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मेरा मुँह अपने आप ही आशु की योनी पर झुकता चला गया और जोश आते ही मैंने अपने मुँह को जितना खोल सकता था उतना खोल कर आशु की योनी को अपने मुँह से ढक दिया. जीभ सरसराती हुई अंदर चली गई और आशु के योनी में लपलपाने लगी. इतने भर से ही आशु की योनी ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया और उसने मेरे कमीज के कॉलर को पकड़ के ऊपर खींच लिया. अब मैंने तो अभी भी पैंट पहनी थी पर आशु इतनी बेसब्री थी की उसने पैंट की ज़िप खोली और मेरे लिंग को टटोलने लगी. लिंग पकड़ में आते ही उसने उसे बाहर निकाला और अपनी योनी के मुख से भिड़ा दिया. आशु के योनी का पानी बहके मेरे लिंग के सुपाडे से टच हुआ था मेरे जिस्म में झुरझुरी छूट गई. मैंने पूरी ताक़त से एक झटका मारा और लिंग फिसलता हुआ और चीरता हुआ आशु के योनी में पहुँच गया."माँ...आ..आ..आ..आ ..आ..आ...आ..मम...आह....हह..हहा...आय....!!" आशु के मुँह से जोरदार चीख निकली और उसने अपने दाँत मेरे कंधे पर गड़ा दिए! तब जा कर मुझे आशु के दर्द का एहसास हुआ. आशु के दाँत अब भी मेरे कंधे पर गड़े हुए थे और मैं बिना हिले-डुले ही उसपर पड़ा रहा. पॉंच मिनट तक हम दोनों इस तरह बिना हिले-डुले पड़े रहे, फिर धीरे-धीरे आशु ने अपने दाँत मेरे कंधे पर से हटाये और नीचे से उसने अपनी योनी को सिकोड़ा. ये मेरे लिए जय था. मैंने धीरे-धीरे लिंग अंदर-बाहर करना शुरू किया और अगले दो मिनट में ही मेरी स्पीड बढ गई और आशु फिर से झड़ गई! उसके झंडने से मेरे लिंग की स्पीड और भी ज्यादा बढ़ गई. पर आशु ने मुझे रोकना चाहा और मेरी छाती पर दबाव दे कर मुझे खुद से दूर करने लगी. पर मैं फिर भी लगा रहा, शायद आशु से ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उसने मुझे बहुत जोर से झटका दे कर खुद से अलग कर दिया. मुझे उसके इस बर्ताव से बड़ी खीज हुई और मैं उसके ऊपर से हट गया और दूर जा कर खड़ा हो गया.मेरी सांसें तेज थी और गुस्से से चेहरा तमतमा रहा था. आशु की नजर मुझ पर पड़ी तो वो शर्मा गई और दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी रही.
दरअसल आशु के जल्दी छूट जाने से और मुझे बीच मजधार में छोड़ देने से मैं बहुत गुस्से में था.
मेरा गुस्सा अब बेकाबू होने लगा था और मुझे कैसे भी शांत करना था. मैंने अपनी कमीज, पैंट सब उतार फेंकी, नंगा बाथरूम में घुस गया और शावर चला कर उसके नीचे खड़ा हो गया.पानी की ठंडी-ठंडी बूँदें सर पर पड़ीं तो गुस्सा थोड़ा कम हुआ और लिंग 'बेचारा' सिकुड़ कर बैठ गया.दस मिनट तक मैं शावर के नीचे आँखें मूंदें खड़ा रहा, पर गुस्सा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. बदन का पानी पोंछ कर जब बाहर निकला तो सामने आशु सर झुकाये खड़ी थी. मैं उसके बगल से निकल गया और अपने कपडे पहनने लगा. आशु पीछे से आई और मुझे अपनी बाहों में भर कर बोली; "सॉरी!" मैंने उसके हाथ अपने जिस्म से अलग किये और बोला; "क्यों मेरे जिस्म में आग लगा रही है, जब उसे बुझा नहीं सकती! मैंने तो नहीं कहा था न की आके मेरे से चिपक जा?" मैंने बड़े रूखे तरीके से उसे दुत्कारा.आशु ने सर झुकाये हुए ही अपने कान पकडे और फिर से सॉरी बोला. मैंने आगे कुछ नहीं बोला और आशु का बैग उठाया और उसे रेडी होने को कहा पर वो वहाँ से हिली ही नही. "सॉरी जानू! आज के बाद कभी ऐसा नहीं करुँगी!" आशु ने फिर से कान पकड़ते हुए कहा. अब तक जिस गुस्से को मैंने रोक रखा था वो आखिर फुट ही पड़ा;
"क्या दुबारा नहीं करुँगी? हाँ? बोल??? कल रात को मना किया था न मैंने? बोला था ना की हम मॅडम के घर पर हैं, पर तुझे चैन नहीं था! आखिर मुझे क्या मिला? तू तो जा कर सो गई और मैं बाथरूम में जा कर हस्तमैथुन कर के सो गया.अभी भी, मैंने तुझे छुआ तक नहीं और तू ही आ कर मुझसे चिपकी थी ना? तेरी तो जिस्म की आग बुझ गई. पर मेरा क्या? अगर मुझे हस्तमैथुन ही करना था तो संभोग क्यों? अगर तुझे कोई बिमारी होती तो मैं फिर भी समझता, ये तो तेरा उतावलापन है जिसके कारन प्यासा मैं रह जाता हु. उस दिन तो बड़े गर्व से कह रही थी की डॉक्टर ने ये सिखाया है, वो सिखाया है अब क्या हुआ उस सब का? कितने महीनों से कर रहे हैं हम ये? बोल??? ६ महीने से!!! और इन ६ महिनों में कितनी बार संभोग देखा तूने मेरे फ़ोन में? उससे कुछ नहीं सीखा? और तेरी वो दोस्त निशा जो तुझे अपने संभोग के किस्से बड़ी डिटेल में बताया करती थी? उससे कभी कुछ नहीं सीखा तूने?
आशु सर झुकाये सब सुनती रही और फिर आकर मेरे सीने से लग गई. उसकी आँखें छलछला गईं और मेरे अंदर जो गुस्सा था वो अब शांत हो गया.मैंने उसे अब भी नहीं छुआ था और मैं उससे कुछ बोलता उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया.मैंने आशु को खुद से अलग किया और फ़ोन उठाया.
आशु ने अपने कपडे बदले और मेरी फ़ोन पर बात खत्म होने तक वो फिर से सर झुकाये खड़ी हो गई. बात कर के मैंने आशु को उसके हॉस्टल छोड़ा और मैं वापस ऑफिस आगया.मुझे ऑफिस में देखते ही मैडम का पारा चढ़ गया और वो बॉस पर बरस पड़ी; "मैंने राज जी को छुट्टी दी थी फिर क्यों बुलाया उन्हें?" ये सुन कर बॉस एक दम से उनका चेहरा देखने लगा. मैं उस समय बॉस के साइन कराने खड़ा था और मैं भी थोड़ा हैरान था. सर इससे पहले की मैडम पर बरसते मैंने उन्हें अपनी उपस्थिति से अवगत कराते हुए कहा; "मॅडम वो सिलिकॉन ट्रेडर्स की जी. एस. टी. की लास्ट डेट थी!" सर चुप हो गए बस मैडम को घूर के देखने लगे. मैंने जल्दी से फ़ोन निकाला और मैडम को कॉल मिला कर फ़ोन वापस जेब में डाल लिया. मैडम का फ़ोन बजा और उन्होंने देख लिया की मेरा ही कॉल है इसलिए बिना कुछ बोले फ़ोन कान से लगा कर बाहर चली गई. कुछ देर बाद मैडम मेरे डेस्क पर आईं और सामने बैठ गईं और बोलीं; "राज जी आप कहीं और जॉब ढूँढ लो! यहाँ रहोगे तो अपने बॉस की तरह हो जाओगे." मैडम का मूड बहुत ख़राब था तो मैंने उन्हें हँसाने के लिए कहा; "मॅडम फिर तो आपका प्रोजेक्ट अधूरा रह जायेगा और फिर हमारी फ्रेंडशिप का क्या?"
"दूसरी जॉब से हमारी फ्रेंडशिप थोड़े ही खत्म होगी? और रही प्रोजेक्ट की तो जाए चूल्हे में!" मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा.
"इतनी मेहनत की है आपने मॅडम की उसे वेस्ट करना ठीक नही. इस प्रोजेक्ट के बाद मैं कोई और ऑप्शन ढूँढता हु." मैंने मैडम की बात का मान रखते हुए कहा.
"अच्छा एक बात बताओ, अगर मैंने अपनी अलग कंपनी शुरू की तो मुझे ज्वाइन करोगे?" मैडम ने उत्सुकता वश पूछा.
"बिलकुल मॅडम ये भी कोई कहने की बात है?! कम से कम आप सैलरी तो अच्छी दोगे!" मैंने हँसते हुए कहा और मैडम ये सुन कर हँस दी. शाम को मैं निकलने वाला था की आशु का फ़ोन आया; "जानू! अब भी नाराज हो?" आशु ने तुतलाते हुए पूछा. मुझे उसके इस बचपने पर हँसी आ गई. "नहीं" बस इतना बोला की मैडम मुझे आती हुई दिखाई दी. मैंने आशु को कहा की बाद में बात करता हूँ और फ़ोन काट दिया. "राज जी! मुझे मार्केट ड्राप कर दोगे?" मैं फिर से हैरान था और मेरी हैरानी भांपते हुए मैडम बोली; "आपके बॉस गाडी ले गए!" अब ये सुन कर मुझे थोड़ा इत्मीनान हुआ और मैडम मेरे पीछे एक तरफ दोनों पैर रख कर बैठ गई.
नितु मैडम: वैसे राज जी आप बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?
मैं: जी मॅडम कहिये.
नितु मैडम: आप इतना डरते क्यों हो?
मैं: डरता हूँ? मैं कुछ समझा नहीं मॅडम?
नितु मैडम: अभी मैंने आप से लिफ्ट मांगी तो आप हैरान थे? कल भी जब मैंने आपको बर्थडे विश किया तब भी, डांस करने के समय भी! आपके बॉस से भी जब मैंने कंप्लेंट की कि उन्होंने क्यों आपको आज बुलाया जब कि मैंने आपको छुट्टी दी है तब भी आप बहुत हैरान थे! दोस्ती में तो ये सब चलता है ना?
मैं: मॅडम आप विश्वास नहीं करेंगे पर पिछले कुछ महीनों से मेरे साथ जो कुछ हो रहा है वो मेरे साथ कभी नहीं हुआ. बचपन से मैं बहुत सीधा-साधा लड़का था....
नितु मैडम: (मेरी बात काटते हुए) वो तो अब भी हो.
मैं: शायद! एनी वे... मेरे दोस्त सब लड़के ही रहे हैं और लड़कियों से मेरी फ़ट.... आई मीन डर लगता था. फिर आप मेरे गाँव कि हिस्ट्री तो जानते ही हैं, अब ऐसे में मैंने कभी किसी लड़की से सिवाय किसी काम ...आई मीन वर्क रीलेटेड बात ही की हे. मुझे डर इसलिए लगता है की सर आपकी और मेरी दोस्ती को कभी नहीं समझ सकते. हम रहते ही ऐसे समाज में हैं जहाँ एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते. तो ऐसे में आपका मेरी साइड लेना किसी को सही नहीं लगेगा.
नितु मैडम: तो इसका मतलब हमें सिर्फ वही करना चाहिए जो सब को अच्छा लगे? अपनी ख़ुशी के लिए कुछ भी नहीं?
मैं: मैडम प्लीज मुझे गलत मत समझिये, बट आई फियर फॉर यू! आई डोन्ट वांट टू कौज एनी ट्रबल इन योवर म्यारीड लाइफ.
नितु मैडम: आई कॅन अंडर स्टँड! अँड दॅट इज वेरी स्वीट ऑफ यू! बट आई इंशुअर यू....यू आर नॉट दीं रिजन ….. एनी वे….. उमम्म्म...…. लेट्स ह्याव सम पानी के बताशे!
मैंने बाइक एक चाट वाले के पास रोकी और मैडम और मैंने कंपिट करते हुए पानी के बताशे खाये. विनर मैडम ही निकलीं और हारने की सजा मैडम ने ये रखी की इस रविवार को मैं उन्हें 'टुंडे कबाबी' खीलाऊ. इस तरह हँसते हुए मैं उन्हें बाजार छोड़ कर घर निकल गया.घर पहुँचते ही आशु का फ़ोन आया और उसने पूछा; "पानी के बताशे कैसे लगे?"
ये सुन कर मैं हैरान तू हुआ पर मैंने जवाब ऐसा दिया की आशु और चिढ जाये. "लाजवाब थे! इतना स्वाद तो मुझे आज तक कभी आया ही नहीं!" मेरी ये डबल मीनिंग वाली बात आशु समझ गई. "जानूउउ उउउउउउउउउउउउ!!! मैं आप पर शक़ नहीं कर रही! मैं आप पर खुद से ज्यादा भरोसा करती हु. दरअसल निशा ने आपको मार्किट में बताशे खाते हुए देखा और मुझे फोन कर के चीढाने लगी की तेरा 'बंदा' यहाँ किसी और लड़की के साथ बताशे खा रहा है!" आशु के मुँह से 'बंदा' शब्द सुन कर मुझे बहुत जोर से हँसी आ गई. "क्या हुआ? हँस क्यों रहे हो?" आशु ने थोड़ा हैरान हो कर पूछा. "मैं तुम्हारा 'बंदा' हूँ?" मैंने आशु को छेड़ते हुए पूछा. "वो कॉलेज में बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड को बंदा-बंदी कहते हैं."
"जानता हूँ! मैं भी उसी कॉलेज में पढ़ा हूँ!" मैंने हँसते हुए कहा.
"हाँ...तो ... वो मुझे चीढाने लगी की आप किसी और को घुमा रहे हो! तो ये सुन कर पहले तो मुझे बड़ी हँसी आई फिर मैंने उसे डाँट दिया ये कह कर की मैं अपने प्यार पर पूरा भरोसा करती हु. वो मुझे कभी धोका नहीं दे सकते! तू चुप-चाप अपना काम कर! इतना कह कर मैंने फ़ोन रख दिया."
"अच्छा जी? बहुत भरोसा करते हो मुझ पर?"
"हाँ जी! इतने दिन आपके साथ ऑफिस में काम कर के देख लिया की कैसे आप खुद को सँभालते हो. आजतक आपने कभी राखी या नितु मैडम से कोई गलत तरह की बात नहीं की. हमेशा उनसे अदब से बात करते हो, कल भी पार्टी में आप नशे में थे तब भी आप खुद को संभाले हुए थे. ये आपका मेरे लिए प्यार नहीं तो क्या है? आजतक कभी मुझे राखी ने नहीं कहा की आपने कभी उसे किसी गलत नजर से देखा हो या उस से कोई अभद्र बात कही हो. एक बार आप पर शक़ करने की गलती कर चुकी हूँ पर अब चाहे भगवान् भी आ कर मुझे कह दें की आपने किसी लड़की के साथ कुछ गलत किया है तो भी मैं नहीं सागरँगी." आशु की बात सुन कर मैं समझ गया था की आशु राखी के जरिये मेरा बैकग्राउंड चेक करवा रही थी. ठीक है भाई कर लो जितनी चेकिंग करनी हो आपने!इस तरह वो दिन सिर्फ बात करते हुए निकला. हम मिलते तो रोज थे पर सिर्फ बातें ही होती थीं ना तो आशु मुझे छूने की कोशिश करती और न ही मैं उसे छूता था. मैंने ये सोच कर ही संतोष कर लिया की शादी के बाद आशु को संभोग की अच्छी से 'कोचिंग' दूँगा, उसे सब सिखाऊँगा की कैसे अपने पार्टनर को खुश किया जाता हे.
दिन गुजरते गए और आखिर वो दिन आ गया जब राखी कि शादी थी. शाम को हम सब को जाने का न्योता था और मैंने आशु को लेने और छोड़ने की जिम्मेदारी ली. अब पहले तो उसे लेहंगा-चोली खरीदवाया और अपने लिए मैंने बस एक ब्लैज़र लिया. हॉस्टल वाली आंटी जी ने आशु को थोड़ी ज्यादा छूट दे रखी थी. उसका कारन ये था की आशु हॉस्टल में सिर्फ और सिर्फ अपने काम से काम रखती थी और पढ़ाई में मन लगाती थी. कुछ उन्हें मेरा भी ख़याल था इसलिए आशु ने जब कहा की वो लेट आएगी तो आंटी जी ने मना नहीं किया. उसके हॉस्टल की लड़की आशु से बहुत जलती थी की इतने कम समय में वो आंटी जी की चहेती बन गई. आशु को पिक करने के लिए मैं थोड़ा जल्दी निकला और उसे चौक पर बुला लिया. मैं पहले से ही वहाँ उसका इंतजार कर रहा था. जैसे ही मेरी नजर आशु पर पड़ी मैं उसे बस देखता ही रह गया!
दरअसल आशु के जल्दी छूट जाने से और मुझे बीच मजधार में छोड़ देने से मैं बहुत गुस्से में था.
मेरा गुस्सा अब बेकाबू होने लगा था और मुझे कैसे भी शांत करना था. मैंने अपनी कमीज, पैंट सब उतार फेंकी, नंगा बाथरूम में घुस गया और शावर चला कर उसके नीचे खड़ा हो गया.पानी की ठंडी-ठंडी बूँदें सर पर पड़ीं तो गुस्सा थोड़ा कम हुआ और लिंग 'बेचारा' सिकुड़ कर बैठ गया.दस मिनट तक मैं शावर के नीचे आँखें मूंदें खड़ा रहा, पर गुस्सा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. बदन का पानी पोंछ कर जब बाहर निकला तो सामने आशु सर झुकाये खड़ी थी. मैं उसके बगल से निकल गया और अपने कपडे पहनने लगा. आशु पीछे से आई और मुझे अपनी बाहों में भर कर बोली; "सॉरी!" मैंने उसके हाथ अपने जिस्म से अलग किये और बोला; "क्यों मेरे जिस्म में आग लगा रही है, जब उसे बुझा नहीं सकती! मैंने तो नहीं कहा था न की आके मेरे से चिपक जा?" मैंने बड़े रूखे तरीके से उसे दुत्कारा.आशु ने सर झुकाये हुए ही अपने कान पकडे और फिर से सॉरी बोला. मैंने आगे कुछ नहीं बोला और आशु का बैग उठाया और उसे रेडी होने को कहा पर वो वहाँ से हिली ही नही. "सॉरी जानू! आज के बाद कभी ऐसा नहीं करुँगी!" आशु ने फिर से कान पकड़ते हुए कहा. अब तक जिस गुस्से को मैंने रोक रखा था वो आखिर फुट ही पड़ा;
"क्या दुबारा नहीं करुँगी? हाँ? बोल??? कल रात को मना किया था न मैंने? बोला था ना की हम मॅडम के घर पर हैं, पर तुझे चैन नहीं था! आखिर मुझे क्या मिला? तू तो जा कर सो गई और मैं बाथरूम में जा कर हस्तमैथुन कर के सो गया.अभी भी, मैंने तुझे छुआ तक नहीं और तू ही आ कर मुझसे चिपकी थी ना? तेरी तो जिस्म की आग बुझ गई. पर मेरा क्या? अगर मुझे हस्तमैथुन ही करना था तो संभोग क्यों? अगर तुझे कोई बिमारी होती तो मैं फिर भी समझता, ये तो तेरा उतावलापन है जिसके कारन प्यासा मैं रह जाता हु. उस दिन तो बड़े गर्व से कह रही थी की डॉक्टर ने ये सिखाया है, वो सिखाया है अब क्या हुआ उस सब का? कितने महीनों से कर रहे हैं हम ये? बोल??? ६ महीने से!!! और इन ६ महिनों में कितनी बार संभोग देखा तूने मेरे फ़ोन में? उससे कुछ नहीं सीखा? और तेरी वो दोस्त निशा जो तुझे अपने संभोग के किस्से बड़ी डिटेल में बताया करती थी? उससे कभी कुछ नहीं सीखा तूने?
आशु सर झुकाये सब सुनती रही और फिर आकर मेरे सीने से लग गई. उसकी आँखें छलछला गईं और मेरे अंदर जो गुस्सा था वो अब शांत हो गया.मैंने उसे अब भी नहीं छुआ था और मैं उससे कुछ बोलता उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया.मैंने आशु को खुद से अलग किया और फ़ोन उठाया.
आशु ने अपने कपडे बदले और मेरी फ़ोन पर बात खत्म होने तक वो फिर से सर झुकाये खड़ी हो गई. बात कर के मैंने आशु को उसके हॉस्टल छोड़ा और मैं वापस ऑफिस आगया.मुझे ऑफिस में देखते ही मैडम का पारा चढ़ गया और वो बॉस पर बरस पड़ी; "मैंने राज जी को छुट्टी दी थी फिर क्यों बुलाया उन्हें?" ये सुन कर बॉस एक दम से उनका चेहरा देखने लगा. मैं उस समय बॉस के साइन कराने खड़ा था और मैं भी थोड़ा हैरान था. सर इससे पहले की मैडम पर बरसते मैंने उन्हें अपनी उपस्थिति से अवगत कराते हुए कहा; "मॅडम वो सिलिकॉन ट्रेडर्स की जी. एस. टी. की लास्ट डेट थी!" सर चुप हो गए बस मैडम को घूर के देखने लगे. मैंने जल्दी से फ़ोन निकाला और मैडम को कॉल मिला कर फ़ोन वापस जेब में डाल लिया. मैडम का फ़ोन बजा और उन्होंने देख लिया की मेरा ही कॉल है इसलिए बिना कुछ बोले फ़ोन कान से लगा कर बाहर चली गई. कुछ देर बाद मैडम मेरे डेस्क पर आईं और सामने बैठ गईं और बोलीं; "राज जी आप कहीं और जॉब ढूँढ लो! यहाँ रहोगे तो अपने बॉस की तरह हो जाओगे." मैडम का मूड बहुत ख़राब था तो मैंने उन्हें हँसाने के लिए कहा; "मॅडम फिर तो आपका प्रोजेक्ट अधूरा रह जायेगा और फिर हमारी फ्रेंडशिप का क्या?"
"दूसरी जॉब से हमारी फ्रेंडशिप थोड़े ही खत्म होगी? और रही प्रोजेक्ट की तो जाए चूल्हे में!" मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा.
"इतनी मेहनत की है आपने मॅडम की उसे वेस्ट करना ठीक नही. इस प्रोजेक्ट के बाद मैं कोई और ऑप्शन ढूँढता हु." मैंने मैडम की बात का मान रखते हुए कहा.
"अच्छा एक बात बताओ, अगर मैंने अपनी अलग कंपनी शुरू की तो मुझे ज्वाइन करोगे?" मैडम ने उत्सुकता वश पूछा.
"बिलकुल मॅडम ये भी कोई कहने की बात है?! कम से कम आप सैलरी तो अच्छी दोगे!" मैंने हँसते हुए कहा और मैडम ये सुन कर हँस दी. शाम को मैं निकलने वाला था की आशु का फ़ोन आया; "जानू! अब भी नाराज हो?" आशु ने तुतलाते हुए पूछा. मुझे उसके इस बचपने पर हँसी आ गई. "नहीं" बस इतना बोला की मैडम मुझे आती हुई दिखाई दी. मैंने आशु को कहा की बाद में बात करता हूँ और फ़ोन काट दिया. "राज जी! मुझे मार्केट ड्राप कर दोगे?" मैं फिर से हैरान था और मेरी हैरानी भांपते हुए मैडम बोली; "आपके बॉस गाडी ले गए!" अब ये सुन कर मुझे थोड़ा इत्मीनान हुआ और मैडम मेरे पीछे एक तरफ दोनों पैर रख कर बैठ गई.
नितु मैडम: वैसे राज जी आप बुरा न मानो तो एक बात कहूँ?
मैं: जी मॅडम कहिये.
नितु मैडम: आप इतना डरते क्यों हो?
मैं: डरता हूँ? मैं कुछ समझा नहीं मॅडम?
नितु मैडम: अभी मैंने आप से लिफ्ट मांगी तो आप हैरान थे? कल भी जब मैंने आपको बर्थडे विश किया तब भी, डांस करने के समय भी! आपके बॉस से भी जब मैंने कंप्लेंट की कि उन्होंने क्यों आपको आज बुलाया जब कि मैंने आपको छुट्टी दी है तब भी आप बहुत हैरान थे! दोस्ती में तो ये सब चलता है ना?
मैं: मॅडम आप विश्वास नहीं करेंगे पर पिछले कुछ महीनों से मेरे साथ जो कुछ हो रहा है वो मेरे साथ कभी नहीं हुआ. बचपन से मैं बहुत सीधा-साधा लड़का था....
नितु मैडम: (मेरी बात काटते हुए) वो तो अब भी हो.
मैं: शायद! एनी वे... मेरे दोस्त सब लड़के ही रहे हैं और लड़कियों से मेरी फ़ट.... आई मीन डर लगता था. फिर आप मेरे गाँव कि हिस्ट्री तो जानते ही हैं, अब ऐसे में मैंने कभी किसी लड़की से सिवाय किसी काम ...आई मीन वर्क रीलेटेड बात ही की हे. मुझे डर इसलिए लगता है की सर आपकी और मेरी दोस्ती को कभी नहीं समझ सकते. हम रहते ही ऐसे समाज में हैं जहाँ एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते. तो ऐसे में आपका मेरी साइड लेना किसी को सही नहीं लगेगा.
नितु मैडम: तो इसका मतलब हमें सिर्फ वही करना चाहिए जो सब को अच्छा लगे? अपनी ख़ुशी के लिए कुछ भी नहीं?
मैं: मैडम प्लीज मुझे गलत मत समझिये, बट आई फियर फॉर यू! आई डोन्ट वांट टू कौज एनी ट्रबल इन योवर म्यारीड लाइफ.
नितु मैडम: आई कॅन अंडर स्टँड! अँड दॅट इज वेरी स्वीट ऑफ यू! बट आई इंशुअर यू....यू आर नॉट दीं रिजन ….. एनी वे….. उमम्म्म...…. लेट्स ह्याव सम पानी के बताशे!
मैंने बाइक एक चाट वाले के पास रोकी और मैडम और मैंने कंपिट करते हुए पानी के बताशे खाये. विनर मैडम ही निकलीं और हारने की सजा मैडम ने ये रखी की इस रविवार को मैं उन्हें 'टुंडे कबाबी' खीलाऊ. इस तरह हँसते हुए मैं उन्हें बाजार छोड़ कर घर निकल गया.घर पहुँचते ही आशु का फ़ोन आया और उसने पूछा; "पानी के बताशे कैसे लगे?"
ये सुन कर मैं हैरान तू हुआ पर मैंने जवाब ऐसा दिया की आशु और चिढ जाये. "लाजवाब थे! इतना स्वाद तो मुझे आज तक कभी आया ही नहीं!" मेरी ये डबल मीनिंग वाली बात आशु समझ गई. "जानूउउ उउउउउउउउउउउउ!!! मैं आप पर शक़ नहीं कर रही! मैं आप पर खुद से ज्यादा भरोसा करती हु. दरअसल निशा ने आपको मार्किट में बताशे खाते हुए देखा और मुझे फोन कर के चीढाने लगी की तेरा 'बंदा' यहाँ किसी और लड़की के साथ बताशे खा रहा है!" आशु के मुँह से 'बंदा' शब्द सुन कर मुझे बहुत जोर से हँसी आ गई. "क्या हुआ? हँस क्यों रहे हो?" आशु ने थोड़ा हैरान हो कर पूछा. "मैं तुम्हारा 'बंदा' हूँ?" मैंने आशु को छेड़ते हुए पूछा. "वो कॉलेज में बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड को बंदा-बंदी कहते हैं."
"जानता हूँ! मैं भी उसी कॉलेज में पढ़ा हूँ!" मैंने हँसते हुए कहा.
"हाँ...तो ... वो मुझे चीढाने लगी की आप किसी और को घुमा रहे हो! तो ये सुन कर पहले तो मुझे बड़ी हँसी आई फिर मैंने उसे डाँट दिया ये कह कर की मैं अपने प्यार पर पूरा भरोसा करती हु. वो मुझे कभी धोका नहीं दे सकते! तू चुप-चाप अपना काम कर! इतना कह कर मैंने फ़ोन रख दिया."
"अच्छा जी? बहुत भरोसा करते हो मुझ पर?"
"हाँ जी! इतने दिन आपके साथ ऑफिस में काम कर के देख लिया की कैसे आप खुद को सँभालते हो. आजतक आपने कभी राखी या नितु मैडम से कोई गलत तरह की बात नहीं की. हमेशा उनसे अदब से बात करते हो, कल भी पार्टी में आप नशे में थे तब भी आप खुद को संभाले हुए थे. ये आपका मेरे लिए प्यार नहीं तो क्या है? आजतक कभी मुझे राखी ने नहीं कहा की आपने कभी उसे किसी गलत नजर से देखा हो या उस से कोई अभद्र बात कही हो. एक बार आप पर शक़ करने की गलती कर चुकी हूँ पर अब चाहे भगवान् भी आ कर मुझे कह दें की आपने किसी लड़की के साथ कुछ गलत किया है तो भी मैं नहीं सागरँगी." आशु की बात सुन कर मैं समझ गया था की आशु राखी के जरिये मेरा बैकग्राउंड चेक करवा रही थी. ठीक है भाई कर लो जितनी चेकिंग करनी हो आपने!इस तरह वो दिन सिर्फ बात करते हुए निकला. हम मिलते तो रोज थे पर सिर्फ बातें ही होती थीं ना तो आशु मुझे छूने की कोशिश करती और न ही मैं उसे छूता था. मैंने ये सोच कर ही संतोष कर लिया की शादी के बाद आशु को संभोग की अच्छी से 'कोचिंग' दूँगा, उसे सब सिखाऊँगा की कैसे अपने पार्टनर को खुश किया जाता हे.
दिन गुजरते गए और आखिर वो दिन आ गया जब राखी कि शादी थी. शाम को हम सब को जाने का न्योता था और मैंने आशु को लेने और छोड़ने की जिम्मेदारी ली. अब पहले तो उसे लेहंगा-चोली खरीदवाया और अपने लिए मैंने बस एक ब्लैज़र लिया. हॉस्टल वाली आंटी जी ने आशु को थोड़ी ज्यादा छूट दे रखी थी. उसका कारन ये था की आशु हॉस्टल में सिर्फ और सिर्फ अपने काम से काम रखती थी और पढ़ाई में मन लगाती थी. कुछ उन्हें मेरा भी ख़याल था इसलिए आशु ने जब कहा की वो लेट आएगी तो आंटी जी ने मना नहीं किया. उसके हॉस्टल की लड़की आशु से बहुत जलती थी की इतने कम समय में वो आंटी जी की चहेती बन गई. आशु को पिक करने के लिए मैं थोड़ा जल्दी निकला और उसे चौक पर बुला लिया. मैं पहले से ही वहाँ उसका इंतजार कर रहा था. जैसे ही मेरी नजर आशु पर पड़ी मैं उसे बस देखता ही रह गया!