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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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आंखें खुलते ही राज की निगाह सतीश पर पड़ी, लेकिन तभी एक आवाज ने उसे चौंका दिया

"नमस्कार डॉक्टर राज.....।"

राज ने चौंककर आवाज की दिशा में देखा।

दाईं तरफ डॉक्टर जय सीने पर हाथ रखे थोड़ा झुका हुआ मुस्करा रहा था। उसके करीब ही कुर्सी पर ज्योति बैठी हुई थी।

"हैलो राज!" उसे अपनी तरफ देखते पाकर बो भी क्रूर मुस्कराहट के साथ बोली।

राज ने हैरत से उन दोनों के चेहरों की तरफ देखा। ज्योति को देखने पर उस मालूम हुआ कि ज्योति के दाए गाल पर दो नीले रंग की छोटी-छोटी खरोंचे मौजूद थी। ऐसे ही नीले निशान टैक्सी ड्राईवर बंता सिंह ने शिंगूरा के चेहरे पर भी बताए थे। इस वक्त पहली बार राज पर राज खुला कि शिंगूरा ज्योति

का ही दूसरा नाम था।

आज ही पहली बार नीकण्ठ को यह भी पता चला कि शिंगूरा हर वक्त आंखों पर रंगीन शीशें वाला चश्मा और चेहरे पर नकाब क्यों डाले रहती है!

लेकिन सबसे ज्यादा हैरान करने वाला सवाल तो यह था कि डेढ़ साल पहले मरने वाले इन्सान जिन्दा कैसे हो गए? क्या वाकई ज्योति जादूगरनी थी या यह जय वर्मा कोई भूत-प्रेत था?

"आप हम दोनों को जिन्दा देखकर काफी हैरान नजर आते हैं?" डॉक्टर जय ने कहा।

राज ने अपने शुष्क होंठों पर जुबान फेरी, उसके गले में कांटे से पड़ रहा थे। वो भी मुश्किल से एक शब्द मुंह से अदा कर पाया

"पानी....."

.

"जग्गा.....।" डॉक्टर जय ने फौरन उस भयानक सूरत बदमाश को आवाज दी।

वो फौरन प्रकट हुआ तो डॉक्टर जय बोला

"एक गिलास ठण्डा पानी लाओ।"

एक मिनट बाद ही पानी आ गया और डॉक्टर जय के इशारे पर जग्गा ने गिलास राज के होंठों से लगा दिया और राज एक ही सांस में वो ठण्डे पानी का पूरा गिलास पी गया।

अब जरा राज के होशो-हवास ठिकाने आए तो उसने एक गहरी निगाह ज्योति और डॉक्टर जय पर डालते हुए कहा

"मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं आ रहा है.....।"

.

.

.

ज्योति ने एक भयानक और पैशाचिक कहकहा लगाया और उसे घूरते हुए बोली

"हां, तुम्हें यकी न आना भी नहीं चाहिए। क्योंकि तुम तो अपनी समझ में हमें खत्म कर आए थे.....।"

"तो क्या वो हकीकत नहीं थी?” राज ने पूछा।

"हकीकत तुम्हारे सामने है.....।" डॉक्टर जय को होठों पर रहस्यमय मुस्कराहट थी।

तभी मेज पर सतीश कुलबुलाया और डॉक्टर जय लपक कर

उसके सिरहाने जा खड़ा हुआ और फिर उसकी नब्ज देखने लगा। फिर वो राज से बोला

" सतीश साहब को गलती से क्लोरोफार्म कुछ ज्यादा मात्र में सुंघा दिया गया। जिससे इनकी जान खतरे में पड़ गई थी, बड़ी मुश्किल से मैंने क्लोरोफार्म का आसर खत्म किया है। कल रात से यह इसी तरह बेहोश हैं, अब इन्हें तब से पहली बार होश आ रहा है। अब यह खतरे से बाहर है।"
 
इसी बीच ज्योति भी सतीश के बराबर में आ खड़ी हुई थी और बड़े गौर से उसका चेहरा देख रही थी, शायद उसके जेहन में उस वक्त की यादें घूम रही हों, जब वो मियां-बीवी थे।

डॉकटर जय और ज्योति के अलावा एक तीसरा सवाल भी राज को परेशान कर रहा था कि आखिर इन्हें उसकी छत पर मौजूगी के बारे में कैसे मालूम हो गया? उसने पूछ ही लिया

"आप को मेरी छत पर मौजूदगी का पता कैसे चल गया?"

"आपकी बेवकूफी से।" डॉक्टर जय ने जवाब दिया, "कल भी आप यहां आए थे और कार पिछली तरफ खड़ी करके छत पर पहुंचे थे। सुबह मेरे असिस्टेंट जमाल ने टायरों के निशान देखकर मुझे सूचना दी थी। मैंने खुद जाकर टायारों के निशान देखे थे और समझ गया था कि कोई शख्स रात को कोठी का राज मालूम करने आया था। कार से पानी से पाईप वाली दीवार तक एक आदमी के बगैर जूतों के पैरों के निशान थे।

उन निशनों से नतीजे पर पहुंच जाना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। मैंने और तसल्ली के लिए छत पर जाकर देखा तो वहां एक आदमी के मी से सने पैरों के निशान थे। मैंने समझा कि कोई आदमी आपके लिए जासूसी कर रहा है। इसलिए मैंने अपने आदमी जग्गा को आज रात उसकी ताक में लगा दिया। मुझे यकीन था कि वो शख्स आज भी जरूर आएगा, लेकिन मुझे यह अपेक्षा नहीं थी कि यह आप होंगे, मेरे पुराने मेहरबान.....।"

यह सुनकर राज अपनी मुर्खता पर खुद ही पेंच-ताव खाकर रह गया। जरा सी गलती ने उसे मुसीबत में फंसा दिया था।

फिर अचानक सतीश ने आंखें खोल दी। ज्योति उसके बराबर में ही खड़ी थी इसलिए सबसे पहले उसकी निगाह ज्योति पर ही पड़ी और वो एकटक ज्योति को देखता रह गया।

चौबीस घंटे की लगातार बेहोशी का उसके दिमाग पर काफी असर पड़ा था इसलिए वो फौरन ही हालात की संगीनी को समझ नहीं सका। क्योंकि उसके दिलो-दिमाग पर लम्बे समय तक ज्योति का राज रहा था। इसलिए तो इस दृश्य को भी उसी जमाने का एक सीन समझ रहा होगा।

उसने ज्योति को देखकर किसी किस्म की हैरत प्रकट किए बगैर अपना हाथ बढ़ाकर बड़े प्यार से ज्योति के हाथ पर रख दिया

और कमजोर सी आवाज में बोला

"आह.....डार्लिंग ज्योति, जरा मेरे और करीब आ जाओ। मेरा सिर चकरा रहा है.....।"

ज्योति के चेहरे ने रंग बदला, लेकिन वो उसी तरह निश्चल और खामोश खड़ी रही।

राज और जय जागी। सतीश की निगाहों ज्योति के चेहरे पर जमी हुई थीं।

फिर अचानक सतीश के चेहरे का रंग बदलने लगा। ऐसा लगा

रहा था राज को, जैसे उसकी याददाश्त वापिस आ रही हो । उसका चेहरा सुर्ख हो गया था, उसने कोहनी के सहारे जरा सा उठाते हुए कहा

"लेकिन.....डार्लिंग ज्योति.....तुम इस तरह क्यों मुझे घूर रही हो? मेरे करीब आ जाओ डार्लिंग....."

और फिर जैसे अचानक ही उसकी पूरी याददाशत लौट आई और उसे स्थिति की गम्भीरता याद आ गई। अचानक उसकी आंखों में दहशत उभर आई। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ गया, खौफ के मारे उसकी आंखें फटी की फटी रह गई थीं। उसने बाएं हाथ के इशारे से सहमें हुए लहजे में कहा

"तुम....तुम कौन हो....तुम ज्योति हो। नहीं-नहीं यह नहीं हो समा सो....नम तो.....म....मर.....चुकी है। स.....ओ...न....म।"

और दहशत के मारे वो फिर बेहोश हो गया।

ज्योति का चेहरा उतर गया। जिससे नीकण्ठ ने अन्दाजा लगाया कि डेढ़-दो साल साथ रहने का असर अभी तक ज्योति के दिलो-दिमाग पर मौजूद है। सतीश से उसकी इस जीब सी मुलाकात ने उसे उदास कर दिया था। लेकिन यह असर सिर्फ कुछ सैकिण्ड ही रहा। फौरन ही उसने अपने आप पर काबू पा लिया और प्रफुल्ला नजर आने लगी।

डॉक्टर जय सतीश के दोबरा बेहोश हो जाने पर तेजी से कमरे से बाहर निकल गया और एक सिरिंज हाथ में लिए वापिस आया।

उसने जल्दी किसी दवा का इंजेक्शन सतीश के बाजू में लगा दिया और काफी देर तक खामोश खड़ा सतीश की नब्ज देखता रहा। कुछ देर बाद वो पलटकर बोला

"पहले तो कुछ देर इनकी याददाश्त ने काम नहीं किया।

लेकिन जब याददाश्त ने काम किया और ज्योति को जिन्दा देख कर ये सही हकीकत से वाकिफ हुए तो खौफ और दहशत से फिर बेहोश हो गए। अगन मैं यह जबर्दस्त ताकत का इंजेक्शन न लगाता तो पांच मिनट में इसके दिल की धड़कने रूक जातीं। लेकिन अब ये धीरे-धीरे अपनी सही हालत पर आ रहे हैं।"

"मैं हैरान हूं डॉक्टर जय।” राज बोला-"पिछली घटनाओं से तो ऐसा लगता है आप हमारे जॉनी दुश्मन हैं-और इस वक्त सतीश की जान बचा रहे हैं?"

डॉक्टर जय ने एक पैशाचिक ठहाका लगाकर कहा

"अभी आप हमारे मेहमान हैं.....और वो राज नहीं जानते कि हम लोग मर कर भी जिन्दा कैसे हो गए?"

"और.....उस राज को बताने के बाद आप हमारे साथ क्या सलूक करेंगे?" राज ने पूछा।

"जो एक दुश्मन को दूसरे दुश्मन के साथ करना चाहिए।"

उसने कड़वाहट से कहा,"राज, मैं डेढ़ साल पहले की अपनी हार नहीं भूला हूं। वो सिर्फ तुम्ही थे जिसने मेरे सारे इरादों पर पानी फेर दिया, मेरी पूरी मैनेजमेंट में गड़बड़ी पैदा कर दी और खुदकुशी करने पर मजबूर कर दिया। उसी वक्त से मेरे दिल में तुम्हारे और सतीश के खिलाफ इन्तकाम की आग भड़क रही है। मैं अपनी शिकस्त का तुमसे ऐसा खौफनाक इन्तकाम लेना चाहता हूं जिसके सामने मौत भी तुम्हें बड़ी आरामदेह लगेगी।"

कहने के बाद डॉक्टर जय पीठ पर हाथ बांधे कमरे में जख्मी चीते की तरह टहलने लगा। उसकी धमकी सुनकर एक बार फिर राज को अपना दिल सीने में डूबता महसूस होने लगा,

दहशत के मारे उसके माथे पर पसीना आ गया।

दो-तीन मिनट तक कमरे में पूरी तरह खामोशी छाई रही।

सतीश को एक बार फिर होश आ रहा था। पहले उसकी सांसों

की रफ्तार तेज हुई, फिर पपोटे थरथराए और उसके कुछ सेकिण्ड बाद ही उसने आंखें खोल दी।

वो हैरान-हैरान, चिंतित नजरों से चारों तरफ देखने लगा।

लेकिन इस वक्त ज्योति क्योंकि उसके सिरहाने की तरफ बैठी हुई थी, इसलिए ज्योति पर उसी नजर नहीं पड़ी। राज पर निगाह पड़ी तो सतीश बोला

"आह...... । राज, तुम भी आ बए हो? क्या तुमने उसे देखा था?"

"किसे, ज्योति को?" राज ने पूछा।

"हां। वही थी.....बिल्कुल वही....।” सतीश ने खौफ भरे लहजे में कहा।

"हां। मैंने देखा है। ज्योति को भी और डॉक्टर जय वर्मा को भी।' राज ने जवाब दिया।

" क....क्या डॉक्टर जय भी जिन्दा है?" सतीश ने सरसराती आवाज में पूछा।

"सब कुछ आंखों के सामने है सतीश। डॉक्टर जय और ज्योति, दोनों तुम्हारे सिरहाने खड़े है। तुम दोबारा बेहोश हुए थे तो डॉक्टर जय ने ही तुम्हें ताकत को इंजेक्शन लगाया था।"

सतीश ने सिर टेढ़ा करके सिरहने की तरफ देखा। ज्योति कुर्सी पर बैठी थी और न जाने किन ख्यालों में गुम थी। डॉक्टर जय खड़ा सिगरेट पी रहा था। उसने सतीश को अपनी तरफ देखते पाया तो बोला

"हैलो।"

"डॉक्टर.....संज.....य....यह हकीकत है या में ख्बाव देखा रहा हूं?" सतीश ने खौफ से कहा।

"ख्वाब नहीं......यह हकीकत है, लेकिन इन्सानों के लिए ख्बसवों जैसी ही है।" डॉक्टर जय ने हंसकर कहा, "एक कड़वी हकीकत!"

"आखिर यह क्या राज है डॉक्टर सेंजय? हमें भी तो बताईए।" राज ने कहा।

"आपने सांप और सपेरों के बारे में कई कहानियां तो सुनी होंगी?" डॉक्टर जय ने पूछा।

"किस किस्म की कहानियां?" राज ने हैरत से पूछा।

"यही कि कई सपेरे इतने ज्ञानी होते हैं और उनके पास सांपों के खतरनाक से खतरनाक जहरों के ऐसे तोड़ होते हैं कि वो कई बार मेरे हुए आदमी को भी जिन्दा कर लेते हैं। क्योंकि सांप का काटा इन्सान सात दिन तक जिन्दा रहता है, क्या समझे आप?"

"यही कि सांप के काटे इन्सान का जिस्म सात दिन तक जिन्दा अवस्था में रहता है।"

"जी हां, यही मैं आपको समझाना चाहता था।" डॉक्टर जय ने कहा, "दरअसल, इसी तरह की कहानियां सुन और पढ़कर मैंने पांच साल के लम्बे प्रयोगों के बाद आखिर यह हकीकत जान ली। उस हकीकत का सार यह है कि खून में जहर के कण मिल जाने की वजह से इन्सान का दिल तो धड़कना बंद कर

देता है, लेकिन उसका खून तरल अवस्था में ही रहता है, जमता नहीं है। अगर सात दिन से पहले-पहले सांप काटने से मरे इन्सान को किसी असरदार तोड़ का इंजेक्शन लगा दिया जाए तो जहर का असर खत्म हो जाता है और धीरे-धीरे उसका दिल फिर से धड़कने लगता है। बस थोड़ी सी कसरतों और दवाओं

की जरूरत होती है।

मैंने अपने लगातार पांच सालों के प्रयोगों से दो दवाएं तैयार कीं। उनमें से एक तो जहर के कणों को अपनी तरफ खींच लेती है, और दूसरी दवा जहर के असर को खत्म कर देती है।
 
जहर के तोड़ वाली दवा में मैंने दिल को ताकत देने वाली दवाएं भी शामिल कर दी। अब प्रक्रिया यह है कि अगर जहर खींचने वाली वो चुम्बकीय दवा गर्म पानी टब में घोल दी जाती है और सांप के काटे मुर्दे को उस टब में डाल दिया जाता है तो नतीजा यह होता है कि दवा अपने चुच्चकीय आकर्षण से खून में फैले सारे जहर को खींच निकालती है और शुद्ध रक्त रह जाता है। उसी दौरान वो दिल को ताकत देकर उसे हिलाने वाले इंजेक्शन भी तीन तीन घंटे बाद से दिए जाते हैं तो ज्यादा से ज्यादा बारह घंटे के बाद सांप के जहर से मरे इन्सान का दिल फिर धड़कने लगता है।"

"कमाल है।" राज के मुंह से निकला।

"लेकिन इसके साथ ही एक शर्त यह भी है कि लाश का कोई हिस्सा चीर-फाड़ न जाए, क्योंकि दवा लगने से खून जमना शुरू हो जाता है। इसी तरह से ज्योति ने मुझे ठीक किया था।"

"म...मगर आपकी लाश....क्या उसे चिता पर रख कर जलाया नहीं गया था?" राज ने पूछा।

"नहीं। सांप के काटे इन्सान का दाह-संस्कार नहीं किया जाता, हमारे यहां उसे दबा दिया जाता है या फिर पानी में प्रवाह दिया जाता है। डॉक्टर जय ने कहा।

"और ज्योति.......।" राज ने हैरत से कहा, "इसको तो हमने अपने हाथों से दाह-संस्कार करावाया था-फिर यह कैसे जिन्दा हो बैठी?"

डॉक्टर जय को होठों पर बड़ी रहस्यपूर्ण मुस्कराहट खेल गई। वो बोला

'' इस पर ऐसी बातों को कोई असर नहीं पड़ता। उसका यह जिस्म नश्वर नहीं है। वो जल जाए, गल जाए या कट जाए, वो फिर अपनी इच्छा से, फिर उसी शरीर में या किसी दूसरे शरीर में प्रकट हो जाती है, जब चाहे।"

"क.....क्या.....यह कैसे हो सकता है?" राज बदहवास होकर बोला।

"खुद अपनी आंखों से देख लो।" डॉक्टर जय ने मुस्करा कर ज्योति की तरफ इशारा किया।

राज ने बिजली की तरह घूमकर देखा। ज्योति जिस कुर्ती पर बैठी हुई थी, वहां एक नाग कढडुली मारे और फन फैलाए बैठा हुआ था, जिसके चारों तरफ हल्की नीली रोशनी का दायारा था।

"ओह.....।" राज के मुंह से निकला, अगर उसने उस मेज का किनारा थाम लिया होता, जिस पर सतीश लेटा हुआ था, तो वक चकराकर गिर पड़ता।

"हो सकता है।"

जब वो कुछ सम्भला तो उसके कानों में ज्योति की आवाज टकराई तो उसने बड़ी मुश्किल से सिर उठाकर देखा।

अब उस कुर्सी पर नाग की जगह फिर से ज्योति बैठी थी और उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कराहट थी। राज की आंखें हैरत से फटी की फटी रह गईं। वाकई उसने बचपन से और बाद में भी सांपों, सपेरों और इच्छाधारी नागिनों की कहानियां सुनी थीं और एक दो पिक्चरों में भी ऐसा देखा था। लेकिन उसे असल जिन्दगी में भी ऐसी परिस्थितियों में से कभी गुजरना पड़ेगा, यह उसने कभी नहीं सोचा था।

आज तक वो उन कहानियों को कल्पित ही समझता था, मगर उन कहानियां की हकीकत ज्योति और डॉक्टर जय के रूप में उसके सामने मौजूद थी। जीती-जागती हकीकत।

डॉक्टर जय कह रहा था

"लेकिन मुझे गम सिर्फ यह था कि हम दोनों का राज खुल चुका था। कयोंकि मुझे मालूम था कि ज्योति मर नहीं सकती , तो फिर इसकी मौत की खबर सुनकर खुदखुशी करने का तो सवाल ही नहीं था। लेकिन पोल खुलने के बाद वहां से गायब होने के लिए हमारे पास मौत के नाटक से ज्यादा अच्छी कोई तरकीब नहीं थी। इसलिए मुझे भी कुछ दिनों के लिए सांप का जहर पीकर मरना पड़ गया था।

उस दिन अपनी खुदकुशी से पहले तुम्हें पत्र लिखने से भी दिल्ली बुला लिया था जिसने मेरी मौत के बाद मुझे जिन्दा करने में ज्योति की बहुत मदद की थी। क्योंकि मेरे प्रयागों में शुरू से ही मेरे साथ रहा था और हर राज से वाकिफ था। फोन पर मैंने उसे अपनी मौत और मरने के बाद की सारी प्लानिंग विस्तार से समझा दी थी।

डॉक्टर जय ने नीलकठ की तरफ मुस्करा कर देखा और बोला

"बस इसके बाद सारा काम आसान था। जमाल ने सारे काम बहुत होशियारी और फुर्ती से किए। यहां तक कि चौबीस घंटे बाद ही मुझे होश आ गया था। चार-पांच दिन में चलने-फिरने के काबिल भी हो गया।"

जय खामोश हुआ तो ज्योति बोलो

"मैं तो समझती थी की नकाब और यश्मों में मेरे इस चेहरे को नहीं पहचान सकेगा। लेकिन ये दोनों तो एक नजर मुझे देखने के बाद ही सन्देह में पड़ गए थे। वो तो इनके दिमाग में यह बात थी कि ज्योति मर चुकी है, वर्ना ये उसी दिन इस असलियत से वाकिफ हो जाते।"

"हमें इसी बात का तो डर था जिसके लिए हमने दिल्ली छोड़ी थी कि कोई हमें पहचान न ले। नहीं तो अच्छा खासा हंगामा हो गया। यहां आकर भी पहचाने जाने के खतरे से बचने के लिए ज्योति उर्फ शिंगूरा हमेशा नकाब और चश्में में बाहर निकला करती थी। मैं तो पहले से ही सैर तफरीह कम करता था। अब बिल्कुल बाहर निकलना छोड़ दिया था। अपने सांपों और जहरों के प्रयोग करके ज्योति के साथ बड़े मजे से जिन्गी गुजर रही थी कि एक बार फिर तुम दोनों बीच में आ टपके हो।"
 
"डॉक्टर वर्मा! कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर आप अपने इस तेज-तर्रार दिमाग को लोकहित में इस्तेमाल करें, अपने इस दुलभ आविष्कार को इन्सानियत की भलाई के लिए काम में लाएं और इस कला को मार्केट हैं, जो सांप के काटने से हर साल मर जाते हैं। क्यों अपनी मानसिक शक्तियों को फिजूल कामों में बर्बाद कर रहे हो?"

"यह अपदेश तो रहने दीजिये डॉकटर राज।" डॉक्टर जय ने कड़वाहट से कहा, "मैं जो कुछ करता हूं, वो अच्छा समझकर ही करता हूं।"

"क्या करते हो तुम ?"राज भी कड़वाहट से बोला,

"दुनिया की एक दुर्लभ हस्ती, एक इच्छाधारी नागिन न जाने क्यों तुम्हारे साथ लगी हुई है, और तुम उसका इस्तेमाल जुर्म द्वारा दौलत इकट्ठी करने में कर रहे हो? भगवान के लिए डॉक्टर जय ओर ज्योति जो हुआ, वो हो गया। अब यह मुजरिमों की जिन्दगी छोड़कर जरा गरीबों की जिन्दगी को ध्यान से देखो और उनके लिए काम करो, तुम्हें सच्ची खुशी महसूस होगी।"

"बहुत खूब.....।" डॉक्टर जय ने कटाक्ष से मुस्कराकर कहा, "तुमने तो अच्छा खासा भाषण ही दे डाला। यह लच्छेदार बातें बनाकर तुम वो आग ठण्डी नहीं कर सकते जो तुम दोनों के खिलाफ मेरे दिल में धधक रही है। मैं जो फैसला कर लेता हूं,

वो अटल होता है।"

"तो फिर अब क्या करने का इरादा है तुम्हारा?" राज ने मायूसी से पूछा।

"इरादा तो मैं सुबह बताऊंगा, फिलहाल तो मुझे तुम दोनों पर कुछ प्रयोग करने हैं। जिनमें सख्त तकलीफ के बाद मौत यकीनी है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अगर मेरा वो प्रयोग सफल हो गया तो पूरा विज्ञान जगत हैरत में पड़ जाएगा।"

राज के जिस्म में झुरझुरी दौड़ गई और सतीश ने भी सहमी हुई नजरों से राज की तरफ देखा।

"अच्छा डॉक्टर राज और मिस्टर सतीश....." डॉक्टर जय ने उनकी मजबूरी का मजाक उड़ाते हुए मुस्कराकर कहा-''रात काफी गुजर चुकी है, इसलिए मैं सोने जा रहा हूं। सुबह फिर मुलाकात होगी और सुबह ही मेरा प्रयोग शुरू होगा। जग्गा अभी

आकर आप दोनों को सोने के लिए कमरा दिखा देगा। लेकिन एक बात बता दूं कि यहां से भागने की कोशिश या चीखना-चिल्लाना न शुरू कर देगा, क्योंकि यह कोठी मैंने बहुत सोच-समझकर बनवाई है। यहां से न तो तुम्हारी चीखें बाहर जा सकती हैं, न ही तुम यहां से भाग पाओगे।"

कहने के बाद वो ज्योति की तरफ मुड़ा

"चलो डार्लिंग, अब मैं सोना चाहता हूं। आज मैं चैन की नींद सोऊंगा क्योंकि तुम्हारे सबसे बड़े दुश्मन हमारी मुी में हैं और हमें अब किसी की तरफ से कोई खतरा नहीं है।"

ज्योति उठ खड़ी हुई, चलते-चलते उसने एएक उचटती सी निगाह सतीश पर डाली और फिर डॉक्टर जय के साथ सिमट गई।

डॉकटर जय ने ज्योति की कमर में हाथ डालकर राज की तरफ चुनौती देने वाले ढंग से देखा।

"डाक्टर राज, अब मेरे और ज्योति के दरम्यान कोई रोड़ा नहीं अटका सकेगा। हमने आराम और ऐश से जिन्दगी गुजारने के लिए काफी दौलत भी इकट्ठी कर ली है।"

"हां।” राज ने व्यंग्य से कहा, "चालीस लाख रूपया तो अभी बेचारे सलीम अनवर से उसके सामने शिंगूरा को पेश करके हासिल किया और फिर उसे कत्ल भी कर दिया है, क्यों, किया है न?"

"अच्छा, तो आप उस राज को भी जान गए हैं?" डॉक्टर जय का चेहरा काला पड़ गया।

"जी सर।" राज ने व्यंग्य भरे लहजे में कहा, "और मुझे यह भी मालूम है कि सलीम की मौत उस सांप के जहर से नहीं हुई है जो उसके कमरे में प्लांट किया गया था। उसकी मौत ऐसे जहर से हुई थी, जो धीरे-धीरे असर करता है।"

डॉक्टर जय ने बहुत खौफनाक निगाहों से राज की तरफ देखा और बोला

"इसमें शक नहीं कि जासूसी के लिए तुमने बेहतरीन दिमाग पाया है डॉक्टर राज। लेकिन मुझे खुशी है कि कल यह दिमाग हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।"

यह धमकी सुन कर राज की रीढ़ की ही में सर्दी की एक लहर दौड़ कई। लेकिन उसने खुद पर काबू पाकर ऊपरी हौसला दिखाते हुए कहा

"जो किस्मत में होगा, देखा जाएगा।"

डॉक्टर जय ज्योति को पकड़े हुए पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद सतीश ने सहमे हुए लहजे में पूछा

"अब क्या होगा राज।"

"यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन हमें निराश नहीं होना चाहिए और भगवान पर भरोसा रखना चाहिए। सुबह तक अगर हम सही सलामत रहे तो सुबह डॉक्टर सावंत पुलिस लेकर यहां पहुंच जाएंगे।"

"वाकई?' सतीश ने हैरत से पूछा।

"हां। मैं इन तमाम खतरों के बारे में सोचकर और उनका प्रबन्ध करके ही यहां आया हूं।" राज ने जवाब दिया। सतीश कुछ देर खामोश रहा, फिर उसने ठण्डी सांस छोड़कर कहा

"तौबा-तौबा! जूही ने मुझे कैसा धोखा दिया है....।"

"इसीलिए मैं कहता हूं कि तुम जरा सावधान रहा करो। लेकिन तुम तो चिकनी सूरत देखकर फिसल पड़ते हो।” राज ने गम्भीरता से कहा।
 
थोड़ी देर के लिए कमरे में खामोशी छा गई। राज सोच रहा था किस तरह यहां से भागा जाए। उसकी पिस्तौल उससे दो कदम के फासले पर पड़ी हुई थी, लेकिन वो उसे उठा नहीं सकता था। वो कुर्सी से बंधा हुआ था और उसके हाथ पीछे की तरफ बंधे हुए थे। वो बेबस था।

"काश...किसी तरह मेरे हाथ खुल जाएं और मैं यह पिस्तौल उठा सकूँ।" राज ने बड़ी हसरत से कहा।

"लेकिन यह नामुमकिन है।" सतीश ने अफसोस से कहा।

उसी वक्त धड़ाम से दरवाजा खुला और भयानक सूरत गुण्डे जग्गा ने अन्दर कदम रखा, उसे देखकर राज कुछ कहते-कहते रूक गया।

"चलिए, आप दोनों को सोने के लिए कमरे में पहुंचा दूं।"

उसने कमरे में आकर कहा और आगे बढ़कर मेज से बंधी रस्सी

खोलने लगा जिससे सतीश के हाथ-पैर बंधे हुए थे।

"क्या टाइम हुआ है?" राज ने उससे पूछा।

"क्यों?" वो व्यंग्य से बोला, "क्या जनाब को घर जाने में देर हो रही है।"

राज को उसके इस धृष्ट व्यवहार पर बहुत गुस्सा आया लेकिन वो इस वक्त कछ नहीं कर सकता था। खामोश ही रहा।

"दो बजे हैं।" थोड़ी देर बाद जग्गा ने खुद ही कहा।

सतीश की रस्सी खोलते-खोलते उसकी नजर जमीन पर पड़ी राज की पिस्तौल पर पड़ी, जो उसकी तलाशी के दौरान दूसरे सामान के साथ निकाल कर फर्श पर दिया था। जग्गा ने जल्दी से पिस्तौल उठा कर जेब में डाल ली। उसके बाद उसने सतीश के दोनों हाथ बंधे रहने दिए, लेकिन उसे मेज से आजाद कर दिया।

उसके बाद वो राज की तरफ पलटा और बो रस्सियां खोलने लगा जो उसे कुर्सी पर जकड़ने के लिए बांधी गई थीं। लेकिन उभी दो रस्सियां पूरी तरह खोल भी नहीं पाया था कि दरवाजा फिर खुला। इस बार जूही आई थी। लेकिन उसकी हालत देखकर राज और सतीश हैरान रह गए।

जूही के हाथ में रिवाल्वर था जिसकी नाल का रुख जग्गा की तरफ था। आहट सुनकर जग्गा ने भी पलटकर देखा और जूही को रिवाल्वर लिए देख कर उसने हैरत से पूछा

"क्या हुआ जूही जी.....क्या बात है?"

"कुछ नहीं.....।" जूही ने करीब पहुंचकर जग्गा के सीने पर निशाना लेते हुए कहा, "जिन्दा रहना चाहते हो तो डॉक्टर राज के हाथ फौरन खोल दो।" ।

उसकी बात सुनकर राज और भी हैरान हुआ और शायद उसके भी ज्यादा जग्गा, क्योंकि हैरत से उसकी मुंह खुले का खुला रह गया था।

"जल्दी करो, मैं सारी रात इन्तजार नहीं कर सकती।" जूही गुर्राई।

जग्गा को मजबूरी में उसके हुकम की तामील करनी पड़ी, हाथ खुलते ही नीकण्ठ ने जग्गा की जेब से फौरन अपनी पिस्तौल निकाल ली।

"अब सतीश साहब के हाथ भी खोल दो।" जूही ने रिवाल्वर हिलाया।

जब जग्गा सतीश की तरफ बढ़ा तो उसके जरा पीछे जूही थी

और राज बगल में था। इसलिए जूही जग्गा की वो हरकत नहीं देख सकी थी, जो राज ने देख ली थी। मुड़ते ही वो सीने की तरफ हाथ ले गया था और अगले ही क्षण उसके हाथ में मिस्त्र ढंग का एक चमकता हुआ खंजर था।

एक सैकेण्ड के हजारवें हिस्से में राज सब समझ गया, और इससे पहले कि वो दोबारा पलट कर जूही राज को अपने निशाने पर गर्व था, इसलिए यह निशाना भी सही पड़ा और गोली जग्गा के दिमाग को फाड़ती हुई निकल गई। जग्गा एक भयानक चीख मारकर फर्श पर गिर पड़ा। जूही ने हैरत से राज की तरफ देखा, मगर वो जग्गा के हाथ में खंजर देखकर सब मामला समझ गई।

"मैं इसके लिए आपकी आभारी हूं राज साहब।" उसने मुस्करा कर कहा।

"इसकी कोई जरूरत नहीं है।" राज बोला, "आपने भी तो हमें बचाया है। लेकिन मैं हैरान हूं कि आप....।''

"ये सारी बातें मैं विस्तार से बाद में बताऊंगी।" जूही ने जल्दी से राज की बात काट दी, "फिलहाल तो फोन करके पुलिस को बुलाना चाहिए।"

गोली का धमाका पूरी कोठी में गूंज गया था, राज का ख्याल था डॉक्टर जय, ज्योति और जमाल दौड़ते आएंगे। लेकिन उसे हैरत हुई कि उनमें से कोई नहीं आया। अलबत्ता बाहर से ऐसी आवाजें जरूर आने लगी थी जैसे दरवाजे पीटे जा रहे हों और कोई चिल्ला रहा हो।

"यह क्या चक्कर है?" राज ने पूछा।

"कुछ नहीं।'' जूही ने मुस्करा कर कहा," जब डॉक्टर जय

और ज्योति कमरे में चले गए थे तो मैंने उनके कमरे को दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया था। यानि अब वो हमार कैदी हैं। इसी तरह जमाल को भी चकमा देकर एक दूसरे कमरे में बंद कर आई हूं। कोठी के कमरों में खिड़कियां नहीं हैं, इसलिए उनके निकल भागने का कोई खतरा नहीं है....और कमरों से बाहर निकलने का भी।"

"वाकई।' सतीश ने खुशी से उछकर पूछा, "ऐसा है तो आपने वाकई कमाल कर दिया है।"

"तारीफ के लिए शुक्रिया।” जूही मुस्करा कर बोली।

"लेकिन जमाल ने तो आपका....।'' राज वही बात कहते-कहते रूक गया।

"मैंने कहा था न, यह लम्बी कहानी है , जो फुर्सत में ही सुनाई जा सकती है। फिलहाल तो हमें बहुत जरूरी काम निबटाने हैं।"

जूही बोली।

"ओके । जैसी आपकी मर्जी।" राज ने जवाब दिया।

"उस दूसरे कमरे में फोन है, आप जरा पुलिस को सूचना देकर यहां बुला लें।"

"चलिए।" राज ने कहा और वो तीनों आगे-पीछे चलते हुए बाहर निकल आए। वो एक कमरे के आगे से गुजरे तो जूही ने कहा

"यह डॉक्टर जय और ज्योति का कमरा है। शायद दरवाजा पीटते-पीटते थक गए हैं।"

राज ने जरा ऊंची आवाज में कहा

"डाक्टर जय, बाजी उलट चुकी है। इस बार यकीनन तुम अपने जुर्मों की सजा भोगेगे।" |

"बको मत!" अन्दर से डॉक्टर जय ने चीखकर कहा,

"डॉक्टर जय वर्मा को कोई नहीं पकड़ सकता....।"

"बहुत बढ़िया।” राज ने व्यंग्य से कहा, " तो आखिरी बार अपनी प्रेमिका ज्योति नागिन के साथ ऐश कर लो, क्योंकि थोड़ी देर बाद तुम दोनों हवालात में पहुंच जाओगे।"
 
उससे आगे जमाल का एक कमरे का दरवाजा बराबर पीटा जा रहा था और जूही का नाम लेकर चिल्ला रहा था। वहां ठहर कर भी राज ने कहा

"अब शोर मचाने से कोई फायदा नहीं है। तुम जमाल हो या कोई, इस वक्त हमारी कैद में हो...और जल्दी पुलिस की कैद में पहुंच जाओगे। तुम्हारा भांडा फूट चुका है।"

जमाल ने जवाब में एक तगड़ी सी गन्दी गाली देकर पूछा

"वो जूही कहां जा मरी है?"

"मेरे पास खड़ी है। उन्होंने ही तुम्हें कैद और हमें आजाद किया

इस बार जमाल ने तीन-चार इकी मोटी गालियां बकी और

खामोश हो गया।

फोन वाले कमरे में जाकर राज ने डॉक्टर सावंत को फोन किया कि वो पुलिस को लेकर जल्दी से जल्दी इस पते पर पहुंच

जाए। साथ ही उसने कोठी का पता बता दिया और लोकेशन समझा दी।

"मैं फौरन पहुंच रहा हूं।” जवाब में डॉक्टर सावंत ने कहा था।

फोन करने के बाद राज ने इत्मीनान से कोठी के कमरों की तलाशी ली। अब वो बंता सिंह ड्राईवर की तलाश कर रहा था।

आखिर एक कमरे में उन्हें बंता सिंह मिल ही गया। जब उसे सारी बातें संक्षेप में पता चली तो बंता सिंह भी बहुत खुश

हुआ।

बंता सिंह ने बताया कि पेड़ों के पीछे छुपा हुआ था कि अचानक

एक बदसूरत से बदमाश ने पीछे से उस पर हमला करके उसे बेहोश कर दिया था। उसे जब होश आया तो वह उसी कमरे में था। दो दिन वो इसी कमरे में बंद था, शाम को एक आदमी जरा सा दरवाजा खोलकर खाना-पीना पहुंचा देता था। नीकण्ठ ने जूही से पूछा

"क्या घर में और कोई शख्स नहीं है-मेरा मतलब है नौकर वगैरह......?”

"नहीं।" जूही ने जवाब दिया, "जहां के नौकरों को शाम के वक्त छी दे दी जाती है.....और वो सुबह वापस आते हैं।"

बंता सिंह के मिल जाने के बाद वो लोग डॉक्टर जय की लेब्रॉटरी में आ गए, और राज ने डॉक्टर जय द्वारा प्राप्त किए जहरों की शीशियां एक जगह जमा करनी शुरू कर दीं, ये सभी बेशकीमती जहर थे। राज अपने प्रयोगों के लिए इन्हें साथ ले जाना चाहता था।

डॉक्टर सावत को फोन किए करीब पन्द्रह मिनट हो चुके थे

और वो सभी बेचैनी से पुलिस का इंतजार कर रहे थे कि अचानक पूरे मकान में एक धुआं सा फैलना शुरू हो गया। उन्होंने घबराकर इधर-इधर देखना शुरू कर दिया कि मामला क्या है। आखिर बड़ी देर बाद उन्हें पता चला कि डॉक्टर जय के कमरे से ही धुएं के गुब्बर के गुब्बार निकल रहे थे। उस कमरे के दरवाजे के ऊपर करीब एक फुट की लोहे की जाली लगी हुई थी। उसी जाली के जंगले में से बहुत सा धुआं निकल-निकल कर पूरी कोठी में फैल रहा था। ऐसे लग रहा था,

जैसे कमरे में आग लग गई हो।

राज ने चीखकर कहा

"डॉक्टर जय, क्या कर रहे हो, क्या जलकर मरने का इरादा है।

लेकिन अन्दर से कोई जवाब नहीं मिला तो राज ने दरवाजा थपथपाया। जब इसकी भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उसने पिस्टल सतीश को थमाते हुए कहा

"तुम दरवाजे पर निशाना बांध कर खड़े हो जाओ, मैं दरवाजा खोलता हूं। अगर डॉक्टर जय कोई गलत हरकत करने की कोशिश करे तो फौरन गोली चला देना।"

सतीश पिस्टल लेकर खड़ा हो गया तो राज ने दरवाजे की बाहर से वोल्ट हटाकर उसे धक्का दिया, तब उसे पता चला कि दरवाजा अन्दर से बन्द है।

"यह तो अन्दर से बन्द है यार!" राज ने हैरत से कहा।

वो सब हैरान थे कि आखिर डॉक्टर जय करना क्या चाहता है? अचानक जूही एक कुर्सी पर चढ़कर अन्दर झांका तो उसे कुछ भी नजर नहीं आया। जंगले से इतना धुआं निकल रहा था कि उसकी आंखों में घुसने लगा था। इसके अलावा कमरे में भी गाढ़े धुएं के सिवा कुछ नहीं था।

"अंदर तो धुंए की वजह से कुछ नजर नहीं आ रहा।"

राज ने बताया।

"तो आओ, जल्दी से फायर ब्रिगेड को भी फोन किया जाए। कहीं आग भड़क न उठे।" जूही बोली थी।

वो सभी भागकर फिर फोन वाले कमरे में पहुंचे और फायर ब्रिगेड स्टेशन फोन किया।

लेकिन जब वो दोबारा कमरे से बाहर आए तो धुंआ कम हो चुका था और कमरे में जपटें उठ रही थीं। कमरे के दरवाजे ने भी आग पकड़ ली थी।

वो यह दृश्य देखकर बौखला गए और फौरन कोठी से बाहर निकल आए। जल्दी में राज जहरों और दवाओं की

शीशियां लाना भी भूल गया था, जो उसने साथ लाने के लिए जमा की थीं।

उनमें वो दोनों दवाएं भी थी जिनसे सांप के काटने से मरने वाले इन्सान को जिन्दा किया जा सकता था।

राज का ख्याल था कि थोड़ी देर में ही फायर ब्रिगेड की गाड़ियां पहुंच जाएंगी और आग पर काबू कर लिया जाएगा। लेकिन उनके बाहर निकलते ही एक जोरदार धमाका हुआ और आग पूरी कोठी में फैल गई।

"यह क्या हुआ?" राज के मुंह से निकला।
 
"ओह.....हब मेरी समझ में आया ।" जूही ने कहा, "दरअसल जय का बेडरूम भी किसी लेब्रॉटरी से कम नहीं था, बहुत ज्यादा कीमती दवाईयां और रसायन वो आमतौर पर बेडरूम में ही रखता था। वहीं स्प्रिट वगैरह की बोतलें भी मैंने कई बार रखी देखी थीं। उन्हीं की वजह से कमरे में आग तेजी से भड़की होगी और शायद किसी केमिकल का भण्डार भी होगा, जिसके आग पकड़ने से यह धमाका हुआ होगा।"

दस-बाहर मिनट में ही आग ने पूरी कोठी में फैल कर कब्जा जमा लिया। लकड़ी के फर्नीचर , भारी पर्दो, कालीनों और बेडरूम में रखे रसायनों ने आग को भड़काने में खूब मदद की। जब पुलिस की बड़ी गाड़ी वहां पहुंची तो आग कोठी के मुख्य द्वार पर पहुंच चुकी थी। अन्दर जाना अब मुमकिन नहीं रहा था।

डॉक्टर सावंत बौखलाया हुआ था, राज ने उसे और पुलिस इंस्पेक्टर को संक्षेप में स्थिति के बारे में बताया। आग अब इतनी भीषण हो गई थी कि लकड़ियां और पत्थर चटख चटकाकर हवा में उड़ने लगे थे। राज को अफसोसस हो रहा था कि डॉक्टर जय की कैसी भयानक मौत हुई थी और ज्योति....।

फिर उसे ख्याल आया कि ज्योति तो इच्छाधारी नागिन थी, हो सकता है वो किसी तरह बचकर निकल गई हो।

वो गुमसुम सा खड़ा था।

अचानक जूही ने राज की कंधों को झिंझोड़ते हुए कहा

"ओह.....हम जमाल को भी निकालना भूल गए, वो भी अब जक कर खाक हो जाएगा....।"

"वाकई, यह तो हमारी गलती से हुआ।” राज ने अफसोस भरे लहजे में कहा।

थोड़ी देर बाद फायर बिग्रेड भी आ गई, लेकिन उनके आने तक आग इतनी भड़क चुकी थी कि उस पर काबू पाना अब नाममुकिन हो गया था। फिर मुसीबत यह हुई कि वहां पानी ज्यादा मात्र में उपलब्ध नहीं था। थोड़ा संघर्ष करने के बाद फायर ब्रिगेड वाले भी निराश हो गए और बेमन से थोड़ा बहुत प्रयास करते रहे, जो इतनी गम्भीर आग के सामने न होने के बराबर ही था।

थोड़ी देर बाद जब आग अपने आप ही ठण्डी पड़ने लगी तो डॉक्टर जय, जमाल और ज्योति या शिंगूरा की मौत पर मन ही मन दुखी घर लौट पड़े। पुलिस अपनी कागजी कार्रवाई करके अपनी गाड़ी में अलग लौट गई थी, फायर ब्रिगेड वालों ने राज को नाम-पता नोट करके उसका बयान लिया था और अभी तक आग बुझाने की छुटपुट कोशिश कर रहे थे।

इस तरह एक बार फिर राज और सतीश मौत के मुंह में जाते-जाते बाल-बाल बचे थे। डॉक्टर जय और ज्योति कमरे में जलकर मर गए थे, लेकिन न जाने क्यों नीककण्ठ का दिल कहता था कि डॉक्टर जय और ज्योति अब भी नहीं मरे , क्योंकि ऐसी-ऐसी पिशाचात्माएं आसानी से नहीं खत्म हुआ करती। और इच्छाधारी नागिनों के बारे में तो राज ने सुन रखा था कि वो अपने दुश्मनों का पाताल तक पीछा नहीं छोड़ती । वो वाकई इन्सान नहीं लगते थे। ज्योति तो इच्छाधारी नागिन थी, और डॉक्टर जय के रूप में जाने कौन सी पैशाचिक शक्ति थी।

हालांकि उन सब की निगाहों के सामने वो दोनों बन्द कमरे में जल मेरे थे, क्योंकि वो उस कमरे में बन्द थे जिस में सब से पहले आग भड़की थी, सबका यही ख्याल था कि पुलिस से बचने के लिए उन्होंने खुद ही आग लगाकर खुदकशी कर ली थी।

यह हकीकत थी कि जाहिरी तौर पर वो खत्म हो गए थे, लेकिन राज का दिल कह रहा था कि वो मरे नहीं हैं। जैसे एक बार पहले वो मरकर जिन्दा हो गए थे और अपने शैतानी काम फिर शुरू कर दिए थे, उसी तरह अब भी वो कहीं न कहीं जरूर प्रकट हो सकते थे, एक बार फिर वो किसी रहस्यमय तरीके से उनकी जिन्दगी में दाखिल होकर कोहराम मचा देंगे।

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दूसरे दिन दोपहर को वो सभी कार में बैठ कर वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि आग ने सारी कोठी को जलाकर खाक कर दिया है या ओर अब वहां काले मलबे के ऐर पड़े हुए थे। जिसमें से अब भी हल्का धुआं निकल रहा था और तपिश महसूस हो रही थी।

बहुत देर वे वहां खड़े अफसोस से मलबे को देख कर डॉक्टर जय, ज्योति और जमाल की बातें करते रहे। उसके बाद वो वापिस लौट पड़े थे।

रास्ते में उनके निरंतर अनुरोध पर जूही ने कहानी सुनाते हुए कहा

"मैं दरअसल कलकत्ता की सी.आई.डी. से सम्बन्धित हूं।"

"सी.आई.डी से?" राज ने हैरत से कहा।

"जी हां।" जूही ने मुस्कराते हुए कहा, "वसीम अनवर दिवंगत सलीम अनवर के छोटे भाई ने तीन महीने पहले मेरी सेवाएं मांगी थीं योरोप जाने से पहले। बम्बई पहुंच कर सलीम ने जब पहली बार में बगैर किसी वजह से दस लाख रूपये बैंक से निकले थे तो वसीम को सन्देह हो गया था कि किसी चक्कर में पड़ गया है। उसके किसी दोस्त ने यह भी उसे फोन पर बताया

था कि उसका भाई आजकल एक मिरू की सुन्दरी के साथ देखा जाता है। वो अपने भाई की आदतों से अच्छी तरह वाकिफ था कि वो बेईमान नहीं है, जरूर वो ब्लैकमेलरों या जालसाजों के चक्कर में फंस गया होगा, उसने सोचा था।

इसलिए उसने प्राइवेट तौर पर मेरी सेवाएं व्यक्तिगत रूप से प्राप्त की, अच्छी ऑफर देकर, ताकि मैं।यहां आकर तहकीत कर सकूँ और यहां के असली हालात जानकर उसे सूचना दे सकूँ।

मैं चूंकि सरकारी तौर पर यह काम नहीं कर सकती थी, इसलिए

छः महीने की छुी ली और यहां पहुंच गई।

यहां आकर मैं एक होटल में ठहरी और प्लाजा होटल में एक दो बार सलीम से मिली। उसे ने मैंने यही बताया था कि मैं यहीं के एक बिजनेसमैन की बेटी हूं। उसी ने मेरा परिचय उस मिस्त्र लड़की शिंगूरा से करवाया था और मैंने फौरन शिंगूरा से दोस्ती कर ली और उसकी कोठी पर आने-जाने लगी, उसी दौरान उसका फर्जी भाई जमाल पाशा मुझसे प्यार करने लगा।"

"तो क्या वो उसका सगा भाई नहीं था?" सतीश ने हैरत से पूछा।

"वो डॉक्टर जय का चेला था और जय के कहने पर ही उसने अपने अपने आपको शिंगूरा का भाई घोषित कर रखा

था। उसके पूर्वज भारतीय ही थे, लेकिन वो मिस्त्र में पैदा हुआ था, इसलिए वो मिस्त्र सभ्यता और संस्कृति से पूरी तरह वाकिफ था। जय ने ही उसे मशविरा दिया था कि वो खुद को और शिंगूरा को मिस्त्र बताए, ताकि शिंगूरा के नकाब पर कोई सन्देह न पैदा हो सके। एक आड़ के तौर पर उसने 'जमाल पाशा एण्ड कम्पनी' नाम से एक मामूली सी फर्म भी कायम करके दे दी थी, जिससे वो इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट करते थे।

उसके बाद मैंने जमाल को जरा सी लिफ्ट दी ताकि वो मुझसे खुल जाए और उसके जरिये मैं ज्यादा से ज्यादा उनके राज मालूम कर सकूँ। लेकिन मैं उसे पसन्द नहीं करती थी और एक सीमा से आगे उसे नहीं बढ़ने देती थी। फिर एक दिन उसन मुझसे प्यार का इजहार कर दिया और मैंने उससे शादी का वादा कर लिया।

इसी बीच मैं उस कोठी के बहुत से रहस्य जान चुकी थी।

धीरे-धीरे मुझे पता चला गया था कि शिंगूरा सलीम अनवार से रूपया ऐंठ रही है। सलीम शिंगूरा से प्यार करने लगा था, इसलिए उसकी हर जायज-नाजायज मांग बगैर सोचे-समझे मान लेता था। शिंगूरा ने उसे यही पट्टी पढ़ाई कि वो उसके भाई के बिजनेस में कुछ रूपया लगा दे, वो लाभ में बराबर का हिस्सेदार रहेगा।

क्योंकि शिंगूरा उसके दिल और दिमाग पर सवार थी इसलिए वो इन्कार न कर सका और उसने इस लाख रूपया मंगवाकर नकद शिंगूरा को दे दिया। फिर एक बार कम्पनी की पेमेन्ट रूक जाने का बहाना बनाकर दस लाख और झटक लिए, आठ लाख रूपये के जेवर और गिफ्ट वो शिंगूरा को दे चुका था और करीब दस लाख ही शिंगूरा ने उससे दस्ती उधार के तौर पर ले रखे थे।
 
लेकिन यह चक्कर क्योंकि लम्बे समय तक नहीं चल सकता था, न ही शिगूरा अनवर से शादी कर सकती थी, इसलिए यह खेल खत्म करने के लिए मजबूरन सलीम की जान लेनी पड़ी, क्योंकि अगर शिंगूरा सलीम से अलग होना चाहती तो उसने अपना पैसा वापस मांगना था और अपने साथ फ्रॉड होता देखकर बो पुलिस की सेवाएं भी जरूर प्राप्त करता।

अफसोस है कि उनकी इस स्कीम का मुझे वक्त रहते पता नहीं चला। मुझे तब पता चला जब सलीम अनवर मर चुका था, अगर मुझे एक दिन पहले पता चल जाता तो मै। उसे बचा लेती। दरअसल, मैं तो निश्चिंत थी कि अभी तो ये लोग सलीम से पैसा ऐंठ रहे हैं, इसलिए उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकते। लेकिन मेरा अन्दाजा गलत निकला।

फिर एक दिन जमाल ने मुझसे कहा कि मैं किसी तरह सतीश साहब को फांस कर उनकी कोठी में ले जाऊं। मैं फौरन मान गई और कह दिया था कि यह काम तो मैं दो-तीन दिन में ही कर लूंगी। जमाल ने मुझे यह भी बताया कि यह सुझाव शिंगूरा ने दिया था, उसी ने कहा था कि सतीश साहब सुन्दर मुखड़ों के पुजारी हैं....और सुन्दर लड़कियों के फरेब में शिंगूरा के कहे अनुसार.....फौरन मुझ पर लटू हो गए।

सतीश यह सुनकर मुस्कुराया और फिर उसने निगाहें नीची कर ली झेंपकर। जूही आगे बोली

"दो दिन तक मैं क्लब में इनसे मिलती रही और इन्हें यकीन दिलाने में कामयाब रही कि मैं भी इनके प्यार में गिरफ्तार हो गई हूं।"

" तो क्या तुम वाकई मुझसे प्यार करने लगी थी?" सतीश नू पूछा।

"जी नहीं, हमार ट्रेनिंग में ऐसे प्यार की एक्टिंग भी सिखाई जाती है।" जूही ने जवाब दिया, " संक्षेप यमें यह कि परसों रात जब राज जी क्लब से जाते हुए बोले कि वो कार ले जा रहे हैं तो मैंने समझ लिया था कि अब सक्शन का वक्त आ गया है।

उसी दौरान जमाल ने एक इन्तजाम यह कर दिया कि जग्गा मेरी मदद के लिए मेरा साथ रहने लगा था, उस दिन भी वो वहीं

था। वहां से चलते हुए मैं सतीश साहब को अपने साथ ले आई, यह कह कर कि मैं इन्हें इनके घर छोड़ आऊंगी। ये फौरन मान गए थे। मेरे इशारे पर जग्गा कार चलाने लगा था और थोड़ी दूर चलने के बाद ही क्लोरोफार्म के रूमाल से मैंने इन्हें बेहोश कर दिया था।

यह काम मैंने सिर्फ इसलिए किया था ताकि उनका विश्वास प्राप्त करके और ज्यादा जनकारी प्राप्त कर सकू। इसका परिणाम अच्छा निकला। यानि सतीश साहब की कोठी में पहुंचने के अगले दिन ही जमाल ने मुझे इनका और ज्योति का पूरा किस्सा सुना दिया था।

तब मैंने सोचा कि इन्हें फंसाने के बाद इनकी रक्षा करना भी मेरा फर्ज है। इसलिए कल रात मैं जानबूझ कर उस कोठी में ही रूक गई थी। एक बजे के करीबे जग्गा राज जी को भी बेहोश करके छत से उतार लाया था। मैं तो अपनी अक्ल से स्कीम बना बातें हुईं, यह मुझे नहीं मालूम । मैं तो अपनी अक्ल से स्कीम बना रही थी। उसी पर मैंने अमल भी किया। जब डॉक्टर जय और ज्योति अपने कमरे में सोने के लिए चले गए तो मैंने उन्हें बन्द कर दिया और फिर दूसरे कमरे में जमाल को भी बन्द कर आई। चौथे आदमी जग्गा को मैंने रिवाल्वर के बल पर काबू करना चाहा, लेकिन उसका खतरनाक इरादा भाप कर राज साहब ने उसे गोली मार दी।

बस यह है मेरी सारी कहानी।"

यह कहानी सुनकर वो सभी हैरान रह गए और बहुत देर तक जूही की प्रशंसा करते रहे।

घोर अन्धेरा था जो चारों तरफ फैल हुआ था। अचानक उस घोर अन्धेरे में एक कांपता हुआ रोशनी का बिन्दु उसे नजर आया और वो बिन्दु धीरे-धीरे अपना आकर बढ़ाने लगा। थोड़ी देर में ही वो रोशन बिन्दु दीपक की लौ की तरह दिखने लगा था उसे।

रोशनी फैलती जा रही थी। दूधिया रंग की पतली सी रोशनी की वो लकीर बढ़ती जा रही थी। फिर वो इस तरह खिंच गई जैसे किसी ने ब्लैक-बोर्ड पर चाक से रेखा खींचकर उसे दो भाग में विभाजित कर दिया हो। उस रेखा में इन्द्रधनुष के रंग भरने लगे, लाल, हरा, नीला, पीला,गुलाबी, संतरी। कई किस्म के चटक रंग उस लकीर में झलकने लगे थे।

एक धीमा सा शोर भी उसके कानों के पर्दो से टकराया। जैसे बहुत दूर कहीं हंगामा जारी हो। धीरे-धीरे वो शोर उसके करीब आता गया और फिर अन्धेरा बिल्कुल गायब हो गया।

उसने घबरा कर आंखें खोल दीं। पहले कुछ सैकिण्ड तक हर चीज उसके लिए नई और अनोखी थी। फिर सैकिण्ड तक बिस्तर, खुली हुई खिड़की, खिड़की के बाहर नीला स्वच्छ आसमान।

सब कुछ उसके लिए नया था-जैसे उसने इस संसार में पहली बार आंखें खोली हों।

उसे कुछ पता नहीं कि वो कौन है और कहां है, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसकी याददाश्त लौटने लगी। उसका जेहन चलने लगा था। अब वो अपने सामने फैली सफेदी को पहचान गया था कि वो दीवारें हैं। खिड़की के बाहर नीले पर्दे को पहचान रहा था कि वो आसमान है।

उसने हिलने की कोशिश की तो उसे ऐसे लगा जैसे उसके सारे अग पत्थर की तरह बेजान हों। उसके जिस्म में हिलने की भी शक्ति नहीं थी। उसकी पहले से बोझिल आखें बंद होती जा रही थीं और दिमाग सुन्न था। आखिर मजबूर होकर उसने दोबारा आंखें बन्द कर ली।

फिर अचानक उसे अपने चेहरे पर हल्की सी गर्म एक सरसराहट महसूस हुई तो उसने कोशिश करके आंखें खोलीं, अब गुलाबी रंग का एक खूबसूरत चेहरा उसके चेहरे पर इस तरह झुका हुआ था कि उसकी महकती सांसें उसके गालों पर फैल रही थीं।

उस चेहरे के गुलाबी होंठ, दमकते हुए गाल, साफ गोरा माथा।

उसकी निगाहें चेहरे पर जमकर रह गईं । उस चेहरे पर काली, खूबसूरत आंखें मुस्करा रही थीं।

अचानक एक मधुर, सुरीली आवाज उसके कानों से टकराई

"अब कैसी तबीयत है आपकी?"

उसको ऐसा महसूस हुआ जैसे चांदी की घंटियां बज उठी हों। उसके होठों से निकला

"मैं कहा हूं.....।" लेकिन वो कह नहीं पाया। अपनी तरफ से वो बहुत जोर से बोला था, लेकिन आवाज होंठों में ही घुटकर रह गई थी। उसने दूसरी और फिर तीसरी कोशिश के बाद चीखकर कहना चाहा, लेकिन आवाज चूहे के चिंचियाने जैसी निकली।

"ओह....सब ठीक हो जाएगा।” उसके कानों में फिर वही सुरीली आवाज पड़ी, गुलाबी होंठ मुस्करा रहे थे-” फिक्र न करें, सब ठीक हो जाएगा।"

एक रेशमी हाथ उसके बालों से खेलने लगा। उसकी नस-नस में गुदगुदी फैल गई। राग-रग में बिजली सी दौड़ गई।

"मैं...... कहां हूं?" उसने पूछा।

"हॉस्पिटल में।" खूबसूरत होंठ हिले।

.

..

"मैं कौन हूं?" उसने जरा ऊंची आवाज में दूसरा सवाल किया।

सुर्ख होंठों पर मुस्कराहट फैल गई, जैसे आवाज की कली दिया,

"अलबत्ता आपकी जेब से जो ड्राईविंग लाइसेंस मिला है, उस पर आपका नाम राज शर्मा लिखा हुआ है।"

"राज.....।" उसके खूबसूरत होंठों ने शब्द दोहराए। उसे लग रहा था यह नाम उसका जाना पहचाना था। फिर एकदम उसे याद आ गया कि राज ही तो उसका नाम है।

"हा.....मेरा नाम राज है......

राज। तुम कौन हो?"
 
"मैं नर्स हूं, मेरा नाम डॉली है।"

तब पहली बार राज को अपने सिर के पिछले हिस्से में दर्द का अहसास हुआ। खट खटाक खट खट जैसे कोई हथौड़े बरसा रहा हो। फिर उसकी दाईं टांग में दर्द की तेज लहर उठी और उसके पूरे जिस्म में फैल गई।

एक कराह उसके होंठों से निकल गई। लेकिन अब उसके अंगों में जान दौड़ चुकी थी, अब वो अपने हाथ-पैर हिला सकता था और सिर इधर-उधर घुमा था।

"क्या ज्यादा दर्द हो रहा है?" डॉली ने सुरीली आवाज में पूछा।

"हां।” राज ने जवाब दिया और धीरे-धीरे सिर घुमा कर डॉली की तरफ देखा, वो दरम्याने कद और छरहरे जिस्म की लड़की थी। हस्पताल की धवल यूनिफार्म में वो आसमान से उतरी कोई अप्सरा लगी राज को। उसकी निगाहें उसके सुडौल जिस्म से फिसली हुई उसके चेहरे पर जाकर ठहर गईं। वो सम्मोहित हो गया था।

जिस कमरे में राज लेटा हुआ था, वो हस्पताल का एक छोटा सा कमरा था। दाएं हाथ की दीवार पर एक आदमकद आइना लगा हुआ था, राज के लोहे के बेड के करीब एक छोटी सी सफेद रंग की अलमारी रखी हुई थी और छोटी सी ही एक मेज थी।

राज के हाथों और जिस्म पर सफेद पयिां बंधी हुई थीं और

अब उसके सारे बदन में दर्द की लहरें उठ रही थीं।

लेकिन ये तमाम बातें मालूम हो जाने के बापजूद राज की समझ में नहीं आ रहा था कि वो यहां कैसे पहुंच गया। बो किस तरह जख्मी हो गया। उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।

उकताकर उसने डॉली से पूछा

"मैं यहां कैसे आ पहुंचा?"

"आप एक कार से घायल हो गए थे, दिमाग में सख्त चोट आई थी। हमें तो आपके जिन्दा बचने की कोई उम्मीद ही नहीं थी। लेकिन भगवान का शुक्र है कि आप मौत के मुंह से वापिस आ गए....।"

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"अच्छा.....मैं कार से टकराकर जख्मी हो गया था।" उसने मन ही मन कहा, "आखिर मैं जा कहां रहा था कि कार से टकरा गया? कहां जा रहा था.....कहां?"

"ज्यादा मत सोचिये।” उसके कानों में डॉली की सुरीली आवाज पहुंची तो राज के ख्यालों का सिलसिला टूट गया। वो कह रही थी

"बेहतर है कि इस वक्त आप सो जाएं, ताकि दिमाग को पूरा आराम मिल सके।"

"मुझे नींद नहीं आ रही है, मेरे सारे जिस्म में तकलीफ हो रही है।" राज ने जवाब में कहा।

"फिक्र न कीजिए, अब सब ठीक हो जाएगा।” डॉली ने कहा और वो बेड पर राज के करीब बैठ गई और काफी देर तक राज का बाजू सहजाती रही।

फिर सकदम राज को अपने बाजू में एक सुई चुभती महसूस हुई, उसने दर्द के मारे आंखें बंद कर लीं। डॉली ने शायद उसे इंजेक्शन लगा दिया था।

अन्धेरा फिर उसके चारों तरफ फैलता जा रहा था....

अन्धेरा.....गहरा अन्धेरा। और फिर उसे कुछ याद नहीं कि क्या हुआ।

दूसरी सुबह उसकी आंख खुली तो चमकीली घूप खिड़की के रास्ते अन्दर आ रही थी । अब उसे तकलीफ कुछ कम थी। बेड के करीब ही एक आराम कुर्सी पर बैठी डॉली अखाबार पढ़ रही थी।

"नर्स...!'' राज ने आहिस्ता से उसे पुकारा।

वो चौंक उठी और राज को जागते पाकर मुस्कराते हुए उठी

और राज के करीब आ खड़ी हुई।

"कहिए, अब क्या हाल है।" उसने पूछा।

"अब तो दर्द कम है।" राज ने जवाब दिया-"लेकिन मुझे प्यास लगी है।"

"अच्छा, अभी पानी लाती हूं।" उसने कहा और छोटे-छोटे कदम उठाती हुई बाहर चली गई।

एकांत में राज ने फिर अपनी याददाश्त कुरेदने की कोशिश की। बड़ी को शिश के बाद मुश्किल से उसे याद आया कि वो अपने एक क्रिश्चियन दोस्त डॉक्टर जेम्स के साथ क्रिसमस की पार्टी में बालरूम गया था। बालरूम क्रिश्चियन लड़के-लड़कियों से भरा हुआ था, जो क्रिसमस के मौके पर खुशी से मस्त होकर नाच रहे थे।

खूबसूरत रंगीन तितलियां इधर-उधर थिरकती फिरती थीं और शराब के नशे में लड़के उनके गिर्द मंडराते फिर रहे थे। डॉक्टर जेम्स अधेड़ होने के बावजूद उन जवानों में जा मिले और एक अधेड़-उम्र औरत ने उसे मुस्काराकर देखा जो बहुत खूबसूरत थी,

और डॉक्टर जेम्स राज को भूलकर उस औरत के साथ डांसिंग फ्लोर पर थिरकने लगा। इस दिन राज का मूड कुछ खराब था, वो उस हंगामे से उकता गया था ओर जेबों में हाथ डाले उस जोशीले दृश्य को देख रहा था ओर सोच रहा था कि इस वक्त नजर बचा कर वहां से निकल लेना चाहिए। कल डॉक्टर जेम्स से क्षमा मांग लेगा।

लेकिन ठीक उसी वक्त, जब वापिसी के लिए कदम उठाने लगा था, एक हसीन लड़की मुस्कराती हुई उसकी तरफ बढ़ी थी और बहुत बेतकल्लुफी से बोली थी

"कया आप डांस नहीं करेंगे?"

"नो, थॅंक्स।" राज ने जवाब दिया था।

लेकिन उसने बड़ी बेबाकी से राज का बाजू थामा था और खींचती हुई उसे डांस फ्लोर पर ले आई थी। राज उसके जवान जिस्म की महक से सम्मोहित सा होकर उसके साथ डांस करने लगा था।

लड़की इतनी खूबसूरत नहीं थी, लेकिन जवानी और मेकअप ने उसमें एक आकर्षण पैदा कर दिया था। डांस के दरम्यान कुछ सैकिण्ड के लिए लाईटें बुझा दी गई थीं तो वह एकदम राज के सीने से चिपट गई और उसने राज के होंठों राज के सीने से चिपट गई और उसने राज के होंठों पर चुम्बनों की बरसात कर दी थी। उस वक्त पहली बार राज को पता चला कि वो लड़की थोड़ी पिए हुए भी थी।

दोबारा लाईटें जली थीं तो उसके करीब वाले जोड़े उसे देख-देख कर मुस्कराने लगे थे, राज ने फौरन रूमाल निकालकर होंठ पैंछे और मुंह भी। रूमाल लड़की की होंठों की जिपस्टिक से लाल हो गया । वो दिल ही दिल में झेंपकर रह गया।

"आपका नाम क्या है?" राज ने नाचते-नाचते लड़की से पूछा।

"रोजी।"

"बड़ा खूबसूरत नाम है....।" उसने मुस्कराकर कहा था।

"थैक्स।"

कुछ देर बाद लड़की ने आहिस्ता से कहा

"आओ, कुछ देर इस शेर-शराबे से दूर बाहर चलें। पार्क में बैठेंगे। मेरा दम घुटने लगा है....।"

"चलो।" राज ने सिर हिलाकर सहमति दे दी थी।

उसके बाद दोनों बालरूम से बाहर आ गए। उस वक्त रात के बारह बज चुके थे, चारों तरफ गहरा अन्धेरा छाया हुआ था।

पार्क बिल्कुल सुनसान था। वो दोनों एक वीरान कोने में जाकर बैठ गए।

एकांत में पहुंचते ही वो राज से चिपट गई थी, उसने अपनी बाहें नलकण्ठ के गले में डाल दी और होंठ उसके होंठों पर जमा दिए थे। एक हसीन और जवान लड़की के इस तरह सामीप्य ने राज के जिस्म में भी अंगारे भर दिए थे और उसने आंखें बन्द करके पूरी ताकत से लड़की को बाहों में जकड़ लिया था।

बस इतना ही राज को याद था। उसके बाद क्या हुआ था

उसे मालूम नहीं था। वो लड़की कहां थी वो खुद वहां उठकर कहां गया था? कार से कैसे टकरा गया? ये सब एक पहेली थी।

अचानक डॉली के कदमों की हल्की सी आवाज ने उसे चौंका दिया और वो अपने ख्यालों के भंवर से निकल आया।

डॉली कांच के गिलास में पानी लिए हुए अन्दर दाखिल हुई, गिलास मेज पर रखकर बैठ गई। राज का सिर उसके कंधे पर था और उसके जिस्म की भीनी-भीनी महक राज के जिस्म में जिन्दगी की लहरें दौड़ा रही थी। उसका जी चाहा, काश यह इसी तरह मुझे बाहों में भरे पानी पिलाती रहे हमेशा....जिन्दगी भर।

लेकिन वो सुहाने पल जल्दी ही खत्म हो गया। पानी खत्म हो जाने के बाद उसने बड़ी सावधानी से नीलण्ठ को नीचे लिटा दिया, बिस्तर पर। उसके पास बैठकर अपनी लम्बी-लम्बी अंगुलियों से उसके बालों में कघी करने लगी।

"मुझे हस्पताल में आए कितने दिन हो चके हैं?" राज ने पूछा।

"तीन दिन।' डॉली ने जवाब दिया।

"इसका मतलब है, मैं तीन दिन पहले जख्मी हुआ था।" उसने दिल में सोचा-"चौथे दिन जब मैं उस बेबाक सुन्दरी रोजी से मिला था उस दिन दिसम्बर की पच्चीस तारीख थी। इस हिसाब से आज उनतीस दिसम्बर होनी चाहिए....।' सोचकर उसने डॉली से पूछा, "क्या आज उन्तीस तारीख है?"

"नहीं।" डॉली बोली-''आज बीस तारीख है।"

"बीस....।" राज ने हैरत से उसका चेहरा देखा और दिल ही दिल में सोचा, 'कहीं उसका दिमाग तो नहीं खराब हो गया....।' उसका हैरान होना जायज था, क्योंकि दिसम्बर उन्नीस सौ नब्बे की पच्चीस दिसम्बर बीत चुकी थी और वो आज बीस तारीख बता चुकी थी.....और यह कह चुकी थी और यह कह चुकी थी कि उसे हस्पताल आए सिर्फ तीन दिन हुए थे।

"हैरान क्यों हो रहे हैं?" उसने राज को अपनी तरफ घूरते पाकर पूछा।

"क्या तुम ठीक कह रही हो कि आज बीस तारीख है?"

"हां, हां। बिल्कुल ठीक कह रही हूं।” उसने हैरत से जवाब दिया,"क्या बात है?" वो शायद ऐसी बातों को राज के दिमाग की खराबी समझ रही थी।

"और महीना....महीना कौन सा है?" राज ने धड़कते दिल से पूछा।

"जून उन्नीस सौ इक्यानवे।" डॉली ने बताया।

हैरत और दहशत के मारे राज के रोंगटे खड़े हो गये। वो चीख उठा

"क्या कहा तुमने, जून उन्नीस सौ इक्यानवे?" और वो चौंक कर बिस्तर से उठा।

"न....नहीं, उठो मत।" डॉली ने उसे कंधों से पकड़कर बिस्तर पर लिटाते हुए कहा, "हिलने-डुलने से जख्मों के टांके टूट जाएंगे।"

लेकिन उस वक्त राज की सारी तकलीफें हैरत और खौफ के भारी बोझ तले दब चुकी थीं। पच्चीस दिसम्बर नब्बे और बीस जून इक्यानवे! दो तारीखें उसके सेहन में नाच रही थी। तो पूरे छः महीने गुजर चुके थे जब वो उस लड़की रोजी से मिला था?

'आखिर यह क्या रहस्य है?" वो सोच रहा था, 'क्या राज है?

क्या वाकई मेरा दिमाग खराब हो गया है या फिर डॉली को गलती लग रही है।'

"आखिर बात क्या है?" डॉली ने राज के बालों में अंगुलियां फिराते हुए पूछा।

"अरे.....तुम्हें यकी न है कि आज वाकई बीस जून है?"

राज ने उसे घूरा।

"अरे....तुम्हें शक क्यों हो रहा है?" उसने सवाल किया।

"क्योंकि पच्चीस दिसम्बर 90 कसे मैं एक लड़की के साथ बैठा बातें कर रहा था। अचानक मैं बेहोश हो गया। भगवान जाने क्या माजरा था। उसके बाद मुझे होश आया तो इस हस्पताल में हूं। अब मैं हैरान हूं कि छः महिने कैसे गुजर गए? जबकि तुम बता चुकी हो कि हस्पताल आए मुझे सिर्फ तीन दिन ही गुजरे

"हस्पताल आए तो आपको सिर्फ तीन दिन ही गुजरे हैं।"

डॉली ने जवाब दिया-"और यह भी हकीकत है कि आज बीस जून ही है। यकीन न आए तो अभी थोड़ी देर में डॉक्टर आपको देखने आएंगे, उनसे पूछ लेना।"

"फिर यह दरम्यान के छः महने कहां बए?' राज ने परेशान होकर पूछा।

"यह बाद में सोच लेना....।" डॉली चितिंत स्वर में बाली

"फिलहाल दिमाग पर जोर न डालो और आंखें बंद करके सोने की कोशिश करो।"

राज समझ गया कि डॉली को उसकी बातों का यकीन नहीं आया। वो समझ रही है कि सर पर सख्त चोट लगने की वजह से वो ऐसी बेपर की बातें कर रहा है। और वाकई राज खुद भी हैरान था। यह मामला ही कुछ ऐसा था कि इस पर कोई यकीन नहीं कर सकता था। भला यह कैसे हो सकता था कि छः महीने....छः लम्बे महीनों का वक्त.....करीब एक सौ अस्सी दिन यों गायब हो जाएं। पच्चीस दिसम्बर के तीन बाद बीस जून कैसे आ सकती है? यह नामुमकिन था.....बिल्कुल नामुमकिन, वो सोच रहा था।

"फिर यह क्या राज है? वो लड़की कौन थी? मैं जख्मी कैसे हो गया था? वह वक्त कहां गुजरा?"

सैकड़ों सवाल उसके जेहन में कुलबुलाने लगे और वो परेशानियों के एक भंवर में घिर गया।
 
डॉक्टर राज को देखने आया तो उसने भी बताई गई डॉली की एक तारीख और महीने वाली बात की पुष्टि कर दी....कि वाकई उस दिन बीस जून सन उन्नीस सौ इक्यानवे था। जब डॉली रात को दवा खिलाकर राज को सुलाने आई तो राज ने उससे पूछा।

"डॉली.....एक बात पूछू?'

"जरूर ।" उसने राज के बराबर बैड पर बैठते हुए कहा।

"क्या सुबह की मेरी बातों से तुमने समझा था कि मैं दिमाग हिल जाने की वजह से ऐसी बातें कर रहा हूं।"

"नहीं। ऐसी बात नहीं है।" उसने जल्दी से कहा, "लेकिन जरूर है कि तारीख और महीने वगैरह के मामले में आपसे गलती हो रही है।"

"अच्छा, यह बताओ।" राज बोला-''जब से मुझे होश आया है, मैंने कोई पागलों जैसी बात की है?"

"नहीं।"

"इसका मतलब है कि मेरा दिमाग बिल्कुल सही हालत में है। यह हकीकत है कि पिछली क्रिसमस की घटना मुझे पूरी तरह याद है। अब अगर उसके बाद वाकई छः महीने का वक्त गुजर चुका है तो मुझे उसके बारे में कुछ भी याद नहीं है।"

"कमाल की बात है।” डॉली ने हैरत से कहा।

"वाकई यह हैरत की बात है।" राज ने डॉली का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, "और मेरे लिए तो यह बहुत यन्त्र्णादायक है। तुम खुद सोचो, छः महीने का लम्बा समय बीत गया और मुझे उसके बारे में कुछ पता नहीं कि मैं उस दौरान कहां और किस हाल में रहा, क्या करता रहा ? मैं जख्मी कैसे हो गया? क्या ये सब बातें रहस्मय नहीं हैं?"

"बहुत ज्यादा रहस्मय हैं।" डॉली ने सिर हिला कर माना-"ऐसी बातें उपन्यासों में मो मैंने पढ़ी हैं और फिल्मों में भी याददाश्त

खो जाने वाले हीरो-हीरोइन देखे हैं। लेकिन हकीकत जिन्दगी में पहली बार यह देखने सुनने का संयोग बना है मेरे लिए।"

" तो तुम समझ सकती हो कि इस वक्त मेरा क्या हाल हो सकता है?" राज बोला, "मुझे पच्चीस दिसम्बर की वो घटना इस तरह याद है जैसे कल की बात हो।"

"क्या घटना थी वो?" डॉली ने उत्सुकता से पूछा।

राज ने थोड़े शब्दों में पूरी कहानी डॉली को सुना दी। सारी कहानी सुनकर उसकी आंखें भी खुली की खुली रह गईं और कुछ सोचते हुए उसने कहा

"आपकी बातें सुनकर मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि उस लड़की रोजी ने किसी खास दवा के जरिये आपको बेहोश कर दिया होगा।

"मेरा भी यही ख्याल है।" राज ने आहिस्ता से कहा,

"लेकिन सवाल यह है कि उसने मुझे बेहोश क्यों किया? मैंने उसे पहली बार देखा था, न ही मेरे पास मोटी रकम थी, न कोई कीमती चीज थी-फिर आखिर उसने मुझे कयों बेहोश किया?

और वो कार-एक्सीडेंट कैसे हुआ जिससे जख्मी होकर मैं यहां आ पहुंचा हूं?"

"ये सारे सवाल रहस्य भरे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सिर में चोट लगने से कई बार याददाश्त खो जाती है। कुछ समय के लिए भी और स्थाई रूप से भी। लेकिन आपने कहा है कि पच्चीस दिसम्बर को आपके सिर पर कोई चोट नहीं लगी थी। फिर भी आपकी याददाश्त को क्या हुआ? क्यों आपकी पिछले

छः महीने की बातें नहीं याद हैं? यह एक पहेली है।"

अचानक राज को डाक्टर जेम्स का ख्याल आया और उसने डॉली से पूछा

"क्या मेरी बेहोशी के दौरान कोई शख्स मुझे देखने आया था।"

"हां।” डॉली ने जवाब दिया, "एक सुन्दर औरत और एक मर्द आपको देखने आए थे। हॉस्पिटल के सारे खर्चे वही लोग उठा रहे हैं। वो आपको अपना दोस्त कह रहे थे।"

राज को और भी हैरत हुई। एक खूबसूरत औरत और मर्द, ये दोनों कौन थे? उसने सोचा।

"क्या उन लोगों ने अपने नाम आपको बताए थे?" राज ने पूछा।

"जी हां।" डॉली ने बड़े सहज भाव से कहा, "महिला का नाम मिसेज ज्योति था और पुरुष का नाम जय वर्मा।"

"क्या?" राज के मुंह से चीख निकल गई और आंखें हैरत से फटी-की-फटी रह गईं। उसके रोंगटे खड़े हो गये और जिस्म में सनसनी की लहर दौड़ गई। डॉली ने जो कहा था, वो सरासर नामुमकिन था।

'भला यह कैसे हो सकता था है कि जो शख्स मेरा जानी दुश्मन हो और कई बार मुझे मार डालने की कोशिश कर चुका हो, वहीं शख्स मेरा दोस्त बनकर पानी की तरह मेरे इलाज पर रूपया खर्च कर रहा हो?' उसने सोचा-'यह बिल्कुल नामुमकिन है! उन्हें तो मेरी मौजूदगी में खुद को छुपाए रखना चाहिए था। इसके विपरीत वो मेरे दोस्त बनकर मुझ पर अहसान कर रहे हैं.....।'

एक बार राज के दिमाग में यह भी आया कि हो सकता है यह हस्पताल ही रहस्यमय हो? कहीं यह नर्स डॉली ही तो उसे धोखा नहीं दे रही? लेकिन फिर उसने सोचा कि उस बेचारी को उसके साथ धोखा करने से क्या फायदा? अब तो तीन दिन पहले उसके साथा धोखा करने से क्या फायदा? अब से तीन दिन पहले तक तो वो उसे जानती तक नहीं थी।

फिर, यह सब क्या था? क्या पहेली थी यह? यह ऐसे सवाल थे जो राज की समझ से बाहर थे। डॉली परेशानी की हालत में राज की समझ से बाहर थे। डॉली परेशानी की हालत में राज के रंग बदलते चेहरे को देख रही थी। फिर वो बोली

" क्या बात है, अपने दोस्तों को जिक्र सुनकर आप परेशान क्यों हो गए हैं?"

"क्योंकि वो दोनों मेरे दोस्त नहीं हैं।" राज ने उसके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए कहा।

"क्या मतलब?" डॉली ने हैरत से पूछा।

"मतलब यह कि वो दोनों मेरे दोस्त नहीं हैं, बल्कि दुश्मन है।"

" ऐसा कैसे हो सकता है?” उसने ताज्जुब से पूछा।

"यही तो मैं सोच रहा हूं कि ऐसा कैसे हो सकता है?"

"मेरे ख्याल में अब सोचना बंद करके आपकी सो जाना चाहिए, ग्यारह बज चुके हैं।"

"इस हालत में नींद कैसे आ सकती है?" राज ने बेचैनी से पहलू बदल।

"ठहरिये, मैं एक खुराक नींद की दवा पिला देती हूं।" डॉली ने कहा और अलमारी में सेस शीशी निकालकर नींद की दवा की एक खुराक राज को पिला दी। फिर उसके बराबर बैठी हुई उसका सिर दबाती रही। यहां तक कि राज को नींद आ गई।
 
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