• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest कैसे कैसे परिवार

संजना, सुरेखा, सागरिका, समर्थ और जॉय:

बैठक का वातावरण कुछ भिन्न था. समर्थ संजना की चूत चाट रहा था और सुरेखा एवं सागरिका जॉय के लंड को चूस रही थीं. संजना आज पहली बार अपनी मम्मी को सजल के अतिरिक्त किसी के लंड को चूसते हुए देख रही थी. पर उसे जो सबसे अजीब संवेदन था वो अपने नाना के खुरदुरे हाथों को अपने शरीर पर चलने का था. नाना के हाथों का स्पर्श और उनकी उसकी चूत पर लपलपाती हुई जीभ उसे एक अन्य ही लोक में ले जा चुके थे. नाना की चूत चाटने का ढंग परिवार की स्त्रियों से बिलकुल ही अलग था. जहाँ परिवार की स्त्रियों के स्पर्श में एक कोमलता थी, वहीं समर्थ के स्पर्श में कुछ कठोरता सी थी.

समर्थ संजना के रस की गंध और स्वाद में खो चुका था. जिस प्रकार वो संजना की चूत में अपनी जीभ डाल डाल कर उसके रस को चाट रहा था उससे ये सिद्ध होता था कि उसे ये अमृत के समान ऊर्जावान लग रहा था. और संजना केवल इन विचारों में गम थी कि कब उसकी सील टूटेगी और वो भी अन्य सभी के समान चुदाई का आनंद ले पायेगी. उसके शरीर इस कल्पना से ही काँप उठा. समर्थ बिना रुके उसकी चूत में अपने मुंह लगाए हुए चाटता रहा.

जॉय के लंड को चूस कर सुरेखा और सागरिका ने बिलकुल अच्छे से खड़ा और गीला कर दिया था. अब प्रश्न ये था कि आगे क्या करना है.

“मौसी जी, आप पहले अपनी चुदाई करवा लें, आप दोनों कभी मिले नहीं हो न.” सागरिका ने सुरेखा से कहा तो सुरेखा को सागरिका कि इस भावना पर बहुत अपनत्व आया.

“ऐसा कुछ नहीं है, मैं बाद में भी….”

“नहीं, मौसी, पहले आप.”

ये कहकर उसने सुरेखा को सोफे पर लिटा दिया और अपने पिता से कहा कि वे अब मौसी की चुदाई करें. जॉय सुरेखा की चूत पर लंड लगाकर अंदर करने लगा. उधर सागरिका ने देखा कि समर्थ का लंड भी खड़ा है, पर उसका कुछ होना नहीं है क्योंकि संजना की तो चुदाई होने नहीं थी. उसने समर्थ के नीचे जाकर उसके लंड को अपने मुंह में लिया और चूसने लगी. समर्थ ने अपना आसन बदल कर दोनों के लिए कुछ आसानी कर दी, पर उसका मुंह संजना की चूत से हटा नहीं.

सागरिका समर्थ का लंड चूस रही थी जो संजना की चूत चाट रहा था, जॉय ने सुरेखा की चुदाई में अपना ध्यान लगाया हुआ था और बैठक में एक बड़ी शांतिमय ढंग से सब कुछ हो रहा था. जॉय के पूछने पर सुरेखा ने कुछ तेज चुदाई के लिए कहा, पर अधिक नहीं. तो जॉय ने एक अच्छी लय में मद्धम गति से सुरेखा की चुदाई करना आरम्भ कर दिया।

********

सुप्रिया और सजल:

“ओह, मौसी!” सजल के मुंह से निकला. “ओह, मौसी.”

सुप्रिया बिना विश्राम के सजल के लंड पर अपनी जीभ और होंठों का जादू बिखेरती रही. वैसे अब तक सजल तीन स्त्रियों से लंड चुसवा चूका था, पर जो सुप्रिया का ढंग था उसने उसे दीवाना कर दिया था.

“मम्मी ने कहा था कि आप सबसे अच्छी हो और मुझे सिखाओगी भी, तब मैंने सोचा था कि वो यूँ ही बोल रही है, पर आप सच में विलक्षण हो, मौसी.”

“तेरी माँ से अच्छी?” सुप्रिया ने फिर उसे छेड़ा. आदमी सामान्य परिस्थिति में जो उत्तर देता है वो लंड किसी स्त्री के मुंह में होने पर नहीं देता. पर सजल अभी भी चौकन्ना था.

“इस मामले में तो आप उनसे आगे हो.”

“हम्म्म, स्मार्ट बॉय.” सुप्रिया ने उसके लंड पर थूका और फिर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी.

सजल का लंड अब तैयार था, और सुप्रिया अभी उससे चूत नहीं चटवाने चाहती थी क्योंकि उसमे अभी भी वीर्य के अवशेष सम्भव थे. इसीलिए उसने सजल से कहा कि वो उसकी चूत को केवल ऊपर से चाटे और चोदने के लिए गीला भर कर दे. सजल ने उसकी इस बात को समझा और उसकी चूत को ऊपर से चाटा और उँगलियों से चूत के अंदर कुछ देर तक हलचल की. अब समय आ गया था मौसी को चोदने का. सजल की तो जैसे आज लॉटरी लगी हुई थी. शोनाली, सगारिका और अब सुप्रिया, एक से बढ़कर एक सुंदर और चुड़क्कड़ परिवार की महिलाओं का जो उसे साथ मिल रहा था.

सुप्रिया ने उसे पूछा कि ऊपर रहना चाहता है या नीचे? सजल को शोनाली के साथ चुदाई में अलग आनंद आया था सो उसने फिर वही आसन के लिए कहा. सुप्रिया ने उसे लेटने के लिए कहा और उसके लेटते ही एक बार फिर उसेक लंड को मुंह में लेकर चाटा और थूक से गीला करते हुए उसके दोनों ओर पांव किया और उसके लंड पर बैठ गयी. सजल तो जैसे स्वर्ग में चला गया हो. सुप्रिया ने इतनी जल्दी उसके लंड को अंदर लिया की पलभर में ही सजल का लंड उसकी बच्चेदानी से जा टकराया.

“लंड मस्त है तेरा. अपने भाइयों को टक्कर देता है और नाना को भी. बहुत मस्त।” सुप्रिया फिर झुकी और उसने अपने मम्मे सजल के वक्ष से सटाये और उसके होंठ चूमते हुए अपने कूल्हे चलने लगी. ये ऐसा आसन है जिसमे शरीर का पूर्ण व्यायाम हो जाता है, और सुप्रिया की शरीर की लचक ही थी जो इसे सम्भव बना रही थी. हल्के धक्कों के साथ सुप्रिया सजल के लंड पर उछलती रही. पर ये आसन आसान बिलकुल नहीं था और इसी कारण उसने अपने मम्मे सजल की छाती से हटाए पर होंठ अपनी वश में रखे. आसन बदलने से सुप्रिया अपनी गति बढ़ाने में भी सफल हो गयी.

सजल ने अपने सामने झूलते हुए सुघड़ मम्मों को देखा तो उससे रहा नहीं गया और उसने अपने हाथों से उन्हें दबोच लिया और निचोड़ने लगा. सुप्रिया तो जैसे पागल ही हो गयी. उसने अपने आप को सीधा किया और तेज गति से उछलने लगी. सजल ने उसके दूधिया मम्मों को दबाना और निचोड़ना बंद नहीं किया. सुप्रिया के मुंह से अब आनंद भरी सिसकारियां निकल रही थीं. फिर उसने अपने दोनों हाथ सजल के दो ओर किया और अपनी गति और भी तीव्र कर दी. सहारा मिल जाने से उसे अब उछल कूद में कोई भी कठिनाई नहीं हो रही थी. सुप्रिया अचानक ही रुक गयी और उसका शरीर एक बिन जल की मछली के समान फड़कने लगा.

सजल को तो समझ ही नहीं पड़ा कि हुआ क्या। पर तभी सुप्रिया जोर से चीखी और धम्म से सजल की छाती पर गिर पड़ी. सजल अब घबराने लगा कि मौसी को कुछ हुआ तो नहीं. वो क्या करे इस बारे में सोच ही रहा था की सुप्रिया कुनमुनाई और फिर उसकी छाती से लग गयी. उसने धीरे से अपने चेहरे को ऊपर किया और सजल को देखा.

“तूने तो कमाल कर दिया, बेटा। मुझे इतनी जल्दी झड़ा दिया. पर तेरा नहीं हुआ न?”

सजल ने नकारा तो सुप्रिया बोली, कुछ देर रुक. मुझे साँस लेने दे.” पर वो न सजल के सीने से उठी न ही उसके लंड को अपनी चूत से निकाला। सजल का लंड उसकी चूत में अभी भी फड़फड़ा रहा था. न जाने कितनी देर तक यूँ ही स्थिति बनी रही. फिर सुप्रिया उठी, सजल के लंड को बाहर किया और उसे चाटा। फिर घोड़ी का आसन ले लिया.

“मौसी की गांड मारेगा?” अपनी गांड हिलाकर सुप्रिया ने सजल को निमंत्रण दिया.

“हाँ, हाँ, हाँ.” सजल एक ही बार में कह गया.

“तो चढ़ जा पीछे से. और अच्छे से मारना। तेज तेज, अंदर तक. कर लेगा?”

“हाँ हाँ, अभी भाभी की ऐसे ही मारी थी.” सजल ने गर्व से कहा.

“तो चढ़ जा मेरे घोड़े.”

सजल के तो भाग्य ही खुल गए. आज दो दो महिलाओं की गांड मरने का सौभाग्य जो मिल रहा था. पर निखिल ने जो उसे सिखाया था सागरिका की गांड मारने के समय अब सजल उनकी माँ के ही ऊपर प्रयोग करने जा रहा था. उसने सुप्रिया की ऊँची उठी हुई गांड को देखा और अपने लंड को पकड़ कर उसके मुहाने रखा.

“डर मत, घुसा दे. डरेगा तो आगे क्या करेगा?” सुप्रिया ने उसे समझाया.

सजल ने लंड के टोपे को अंदर धकेला और उसके अंदर जाने के बाद एक लम्बा धक्का लगाया जिससे उसके लंड ने पूरी दूरी तय कर ली.

“शाबास! अब मार मेरी गांड!!”

सजल अब एक स्वचालित मशीन समान सुप्रिया की गांड मारने लगा. भाभी की गांड कुछ अधिक कसी थी और उसके साथ ही एक और लंड उनकी चूत में होने से बहुत ही अधिक तंग थी. पर मौसी की गांड खुली हुई थी और उसे दोनों के बीच का अंतर समझ आ रहा था. दोनों का अलग सुख था. मौसी की गांड में लंड आसानी से चल रहा था पर गर्मी अधिक थी. और उस गर्मी में उसे अपना लंड भी गर्माते हुए अनुभव हो रहा था. और मौसी की गांड की एक खूबी थी. सुप्रिया इतनी बार गांड मरवा चुकी थी कि वो गांड मरवाते समय अपनी गांड की मांसपेशियों को इस प्रकार से संकुचित करती थी कि लंड पर अतिरिक्त तनाव आता था.

“अरे रे!” सुप्रिया अचानक से बोली.

“क्या हुआ मौसी?”

“सुमति के लिए कैसे रोकेंगे मेरी गांड में तेरा पानी?” सुप्रिया ने दुविधा से पूछा.

“आप गांड ऊपर किये रखना, मैं कुछ लेकर इसे बंद कर दूंगा. अभी आप टेंशन मत लो.”

“ठीक है, तो चलने दे.”

सजल की आँखें अब कमरे में घूम रही थीं और उसे उपयुक्त वास्तु दिखाई दे गयी. एक लम्बी मोटी मोमबत्ती टेबल पर रखी थी. मोटी यानि मोटी, और उसके अगले उपयोग के बारे में सोचते हुए सजल ने अपने धक्कों की गति और गहराई बढ़ा दी.

सजल ने कोई दस से पंद्रह मिनट तक अपनी मौसी की गांड को ठोका और सुप्रिया ने भी पूरा आनंद लेकर गांड मरवाई. फिर अंत में सजल ने गांड में अपना पानी छोड़ ही दिया. लंड से पूरा रस निकलने के पश्चात् उसने सुप्रिया से उसी आसन में बने रहने का आग्रह किया. अपने लंड को निकालकर वो टेबल के पास गए और मोमबत्ती लेकर लौटा. सुप्रिया ने देखा तो हंस पड़ी.

“बंद कर मेरी गांड और चल सुमति के पास मेरे साथ. मोमबत्ती से तूने मुझे अपनी जवानी याद करा दी.”

सजल ने बहुत संभाल कर मोमबत्ती को सुप्रिया की गांड में डाला और फिर उसे सहारा देकर खड़ा किया. फिर दोनों सुमति के कमरे की ओर कल पड़े. कपड़े पहनने की दोनों ने इस बार कोई आवश्यकता नहीं समझी.

क्रमशः
 
पाँचवाँ घर: शोनाली और जॉय चटर्जी

अध्याय ५.३

भाग ६

*********

अब तक:

समर्थ और जॉय के परिवार समर्थ के घर पर एकत्रित हैं, जहाँ समर्थ अपने अवकाश प्राप्ति की घोषणा करता है. वो अपने व्यवसाय का पूरा उत्तरदायित्व अपनी बेटियों को सौंप देता है. इसी के साथ वो अपनी पत्नी शीला के साथ भ्रमण पर जाने की भी घोषणा करता है. साथ ही वो सुमति को सुप्रिया की सहायता हेतु कम्पनी में नौकरी दे देता है. घर के विस्तार के बारे में बताकर वो अपनी दोनों बेटियों को परिवार सहित उनके ही साथ रहने का आग्रह करता है. इसके बाद पार्टी और चुदाई का खेल चलता है.

सुप्रिया और सजल की चुदाई पूरी हो चुकी थी. वहीं पार्थ ने भी भीषण चुदाई से शीला की हड्डियाँ हिला दी थीं. पारुल और नितिन एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे. समर्थ अपनी नातिन की कुँवारी चूत का रस पी रहा था. जॉय सुरेखा की चुदाई में व्यस्त हो चुका था. सुमति और निखिल भी अपने कमरे में चुदाई के लिए उग्र थे.

सुमति और निखिल:

निखिल ने आज सुमति के साथ एक नया प्रयोग करने का निर्णय लिया. उसने सुमति को घोड़ी का आसन लेने के लिए आग्रह किया. सुमति ने पलटते हुए अपनी गांड उठाकर आसन ले लिया. अब वो अपनी चूत की खुजली दूर होने की आशा कर रही थी.

*********

पारुल और नितिन:

अब तक नितिन का लंड खड़ा हो चुका था और अपनी संभावित पत्नी की चुदाई के लिए तत्पर था.

“तो सुहागरात मना लेते हैं?” नितिन ने कहा.

“बिलकुल. नेकी और पूछ पूछ.” पारुल ने ये कहते हुए अपने पैर फैला दिए.

*********

संजना, सुरेखा, सागरिका, समर्थ और जॉय:

सागरिका समर्थ का लंड चूस रही थी जो संजना की चूत चाट रहा था, जॉय ने सुरेखा की चुदाई में अपना ध्यान लगाया हुआ था और बैठक में एक बड़ी शांतिमय ढंग से सब कुछ हो रहा था. जॉय के पूछने पर सुरेखा ने कुछ तेज चुदाई के लिए कहा, पर अधिक नहीं. तो जॉय ने एक अच्छी लय में मद्धम गति से सुरेखा की चुदाई करना आरम्भ कर दिया।

********

सुप्रिया और सजल:

सजल ने बहुत संभाल कर मोमबत्ती को सुप्रिया की गांड में डाला और फिर उसे सहारा देकर खड़ा किया. फिर दोनों सुमति के कमरे की ओर कल पड़े. कपड़े पहनने की दोनों ने इस बार कोई आवश्यकता नहीं समझी.

अब आगे:

सुमति और निखिल:

निखिल ने आज सुमति के साथ एक नया प्रयोग करने का निश्चय किया. उसके अनुरोध पर सुमति घोड़ी के आसन में आ गयी और अब वो आशा कर रही थी कि निखिल उसकी चूत में जलती हुई आग को बुझायेगा. निखिल ने अपने लंड को सुमति की चूत पर लगाते ही एक धक्का दिया और सुमति की चूत में उसका लंड समा गया. सुमति को कुछ आराम मिला. उसकी दहकती हुई चूत ने निखिल के लंड को जकड़ लिया और निखिल को भी उस गर्मी का आभास हुआ. इस आग को बुझाने का एक ही उपाय था, और वो था सुमति की कमरतोड़ चुदाई. और निखिल इस कार्य में पूरी तन्मयता से लग गया.

पर उसने सुमति की चूत को कोई दो तीन मिनट ही चोदा और फिर एक ही बार में अपने लंड को बाहर खींच लिया. सुमति सकपका गयी. उसे अपनी चूत का खालीपन तनिक भी रास नहीं आया. वो कुछ कह पाती इसके पहले ही निखिल ने लंड को उसकी गांड पर रखा और इस बार गांड को चीरते हुए अपने लंड को अंदर पेल दिया. गांड मरवाने की आदी सुमति भी इस अप्रत्याशित प्रहार से धराशाई हो गई. और निखिल को लगा जैसे उसने अपने लंड को कड़ाही से निकालकर नंगी आग पर रख दिया हो. गांड की असहनीय गर्मी उसके लंड को तपाने लगी.

निखिल ने रुकना सही नहीं समझा, अन्यथा उसके लंड के जलने की आशंका थी. और उसने सुमति की गांड में लंड की यात्रा आरम्भ की. जैसे जैसे लंड अंदर से बाहर और बाहर से अंदर होता रहा, अंदर की गर्मी भी उसी अनुपात में घटने लगी. सुमति को तो गांड मरवाने में आनंद आना ही था तो वो अपनी गांड उछालकर निखिल के लंड के थपेड़ों का प्रतिउत्तर देने लगी. पर निखिल यहाँ भी अधिक देर तक रुकने के मूड में नहीं था. इस बार भी जब दो तीन मिनट हुए तो उसने लंड को बाहर निकाला और इस बार फिर से सुमति की चूत में डाल दिया.

सुमति समझ गयी कि निखिल आज उसकी चूत और गांड एक साथ मरेगा और एक छेद के रस को दूसरे में मिलता रहेगा. फिर उसने सोचा कि इस प्रकार से तो उसे न केवल उसे अपनी गांड में से निखिल का रस पीने मिलेगा, बल्कि अपनी चूत के रस के साथ इस मिश्रण का भरपूर आनंद मिलेगा. उसे निखिल के इस नए ढंग का परिणाम अत्यंत सुखद और स्वादिष्ट लग रहा था. उसने इस प्रकार से अपने बेटे पार्थ और भाई जॉय से भी चुदने का निर्णय लिया.

निखिल दोनों छेदों में पर्याप्त समय दे रहा था और उसके चूत से गांड और वापिस चूत में लंड को बदलते रहने का क्रम सटीक और अटूट था. सुमति के दोनों छेदों के खुले होने से भी उसे इस लुका छिपी में अधिक कठिनाई नहीं हो रही थी. सुमति की आनंद से भरी सिसकारियां अब हल्की चीखों में परिवर्तित हो चुकी थीं. पूरी डबल चुदाई का आनंद न सही पर निखिल उसे एक नए प्रकार से ही उसका आनंद दे रहा था. सुमति की चूत से झरता रस बिस्तर को इतना गीला कर चुका था कि उसे बदलना नितांत आवश्यक था.

निखिल इस समय उसकी गांड मार रहा था कि कमरे में सुप्रिया ने सजल के साथ प्रवेश किया. सुप्रिया ने पीछे मुड़कर अपनी गांड से बाहर निकली हुई मोमबत्ती को दिखाया तो सुमति एक बार फिर झड़ गयी.

“वाओ, मॉम, क्या आइडिआ लगाया है.” निखिल ने देखा तो हंसकर बोला।

“ये सजल की तीव्र बुद्धि का काम है.” सुप्रिया ने सजल को पूरा श्रेय दिया. “अब थोड़ा हटो मैं सुमति के आगे आ जाऊँ फिर अपना खेल चालू कर देना.”

निखिल ने अपने लंड को सुमति की गांड से निकाला, सुप्रिया ने सुमति को सीधे लेटने के लिया कहा और उसके सीधे होते ही उसके मुंह पर आ गयी. सुमति ने मोमबत्ती को निकाला और उसके मुंह में सजल और सुप्रिया की चुदाई का मिश्रण गिरने लगा. स्वाभाविक रूप से जब गांड से पानी निकलना बंद हुआ तो सुमति ने सुप्रिया को नीचे खींचा और उसकी गांड पर मुंह लगाकर, जोर से बचा हुआ माल भी पी लिया. निखिल ने इसी आसन में सुमति की गांड में अपना लंड पेल दिया और फिर से उसकी गांड मारने लगा.

“मॉम, ये मोमबत्ती यहां छोड़ दो. हमारे काम आएगी.” निखिल ने अपने धक्कों पर बिना अंकुश लगाए अपनी माँ से कहा. सुप्रिया ने मोमबत्ती उठाई और सुमति से कहा कि उसे साफ कर दे. सुमति के लिए तो जैसे हर अंश टॉनिक था तो उसने चाटकर उसे साफ कर दिया. सुप्रिया उठी और मोमबत्ती निखिल को सौंपकर सजल के साथ कमरे से चली गयी.

निखिल को हंसी आ आ गयी.

“देखा बुआ, नानी प्लग दे गयी और मम्मी मोमबत्ती. सब आपको कितना चाहते हैं, कि आपकी मन की इच्छा पूरी करने के लिए हर सम्भव उपाय करते हैं.” निखिल इस समय सुमति की गांड में लंड पेल रहा था. और अब दोनों झड़ने के निकट थे.

जब सुमति की चूत में लंड डाला तब सुमति ने उत्तर दिया, “सच है. सबने मुझे कितनी सरलता और भेदभाव के स्वीकार किया है. मुझे नहीं लगता कि मुझे कभी इससे अधिक प्यार मिला हो.”

अब सुमति झड़ रही थी. निखिल का लंड भी अब झड़ने की कगार पर था, इसीलिए उसने चूत में से लंड निकाला और सुमति की गांड में फिर से डाला और तेज धक्कों से उसकी गांड को पेलने लगा. उसके लंड से वीर्य का स्त्राव भी उसके धक्कों को धीमा न कर पाया. पर जब उसे आभास हुआ कि उसका वीर्य अब सुमति की गांड से झाग के साथ बाहर निकल रहा है तो उसने धक्के हल्के किये और अपने झड़े हुए लंड को बाहर निकालते हुए नानी द्वारा दिए प्लग से सुमति की गांड बंद कर दी. अब उसे एक ग्लास की आवश्यकता थी. जो उसे मिल गया.

अपने लंड को सुमति के मुंह के पास ले जाने पर सुमति ने पूरे प्यार से उसे चाटा और कुछ देर मुंह में लेकर चूसा. सुमति आनंदित थी. निखिल ने उसे सीधे लिटाया और ग्लास उसकी गांड के नीचे लगाते हुए प्लग को निकाल बाहर किया. ग्लास लगभग आधा भर गया तो उसने उसे सुमति को दिया. सुमति अपने कोहनी के बल बैठकर स्वाद लेते हुए उसे पीने लगी. निखिल विस्मृत आँखों से उसे देख रहा था. आखिरी घूंट को अपने मुंह में घुमाते हुए सुमति ने उसे निगल लिया.

“बहुत अलग स्वाद था आज. चूत और गांड की गंध से तुम्हारे रस के स्वाद में अलग ही बात थी. मुझे लगता है कि मुझे अब इसे अपनी नियमित खुराक में जोड़ लेना चाहिए, पर किसी और की चूत और गांड से निकले तो पता लगेगा कि सच में इतना ही स्वादिष्ट है या नहीं.” सुमति ने अपने विचार रखे.

निखिल हंस कर बोला, “मुझे नहीं लगता कि आपको इस के कोई विशेष कठिनाई होगी. चलिए अब चलते हैं. लोगों के मन मैं उस रिसोर्ट के बारे में जो प्रश्न हैं, उन्हें तो मैंने अभी तक सुना भी नहीं.”

“बिलकुल, चलो.” सुमति और निखिल ने भी अब कुछ पहनने पर ध्यान नहीं दिया और दोनों नग्नावस्था में ही बैठक को चले गए.

पारुल और नितिन:

नितिन और पारुल अपनी अनौपचारिक सुहागरात मनाने वाले थे. पारुल ने अपने पाँव फैलाये और नितिन ने अपने लंड को उसकी चूत में डाल दिया. वो कमसिन सी दिखने वाली इस कोमल सी लड़की को प्रेम से ही चोदने का पक्षधर था. वैसे पारुल पार्थ के मोटे लम्बे लंड को भी ले चुकी थी, और नितिन का लंड भी पार्थ से अधिक भिन्न नहीं था, पर वो इस चुदाई को अपने और पारुल के लम्बे और उज्ज्वल भविष्य के लिए स्मरणीय बनाने वाला था. एक मद्धम गति से चुदाई करते हुए दोनों प्रेमी एक दूसरे के चुंबन में लीन थे. नितिन की जीभ पारुल के मुंह में थी जिसे पारुल अपनी जीभ से लड़ा रही थी. पर इस लड़ाई में ज्वर नहीं था, प्रेम था.

पारुल को ये आभास हुआ कि नितिन उसे उसी प्रेम और कोमलता से चोद रहा है जैसे उसके पिता जॉय चोदते हैं. और इस निष्कर्ष ने उसे नितिन से और भी अधिक निकट आने में सहायता की. उसे अब विश्वास हो गया कि नितिन उसे न केवल प्रेम से परिपूर्ण करेगा, परन्तु समय आने पर उसकी रक्षा में भी आगे रहेगा. पारुल और नितिन के तन जुड़ने के साथ अब मन भी एक थे. पहले नितिन का मन पारुल की गांड मारने का था, परन्तु उसने उसे आज के लिए त्याग दिया. समय आने पर उसे पारुल की मुलायम और संकरी गांड मारने के अनगिनत अवसर मिलेंगे. पर आज उसे केवल चूत से ही संतुष्टि थी.

जब नितिन ने अपनी भावना पारुल को बताई तो उसकी आँखें आंसुओं से भर उठीं, पर स्वयं को संभालते हुए उसे कहा, “बुआ बेचारी दुःखी होंगी, उनकी इच्छा थी मेरी गांड से तुम्हारा पानी पीने की.”

“कोई बात नहीं, जब भी हम इसके बारे में निर्णय लेंगे उन्हें अवश्य आमंत्रित कर लेंगे.” नितिन ने कहा.

“बिल्कुल नहीं. मैं मम्मी से प्लग ले लूँगी जो तुम्हारा पानी गांड में रोक कर रखेगा. घर पर पिला दूंगी. पहली बार गांड मारोगे तब हम अकेले ही रहेंगे.”

नितिन ने इस बात पर पारुल के होंठ चूम लिए.

पारुल और नितिन के इस समागम को चुदाई कहना उचित नहीं होगा. वो दो प्रेमियों की भांति रासलीला कर रहे थे. दोनों जानते थे कि उनका ये समय कितना बहुमूल्य है. अन्य समय वो दूसरों के साथ चुदाई में लीन रहते थे. पर एक दूसरे के साथ अब उनका इस प्रकार से ही मिलन होगा, ये लगभग निश्चित था. हाँ, ऐसा नहीं कि वे तेज और व्यग्र चुदाई नहीं करेंगे, पर उनका मुख्य आकर्षण इसी प्रकार से सम्भोग कहोगे.

पारुल की जीभ को अपने मुंह में लिए हुए नितिन उसे चूस रहा था. पारुल अपनी जीभ को उसके मुंह में घुमा रही थी और इसी के साथ नितिन का लंड भी पारुल की चूत में अपनी यात्रा में मग्न था. न जाने कितनी देर तक यूँ ही दोनों प्रेमी एक दूसरे से जुड़े रहे. परन्तु शारीरक और प्राकृतिक सीमाओं के कारण अब दोनों उबाल पर आ रहे थे. नितिन ने अब अपनी गति बधाई और पारुल ने उसका साथ देते हुए अपनी कमर को उछालते हुए उसके हर धक्के का साथ दिया. इसी गति से कुछ देर के संसर्ग के बाद जब नितिन को लगा की वो अब झड़ने वाला है, तो उसने पारुल को बताया. पारुल ने इच्छा जताई कि वो नितिन के रस को पीने की इच्छुक है.

नितिन ने अंतिम समय तक धक्के लगाने के बाद जैसे ही झड़ने लगा उसने अपने लंड को पारुल को प्रस्तुत किया. पारुल ने उसे मुंह में लेकर चूसना आरम्भ किया ही था कि नितिन के लंड से रस की धार उसके मुंह में गिरने लगीं. पारुल ने एक बून्द भी व्यर्थ न जाने दी. जब उसने नितिन के सम्पूर्ण रस को पी लिया तो उसके लंड को चाटते हुए उसे साफ किया और चूमते हुए नितिन को प्रेम भरी दृष्टि से देखा.

“तुम्हारा हुआ या नहीं?” नितिन ने पारुल से पूछा.

“पूरा नहीं” पारुल ने उत्तर दिया.

ये सुनते ही नितिन नीचे की ओर गया और अपने मुंह से उसे चाटने लगा.

“ये क्या कर रहे हो? पारुल ने आश्चर्य से कहा, क्योंकि अभी नितिन का लंड उसकी चूत से निकले हुए देर नहीं हुई थी.

“अपनी भावी पत्नी का स्वाद ले रहा हूँ, चुदाई के बाद कैसी लगती है. पर मुझे कोई विशेष अंतर नहीं लगा.” नितिन अपने कार्य में जुट गया.

पारुल के लिए ये एकदम नया अनुभव था. उसकी माँ और बुआ उसकी चूत चुदाई के बाद चाटकर कई बार साफ कर चुकी थीं, पर किसी पुरुष ने ये अब तक नहीं किया था. फिर उसने विचार किया कि झड़ा तो नितिन भी नहीं है. उसकी चूत की कुलबुलाहट ने उसे चेतावनी दी कि वो अब झड़ने वाली है. नितिन को बताने से भी नितिन ने अपनी जीभ और मुंह को हटाया नहीं और पारुल के झड़ते ही उसके सारा रस पी किया.

पारुल और नितिन फिर आलिंगनबद्ध हो गए और एक दूसरे को चूमते हुए कुछ देर यूँ ही लेटे रहे. फिर उन्होंने कपड़े पहने और बैठक की ओर चल दिए. दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामा हुआ था. और उनके बैठक में पहुंचने पर सबने इसे देखा. प्रश्नभरी आँखों ने दोनों को देखा.

नितिन ने कहा, “हम आप लोगों को बाद में कुछ कहना चाहते हैं.”

अनुभवी सुप्रिया और शोनाली समझ गए और एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा पड़े.

*******
 
संजना, सुरेखा, सागरिका, समर्थ और जॉय:

संजना के अनूठे स्वाद और सुगंध से अचम्भित समर्थ एक नशे जैसी अवस्था में थे. संजना भी निरंतर उन्हें अपने अमृत से विव्हल कर रही थी. समर्थ अपनी बेटियों का तो अक्षत अमृत नहीं पी पाए थे, परन्तु अपनी नातिन के रस का पान करने में वो कोई कमी नहीं करना चाहते थे. जॉय उनके ही बगल में उनकी छोटी बेटी सुरेखा की चुदाई कर रहा था और समर्थ सुरेखा की बेटी का रस पीने में व्यस्त थे. संजना भी पहले पुरुष संसर्ग से इतनी उत्तेजित थी कि उसका शरीर उसकी भावनाओं के वश में आकर कभी जलता तो कभी ठंडा पड़ जाता.

समर्थ जब अपने घुटनों पर बैठे हुए तक गए तो उन्होंने निणर्य लिया कि आज के लिए अमृत कलश को छोड़ना ही श्रेयस्कर है. संजना की चूत तो बहती नदी के समान अविरल जल का निस्तारण किये जा रही थी. उन्होंने संजना के भग्नाशे को चाटा और अपनी उँगलियों में लेकर हल्के से मसक दिया. यही वो शिखर था जिसे छूने के प्रयास में संजना इतनी देर से व्याकुल थी. उसकी चीख सुनकर सभी सहम गए. सुरेखा तो समझी की उसके पिता ने संजना को चोद तो नहीं दिया. परन्तु स्थिति के आकलन से ज्ञात हुआ कि संजना का कौमार्य सुरक्षित था और वो बुरी तरह से कांप रही थी और समर्थ होनी उँगलियों में लेकर उसके भग्न को मसल रहे थे.

अंततः, संजना शांत पड़ गयी. फिर उसने अपनी आँखों को आधा खोला और धीमे स्वर में कहा, “थैंक यू, नानू।”

समर्थ ने उसकी चूत पर एक चुंबन लिया और सागरिका से पूछा, “कुछ सहायता करूँ क्या, बहू?”

सागरिका ने उनकी ओर देखा और मुस्कुराई, “नाना जी, इसमें पूछने कि कोई आवश्यकता है ही नहीं. सब आपका ही है, जो चाहे ले लीजिये.”

समर्थ खड़े हो गए और उनके विशाल मोटे और लम्बे लंड को देखकर सागरिका के मुंह में पानी आ गया.

पर समर्थ अब बहुत देर से अपने लंड को संभाले हुए था तो उसे चुदाई की इच्छा था. उसकी आँखों से झलकती वासना को देखकर सागरिका समझ गयी कि चूसने का अवसर उसे बाद में ही मिलेगा.

अब तक परिवार के सदस्य एक एक करके बैठक में जमा हो रहे थे. सबकी आँखें अब जॉय के ऊपर ही थीं जो चुदाई के अपने अंतिम पड़ाव पर था. सुप्रिया, सुमति और पारुल चल रहे चुदाई के खेल को देखते रहे पर कुछ बोले नहीं. पारुल और नितिन अभी भी कपड़े पहने थे और एक दूसरे का हाथ पकड़े थे. सुमति ने देखा कि किसी की गांड नहीं मारी जा रही तो कुछ उदास सी हो गयी. पर समर्थ ने उसके भावों को पढ़ लिया. सागरिका उसके लंड पर आँखें गढ़ाए थी.

समर्थ: “बहू, मैं तुम्हारी बुआ के लिए कुछ। …”

समर्थ की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि सागरिका झट से घोड़ी के आसन में आ गयी और अपनी गांड हिलाकर समर्थ को ललचाने लगी.

समर्थ ने आव देखा न ताव उसके पीछे जाकर उसकी गांड में अपना लंड पेल दिया. निखिल को जैसे कुछ दर्द सा हुआ, पर उसने अपनी भांवनाओं को संयत किया और समर्थ से अपनी भावी पत्नी की गांड मारने के दृश्य को देखने लगा. सुप्रिया ने संजना के पास जाकर उसे उठाया और फिर सोफे पर बैठा दिया. उसकी आँखों में अभी भी एक नशा सा था. सुप्रिया ने उसे पानी लेकर दिया. पानी पीकर संजना बोली, “नानू सच में बहुत अच्छे है,”

सुप्रिया ने मुस्कुराते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया. “तुम भी बहुत अच्छी हो, बहुत स्वीट.”

जॉय अब झड़ रहा था और सुरेखा उसके वीर्य को अपनी चूत में सहेजने का प्रयास कर रही थी. जब जॉय अपने रस से उसकी चूत को भर चुका तो वो एक और हट के खड़ा हो गया, और फिर सोफे पर ढह गया. और कोई समय होता तो पारुल अपने पिता का रस चाटने में देर न लगती. पर आज कुछ अंतर था. इसीलिए वो खड़ी रही. सुमति का ध्यान सागरिका की गांड में चल रहे समर्थ के लंड पर था और उससे ये आशा करना कि वो सुरेखा को चाटेगी व्यर्थ था. सुप्रिया ने ये कार्य अपने ऊपर लिया.

सुरेखा की चूत के आगे झुकते हुए उसने उसे चाटते हुए पूरा साफ कर दिया. फिर अपनी जीभ से उसके अंदर बचे हुए वीर्य को भी खींचकर पी किया. सुरेखा अब धीरे धीरे सामान्य हो रही थी. उसने अंख खोली तो देखा कि उसके बच्चे सजल और संजना उसे ही देख रहे हैं. उसे कुछ क्षण के लिए शर्म आयी, पर जब देखा कि वो दोनों भी नंगे ही हैं, तो उसने एक संतुष्ट मुस्कुराहट के साथ अपनी आँखें बंद कर लीं और सुप्रिया को उसकी चूत को चाटकर साफ करने के लिए छोड़ दिया.

निखिल ने नितिन और सुमति को देखा. जहाँ सुमति की आँखों में उसे एक भूख दिखाई दी, जो अवश्य ही उसकी भावी पत्नी की गांड से रस पीने के लिए थी, उसे नितिन को देखकर आश्चर्य हुआ. उसने पारुल का हाथ जोर से पकड़ा हुआ था, जैसे छोड़ने वाला न हो. पर उसकी आँखें उनकी माँ सुप्रिया पर थीं जो अब उनकी मौसी की चूत साफ करके हटी थीं. निखिल मुस्कुराया. प्रेम हो या नहीं, ये मादरचोद का मादरचोद ही रहेगा।

समर्थ के मुंह से अब जो ध्वनि आ रही थी, उसे सुनकर सभी ने ये अनुमान लगा लिया कि उसका पानी अब छूटने ही वाला है. सुमति की आँखें चमक रही थीं. और उसकी जीभ लपलपा रही थी. और जब समर्थ ने एक हुंकार के साथ अपना रस सुमति की गांड में गिराया तो सुमति तुरंत उनके पास जा पहुंची. गर्मागर्म माल खाने का ये स्वर्णिम अवसर वो कैसे छोड़ सकती थी. समर्थ ने उसे देखा और फिर झड़ने के बाद अपने लंड को सागरिका की गांड से निकाल कर सुमति के मुंह के आगे कर दिया. सुमति ने उसके लंड को चाटकर साफ तो किया पर उसकी आंखें सागरिका की गांड पर तिकी रहीं. वो तो अच्छा हुआ कि गांड से रस बाहर नहीं बहा अन्यथा सुमति क्या करती कहना सम्भव नहीं है.

समर्थ के लंड को चाटने के बाद सुमति के अपने होंठ सागरिका की गांड पर लगा दिया और खींच खींच कर उसे खाली करने लगी. सागरिका अपनी बुआ के इस व्यसन से भली भांति परिचित थी, पर इस प्रक्रिया से उसे गांड में गुदगुदी हो रही थी इसीलिए वो हंसने लगी. सुमति ने अपने खुराक लेने के बाद सिर उठाया तो देखा कि सब उसे ही देख रहे है. पर उनकी आँखों में उसे प्यार के सिवाय और कुछ न दिखा. उसने अपने होंठ चाटे और जाकर सोफे पर बैठ गयी.

अब पार्थ द्वारा मंत्रीजी के रिसोर्ट की सम्पूर्ण कथा को सुनने का समय था.

क्रमशः
 
पाँचवाँ घर: शोनाली और जॉय चटर्जी

अध्याय ५.३

भाग ७

*********

पार्थ द्वारा मंत्रीजी के रिसोर्ट की कथा:

समस्त परिवारगण पार्थ के अनुभव का खुले कानों से श्रवण कर रहे थे. पार्थ ने जो बताया उसे सुनकर उनके आश्चर्य की कोई सीमा ही नहीं रही. उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस देश में ऐसा भी कुछ सम्भव है. पर जब समर्थ ने उन्हें याद दिलाया कि पार्थ का दिंची क्लब स्वयं इसका उदाहरण है तो उन्हें विश्चास हो ही गया.

पार्थ ने बताना आरम्भ किया.

रूचि और मुझे एक अलग कार में ले जाया गया था. और हम दोनों उनके ही बंगले पर रुके थे. उस रिसोर्ट में उनका अलग बंगला है, जिसे हर प्रकार से सुरक्षित किया गया है. उनके सरकारी सुरक्षा कर्मी उस बंगले के एक गेट पर ही पहरा देते हैं और उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं है. अंदर उनकी अपने सुरक्षाकर्मी रहते हैं और दूसरा गेट रिसोर्ट में खुलता है. उनकी अनुमति के बिना रिसोर्ट के मैनेजर इवान स्टोन भी वहां नहीं आ सकते.

पार्थ की पूरी बात सुनकर परिवार वाले अत्यंत आश्चर्य में थे. उनके कभी स्वप्न में भी ये भान नहीं हुआ था की उक्त मंत्री इस प्रकार का व्यभिचारी भी हो सकता है. यही नहीं उसने इस सबके लिए एक रिसोर्ट भी बनाया है जिसमे अन्य प्रसिद्द और मान्य व्यक्तिगण भी सम्मिलित थे. कुछ लोगों के बारे में जानकर उन्हें और भी अधिक अचरज हुआ. सच में हाथी के दाँत दिखाने के और तथा खाने के और होते हैं. जिनके बारे में पार्थ ने बताया था उन पर तो यही चरितार्थ होता था. पर इन दोनों परिवारों के बारे में भी यही कहा जा सकता था. किसे पता था कि बाहर के समाज में सौम्य और चरित्रवान बने ये सभी अंदर से किस प्रकार से लिप्त हैं.

मंत्रीजी जिन्हें सभी नेताजी कहते हैं अपनी सुरक्षा के साथ अपने परिवार के साथ हमारे आगे जा रहे थे. मैं और रूचि अपनी गाड़ी में उनके पीछे थे. हमारे पीछे केके का परिवार था. और उनके पीछे हमारे क्लब के नौ रोमियो दो गाड़ियों में थे. इस लम्बी पंक्ति में हम सभी लगभग दो बजे नेताजी के रिसोर्ट पर पहुंचे थे. हमारी जाँच के बाद हम सभी को नेताजी के बंगले में जाने की अनुमति मिली. अंदर जाने के बाद उस बंगले की विराटता देखकर ही मन प्रफुल्लित हो गया. नेताजी की पत्नी शिखा और पुत्री मनीषा अपने कमरे में चले गए. रूचि और मुझे एक कमरा दिया गया था जिसमे हमें पहुंचाया गया. केके अपनी पति और बेटे के साथ एक कमरे में चले गए थे. कुछ देर में हम सब नहा धोकर उनकी बैठक में पहुंच गए. नेताजी की सेवा में रिसोर्ट की लड़कियाँ और लड़के लगे हुए थे. वे एक बहुत ही मासूम दिखने वाली लड़की को कुछ समझा रहे थे.

“और तुम उसकी बेटी का पात्र निभाओगी. इसके आगे की बात तुम जाकर केके से समझ लो. बस ये जानो कि मैंने तुम्हारी विकृति के अनुसार ही तुम्हें उनके लिए चुना है. मुझे निराश मत करना.”

“नहीं, सर. आप जानते हैं कि इस प्रकार की भूमिका मैं कितने अच्छे से निभाती हूँ. और अगर वो ऐसे प्रसिद्ध लोगों के साथ हो तो सोने पर सुहागा. मैं आपका धन्यवाद करना चाहूँगी.”

“उसके भी तुम्हें अवसर मिलेगा अगर तुम अपने काम में सफल हुईं और वे प्रसन्न हुए. अब तुम जाकर केके से मिलो और उससे समझो कि तुमसे क्या अपेक्षा है.” नेताजी ने उसे जाने के लिए संकेत किया.

नेताजी की पत्नी शिखा और बेटी मनीषा इस समय तक बैठक में आ चुकी थीं और उन्होंने एक भी वस्त्र नहीं पहना था. रूचि और मैं अभी अपने कपड़े पहने हुए थे.

शिखा: “पार्थ और रूचि. आप दोनों को इस वर्ष की पोशाक का बताया गया था, तो आप भी जाकर उचित प्रकार से लौटें.” उसकी बातों में आज्ञा और निवेदन का मिलाजुला पुट था. रूचि और मैं अपने कमरे में गए और नंगे होकर बैठक में लौट आये. अब तक नेताजी भी नंगे हो चुके थे और मनीषा उनकी गोद में बैठी हुई थी.

नेताजी: “पार्थ और रूचि को मुझसे कुछ व्यवसाय संबंधित बातें करनी हैं, तो हम तीनों मेरे ऑफिस में जा रहे हैं. मनीषा तुम जाकर केके को पूछो अगर उन्हें कुछ चाहिए. शिखा आप जाकर रूचि के रोमियो से मिलें और उन्हें एक बार फिर रिसोर्ट के नियम समझा दें. लड़के हैं, कोई कोताही न कर बैठें।”

पार्थ: “नेताजी, मैंने उन्हें सब कुछ समझा दिया है.”

नेताजी: “कोई बात नहीं, शिखा फिर से एक बार समझा देगी.”

नेताजी के साथ रूचि और में ऑफिस में गए और लगभग एक घंटे के विचार विमर्श के बाद हम एक सहमति पर पहुंचे. इसके बाद नेताजी ने एक सहमतिपत्र बनाया जिस पर हम तीनों से हस्ताक्षर किये.

नेताजी: “इसका अनुबंध शिखा के नाम से बनाया जायेगा. उसके पूरे होने के बाद आपको देने के लिए वो स्वयं ही आएगी, क्योंकि लिखित पत्र है और मैं इसे किसी और माध्यम से नहीं भेज सकता.”

रूचि: “अगर ऐसा है तो वो मेरे घर पर ही आएं जिससे कोई अफवाह भी नहीं उठेगी.”

नेताजी: “आपकी सोच बिलकुल सही है. आप शिखा को अपने घर का पता दे दीजिएगा. चलिए अब देखें क्या कुछ चल रहा है.”

तभी नेताजी का फोन बजा और बताया गया कि रिसोर्ट के मैनेजर इवान स्टोन आये हैं.

नेताजी: “मेरे रिसोर्ट के मैनेजर इवान आ रहे हैं. मैं उनसे आपको मिलता हूँ और हमारे अनुबंध के बारे में बताता हूँ. उन्हें अधिक विस्तार में मैं आगे उन्हें रात में समझा दूंगा.”

इसके बाद हम बैठक में गए और इवान से मिले.

इवान से बातें करने के बाद जब हम चलने को हुए तो इवान केके से मिलने का इच्छुक दिखा. नेताजी ने तो कुछ नहीं कहा पर बाद में पता लगा कि शिखा ने उसे समझाया था. जो उसने देखा उसे देखकर उसके मन में केके और उसके पति के लिए कोई भी आदर था वो समाप्त हो गया. रूचि ने भी उसे समझाया था. रूचि को कैसे पता था कि क्या हुआ है वो मुझे नहीं पता, पर उसने उस रात मुझे बताया। मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि मैं क्लब में केके के कारनामे देख चुका था. हाँ मुझे उस मासूम दिखने वाली लड़की पर अवश्य अचरज हुआ कि नेताजी ने उसे इसीलिए चुना था क्योंकि वो इस प्रकार के खेलों में निपुण थी.

जब हम रेस्त्रां पहुंचे तो मेरी भेंट डेविड के परिवार से हुई, जैसा कि मैंने आपको बताया था. मुझे इस बात पर सुखद आश्चर्य हुआ कि हमारे आठ घरों के छोटे से द्वीप में चार परिवार हमारी ही जीवन शैली में लिप्त हैं. डेविड को विश्वास दिलाकर कि उन्हें हमसे कोई डर नहीं है, मैं और रूचि एक ओर बैठकर चल रही गतिविधियों को देखते रहे. ये साफ दिख रहा था कि ये रिसोर्ट लोगों के अंतर के सभी विकृत विचरों को पूरा करने के लिए बनाया गया है. जो परिवार या लोग हमारे सामने शीशे के समान साफ दिखते हैं, उनके अंदर कितना मैल है ये देखकर आश्चर्य भी हुआ दुःख भी.

एक प्रसिद्ध समाज सेविका जो नैतिक मूल्यों के लिए कई भाषण दे चुकी है, एक प्रसिद्ध डॉक्टर जिनको जीवनदाता माना जाता है, एक मुख्य व्यवसाई जिनके सच्चाई और स्वच्छ व्यक्तित्व को अनूठा समझा जाता है. इसी प्रकार से अन्य लोग जो आये थे किसी न किसी क्षेत्र में अग्रणी थे. पर वहाँ न किसी के शरीर पर कोई वस्त्र था, न चेहरे पर कोई मुखौटा. ये भी दिख रहा था कि वे सब किसी न किसी प्रकार से नेताजी के ऋणी थे. पर उनमे से कोई भी किसी भी सरकारी पद पर नहीं था. नेताजी ने चुन चुन कर अपने इस समूह को बनाया था.

पार्थ कुछ देर के लिए रुका और सजल ने उसे ग्लास में ड्रिंक थमा दी. इससे पहले कि वो कुछ बोलता शोनाली बोल पड़ी.

“मैं अभी मिशेल से मिलने गयी थी. उसे भी बहुत ख़ुशी हुई मुझसे मिलकर. हमने मिलकर एक पार्टी करने का निश्चय किया है. देखना ये है कि माँ बाबूजी के जाने के पहले सम्भव होगी या नहीं.”

“पार्थ.” ये समर्थ थे जिन्हें पार्थ के कुछ भावुक होने का आभास हो रहा था. “कौन अपने जीवन को किस प्रकार से जीता है, इसपर टिप्पणी करना या कोई विचार बनाना गलत है. समाज की कई सीमाएं हैं, परन्तु वे सामाजिक परिवेश को प्रदूषण से बचने के लिए हैं. हमारे परिवार में जो हम कर रहे हैं, इससे समाज के किसी भी और व्यक्ति पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं है. इसी प्रकार से अगर वहाँ आये लोग अपने अंतर की वासना को इस रूप में पूरा करते हैं तो समाज पर कोई अंतर नहीं पड़ता. क्या वो समाज सेविका, या डॉक्टर या व्यवसाई अपने कामों में किसी प्रकार से भी कमी करते हैं, क्या उन्होंने किसी की हानि की है? अगर तुम्हें उनके ऊपर क्रोध है तो हम सब पर क्यों नहीं. यहाँ हम सबको देखकर बताओ कि हम उनसे किस प्रकार से भिन्न हैं, और अगर नहीं तो तुम्हारी भावनाएं क्यों उनके लिए अलग और हमारे प्रति अलग हैं?”

पार्थ अपनी ड्रिंक पीते हुए समर्थ की बात पर चिंतन करता रहा.

“आप सच कह रहे हैं नानाजी. मैं समझ गया.” पार्थ ने कहा, “नहीं तो मेरा तो सन्यास ही आरम्भ हो जायेगा.”

सब हंस पड़े और पार्थ ने ड्रिंक समाप्त करते हुए आगे की कथा सुनाना आरम्भ किया. सजल उठकर उसके ग्लास को फिर भर लाया.

खाने के बाद परिवार एक दूसरे को आमंत्रित कर रहे थे, कुछ परिवार पूरे आमंत्रित थे पर अधिकांश में चुने हुए लोग ही थे. सम्भवतः इस प्रकार का आयोजन बुरा नहीं माना जाता था क्योंकि किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की थी. हमें बाद में समझ में आया कि अधिकांश आमंत्रण लड़को और लड़कियों को ही दिए गए थे. और रिसोर्ट ने उनके बदले में अपने लड़कों और लड़कियों को निर्धारित किया था. मतलब अगर किसी परिवार का एक लड़का अकेला आमंत्रित किया गया था तो उस परिवार को अन्य लड़के को रिसोर्ट से लेने की छूट थी. इसके बाद भी अगर कोई रिसोर्ट का लड़का या लड़की बचते थे तो वो अपने पसंद से किसी भी परिवार के साथ जा सकते थे.

मुझे भी आमंत्रण मिला था, परन्तु मैं और रूचि कुछ चर्चा करना चाहते थे और इसीलिए मैंने उसे स्वीकार नहीं किया था. रूचि ने मुझे इस बात के लिए छेड़ा था, पर अधिक कुछ नहीं कहा था. कुल मिलाकर सोलह परिवार थे, इसमें इवान और नेताजी का परिवार भी सम्मिलित था. शिखाजी डॉक्टर परिवार में आमंत्रित हुई थीं और डेविड को भी उन्होंने आमंत्रित किया था. डॉक्टर की पुत्री को जैसन ने आमंत्रित किया था. डॉक्टर साहब की पत्नी और बेटे को भी आमंत्रण था पर उन्होंने बाद में आने के लिए कहा था. मिशेल ने इवान के साथ जाने की इच्छा की थी और उसे हेलेन ने सहर्ष स्वीकार किया था. कुल मिलाकर सभी एक दूसरे के साथ मिल कर चुदाई करने वाले थे. एक से अधिक परिवारों में भी निमंत्रण थे. मुझे तो समझ ही नहीं पड़ा कि वे ये सब कैसे संभालेंगे. फिर इसके बारे में चिंता न करते हुए हम अपने कमरे में चले गए.

अगले दिन सुबह इवान से जब चर्चा हुई तो उसने हमें अपना cctv वाला कमरा दिखाया और ये भी बताया कि सभी प्रसंग रिकॉर्ड किये गए थे और हम चाहें तो उन्हें अपने कमरे में टीवी पर देख सकते हैं. उसने हमें उन्हें देखने की प्रक्रिया बताई. हमें एक पासवर्ड भी दिया गया. फिर शेष रिसोर्ट के बारे में भी बताया गया.

इवान: “मेरी कल जो नेताजी से बात हुई है उससे ये पता लगा है कि हमारे इस प्रकार के आयोजनों में अधिकांश लड़कों की कमी हो जाती है. महिलाएं यहाँ आने पर नए नए प्रयोग करना चाहती हैं जो हर बार सम्भव नहीं होता. इस प्रकार के अनुबंध से हमारे लिए आसानी हो जाएगी. जहां तक लड़कियों की कमी का प्रश्न है, तो उसके लिए अभी कोई विशेष आवश्यकता नहीं जान पड़ती है क्योंकि हमारे रिसोर्ट की लड़कियाँ ही नब्बे प्रितशत से अधिक अनुरोध संभाल पाती हैं. मैं ये बता दूँ कि अधिकतर परिवार में ये महिलाओं पर केंद्रित अधिक है क्योंकि उन्हें समाज में अधिक सजग रहना होता है. मेरे विचार से इसीलिए आपके क्लब से ये अनुबंध हम सबके लिए बहुत लाभदायी सिद्ध होगा.”

इसके बाद इवान ने हमे नाश्ता करवाया और फिर हम अपने कमरे में चले आये. सुबह उस समय पूरा रिसोर्ट सूना पड़ा था. रात भर चुदाई में संलग्न लोग अभी तक सोये पड़े थे. हम अपने कमरे में गए तो रूचि ने कल की रिकॉर्डिंग देखने की इच्छा व्यक्त की. हमने पासवर्ड का प्रयोग करते हुए इवान द्वारा दिए निर्देशों के अनुसार उनका चैनल लगाया तो हमारे घर के समान अलग अलग कमरों के दृश्य दिखे. रूचि ने रिमोट मेरे हाथ से लिया और सबसे पहले समाज सेविका के कमरे पर केंद्रित कर दिया.

अंजलि और उसके पति रोहित के कमरे में अब उनकी पुत्री नहीं थी जो किसी और के कमरे में गयी हुई थी. रिसोर्ट की एक बाला उनके कमरे में थी. वो लड़की अंजलि की चूत चाट रही थी और रोहित उस लड़की के पीछे से उसकी चुदाई कर रहे थे. ये बताना सम्भव नहीं कि उनका लंड चूत में था या गांड में. कुछ देर ये देखने के बाद रूचि ने चैनल बदल दिया। रूचि यही कर रही थीं, चार पांच मिनट के लिए एक कमरे में चल रहे दृश्य को देखतीं और फिर बदल देतीं. मुझे समझ नहीं आया कि वे चाहती क्या थीं. मेरे पूछने पर उसने कहा कि कुछ अलग. ये सब तो देखा हुआ है.

मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसा क्या धुंध रही है जो देखा न हो, पर मैंने कुछ न पूछने का निश्चय किया. अचानक उसने एक चैनल पर लगाया जिसमे शिखा थी. ये डॉक्टर का कमरा था और डॉक्टर की पत्नी कोमल, डॉक्टर, उनका बेटा रमन और डेविड थे. पर रूचि इस चैनल पर रुक गयी. और मेरे सीने में सिमटते हुए बोली कि आज मुझे यही देखना है. मैंने कोई टिप्पणी नहीं की.

“शिखा मेरे घर पर आने वाली हैं, अनुबंध के साथ, तो मैं जानना चाहती हूँ कि उनकी किस प्रकार से आवभगत करनी चाहिए. अगर शिखा हमसे प्रसन्न रहेगी तो नेताजी भी रहेंगे और कभी कभार अगर कोई उलझन आयी तो सरलता से संभाल ली जाएगी.”

रूचि की बात मुझे भी सही लगी और हम दोनों उस कमरे में चल रहे दृश्य को आगे के लिए देखने लगे. बस एक ही कमी थी इन वीडियो में, वो ये कि इनमें वीडियो मात्र था, कौन क्या कह रहा था ये नहीं पता चल रहा था. और हर कमरे में कवल दो ही कैमरे थे जिसके कारण दृष्टिकोण सीमित था. पर जानने समझने के लिए पर्याप्त था. शिखा और कोमल एक दूसरे के साथ 69 के आसन में थीं और चूत चाटने में व्यस्त थीं. तीनों पुरुष एक ओर थे और कुछ पी रहे थे. उन तीनों के लंड भी खड़े हुए थे और देखने से अच्छे नाप के प्रतीत हो रहे थे. शिखा ऊपर थी और उसने डॉक्टर को देखा और तीनों लौडों पर आँख दौड़ाई. फिर उसने अपना चेहरा कोमल की चूत में डाल दिया.

रूचि क्या देखना चाहती थीं ये मुझे समझ में नहीं आया. मैं उसके साथ देखता रहा. कुछ देर बाद शिखा ने अपना चेहरा उठाया तो वो पूरा गीला था. अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसने कुछ कहा. फिर उसने तीनों पुरुषों को पास बुलाया. कोई दो दो मिनट तक उसने तीनों के लंड चाटे और फिर उनसे कुछ कहा और वहाँ से हटकर एक सोफे पर बैठ गयी. उसके अपनी उँगलियों से अपनी चूत को छेड़ने में अधिक देर नहीं की. मेरे विचार से वो कोमल की चुदाई देखना चाहती थी.

कोमल के पति ने उससे कुछ पूछा और फिर डेविड और रमन से कुछ कहा. रमन से डेविड की ओर देखकर कुछ पूछा फिर अपने पिता को उत्तर दिया. रमन बिस्तर पर लेट गया और डॉक्टर ने अपनी पत्नी को सहारा देते हुए अपने बेटे के लंड पर बैठा दिया. कोमल अपने बेटे के लंड पर कुछ देर उछली और जब उसे लगा कि लंड अब सही प्रकार से जम गया है तो रुक गयी और डॉक्टर से कुछ कहा. डॉक्टर ने आगे जाकर अपने लंड को उसके मुंह में दे दिया. अचानक देखा तो शिखा खड़ी हुई और उसने एक टेबल के अंदर से कुछ निकाला। ये एक अच्छा लम्बा डिल्डो था. शिखा ने अब उसे डिल्डो से अपनी चूत को चोदना आरम्भ किया.

डेविड कोमल की पीछे गया और हमने उसके लंड को कोमल की गांड में गुम होते देखा. इसके बाद तीनों ने कोमल की लम्बे समय तक चुदाई की और फिर उसके तीनों छेदों में अपना रस भर दिया. शिखा ने उठकर कोमल की चूत से रस को चूसा और फिर कोमल के साथ उसे बाँटा, यही प्रक्रिया उसने कोमल की गांड से बहते हुए रस के साथ भी की. डॉक्टर का तो लंड साफ ही था, शिखा ने अन्य दोनों को साफ किया और फिर कोमल को उठाकर सोफे पर बैठा दिया. कोमल वहीं ढुलक गयी.

शिखा ने तीनों से कुछ पूछा और हमने यही समझा कि वो उनसे उसकी चुदाई के बारे में बात कर रही थी. पर रूचि ने टीवी को बंद कर दिया.

“जब शिखा मुझे अनुबंध देने आये तो तुम्हें क्लब से रोमियो भेजने होंगे. उसे अतृप्त तो नहीं भेज सकते.”

इसके बस मैंने रूचि की चुदाई की और हम सो गए क्योंकि अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था.

*******

अगले दिन जब हम उठे तो नहाने के बाद नाश्ते के लिए रेस्त्रां गए. रिसोर्ट में कोई भी नहीं दिखा. रेस्त्रां में हम दोनों ही थे और हमने शांति से खाया और अपने कमरे में लौट गए. दस बजे मैं और रूचि को लेने के लिए इवान आया और हमें उस स्थान पर ले गया जहाँ केके का शो था. अच्छा बड़ा सा हॉल था और एक स्टेज भी था. समस्या थी कि किस प्रकार से सारी सजावट और सेट को लगाया जाये. इसका उपाय इवान ने ही बताया. उसने बताया कि सभी लोगो को कमरे में ही रहने के लिए कहा गया है दो बजे तक. तब तक हमें अपना सारा कार्य समाप्त करना होगा. इस अवधि में सब सामान्य वस्त्रों में रहेंगे.

साढ़े दस बजे के आसपास सेर लगाने वाले आ गए और उन्हें अत्यंत गुप्त रूप से अंदर लाया गया और इस पर विशेष ध्यान दिया गया कि वे इधर उधर न जाएँ न देखें. इसमें CCTV का महत्वपूर्ण योगदान था. उन्होंने ढाई घंटे में ही अपना काम समाप्त किया और उन्हें अगले दिन शाम को आने के लिए कहा गया, जब रिसोर्ट खाली हो चुका होगा. इसके बाद इवान ने कण्ट्रोल रूम में बताया।

इवान: “अब सभी को अपने प्राकृतिक अवस्था में आने के लिए कह दिया है. हम सब भी अपने कमरों में जाकर कपड़े निकालकर रेस्त्रां में मिलते हैं. शाम पाँच बजे से अन्य कार्यक्रम आरम्भ होंगे. केके का शो आठ बजे के आसपास होगा. अन्य कार्यक्रम उसके बाद भी चलते रहेंगे. साढ़े ग्यारह बजे से इस वर्ष की विदाई और नए वर्ष की स्वागत का आयोजन है. तो हम कुछ ही देर में मिलते हैं.”

इसके बाद हम सब अपने कमरे में जाकर नंगे होकर रेस्त्रां में पहुंचे जो पूरा भरा हुआ था. कई लोग जो नाश्ता नहीं कर पाए थे भोजन पर जुटे हुए थे. एक अत्यंत उन्मुक्त वातावरण था. डेविड का परिवार भी अब अन्य लोगों से मिलकर बातों में व्यस्त था. डेविड ने मुझे बताया कि रिचर्ड की नेताजी से चर्चा बहुत लाभकारी रही और उसका पूरा परिवार बहुत प्रसन्न है. मैंने अधिक जानने का प्रयास नहीं किया.

मिशेल आंटी मेरे पास आयीं और कहने लगीं “कल तुम कहाँ थे?

पार्थ: “मैं और रूचि जल्दी सोने चले गए थे.”

मिशेल: “आज हमारे लिए कुछ समय निकाल पाओगे?”

मैंने उनके कान में कहा, “आज तो नहीं, पर बाद में अवश्य. आज दूसरे फल खाने का अवसर जो मिला है.”

मिशेल: “नॉटी बॉय. पर मैं समझ सकती हूँ. ठीक है. हम बाद में वहीं मिलते हैं.”

इसके बाद अन्य महिलाएं भी आकर मुझसे मिलती रहीं और कई पुरुष आकर रूचि पर डोरे डालते रहे. हमारे लिए आज रात साथियों की कोई कमी न थी.

खाने के बाद तीन बजे सभी अपने कमरों में चले गए. आज की रात लम्बी थी और सभी उसके लिए विश्राम करना चाहते थे. आज नेताजी नहीं ए थे. न ही शिखा और मनीषा। वे अपने कमरे में ही खाना खा रहे होंगे केके के परिवार के साथ. हमारे रोमियो भी नहीं आये थे. हम भी आकर सो गए और साढ़े चार बजे ही उठे.

पाँच बजे के पहले हम दोनों हॉल में पहुंच गए, जहाँ इवान ने हमर स्वागत किया और सामने की दो सीटों पर बैठने के लिए आमंत्रित किया. अन्य अथिति भी आने लगे थे. कुछ ही देर में हॉल में सभी लोग आ गए. रिसोर्ट के अन्य कर्मी भी आ गए. और हॉल को बंद कर दिया गया. नेताजी और उनका परिवार भी आगे की सीटों पर ही बैठा हुआ था. हॉल की बत्तियां धीमी कर दी गयीं और इवान और हेलेन स्टेज पर पहुंचे. मैं और रूचि विस्मयता से देख रहे थे कि आगे क्या होना है.

कार्यक्रम अब आरम्भ होने वाला था.
 
छठा घर: दिया और आकाश पटेल

अध्याय ६.३

भाग १

*********

तनाव

पटेल परिवार में कुछ दिनों से तनाव का वातावरण था. आकार को ये बात बिलकुल भी रास नहीं आयी थी कि नीलम ने उनका बंगला अफ्रीकी लोगों से चुदवाने के लिए प्रयोग में लाया था. और तो और उसने ये बात घर में सबसे छुपा कर भी रखी थी. उनका परिवार इस प्रकार के संबंधों पर कोई आपत्ति अधिकतर नहीं करता था, पर जो नीलम ने किया था वो किसी को भी ठीक नहीं लगा था. आकार मेधा पर भी कुपित था और उसने मेधा को दो सप्ताह के लिए छुट्टी दी थी. पीठ पीछे इस प्रकार का स्वांग उसे बिलकुल नहीं भाया था.

नीलम ने सबसे अपनी गलती का पछतावा किया था पर न जाने क्यों कोई उसे क्षमा करने के लिए उत्सुक नहीं था. और इसी कारण जहां घर के अन्य लोग अपना जीवन सामान्य रूप से व्यतीत कर रहे थे, नीलम अलग थलग पड़ी थी. हाँ, वो वहीँ रह रही थी पर मानो अकेले. हितेश और अलोक जो सदा ही उसे चोदने के लिए लालायित रहते थे, वो भी उससे कन्नी काट रहे थे. अंततः उसने हार मानकर बहरी सहायता लेने का निर्णय किया. उसने एक बार फिर आकार से क्षमा याचना की और उससे विनती की कि क्या वो दो तीन दिनों के लिए बाहर जा सकती है. उसे विश्वास था कि उसके न रहने से परिवार वालों के मन में कुछ दयाभाव जागृत हो जाये.

आकार ने उसे अनुमति दे दी और वो अगले दिन सुबह निकल गयी. इस बार भी उसने एक गलती की थी. उसने इस बार भी किसी को नहीं बताया कि वो कहाँ जा रही थी. पर इस समय वो निराश थी और उस व्यक्ति से मिलने जा रही थी जो घर के एक या दो सदस्यों को मना सकता था. अपनी गाड़ी स्वयं चलते हुए वो उस नगर में पहुंची जहाँ उसे एक आशा की किरण दिख रही थी. पर उसे ये भी दुविधा थी कि वो व्यक्ति मिलेगा भी या नहीं. सुबह छह बजे की निकली हुई वो एक बार रुकी जहाँ उसने कुछ जलपान किया। फिर साढ़े दस बजे वो एक घर के सामने अपनी कार खड़ी कर रही थी.

घंटी बजाने के बाद वो बहुत उत्तेजित हो गयी. उसे समझ नहीं पड़ रहा था कि उसका ये कदम उसकी कठिनाई दूर करेगा या और बढ़ा देगा. घर के दरवाजे के खुलते ही सामने वाले की आँखें उसे देखकर आश्चर्य से खुली रह गयीं.

“नीलम तुम! यहाँ कैसे?” उसने पूछा.

नीलम से अब रुका नहीं गया. वो उसके गले से लिप्त गयी और फूट फूट कर रोने लगी. उसे अपनी बाँहों में लेकर अंदर ले जाकर द्वार बंद कर दिया. नीलम को सोफे पर बैठाकर उसके लिए पानी लाया और उसे पिलाया. नीलम अब कुछ संयत हुई.

“नीलम, अब बताओ, ऐसा क्या हुआ कि तुम चार घंटे गाड़ी चलाकर मुझे मिलने आयी हो. और इतनी द्रवित हो.”

“दीदी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी.” ये कहते हुए नीलम ने बिना रुके पूरा वृत्तांत सुना दिया.

“गलती तो है पर आकार तुम्हे क्षमा नहीं कर रहा ये भी बड़ी बात है. दिया क्या कहती है?”

“मुझसे कोई भी बात नहीं कर रहा. हितेश भी नहीं. मैं कहाँ जाऊँ दीदी, मैं क्या करूं. बस मेरा अब एकमात्र आप ही सहारा हैं.”

“कब जाना है तुम्हें वापिस?”

“मैं दो तीन दिन का बोल कर आयी हूँ.”

“ठीक है, हम कुछ न कुछ सोच लेंगे. इनकी भी सलाह लेंगे कि क्या किया जा सकता है. तुम अपना सामान निकालो और अथिति कक्ष में रख लो. फिर नहा धोकर नाश्ता करो. फिर बात करेंगे. चिंता न करो, सब ठीक हो जायेगा.”

नीलम ने अपना सामान रखा और नहाकर बाहर आ गयी. सामने खड़ी स्त्री को देखकर उसे अचरज होता था कि उनके परिवार वाले उन्हें और उनकी बहन में अंतर कैसे कर लेते थे. क्योंकि जिसकी शरण में नीलम आयी थी वो और कोई नहीं दिया की बहन सिया थी.

*******

मंत्रणा:

जब नीलम गयी हुई थी तब नाश्ते के बाद घर के सभी सदस्य बैठे हुए पिछले दिनों की घटना पर मंत्रणा कर रहे थे. आकार इस पूरी चर्चा का मुख्य बिंदु था.

दिया: “भाई, हम सब आपके साथ हैं और समझते हैं कि नीलम ने जो किया वो अनुचित था. और वो भी इसके लिए कई बार क्षमा मांग चुकी है. एक बात और ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ हो. अपने पहले कभी भी कोई आपत्ति नहीं की, फिर इस बार क्यों?”

आकार: “बात सीधी सी है, भाभी. हम सब किसी से भी कोई बात नहीं छुपाते. अगर वो हमें बताकर जाती तो कोई आपत्ति नहीं थी. पर उसने ऐसा हमारे पीठ पीछे किया जो गलत है.”

कनिका: “पापा, मॉम इसके लिए बहुत ही शर्मसार हैं. और मुझे लगता है कि वे आगे ऐसा कुछ न करेंगी. इसीलिए, हम सब आपसे प्रार्थना कर रहे हैं, उन्हें इस बार क्षमा कर दीजिये.”

आकार: “अभी कहाँ गयी है, किसी को पता है?”

दिया: “नहीं, पर जिस मनस्थिति में वो गयी है, मैं अनुमान अवश्य ही लगा सकती हूँ.” उसने हितेश की ओर देखकर कहा.

आकार ने हितेश से पूछा, “तुम्हें पता है?”

हितेश हड़बड़ा गया. “नहीं, मुझे नहीं पता, मौसाजी.”

दिया: “सिया से मिलने गयी होगी. मेरे बाद वो उसके ही सबसे निकट है. उस बेचारी के परिवार में तो कोई है नहीं हमारे सिवाय. और कहाँ जाएगी.”

आकार का हृदय द्रवित हो गया. नीलम के परिवार में अब कोई नहीं था. उसके माता पिता को एक एक्सीडेंट में खोने के बाद अब नीलम का उन सबके सिवाय और कोई न था. उसे ग्लानि हुई कि उसने नीलम से इस प्रकार का व्यव्हार किया. उसने आकाश की ओर देखा तो आकाश ने सिर हिलाकर अपनी सहमति व्यक्त की. एक गहरी साँस लेते हुए आकार ने दिया को देखा.

“भाभी, ठीक है. आप सब से मैं अलग नहीं सोच सकता. मैं नीलम को क्षमा करता हूँ. और अगर सिया जी का फोन आये तो उन्हें भी बता देना. नीलम दो चार दिन वहाँ रह ले, उसका मन भी लग जायेगा और कुछ चिंतन भी कर लेगी.”

“और चुदाई भी. बेचारी इतने दिनों की प्यासी है. ये बात सुनकर मुझे नहीं लगता की जीजाजी और देवर जी को आज रात सोने को मिलने वाला है.”

सब हंसने लगे तो हितेश ने भी साथ दिया, “अगर मुझे पता होता तो मैं भी चला जाता.”

आकाश: “अब चला जा, उसे साथ लिवा लाना लौटने में. हाँ अपने आप जाना होगा, गाड़ी तो नीलम ले गयी है.”

हितेश: “सच! मैं अभी बस से निकल जाता हूँ.”

आकाश ने दिया को देखा, “तब तक तुम ये समाचार अपने तक ही रखो. जब हितेश पहुंचे तब ही सिया को बताना.”

दिया: “आप बहुत कुटिल हैं. पर इसीलिए मैं आपसे इतना प्यार करती हूँ. आलोक जाकर हितेश को बस अड्डे तक छोड़ आ. समय नहीं खोना चाहिए.”

कुछ ही देर में आलोक हितेश के साथ निकल गया. हितेश शाम तक ही पहुंच सकता था. आलोक लौटा तो खुश था.

“पापा, एक टैक्सी वाला जा रहा था, तो हितेश को उसने ले लिया. दोपहर के खाने तक पहुंच जायेगा.”

“जैसे खाना खाने वाला हो वो. चलो अब हम सब अपने काम पर लगें. दिया, बताना क्या हुआ.” ये कहते हुए आकाश ने मंत्रणा समाप्त कर दी.

*******

योजना:

नीलम बाहर निकली तो सिया किसी से बात कर रही थी. उसने नीलम को बैठने का संकेत किया और बात करती रही. उसकी बातों से ये पता चल ही गया कि वो अपने पति से बात कर रही थी और उसे सारी स्थिति से अवगत करा रही थी. नीलम के मन में हूक सी उठी. अगर उसने भी आकार से छुपाया न होता तो आज इस स्थिति ने न होती. पर अब केवल सिया ही उसकी सहायता कर सकती थी. पर क्या उतना पर्याप्त होगा? ये तो केवल समय ही बता सकता था. पर सिया के पास आने से उसे एक आशा अवश्य थी.

सिया ने फोन रखा और नीलम की ओर देखा. “इनका कहना है कि समस्या इतनी गंभीर नहीं है. और तुम्हारे यहाँ रहने से सम्भव है कि आकार का मन जल्दी बदले. तुमने जो तीन चार दिन के बारे में सोचा है वो सही है. अब अगर चाहो तो तुम कुछ समय के लिए सो जाओ. इन्होनें कहा है कि ये और मेरा देवर आज जल्दी आ जायेंगे.” फिर नटखट मुस्कान के साथ बोली, “कोई विशेष कारण ही होगा, मेरे लिए तो ये कभी जल्दी आने के लिए नहीं कहते।”

नीलम शर्मा गयी. “दीदी, मैं उन सब विषयों के बारे में जब से ये हुआ है सोच भी नहीं पा रही हूँ. और कोई समय होता तो मुझे बहुत ख़ुशी होती.”

सिया: “मैं समझती हूँ, पर इस प्रकार से तुम्हारा मन कभी शांत नहीं होगा और तुम्हें कोई रास्ता भी नहीं मिलेगा.”

नीलम ने कहा कि वो कुछ देर सो लेती है, उसे कुछ थकान तो थी ही, शारीरिक और मानसिक दोनों. सिया ने उसे आश्वासन दिया कि अब वो दिया से बात करने वाली है, परन्तु उसका न रहना ही अच्छा होगा. नीलम अपने दिए हुए कमरे में गयी और छत की ओर देखते हुए न जाने कब नींद में चली गयी.

सिया ने दिया को फोन लगाकर बताया कि नीलम आयी है तो दिया ने कहा कि उसे यही अनुमान था. उसके बाद दोनों बहनें दो घंटे तक बात करती रहीं. बातों में हर विषय था, सखी सहेलियों से लेकर चुदाई तक. जब फोन काटा तो सिया को आश्चर्य हुआ कि इतना समय निकल गया. उसने तुरंत ही खाने का प्रबंध करने के लिए किचन में कदम रखा.

दिया ने सिया से बात करके फोन रखा तो कनिका ने पूछा क्या हुआ. दिया ने संक्षेप में पूरी बात सुनाई और फिर खाने की तैयारी में जुट गयी. खाना बनाकर जैसे ही दिया बैठक में आयी हितेश का फोन आया और उसने बताया कि वो अपने शहर पहुंच गया है और बीस मिनट में घर भी पहुंच जायेगा. दिया ने आकार को बताया और फिर अगले फोन की प्रतीक्षा में टीवी लगाकर बैठक में बैठ गयी.

*******

सिया को भी जब समय का पता लगा तो उसे भी आश्चर्य ही हुआ. उसने सोचा कि अब नीलम को जगा देना ही अच्छा होगा क्योंकि अधिक सोने से सुस्ती चढ़ेगी. वो उठे इसके पहले ही घर की घंटी बज उठी. अब इस समय कौन आ गया? ये सोचते हुए उसने द्वार खोला तो आश्चर्य से जैसे चीख ही पड़ी.

“हितेश, बेटा तू? हाय मेरा बच्चा. कैसे आया? अंदर आ. खाना खाया?” सिया के प्रश्न जैसे अंत ही नहीं हो रहे थे.

“अरे रे रे मॉम, थोड़ी साँस तो ले लो. सब बताता हूँ. पहले ये बताओ मेरी मिठाई कहाँ है?” हितेश ने अंदर आकर घर लॉक करके पूछा.

“जहाँ हमेशा रही है.” सिया ने उसे जकड़ लिया.

हितेश ने उसके होंठों पर होंठ रखे और गहरा चुंबन लिया।

“इस मिठाई का स्वाद हर मिठाई से अधिक मीठा है. पर ये बताओ मौसी कहाँ हैं?”

“अंदर सो रही है.”

“ठीक है, आपके कमरे में चलो, मैं बताता हूँ मैं क्यों आया.”

सिया के कमरे में जाकर हितेश ने उसे अपने आने का कारण बताया. सिया को ख़ुशी हुई कि नीलम की समस्या सुलझ गयी.

“और मॉम, आपका कैसा चल रहा है. पापा और चाचा आपका ध्यान रखते तो हैं न?”

“हाँ, पर तेरी कमी हमेशा खलती है.”

“चाचा को कोई चाची मिली?”

“उन्हें न मिलने की. वो सबमे मुझे और दिया को ढूंढते हैं, और वैसी मिलने वाली नहीं.”

हितेश कुछ सोचने लगा. “मॉम, मुझे कुछ अधिक तो नहीं पता पर मौसा के मोहल्ले में एक विधवा स्त्री है, बंगाली है और उनका मेरी आयु का एक लड़का भी है. बहुत सुंदर भी है. और न जाने जब जब मैं उन्हें देखता हूँ, मुझे लगता है कि वो बहुत चुदक्क्ड़ भी है. चाचा के लिए मुझे सही लगती हैं, पर आगे आप लोगों को देखना पड़ेगा.”

“फोटो या कुछ है?”

“नहीं, पर आप मौसी से कहोगी तो वो भेज सकती हैं. उनके व्हाट्सएप्प ग्रुप में हैं.”

“पर हमारे परिवार के जिस प्रकार के सम्बन्ध हैं वो समस्या बन सकते हैं.”

“हाँ, पर आगे की जानकारी के बिना इसपर आगे बढ़ना ठीक नहीं है.”

“जब तू आया तो मैं नीलम को जगाने जा रही थी. पर अब मुझे लगता है कि ये काम तू अच्छे से कर सकता है.” इस बार सिया के चेहरे पर मुस्कान थी.

“मैंने उन्हें पहले भी कई बार जगाया है, मुझे पता है उन्हें कैसे जगाते हैं. वैसे आपको भी वैसी ही जागना पसंद है.”

“फिर जल्दी कर, अगर स्वयं जाग गयी तो हमारा सरप्राइज़ व्यर्थ हो जायेगा.”

हितेश उठकर जाने लगा तो सिया ने उसे रोका. “कपड़े यहीं छोड़ जा.”

हितेश ने आनन फानन कपड़े उतारे तो सिया ने उसे पास बुलाया और उसके लंड को चूमकर थोड़ा चाटा और चूसने के बाद उसे जाने के लिए कहा.

“बड़े दिन बाद तेरे लंड का स्वाद लिया है. बिना नीलम की चूत के रस के बिना एक बार चाटना चाहती थी. अब जा और बजा दे अपना डंका।”

हितेश उस कमरे में चला गया जहाँ नीलम अभी तक सोई पड़ी थी.

*******

घर की बात:

सिया के फोन का उत्तर देने में दिया ने देर नहीं की. कुछ देर की हल्की फुलकी बातों के बाद सिया ने धमाका किया. उसने हितेश के द्वारा अपने देवर के लिए किसी सुमति नाम की महिला के बारे में पूछा. दिया सोच में पड़ गयी. सुमति से वो कई बार मिली थी परन्तु इतनी घनिष्टता भी नहीं थी कि आगे बात की जा सके. फिर उनके परिवार की जीवन शैली का भी अंतर था. अगर सुमति को ये सब रास न आया तो क्या होगा? फिर ये बात भी थी कि क्या वो अपने भाई जॉय से दूर जाना चाहेगी? जहाँ तक उसे पता था उसका बेटा पार्थ का भी अपना काम था. उसने अपनी राय सिया को दी.

सिया ने कहा कि इसका एक ही उपाय है, कि किसी प्रकार से उसके देवर प्रकाश से सुमति को मिलाया जाये और फिर देखा जाये कि आगे क्या होता है. अचानक ही दिया को एक कड़ी का ध्यान आया जो उन्हें जोड़ती थी. उसका नाम था रमोना. रमोना पार्थ को जानती थी पर कैसे ये उसे पता नहीं था. पर रमोना उससे चुदी न हो इसकी संभावना कम ही थी. सिया के कहने पर उसने सुमति का एक फोटो अपने व्हाट्सएप्प ग्रुप से उसे भेज दिया. जब बात समाप्त हुई तो उसने रमोना को फोन लगाया और मिलने की इच्छा की.

रमोना ने उसे कल आने के लिए कहा और इसी के साथ इस नए समीकरण की नींव पड़ गयी. अब आगे क्या होना है ये तो किसी को पता न था. दिया ने सिया को फोन पर कहा कि वो प्रकाश को नीलम और हितेश के साथ यहाँ आने के लिए कहे, पर उसका अभिप्राय न बताये। अब चूँकि दिया के पास तीन दिन का समय था तो वो अपनी योजना को सफल बनाने के लिए जुट गयी. शाम को उसे ये बात परिवार के अन्य सदस्यों से साझा करनी होंगी. इसके बाद दिया ने खाना खाया और कुछ देर टीवी देखकर सोने के लिए चली गयी.

********

भारमुक्ति:

हितेश कमरे में गया तो नीलम अभी भी बेसुध सोई पड़ी थी. उसके चेहरे पर एक चिंता का भाव था जिसे हितेश ने भलीभांति पढ़ लिया था. एक हल्की नाइटी में नीलम सीधी ही लेटी हुई थी पर उसकी गर्दन एक ओर ढुलकी हुई थी. नाइटी उसके घंटों तक मुड़ी हुई थी और अगर हितेश का अनुमान सही था तो अंदर पैंटी नहीं थी. उसने परिवार की किसी स्त्री को अब तक पैंटी पहने नहीं देखा था. अगर वो बाहर जाते समय पहनती थीं तो इसका उसे पता नहीं था. हितेश ने आगे बढ़ते हुए नीलम की नाइटी को ऊपर उठाया और उसे अपने अनुमान पर गर्व हुआ. नीलम की चूत उसके सामने खुली पड़ी थी.

हल्के से उसने बिस्तर पर कोहनी रखी और नीलम की टाँगो को फैलाया और उसकी चूत को देखा. कई दिन की बिना चुदी चूत को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया. अपनी जीभ से उसने नीलम की चूत की फांकों को चाटा। नीलम सिहर उठी, पर वो जागी नहीं. हितेश अपने गंतव्य पर आगे बढ़ता रहा और कुछ ही देर में उसकी लपलपाती जीभ नीलम की चूत के आसपास के हिस्से पर लहराने लगी. नीलम स्वप्न समझकर इस आनंद में डूबी रही. हालाँकि वो अब नींद से बाहर आ रही थी, परन्तु उसकी आँखें अभी भी बंद ही थीं. जब वो जाग भी गयी तो इस डर से आँखें नहीं खोलीं कि खिन सपना टूट न जाये.

पर उसे तब आश्चर्य हुआ जब उसके भग्नाशे को उसके स्वप्न के पुरुष ने मसला और काटा। उसकी आँखें खुल गयीं. ये स्वप्न नहीं हो सकता. उसने अपनी टांगों के बीच में एक सिर को घुसा पाया, पर वो पहचान न पायी. उसे लगा कि सिया के पति चंद्रेश जिन्हें सब चंदू पुकारते थे, वो उसकी चूत चाट रहे थे. उसने आँखें बंद कर लीं. पर उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा था. चंदू के सिर पर तो इतने बाल नहीं थे, और वो भी कुछ कुछ सफेदी ले चुके थे. पर उसकी चूत चाटते हुए पुरुष के बाल घने और काले थे. तो क्या सिया ने भी कोई और चोदू पाला हुआ है?

उसने अपनी चूत में घुसे सिर पर एक थपकी दी तो वो रुक गया. पल भर में ही उसका सर उठा और उसकी ऑंखों से आँख मिला बैठा.

“हितेश, तू? यहाँ क्या कर रहा है. अब तो मेरी समस्या और बढ़ गयी. किसी को न कहना बेटा कि मैं यहाँ हूँ.” नीलम ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

हितेश: “अरे मौसी, सबको पता है कि आप यहाँ हो. और मौसा ने ही मुझे यहाँ भेजा है. ये कहकर कि आपको लौटने में अकेले गाड़ी न चलने दूँ और साथ लेकर आऊँ.”

नीलम के मन से एक बड़ा बोझ जैसे हट गया. “और क्या कहा तेरे मौसा ने?”

“यही कि आप आराम से अपने मन के अनुसार यहाँ रहो और मजे करो. जब लौटने का मन करे तब लौटना.”

“तो तू मुझे मजे कराने वाला है.”

“बिलकुल” ये कहते हुए हितेश ने अपना मुंह नीलम की चूत पर वापिस लगा दिया.

क्रमशः
 
छठा घर: दिया और आकाश पटेल

अध्याय ६.३

भाग २

*********

अब तक:

पटेल परिवार में तनाव का वातावरण था. नीलम के बिना बताये अफ्रीकी साथियों के साथ चुदाई के कारण उसका पति आकार उससे खिन्न था. परिवार के अन्य सदस्य भी उससे दूरी रखे थे. कोई और रास्ता न देख वो दिया की बहन सिया से सहायता मांगने गयी. वहाँ सिया ने अपने देवर के अकेलेपन का उल्लेख किया. उधर सबके कहने पर आकार ने भी नीलम को क्षमा करने का निर्णय लिया और हितेश को उसे वापिस लाने के लिए भेजा. हितेश की माँ सिया अपने बेटे को देखकर बहुत प्रसन्न हुई. बातों बातों में सुमति का भी नाम आया और इस मिशन पर काम आरम्भ हुआ. एक ही अड़चन थी: क्या सुमति उनकी जीवन शैली को अपना पायेगी?

सिया ने नीलम को जगाने और घटनाक्रम से अवगत कराने के लिए हितेश को उसके पास भेजा. और स्वयं दिया से सुमति के बारे में जानकारी एकत्रित करने लगी. हितेश नीलम को उसकी चूत के माध्यम से जगाता है और उसे बताता है कि उसके पति अब रुष्ट नहीं हैं.

*******

अब आगे:

दिया के घर अब वातावरण सामान्य हो चला था. वैसे तो सभी नीलम और हितेश की कमी अनुभव कर रहे थे, पर ये जानकर संतुष्ट थे कि सब कुछ ठीक ही है और रहेगा. दिया ने सुमति के बारे में बात चलाई तो सब एक दूसरे की ओर देखने लगे. फिर दिया ने बताया कि वो कल रमोना से मिलने जा रही है क्योंकि रमोना उनके परिवार से परिचित है. वो जानने का प्रयास करेगी कि क्या ये संबंध सम्भव है? आकाश ने उसे सतर्क रहने का सुझाव दिया. इसके बाद सभी अपने अपने कमरों में चले गए. चुदाई का ऐसा किसी का कोई विशेष मूड नहीं था और जल्दी ही सब नींद में खो गए.

अगले दिन दिया घर से दस बजे निकली और रमोना के घर पहुंची. रमोना ने उसे बताया था कि उसके पति पाँच छह दिनों के लिए बाहर गए हैं और वो आराम से बातें कर सकती हैं. रमोना ने जब द्वार खोला तो ये विदित हो गया कि उसकी अभी अभी चुदाई हुई है. यही नहीं उसके होंठों के एक कोने में एक सफेद द्रव्य का थक्का था जो निश्चित रूप से वीर्य ही था. दिया रमोना की चुदाई की भूख को जानती थी, पर उसे भी इतनी सुबह चुदने में आश्चर्य हुआ.

“अरे, मैंने तुम्हारे कार्यक्रम में व्यवधान तो नहीं डाला?” दिया ने औपचारिक रूप से पूछा.

“नहीं नहीं. अभी एक ही राउंड हुआ है. बाकि तुम्हारे जाने के बाद खेलेंगे.” रमोना ने बेझिझक और बेशर्मी से कंधे उचकाते हुए कहा.

“कौन है?” दिया की जिज्ञासा ने उसे पूछने पर विवश कर दिया.

“सचिन ही है, और कौन आएगा इतनी सुबह मुझे चोदने?” रमोना ने अपने बेटे सचिन के बारे में कहा और दिया का हाथ पकड़कर उसे बैठक में ले गयी और सोफे पर बैठाया.

फिर वो किचन से पानी और कुछ अल्पाहार लायी और बीच टेबल पर रखा और दिया के सामने के सोफे पर बैठ गयी. उसका गाउन ढलक गया और उसके स्तन बाहर झलक पड़े. रमोना ने उन्हें छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया. ये साफ था कि वो गाउन के नीचे नंगी ही थी.

“क्या बात है, कुछ विशेष बात करनी थी क्या?” रमोना ने समय व्यर्थ न करना ही उचित समझा.

दिया ने एक गहरी साँस ली और फिर अपनी बहन के देवर और सुमति के बारे में बात की. उसने बताया कि उसका देवर विवाह तो करना चाहता है, परन्तु वो अपनी भाभी सिया को भी नहीं छोड़ना चाहता. बात जब समाप्त हुई तो रमोना के चेहरे पर मुस्कान थी.

“तो मुझसे क्या चाहती हो?” रमोना ने पूछा.

“मुझे पता है कि तुम भी उस परिवार को जनता हो, विशेषकर शोनाली को. मैं ये जानना चाहती हूँ कि क्या सुमति हमारी जीवनशैली में अपने आपको स्थापित कर पायेगी?” दिया ने अपना प्रयोजन बताया.

रमोना का अट्टहास ने उसे डरा ही दिया. जब रमोना की हंसी रुकी तो उसकी आँखों में आँसू थे.

उसने कहा, “वैसे इसका उत्तर मैं दे सकती हूँ, पर मैं चाहूँगी कि सचिन तुम्हारी ये दुविधा दूर करे.” रमोना ने सचिन को पुकारा और कहा कि दिया आंटी आयी हैं.

दिया अपनी आपत्ति भी न जता पायी कि इस संदर्भ में सचिन को न बुलाया जाये. पर अब देर हो चुकी थी. सचिन कमरे में आया तो उसने भी एक गाउन ही पहना हुआ था और उसके लंड का उभर साफ दिख रहा था.

वो दिया के पास गया और उसके गाल चूमे, “हैलो आंटी।”

“हैलो सचिन. मम्मी ने तुम्हे बेकार ही बुला भेजा.” दिया ने बोला।

पर रमोना ने बात को आगे चलाया. आंटी जानना चाहती हैं कि सुमति के लिए अगर कोई विवाह का संबंध आये वो भी ऐसे घर से जहाँ पारिवारिक चुदाई चलती हो तो क्या ये ठीक होगा?”

सचिन अचम्भे से कभी दिया और कभी अपनी माँ को देखने लगा.

“इसका उत्तर तो आप भी दे सकती थीं, मुझे क्यों बुलाया?” सचिन थोड़ी खीझ के साथ बोला।

“क्योंकि तुम सागरिका और निखिल के विवाह के तय करने वाली पार्टी में सम्मिलित थे, मैं नहीं.”

दिया का सिर घूम रहा था. अब ये नया मोड़ कहाँ से आ गया.

सचिन: “ओके मॉम. अब अपने मुझे बुलाया ही है तो ठीक है, पर इसके लिए आपको मुझे विशेष पुरुस्कार देना होगा.”

रमोना की आँखों की चमक बढ़ गयी, “जो मेरा बेटा चाहे.”

सचिन: “आंटी, आपको बता दूँ की पार्थ के घर में भी इसी प्रकार की जीवन शैली है. पार्थ अपनी माँ, बुआ और अपनी दोनों बहनों को चोदता है. इसीलिए, इस मापदंड पर कोई भी समस्या नहीं है. और तो और पार्थ की बहन सागरिका का विवाह जो निखिल के साथ तय हुआ है, उसके पहले उन्होंने दोनों परिवारों के मिलन की एक पार्टी रखी थी, जिसमे मैं और कुछ अन्य मित्र भी बुलाये गए थे पार्थ के द्वारा. सौ बात की एक बात निखिल के परिवार में भी यही प्रचलन है. तो आप बिना चिंता के इस संबंध के बारे में आगे बढ़ सकती है. आपको मेरी शुभकामनायें हैं.”

दिया को अभी तक विश्वास ही नहीं हुआ था.

“मतलब, शोनाली और शीला के परिवार भी…”

“आपका मोहल्ला आठ बंगलों का ही है, पर वहाँ क्या क्या होता है, ये अभी भी आपको नहीं पता. बस ये जानिए की स्मिता (शेट्टी) का परिवार भी ऐसी ही जीवन शैली में लिप्त है.”

“और कोई?”

“समय के साथ सब जान जाइएगा. ओके मॉम मैंने अपना वादा पूरा किया अब मेरा पुरुस्कार दो.”

“हट बदमाश, घर पर अथिति है और मुझसे मांग रहा है. दिया, क्या तुम सचिन से चुदवाने की इच्छुक हो?”

तभी सचिन बोल पड़ा, “आंटी आप चाहो तो मैं पार्थ से चार बजे आने का अनुरोध कर सकता हूँ. आप उससे अन्य प्रश्न भी पूछ सकती हैं. और चाहे तो हम दोनों को भी ट्राई कर सकती हैं.”

दिया ने बिना सोचे ही उत्तर दे दिया, “ठीक है, बुला लो.”

सचिन ने पार्थ को फोन किया तो पार्थ ने चार बजे आने में असमर्थता जताई पर पाँच बजे के लिए मान गया. फोन रखकर सचिन ने दिया को देखा, “पाँच बजे.”

“ठीक है.” ये कहते हुए दिया उठने लगी तो रमोना ने टोका, “पक्का तुम्हें सचिन से नहीं चुदना है अभी?”

“हाँ. मुझे कुछ सोचना है और सिया से भी बात करनी है.”

“ये अच्छा ही. क्योंकि अब मैं सचिन से गांड मरवाकर उसे उसका पुरुस्कार दूँगी।” ये कहते हुए रमोना उठी और अपना गाउन हटाकर सचिन के गाउन को एक ओर किया और सचिन के पहले से तने लंड को अपनी गांड के छेद पर रखा और उसपर बैठती चली गयी.

दिया ने रमोना को देखा और फिर घर से बाहर निकल गयी. द्वार स्वतः उसके पीछे बंद हुआ और लॉक भी हो गया.

********

दिया अपने घर जाते हुए दुविधा में थी. किसे पहले बताये? आकाश को? या सिया को? उसने जो आज जाना था वो बहुत विस्फोटक था. उसने कभी ये सोचा भी न था कि शोनाली और शीला के परिवार इस प्रकार से लिप्त होंगे. फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी. यही बात अगर लोगों को उनके बारे में पता चली तो वो भी यही सोचेंगे. ऐसा नहीं था कि संबंध तय होना ही था. कई अड़चनें थीं. क्या सुमति अपने परिवार को इस आयु में छोड़कर जाना चाहेगी? फिर पार्थ का या उसके व्यवसाय का क्या होगा? अगर ये न हुआ तो क्या प्रकाश यहाँ आना चाहेगा? कुछ चिंतन के बाद उसे लगा कि प्रकाश को यहाँ आने में कोई अधिक आपत्ति न होगी.

घर पहुंचने पर उसने देखा कि सब जा चुके थे. उसने अपने लिए कॉफी बनाई और सोफे पर बैठ गयी. पहले उसने आकाश को फोन किया.

“हैलो, हाँ मैं रमोना से मिलने गयी थी. समाचार अच्छा ही है. शाम आप जब आओगे तब बताती हूँ. और हाँ मैं रमोना के पास शाम पाँच बजे फिर जाऊँगी, कुछ और जानकारी लेने और किसी से मिलने.”

“,”

“ शाम सब बता ही दूंगी, अधिक उत्सुक मत हो जाइये अभी से. हो सकता है कि बात उलटी ही निकले.”

“बाय, लव यू।”

कॉफी पीते हुए उसने इस बार सिया को फोन किया. फिर काट दिया. “खाने के बाद करूंगी नहीं तो लम्बा समय निकल जायेगा।” ये सोचकर कॉफी समाप्त करने के बाद उसने खाना बनाने का काम आरम्भ किया.

जब तक खाना बना तो एक बजे से ऊपर हो चुका था और कनिका भी आ गयी.

“हैलो मॉम, क्या बनाया है? अपने खाया?’

दिया ने उसे बताया और कहा कि वो भी अब खाने ही जा रही है.

“फिर आप बस दस मिनट रुको, मैं भी साथ में खा लेती हूँ. ओके?”

दिया ने खाना टेबल पर लगाया और कनिका की राह देखने लगी. कनिका कहे अनुसार दस मिनट में ही आ गयी. और माँ बेटी गपशप करते हुए खाना खाती रहीं. इसके बाद कनिका अपने कमरे में चली गयी और दिया ने भी सोचा आधे घंटे सोने के बाद सिया से बात करुँगी. आधे घंटे की नींद के बाद उसने अपने कमरे में से ही लेटे हुए सिया को फोन लगाया.

*******

जब सिया का फोन बजा तो वो फोन उठाने की स्थिति में ही नहीं थी. उसने अपने फोन को टेबल पर बजते हुए देखा और कुछ न कर पायी. करती भी कैसे. उसका पति चंद्रेश और देवर प्रकाश अपने कहे अनुसार जल्दी आ गए थे. ये जानकर भी कि नीलम घर में है, प्रकाश ने सिया को अपनी गोद में उठाया और उसके कमरे में ले गया. उसका पति चंद्रू भी हँसता हुआ उनके पीछे हो लिया. सीए उन्हें ये तक न बता पायी कि हितेश भी आया है. आननफानन में उसके कपड़े उतारकर उन्होंने सिया को नंगा किया और चंद्रेश नीचे लेते और सिया को अपने लंड पर चढ़ा लिया. पीछे से प्रकाश ने भी आव देखा न ताव और अपना लंड उसकी गांड में ठूंस दिया. दोनों भाई सिया की ताबड़तोड़ चुदाई में व्यस्त हो गए.

सिया भी अब सब कुछ भूलकर अपनी इस अकस्मात चुदाई का आनंद लेने लगी. हालाँकि ये इन दोनों का लगभग प्रतिदिन की दिनचर्या समान ही थी. दोनों जब भी लौटते थे तो पहले सिया को चोदते फिर कुछ और बात करते. बस कौन किस छेद को पेलता था यही बदलता था. जैसे आज प्रकाश को उसकी गांड मारने का अवसर मिला था. इस घनघोर चुदाई के बीच में ही सिया का फोन बजा था और फिर शांत हो गया था. दोनों भाई पूरी शक्ति के साथ सिया को चोदने के बाद जब झड़े तब उन्होंने ने चैन की साँस ली. तीनों हाँफते हुए बिस्तर पर लुढ़क गए.

“हितेश भी आया है.” सिया ने साँसे समान्य होने पर कहा.

“अरे! तो बताया क्यों नहीं. तुम्हारा मुंह व्यर्थ ही में खाली छूट गया.” चंद्रेश ने हंस कर कहा.

“आपको इसके सिवाय कुछ सूझता भी है. मुझे अपने एक पल का भी समय नहीं दिया और पेल दिया.”

“क्या करें भाभी, आपको देखने की चाह में ही लंड खड़ा हो जाता है और चोदे बिना नहीं बैठता.”

“अब नीलम भी आ गयी है, तो मुझे कुछ विश्राम मिलेगा.”

“हितेश कहाँ गया?” इस बार चंद्रेश ने पूछा.

“नीलम को जगाने गया था जब आप लोग आये थे, अब तक तो चोद रहा होगा.” सिया ने कहा.

“चलो अच्छा है, आज रात मजे आएंगे.” चंद्रेश ने कहा और बाथरूम में घुस गया.

बाहर आया तो कपड़े पहने फिर सिया से पूछा कि नीलम किस कमरे में ठहरी है. सिया ने बताया कि हितेश के कमरे में ही है, और वो भी बाथरूम में घुस गयी. प्रकाश कपड़े हाथ में लिए अपने कमरे में चला गया. चंद्रेश हितेश के कमरे की ओर चल दिया.

*******

सिया ने भी बाथरूम जाने के बाद कपड़े बदले और फिर अपना फोन देखा तो दिया का फोन आया था. उसने दिया को फोन लगाया.

सिया: “हाँ, फोन किया था?”

दिया: “कहाँ थी”

सिया: “ये दोनों जल्दी आने को कहे थे न, तो इतनी जल्दी आ टपके. और चढ़ गए मेरे ऊपर. तुम्हारा फोन आया तो दोनों चोद रहे थे. ये चूत में थे तो प्रकाश गांड मार रहा था. कैसे उठाती फोन?”

दिया: “वैसे तुम्हारी चाँदी है. तीन तीन के बीच में अकेली हो, खूब चुदती हो.”

सिया: “जिसकी फटती है उसे ही पता रहता है. ये तो अच्छा है हितेश तुम्हारे घर पर है नहीं तो तीनों मेरी गांड फाड़ देते थे. कहाँ से इनमे इतना दम है?”

दिया: “तुम्हें देखते ही दम आ जाता है. पर क्या तुम शिकायत कर रही हो?”

सिया: “अरे बिलकुल नहीं. पर कभी थोड़ा आराम भी तो चाहिए होता है. वैसे आज मुझे नीलम की चिंता हो रही है. ये तीनों आज उसका माँ चोद देंगे. मुझे दो तीन दिन का विश्राम मिल जायेगा. और बताओ फोन क्यों किया था?”

दिया ने रमोना से मिली हुई जानकारी सिया को दी. सिया ने उसकी पूरी बात सुनी.

सिया: “वैसे ये प्रकाश से सांकेतिक भाषा में कह चुके हैं कि वो इनका काम किसी और शहर में भी फैलाये. इनका स्वयं जाना सम्भव नहीं है, पर प्रकाश अभी अकेला है तो जा सकता है. तो एक समस्या का तो हल है. अब रही बात कि ये दोनों एक दूसरे को पसंद करेंगे या नहीं, इसका केवल यही उपाय है कि उन्हें साथ लाया जाये. अगर बात बनी तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं.”

दिया: “वैसे मैं सुमति के बेटे से मिलने वाली हूँ शाम पाँच बजे. टटोल कर देखती हूँ, कि वो क्या इसके पक्ष में है. अगर उसने सहमति दी तो संभावना बढ़ जाएँगी. पर बेचारा प्रकाश तुमसे दूर रह भी पायेगा?”

सिया: “अरे रह लेगा. सिया नहीं तो दिया सही. और उसे तो इतनी और स्त्रियां मिल जाएँगी. पागल ही होगा जो नहीं मानेगा.”

दिया और सिया ने कुछ देर और बातें के बाद फोन काट दिया. सिया बाहर गयी तो घर शांत था. प्रकाश का तो समझा जा सकता था कि वो अपने कमरे में होगा, पर चंद्रेश को देखने के लिए वो हितेश के कमरे में गयी. देखा तो चंद्रेश नीलम से बात कर रहा था और हितेश नीलम के पास बैठा था. नीलम की चूत से पानी बह रहा था जो हितेश का ही था. तीनों बड़े सामान्य रूप से बातें कर रहे थे. जब सिया अंदर गयी तो नीलम की आँखें भीग गयीं.

“दीदी, अपने मुझे बचा लिया.”

सिया: “ऐसा कुछ नहीं है, अब आराम से तीन चार दिन रहो फिर जाना.” फिर चंद्रेश को देखते हुए बोली, “तुम रहोगी तो ये दोनों भाई मुझे थोड़ा छोड़ देंगे. और मैं भी अपने बच्चे के साथ कुछ रातें बिता पाऊँगी.”

चंद्रेश को ख़ुशी हुई कि अब तीन चार दिन के लिए उसे नीलम की चुदाई का लाइसेंस मिल गया. प्रकाश भी खुश ही होगा. अब चूँकि प्रकाश नहीं था तो उसने दिया से की हुई बात को संक्षेप में बताया. नीलम को भी आश्चर्य हुआ पर उसने कहा कि उसे लगता है कि पार्थ सुमति को मना लेगा. कोई भी बेटा अपनी माँ को यूँ अकेला नहीं देखना चाहेगा. इस सकारात्मक सोच के साथ मंत्रणा हुई कि प्रकाश को कैसे मनाया जाये.

नीलम: “ऐसा करते हैं कि दीदी और हितेश को किसी बहाने से बाहर भेज देते हैं और जीजाजी प्रकाश को मुझे छोड़कर आने के लिए कहेंगे. आगे का पूरा कार्यक्रम मैं और दिया भाभी संभाल लेंगे. हमसे बच कर कहाँ भागेगा?”

सब इस षड्यंत्र पर हंस पड़े.

“पर मैं जाऊँगी कहाँ?”

‘अपनी बहन के घर, और कहाँ? जब मैं प्रकाश को लेकर पहुँचूँ बस उस समय आप दोनों वहाँ मत रहना.”

चंद्रेश ने दुखी चेहरा बनाकर कहा, “यानि मुझे अकेले छोड़ दोगे?”

नीलम, “जीजाजी, आप भी चलो न. बिलकुल आखिरी समय पर बोलना कि आप भी चलोगे. तब तक प्रकाश भी वचनबद्ध होगा.”

“हम्म्म, स्त्रियों के षड्यंत्रों के सामने हम भोले भले पुरुष कहाँ टिक सकते हैं. समझे हितेश?”

“बिलकुल पापा.”

सब हँसते हुए अपनी योजना पर खुश हो गए. नीलम और हितेश ने बाथरूम में जाने के बाद कपड़े पहने और फिर सबके साथ बैठक में चले गए.

*******

साढ़े चार बजने के पहले ही दिया अपने घर से निकल कर रमोना के घर की ओर चल दी. उसे इस पूरी योजना के सफल होने की भरपूर आशा थी. देखना ये था कि पार्थ क्या निर्णय करता है. अब जब ये भी तय हो गया था कि प्रकाश यहाँ कम्पनी का नया ऑफिस खोल सकता है, तो उसे अधिक कठिनाई नहीं दिख रही थी. परन्तु पहले पार्थ और फिर सुमति क्या निर्णय लेगी ये अभी तक पता नहीं था. और तो और प्रकाश को अभी भी उनकी इस योजना की भनक नहीं थी. पर सिया विश्वस्त थी कि उसकी ओर से कोई विशेष प्रतिरोध नहीं होगा.

पाँच बजने के कुछ पूर्व ही दिया ने रमोना के घर की घंटी बजे और सजी संवरी रमोना ने उसे घर में आने के लिए कहा. रमोना ने कोई इत्र लगाया था जो बहुत ही आकर्षक था. सचिन भी यथोचित वस्तओं में था. उन्हें देखकर सुबह के दृश्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. रमोना और दिया बातें करने के लिए अभी बैठे ही थे कि फिर से घंटी बजी और इस बार सचिन पार्थ को लेकर अंदर आया. पार्थ दिया को देखकर भौंचक्का सा रह गया, परन्तु उसने अपने आपको तुरंत संभाला.

“हैलो, दिया आंटी। आप रमोना जी को जानती हो?”

दिया को दोनों सम्बोधनों के अंतर का कारण समझ आ गया. उसने हामी भरी और फिर रमोना उठकर पार्थ के पास गयी.

“बहुत व्यस्त हो गए हो जो मुझे समय ही नहीं देते. कितने दिनों से तुम्हारी राह देख रही हूँ, पर…”

इससे पहले कि रमोना कुछ राज खोल पाती पार्थ ने उसे चुप करा दिया.

“ऐसा नहीं है, अपने भी तो याद नहीं किया. और देखो, सचिन ने मुझे बुलाया और मैं चला आया.”

रमोना भी समझ गयी कि क्लब की बात दिया के सामने बोलते बोलते उसे पार्थ ने रोका था. उसने पार्थ को बैठाया और फिर बात आरम्भ की.

“पार्थ, मैं दिया को बहुत समय से जानती हूँ. हम दोनों एक साथ खेलते भी हैं कभी कभी.” इस बात पर पार्थ ने दिया को देखा तो दिया ने उसे मुस्कुराकर देखा.

“बात ये है, और मैं सीधे असली बात पर आ रही हूँ, कि दिया की बहन सिया जो दूसरे शहर में रहती हैं, उनका एक देवर है. आयु कोई चालीस के लगभग होगी. परन्तु उन्होंने आज तक विवाह नहीं किया. मुख्यतः क्योंकि वो सदा से सिया जैसी लड़की ढूंढते रहे और दूसरे उन्हें सिया का साथ भी मिला हुआ था. तीसरी बात ये थी कि उन्हें भी ऐसा परिवार चाहिए था जो परिवारिक सम्भोग को बुरा न मानता हो, या उसमे लीन हो. पर कल ही हितेश ने बिना ये जाने कि तुम्हारा परिवार भी इस प्रकार के संबंधों का अनुगमन करता है, सिया से सुमति के बारे में कहा.”

पार्थ के चेहरे के भाव पढ़ने की चेष्टा करते हुए रमोना आगे बोली, “दिया सुबह मेरे पास आयी थी और मैंने उसे विश्वास दिलाया कि ये जीवन शैली रुकावट नहीं है. अब हम ये जानना चाहते हैं कि क्या तुम अपनी माँ के लिए प्रकाश को पति के रूप में और अपने पिता के रूप में स्वीकार करोगे.”

पार्थ सोच रहा था. उसने दिया को देखा जो आशापूर्ण आँखों से उसे देख रही थी. वो खड़ा हुआ और कुछ देर यूँ ही कमरे में घूमता रहा. कमरे का वातावरण तनावपूर्ण हो चला.

फिर वो बैठा और पहले रमोना को देखा और फिर दिया से बोला, “वैसे मुझे पिता की आवश्यकता तो नहीं है, परन्तु माँ को एक पति की कमी कई बार खलती है. वो हम सबसे अपना प्यार बाँट तो लेती हैं, पर पापा के गुजरने के बाद उनके मन में एक विषाद अवश्य है. तो मुझे इस प्रस्ताव में कोई बुराई नहीं लगती. और आवश्यकता हो न हो, अगर मुझे एक पिता भी इसमें मिल जाएँ तो सोने पर सुहागा.”

दिया से अब रुका नहीं गया वो उठी और पार्थ से चिपक गयी.

“मुझे तुम्हारी यही बात सुननी थी, पार्थ. अब हमें आगे क्या करना है ये भी बताओ. वैसे नीलम तीन चार दिनों में प्रकाश के साथ आ रही है. उन दोनों को मिलाना और फिर आगे ले जाना, ये कैसे हो पायेगा?”

पार्थ: “इस सारे का उत्तरायित्व अच्छा हो अगर हम शोनाली बुआ, और परिवार की स्त्रियों पर छोड़ दें. ये मेरे अकेले के बस की बात नहीं है. मैं अपनी स्वीकृति देकर उन्हें ये काम सौंपना ही ठीक समझता हूँ.”

रमोना: “देखा दिया, मैंने कहा था न, लड़का बहुत समझदार है.”

पार्थ: “तो सचिन अगर और कुछ न हो तो मैं चलूँ. मैं बुआ से बात करके उन्हें इस कार्य पर लगा देता हूँ. वैसे शीला नानी भी सहायता कर सकती हैं.”

रमोना के स्वर में वासना भर गयी, “पार्थ, इतने दिनों में मिले हो और बिना कुछ किये चले जाओगे क्या?”

पार्थ हंस पड़ा, “आप बताओ, क्या करना है.”

“तुमसे गांड मरवाये हुए बहुत दिन हो गए. तो क्यों नहीं तुम और सचिन पहले जैसे मेरी डबल चुदाई करते?”

“और दिया आंटी क्या करेंगी?”

“अरे उसे भी आज अपने लंड का स्वाद दो, तभी तो वो तुम्हारी माँ की सहायता पूरे मन से करेगी. पर मेरे बाद. क्यों दिया, तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?”

“नहीं, वैसे मैं इसके लिए तैयार ही होकर आयी थी.”

“तो चलो फिर शयनकक्ष में, यहाँ समय व्यर्थ करने से क्या मिलना है.”

चारों उठकर रमोना के शयनकक्ष में चले गए.

*******

शतरंज के मोहरे बिछ चुके थे. पर एक ओर के राजा और दूसरी ओर की रानी की अभी इसकी भनक भी न थी. वे दोनों अपनी जीवनचर्या में व्यस्त थे.

प्रकाश अपनी भाभी की गांड मारने के बाद उनके जैसी ही कोई और चुदक्क्ड़ स्त्री को अपनी पत्नी बनाने के सपने में खोया हुआ था. पर अब इस आयु में उसे इसकी संभावना धूमिल ही लगती थी.

सुमति अपने सर्वाधिक प्रिय कार्य में व्यस्त थी. वो सागरिका की गांड से बहते हुए नितिन के वीर्य को पीने में व्यस्त थी. ये बात अलग थी कि अभी उसे अपनी गांड में से भी निखिल के वीर्य को पीने का अवसर मिलने वाला था. निखिल उसकी गांड मारकर अब झड़ने के निकट था. वो अपनी इस स्वप्निल जीवन के लिए अपने भाई को धन्य करती थी. हालाँकि, उसके मन में रह रह कर एक हूक सी उठती थी कि कोई उसका अपना भी हो. पर उसकी आयु की विधवा से विवाह करने के लिए कोई भी नहीं मानेगा. उसने सागरिका की गांड साफ की और निखिल के निस्तार होने की राह देखने लगी.

बिस्तर पर लेटी हितेश से चुदवाती हुई नीलम भी अपने भाग्य को धन्य कर रही थी. उसकी एक गलती ने जीवन भर का श्राप न बनकर उस पर एक कर्ज सा चढ़ा दिया था. सिया ने उसकी जितना सहायता की थी, वो अपूर्व थी. सिया के बेटे हितेश की पीठ पर अपनी टाँगें जकड़ते हुए वो अपर्याय रूप से उसे धन्यवाद करने लगी.

सिया अपनी चुदाई से संतुष्ट होकर अब दिया के फोन की प्रतीक्षा में थी. उसे आशा थी कि चंद्रेश और प्रकाश चाहे दोनों नीलम को रात भर चोदे पर उसके लिए उसके बेटे को छोड़ दें.

पटेल परिवार के अन्य सदस्य घर जाने के लिए निकल चुके थे. आकार ने मेधा को क्षमा करते हुए काम पर वापिस बुला लिया था, जिसका आभार उसने अपनी गांड में आकार के लंड को लेकर व्यक्त किया था.

दिया अपने सामने रमोना को चुदाई के लिए तैयार होते देख रही थी और अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी.

शाम सात बजे दिया को छोड़कर सभी घर पहुंच चुके थे.

क्रमशः
 
छठा घर: दिया और आकाश पटेल

अध्याय ६.३

भाग ३

*********

अब तक:

दिया के घर अब वातावरण सामान्य हो चला था. सुमति और प्रकाश के विवाह की भी योजना बनाई जाने लगी थी. नीलम सिया के घर दो चार दिन और रहने वाली थी. इसके बाद वो प्रकाश को लेकर लौटने वाले थे. दिया ने रमोना से सुमति के परिवार के बारे में पूछ ताछ कि तो पता चला कि वो भी परिवारिक व्यभिचार में लिप्त हैं. रमोना ने दिया को शाम को पार्थ से मिलकर आगे के बारे में बात करने के लिए निमंत्रण दिया. पार्थ ने इस सुझाव के लिए अपनी स्वीकृति दे दी. फिर इस योजना को कैसे फलित किया जाये इसके लिए महिला मंडली पर छोड़ दिया गया.

शतरंज के मोहरे बिछ चुके थे. पर एक ओर के राजा और दूसरी ओर की रानी की अभी इसकी भनक भी न थी.

*******

अब आगे:

*******

दिया का घर:

दिया शाम को आठ बजे घर पहुंची. उसे देखकर सभी खुश हो गए और उससे पूछने लगे कि कुछ बात बनी? दिया ने हाँ में सिर हिलाया और फिर जाकर अपने लिए एक बड़ा पेग बनाया.

“लगता है कुछ अधिक हो गया? क्या हुआ?” आकाश ने अपनी पत्नी से पूछा, क्योंकि वो इतना बड़ा पेग विशेष परिस्थितियों में ही लेती थी.

“क्या हुआ वो खाने के बाद बताऊँगी पर शेष बात अभी ही बता देती हूँ.”

कनिका और अलोक उठकर अन्य सब के लिए पेग बना लाये और दिया के सामने बैठकर उसकी बात सुनने लगे. दिया अपना पेग लगभग समाप्त ही कर चुकी थी.

दिया: “पार्थ को ये संबंध स्वीकार है. उसने ये बात भी मानी कि उनका परिवार भी हमारी शैली ही अपनाता है, और तो और शीला के परिवार में भी यही चलन है. शीला की दोनों बेटियाँ और उनके परिवार सभी हमारी ही प्रकार से उन्मुक्त हैं. उसे इस बात को आगे बढ़ने के लिए शोनाली और शीला की सहायता मिलने का पूरा विश्वास है.”

“अब जब दोनों ओर से महिलाएँ इस कार्य में इतनी रूचि ले रही हैं तो मुझे नहीं लगता कि प्रकाश और सुमति के बचने का कोई रास्ता शेष है.” आकाश ने कहा तो सबकी हँसी छूट गयी.

“आप सही सोचते हो. वैसे पार्थ ने भी इस योजना को गुप्त रखने का ही सुझाव दिया है, और ये देखना है कि उन दोनों को कैसे एक दूसरे से मिलाया जाये. फिर शीला और समर्थ बाहर जा रहे हैं, कोई दो महीनों के लिए तो ये मिलाप उसके पहले होना आवश्यक है. नहीं तो शीला को शांति नहीं रहेगी अपनी यात्रा के समय.”

“हाँ, ये मैं समझ सकता हूँ, भाभी.” आकार ने माना और ये देखकर कि दिया का पेग समाप्त हो गया है उसे एक और उतना ही बड़ा पेग लेकर दे दिया.

“दिया: “एक और! लगता है आपके मन में अपनी भाभी के प्रति कुछ गलत भाव हैं. उसे दारू पिलाकर चोदने के बारे में तो नहीं सोच रहे हैं न?” दिया ने चुलबुली हंसी के साथ कहा.

“अरे नहीं भाभी, ऐसा कभी हुआ है क्या? पर मैं सोच रहा था कि नीलम तो है नहीं, तो क्यों न भैया और मैं आपको आपकी इस सफलता की बधाई सही रूप में दें. बच्चे अपने लिए कुछ और सोच ही लेंगे.”

“हम्म्म, और आप भी इसकी बात से सहमत ही होंगे? है न? मुझे अकेली को आप दोनों भाई चोद चोद कर मार दोगे रात भर.”

“विचार तो कुछ ऐसा ही है, पर मारने का कोई अभिप्राय नहीं है.”

कनिका और अलोक एक दूसरे को देख रहे थे. और सोच रहे थे कि कितनी आत्मीयता से सब बातें कर लेते हैं.

“ताई, चलो खाना खा लेते हैं फिर आप सुनाओ पार्थ के साथ क्या किया आज.”

सबने अपने पेग समाप्त किये, कनिका ने खाना परोसा और सबने मन से भोजन किया.

***********

सिया का घर:

जब चंद्रेश और प्रकाश सिया की चुदाई में व्यस्त थे, हितेश नीलम की सवारी कर रहा था. नीलम की चूत को मन भर के चाटने के बाद जब उसने नीलम की चूत से छूटा हुआ रस पी लिया तो उसने अपने लंड पर ध्यान दिया. लंड कड़क हो चुका था, और सामने चूत खुली हुई थी. नीलम ने आँखें खोलकर उसे आगे बढ़ने का निमंत्रण भी दे डाला और हितेश को कोई संकोच नहीं हुआ. उसने नीलम के फैले हुए पैरों के बीच में यथावत स्थान बनाया और फिर अपन लंड को नीलम की चूत पर रगड़ने लगा. नीलम कुनमुनाई.

“अब समय मत व्यर्थ कर. चोद दे, इतने दिनों से तुम सबने मुझे जो अलग किया हुआ था मेरी तो चूत सिकुड़ ही गयी होगी. अब देर न कर. चोद डाल अपनी मौसी को.” नीलम ने विनती की.

हितेश ने अपने लंड को अब सीधा किया और एक तगड़े धक्के के साथ नीलम की प्यासी चूत में उतार दिया. चूत सम्भवतः सच में सिकुड़ गयी थी, क्योंकि हितेश के इस धक्के से जहाँ पहले पूरा लंड अंदर चला जाता था, आज आधा या उससे कुछ ही अधिक जा पाया था.

“सच में मैसी, आपकी चूत तो तंग हो गयी है. लगता है इस प्रकार का सन्यास थोड़े थोड़े दिनों में अच्छा रहेगा आप सबके लिए.”

“गांड मार दूँगी भोसड़ी के अगर ऐसी बकवास की तो. मादरचोद अपनी माँ को सन्यास दिलवाना, जिसकी गांड और चूत में रोज लौड़े जाते हैं.” नीलम तिलमिला गयी.

“अरे मौसी, गुस्सा क्यों कर रही हो. मैंने तो बस यूँ ही कहा था.” हितेश डर के बोला।

“ठीक है. पर ऐसी बात फिर मत करना. तुम सबसे से चुदने में ही तो मेरे जीवन का आनंद है. कैसे तड़पी हूँ मैं इतने दिन, तू क्या जाने. अब अच्छे से चुदाई कर और ढीली कर दे मेरी चूत को फिर से. रात में न जाने कौन पेलने वाला है आज.”

हितेश को पता था कि आज नीलम की रात में भयंकर चुदाई होगी. उसके पिता और चाचा उन्हें छोड़ने वाले नहीं थे. वो तो उसकी माँ न होती तो उसे भी साथ ले लेते. पर सिया की चुदाई किये भी हितेश को एक लम्बा समय हो चला था और वो आज की रात अपनी माँ की चुदाई करना चाहता था. हितेश अब पूरे लंड से नीलम की चुदाई कर रहा था. नीलम भी इतने दिनों के बाद चुदाई होने से आनंद के महासागर में गोते लगा रही थी. अपनी गांड उछाल कर वो भी हितेश के शक्तिशाली धक्कों का पूरा प्रतिउत्तर दे रही थी. चुदाई की थापों ने कमरे में शोर मचाया हुआ था. नीलम की चूत से इतना पानी झरने के समान बह रहा था कि चुदाई की ध्वनि भी थप थप से बदल कर छप छप हो चली थी. हितेश अपने पूर्ण सामर्थ्य से नीलम को चोद रहा था और नीलम भी बिना पीछे हटे अपनी कमर और गांड उठा उठा कर चुदवा रही थी.

नीलम की एक तेज चीख ने कमरे को हिला दिया. उसका शरीर ढीला पड़ गया और वो शांत हो गयी. हितेश अभी भी अपने लंड से उसे चोद रहा था, पर अब वो भी रुक न पाया और नीलम की चूत में अपने लंड के रस की वृष्टि करने लगा. पूरा झड़ने के बाद वो नीलम के ऊपर से हटा और उसके साथ ही लेट गया. दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

“मुझे इसकी बहुत आवश्यकता थी. मेरी एक गलती के कारण मेरा इतने दिनों का उपवास जो हो गया था.” नीलम ने संतुष्टि की साँस लेकर हितेश को चूमते हुए कहा.

“आपका उपवास टूटा है अभी तो, रात को देखिये क्या होता है. मुझे पूरा विश्वास है कि आज की रात आपको पापा और चाचा एक साथ चोदने वाले हैं.” हितेश ने उसे अपने विचार बताये.

“मुझे भी यही आशा है. पर अब मैं कुछ देर के लिए सोना चाहती हूँ. तुम भी मेरे साथ ही लेटो, कहीं जाना मत. किसी की बाँहों में सोये हुए बहुत दिन निकल गए.” नीलम ने कहा. “और फिर रात में न जाने कितनी देर जागना पड़े.”

हितेश ने उसे अपनी बाँहों में लिया और कुछ ही देर में नीलम सो गयी. कोई आधा घंटा ही हुआ था कि कमरे का द्वार खुला और चंद्रेश ने प्रवेश किया. नीलम और हितेश को आया देखकर उसने कुछ न कहा. पर नीलम के नंगे शरीर को देखकर उसका लंड फिर से अंगड़ाई लेने लगा. आज की रात इसे अच्छे से चोदुँगा ये सोचते हुए उसने उनके ऊपर एक चादर डाली और कमरे से निकल गया. प्रकाश अपने कमरे में था. कुछ सोचकर वो दोबारा नीलम के कमरे में गया तो देखा कि हितेश जागा हुआ था और नीलम का हाथ पकड़कर बैठा था. नीलम भी जाग गयी थी. चंद्रेश को देखकर वो बैठ गयी और चादर नीचे सरक गयी. नीलम ने अपने शरीर को छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया. बल्कि उसने चादर हटा दी.

चंद्रेश और नीलम बात करने लगे और तभी सिया अंदर आयी और नीलम की चूत से हितेश के रस को बहते हुए और अपने पति की नीलम से बात करते हुए देखा. फिर वे चारों प्रकाश और सुमति के लिए अपनी योजना को पक्का करने में जुट गए.

********

दिया का घर:

सब लोग दिया को ही देख रहे थे. और फिर दिया ने बताना आरम्भ किया.

“जैसा कि मैंने बताया, पार्थ को ये संबंध स्वीकार है और वो शोनाली और शीला को इसके लिए पहल करने की विनती करेगा. हम चारों रमोना के शयनकक्ष में चले गए. रमोना और सचिन के साथ तो आप सब जानते ही हो कि मैं चुदाई पहले भी कर चुकी हूँ. पर पार्थ के बारे में मैं उत्सुक थी. रमोना ने ही पहल की और अपने कपड़े निकालने में अधिक देर न लगाई. मैं भी यही कर रही थी. सचिन को भी नंगा होने में अधिक समय नहीं लगा. उसका मोटा लंड खड़ा हो चुका था. पार्थ कुछ अधिक ही समय ले रहा था. पर अंततः जब वो नंगा हुआ तो मैं उसे देखकर आकर्षित हुए बिना नहीं रह पायी.”

“ये कोई नयी बात नहीं है. आप हर नए लंड को देखकर आकर्षित ही होती हो, मॉम.” अलोक के इस कथन पर सब हंस पड़े और दिया शर्मा सी गयी.

“बात ये है कि पार्थ का लंड सचिन से भी अधिक लम्बा और मोटा दिख रहा था, और अभी भी वो अपने पूरे जोश में नहीं था. मैं रमोना की क्षमता से प्रभावित हो गयी क्योंकि उसके कहे अनुसार वो पार्थ से गांड भी मरवा चुकी थी. पार्थ अपने लंड को झुलाता हुआ मेरे सामने आ खड़ा हुआ.”

“आंटी, आप इसे प्यार करो तो इसे बहुत ख़ुशी होगी.” “मैंने रमोना को देखा जिसने सिर हिलाकर सहमति दिखाई और स्वयं सचिन के लंड को अपने मुंह में लेकर चाटने लगी. मैंने भी पार्थ के लंड को हाथ में लिया तो वो बहुत ही भरी लगा. कुछ देर तक उसे यूँ सहलाते हुए मैं उसे बढ़ता हुआ देखती रही. पार्थ में संयम बहुत है. उसने इस पूरे समय एक बार भी किसी प्रकार से मुझे नहीं छुआ. पर जब उसके लंड पर मैंने मदन रस की बून्द को चमकते हुए देखा तो रुकना मेरे लिए सम्भव न हुआ. मैंने उसके लंड को मुंह में लिया और चाटने लगी. इस बार पार्थ ने मेरे सिर को अपने हाथ से हल्के से पकड़ा और अपनी ओर से भी लंड मुंह में डालने का प्रयास करने लगा.”

परिवार के सदस्य दिया की इस कहानी को बड़े ध्यान से सुन रहे थे.

“कुछ देर के बाद पार्थ ने कहा कि क्यों न हम बिस्तर पर चलें जिससे कि वो भी कुछ स्वाद ले पाए. हम दोनों उठे और बिस्तर पर गए. सचिन और रमोना पहले ही वहाँ जमे हुए थे और रमोना लेटी थी और सचिन उसके ऊपर चढ़ा हुआ अपने लंड से उसका मुंह चोद रहा था. साथ ही साथ उसका अपना मुंह रमोना की चूत में घुसा हुआ था. पार्थ ने कहा कि वो नीचे रहेगा जिससे कि मैं अपने अनुसार उसके लंड को चूस सकूँ। मुझे भी ये सुझाव सही लगा और मैंने पार्थ लो लेटने दिया. लेटने के बाद उसके लंड के आकार को देखकर मुझे थोड़ा डर सा लगा. मोटा अजगर की तरह लम्बा लंड है उसका. मैंने साहस बांधकर उसके मुंह पर अपनी चूत रखी और फिर आगे झुकते हुए उसके लंड को चाटा। फिर धीरे धीरे अपने मुंह में लिया. जब मुझे लगा कि और लेना मेरे लिए सम्भव नहीं है तो मैं उतने ही लंड को चूसने लगी. चूसने से मुझे लगा कि उसका लंड और कड़ा और बड़ा हो गया. पर अब मैं भी रुकने वाली तो थी नहीं. मन लगाकर उसके लंड को चूस रही थी. कुछ और लंड भी इस प्रक्रिया में अंदर गया पर अधिक नहीं.”

“बिस्तर के दूसरी ओर कुछ गतिविधि हुई तो मैंने सिर घुमाकर देखा तो अब सचिन रमोना की टाँगों के बीच बैठा अपने लंड को उसकी चूत पर घिस रहा था. रमोना की सिसकारियां उसके अंदर भड़कते ज्वालामुखी को दर्शा रही थीं. आप लोग तो जानते ही हो, रमोना चुदवाती है तो कितना चिल्लाती है. और उसकी सीत्कार निकली जब सचिन ने अपना लंड अंदर डाला. मेरा ध्यान उचट गया था, पर मैंने पार्थ के हाथ को अपने सिर पर अनुभव किया और अपने लंड पर दबा दिया. इसके कारण मेरे मुंह से लंड गले में चला गया और मैं साँस लेने के लिए व्याकुल हो उठी. पार्थ ने तुरंत ही अपना हाथ हटाया और मैंने भी लंड को मुंह से निकाला और फिर से मुंह डालकर चूसा..”

“अब हम चुदाई कर सकते हैं, आंटी।” “पार्थ ने जब कहा तो मेरी चूत जो उसके मुंह पर थी भकभकाकर झड़ गयी. मुझे ऐसी गुदगुदी सी हुई कि मुझे कुछ क्षणों के लिए कुछ समझ ही नहीं पड़ा. पर जब मैं चेतना में आयी तो इस बार मैं बिस्तर पर लेटी थी और पार्थ मुस्कुरा रहा था. मैंने नीचे देखा तो उसका लंड मेरी चूत के मुहाने पर था और हल्के हल्के से मेरी चूत को रगड़ रहा था. मैंने पार्थ को देखा तो उसे सम्भवतः कुछ भी दिखा होगा. उसने मुझे विश्वास दिलाया कि वो मेरी इच्छा और मांग के अनुसार ही चोदेगा और मैं भी उसकी बात से आश्वस्त हो गयी. मैंने एक तकिया अपने सिर के नीचे लगाई और अपनी चूत को देखने के लिए सिर उठा लिया. पार्थ का लंड मेरी चूत के अंदर अपनी लम्बी यात्रा आरम्भ कर चुका था.”

दिया कुछ ठहरी और उसने आलोक को देखा तो आलोक समझ गया और अपनी माँ के लिए एक और पेग बना लाया. फिर कीर्तिका भी उठी और दोनों भाई बहन सबके लिए पेग बनाकर ले आये. दो घूंट लेकर दिया ने सबको देखा और अपनी कथा आगे बढ़ाई।

“पार्थ ने अपने लंड को जब मेरी चूत में डालना आरम्भ किया तो मुझे लगा कि न जाने कैसे मैं पूरा लंड ले पायूँगी। परन्तु पार्थ सम्भवतः ऐसी परिस्थितियों से अवगत था, उसने लगभग आधे लंड को डालने के बाद ही मुझे धीरे धीरे चोदना आरम्भ कर दिया. उसके मौखिक प्रेम के कारण मेरी चूत भी पर्याप्त मात्रा में गीली थी और उसे अधिक कठिनाई नहीं हुई, न ही मुझे. पर पास में मानो रण छिड़ चुका था. सचिन अपनी माँ रमोना को पूरे लंड से भीषण गति से चोद रहा था. हम दोनों जोड़ों में किता अंतर था ये विदित था. जहाँ सचिन और रमोना चुदाई को एक युद्ध के स्तर पर ले रहे थे वहीं पार्थ और मेरी चुदाई प्रेम पूर्वक और अत्यंत शालीनता से चल रही थी. मुझे पार्थ के इस संयम पर बहुत गर्व हुआ.”

“पार्थ ने मुझे चोदते हुए कुछ ही देर में कुछ और गहराई तक अपने लंड को डाला. सच तो ये है, कि मुझे पता भी नहीं चला. मेरी भी चूत उसके लंड से अब अभ्यस्त हो गयी थी और अब मैं भी अपनी कमर उछालते हुए उसके लंड को और अंदर तक लेने का प्रयास कर रही थी. और तभी मुझे आभास हुआ कि अब मेरी और पार्थ की जाँघें एक दूसरे को छू रही हैं. मैंने नीचे देखा तो मेरी चूत में अब पार्थ का लंड पूरी गहराई तक समाया हुआ था. मैंने एक गहरी साँस ली और स्वयं को बधाई दी कि मैं बिना चोटिल हुए उस लंड से चुदवा रही हूँ.”

कनिका बोल पड़ी, “ताईजी, आप लोग बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ?”

“हाँ”

“मॉम ने क्या गलत किया था अगर वो भी बड़े लौंड़ों से चुदवाने गयी थी तो?”

“केवल ये कि उन्होंने हम सब से छुपकर ये किया था. अन्यथा हमारे घर में किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं है. समझीं?”

“हाँ, मेरा भी यही सोचना था. आप आगे सुनाओ.”

“मैं कहाँ थी?” दिया ने पूछा.

आकार ने बताया तो दिया आगे बताने लगी.

“जैसा कि मैंने कहा कि न केवल मैं पार्थ के धैर्य बल्कि उसकी कला से भी अचम्भित हुए बिना न रह सकी. उसने जिस संतोष और संयम से मेरी चूत में अपना पूरा लंड पेला था उसकी प्रशंसा करनी होगी. उधर दूसरी ओर रमोना की चीख चिल्लाहट कमरे के वातावरण को अशांत करने के लिए पर्याप्त थी. पर इसका कारण ये भी था कि सचिन भी उसे अपनी माँ न समझते हुए किसी सस्ती रंडी के समान चोद रहा था. बिस्तर पर उसकी शक्तिशाली थापों के कारण जो कम्पन हो रहा था वो अगर मैं और पार्थ भी उसी लय में चोदते तो टूट ही जाता. पार्थ अपनी गति बढ़ा रहा था, मैं और मेरी चूत दोनों अब उसका पूरा साथ दे रही थीं. मैं कुछ बार झड़ चुकी थी, पर वो शिखर अभी भी दूर था जहां जाना और नीचे गिरना ही चुदाई का मुख्य आकर्षण है.”

“पार्थ मेरे मन को पढ़ सक रहा था या उसे इतना अनुभव था कि वो जान गया कि मैं अभी उस ज्वालामुखी के समान बिखरने के लिए लालायित हूँ. उसने मेरे मम्मे अपने हाथों में लेकर उन्हें मसलते हुए अपने धक्कों को और गतिशील कर दिया. मेरे मम्मे जैसे निचोड़ ही दे रहा था, पर मुझे उसमें कितना आनंद आता है ये आप सब जानते ही हो. फिर उसने अपना एक हाथ हटाया और मेरे भग्नाशे को छेड़ने लगा. कुछ देर तो मुझे संज्ञान ही नहीं हुआ कि क्या हुआ पर जब उसने उसे मसला तो मेरा शरीर बिखर ही गया. मेरी कमर ऊपर उठी ही थी कि पार्थ ने एक भीषण धक्के के साथ मुझे बिस्तर पर चिपका दिया. उसकी उँगलियों ने मेरे भग्न को मसलने में कोई कोताही नहीं की, न ही उसके धक्के धीमे पड़े और उसका दूसरा हाथ मेरे एक मम्मे को अब निर्ममता से निचोड़ रहा था. वो एक से दूसरे पर जाता पर गति न कम पड़ती न ही मेरे भग्न पर उसकी उँगलियों का दबाव.”

“मेरा शरीर मेरा साथ छोड़ चुका था, पूरा शरीर काँप रहा था और चूत में वही संवेदना थी जो मुझे चेता रही थी कि वो भी इस समय अपने आनंद में लीन है. शिखर दिखा और मैं बहुत समय तक वहीँ ठहरी सी रही, जैसे एक लहर थी जो मुझे नीचे ही नहीं आने दे रही थी. पर फिर न जाने क्या हुआ मुझे अपनी ही चीखें सुनाई पड़ीं. और फिर ऐसा लगा जैसे मैं डूब रही हूँ. और फिर सब कुछ अँधेरे में डूब गया.”

“उस अंधकार में भी मैंने अपनी चूत में से कुछ बाहर निकलने का अनुभव किया. फिर ऐसा लगा जैसे कुछ ठंडा सा उसके भीतर गया और कुछ गर्म सा बाहर बहा. बस चेतना इतनी ही थी. तारे मेरी आँखों के सामने घूम रहे थे. मैंने अपने होंठों पर किसी के होंठों का स्पर्श अनुभव किया। बिस्तर अभी भी हिल रहा था या मैं ही लहरों में तैर रही थी ये तो नहीं पता. पर जब मैंने कुछ देर बाद आँख खोली तो सब कुछ शांत था. मैं अकेली पड़ी हुई थी. मेरी चूत में से पार्थ का रस बह रहा था. आँखें मीचते हुए मैं भी उठी, तो देखा कमरे में कोई न था. मैंने कपड़े डाले और बाहर आयी तो देखा की वे तीनों अभी भी नंगे ही थे और कुछ पी रहे थे.”

“पार्थ ने मुझे देखा तो मुझे भी एक ग्लास दिया. उसमे जूस था, जो मैंने पिया और पार्थ को देखा. “आपको अच्छा तो लगा न आंटीजी.” मैं केवल सिर ही हिला पायी.”

“समय देखा तो देर हो रही थी. मैंने रमोना को कहा तो उसने कहा कि अगली बार कुछ अधिक समय लेकर जाऊँ ताकि पार्थ मेरी गांड का भी स्वाद ले पाए. फिर उसने बताया कि अब वो सचिन और पार्थ से डबल चुदाई करवाने वाली है. और मुझे आँख मारते हुए बोली कि पार्थ का लंड उसकी गांड में बहुत खलबली मचाता है. मैंने उन तीनों से विदा ली और फिर अपना मेकउप ठीक किया और घर चली आयी.

“वावो, मॉम. काफी मस्त रही आपकी शाम तो.”

“और रात और भी मस्त होने वाली है. भाई आज तो गांड पहले मैं ही मारूँगा।” आकाश ने अपने पति होने का हक जताया.

“अरे भैया, पूरी रात है. पहले आप मार लेना, बाद में मैं. बाद में मत कहना जब नीलम लौट आये तो.” आकार ने कहा तो सभी हंस पड़े.

********

रात हो चुकी थी और आज की रात पटेल परिवार की दोनों बहुओं के लिए स्मरणीय होने वाली थी. बड़ी बहू दिया को उसके पति और देवर के साथ एक साथ चुदाई का एक और अवसर मिला था. वहीं दूर घर की छोटी बहु भी अपनी जेठानी की बहन के पति और उनके भाई से साथ एक साथ चुदने के लिए व्याकुल थी. आलोक और कनिका ने भी अपना प्लान बना लिया था और दोनों एक दूसरे के साथ अकेले समय बिताने के लिए खुश थे. लव को आज कई दिनों के बाद अपनी माँ का संसर्ग मिला था और सिया भी अपने बेटे से चुदने के लिए लालायित थी. प्रकाश इस बात से अनिभज्ञ था कि उसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. उसे तो केवल इस समय नीलम की गांड का ही ध्यान आ रहा था.

सभी अपने अपने साथियों के साथ खाने के बाद निर्धारित कमरों में चल पड़े. आज की रात दो घरों के चार कमरों में चुदाई का निरंतर संगीत बजने वाला था. कुछ ही देर में चारों कमरों के द्वार बंद हो गए.

क्रमशः
 
छठा घर: दिया और आकाश पटेल

अध्याय ६.३

भाग ४

*********

अब तक:

रात हो चुकी थी और आज की रात पटेल परिवार की दोनों बहुओं के लिए स्मरणीय होने वाली थी. बड़ी बहू दिया को उसके पति और देवर के साथ एक साथ चुदाई का एक और अवसर मिला था. वहीं दूर घर की छोटी बहु भी अपनी जेठानी की बहन के पति और उनके भाई से साथ एक साथ चुदने के लिए व्याकुल थी. आलोक और कनिका ने भी अपना प्लान बना लिया था और दोनों एक दूसरे के साथ अकेले समय बिताने के लिए खुश थे. लव को आज कई दिनों के बाद अपनी माँ का संसर्ग मिला था और सिया भी अपने बेटे से चुदने के लिए लालायित थी. प्रकाश इस बात से अनिभज्ञ था कि उसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. उसे तो केवल इस समय नीलम की गांड का ही ध्यान आ रहा था.

सभी अपने अपने साथियों के साथ खाने के बाद निर्धारित कमरों में चल पड़े. आज की रात दो घरों के चार कमरों में चुदाई का निरंतर संगीत बजने वाला था. कुछ ही देर में चारों कमरों के द्वार बंद हो गए.

*******

अब आगे:

*******

दिया का घर:

आलोक और कनिका:

आलोक कनिका के साथ अपने कमरे में चला गया. कनिका ने भी उसका कमरा ही अधिक उपयुक्त समझा, कारण था कि वो एक कोने में था और शांति से वे चुदाई कर सकते थे.

कनिका: “तुम्हें नहीं लगता कि जिस प्रकार से सब मौसा और सुमति आंटी को मिलाने का षड्यंत्र रच रहे हैं वो सही है?”

आलोक: “नहीं. प्रकाश मौसा के साथ मेरी जब भी बात हुई उनके मन में कहीं न कहीं एक फ़ांस सी अनुभव हुई कि वे अकेले ही रह गए. ठीक है, मौसी के कारण उन्हें इतना अकेलापन न लगा हो, पर मौसी रात में तो उनके साथ रहती नहीं हैं. वो अकेले ही सोते हैं. ऐसा मुझे उनकी बातों से लगा है. जहां तक सुमति आंटी की बात है, मैं अधिक कुछ नहीं कह पायूँगा, क्योंकि मुझे उनके बारे में कुछ पता ही नहीं है. पर इतने वर्ष पूर्व विधवा होने के बाद अगर वो आज अपने भाई के परिवार के साथ संलग्न हैं, तो उन्हें भी वही अकेलापन सताता तो होगा. देखो न मम्मी ने बताया नहीं कि पार्थ कितनी सरलता से इसके लिए मान गया.”

कनिका: “हाँ, बात तो सही है. मम्मी के अनुसार पार्थ भी अपने जीवन में इस पिता स्वरूप की इच्छा रखता है. संभवतः ये समाधान सबके लिए ठीक ही रहेगा. पर मेरे प्यारे भाई, अब अपनी भी बात कर लो कुछ.” ये कहकर कनिका आलोक के पास गयी और उसके सीने से चपक गयी.

आलोक ने उसका चेहरा उठाया और चूमते हुए कहा, “मैं भी यही सोच रहा था. आज इतने समय बाद हम दोनों को अलग मिलने का अवसर जो मिला है. नहीं तो पापा या चाचा तुम्हे छोड़ते ही नहीं हैं.”

“बोल तो ऐसे रहे हो जैसे स्वयं ताई या मम्मी के पल्लू को छोड़ते हो. वो तो भला हो कि ताईजी आज व्यस्त हैं नहीं तो उनके ही पिछवाड़े में घुसे रहते.”

“वैसे उनका पिछवाड़ा है मस्त, और मम्मी को भी गांड मरवाने में बहुत मजा आता है.”

“तो मेरा कैसा है?”

आलोक ने अपने हाथों से कनिका की गांड दबाई, “तुम्हारे पिछवाड़े का स्वाद और तंगी बहुत मस्त हैं. माँ की गांड तो अब वैसे कुछ चौड़ी भी हो गयी है.”

“समझ गयी, आज मेरी गांड मारनी है तो मुझे मस्का मार रहे हो. कल जाकर अपनी मम्मी की गांड चाटोगे.”

“अरे क्यों जल रही है? हम सबने कब से इन बातों में जलना सीख लिया?” ये कहकर आलोक ने उसके मुंह को अपने मुँह से बंद किया और दोनों गहरे चुंबन में लीन हो गए. इसी प्रकार एक दूसरे में समय हुए उन्होंने एक हाथ से अपने कपड़ों को अलग किया और चूमते हुए एक दूसरे को नंगा करने में सफल हो गए. अब दोनों एक दूसरे के शरीर पर अपने हाथ सहला रहे थे. धीरे चलते हुए आलोक ने कनिका को बिस्तर पर लिटाया और फिर उसकी चूत में अपना मुंह डालकर उसे चाटने लगा.

*********

दिया, आकाश और आकार:

दिया के साथ आकाश और आकार उसके कमरे में चले आये थे. हल्की फुल्की बातों में ही आकार ने दिया को छेड़ा.

“भाभी, ये तो आपके लिए अच्छा है कि नीलम नहीं हैं नहीं तो आपको हम दोनों के साथ चुदाई का ये अवसर नहीं मिलता.”

दिया को ये बात कुछ ठीक नहीं लगी. उनके परिवार में इतना सामंजस्य था कि अगर वो भी नीलम से कहती तो नीलम भी इसके लिए उसे कदापि मना नहीं करती.

“देवरजी ऐसी बात मत करिये. क्या नीलम मुझे मना करती? या मैं नीलम को? और ये मत भूलिए कि उसकी सेवा मैं भी मेरे जीजा और उनके भाई उन्नत हैं. आज उसकी भी मन भरके चुदाई होने वाली है. आप दोनों भाई सौभाग्यशाली हैं कि आज आपकी पत्नियां दो दो लौंडों से चुदाई का आनंद लेने वाली हैं.”

“हाँ, भाभी. मैंने तो बस यूँ ही कहा था. आप लगता है बुरा मान गयीं. वैसे भी आप दोनों की दिन में एक चुदाई हो ही चुकी है. बताइये मैं क्या करूं कि आप मुझे क्षमा कर दें.” आकार ने भोला सा चेहरा बनाकर कहा.

“हम्म्म, ये सोचने वाली बात है. क्यों न आप आज मेरे पॉँव से लेकर ऊपर तक अपनी जीभ से चाटकर अपनी गलती का प्रायश्चित करते?” दिया ने एक शरारती स्वर में कहा.

इस बात पर आकाश हंस पड़ा और अपने भाई से बोला, “फंस गया न बच्चू? अब चाट इसके तलवे. मैं उधर बैठकर देखता हूँ कि कैसे तू अपनी भाभी की सेवा करता है.”

“क्या भाई, आप भी?” आकार ने कहा और फिर दिया की ओर मुड़ा।

“भाभी, आपकी सेवा करने में मुझे कोई हिचक नहीं है. अब आप कपड़े निकाल दो और फिर देखो अपने देवर का कमाल।”

दिया तुरंत ही नंगी हो गयी और आकार ने उसे सोफे पर बैठने का आग्रह किया।

दिया बोली, “ठहरो, मैं पहले हाथ पाँव धो लेती हूँ. न जाने क्या क्या लगा होगा.” ये कहकर वो बाथरूम में गयी और कुछ ही देर में लौट आयी और सोफे पर पसर गयी.

आकार उसके सामने बैठा और उसके एक पांव को उठाकर उसकी उँगलियाँ चाटने लगा. फिर दूसरे पैर की चाटीं। उसके बाद तलवे और इस प्रकार से नीचे के हर अंग प्रत्यंग को चाटते हुए वो ऊपर की ओर बढ़ता चला गया. दिया को इस प्रकार का अनुभव नहीं था. वैसे तो आकार को भी नहीं था पर वो अपनी लग्न और परिश्रम से दिया को सुख देने का पूर्ण प्रयत्न कर रहा था.

और जब तक आकार दिया की जांघों तक पहुँचा दिया का शरीर काँप रहा था. ऐसी सुखद अनुभूति उसे पहले कभी नहीं हुई थी. जैसे ही आकार की जीभ ने उसकी जाँघों के अंदर के भाग को चाटा दिया की चूत ने आकार के मुंह पर ढेर सारा रस छोड़ दिया. आकार सकपका के पीछे हटा पर उसके पूरे चेहरे से वो रस टपक रहा था. उसे हटा जानकर दिया ने उसकी ओर देखा तो उसकी स्थिति देख कर आकाश और दिया हँस पड़े.

“देवर जी, मेरी उँगलियाँ और तलवे और चाटो न, बहुत अलग भावना आयी थी उसमें.”

आकार ने अपने चेहरे को हाथों से पोंछा और दिया की पांवों को चाटने में जुट गया. परन्तु इस समय उसने अधिक समय नहीं व्यर्थ किया. उसका लंड भी अब अकड़ा हुआ था और उसे भी शांति की आस थी. उसने इस बार सीधे दिया की चूत पर ही हमला किया और दिया खिलखिलाते हुए उसके सिर को अपनी चूत पर दबाने लगी. लपलपाते हुए आकार ने पहले मन भर के दिया की चूत को चाटा और फिर उसने अपना ध्यान दिया की गांड के छेद की ओर किया. अब तक आकाश भी नँगा हो चुका था और उसने अपने पत्नी के मुंह में अपने लंड को डाला जिसे दिया सप्रेम चूसने लगी.

आकार दिया की चूत को उँगलियों से सहलाते हुए उसकी गांड को अपनी जीभ से कुरेद रहा था. उसका पर्याय केवल दिया की गांड को पर्याप्त रूप से ढीला करना था जिससे कि उसे दो दो लंड से चुदने में अधिक कठिनाई न हो. वैसे दिया अब इसमें पारंगत हो चुकी थी, परन्तु दोनों भाई एक दूसरे की पत्नियों का बहुत ही ध्यान रखते थे.

दिया की गांड और चूत अब आवश्यक रूप से चुदाई के लिए अनुकूल ही चुके थे. आकार ने उठकर इस बार अपने कपड़े उतारे हुए नंगा हुआ ही था कि आकाश ने अपने लंड को दिया के मुंह से निकाल लिया और अपने भाई को उस रिक्त स्थान को भरने के लिए आमंत्रित किया. दिया ने उसी प्रेम से आकार के भी लंड को चूसा जिस प्रेम से उसने अपने पति का लंड चूसा था. कुछ ही क्षण में अब दोनों लंड उसकी सेवा करने के लिए उपयुक्त हो चुके थे.

*******

सिया का घर:

सिया और हितेश:

उधर कुछ मील दूर माँ बेटे का मिलन एक लम्बे समय के बाद हो रहा था. हितेश बिस्तर पर लेता हुआ था और सिया की चूत उसके मुंह पर थी, जिसे वो चाशनी समझ कर चाटे जा रहा था. सिया भी उसके मुंह में रस की धारा छोड़ने में कोई कसर नहीं रख रही थी. और साथ ही साथ वो आने बेटे के लंड को भी चाट कर उसके स्वाद से स्वयं को तृप्त करना चाहती थी. टोपे को भली भांति चाट लेने के बाद उसने हितेश के लंड को मुंह में लेकर चूसने की प्रक्रिया भी आरम्भ कर दी थी. वो तो भला हो नीलम का जिसने दिन में हितेश को दो बार झाड़ दिया था नहीं तो जिस ललसा से सिया उसे चूस रही थी, वो अब तक झड़ ही चुका होता.

पर अब माँ और बेटा एक दूसरे के साथ मिलन के लिए बेचैन हो रहे थे. मुंह से सुख मिलता तो है, पर जो सुख लंड के चूत में जाने पर मिलता है, उसका कोई और पर्याय तो है नहीं। और यही सत्य गांड में लंड के लिए भी उपयुक्त है. दोनों एक दूसरे की भावनाओं से अवगत थे और हितेश के लंड के सिया के मुंह में उछाल से सिया भी जान चुकी थी कि लौड़ा अब उसकी चूत के लिए लालायित है. और यही संदेश उसकी कुलबुलाती चूत भी हितेश को दे रही थी, जो इस अल्प आयु में भी स्त्री के अंगों की सांकेतिक भाषा पढ़ने में निपुण हो चला था.

नीलम, चंद्रेश और प्रकाश:

उनके कमरे से कुछ ही दूर एक दूसरे कमरे में नीलम भी दो भाइयों के साथ गुत्थम गुत्था थी. जहां प्रकाश उसकी चूत और गांड को तर कर रहा था वहीँ नीलम भी चंद्रेश के लंड को मुंह में निगले हुए पूरी श्रद्धा से चूस रही थी. दिन की चुदाई ने उसकी कामाग्नि को और बढ़ा दिया था. इतने दिन का उपवास तो उसने जीवन में अपनी माहवारी के समय भी नहीं किया था, जब वो अपनी गांड मरवाकर संतोष करती थी. और आज हितेश से उसकी गांड बची रह गयी थी, पर उसकी भरपाई इन दोनों भाइयों में से एक ने करनी ही थी, और अगर सम्भव हो पाया तो दूसरा भी उसकी गांड पर हाथ साफ कर ही लेगा.

इन्ही सब विचारों ने उसकी उत्तेजना को बहुत बढ़ा दिया था. और अगर उसने सही समझा था तो आज परिवार के सभी सदस्य सम्भोग में व्यस्त होंगे. उसे अपने घर के बारे में अभी अधिक सूचना नहीं थी, पर ये जानती थी कि सूखा तो कोई नहीं सोयेगा वहां भी.

नीलम चंद्रेश के लंड पर थूक थूक कर उसे चिकना करने में जुटी थी, अपने मुंह में लेकर चाटती और फिर उसे निकलकर थूक से सना देती. चंद्रेश भी नीलम की इस कला से बहुत प्रभावित था, और समझ रहा था कि नीलम चुदाई के लिए तरसी एक प्यासी स्त्री है. और उसे गर्व था कि ऐसी दुखिया का दुःख दूर करने हेतु वो दोनों भाई उपस्थित थे.

प्रकाश भी अब ये अनुभव कर रहा था कि नीलम अब चुदने के लिए तैयार हो चुकी है, उसने सिर उठाकर प्रकाश को देखा जिसने संकेत किया कि लोहा पर्याप्त मात्रा में गर्म हो चुका है, और अब उसे अपने अनुसार ढालने में समय नहीं लगाना चाहिए. दोनों भाइयों ने ये तय किया कि नीलम को आज अकेले नहीं चोदा जायेगा. हर समय उसकी चूत और गांड में लौड़ा रहेगा. जब तक दोनों भाइयों के लौड़े खड़े रह पाए तब तक नीलम के भी दोनों छेद रिक्त नहीं रहेंगे. और रस का अनुदान नीलम के मुंह में ही किया जायेगा.

इसी रूप रेखा के अनुसार चंद्रु ने अपना लंड नीलम के मुंह से निकाला और नीचे प्रकाश ने अपना मुंह उसकी चूत और गांड से हटा लिया. नीलम समझ गयी कि एक लम्बी रात का आरम्भ हो चुका है. और उसके मुंह से एक कामुक सीत्कार निकली जिसका अर्थ था कि वो भी अब इस रण के लिए तैयार है.

क्रमशः
 
छठा घर: दिया और आकाश पटेल

अध्याय ६.३

भाग ५

*********

अब तक:

दो नगरों के चार कमरों में चुदाई की पूरी भूमिका बन चुकी थी. चलिए देखें किस किस कमरे में क्या क्या खेल चल रहे हैं.

धीरे चलते हुए आलोक ने कनिका को बिस्तर पर लिटाया और फिर उसकी चूत में अपना मुंह डालकर उसे चाटने लगा.

कुछ ही क्षण में अब आकाश और आकार के लंड दिया की सेवा करने के लिए उपयुक्त हो चुके थे.

पर अब सिया और हितेश, माँ और बेटा एक दूसरे के साथ मिलन के लिए बेचैन हो रहे थे.

नीलम समझ गयी कि चंद्रेश और प्रकाश के साथ एक लम्बी रात का आरम्भ हो चुका है.

*******

अब आगे:

*******

दिया का घर:

आलोक और कनिका:

कनिका ने भी अपनी टाँगे फैलते हुए आलोक के लिए अपनी चूत का रास्ता सुलभ कर दिया. आलोक का लंड भी अब तन चूका था पर वो कनिका की चूत को पहले भली भांति चाटना चाहता था. चाटते हुए उसने अपनी एक ऊँगली कनिका की चूत में डाली और अपनी जीभ और ऊँगली के समंजस्य से कनिका को जल्दी ही कामोटजीत कर दिया. अपने मुंह को हटाने से पहले आलोक ने कनिका के भग्न को अपनी उँगलियों से मसला तो कनिका की आनंदकारी सिसकारी ने उसका मन मोह लिया. उसने कनिका को बिस्तर पर सही रूप से लिटाया और फिर अपने लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रखा.

“भैया, आज मुझे अच्छे से चोदना और फिर मेरी गांड भी मारना। ताईजी की तो डबल चुदाई हो रही होगी, उस दिन पापा और ताऊजी ने मेरी भी डबल चुदाई की थी. सच में बहुत मजा आया था. उसके बारे में सोचकर ही मेरी गांड में फुरफुरी होने लगती है. इसीलिए गांड में भी मुझे तुम्हारा लंड चाहिए.” कनिका बोले जा रही थी.

आलोक ने उसका मुंह अपने मुंह से बंद कर दिया और कनिका की आँखों में आँखें डालकर उसे चूमने लगा.

“हितेश भी आने ही वाला है दो चार दिन में. फिर उसके साथ मैं तेरी इस डबल चुदाई की इच्छा भी पूरी कर दूंगा. और ऐसा सोचना भी मत कि आज तेरी गांड बचने वाली है. तेरी गांड मारे बिना मुझे भी चैन नहीं मिलने वाला.” इतना कहते हुए आलोक ने एक धक्का लगाया और उसके लंड ने कनिका की चूत में अपना पदापर्ण किया. कनिका ने अपनी टाँगे जोड़कर अपनी चूत को और तंग कर दिया. आलोक को उसकी कसी चूत में अब लंड पेलने में कुछ अधिक घर्षण मिलने लगा. उसने लंड को कुछ देर अंदर बाहर किया और फिर एक तीव्र झटके के साथ पूरा लंड अंदर पेल दिया. कनिका की टाँगे खुल गयीं और उसकी आँखें भी. पर उन आँखों में वासना की डोरियाँ लहरा रही थीं. पूरा लंड अंदर जाने के बाद आलोक ने कनिका की चुदाई करनी आरम्भ की और कनिका ने अपनी टाँगों को कभी खोलकर तो कभी बंद करते हुए आलोक को अपनी फैलती सिकुड़ती चूत के द्वारा एक नया ही अनुभव कराया.

आलोक ने भी अपनी ओर से परिश्रम में कोई कमी नहीं की और वो भी पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ कनिका को चोदने लगा. दोनों एक दूसरे को देखते हुए एक दूसरे में खोने का प्रयास कर रहे थे. दोनों के जुड़े हुए शरीर क्षण भर के ही लिए पृथक होते और फिर नयी शक्ति के साथ फिर मिल जाते. कमरे में चुदाई का संगीत बज रहा था और दोनों की आहों और सिसकारियों ने उस संगीत में नए सुर जोड़ दिए थे.

कोई दस मिनट की इस चुदाई के बाद दोनों एक दूसरे को देखकर झड़ने लगे. आलोक ने कनिका की चूत में ही अपना रस छोड़ दिया और फिर उसे चूमते हुए उसके ऊपर ही लेट गया. कनिका और आलोक के मिलन का रस अब बिस्तर को गीला कर चुका था. कनिका ने धीरे से आलोक को ऊपर से हटाया और अपनी चूत में उँगलियों से मिलन रस को लिया और अपने मुंह में डाल लिया. आलोक उसके पास में लेटे हुए ये देख रहा था. कनिका ने फिर उठकर आलोक के मुरझाते हुए लंड को मुंह में लिया और उसपर लगे प्रेम रस के मिश्रण को चाट लिया.

“इसका स्वाद अलग ही होता है. और सुगंध भी.” कनिका ने संतुष्टि से आह भरते हुए कहा.

कनिका आलोक के पास लेट गयी और दोनों अन्य बातों में व्यस्त हो गए. पर अलोक और कनिका को अपने प्रेम का अगला चरण भी याद था. कनिका की गांड मारने का. पर उसके लिए दोनों ने कुछ देर विश्राम करना उपयुक्त समझा था.

*********

दिया, आकाश और आकार:

दिया ने दोनों लौंड़ों को देखा और फिर आकाश की ओर देखा. पति होने के कारण वो किस छेद में जाना चाहता था इसपर उसका पहला अधिकार था. आकाश भी उसकी इस बात को समझ गया.

“आकार, जिस प्रकार से तुमने आज अपनी भाभी की सेवा की है, उसके लिए मैं तुम्हें उनकी गांड पहले मारने का न्योता देता हूँ. वैसे तुम्हारी क्या इच्छा है?”

“भाई, अपने जैसा कहा है, बस वही मेरी भी इच्छा बन गई है.” आकार ने चतुराई से उत्तर दिया.

दिया: “आप दोनों ही तय करोगे या मुझसे भी कुछ पूछोगे?”

आकाश: “ये तो मैंने सोचा नहीं था. तुम्हारी क्या इच्छा है दिया?”

दिया हंसकर बोली, “जो आपकी है. हालाँकि मुझे इतना कोई भेदभाव नहीं करना है. मैं जानती हूँ कि आप भी मेरी गांड अवश्य ही मारने वाले हैं. बस अपने भाई को पहला स्वाद दे रहे हैं.”

“बिल्कुल, अब ये बेचारा अपनी बीवी के बिना इतने दिनों से कितना तड़प रहा है.” आकाश ने कहा.

दिया: “ऐसा तो नहीं लगता. ऑफिस में तो आज अपनी सेक्रेटरी की गांड मारी ही होगी। है न देवर जी?”

आकार: “और क्या, उसे वापिस काम पर बुलाया तो वो मुझे धन्यवाद करने की इच्छुक थी. मैं भला कैसे मना करता?”

आकाश बिस्तर पर लेट गया, “अब बातें बंद करो, देखो मेरा लंड अब चुदाई के लिए कैसे तड़प रहा है.”

दिया ने उसे देखा और अपने मुंह में लेकर कुछ क्षणों के लिए चूसा और फिर उसके ऊपर चूत रखकर बैठती चली गयी. पूरे लंड को अंदर लेकर उसने कुछ देर उछलकूद की और फिर आगे झुकते हुए अपनी गांड को दोनों हाथों से फैला लिया. आकार के लिए ये खुला निमंत्रण था और वो इस अस्वीकार नहीं करने वाला था. उसने अपने लंड के ऊपर थूक लगाया और उसे सहलाते हुए दिया की गांड के छेद पर लगा दिया. दिया ने उसे मुड़कर देखा और सहमति में सिर हिलाया. आकार ने एक तगड़ा धक्का लगाया और अपने पूरे लंड को दिया की गांड में अंत तक गाड़ दिया. दिया की पीड़ा और आनंद से मिश्रित चीख ने कमरे को थर्रा दिया.

दोनों भाइयों के बीच में दिया इस समय एक गुड़िया ही बनी हुई थी. दिन में हुई चुदाई से उसकी वासना और भड़की हुई थी और इसका ही प्रभाव था कि उसे आज दो दो लौड़े एक साथ लेने का मन था. उसे ये भी पता था कि उसके घर आने के पश्चात् रमोना की भी ऐसी ही घनघोर चुदाई की गई होगी. पर अभी जो लौड़े उसकी चूत और गांड को खंगाल रहे थे वे भी कम नहीं थे. दोनों भाइयों की इस प्रकार की चुदाई का अनुभव उन्हें दिया की हर इच्छा को पूर्ण करने के लिए समर्थ था.

पहले तो आकाश बिना कुछ किये हुए यूँ ही लंड उसकी चूत में पेल कर पड़ा रहा था, पर जब आकार ने उसकी गांड में अपने लंड से लम्बे धक्के लगाने आरम्भ किये तो आकाश ने भी उसमे ताल मिलाकर नीचे से उसकी चूत में भी उसी गति से धक्के दे मारे। दिया अब सातवें आकाश पर थी, उसकी आँखों के सामने तारे नाच रहे थे. उसके दोनों छेद इस समय तीव्र और बलशाली धक्कों की आपदा का सामना कर रहे थे परन्तु इसमें भी वे आनंद का अनुभव कर रहे थे.

धक्कों की बढ़ती शक्ति और गति के आगे दिया अब बेबस थी. उसकी चूत से अवश्य पानी बहा जा रहा था, और गांड में एक पूर्व परिचित सी खुजली भी होने लगी थी. और उसे मिटाने का एक ही उपाय था. गांड की और भीषण चुदाई. और उसने चिल्लाकर आकार को अपनी इच्छा बताई। आकार ने अपनी स्थिति कुछ बदली और वो पीछे के स्थान पर दिया की गांड के ठीक ऊपर आ गया. इस स्थिति में उसके लंड के आघात अब और लम्बे और गहरे हो गए क्योंकि अब लंड के नीचे का हिस्सा निर्विरोध हो गया था.

दिया अब आकाश के सीने से चिपकी हुई थी और आकाश भी अपनी पत्नी की निर्ममता से चूत को चोद रहा था. नीचे से वो इतनी शक्ति के साथ चुदाई कर पा रहा था वो यही दर्शाता था कि वो शारीरिक रूप से कितना सक्षम था. उसके धक्कों की गति बढ़ने का एक कारण और भी था. आकार के नए आसान को लेने के कारण उसके ऊपर से बोझ कम हो गया था और वो अब अपनी कमर को अधिक तेजी से चला पा रहा था. और इसका पूरा आनंद उन दोनों के बीच में सैंडविच के समान फंसी हुई दिया ले रही थी. आकार के लंड से जहां एक ओर उसकी गांड की गहराई नपी जा रही थी, वहीं उसके पति ने उसकी चूत की दुर्दशा करने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

कमरा बंद होने के बाद भी उसकी चीखें बाहर तक सुनी दे रही थीं, परन्तु उन्हें सुनने वाला कोई न था. और सुनता थो भी आश्चर्य ही करता कि ये पीड़ा से उभरी हैं या आनंद से. दोनों भाई अपनी पूरी शक्ति के साथ दिया को चोदते हुए अब कुछ थकने से लगे थे. एक दूसरे के लंड के कारण कसे हुए छेद अब उन्हें अपने गंतव्य की और शीघ्रता से ले जा रहे थे. और जैसा कि होता है, गांड मारने वाला पहले झड़ता है. आकार ने भी अपने स्खलन की घोषणा की और फिर बिना कुछ और कहे उसका शरीर जड़ हो गया. शरीर तो जड़ था पर उसकी कमर अप्राकृतिक रूप से हिल रही थी. और उसके लंड से वीर्य की धार उसकी भाभी दिया की गांड की तंग गली को सींच रही थी.

उसके इस प्रकार से रुकने के कारण आकाश की भी ताल टूट गयी और साथ ही साथ दिया का हिलना भी कुछ असामान्य हो गया. इसी कारण उसके लंड ने भी अपने रस से दिया की चूत के भीतर अपना फौवारा छोड़ा और उसकी अंदरूनी घाटी को ओतप्रोत कर दिया. उसके ठहरते ही दिया उसपर निढाल सी होकर लेट गयी. आकार ने अपना लंड बाहर खींचा और हट गया. दिया आकाश के ऊपर से हटती हुई एक ओर ढुलक गयी. उसका शरीर थका था पर आत्मा तृप्त थी.

कुछ देर बाद उठकर दिया ने दोनों लौंड़ों को चाटकर साफ किया. फिर बाथरूम में जाकर अपनी चूत और गांड को भी अच्छे से स्प्रे के द्वारा अंदर से साफ किया। अपने मुंह को धोकर वो कमरे में लौटी तो आकार ने सबके लिए पेग बना रखे थे. उसके बाद आकाश फिर आकार भी बाथरूम में जाकर साफ सफाई किये और फिर बैठकर अपने पेग पीने लगे.

और अभी रात शेष थी.

क्रमशः
 
छठा घर: दिया और आकाश पटेल

अध्याय ६.३

भाग ६

*********

अब तक:

दो नगरों के चार कमरों में चुदाई की पूरी भूमिका बन चुकी थी.

दिया के घर पर आलोक और कनिका की चुदाई का एक क्रम पूर्ण हो चुका है. वहीं दिया की भी डबल चुदाई एक बार हो चुकी है. देखते हैं उधर उसकी बहन सिया के घर पर क्या चल रहा है, क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता कि इस कहानी में कोई बिना चुदाई के छूट जाये.

पर अब सिया और हितेश, माँ और बेटा एक दूसरे के साथ मिलन के लिए बेचैन हो रहे थे. सिया की कुलबुलाती चूत भी हितेश को संदेश दे रही थी, जो इस अल्प आयु में भी स्त्री के अंगों की सांकेतिक भाषा पढ़ने में निपुण हो चला था.

नीलम समझ गयी कि चंद्रेश और प्रकाश के साथ एक लम्बी रात का आरम्भ हो चुका है.

*******

अब आगे:

*******

सिया का घर:

सिया और हितेश:

सिया की कुलबुलाती चूत भी हितेश को संदेश दे रही थी, जो इस अल्प आयु में भी स्त्री के अंगों की सांकेतिक भाषा पढ़ने में निपुण हो चला था. कुछ समय तक अपनी माँ की चूत को प्रेम से देखने के बाद हितेश ने अपने लंड को पकड़ा और सिया की चूत पर लगाया. सिया ने एक गहरी साँस ली और बिना कुछ बोले अपने होंठों से कहा “डाल दे.”

हितेश वैसे भी अब रुकने वाला तो था नहीं, पर सिया के इस निशब्द संकेत ने उसे अपने लंड को अंदर डालते हुए अनुभव किया. माँ बेटे के आनंद का इस समय कोई पर्याय नहीं था.

अभी लंड का केवल टोपा ही अंदर गया था, पर दोनों एक शांति का अनुभव कर रहे थे. एक अवधि के बाद के मिलाप से दोनों आनंदित थे. हितेश का लंड एक धीमी गति के साथ सिया की चूत को बेधता चला गया. सिया उसे प्रेम भरी दृष्टि से देखती रही और होनी चूत में उसके लंड का आव्हान करती रही. हितेश जब रुका तो उसका लंड उसकी माँ की चूत में पूरा समाया हुआ था.

हितेश रुक गया और दोनों एक दूसरे के गुप्तांगों के स्पंदन का आभास करते रहे. कोई शीघ्रता नहीं थी. न किसी ने आना था, न किसी ने टोकना, न उन्हें कहीं जाना ही था आज की रात. एक दूसरे की आँखों में देखते हुए हितेश का अपनी माँ के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा. वो आगे झुका और उसने सिया के होंठों से अपने होंठ मिला लिए. लंड को चूत में डाले हुए दोनों एक दूसरे को चूमने में व्यस्त हो गए. अचानक ही हितेश ने अपने लंड को बाहर खींचा और सिया के होंठों को चूमते हुए एक लम्बे धक्के के साथ उसे फिर अंदर पेल दिया.

हितेश को सिया के होंठों का कम्पन अपने होंठों पर अनुभूत हुआ. उसने अपनी जीभ को सिया के मुंह में डाला और अब उनका चुंबन माँ बेटे से अधिक प्रेमियों की श्रेणी में स्थापित हो गया. सिया ने भी हितेश की जीभ को चूसते हुए अपनी स्वीकृति दर्शाई. हितेश अब सिया की लम्बे पर धीमे और सधे हुए धक्कों से कर रहा था. सिया ने अपने दोनों मम्मों को अपने हाथों से ही मसलना आरम्भ कर दिया. हितेश दुविधा में पड़ गया. अगर वो अपनी माँ के मम्मों पर ध्यान देता तो अवश्य ही चुंबन तोड़ना पड़ता. वो इतना अनुभवी भी नहीं था कि चुदाई और चुम्बन के साथ सिया के मम्मे मसल सकता.

सिया ने उसकी इस दुविधा को स्वयं ही दूर कर दिया. उसने हितेश के बाएँ हाथ को अपने स्तन पर रखा और अपना हाथ हटाकर उसके सिर पर रख दिया. अब सिया हितेश के सिर को पकड़े थी और उनके होंठ अभी भी जुड़े हुए थे. हितेश दाएँ हाथ के सहारे उसकी चुदाई कर रहा था और बाएँ हाथ से उसके मम्मों को मसल रहा था. पर इस कारण चुदाई की गति क्षीण हो चली थी. कुछ देर तक यही स्थिति बनी रही.

सिया ने ये समझते हुए कि ऐसा आसन अनुपयोगी है, अपना हाथ हितेश के सिर से हटाया और उसे बोली कि मेरे मम्मे निचोड़ दो. हितेश के चेहरे के आनंद को देखकर सिया को भी लगा कि हितेश भी यही चाहता था. हितेश ने अपने दोनों हाथ सिया के मम्मों पर जमाये और उन्हें मसलते हुए अपनी चुदाई की गति तीव्र कर दी. अब सिया को सच्चा सुख मिल रहा था. एक ओर उसकी चूचियों पर आक्रमण हो रहा था वहीं दूसरी ओर उसकी चूत को भी अपने बेटे के लंड का सुख मिल रहा था.

बहुत समय तक हितेश सिया की इसी आसन में चुदाई करता रहा. दोनों को मानो थकान का बोध भी नहीं था. सिया की चूत अब पानी से लबालब हो चुकी थी और हितेश के लंड के अंदर बाहर होने उसे उसकी थापों की ध्वनि भी बदल चुकी थी. हितेश ने आसन बदलने के लिए सिया से आग्रह किया और सिया ने उसकी बात को मानते हुए तुरंत ही घोड़ी का आसन ले किया. हितेश ने पास पड़े अपने अंडरवियर से सिया की चूत को पोंछा और फिर अपने लंड को उसकी चूत में फिर से पेल दिया। चूत पोंछने के कारण कुछ सीमा तक फिर से तंग लग रही थी और हितेश को चुदाई का आनंद फिर से प्राप्त होने लगा.

इस आसन में वैसे भी वो अधिक नियंत्रण में था और उसका लाभ उठाते हुए वो अपने धक्कों को प्रभावशाली रूप से सिया की चूत में मारने में सफल हो रहा था. सिया को भी इस आसन में अधिक आनंद मिल रहा था क्योंकि पिछले आसन में पाँवों को फ़ैलाने से उसे थकान सी हो चली थी. वो रह रह कर पीछे देखती और हितेश से और गहरी चुदाई करने के लिए आग्रह करती. हितेश अपनी गति और धक्कों की लम्बाई को संभावित रूप से बढ़ा रहा था, पर उसकी सीमा अब समाप्त हो चुकी थी. सिया की भी चूत का रस एक बार फिर से उसी तेजी से निकल रहा था और उन दोनों के संसर्ग मार्ग से गिरता हुआ बिस्तर को गीला कर रहा था.

हितेश से अब और रुका न गया और उसने एक चिंघाड़ के साथ सिया की चूत को अपने वीर्य से भर दिया. सिया भी बिस्तर पर लुढ़क गयी और उसके ऊपर ही हितेश भी जा गिरा.

“तुम्हारा हुआ न, मम्मी?’ हितेश ने पूछा.

“मेरा तो पहले ही हो चुका था, वो तो तेरे लिए ही इतनी देर तक टिकी रही, नहीं तो तू फिर मुझे अलग हो जाता.”

हितेश ने सिया की गर्दन को चूमा और फिर उसके साथ ही लेट गया.

“मैं अलग नहीं हूँ, पर पढ़ाई पूरी किये बिना भी अब नहीं आ सकता. बस अब कुछ और महीनों की ही तो बात है, फिर यहीं लौट आयूंगा और पापा का बिज़नेस में हाथ बाटूंगा.” दोनों यूँ ही लेटे हुए बात कर रहे थे.

“हाँ, उन्हें भी अब तेरी आवश्यकता पड़ेगी, अगर तेरे चाचा चले गए तो. अब तक उनका बहुत सहारा था.”

“मैं समझता हूँ, पर मुझे लगता है कि चाचा के जाने और मेरे आने के मध्य अधिक समय नहीं रहेगा. कुछ दिन तक तो पापा को कठिनाई होगी, पर एक बात और भी है जो अपने अब तक नहीं सोची.” हितेश ने मुस्कुराकर कहा.

“क्या नहीं सोचा, बदमाश!”

“यही कि न जाने कितने वर्षों बाद उस अवधि में आप और पापा अकेले रहेंगे. उस समय का सदुपयोग करना. अब तक हम सबके लिए आप दोनों त्याग करते रहे, अब किसी को बीच में मत आने देना.”

सिया सोच में पड़ गयी. ये सच था. हितेश के जन्म के दो वर्ष बाद से वो और चंद्रेश कभी अकेले नहीं रहे थे. चंद्रेश के पिता की मृत्यु के बाद प्रकाश उनके ही पास जो आ गया था. उसने अपने बेटे को देखा.

“सच कह रहा है, तेरी बात से तो लगता है की तेरे चाचा को जल्दी से जल्दी भगा देना चाहिए. और मैं स्वयं इनके काम में साथ दूंगी. कुछ तो कर ही लूँगी.”

“मम्मी, आप बहुत कुछ कर लोगी. सबसे बड़ी बात ये होगी कि पापा को किसी भी समस्या या कठिनाई में उनके सबसे घनिष्ठ मित्र का साथ रहेगा. ये और भी अच्छा होगा.”

“बेटा, सच में तू बहुत बुद्धिमान है. और हम दोनों के लिए इतना चिंतन करता है. तो इसी बात पर अब मेरी गांड को भी थोक डाल. तेरी प्रतीक्षा में बहुत व्याकुल सी हो गयी है.”

“हाँ हाँ जैसे आज चाचा ने नहीं मारी हो. पर सच में मुझे भी इसकी बहुत याद आती है.”

“तो चल फिर पहले इसे चाटकर अपने अनुकूल बना और फिर पेल दे.” सिया ने वही घोड़ी का आसन फिर से ले लिया और अपनी गांड को लहराकर हितेश को आमंत्रित किया.

हितेश ने अपनी माँ की आँखों में मंडराती वासना और प्रेम की छाया देखि और उसके होंठों को चूमकर उठा और सिया की गांड के पीछे आ गया. सिया की गांड दोपहर की चुदाई के कारण अभी भी कुछ खुली हुई थी पर हितेश को इससे कोई अरुचि नहीं हुई. उसने सिया के नितंबों पर अपनी जीभ से वार किया और एक गोलाकार आकृति में उसकी गांड के छल्ले तक पहुंच गया. सिया ने एक आह भरी और हितेश ने अपने हाथों से उसकी गांड को फैलाते हुए अपनी जीभ से उसे छेड़ दिया.

कुछ ही पल में उसकी जीभ सिया की गांड के भीतर थी और सिया की सिसकियाँ तेज हो रही थीं. अपनी माँ की गांड को कुछ समय तक अपनी जीभ से अनुकूल करने के पश्चात् हितेश ने अपने लंड को सहलाया. उसका लंड आने वाले सुख की कामना से तना हुआ था और फिर अपने मुंह से कुछ थूक निकालकर हितेश ने अपने लंड के टोपे पर लगाया. सिया अब उसके लंड की प्रतीक्षा में थी. और हितेश ने उसकी कामना पूरा करते हुए अपने लंड को उसकी मखमल जैसी गांड पर लगा दिया.

“कैसे मरवाना है अपनी गांड मम्मी?”

“जोर से. नहीं तो दोपहर की चुदाई की खुजली मिटेगी नहीं.”

“जैसा आप कहो.”

और इसी के साथ हितेश ने एक शानदार धक्का मारा और उसका लंड सिया की गांड को चीरता हुआ अंदर चला गया. सिया कुलबुलाकर रह गई. और हितेश ने अब उसकी गांड को बिना दया भावना के पूरी शक्ति के साथ छेदना आरम्भ कर दिया. सिया की खुजली का उपचार अब उसका बेटा उसी रूप में कर रहा था जैसा उसकी इच्छा थी.

हितेश की चक्रवाती गति के आगे सिया ने हाथ डाल दिए और वो भी अपनी गांड का सत्यानाश करने में हितेश का साथ देने लगी. अपनी गांड को पीछे उछालते हुए वो अब हितेश के हर धक्के का बराबर उत्तर दे रही थी. हितेश को अपनी माँ की गांड मारने का अवसर बहुत दिनों के बाद मिला था. उसकी इच्छा तो थी कि वो इसे प्रेम पूर्वक चोदे पर दोपहर की चुदाई के कारण सिया की वासना चरम पर थी. हितेश किसी भी आज्ञाकारी पुत्र के समान अपनी माँ की इच्छा के सामने नतमस्तक था और उसकी गांड को सम्पूर्ण मनोबल और शक्ति के साथ चोद रहा था.

सिया की सिसकारियां अब चीखों में परिवर्तित हो चुकी थीं और हितेश को उनसे और भी अधिक प्रोत्साहन मिल रहा था. अपनी अनियमित और प्रचंड गति से उसने सिया की गांड के तार खोल दिए थे. सिया की इस प्रकार से गांड मारते हुए हितेश ने कोई दस मिनट और लिए. और उसके बाद उसके शरीर ने भी उसे उत्तर दे दिया. उसका लंड सिया की गांड में फूलने लगा और सिया भी जान गई कि अब हितेश झड़ने के निकट पहुंच गया है.

“मुझे अपने लंड का रस का स्वाद देना अब. अंदर मत छोड़ देना.”

“ओके, मम्मी.”

हितेश इसके बाद कोई चार मिनट ही और टिक पाया फिर उसने गति तोड़कर अपने लंड को सिया की गांड में से बाहर निकाल लिया. सिया के सामने जब तक पहुंचता, सिया ने एक पलटी ली और फिर सीधी होते हुए बैठ गई. उसके सामने हितेश का सना हुआ लंड नाच रहा था. उसे बिना हाथ से छुए सिया ने जीभ से चाटा और साफ होने के बाद हाथ में लेकर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी.

हितेश का लंड फिर से फूलने पिचकने लगा और फिर उसे अपना लावा सिया के मुंह में छोड़ दिया. एक बार झड़ चुकने के कारण इस बार मात्रा इतनी ही थी कि सिया सरलता से पी सके और उसने पूरा स्वाद लेकर अपने पुत्र के वीर्य को ग्रहण किया. लंड के शांत होने के बाद उसने एक बार उसे चूमा और चाटकर हितेश को प्रेम से देखा.

“बहुत अच्छा किया जो तू घर आ गया. आज पूरी रात अपनी माँ को चोदकर निहाल कर देना.”

“इसमें कोई शंका ही नहीं कि ऐसा ही होगा. अगर कल आप सीधी चल पायीं तो मेरे लिए शर्म की बात होगी.”

“मुझे भी यही आशा है. वैसे नीलम की स्थिति तो और भी बुरी होने के संभावना है. तेरे चाचा आज कुछ अलग मूड में हैं.”

“फिर तो उनकी खैर नहीं.”

दोनों माँ बेटे इस बात पर हंस पड़े और फिर उठकर बाथरूम में चले गए.

क्रमशः
 
Back
Top