘‘कामयाब...!’’ शौकत ने बौखला कर कहा। ‘‘लेकिन... लेकिन...!’’

‘‘मैं सिर्फ़ तुम्हारे लिए मरा था, मेरे दोस्त...और यह देखो आज जिसने तुम्हारे गले में फ़ाँसी का फन्दा डाला था, तुम्हारे सामने मुर्दा पड़ा है।’’

अब सारे लोग फ़रीदी की तरफ़ देखने लगे।

‘‘आप लोग मेहरबानी करके लाश के क़रीब से हट जाइए।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और हमीद, तुम डॉक्टर शौकत की कार पर थाने चले जाओ।’’

‘‘तुम कौन हो...!’’ बेगम साहिबा गरज कर बोलीं।

‘‘मोहतरमा, मैं डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन, या यूँ समझ लीजिए, जासूसी विभाग का इन्स्पेक्टर हूँ।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और मैं सर्कस वाले नेपाली के क़ातिल और डॉक्टर शौकत की जान लेने की कोशिश करने वाले की लाश थाने में ले जाना चाहता हूँ।’’

‘‘न जाने तुम क्या बक रहे हो।’’ नजमा ने आँसू पोंछते हुए तेज़ी से कहा।

‘‘जो कुछ मैं बक रहा हूँ, उसका ख़ुलासा क़ानून करेगा।’’

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ख़ुलासा

एक हफ़्ते के बाद नजमा और डॉक्टर शौकत कोठी के पास बाग़ में चहलकदमी कर रहे थे।

‘‘उफ़, बहुत शरारती हो तुम नजमा...!’’ शौकत ने कहा। ‘‘आखिर बेचारे मालियों को तंग करने से क्या फ़ायदा? ये क्यारियाँ जो तुमने बिगाड़ दी हैं, माली इसका ग़ुस्सा किसी और के ऊपर उतारेगा।’’

‘‘मैंने इसलिए बिगाड़ी हैं ये क्यारियाँ, क्योंकि मैं तुम्हारा इम्तहान लेना चाहती हूँ।’’

‘‘क्या मतलब...!’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘यही कि तुम उनका ऑपरेशन करके उन्हें फिर ठीक कर दो।’’ नजमा ने शोख़ी से कहा।

‘‘उन्हें तो नहीं...लेकिन शादी हो जाने के बाद तुम्हारा ऑपरेशन करके तुम्हें बँदरिया ज़रूर बना दूँगा।’’

‘‘शादी...बहुत ख़ूब...शादी...तुम यह समझते हो कि मैं सचमुच शादी कर लूँगी।’’

‘‘तुम करो या न करो, लेकिन मैं तो कर ही लूँगा।’’

‘‘तो मुझे बँदरिया बनाने से क्या फ़ायदा...क्यों न तुम्हारे लिए एक बँदरिया पकड़वा ली जाय। ऑपरेशन की ज़हमत से बच जाओगे।’’

‘‘अच्छा, ठहरो, बताता हूँ...हैलो, भाई फ़रीदी। आओ– आओ, हम तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रहे थे।’’

फ़रीदी और हमीद कार से उतर रहे थे।

‘‘नवाब साहब का क्या हाल है?’’ फ़रीदी ने शौकत से हाथ मिलाते हुए कहा।

‘‘अच्छे हैं...तुम्हें याद कर रहे थे। आओ चलो, अन्दर चलें।’’

नवाब साहब गाव तकिये से टेक लगाये, अंगूर खा रहे थे। फ़रीदी को देख कर बोले, ‘‘आओ मियाँ फ़रीदी...मैं आज तुम्हें याद कर रहा था। मैंने तुम्हें उस वक़्त देखा था जब मुझे बोलने की इजाज़त न थी। आजकल तो मेरे बेटे का हुक्म मुझ पर चल रहा है।’’

नवाब साहब ने शौकत की तरफ़ प्यार से देखते हुए कहा।

‘‘आपको अच्छा देख कर मुझे बहुत ख़ुशी है।’’ फ़रीदी ने सोफ़े पर बैठते हुए कहा।

थोड़ी देर तक इधर–उधर की बातें करने के बाद नवाब साहब ने कहा। ‘‘फ़रीदी मियाँ, तुम्हें इस बात का पता कैसे चला शौकत मेरा बेटा है?’’

‘‘मैं कहानी का बाक़ी हिस्सा आपकी ज़बानी सुनना चाहता था।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘नहीं भई...पहले तुम बताओ।’’ नवाब साहब बोले।

‘‘मेरी कहानी ज़्यादा लम्बी नहीं...सिर्फ़ दो लफ़्ज़ों में ख़त्म हो जायेगी। जब मैं पहली बार सलीम से रिपोर्टर के भेस में मिला था...उस वक़्त मैंने आपके वालिद साहब की तस्वीर देख कर अन्दाज़ा लगा लिया था कि इस कोठी का कोई मेम्बर डॉक्टर शौकत को क्यों क़त्ल करना चाहता है। शौकत की शक्ल हू–ब–हू नवाब साहब मरहूम से मिलती है, लेकिन मुझे हैरत है कि जिस बात का पता डॉक्टर शौकत को नहीं था, उसका पता सलीम को कैसे हुआ?’’

‘‘शायद मैं बेहोशी के दौरान कुछ बक गया हूँगा। मुझे मालूम हुआ कि सलीम ज़्यादातर मेरे क़रीब ही रहता था। फ़रीदी मियाँ, यह एक बहुत ही दर्द–भरी दास्तान है। मैं तुम्हें शुरू से सुनाता हूँ। शौकत की माँ हमारे ख़ानदान की न थी। लेकिन वह किसी पिछड़ी जाति से भी ताल्लुक़ न रखती थी। उनमें सिर्फ़ इतनी ख़राबी थी कि उनके माता-पिता हमारी तरह दौलतमन्द न थे। हम दोनों एक दूसरे को बेहद चाहते थे, लेकिन वालिद साहब मरहूम के डर से खुल्लम-खुल्ला शादी न कर सकते थे। इसलिए हमने छिप कर शादी कर ली। एक साल के बाद शौकत पैदा हुआ, लेकिन उसकी पैदाइश के छै महीने बाद ही शौकत की माँ को एक ख़तरनाक बीमारी हो गयी। उसी हालत में वह दो साल तक ज़िन्दा रही। उसकी ख़्वाहिश थी कि वह अपने बेटे को जागीरदाराना माहौल से अलग रख कर ऊँची तालीम दिलाये। वह एक रहमदिल औरत थी। वह चाहती थी कि उसका बेटा डॉक्टरी की तालीम हासिल करके ग़रीबों की मदद करे। यह उसका ख़याल था और बिलकुल ठीक था कि जागीरदारी माहौल में पले हुए बच्चे के दिल में ग़रीबों का दर्द नहीं हो सकता। जब वह दम तोड़ रही थी तो उसने मुझसे वादा ले लिया था कि उस वक़्त तक मैं शौकत पर यह बात ज़ाहिर न करूँ जब तक वह उसकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ एक अच्छे किरदार का मालिक न हो जाये। फिर उन्होंने शौकत को सविता देवी के सुपुर्द कर दिया। मैं खुफ़िया तौर पर सविता देवी की मदद किया करता था। ख़ुदा जन्नत नसीब करे उसे, बड़ी ख़ूबियों की मालिक थी। आखिरकार उसने शौकत के लिए जान दे दी। शौकत की माँ के इन्तक़ाल के बाद मेरा दिल टूट गया और फिर मैंने दूसरी शादी नहीं की और दुनिया यही समझती रही कि मैं ताज़िन्दगी कुँवारा ही रहा।’’

नवाब साहब ने फिर शौकत और नजमा की तरफ़ प्यार-भरी नज़रों से देख कर कहा। ‘‘अब मेरी ज़िन्दगी में फिर से बहार आ गयी है....ऐ ख़ुदा...ऐ ख़ुदा...!’’ उनकी आवाज़ रुँध गयी और आँखों में आँसू छलक पड़े।

‘‘फ़रीदी मियाँ...!’’ नवाब साहब बोले। ‘‘इस सिलसिले में तुम्हें जो परेशानियाँ उठानी पड़ी हैं, उनका हाल मुझे मालूम है। बख़ुदा, मैं तुम्हें शौकत से कम नहीं समझता। तुम भी मुझे उतने ही अज़ीज़ हो जितने कि शौकत और नजमा...!’’

‘‘यह आपकी मुहब्बत है जनाब...!’’ फ़रीदी ने सिर झुका कर धीरे से कहा।

‘‘हाँ भई...वे बेचारे प्रोफ़ेसर का क्या हुआ ?’’

‘‘वह किसी तरह रिहा नहीं हो सकता।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘लेकिन मैं उसे बचाने की भरपूर कोशिश करूँगा।’’

‘‘अच्छा भई, अब तुम लोग जा कर चाय पियो। अरे हाँ, एक बात तो भूल ही गया। अगले महीने शौकत और नजमा की शादी हो रही है।’’ नवाब साहब ने नजमा और शौकत को देखते हुए कहा। ‘‘अभी से कहे देता हूँ फ़रीदी मियाँ कि तुम्हें और हमीद साहब को शादी से एक हफ़्ता पहले ही छुट्टी ले कर यहाँ आ जाना पड़ेगा।’’

‘‘ज़रूर-ज़रूर....!’’ फ़रीदी ने दोनों की तरफ़ देखते हुए कहा। ‘‘मुबारक हो...!’’

नजमा और शौकत ने शर्मा कर सिर झुका लिया।

थोड़ी देर के बाद चारों ड्रॉइंग–रूम में बैठे चाय पी रहे थे।

‘‘भई फ़रीदी, तुम कब शादी कर रहे हो’’ डॉक्टर शौकत ने चाय का घूँट ले कर प्याली मेज़ पर रखते हुए कहा।

‘‘किसकी शादी...!’’ फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला।

‘‘अपनी भई...!’’

‘‘ओह...मेरी शादी...!’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा। ‘‘सुनो मियाँ शौकत! अगर मेरी शादी होती तो तुम्हारी शादी की नौबत न आती।’’

‘‘वह कैसे...’’

‘‘सीधी–सी बात है। अगर मेरी शादी हो गयी होती तो मैं बच्चों को दूध पिलाता या जासूसी करता। मेरा ख़याल है कि कोई शादी–शुदा शख़्स कामयाब जासूस हो ही नहीं सकता।’’

‘‘तब तो मुझे अभी से इस्तीफ़ा देना चाहिए। मैं शादी के बग़ैर नहीं रह सकता।’’ हमीद ने इतनी मासूमियत से कहा कि सब हँसने लगे।

‘‘तो फिर क्या तुम ज़िन्दगी भर कुँआरे ही रहोगे।’’ शौकत ने कहा।

‘‘इरादा तो यही है।’’ फ़रीदी ने सिगार सुलगाते हुए कहा।

‘‘भई तुम बुरी तरह सिगार पीते हो। तुम्हारा फेफ़ड़ा बिलकुल काला हो गया होगा।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘अगर सिगार भी न पियूँ तो फिर ज़िन्दगी में रह ही क्या जायेगा।’’

‘‘तो यह कहिए कि सिगार ही को बेगम बना लिया है।’’ नजमा हँस कर बोली।

हमीद क़हक़हा मार कर हँसने लगा। बक़िया लोग सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गये। हालाँकि यह कोई ऐसा वाक्य नहीं था कि क़हक़हा लगाया जाये। लेकिन फ़रीदी, हमीद की आदत से वाक़िफ़ था। वह औरतों के फूहड़ जुमलों पर ख़ूब ख़ुश हुआ करता था।

‘‘हाँ भई फ़रीदी, यह बताओ कि तुम मरे किस तरह थे? मुझे यह आज तक मालूम न हो सका।’’ डॉक्टर शौकत ने पूछा।
 
‘‘यह एक लम्बी कहानी है, लेकिन मैं तुमको छोटी करके बताता हूँ। मुझे शुरू ही से सलीम पर शक था, लेकिन मैंने शुरू ही में एक बुनियादी ग़लती की थी, जिसकी बिना पर मुझे मरना पड़ा। हालाँकि मैं पहले से जानता था कि नेपाली का क़ातिल हम लोगों का पीछा कर रहा है और वह हम लोगों को अच्छी तरह पहचानता है। इस सिलसिले में मुझसे जो ग़लती हुई वह यह थी कि मैं सलीम से रिपोर्टर के भेस में मिला था। वह मुझे पहचान गया और उसने वापसी पर मुझ पर राइफ़ल से फ़ायर किया, लेकिन नाकाम रहा। उसने राइफ़ल प्रोफ़ेसर के हाथ में थमा दी और ख़ुद ग़ायब हो गया। प्रोफ़ेसर के बारे में तो तुम जानते हो कि वह कुछ पागल–सा है। सलीम उसे अपना हथियार बनाये हुए था। कई साल की बात है जब प्रोफ़ेसर यहाँ नहीं आया था और अच्छा-ख़ासा था, वह उन दिनों एक प्रयोग कर रहा था। उसने चाँद का सफ़र करने के लिए एक ग़ुब्बारा बनाया था। प्रयोग के लिए उसने पहली बार अपने असिस्टेंट नईम को उस ग़ुब्बारे में बिठा कर उड़ाया, शायद नईम ग़ुब्बारे को उतारने की कला भूल गया था या यह कि उसकी मशीन ख़राब हो गयी थी। ग़ुब्बारा फिर प्रोफ़ेसर के ख़याल से ज़मीन की तरफ़ कभी न लौटा, हालाँकि उसका ख़याल ग़लत था। नईम ग़ुब्बारे समेत मद्रास के एक गाँव में गिरा। उसे काफ़ी चोटें आयी थीं, लेकिन गाँव वालों की देख-भाल की वजह से वह बच गया। उसी दौरान उसे एक बाज़ारू लड़की से इश्क़ हो गया और वह वहीं रह गया। प्रोफ़ेसर इन सब बातों से अनजान था। वह ख़ुद को अपराधी समझ रहा था। इस परेशानी में वह क़रीब-क़रीब पागल हो गया। उसके बाद वह शहर छोड़ कर राजरूप नगर में आ गया। नईम ने उसे ख़त लिखे जो उसके पुराने ठिकाने से फिरते-फिराते यहाँ राजरूप नगर पहुँचे।

‘‘वे ख़त किसी तरह सलीम के हाथ लग गये और इस तरह प्रोफ़ेसर के बारे में उसे सब पता चल गया। अब उसने प्रोफ़ेसर पर अपनी धौंस जमा कर ब्लैकमेल करना शुरू किया। मुझे इन सब बातों का पता उस वक़्त हुआ जब मैं एक रात चोरों की तरह इस कोठी में दाख़िल हुआ और सलीम के कमरे की तलाशी ली। नईम के लिखे हुए ख़त अचानक मिल गये। इस तरह मैं भी सब जान गया और उसी वक़्त मैं इस नतीजे पर भी पहुँचा कि मुझ पर गोली सलीम ही ने चलायी थी, क्योंकि प्रोफ़ेसर को राइफ़ल चलाना आता ही नहीं था।

‘‘मैं कहाँ–से–कहाँ पहुँच गया।’’ उसने अपने आप से कहा फिर आगे बोलना शुरू किया, ‘‘हाँ, तो बात मेरे मरने की थी। जब मैं सलीम और डॉक्टर तौसीफ़ से मिल कर वापस जा रहा था, सलीम ने रास्ते में धोखा दे कर मुझे रोका और झाड़ियों की आड़ से मुझ पर गोलियाँ चलाने लगा। मैंने भी फ़ायर करने शुरू कर दिये। उसी दौरान अचानक मुझे अपनी ग़लती का पता चला और मैंने तय कर लिया कि मुझे किसी– न–किसी तरह यह साबित करना चाहिए कि अब मेरा वजूद इस दुनिया में नहीं, वरना होशियार मुजरिम हाथ आने से रहा। इसलिए मैंने एक चीख़ मारी और भाग कर अपनी कार में आया और शहर की तरफ़ चल पड़ा। मैं सीधा हस्पताल पहुँचा और वहाँ कम्पाउण्ड में मोटर से उतरते वक़्त ग़श खा कर गिर पड़ा। लोगों ने मुझे अन्दर पहुँचाया। मैंने डॉक्टर को अपनी सारी स्कीम बता दी और अपने चीफ़ को बुलवा भेजा। उनको भी मैंने सब कुछ बताया। फिर वहाँ से मेरे जनाज़े का इन्तज़ाम शुरू हुआ। क़िस्मत मेरे साथ थी। उस दिन इत्तफ़ाक़ से हस्पताल में एक लावारिस मरीज़ मर गया था। मेरे डिपार्टमेंट के लोग उसे स्ट्रेचर पर डाल कर अच्छी तरह ढाँक कर मेरे घर ले आये। पड़ोसी और दूसरे जानने वाले उसे मेरी लाश ही समझे। मेरी मौत की ख़बर उसी दिन शाम के अख़बारों में छप गयी। फिर मैंने उसी रात हमीद को एक नेपाली के भेस में डॉक्टर तौसीफ़ के पास भेजा और उसे ताक़ीद कर दी कि वह मेरे राजरूप नगर में आने के बारे में किसी से कुछ न कहे। इसलिए यह बात छिपी ही रही कि उस दिन मैं राजरूप नगर गया था। इस तरह सलीम धोखा खा गया और उसे इत्मीनान हो गया कि उस पर शक करने वाला अब इस दुनिया में नहीं रहा और अब वह आसानी के साथ अपना काम अंजाम दे सकेगा।

‘‘मैं चाहता था कि तुम्हें किसी तरह राजरूप नगर ले जाऊँ। इसलिए मैंने डॉक्टर तौसीफ़ से दोबारा कहलवा भेजा कि ज़रा जल्दी तुम्हें राजरूप नगर ले जाये। जब तुम वहाँ पहुँचे तो मैं साये की तरह तुम्हारे पीछे लगा रहा। तुम्हारी कार मैंने ही ख़राब की थी। मुझे यह पहले से मालूम था कि इस वक़्त कोठी में कोई कार मौजूद नहीं है, इसलिए मैंने यक़ीन कर लिया कि तुम इस सूरत में पैदल ही जाओगे। मुझे यह भी यक़ीन था कि सलीम तुम्हें नवाब साहब के ऑपरेशन से पहले ही ख़त्म करने की कोशिश करेगा। इसलिए मैंने उसे मौक़ा-ए-वारदात ही पर गिरफ़्तार करने की सोची, लेकिन उस कमबख़्त ने वह दाँव इस्तेमाल किया जिसका मुझे पता तक न था। तुम वाक़ई क़िस्मत के अच्छे थे कि वह सुई प्रोफ़ेसर के हाथ से गिर गयी, वरना तुम ख़त्म हो जाते और मुझे पता भी न चलता। उसके बाद तुम क़स्बे में चले गये और मैं एक माली के ख़ाली झोंपड़े में बैठ कर प्लान बनाता रहा। यह तो मुझे तुम्हारी ज़बानी मालूम हो गया था कि तुम शाम को भी पैदल ही आओगे। उसी दौरान मुझे प्रोफ़ेसर के बारे में कुछ और बातें भी मालूम हुईं। जैसे एक तो यही कि वह कोकीन खाने का आदी था...देखो, बातों–ही–बातों में बहकता चला जा रहा हूँ। बाक़ी हालात बताने से क्या फ़ायदा...वे तो तुम जानते ही होगे। बहरहाल, यह थी मेरे मरने की दास्तान।’’

‘‘ख़ुदा तुम्हें जन्नत नसीब करे।’’ डॉक्टर शौकत ने हँसते हुए कहा।

‘‘तो फ़रीदी भाई...अब तो आपकी तरक़्क़ी हो जायेगी। दावत में हमें न भूलिएगा।’’ नजमा ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘मैं तरक़्क़ी कब चाहता हूँ। अगर तरक़्क़ी हो गयी तब तो मुझे शादी करनी पड़ेगी, क्योंकि इस सूरत में मुझे दफ़्तर ही में बैठ कर मक्खियाँ मारनी पड़ेंगी। फिर दिन भर मक्खियाँ मारने के बाद घर पर तो मुझसे मक्खियाँ न मारी जायेंगी और इसका नतीजा यह होगा कि घर पर मक्खियाँ मारने के लिए मुझे एक अदद बीवी का इन्तज़ाम करना ही पड़ेगा जो मेरे बस का रोग नहीं।’’

‘‘नजमा, शायद तुम यह नहीं जानतीं कि हमारे फ़रीदी साहब जासूसी का शौक़ पूरा करने के लिए इस विभाग में आये हैं।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा। ‘‘वरना ये ख़ुद काफ़ी मालदार आदमी हैं और इतने कंजूस हैं कि ख़ुदा की पनाह।’’

‘‘अच्छा...यह मैं आज एक नयी ख़बर सुन रहा हूँ कि मैं कंजूस हूँ। क्यों भाई, मैं कंजूस कैसे हूँ ?’’ फ़रीदी ने सवाल दाग़ा।

‘‘शादी न करना कंजूसी नहीं तो और क्या है।’’ नजमा ने कहा।

‘‘अच्छा भाई हमीद, अब चलना चाहिए, वरना कहीं ये लोग सचमुच मेरी शादी न करा दें।’’ फ़रीदी ने उठते हुए कहा।

‘‘अभी बैठिए न...ऐसी जल्दी क्या है?’’ नजमा बोली।

‘‘नहीं बहन, अब चलूँगा। कई ज़रूरी काम अभी तक अधूरे पड़े हैं।’’

नजमा और शौकत दोनों को कार तक पहुँचाने आये। दोनों के चले जाने के बाद शौकत बोला, ऐसा हैरत-अंगेज़ आदमी मेरी नज़रों से नहीं गुज़रा। पता नहीं, पत्थर का बना है या लोहे का...मैंने आज तक उसे यह कहते नहीं सुना कि आज मैं बहुत थका हुआ हूँ।’’

‘‘और सार्जेंट हमीद बिलकुल मुर्ग़ी का बच्चा मालूम होता है।’’ नजमा हँस कर बोली।

‘‘क्यों...’’

‘‘न जाने क्यों मुझे उसकी नाक देख कर मुर्ग़ी के बच्चे याद आ जाते हैं।’’

‘‘बहरहाल, आदमी ख़ुशमिज़ाज है। अच्छा, आओ, अब अन्दर चलें...सर्दी तेज़ होती जा रही है।’’ यह कह कर दोनों कोठी के अन्दर दाख़िल होने के लिए चल पड़े।

end
 
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