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1स्ट साधु—असली मैं हूँ...तू ढोंगी है
2न्ड साधु—ठहर जा..अभी बताता हूँ...ढोंगी तू है और मुझे बोलता है...अभी तेरा सिर फोड़ दूँगा मैं
1स्ट साधु—तू ढोंगी है...मैं तेरी दाढ़ी मे आग लगा दूँगा.
2न्ड साधु—राज..इसने ही वो तिलिस्मि किताब चुराई है जिससे तुम ये तिलिस्म ना तोड़ सको..ये अकेले हड़पना चाहता है
1स्ट साधु—ढोंगी...मेरा भेष बना के राज को धोखा दे रहा है...किताब तूने चुराई है.
दोनो के दोनो एक बार फिर से गुत्थम गुत्था हो गये...एक दूसरे के बालो को पकड़ के खिचने लगे...और नोचने खसोटने लगे नखुनो से.
राज—आप दोनो शांत हो जाइए...ये तो निश्चित है कि आप दोनो मे से एक नकली साधु है...
1स्ट साधु—मैं असली हूँ…ये नकली है.
2न्ड साधु—ये नकली है...असली मैं हूँ
राज—आप दोनो चिंता ना करे...मैं अभी ये साबित कर देता हूँ कि असली कौन है और नकली कौन..... ?
परिधि—कैसे साबित करोगे राज.... ?
राज—मेरे पास एक ऐसी दवाई है जिसके खाते ही लोग सच बोलने लगते हैं....मैं आप दोनो को वो दवा देता हूँ जिसे आप दोनो के खाते ही कौन असली है और कौन नकली खुद ही मालूम चल जाएगा.
नेहा—राज्ज्ज...ये क्याअ... ? दोनो साधु कहाँ गये देखते देखते... ?
राज—ये क्या...दोनो साधु भाग गये.... ? दोनो मे से जो नकली था, उसका भागने का मतलब तो समझ मे आता है लेकिन असली वाला साधु क्यो भाग गया... ? ज़रूर बहुत बड़ा मामला है ये..कुछ सोचना पड़ेगा.
पायल—मुझे तो दोनो के दोनो ही पागल लगते हैं...ये हमे गोल गोल घुमाए जा रहे हैं.
परिधि—अब यहाँ से कैसे निकलेंगे राज…?
राज—सोचने दो दीदी मुझे थोड़ा...
मैने इन सब बातो के विषय मे सोचते हुए अपनी आँखे बंद कर ली और इस तिलिस्म मे प्रवेश करने से लेकर यहाँ तक के सफ़र का बारीकी से अवलोकन करने लगा….जो कुछ भी यहा पहुचने तक हुआ हमारे साथ या फिर जो कुछ भी देखा सुना, उन्न सब बातो पर गौर करता गया.
लगभग . मिनिट तक मैं ऐसे ही ध्यान मे मग्न रहा…..अंततः मैने अपनी आँखे खोल ली…लेकिन अब मेरे चेहरे पर परेशानी के बदल छट चुके थे और एक सुकून आ गया था मेरे चेहरे मे.
पायल—ऐसे शांत क्यो है राज…? कुछ बता ना..क्या करे अब….?
राज—जब भी कोई . होता है इस कमरे से ही शुरू होता है….हम अभी तक उस कमरे मे क्या है, नही जानते…. किंतु सारा .
इस कमरे से ही जुड़ा हुआ लग रहा है.
नेहा—तो तेरे कहने का मतलब है कि हमे इस कमरे के अंदर जाना चाहिए... !
राज—हां…मुझे लगता है कि यही से हमे यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा.
पायल—लेकिन हम तो यहाँ से पहले भी बाहर निकल चुके थे ना...उस दरिया को पार करके.....फिर से वैसे ही पार कर के निकल जाएँगे.
दरिया फिर से पार करने का सुन कर नेहा चाची और नानी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी....सब कुछ जैसे फिर से उनकी आँखो के सामने उनके साथ होता हुआ वही सब नज़र आने लगा....जिससे दोनो के चेहरे मारे शरम से झुक गये.
राज (मज़ाक मे)—क्यो चाची फिर से दरिया पार कर के चले.... ? क्यो नानी आप बताओ.... ?
नेहा (धीरे से)—राज....क्या कोई और दूसरा रास्ता नही है..... ?
नानी—नही..नही...मैं कमरे के अंदर चलने को तैयार हूँ.
राज (मुश्कुरा कर)—ठीक है..सब आओ अंदर
मेरे पीछे पीछे सभी उस कमरे मे आ गये जिसमे वो साधु जाता था…..लेकिन ये क्या हम जैसे ही कमरे के अंदर . हुए वैसे ही दरवाजा बंद हो गया.
कमरे मे हर तरफ घना अंधेरा पसरा हुआ था….कोई भी नज़र नही आ रहा था…कोई भी नज़र आने की बात तो बहुत दूर अपना खुद का
हाथ तक नही दिखाई दे रहा था उस अंधकार मे.
परिधि—राज..कहाँ हो…? आआआआ
पायल—राज..कुछ नही दिख रहा…आआआ…मेरे पैर….राज्ज्जज्ज्ज…?
नेहा—आआआअ…राज्ज्ज…मेरे पैर….
नानी—आआआअ…राज्ज्ज...
राज—सब एक दूसरे का हाथ पकड़ लो
परिधि—राज्ज्जज्ज्ज्ज्ज्ज….आआआआआअ
एक बार फिर से हम उसी कमरे मे फँस गये जहाँ पर पहले उलझ गये थे और हमारे पैरो मे ज़ंजीर पड़ गयी थी….अभी भी ठीक वैसा ही हो रहा था..सभी के दोनो पैरो को ज़ंजीर ने जकड़ा हुआ था और उनको विपरीत दिशा मे उनके दोनो पैरो को फैलाते हुए अपनी अपनी तरफ खिचे जा रहे थे.
वहाँ उन सभी की दर्द मे डूबी चीखे गूंजने लगी…ये सुन कर मैने सोच लिया कि अगर जल्दी ही कुछ नही किया गया तो इनमे से कोई भी ज़्यादा देर तक जिंदा नही रह पाएँगी.
ये सोच कर मैने झुक कर दोनो हाथ से अपने दोनो पैरो की ज़ंजीरो को पकड़ लिया और तेज़ी से एक दिशा मे जंप करते हुए कूद गया.
अगले ही पल वहाँ पूरे कमरे मे रोशनी फैल गयी…….सभी दर्द मे चिल्लाते हुए मेरी तरफ घूम गयी…तो चौंक गयी क्यों कि मैने किसी को अपनी बाहों मे दबोचा हुआ था.
पायल (शॉक्ड)—कंगनाआआ…..? आआआआ
ये कंगना ही थी जिसको मैने दबोच रखा था……उसको उजाले मे मेरी बाहों मे देख सभी हैरान हो गये लेकिन अगले ही पल सब के कानो मे
भयानक आवाज़ पड़ते ही सब डर से काँपते हुए जैसे ही सामने की ओर देखा तो सभी की चीख निकल गयी.
एक तरफ शेर और एक तरफ से वो भेड़िया लोहे की उन मोटी मोटी ज़ंजीरो को अपनी तरफ तेज़ी से . और दहाड़ते हुए खीच रहे थे….लेकिन मेरी ज़ंजीर वो नही खिच पा रहे थे, पूरी ताक़त लगाने के बावजूद भी.
पायल—राज्ज्जज्ज्ज्ज्ज
मैने एक हाथ से पकड़ के ज़ोर का झटका लगा कर अपने पैरो से उन ज़ंजीरो को तोड़ दिया लेकिन वो अगले ही पल फिर से पता नही कहाँ से आकर मेरे पैरो से लिपट गयी.
नेहा—राज्ज्जज्ज….
नानी—मररर गाइिईईईईईईई
मैने एक बार फिर से एक हाथ से कंगना को दबोचे हुए दूसरे हाथ से उन ज़ंजीरो को तोड़ दिया…..इससे पहले कि वो मेरे पैरो को फिर से जकड पाती मैने कंगना को उन ज़ंजीरो के हवाले कर दिया.
ज़ंजीरो ने कंगना को लपेट लिया…लेकिन मेरे पीछे दूसरी ज़ंजीर बढ़ने लगी..ये देख मैं वहाँ से जंप कर गया और सीधा परिधि दीदी के पास पहुच गया.
राज—मैं जैसे ही ज़ंजीर तोड़ू…आप तुरंत मेरे कंधे पर बैठ जाना….सब लोग दरिया पार करने वाली पोज़िशन मे बैठ जाना.
मैने जैसे ही परिधि दीदी की ज़ंजीरो को पकड़ के तोड़ा..तो वो मेरे एक कंधे पर बैठ गयी..लेकिन तब तक मेरे पैरो मे ज़ंजीर फँस चुकी थी.
मैं फिर अपनी ज़ंजीर तोड़ कर पायल दीदी के पास पहुच गया और उन्हे आज़ाद कर के अपने दूसरे कंधे पर बिठा लिया…ऐसे ही मेरे पैरो को ज़ंजीर जकड़ती रही और मैं उसको तोड़ कर नेहा चाची को पीठ मे और नानी को सामने से कमर मे चिपका लिया.
मेरे पैरो मे फिर से ज़ंजीर फँस चुकी थी और दोनो तरफ से भेड़िया और वो शेर उसको खिच रहे थे लेकिन मैं हर बार उन्हे तोड़ते हुए आगे उनकी तरफ बढ़ने लगा.
ये देख कर दोनो गुस्से से मेरी ओर झपट पड़े…मैं तो पहले से ही . था ..उनके इस हमले के लिए..जैसे ही दोनो ने मेरे उपर हमला किया मैने एक एक पंच दोनो के जबड़ो पर रख दिया कस के.
अगले ही पल दोनो ज़मीन पर जा गिरे…दूसरा हमला करने की उनमे हिम्मत नही थी..मैने पायल दीदी की कुल्हाड़ी लेकर जैसे ही शेर की गर्दन काटनी चाही तो वो उसी साधु मे बदल गया…हम सब हैरान होकर देखने लगे और जैसे ही भेड़िया को मारने गया तो वो भी साधु मे बदल गया.
पायल—राज…मार दो इस साधु को…ये दोनो के दोनो ढोंगी हैं.
मैने दोनो की गर्दन एक झटके मे उड़ा दी…..लेकिन ये क्या दोनो के मरते ही उनकी बॉडी वहाँ से गायब हो गयी_और उनकी बॉडी की जगह पर दो किताबें रोशनी बिखेरती हुई नज़र आने लगी.
मैने दोनो किताबो को उठा कर पायल दीदी को पकड़ा दिया…जैसे ही कंगना की तरफ मुड़ा तो एक बार फिर झटका लगा, क्योंकि अब वहाँ कंगना थी ही नही बल्कि उसकी जगह पर एक सुनहरे रंग की एक चाबी थी.
मैने जैसे ही उस चाबी को उठाया तो अगले ही पल वहाँ से सब कुछ गायब हो गया…और अब हमारे सामने वही भूतहा__क़िला था यानी की मौत का घर._
पायल—ये क्या…हम यहाँ कैसे पहुच गये….?
नेहा—वो दरिया कहाँ गया….?
राज—वो दरिया अब नही आएगा और ना ही वो साधु.
परिधि—पहले भी तो वो यहाँ आ गये थे…?
राज—क्यों कि पहले वो ज़ंजीर वाला तिलिस्म टूटा नही था ना, इसलिए…पर अब वो तिलिस्म टूट चुका है…बाकी सब बाद मे डीटेल मे
बताउन्गा….अभी आगे के सफ़र के लिए तैयार हो जाओ.
मैने उस दरवाजे को धक्का देकर खोल दिया जिसके उपर मौत का घर लिखा हुआ था और अंदर घुस गया..सभी अभी भी मेरे उपर ही टँगे
हुए थे. मैने सब को नीचे उतारा और आगे चलने लगे.
. ना जाने कितने कमरे बने हुए थे…जो ख़तम ही नही हो रहे थे..अभी तक हमे कोई परेशानी यहाँ पेश नही आई थी लेकिन क्या पता
आगे कौन सा ख़तरा हमारा इंतज़ार कर रहा हो.
2न्ड साधु—ठहर जा..अभी बताता हूँ...ढोंगी तू है और मुझे बोलता है...अभी तेरा सिर फोड़ दूँगा मैं
1स्ट साधु—तू ढोंगी है...मैं तेरी दाढ़ी मे आग लगा दूँगा.
2न्ड साधु—राज..इसने ही वो तिलिस्मि किताब चुराई है जिससे तुम ये तिलिस्म ना तोड़ सको..ये अकेले हड़पना चाहता है
1स्ट साधु—ढोंगी...मेरा भेष बना के राज को धोखा दे रहा है...किताब तूने चुराई है.
दोनो के दोनो एक बार फिर से गुत्थम गुत्था हो गये...एक दूसरे के बालो को पकड़ के खिचने लगे...और नोचने खसोटने लगे नखुनो से.
राज—आप दोनो शांत हो जाइए...ये तो निश्चित है कि आप दोनो मे से एक नकली साधु है...
1स्ट साधु—मैं असली हूँ…ये नकली है.
2न्ड साधु—ये नकली है...असली मैं हूँ
राज—आप दोनो चिंता ना करे...मैं अभी ये साबित कर देता हूँ कि असली कौन है और नकली कौन..... ?
परिधि—कैसे साबित करोगे राज.... ?
राज—मेरे पास एक ऐसी दवाई है जिसके खाते ही लोग सच बोलने लगते हैं....मैं आप दोनो को वो दवा देता हूँ जिसे आप दोनो के खाते ही कौन असली है और कौन नकली खुद ही मालूम चल जाएगा.
नेहा—राज्ज्ज...ये क्याअ... ? दोनो साधु कहाँ गये देखते देखते... ?
राज—ये क्या...दोनो साधु भाग गये.... ? दोनो मे से जो नकली था, उसका भागने का मतलब तो समझ मे आता है लेकिन असली वाला साधु क्यो भाग गया... ? ज़रूर बहुत बड़ा मामला है ये..कुछ सोचना पड़ेगा.
पायल—मुझे तो दोनो के दोनो ही पागल लगते हैं...ये हमे गोल गोल घुमाए जा रहे हैं.
परिधि—अब यहाँ से कैसे निकलेंगे राज…?
राज—सोचने दो दीदी मुझे थोड़ा...
मैने इन सब बातो के विषय मे सोचते हुए अपनी आँखे बंद कर ली और इस तिलिस्म मे प्रवेश करने से लेकर यहाँ तक के सफ़र का बारीकी से अवलोकन करने लगा….जो कुछ भी यहा पहुचने तक हुआ हमारे साथ या फिर जो कुछ भी देखा सुना, उन्न सब बातो पर गौर करता गया.
लगभग . मिनिट तक मैं ऐसे ही ध्यान मे मग्न रहा…..अंततः मैने अपनी आँखे खोल ली…लेकिन अब मेरे चेहरे पर परेशानी के बदल छट चुके थे और एक सुकून आ गया था मेरे चेहरे मे.
पायल—ऐसे शांत क्यो है राज…? कुछ बता ना..क्या करे अब….?
राज—जब भी कोई . होता है इस कमरे से ही शुरू होता है….हम अभी तक उस कमरे मे क्या है, नही जानते…. किंतु सारा .
इस कमरे से ही जुड़ा हुआ लग रहा है.
नेहा—तो तेरे कहने का मतलब है कि हमे इस कमरे के अंदर जाना चाहिए... !
राज—हां…मुझे लगता है कि यही से हमे यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा.
पायल—लेकिन हम तो यहाँ से पहले भी बाहर निकल चुके थे ना...उस दरिया को पार करके.....फिर से वैसे ही पार कर के निकल जाएँगे.
दरिया फिर से पार करने का सुन कर नेहा चाची और नानी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी....सब कुछ जैसे फिर से उनकी आँखो के सामने उनके साथ होता हुआ वही सब नज़र आने लगा....जिससे दोनो के चेहरे मारे शरम से झुक गये.
राज (मज़ाक मे)—क्यो चाची फिर से दरिया पार कर के चले.... ? क्यो नानी आप बताओ.... ?
नेहा (धीरे से)—राज....क्या कोई और दूसरा रास्ता नही है..... ?
नानी—नही..नही...मैं कमरे के अंदर चलने को तैयार हूँ.
राज (मुश्कुरा कर)—ठीक है..सब आओ अंदर
मेरे पीछे पीछे सभी उस कमरे मे आ गये जिसमे वो साधु जाता था…..लेकिन ये क्या हम जैसे ही कमरे के अंदर . हुए वैसे ही दरवाजा बंद हो गया.
कमरे मे हर तरफ घना अंधेरा पसरा हुआ था….कोई भी नज़र नही आ रहा था…कोई भी नज़र आने की बात तो बहुत दूर अपना खुद का
हाथ तक नही दिखाई दे रहा था उस अंधकार मे.
परिधि—राज..कहाँ हो…? आआआआ
पायल—राज..कुछ नही दिख रहा…आआआ…मेरे पैर….राज्ज्जज्ज्ज…?
नेहा—आआआअ…राज्ज्ज…मेरे पैर….
नानी—आआआअ…राज्ज्ज...
राज—सब एक दूसरे का हाथ पकड़ लो
परिधि—राज्ज्जज्ज्ज्ज्ज्ज….आआआआआअ
एक बार फिर से हम उसी कमरे मे फँस गये जहाँ पर पहले उलझ गये थे और हमारे पैरो मे ज़ंजीर पड़ गयी थी….अभी भी ठीक वैसा ही हो रहा था..सभी के दोनो पैरो को ज़ंजीर ने जकड़ा हुआ था और उनको विपरीत दिशा मे उनके दोनो पैरो को फैलाते हुए अपनी अपनी तरफ खिचे जा रहे थे.
वहाँ उन सभी की दर्द मे डूबी चीखे गूंजने लगी…ये सुन कर मैने सोच लिया कि अगर जल्दी ही कुछ नही किया गया तो इनमे से कोई भी ज़्यादा देर तक जिंदा नही रह पाएँगी.
ये सोच कर मैने झुक कर दोनो हाथ से अपने दोनो पैरो की ज़ंजीरो को पकड़ लिया और तेज़ी से एक दिशा मे जंप करते हुए कूद गया.
अगले ही पल वहाँ पूरे कमरे मे रोशनी फैल गयी…….सभी दर्द मे चिल्लाते हुए मेरी तरफ घूम गयी…तो चौंक गयी क्यों कि मैने किसी को अपनी बाहों मे दबोचा हुआ था.
पायल (शॉक्ड)—कंगनाआआ…..? आआआआ
ये कंगना ही थी जिसको मैने दबोच रखा था……उसको उजाले मे मेरी बाहों मे देख सभी हैरान हो गये लेकिन अगले ही पल सब के कानो मे
भयानक आवाज़ पड़ते ही सब डर से काँपते हुए जैसे ही सामने की ओर देखा तो सभी की चीख निकल गयी.
एक तरफ शेर और एक तरफ से वो भेड़िया लोहे की उन मोटी मोटी ज़ंजीरो को अपनी तरफ तेज़ी से . और दहाड़ते हुए खीच रहे थे….लेकिन मेरी ज़ंजीर वो नही खिच पा रहे थे, पूरी ताक़त लगाने के बावजूद भी.
पायल—राज्ज्जज्ज्ज्ज्ज
मैने एक हाथ से पकड़ के ज़ोर का झटका लगा कर अपने पैरो से उन ज़ंजीरो को तोड़ दिया लेकिन वो अगले ही पल फिर से पता नही कहाँ से आकर मेरे पैरो से लिपट गयी.
नेहा—राज्ज्जज्ज….
नानी—मररर गाइिईईईईईईई
मैने एक बार फिर से एक हाथ से कंगना को दबोचे हुए दूसरे हाथ से उन ज़ंजीरो को तोड़ दिया…..इससे पहले कि वो मेरे पैरो को फिर से जकड पाती मैने कंगना को उन ज़ंजीरो के हवाले कर दिया.
ज़ंजीरो ने कंगना को लपेट लिया…लेकिन मेरे पीछे दूसरी ज़ंजीर बढ़ने लगी..ये देख मैं वहाँ से जंप कर गया और सीधा परिधि दीदी के पास पहुच गया.
राज—मैं जैसे ही ज़ंजीर तोड़ू…आप तुरंत मेरे कंधे पर बैठ जाना….सब लोग दरिया पार करने वाली पोज़िशन मे बैठ जाना.
मैने जैसे ही परिधि दीदी की ज़ंजीरो को पकड़ के तोड़ा..तो वो मेरे एक कंधे पर बैठ गयी..लेकिन तब तक मेरे पैरो मे ज़ंजीर फँस चुकी थी.
मैं फिर अपनी ज़ंजीर तोड़ कर पायल दीदी के पास पहुच गया और उन्हे आज़ाद कर के अपने दूसरे कंधे पर बिठा लिया…ऐसे ही मेरे पैरो को ज़ंजीर जकड़ती रही और मैं उसको तोड़ कर नेहा चाची को पीठ मे और नानी को सामने से कमर मे चिपका लिया.
मेरे पैरो मे फिर से ज़ंजीर फँस चुकी थी और दोनो तरफ से भेड़िया और वो शेर उसको खिच रहे थे लेकिन मैं हर बार उन्हे तोड़ते हुए आगे उनकी तरफ बढ़ने लगा.
ये देख कर दोनो गुस्से से मेरी ओर झपट पड़े…मैं तो पहले से ही . था ..उनके इस हमले के लिए..जैसे ही दोनो ने मेरे उपर हमला किया मैने एक एक पंच दोनो के जबड़ो पर रख दिया कस के.
अगले ही पल दोनो ज़मीन पर जा गिरे…दूसरा हमला करने की उनमे हिम्मत नही थी..मैने पायल दीदी की कुल्हाड़ी लेकर जैसे ही शेर की गर्दन काटनी चाही तो वो उसी साधु मे बदल गया…हम सब हैरान होकर देखने लगे और जैसे ही भेड़िया को मारने गया तो वो भी साधु मे बदल गया.
पायल—राज…मार दो इस साधु को…ये दोनो के दोनो ढोंगी हैं.
मैने दोनो की गर्दन एक झटके मे उड़ा दी…..लेकिन ये क्या दोनो के मरते ही उनकी बॉडी वहाँ से गायब हो गयी_और उनकी बॉडी की जगह पर दो किताबें रोशनी बिखेरती हुई नज़र आने लगी.
मैने दोनो किताबो को उठा कर पायल दीदी को पकड़ा दिया…जैसे ही कंगना की तरफ मुड़ा तो एक बार फिर झटका लगा, क्योंकि अब वहाँ कंगना थी ही नही बल्कि उसकी जगह पर एक सुनहरे रंग की एक चाबी थी.
मैने जैसे ही उस चाबी को उठाया तो अगले ही पल वहाँ से सब कुछ गायब हो गया…और अब हमारे सामने वही भूतहा__क़िला था यानी की मौत का घर._
पायल—ये क्या…हम यहाँ कैसे पहुच गये….?
नेहा—वो दरिया कहाँ गया….?
राज—वो दरिया अब नही आएगा और ना ही वो साधु.
परिधि—पहले भी तो वो यहाँ आ गये थे…?
राज—क्यों कि पहले वो ज़ंजीर वाला तिलिस्म टूटा नही था ना, इसलिए…पर अब वो तिलिस्म टूट चुका है…बाकी सब बाद मे डीटेल मे
बताउन्गा….अभी आगे के सफ़र के लिए तैयार हो जाओ.
मैने उस दरवाजे को धक्का देकर खोल दिया जिसके उपर मौत का घर लिखा हुआ था और अंदर घुस गया..सभी अभी भी मेरे उपर ही टँगे
हुए थे. मैने सब को नीचे उतारा और आगे चलने लगे.
. ना जाने कितने कमरे बने हुए थे…जो ख़तम ही नही हो रहे थे..अभी तक हमे कोई परेशानी यहाँ पेश नही आई थी लेकिन क्या पता
आगे कौन सा ख़तरा हमारा इंतज़ार कर रहा हो.