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Incest अनैतिक संबंध

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मेरा मुँह अपने आप ही आशु की योनी पर झुकता चला गया और जोश आते ही मैंने अपने मुँह को जितना खोल सकता था उतना खोल कर आशु की योनी को अपने मुँह से ढक दिया. जीभ सरसराती हुई अंदर चली गई और आशु के योनी में लपलपाने लगी. इतने भर से ही आशु की योनी ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और उसने मेरे कमीज के कॉलर को पकड़ के ऊपर खींच लिया. अब मैंने तो अभी भी पैंट पहनी थी पर आशु इतनी बेसब्री थी की उसने पैंट की ज़िप खोली और मेरे लिंग को टटोलने लगी. लिंग पकड़ में आते ही उसने उसे बाहर निकाला और अपनी योनी के मुख से भिड़ा दिया. आशु के योनी का पानी बहके मेरे लिंग के सुपाडे से टच हुआ था मेरे जिस्म में झुरझुरी छूट गई. मैंने पूरी ताक़त से एक झटका मारा और लिंग फिसलता हुआ और चीरता हुआ आशु के योनी में पहुँच गया."माँ...आ..आ..आ..आ ..आ..आ...आ..मम...आह....हह..हहा...आय....!!" आशु के मुँह से जोरदार चीख निकली और उसने अपने दाँत मेरे कंधे पर गड़ा दिए! तब जा कर मुझे आशु के दर्द का एहसास हुआ. आशु के दाँत अब भी मेरे कंधे पर गड़े हुए थे और मैं बिना हिले-डुले ही उसपर पड़ा रहा. पॉंच मिनट तक हम दोनों इस तरह बिना हिले-डुले पड़े रहे, फिर धीरे-धीरे आशु ने अपने दाँत मेरे कंधे पर से हटाये और नीचे से उसने अपनी योनी को सिकोड़ा. ये मेरे लिए जय था. मैंने धीरे-धीरे लिंग अंदर-बाहर करना शुरू किया और अगले दो मिनट में ही मेरी स्पीड बढ गई और आशु फिर से झड़ गई! उसके झंडने से मेरे लिंग की स्पीड और भी ज्यादा बढ़ गई. पर आशु ने मुझे रोकना चाहा और मेरी छाती पर दबाव दे कर मुझे खुद से दूर करने लगी. पर मैं फिर भी लगा रहा, शायद आशु से ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उसने मुझे बहुत जोर से झटका दे कर खुद से अलग कर दिया. मुझे उसके इस बर्ताव से बड़ी खीज हुई और मैं उसके ऊपर से हट गया और दूर जा कर खड़ा हो गया.मेरी सांसें तेज थी और गुस्से से चेहरा तमतमा रहा था. आशु की नजर मुझ पर पड़ी तो वो शर्मा गई और दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी रही.

दरअसल आशु के जल्दी छूट जाने से और मुझे बीच मजधार में छोड़ देने से मैं बहुत गुस्से में था.

मेरा गुस्सा अब बेकाबू होने लगा था और मुझे कैसे भी शांत करना था. मैंने अपनी कमीज, पैंट सब उतार फेंकी, नंगा बाथरूम में घुस गया और शावर चला कर उसके नीचे खड़ा हो गया.पानी की ठंडी-ठंडी बूँदें सर पर पड़ीं तो गुस्सा थोड़ा कम हुआ और लिंग 'बेचारा' सिकुड़ कर बैठ गया.दस मिनट तक मैं शावर के नीचे आँखें मूंदें खड़ा रहा, पर गुस्सा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. बदन का पानी पोंछ कर जब बाहर निकला तो सामने आशु सर झुकाये खड़ी थी. मैं उसके बगल से निकल गया और अपने कपडे पहनने लगा. आशु पीछे से आई और मुझे अपनी बाहों में भर कर बोली; "सॉरी!" मैंने उसके हाथ अपने जिस्म से अलग किये और बोला; "क्यों मेरे जिस्म में आग लगा रही है, जब उसे बुझा नहीं सकती! मैंने तो नहीं कहा था न की आके मेरे से चिपक जा?" मैंने बड़े रूखे तरीके से उसे दुत्कारा.आशु ने सर झुकाये हुए ही अपने कान पकडे और फिर से सॉरी बोला. मैंने आगे कुछ नहीं बोला और आशु का बैग उठाया और उसे रेडी होने को कहा पर वो वहाँ से हिली ही नही. "सॉरी जानू! आज के बाद कभी ऐसा नहीं करुँगी!" आशु ने फिर से कान पकड़ते हुए कहा. अब तक जिस गुस्से को मैंने रोक रखा था वो आखिर फुट ही पड़ा;

"क्या दुबारा नहीं करुँगी? हाँ? बोल??? कल रात को मना किया था न मैंने? बोला था ना की हम मॅडम के घर पर हैं, पर तुझे चैन नहीं था! आखिर मुझे क्या मिला? तू तो जा कर सो गई और मैं बाथरूम में जा कर हस्तमैथुन कर के सो गया.अभी भी, मैंने तुझे छुआ तक नहीं और तू ही आ कर मुझसे चिपकी थी ना? तेरी तो जिस्म की आग बुझ गई. पर मेरा क्या? अगर मुझे हस्तमैथुन ही करना था तो संभोग क्यों? अगर तुझे कोई बिमारी होती तो मैं फिर भी समझता, ये तो तेरा उतावलापन है जिसके कारन प्यासा मैं रह जाता हु. उस दिन तो बड़े गर्व से कह रही थी की डॉक्टर ने ये सिखाया है, वो सिखाया है अब क्या हुआ उस सब का? कितने महीनों से कर रहे हैं हम ये? बोल??? ६ महीने से!!! और इन ६ महिनों में कितनी बार संभोग देखा तूने मेरे फ़ोन में? उससे कुछ नहीं सीखा? और तेरी वो दोस्त निशा जो तुझे अपने संभोग के किस्से बड़ी डिटेल में बताया करती थी? उससे कभी कुछ नहीं सीखा तूने?

आशु सर झुकाये सब सुनती रही और फिर आकर मेरे सीने से लग गई. उसकी आँखें छलछला गईं और मेरे अंदर जो गुस्सा था वो अब शांत हो गया.मैंने उसे अब भी नहीं छुआ था और मैं उससे कुछ बोलता उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया.मैंने आशु को खुद से अलग किया और फ़ोन उठाया.

आशु ने अपने कपडे बदले और मेरी फ़ोन पर बात खत्म होने तक वो फिर से सर झुकाये खड़ी हो गई. बात कर के मैंने आशु को उसके हॉस्टल छोड़ा और मैं वापस ऑफिस आगया.मुझे ऑफिस में देखते ही मैडम का पारा चढ़ गया और वो बॉस पर बरस पड़ी; "मैंने राज जी को छुट्टी दी थी फिर क्यों बुलाया उन्हें?" ये सुन कर बॉस एक दम से उनका चेहरा देखने लगा. मैं उस समय बॉस के साइन कराने खड़ा था और मैं भी थोड़ा हैरान था. सर इससे पहले की मैडम पर बरसते मैंने उन्हें अपनी उपस्थिति से अवगत कराते हुए कहा; "मॅडम वो सिलिकॉन ट्रेडर्स की जी. एस. टी. की लास्ट डेट थी!" सर चुप हो गए बस मैडम को घूर के देखने लगे. मैंने जल्दी से फ़ोन निकाला और मैडम को कॉल मिला कर फ़ोन वापस जेब में डाल लिया. मैडम का फ़ोन बजा और उन्होंने देख लिया की मेरा ही कॉल है इसलिए बिना कुछ बोले फ़ोन कान से लगा कर बाहर चली गई. कुछ देर बाद मैडम मेरे डेस्क पर आईं और सामने बैठ गईं और बोलीं; "राज जी आप कहीं और जॉब ढूँढ लो! यहाँ रहोगे तो अपने बॉस की तरह हो जाओगे." मैडम का मूड बहुत ख़राब था तो मैंने उन्हें हँसाने के लिए कहा; "मॅडम फिर तो आपका प्रोजेक्ट अधूरा रह जायेगा और फिर हमारी फ्रेंडशिप का क्या?"

"दूसरी जॉब से हमारी फ्रेंडशिप थोड़े ही खत्म होगी? और रही प्रोजेक्ट की तो जाए चूल्हे में!" मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा.

"इतनी मेहनत की है आपने मॅडम की उसे वेस्ट करना ठीक नही. इस प्रोजेक्ट के बाद मैं कोई और ऑप्शन ढूँढता हु." मैंने मैडम की बात का मान रखते हुए कहा.

"अच्छा एक बात बताओ, अगर मैंने अपनी अलग कंपनी शुरू की तो मुझे ज्वाइन करोगे?" मैडम ने उत्सुकता वश पूछा.

"बिलकुल मॅडम ये भी कोई कहने की बात है?! कम से कम आप सैलरी तो अच्छी दोगे!" मैंने हँसते हुए कहा और मैडम ये सुन कर हँस दी. शाम को मैं निकलने वाला था की आशु का फ़ोन आया; "जानू! अब भी नाराज हो?" आशु ने तुतलाते हुए पूछा. मुझे उसके इस बचपने पर हँसी आ गई. "नहीं" बस इतना बोला की मैडम मुझे आती हुई दिखाई दी. मैंने आशु को कहा की बाद में बात करता हूँ और फ़ोन काट दिया. "राज जी! मुझे मार्केट ड्राप कर दोगे?" मैं फिर से हैरान था और मेरी हैरानी भांपते हुए मैडम बोली; "आपके बॉस गाडी ले गए!" अब ये सुन कर मुझे थोड़ा इत्मीनान हुआ और मैडम मेरे पीछे एक तरफ दोनों पैर रख कर बैठ गई.

नितु मैडम: वैसे राज जी आप बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?

मैं: जी मॅडम कहिये.

नितु मैडम: आप इतना डरते क्यों हो?

मैं: डरता हूँ? मैं कुछ समझा नहीं मॅडम?

नितु मैडम: अभी मैंने आप से लिफ्ट मांगी तो आप हैरान थे? कल भी जब मैंने आपको बर्थडे विश किया तब भी, डांस करने के समय भी! आपके बॉस से भी जब मैंने कंप्लेंट की कि उन्होंने क्यों आपको आज बुलाया जब कि मैंने आपको छुट्टी दी है तब भी आप बहुत हैरान थे! दोस्ती में तो ये सब चलता है ना?

मैं: मॅडम आप विश्वास नहीं करेंगे पर पिछले कुछ महीनों से मेरे साथ जो कुछ हो रहा है वो मेरे साथ कभी नहीं हुआ. बचपन से मैं बहुत सीधा-साधा लड़का था....

नितु मैडम: (मेरी बात काटते हुए) वो तो अब भी हो.

मैं: शायद! एनी वे... मेरे दोस्त सब लड़के ही रहे हैं और लड़कियों से मेरी फ़ट.... आई मीन डर लगता था. फिर आप मेरे गाँव कि हिस्ट्री तो जानते ही हैं, अब ऐसे में मैंने कभी किसी लड़की से सिवाय किसी काम ...आई मीन वर्क रीलेटेड बात ही की हे. मुझे डर इसलिए लगता है की सर आपकी और मेरी दोस्ती को कभी नहीं समझ सकते. हम रहते ही ऐसे समाज में हैं जहाँ एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते. तो ऐसे में आपका मेरी साइड लेना किसी को सही नहीं लगेगा.

नितु मैडम: तो इसका मतलब हमें सिर्फ वही करना चाहिए जो सब को अच्छा लगे? अपनी ख़ुशी के लिए कुछ भी नहीं?

मैं: मैडम प्लीज मुझे गलत मत समझिये, बट आई फियर फॉर यू! आई डोन्ट वांट टू कौज एनी ट्रबल इन योवर म्यारीड लाइफ.

नितु मैडम: आई कॅन अंडर स्टँड! अँड दॅट इज वेरी स्वीट ऑफ यू! बट आई इंशुअर यू....यू आर नॉट दीं रिजन ….. एनी वे….. उमम्म्म...…. लेट्स ह्याव सम पानी के बताशे!

मैंने बाइक एक चाट वाले के पास रोकी और मैडम और मैंने कंपिट करते हुए पानी के बताशे खाये. विनर मैडम ही निकलीं और हारने की सजा मैडम ने ये रखी की इस रविवार को मैं उन्हें 'टुंडे कबाबी' खीलाऊ. इस तरह हँसते हुए मैं उन्हें बाजार छोड़ कर घर निकल गया.घर पहुँचते ही आशु का फ़ोन आया और उसने पूछा; "पानी के बताशे कैसे लगे?"

ये सुन कर मैं हैरान तू हुआ पर मैंने जवाब ऐसा दिया की आशु और चिढ जाये. "लाजवाब थे! इतना स्वाद तो मुझे आज तक कभी आया ही नहीं!" मेरी ये डबल मीनिंग वाली बात आशु समझ गई. "जानूउउ उउउउउउउउउउउउ!!! मैं आप पर शक़ नहीं कर रही! मैं आप पर खुद से ज्यादा भरोसा करती हु. दरअसल निशा ने आपको मार्किट में बताशे खाते हुए देखा और मुझे फोन कर के चीढाने लगी की तेरा 'बंदा' यहाँ किसी और लड़की के साथ बताशे खा रहा है!" आशु के मुँह से 'बंदा' शब्द सुन कर मुझे बहुत जोर से हँसी आ गई. "क्या हुआ? हँस क्यों रहे हो?" आशु ने थोड़ा हैरान हो कर पूछा. "मैं तुम्हारा 'बंदा' हूँ?" मैंने आशु को छेड़ते हुए पूछा. "वो कॉलेज में बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड को बंदा-बंदी कहते हैं."

"जानता हूँ! मैं भी उसी कॉलेज में पढ़ा हूँ!" मैंने हँसते हुए कहा.

"हाँ...तो ... वो मुझे चीढाने लगी की आप किसी और को घुमा रहे हो! तो ये सुन कर पहले तो मुझे बड़ी हँसी आई फिर मैंने उसे डाँट दिया ये कह कर की मैं अपने प्यार पर पूरा भरोसा करती हु. वो मुझे कभी धोका नहीं दे सकते! तू चुप-चाप अपना काम कर! इतना कह कर मैंने फ़ोन रख दिया."

"अच्छा जी? बहुत भरोसा करते हो मुझ पर?"

"हाँ जी! इतने दिन आपके साथ ऑफिस में काम कर के देख लिया की कैसे आप खुद को सँभालते हो. आजतक आपने कभी राखी या नितु मैडम से कोई गलत तरह की बात नहीं की. हमेशा उनसे अदब से बात करते हो, कल भी पार्टी में आप नशे में थे तब भी आप खुद को संभाले हुए थे. ये आपका मेरे लिए प्यार नहीं तो क्या है? आजतक कभी मुझे राखी ने नहीं कहा की आपने कभी उसे किसी गलत नजर से देखा हो या उस से कोई अभद्र बात कही हो. एक बार आप पर शक़ करने की गलती कर चुकी हूँ पर अब चाहे भगवान् भी आ कर मुझे कह दें की आपने किसी लड़की के साथ कुछ गलत किया है तो भी मैं नहीं सागरँगी." आशु की बात सुन कर मैं समझ गया था की आशु राखी के जरिये मेरा बैकग्राउंड चेक करवा रही थी. ठीक है भाई कर लो जितनी चेकिंग करनी हो आपने!इस तरह वो दिन सिर्फ बात करते हुए निकला. हम मिलते तो रोज थे पर सिर्फ बातें ही होती थीं ना तो आशु मुझे छूने की कोशिश करती और न ही मैं उसे छूता था. मैंने ये सोच कर ही संतोष कर लिया की शादी के बाद आशु को संभोग की अच्छी से 'कोचिंग' दूँगा, उसे सब सिखाऊँगा की कैसे अपने पार्टनर को खुश किया जाता हे.

दिन गुजरते गए और आखिर वो दिन आ गया जब राखी कि शादी थी. शाम को हम सब को जाने का न्योता था और मैंने आशु को लेने और छोड़ने की जिम्मेदारी ली. अब पहले तो उसे लेहंगा-चोली खरीदवाया और अपने लिए मैंने बस एक ब्लैज़र लिया. हॉस्टल वाली आंटी जी ने आशु को थोड़ी ज्यादा छूट दे रखी थी. उसका कारन ये था की आशु हॉस्टल में सिर्फ और सिर्फ अपने काम से काम रखती थी और पढ़ाई में मन लगाती थी. कुछ उन्हें मेरा भी ख़याल था इसलिए आशु ने जब कहा की वो लेट आएगी तो आंटी जी ने मना नहीं किया. उसके हॉस्टल की लड़की आशु से बहुत जलती थी की इतने कम समय में वो आंटी जी की चहेती बन गई. आशु को पिक करने के लिए मैं थोड़ा जल्दी निकला और उसे चौक पर बुला लिया. मैं पहले से ही वहाँ उसका इंतजार कर रहा था. जैसे ही मेरी नजर आशु पर पड़ी मैं उसे बस देखता ही रह गया!
 
वहाँ पर जो कोई भी खड़ा था वो बस आशु को ही ताड़े जा रहा था. "क्या देख रहे हो आप?" आशु ने शर्माते हुए पूछा. "हाय! आज तो क़हर ढा रही हो! दुल्हन से ज्यादा तो लोग तुम्हें ही देखेंगे!" मेरी बात सुन कर आशु के गाल शर्म से लाल हो गए और वो आ कर पीछे बैठ गई और बोली; "आप तैयार क्यों नहीं हुए? ऐसे ही जाने वाले हो क्या?" मैंने सोचा थोड़ा मजाक कर लेता हूँ तो मैंने कह दिया की; "हाँ मैं ऐसे ही जाऊँगा, सैलरी नहीं बची इसलिए अपने लिए कुछ नहीं खरीदा"

"पर आपने तो कहा था की आपने ब्लैज़र लिया है?" आशु ने चौंकते हुए कहा.

"झूठ बोला था वरना तुम लेहंगा-चोली नहीं लेती." अब ये सुन कर आशु को बहुत गुस्सा आया. "गाडी रोको! मुझे नहीं जाना कहीं! वापस छोड़ दो मुझे हॉस्टल!"

"अरे बाबू शांत हो जाओ, मैं मज़ाक कर रहा था. हम अभी घर जा रहे हैं वहाँ मैं चेंज करूँगा तब निकलेंगे." मैंने आशु को प्यार से समझाया. घर पहुँच कर आशु ने अपने लहंगे को थोड़ा नीचे बाँधा जिससे उसका नैवेल दिखने लगा. छरहरा बदन पर उसका अपना ये नैवेल दिखाना आज नजाने कितनो की जान लेने वाला था. अब मैं सबसे पहले नहाने गया, नहा के बाहर सिर्फ कच्छे में आया और अलमारी से अपनी शर्ट निकाली. मुझे ऐसे देख कर आशु ने अपनी ऊँगली दाँतों तले दबा ली और सिसक कर रह गई. मैंने सोचा की अभी जाने में बहुत समय है तो अभी से क्या कपडे पहनने पर आशु जिद्द करने लगी की मुझे अभी पहन के दिखाओ. अब उसकी बात मानते हुए मैंने वाइट शर्ट, पैंट, ब्लैज़र और लोफ़र्स पहन के उसे दिखाया.

मुझे पूरा तैयार देख कर आशु की आँखें फ़ैल गईं; "जानू! मानना पड़ेगा की आप की पसंद कपड़ों के मामले में बहुत बढ़िया हे. आई एम सो लकी टू ह्याव यू एज माई हसबंड!”

"रियली??? वेल शुक्रिया मॅडम मोसेल!” मेरी बात सुन कर आशु शर्मा गई और आ कर मेरे सीने से लग गई. "एक बात कहूँ जानू?" आशु ने मेरे सीने से लगे हुए ही कहा, जवाब में मैंने बस; "हम्म" कहा.

"आज हम दोनों कहीं कैंडल लाइट डिनर करने चलें? उसके बाद शादी में चले जायेंगे." आशु मेरे आँखों में देखते हुए कहा. अब भला मैं अपने प्यार को कैसे मना करता. मैंने फटाफट कैब बुक की और आशु को मैं 'विवांता ताज ' ले आया. ये लखनऊ का सब से बड़ा ५ स्टार रेस्टरंट है, वहाँ की चमक देख कर आशु की आँखें जगमगा उठी. मेरे कॉलेज के दिनों में मैं यहाँ से कई बार गुजरा था और यही सोचता था की शादी होगी तब यहाँ जरूर आऊँगा.एक वेटर हमें हमारे टेबल तक ले जाने को आया. मैं और आशु किसी प्रेमी जोड़े की तरह बाँहों में बाहें डाले चल रहे थे. टेबल पर पहुँच कर मैंने आशु की कुर्सी खींची और फिर उसे बिठाया और फिर मैं उसके ठीक सामने बैठ गया.खुला गार्डन था और वहाँ बहुत सारे टेबल लगे हुए थे, हमारी तरह वहाँ कुछ प्रेमी जोड़े थे और बाकी सब फोरिनर और कुछ अमीर आदमी आये थे. आशु आज पहली बार इतनी महंगी जगह आई थी और उसकी आँखें वहाँ की चकाचौंध में खो गईं और वो सब कुछ देखने लगी. वेटर मेनू ले कर आया पर आशु की आँखें तो अब भी वहाँ के नज़ारे देखने में लगी थी. धीमी-धीमी आवाज में वहाँ म्यूजिक गूँज रहा था. मैंने आशु का हाथ पकड़ा तो उसकी आँखें भर आईं थी. मैं उठ कर खड़ा हुआ और उसे अपने सीने से लगा लिया.

" ... शुक्रिया !!!!" आशु ने रोते-रोते कहा. "बट बेबी व्हाय आर यू क्रायींग?” मैंने उससे पूछा तो आशु ने अपने आँसूँ पोछे और बोली; "मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की मैं कभी ऐसी जगह आ पाऊंगी. ऐसी जगह जहाँ के मेन गेट के अंदर घुसने की भी मेरी औकात नहीं है, वहाँ आप मुझे डिनर के लिए लेके आये हो! शुक्रिया!"

"मेरी जानेमन इससे भी कई ज्यादा कीमती है!"

अगले ही पल मैंने अपनी दायीं टाँग मोड़ी और घुटने को जमीन से टिकाया, बायीं बस मोड़ी और आशु का बयां हाथ अपने बाएं हाथ में लेते हुए उससे पूछा; " मैंने तुम पर बहुत बार चीखा हूँ, चिल्लाया हूँ यहाँ तक की तुम पर हाथ भी उठाया है पर ये सच है की मैं प्यार सिर्फ और सिर्फ तुम्हीं से करता हु. उस दिन जब मैंने तुम्हें पहलीबार दिल से गले लगाया था उसी दिन मैंने तुम्हें अपना दिल दे दिया था. मैं वादा करता हूँ की तुम्हें जिंदगी भर खुश रखूँगा, तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं दूँगा, तुम्हें पलकों पर बिठा कर रखुंगा. (एक लम्बी साँस लेते हुए) विल् यू म्यारी मी???" ये सुन कर आशु की आँखें छलक आईं और उसने हाँ में गर्दन हिलाई और बैठे-बैठे ही मेरे गले लग गई. वहाँ मौजूद सभी लोगों ने तालियाँ बजाई और तब जा कर हम दोनों को होश आया की हम दोनों बाहर आये हे. आशु ने शर्म के मारे अपना मुँह दोनों हाथों से छुपा लिया. तभी वहाँ एक अंकल आये और मुझसे बोले; "कम ऑन मेन लेट्स पुट अ रिंग ऑन हर!”

“बट आई डोन्ट ह्याव एनी रिंग विदमी! आई दिडंट प्लॅन दिस फार!” मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने फ़ौरन वेटर को बुलाया और उसके कान में कुछ खुसफुसाये. उसके बाद आशु से बोले; “मे दीं लव यू शेअर टूडे ग्रो स्ट्रोंगर एज यू ग्रो ओल्ड टूगेदर.” इतने में वही वेटर वापस आ गया और उसने उन्हें एक छोटी सी डिब्बी दी जिसमें एक वाइट सिल्वर की वेडिंग रिंग थी! उन्होंने मुझे वो डिब्बी दे दी और आशु को पहनाने को कहा. मैं और आशु हैरानी से उन्हें देखने लगे; "अ गिफ्ट फॉर दीं ब्युटीफुल कपल.” उन्होंने कहा.

“सॉरी सर, बट आई कान्ट टेक दिस!” मैंने उन्हें मना किया.

“ओह कमऑन डिअर! इट्स जस्ट अ स्मॉल गिफ्ट! टेक इट!” उन्होंने जबरदस्ती करते हुए वो डिब्बी मेरे हाथ में पकड़ा दी.

“नो..नो..सर… आई विल पे यू फॉर दिस!”

वो मुस्कुराने लगे और अपनी जेब में से एक कार्ड निकाला और मुझे दे दिया;"ये लो...जब टाइम हो तब आ कर पैसे दे जाना पर अभी तो ये मोमेंट ख़राब मत करो."

मैंने उनके हाथ से कार्ड ले कर रख लिया और वापस प्रोपोज़ करने का पोज़ बनाया और आशु से पूछा; "विल् यू म्यारी मी?” आशु ने शर्मा कर हाँ कहा और फिर मैंने उसे वो रिंग पहना दी और आशु कस कर मेरे सीने से लग गई. मैंने उसके सर को चूमा और पूरा गार्डन तालियों से गूँज उठा.

अंकल ने फिर से हमें आशीर्वाद दिया और वापस अपने टेबल पर अपने दोस्तों के साथ बैठ कर शराब एन्जॉय करने लगे. आशु बहुत खुश थी और उसकी ये ख़ुशी देख कर मैं भी बहुत खुश था. हमने खाना खाया और फिर मैं उन अंकल को दुबारा शुक्रिया बोल कर निकल आया. अब बारी थी राखी की शादी अटेंड करने की, मैने कैब बुक की और उसके आने तक आशु मुझसे चिपकी खड़ी रही. कैब में जब हम बैठे तो आशु मेरे बाएं कंधे पर सर रख कर बैठ गई और उसी रिंग को देखे जा रही थी. "अब इसे उतार दो, वरना सब पूछेंगे की किसने दी?" मेरी बात सुन कर आशु जैसे अपनी ख्यालों की दुनिया से बाहर आई. "ना! मैंने नहीं उतारने वाली!" उसने मुँह बनाते हुए कहा. "तो सब से क्या कहोगी?" मैंने पूछा. "कह दूँगी मेरे लवर ने दी हे." ये कह कर वो मुस्कुराने लगी. "और जब उस लड़के का नाम पूछेंगे तब?"

"वो सब मैं देख लूँगी! आप उसकी चिंता मत करो." इतना कह कर आशु फिर से उसी रिंग को देखने लगी. मैंने भी सोचा की अपने आप संभालेगी, मैं तो कुछ कह भी नहीं सकता और रायता फैलना है तो फ़ैल ही जाए! जो होगा देख लूँगा! ये सोच कर मैं भी इत्मीनान से बैठ गया.बैंक्वेट हॉल आने लगा तो मैंने आशु से कहा की वो अपना मेक-अप ठीक कर ले, फिर हम दोनों जब कैब से उतरे तो आशु ने फिर से मेरी बाहों में बाहें डाल ली. हम दोनों कपल लग रहे थे और ये अभी के लिए थोड़ा ज्यादा था. मैंने आशु के कान में खुसफुसाते हुए कहा; "जान! यहाँ बॉस भी आएंगे तो थोड़ा सा डिस्टेंस मेन्टेन करो." ये सुन कर आशु ने नकली गुस्सा दिखाया और मेरा हाथ छोड़ दिया. अभी अंदर घुसे भी नहीं थे की मुझे मेरे ऑफिस के कलिग मिल गए और बेशर्मों की तरह आशु को घूरे जा रहे थे. "बॉस और नितु मॅडम आ गये?" मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की वो अंदर हैं इसलिए मैंने आशु को अंदर जाने को कहा. पर उसका मन अंदर जाने को कतई नहीं था. मैंने उसे आँखों से इशारा कर के समझाया की ये लोग मुझे छोड़ने वाले नहीं हैं, तब जा कर आशु मानी. उसके जाते ही सब मेरे ऊपर टूट पड़े, "साले कैसे फँसा लिया तूने?" मैं उनकी सारी बातें बस टालता रहा ये कह की मैंने ऐसा कुछ नहीं किया बस कैब शेयर की थी हमने.पर कमीने तो कमीने ही होते हैं, मैं किसी तरह से उनसे बच के अंदर आ गया.अंदर आ कर देखा तो एक टेबल पर सर, नितु मैडम और आशु बैठे हुए बात कर रहे थे. मुझे देखते ही सर बोल उठे; "तुम दोनों साथ आये हो फिर आगे-पीछे क्यों एंटर हुए? हम क्या बेवक़ूफ़ बैठे हैं यहाँ?"

"सर वो बाहर रस्तोगी जी मिल गए थे उन्होंने रोक लिया. वैसे साथ आने में कैसे शर्म?" इतना कह कर मैं वहीँ बैठ गया पर मन ही मन आशु को कोसने लगा की उसे कोई और जगह नहीं मिली बैठने को?! इधर सर उठ कर कुछ खाने के लिए गए और नितु मैडम को मेरी तारीफ करने का मौका मिल गया; "राज जी! आज तो बहुत हैंडसम लग रहे हो!"

"शुक्रिया मॅडम!" मैंने शर्माते हुए कहा. "आपको तो रोज ऐसे ही रेडी हो कर ऑफिस आना चाहिए." आशु ने मज़ाक करते हुए कहा.

"हाय!! फिर हम दोनों (नितु मैडम और आशु) काम कैसे करेंगे?" नितु मैडम ने ठंडी आह भरते हुए कहा. ये सुन कर हम तीनों हँस पड़े, इतने में सर कुछ खाने को ले आये और सीधा आशु को ऑफर कर दिया. ये देख कर मैं थोड़ा हैरान हुआ पर फिर मैं समझ गया की आज आशु लग ही इतनी सुन्दर रही है की हर एक की नजर सिर्फ उसी पर हे. मैं अपने लिए कुछ खाने के लिए लेने को उठा तो मेरे पीछे-पीछे नितु मैडम भी उठ गई. जब मैंने मैडम को ढंग से सजा-सांवरा देखा तो मैंने भी उनकी तारीफ करते हुए कहा; "वैसे मॅडम यू आर लूकिन फ्याबुलस टूडे! ये सुन कर मैडम भी शर्मा गईं और बोलीं; "उतनी सुंदर तो नहीं जितनी आज डॉली लग रही हे. उसका लेहंगा तुम ने ही सेलेक्ट किया था ना?" मैंने बिलकुल अनजान बनते हुए कहा; "नहीं तो मॅडम!" मैडम ने शायद मेरी बात मान ली या फिर उन्होंने जानबूझ कर उस बात को और ज्यादा नहीं कुरेदा.

खेर मैं और मैडम खाने-पीने की सभी चीजों का मुआइना कर रहे थे, की तभी उनकी नजर मसाला डोसे पर गई और वो मुझे खींच कर वहाँ ले गई. मैं एक्स्ट्रा बटर डलवा कर उनके लिए डोसा बनवाया और अपने लिए मैं आलू-चीज पफ ले आया. जब मैंने उन्हें ऑफर किया तो उन्होंने एक पीस खाया और बोलीं; "राज जी आपकी पसंद का जवाब नहीं! हर चीज में आपकी पसंद ओसम है!" मैंने बस उन्हें शुक्रिया कहा और फिर उनके डोसा खत्म होने के बाद वापस आ कर बैठ गये. चूँकि हमें आने में थोड़ा समय लगा था तो सर पूछने लगे; "कहाँ रूक गए थे तुम दोनों?" मेरे कुछ बोलने से पहले ही मैडम बोल पड़ीं; "डोसा खा रहे थे!" अब ये सुन कर सर चुप हो गये.

दूल्हे की बारात आई और तभी खाना खुल गया और सभी लोग लाइन में लग गये. सर सबसे पहले और उनके पीछे नितु मैडम, फिर मैं और मेरे पीछे आशु. आज पहली बार आशु इतनी बड़ी और महंगी शादी में आई थी और खाने के लिए जो चीजें रखी थीं वो उसके नई थी. उसने वो कभी चखी भी नहीं थी. आशु ने कहा की उसे दाल-चावल खाने हैं तो मैंने उसे हँसते हुए समझाया की वो सब यहाँ नहीं मिलता. मैंने उसे पहले दाल महारानी, पनीर लबाबदार और २ रोटी दिलवाई और मैंने अपने लिए चिकन और नान लिया. हम वापस बैठ कर खा रहे थे, मैडम ने भी चिकन लिया था और सर ने वेज लिया था. "तुम सारे नॉन-वेज यहाँ बैठो मैं और डॉली कहीं और बैठेंगे" अब ये सुन कर मुझे बुरा लगा क्योंकि मैं नहीं चाहता था की आशु कहीं और जाये. इसका जवाब खुद आशु ने ही दिया; "पर सर सारे टेबल फुल हैं! " ये सुन कर मैडम के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई पर उन्होंने जैसे-तैसे अपनी हँसी छुपाई. नितु मैडम ने मुझे इशारा किया और मैं उनका ईशारा समझ गया.

हम दोनों ने एक-एक लेग पीस उठाया और जंगलियों की तरह खाने लगे. हमें ऐसा करते हुए देख सर मुँह बिदकाने लगे और बोले; "ढंग से खाओ! ये क्या जंगलियों की तरह खा रहे हो?" इतना कह कर वो उठ के चले गए और इधर मैं, मैडम और आशु हँसने लगे. मैडम की नजर आखिर रिंग पर चली गई और उन्होंने आशु से पूछ लिया; "डॉली ये रिंग आपको किसने दी?" अब ये सुनते ही मैंने अपनी आँखें फेर ली और ऐसे दिखाया जैसे मैंने सुना ही ना हो. "वो मॅडम ......" इसके आगे वो कुछ नहीं बोली और शर्माने लगी. "अच्छा जी! उसने तुम्हें प्रोपोज़ कर दिया? और तुमने हाँ भी कर दी?" मैडम ने थोड़ा जोर से बोला ताकि मैं भी उनकी बात सुन लु. "प्रोपोज़? किसने किसे किया?" मैंने जान बुझ कर ऐसे जताया जैसे मुझे कुछ पता ही नही. "राज जी! आपका पत्ता तो कट गया!" मैडम ने मेरे मज़े लेते हुए कहा. मैं जान बुझ कर जोर से हँसा ताकि उन्हें ये इत्मीनान हो जाए की मेरे और आशु के बीच में कुछ नहीं चल रहा.

खाने के बाद आखिर दुल्हन का आगमन हुआ, दुल्हन के जोड़े में राखी बहुत ही प्यारी लग रही थी. फिर शुरू हुआ नाच गाने का मौका और डी.जे ने एक के बाद एक गाना बजा कर माहौल में जान डाल दी. मैडम ने सर से नाचने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया. मैं उठ के खड़ा हुआ और आशु और मैडम को अपन साथ जबरदस्ती डांस के लिए ले गया और हम तीनों ने बड़े जोर-शोरों से नाचा. सर से हमारी ये ख़ुशी देखि नहीं गई और उन्होंने हमें इशारे से हमें वापस बुलाया और कहा की अब हमें चलना चाहिए. निकलने से पहले हमें शगुन तो देना था इसलिए हम सारे स्टेज के ऊपर चढ़ गये. दूल्हे से मैंने हाथ मिलाया और फिर राखी से मैंने हाथ जोड़ कर नमस्ते की पर वो हमेशा की तरह ही मुझसे गले लग गई. उसके पति को थोड़ा अटपटा सा लगा पर उसने कहा कुछ नही. इधर राखी ने खुद ही माहौल को हल्का करने के लिए कहा; "राज जी इतने हैंडसम लग रहे हो की मैं तो सोच रही हूँ की दूल्हा चेंज कर लु." ये सुन कर सारे हँस दिए और इधर राखी का दूल्हा भी राखी के मज़े लेने लगा और बोला; "सही है! तू अपने राज जी से शादी कर ले और मैं उनकी गर्लफ्रेंड से!" ये सुन कर मैं और आशु दोनों एक दूसरे को देखने लगे और बाकी सब हँसने लगे. मैं और आशु ये सोच रहे थे की ये लोग अपनी शादी छोड़ कर हमारे पीछे पड़े हैं!

शगुन दे कर, और फोटो खिचवा के हम जाने लगे तो राखी ने सब को रोक दिया और सर से बोली; "सर अभी तो १२ ही बजे हैं! प्लीज थोड़ी देर और रुक जाइये!" उसका दूल्हा भी बोल पड़ा; "सर अभी तो ड्रिंक्स भी चालु नहीं हुई हैं!" अब फ्री की ड्रिंक्स और मेरे सर उसे छोड़ दें, ऐसा तो हो ही नहीं सकता.

ड्रिंक्स का राउंड शुरू हुआ पर ना तो आशु ने पी और न ही मैडम ने.मैं भी नहीं पीना चाहता था पर हमारे ऑफिस के सारे कलिग आ कर बैठ गये. रस्तोगी जी बोले; "अरे भाई राज ऑफिस में तो तुम्हारा ग्रुप दूसरा सही पर यहाँ तो हमारे साथ शामिल हो जाओ." अब उनकी बात सुन कर मुझे मजबूरन उनके साथ बैठना पड़ा और इधर सर ने व्हिस्की आर्डर कर दी. वेटर ५ गिलास व्हिस्की के लार्ज ले आया. लार्ज पेग देख कर आशु हैरान हो गई और मन ही मन डरने लगी की पता नहीं आज क्या होगा. पर वो लार्ज पेग पीने के बाद मेरा सिस्टम उतना नहीं हिला जितना की आमतौर पर लोगों का हिल जाता था. प्रफुल (मेरा कलिग) का तो एक पेग में ही बंटाधार हो गया और उसने साफ़ मना कर दिया.

रस्तोगी जी, मैं, मोहित (मेरा कलिग) और सर अब भी टिके हुए थे. हम चारों पर ही जैसे असर नहीं हुआ था. रस्तोगी जी ने वेटर को बुलाया और उसे देसी लाने को कहा. वेटर ने साफ़ मना कर दिया की उनके पास देसी नहीं हे. "बेटा हमें इन महंगी शराबों से नहीं चढ़ती, हमें तो देसी चाहिए. तू ये ले पैसे, एक बोतल ले आ और बाकी पैसे तू रख ले." रस्तोगी जी का ये बर्ताव देख कर मैडम और आशु का मुँह बन गया पर सर उनकी तारीफ करने लगे.

"सॉरी! रस्तोगी जी मैं अब और नहीं पीयूँगा." मैंने कहा पर रस्तोगी जी तो आज फुल मूड में थे. "अरे भाई! क्या तुम एक देसी से घबरा गए? मर्द बनो!" रस्तोगी जी की बात सुन कर आशु और नितु मैडम मेरे बचाव में एक साथ कूद पडे. "शराब पीने से कब से मर्दानगी आने लगी?" मैडम ने कहा. "रहने दीजिये न सर फिर घर भी तो जाना हे." आशु बोली पर तभी सर बोल पड़े; "अरे भाई! कौन सा रोज-रोज पीते हे. आज इतना अच्छा दिन है और रही बात घर छोड़ने की तो मैं छोड़ दूंगा." अब मैं अगर पीने से पीछे हट जाता तो रस्तोगी जी और बाकी के सभी लोग मुझे जिंदगी भर मैडम और आशु के नाम से छेड़ते रहते इसलिए मैं भी कूद पड़ा; "चलो देखते है रस्तोगी जी आपकी देसी कितनी दमदार हे." ये सुन कर तो रस्तोगी जी हैरान हो गए, आखिर देसी आई और मैंने जान-बुझ कर लार्ज पेग बनाये.

मैं समझ गया था की ये सब रस्तोगी जी का ही प्लान है ताकि मैं पी कर लुढक़ जाऊँ और वो मुझे उम्र भर इस बात का ताना देते रहे. पर वो नहीं जानते थे की राज का कोटा बहुत बड़ा है! देसी के पहले पेग के बाद ही मोहित और सर ने हाथ खड़े कर दिए और अब बस मैं और रस्तोगी जी ही बचे थे. बाकी बची आधी बोतल को मैंने बराबर-बराबर दोनों के गिलास में डाल दिया. "आशु ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे रोकना चाहा पर मुझपर तो शराब का सुरूर छाने लगा था. मैंने आशु की तरफ देखा और ऐसे दिखाया जैसे मैं अभी भी पूरे होश में हु. इधर डी.जे. ने भी हमारा ये कॉम्पिटिशन होते हुए देख लिया और उसने गाना लगा दिया; दारु बदनाम कर दी! अब ये सुनते ही रस्तोगी जी फुल जोश में आ गए और खड़े हो गए और बाकी बची पूरी दारु एक साँस में पी गये.ये देख कर दूल्हा-दुल्हन और बाकी सब वहीँ आ गए की यहाँ कौन सी प्रतियोगिता हो रही है! सारे के सारे हमें घेर कर खड़े हो गए पर ये क्या रस्तोगी जी तो ५ मिनट बाद ही ढेर हो गए! अब बचा सिर्फ मैं, मैंने भी जोश में आते हुए पूरी की पूरी दारु एक साँस में गटक ली! सब के सब ये सोचने लगे की मैं अब गिरा..अब गिरा...पर मैं टिका रहा. गाने की आवाज और तेज हो गई और डी.जे. माइक पर जोर से चिल्लाया; "गिव अ बिग ह्यांड फॉर दिस जेंटलमन!” सारे तालियाँ बजाने लगे और मैंने भी सर झुका कर सबका अभिवादन स्वीकार किया. उस समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे कोई अवार्ड मिल रहा हो! पर ठीक तभी मेरे बॉस ने एक चाल चली, उन्होंने डी.जे. से माइक लिया और मेरे पास ले कर आ गए और बोले; "राज आज तो इस मौके पर तुम्हारी शायरी बनती हे." शायरी का नाम सुनते ही सब ने शोर मचाना शुरू कर दिया
 
राखी ने भी बड़े प्यार से रिक्वेस्ट की और सर ने इसी का फायदा उठाते हुए मुझ पर और दबाव डाल दिया; "भाई अब तो दुल्हन ने भी रिक्वेस्ट कर दि.अब तो सुना दो, कम से कम उसका दिल तो मत तोड़ो." अब मेरी हालत ऐसी थी की शराब दिमाग पर चढ़ चुकी थी. मैं ये तो जानता था की मैं कहाँ हूँ पर क्या शेर बोलना है उस पर मेरा काबू नहीं था. अब दिल और जुबान के तार एक साथ जुड़ गए और मैंने अपनी आँख बंद की और और बोला;

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में,

ज़रूरी बात कहनी हो कोई वादा निभाना हो,

उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो,

हमेशा देर कर देता हूँ मैं,

मदद करनी हो उस की यार की ढांढस बंधाना हो,

बहुत देरीना रास्तों पर किसी से मिलने जाना हो,

हमेशा देर कर देता हूँ मैं,

बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो,

किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो,

हमेशा देर कर देता हूँ मैं,

किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो,

हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो,

हमेशा देर कर देता हूँ मैं ....हर काम करने में.....

ये गजल किस के लिए थी वो सब समझ चुका था. और माहौल को हल्का करते हुए राखी का दूल्हा बोला; "राज जी! वैसे अभी देर नहीं हुई है!" मैं बस मुस्कुरा दिया और मैं जा कर उसके गले लगा और उसे बोला; ‘यू आर अ लकी गाय, शी इज अ किपर! बेस्ट विशेस फ्रॉम मी अँड विश यू अ वेरी हॅपी म्यारीड लाइफ!” मैंने उसे दिल से बधाई दी और माहौल हल्का हो गया.दूल्हा-दुल्हन के माँ-बाप को ये बाद जरूर लगी होगी इसलिए मैंने बस हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी और मैं निकल आया. मेरे पीछे-पीछे ही सर मैडम और आशु भी आ गये. मैंने कैब बुला ली थी और सर और मैडम तो अपनी कार से ही जाने वाले थे. मैंने उन्हें गुड नाईट बोला और हम दोनों चल दिये. कैब में बैठ कर हम दोनों खामोश थे, अब मुझे अपनी सफाई देनी थी पर जब दिमाग और जुबान का कनेक्शन टूट चूका था तो अब सिर्फ सच ही बाहर आना था.

"आशु...तुझे कुछ कहना नहीं है?" मैंने आशु से बात शुरू करते हुए पूछा.

"कहना नहीं पूछना हे." आशु ने मेरी तरफ मुँह करते हुए कहा और फिर अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थाम लिया. नशे के कारन मेरी आँखें थोड़ी बंद होने लगी थी पर आशु ने मुझे थोड़ा झिंझोड़ा और मैं कुछ होश में आया.

"आप अब भी उससे प्यार करते हो?" आशु ने मुझसे पूछा पर आज जो भी जवाब आना था वो दिल से ही आना था.

"नहीं! मैं....बस....तुमसे...प्यार करता हु." मैंने जवाब दिया और मेरा जवाब सुन कर आशु कस कर मेरे सीने से लग गई. मैंने भी आँखें बंद कर लीं और दिल को इत्मीनान हो गया की आशु और मेरे बीच में अब कोई भी गलतफैमी नहीं बची. कुछ देर ऐसे ही मेरे सीने से लगे हुए रहने के बाद आशु ने पूछा; "सर को सब पता था ना?" पर मैं तो जैसे सो ने लगा था पर आशु ने फिर मुझे नींद से उठाते हुए झिंझोड़ा और तब मेरे मुँह से टूटे-फूटे शब्द निकलने लगे; "मैंने....कभी...उन्हें नहीं....बताया."

पर आशु को तो अब सारी बात सुननी थी. आशु ने अपने पर्स से एक सेंटर शॉक निकाली और मेरे मुँह में डाल दी. दाँतों तले जैसे ही मैंने उस च्युइंग गम का दबाया की खटास के झटके से मेरी आँख खुल गई. मैंने अजीब सा मुँह बनाते हुए आशु को देखा, ठीक वैसा ही मुँह जैसे की आप किसी नन्हे से बच्चे को नीम्बू चटा दो. आशु खिलखिला कर हँस दी और फिर बोली; "अब बताओ, सर को पता था की आप राखी से प्यार करते थे?"

मैंने कभी उन्हें इस बारे में नहीं बताया, बल्कि उन्हें क्या किसी को नहीं बताया. जब मैंने ऑफिस ज्वाइन किया था तो मेरे आने से कुछ महीने पहले ही राखी ने ज्वाइन किया था. हम दोनों के बीच में कभी कोई बात नहीं हुई, जो भी बात हुई वो काम से रिलेटेड थी. अब चूँकि मैं नया जोइनी था और थोड़ा नौसिखिया तो सर ने मुझे और राखी को एक साथ एक कंपनी का डाटा दे दिया. लंच ब्रेक में भी हम दोनों साथ ही बैठे होते पर बातें बहुत कम ही होती. चाय पीने के समय मैं अकेला ही जाता और एक दिन राखी ने मुझे सिगरेट पीते हुए देख लिया और तब से हमारी थोड़ी बहुत बात शुरू हुई. बातें बड़ी साधारण ही होती, थोड़ी बहुत कॉलेज की बातें बस! अब ऑफिस के सारे मेल एम्प्लाइज को तो तुम जानती हो उन हरामियों ने हम दोनों के बारे में बातें करना शुरू कर दिया. शायद सर ने सुन लिया और उन्हें ये लगा की हम दोनों का कोई चक्कर चल रहा हे. इसीलिए उन्होंने हम दोनों को अलग-अलग डाटा दे कर दूर कर दिया. काम का लोड ज्यादा था तो अब हमारी बातें सिर्फ लंच टाइम में होती या कभी कभार वो मुझे चाय पीते हुए मिल जाती." आशु मेरी बातें बड़े इत्मीनान से सुन रही थी. और जब मैंने बोलना बंद किया तो वो बोली; "ये सब रस्तोगी जी और सर ने मिल के किया है! ये उन्हीं का प्लान था की कैसे आपको बदनाम करें! पहले रस्तोगी जी ने आपको जबरदस्ती चढ़ा दिया की शराब पीनी है और लास्ट का दांव सर ने चला. छी! कितने गंदे लोग हैं!" आशु ने गुस्से से तिलमिलाते हुए कहा.

"वेलकम टू दीं कॉर्पोरेट कल्चर!!! यहाँ कोई भी किसी को तरक्की करता हुआ देख कर खुश नहीं होता. अब मुझे सैलरी में रेज मिला तो रस्तोगी जी की किलस गई!" मैंने कहा. बातों-बातों में आशु का हॉस्टल आ गया और मैंने उसे गेट पर छोड़ा और वापस उसी कैब में अपने घर निकल गया.घर आया ही था की दो मैसेज फ़ोन में आये, पहला आशु का की वो हॉस्टल पहुँच गई और आंटी जी ने उसे कुछ नहीं कहा और दूसरा नितु मैडम का; "राज जी! रियली सॉरी! आज जो कुछ हुआ उसके लिए मैं इनकी तरफ से माफ़ी माँगती हु. अभी इन्होने मुझे अपना सारा घटिया प्लान बताया!" एक पल को तो मन किया की कल ही जा कर अपना रेसिग्नेशन बॉस के मुँह पर मार आता हूँ पर फिर ये सोच कर चुप हो गया की अभी कुछ महीनों के लिए आशु के साथ इस प्रोजेक्ट पर और काम कर लेता हूँ बाद में छोड़ दूंगा. यही सोचते हुए मुझे कब नींद आई पता ही नहीं चला.

सुबह बहुत देर से उठा करीब आठ बजे होंगे, जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और ऑफिस पहुंचा. जाहिर है ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर हो गई पर आज बॉस ने मुझे कुछ नहीं कहा. बाकी दिन जब मैं लेट हो जाता तो बॉस कुछ न कुछ सुना देता था पर आज चुप था. जब मैं केबिन में गुड मॉर्निंग करने घुसा तब भी बस गुड मॉर्निंग का जवाब दिया पर कोई भी फाइल उठा कर मुझे नहीं दी. मैं भी वापस आ कर अपनी डेस्क पर बैठ गया और अपना सिस्टम चालु किया, सोचा की मैडम वाले प्रोजेक्ट पर ही थोड़ा काम कर लेता हु. तभी मेरी नजर रस्तोगी जी पर पड़ी.और दिन तो उनके टेबल पर एक-आधी ही फाइल होती थी पर आज तो ढेर सारी थी! मैं समझ गया की मेरी फाइल्स भी सर ने उन्हें दे दी है तो अब बारी मेरी थी उनके मज़े लेने की! मैं उठा और उनके टेबल पर पहुँच गया;

मैं: अरे प्रफुल भाई, आपने रस्तोगी जी को ब्लैक कॉफ़ी नहीं मँगवा के दी? उनका हैंगओवर कैसे उतरेगा?

ये सुनते ही मोहित और प्रफुल हँसने लगे अब रस्तोगी जी को भी ढोंग करते हुए झूठी हँसी हसनी पडी.

मैं: क्या रस्तोगी जी आप मेरे जैसे बच्चे से हार गए? वो भी देसी पीने में? बॉस से हारे होते तो मैं फिर भी मान लेता!

रस्तोगी: अरे भाई....वो ....दरअसल ...खाली पेट थे ना?

मैं: खाली पेट? वो भी शादी में? काहे?

मोहित: अरे रस्तोगी जी काहे झूठ बोल रहे हो? सबसे ज्यादा खाना तो आप ही दबाये हो! (ये सुनते ही हम सारे हँसने लगे.)

प्रफुल: रस्तोगी जी ने पूरे शगुन के पैसे वसूल किये हे.

मैं: रस्तोगी जी महराज धन्य हो आप! मुझे लुढ़काने के चक्कर में खुद लुढ़क गए!

रस्तोगी: बिटवा थोड़ा ज्यादा उड़ रहे हो!

उन्होंने मुझे टोंट मारना चाहा पर उनके आगे बोलने से पहले ही मैं बरस पड़ा;

मैं: मैं कहाँ उड़ रहा हूँ जी! मुझे उड़ाने का प्लान तो आप लोग बनाये थे, पर आप जानते नहीं हो मुझे ठीक से! जितनी आपकी उम्र है उतने घाटों का पानी पी चूका हु. अगली बार खुंदस निकालनी हो तो थोड़ा ढंग का प्लान बनाना.

मेरी आवाज ऊँची हो चली थी जो बॉस ने भी सुनी पर वो सिर्फ मुझे देख कर ही चुप हो गये. ठीक उसी समय मैडम एंटर हुईं और उन्होंने शायद मेरी बात सुन ली थी इसलिए अपने दाहिने हाथ की छोटी ऊँगली से मेरे हाथ को चलते हुए पकड़ा और मुझे अपने साथ अपने केबिन की तरफ ले आईं और बोलीं; "राज जी क्यों अपना मुँह गन्दा करते हो? ये छोटे लोग हैं और इनकी सोच भी छोटी है, किसी की तरक्की इनसे देखि नहीं जाती." मैंने मैडम की बात का जवाब नहीं दिया बल्कि मुड़ के अपने डेस्क की तरफ जा रहा था की उन्हें लगा जैसे मैं उनसे नाराज हु. मैडम मेरे टेबल के नजदीक आईं और मुझसे पूछने लगीं; "मुझसे नाराज हो?"

"नहीं तो मॅडम! आपसे भला किस बात की नाराजगी?! मुझे बदनाम करने का प्लॅन आपने थोड़े ही बनाया था." मैंने तपाक से जवाब दिया.

"वैसे राज जी! हीरे पर धुल गिराने से उस की चमक कम नहीं होती!" मैं मैडम के बात का मतलब समझ गया इसलिए मैंने आगे उनसे इस बारे में कुछ नहीं कहा. मैडम वापस अपने केबिन में चलीं गईं और मैं प्रोजेक्ट के काम में लग गया.कुछ देर बाद मैडम आईं और बोलीं; "राज जी आप मुझे हज़रतगंज छोड़ दोगे? वहाँ जी. एस. टी. ऑफिस में मुझे कुछ काम हे."

"मॅडम आप मुझे बोल दीजिये मैं चला जाता हु." मैंने कहा.

"नहीं मैं ही जाऊँगी, यहाँ रहूँगी तो इनकी (बॉस की) शक्ल देखनी पडेगी." मैडम ने मुँह बनाते हुए कहा. पर मुझे दिक्कत ये थी की बॉस का क्या सोचेंगे पर तभी मैडम बोलीं; "क्या सोच रहे हो?"

अब मैं क्या बोलता, मैं था और मैडम को चलने के लिए कहा. मैडम अपने केबिन में कुछ फाइल्स लेने गईं और मैं नीचे उतर आया, पार्किंग से बाइक निकाल के बाहर आया और इतने में मैडम भी नीचे आ गई. मैडम ने पिट्ठू बैग टाँगा हुआ था. वो आज बाइक पर दोनों तरफ टांगें कर के बैठ गईं और उनके दोनों हाथ मेरे सीने से आ चिपके.आज तो उन्होंने ब्रा भी नहीं पहनी थी और नंगे स्तन बस एक कुर्ते के पीछे से मेरी कमीज में गड़े हुए थे. उनके इस स्पर्श से मेरे जिस्म में करंट दौड़ गया, मेरे लिए ये बहुत अनकंफर्टेबल हो रहा था पर हिम्मत नहीं हो रही थी की मैडम को बोल सकू. मैं जानबूझ कर आगे को झुका ये ड्रामा करने को की मैं बुलेट के इंजन को छू कर कुछ ढूँढ रहा हु. इससे मैडम की पकड़ थोड़ी ढीली हो गई और हम दोनों के बीच थोड़ा सा गैप आ गया.मैडम भी समझ गईं की मैं नाटक कर रहा हूँ इसलिए उन्होंने खुद से "सॉरी!!!" बोला. मैं उन्हें ज्यादा ऑक्वर्ड फील नहीं करवाना चाहता था इसलिए मैंने बाइक स्टार्ट की और हम हज़रतगंज के लिए निकले.
 
पूरे रास्ते मैडम ने मुझसे कोई बात नहीं की, आधे घंटे का रास्ता चुप-चाप निकला. जी. एस. टी. ऑफिस पहुँच कर मैडम ने कहा की मैं ऑफिस वापस चला जाऊ. पर वो आज बहुत उदास महसूस कर रहीं थीं, अब उनका दोस्त था तो उन्हें ऐसे अकेला छोड़ना सही नहीं लगा. "मॅडम आपकी टुंडे कबाब की ट्रीट बाकी है! आज खाएं?" मेरी बात सुनते ही मैडम की चेहरे पर ख़ुशी लौट आई. उन्होंने बताया की उन्हें कम से कम आधे घंटे का काम है और तब तक मैंने भी सोचा की अपना एक काम निपटा लूँ, इसलिए मैंने उनसे इज्जाजत मांगी और निकल आया. जेब से उन अंकल जी का कार्ड निकाला जिन्होंने कल मुझे वो रिंग दी थी. एड्रेस आस-पास का ही था तो मैं उनकी दूकान जा पहुँचा, दूकान क्या वो तो शोरूम था! अब मुझे लगा की बेटा जितनी सेविंग थी सब गई! एंकल जी कॅश काउंटर पर खड़े थे और मुझे देखते ही मेरे पास आये और मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे काउच पर बिठा दिया और आ के मेरे बगल में ही बैठ गये. मेरे बारे में पूछा की मैं कहाँ का रहने वाला हूँ, यहाँ कब से हूँ, क्या जॉब करता हूँ वगैरह-वगैरह... मैंने भी उन्हें सब बता दिया और फिर बात आई रिंग की कीमत की! "बेटा मैं अब भी कह रहा हूँ की तुम्हें पैसे देने की कोई जरुरत नहीं!" अंकल जी ने बड़े प्यार से कहा.

"अंकल जी मैं बड़ा गैरतमंद इंसान हूँ! आपसे इस तरह से इतनी महंगी चीज लेना ठीक नहीं! फिर मैं नहीं चाहता की आपको मेरी वजह से नुकसान हो!" मैंने भी बड़े प्यार से उन्हें अपनी मजबूरी समझाई.

"ठीक है बेटा! वो रिंग ज्यादा महंगी नहीं थी. वाइट सिल्वर की थी. वो दरअसल किसी और क्लाइंट के लिए बनाई थी पर उस रात को तुम-दोनों को देख कर मुझे मेरी जवानी के दिन याद आ गये. अब तुमसे पैसे लेने को दिल नहीं करता पर तुम बहुत गैरतमंद हो इसलिए तुम मुझे बस लागत दे दो: ७,०००/-, चाहो तो बाद में दे देना इतनी भी कोई जल्दी नहीं हे."

"अंकल जी मैं कार्ड लाया था तो ....आपके पास मशीन हो तो?!" मैंने थोड़ा डरते हुए पूछा की खाएं वो कुछ गलत न समझें पर वो निहायती शरीफ थे उन्होंने तुरंत मशीन मंगवाई और पेमेंट होने के बाद मुझे बिल भी देने लगे तो मैंने मना कर दिया. उनसे बिल ले कर मैं उनकी बेज्जत्ती नहीं करना चाहता था. "तो बेटा शादी कब कर रहे हो?" अंकल ने पूछा.

"जल्द ही अंकल जी!" इतना कह कर मैंने उनसे विदा ली और वापस जी. एस. टी. ऑफिस के बाहर पहुंचा. मैडम को बिठा कर सीधा आझाद बाग पहुँचा और हमने टुंडे कबाब खाये. पर मैडम को अभी भी भूख लगी थी और वो कहने लगीं की किसी रेस्टरंट चलते हैं जहाँ बैठ कर खाना खा सके. हम दोनों एक रेस्टरंट में आये और बैठ गए, मैडम का मुँह अब पहले की तरह खिला-खिला था इसलिए खाना भी उन्हीं ने आर्डर किया.

खाने में मैडम ने बस एक थाली ही आर्डर की थी. दरअसल उन्हें मुझसे कुछ बात करनी थी जो खड़े-खड़े कबाब खाते हुए मुमकिन नहीं थी. आर्डर आने से पहले ही मॅडम ने अपनी बात शुरू की;

नितु मैडम: मैं अपनी इस शादी में पिछले २ साल से घुट रहीं हूँ! कॉलेज खत्म होने के बाद मेरा मन शादी करने का कतई नहीं था. बल्कि मैं तो घूमना-फिरना चाहती थी पर मेरे परिवार वालों की सोच बड़ी रूढ़िवादी थी. मेरा घूमना-फिरना उन्हें कतई पसंद नहीं था इसलिए मेरी शादी जबरदस्ती कर दी गई. कुमार (मेरे बॉस का मिडिल नाम) बहुत बोर और लालची इंसान है, उसके दिमाग में हर वक़्त पैसे ही पैसा घूमता हे. दहेज़ के लालच में शादी की और इतने सालों में हम ने कभी प्यार के हसीन पल साथ नहीं बिताये! अपना अकेलापन दूर करने को मैंने पीना शुरू कर दिया और खुद उसी मायूसी में घुटती रही. ये घुटन दिन पर दिन बढ़ने लगी थी और मैं सोचने लगी थी की सुसाइड कर लूँ, पर फिर वो मुंबई वाला ट्रिप हुआ और मुझे तुम्हारे रूप में एक अच्छा दोस्त मिल गया.

इतने में वेटर एक थाली ले कर आ गया.

मैं: मॅडम आपने सर से इस बारे में बात की? आई मीन इफ यू टेल हिम, ही माईट चेंज हिमसेल्फ …… (मैडम मेरी बात काटते हुए बोलीं)

नितु मैडम: आई दिड बट ही इज टू ड्याम एडमिट टू एकसेप्ट हिज बिहेवियर अँड इंस्टेड ब्लेम मी फॉर इट अँड एक्सपेक्ट मी टू चेंज! दिस रिलेशनशिप इज बियोंड रीपेयरेबल …अँड आई एम गोना एंड इट सोऑन! आई कान्ट लिव्ह विद दिस ऐसहोल एनीमोर!

अब ये सुन कर मुझे बुरा लगने लगा और मैं कुर्सी पर पीठ टिका कर बैठ गया, मैडम ने पूरी का एक कौर खाया और मेरी तरफ देखते हुए बोलीं;

नितु मैडम: डोन्ट ब्लेम योवरसेल्फ फॉर इट, यू आर नॉट रिस्पॉनसिबल फॉर एनी ऑफ दिस! आई टोल्ड यू ऑल दिस कौज आई वॉन्टेड टू आस्क यू अ क्वशन?

अब ये सुन कर मेरी फटी पड़ी थी. मुझे लग रहा था की मैडम मुझे कहीं आई लव यू न बोल दें!

नितु मैडम: डू यू सपोर्ट मी इन दिस डिसिजन …... एज अ फ्रेंड?

मैं: आई डू मॅडम! ….. एज अ फ्रेंड ...आई डू!

नितु मैडम: शुक्रिया! इन केस आई निड टू क्रॅश अ डे ऑर टू, आई विल लेट यू नो!

ये कहते हुए मैडम हँसने लगीं और मैं भी झूठी हँसी हँसने लगा. मन ख़राब था पर मैं अपने चेहरे पर नकली हँसी बनाये हुए था. मैं नहीं चाहता था की मैडम का घर टूटे! हम अभी बाइक पर बैठ ही थे की किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मैंने पलट के देखा तो ये सुमन थी!

"कहाँ घूम रहे हो?" उसने हँस कर पूछा. पर मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़ी; "अच्छा जी! गर्लफ्रेंड घुमा रहे हो!!!!" उसकी बात सुन कर मैडम हँस पड़ीं और मैंने उसे प्यार भरे गुस्से से डांटते हुए कहा; "पागल! ऑफिस मॅडम हैं मेरी!"

"ओह..सॉरी...सॉरी..सॉरी..!!!" सुमन ने कान पकड़ते हुए कहा.

"इट्स ओके डिअर !!!" मैडम ने भी हँसते हुए कहा.

"तो यहाँ क्या कबाब खाने आये थे आप लोग?" सुमन ने पूछा.

"हाँ जी! जी. एस. टी. ऑफिस से काम निपटा कर सोचा की चलो कबाब ही खा लें." मैडम ने जवाब दिया.

"आप यहाँ क्या कर रही हो? बॉयफ्रेंड का इन्तेजार??" मैंने सुमन को छेड़ते हुए कहा.

"अरे कहाँ बॉयफ्रेंड! सारे अच्छे लड़के तो आपकी तरह ब्रह्मचारी हो गए हैं!" सुमन ने पलट कर मुझे ही छेड़ दिया.

"किसने कहा मैं ब्रह्मचारी हूँ? इतने साल टूशन पढ़ने के टाइम तो कभी मुझे कुछ कहा नहीं? बल्कि तब तो मेरे मजे लेती थी?!" मैंने कहा और मेरी बात सुन कर मैडम हैरानी से मुझे देखने लगी.

"अरे तब माँ होती थी ना! पर अब आपके पास टाइम ही नहीं है!" सुमन ने कहा.

हमारी इस हँसी-ठिठोली के मजे मैडम ने बहुत लिए और वो जी भर के हँस रही थी. फिर मुझे याद आया की कहीं सुमनं आशु के बारे में कहीं न बक दे, इसलिए मैंने उससे विदा ली.

मैडम और मैं बस हलकी-फुलकी बातें करते हुए ऑफिस पहुँचे, मैंने अपना बैग उठा कर सर को; "मैं जा रहा हु." बोल कर निकल गया.सीधा अपनी जानेमन से मिलने उसके कॉलेज वाली लाल बत्ती पर उसका इन्तेजार करने लगा. आशु हमेशा की तरह मुस्कुराती हुई आई और पीछे बैठ गई. हम एक कैफ़े में पहुँचे और फिर मैंने उसे आज की सारी घटना बता दी. मेरी बात सुन कर उसे जरा भी हैरानी नहीं हुई और वो भी पूरे जोश में मैडम का सपोर्ट करते हुए बोली; "मॅडम ने जो भी कहा वो सही कहा! खुश रहने का हक़ सब को है, अब अगर बॉस उन्हें खुश नहीं रख पाते तो वो अपना जीवन क्यों बर्बाद करें? और इस सब में आपकी बिलकुल भी गलती नहीं है, आप नहीं होते तो मैडम सुसाइड कर लेतीं! भगवान् ने आपको उनकी जिंदगी में भेजा ही इसलिए था की आप उन्हें एक अच्छे दोस्त की तरह संभाल सकें!" मैं आगे कुछ बोल न सका, आशु का भरोसा खुल कर मेरे सामने आ रहा था. "अच्छा एक जरूरी बात! परसों निशा का जन्मदिन है और उसने हम दोनों को रात की पार्टी में इन्वाइट किया हे. इसलिए आपको अच्छे से तैयार हो कर आना हे." आशु ने जोश में आते हुए कहा.

"आजकल पार्टी कुछ ज्यादा नहीं हो रही? मेरी बर्थडे पार्टी, फिर राखी की शादी और अब ये निशा का बर्थडे?! थोड़ा पढ़ाई में भी ध्यान दो! वैसे आंटी जी को क्या बोलोगी?" मैंने आशु को थोड़ा डाँटते हुए कहा.

"उन्हें मैंने पहले ही बता दिया है की घर पर पूजा है इसलिए आप और मैं ३ दिन के लिए जा रहे हैं." आशु ने बड़ी सरलता से कहा.

"पागल हो क्या? तीन दिन? कहाँ है ये पार्टी?" मैंने हैरानी से पूछा.

"जयपुर!!!" आशु ने उत्साह से भरते हुए कहा. मैं अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से आशु को घूरने लगा की ये लड़की पागल तो नहीं हो गई.

"आशु तुझे हो गया है? तेरे कुछ ज्यादा पर निकल आये हैं? कहाँ तो गाँव में चुप-चाप रहने वाली लड़की आज शहर की फूलझड़ी बन गई है!" मैंने आशु को थोड़ा डाँटते हुए कहा. ये सुन कर आशु का सारा उत्साह फुर्र हो गया और उसकी गर्दन झुक गई.

"गाँव में मैं 'जी' कहाँ रही थी? वहाँ जो भी खुशियां मिली वो सिर्फ आपने दी, वो खुशियाँ बस तरीकों के साथ आती थी. एक लिमिटेड टाइम के लिए, कुछ भी करने से पहले दस बार सोचना की कहीं घर वाले नाराज न हो जाएँ और मेरी शादी न कर दें! पर यहाँ आ कर मुझे पता चला की लाइफ को जिया कैसे जाता है! आप अगर मुझे यहाँ ना लाते तो मैं वही गाँव की गंवार बन के रह जाती. मानती हूँ की कई बार मैं अपनी सारी हदें पार कर देती हूँ, शायद इसलिए की ये खुशियाँ मेरे लिए बाकी थीं और बड़ी लेट मिलीं." आशु ने सर झुकाये हुए ही दबी आवाज में कहा.

मैं आशु का दर्द समझ सकता था पर ये जो वाईल्ड हरकतें वो कर रही थी वो हमारे प्लान पर पानी फेर देतीं. "आशु देख मैं समझ सकता हूँ पर तू जिस स्पीड पर भाग रही है वो हमारे आने वाले जीवन के लिए खतरनाक है! अगर घर में बात जारा सी भी लीक हो गई तो बवाल खड़ा हो जायेगा." मैंने आशु को समझाया. आशु ने बस सर झुकाये हुए ही हाँ में गर्दन हिलाई और मैं उठ कर उसके बगल में बैठ गया और उसे अपने सीने से लगा लिया. ५ बजने वाले थे तो मैं उसे ले कर निकल पड़ा और उसे हॉस्टल छोड़ा और फिर अपने घर आ गया.

रात के करीब दस बजे होंगे और मैं अंडे की भुर्जी बना रहा था की मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने दरवाजा खोला तो सामने निशा खड़ी थी. मुझे देखते ही वो "हाई!!!" बोली. मैं उसे यहाँ देख कर भौंचक्का रह गया और हकलाते हुए "ह ... ...हाई!!!" निकला...

“कॅन आई कम इन?” निशा ने पूछा तो मैंने दरवाजे पर से हाथ हटाया और उसे अंदर आने दिया और खुद दरवाजे पर ही खड़ा रहा. वो अंदर आ कर मेरे घर को देखने लगी और तब उसका ध्यान अंडा भुर्जी पर गया और उसने फटाफट किचन सिंक में हाथ धोये और खुद ही एक प्लेट में अपने लिए भुर्जी निकाल ली और ब्रेड का पैकेट खोलने वाली थी तो मैंने उसे बताया की टिफ़िन में परांठा हे. उसने फ़ौरन वो निकाला और बिना कुछ आगे बोले खाने लगी. मैं चौखट से अपनी पीठ टिका कर खड़ा हो गया और उसे खाते हुए देखने लगा. आधा परांठा खाने के बाद उसे याद आया की वो किस काम के लिए आई थी; "राज जी! प्लीज चलो ना मेरे बर्थडे पार्टी पर जयपुर? आप नहीं जाओगे तो डॉली भी नहीं जायेगी!"

"सॉरी जी! पर ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलेगी." मैंने कहा पर वो आज पूरा मन बना कर आई थी.

निशा: ओह कम ऑन! ये बस एक कपल गेट टूगेदर है! आप दोनों के बिना हमें कैसे मजा आएगा?

मैं: नो ऑफेंस, बट आई डोन्ट एवन नो यू! आई मीन एक्सेप्त दॅट यू आर हर फ्रेंड?

निशा: दॅट इज दीं बेस्ट पार्ट, यू अँड मी… आई मीन… वी कॅन गेट टू नो इच अदर!

मुझे निशा की बात बहुत अजीब लगी!

मैं: आई एम सॉरी, बॉस छुट्टी नहीं देगा.

निशा: अरे ऐसे कैसे? इतनी मेहनती आदमी को छुट्टी नहीं मिलेगी तो कैसे चलेगा? मैं बात करती हूँ आपके बॉस से!" निशा ने भुर्जी खाते हुए कहा.

मैं: ओह प्लीज! डोन्ट बी अ कीड!

निशा: ओह! समझी.... आप जानबूझ कर जाना नहीं चाहते! ठीक है मैं यहाँ से तब तक नहीं हिलूँगी जब तक आप हाँ नहीं कहते.

मैं: एज यू विश!

मैंने सोचा की ये कर भी क्या लेगी, कुछ देर बाद तो इसे जाना ही होगा वरना अपने घर में क्या बोलेगी? मैंने इधर आशु को फ़ोन मिलाया पर उसने उठाया नहीं, शायद वो सो चुकी थी. आधे घंटे तक मैं चौखट से अपनी पीठ टिकाये खड़ा रहा और निशा मेरे पलंग पर आलथी-पालथी मारे बैठी रही.

निशा: राज जी! मुझे घर भी जाना है! प्लीज मान जाओ, मेरे लिए न सही पर आशु के लिए. उस बेचारी ने कभी जयपुर नहीं देखा वो थोड़ा घूम लेगी तो आपका क्या जायेगा? मैं उसे साथ ले जाती पर वो सिर्फ आपके साथ जाना जाती हे.

अब मैं सोच में पड़ गया की ये खतरा कैसे उठाऊँ? घर पर ये बात खुलती तो काण्ड होना तय था! तभी आशु का फ़ोन आया और उसने मुझे फ़ोन स्पीकर पर करने को कहा; " निशा? तेरी हिम्मत कैसे हुई उनको तंग करने की? मैंने तुझे बोला था न की हम नहीं जा रहे तू चली जा? फिर तू इतनी रात गए वहाँ क्या कर रही है?" आशु निशा पर बरस पडी.

"आशु बस! .... शांत हो जा! हम दोनों जा रहे हैं." मेरी बात सुन कर निशा खुश हो गई तो आशु खामोश हो गई. मैंने फ़ोन स्पीकर मोड से हटाया और अपने कान से लगाया. "अपनी जानेमन की ख़ुशी के लिए कुछ भी!" आशु को अब भी यक़ीन नहीं हो रहा था; "उस इडियट ने तो आपको तंग नहीं किया ना? मैंने उसे आपके पास जाने को नहीं बोला. मुझे तो पता भी नहीं था की वो आपके घर पर आई हुई हे. अभी उसका मैसेज पढ़ा की वो आपके घर पर आपको मनाने आई है और आप मान नहीं रहे. इसलिए मैंने अभी कॉल किया!"

"जान! मैं किसी दबाव में नहीं कह रहा, बस इस पागल लड़की की बात से एहसास हुआ की मैं तुम्हारे साथ कितनी ज्यादती कर रहा था." मैंने कहा और मेरे निशा को पागल लड़की कहने पर वो हँस दी!

"पर घर का क्या?" आशु ने चिंता जताई.

"क्यों तुमने तो पहले ही बहाना ढूँढ रखा है?!" मैंने थोड़ा प्यार भरा टोंट मारा. "थैंक यू जानू! आई लव यू!!!" आशु की ख़ुशी लौट आई और मुझे नहीं लगता की वो उस रात सोइ भी होगी! इधर रात के पोन ग्यारह हो रहे थे और अभी इस पागल लड़की को घर भी जाना था. "चलो आपको घर छोड़ दू." मैंने आशु का फ़ोन काटते ही निशा से कहा. “शुक्रिया… शुक्रिया… शुक्रिया… शुक्रिया… शुक्रिया” कहते हुए वो मेरे नजदीक आ गई और मेरे गले लग गई पर मैंने उसे छुआ भी नही. "अच्छा बस मैडम! चलिए!" इतना कह कर मैंने खुद को उससे छुड़वाया और उसे घर छोड़ने निकला.मेरे घर से उसका घर करीब २० मिनट दूर था. अब रात में कहीं कुत्ते पीछे न पड़ जाएँ इसलिए मैंने बाइके निकाली और उसे उसके घर के सामने छोडा. वो मुझे बाय बोल कर उछलती-कूदती हुई चली गई. मैं भी घर लौट आया और ब्रेड और ठंडी भुर्जी खा कर सो गया.
 
अगले दिन मैं उठ कर, नाहा धो कर ऑफिस पहुँचा और बॉस के सामने अपनी छुट्टी की अर्जी रख दी. "सर मुझे ४ दिन की छुट्टी चाहिए, घर पर पूजा-पाठ है! मैं मंडे ज्वाइन कर लुंगा." सर ने मुझे देखे बिना ही ठीक है कह दिया. मैं भी वापस बाहर आ कर डेस्क पर पहले से ही रखी फाइल्स निपटाने लगा. लंच टाइम मैं उठ कर बाहर जा रहा था की नितु मैडम आ गईं और मुझसे बोलीं; "राज जी! आपके सर ने बताया की आप कल गाँव जा रहे हो? कोई इमरजेंसी तो नहीं?"

"नहीं मॅडम, वो घर में पूजा है इसलिए जा रहा हु. अँड सॉरी इस रविवार प्रोजेक्ट पर काम नहीं कर पाउँगा, मैं रविवार शाम तक लौटूँगा. आज मैं पी. पी. टी. फाइनल कर दूँगा और वो आपने उन्हें पिछले पाँच साल के फाइनेंसियल स्टेटमेंट्स मँगवा लिए?" पर मैडम का तो जैसे मेरी बातों पर ध्यान ही नहीं था. उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं पर ध्यान कहीं और था! मैं ने हवा में मैडम के चेहरे के सामने हाथ हिला कर मैडम की तन्द्रा भंग करते हुए पूछा; "क्या हुआ मॅडम?"

उन्होंने बस कुछ नहीं कहा और वो अपने केबिन की तरफ चली गईं मैं भी कुछ सोचते हुए नीचे आ गया और चाय पी रहा था. मैंने जेब से फ़ोन निकाला और घर फ़ोन किया ये जानने के लिए की वहाँ सब कुछ कैसा है? कहीं पता चले की वहाँ से कोई शहर आ टपके और काण्ड हो जाए! पिताजी ने फ़ोन उठाया तो वो मुझ पर ही बरस पड़े; "तुम दोनों के पास इतना भी समय नहीं की घर आ जाओ? पढ़ाई और काम-धंधे में इतने व्यस्त हो की घर की कोई चिंता ही नहीं? पहले तो हफ्ते में दो दिन के लिए तुम्हारी शक्ल दिख जाती थी अब तो महीने होंने को आये तुम्हें देखे हुए? तुम लोगों की सूरत तो छोडो आवाज सुनने को कान तरस गए और तुम लोग हो की बस अपनी मस्ती में मस्त हो! इसीलिए तुम दोनों को शहर भेजा था?" पिताजी की बात जायज थी पर यहाँ आशु और मेरे काम के कारन हम गाँव नहीं जा आ रहे थे.

"पिताजी आपसे हाथ जोड़ कर माफ़ी माँगता हूँ! मैं या आशु आप सब की दी हुई आजादी का गलत फायदा नहीं उठा रहे, दरअसल मेरे ऑफिस में आज कल एक नया प्रोजेक्ट चल रहा है और इसलिए मैं शनिवार-रविवार ओवरटाइम कर रहा हु. कुछ महीनों में वो खत्म हो जायेगा तो मैं फिर से शनिवार-रविवार आ जाऊंगा. बल्कि मैं इस रविवार ऑफिस के कुछ काम से आ रहा हूँ और आशु को घर छोड़ जाऊँगा, उसके कॉलेज की छुट्टियाँ हे. मैं ताऊ जी से भी माफ़ी मांग लूँगा, पर पहले आप तो माफ़ कर दिजिये." मेरी सेंटीमेंटल बातें सुन कर पिताजी को तसल्ली हुई और उनका गुस्सा शांत हो गया.अभी मैंने कॉल रखा ही था की आशु का फ़ोन आ गया.

"जानू! मुझे बहुत डर लग रहा है! अगर हमारे पीछे से घर से कोई यहाँ आ गया तो?" आशु ने डरते हुए कहा.

"ये सब पहले नहीं सोचा था?" मैंने आशु को ताना मारते हुए कहा. "मैं तो साफ़ कह दूँगा की ये लड़की (आशु) मुझे बरगला कर ले गई थी!" मेरी बात सुनते ही आशु के मुंह से "आव्वव्वव्वव्व!!! " निकला और में जोर से हँस दिया. मिनट भर तक पेट पकड़ के हँसने के बाद मैं बोला; "तू चिंता मत कर, मैंने अभी घर कॉल किया था और घरवाले अभूत गुस्सा हो रहे थे. बड़ी मुश्किल से मैंने पिताजी को समझाया है और वादा किया है की इस रविवार तुझे घर छोड़ दूँगा कुछ दिनों के लिए, क्योंकि तेरे कॉलेज की छुट्टी हे." ये सुनते ही आशु बोली; "ये अच्छा है! मुझे ही फंसा दो आप?! मैं वहाँ अकेली इतने दिन आपके बिना क्या करुँगी?!"

"जयपुर का प्लान किसने बनाया था?" मैंने पूछा और आशु समझ गई की ये उसकी गलती की सज़ा हे. "अगली बार अगर इस तरह का पन्गा खड़ा किया न तो देख ले फिर?!" मैंने आशु को सचेत करते हुए कहा.

"आई प्रॉमिस अगलीबार कुछ भी करने से पहले आप से पूछूँगी.वैसे आज कितने बजे मिल रहे हैं?"

"आज मुश्किल है, प्रोजेक्ट की पी. पी. टी. पूरी करनी है वरना मैडम अकेले कैसे करेंगी और हाँ.... याद से मैडम को कल फ़ोन कर के बता देना की तुम इस रविवार नहीं आने वाली और प्लीज ये मत कहना की घर पर पूजा है! वो बहाना मैंने मारा हे." मेरी बात खत्म हुई और आशु वापस कॉलेज लेक्चर अटेंड करने चली गई. मैं भी चाय पी कर वापस आ गया और डेस्कटॉप पर काम करने लगा.

उस दिन मैडम से मेरी बात सिर्फ मेल पर ही हो रही थी क्योंकि मैडम लंच के बाद निकल गईं थी. अगले दिन सुबह जब मैं ऑफिस पहुँचा तो बॉस और मैडम को लगा की मेरा जाना कैंसिल हो गया; "जी शाम की बस है और वो पी. पी. टी. वाला काम फाइनल करना था इसलिए आ गया." इतना कह कर मैं कल वाली पी. पी. टी. में मैडम के बता हुए करेक्शन कर रहा था. लंच के बाद मैं सर को बोल कर निकल गया, मैडम पहले ही जा चुकी थी. मैं घर पहुँच कर तैयार हो कर एक बैग में अपने कुछ कपडे ले कर निकला और आशु के हॉस्टल पहुंचा. आंटी जी चूँकि वहीँ थीं तो उन्होंने जबरदस्ती रोक लिया और चाय पिलाई और पूछने लगी; "क्या घर में सत्य नारायण की पूजा है?" अब मैं बड़ा ही धार्मिक आदमी हूँ इसलिए मैं जान बुझ कर चुप रहा और आशु की तरफ देखते हुए मैंने चाय का कप अपने होठों से लगा लिया; "जी आंटी जी!" आशु बोली. चाय पी कर हम निकले और एक ऑटो में बैठ गये. "भगवान् के नाम से झूठ बोला है तूने, इस पाप की भागीदार तू ही हे." मैंने आशु को छेड़ते हुए कहा. "कोई नहीं जी! आपके प्यार के लिए ये पाप भी सर आँखों पर." आशु ने जवाब दिया.

हम दोनों ही बस स्टॉप पहुँच गए पर निशा और उसका बंदा अभी तक नहीं आये थे. बस आने में अभी करीब आधा घंटा था और मैं और आशु आराम से बैठे बातें कर रहे थे. इतने में मैडम का फ़ोन आया और मैं उनका कॉल लेने के लिए बाहर आ गया और हमारी बातें कुछ मेल वगैरह की हो रही थी. तभी निशा और उसका बंदा आ गए और सीधा आशु के पास बैठ गये. मेरी नजर अभी उन पर नहीं पड़ी थी. इतने में मेरी तरफ एक लड़का चलता हुआ आया. आँखों पर काला चस्म, लेदर जैकेट और मुँह में च्युइंग गम खाते हुए वो मेरे पास रूक गया.मैंने मैडम से एक मिनट होल्ड करने को कहा, उनका कॉल होल्ड पर डालते हुए उसकी तरफ देखते हुए सवालियां नजरों से देखने लगा और तभी वो खुद बोल पड़ा; "हाय! आई एम अक्षय!" उसने हाथ मिलाने को आगे बढ़ाया पर मैं अब भी सोच में था की ये कौन है? मेरी उलझन समझ कर वो खुद बोला; "आई एम निशा बॉयफ्रेंड!" ये सुन कर मैं उसे ऊपर से नीचे फिर से देखने लगा और उसे कहा; "जस्ट ए सेक! मॅडम आई विल कॉल यू बॅक.” और मैंने मैडम का कॉल काटा और उस अजीब से भेष को देख कर मेरी हँसी बाहर आने को बेचैन हो गई. ठण्ड अभी शुरू नहीं हुई थी ये मंदबुद्धी लेदर जैकेट पहन के आया था. "यू मस्टबी राज ?! डॉली बॉयफ्रेंड.” उसने बड़े अमेरिकन एक्सेंट के साथ कहा और मेरी हँसी मेरे चेहरे पर झलकने लगी पर मैंने वो फिर भी जैसे-तैसे दबाई और हाँ में सर हिलाया. इतने में निशा आगई और उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ी हो गई और बड़ी अकड़ से मेरी तरफ देखने लगी; "हाऊ दिड यू लाईक हिम?” मैं जानता था की मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला तो मेरे मुँह से हँसी निकल जायेगी इसलिए मैंने बस थम्ब्स अप का निशाँ दिखाया और जाने लगा.

तभी अक्षय मुझे रोकते हुए बोला; "आई एम गोइंग टू गेट सम मिनरल वाटर, वुड यू लाईक सम?” मैंने बस ना में सर हिलाया और आशु के पास आ कर बैठ गया.

ने मेरी तरफ देखा और पूछा; "कैसा लगा अक्षय?"

"नजाने क्या मजबूरी रही होगी निशा की!" मेरे मुँह से बस इतना निकला की आशु और मैं दहाड़े मार के हँसने लगे. वहाँ बैठे सारे लोग हमें देख रहे थे और तभी निशा भी आ गई. उसे देख हमें और भी हँसी आ रही थी और वो बेचारी अनजान हमसे हँसी का कारन पूछ रही थी. आशु ने बात घुमा दी और ये बोल दिया की ऑफिस की बात थी!
 
थोड़ी देर में अक्षय पानी की बोतल ले आया और हमारे सामने बैठ गया.तभी उसकी नजर आशु की रिंग पर गई और उसने पूछ ही लिया, अपनी अमेरिकन एक्सेंट में; "दॅट इज अ नाइस रिंग, हु गेव यू?" आशु के जवाब देने से पहले ही निशा ने उसकी पीठ पर थपकी दी और बोली; "डफर राज जी ने दी और किस की हिम्मत है जो डॉली को रिंग देगा?" इतना कहते हुए निशा ने कॉलेज के पहले दिन वाला काण्ड दोहरा दिया जिसे सुन कर अक्षय चुप हो गया.बेचारा कॉम्प्लेक्स फील करने लगा तो मैंने सोचा की कोई और टॉपिक छेड़ा जाए; "सो गाईज व्हॉट इज दीं प्लॅन? व्हेअर आर वी स्टेयींग अँड व्हॉट आर वी डूयिंग?”

“चील..ब्रो! आई गोट इट!” अक्षय ने कूल बनते हुए कहा.

“ओह रियली? बट कॅन यू शेअर इट विद अस?” मैंने कहा तो अक्षय बड़े ऐटिटूड में बोला; "वन्स वी रीच जयपूर वीआर गोना चेक इन इन टू हॉटेल, रेस्ट अँड ह्याड आऊट फॉर पार्टी एट नाईट!”

“ओके! बट व्हॉट इज दीं नेम ऑफ दीं हॉटेल वीआर चेकिंग इंटो? अँड व्हॉट आर वी डूयिंग फॉर ३ डेज?” मैंने अक्षय की गलती निकालते हुए पूछा.

"रोमांस …रोमांस…. रोमान्स” उसने बड़े क्याजूअली जवाब दिया. पर ये सुन कर डॉली और निशा गुस्से में उसे देखने लगी.

“क्या? आई थोट वीआर गोइंग फॉर रोमांस?” ये सुनते ही निशा ने अपना पर्स उठाया और उस के मुँह पर मारा.

“मंदबुद्धी कहिके मेरा बर्थडे मनाने जा रहा है या हनीमून?" निशा के मुँह से गाली सुनते ही मेरी तगड़ी वाली हँसी छूट गई और आशु आँख फाड़े मुझे देखने लगी.

“यार आई वाज जोकिंग!” अक्षय ने हँसते हुए कहा पर निशा का गुस्सा खत्म नहीं हुआ; "कमीने तुझे बोला था न डॉली के सामने जुबान संभाल के बात करिओ, पर नहीं तूने तो अपनी ..... मरवानी है! सारे बनाये हुए इम्प्रैशन की माँ बहेन एक दी तूने हरामी!"

"तू कभी नहीं सुधरेगी!" आशु ने निशा को गुस्से से देखते हुए अपने दाँत पीसते हुए कहा. मेरा हँसनाबंद हो चूका था. अब मुझे सब समझ आने लगा था. कॉलेज ज्वाइन करने से पहले मैंने आशु को समझाया था की अपने दोस्त सोच समझ कर बनाना. नशेड़ी,गंजेड़ियों, लौंडियाबाजों से दूर रहना और अगर लड़की से दोस्ती की तो कम से कम वो गाली न देती हो! निशा गाली देती थी और आशु मुझसे ये बात छुपाना चाहती थी. मैंने आशु की तरफ देखा और दबी हुई आवाज में कहा; "सिरीयसली??!" आशु ने कान पकडे और मुझे सॉरी कहा पर अब कुछ हो भी क्या सकता था.

"जोक्स अ पार्ट, होटल कौन सा बुक हुआ है?" मैंने पूछा.

"वहाँ पहुँच कर देखते हैं!" अक्षय अब भी बड़ा निश्चिन्त था. मैने आगे कुछ नहीं कहा और चुप-चाप अपना फ़ोन निकाला और ओयो पर दो रूम बुक किये. फिर फ़ोन दोनों की तरफ घुमाया और उन्हें दिखाते हुए बोला; "रूम बुक हो गये हैं."

"देख कमीने और सीख राज जी से!" निशा ने अक्षय को घुसा मारते हुए कहा.

बस के आने का टाइम हो चूका था और गनीमत है की उसकी टिकट्स निशा ने बुक करा दी थी. हमारे सामने व्होल्व्हो आ कर खड़ी हुई और हम चारों अपनी-अपनी सीट्स पर बैठ गये. निशा और अक्षय ठीक हमारे सामने वाली सीट्स पर थे.खिड़की पर आशु बैठी थी. मैं एसल सीट में और उधर अक्षय खिड़की पर और निशा एसल सीट पर.१० मिनट बाद ही बस चल पड़ी और अक्षय ने मुझे देखते हुए अपना हाथ निशा के कन्धों पर रख दिया. पर मुझे कोई दिखावा करने की जरुरत नहीं थी. आशु खुद ही मेरे कंधे पर सर रख चुकी थी और अपने दोनों हाथों से उसने मेरे दाएँ हाथ को पकड़ लिया. “दिड यू प्लॅन ऑल दिस?” मैंने आशु से बड़े प्यार से पूछा. पर वो मेरी बात समझ नहीं पाई और बोली; "मैं कुछ समझी नहीं?"

"निशा को मेरे घर मुझे मनाने के लिए भेजना?"

"बिलकुल नहीं!" आशु ने चौंकते हुए कहा.

"तो फिर वो मेरे घर कैसे आई? किसने एड्रेस दिया उसे मेरा?"

"उसने बाजार में आपको कई बार देखा था और एक आध-बार वो आपके घर के पास से गुजरी तब उसने आपको घर में घुसते-निकलते हुए देखा था. जब मैंने उसे आपसे इंट्रोडस करवाया था तब बाद में उसने बताया की वो तो आपको जानती है, मेरा मतलब की आप कहाँ रहते हो ये जानती है!"

"अच्छा जी?!" मैंने आशु को चिढ़ाते हुए कहा और आशु फिर से मेरे सीने पर सर रख कर बैठ गई.

मुझे नींद का झौंका आ रहा था और आशु अपने बाएं हाथ से मेरे दाएँ हाथ को लॉक कर मेरे कंधे पर सर रख बैठी थी. उसकी ख़ुशी उसके चेहरे से झलक रही थी और दूसरी तरफ अक्षय और निशा जी भर के शो ऑफ करने में लगे थे, एक दूसरे को छेड़ रहे थे, हँसी-ठिठोली कर रहे थे. पर आशु बहुत शांत थी और मन ही मन जैसे इस सब के लिए भगवान् को शुक्रिया कर रही थी. अभी मेरी आँख बंद ही हुई थी की उसने मुझे जगा दिया और बोली' "जानू! मुझे भूख लग रही है!" मैंने घडी देखि तो अभी शाम के ६ बजे थे, फिर उसे ऊपर रखे हुए चिप्स और थम्ब्स अप निकाल के दी. मैं हाथ मोड़ के बैठ गया, आशु ने पहला चिप्स मुझे खिलाया और फिर खुद खाने लगी. इतने में निशा का ध्यान हमारी तरफ आया तो वो भी खाने के लिए उसी चिप्स के पैकेट पर टूट पडी. "राज जी आप मेरी सीट पर बैठ जाओ." निशा बोली.

"हेल्लो मैडम! मैं आपके बॉयफ्रेंड के साथ बैठने यहाँ नहीं आया." मैंने मजाक करते हुए कहा. तभी डॉली ने अपना चिप्स का पैकेट उसे दे दिया; "ये ले खा मोटी!" ये सुन कर हम चारों हँस पडे. इतने में नितु मैडम का फ़ोन आ गया; "तो राज जी बस मिल गई?"

"जी मॅडम मिल गई. इनफैक्ट मैं बस में ही हु. सॉरी उस टाइम आपसे बात नहीं कर पाया."

"अरे कोई बात नहीं, वो दरअसल मैं कंपनी को मेल किया था तो उसने सारा डाटा भेज दिया हे. शनिवार डॉली आएगी तो मैं उसके साथ बैठ कर काम खत्म करती हु." मैडम की बात सुन कर मैं आशु की तरफ हैरानी से देखने लगा. आशु ने अभी तक मैडम को नहीं बताया था की वो शनिवार-रविवार नहीं आ पायेगी! मैडम से बस इतनी ही बात हुई और फिर उन्होंने फ़ोन काट दिया. "आशु तूने मैडम को कॉल करके नहीं बताया?" मैंने आशु से पूछा तो वो अपनी जीभ दाँतों तले दबाते हुए बोली; "भूल गई! सॉरी! अभी कॉल करती हु."

"पागल न बन! कल सुबह कॉल करिओ और बहाना अच्छा मारिओ वरना मैडम जबरदस्ती बुला लेंगी" मैंने आशु को समझाया. खेर रात आठ बजे बस ने एक हॉल्ट लिया और हमारा खाना-पीना हुआ. मैं बस की यात्रा में कुछ ज्यादा खाता-पीता नहीं, चिप्स या बिस्किट और कोल्ड ड्रिंक्स, इससे ज्यादा कुछ नहीं लेता. निशा और अक्षय ने तो दबा कर पेला और पेट भर खाना खाया. आशु ने भी बस दो रोटी खाई और मुझे भी खाने को कहा पर मैंने मना कर दिया. रात के दस बजे होंगे, सारी लाइट्स ऑफ हो गईं और निशा और अक्षय का बस मे रोमांस चालु हो गया.

दोनो ने एक दूसरे को चूमना शुरू कर चुका था.आशु ये सब देख रही थी और मेरी नजर आशु पर थी. आशु बेचैन होने लगी थी पर जानती थी की हम बस में हैं और यहाँ कुछ भी करना पॉसिबल नहीं हे. आशु ने अपने बाएँ हाथ को मेरी कमर में डाला और मेरी तरफ झुक कर मेरे सीने पर अपना सर रख लिया. उसका दाहिना हाथ मेरे पेट पर था और ध्यान अब भी निशा और अक्षय के चूमने पर था. वो दोनों ज्यादा तो कुछ नहीं कर रहे थे बस एक दूसरे को किस ही कर रहे थे और इतने से ही आशु की सांसें भारी होने लगी थी. जिस दिन मैंने आशु का गुस्से से डाँटा था उस दिन से मैंने उसे जरा भी नहीं छुआ था और उसकी ये बेताबी फिर से बाहर आने लगी थी. मैने झुक कर आशु के सर को चूमा ताकि वो अपने जज्बातों को काबू में कर ले.पर मेरा ये किस ऐसा था मानो जैसे किसी ने गर्म तवे पर पानी का छींटा मारा हो. मेरे आशु के सर पर किस करते ही वो मेरी आंखों में प्यास भरी आँखों से देखने लगी. वो आँखों ही आँखों में मुझसे मिन्नत करने लगी. मानो जैसे कह रही हो की बस एक किस! उसकी मासूम आँखों को देख कर मैं पिघलने लगा और झुक कर उसके होटो पर अपने होठों को रख दिया. मैंने अपना मुँह थोड़ा सा खोला और उसके नीचले होंठ को धीरे से अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा.
 
आशु का दायाँ हाथ मेंरे बाएँ गाल पर आ चूका था. आशु ने अपनी रस भरी जीभ मेरे मुँह में दाखिल कर दी थी और वो मेरी जीभ से समागम करने लगी थी. मैंने अपने दोनों हाथों से आशु के मुँह को थाम लिया था. और उसकी जीभ को अपने मुँह में चूसने लगा था. कुछ सेकंड बाद मैंने उसकी जीभ छोड़ दी और अपनी जीभ को धीरे से उसके मुँह में सरका दिया. मेरी जीभ का गर्म जोशी से स्वागत हुआ, डॉली के होठों ने उसे अपने दबाव से पकड़ लिया और आशु उसे चूसने लगी. इसी तरह हम दोनों बारी-बारी से एक दूसरे के होठों को चूस रहे थे और ये सब हम बिना किसी आवाज के और धीरे-धीरे कर रहे थे. जब हम रुके और अलग हुए तो हमारे रस की एक तार हम दोनों के होठों के बीच थी. हम दोनों उस कुछ देर के लिए ये भी भूल चुका था. की हम घर पर नहीं बल्कि बस में हे. जब हम अलग हुए तो आशु की नजर बगल वाली सीट जिस पर निशा और अक्षय बैठे थे उस पर पड़ी और वो एक दम से शर्मा कर मेरे सीने पर दोनों हाथों से अपना मुँह छुपा कर बैठ गई. मैंने जब उस तरफ देखा तो पाया की वो दोनों हमें ही देख रहे थे! हमारे किस से अगर कोई संतुष्ट था तो वो थे निशा और अक्षय! हैरानी बात ये थी की मैं बिलकुल नहीं शरमाया बल्कि मुझे तो जैसे गर्व महसूस हो रहा था. ऐसा लगा जैसे मैं कोई टीचर हूँ और उन दोनों को किस करना सीखा रहा हु. मैंने अपने दोनों हाथों से आशु को अपने सीने से चिपकाया और हाथों को लॉक कर ऐसे जताया की वो मेरे पहलु में सुरक्षित हे. मेरे ऐसा करने से आशु भी संतुष्ट हो गई की वो सुरक्षित है और उसने अपने दोनों हाथों से मुझे कस कर जकड़ लिया. कुछ देर बाद निशा और अक्षय एक दूसरे से कुछ खुसर-फुसर करते हुए सो गये. मुझे ऐसा लगा जैसे निशा अक्षय से कह रही हो की; "सीख राज जी से कुछ! कितना प्याशनेटली किस करते हैं वो डॉली को?" और वो बेचारा जल-भुन के रह गया.

बस मे सब सो चुका थे. एक अकेला मैं ही जाग रहा था. हाईवे में हवा से बातें करती हुई बस, वो साईरन बजाते हुए ट्रकों का गुजरना,वो जगमगाती हुई ढाबों की लाइट्स, वो दूर कहीं किसी के घर की लाइट्स आदि को देखना. मुझे यही देखने में बड़ा मजा आ रहा था और मैं अपनी सोच में गुम था. बारह बजे आशु जागी और उसने मुझे इस तरह से जागा हुआ पाया तो पूछने लगी; "जानू! क्या हुआ? आप जाग क्यों रहे हो?"

"कुछ नहीं जान! मैं रात को बस में सोता नहीं हूँ, ये शान्ति और लाइट्स देखना मुझे अच्छा लगता हे." मैंने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा.

"एक बात कहूँ जानू? आपको पता है मुझे अभी कैसा लग रहा है?"

"कैसा?" मैंने पूछा.

"ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों घर से भाग रहे हैं और कल से हमारी एक नयी जिंदगी शुरू होगी. जहाँ हमें इन समाज के बंधनों की कोई जरुरत या परवाह नहीं होगी. कोई रोक-टोक नहीं! हम आजाद परींदे होंगे! वो फिल्मों वाली फीलिंग आ रही है, जिसमें हीरो अपनी हेरोइन को इसी तरह अपने पहलु में छुपाये घर से भगा कर ले जा रहा हो."

"हम्म... वो दिन भी आएगा मेरी जान! अब आप सो जाओ!" मैंने आशु के सर को चूमते हुए कहा.

"हम जयपुर कब पहुँचेंगे?" आशु ने फिर से मेरे सीने पर सर रखते हुए पूछा.

"सुबह ४ बजे!"

'तो आप भी सो जाओ थोड़ी देर|" आशु ने मुझे उसकी गोद में सर रख कर सोने का निमंत्रण देते हुए कहा.

"आप सो जाओ जान! मुझे ये लाइट्स देखने में आनंद आ रहा हे."

"ठीक है तो मैं भी आपके साथ जागुंगी. मैं भी तो देखूँ की आप किस आनंद की बात कर रहे हो." पर आशु कुछ देर ही मैं बोर हो गई और मेरे कंधे पर सर रख कर सो गई. मैंने धीरे से अपनी जेब से फ़ोन निकाला और अपनी एक सेल्फी ली. आशु मेरे कंधे पर सर रख कर सोते हुए बड़ी प्यारी लग रही थी. फिर मैं फ़ोन से स्लो मोशन वीडियो बनाने लगा, फिर फ़ोन से हेडफोन्स लगाए और गाने सुनने लगा, इसी तरह से मैंने सारी रात पार की. सुबह पौने चार बजे मैंने आशु को उठा दिया.साथ ही निशा और अक्षय को भी उठा दिया. ठीक ४ बजे हमारा स्टैंड आ गया.अपना सामान ले कर हम चारों उतरे और मैंने फटफट ऑटो किया, अब बैठने की बारी आई तो निशा बोली; "अक्षय तू आगे बैठ जा!" आगे का मतलब था ड्राइवर के साथ और ये सुन कर वो निशा की तरफ सवलिया नजरों से देखने लगा. मुझे हँसी तो बहुत आई पर मैं कुछ नहीं बोला और हम तीनों पीछे बैठ गये. मैंने नेविगेशन ऑन कर दी थी की कहीं ऑटो वाला होशियारी न करे और मैं ऑटो वाले को ऐसे बता रहा था जैसे मैं इस इलाके से परिचित हु. वो भी मुझसे पूछ रहा था की; "बाबू आप यहीं के रहने वाले हो?" मैंने भी जवाब में हाँ कहा और उसे आगे ज्यादा बात करने का मौका नहीं दिया. पर अक्षय तो मंदबुध्दी ही निकला वो पूछने लगा; "राज आप जयपुर के हो?"

अब उसकी बात सुन कर मैं निशा की तरफ देखने लगा और वो अपना सर पीटते हुए बोली; "ही इज ब्लफिंग यू मोरोन" तब जा कर उसे समझ आया और वो चुप कर गया.होटल पहुँच कर मैंने अपनी रिजर्वेशन दिखाई और हम अपने-अपने कमरे में आ गये. सामान रख कर मेरा जासूसी दिमाग चालु हो गया और मैं अपना और आशु का फ़ोन ले कर कमरे घूमना शुरू कर दिया.

ये ओयो का होटल था और हाल ही में इसके बारे में छूपा था की यहाँ पर रूम्स के अंदर हिडन कैमरा लगे होते हे. आशु बड़ी हैरानी से मुझे ये जासूसी करते हुए देख रही थी और जब मेरी तहक़ीक़ात पूरी हो गई तो वो बोली; "ये आप क्या कर रहे थे?" तब मैंने आशु को सारी बात बताई और वो कहने लगी की हम कहीं और चलते हे. "जान! किस होटल में कैमरा लगा है ये किसी को नहीं पता, पर अपनी तरफ से चेक कर लेना बेहतर हे. इस कमरे में कहीं कोई कैमरा नहीं हे. सो रिलॅक्स! ओके?!" मेरी बात से आशु आश्वस्त हो गई और हम अपने कपडे बदल कर लेट गये.मुझे लग रहा था की आशु संभोग के लिए आतुर हो गई पर उसके ठीक उलट वो तो बस मेरे सीने पर सर रख कर, अपने बाएँ हाथ से मुझे जकड़ और अपनी बायीं टाँग मेरे पेट पर रख कर सो गई. मैंने आशु के सर को चूमा और मैं भी सो गया.

सुबह १० बजे मेरी आँख खुली और आशु अब भी मेरे से उसी तरह चिपकी हुई थी. मैं उठने लगा तो उसकी भी आँख खुल गई पर फिर भी लेटी रही. में फ्रेश हो कर आपस आ गया और तब तक आशु भी उठ गई थी और टी.वी चालु कर रही थी. मुझे देखते ही वो आ कर मेरे से लिपट गई; "जानू! आज कौन सा आपको ऑफिस जाना है जो उठ गए?" मैंने प्यार से आशु के सर को चूमा और कहा; "क्या करें? आदत है उठने की और वैसे भी भूख लग आई थी." फिर मैंने अपने और आशु के लिए नाश्ता मँगवाया जो की कॉम्प्लिमेंट्री था. नाश्ता खा कर आशु फिर से बिस्तर में बैठ गई पर मैं तैयार होने लगा. मुझे ऐसे तैयार होता हुआ देख वो बोली; "कहाँ जा रहे हो आप?"

"यहाँ कमरे में सोने थोड़े ही आये हैं? चलो रेडी हो जाओ यहाँ इतनी सारी जगह है घूमने की और हाँ याद है नितु मैडम को भी इन्फॉर्म कर दो." तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैंने दरवाजा खोला और निशा अंदर आ गई. "आप कहीं जा रहे हो राज जी?" उसने पूछा.

"मैं तो आप दोनों को जगाने आ रहा था. की कहीं घूम कर आते हैं." मेरी बात सुन कर निशा खुश हो गई और रेडी होने चली गई. इधर आशु ने भी तैयार होना शुरू कर दिया. आज आशु ने पहलीबार जीन्स और एक टॉप पहना था और उसे जब देखा तो मेरी आँखें उस पर से हट ही नहीं रही थी.

"क्या कहूँ तेरी सूरत-ए-तारीफ में मेरे हमदम,

अल्फाज खत्म हो गए हैं तेरी अदाएं देख-देख के!"

ये शेर सुनते ही आशु भागती हुई आई और मेरे गले लग गई. शर्म से गाल लाल हो चुका था.. हम ऐसे ही दूसरे में खोये हुए थे, निशा की आवाज ने हमें वापस रियलिटी में खींच लिया. "ओ लव-बर्ड्स चलो" उसने हँसते हुए कहा. हाथों में हाथ लिए मैं और आशु कमरा लॉक कर के होटल से निकले और हमने ऑटो किया, सबसे पहले हम हवा महल पहुंचे और उसके पास वाली मार्केट में घूमने लगे. निशा तो वहाँ की दुकानें देख कर शॉपिंग करने को कूद पड़ी और आशु को भी अपने साथ खींच के ले गई. दोनों एक पटरी वाले के पास झुमके देख रहे थे और मैं अपनी जेब में हाथ डाले खड़ा उन्हें देख रहा था. अचानक से निशा ने एक झुमका आशु को दिया और ट्राय करने को कहा पर आशु ने मना कर दिया. मुझसे नजर बचा कर उसने खुसफुसाती हुए निशा से कहा; "मेरी सैलरी जीन्स और टॉप में खत्म हो गई... तू ले ले!" निशा भी खुसफुसाती हुए कहने लगी; "अरे मुझे बाद में दे दियो!" पर आशु नहीं मानी और उसने वो झुमका निशा को वापस दे दिया. निशा बहुत होशियार थी उसने हाथ हिला कर मुझे अपने पास बुलाया और वो झुमके का पैकेट मुझे दिया और इशारे से कहा की मैं आशु को खरीद कर दू. मैंने वो झुमके को पैकेट को गौर से देखा और वापस नीचे रख दिया. मेरा ऐसा करने से निशा का मुँह बन गया.वो सोचने लगी की कितना कंजूस बॉयफ्रेंड है डॉली का, पर अगले ही पल मैंने एक रॉयल ब्लू कलर का झुमका उठाया और उसे आशु को ट्राय करने को कहा. मेरा ऐसा करने से निशा की ख़ुशी लौट आई पर आशु ने ना में सर हिला कर मना कर दिया. "अच्छा लगेगा अगर मैं यहाँ तुझे एक खींच कर चमाट मार दूँ?" मैंने आशु को थोड़ा प्यार से डराते हुए कहा. उसने चुप चाप वो झुमके मुझे पहन के दिखाए और जब उसने खुद को आईने में देखा तो ख़ुशी से उछाल पड़ी और आ कर मेरे सीने से लग गई. निशा ने भी इसका फायदा उठाया और हम दोनों की तस्वीर खींच ली! भरी-पूरी मार्किट में एक प्रेमी जोड़ा सब कुछ भूल कर बस एक दूसरे के गले लगा हुआ हे. हम तो जैसे अलग होना ही नहीं चाहते थे पर इस मंदबुध्दी अक्षय ने एक्साइटमेट में शोर मचा दिया और हम दोनों अलग हो गये. मैंने अपना वॉलेट निकाला और आशु को १०००/- रुपये दे दिए इतने में अक्षय ने मुझे स्मोक करने का इशारा किया. आशु ने ये देख लिया और हाँ में सर हिला कर मुझे इजाज़त दी.
 
आशु का दायाँ हाथ मेंरे बाएँ गाल पर आ चूका था. आशु ने अपनी रस भरी जीभ मेरे मुँह में दाखिल कर दी थी और वो मेरी जीभ से समागम करने लगी थी. मैंने अपने दोनों हाथों से आशु के मुँह को थाम लिया था. और उसकी जीभ को अपने मुँह में चूसने लगा था. कुछ सेकंड बाद मैंने उसकी जीभ छोड़ दी और अपनी जीभ को धीरे से उसके मुँह में सरका दिया. मेरी जीभ का गर्म जोशी से स्वागत हुआ, डॉली के होठों ने उसे अपने दबाव से पकड़ लिया और आशु उसे चूसने लगी. इसी तरह हम दोनों बारी-बारी से एक दूसरे के होठों को चूस रहे थे और ये सब हम बिना किसी आवाज के और धीरे-धीरे कर रहे थे. जब हम रुके और अलग हुए तो हमारे रस की एक तार हम दोनों के होठों के बीच थी. हम दोनों उस कुछ देर के लिए ये भी भूल चुका था. की हम घर पर नहीं बल्कि बस में हे. जब हम अलग हुए तो आशु की नजर बगल वाली सीट जिस पर निशा और अक्षय बैठे थे उस पर पड़ी और वो एक दम से शर्मा कर मेरे सीने पर दोनों हाथों से अपना मुँह छुपा कर बैठ गई. मैंने जब उस तरफ देखा तो पाया की वो दोनों हमें ही देख रहे थे! हमारे किस से अगर कोई संतुष्ट था तो वो थे निशा और अक्षय! हैरानी बात ये थी की मैं बिलकुल नहीं शरमाया बल्कि मुझे तो जैसे गर्व महसूस हो रहा था. ऐसा लगा जैसे मैं कोई टीचर हूँ और उन दोनों को किस करना सीखा रहा हु. मैंने अपने दोनों हाथों से आशु को अपने सीने से चिपकाया और हाथों को लॉक कर ऐसे जताया की वो मेरे पहलु में सुरक्षित हे. मेरे ऐसा करने से आशु भी संतुष्ट हो गई की वो सुरक्षित है और उसने अपने दोनों हाथों से मुझे कस कर जकड़ लिया. कुछ देर बाद निशा और अक्षय एक दूसरे से कुछ खुसर-फुसर करते हुए सो गये. मुझे ऐसा लगा जैसे निशा अक्षय से कह रही हो की; "सीख राज जी से कुछ! कितना प्याशनेटली किस करते हैं वो डॉली को?" और वो बेचारा जल-भुन के रह गया.

बस मे सब सो चुका थे. एक अकेला मैं ही जाग रहा था. हाईवे में हवा से बातें करती हुई बस, वो साईरन बजाते हुए ट्रकों का गुजरना,वो जगमगाती हुई ढाबों की लाइट्स, वो दूर कहीं किसी के घर की लाइट्स आदि को देखना. मुझे यही देखने में बड़ा मजा आ रहा था और मैं अपनी सोच में गुम था. बारह बजे आशु जागी और उसने मुझे इस तरह से जागा हुआ पाया तो पूछने लगी; "जानू! क्या हुआ? आप जाग क्यों रहे हो?"

"कुछ नहीं जान! मैं रात को बस में सोता नहीं हूँ, ये शान्ति और लाइट्स देखना मुझे अच्छा लगता हे." मैंने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा.

"एक बात कहूँ जानू? आपको पता है मुझे अभी कैसा लग रहा है?"

"कैसा?" मैंने पूछा.

"ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों घर से भाग रहे हैं और कल से हमारी एक नयी जिंदगी शुरू होगी. जहाँ हमें इन समाज के बंधनों की कोई जरुरत या परवाह नहीं होगी. कोई रोक-टोक नहीं! हम आजाद परींदे होंगे! वो फिल्मों वाली फीलिंग आ रही है, जिसमें हीरो अपनी हेरोइन को इसी तरह अपने पहलु में छुपाये घर से भगा कर ले जा रहा हो."

"हम्म... वो दिन भी आएगा मेरी जान! अब आप सो जाओ!" मैंने आशु के सर को चूमते हुए कहा.

"हम जयपुर कब पहुँचेंगे?" आशु ने फिर से मेरे सीने पर सर रखते हुए पूछा.

"सुबह ४ बजे!"

'तो आप भी सो जाओ थोड़ी देर|" आशु ने मुझे उसकी गोद में सर रख कर सोने का निमंत्रण देते हुए कहा.

"आप सो जाओ जान! मुझे ये लाइट्स देखने में आनंद आ रहा हे."

"ठीक है तो मैं भी आपके साथ जागुंगी. मैं भी तो देखूँ की आप किस आनंद की बात कर रहे हो." पर आशु कुछ देर ही मैं बोर हो गई और मेरे कंधे पर सर रख कर सो गई. मैंने धीरे से अपनी जेब से फ़ोन निकाला और अपनी एक सेल्फी ली. आशु मेरे कंधे पर सर रख कर सोते हुए बड़ी प्यारी लग रही थी. फिर मैं फ़ोन से स्लो मोशन वीडियो बनाने लगा, फिर फ़ोन से हेडफोन्स लगाए और गाने सुनने लगा, इसी तरह से मैंने सारी रात पार की. सुबह पौने चार बजे मैंने आशु को उठा दिया.साथ ही निशा और अक्षय को भी उठा दिया. ठीक ४ बजे हमारा स्टैंड आ गया.अपना सामान ले कर हम चारों उतरे और मैंने फटफट ऑटो किया, अब बैठने की बारी आई तो निशा बोली; "अक्षय तू आगे बैठ जा!" आगे का मतलब था ड्राइवर के साथ और ये सुन कर वो निशा की तरफ सवलिया नजरों से देखने लगा. मुझे हँसी तो बहुत आई पर मैं कुछ नहीं बोला और हम तीनों पीछे बैठ गये. मैंने नेविगेशन ऑन कर दी थी की कहीं ऑटो वाला होशियारी न करे और मैं ऑटो वाले को ऐसे बता रहा था जैसे मैं इस इलाके से परिचित हु. वो भी मुझसे पूछ रहा था की; "बाबू आप यहीं के रहने वाले हो?" मैंने भी जवाब में हाँ कहा और उसे आगे ज्यादा बात करने का मौका नहीं दिया. पर अक्षय तो मंदबुध्दी ही निकला वो पूछने लगा; "राज आप जयपुर के हो?"

अब उसकी बात सुन कर मैं निशा की तरफ देखने लगा और वो अपना सर पीटते हुए बोली; "ही इज ब्लफिंग यू मोरोन" तब जा कर उसे समझ आया और वो चुप कर गया.होटल पहुँच कर मैंने अपनी रिजर्वेशन दिखाई और हम अपने-अपने कमरे में आ गये. सामान रख कर मेरा जासूसी दिमाग चालु हो गया और मैं अपना और आशु का फ़ोन ले कर कमरे घूमना शुरू कर दिया.

ये ओयो का होटल था और हाल ही में इसके बारे में छूपा था की यहाँ पर रूम्स के अंदर हिडन कैमरा लगे होते हे. आशु बड़ी हैरानी से मुझे ये जासूसी करते हुए देख रही थी और जब मेरी तहक़ीक़ात पूरी हो गई तो वो बोली; "ये आप क्या कर रहे थे?" तब मैंने आशु को सारी बात बताई और वो कहने लगी की हम कहीं और चलते हे. "जान! किस होटल में कैमरा लगा है ये किसी को नहीं पता, पर अपनी तरफ से चेक कर लेना बेहतर हे. इस कमरे में कहीं कोई कैमरा नहीं हे. सो रिलॅक्स! ओके?!" मेरी बात से आशु आश्वस्त हो गई और हम अपने कपडे बदल कर लेट गये.मुझे लग रहा था की आशु संभोग के लिए आतुर हो गई पर उसके ठीक उलट वो तो बस मेरे सीने पर सर रख कर, अपने बाएँ हाथ से मुझे जकड़ और अपनी बायीं टाँग मेरे पेट पर रख कर सो गई. मैंने आशु के सर को चूमा और मैं भी सो गया.

सुबह १० बजे मेरी आँख खुली और आशु अब भी मेरे से उसी तरह चिपकी हुई थी. मैं उठने लगा तो उसकी भी आँख खुल गई पर फिर भी लेटी रही. में फ्रेश हो कर आपस आ गया और तब तक आशु भी उठ गई थी और टी.वी चालु कर रही थी. मुझे देखते ही वो आ कर मेरे से लिपट गई; "जानू! आज कौन सा आपको ऑफिस जाना है जो उठ गए?" मैंने प्यार से आशु के सर को चूमा और कहा; "क्या करें? आदत है उठने की और वैसे भी भूख लग आई थी." फिर मैंने अपने और आशु के लिए नाश्ता मँगवाया जो की कॉम्प्लिमेंट्री था. नाश्ता खा कर आशु फिर से बिस्तर में बैठ गई पर मैं तैयार होने लगा. मुझे ऐसे तैयार होता हुआ देख वो बोली; "कहाँ जा रहे हो आप?"

"यहाँ कमरे में सोने थोड़े ही आये हैं? चलो रेडी हो जाओ यहाँ इतनी सारी जगह है घूमने की और हाँ याद है नितु मैडम को भी इन्फॉर्म कर दो." तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैंने दरवाजा खोला और निशा अंदर आ गई. "आप कहीं जा रहे हो राज जी?" उसने पूछा.

"मैं तो आप दोनों को जगाने आ रहा था. की कहीं घूम कर आते हैं." मेरी बात सुन कर निशा खुश हो गई और रेडी होने चली गई. इधर आशु ने भी तैयार होना शुरू कर दिया. आज आशु ने पहलीबार जीन्स और एक टॉप पहना था और उसे जब देखा तो मेरी आँखें उस पर से हट ही नहीं रही थी.

"क्या कहूँ तेरी सूरत-ए-तारीफ में मेरे हमदम,

अल्फाज खत्म हो गए हैं तेरी अदाएं देख-देख के!"

ये शेर सुनते ही आशु भागती हुई आई और मेरे गले लग गई. शर्म से गाल लाल हो चुका था.. हम ऐसे ही दूसरे में खोये हुए थे, निशा की आवाज ने हमें वापस रियलिटी में खींच लिया. "ओ लव-बर्ड्स चलो" उसने हँसते हुए कहा. हाथों में हाथ लिए मैं और आशु कमरा लॉक कर के होटल से निकले और हमने ऑटो किया, सबसे पहले हम हवा महल पहुंचे और उसके पास वाली मार्केट में घूमने लगे. निशा तो वहाँ की दुकानें देख कर शॉपिंग करने को कूद पड़ी और आशु को भी अपने साथ खींच के ले गई. दोनों एक पटरी वाले के पास झुमके देख रहे थे और मैं अपनी जेब में हाथ डाले खड़ा उन्हें देख रहा था. अचानक से निशा ने एक झुमका आशु को दिया और ट्राय करने को कहा पर आशु ने मना कर दिया. मुझसे नजर बचा कर उसने खुसफुसाती हुए निशा से कहा; "मेरी सैलरी जीन्स और टॉप में खत्म हो गई... तू ले ले!" निशा भी खुसफुसाती हुए कहने लगी; "अरे मुझे बाद में दे दियो!" पर आशु नहीं मानी और उसने वो झुमका निशा को वापस दे दिया. निशा बहुत होशियार थी उसने हाथ हिला कर मुझे अपने पास बुलाया और वो झुमके का पैकेट मुझे दिया और इशारे से कहा की मैं आशु को खरीद कर दू. मैंने वो झुमके को पैकेट को गौर से देखा और वापस नीचे रख दिया. मेरा ऐसा करने से निशा का मुँह बन गया.वो सोचने लगी की कितना कंजूस बॉयफ्रेंड है डॉली का, पर अगले ही पल मैंने एक रॉयल ब्लू कलर का झुमका उठाया और उसे आशु को ट्राय करने को कहा. मेरा ऐसा करने से निशा की ख़ुशी लौट आई पर आशु ने ना में सर हिला कर मना कर दिया. "अच्छा लगेगा अगर मैं यहाँ तुझे एक खींच कर चमाट मार दूँ?" मैंने आशु को थोड़ा प्यार से डराते हुए कहा. उसने चुप चाप वो झुमके मुझे पहन के दिखाए और जब उसने खुद को आईने में देखा तो ख़ुशी से उछाल पड़ी और आ कर मेरे सीने से लग गई. निशा ने भी इसका फायदा उठाया और हम दोनों की तस्वीर खींच ली! भरी-पूरी मार्किट में एक प्रेमी जोड़ा सब कुछ भूल कर बस एक दूसरे के गले लगा हुआ हे. हम तो जैसे अलग होना ही नहीं चाहते थे पर इस मंदबुध्दी अक्षय ने एक्साइटमेट में शोर मचा दिया और हम दोनों अलग हो गये. मैंने अपना वॉलेट निकाला और आशु को १०००/- रुपये दे दिए इतने में अक्षय ने मुझे स्मोक करने का इशारा किया. आशु ने ये देख लिया और हाँ में सर हिला कर मुझे इजाज़त दी.
 
"दो गोल्ड फ्लैक" अक्षय ने कहा तो मैंने उसे मना कर दिया और अपने लिए एक अल्ट्रा ली, मुझे अल्ट्रा फूँकते देख उसे मेरी रईसी भा गई. २ मिनट बाद ही आशु और निशा दोनों ही हमारे पास आ गई. अक्षय ने सिगरेट निशा की तरफ बढ़ाई और उनसे काश लेते हुए आशु को भी पीने का इशारा किया. आशु मेरी तरफ देखने लगी और मैंने नहीं में सर हिलाया और उसे सिगरेट नहीं दी. "तू स्मोक करती है?" मैंने आशु से पूछा तो उसने ना में सर हिलाया. "खा मेरी कसम!" मैंने कहा तो आशु ने झट से मेरी कसम खाई और बोली; "मैंने आज तक कभी सिगरेट नहीं पि आपके साथ उस दिन पार्टी में जो पिया था उसके बाद कुछ भी नहीं पिया या खाया."

"गिव हरसम फ्रीडम मेन!" अक्षय ने बीच में बोलते हुए कहा.

"शी ह्याज ऑल दीं फ्रीडम शी वांट बट स्मोकिंग इजंट अलो!” मैंने हुक्म से बोला.

"दॅट इज नॉट फेयर! यू स्मोक टू!" निशा बोली.

"बिकाज आई गेव हिम परमिशन!" आशु बोली और ये सुन कर वो दोनों चुप हो गये. सिगरेट खत्म हो चुकी थी तो हम पैदल चलते हुए हवा महल पहुँचे और वहाँ टिकट ले कर घूमे, ऊपर चढ़ कर हमने बहुत सी पिक्चर खींची! ३ बजे हम वहाँ से निकले और खाना खाने एक रेस्टरंट में बैठ गये. खाना आज आशु ने आर्डर किया, दाल बाटी, राजस्थानी कढ़ी, बाजरे की रोटी, गट्टे का पुलाव और मीठे में घेवर. "रिसर्च कर के आई हो?" मैंने आशु की तारीफ करते हुए कहा और वो मुस्कुराते हुए बोली; "आपसे सीखा हे." खाना खा कर हम उठे थे की नितु मैडम का फ़ोन आ गया; "राज जी! आप क्या गए यहाँ तो सब के सब मुझे अकेला छोड़ के चले गए?" ये सुन कर मैं थोड़ा हैरान हुआ और समझ नहीं आया की मैडम का कहने का मतलब क्या है; "मैं कुछ समझा नहीं मॅडम?"

"अरे डॉली भी छुट्टी मार रही है! उसके घर पर किसी की डेथ हो गई हे." ये सुनते ही मेरी आँखें बड़ी हो गई और मैं हैरानी से आशु को देखने लगा.

"ओह! मॅडम किसकी डेथ हो गई कुछ बताया नही डॉली जी ने?" मैंने आशु की तरफ देखते हुए कहा और तब वो समझी की क्या माजरा हे.

"उसके नाना जी की डेथ हो गई. बेचारे उम्रदराज जो थे!" मैं चुप रहा और मुझे आशु का बहाना सुन कर हँसी भी आ रही थी और गुस्सा भी. आशु के नाना की मृत्यु कुछ साल पहले ही हो चुकी थी और मुझे बुरा लगा की उसने ऐसा झूठ बोला. मैडम ने कुछ काम जे जुडी बातें की और फिर उन्होंने बाय बोल कर कॉल रख दिया. "तुझे मारने के लिए कोई और नहीं मिला?" मैंने आशु से हँसते हुए पूछा. ये सुन कर निशा पूछने लगी तो आशु ने खुद ही सारी बात बताई.ये उन कर वो और अक्षय दोनों हँसने लगे पर आशु जानती की मुझे उसकी ये बात बुरी लगी हे.

हम होटल लौटे और रात को पब जाने का प्लान बना था. मैंने अपने कपडे उतारे और अंडर गारमेंट्स में ही लेट गया.आशु ने भी अपने कपडे बदले और पलंग पर चढ़ गई. फिर अपने दोनों कान पकडे और घुटनों के बल बैठ गई; "जानू! आई एम रियली सॉरी! मैं ऐसा झूठ नहीं बोलना चाहती थी. पर मुझे कोई और बहाना नहीं सूझा. आई एम रियली सॉरी!” मैंने अपनी बाहें खोल दीं और आशु आ कर मेरे सीने से चिपक गई. मैंने उसे माफ़ कर दिया. पर निशा की दोस्ती में आशु कुछ ज्यादा ही बिगड़ने लगी थी. कल रात जागने की वजह से मुझे नींद आ रही थी और हम ऐसे ही सो गये. शाम के ७ बजे होंगे की निशा हमें उठाने आई. आशु दरवाजा खोलने गई और मैं बाथरूम जा रहा था. निशा ने मुझे कच्छे में बाथरूम घुसते देख लिया और वो आशु को छेड़ने लगी. हम तैयार हो कर निकले तो आशु और निशा को भूख लगी थी और उन्हें चाहिए था खाना. अक्षय ने उन्हें समझाया की जो खाना है वो पब में ही खाना हे. हम पब पहुँचे और अक्षय ने हमारे लिए एक बूथ ले लिया. लड़कियों ने खाना मंगाया और अक्षय ने ड्रिंक्स मेनू मेरी तरफ बढ़ा दिया. वो जानता था की मेरी पसंद बढ़िया है! अपने, आशु और निशा के लिए हेनिकेन्स मंगवाई और अक्षय को शो-ऑफ करना था तो उसने अपने लिए कोरोना मंगाई! म्यूजिक अभी बहुत स्लो था. लोग भी ज्यादा नहीं थे. तो बियर पीते हुए बातें शुरू हुईं;

अक्षय: सो हाऊ दिड यू गाईज मिट?

अब इस बारे में आशु मुझे पहले ही बता चुकी थी की उसने निशा को क्या झूठ बोला हे. मैंने भी आशु की बात को दोहरा दिया;

मैं: वी मिट इन अ बस.

निशा: ओह कम ऑन राज जी! आई विल टेल यू दीं व्होल स्टोरी. सो अक्च्युअली इट वाज अ संडे मॉर्निंग अँड शी वाज ऑन हरवे टू समव्हेअर. शी वाज सिटिंग अलोन ऑन दीं बस स्टँड अँड दॅट इज दीं फर्स्ट टाइम ही (राज ) सॉ हर. देन दीं बस केम अँड दे बोथ टूक अ सिट बट नॉट टूगेदर बट अट सम दिस्टांस. राज जी वाज सिटिंग अ सिट अगदी ऑफ हर अँड शी वाज बिजी लूकिन आऊटसाइड. देन अन ओल्ड अंकल केम अँड ही (राज ) ऑफर हिज सिट टू देम अँड स्टूड. दॅट इज दीं फर्स्ट टाइम शी सॉ हिम अँड दे वेयर कोंस्टांटली सियींग इचअदर. दे गोट डाऊन यट दीं सेम बस स्टँड अँड ही (राज ) सेड ‘हाई’ टू हर अँड शी जस्ट स्माइल. देन दे सिंपली मूव इंटो दिफरंट डीरेक्शन.

अक्षय: व्हॉट दीं हेल? व्हाय दिडंत यू गाईज टॉक? दिडंत एवन एक्सचेंज नंबर?

निशा: स्टोरी इज नॉट ओव्हर, यू डफर! देन आफ्टर फ्यू डेज दे मिट अगैन ऑन दीं सेम बस स्टँड अँड दिस टाइम दे वेयर सिटिंग नेक्स्ट टू इच अदर ऑन दीं बस. ही (राज ) स्टारटेड दीं कंवरसेशन अदरवाइज दिस डंबो (आशु) वूड नोट ह्याव अतर्ड अ वर्ड. अँड दॅट इज हाऊ दे केम क्लोज!

आशु ये सब मुस्कुराती हुई मेरे बाएँ कंधे पर सर रख कर सुन रही थी. सच में बड़ी डिटेल में कहानी बना कर सुनाई थी उसने निशा को.

धीरे-धीरे म्यूजिक लाउड हो रहा था और नौजवान लोगों का ताँता लगना शुरू हो गया था. बातें करते-करते कब चारों ने तीन-तीन बियर की बोतल ख़त्म कर दी पता ही नहीं चला. चूँकि हेनिकेन्स बड़ी स्मूथ बियर होती है तो हम चारों में से कोई भी नशे में नहीं था. एक हल्का सा सुरूर जरूर था. अभी सिर्फ १० ही बजे थे और डी.जे ने अंग्रेजी गाने बजाने शुरू कर दिए थे और हमारे अक्षय को बस एक ही सिंगर का नाम था और एक ही गाना पसंद था. वो गाना था जस्टिन बिबेर का; 'बेबी...इन्होने अपनी फरमाइश कर दी और डी.जे. भाई ने बजा दिया... गाना! ये भाईसाहब अकेले थे जो खड़े हो कर झूम रहे थे! आशु ने मुझे कोहनी मारी और दिखाया की बाकी सब अक्षय पर हँस रहे थे! हंसी तो मुझे भी आ रही थी पर मैं जैसे-तैसे हँसी झेल गया.इधर निशा ने गुस्से में अपने लिए स्कॉच मँगा ली, मैं समझ गया की आज रायता जरूर फैलना हे. अब स्कॉच देख कर आशु ने मेरी देखा, अब उसे मन नहीं कर सका. मैंने हम दोनों के लिए भी स्कॉच मंगाई पर आशु के ३० मिली को अपनी ड्रिंक में डाल कर १० मिली कर दिया! वो प्यार भरे गुस्से से मुझे देखते हुए बोली; दॅट इज नॉट फेयर!" मैंने प्यार से उसके गाल को चूमा और कहा; "अब हो गया न फेयर?" आशु खुश हो गई और पूरा ड्रिंक एक बार में गटक गई. मैं हैरानी से उसे देखता रह गया पर उसके चेहरे पर प्राउड वाली फीलिंग थी. मानो जैसे इस तरह एक घूँट में सारा ड्रिंक पी कर उसने कोई तीर मारा हो. मुझे उसके ऐसा करने पर प्यार आ गया और आशु मेरे सीने से सर लगा कर बैठी रही.

इधर निशा हम दोनों को देख-देख कर जल रही थी. उसने आधा ड्रिंक पिया, खड़ी हो कर डांस फ्लोर पर चली गई और अक्षय के साथ नाचने लगी. मैं और आशु अब भी ऐसे ही बैठे थे और मैं धीरे-धीरे ड्रिंक कर रहा था. आशु बहुत शांत थी और स्कॉच का हल्का-हल्का असर उस पर आने लगा था. "जानू! आज मैं भी चिकन विंग्स खाऊँ?" उसने पूछा तो मैंने सीधा वेटर को बुलाया और चिकन विंग्स आर्डर कर दिये. इधर निशा और अक्षय थक कर वापस आ कर बैठ गये. अक्षय ने भी अपने लिए स्कॉच मँगाई और धीरे-धीरे पीने लगा. १० मिनट बाद चिकन विंग्स आ गए और सबसे पहले आशु ने एक पीस उठाया. मैंने आशु वाले पीस पर आधा निम्बू और निचोड़ दिया. पहली बाईट लेते ही आशु को मजा आ गया.निम्बू की खटास थी तो आशु को उबकाई नहीं आई वरना मुझे डर था कहीं वो उलटी न कर दे.

"वाव! इट्स सो यमी....! मैंने अपने जीवन ले १९ साल बिना इसे खाय कैसे निकाल दिए?" आशु ने चटकारा लेते हुए कहा. आशु को चिकन खाता देख निशा आँखें फाड़े देख रही थी. "राज जी! आपने क्या जादू कर दिया डॉली पर? जिसे नॉन-वेज देख कर उलटी आती थी वो आज चिकन खा रही हे." निशा ने मुझसे पूछा. "मैंने कुछ नहीं किया. मैडम जी को आज खुद खाने का मन किया." मैंने सफाई देते हुए कहा. खेर हम तीनों का ड्रिंक खत्म हो चूका था और किसी ने डी.जे. से रोमांटिक गाने की फरमाइश कर दी. "दिल दियां गल्लां" जैसे ही बजा निशा मुझे और आशु को खींच कर डांस फ्लोर पर ले आई. आशु को स्कॉच की थोड़ी-थोड़ी खुमारी चढ़ने लगी थी और डांस फ्लोर पर सभी कपल्स को देख उसने भी ठीक वैसे ही डांस करना शुरू कर दिया. शुरुआत में आशु मेरी तरफ मुँह कर के खड़ी थी और मेरे दोनों हाथ उसके कमर पर थे, आशु के भी दोनों हाथ मेरे दोनों कन्धों पर थे. हम दोनों बस धीरे-धीरे दाएँ से बाएँ हिल रहे थे.

मैं आशु की आँखों में खुमारी साफ़ देख पा रहा था और आशु मेरी आँखों में अपने लिए प्यार|.

"दिल दियां गल्लां

करांगे नाल नाल बह के

आँख नाले आँख नू मिला के

दिल दियां गल्लां…"

मैं और दोनों ही गाने को लिप सिंक कर रहे थे और एक दूसरे की आँखों में खो गए थे. उस पूरे गाने के दौरान ना तो हमें किसी की परवाह थी न खबर. बस एक आशु और एक मैं.....

डी.जे. ने गाना खत्म होने के बाद जो गाना लगाया उससे तो माहौल और भी रोमैंटिक हो गया.अगला गाना था; ऑल ऑफ मी - जॉन लेजंड का.गाना चेंज होते ही मैंने और आशु ने अपने डांस स्टाइल भी चेंज कर दिया.

मेरा बायाँ हाथ आशु की कमर पर था और उसका दाहिना हाथ मेरी कमर पर था. मेरे दाहिने हाथ में आशु का बायाँ हाथ था और अब हम अपने पैरों को लेफ्ट-राइट के साथ आगे-पीछे भी कर रहे थे. आशु इस गाने के बोल नहीं जानती थी इसलिए वो बस मेरी आँखों में देख रही थी. पर मैं गाने के सारे बोल जानता था और मैं वो गाते हुए आशु की आँखों में देख रहा था.

मेरा हाथ आशु की गर्दन से लेकर कमर और फिर उसके कूल्हे तक गाने के बोल के साथ फिसलते हुए आ गया था. आशु उस गाने को समझते हुए अपने पंजों पर खड़ी हो गई मुझे किस करने को और मैं भी उस गाने में इतना खो गया था की मैंने आशु के होठों को पहले चूमा और फिर हमने फ्रेंच किस की पर बहुत ही स्लो! हमें इस तरह किस करते हुए देख वहां सारे लौंडों और निशा ने हल्ला मचा दिया. डी.जे. ने भी माइक पर अन्नोउंस कर दिया; "गिव अ चीयर फॉर दिस ब्युटीफुल कपल." ये सुन कर सब ने चिल्लाना शुरू कर दिया पर मैं और आशु उसी तरह प्याशनेटली एक दूसरे को किस करते रहे. १० सेकंड बाद जब दोनों पर नशा कुछ कम हुआ और याद आया की हम बाहर हैं तो आशु शर्मा गई और मेरा हाथ पकड़ के मुझे खींच के वापस बूथ पर ले आई. वहाँ बैठते ही उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया और मेरे सीने से लग गई. मैं आशु के सर को चूमने लगा और उससे पूछा; "बियर चाहिए?" आशु ने बिना मेरी तरफ देखे हाँ में सर हिलाया. मैंने उसके लिए बियर और अपने लिए ६०मिली स्कॉच मँगाई! तभी निशा और अक्षय भी आ गए और निशा आशु को गुदगुदी करते हुए छेड़ने लगी. आशु खिलखिला के हँसने लगी. अक्षय ने भी अपने और निशा के लिए ड्रिंक्स आर्डर की और खाने के लिए ड्रम्स ऑफ़ हेवन आर्डर किये. हम सब का आर्डर साथ ही आया, ड्रम्स ऑफ़ हेवन देख कर आशु मुझसे पूछने लगी की ये क्या है; "चिल्ली पोटैटो वाली सॉस में चिकन विंग्स को बनाया है बस|" ये सुनते ही आशु ने पीस उठा लिया और खुद ही उस पर नीम्बू निचोड़ा और बाईट ली. स्वाद उसे तो बहुत आया और बच्चों की तरह मुँह बनाने लगी. उसे इस तरह देख कर मैं बहुत खुश था और दुआ कर रहा था की हमारी इन खुशियों की किसी की नजर न लगे.
 
मैं उठ कर वाशरूम चला गया और वापस आया तब मुझे छत पर जाती हुई सीढ़ियाँ नजर आई. मैं ने पहले तो एक बड़ा घूँट स्कॉच का पिया और फिर आशु का हाथ पकड़ के उसे खींच के उस तरफ चल दिया. निशा और अक्षय भी मुझे देख रहे थे की मैं और आशु कहाँ जा रहे हे. हम दोनों सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर पहुँचे तो वहाँ सारे कपल बैठे थे और नीचे के उलट यहाँ माहौल बिलकुल शांत था. वहाँ पर एक जगह थी जहाँ पर शीशे की एक रेलिंग थी और मैं और आशु वहीँ खड़े हो गये. रात की ठंडी-ठंडी हवा हमारे माथे को छू कर सुकून दे रही थी. आशु मेरे सामने खड़ी थी और मेरी बाहें उसके सीने पर लॉक थी. आशु ने अपने दोनों हाथों से मेरे बाजुओं को पकड़ रखा था. हम दोनों ही खामोश खड़े थे और सड़क पर आते-जाते ट्रैफिक को देख रहे थे.

दस मिनट बाद अक्षय हमें नीचे बुलाने आया, नीचे आ कर देखा तो निशा डांस फ्लोर में नाच रही थी और उसने हमे फिर से अपने साथ डांस करने के लिए खींच लिया. तभी डी.जे.ने गाना लगाया; "मर्सी" - बादशाह वाला और हम चारों पागलों की तरह नाचने लगे. 'ह्याव मर्सी ऑन मी' वाली लाइन पर अक्षय निशा को कान पकड़ के गाने लगता. मैंने घडी पर नजर डाली तो रात के बारह बज गए थे, तो मैं वहाँ से धीरे से निकला और डी.जे को बताया की निशा का बर्थडे हे. “गाईज, वी ह्याव अ बर्थ डे गर्ल इन दीं हाऊस!” डी.जे. ने अनाउंसमेंट की और सब जोर से "हॅपी बर्थ डे!!!" चिल्लाने लगे. पहले अक्षय ने गले लग कर और किस कर के निशा को हॅपी बर्थ डे बोला. उसके बाद आशु ने गले लग कर उसे बर्थ डे विश किया. अब मेरी बारी थी तो वो खुद ही आ कर मेरे गले लग गई और मैंने भी उसे हॅपी बर्थ डे विश किया. हम चारों बूथ में बैठने जा रहे थे की अक्षय हम तीनों को अपने साथ बार काउंटर पर ले आया और उसने चार शॉट्स आर्डर किये. बारटेंडर ने उन ग्लासों में वोडका डाली और फिर चारों गिलास में उसने १-१ गोली डाल दी जो एक दम से घुल गई. "ये क्या है?" मैंने अक्षय से पूछा तो उसने बोला; "एन्जॉय!!!" और उसने शॉट मारा, फिर निशा ने मारा और इससे पहले की मैं आशु को रोकता उसने भी शॉट मारा और अब तीनों मुझे भी जबरदस्ती उकसाने लगे और मैंने भी शॉट मारा. पर अक्षय बाज नहीं आया उसने फिर से रिपीट करवा दिया पर इस बार बारटेंडर ने सिर्फ मेरे और अक्षय के गिलास में वो गोली डाली. इस बार में भी जोश में आ गया और चारों ने एक साथ शॉट मारा. मैंने वेटर को हाथ से इशारा कर के बिल मंगवाया और हम चारों अपने बूथ में बैठ गये. वहाँ अब भी मेरी आधी ड्रिंक रखी थी. जिसे आशु ने एक दम से उठाया और थोड़ा ही पी पाई थी की मैंने उसके हाथ से ड्रिंक ले ली और खुद एक साँस में खींच गया.वेटर बिल ले कर आया तो वो १० हजार का निकला! बिल सुन कर तो आशु के कान खड़े हो गए पर बिल निशा, मैंने और अक्षय ने मिल कर बाँट लिया.

बिल पे हो चूका था पर हम चारों पर दारु की खुमारी चढ़ चुकी थी. उठने को जैसे जी ही नहीं चाह रहा था. कोई घर छोड़ दे बस यही दुहाई कर रहे थे सारे और ठहाके मार के हँस रहे थे. पाँच मिनट बैठे रहने के बाद मेरे दिल की धड़कन अचानक से तेज हो गई. अंदर एक अजीब सी फीलिंग हो रही थी. माथे पर पसीना आ गया और मैं हैरानी से आशु की तरफ देखने लगा. उसने वेटर से अपने लिए पानी मंगाया, प्यास से उसका गला सूख रहा था. इधर मेरे जिस्म में तूफ़ान खड़ा हो चूका था. लिंग अचानक से अकड़ चूका था और मैं अपने आप ही आशु की तरफ झुक रहा था. मेरा मन अब उसे कस कर किस करने को कह रहा था. इससे पहले की मैं उसे किस करता निशा ने मेरा हाथ पकड़ के मुझे डांस फ्लोर पर खींच लिया. उस समय गाना चल रहा था; "तेरे लक दा हुलारा" और निशा मेरे से चिपक गई और मुझे बहकाने के लिए अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन में डाल कर कस लिया. वो मुझे किस करने ही वाली थी की मैंने उसकी कमर को पकड़ा और उसे खुद से दूर कर दिया और मुड़ कर जाने लगा. पर उसने मेरा हाथ थाम लिया और अपने दाहिने हाथ से अपने कान को पकड़ के सॉरी कहने लगी. में रूक गया और तभी आशु आ गई और उसने मेरे करीब आ कर नाचना शुरू कर दिया. मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़ लिया और खुद से चिपका लिया. गर्दन झुका कर उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा. आशु ने अभी अपनी दोनों बाहें मेरी पीठ पर चलानी शुरू कर दी. हम दोनों ही बेकाबू होने लगे थे और उधर हमारे आस-पास जो भी लोग थे सब चीख रहे थे; "गाईज गेट अ रूम!" पर हम दोनों पर इसका कोई असर ही नहीं पड़ रहा था.

निशा ने हम दोनों का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ खींचने लगी. अब एक तो शराब का नशा और ऊपर से जिस्म की आग! किसी तरह हम चारों लड़खड़ाते हुए बाहर आये और अक्षय बुरी तरह चीखने लगा; "ओये!! ऑटो!!! हरामी!" अब उसकी इस हालत को देख कोई भी रूक नहीं रहा था. इधर निशा की उलटी शुरू हो गई और वो एक नाली के पास झुकी उलटी करने लगी. आशु से भी खड़ा हो पाना मुश्किल हो चूका था. मैं लड़खड़ाते हुए अक्षय के पास आया और उसके इस तरह गाली देने से कोई ऑटो रूक नहीं रहा था तो मुझे उस पर गुस्से आ गया.मैंने उसकी गुद्दी पर एक चमाट मारी; "मंदबुद्धी कहिके! ऐसे गाली देगा तो कौन रुकेगा?" मैंने जेब से फ़ोन निकाला पर उसमें कुछ ठीक से दिखे ही नही रहा था! फिर भी जैसे-तैसे उबर एप खोला अब ये ऍप अपडेट मांग रही थी और मेरा गुस्सा और बढ़ता जा रहा था. मेरा मन था की हम जल्दी से होटल पहुँचे और मैं आशु को बिस्तर पर पटक कर उस पर चढ़ जाऊँ! जब तक ऍप अपडेट हुआ मैं जी भर के गाली बकता रहा; दो मिनट लिए उस ऍप ने अपडेट होने में और फिर बड़ी मुश्किल से राइड बुक हुई.

मैंने फ़ोन जेब में डाला और वापस आशु के पास जाने को मुड़ा, मैंने अक्षय का कॉलर पकड़ा और खींच कर उसे दोनों के पास ले आया. निशा की उलटी अब बंद हो चुकी थी. वो और आशु एक खम्बे का सहारा ले कर खड़े थे. आशु तो मुझे देखते ही बेकाबू हो गई और लड़खड़ाते हुए मेरे पास आई और फिर से मेरे सीने से लग गई. इधर मेरा लिंग बेकाबू होने लगा था. मैंने आशु को अपनी गोद में उठाया. आशु ने अपनी दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट ली और मेरे ऊपर वाले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसने लगी. मैं भी बेतहाशा उसके होंठों को चूस रहा था और अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी. हमारी देखा-देखि निशा को भी जोश आ गया और वो अक्षय से चिपक गई और दोनों बुरी तरह किस करने लगे. इधर हमारी कैब आ गई और ड्राइवर ने कॉल किया. "सर मैं लोकेशन पर हूँ, आप कहाँ हैं?" ड्राइवर ने पूछा.

"एक मिनट!" इतना बोलते हुए मैं आशु को इसी तरह गोद में लिए बाहर आया और पीछे ही निशा और अक्षय भी आये. मैंने पीछे का दरवाजा खोला और सब से पहले निशा घुसी और फिर मैं जैसे-तैसे आशु को गोद में लिए बैठ गया.अक्षय आगे बैठा था पर ड्राइवर की नजर मेरे पर थी. "चलो भैया" मैंने उसे कहा तो वो आगे चला. इधर निशा मेरे नजदीक आ कर बैठ गई और अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया. आशु पर तो संभोग सवार हो चूका था और वो मेरी गर्दन के बायीं तरफ चूम रही थी. निशा भी बहकने लगी थी और वो मेरी गर्दन के दाएं तरफ चूमना चाहती थी पर मैंने उसे ऊँगली से इशारा कर के मना कर दिया. मेरे दोनों हाथ आशु की पीठ पर चल रहे थे और लिंग नीचे से आशु की नितंब पर दस्तक दे रहा था. मैंने भी आशु की गर्दन की बायीं तरफ धीरे से काट लिया और आशु बस सिसक रह गई. होटल पहुँचने तक मैं बस उसकी गर्दन को चूमता रहा और आशु भी मेरी गर्दन को चूम रही थी. मुझे तो फिर भी थोड़ी शर्म थी की मेरे अलावा वहाँ तीन और लोग हैं पर आशु पूरी तरह बेकाबू थी और वो धीरे-धीरे मेरी गर्दन को चूमे जा रही थी. ट्रैफिक नहीं था तो हम जल्दी ही होटल पहुँच गए, ड्राइवर ने अक्षय को हिला कर जगाया.निशा दूसरी तरफ से उतरी और आशु भी मेरी गोद से उत्तरी और मैंने ड्राइवर को पैसे दिए और थोड़े एक्स्ट्रा भी दे दिए! लॉबी से कमरे तक हम चारों लड़खड़ाते हुए चल के पहुंचे.

अक्षय और निशा का कमरा पहले था और मेरा और डॉली कमरा आखिर में था. अंदर घुसते ही मैंने दरवाजे की चिटकनी लगाईं और आशु मुझ पर टूट पडी. वो फिर से मेरी गोद में चढ़ गई और सीधा अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी. आशु को अपने दोनों हाथों से थामे मैंने उसे बिस्तर पर ला कर पटक दिया. उसकी आँखों में देखते हुए मैंने अपनी कमीज के बटन जल्दी-जल्दी खोलने शुरू किये, फिर पैंट भी निकाल के फेंक दी और पूरा नंगा हो कर आशु के कपडे उतारने का वेट करने लगा. आशु ने भी फटाफट अपना टॉप उतार फेंका, फिर अपनी ब्रा भी निकाल फेंकी. उसने अपनी जीन्स के बटन खोले और मैंने उसकी जीन्स खींच के निकाल दी और उस पर कूद पडा. आशु का जिस्म मेरी दोनों टांगों के बीच था और मैं उसके चेहरे को थामे उसके होंठ चूसने लगा. मेरे पास सब्र करने का बिलकुल समय नहीं था. इसलिए मेंने अगला हमला आशु की गर्दन पर किया. अपने दाँतों को आशु की गर्दन पर गाड़ के मैंने उसे जोर से काट लिया. "आअह!" कहते हुए आशु ने अभी अपने नाखून मेरी पीठ में गाड़ दिये. दर्द से आशु सीसिया रही थी पर मुझे तो जैसे उसके दर्द की कोई परवाह ही नहीं थी. मैं नीचे को आया और उसके बाएँ स्तन को अपने मुंह में भर कर अपने दाँत गड़ा दिये. अपने बाएं हाथ से मैंने आशु के दाएँ स्तन को मुट्ठी में भर कर उसे निचोड़ने लगा और उसके बाएँ स्तन को दाँतों से काट और चूसने लगा. मेरी उँगलियाँ आशु के दाएँ स्तन पर छप चुकीं थीं और मेरे दाँतों ने आशु के बाएँ स्तन को लाल कर दिया था. मैं नीचे आया तो पाया की उसकी पैंटी अब भी उसकी योनी को ढके हुए हे. मैंने अपने दाएँ हाथ से उसकी कच्ची को पकड़ के खींचा पर वो फटी नहीं, मुझे गुस्सा आया और मैं ने जोर से उसकी पैंटी खींच कर निकाल फेंकी. आशु की पहले से गीली योनी मेरे आँखों के सामने थी. मैं जितना मुंह खोल सकता था उतना खोला और जीभ निकाल कर आशु की योनी को अपनी जीभ से ढक दिया. गर्म जीभ का स्पर्श मिलते ही आशु कसमसाने लगी. उसने अपने दोनों हाथों की उँगलियों से मेरे बाल पकड़ लिए और मेरे मुंह को अपनी योनी पर दबाने लगी. मैंने भी जीभ से पहले आशु के क्लीट को छेड़ा और फिर उसके योनी के कपालों को चूसने लगा. पर नीचे मेरे लिंग की हालत बहुत खराब थी. खून का बहाव मेरे लिंग पर बहुत तेज था और मेरे लिंग में जलन होने लगी थी. लघभग १ मिनट योनी चुसाई और फिर मैं आशु के ऊपर आ गया और अपने दाहिने हाथ से अपने लिंग को पकड़ के आशु की योनी पर दबाने लगा. अभी सिर्फ लिंग का सुपाड़ा ही अंदर गया था की आशु अपनी गर्दन को दाएँ-बाएँ पटकने लगी. पर मैं इस बार उसके दर्द की परवाह नहीं कर रहा था और धीरे-धीरे अपना लिंग दबाते हुए उसकी योनी में पेल दिया.
 
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