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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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उस घटना के दो दिन बाद, राज और सतीश पिक्चर देखने जाने की तैयारी कर रहे थे कि फोन की घंटी बज उठी। राज ने रिसीवर उठाया।

"हैलो...।"

"क्या राज साहब बोल रहे हैं?" दूसी तरफ से कहा गया, “मैं डॉक्टर सावंत हूं।"

“जी हां, डॉक्टर साहब। मैं राज ही हूं।" राज ने जवाब दिया।

"अगर फुर्सत हो तो इसी वक्त चले आओ।"

"कोई खास बात है?" राज ने पूछा।

“जी हां। सेठ हरसुख मेहता का आज सुबह पोस्टमार्टम हो गया है, उस पर थोड़ा विचार-विमर्श करेंगे।"

“बहुत अच्छा, मैं अभी आ रहा हूं।“ राज ने जवाब दिया

और रिसीवर रख दिया।

सतीश पिक्चर देखने चला गया और राज डॉक्टर सावंत के घर की तरफ चल पड़ा। डॉक्टर सावंत अपने लेब्रॉटरी ऑफिस में उसके प्रतीक्षक था। राज को देखते ही उन्होंने कहा

"अजीब बात है यार राज! सेठ हरसुख की मौत वाकई किसी घातक जहर से हुई है।"

"घातक जहर से?" राज ने चौंककर पूछा।

“हां। ऐसे जहर से जो बहुत तेज असर था, जिसने तुरत-फुरत दिल की घड़कने बन्द कर दी थी और वो मर गया।"

"इसका मतलब है कि प्लेटफार्म की भीड़ में चलते-चलते किसी तरह उसके जिस्म में जहर दाखिल कर दिया गया?"

"लेकिन सवाल यह है कि उसके जिस्म पर किसी जख्म का तो क्या सुई का निशान भी नहीं था। तो जहर किस तरह उसके जिस्म में पहुंचाया गया? जाहिर है कि चलते-चलते उसने कोई

चीज खाई भी नहीं थी।"

"मैं खुद हैरान हूं कि यह मामला क्या है?"

"क्या आपने जहर का परीक्षण किया था?"

"हां, किया था। डॉक्टर सावंत ने कहा, " वो सायनाइड नहीं है, लेकिन सायनाइड जितना ही तेज और घातक कोई दूसरा जहर है।

अचानक राज के जेहन में एक ख्याल उभरा, उसने कहा

"क्या यह मुमकिन नहीं कि सुबह नाश्ते में सेठ हरसुख को वो जहर दिया गया हो? जिसका असर एक-डेढ़ घंटे बाद हुआ हो?"

"नहीं। मेरे ख्याल में ऐसा नामुमकिन है।" डॉक्टर सावंत ने कहा, “ क्योंकि वो जहर इतना घातक है जिसका तुम अन्दाजा भी नहीं लगा सकते। मृतक के दिल के ऊपर इस तरह छाले पड़े हुए हैं जैसे बहुत तेज किस्म का तेजाब डाल दिया गया हो उसके दिल पर...।

"फिर सवाल यह है कि आखिर जहर किस तरह इस्तेमाल किया गया?"

“यही सवाल तो तहकीकात मांगता है।"

कुछ क्षण खामोश रहने के बाद राज ने पूछा

"क्या आप लाश के खून का सैम्पल साथ लाए हैं?"

"हां। मुझे पूरी उम्मीद थी कि खून का ख्याल तुम्हें जरूर आयेगा।

“तो चलिए लेब्रॉटरी में । मैं खुद उसकी परीक्षण करना चाहता हूं।" राज बोला।

वो दोनों लेब्रॉटरी में जा पहुंचे। वहां की हर चीज राज की जानी-पहचानी थी। डॉक्टर सावंत ने एक बड़ी सी शीशी उसे दी, जिसमें सेठ हरसुख मेहता का खून था। राज ने पहले तो माईक्रोस्कोप से खून के कुछ कतरों का मुआयना किया ।

खून के कणों में एक अजीब से रंग के कण शामिल थे जो यकीनन जहर के कण थे। उसके बाद राज ने एक रासायनिक प्रक्रिया से शुद्ध खून को अलग कर दिया। अब जो कुछ बाकी बचा था, उसमें जहर की मात्र त्यादा थी और खून कम था।

हालांकि जहर की मात्र किसी भी परक्षण या प्रयोग के लिए कम था, लेकिन जहर चूंकि बहुत घातक था, इसलिए उसके परिणाम भी आम जहरों से ज्यादा स्पष्ट होने जरूरी थे।

शुरूआती कामों से फारिग होकर राज ने तरल बनाया और उसे इंजेक्शन द्वारा एक स्वस्थ खरगोश के जिस्म में पहुंचा दिया। सुई चुभने से खरगोश कसमसाया, बस। इसके सिवा और

कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई उस पर । जहर की वो मात्र एक खरगोश को मारने के लिए बहुत थी। लेकिन खरगोश इंजेक्शन लगने के बावजूद स्वस्थ व चुस्त दिखाई दे रहा था।

डॉक्टर सावंत एक कुर्सी पर बैठा सब कुछ खामोशी से देख रहा

था। दोनों बहुत देर तक खरगोश पर बारीकी से नजर रखते रहे। डॉक्टर सावंत उसके दिल की धड़कनें गिनता रहा। राज मैग्नीफाईंग ग्लास से उसकी आंखों पर नजर रखे रहा। लेकिन खरगोश के जिस्मानी मैनेजमेंट में कोई फर्क नहीं पड़ा।

“अजीब गोरखधंधा है...।“ राज बड़बड़ाया।

"हां।" डॉक्टर सावंत ने चश्में से घूरते हुए कहा, “इतना घातक जहर है। हालांकि इसकी मात्र काफी कम थी। फिर भी खरगोश पर थोड़ा असर तो होना ही चाहिए था। शायद कुछ देर बाद हो..."

राज ने एक नए ख्याल के तहत कहा-“बेहतर है कि इस खरगोश पर निशान लगा कर छोड़ दिया जाए और कल सुबह फिर इसका मुआयना किया जाए।

"ऐसा करके भी देख लेते हैं। डॉक्टर सावंत ने सिर हिला कर इस सुझाव से सहमति जताते हुए कहा।

राज ने खरगोश के गले में प्रयोग का वक्त और तारीख लिखकर बांध दी और खरगोश को पिंजरे में छोड़ दिया।

फिर दोनों लेब्रॉटरी से बाहर आ गए।
 
"आओ, चाय पीते हैं।" डॉक्टर सावंत ने कहा । राज उसके साथ ड्राइंगरूम में आ गया।

चाय पीते हुए फिर उन्होंने उसी विषय पर बातचीत शुरू कर दी।

“यह केस तो बिल्कुल उसी तरह रहस्यमय है।" डॉक्टर सावंत ने कहा, “ जैसे कुछ समय पहले तुम्हारी दोस्त...क्या नाम है उसका...हां...ज्योति...उसके मामले में हुआ था।"

ज्योति का जिक्र सुनकर राज के जिस्म में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। वो आहिस्ता से बोला

"भगवान के लिए उस खौफनाक नागिन का नाम मत लीजिए डॉक्टर सावंत!

डॉक्टर सावंत ने मुस्करा कर कहा

"लेकिन मैंने सुना था कि वो एक बार फिर जिन्दा हो गई थी। क्या यह सच है?"

"हां।“ राज ने आहिस्ता से कहा, “ उससे पहले भी एक बार वो मरकर जिन्दा हो गई थी। सच पूछिये डॉक्टर साहब तो अब मुझे यकीन हो चला है कि ज्योति और जय इन्सान नहीं हैं, बल्कि ज्योति तो इच्छाधारी नागिन है ही, डॉक्टर जय भी कोई शैतानी प्रेतात्मा है।" कहकर राज ने संक्षेप में उसे सारी घटनाएं शुरू से आखिर तक सुना दीं। फिर ठण्डी आह भर कर बोला

“उसके बाद मैंने डॉली से शादी कर ली थी। हमारी शादी के बाद हंसी-खुशी दिन गुजार रहे थे...कि पिछले साल डॉली का देहांत हो गया और सतीश की बीबी जूही का भी। हम दोनों उन दिनों दिल्ली में थे। दोनों को ही तेज बुखार हो गया था और दो दिन में ही दोनों मर भी गई थीं... ।

"हां। मैंने भी अखबारों में उस बीमारी के बारे में पढ़ा था।"

डॉक्टर सावंत ने कहा, “शायद कोई मौसमी महामारी थी। डेंगू, या इसी तरह की कोई दूसरी । तो तुम्हारे कहने का मतलब है कि जब पुलिस और तुम लोग ज्योति और डॉक्टर जय का पीछा कर रहे थे तो उन दोनों की कार हजारों फुट गहरी खाई में जा गिरी थी?

“जी हां। वो भागने के जोश में होश खो बैठे थे। हम लोगों ने अपनी आंखों से खाई में गिरी कार देखी थी।"

पूरी कथा सुनने के बाद डॉक्टर सावंत ने एक गहरी सांस ली थी। वो बोला

"तो इस बार तुमने जॉनी दुश्मनों को खत्म कर दिया?'

"लगता हो ऐसा ही है। राज ने जवाब दिया, " लेकिन सच तो यह है कि अब भी कभी-कभी मेरे दिल में यह ख्याल पैदा हो जाता है कि वो मरे अब भी नहीं ।क्या पता वो एक बार फिर मुझसे इन्तकाम लेने के लिए फिर मेरे सामने आ रहे हों?"

“यह तुम्हारा वहम ही है। डॉक्टर सावंत ने हंस कर कहा,

"भला मरे हुए इन्सान कैसे जिन्दा हो सकते हैं?"

“पहले भी तो वे दो बार मर कर जिन्दा हो चुके हैं। प्रेत भी कभी मरते हैं?"

“लेकिन मेरा ख्याल है कि इस बार बाकई तुम्हें उनसे छुटकारा मिल चुका है।"

“भगवान करे ऐसा ही हो । एक-दो क्षण रूककर फिर वो बोला, “ न जाने कल से मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि सेठ हरसुख मेहता की रहस्यमय मौत में उन्हीं दोनों का हाथ है।

क्योंकि इस किस्म के अनोखे और घातक जहरों का आविष्कारक डॉक्टर जय के सिवा कोई नहीं हो सकता ।" फिर अचानक राज ने सवाल किया, "उस प्राईवेट सैक्रेटरी सोनाली के बारे में आपका क्या ख्याल है?"

"मेरे ख्याल में तो सोनाली एक सीधी सादी और मासूम लड़की है और सेठ हरसुख मेहता की मौत से उसका कोई सीधा सम्बंध नहीं है।"

"शायद ही आपका ख्याल सही निकले।"

"क्यों, क्या आपका ख्याल कुछ और है?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"अभी इस तरह के अन्दाजे भी नहीं लगाए जा सकते । लेकिन एक बात मैं दावे से कह सकता हूं कि सेठ हरसुख की मौत की अपेक्ष सोनाली की थी।"

"हो सकता है तुम्हारी बात सही हो। मुझे इस तरह के कामों का ज्यादा तजुर्बा नहीं है। डॉक्टर जय और ज्योति से टक्कर लेने के बाद तुम एक जासूस जरूर बन चुके हो।"

"तो फिर इस केस का क्या होगा? पुलिस मामले की जांच करेगी या खामोश बैठ जाएगी?"

“मेरे ख्याल में तो बकायदा तफ्तीश की जाएगी।"

“आजकल यहां हामीसाईड डिपार्टमेंट का इन्चार्ज कौन है?''

+

राज ने पूछा।

“एक जवान शख्स है, विकास त्यागी। हाल ही में सब-इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर हुआ है।"

"चलता पुर्जा है?

"हां, अपने दिमाग और तेज तर्रार पर्सनेलिटी होने की वजह से ही वो आज इस ओहदे तक पहुंचा है।"

"फिर जरूर वही इस केस पर लगाया जाएगा।" राज ने धीरे से कहा।

"शायद ।" डॉक्टर सावंत बोला।

“मैं भी अपने तौर पर काम करके जानकारियां हासिल करने की कोशिश करूंगा।। अगर कोई काम की बात मालूम हो सकी तो यकीनन पुलिस से सहयोग करूंगा।" वो उठते हुए बोला, " अब मैं चलूंगा। कल फिर आऊंगा।"

"बहुत अच्छे ।“ डॉक्टर सावंत उठ कर हाथ मिलाते हुए बोला।

"कल सुबह को आप उस खरगोश को जरूर देख लेना।

राज ने चलते-चलते कहा, “और वो रात को मर जाए या

उसमें जहर के लक्षण दिखाई देने लगें तो फौरन मुझे फोन कर दें। मैं तुरंत आ जाऊंगा।"

"ठीक है।"

उसके बाद राज वहां से वापस होटल पहुंच गया।

उसके बाद छ:-सात दिन गुजर गए, उस बीच कई बार इरादा करने के बावजूद राज सोनाली से मिलने का वक्त नहीं निकाल पाया था। लेकिन डॉक्टर सावंत के यहां वो हर रोज जाता था।

वो खरगोश अभी तक जिन्दा और चुस्त-दुरूस्त था।
 
वो दोनों हैरान थे कि इतने खतरनाक जहर ने खरगोश पर असर क्यों नहीं किया? क्या सेठ हरसुख की मौत वाकई जहर से नहीं हुई थी, बल्कि उसके जिस्म में किसी बीमारी से जहर फैल गया था जिसने उसके दिल में छाले डाल दिए था और वो मर गया हो। लेकिन चूंकि उन्होंने आज तक किसी ऐसे केस के बारे में भी कभी पढ़ा-सुना नहीं था इसलिए इस बात को भी वो यकीन से नहीं कह सकते थे।

खरगोश को जहर देने के आठवे दिन। राज खाना खाने मेज पर बैठने वाला था कि उसे डॉक्टर सावंत का फोन आ गया था

"राज , फौरन मेरे यहां चले आओ।" उसने बगैर किसी भूमिका के कहा था।

“खैरियत तो है?" राज ने पूछा।

“वो तुम्हारा खरगोश अचानक मर गया है।" जवाब मिला।

सुनकर राज हैरान रह गया। रिसीवर रखकर उसने कोट उठाया और सतीश से 'अभी आया कहकर डॉक्टर सावंत के यहां जाने के लिए रवाना हो गया। उसकी भूख गायब हो गई थी।

"डॉक्टर राज, मेरी तो अक्ल हैरान है। डॉक्टर सावंत ने राज को देखते ही कहा, “ ऐसा विचित्र केस आज तक मेरी नजर से नहीं गुजरा।"

“कौन सा केस?" राज ने हैरत से पूछा, “खरगोश का या हरसुख वाला?"

“दोनों । दोनों एक जैसे हैं। बिल्कुल एक जैसे।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"जरा खुलकर बताइये डॉक्टर ।" राज बेताबी से बोला।

डॉक्टर सावंत एक कुर्सी खींच कर बैठते हुए बोला

"मैं सुबह से लेब्रॉटरी में काम कर रहा था। तीन घंटे बाद मुझे इस खरगोश का ख्याल आया था। मैंने काल छोड़ कर उसे पिंजरे से निकाला था। वो पहले की तरह सेहतमंद और चुस्त

था। मैंने उसे पिंजरे में डालने की बजाय यहीं, मेज पर रहने दिया और फिर काम में लग गया था।

लेकिन तुम्हें फोन पर सूचना देने से दस मिनट पहले उसके मुंह से गुर्राहट की आवाजें निकलीं और यह बेजान सा होकर मेज पर ढलक गया। मेज पर गिरने के बाद खत्म हो गया। मैंने फौरन इसका मुआयना शुरू कर दिया था। यह खत्म हो गया। मैंने फौरन इसका मुआयना शुरू और कर दिया था। यह मर

चुका था।" डॉक्टर सावंत कह रहा था

“दो मिनट के लिए तो मुझे यकीन ही नहीं आया कि एक सेहतमंद खरगोश एक पल में ही कैसे मर सकता है। फिर जब मेरे होशो-हवास ठिकाने पर लौटे तो मैंने फौरन तुम्हें फोन किया।"

"ठहरिये।" राज ने आगे बढ़ कर खरगोश की लाश को देखते हुए कहो,“ जरा इसका पोस्टमार्टम करके तो देख लें। उसके बाद बहस में पड़ेगे।"

"चलो...फिर शुरू करें।“ डॉक्टर सावंत ने कहा। उसने चीर-फाड़ के उपकरण इके करने शुरू कर दिए।

पन्द्रह मिनट बाद ही वो पोस्टमार्टम से फारिग हो चुके थे।

खरगोश के दिल पर वाकई छाले पड़ चुके थे।

इस पोस्टमार्टम के बाद उन्होंने खरगोश की लाश गार्ड को सौंप दी ताकि वो उसे कहीं दफना दे। हाथ-मुंह धोकर वो ड्राइंगरूम में आ बैठे।

फुर्सत होने पर डॉक्टर सावंत ने चैन की सांस लेते हुए कहा

“कहो राज, चाय पिओगे?"

“जी नहीं । मैं खाना खाऊंगा।" राज ने जल्दी से कहा,

"मैं खाना खाने ही बैठा था कि आपका फोन आ गया था और मैं भागा चला आया था।

"खाना तो मैंने भी नहीं खाया।" डॉक्टर सावंत ने कहा,

“मेरी भूख तो खरगोश वाली घटना से उड़ चुकी है। लेकिन तुम्हारे साथ मैं भी थोड़ा बहुत खाने की कोशिश करूंगा।"

दस मिनट में ही डॉक्टर सावंत ने मेज पर खाना लगा दिया और

वो खाना में व्यस्त हो गए। खाने के दौरान उनमें खरगोश या जहर के बारे में कोई बातचीत नहीं हुई। खाने के बाद जब वो कॉफी पी रहे थे, उस वक्त राज ने टॉपिक की तरफ लौटते हुए कहा

“यह तो बिल्कुल टाईम बत की तरह है।''

"टाईम बम में भी तो इसी तरह होता है। राज ने हंस कर कहा, “आप टाईम बम पर कोई भी टाईम सैट करके रख दीजिए। उस वक्त से पहले बम सिर्फ लोहे या प्लास्टिक वगैरह की तरह बेजान होता है और नुकसानदेह भी नहीं होता-लेकिन आंधी हो या बरसात, अपने तय वक्त पर वो फट जाता है। इसी तरह यह जहर है। आठ दिन खरगोश पर कोई असर नहीं हुआ, उसके जिस्मानी सिस्टम में कोई फर्क नहीं पड़ा । लेकिन आठवें दिन वो अचानक गिर कर मर गया। सिर्फ एक-दो सैकिण्ड में-इसी तरह हरसुख मेहता को भी उसकी मौत से आठ दिन पहले वो जहर दे दिया गया होगा। जिसका परिणाम उस दिन प्लेटफार्म पर निकला , वो दो सैकिण्ड में खत्म हो गया।"

“ऐसा ही लगता है। डॉक्टर सावंत ने सोचते हुए कहा,

"लेकिन मेरी समझ में यह बात नहीं आई कि इतना खतरनाक जहर जिस्म में जाने के बावजूद इतने अर्से तक असर क्यों नहीं करता? जबकि दिल पर तो छाले फौरन पड़ते हैं। आहिस्ता-आहिस्ता नहीं।"

"आपका ख्याल बिल्कुल दुरूस्त है ।" राज बोला,

“यकीनन यह जहर धीरे-धीरे असर नहीं करता, बल्कि तुरंत करता है। वाकई यह ताज्जुब की बात है कि यह जिस्म पर फौरन असर क्यों नहीं करता और सात-आठ दिन बाद वो दिल पर ही किस तरह फौरन असर करता है? सात-आठ दिन जिस्म के अन्दर कोई नुकसान क्यों नहीं करता?"

“यही तो हैरानी की बात है। डॉक्टर सावंत ने गहरी सांस ली।

फिर अचानक राज के जेहन में एक बिल्कुल नया ख्याल

आया। उसने डॉक्टर सावंत से पूछा

"आप आज क्या प्रयोग कर रहे थे?"

"कुछ खास नहीं। आज मैं अमोनिया तरल में एक जहर मिलाकर और उसकी गैस बनाकर उसके परिणाम जानना चाहता

था। उसका क्या असर होता है?

राज कुछ देर अपने नजरिये पर गौर करता रहा, फिर उसने डॉक्टर सावंत से पूछा

"क्या सेठ हरसुख मेहता का दाह-संस्कार कर दिया गया है?"

"नहीं। उसके किसी रिश्तेदार का विदेश से आने का इन्तजार है। क्यों?"

"मेरे दिमाग में एक बिल्कुल नया ख्याल आया है।"

राज बोला, “क्या आप उस लाश का थोड़ा सा जहरीला

खून और ला सकते हैं?"

"जरूर ला सकता हूं।"

"तो कृपया उसे कल जरूर ले आएं।"

"ले आऊंगा।"

"थैक्यू।" राज ने कहा, “अब मैं चलता हूं।"

"ठीक है, मैं कल सुबह इन्तजार करूंगा। लेकिन यह तो बताओ, क्या इस बीच सोनाली से मिले थे?"

"नहीं जा पाया उसके यहां। कई बार समय निकालने की कोशिश की, लेकिन नहीं निकाल सका। लेकिन मैं आज, बल्कि इसी वक्त उससे मिलने जाने का इरादा रखता हूं।"

“क्या उसका एड्रेस तुम्हें मालूम है?"

“जी हां, उसने विजिटिंग कार्ड देकर कहा था कि उसे खुशी होगी मुझसे मिलकर।"

"उससे मुलाकात का हाल भी कल बता देना ।“ डॉक्टर सावंत ने कहा।

"जरूर-जरूर ।" राज ने शालीनता से जवाब दिया।

राज चलने लगा तो डॉक्टर सावंत ने फिर रोक कर पूछा

"और... सतीश का क्या हाल है?"

“बिल्कुल ठीक है। उसे तो सिर्फ क्लब और स्कॉच चाहिए, बाकी दुनिया के झगड़ों से उसे कोई मतलब नहीं है। मस्त है अपने आप में।"

"मेरा मतलब है, यहां आकर तुम फिर एक हंगामें में फंस गए हो। वो बेचारा अकेला उकता जाता होगा।'

“ऐसा कुछ नहीं है। क्लब के डिस्कोथक में जरूर वो कोई न कोई अच्छी साथी हर रोज तलाश कर ही लेता है। ऐसे कामों में माहिर है वो।"

डॉक्टर सावंत हंस पड़ा, राज उसे नमस्कार कह चल पड़ा।
 
हालांकि राज की सोनाली से बड़ी छोटी सी मुलाकात हुई थी, लेकिन उसके हुस्न और जवानी में कुछ ऐसा आकर्षण था कि वो राज के ख्यालों में बसी हुई थी, आठ नौ दिनों के छोटे से पीरियड में कम से कम दो सौ बार राज ने सोनाली को याद किया होगा। उसकी मोहिनी सूरत एकांत मिलते ही राज के सामने रोशन होने लगती थी। वो डरता था कि कहीं उससे अगली मुलाकात कोई नया गुल न खिला दे। क्योंकि अपने अनुभवों के आधार पर उसने महसूस किया था कि उस दिन सोनाली भी उसमें दिलचस्पी ले रही थी।

डॉली के देहांत के बाद राज की जिन्दगी भी रूखी-सूखी होकर रह गई थी।हर पल उस पर उदासी छाई रहती थी। उसकी आत्मा भी एक अच्छे साथी के लिए बेचैन थी। सोनाली में राज को वो तमाम खूबियां नजर आई थीं जो उसके सुन्दरता के पैमाने पर खरी उतरती थीं। यही वजह थी कि सोनाली पहली मुलाकात में ही उसके होशो-हवास पर कब्जा कर बैठी थी।

डॉक्टर सावंत के घर से राज पहले एक मैडिकल स्टोर पर पहुंचा और उससे थोड़ा सा लिक्विड अमोनिया खरीदा। उसके बाद उससे थोड़ा सा तेज गंध वाला परफ्यूम खरीदकर उसमें अमोनिया मिला दिया। इस तरह रसायन की शीशी को जेब में सावधानी से रखकर वो सोनाली से मिलने चल पड़ा।

सोनाली का फ्लैट उसने बड़ी आसानी से तलाश कर लिया।

कॉलबेल की आवाज सुनकर एक अधेड़उम्र औरत ने आकर दरवाजा खोला।

"सोनाली जी हैं?" राज ने उस अधेड़ औरत से पूछा।

“जी हां हैं। आप...?"

“उनसे कहिए राज मिलने आया है।"

अधेड़ औरत चली गई। दो ही मिनट में वापिस आकर बोली

"तशरीफ ले आईए साहब।"

राज उसके पीछे-पीछे फ्लैट के अन्दर आ गया। ड्राईंगरूम में सोफे पर बैठी सोनाली कुछ बुन रहीं थी। राज को देखकर वो मुस्कराती हुई उठी और बोली

"मैं तो समझी थी कि आप मुझे बिल्कुल ही भूल गए। लेकिन भगवान का शुक्र है कि आपने याद तो रखा...।"

"कई शक्लें ऐसी होती हैं जो जिन्दगी भर भुलाई नहीं जा सकतीं। आप उनमें से एक हैं।"

"क्या सच्ची?" उसने राज की आंखों में आंखें डालकर शोखी से कहा। उसकी हिरणी जैसी आंखों में एक अनोखी सी मस्ती झलक रही थी। राज को महसूस हुआ जैसे हल्का-हल्का नशा उसकी रगों में दौड़ने लगा हो।

“मैं इस बीच आपको कई बार याद कर चुकी हूं...।" उसने खामोशी तोड़ते हुए कहा।

"अहोभाग्य!" राज ने मुस्करा कर कहा, "क्या बन्दा इस काबिल है?"

"मैं आपको अच्छी तरह जानती हूं।" उसने हंस कर कहा।

"मुझे...?"

“जी हां। मैंने सैंकड़ों बार आपके बारे में अखबारों में पढ़ा है। आपके फोटोग्राफ्स देखे हैं। आप वही डॉक्टर राज है। न जो ज्योति जैसी नागिन और डॉक्टर जय जैसे खतरनाक मुजरिम से कई बार टक्कर ले चुके हैं?"

“जी हां! बकिस्मती से हूं तो वही राज । लेकिन क्या क्या मेरी यह विशेषताएं भी इस काबिल हैं कि आप जैसी ब्यूटी

क्वीन मुझे याद कर सके?"

"मेरी तो बड़े दिनों से इच्छा थी कि किसी तरह आपसे मिलूं, लेकिन किस्मत देखिए...कि इच्छा पूरी भी हुई तो कितने खतरनाक मौक पर !"

“खैर...यह तो होता ही रहता है। मुझे खुशी है कि आपने मुझे इस काबिल समझा।

वो दोनों आकर इत्मीनान से एक ही सोफे पर बैठ गए।

सोनाली ने उसी औरत को पुकार कर चाय के लिए कह दिया। फिर राज की तरफ देख कर बोली

“आज शायद आप उसी बारे में पूछताछ करने आए होंगे?"

"वो भी एक मकसद था। लेकिन मेन मकसद आपसे मिलना ही था।

"सच्ची?

“मैं बेवजह झूठ बोलने का आदी नहीं हूं।" राज ने उसकी बेतकल्लुफी से हिम्मत पाकर बेबाकी से कहा, “सच पूछिए तो इस बीच सैंकड़ों बार आपका ख्याल आया, लेकिन यहां आने की फुर्सत चाहते हुए भी न मिल सकी।"
 
"राज साहब! वो घटना इतनी खौफनाक थी कि दो दिन तक तो मैं चैन से सो भी नहीं सकी थी। अब भी वो सीन याद आता है तो मेरी आत्मा कांप उठती है।"

"लेकिन माफी चाहता हूं सोनाली जी। उस दिन वाला सवाल मैं फिर दोहराऊंगा। आप सेठ हरसुख की उस अचानक मौत से हैरान क्यों नहीं हुई थीं? क्या आपको उनके किसी भी वक्त अचानक मर जाने की आशंका थी?"

“यह सिर्फ आपके दिल का वहम है।" सोनाली हंस कर बोली, "वर्ना मैं तो उस वक्त हैरान भी थी और परेशान भी । न जाने आपके दिल में यह वहम क्यों बैठ गया है?"

उसने यह बात बड़ी मासूमियत से कही थी। लेकिन राज को पक्का यकीन था कि वो सफेद झूठ बोल रही थी। राज ने भी इस मामले में ज्यादा नहीं सोचा, न बहस करना उचित समझा। वो खामोश हो गया।

उस दौरान वो औरत चाय रख गई थी, सोनाली चाय बनाने लगी। चाय बनाकर उसने प्लेट में रखा कप राज की तरफ बढ़ा दिया। राज ने थैक्स कह कर चाय ले ली।

चाय का छोटा सा छूट लेकर वो बोला

“क्या यहां अकेली रहती हैं?"

“जी नहीं । मेरी बूढ़ी मां और यह नौकरानी भी साथ हैं। मैंने सिर्फ शौकिया सर्विस की थी। वर्ना जायदाद इतनी है कि हमारा गुजारा आराम से हो जाता है।'

"बहुत बढ़िया।"

कुछ पल की खामोशी के बाद सोनाली ने पूछा

“सेठ हरसुख जी के मौत के मामले में कोई नई बात मालूम हुई है क्या?"

"आपके सवाल का जवाब देने से पहले एक सवाल मैं आपसे पूछना चाहता हूं।

"जरूर-जरूर ।" उसने हंसकर कहा।

"जिस वक्त सेठ हरसुख चीख कर जमीन पर गिरा था, उस वक्त आप बिल्कुल उसके साथ चल रही थीं। क्या आपने ठीक उसी वक्त किसी परफ्यूम की गंध महसूस की थी? या कोई अजीब सी गंध?"

एक पल के लिए सोनाली ने खामोश रहते हुए कुछ सोचा, फिर बोली

"हां। मेरा ख्याल है कि एक खास किस्म की गंध मैंने महसूस की थी। मैंने सोचा था कि शायद कोई औरत परफ्यूम लगाए हुए है। लेकिन...आप यह क्यों पूछ रहे हैं?

"बस यों ही ।" राज ने लापरवाही से कहा-“कुछ गवाहों ने एक खास किस्म की खुशबू के बारे में ब्यान दिया था। क्या

आपके ख्याल में वो गंध अजीब सी थी?"

“अब मैं सोचती हूं तो याद आता है कि वाकई वो गंध अजीब सी थी। उसे सुगंध भी कहा जा सकता है और दुर्गंध भी समझा जा सकता था।" सोनाली ने सोचते हुए कहा, “उस वक्त क्योंकि मैं फौरन ही सेठ साहब की तरफ आकर्षित हो गई थी, इसलिए उस सुगन्ध की तरफ से मेरा ध्यान हट गया था।"

राज ने जेब से परफ्यूम मिले अमोनिया की शीशी निकाली

और उसमें से थोड़ा सा रसायन अपने रूमाल पर डाल कर स्माल हवा में लहरा कर पूछा

“क्या वो इस तरह की सुगन्ध थी?"

सोनाली ने आंखें बंद करके दो तीन गहरी-गहरी सांसें ली और बोली

“सुगन्ध तो ऐसी नहीं थी, लेकिन इस सुगन्ध और उस सुगन्ध में कोई न कोई समानता थी जरूर, जिसे मैं शब्दों में नहीं बता सकती। लेकिन आखिर आप उस सुगन्ध के बारे में इतने विस्तार से क्यों पूछ रहे हैं?"

"कोई खास बात नहीं है।" राज मुस्कराया, “अगर आपको यह टॉपिक पसन्द नहीं है तो मैं टॉपिक चेंज कर देता हूं। यह बताईये खाली वक्त में आप क्या करती हैं?"

सोनाली हंस पड़ी और फिर बोली

"खैर, मेरा मतलब यह नहीं था कि टॉपिक बदल कर आप ऊटपटांग बातें करने लगे।"

"तो फिर आप ही बताईये, मैं किस किस्म की बाते करूं कि आपको खुश रख सकूँ?"

सोनाली के हाथ बुनाई में व्यस्त थे, राज को अपनी तरफ देखते पाकर उसके हाथ रूक गए और वो अजीब निगाहों से राज की तरफ देखने लगी।

सोनाली की आंखे इस वक्त इतनी मस्त थीं कि राज का जी चाहा कि उसे खींच कर सीने से लगा ले और चूम ले। लेकिन अभी तक सभ्यता और शालीनता की दीवार उनके दरम्यान खड़ी थी वो निश्चल बैठा रहा।

"क्या आप किसी क्लब या डिस्कोथेक में जाना पसन्द करती हैं?" राज ने पूछा।

“जी हां, कभी-कभी चली जाती हूं।"

"अगर पसन्द करें तो कल शाम को मेरे साथ चलें।"

“आप कौन से क्लब में जाते हैं?" सोनाली ने पूछा।

"ब्लू मून में ।

“मैं जरूर चलूंगी। आपके साथ चल कर मुझे खुशी होगी।"

"थैक्स ।" राज ने उसका हाथ थाम कर बेतकल्लुफी से कहा।

एक-दो पल के लिए उन दोनों की निगाहें मिली और कई पलों के लिए वो एक-दूसरे में खो गए। मुलाकात चूंकि काफी लम्बी हो चुकी थी और राज को अभी और भी बहुत से काम थे इसलिए राज ने उठते हुए कहा

“अच्छा सोनाली जी, मैं चलता हूं। आपकी दया भावना के लिए मैं आपका आभारी हूं।

"तो क्या कल शाम को आप आएंगे?"

“जी हां, ठीक सात बजे।"

"मैं इन्तजार करूंगी।"

दरवाजे पर उसने विदा के लिए हाथ बढ़ा दिया। राज ने उसका नम मुलायम हाथों में लेकर जरा सी सहलहकर दबया, सोनाली मुस्करा उठी।

उससे विदा लेकर राज ने टैक्सी ली और दादर स्टेशन जा पहुंचा, जहां उस दिन वो दुर्घटना घटी थी। वहां पुलिस इंस्पेक्टर से मिल कर उसने उन गवाहों के नाम-पते मांगे जो उस दिन घटना के वक्त सेठ हरसुख मेहता के आस-पास मौजूद थे और जो चौकी में उस दिन अपने नाम-पते लिखा गए थे। इंस्पेक्टर बड़े सम्मान और शालीनता से पेश आया और उसने वो तमाम नाम और पते राज को नोट करवा दिए।

वहां से राज करवा दिए।

वहां से राज टैक्सी में हर उस गवाह के मकान पर गया जिसका नाम-पता उसे इंस्पेक्टर ने दिया था। उनमें से सिर्फ छः लोग मिल सके। दो घंटे की भागदौड़ के बाद उसे जो जानकारी मिली, उसका सार यह है

एक खास किस्म की सुगन्ध उनमें से हर उस शख्स ने महसूस की थी जिस वक्त हरसुख मेहता चीख कर गिरा था। लेकिन हर शख्स ने यही समझा था कि उनके आस-पास किसी ने सेंट लगा रखा होगा। अमोनिया और परफ्यूम की मिली-जुली गंध सूंघकर यही कहा था कि हालांकि दोनों गंध आपस में मिलती नहीं थीं, लेकिन कोई ऐसी समानता जरूर थी जिसके बारे में अब वो यकीन से कुछ नहीं कह सकते थे।
 
अपनी आज की खोजबीन से राज संतुष्ट था। उसने जो नजरिया अपनाया था, वो काफी हद तक सही साबित हो रहा था।

घर वापिस आकर उसने देर से लौटने पर सतीश से माफी मांगी

और भरपाई के तौर पर पहले उसके साथ पिक्चर गए। अपनी खोजबीन और उसके नतीजे के बारे में राज ने सतीश को बता दिया , जिसे सुनकर वो बोला

"चलो अच्छा है। बम्बई आते ही तुम्हें व्यस्त रहने का एक बहाना तो मिल गया..."

दूसरे दिन राज सुबह दस बजे डॉक्टर सावंत के यहां पहुंच गया। उसने वादा निभाते हुए हरसुख मेहता को थोड़ा सा जहरीला खून ला रखा था और राज की प्रतीक्षा में बैठा हुआ था।

“आईए डॉक्टर सावंत ।" राज ने डॉक्टर सावंत के कंधे पर हाथ रख कर कहा, “एक नया परीक्षण करके देखते हैं। मुझे यकीन है कि अगर मेरा परीक्षण सफल रहा तो आप हैरान रह जाएंगे।"

"तुम मेरी उत्सुकता को क्यों भड़का रहे हो?" डॉक्टर सावंत ने कहा, “ यों ही बात दो, “तुम किस नतीजे पर पहुंचे हो?"

"मेरा ख्याल है कि सेठ हरसुख मेहता को यूरेनियत से खत्म किया गया है। उसके साथ ही इसे कोई चीज दी गई है जो

अमोनिया की गंध से सक्रिय होकर यूरेनियम में तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर देती है।"

"ओह...।“ डॉक्टर सावंत ने सिर थाम लिया।

“अब वक्त आ गया है कि हम सतीश को भी बुला लें और इंस्पेक्टर विकास त्यागी को भी हमें मामले की जानकारी दे देनी चाहिए। मामला खतरनाक होता जा रहा है। राज ने गम्भीरता से कहा।

अगले दिन जब डॉक्टर राज, डॉक्टर सावंत और सतीश ने इंस्पेक्टर विकास त्यागी को जाकर सब माजरा सुनाया तो उसने यूरेनियम का नाम सुनते ही फैसला सुना दिया

"कल से, मैं चौबीसों घंटे आप लोगों के साथ रहूंगा। मुझे आप लोगों के केस के साथ-साथ यह भी मालूम करना होगा कि यूरेलियत किसके पास है...और जिसके पास है उसके पास आया कहां से? यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गम्भीर मामला है।"

"ठीक है, जैसा आप उचित समझें। राज ने गहरी सांस ली।

उसके बाद सभी इंस्पेटर विकास त्यागी के ऑफिस से उठ गए।

बाहर आकर वो बाजार में स्थित पार्किंग की तरफ अपनी कार

की तरफ जा रहे थे, सतीश राज से कोई बात कर रहा था।

अचानक राज को ऐसा लगा जैसे किसी ने सतीश का गला घोंट दिया हो-उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। राज को ऐसा लगा जैसे वो बेहोश होकर गिरने वाला हो । उसकी निगाहें सड़क में किसी पर जमी हुई थीं।

राज ने फुर्ती से सतीश के गिरते हुए जिस्म को सम्भाला

और पलट कर उस तरफ देखा, जिधर सतीश देख रहा था। उधर देखते ही उसके दिल को भी एक धक्का सा लगा और पूरे जिस्म में खौफ की लहर दौड़ गई। वो फंसी-फंसी आवाज में सिर्फ इतना ही कह सका

ङ्के डॉक्टर मेहता...पो...वो...ज्योति....

डॉक्टर मेहता ने तुरंत पलटकर देखा, सतीश लगभग बेहोश था और राज बेहोश होने वाला था। डॉक्टर मेहता की नजर भी उधर उठ गई और जो कुछ राज और सतीश ने देखा था, वो डॉक्टर मेहता ने भी देख लिया । उसका चेहरा भी पीला पड़ गया, क्योंकि वो शिंगूरा के रूप में ज्योति का आधा चेहरा कई बार देख चुका था और उसकी तस्वीरें भी उसने कई बार देख रखी थीं।
 
डॉक्टर मेहता ने तुरंत पलटकर देखा, सतीश लगभग बेहोश था और राज बेहोश होने वाला था। डॉक्टर मेहता की नजर भी उधर उठ गई और जो कुछ राज और सतीश ने देखा था, वो डॉक्टर मेहता ने भी देख लिया । उसका चेहरा भी पीला पड़ गया, क्योंकि वो शिंगूरा के रूप में ज्योति का आधा चेहरा कई बार देख चुका था और उसकी तस्वीरें भी उसने कई बार देख रखी थीं।

सामने सड़क पार बाकई ज्योति खड़ी थी। काली ड्रेस में वो पहले से भी कही ज्यादा हसीन दिखाई दी थी। राज को इतने बरस गुजर जाने के बावजूद वो वैसी ही आकर्षक दिखाई देती थी। अपने तमाम जादुई हुस्न के साथ और अपनी रहस्यमयी ताकतों के साथ। जिसे देख कर राज को झुरझुरी आ जाती थी।

ज्योति को वो लोग दस साल से जानते थे और अब उसे करीब तीन साल बाद देख रहे थे। लेकिन उसमें शुरू दिन से लेकर अब एक रत्ती भर भी फर्क नहीं आया था।

वो सड़क पार खड़ी किसी से बातें कर रही थी। जब डॉक्टर मेहता ने उसकी तरफ देखा था तो वह अपनी बात खत्म करके आगे बढ़ गई थी।

“उफ...ओह...।“ सतीश ने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा,

"मेरा दिल घबरा रहा है। क्या वो ज्योति ही थी?"

"हां। वो ज्योति ही थी। डॉक्टर सावंत ने जवाब दिया।

राज और डॉक्टर सावंत सतीश को फुटपाथ पर बिठा कर तेजी से उस तरफ लपके, जिधर ज्योति गई थी। लेकिन सड़क पर भीड़ इतनी ज्यादा थी कि ज्योति लोगो के बीच कहा गायब हो गई थी, यह उन्हें पता भी न चल सका।

वो वाकई गायब हो गई थी।

"ओह... "डॉटर मेहता ने कहा, "काश हम उसका पीछा कर सकते ।

"बेकार है डॉक्टर साहब। “राज ने ठण्डी सांस लेकर कहा, " यह पीछा करने का वक्त नहीं है। वो हमारे हाथ नहीं लग सकेगी। सतीश की हालत खराब है, उसे आराम की जरूरत है।"

"तो चलो...हम लोग चलें।

राज ने सहारा देकर सतीश को उठाया और कार में ला बिठाया, फौरन ही वो सब डॉक्टर मेहता के घर की तरफ चल पड़े

घर पहुंच कर राज ने सतीश को सोफे पर लिटा दिया और

ब्राण्डी का एक पैग बना कर उसे दिया। पैग शुरू करते ही उसके चेहरे पर जान नजर आने लगी।

उसके बाद वो लेब्रॉटरी में पहुंचे , लेकिन वहां पहुंचकर वो दंग रह गए।जिस मेज पर उन्होंने एक दिन पहले एटमी जहर से मरे हुए खरगोश का पोस्मार्टम किया था, उस पर एक लाश पड़ी दिखाई दे रही थी। किसी जवान औरत की लाश।

दोनों दो क्षण के लिए निश्चल खड़े लाश को देखते रहे। फिर जब थोड़ा सम्भले तो लपककर मेज के पास पहुंचे और दोनों की निगाह एक साथ लाश के चेहरे पर पड़ी।

"हे भगवान!" डॉक्टर सावंत ने दहशत भरे स्वर में कहा,

“य...यह तो ज्योति की लाश है...।"

वो ज्योति की ही लाश थी। लेकिन कैसी थी यह लाश? ऐसे जैसे हजारों साल परानी ममी हो। चेहरे से लेकर से लेकर पांव तक जो भी अंग नंगे थे, उन पर एक अजीब सा पलस्तर नजर आ रहा था और गले से लेकर पैर तक उसको एक जर्जर सा मटमैले रंग का लबाद पहनाया गया था।

“यह...यह नामुमकिन है। डॉक्टर मेहता ने सरसराते हुए लहजे में कहा, “ज्योति को हम अभी बाजार में जिन्दा और सलामत देख कर आए हैं। चलते फिरते, सही सलामत।"

“मुझे भी यकीन नहीं आता ।" राज बोला, "मैं भूत-प्रेतों पर यकीन नहीं करता, न जादू-टोने को मानता हूं। मैं आत्माओं को भी नहीं मानता लेकिन... ।

राज की बात अधूरी की अधूरी ही रह गई। लेब्रॉटरी का दरवाजा धड़ाम की आवाज के साथ बंद हुआ था और इसके साथ ही कमरे में जलती लाईटें टिमटिमाते दीपकों की तरह कंपकपाने लगीं।

वो दोनों हत्प्रभ से खड़े थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है और उन्हें क्या करना चाहिए। फिर टिमटिमाती लाईटें बिल्कुल बुझ गईं और कमरे में अन्धेरा छा गया।

फिर वो दोनों ही बेहोश होते-होते बड़ी मुश्किल से बचे। ज्योति की लाश के गिर्द धुंआ उठने लगा था। धुंध जैसा धुंआ, हल्के नीले और हरे रंग का धुंआ, जो धीरे-धीरे ऊपर उठ कर मानवाकार में, लेकिन मानवाकार से लम्बा और चौड़ा होकर स्थिर खड़ा हो गया।

दोनों की आंखें फटी की फटी रह गई थीं। लेकिन अभी तो उन्हें हैरतों के कई झटके लगने थे। उस चमकते कोहरे में धीरे-धीरे एक नारी आकृति उभरती दिखाई देने लगी। यह भी ज्योति का ही रूप थी। लेकिन इस धुंध में खड़ी ज्योति को देखकर वो दंग रह गए। उसने प्राचीन काल के राजसी वरू पहने हुए थे। धोती घाघरा और लम्बी चुनरी, जो उसके भारी जूड़े पर से होती हुई पूरी पीठ, नितम्बों को ढकते हुए घुटनों के नीचे से मुड़-मुड़ कर उसके कंधे पर होकर वक्षों को ढकते हुए दूसरे कंधे पर जाकर फिर पीछे चली गई थी।

सबसे अजीब बात थी उसके सिर पर पीली सी किसी धातु का मुकुट था जिसमें रंग-बिरंगे चमकते हुए पत्थर जड़े हुए थे। माथे

से ऊपर एक फन फैलाए सांप उसी धातु से बना हुआ था। बाजुओं और कलाईयों पर दो-दो जिन्दा सांप लिपटे हुए थे।

इतना भव्य श्रृंगार होते हुए भी इस ज्योति के चेहरे पर दुख के भाव थे और आंखों में गम्भीरता । वो कुछ सैकिण्ठ हतप्रभ खड़े दोनों डॉक्टरों को देखती रही। फिर सरसराती हुई धीमी आवाज में बोली

“राज, ये जहरों का परीक्षण करना छोड़ो। इससे तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला। मैं मुम्हें बताती हूं कि यह सारा खेल डॉक्टर जय का रचाया हुआ है। वो मणि ढूंढने का बहाना करके मेरे द्वारा लोगों की हत्याएं करवा कर, और दूसरे कई तरीकों से पैसे लूटता रहा है। मुझे लगता है...या तो मणि उसके पास है या उसे मालूम है कि मणि कहां है? यदि तुम मेरी सहायता करो तो मुझे मेरी मणि वापिस मिल जाएगी और तुम उस्स हत्यारे को सजा दिलाने में सफल हो जाओगे। कृपा करके मेरी सहायता करो भाई । आखिर कई साल तक मैं तुम्हारे करीब रही ही
 
“मगर...मगर तुम असल में हो कौन ?" राज ने बड़ी मुश्किल से खुद से खुद सम्भालकर पूछा।

“नागलोक की एक राजकुमारी।"

"तो क्या वाकई तुम इच्छानुसार रूप बदलने में समर्थ हो?"

“हां, हम सभी राजकुमारियों में यह क्षमता होती है।"

“और तुम्हारी मणि कहां गई?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

“यह छ: सौ साल पहले की बात है।" ज्योति गहरी सांस लेकर बोली, 'तब एक दिन मेरा जी चाहा कि मैं मानवी रूप में पृथ्वी-लोक के नमभावन दृश्य दूखें, वनों में विचरूं, मानवों के संग रह कर नए-नए अनुभव प्राप्त करूं। उन्ही दिनों रामगढ़ की इस राजकुमारी ज्योति का निधन हो गया। ज्योति ने अपनी अंगुली से मेज पर अपने पेरों के करीब पड़ी अपनी लाश की तरफ इशारा करते हुए कहा," उसकी मृत्यु के पश्चात जब मुझे सूचना मिली तो मैं चुपके से इस शरीर में प्रवेश कर गईं। यह फिर उसे उठ बैठी थी

रामगढ़ के राजमहल में बहुत खुशिशं मनाई गई कि उनकी राजकुमारी मर कर जिन्दा हो गई है। तब से मैं राजकुमारी ज्योति के रूप में रामराढ़ मे रहते हुए जंगलों में घूमती रहती, पहाड़ों की सैर करती, पक्षियों की चहचहाहट से प्रसन्न होती, नदी की कलकल का आनन्द उठाती

उन्ही दिनों जब में एक दिन जंगल में घूम रही थी, मैंने एक सपेरे को देखा। वो सपेरा बहुत सुन्दर युवक था। वो मुझे देखते ही मोहित हो गया और अपनी बीन तथा टोकरी अपनी जगह छोड़कर मेरी आंखों के सम्मोहन में बंधा मेरे पीछे-पीछे रामगढ़ के द्वारा तक चला आया था।

फिर हर रोज ऐसा ही होने लगा। मैं जंगल में जाती तो वो भी मुझे ढूंढ़ता हुआ कहीं से वहां जाता हैं और मेरे पीछे-पीछे चलता रहता था, चुपचाप । फिर एक दिन मै जंगल में पहुंची थी तो बीन की आवाज सुनकर ठिठक गई थी।

बीन की वो धुन इतनी मोहक थी कि मैं अपने आप पर नियंत्रण न रख पाई थी और बजाने की आवाज आ रही थी। वहां पहुचकर मैने देखा कि दो वृक्षों के मध्य बहुत सी खाली जगह थी, जहां एक पत्थर पर बैडा वही युवक सपेरा बीन बजा रहा था और उसके समक्ष कई नाग झूम रहे थे।

मुझे मालूम ही न हुआ कि कब मैने बीन की धुन पर नृत्य

करना आरम्भ कर दिया था। जब मुझें होश आया तो मैं पसीने से तर थी और वो युवक सपेरा पत्थर पर बैठा हांफ रहा था

और उसकी बीन उसकी गोद में रखी हुई थी।

उसके बाद हर दिन ऐसा ही होने लगा। वो सपेरा बीन बजाता था और मैं नृत्य करती थी। धीरे-धीरे शायद हम दोनों में प्रेम अंकुर कुछ इस तरफ फूटा कि हमें पता भी न चल सका। अब मुझे बीन की धुन सुने बगैर एक पल भी चैन न मिलता था।

फिर ऐसा होने लगा कि मैं रात्रि को चुपके से महल से निकलती

थी और हम दोनों आपस में बातें करते रहते।

ऐसा ही एक रात्रि को मुझे महल में लौटने में देर हो गई थी। तब अपने प्रेमी बसंता के अनुरोध पर मैंने रात्रि वन में ही व्यतीत करने का मन बना लिया। बसंता वन में से कुछ फल ले आया था, हम दोनों ने वो फल नदी का पानी पिया था और सो गए थे।

परन्तु रात्रि के दूसरे प्रहर शेर दहाड़ेने की आवाज से हमारी आंख खुल गई। मैंने जाग कर देखा तो कुछ भी नजर नहीं आया। एक सत्य आपको बता दूं कि जंगल में मानव हो या नाग, सिंह की दहाड़ से सभी का मन दहल उठता है। इस आशंका से कि सिंह कहीं समीप ही न हो, मैंने जल्दी से मंत्र पढ़ा था और मस्तक से मणि प्रकट हो गई थी, जिसे देखकर मेरा सपेरा प्रेमी कुछ क्षण के लिए तो दंग रह गया था। परन्तु शीघ्र ही वो वो सामान्य हो गया था। फिर कुछ देर में ही सिंह के दहाड़ने की आवाज भी बन्द हो गई। तो बसंता ने कहा था

"ज्योति , हम सो गए और शेर दोबारा आ गया तो हमें खा जाएगा....।"

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"तब, हमें क्या करना चाहिए?" मैंने पूछा था।

"इस हीरे को यहीं एक पत्थर पर रख देते हैं, उसकी चमक को आग समझ कर इधर नहीं आएगा।" बसंता ने कहा था और उसकी बात उचित जानकर मैंने मणि एक पत्थर पर रख दी थी और हमारे आसपास दूधिया उजाला हो गया था। हम फिर से सो गए थे।

परन्तु जब मैं जागी थी तो प्रभात हो रही थी, मेरे चारों ओर अन्धकार था। न वहां सपेरा बसंता था और न ही मेरी मणि थी। तब से लकर छः शताब्दियां व्यतीत हो गईं और मैं इस राजकुमारी ज्योति के शरीर में कैद होकर रह गई हूं। अब मैं तब तक अपने नागिन रूप को प्राप्त करके नाग लोक नहीं लौट सकती , जब तक कि मैं अपनी मणिा न प्राप्त कर लूं।" ज्योति ने रूककर ठण्डी आह भरी।

डॉक्टर राज और डॉक्टर सावंत पत्थर को दो बुतों तरह ज्योति की बातों निरन्तर बड़े ध्यान से सुन रहे थे। ज्योति

खामोश हो जाने के बाद भी कुछ देर यों ही खड़े रहे।

फिर राज कुछ सम्भला तो वो आहिस्ता से बोला

"और वो....डॉक्टर जय बसंता का ही बारहवां जन्म है। उसे मालूम होना चाहिए कि उस रात मणि लेकर भागने के बाद उसने मणि का क्या किया था। मैंने उसे बहुत मेहनत से पन्द्रह वर्ष पूर्व तलाश किया था, तब से वो मुझे आश्वासन देता आ रहा है कि वो मुझे मणि ढूंढ देगा। परन्तु मुझे नहीं लगता कि वो ऐसा करेगा।” ज्योति ने कहा।

"उसकी क्या वजह है?" राज नू पूछा।

"उसका कारण यह है कि वो जन्म-जन्म से मेरा प्रेमी है। उसने छ: सौ वर्ष सामाजिक लोभ में मेरी मणि जरूर चुरा ली थी, किन्तु उसकी आत्मा अब भी मुझसे प्रेम करती है और तब भी करती थी। उसे ज्ञात है कि मणि पाते ही मैं नागिन रूप धार कर नागलोक लौट जाऊंगी। और वह भी जीवित नहीं रह पाएगा।

इसलिए वो मुझे टालता जा रहा है।"

"तो क्या तुम मणि के बगैर नागिन रूप नहीं पा सकतीं?" राज ने पूछा।

"हां"

"लेकिन आग लगाकर डॉक्टर जय की कोठी से भागने से पहले तुमने मुझे नागिन रूप दिखाया था, फिर तब वो कैसे सम्भव हो सका था?"

"दो-चार पल के लिए मैं नागिन रूप में प्रकट हो सकती हूं। परन्तु दो चार क्षण में तो नागलोक नहीं जाया जा सकता न?"

"नहीं।" राज ने जवाब दिया।

"तो यह लाश छः सौ साल पुरानी है?" डॉक्टर सावंत ने भी जैसे नींद से जागकर पूछा।

"हां।” ज्योति ने सिर हिलाकर कहा।

"लगती तो नहीं है।" डॉक्टर सावंत ने कहा, "और यह इस पर पलस्तर सा कैसा चढ़ा हुआ है?"

"पुरानी इसलिए नहीं लगती, क्योंकि जब मैं इस शरीर में प्रवेश करती हूं तो इसकी सांस चलती है, यह सड़-गल नहीं पाती, यह इस पर वो लेप है, जो डाक्टर जय द्वारा आविष्कार किया था। यह इस शरीर की बाहरी त्वचा और सुन्दरता को नष्ट होने से सुरक्षित रखता है।"

"अब तुम हमसे क्या चाहती हो? हम किस तरह तुम्हारी सहायाता कर सकते है?" राज ने पूछा।

"डाक्टर जय का स्थाई ठिकाना एलोरा की गुफाओं से है, जहां उसने अपनी कीमती चीजें, कुर्लभ जहर वगैरह छुपा रखे हैं।

मुझे लगता है कि मणि भी उसने वहीं कहीं छुपा रखी होगी। तुम लोग एलोरा पहुंचो, मैं वहां तुम्हारा मार्गादर्शन करूंगी। अब मैं इस दुष्चक्र से छुटकारा पाना चाहती हूं। तुम लोग औरंगाबाद पहुंच कर मुझे ढूंढ लेना। मैं तुम लोगों को जय के ठिकाने पर ले चलूंगी। तुम औरंगाबाद की गोखली मार्किट पर नजर रखना, मैं बीच-बीच में वहां चक्कर लगाती रहूंगी। तुम्हें मुझे देखकर मिलने की कोशिश नहीं करनी है बस मुझे देखकर चुपचाप मेरे पीछे चल पड़ना है।"

राज ने सहमति में सिर हिला दिया। डॉक्टर सावंत खामोश और निश्चल खड़ा रहा।

तभी उनकी आंखें एक बार फिर हैरत से फटी की फटी रह गई।
 
वो नीली-हरी चमकती हुई धुंध, जिसके दरम्यान छ: सौ साल पूर्व की राजकुमारी ज्योति राजसी रूप में खड़ी थी, उस धुन्ध में से धीरे-धीरे ज्योति का आकार नष्ट होने लगा। फिर वो हिलती बोलती ज्योति बिल्कुल गायब हो गइ। केवल मानवाकार में धुन्ध बची रह गई थी, जो धीरे-धीरे राजकुमारी ज्योति की लाश पर छाती जा रही थी।

लाश पूरी तरह धुन्ध से ढक गई थी और फिर धुन्ध गायब हो गई। अगले ही क्षण मेज पर लेटी लाश में जैसे प्राण पड़ गए

और लाश उठकर बैठ गई। डॉक्टर सावंत और राज को मानो काटो तो खून नहीं, दोनों पत्थर बने देखते रहे ओर उनके

देखते-देखते लाश धीरे-धीरे मेज से उतरी और दरवाजे की तरफ बढ़ी। उसके दरवाजे के पास पहंचते ही दरवाजा अपने आप खुल गया वो बाहर चली गई।

राज ने कोशिश की कि वो ज्योति के पीछे जाए, लेकिन चाहने के बावजूद वो अपनी जगह से हिल भी न सका। उसके साथ ही डॉक्टर सावंत भी खड़ा रह गया और कमरे की लाईटें जल उठीं।

वो दोनों उसी तरह बुत बने खड़े रहे। फिर राज बोला

"वो....दोनों ज्योति ही थीं, डॉक्टर सावंत ने माथे पर से पसीना पौंछते हुए कहा, ” उसे हम बाजार में देख कर आए थे, घर पहुंचे तो उसकी लाश पड़ी थी। उस लाश के ऊपर एक ओर ज्योति प्रकट हुई, उसने हमें छ: सौ साल पुरानी कहानी सुना कर अपना दुखड़ा प्रकट हुई, उसने वो लाश भी उठ कर चली गई

और दूसरी ज्योति भी गायब हो गई। मेरी तो अक्ल हैरान

"अब तो हमें मानना ही पड़ेगा डॉक्टर साहब।" राज ने गहरी सांस लेकर कहा, "बाजार में हमने उसे जिन्दा देखाा, यहां पहुंच गई और उसकी लाश पर किसी ने मसाला भी लेप कर दिया, यह नामुमकिन है।"

डॉक्टर सावंत कुछ नहीं बोला, उसके चेहरे पर गहन गम्भीरता छाई हुई थी। बाहरी दरवाजे पर घंटी की आवाज सुनाई दी और

दोनों चौंक कर एक साथ लेब्रॉटरी से निकल पड़े।

सतीश उनके लेब्रॉटरी में रहने के वक्त जाग उठे उल्लू की तरह पलकें झपका-झपका कर इधर-उधर देख रहा था।

नीलण्ठ का दिमाग चकरा रहा था। अभी-अभी जो चमत्कार उसने देखा था, उसकी अक्ल उसे कबूल नहीं कर रही थी, इच्छाधारी नागिन के बारे में उसने बहुत कुछ सुना और पढ़ा था, लेकिन सच बात तो यह है कि अब तक वो ऐसी बातों को पुराने जमाने के नाटककारों की कपोल कल्पना ही समझता आया था, लेकिन.....उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि कुछ देर पहले की घटना को क्या समझे, वहम या हकीकत?

लेकिन वो उस घटना को वहम कहकर भी तो नहीं टाल सकता था। वो अकेला होता शायद वहम समझ भी लेता, लेकिन उसके साथ डॉक्टर मेहता भी था, जो सारी घटना का चश्मदीद गवाह

था।

दोनों आमने-सामने सोफों पर बैठे गए। दोनों अपनी-अपनी जगह सोच में गुम थे। फिर कुछ देर सोचने के बाद डॉक्टर सावंत ने ही कहा

"राज, एक बात मेरी समझ में नहीं आई.....।"

"आपकी समझ में एक बात नहीं आई?" राज ने गहरी सांस लेकर कहा-" मेरी समझ में तो कोई बात नहीं आई है।

कहिए, आपकी समझ में कौन सी बात नहीं आई?"

"यह ज्योति कारों में घूमती है, ट्रेन पर भी सुर करती होगी। अगर वो परालौकिक चीज है तो उसे सवारियों की जरूरत क्यों पड़ती है?"

"क्योंकि उसके पास एक इन्सानी जिस्म भी है।” राज ने जवाब दिया, "अगर सिर्फ नागिन का मामला होता तो शायद वो यहां न आती, लेकिन उसकी मणि छिन जाना उसके लिए भारी मुसीबत का करण बना हुआ है। जिससे वो मजबूर है। वर्ना इच्धारी नाग तो पल भर में कहीं भी गायब होकर कहीं भी पहुंच

सकते हैं।"

"क्या तुम गम्भीर हो राज ?"

"इन परिस्थितियों में जितना गम्भीर रहा जा सकता है, उतना ही हूं। राज ने कहा," हम बाजार गए थे। मेज पर कुछ नहीं था, बाजार में हमें ज्योति दिखाई दी जो वहां से गायब हो गई। यहां लौटे तो लेब्रॉटरी की मेज पर छः सौ साल पुरानी रामगढ़

की राजकुमारी ज्योति की लाश पड़ी हुई थी।

उसके बाद ज्योति की या इच्छाधारी नागिन की आत्मा प्रकट हुई

और उसने हमें एक कहानी सुना दी। आप ही कहिए इसे क्या समझा जाए? हम लोग डॉक्टर हैं और आमतौर पर हम लोग वहमी या अनधविश्वासी नहीं होते । लेकिन जो कुछ हमने देखा है, उसे क्या कहा जाए?"

"कहीं वो सारा हिप्नोटिज्म का करिश्मा तो नहीं है?" डॉक्टर सावंत ने हैरानी से पूछा।

" हो सकता है, ऐसा भी हो सकता है।" राज गम्भीरता से बोला-''जिस मामले में ज्योति और डॉक्टर जय इन्वाल्व थे उस मामले के बारे में कुछ भी हो सकता है।"

"अगर वो सब हम दोनों ने सम्मोहन की हालत में देखा था तो फिर यह भी मुमकिन है कि ज्योति की सुनाई कहानी मनघड़त

हो और यह भी उन दोनों की किसी नई साजिश का हिस्सा हो, हमें हमारी जांच से भटकाने के लिए उन्होंने यह लाश , मणि

सपेरे और इच्छाधारी नागिन की स्क्रिप्ट लिखी हो?"

"अगर है तो अब हमें और ज्यादा होशियारी से काम लेना होगा,

और यही सोचकर चलना होगा कि यह ज्योति और डॉक्टर जय की साजिश ही है। ऐसा न हो कि हम एक मजबूर इच्छाधारी नागिन की मदद करने के चक्कर में खुद किसी जाल में फंसें ।" राज ने कहा।

"हां, हमें ऐसा ही करना चाहिए।” डॉक्टर सावंत ने सोचते हुए कहा, "एक और बात भी मेरी समझ में नहीं आ रही है।"

"वो कौन सी?"

"हमने जब बाजार में ज्योति को देखा था तो उसने काली ड्रेस पहन रखी थी। लेकिन जब यहां उसकी लाश थी तो उसने

मटियाले रंग का लम्बा सा लबादा पहन रखा था?"

"यह कोई खास बात नहीं हैं।" राज ने कहा, "जो औरत आधे घंटे में मर कर जिन्दा हो सकती है, उसके लिए ड्रेस चेंज कर लेना क्या मुश्किल है?"

"ऐसे नहीं। यह मान कर बताओ कि वो भूत-प्रेत या इच्छाधारी नागिन नहीं, बल्कि एक आम औरत है।"

"अगर आम औरत के तौर पर मान कर चलें तो , वो हमसे जल्दी यहां पहुंच गई होगी और कपड़े या तो उसने रास्ते में ही किसी काले शीशों वाली कार में बदल लिये होंगे या फिर यहां पहुंचकर किसी बाथरूम वगैरह में बदल लिये होंगे, उसके साथ कोई दूसरा भी होगा, जो उसके उतारे हुए कपड़े साथ ले गया होगा।"

"तो अब क्या करना है?'' डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"किस बारे में?"

"ज्योति के अनुरोध पर औरंगाबाद जाना है या उसे नजरअन्दाज कर देना है?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"अगर ज्योति को इच्छाधारी नागिन न मानकर हम उसे डॉक्टर जय की साजिशी कठपुतली भ समझ लें, तब भी उसकी उस बात में मुझे दम लगता है कि डॉक्टर जय का स्थाई ठिकाना औरंगाबाद से उन्नीस किलोमीटर दूर एलोरा की गुफाओं में या गुफाओं के आसपास कहीं होना चाहिए। वो अपेक्षाकृत सुनसान इलाका है, जहां डॉक्टर जय को खेल खेलने का भरपूर मौका

सो मजबूरी में वहां जाना ही पड़ेगा।"

डॉक्टर सावंत ने सहमति में सिर हिला दिया और बोला

"तुम कहो तो हम इंस्पेक्टर त्यागी को इस मामले में सूचना देकर उसका सहयोग भी प्राप्त कर लें?" ।

"नहीं साहब।" राज ने दृढ़ता से कहा," मेरे ख्याल में पहले हम दोनों को अकेले ही उस ओ के बारे में खोजबीन करनी चाहिए। उसके बाद कोई सबूत पाते ही हम इंस्पेक्टर को खबर कर देंगे। पहले हम दोनों ही औरंगाबाद जाएंगे।"

"और सतीश?" डॉक्टर सावंत ने कहा।

" सतीश को तो पता तक नहीं लगना चाएि डॉक्टर साहब कि हमारा क्या प्रोग्राम है।"

"क्यों?" डॉक्टर सावंत ने हैरत से पूछा।

"वो इसलिए कि ज्योति को देखते ही उसके होशोहवास जवाब दे जाती हैं। उसे साथ रखकर हमें परेशानी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।"

"चलो ऐसे ही सही....।" डॉक्टर सावंत बोला, "तो फिर तैयारी करो औरंगा बाद जाने की।"

"जैसा आपका हुक्म ।" राज ने बड़ी देर बाद मुस्कराते हुए कहा।

उन्हें औरंगाबाद आए एक दिन ही गुजरा था, यह अलग बात है कि उन्हें बम्बई से चलते-चलते दो दिन लग गए थे। जब से वो

औरंगाबाद आए थे, कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी थी।
 
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