• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
चार हसीन मुसीबतें सीरीज़

यह कहानी हैं एक लड़के अजय की, 26-27 साल की उमर हैं. आगे की कहानी अजय की ज़ुबानी सुनिए.

मैं अजय, 2 साल पहले ही अर्चना से शादी हुई हैं. अर्चना मुझसे 1-2 साल छोटी हैं. यह मेरे और मेरी बीवी की कहानी हैं पर कहानी की शुरुआत अपने ससुर रमाकांत जी से करता हूँ.

रमाकांत जी एक बहुत ही धार्मिक आदमी हैं. सरकारी नौकरी मे हैं. मगर वो पहले इतना धार्मिक नही थे. सुना हैं की वो धार्मिक तब बने जब उनको एक के बाद एक दो बेटियाँ पैदा हो गयी.

कइयो की तरह उनकी भी तमन्ना थी की उनको भी एक लड़का हो. जब दूसरा बच्चा भी लड़की निकली तो अचानक से उपर वाले मे आस्था कुच्छ ज़्यादा ही बढ़ गयी. अलग अलग धार्मिक स्थानो पर माथा टेकने लगे इस उम्मीद मे की अगली बार लड़का ही हो.

रमाकांत की बीवी लड़का लड़की मे कोई फ़र्क नही करती थी. वो दो लड़कियो को पैदा करने के बाद थोड़ा बीमार रहने लगी थी और थक चुकी थी और आगे फिर से मा नही बनना चाहती थी.

मगर रमाकांत जी की ज़िद थी की वो एक बार फिर से लड़के का ट्राइ करे. रमाकांत की बीवी को बात माननी पड़ी. मगर तबीयत खराब रहती थी इसलिए कुच्छ साल वेट करना पड़ा.

मेरे पिताजी रमाकांत जी के अच्छे दोस्त थे. मेरे पिता का अच्छा ख़ासा खानदानी कारोबार था. मेरी मम्मी भी रमाकांत जी की बीवी की पक्की सहेली थी.

जब रमाकांत जी को दो लड़किया हो गयी तो नौकरी पेशा रमाकांत जी को भी चिंता हुई और मेरे पिता जी से वादा ले लिया की वो अपने दोनो बेटों की शादी उनकी दोनो बेटियो से करेंगे.

मेरा घर मे मम्मी पापा के अलावा एक बड़ा भाई विनोद भी हैं. इस तरह बचपन मे ही मेरे बड़े भाई और मेरी शादी के लिए लड़किया पसंद कर ली गयी.

रमाकांत जी की बड़ी बेटी वंदना की शादी मेरे बड़े भाई विनोद के साथ और मैं अजय, मेरी शादी रमाकांत की दूसरी बेटी अर्चना से पक्की हो गयी. मगर यह बात तब सिर्फ़ रमाकांत जी और मेरे पिता को ही पता थी.

रमाकांत जी की थोड़ी टेन्षन कम हुई की उनकी दोनो बेटियो की शादी का इंतज़ाम उन्होने अपने ही दोस्त के घर मे कर लिया हैं. जब रमाकांत जी की बीवी की तबीयत थोड़ी सुधरी तो रमाकांत जी ने अपने तीसरे बच्चे की तैयारी की.

रमाकांत जी की बीवी की तबीयत बिगड़ती गयी और बच्चा पैदा करते हुए उनकी मरने जैसी हालत हो गयी. रमाकांत जी को तीसरी बार भी लड़की ही पैदा हुई.

रमाकांत जी की बीवी ने अपनी सहेली यानी मेरी मेरी मम्मी को अपने पास बुलाया और कहा की वो उनकी तीसरी बेटी को गोद ले ले क्यू की मेरी मम्मी को भी एक बेटी चाहिए थी जब की मेरे पापा तीसरी संतान नही चाहते थे.

मेरी मम्मी ने देखा की उस वक़्त रमाकांत जी की बीवी की हालत अच्छी नही हैं इसलिए यूही उनसे झूठा वादा कर दिया की वो उनकी तीसरी बेटी को गोद ले लेगी.

मम्मी को नही पता था की रमाकांत जी की बीवी असली मे चल बसेगी. एक दूध मूही बच्ची को छोड़ कर उसकी मा चली गयी. मेरी मा को सदमा लगा. उन्होने एक मरते इंसान से एक वादा किया था.

मेरी मम्मी ने गोद वाली बात मेरे पापा को बताई. पापा ने उनको अपना खुद का दिया वादा बताया की उन्होने दोनो बेटों की शादी का वादा पहले ही रमाकांत जी से कर दिया हैं.

पर मेरी मम्मी अपना वादा नही तोड़ना चाहती थी. वैसे भी नवजात बच्ची को पालने वाली मा घर मे नही थी. मा ने उस बच्ची को गोद ले लिया.

मुझे याद हैं तब मे 4 साल का था और मेरी मम्मी एक छोटी बच्च्ची को गोद मे लेकर घर आई और मुझे और मेरे भाई विनोद को कहा की वो हमारी बहन हैं.

उस उम्र मे हमे तो यही लगा की वो हमारी रियल बहन हैं और मा ने उसको जनम दिया हैं. अपनी दोनो बड़ी बहनो वंदना और अर्चना की तरह तीसरी बच्ची का नाम पूजा रखा गया. तीनो बहनो के नाम का एक ही मीनिंग था.

मैं और मेरे बड़े भाई विनोद को छोटी बहन पूजा मिल गयी. दूसरी तरफ हम दोनो की होने वाली बीविया वंदना और अर्चना रमाकांत जी के घर मे बड़ी हो रही थी.

हम पाँचो बच्चे इस बात से अंजान थे की पूजा के असली मा बाप कौन हैं. जो भी था रमाकांत जी की एक चिंता और कम हो गयी.

अपना बेटा पैदा करने की चाह रमाकांत जी मे अभी भी ज़िंदा थी. उन्होने एक विधवा औरत से शादी कर ली ताकि उनको एक बेटा हो जाए.

वंदना और अर्चना को एक सौतेली मा मिल गयी. मगर फिल्मी सौतेली मा की तरह वो उन पर ज़ुल्म नही करती थी. खैर रमाकांत जी फिर से बाप बनने वाले थे.

रमाकांत जी की प्रार्थना इस बार भी काम नही आई और उनके घर फिर एक बेटी पैदा हुई. रमाकांत जी टूट गये और फ़ैसला किया की अब और कोई बच्चा पैदा नही करेंगे.

रमाकांत जी ने अपनी छोटी बेटी का नाम श्रद्धा रखा. हालाँकि दुनिया की नज़रो मे श्रद्धा उनकी तीसरी बेटी थी क्यू की तीसरी बेटी पूजा को तो वो मेरे मम्मी पापा को गोद दे चुके थे मगर उनकी चार बेटियाँ थी वंदना, अर्चना, पूजा और श्रद्धा.

यह तो था हम दोनो परिवार वालो का इंट्रोडक्षन और हिस्टरी. एक तरफ मेरे मम्मी पापा के तीन बच्चे, विनोद, अजय और गोद ली बेटी पूजा. तो दूसरी तरफ रमाकांत जी के साथ उनकी दूसरी पत्नी और तीन बेटियाँ वंदना, अर्चना और श्रद्धा.
 
रमाकांत जी की दोनो बड़ी बेटियाँ वंदना और अर्चना समझदार निकली और अपने पैरो पर खड़ी हो गयी. मेरी होने वाली बीवी अर्चना ने क्ब किया और वकील बनने के लिए प्रॅक्टीस शुरू कर दी.

बड़ी बेटी वंदना ने म्बबस किया और रेसिडेंट डॉक्टर थी. दूसरी तरफ मेरे बड़े भाई विनोद और मैने पिताजी का कारोबार जाय्न कर लिया था. पढ़ाई मे हमे ज़्यादा कुच्छ करना नही था.

मेरे घर मे पढ़ाई का इतना माहौल नही था और इसका असर हमारी छोटी बहन पूजा पर भी पड़ा. पूजा की असली बड़ी बहनो ने तो खूब पढ़ाई की पर पूजा हमारे साथ रह कर पढ़ाई मे थोड़ी फिसड्डी रह गयी.

पूजा के शौक थे सेल्फिे लेना, घूमना फिरना, सज सवर कर रहना और मौज मस्ती करना. पूजा दिखने मे बहुत खूबसूरत थी और फिल्म्स देखने का शौक था और वो हेरोयिन भी बनना चाहती थी, हालाँकि उसको आक्टिंग आती नही थी.

रमाकांत की सबसे छोटी लड़की श्रद्धा भी उनके घर मे अपवाद(सबसे अलग) थी. दोनो बड़ी बहनो की विपरीत वो थोड़ी पढ़ाई मे कमजोर थी. मगर वो ज्योतिषी बनना चाहती थी जो वो आगे जाकर बन भी गयी.

श्रद्धा अपने पिता की तरह बहुत ही धार्मिक थी, और बहुत सात्विक थी. लड़को से नफ़रत करती और दुनिया उसके लिए मो माया थी. वो ज़िंदगी भर शादी भी नही करना चाहती थी.

जैसा की मेरे पिता ने वादा किया था मेरे बड़े भाई और मेरी शादी एक ही दिन वंदना और अर्चना से कर दी गयी. एक ही दिन विनोद वेड्स वंदना और अजय वेड्स अर्चना का कार्ड छप गया.

हालाँकि मेरी छोटी बहन पूजा को एक दिन शादी करके दूसरे घर जाना था पर उसको मिला कर देखा जाए तो रमाकांत जी की तीन बेटियाँ अभी हमारे घर का हिस्सा थी.

मेरी बीवी अर्चना वकील थी, तो बहुत तेज तर्रार थी. घर मे कोई बहस हो तो उसको हराना नामुमकिन था. झूठ नही बोलूँगा पर मैं भी हमेशा अर्चना से दबा दबा ही रहता था.

एक ही समय होता हैं जब मैं अपनी बीवी अर्चना को दबाता हूँ और वो हैं जब मैं उसके उपर चढ़ कर उसकी चुदाई करता हूँ. वैसे अधिकतर वो ही मुझ पर चढ़ मेरी चुदाई करती हैं, क्यू की वो मुझे दबाना पसंद करती हैं.

मेरी भाभी डॉक्टर वंदना थोड़ी शांत किस्म की हैं. विनोद भाय्या वंदना भाभी को थोड़ा दबा कर रखते थे. वंदना भाभी बहुत समझदारी की बातें करती हैं. मगर वंदना भाभी मेरे साथ बहुत कूल हैं.

इसी तरह मेरी बीवी अर्चना भी मेरे बड़े भाई विनोद को रेस्पेक्ट करती हैं. या यू कहे की रेस्पेक्ट कम और मज़ा मस्ती ज़्यादा क्यू की मेरे बड़े भाई अर्चना के ज़िजज़ि भी हैं तो साली जीजा वाली मस्ती रहती हैं.

एक हरा भरा घर हैं तो मम्मी पापा भी खुश हैं. दोनो बहुए सेवा करती हैं. मेरी छोटी बहन पूजा जितनी काम चोर हैं, दोनो बहुए उतनी ही ज़्यादा काम करती हैं. अब तो पूजा और भी काम नही करती थी.

वंदना और अर्चना भी पूजा को ननंद ना मान कर अपनी छोटी बहन की तरह रखती, वैसे भी वो उनकी छोटी बहन ही थी.

मेरे और मेरी वाइफ अर्चना की सेक्स लाइफ बहुत अच्छी चल रही थी. मेरी जब भी चोदने की इक्षा होती तो वो तैयार रहती. कभी निराश नही किया बल्कि जितना चाहा उस से ज़्यादा ही मज़ा दिलाया.

मैं जब भी अर्चना को चुदाई का नया आसान बताता तो वो करने को मान जाती. मेरे कुच्छ दोस्त हैं जिनको हमेशा शिकायत रहती की उनकी बीविया इस मामले मे चूज़ी हैं, मगर मैं खुशकिस्मत था.

वैसे पूजा मेरी साली थी पर बचपन से हमेशा उसको छोटी बहन ही माना था. मेरी एक और साली थी, श्रद्धा. उसको लड़को से बहुत नफ़रत थी पर अगर किसी लड़के से वो सबसे ज़्यादा बात करती और भरोसा करती तो वो लड़का मैं ही था.

मुझे भी पता नही की उसकी मेरे से इतनी अच्छी क्यू बनती हैं. श्रद्धा मेरे बड़े भाई विनोद से भी इतनी बात नही करती.

एफेक्टिव्ली मेरे बड़े भाई विनोद की एक ही साली थी अर्चना जो की मेरी बीवी भी हैं, और मेरी एक ही साली थी श्रद्धा.

हम लोगो को पिक्निक जाने का बहुत शौक था. मम्मी पापा तो अधिकतर नही आते क्यू की वो हम यंग लोगो को घूमने देते. हम लोग श्रद्धा को भी साथ ले लेते क्यू की वो अपनी बहनो की शादी के बाद अकेले पड़ गयी थी.

शारढा का 18त ब्रिथड़े था तब हम सबको पेरेंट्स ने बता दिया था की पूजा को गोद लिया गया हैं पर हमको इस से कोई फ़र्क नही पड़ा और पुराने रिश्ते बरकरार थे.

हम दोनो भाई और वो चारो बहने खूब मज़ाक मस्ती करते और घूमते फिरते. शादी के बाद दो साल कैसे गुज़रे पता ही नही चला.

मम्मी पापा की नज़रो मे उनकी दोनो बहू की वॅल्यू हम दोनो भाइयो से भी ज़्यादा थी. पूजा की शादी की ज़िम्मेदारी भी वंदना भाभी और अर्चना को दी गयी.

अर्चना ने अपने ही किसी वकील साथी पीयूष के साथ पूजा की शादी की बात चलाई. लड़का सबको पसंद आया और पूजा की शादी कर दी गयी.

पूजा की विदाई के समय वंदना और अर्चना से ज़्यादा मैं और विनोद भाय्या रो रहे थे. रमाकांत जी से ज़्यादा मेरे मम्मी पापा उदास थे. पालने वाले रिश्ते पैदा करने से बड़े होते हैं.

हमारे गुम को देखते हुए रमाकांत जी ने थोड़े दिन के लिए श्रद्धा को भी हमारे यहा भेज दिया ताकि पूजा की कमी ना खले.

विनोद भैया से तो श्रद्धा ज़्यादा बात नही करती थी पर मुझे थोड़ी सांत्वना मिली. थोड़े दिन बाद श्रद्धा चली गयी पर वो हमारे घर आती रहती थी.

जब लगता हैं की ज़िंदगी की नाव बहुत सही चल रही हैं तभी शायद तूफान आता हैं. हमारी खुशहाल ज़िंदगी मे भी तूफान आने वाला था और एक नाजायज़ रिश्ता खुलने वाला था.

अगले एपिसोड मे पढ़िए वो तूफान क्या था.

……………..//////////////
 
अब आगे की कहानी अजय की ज़ुबानी जारी हैं…

पूजा की शादी हमारे ही शहर मे हुई थी इसलिए वो हफ्ते मे 1-2 बार हमारे घर आ जाती थी. हम सब घर वालो को अच्छा लगता था. उसके पति पीयूष के पेरेंट्स दूसरे शहर मे रहते थे इसलिए पूजा पर ज़्यादा पाबंदी नही थी.

एक दिन मैं अपने काम पर था तब मा का फोन आया की पूजा घर आई हुई हैं. मैं सारा काम अपने बड़े भाई विनोद के हवाले छोड़कर लंच के बहाने घर पहुचा.

हमारा घर दो मंज़िल का हैं. नीचे की मंज़िल पर मम्मी-पापा और विनोद भैया-वंदना भाभी के बेडरूम थे. उपर की मंज़िल पर एक कमरे मे मैं और मेरी वाइफ अर्चना रहते तो दूसरा कमरा पूजा का था. वो जब भी ससुराल से आती तो अपने ही कमरे मे रहती थी.

मम्मी नीचे ही थी और उन्होने मुझे बताया की पूजा उपर अपने कमरे मे हैं. मैं भागते हुए उत्साह मे उपर गया. पूजा के कमरे का दरवाजा जोश के साथ खोला.

अंदर का नज़ारा देख कर मेरे प्राण सुख गये. आँखें फट कर बाहर आ गयी थी. मेरी छोटी बहन पूजा टॉपलेस और सिर्फ़ एक पैंटी मे थी और मेरी बीवी अर्चना से च्चती से च्चती मिलाए चिपकी हुई किस कर रही थी.

अर्चना भी पूजा की ही तरह टॉपलेस थी और सिर्फ़ पैंटी मे थी. उनको इस हालत मे देख कर मेरी हल्की सी चीख निकली और वैसी ही चीख पूजा की भी निकली.

मैं मूर्ति के समान खड़ा था और पूजा ने जल्दी से चादर लिया और अपने नंगे बदन को ढक दिया. अर्चना ने अपना नंगा शरीर ढकने का कोई प्रयास नही किया. क्यू की उसको पिच्छले दो साल मे मैं काई बार पूरा नंगा देख चुका हूँ और उसके बड़े बूब्स चूस चुका हूँ.

मैं पलट कर अपने कमरे मे आ गया. जो देखा उस पर यकीन नही हो रहा था. यही दुआ कर रहा था की मैने जो देखा वो हक़ीकत नही हो और मेरी छोटी खूबसूरत बहन पूजा जिसको हेरोयिन बनना था वो अभी कोई आक्टिंग कर रही थी.

कुच्छ मिनिट्स मे अर्चना कपड़े पहने हमारे बेडरूम मे आई और दरवाजा बंद किया. मैं सवालीयो नज़रो से बिना पुच्छे ही काई सवाल कर रहा था. अर्चना ने भी मेरी मन की बात भाप ली और और खुद ही बोल पड़ी.

अर्चना: “हा मैं बाइसेक्षुयल हूँ. तुम्हारे अलावा मेरी ज़िंदगी मे और कोई मर्द नही हैं, सिर्फ़ दो लड़किया हैं. पहली मेरे साथ काम करने वाली मेरी एक सहेली और दूसरी हमारी छोटी बहन पूजा”

मैं यह सुनना नही चाहता था पर यही हक़ीकत थी और कोई आक्टिंग नही थी. मेरी बोलती वैसे भी अर्चना के सामने बंद हो जाती हैं, तो मैं चुप ही रहा.

अर्चना: “मैं मेरी सहेली से शादी करना चाहती थी पर उसकी हिम्मत नही थी. यह समाज दो लड़कियो की शादी स्वीकार नही करता. वैसे भी हम बाइसेक्षुयल थे, इसलिए उसने किसी लड़के से शादी कर ली और मैने तुमसे. अब हम दोनो नही मिलते”

फिर मैने हिम्मत करके अर्चना से सवाल पुच्छ ही लिया.

अजय: “मगर पूजा के साथ!”

अर्चना: “पूजा इतनी खूबसूरत हैं, जवान हैं और उसका कोई बाय्फ्रेंड नही हैं, फिर भी तुम लोगो को कभी शक नही हुआ की पूजा लेज़्बीयन हो सकती हैं!”

अजय: “लेज़्बीयन!!”

अर्चना: “हा, लेज़्बीयन. मैने तुम्हारे घर मे आते ही एक महीने मे यह पता कर लिया था. फिर मैं और पूजा एक दूसरे के लेज़्बीयन पार्ट्नर बन गये”

अजय: “और घर मे किसी को भनक भी नही लगी!”

अर्चना: “क्यू की पूजा और हमारा कमरा दूसरी मंज़िल पर हैं तो हमारे लिए आसान हो गया”

अजय: “मगर पूजा के हज़्बेंड पीयूष का क्या होगा! पूजा तो लेज़्बीयन हैं, उसको मर्दो मे कोई इंटेरेस्ट ही नही होगा!”

अर्चना: “इसलिए तो पीयूष के साथ मैने पूजा की शादी करवाई. पीयूष भी मेरी कम्यूनिटी का ही हैं. पीयूष गे हैं. उसको सिर्फ़ मर्दो मे इंटेरेस्ट हैं. वो पूजा को हाथ भी नही लगाता. मैने इसीलिए पूजा की शादी पीयूष से करवाई”

अजय: “मगर ऐसे कब तक चलेगा! लोगो को पता नही चल जाएगा?”

अर्चना: “मैं बाइसेक्षुयल हूँ किसी को पता चला? पूजा लेज़्बीयन हैं वो भी पता नही चलता अगर हमने थोड़ी लापरवाही ना करके दरवाजा लॉक कर दिया होता तो”

अजय: “मतलब इसलिए तुम और पूजा कई बार उसके कमरे मे बंद रहते थे और मुझे लगता था तुम गप्पे लड़ा रहे हो”

मैने अपना सिर पीट लिया. मेरी नाक के नीच यह सब खेल चल रहा था और मुझे पता ही नही चला.
 
अर्चना: “तुम हमारे राज को राज रखने मे मदद करोगे? मैने तुम्हे प्यार देने मे कभी कोई कमी नही आने दी. मैं बाइसेक्षुयल हूँ इस वजह से तुम्हारी सेक्स लाइफ कभी अफेक्ट नही हुई और आगे भी नही होगी”

अपनी बीवी के आर्ग्युमेंट के सामने मैं कभी जीत नही पाया तो आज कैसे जीतता. वो सही थी, उसकी वजह से मुझे कभी कोई तकलीफ़ नही हुई थी.

क्या मैं उसको उसकी ज़िंदगी जीने दूं जो मेरी नज़र मे ग़लत हैं पर मेरी ज़िंदगी उसकी वजह से डिस्टर्ब भी नही थी! मैने अर्चना को हामी भर दी और उसने मुझे गले लगा लिया.

अर्चना: “पूजा बहुत डरी हुई हैं. लेज़्बीयन लोग हमेशा डरे हुए ही रहते हैं. उनको समाज स्वीकार नही करता. तुम उसके पास जाओ और उसको शांत करो”

मैं डर गया. पूजा का सच जानने के बाद और अपनी जवान बहन को उस नंगी हालत मे देखने के बाद मैं उस से नज़रे कैसे मिलाता. मगर अर्चना मुझे पकड़ कर पूजा के रूम मे ले गयी.

पूजा वहाँ एक कोने मे डरी सहमी सी खड़ी थी. एक नज़र हमे देखने के बाद उसने नज़रे नीचे झुका ली. पूजा ने कपड़े पहने हुए थे और मुझे फिर से उसमे अपनी छोटी चुलबुली बहन नज़र आई.

मैने हिम्मत की और उसके पास गया. उसके सिर पर हाथ फेरा और वो एक झटके मे मेरे से गले लग गयी. मैं तो वही पर पिघल गया. पूजा के सिर और पीठ पर हाथ मलता ही रह गया.

वो लेज़्बीयन हैं उसमे उसकी कोई ग़लती नही थी. मैने वो घटना भुलाते हुए ज़िंदगी मे आगे बढ़ना शुरू किया. मगर अपनी बहन और बीवी को नंगी हालत मे देखने का वो दृश्य मेरी आँखों से जा नही रहा था.

अपनी बीवी अर्चना को जब भी चोदता तो वो दृश्य याद कर रुक जाता. अर्चना भी मेरी मनोस्तिति समझ चुकी थी और वो खुद मेरे उपर चढ़ कर मुझको चोद देती.

पूजा जब भी मेरे घर आती तो अर्चना मेरी इजाज़त लेकर ही पूजा के कमरे मे जाती. मुझे भी पता था वो क्या करने जा रही हैं. शुरू शुरू मे मुझे सच स्वीकारने मे बहुत दिक्कत हुई.

मेरी हालत देख अर्चना मुझे गले लगाती और पहले मुझे चोदने की बात कहती पर मैं उसको जाने देता. धीरे धीरे मैने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया.

पूजा और अर्चना दोनो खुश थे इसलिए मैं भी खुश था. मगर मैं अब हर लड़की को लेज़्बीयन या बाइसेक्षुयल नज़रिए से देखने लगा.

वंदना भाभी भी कही लेज़्बीयन तो नही, या फिर मेरी साली श्रद्धा जिसको लड़को से नफ़रत हैं क्या वो भी लेज़्बीयन हैं! मेरे सवाल बढ़ने लगे.

अर्चना और पूजा थोड़ा और खुल चुके थे, क्यू की अब वो दोनो मेरी प्रोटेक्षन मे थे. काई बार मैने उनके कमरे के बाहर पहरेदारी भी की हैं ताकि घर मे किसी और को पता ना चले.

काई बार उनके दरवाजे पर नॉक करते हुए मैने उनको सिसकिया और आहें धीरे करने को कहा ताकि घर मे कोई और सुन ना ले. कभी कभी सोचता की एक मर्द औरत का तो ठीक हैं मगर वो दोनो लड़किया मज़ा कैसे लेती होगी! मगर यह सवाल पुच्छने की हिम्मत नही होती थी.

कुच्छ समय बाद वो दोनो मेरी आँखो के सामने भी एक दूसरे को किस कर दिया करते या आपस मे चिपक जाते. मेरा दिल धक धक करने लगता और शुरू शुरू मे मैं वहाँ से खिसक जाता.

फिर मुझे आदत पड़ गयी और मुझे वो नॉर्मल लगने लगा. कभी अर्चना के उपर पूजा लेटी होती तो कभी पूजा के उपर अर्चना और एक दूसरे के शरीर को दबाती और किस करती.

वो दोनो मेरे सामने कपड़े नही खोलती थी, सिर्फ़ च्छुने के और किस करने के मज़े ही लेती थी. मैं नही होता तभी वो कपड़े खोल कर उनका कार्यक्रम करती थी.

एक बार रात को रुकने के लिए पूजा हमारे घर आई हुई थी. सबके सोने के बाद वो मेरे कमरे मे आई. मैं और अर्चना बिस्तर पर बैठे बात कर रहे थे. आते ही पूजा ने अर्चना को बिस्तर पर लिटा कर उस पर सवार हो गयी और झुक कर अर्चना को किस करने लगी.

किस करने के बाद वो दोनो मेरी तरफ देखने लगे और स्माइल कर रहे थे. वो शायद मुझे बाहर भेजना चाह रहे थे. मैं नही गया और वही बैठा रहा.

पूजा ने अर्चना का नाइट गाउन निकाल दिया और उसको नंगा कर दिया. अर्चना को तो मैं नंगा देखता रहता हूँ तो मैं नही हिला. फिर वो लोग मुझे ही देख रहे थे की अब तो मैं बाहर जाऊ.

पूजा ने अपना टीशर्ट उपर करना शुरू किया और सिर से बाहर निकाल दिया. मुझे यह उम्मीद नही थी. मैने उसको डाट दिया.

अजय: “मुझे बाहर भेजना हैं तो सीधा बोल दो मैं चला जाता. मेरे सामने कपड़े तो मत खोलो”

मैं बिस्तर से खिसक कर कर नीचे उतरा और जाने लगा. पूजा मेरे पास आई और मुझे गले लगा कर सॉरी और थॅंक यू बोला. पूजा हाइट मे मुझसे 6 इंच छोटी हैं. मैने उसका चेहरा देखा पर मेरी नज़र ब्रा के उपर से दबे हुए नंगे बूब्स की झलक पर गयी.
 
मेरी कामुकता का सफ़र

मैं अपनी साड़ी लपेट चुकी थी और बालो को आखिरी स्वरुप दे रही थी की तभी सासु माँ की आवाज़ आयी की तैयार हुई की नहीं, सब लोग आ चुके होंगे ज्यादा देर नहीं करते अब।

मैं तुरंत कंघा नीचे रखते हुए बोली हो गया बस और कमरे से बाहर निकल गयी। सासु जी तैयार थे पडोसी के यहाँ एक रात्री जागरण में जाने के लिए। मैंने तुरंत कमरे को ताला लगाया और सासुजी के साथ पैदल घर से निकल पड़ी।

सासु जी कुछ बोलते हुए चल रहे थे पर में किन्ही और ख्यालो में थी, पति को दूसरे शहर गए 4 महीने हो चुके थे और बहुत याद आ रही थी, विरह के कुछ महीने काट रही थी।

दस मिनट के बाद ही हम पड़ोस के मकान के सामने खड़े थे, अंदर काफी चहल पहल थी, रात्रि जागरण का माहौल बन चूका था। एक बड़े हाल में सारे पुरुष लोगो के लिए व्यवस्था थी।

वहाँ की मेरी भाभी सहेलिया दूसरे थोड़े छोटे कमरे में थी अपने पीहर और घनिष्ट सहेलियों के साथ, इसलिए थोड़े अभिवादन के बाद मैंने उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा।

अंदर एक बड़े कमरे में सारी औरते बैठी बातों में मशगूल थी, हमारे आते हैं उन्होंने स्वागत किया और हम लोग बैठ गए। कुछ औरते बातों में मग्न थी कुछ ने सोने की तैयारी कर ली थी। पता चला पूजा आरती का कार्यक्रम सुबह 5 बजे होने वाला हैं।

मैं अपने पुराने दिनों और विचारो में खो गयी और मध्य रात्रि होने वाली थी, अब तक सारी औरते और पुरुष सो चुके थे। शायद सुबह 5 बजे उठने की तैयारी में, मगर मेरी आँखों में नींद नहीं थी, भीड़ भरा माहौल देख कर मेरी नींद वैसे भी जा चुकी थी। मैं कमरे से बाहर लघु शंका के बहाने किसी तरह औरतो के पाँव बचाते हुए बाहर निकली।

तभी सामने मोहित दिखाई दिया, जिसका यह घर था। एक हंसमुख और मुखर स्वभाव का युवक मेरे पति का हम उम्र। जब भी किसी फंक्शन में जाता अपनी बातों से वह शमा बाँध लेता। मुझे ऐसे व्यक्तित्व हमेशा आकर्षित करते हैं।

पिछली बार जब कुछ महीने अपने पति से दूर थी तब जब भी वह मिलता मेरी कुशलक्षेम जरुर पूछता और मदद के लिए पूछता। मगर कभी उसे मदद का मौका नहीं दिया।

मुझे देखते ही उसने हँसते हुए सवाल दाग दिया की मेरे पति कब आने वाले हैं। मुझे भी पक्का पता नहीं था पर बोल दिया कुछ और महीने लगेंगे। फिर उसने पूछा की मैं अब तक सोई क्यों नहीं जब की सारे लोग सो चुके थे।

फिर उसने सुबह 5 बजे के प्रोग्राम के बारे में बताया। मैंने उसे समझाया की इस भीड़ में मैं नहीं सो सकती। उसको मुझ पर दया आयी और कुछ सोचने लगा। उसकी इस उधेड़बुन को देखते हुए मैंने एक सवाल दाग दिया आप अब तक क्यों नहीं सोये।

उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान तेर गयी और हाथ में पकड़ी कम्बल को थोड़ा उठाते हुए बोला की उसके सोने का एक विशेष प्रबंध किया हैं उसने घर की छत पर। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, और पूछा छत पर तो बहुत मच्छर होंगे और सुबह होने तक ठण्ड भी बढ़ जाएगी।

वह मेरे सवालो के जवाब के साथ तुरंत तैयार था। उसने बताया की उसने एक मच्छरदानी का इंतज़ाम पहले से कर लिया हैं और ठण्ड के लिए कम्बल लेने ही आया था।

यह कम्बल भी उसने किसी और सोते हुए व्यक्ति के सिरहाने से निकाल कर लिया हैं। मैं उसकी इस शरारत पर खिलखिला पड़ी। मेरे चेहरे पर हंसी देख कर उसको अच्छा लगा और मुझे मदद के रास्ते सोचने लगा।

मैंने मजाक करते हुए कहा आपके अच्छा हैं विशेष इंतेज़ाम हैं, हमारा क्या? यह बात उसकी दिल को लगी। उसमे मुझे सुझाव दिया की मैं छत पर मच्छरदानी में सो जाऊ। मुझे लगा वह मजाक कर रहा हैं, पर वह इस बात पर गंभीर था।

उसने अब और ज्यादा आग्रह किया तो तो मैंने उसको टालने के लिए बोल दिया की फिर आप कहा सोएंगे। उसने बोला की वह नीचे ही सो जायेगा पुरुषो के कमरे में।

मैंने उसका प्रस्ताव यह कहते हुए ठुकरा दिया की यह नहीं हो सकता, सारी महिलाये यहाँ हैं मैं वहां अकेले जाउंगी और किसी को पता लगा तो अच्छा नहीं होगा।

 
उसने बताया की छत पर कोई नहीं हैं और मैं छत पर लगे दरवाज़े को अंदर से बंद करके सो सकती हूँ, किसी को पता नहीं चलेगा और सुबह सबके जागने तक वापिस नीचे आ सकती हूँ। मुझे कुछ और नहीं सुझा तो बहाना मार दिया की मैं वहाँ अकेले नहीं सो सकती डर लगता हैं।

कुछ सोचने के बाद वह बोला कि वह मेरे साथ सो जायेगा। उसके यह कहते ही एक चुप्पी सी छा गयी। उसे अहसास हुआ की उसने क्या बोल दिया और तुरंत अपनी बात सुधारते हुए बोला कि वह पास में ही दूसरा बिस्तर लगा के सो जाएगा।

मैंने तुरंत मना कर दिया कि मेरी वजह से मैं उसको मच्छरों का भोजन नहीं बना सकती। वह अपने आप को लाचार महसूस करने लगा। हमेशा मदद के लिए ऑफर करने वाला आज मदद मांगने पर नहीं कर पा रहा था।

उसने अपना आखिरी प्रस्ताव रखा कि मच्छरदानी पलंग के साइज की हैं जिसमे दो लोग आसानी से सो सकते हैं और अगर मुझे आपत्ति ना हो तो हम दोनों वहां सो सकते हैं।

मेरे हां कहने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता पर अब उसने एक ब्रह्मास्त्र छोड़ा की अगर मैं उसपे थोड़ा सा भी भरोसा करती हु तो हां कर दू। अब मैं बुरी तरह फंस चुकी थी। न हां कह सकती और न ही ना कह सकती। एक तरफ कुआ दूसरी तरफ खाई।

ऐसा नहीं था की मैं उसपे भरोसा नहीं करती। परन्तु यह समाज, अगर किसी को पता चल गया, तो कुछ ना होते हुए भी मुझे बहुत कुछ होने वाला था। अपने पति को क्या जवाब दूंगी।

मैं हां या ना कुछ कह पाती उसके पहले ही उसने मुझे निर्देश दिया कि मैं अपनी सासुजी को बोल दू की मैं दूसरे कमरे में भाभी (उसकी पत्नी) के साथ सो रही हु और फिर मैं छत पर आ जाऊ वह मेरा इंतज़ार करेगा। यह कहते हुए वह सीढिया चढ़ते हुए चला गया।

मेरे पाँव अब जम गए, फिर औरतो वाले कमरे की तरफ गयी सासुजी दूसरे कोने में सो रहे थे और उन तक पहुंचने के लिए काफी लोगो को लांघ कर जाना था, फिर सासुजी की नींद ख़राब करना ठीक नहीं समझा। मैं मुड़ कर सीढ़ियों की तरफ भारी कदमो से बढ़ने लगी।

किसी तरह बेमन से मैं छत पर पहुंची, वहा वो मेरा इंतज़ार कर रहा था। उसने छत के दरवाज़े पर कुण्डी लगाते हुए मुझे आश्वासन दिया कि चिंता ना करू और किसी को पता नहीं चलेगा।

उसने अच्छे से गद्दा लगा रहा था और मच्छरदानी के अंदर दो तकिये लगे हुए थे। उसने कही से मेरे लिए दूसरे तकिये का इंतज़ाम कर लिया था। शायद फिर किसी के सिरहाने से खिंच कर।

अब हम दोनों एक ही बिस्तर पर आस पास लेटे आसमान को निहार रहे थे। चांदनी रात थी आसमान साफ़ था तारो से भरा हुआ और बहुत खुशनुमा रात का मौसम था। हलकी सी हवा चल रही थी पर ठण्ड शुरू नही हुई थी इसलिए कम्बल एक कोने में पड़ा था। थोड़ी देर ऐसे ही बातें करते रहे फिर थोड़ी ख़ामोशी और पता ही नहीं चला कब मेरी आँख लग गयी।

 


अचानक मैंने अपने सीने पर कुछ हलचल महसूस कि और मेरी नींद टूट गयी पर आँखें अभी भी बंद ही थी। मैंने मह्सूस किया कुछ उंगलिया मेरे ब्लाउज के हुक को खोल रही थी। मैं डर से काँप उठी, क्या यह उसी की हरकत हैं।

अब में क्या कर सकती हु। अगर चिल्लाई तो लोग पूछेंगे मैं यहाँ अकेले क्यों आयी और मुझ पर ही शक करेंगे। मैंने आँखें बंद किये हुए ही कुछ इंतज़ार करना ठीक समझा।

तब तक सारे हुक खुल चुके थे और मेरे खुले ब्लाउज के अंदर कुछ हवा प्रवेश कर गयी। मैं फिर से कांप उठी और एक अनिष्ट की आशंका से गिर गयी। मैं इंतज़ार करने लगी आगे क्या गलत होने वाला हैं।

अब उसका हाथ मेरे पेट पर था, पुरे 4 महीने बाद किसी पुरुष ने मुझे छुआ था, पुरे शरीर में एक तरंग सी दौड़ गयी। कुछ मजा भी आ रहा था पर डर ज्यादा था। उसने अब मेरे पेटीकोट से साड़ी की पटली निकालने की कोशिश की जिसमे वह कामयाब नहीं हुआ, शायद मेरे जाग जाने के डर से ज्यादा ताकत नहीं लगाई। मैंने चैन की सांस ली।

अब उसने मेरा ब्लाउज सामने से और खुला कर दिया शायद मेरे स्तन देखना चाहता था, पर कसे हुए ब्रा की वजह से कुछ हो नहीं पाया। ब्रा का हुक पीठ पर था और मैं पीठ के बल ही सोइ थी इस बात की ख़ुशी थी। वो चाहते हुए भी ब्रा नहीं खोल सकता था।

कुछ मिनट ऐसे ही निकल गए और वो मेरे कमर और ऊपरी सीने पर ऐसे ही हाथ मलता रहा, फिर जब उसे अहसास हुआ की कुछ होने वाला नहीं तो मेरे हुक वापिस लगा दिए। मैंने चैन की लम्बी सांस ली और थोड़ी देर बाद कब फिर आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

मेरी नींद में दूसरी बार व्यवधान आया, इस बार मैं करवट लेके उसकी और पीठ करके सोई हुई थी इसलिए आँखें खोली, अभी भी गहरी चांदनी रात थी और नींद खुलने का कारण वही था।

पर थोड़ी देर हो चुकी थी, ब्लाउज के सारे हुक खुल चुके थे। फिर से डर की लहर कोंध गयी कि इस बार कैसे बचूंगी क्यों की मैं करवट लेके सोई थी और ब्रा का हुक उसकी तरफ था।

कुछ सोच पाती उसके पहले ही खट की आवाज़ से ब्रा का हुक खुल चूका था और अचानक सीने पर कस के बाँधा हुआ प्रोटेक्शन ढीला हो चूका था। मैंने एक साये को अपने चेहरे की तरफ आते महसूस किया और तुरंत अपनी आँखें बंद कर ली।

उसके हाथों ने अब मेरा ब्रा, मेरे शरीर के एक महत्पूर्ण अंग से उठा दिया और हवा की लहरे अब मेरे स्तनों को छू रही थी। उस साये में मैंने मह्सूस किया कि अब वह मेरे शरीर के उस भाग को घूर रहा हैं जिसे देखने की असफल कोशिश उसने कुछ देर पहले ही की थी, पर अब वो कामयाब हो चूका था।

मैं अपने आप को कोसने लगी क्यों मैंने करवट ली। और उससे भी पहले क्यू मैं उसको ना नहीं बोल पाई छत पर आने के लिए। पर अब क्या हो सकता था, या अब भी बहुत कुछ रोका जा सकता था।

अगले कुछ क्षणों के बाद उसने एक हाथ से मेरे स्तन को दबोच लिया था, मैं अंदर से पूरी तरह सिहर गयी थी। पर कुछ बोलने या करने की हिम्मत नहीं जुटा पायी। और यह प्रार्थना करने लगी की इससे बुरा कुछ न हो, या शायद अंदर ही अंदर कही से यह चाहती थी की 4 महीने के एकांत वास को टूटने दिया जाये। शायद मैं कुछ निर्णय नहीं ले पा रही थी और खुद को भाग्य के हाथों छोड़ दिया था।

कुछ देर ऐसे खेलने के बाद उसके हाथ फिर मेरी साड़ी की पटली की तरफ बढे और कुछ सेकंड के जद्दोजहद के बाद पटली पेटीकोट के बाहर थी और अगले कुछ मिनटों में मेरी पूरी साड़ी पेटीकोट से अलग हो चुकी थी।

अब मैं एक अबला की नारी तरह पड़ी थी जिसके शरीर पर सिर्फ पेटीकोट था ऊपर के वस्त्र सामने से खुले थे। फिर से एक खट की आवाज़ हुई और मेरे पेटीकोट का नाड़ा खुल चूका था और उसने मेरा पेटीकोट कमर से नीचे खिसकाना शुरू कर दिया।

मैंने आंखें खोली तो पेटीकोट पूरा निकल कर मेरी आँखों के सामने पड़ा चिढ़ा रहा था। और कुछ सोचने के पहले ही मेरे नीचे के अंगवस्त्र भी निकल कर पेटीकोट का साथ पड़े थे।

अब मुझे अहसास हो चूका था कि बचने का कोई रास्ता नहीं हैं और आत्म समर्पण कर देना चाहिए या तुरंत उठ कर फटकार लगा देनी चाहिये कि उसकी यह हिम्मत कैसे हुई। फिर किसी डर की आशंका से या काफी समय से शरीर की जरुरत पूरी नहीं होने की वजह से मैं चुप चाप लेटी रही।

 
मेरे नग्न शरीर को देख कर अब शायद उसका अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहा था और पीछे से उसका शरीर मुझसे चिपका हुआ था और रह रह कर ऊपर निचे रगड़ रहा था। और उसका एक हाथ मेरे कमर, कूल्हों और स्तनों पर फेरा रहा था।

फिर उसने अपना शरीर मुझसे अलग कर लिया, मुझे लगा उसका इरादा बदल गया लगता हैं और मैं सुरक्षित हूं, पर मैं गलत थी। फिर कुछ कपडे निकलने की आवाज़ आयी।

अब मैंने अपने पीछे के निछले हिस्से में एक गर्म बदन का स्पर्श महसूस किया, मुझे समझते देर नहीं लगी की उसने क्या किया हैं। और अब वो पूरा नग्न था मुझसे पीछे से फिर चिपक गया। इस बार शायद कुछ ज्यादा ही जोर से, शायद नग्नावस्था में उसकी इन्द्रिया और सक्रीय हो गयी थी।

उसका लचीला अंग मेरे पुठ्ठो को छु गया। अब शायद कही न कही मैं अपने आप को तैयार कर चुकी थी एक अनपेक्षित मिलन के लिए। उसका शरीर बराबर मुझे पीछे से रगड़ रहा था। मैं महसुस कर पा रही थी उसका लचीला अंग धीरे धीरे कठोर होता जा रहा था। अब वह जोर जोर से मेरे स्तनों को दबाते हुए कुचलने लगा पर अब मुझे बुरा नहीं लग रहा था।

कुछ देर बार उसने हाथ स्तनों से हटा लिया। उसका कठोर अंग अब मेरे दोनों टांगो के बीच खोजी कुत्ते तरह कुछ ढूंढ रहा था। शायद अंदर प्रवेश का मार्ग पर मिल नहीं रहा था। एक दो बार वह मेरे योनि द्वार के आस पास भी पंहुचा था।

थोड़े प्रयासों के बाद ही उसे मेरे शरीर पर गीली जमीन मिल गयी और वो रुक गया। उसका लिंग अब मेरे योनि द्वार पर था। मेरी साँसे जैसे रुक गयी। एक भटकते हुए प्यासे राहगीर के होठों पर जैसे किसी ने पानी का गिलास रख दिया था।

उसके लिंग ने थोड़ी ऊपर नीचे हरकत की और थोड़ा सा योनि में अंदर गड़ गया। मैंने आँखें जोर से बंद कर ली अगले क्षणों में जो होने वालो था उसकी तैयारी में। पति के अलावा पहली बार कोई पुरुष मेरी योनि में प्रवेश करने वाला था। इतनी देर की रगड़ से मेरे अंदर पहले ही थोड़ा गीला हो चूका था।

मक्खन की तरह धीरे धीरे उसका लिंग फिसलते हुए अंदर आता गया और उसके मुँह से सिसकी निकलती गयी। मेरा हाथ चेहरे के पास ही था, सो अपने होठों पर रख मुँह बंद कर दिया। उसने अपने हाथ से एक बार फिर मेरा स्तन दबोच लिया।

मैं अपने काफी अंदर तक उसके कठोर लिंग को महसूस कर पा रही थी। जितनी धीमी गति से वो अंदर गया उसी धीमी गति से उसने फिर उसको आधे से भी ज्यादा बाहर निकाला। अंदर और बाहर निकलते समय उसका लिंग मेरी योनी की दीवारों को रगड़ते हुए जा रहा था और मेरा पूरा शरीर अंदर ही अंदर कम्पन कर रहा था।

दो सेकंड के विराम के बाद एक बार फिर उसी धीमी गति से वो दीवार रगड़ता हुआ अंदर गया। जितना अंदर वो गया उससे मुझे अहसास हो गया उसकी लम्बाई कितनी ज्यादा रही होगी, और जिस तरह वो मेरी दीवारों से रगड़ खा रहा था इतनी मोटाई मैंने तो पहले महसूस नहीं की थी।

काफी समय तक वो ऐसे ही मालगाड़ी की रफ़्तार से धीरे धीरे अंदर जाता थोड़ा रुकता और बाहर आता फिर थोड़ा रूककर अंदर जाता। हर बार अंदर जाते ही उसकी एक लम्बी आह निकलती।

 
पता ही नहीं चला कब उसकी मालगाड़ी फ़ास्ट ट्रैन में बदली और कब राजधानी एक्सप्रेस बन गयी। उसका लिंग अंदर योनी में एकत्रित पानी को तेजी से चीरता हुआ आ जा रहा था जिससे छपाक छपाक की आवाज़े आने लगी थी। उसकी झटको की गति बढ़ने के साथ छपाक की आवाज़े काफी तेज हो गयी थी।

अब वह तेजी से बार बार झटके मारते हुए अंदर बाहर हो रहा था और मेरी उत्तेजना भी बढ़ती जा रही थी। उसके मुँह से अब आहें निकलने लगी और समय के साथ तेज होती गयी।

मुझे डर लगा कही कोई सुन न ले। रात के सन्नाटे में ऐसी आवाज़ें ज्यादा ही गूंजती हैं। पर मैं मन ही मन चुपके से उसका आनद भी लेती जा रही थी। कुछ ही देर में न चाहते हुए भी मैं भी उस आनंद में भीग गयी।

मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ अभी तक दबा के रखी हुई थी, जो की अब आपे से बाहर होता जा रहा था। मेरे होठों के बीच से एक आवाज़ छूट ही गयी।

इसके पहले कि मैं अपने हाथों से ओर जोर से मुँह को दबाती, उसने सुन लिया और डरने की बजाय मेरी आह को मेरी मौन स्वीकर्ती मान कर उसने कुछ जोर के झटके मुझे मारे, जिससे मेरी हलकी चीख निकलने लगी।

अब कोई फायदा नहीं था आवाज़ दबाने का। जिस चीज़ के लिए मैं कुछ महीनो से तड़प रही थी वह मिली तो भी इस तरह से और वह भी किस व्यक्ति से, यह सपने में भी नहीं सोचा था।

उसने अब मेरे ब्लाउज और ब्रा को पूरी तरह मेरे शरीर से अलग कर दिया था। अब मेरे शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था और ना ही उसके। पर अब हमें कपड़ो की परवाह नहीं थी, हम इन क्षणों को पूरी तरह सफल बनाने में झूट गए।

हम दोनों की आहे एक ही सुर में छपाको की आवाज़ से ताल मिला रही थी। इतनी देर करने के बाद भी उसकी शक्ति क्षीण नहीं हुई थी और उसी गति से उसके झटके निर्बाध जारी थे।

मैं अपनी योनी के बाहर कुछ तरल पदार्थ रिसता हुआ महसूस कर पा रही थी जो उसके लिंग के बाहर आते वक़्त साथ बाहर आ रहा था। मैं अपने चरम की तरफ बढ़ती जा रही थी और दुआ कर रही थी की मुझसे पहले कही वो छूट ना जाये।

पर शायद इन मर्दो को दूसरी औरतो के साथ करते वक़्त ज्यादा ही ताकत मिल जाती हैं। मेरा नशा अब सर तक चढ़ने लगा था और जैसे चक्कर आने लगे, मैं निश्तेज महसूस करने लगी थी, ये चरम के नजदीक पहुंचने के संकेत थे।

मैंने अपनी टाँगे अब खोल दी, जिससे बाहर छलके पानी से हवा टकराई और एक ठंडक का अहसास हुआ। टाँगे खुलने से उसको और भी बड़ा रास्ता मिला और उसने अपना लिंग ओर गहराई में ड़ाल दिया। शायद एक इंच ओर गहरा वो उतर गया था।

अगले कुछ मिनट बहुत कीमती थे, उसने जिस गहराई से एक के बाद एक तेज झटके मारे मैं पूरा छूट गयी, मेरी छोटी छोटी आहें चरम पर आते ही एक लम्बी चीख में तब्दील हो गयी, और उसके बाद मेरी कुछ हलकी चीखे निकली और मैंने अपना चरम प्राप्त कर लिया।

मेरे चरम से उसका उत्साहवर्धन हुआ और वो भूखे भेड़िये की तरह आवाज़े निकालते हुए झटको पर झटके मारता रहा। मेरे स्तन को वो अब बुरी तरह से मौसम्बी की तरह निचोड़ रहा था।

फिर एक झटका उसका इतनी गहराई में उतरा की लिंग बाहर नहीं निकला और वही पड़ा हुआ कुलबुला कर फुफकारने लगा। मैंने अपने अंदर एक गर्म लावा महसूस किया, उसने सारा पानी अंदर छोड़ दिया था। वो कुछ देर तक ऐसे ही निढाल पड़ा रहा।

सारी प्रतिक्रियाए शांत हो चुकी थी जैसे एक तूफ़ान के बाद की शांति। अब भी वह मुझे झकड़े हुए था और उसके शरीर का एक हिस्सा मेरे शरीर में था।

 
कुछ क्षणों के बाद अपनी चेतना को लौटाते हुए उसने अपने आप को मुझसे अलग किया, उसके बाहर निकलते ही ऐसे लगा जैसे मेरे शरीर का कोई हिस्सा मुझसे अलग हो गया, और एक हलके दर्द से मेरी आह निकली।

मुझे में पीछे मुड़ कर उससे आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं थी, जबकि सारी गलती उसकी थी, शायद मेरी गलती सिर्फ यह थी की मैंने उसे नहीं रोका। पर क्या मैं उसको रोक सकती थी! इसमें मेरी क्या गलती थी, शायद मेरे पति की गलती थी जो की इतने महीनो तक मुझसे दूर रहा और इस हाल में छोड़ दिया की मैं इस गलती में न चाहते हुए भागीदार बनी।

मैंने एक एक कर फिर से अपने कपडे पहनना शुरू किआ। मुझे यह सुनिश्चित करना था की सुबह उठ कर जब नीचे जाउंगी तो मेरी हालत देख कर किसी को कुछ शक ना हो।

कपडे पहनने के बाद जैसे ही मैं मुड़ी देखा वह काफी पहले ही कपडे पहन चूका था और मेरा इंतज़ार कर रहा था दूसरी और देख कर। शायद कपडे पहनते वक़्त भी उसने मुझे घुरा होगा, पर मैंने मन में सोचा अब उधर देखने का क्या फायदा, सब कुछ को वह पहले ही देख चूका हैं।

क्या उसे अपने किये पर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। गलती तो उसने की हैं या फिर मुझे उसको शुक्रिया कहना चाहिए था। उसकी इस जबरदस्ती ने मुझे कई दिनों के बाद एक मानसिक और शारीरिक सुख की प्राप्ति कराई थी। काफी समय के बाद मैं अपने आप को बहुत पूर्ण, तरो ताज़ा और तंदरुस्त महसूस कर थी।

वह मेरे पास चलते हुए आया और पास आकर खड़ा हो गया। मुझे लगा मुझसे माफ़ी मांगेंगा और मैं उसे झूठमूठ गुस्सा करके डाट दूंगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

उसने कहा साढ़े चार बज गए हैं और थोड़ी देर में सब लोग उठने लगेंगे अब मुझे नीचे जाना चाहिए। मैंने उसको दबे शब्दों में कहा आप जरा मेरे आगे चलिए और देखिये कोई मुझे सीढ़ियों से उतरते हुए न देख ले।

उसने तुरंत मेरे हुक्म का पालना किया, और करता भी क्यों नहीं, मैंने उसको उसके एक सपना पूर्ण करने में साथ दिया जो नैतिक तौर पर गलत था। मैंने चैन की सांस ली कि सब ठीक हैं और किसीने नहीं देखा मुझे यह पाप करते हुए।

मैं सासु जी के पास बैठी और थोड़ी ही देर में वह उठ गए। मुझसे कहने लगे तू उठ गयी? नींद तो ठीक से आयी ना? मैंने शरमाते हुए हां में सर हिला दिया और एक कुटिल मुस्कान अंदर ही दबा ली।

सुबह के 7 बज रहे थे और सारे कार्यक्रम ख़त्म हो चुके थे और लोग अपने अपने घरो की तरफ जाने के लिए निकल रहे थे। सासुजी ने आंटी से विदा ली और हम लोग उस घर से बाहर निकले।

कुछ कदम चलने के बाद मैंने पीछे मुड़ कर घर की छत को देखा जहां मैंने कभी ना भूलने वाली रात बितायी थी। वह अभी वही छत पर खड़ा था, शायद मौन रह कर माफ़ी मांग रहा था या शायद मुझे शुक्रिया कह रहा था।

तभी उसने ऊपर से जोर से आवाज़ लगायी “मौसी, मंगलवार को दूसरा जागरण भी रखा हैं याद रखना, जरूर आना हैं”। मेरी सासु जी ने मुस्करा कर “हां याद हैं” जवाब दिया और फिर चल पड़े।

मैंने सासुजी को कहा की मम्मी आप मंगलवार के जागरण में अकेले जाओ तो मुझे भी ले जा सकते हो कंपनी देने के लिए। उन्होंने हां में सर हिलाया। मैं मन ही मन एक मुस्कान लिए उनके साथ अपने घर की तरफ चल पड़ी।

आखिर वो मंगलवार के दिन का सूरज उग आया, जिसका मुझे पिछले कुछ दिनों से इंतज़ार था। पर इंतज़ार अभी पुरा ख़त्म नहीं हुआ था। असल इंतज़ार तो आज रात के जागरण का था। मैं एक मीठी मुस्कान के साथ उठी और एक उत्साह के साथ रोज़मर्रा के कामों में लग गयी।

दोपहर को मैं रात की तैयारी में लग गयी, मैंने चेहरे पर उबटन लगाया ताकि मेरा चेहरा ओर खिल जाए। फिर अपने पुरे शरीर का वैक्सीन किया ताकि सारे अनचाहे बाल निकल कर त्वचा चिकनी हो जाये।

आज तो समय भी जैसे धीरे धीरे बीत रहा था। जब किसी का बेसब्री से इंतज़ार होता हैं तो समय ऐसे ही परीक्षा लेता हैं।

शाम का खाना खा लेने के तुरंत बाद ही मैंने सजना सवरना शुरू कर दिया था। जैसे किसी जागरण में नहीं किसी शादी में शिरकत करनी हो।

अभी एक घंटा बाकी था जाने में और मैंने अंदर से अपनी पसंदीदा गुलाबी साड़ी निकाली, फिर पहले ही बनाये प्लान के मुताबिक अंदर से वो महंगे वाले डिज़ाइनर अंतवस्त्र निकाले जो मेरे पति कुछ ख़ास मौको पर उन्हें रिझाने के लिए पहनने को कहते थे।

मैं क्या, कोई भी स्त्री उन खूबसूरत अंतवस्त्रों में बहुत कामुक और हसीन लगती। अब मैंने साड़ी पहन ली। फिर से मैं अपना मेकअप करने लगी। मैं सारी तैयारी ऐसे कर रही थी जैसे जागरण नहीं सुहागरात हो। ओरो के लिए वो जागरण था पर मेरे लिए तो सुहागरात ही थी।

एक बार फिर से सासु जी की चिर परिचित आवाज़ सुनाई दी, तैयार हो गयी क्या। इतनी तैयारियों में ध्यान ही नहीं रहा कि कब वो समय हो गया जिसका मुझे कब से इंतज़ार था।

वहां पहुंच कर मेरी नजरे लगातार मोहित को ढूंढ रही थी, जिसके लिए लिए मैंने आज सुबह से इतनी तैयारियां की थी। पर वो मुझे कही दिखाई नहीं दिया। तभी भाभियो ने अपने कक्ष में बुलाया। आज वहाँ इतनी भीड़ नहीं थी।

अब हम लोग आपस में बातें करने लगे। दोनों भाभियाँ कह रही थी कि आज उनके इस कमरे पर दूसरी औरतों का कब्जा होने वाला हैं। उनके कुछ ख़ास रिश्तेदार दूसरी औरतों से अलग उस छोटे कमरे में सोना चाहते थे।

 

Similar threads

Back
Top