• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest कैसे कैसे परिवार

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

"ओ गॉड! ये क्या है?" स्मिता के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे, "क्या है ये?"

स्मिता की आँखों के आगे उसके जीवन का सबसे बड़ा लंड झूल रहा था. मोटा इतना था जितनी कि उसकी कलाई. और लम्बा जितना कि उसकी कोहनी से इसकी कलाई. ये मनुष्य का लंड नहीं था. यही कारण था कि उसे केवल विवाहित महिलाएं ही झेल पाती थीं. कैसे जायेगा वो उसकी चूत में. और गांड, ये सोचते ही स्मिता के शरीर में झुरझुरी सी होने लगी.

"ये, ये, ये तुम्हारा लंड है?"

"आपको क्या लगता है."

"और तुम्हारी प्रिंसिपल इसे अपनी गांड में लेती है?"

"और उसकी माँ, बहन और सास भी."

"क्या? तुमने उसके खानदान की सारी औरतों को चोद दिया है क्या?"

"नहीं, बेटी अभी बाकी है. नहीं, उसे चोदने का कोई प्लान नहीं है. नहीं तो मेरी अन्य ९ रंडियों का क्या होगा."

"रंडी! ये क्या कह रहे हो?"

"अरे मम्मी, जब एक बार आप इस खूंटे से बंध जाओगी न तो रंडी की ही तरह चुदवाओगी मुझ से. अब देर मत करो, लंड चूसो मेरा, आपके पहले छेद का उद्घाटन करना है."

स्मिता ने धीरे से उसका लंड अपने मुंह में डाला और हल्के हलके चूसने लगी. वो ये सोच रही थी कि उनके समुदाय की महिलाएं तो पागल ही हो जाएँगी. फिर उसके मुँह से हंसी निकल गई.

"क्या हुआ?"

"श्रीमती गुप्ता, जो अपने आप को बहुत बड़ी चुड़क्कड़ मानती है और कहती है की ऐसा कोई लंड नहीं बना जो उसकी गांड की गर्मी ठंडी कर सके जब इसे देखेगी तो फट जाएगी हरामजादी की गांड."

"उसकी गांड उस समय देखेंगे. आज आपकी बारी है. पहले अपनी बचा लो फिर दूसरों की सोचना. वैसे सुजाता आंटी की गांड भी मस्त है. परसों के लिए बुक कर दो उन्हें मेरे लिए. परसों में फ्री हूँ ३ बजे के बाद. पर याद रहे उसे कुछ बताना नहीं है."

ये कहते हुए मेहुल ने पहल की और स्मिता के मुंह में अपना लंड डालकर उसका सिर पकड़ा और लंड अंदर तक धकेल दिया. लंड गले में जाकर फंस गया और स्मिता की साँस रुक गई और आँखों में आंसू आ गए. वो सिर हिलाकर छटपटाने लगी. मेहुल ने सिर को छोड़ा और लंड को बाहर खींच लिया पर मुंह से निकला नहीं. स्मिता ने उसे विनती भरी आँखों से देखा.

"जब मैं कह रहा हूँ की चूसो इसे तो इधर उधर की बातें क्यों कर रही हो. अब लगो काम पर और इसकी ठीक से सेवा करो. जब तक मैं न बोलूं, रुकना नहीं."

कहते हुए मेहुल बिस्तर पर पांव चौड़े करके बैठ गया और स्मिता को अपना स्थान लेने का संकेत किया. एक तकिया उठाकर अपने पांवों के बीच डाल दी जिससे स्मिता के घुटने न दुखें. स्मिता ने अपना स्थान ग्रहण किया और ऊपर से नीचे तक लंड को अच्छे से चाटते हुए अपने मुंह में ले लिया और इस बार पूरी तन्मयता से चूसने लगी. हालाँकि मुंह इतना चौड़ा करके चूसने में उसे कठिनाई हो रही थी पर वो मेहुल को अपने प्यार की गहराई से भी अवगत कराना चाहती थी.

मेहुल जानता था कि माँ अधिक देर ये नहीं कर पायेगी अन्यथा उसके जबड़े दुःख जायेंगे. वो उन्हें केवल उन्हें अपना और उनका स्थान दिखाना चाहता था. जो औरतें उससे चुदवाती थीं उन्हें उसके पांवों में झुकना पड़ता था. आज उसकी माँ वहां थी.

"आगे से जब भी हम चुदाई के लिए साथ होंगे तो आपका यही स्थान होगा. फिर मैं आपकी सेवा करूँगा पर पहले आपको मेरे सामने इसी आसन में आना होगा. ठीक है?"

स्मिता ने लंड चूसते हुए सिर हिलाया कि उसे ये स्थिति स्वीकार्य है.

"उठिये अब, मैं नहीं चाहता कि आपको कोई कष्ट हो." मेहुल ने आज्ञा दी.

स्मिता खड़ी हो गई.

"थोड़ा अपने इस सौंदर्य का दर्शन तो कराओ मम्मी. पीछे मुङो और नीचे झुको."

स्मिता ने वैसे ही किया जिससे उसकी गांड मेहुल के मुंह से सामने आ गई. मेहुल ने उसकी कमर पकड़कर धीरे से अपनी ओर खींचा और उसकी गांड में अपना मुंह डाल दिया. स्मिता चिहुंक पड़ी, पर अपने आसन से हटी नहीं.

मेहुल उसकी गांड के चारों ओर अपनी जीभ से चाट रहा था और गांड के छेद के सितारे पर विशेष रूप से ध्यान दे रहा था. स्मिता को गुदगुदी होने लगी तो वो हंस पड़ी. मेहुल ने उसकी ख़ुशी बढ़ने के लिए उसके नितम्ब दोनों हाथों से फैलाये और अपनी जीभ को गांड की गुफा में ढकेल दिया. स्मिता एक झुरझुरी के साथ एकदम से झड़ गई.

"मम्मी, आपकी गांड तो बहुत टाइट है, लगता है किसी अच्छे लंड से इसकी सिकाई नहीं हुई कभी."

स्मिता की अचानक मानो चेतना जाग्रत हुई. वो स्वयं को कोसने लगी कि क्यों उसने तीनों छेदों का नाम लिया. उसे नहीं लगता था कि वो मेहुल का डंडा अपनी गांड में ले पायेगी, चूत तो अम्भ्वतः उसे स्वीकार कर भी ले, पर गांड! ये सोचते ही उसकी गांड फट गई. और अगर गांड में ले भी लिया तो कितने दिन तक उसकी स्थिति थिंक हो पायेगी ये समझना कठिन था.

"अरे मम्मी, घबराओ नहीं, मैंने जितनी आंटियों को चोदा है सब की गांड इतनी ही संकरी थी, कई तो पहली बार गांड में लंड ले रही थीं. पर आज सब उछल उछल कर मुझसे गांड मरवाती हैं. आप मेरा विश्वास करो मैं आपको असीम सुख के सिवा कुछ नहीं दूंगा."

स्मिता ने अपनी सांसे संयत की. मेहुल ने उसकी गांड चाटना बंद करके, उसे सीधे होने के लिए कहा.

"अगर वेसलीन हो, तो ले आईये न प्लीज."

स्मिता गांड मटकाती हुई ड्रेसर से वेसलीन ले आयी. देखा तो मेहुल बिस्तर पर लेट चूका था और दोनों तकिये अपने सिर के नीचे लगा रखे थे.

मेहुल का तना लंड इस समय बहुत ही भयावना लग रहा था.

"पहले अपनी चूत में अच्छे से वेसलीन लगा लीजिये और फिर मेरे लंड पर भी. मैं नीचे रहूँगा, जिससे आप अपनी सुविधा के अनुसार जितना संभव हो उतना लंड डाल पाएं. अपने अनुमान से चुदवाइये अपनी चूत।"

स्मिता ने चैन की साँस ली, कि चलो अपने तरीके से ही लेगी. इतने में मेहुल ने उसे झटका दिया.

"पर गांड मैं अपने ढंग से मारूंगा।"

स्मिता की फिर गांड फट गई. पर ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना सोचते हुए अपने मन को मनाया. स्मिता बिस्तर पर बैठी और अपने पांव चौड़े करते हुए अपनी चूत में वेसलीन लगाने लगी. जब उसे लगा की उसकी चूत अच्छी चिकनी हो गई है, तो उसने मेहुल के लंड को पकड़ा और उसके टोपे पर एक चुम्मा लिया. फिर वेसलीन लगाकर उसे भी बिल्कुल चिकना कर दिया.

"आइये अब सवारी कीजिये. आपका घोड़ा तैयार है."

**********
 
बैठक में:

इस समय सब परिवार वाले एक गूढ़ चिंतन में डूबे थे. २ घंटे से ऊपर हो चुके थे. रात का लगभग १ बजने को था, पर स्मिता की ओर से कोई सन्देश नहीं आया था.

"कहीं मम्मी और मेहुल सो तो नहीं गए. जाकर देखूं?" महक ने पूछा.

"नहीं, नियम यही है कि मैसेज के पहले कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया नहीं की जाएगी. अगर मेहुल बाहर नहीं गया है तो स्थिति तनावपूर्ण अवश्य है, पर नियंत्रण में है. मुझे स्मिता पर पूरा विश्वास है. वो मेहुल को सांचे में ढाल लेगी. पर हमें अपनी निगरानी हटानी नहीं है." विक्रम ने मना करते हुए स्पष्ट किया.

"ठीक है पापा."

और सब बैचेनी से प्रतीक्षा में लगे रहे.

**********

स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

स्मिता ने बिस्तर पर चढ़ते हुए मेहुल के दोनों ओर पाँव किये, अपनी चूत के छेद पर मेहुल के लंड को लगाया और बहुत धीरे धीरे से उस पर उतरने लगी. लगभग ६-७ इंच लेने के बाद वो रुक गई और आगे झुककर मेहुल को चूमने लगी. मेहुल ने भी उसका भरपूर साथ दिया और उसके मम्मे मसलने लगा. स्मिता इस समय बहुत आनंदित थी और इतनी लम्बाई के लंड कई बार ले चुकी थी. पर चौड़ाई थी जो उसे आगे बढ़ने से रोक रही थी. इस समय उसे अपनी चूत पूरी तरह से पैक लग रही थी, मानो हवा तक जाने का स्थान न हो.

उसने धीरे धीरे उठक बैठक शुरू की, वेसलीन लगी होने से वो बहुत हो आसानी से चुदवा रही थी. इसी उपक्रम में उसने अपनी गति बढ़ा दी, चौड़ी हुई चूत अब और लंड की मांग करने लगी. वो लंड पर शायद एक दो इंच और उतरी होगी कि उसके ऐसे स्थान पर पंहुचा जहाँ आज तक कोई बिरला ही जा पाया था. इसी गहराई पर उसने अपनी चूत को रोक लिया और अपनी गति बढ़ाते हुए चुदवाने लगी.

"ओह, माँ, क्या लंड है तेरा मादरचोद. पूरी सिलाई खोल दी मेरी चूत की." वो बड़बड़ा रही थी.

उसकी चूत अब दनादन पानी की धार छोड़ रही थी जो मेहुल की जांघों को तर बतर कर रही थीं. वो इस समय वासना के ऐसे उन्माद में थी की उसे किसी भी और चीज़ का भान नहीं था. उसके सारी इन्द्रियाँ एक ही स्थान पर केंद्रित थीं और वो थी उसकी चूत। यही कारण था की जब मेहुल ने अपने दोनों हाथ उसकी कमर में डालकर मुट्ठी बंधी तो उसे इसका अर्थ न समझ पायी. मेहुल ने धीरे धीरे अपने बंधे हुए हाथ उसकी कमर के बिल्कुल नीचे के हिस्से पर ले जाकर रोक दिए.

हल्की हल्की चुम्मियाँ लेते हुए मेहुल ने बड़े प्यार से पूछा," मम्मी, मज़ा आ रहा है?"

"हूँ. बहुत. बहुत मजा आ रहा है. तेरा लंड वाकई में बहुत शानदार है."

"पर अभी तो आधा ही खाई हो, फिर भी इतना मजा आ रहा है."

"मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है , बस मुझे चोदने दे."

"हम्म्म, मम्मी."

"ह्म्म्मम्म"

"पर मैंने आपको पूरा सुख देने का वचन दिया था, है न?"

"हाँ दे तो रहा है. और कितना देगा." अचानक स्मिता के दिमाग की बत्ती जल उठी. कहीं ये सारा तो नहीं जड़ देगा मेरी चूत में., वो हटने का प्रयास करने लगी. पर मेहुल ने उसे अपने बाहुपाश में जकड रखा था.

"मम्मी, मैं हमेशा अपना वचन पूरा करता हूँ."

ये कहकर आधी ऊपर उठी स्मिता को जोर से अपने लंड की ओर खींचा और साथ ही अपनी कमर को बहुत तेजी के साथ ऊपर की ओर उठाते हुए एक जोरदार धक्का मारा. मेहुल का पूरा लंड अब स्मिता की चूत में जड़ तक समा गया था. स्मिता ऐसे आघात से एकदम सन्न हो गई. उसे लग रहा था जैसे किसी ने उसको चाकू से चीर दिया हो. उसकी आँखों से आंसू झरने लगे.

मेहुल स्मिता को उसी स्थिति में पकड़कर उसके बहते हुए आंसू चूम चूम कर पीने लगा. हल्के हल्के चुम्बन भी ले रहा था. एक हाथ से वो स्मिता की पीठ सहला रहा था. कुछ देर इसी तरह रहने पर स्मिता को थोड़ा आराम लगा तो वो रोने लगी. मेहुल ने उसके होंठ चूमते हुए कहा.

"मम्मी, एक बात बताओ."

"पूछ"

"जब बैंड ऐड की पट्टी निकालते है तो धीरे धीरे निकालने में अधिक दर्द होता या एक बार में निकालने में?"

"एक बार में निकालने में दर्द ज्यादा होता है पर ठीक भी जल्दी होता है."

"अब समझीं मैंने ऐसा क्यों किया. अपने आप कभी भी पूरा लंड नहीं लेतीं और जो अब आनंद मिलने वाला है उससे वंचित रह जातीं. मुझे क्षमा करना आपको इस तरह से छलना पड़ा. " मेहुल ताबड़तोड़ चुम्बन जड़ते हुए बोला।

"तू बहुत दुष्ट है. अब?"

"अब मैं आपको नीचे करूँगा और आपकी सही तरह से चुदाई करूँगा, जो आपका अधिकार है." ये कहकर मेहुल ने स्मिता की कमर पकड़कर एक करवट ली और स्मिता उसके नीचे आ गई. इस पूरे उपक्रम में मेहुल के लंड ने अपना स्थान नहीं छोड़ा.

मेहुल ने अब हलके और सधे हुए धक्कों से स्मिता की चुदाई शुरू की. अपने बाएं अगूंठे से वो रह रह कर भग्नाशे को कभी सहलाता, कभी रगड़ता और कभी उँगलियों में लेकर दबा देता. पर उसके इस प्रयास में कोई क्रम नहीं थे. स्मिता को अब वो आनंद आ रहा था जिससे वो इस जीवन में अछूती थी और ये सुख कोई और नहीं उसका सबसे लाडला बेटा ही उसे दे रहा था.

मेहुल ने भी अब गति पकड़ ली थी पर अभी भी वो पूरी लम्बाई का प्रगोग नहीं कर रहा था. उसकी चौड़ाई ही इतना घर्षण पैदा कर रही थी कि स्मिता कि चूत पानी पानी हो रही थी. अब कमरे में फच फच की ध्वनि गूंज रही थी.

"और चोद मुझे, और!" स्मिता ने मेहुल का उत्साह बढ़ाते हुए कहा. मेहुल ने भी अब समझ लिया कि उसकी माँ पूरे लंड के लिए तैयार है. उसने अब अपने धक्के पूरे गहरे और लम्बे कर दिये। बिस्तर कराह रहा था और स्मिता की चूत रो रो कर बेहाल थी. इतना पानी उसने छोड़ा था आज की पूरी बाल्टी भर जाती और अभी भी खेल समाप्त नहीं हुआ था. मेहुल के धक्के स्मिता की बच्चेदानी को हिला दे रहे थे. जिस रास्ते वो निकला था आज वहीँ उसने अपना झंडा गाढ़ दिया था.

"बेटा, अब बस कर. मेरी चूत फट गई है. इतना झड़ी हूँ कि कुछ बचा नहीं. अपने पानी से सींच दे मेरी चूत।"

मेहुल भी अब अधिक दूर नहीं था. उसने अपनी गति में परिवर्तन करते हुए कभी गहरे तो कभी तेज, कभी हलके तो कभी कभी रूककर धक्कों की झड़ी लगा दी. अपने निकट आते हुए उत्सर्ग से भी अंकुश हटा दिया. बस फिर क्या था स्मिता की चूत में तो जैसे एक बाढ़ सी आ गयी. उसका अपना पानी जब मेहुल के रस से मिला तो पूरा बिस्तर गीला हो गया. मेहुल ने पूरा झड़ने के बाद अपना लंड बाहर निकाला स्मिता की चुम्मियाँ लेता हुआ उसकी बगल में लेट गया.

दोनों हांफ रहे थे. फिर एक दूसरे की ओर मुड़कर एक लम्बा चुम्बन लिया.

"कैसा रहा." मेहुल ने पूछा.

"अद्वितीय. परम सुख मिला है आज. तूने सीखा कहाँ से ये सब?"

"बताया न, मुझे बहुत अच्छी शिक्षिकाएँ मिलीं. जो इस कला में बहुत निपुण हैं. उन्होनें बहुत कुछ सिखाया कि किसी स्त्री को कैसे सुख देते हैं."

"पर तू जो जबरदस्ती कर गया, वो."

"उनका कहना है की स्त्री सदैव हर क्रीड़ा के लिए मानती नहीं है, कभी कभी मनाने की असफल चेष्टा से कर लेना सही रहता है."

"क्या मैं पास हो गया?"

मेहुल का मुंह चूमते हुए स्मिता बोली, "एकदम टॉप."

"कुछ पियोगी?"

"हाँ बना दे एक पेग. टाइम क्या हुआ है?"

"१ बजे हैं."

"क्या. अरे मेरा फोन दे और पेग बना कर ला."

स्मिता ने विक्रम को मेसेज किया, "मिशन सफल,"

तब तक मेहुल पेग ले आया और दोनों माँ बेटे नंगे ही चुस्कियां लेने लगे.

**********

बैठक में:

"मिशन सफल,"विक्रम ने अपने फोन पर मेसेज पढ़ा. और सबको बता दिया. सबके मन में आनंद और सफलता की एक लहर दौड़ गई. और सब उठ के एक दूसरे के गले मिले और फिर अपने अपने कमरों में चले गए.

**********
 
स्मिता का शयनकक्ष: स्मिता और मेहुल

जब दोनों ने दो पेग लगा लिए तो मेहुल ने चिहुल की, "मम्मी, अब आओ, आपके तीसरे छेद का वचन भी पूरा कर देता हूँ." उसे पता था कि आज उसकी माँ किसी भी स्थिति में अपनी गांड नहीं मरवाने वालीं. स्मिता के हाथ पांव कांपने लगे.

वो विनती करने लगी, "बेटा, आज तू बस चूत ही से संतुष्ट हो ले."

मेहुल भी अपनी माँ को अधिक नहीं सताना चाहता था. हाँ अगर वो उसके परिवार की न होकर कोई और होती तो वो बिना गांड फाड़े छोड़ता नहीं.

"ठीक है मम्मी. पर कब."

स्मिता ने कुछ सोचा फिर बोली, "एक आइडिया है. परसों तू सुजाता और मुझे एक ही साथ क्यों नहीं चोदता। मेरी गांड भी तभी मार लेना और सुजाता की भी."

"हम्म आइडिया बुरा नहीं है. परन्तु मुझे स्वीकार नहीं है. मैं सुजाता आंटी को एक बार अकेले में ही चोदना चाहता हूँ. वे भी मुझे मूर्ख समझती हैं और आपको भी अधिक आदर नहीं देतीं. इसके बारे में कुछ करना होगा”, मेहुल के चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान थी, “तब तक अपने २-३ राउंड हो जाएँ"

"क्यों नहीं।" ये कहते हुए दोनों माँ बेटे फिर से एक दूसरे के आलिंगन में खो गए.

अभी पूरी रात जो शेष थी.

क्रमशः

...................................
 
प्रस्तावना

एक बड़े शहर में एक सुंदर कॉलोनी थी. मात्र ८ घर ही घर थे इस कॉलोनी में. इनके स्वामी अधिकतर या तो व्यवसाई थे या ऊँचे पद पर काम करने वाले प्रतिष्ठित व्यक्ति. पुरुषों की एक मित्र मंडली थी, और महिलाओं की किटी. आठों भवन दो पंक्तियों में थे. एक ओर इन्होने एक जिम, स्पोर्ट्स हाल और स्विमिंग पूल बनवाया था, और दूसरी ओर एक दो मंज़िला भवन जिसमे लगभग ४०० लोगों की पार्टी आराम से हो सकती थी. इसमें ही एक किचॅन था. पहले रेस्तराँ खोलने का प्लान था पर इतने कम लोगों के लिए उसका कोई औचित्य नहीं था. परन्तु किटी पार्टीस और जेंट्स पार्टीस यहीं होती थीं. हालाँकि सब अच्छे दोस्त थे पर एक दूसरे के जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं करता था. ये पार्टीस ही थीं जिनमें कुछ बातें सामने आती थीं. पर कभी भी इस कमरे से बाहर किसी ने इसको दोबारा नहीं बोला.

६ लोग इन दोनों की प्रबंधन के लिए रखे थे, और एक सेक्यूरिटी एजेन्सी पहरेदारी के लिए.

अब क्योंकि इस कॉलोनी का कोई नाम भी होना चाहिए, तो हम इसे "संभ्रांत नगर" से बुला लेंगे. ये अलग बात है कि पर्दे के पीछे झाँकने पर कुछ और ही मिलेगा.

हम अब हर घर का लेखा जोखा लेंगे और देखेंगे की उन घरों में कब कब क्या क्या खेल खेले जाते हैं.

अध्याय १ पहला घर: अदिति और अजीत बजाज १

इस घर में वैसे तो चार ही लोग रहते हैं, पर कुछ महीनों से अजीत की माँ शालिनी बजाज भी यहीं आ गई थीं. अपने पति के देहांत के बाद तीन साल तो उन्होंने काट लिए, पर अजीत की बहुत ज़िद के कारण उन्होंने अपना घर बेचकर यहीं रहना शुरू कर दिया था. अब लगभग साल भर निकालने के बाद वो अपने निर्णय से बहुत संतुष्ट थीं. न सिर्फ़ अदिति उनका अत्यधिक आदर सम्मान करती थी, बल्कि बच्चों के साथ रहने से उनका अकेलापन भी अब उन्हें सताता नहीं था. अजीत तो दिन में हमेशा बाहर ही रहता था, पर दोनों सास बहू की खूब पटती थी.

अदिति के बेटी अनन्या और बेटा गौतम भी अपनी दादी का बहुत ध्यान रखते थे. दोनों में बस १.५ साल का अंतर था और कॉलेज में थे. गौतम अनन्या से बड़ा था.

कुछ ही दिन पहले अदिति का एक ऑपरेशन हुआ था जिससे उसको शारीरिक संबंध बनाने की ३ महीने की मनाही थी. अजीत उसे पहले हफ्ते में लगभग तीन से चार दिन चोदता था, पर इस ऑपरेशन ने उस पर अंकुश लगा दिया था. अदिति और गौतम कई बार अपने दोस्तों के घर रुक जाते थे, उनके भी दोस्त ऐसा ही करते थे. सप्ताह में एक दिन तो वो बाहर ही रहते थे. आज भी वो अपने दोस्तों के साथ बाहर थे.

आज शाम को अजीत अपने कार्यालय से घर पहुँचा और मुंह हाथ धोकर अदिति के साथ सोफे पर बैठ गया. अदिति ने उसे उसकी मनपसंद ड्रिंक हाथ में थमाई और एक अपने लिए भी ले ली. तभी किचन से शालिनी भी अपनी ड्रिंक के साथ आ गई. इस प्रकार से एक साथ मदिरा सेवन सामान्य घटना थी. तीनों पूरे दिन में घटित घटनाओं की बातें करने लगे. ड्रिंक्स का एक और राउंड होने के बाद सब खाने के लिए बैठ गये. अजीत को इस सबमें कुछ योजना दिख रही थी. पर वो शांत रहा और उचित समय की प्रतीक्षा करने लगा. खाने के बाद अदिति ने एक और ड्रिंक की बात की तो अजीत चौंक गया. पर उसने हामी भारी और जाकर सोफे पर बैठ गया. तीनों फिर अपनी ड्रिंक्स की चुस्कियाँ लेने लगे.

"हनी, मेरे ऑपरेशन के समय से अपने बहुत धैर्य रखा है." ये कहते हुए उसने अजीत के हाथ में एक गोली थमा दी. गोली देखते ही अजीत सकपका गया.

"पर तुम्हें तो अभी २ महीने तक कुछ भी नहीं करना है." अजीत ने अदिति की ओर देखकर कहा. वो अपनी माँ को भी कनखियों से देख रहा था क्योंकि ये पति और पत्नी के बीच का संवाद था जिसे अदिति उसकी माँ के सामने ही उदित कर रही थी.

"वो तो है. पर मैं चाहती हूँ कि अब मैं भी तुम्हारी और शालिनी की प्रेम कहानी में भागीदार बन जाऊं."

अजीत का दिमाग़ चक्कर खाने लगा. उसकी पत्नी उसकी माँ को नाम से पुकार रही थी. न सिर्फ़ इतना बल्कि उसे संभवतः उन दोनों के बारे में पता था. अजीत ने अपनी माँ को ओर नज़र डाली तो वो मुस्कुरा रही थी.

"मैं तुम्हें हमेशा कहती हूँ कि मुझे इस घर में बहुत प्यार मिला है." शालिनी उठकर अदिति के पास बैठ गई और उसके होंठ चूम लिए. "अदिति को अपने बारे में मैने ही बताया, पर शायद तुम्हें हम दोनों के बारे में कुछ नहीं पता." शालिनी ने फिर से अदिति को चूमते हुए कहा.

"मैने तुम्हारे लिए एक अविस्मरणीय रात्रि शाम का प्रबंध किया है."

इस बार अजीत का ध्यान अपनी माँ की ओर गया, अभी तक उसने ध्यान नहीं दिया थे पर वो इस समय बहुत सुंदर लग रही थी. वो अपने शरीर का बहुत ध्यान रखती थी और इस आयु में भी लोगों को आकर्षित कर सकती थी. अजीत के दिमाग़ पर छाई धुन्ध छटने लगी और उसे योजना का अनुमान होने लगा. उसने बेध्यानी में अपने हाथ की गोली तो एक सिप के साथ खा लिया.

अब ऐसा नहीं था की अजीत इन तीन हफ्तों में सेक्स से वंचित रहा था. वो हफ्ते दो बार तो अपनी सेक्रेटरी को चोद लेता था. इसका लाइसेन्स उसे अदिति ने ही दिया था. दरअसल दोनों काफ़ी खुले विचारों के थे. जब वो कहीं बाहर जाता तो उसे और अदिति के बाहर जाने पर अदिति को कुछ सीमा तक दूसरों को चोदने की छूट थी. पर वो ऐसा कम ही करते थे. वो सोचता था कि अपनी माँ के साथ संबंधों का अदिति को भी पता नहीं था.

"बेडरूम में चलें?" अदिति ने अचंभित अजीत का हाथ पकडकर उसे उठाया और अपनी सास को साथ आने का इशारा किया.

बिस्तर के पास पहुँचकर अदिति ने उसे जोरदार चुंबन दिया और उसे बिस्तर पर धकेल दिया.

"माँ जी, आइए." अदिति बोली.

उन दोनों ने मिलकर कुछ ही क्षणों में अजीत को नंगा कर दिया. अजीत का शरीर काफ़ी गठा हुआ था. जो गोली उसने खाई थी उसके असर से उसका लंड भी बुरी तरह से तना हुआ था. अदिति घुटनों के बल बैठ गई और उसने अजीत का लंड अपने मुँह में भर लिया और पूरे ज़ोर शोर से चूसने लगी. अजीत ने कनखियों से देखा तो उसकी माँ अपने कपड़े उतार रही थी और जल्दी ही वो भी नंगी हो गई. उसने अजीत के चेहरे की ओर आकर अजीत के मुँह पर अपनी पसीजी हुई चूत को रख दिया. अजीत उसकी चूत को चूसने लगा. जल्दी ही उसने अपनी जीभ अंदर डाल दी और घुमाने लगा. नीचे अदिति उसके लंड को चूस रही थी और ऊपर वो शालिनी की चूत.

"माँ जी, आपका बेटा तैयार है सवारी के लिए. चढ जाइए."

"और तुम?"

"मुझे ज़्यादा तनाव नहीं लेना है. मैं आपकी जगह ले लेती हूँ."

ये कहते हुए, अदिति ऊपर आ गई और शालिनी ने अजीत का भारी मोटा लंड अपने हाथ में लिया. २ मिनट के लिए चूसा और फिर दोनों ओर पाँव फैलाकर अपनी रसीली चूत को उस पर उतार दिया. अदिति ने थोड़ा संभाल कर अपनी चूत को अजीत के मुँह पर रखा, अजीत की जीभ फिर हरकत में आ गई. पर अदिति के लिए इसमे थोड़ी मुश्किल हो रही थी. सो वो हट गई और एक तरफ बैठकर अपनी चूत को सहलाने लगी. अजीत को देखकर अच्छा नहीं लगा.

अदिति ने थोड़ा संभाल कर अपनी चूत को अजीत के मुँह पर रखा, अजीत की जीभ फिर हरकत में आ गई. पर अदिति के लिए इसमे थोड़ी मुश्किल हो रही थी. सो वो हट गई और एक तरफ बैठकर अपनी चूत को सहलाने लगी. अजीत को देखकर अच्छा नहीं लगा.

उसने जानने के लिए पूछा, "तो तुम दोनों का क्या रहस्य है."

"हम दिन में एक दूसरे को सुख देते हैं." माँ ने बड़े नपे तुले शब्दों में कहा. अजीत को हँसी आ गई.

"अपने बेटे से यहाँ नंगी होकर अपनी बहू के सामने चुदवा रही हो और बातें ऐसी जैसे कोई सती सावित्री हो. कोई बात नहीं मैं समझ गया."

"अदिति, आओ तुम यहाँ लेट जाओ और माँ को तुम्हें सुख देने दो और मैं उन्हें घोडी बनाकर सुख दूँगा" अजीत ने व्यंग्य से कहा.

अदिति और शालिनी की हँसी छूट गई. पर शालिनी हट गई और उसने अदिति को बिस्तर पर लिटा दिया. खुद घोड़ी बनकर, अदिति की चूत में अपना मुँह घुसा दिया. पीछे से अजीत ने उसकी चूत में लंड पेल दिया.

"ओह, माँ ! तुम्हारी चूत की अब भी कोई तुलना नहीं है ." अजीत ज़ोरदार धक्के लगता हुआ बोला.

शालिनी भी पूरी मस्ती से इस तबाड़तोड़ चुदाई का आनंद ले रही थी. उसका मुँह उसकी बहू के चूत में था और अपनी जीभ पूरी अंदर कर रखी थी. अदिति भी इस समय एक अलग ही लोक में थी. अजीत ने ये दृश्य कभी सपने में भी नहीं सोचा था.उसने अपने धक्कों की गति तेज़ कर दी.

"अओऊउघह" अजीत की आँखों के आगे तारे से नाचने लगे. उसे अपने लंड में एक जबरदस्त फुलाव महसूस हुआ. वो झडने लगा था और उसने अपनी माँ की चूत में अपना रस भर दिया. ये दुनिया का संभवतः सबसे नीच काम था पर वो तीनों अपने वासना में ऐसे रंगे हुए थे कि इस सुख के आगे उन्हें कुछ न दिख रहा था. तभी अदिति और शालिनी का भी पानी छूट गया. शालिनी बेझिझक अपनी बहू का स्वादिष्ट रस पी गई. अदिति भी इस समय निढाल सी हो गई.

"अपने पति और मेरे रस का एक साथ स्वाद लोगी?" शालिनी ने अदिति की चूत पर एक चुंबन लेते हुए पूछा.

अदिति की आँखों में एक चमक आ गई.

"क्यों नहीं"

"तुम लेटी रहो, मैं तुम्हारे मुँह में सीधे परोसती हूँ." ये कहकर उसने अजीत को हटने को कहा और अपने दोनों पाँव अदिति के सिर के पास रखकर अपनी चूत को उसके मुँह से लगा दिया.

अदिति सडप सडप कर शालिनी की चूत से बहता हुआ रस गटक गई. तीनों एक संतुष्टि का अहसास करते हुए एक दूसरे से लिपट गए.

"आई लव यू" तीनों के मुँह से एक साथ निकला.

तीनों हँसते हुए आगे आने वाले नये रोमांच के बारे में सोचते हुए सो गये.
 
कुछ दिनों बाद:

रात के १ बजे अदिति की नींद खुली तो उसने देखा की वो अकेली है. वो बाथरूम गई, और लौट कर बिस्तर पर आकर लुढ़क गई. दोबारा नींद लगने से पहले उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट आयी ये सोचकर कि अजीत शायद शालिनी के कमरे में चला गया होगा. माँ बेटे का दिल नहीं भरा होगा और वो उसकी नींद न टूटे इस कारण दूसरे कमरे में चले गए होंगे.

शालिनी के कमरे में वही चल रहा था जैसी अदिति ने कल्पना की थी. अजीत लेटा हुआ था और उसकी माँ उसके ऊपर चढ़कर उसका लंड चूस रही थी. इस समय शालिनी की चूत अजीत के मुंह पर सटी थी जिसे वो बहुत प्यार और जोश से चाट रहा था. शालिनी को अपनी चूत चटवाने और चुसवाने में बहुत आनंद आता था. जब उसके पति जीवित थे तो वो घंटों उसकी चूत में छुपे रहते थे. उसके इसी प्रेम के कारण शालिनी अब मौखिक सहवास की इतनी आदी हो गई थी कि उसका दिन बिना इस क्रीड़ा के निकलता ही नहीं था. जब अजीत लगभग २० वर्ष का था तो एक बार शालिनी ने उसे कमरे में झांककर अपने पिता के इस कार्य में रत देख लिया था. शालिनी ने तब ये निश्चय किया था कि वो अजीत को वो सब गुर सिखाएगी जिससे वो किसी भी स्त्री को हर प्रकार से संतुष्ट कर सके.

और एक दिन जब उसके पति टूर पर बाहर थे उसने अवसर देखकर अजीत को ये प्रशिक्षण देने का प्रण किया था.

और उस रात शालिनी ने अजीत को रात भर चूत चाटने का प्रशिक्षण दिया. पर उसने अजीत के लंड को छुआ तक नहीं. अगले दिन अजीत की हालत ख़राब थी, एक तो रात भर का परिश्रम और उस पर उसे कोई झड़ने का समय जो नहीं मिला. उसने एक दो बार मुठ मारी और खाना खाने के बाद सो गया. रात में फिर शालिनी के उसे अपने कमरे में बुला लिया और इस बार माँ बेटे ने एक दूसरे की चूत और लंड चाटे और चूसे. और तीसरी रात में शालिनी ने उसे अपनी चूत में प्रवेश दिया. जवान लड़का रात में ५ बार अपनी माँ को चोदकर सोया था. अगले दिन ही शालिनी के पिता वापिस आने वाले थे और इस रात शालिनी ने उसे गांड चाटना सिखाया और अंततः प्रशिक्षण की अंतिम सीढ़ी पार कराते हुए उसके लंड को अपनी गांड की यात्रा भी करा दी.

अपने पति के आने के बाद अब अजीत और शालिनी जब समय मिलता तब इस नैसर्गिक सुख में लिप्त हो जाते थे. ४ साल बाद अजीत का विवाह अदिति से हो गया और इस सम्बन्ध पर विराम लग गया. अजीत अब कभी कभार ही अकेला आ पाता था. लगभग २० साल इसी तरह निकल गए और शालिनी के पति का स्वर्गवास हो गया. शालिनी अब इस अकेलेपन में बहुत दुखी रहने लगी थी. अजीत और अदिति से जब बात होती तो वो उसके इस दर्द को समझ लेते थे. एक दिन अदिति गयी और जिद करके शालिनी को अपने साथ ले आई। २ महीने निकलने के बाद अंततः शालिनी ने यहीं रहने का निर्णय लिया. इस दो महीनों में माँ बेटे के सम्बन्ध दोबारा स्थापित हो चुके थे. अजीत ने शालिनी का घर बेचकर उसके खाते में जमा कर दिए. अब शालिनी के पास धन और परिवार दोनों थे. उसका मन और तन दोनों खिल गए. चढ़ता हुआ बुढ़ापा जैसे लौटने लगा था.

इसी बीच शालिनी ने राधा को अपना हमराज बनाया और राधा से सुबह सुबह अपनी चूत और गांड चटवा कर संतुष्ट हो जाती. पर इसकी भनक अदिति को लग गई क्योंकि जब एक दिन राधा शालिनी के कमरे से बाहर निकली तो अदिति ने उसे किसी काम के लिए बुलाया. उसके मुंह और उँगलियों से चूत की सुगंध आते ही वो सब समझ गई. अदिति ने अपनी सास के पास जाकर उनसे पूछा तो शालिनी घबरा गई, की वो अब कहाँ जाएगी.

"माँ जी, आपको चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है. पर क्या आप चूत केवल अपनी ही चटवाती हो या दूसरे की भी चाटती हो."

शालिनी ने माना की उसने अभी तक कभी चूत चाटी नहीं है.

"ठीक है, माँ जी. वो अब मैं आपको सिखाऊंगी." कहकर अदिति ने अपने कपडे उतारे और पांव फैलाकर शालिनी को बुलाकर काम पर लगने को कहा.

"माँ जी आप जैसे चटवाती हो, बस वैसे ही करो."

उस दिन से शालिनी के जीवन में और बहार आ गई. सुबह राधा, दोपहर अदिति, और अवसर के अनुरूप अजीत उसके शरीर की प्यास बुझाने लगे. जब अदिति का ऑपरेशन हुआ तो शालिनी ने अजीत को आराम देने के लिए अपना शरीर प्रस्तुत कर दिया. इसमें अदिति की सहमति थी हालाँकि अजीत को इसका ज्ञान नहीं था. वो हफ्ते में २ बार अपनी सेक्रेटरी को चोद लेता था, पर अपनी माँ को वो कभी भी मना नहीं कर पाया.

यही वो समय है जहाँ हम इस परिवार से मिले थे.

घर के सर्वेंट क्वार्टर में इस समय राधा अपने पति गोकुल का लंड चूस रही थी. गोकुल बिस्तर पर लेटा हुआ था और राधा के मुंह का आनंद ले रहा था.

गोकुल ने राधा से पूछा, "बड़ी मालकिन ने क्यों बुलाया था आज तुझे?"

"जिस काम के लिए हमेशा बुलाती है."

ये सुनते ही गोकुल के लंड में तनाव और बढ़ गया.

"पर बुलाती क्यों हैं तुझे ? और वहां से लौटकर तू मुझसे चुदने के लिए बहुत अधीर रहती है."

राधा ने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया और गोकुल की नाक से लगाया. गोकुल ने बिना कुछ जाने एक गहरी साँस ली तो उसकी नाक में चूत की खुशबू भर गयी."

"तू अपनी चूत मुझे क्यों सुंघा रही है?"

"इतने साल में तुझे क्या मेरी चूत की खुशबू भी नहीं पता?"

गोकुल ने फिर सूंघा तो ये गंध राधा की चूत से अलग थी.

"तू बड़ी मालकिन की चूत चोद कर आयी है क्या."

"हाँ, मेरे राजा. बेचारी इस उम्र में भी बहुत प्यासी है. सुबह इसीलिए बुलाती है जिससे उसे एक दो बार झड़ा देती हूँ तो उनका दिन अच्छा निकलता है. पर उनकी चूत चूसने में मजा बहुत आता है."

"तुझे तो लंड हो या चूत कुछ भी चुसवा लो, मजा ही आता है."

"सच कहा, पर आज का उनका स्वाद अलग था."

"कैसे?"

"उसमे मर्द के पानी का भी स्वाद था. लगता है रात में चुदवाई है किसी से."

"पर घर में तो कोई दूसरा आदमी आया नहीं. फिर?"

"घर वाला ही कोई रहा होगा." राधा अर्थपूर्ण ढंग में बोली.

"घर वाला ?" अचानक गोकुल के पसीने छूट गए. "सुन ये किसी से कहना नहीं. हमारी नौकरी खतरे में आ जाएगी."

"मुझे पता है. अब तेरा लंड तैयार है. पेल दे मेरी चूत में."

ये कहकर राधा पांव फैलाकर लेट गयी और गोकुल उसे चोदने में व्यस्त हो गया.

************
 
शालिनी, अदिति और अजीत इस बात से अनिभिज्ञ थे की कल रात का खेल गौतम ने देख लिया था. रात में जब बीच में उसकी नींद खुली तो उसने पाया कि उसके कमरे में पीने का पानी नहीं है. जब उसने किचन में जाने के लिए कमरे का दरवाजा खोला ही था कि उसने पापा और दादी को दादी के कमरे में घुसते हुए देखा. पर सबसे बड़े अचरज की बात ये थी कि दोनों ने अपने कपडे पहने नहीं थे बल्कि हाथ में लिए हुए थे. अपनी दादी की मटकती गांड देखकर गौतम के लंड में तनाव आ गया. वो पानी के लिए किचन में गया और एक बोतल भर कर ले आया.

पूरे समय उसके दिमाग में यही घूम रहा था कि चक्कर क्या है. उसे कुछ बातें तो समझ आ रही थी.

१. पापा और दादी के सम्बन्ध उतने पवित्र नहीं जैसे दिखते हैं.

२. उसकी माँ को या तो पता है या वो भी इसमें शामिल हैं.

और उसने इस संदेह को दूर करने का निश्चय किया. और संभवतः अपने लिए एक या दो नई चूतों की उपलब्धि. यही सोचकर उसने अगले दो तीन दिन घर में ही रहने का निश्चय किया और अपनी दादी की दिनचर्या को समझा. दूसरे दिन उसने चूतों की संभावित सूची में राधा का नाम भी जोड़ दिया. उसने ये समझा कि राधा के जाने के लगभग आधे घंटे बाद दादी किचन में जाती है और दो घंटे वहीँ रहती हैं उसकी मम्मी के साथ. फिर यही क्रम शाम पांच बजे दोहराया जाता है, पर इस समय दादी ३ घंटे से अधिक अपने कमरे से बाहर रहती है. गौतम ने दादी के कमरे में गुप्त कैमरे लगाने का निश्चय किया.

उसने अगले दो दिन दोपहर को दादी के कमरे में जाकर उनसे बातें कीं और ये ताड़ने का प्रयास किया कि कैमरे कहाँ सही बैठेंगे. अंत में उसने तीन कैमरे का स्थान सुनिश्चित किया। अब बारी थी कैमरे खरीदने और फिर लगाने की. HD कैमरे जो केवल बैटरी से चलते हैं और साउंड भी रिकॉर्ड करते हैं, इस के लिए सबसे उपयुक्त थे. मंहगे होने के बाद भी गौतम ने उन्हें ख़रीदा और समझा कि किस प्रकार लगाया और प्रयोग किया जाता है. इसके लिए उसने तीन दिन अपने कमरे में इसका अभ्यास किया. जब उसने ये जान लिया की वो तीनों कैमरे २ घंटे के अंदर लगा सकता है, तब उसने अगले दिन शाम को (जब तीन घंटे कमरा खाली रहता है) कैमरे लगाने का निश्चय किया.

अगले दिन उसने सफलता पूर्वक कैमरे लगा दिए और अपने कमरे में चेक भी कर लिया. अब वो तैयार था.

************

अगले दिन गौतम अपने काम से दो दिन के लिए बाहर चला गया. और लौटने के बाद उसका ध्यान अपने कमरे में रिकॉर्डर पर ही था जहाँ दो दिन के उसकी दादी के कमरे के वीडियो रिकॉर्ड हुए पड़े थे. रात को खाना होने के बाद उसने सबसे कहा कि वो सोने जा रहा है. अपने कमरे में जाकर उसने रिकॉर्डर को टीवी से लगाया और ब्लू टूथ एयरफ़ोन अपने कानों में लगाकर पहले कमरे के वीडियो को चालू कर दिया. वीडियो पहले दिन रात का था.

************

क्रमशः

अध्याय २ दूसरा घर: सुनीति और आशीष राणा १

कमरा प्रकाश में नहाया हुआ था. एक सीट के सोफे पर लगभग ४५ साल का पुरुष बैठा हुआ था. उसके हाथ में एक महँगी व्हिस्की का पेग था और वो उसकी चुस्कियां ले रहा था और वो इस समय वो नंगा था. पर कमरे में वो अकेला नहीं था, चार लोग और थे. और वो सब भी इस समय नंगे ही थे. सामने एक तीन सीट के सोफे पर एक अत्यंत सुन्दर महिला जो उस पुरुष की ही आयु की थी. वो भी अपनी व्हिस्की की चुस्कियां ले रही थी. वो पांव फैलाकर बैठी थी. उसकी बगल में एक जवान लड़का उसके सुडौल स्तनों से खेल रहा था. कभी वो उन्हें दबाता और कभी झुक कर उन्हें प्यार से चूसता। उसके बगल में दो पेग रखे थे. एक से वो बीच बीच में गहरे घूँट ले लेता था और फिर अपने मुख्य काम में लग जाता.

उस स्त्री के पांवों के बीच में एक और जवान लड़का अपना चेहरा घुसाए हुए था और उसकी चूत को चाट और चूस रहा था. रह रह कर वो अपना हाथ बढ़ाता, जिसमें पहला लड़का उसे उसकी ड्रिंक दे देता, जिसे पीने के बाद वो अपने काम में लग जाता. सामने बैठा हुआ पुरुष भी इस समय खाली नहीं था. उसके मोटा लम्बा लंड एक जवान लड़की के मुंह में था, जिसे वो पूरी श्रद्धा से निगल निगल कर चूस रही थी. आदमी ने अपना हाथ उसके बालों पर रखा हुआ था और उसे बड़े प्यार से सहला रहा था.

"तू खुश तो है न अपने घर में?" आदमी ने पूछा.

"हाँ मौसाजी, मेरा बहुत ख्याल रखते हैं सब लोग. सूरज तो मुझ पर जान छिड़कते. मौसी के मेरे सास से बात करने के बाद तो वो पूरी तरह ही बदल गई है."

महिला बोली, “तुझे कितनी बार समझाया है, अपने पति का नाम मत लिया कर.”

“जी मौसी.”

आदमी मुस्कुराया. "बहुत ख़ुशी की बात है कि तू खुश है. सूरज की नौकरी ठीक चल रही है?"

"हाँ, आपके दोस्त की कंपनी में अब सुपरवाइसर हो गए हैं. पर उसे दो दिन रात में अभी भी जाना पड़ता है."

"जानता हूँ. नहीं तो तुझे यहाँ कैसे आने मिलेगा ? हटवा दूँ उसकी नाईट शिफ्ट?"

"अब आपने सोचा होगा तो ठीक ही होगा." लड़की ने चतुराई से उत्तर दिया.

सामने बैठी स्त्री खिलखिला पड़ी. "तुम इससे नहीं जीत सकते, आशीष. ये बहुत प्रखर बुद्धि की है. है न भाग्या ?"

"मौसी जी. आपसे क्या इतना भी नहीं सीखूंगी?" भाग्या ने इठला कर कहा.

इस बार हंसने की बारी आशीष की थी. सुनीति ने मुस्कुराकर मुंह बिचकाया.

"लड़की वाकई बहुत चतुर है."

"सो तो है", सोफे पर सुनीति के साथ बैठा हुआ लड़का बोला, "हफ्ते में दो दिन यहाँ पापा से चुदवाने आती है और पति को भनक भी नहीं. कभी हमें भी कभी भोग लगाने दे न." असीम शिकायत भरे लहजे में बोला.

"हाँ दीदी, तुम तो हमारी ओर देखती भी नहीं. कभी हमें भी चखने दो तुम्हारी मलाई." कुमार अपने चेहरे को सुनीति की चूत से हटाता हुआ बोला।

सच यही था, भाग्या आशीष, बिरजू और सूरज के सिवाय किसी को भी अपने शरीर से खेलने नहीं देती थी.

"भैया, आप दोनों तो जानते हो की मैं आपका कितना सम्मान करती हूँ. आपके बारे में तो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती."

"अच्छा, पापा. कुछ समझे? ये आपका सम्मान नहीं करती."

"अब फंसी!" सुनीति खिलखिला पड़ी. "क्यों भाग्या, क्या कहती है?"

"मौसी, मैं तो इनसे प्यार करती हूँ. अगर ये आपके न होते तो मैं सूरज को कभी न ब्याहती।"

"तभी तो तेरी शादी कर दी कि कहीं तू ही मेरी सौत न बन जाये." सुनीति ने चुहल करते हुए कहा.

"मौसी, ऐसा कभी सोचना भी मत. अब मुझे इस लंड का स्वाद लेने दो "

"असीम, मेरे लिए एक और ड्रिंक बना दे." आशीष ने आज्ञा दी.

"और कोई भी?"

"सबके लिए बना दे."

असीम उठा और सबके लिए नए ड्रिंक्स बनाने लगा. सुनीति ने अपने पांव जोड़े और बोली, "कुमार बेटा ऊपर आ, मुझे तेरा लंड चूसने दे, असीम भी मेरी चूत पीना चाहता है."

"ठीक है, मॉम." कहते हुए कुमार सोफे पर आ गया.

इस समय उसका लंड पूरी तरह से तना हुआ था. वो सुनीति के मम्मों से खेलने लगा. तब तक असीम ड्रिंक्स बना लाया और सबको बाँट दीं। भाग्या ने बस सादा ठंडा पानी ही लिया. असीम अपनी ड्रिंक सिप करता हुआ सुनीति के पांवों के बीच बैठ गया. उसने सुनीति की चूत की पंखुडिओं को फैलाया और अपनी जीभ से उसे कुरेदने लगा. सुनीति की आह निकल गई. उसने अपनी ड्रिंक का एक लम्बा घूँट भरा और ग्लास एक कोने में रखकर कुमार के लौड़े को अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगी.

"ओह, माँ, तुम से अच्छा लंड चूसने वाला अभी तक नहीं मिला."

"अच्छा जी, कितनों को आजमा चुके हो?"

"गिनना मुश्किल है." कुमार ने गर्व से कहा.

"ये सच कह रहा है, असीम?"

"हाँ माँ, आंटियों का काफी अनुभव है इसे, कहता है कि उन्हें जितना अच्छा लंड पीना आता है वो हमारी उम्र की लड़कियों को तो बिलकुल नहीं आता। "

"मैं इसका समर्थन नहीं करता. भाग्या बेहतरीन लंड चूसती है." आशीष बोला.

"आप तो न ही बोलें पापा तो ठीक है. आपने भाग्या पर एकाधिकार बनाया हुआ है. आप ही सिफारिश करो न दीदी से हमारी."

इन सब बातों से दूर सुनीति कुमार के लौड़े सड़प सड़प के चूस रही थी. उससे अब रुका नहीं जा रहा था.

"चलो इस खेल को बिस्तर पर ले चलते हैं." तीनों ने अपनी ड्रिंक एक ही साँस में ख़त्म की और बिस्तर की ओर बढ़ गए.

कुमार जाकर बिस्तर पर पीठ के बल लेट गया, और सुनीति ने उसका लंड दोबारा मुंह में ले लिया. असीम ने पीछे जाकर उसकी चूत की फांकें खोलीं और फिर से जीभ से चोदने लगा. फिर उसने सुनीति के दोनों नितम्बों को फैलाया और उसकी गांड में अपनी जीभ घुसा दी. हलके हलके वो दो उंगलियां चूत में डालकर आगे पीछे करने लगा और गांड को जीभ से चाट चाट कर गीला कर दिया.

उधर आशीष ने भी भाग्या को उठाया और उसे एक गहरा चुम्बन देकर हाथ पकड़कर बिस्तर के दूसरी ओर ले आया. उसने भाग्या को बिस्तर पर लेटाया और उसकी चूत भूखे भेड़िये की तरह चाटने लगा. भाग्या की सिसकारियों से कमरा भर गया. सुनीति ने असीम को हटने का इशारा किया और घुटनों के बल उठकर कुमार के लंड को अपनी चूत से लगाया और एक थाप में अंदर ले लिया.

"ओह माँ" कुमार और सुनीति दोनों के मुंह से एक साथ निकला.

सुनीति झुकी और कुमार के होठों को चूसने लगी. कुमार ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उसकी माँ का मुंह कुछ पल पहले ही उसका लंड चूस रहा था. धीरे धीरे सुनीति ने अपने कूल्हे ऊपर नीचे करना शुरू कर दिए. असीम अपने लंड को हलके से सहलाते हुए बिस्तर पर चढ़ा और सुनीति के सामने खड़ा हो गया. सुनीति ने बिना झिझक उसके लंड को अपने मुंह में लिया और गले तक ले जाकर चूसने लगी.

"सच में माँ, आपके जैसे लंड कोई नहीं चूसता, बिलकुल वैक्यूम क्लीनर की तरह."

सुनीति के मुंह से सिर्फ गौं गौं की आवाज़ ही निकली. उसके नीचे से कुमार उसे बड़े प्यार से चोद रहा था.

"मौसा जी, अब प्लीज़ मुझे चोदो, मेरी प्यास बुझा दो." भाग्या ने अनुरोध किया.

आशीष ने एक तकिया भाग्या की गांड के नीचे रखा और बहुत प्यार से अपने लंड को उसकी चूत की गहराइयों में उतार दिया. फिर उसने झुककर उसके एक स्तन को अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगा. नीचे उसने अपने लंड का प्रहार जारी रखा. भाग्या उत्तेजना से कांपने लगी. ऐसा लगा जैसे वो झड़ रही हो. आशीष ने उसके मम्मों को हाथ में भरा और बड़े प्यार से मसलने लगा.

सुनीति ने अब अपनी गति तेज कर दी थी. असीम के लंड पर उसकी पकड़ कमजोर हो रही थी. वो वासना के उन्माद में थरथरा उठी और कांपने लगी. वो झड़ने लगी थी.

"क्यों माँ, मजा आ रहा है.?" नीचे से कुमार धक्के लगता हुआ बोला।

"अब दूसरा चरण शुरू करें, दोनों एक बार झड़ चुकी हैं." आशीष ने कहा.

सब जानते थे इसका क्या अर्थ है. पर उत्तर सिर्फ भाग्या और सुनीति को ही देना था. ये उनकी ही इच्छा होने पर आगे जाने वाले थे.

"हाँ", सुनीति ने हामी भरी.

"भाग्या ?"

"मैंने कभी मौसी की बात टाली है?"

इतना सुनके तीनो मर्दों के चेहरे पर एक वहशी मुस्कान आ गई.

कुमार ने नीचे से धक्के तेज करते हुए पूछा, "क्यों मॉम, क्या मन है?"

"आज दोनों को एक साथ लेना चाहती हूँ चूत में. बहुत दिन हो गए तुम लोगों ने मुझे वैसे नहीं चोदा। "

"ठीक है मॉम. आपकी आज्ञा सर आँखों पर." कहते हुए असीम नीचे आ गया. "मॉम इस आसन में सही नहीं होता है. बार बार लंड निकल जाता है. ऐसा करो पलट जाओ."

सुनीति ऊपर उठकर पलट जाती है. कुमार का लंड अभी भी चूत में ही था, पर अब उसकी पीठ कुमार की ओर थी और लंड से भरी चूत सामने. असीम सही अवस्था में आता है. वो सुनीति की छाती पर हाथ रखकर उसे थोड़ा नीचे झुकाता है. कुमार अपनी माँ को अपने हाथों से थाम लेता है, और अपना लंड थोड़ा बाहर निकालता है. असीम अपने लंड को सुनीति के चूत पर कुमार के लंड के समकक्ष लगाता है. सुनीति दोनों एक मुट्ठी में लेकर एक साथ अपनी चूत के मुंह पर रखती है. असीम कुमार को उंगली से इशारा करता है…

एक..,

दो..

तीन..

और दोनों भाई एक संयोजित तरीके से एक ही धक्के में अपने लौडों को सुनीति की चूत में उतार देते है. सुनीति दर्द और आनंद से चीख उठती है.

"आ जा भाई, कर जुगलबंदी." ये दोनों का एक दूसरे को संकेत था.

बस फिर क्या था, ऐसी लय बंधी की देखने वाले अगर कोई होते तो विस्मित रह जाते. दोनों अपने मोटे तगड़े लंड एक साथ बाहर खींचते, थोड़ा ठहरते और फिर एक ही लय में अंदर पेल देते.

दूसरी ओर भी आशीष अब भाग्या को लम्बे और तगड़े धक्के लगा रहा था. कोई सोच नहीं सकता था कि ५. ५ फुट की इतनी छोटी लड़की ऐसे डील डौल वाले मर्द के भीषण धक्के इतनी आसानी से झेल रही होगी. बल्कि वो और ज्यादा की मांग कर रही थी.

"हाय मौसाजी, आपसे अच्छा मुझे कोई नहीं चोद सकता, और जोर से मारो, फाड़ दो मेरी चूत। हफ्ते भर मुझे इस लंड के बिना रहना है. और जोर से मारो."

आशीष ने भी अपनी पूरी ताकत लगा दी और भीषण धक्कों से भाग्या को चोदने लगा.

"अरे मेरे लाल, वारी जाऊं तुम पर, मेरी चूत का कीमा बना दोगे तुम. आह , क्या लंड पाए हैं. वाह. और अंदर तक डालो, बहुत मजा आ रहा है. और जोर से. फक मी , फक मी डीपर, फक मी हार्डर."

असीम और कुमार ने अपने गियर बदले और पांचवे गियर में एक साथ अपनी माँ की चूत एक साथ चोदने लगे. दोनों औरतों की वासना भरी चीखें और सिसकारियां माहौल को बेहद रंगीन बना दे रही थी.

"मौसा जी, मैं गई! मौसा जी ईईई ईईई ईईई ईईई !" चीखते हुए भाग्या थरथरा कर झड़ गई और एकदम से ढीली पड़ गई.

आशीष भी अब रुक नहीं पाया. "मैं भी गया." उसका शरीर अकड़ गया और उसने अपना पूरा लंड भाग्या की चूत में जड़ तक गाढ़ दिया. उसका पानी भाग्या की चूत को लबालब भर रहा था. वो निढाल सा होकर भाग्या के ऊपर लेट गया. फिर हलके से एक करवट ली और उसके बगल में लेट गया. दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

वहां सुनीति भी अब झड़ रही थी. पर वो दो दो मुश्टंडों के बीच थी और वो शिथिल हो कर अपनी छाती कुमार के ऊपर लगाकर वासना और संतुष्टि से गहरी साँसे ले रही थी. पर उसके बेटे अभी तक उसे पेल रहे थे.

"टॉप गियर." असीम ने कहा.

ये सुनकर दोनों ने अपनी लय बदल दी. अब कुमार अंदर पेलता तो असीम बाहर निकालता. और जब असीम अंदर डालता तो कुमार बाहर निकालता. सुनीति की चूत के ऊपरी और निचले हिस्से अब अलग अलग घर्षण महसूस कर रहे थे. सुनीति से अब रहा नहीं गया वो सिसकते हुए फिर से झड़ने लगी. बगल से आशीष और भाग्या ये खेल देखकर स्तंभित थे.

"तरस खाओ अपनी माँ पर हरामखोरों. क्या मार ही दोगे ?" आशीष ने अपनी पत्नी की हालत देखकर बोला।

"अरे पापा, आप टेंशन मत लो. माँ को ऐसे ही मजा आता है. इन्हें कुछ नहीं होगा."

कहते हुए असीम और कुमार ने अपनी रफ़्तार भयंकर रूप से बढ़ा दी. दस मिनट की दुर्दांत चुदाई के पश्चात असीम और कुमार भी अपने लक्ष्य के निकट पहुंच गए थे.

"कहाँ निकालें माँ?"

"मेरे मुंह में और मेरे चेहरे पर. अंदर नहीं."

"ओके मॉम."

कहकर असीम ने धीरे से अपना रस से ओतप्रोत लंड बाहर निकल लिया. सुनीति ने धीरे से अपने आपको कुमार के लंड पर से उठाया. उसकी चूत इस समय ऐसे खुली हुई थी जैसे की बच्चा निकला हो. वो बिस्तर से उठकर घुटनों के बल बैठ गई. कुमार भी उठा और असीम के साथ खड़ा हो गया. सुनीति ने दोनों लंडों को एक बार अपने मुंह में लेकर चूसा और अपने हाथों में लेकर उनकी मुठ मारने लगी.

कुछ ही देर में असीम कराहा, "मैं आया."

"मैं भी" कुमार बोला।

सुनीति ने अपना मुंह खोल दिया. दोनों भाइयों के लौडों ने पिचकारियां छोड़ना शुरू किया. जितना सुनीत पी पाई, पी गई बाकी का रस उसके चेहरे पर बिखर गया. उसने इस पानी को अपने चेहरे और स्तनों पर मल दिया.

"देख और सीख की अपनी सुंदरता कैसे बनाये रखते हैं अपनी मौसी से." आशीष ने भाग्या को सलाह दी. भाग्या ऐसे शरमाई मानो बड़ी पतिव्रता हो.

"एक बड़ा पेग बनाकर ला कुमार. मजा आ गया आज तो. है न जान." सुनीति ने कुमार को आज्ञा देकर आशीष से पूछा.

"तुम्हें कब मजा नहीं आता ? चलो अब अपनी ड्रिंक्स लेते हैं. सोने का भी समय हो रहा है." आशीष ने कहा.

कुमार से सबको ड्रिंक्स और भाग्या को जूस दिया. फिर सब बैठकर बातें करते रहे.

"दीदी, मौसा मौसी कुछ नहीं कहते आप जो इतने देर गायब रहती हो घर से?" कुमार से भाग्या से पूछा।

इससे पहले की भाग्या कुछ बोल पाती, आशीष और सुनीति ने एक दूसरे को अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा. फिर सुनीति ने कुमार को एक हल्का चुम्बन दिया.

“वो दोनों भी तुम्हारे दादाजी के साथ अपने खेल में व्यस्त हैं.”

भाग्या ने कुछ सोचते हुए कहा, “माँ की माँ चोद देंगे दोनों मिलकर आज रात में.”

इस बात पर सब हंस पड़े और अपने पेग पीने लगे.

आशीष के पिता जीवन के कमरे में भाग्या का वचन सत्य सिद्ध हो रहा था. उसकी माँ सलोनी इस समय न चीख ही पा रही थी न ही कराह. अपितु उसके मुंह से जो ध्वनि निकल रही थी उसे किसी भी श्रेणी में रखना लगभग असम्भव था. कुछ मायनों में उन्हें आनंद की किलकारियां भी कहा जा सकता था. उसका पति शंकर उसकी गांड मार रहा था और उसके धक्कों में शक्ति की कमी न थी. करता भी कैसे उसकी तुलना इस समय जीवन से जो हो रही थी. जीवन आज भी कसरती शरीर रखते थे और उनके लंड का आकार और शक्ति पूर्ण रूप से अद्भुत थे. इस समय वो सलोनी की चूत में अपने लंड को डाले विश्राम कर रहे थे.

सलोनी उन पर चढ़ी हुई थी और शंकर ही सारा व्यायाम कर रहा था. उसके धक्कों के कारण सलोनी स्वयं ही जीवन के विशाल लौड़े पर ऊपर नीचे हो रही थी.

“बाबूजी, आप भी चोदो न! पूरा आनंद नहीं आ रहा है.”

जीवन ने बिना कुछ बोले अपने लंड को एक जोरदार झटके से सलोनी की चूत में पेल दिया. सलोनी के मुंह से इस बार जो निकली थी वो अवश्य ही चीख थी.

“कितना समझाया है तुझे, बाबूजी को मत छेड़ा कर.” शंकर ने बिना रुके सलोनी को झिड़का.

“छेड़ती नहीं हूँ तो बाबूजी अच्छे से नहीं चोदते, उई माँ, मरी!” सलोनी ने आनंद से कराह ली.

बिरजू और जीवन हंसने लगे और ताबड़तोड़ धक्के मारने लगे. सलोनी को कस कर पीस रहे थे और सलोनी भी कम न थी वो भी इस चुदाई का भरपूर आनंद ले रही थी. लम्बे समय तक चुदाई के बाद जीवन और बिरजू ने अपना पानी सलोनी के दोनों छेदों में छोड़ दिया. बिरजू हाँफते हुए जाकर सोफे पर बैठ गया. सलोनी जीवन के चौड़े सीने पर सिर रखकर हाँफते हुए ढह गई. कुछ समय यूँ लेते रहने के बाद वो हटी और जीवन का लंड उसकी चूत से बाहर निकल गया और ढेर सारा रस भी. उसकी गांड से भी रस बह रहा था.

“जाकर सफाई कर ले बाथरूम में.” जीवन ने सलोनी से कहा और फिर बिरजू से बोला, “लगा एक एक और पेग प्यास बढ़ गयी इसे चोदकर।” जीवन ने कहा.

“सच है बाबूजी,” ये कहते हुए बिरजू तीनों के लिए पेग बनाने लगा.

कुछ देर में ही सलोनी बाहर आ गई और दो गीले तौलियों से जीवन और बिरजू के लंड साफ कर दिए. बिरजू ने उसे उसका ग्लास दिया.

जीवन राणा इस आयु में भी वही रोब रखते थे जो ४० साल पहले था. इनके लम्बे और बलिष्ठ शरीर को जैसे उम्र ने छुआ तक नहीं था. उनकी पत्नी की मृत्यु को अब कोई दस वर्ष हो चुके थे. आज भी उसकी याद में उनकी ऑंखें भर आती थीं. परन्तु जीवन का यही नियम है कि किसी के जाने के बाद भी ये नहीं रुकता. आज भी वो अपने गांव और खेतों से उतना ही प्यार करते थे जितना पहले. साल में दो बार १० दिनों के लिए वो हरियाणा के अपने गाँव अवश्य जाते थे. अपने पुराने मित्रों के साथ मिलने बैठने का आनंद ही कुछ और था. उस गाँव से जुडी उनकी यादें ताजा करके उनके मन को एक शांति मिलती थी.

“बाबूजी, इस बार आप कितने दिनों के लिए गाँव जा रहे हो?” बिरजू ने पूछा.

“देखता हूँ, इस बार अधिक नहीं रुकूँगा। वैसे तुम्हारे घर पर कुछ भेजना है तो बता दो, मैं भिजवा दूँगा।” जीवन ने कहा.

“नहीं बाबूजी. कुछ नहीं. वो सलोनी कर देगी.”

“ठीक है. कल सुबह निकलना है. तो तुम दोनों भी सो जाओ. सलोनी तुमने अपना सामान ले लिया न?”

“जी बाबूजी.”

पेग समाप्त होते ही बिरजू और सलोनी अपने कमरों में चले गए और जीवन भी कुछ देर तक बैठने के बाद सो गए.

क्रमशः
 
अध्याय ३: तीसरा घर - शीला और समर्थ सिंह १

सुरेखा सिंह बहुत उदास थी. वो अपने पति को विमानतल छोड़कर घर वापिस जा रही थी. उसके पति नागेश को अपने काम से १ महीने के लिए विदेश जाना था. उसकी उदासी का कारण ये था कि उन दोनों के बीच में पिछले दो महीनों से कोई शारीरिक संबंध नहीं हुआ था. वो आज अपनी २० साल की शादी से पूरी तरह से असंतुष्ट थी. पर उसे इस समस्या के हल के लिए कोई और राह भी नहीं दिख रही थी. उसके दोनों बच्चे सजल और संजना अब बड़े हो चुके थे और कॉलेज में थे.

सुरेखा जानती थी की इस आयु में भी वो इतनी आकर्षक थी कि पुरुषों को आकृष्ट करती थी. पुरुष अक्सर उसके नितंब निहारा करते थे. पर अगर कोई आँख गढ़ाकर देखता था तो वो थी उसकी सुडोल और भारी चुचियाँ. अपने कार्यालय के पुरुषों को वो किसी भी तरह का भाव नहीं देती थी. उसने कभी भी अपने पति से विश्वासघात नहीं किया था. पर अब वो अपने पति के व्यवहार से उचट चुकी थी. उसे कोई न कोई समाधान निकालना ही था.

वो अपने माता पिता को देखकर आश्चर्य करती थी की वो आज तक एक दूसरे से कितना प्यार करते थे. दोनों की शादी उस समय के अनुसार बहुत छोटी आयु में ही हो गई थी. वो दोनों अभी भी स्वस्थ और सक्रिय थे. उसकी बड़ी बहन सुप्रिया का विवाह बहुत दिन नहीं चल पाया था. दो बच्चे होने के कुछ ही वर्षों में उसका तलाक़ हो गया था. पर सुरेखा ने तलाक़ के बाद भी कभी सुप्रिया को दुखी नहीं देखा. उसने अपना सारा समय अपने कार्य और बच्चों के पालन पोषण में लगा दिया था. आज उन दोनों के बच्चे बड़े हो चुके थे और कॉलेज से निकलने के निकट थे.

इसी चिंतन में उसने अपनी कार अपने घर को अपने घर की ओर से अपने पिता के घर संभ्रांत नगर मोड़ दी. उसके घर पर कोई था नहीं और वो बहुत बेचैन थी. सम्भवतः उसकी माँ उसकी इस समस्या के लिए कोई सुझाव दे पाएंगी. उसे ये देखकर खुशी हुई की सुप्रिया की कार भी वहीं थी. अब वो अपनी माँ और बहन से सलाह लेने का मन बना चुकी थी. ये तो अच्छा ही हुआ कि दोनों एक ही दिन एक ही साथ मिल गयीं. उसने घंटी बजाई, पर कोई उत्तर न मिलने पर अपनी चाबी से दरवाजा खोला और अंदर चली गयी. वो अपनी माँ को पुकारने ही वाली थी कि उसे ऊपर के कमरे से सिसकारियाँ सुनाई दीं. उत्सुकतावश वो दबे पाँव ऊपर की ओर बढ़ने लगी और अपने माता पिता के कमरे को ओर जाने लगी.

"उूउउह, और अंदर, और ज़ोर से." सुरेखा ने अपनी माँ की आवाज़ को पहचान लिया. वो अपनी हँसी दबाते हुए सोचने लगी कि उसके माता पिता दोनों दोपहर में चुदाई कर रहे हैं. उसकी बहन अपने पुराने कमरे में सम्भवतः सो रही होगी.

"मैं बाद में आ जाऊंगी, अभी इन्हे आनंद लेने दूँ ." सोचकर वो पलटी। फिर ये सोचकर की थोड़ी जासूसी की जाए, वो बढ़ी तो देखा कि द्वार पूरा बंद नहीं था. बचपन की शरारत याद करते हुए उसने पल्ला थोड़ा सा खोला और अंदर झाँका.

उसकी माँ निर्वस्त्र थी और अपने लाल होठों से अपने पति की लंबा और मोटा लंड चूस रही थी. सुरेखा ने ये देखकर अपने सूखे होठों पर जीभ फिराई. उसके पिता के लंड को देखकर सुरेखा विस्मित हो गई. उसकी माँ पिता के अंडकोष हल्के हाथों से दबा रही थी. उसके पिता का सिर ऊपर पीछे था और चेहरा आनंद विभोर था. अपनी माँ को लंड चूसते हुए देखकर सुरेखा को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. पर उसे जिस दृश्य ने आतंकित किया वो ये था कि वो दोनों अकेले नहीं थे. एक और आदमी था जो उसकी माँ शीला की पीछे से चुदाई कर रहा था.

और वो कोई और नहीं, सुप्रिया का बड़ा बेटा निखिल था!

*****

निखिल का बांया हाथ उसकी नानी के नितम्ब पर था, और दाएं से वो उनका भग्नासा निचोट रहा था. शीला ने अपने मुंह को समर्थ ने लंड से हटाया और पीछे मुड़कर निखिल की ओर वासना से देखा.

"नानी की चूत को ऐसे ही अच्छे से धीरे धीरे पेल." उन्होंने आज्ञा दी.

"सच तो ये है, कि इस चूत में आज तक न जाने इतने लंड गए हैं, पर तेरे मूसल को लेने में अभी भी थोड़ी हिम्मत चाहिए.” शीला बोले जा रही थी, “हाँ ऐसे ही,ऐसे ही. किसी घोड़ी को भी तेरा लंड लेने में कष्ट होगा, पर आनंद भी भरपूर आएगा."

निखिल अपनी प्रशंसा सुनकर गर्व से फूल गया. "नानी आप भी बहुत मस्त चुड़क्कड़ हो, मैं सिर्फ एक ही और स्त्री को जानता हूँ जो मेरे पूरा लौड़ा बिना दुविधा के ले पाती है. और उन्हें भी इससे अत्यंत प्रेम है.”

"प्रेम? मैं न्योछावर हूँ इस पर." शीला बोली, "मुझे दो लोगों से एक साथ चुदवाने से अधिक कोई कार्य आनंद नहीं देता. और तुम्हारा तो ये ११ इंच का मूसल तो जैसे मेरे ही लिया बना था."

"११ इंच ?" सुरेखा के मुंह से अनजाने ही एक आश्चर्य भरी सिसकारी निकल गई.

तीन सिर कमरे के द्वार की ओर मुड़े। उनकी ऑंखें सुरेखा की आँखों से जा टकराईं, जो इस कौटुम्बिक व्यभिचार के कृत्य की जीती जागती साक्षी थी.

*****

सुरेखा जड़वत खड़ी थी, वो डर और शर्म से हतप्रभ थी. पर चुदाई में व्यस्त वो तिकड़ी न गुस्सा लग रही थी न ही दोषी. निखिल ने एक हलकी सी मुस्कान के साथ अपनी मौसी की आँखों में डालते हुए अपनी नानी की चूत में अपने लंड का आवागमन बनाये रखा. शीला ने अपना सिर मोड़कर सुरेखा की ओर देखा। उसके मुंह से समर्थ का लंड बाहर निकल गया.

उसने बेशर्मी की एक कुटिल मुस्कान से व्यंग्य किया,"ओह हो, मेरी मासूम बेटी, सुरेखा"

वो खिलखिलाई, "देखने आयी है कि उसके बूढ़े माँ बाप अपनी दवाइयाँ ले रहे हैं या नहीं? है न?"

समर्थ के थूक से लिपटे हुए लंड को अपने हाथ से हलके से सहलाते हुए आगे बोली," मैं तो अवश्य ले रही हूँ. मेरी सर्वप्रिय प्रोटीन शेक का डबल डोज़ जो लेने वाली हूँ."

"माँ, तुम ऐसा भद्दा मजाक कैसे कर सकती हो?" सुरेखा चिल्लाई, "दो दो पुरुषों आदमियों के साथ एक साथ ऐसा काम, और उसमे से एक तुम्हारा नाती है. ये इन्सेस्ट है."

"बिलकुल, और इसीलिए इतना अद्भुत है," शीला ने वासना से भरी आवाज़ में कहा, “और पुरुष इसीलिए क्योंकि कोई स्त्री उपलब्ध नहीं है, अन्यथा मुझे उसका स्वाद भी उतना ही प्रिय है..”

"और ये दोनों घोड़े भी कोई आपत्ति नहीं कर रहे." अपने नितम्बों को घुमाते हुए बोली. "ऐ लड़के, मुझे चोदना बंद मत कर."

ये सुनते ही निखिल ने फिर गति पकड़ ली और लम्बे और ताकतवर धक्कों से अपनी नानी को चोदने लगा.

शीला ने सुरेखा को कहा," अब टेंशन छोड़कर शांत हो जा और इस शो का आनंद ले."

"आनंद लूँ !" सुरेखा ने आश्चर्य से कहा, "माँ तुम मानसिक रोगी हो. तुमने सोचा भी कैसे कि मैं इसका आनंद लूंगी। "

उसके शब्द तो उसे इस दृश्य से दूर कर रहे थे, पर वो खुले हुए मुंह से अवाक् अपने भांजे को ताक रही थी जो हर धक्के में और गहरा जाता प्रतीत हो रहा था. निखिल ने अपनी शक्ति दिखाते हुए अपने दोनों घुटनों को और फैलाया, शीला के भी पैरों को और फैलाते हुए जोरदार धक्के लगाने लगा. शीला अपने बिस्तर पर सिसकती और कराहती हुई पेट के बल फ़ैल गई. समर्थ ने अपने लंड से शीला के चेहरे और होठों को हलके हलके पीटने लगा. शीला अभी भी उसे पकड़ने का प्रयास कर रही थी पर निखिल की गति से वो इतना हिल रही थी की असमर्थ थी.

"ठहरो सब! ठहर जाओ! माँ तुम छिनाल हो." सुरेखा ने फिर आपत्ति की.

शीला किसी प्रकार से बोलती रही, "और मुझे इस पर गर्व है. तुम ज्यादा पाखंडी न बनो, तुम्हारी पैंट क्यों गीली है? तुम्हारी चूत पानी छोड़ रही है न?"

सुरेखा का हाथ अपनी पैंट के सामने गया. उसे आभास हुआ कि उसकी माँ सच कह रही थी. उसका सिर झुक गया और वो शर्म से लाल हो गई.

"सुरेखा, गुड़िया, आराम से." उसके पिता ने पहली बार कुछ बोला। उसके लंड को इतने में शीला ने अपने मुंह में डाल लिया. "क्षमा करना, कि तुम्हें इस प्रकार पता चला. पर पता तो लगना ही था एक दिन. मैं तो कब से इस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था."

एक रहस्यमई मुस्कान से उसने आगे बोला "बहुत सारी नयी संभावनाएं खुल जाती हैं इस तरह, क्यों शीला?"

"बिलकुल" एक स्त्री के पीछे से आते हुए स्वर ने सुरेखा को सनसना दिया.

दो छोटे कोमल हाथ उसके वक्ष के ऊपर आये, उसकी शर्ट के अंदर गए और आगे से उसके ब्लाउज के हुक खोल दिए. उन दोनों कोमल हथेलियों ने उसके स्तनों को मसलना और सहलाना प्रारम्भ कर दिया. सुरेखा डर और अचम्भे से पीछे मुड़ी तो उसने अपनी बड़ी बहन सुप्रिया को मुस्कुराता पाया. सुप्रिया भी पूरी नंगी ही थी और उसके बड़े बड़े स्तन सुरेखा के स्तनों से मेल जोल कर रहे थे.

सुरेखा ने विरोध करने के लिए मुंह खोला परन्तु सुप्रिया ने इसका लाभ उठाकर अपनी बहन को पास खींचा और गहरा चुम्बन लिया. सुप्रिया ने वासनामय आँखों से सुरेखा की आँखों में देखा और अपनी जीभ उसके मुंह में डालकर प्रगाढ़ चुम्बन लेने लगी. सुरेखा को ये जानने में अधिक देर नहीं लगी कि सुप्रिया के मुंह से वीर्य का स्वाद आ रहा था. पर किसका? अपने हाथों से सुप्रिया सुरेखा के माँसल स्तनों को भींचने लगी. अपने अनुभवी उँगलियों से वो सुरेखा की चूचियों को बिलकुल सही मात्रा में मसल रही थी.

सुरेखा का मनोबल टूट रहा था, "नहीं, नहीं, मुझे इसमें आनंद नहीं आना चाहिए, मेरी बहन गलत कर रही है. जैसे मैं गलत थी अपने भांजे से अपनी माँ की चुदाई देखकर."

पर उसका शरीर अब उसका साथ नहीं दे रहा था. महीनों से सेक्स से वंचित भूखा शरीर इस आक्रमण का प्रतिरोध करने में अक्षम था. अपनी जीत का अनुभव करते हुए सुप्रिया ने अपनी नंगी जांघों को सुरेखा की जांघों से सटा दिया। सुरेखा ने देखा की सुप्रिया की चूत बिलकुल चिकनी थी, और गीली भी.

"मत करो ऐसा, प्लीज."

पर अब सुप्रिया कहाँ रुकने वाली थी, उसने अपना पराक्रम और बढ़ा दिया.

"सही जा रही हो, मॉम." ये एक नए पुरुष के स्वर ने प्रोत्साहन दिया, "खेलो इन चूचियों से."

ये नितिन था, सुप्रिया का दूसरा बेटा, जो सुप्रिया से कुछ ही दूर खड़ा था. अन्य लोगों की तरह वो भी इस समय नंगा ही था और उसके गीले लंड से कुछ रस गिर रहा था. ये लंड भी निखिल से किसी तुलना में उन्नीस नहीं था.

नितिन चलकर सुरेखा के पीछे आया और उसने अपने बड़े हाथों से सुरेखा की पैंट के बटन और ज़िप खोली और बड़ी सादगी से उसे सुरेखा के लम्बे सुडौल पैरों से नीचे उतार दिया. सुरेखा तो मानो एक तन्द्रा में थी. उसने एक एक कर के अपने पाँव उठाये और पैंट निकल जाने दी. सुप्रिया भी सुरेखा के ब्लाउज निकालने में सफल हो चुकी थी. एक बार निर्वस्त्र होने पर सुप्रिया ने सुरेखा को फिर अपनी बाँहों में भर लिया. सुप्रिया उसे चुम्बनों से ओतप्रोत कर रही थी और उसके नितम्ब जोर जोर से मसल रही थी. सुरेखा ने अपने पीछे नितिन के लंड का स्पर्श महसूस किया जो उसकी गांड के ऊपर दस्तक दे रहा था. सुप्रिया ने एक हाथ सुरेखा की चूत पर लगा दिया और उसे सहलाने और मसलने लगी. सुरेखा इस समय अपने भतीजे और बहन के बीच फंसी हुई थी और उसे बहुत आनंद आ रहा था.

"ओह, मैं झड़ रही हूं !" शीला चीखी, "और जोर से चोद मुझे! फाड़ दे मेरी चूत अपने मूसल से! फक मी! समर्थ, समर्थ, अपना पानी मेरे मुंह में छोड़ दो."

"नहीं!" समर्थ ने अपना विशाल लंड शीला के मुंह से निकलते हुए कहा.

शीला अपने स्खलन के उत्कर्ष पर थी और निखिल ने भी अपने अण्डों में कसाव महसूस किया और अपनी गति और तेज कर दी.

"मैं भी गया नानी!" निखिल चीखा और अपने लंड को शीला की चूत की गहराई में जाकर जड़ कर दिया. "तुम्हारी चूत में झड़ रहा हूँ, मेरी प्यारी नानी! आआह!"

अंततः निखिल और शीला शांत होकर हाँफते हुए लेट गए. सुरेखा स्वयं सांसे रोके हुए थी सामने के दृश्य को देखकर. निखिल ने धीरे से अपना लंड अपनी नानी की बहती चूत से निकला.

"मुझे तेरा रस पीना है, इधर आ." निखिल ने अपना लंड नानी के मुंह में डाल दिया जिसे बहुत प्यार से शीला ने चाट चाट कर साफ किया. "तू अच्छा है, तेरे नाना ने तो मुझे अपना पानी पिलाने से मना कर दिया."

"मैं किसी और के लिए बचाकर रखा हूँ." समर्थ ने कहा.

ये सुनकर सुप्रिया और नितिन ने सुरेखा को छोड़ दिया.

"तुम्हें आज बहुत धक्का लगा है, है न?" समर्थ ने सुरेखा से पूछा.

सुरेखा ने हामी भरी.

"इधर आओ, मेरे पास, हमें बाप बेटी के बीच कुछ बात करनी है."

सुरेखा हलके क़दमों से अपने पिता के तने हुए लंड पर नज़र गढ़ाए हुए, समर्थ के पास बैठ गई.

"तुम जानती ही हो कि हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे तुम्हें आपत्ति हो. तुम ये भी जानती हो कि मैंने दो साल पहले पूरे घर को उच्च स्तर के CCTV से सुरक्षित किया था." समर्थ ने सुरेखा की चिकनी जांघ पर हाथ फिरते हुए कहा.

"जब तुम आयीं तब मैंने और नितिन ने तुम्हें CCTV पर देख लिया था। " सुप्रिया ने बीच में बताया. "मुझे TV पर दूसरों की चुदाई देखकर चुदने में बहुत मजा आता है."

समर्थ ने उसकी बात काटते हुए सुरेखा कहा, "पिछली बार जब तुम आयीं थीं तब हमने देखा था तुम्हे नागेश से चुदवाने की असफल कोशिश करते हुए." कहते हुए समर्थ ने सुरेखा का हाथ अपने लंड पर रख दिया. सुरेखा सिहर उठी. वो अचेतन मन से हलके हलके उसे मुठियाने लगी.

"आपने हमें देखा था?"

"हाँ, बिलकुल." शीला ने निखिल के लंड को मुठियाते हुए कहा. "और हमें बहुत दुःख भी हुआ था ये देखकर कि उसने तुम्हें एक प्रकार से झिड़क दिया था. पर अब तुम सही जगह आयी हो. यहाँ हमेशा खड़े हुए हलब्बी लौंड़ों से तुम्हे दोबारा कभी सेक्स से वंचित नहीं रहना होगा." निखिल के लंड को अपने मुंह में लेते हुए उसकी माँ बोली.

फिर समर्थ और निखिल के लंडों को अपने हाथ में लेकर बोली, "जो तुम्हारी प्यास मिटा सकें वो सब यहाँ है. बस आँखों से पट्टी हटा कर देखो. और ये सब अपने ही हैं. कहीं बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं है.” फिर हँसते हुए बोली, “हालाँकि उसमें भी कोई बुराई नहीं है.”

"मैं समझ नहीं पा रही हूँ. ऐसा कैसे कर सकती हूँ? सुप्रिया तुम अपने ही बेटों से चुदवाती हो? क्या ये पाप नहीं है?"

"सम्भव है. पर मैं पाप और पुण्य की परिभाषा में नहीं पढ़ना चाहती. अपनी सोच बदल." सुप्रिया ने डाँटते हुए कहा, "देख मेरे बेटों के लंड! मैं एक सदा चुदासी स्त्री हूँ, और मैं ढोंगी नहीं हूँ. मुझे जब लंड चाहिए तब मिलते हैं. ये तीनों मेरी चूत में उतने ही अच्छे से फिट बैठते हैं जैसे कोई और. असली पाप तो ये होगा कि ऐसे घोड़ों के साथ रहना और इनसे बिना चुदे जीवन बिताना. और क्योंकि ये मेरी ही संतान हैं, या मैं पापा की, इससे पूरे व्यभिचार का आनंद कई गुना बढ़ जाता है." ये कहकर सुप्रिया झुकी और सुरेखा की चूत को ऊपर से नीचे तक चाट लिया. फिर उसने सुरेखा का भग्नासा अपने होठों में लेकर दबा दिया.

सुरेखा बेबस हो गई और ऐसा लगे जैसे वो झड़ने वाली ही है. वो अब झड़ना चाहती थी, कई दिनों की प्यासी जो थी.

"देखो पापा, कैसे लुपलुपा रही है इसकी चूत, कितनी गीली हो गई है, देखो छूकर।" सुप्रिया ने समर्थ का हाथ पकड़कर सुरेखा की चूत पर रख दिया. समर्थ ने उसे थोड़ा सहलाया और अपनी एक उंगली अंदर डाल दी.

"ओह हाँ, ओह" सुरेखा सिसक उठी, "मेरा मतलब, नहीं नहीं."

पर अब देर हो चुकी थी. उसका शरीर उससे छल कर रहा था. उसने फिर अपने पिता के लंड की ओर हाथ बढ़ाया, पर वापिस खींच लिया. वो अपनी अनियंत्रित होती वासना पर कुछ अंकुश लगाना चाहती थी. सम्भव था कि वो स्वयं को इस भंवर में जाने से रोक सके.

"ह्म्म्मम्म, लगभग तैयार हो, है न? चलो तुम्हें सहमत करने के लिए एक और प्रलोभन देती हूँ." सुप्रिया ने नितिन को इशारा किया. नितिन अपने खड़े लंड को लेकर सुरेखा के चेहरे के पास खड़ा हो गया.

"मौसी, लगता है काफी दिन हो गए तुम्हें लंड चूसे हुए." उसने छेड़ते हुए बोला और अपना लंड सुरेखा के होठों से सटा दिया और रुक गया.

सुरेखा ने जीभ से टोपा चाटा और स्वाद और सुगंध से उत्तेजित हो गई. उसके मुंह में पानी आ गया.

"मेरे अण्डों से खेलो मौसी, मैं न तुम्हारा पिता हूँ न बेटा। इसे गलत मत समझो." नितिन ने चाल चली.

सुरेखा की आँखों में एक नयी चमक आई जैसे कि उसे नया उद्बोध हुआ हो. उसने मुंह खोला और नितिन का लंड निगल लिया. उसने नितिन को अपनी ओर खींचा. नितिन उसके रेशमी बालों को सहलाते हुए धीरे धीरे अपना लंड उसको खिलाने लगा. लंड चूसने में उसे अत्यधिक आनंद आता था परन्तु उसके पति ने उसे वर्षों से लंड चूसने का अवसर ही नहीं दिया था. और उसका लंड भी इस स्तर का नहीं था. उसने शर्म ताक में रखकर नितिन के लंड को संभव स्तर तक मुंह में ले लिया.

"ये हुई न बात!" उसके पिता ने उसका उत्साहवर्धन किया. "अब नितिन को अपने मुंह से चोदो। "

उसे अपने पीछे “स्लर्प स्लर्प” की ध्वनि आ रही थी और निखिल की आहें भी सुनाई दे रही थीं. उसकी माँ वाकई बहुत ऊँचे स्तर की चुड़क्कड़ है, ये सोचते हुए उसने नितिन के भारी लंड पर अपना आक्रमण तीव्र कर दिया. आज वो अपनी कई दिनों की प्यास बुझाने वाली थी. नितिन ने भी हलके हलके अपने लंड का दबाव बढ़ाया, फिर हलके से सिर पकड़कर थोड़ा तेजी से मुंह चोदने लगा.

अचानक नितिन ने अपना लंड एक ही झटके से निकला और छिटककर दूर चला गया. उसने अपनी माँ के कन्धों पर हाथ रखा और उसे भी हटा दिया.
 
सुरेखा निराशा से चिल्ला पड़ी, "नहीं नितिन, यहाँ आओ, मुझे इतने दिन हो गए, मुझे लंड पीना है."

"सॉरी मौसी" नितिन ने हलके मन से कहा, "मुझे लगता है कि ये नाना का अधिकार है. अच्छा नहीं लगेगा अगर मैं सबसे पहले आपको पानी पिलाऊँ." कहते हुए उसने अपनी माँ सुप्रिया के होंठ चूमे और मम्मे मसल दिए.

"चलो मम्मी, हमारा खेल बीच में रुक गया था. अब उसे आगे ले चलते हैं. यहाँ स्थान नहीं है इसीलिए नीचे लेटो और मुझे चोदने दो."

"देखा सुरेखा, मेरा राजा बेटा अपनी माँ का कितना ध्यान रखता है." वो नीचे कालीन पर लेटकर अपने पैर फैलाती हुई चिहुंक पड़ी. "मेरी चूत लबलबा रही है कर मेरी सवारी मेरे घोड़े. तेज और कठोर सवारी."

"जैसी आज्ञा, मॉम." नितिन ने कहा.

सुरेखा अब बेचैन हो रही थी चुदने के लिए. उसने ललचाई आँखों से नितिन को अपने घुटनों के बल बैठकर सुप्रिया की चूत पर लंड रखते देखा. और तब नितिन ने एक ही झटके में अपना खूंटा सुप्रिया के पनियाई हुई चूत में पेल दिया.

"आईईई!" सुप्रिया चीख पड़ी, और अपने कूल्हे मटका कर नितिन को प्रोत्साहित करने लगी. "मार डाल मुझे चोद चोद कर, और जोर से दबा दबा के चोद. अपनी मम्मी को चोद मेरे बेटे. मेरी प्यास बुझा दे रे, चीर दे इसे."

सुरेखा के पिता समर्थ ने सुरेखा की चूत की पंखुड़ियों को सहलाते हुए दो उंगलियां अंदर डाल दीं और अंदर बाहर करने लगे. अब सुरेखा की मोटर ऑन हो चुकी थी, उसके शरीर ने उसके मन में चल रहे नैतिक विचारों को पीछे धकेल दिया था. अब उसे उँगलियों नहीं, बल्कि किसी और हथियार की आवश्यकता थी.

उसने अपने पिता की ओर मुंह करते हुए बोलै, "पापा, प्लीज़। आप मुझे चोदोगे? प्लीज, पापा. चोद दो मुझे."

"क्या सच में?" समर्थ ने उसे छेड़ा, "क्या तुम्हें ये पाप नहीं लगता?" कहते हुए दो उँगलियों से भगनासे को मसल दिया.

"मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता. मुझे अपनी आत्मा को तृप्त करना है. मेरी चूत अब और सहन नहीं कर सकती. मुझे आपका लंड चाहिए पापा! प्लीज मुझे मत तरसाओ!" सुरेखा ने विनती की.

समर्थ ने अपनी बेटी की याचना सुनी और उसे हलके से बिस्तर पर लिटा दिया. अपने लंड को सुरेखा की चूत पर रखा ही था कि सुरेखा कमर उचकाने लगी. समर्थ ने उसके पेट पर हाथ रखा और उसे संयत लिया. फिर धीरे धीरे अपने लंड को अंदर उतारने लगा.

"पापा, डाल दो अंदर" सुप्रिया ने नितिन के नीचे धक्के खाते हुए कहा. फिर उसने घोड़ी का आसन लिया और नितिन को पीछे से चोदने को कहा. "ऐसे अच्छे से दिखाई देगा. मौसी भी नाना के लंड की दीवानी होने वाली है."

ये यही सत्य भी था. सुरेखा अपने पांव इधर उधर फेंक रही थी. समर्थ ने बहुत संयम के साथ अपना पूरा लंड अंततः अंदर घुसा ही दिया. सुरेखा को अपनी चूत इससे अधिक भरी हुई कभी अनुभव नहीं हुई थी. उसने ये भी समझ लिया कि अब वो कभी भी अपने पिता को चोदने से मना नहीं कर पायेगी. इतना पूरी रूप उसकी पूरी गहराई तक छूने वाले लंड को छोड़ना असंभव था. उसे अपनी माँ और बहन का इन तीनों से अथाह प्रेम का कारण समझ में आ गया. समर्थ ने हलके हलके धक्के लगाने शुरू किये. उसे नागेश के लंड आकार पता था, और उसकी बेटी कई दिनों से चुदी भी नहीं थी. सुरेखा ने नीचे देखा और अचरज किया कि वो कैसे ऐसे मूसल को ले पाई. फिर चिंता छोड़ आंखे बंद कर सुख के सागर में गोते लगाने लगी.

"नानी देखो!" निखिल ने शीला का ध्यान आकर्षित किया. "नाना मौसी को चोद रहे है! और मैं झड़ने वाला हूँ!"

शीला ने सुरेखा से ऑंखें मिलायीं और एक संतुष्ट मुस्कान के साथ निखिल के रस का पान करने लगी.

"उह्ह्ह! हाय पापा, पहले क्यों नहीं क्या मुझे आप सबने अपने खेल में सम्मिलित?" सुरेखा ने अपने कूल्हों को ऊपर नीचे करते हुए पूछा. "मेरे अंदर ही झड़ना पापा. मुझे आपका पूरा पानी अंदर लेना है."

समर्थ इस बार अधिक समय तक नहीं रुक सकता था. वो पिछले दो घंटों से चुदाई कर रहा था और अब तो उसने अपनी छोटी बेटी को पहली बार चोदा था. समर्थ ने अपनी गति और तेज कर दी. वो सुरेखा की चूत से बहते हुए पानी में अपना चप्पू चलाये जा रहा था. सुरेखा झड़ती जा रही थी और समर्थ इस आयु में भी पूरी शक्ति के साथ उसे चोदे जा रहा था.

"सुरेखा, मैं झड़ने वाला हूँ. देख शीला, मैं अपनी बेटी की चूत में झड़ रहा हूँ."

"देख रही हूँ. भर दे उसकी चूत. मिटा दे अपनी बेटी की प्यास."

"बेटा क्यों न तुम भी नाना के साथ ही झड़कर हम दोनों बहनों को एक साथ तर कर दो." सुप्रिया ने नितिन से कहा.

नितिन ने बिना कुछ बोले अपने धक्को को अति तीव्र कर दिया. सुरेखा ने अपने पिता का बीज अपनी चूत को सींचते हुए महसूस किया. वो इस पूरे समय में तीन बार झड़ चुकी थी. उधर सुरेखा ने नितिन को भी सुप्रिया के अंदर झड़ते हुए देखा. उसने अपनी चूत पर हाथ रखा और उसे छूते ही एक बार और उसका पानी छूट गया. वो निढाल हो कर पड़ गई. समर्थ उसके ऊपर से हलके से हटा और लेट गया. सुरेखा ने सोचा न था कि उसे एक ही दिन में इतने चौंकाने वाले वृत्तांत देखने और खेलने के लिए मिलेंगे. वो स्वप्निल आँखों से एक मुस्कान लेकर अपनी सांसे संभाल रही थी.

उसकी आँखें बंद थीं और उसे ऐसा आभास हुआ जैसे कोई उसकी टाँगों को फैला रहा है. फिर अपनी चूत पर किसी की जीभ का अनुभव हुआ. इस बार उसने आँखें खोलीं. उसके पिता उसके साथ लेटे हुए उसे प्रेम से निहार रहे थे. और नीचे देखने पर उसे अपनी माँ का सिर दिखाई पड़ा.

“तेरी माँ ऐसे नहीं छोड़ने वाली. मेरा रस उसके मुंह में जाना था जब तुम आयी थी. तो वहीँ जा रहा है, बस उसका श्रोत इस बार तुम्हारी चूत के द्वारा है.” उसके पिता ने उसे समझाया.

सुरेखा के लिए ये एक नया अनुभव था. उसकी माँ उसकी चूत को मानो खोल कर उसमें से अपनी जीभ के माध्यम से पूरा रस पीने की इच्छुक थी. किसी स्त्री के द्वारा ऐसा कृत्य उसके साथ पहली बार हो रहा था. और इसका आनंद भी अत्यंत सुखद था. उसने आँखें फिर बंद कर ली.

कुछ ही पलों की देरी के बाद उसके दूसरी ओर का बिस्तर दबा और उसे अपनी बहन सुप्रिया की सुगंध आई. आँखों को खोलने पर उसने भी सुप्रिया को प्रेम से देखते हुए पाया.

“तुम बहुत सुंदर हो.” ये कहते हुए सुप्रिया ने उसके होंठों से फिर होंठ जोड़ लिए और दोनों बहनें चुंबन में लीन हो गयीं.

सुरेखा भाव विभोर थी, उसकी बहन उसे चूम रही थी और उसकी माँ उसकी चूत चाट रही थी.

“बहुत मीठी है मेरी बेटी, और आपके रस से मिलकर तो इसका स्वाद ही विलक्षण है.” शीला ने अपना कार्य समाप्त करने के बाद बोला।

“मॉम. मेरे लिए कुछ बचा या नहीं?” सुप्रिया ने प्रश्न किया.

“नहीं! परन्तु अब कोई बाधा नहीं है. जब चाहे पी लेना. अब तो ये भी हममें जुड़ गयी है.” शीला ने उत्तर दिया.

“मम्मम।” सुरेखा ने अपनी सहमति दर्शाई.

"मुझे आशा है कि ये सब वीडियो में ठीक से रिकॉर्ड हो गया होगा." उसने अपने पिता की आवाज़ सुनी.

ये सुनकर उसकी आँखें खुल गयीं और उसे अपने सामने उसकी माँ का हँसता हुआ चेहरा दिखा।

“रिकॉर्ड?

“और क्या, तुम्हारी पहली चुदाई की स्मृति तो रखनी है होगी न?” उसकी माँ ने उसे समझाया और फिर उठकर अपने पति के पास जाकर खड़ी हो गईं।

सुरेखा ने अपने परिवार को देखा तो उसका मन उदास न रहा. यहाँ आने से पहले उसे उसके जीवन में जो भी कमियाँ दिख रही थीं, वो मानो दूर हो चुकी थीं. वो अपने घर लौट आई थी. इस आभास के साथ उसने अपनी आँखों को फिर से बंद किया और शांति से सो गई.

.......................................
 
अध्याय ४: चौथा घर - मिशेल और रिचर्ड डिसूज़ा १

शाम को अपने कार्यालय से आने पर रिचर्ड ने मिशेल को किस किया.

"कैसी हो हनी?"

"आई ऍम फाइन. तुम?" मिशेल इतने साल बाद भी हिंदी में ठीक से बात नहीं कर पाती थी. रिचर्ड इस पर आश्चर्य करता था क्योंकि केरल का होने के बाद और विदेश में रहने के बाद भी उसकी हिंदी अच्छी थी.

"जैसन का कॉल आया था, वो दो सप्ताह बाद आ रहा है. कह रहा था की ईव, ऐलिस और मार्क भी आने को मान गए हैं." रिचर्ड ने बताया.

"वाओ, देट इस गुड न्यूज़. बहुत मजा आएगा. शैली तो ऐलिस की बड़ी फैन है."

"और मैं भी." रिचर्ड ने हंस कर कहा.

"यू नॉटी मैन ! बस तुम्हारा दिमाग में बस एक ही चीज़ रहता है."

"अरे जिसे तुम्हारे जैसी जूसी (रसीली) बीवी मिली हो वो और सोच भी क्या सकता है. अच्छा, सुनो वो क्लब के केयर टेकर को कहना चार रूम ब्लॉक कर दे. जैसन के बिज़नेस पार्टनर्स भी आ रहे हैं उसके साथ. कह रहा था यहीं रोक लें तो ठीक है."

"ओह, अच्छा, रिकी और डॉन से मिले हुए बहुत दिन हो गए."

"यू नॉटी गर्ल." रिचर्ड ने मिशेल के कुछ देर किये कथन को ही मोड़कर बोला।

दोनों हंस दिए. फिर रिचर्ड नहाने चला गया.

*************

"हे सिस !" डेविड ने खाने के बाद शैली को पुकारा।

"यस, ब्रदर डियर."

"तुमने सुना, मामा और फॅमिली आ रहे हैं."

"ओ या. कूल. पिछली बार बहुत मजा आया था साथ में. मार्क बहुत हॉट है."

"और ऐलिस बहुत स्वादिष्ट."

"हम्म्म, पापा की भी लार टपकने लगती है उसे देखकर. और तेरा कुछ बना एंजिल आंटी के साथ?"

एंजिल शैली की सहेली शिरीन की माँ थी. डेविड उसकी माँ के चक्कर में था.

"कल बुलाया है घर में कुछ सामान एडजस्ट करने के लिए. तुम और शिरीन कल कोई मूवी देखने चले जाओ. "

"अच्छा जी! और मुझे क्या मिलेगा?"

डेविड ने उसके कान में कुछ फुसफुसाया.

"ओके, मैन. डन. मैं उसे मूवी ले जाऊँगी और रात में तेरी मूवी देखूँगी."

डेविड ने अपनी हर आंटियों के साथ चुदाई का वीडियो बनाता था. इनका तात्पर्य मात्र मनोरंजन होता था. शैली को इनका ज्ञान था और वो कभी कभी उनका उपयोग भी करती थी.

"ओके गुड नाईट."

दोनों अपने अपने कमरों में चले गए.

**********
 
दो सप्ताह बाद:

मिशेल ने दरवाज़ा खोला तो अपने बड़े भाई जैसन को खड़ा देखा. उसके साथ कुछ सूटकेस भी थे.

"जैसन!" मिशेल ने ख़ुशी दिखते हुए कहा, "कैसे हो?"

"बहुत अच्छा!" जैसन ने अपनी बहन को बाँहों में लेकर कहा.

और फिर उसने मिशेल को अपनी बाँहों में उठा लिया. मिशेल उसके ताकतवर शरीर में सिमट गई. मिशेल ने अपनी बाहें जैसन के गले में डाल दीं। उसे उठाए हुए जैसन सोच रहा था कि हालाँकि वो हमेशा उसे अपनी बेबी समझता था, पर अब उसे देखकर उसकी परिपक्वता का अहसास होता था. ये सोचते हुए उसका लंड खड़ा होने लगा. मिशेल के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

उसने मन में सोचा, "मेरा ठरकी भाई, फिर चुदाई के बारे में सोचने लगा है."

जैसन ने उसे नीचे उतारा और ध्यान से देखा. अब चूँकि वो घर में अकेली थी और ये अनुमान किये हुए थी कि जैसन २ घंटे बाद आएगा, तो वो एक हलके टॉप और शॉर्ट्स ही पहने हुए थी.

"तुम इन कपड़ों में बिलकुल गुड़िया लग रही हो."

"मैं इनके बाहर और भी अच्छी लगती हूँ, लोग तो यही कहते हैं."

"तुम पिछले ६ महीने में बहुत अच्छी लगने लग गई हो, मिशेल." जैसन बोला, "इतना जितना कि तुम सोच भी नहीं सकते." उसने मन ही मन सोचा.

"ईव और बच्चे कहाँ है?" मिशेल ने पूछा.

"वो थोड़ा कुछ सामान लेने के लिए रुक गई. आ जाएगी १ घंटे में."

"अरे मैं भी कितनी बुद्धू हूँ, बाहर खड़ा किया हुआ है. अंदर आओ और विश्राम करो."

मिशेल अंदर की ओर मुड़ी और जैसन उसके पीछे हो लिया. वो मिशेल के मटकते हुए नितम्ब देखकर विचलित हो गया. सोचने लगा की वो उनके साथ क्या क्या न करेगा. अपने बैग उसने बाहर ही छोड़ दिए.

"सब लोग कहाँ हैं?" जैसन ने पूछा।

'रिचर्ड तो ऑफिस में है, शैली अपनी सहेली के घर गई है, आएगी शाम तक. डेविड स्विमिंग पूल में तैर रहा है."

"हाँ गर्मी तो बढ़ गई है."

"चाहो तो उसको ज्वाइन कर लो पूल में."

"अभी नहीं. बाद में देखेंगे. अभी बहुत थकान है. अगर एक ड्रिंक मिल जाये तो अच्छा लगेगा." सोफे पर लुढ़कते हुए जैसन ने कहा.

मिशेल ने जैसन को उठाया और ऊपर के एक कमरे में ले गई. "ये तुम्हारा और ईव का कमरा है. मार्क सामने के कमरे में रहेगा. लड़कियों को मैंने एक साथ कर दिया है."

"थैंक्स, सिस!" जैसन ने अपने बैग बिस्तर पर रखते हुए कहा.

"तुम फ्रेश हो जाओ, और फिर नीचे आओ. कॉफी या ड्रिंक जो भी इच्छा हो, ले लेना. मुझे घर की सारी न्यूज़ और गॉसिप चाहिए."

मिशेल ने जैसन के होठों पर एक हल्का सा चुम्बन जड़ा और चली गई. बाहर डेविड ने अपने कसे शरीर को स्विमिंग पूल से बाहर खींचा और तौलिये से पोंछते हुए घर की ओर आने लगा. वो अपने मामा के परिवार के बारे में ही सोच रहा था. ऐलिस के बारे में सोचकर उसका लंड अकड़ने लगा. उसकी मामी भी कुछ कम न थी, झरहरी और हर अंग मानो नपा तुला हो.

"ये दो हफ्ते सच में बहुत आनंद दायक होने वाले हैं." उसने मन में सोचा.

घर में प्रवेश करते ही उसकी ऑंखें रसोई की ओर गयीं जहाँ उसकी माँ मिशेल कुछ काम कर रही थी. शॉर्ट्स में उसकी हिलती हुई गांड देखकर डेविड के लंड का हाल और बुरा हो गया. वो चुपके से मिशेल के पीछे गया और बाएं हाथ से एक मम्मा पकड़ लिया और दाएं हाथ सी उसकी चूत को कपडे के ऊपर से ही मसलने लगा.

"मॉम, कैन वी फक?" पलक झपकते ही उसे अपने दाएं हाथ में कुछ गीलापन महसूस हुआ.

"डेविड, नो !" मिशेल ने फुसफुसाते हुए कहा.

"क्या हुआ, मॉम. क्या मन नहीं है? "

"नहीं बेटा , जैसन आ गया है अभी 15 मिनट पहले. हमें अब संयम रखना होगा. समझे।"

पर डेविड ने रुकने की जगह अपने दाएं हाथ से मिशेल को चूत को मुट्ठी में ले लिया.

"तो हम अब ये सब नहीं कर सकते, मॉम?" डेविड ने चूत पर दबाव बढ़ाते हुए पूछा.

"मेरा भी बहुत मन है, मैंने सोचा था की जैसन २ घंटे बाद आएगा और हमारे पास समय रहेगा. पर वो पहले ही आ गया. हम अब कुछ नहीं कर सकते. समझो प्लीज."

"अरे वो सो गए होंगे इतनी लम्बी फ्लाइट के बाद, चलो एक राउंड लगाते हैं."

"नहीं, बिलकुल नहीं. बाद में. प्रॉमिस. जब सब सो जायेंगे."

"ओके मॉम"

डेविड को भी समझ में आ गया कि उसकी माँ, पिता और बहन के बीच जो है, उसे किसी को पता नहीं चलना चाहिए.

"आज रात, पक्का. अपनी ताकत बचा कर रखना।"

मिशेल ने अपने कपडे बदलने के लिए अपने कमरे ओर प्रस्थान किया. उसे चिंता थी की जैसन उसे इस गीली शॉर्ट्स में देख न ले. पर देर हो चुकी थी. जैसन ने जब डेविड की आवाज़ सुनी थी तो वो नीचे आ गया था उससे मिलने. पर उसने जो सुना उसके बाद उसका मन प्रसन्न हो गया. उसे अपने बेटे मार्क, पत्नी ईव और बेटी ऐलिस की याद आ गई. खास तौर पर पत्नी ईव की जिसे लम्बे चौड़े पुरुष जिनके लंड बड़े और मोटे हों अत्यंत लुभावने लगते थे. और जैसन को कमसिन लड़कियों में ज्यादा दिलचस्पी थी, वो भी लंड के मामले में कम नहीं था, वर्ना ईव उससे शादी कभी न करती. दोनों आपसी अनुमति से बाहर भी सेक्स का सुख उठाते थे. और कई बार एक साथ.

अब डेविड और मिशेल की बातें सुनकर उसे नई आशा दिखी कि जो हुआ अच्छे के लिए हुआ. पिछली बार दोनों परिवार निकट आने से कुछ ही दूर रह गए थे. समय के अभाव के कारण वो अंतिम सीमा पर न कर सके थे. पर ये अवश्य ही था कि वो इस बार चुदाई करने वाले थे, एक परिवार के रूप में.

"हमम्म , ये दो हफ्ते बहुत आनंदकर होने वाले हैं." सोचते हुए जैसन ने मिशेल के कमरे की ओर चल दिया.

कमरे का दरवाज़ा हल्के से ही अटका था. अंदर मिशेल कपडे बदल रही थी. इतने में ही जैसन को उसकी चूचियों और कसी गांड का दर्शन हो गया. उसका हाथ अनायास ही अपने लंड पर गया और वो उसे पैंट में ठीक करने लगा. मिशेल ने एक हल्की सी ड्रेस निकाली और पहनने लगी. ऐसा करने में जैसन को उसकी पनियाई हुई चूत भी दिख गई. घर के वातावरण के कारण आजकल मिशेल अंगवस्त्र नहीं पहनती थी.

"अब बहुत हो गया. इसे अब चोदना ही होगा। नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा." सोचते हुए जैसन मिशेल के पीछे गया और उसे बाँहों में ले कर उसके मम्मे दबाने लगा. मिशेल बिचक गई.

"डेविड, मैंने मना किया न. रात में चोद लेना मुझे, प्लीज अभी छोड़ो. जैसन कहीं देख न ले ".

"अब देर हो गई, सिस डियर!" जैसन ने उसके कान में हलके से फुसफुसाया और अपने हाथों से मम्मे दबाना चालू रखा, “ये जैसन ही है.”

मिशेल के मुंह से एक हलकी सी कराह निकल गई. जैसन अब उसके मम्मे और घुंडियां मसल रहा था.

"जैसन तुम! मैंने सोचा कि..." वो रुक गई "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

"वही जो हम कई बार पहले भी कर चुके हैं,"

"नहीं जैसन, अब नहीं. प्लीज." मिशेल ने ऐतराज़ जताते हुए कहा. पर उसे जैसन का लंड पीछे से कड़ा होते हुए अनुभव हो रहा था.

"तो कब, स्वीट सिस? रात तो तुमने डेविड को प्रॉमिस किया है." जैसन ने एक हाथ से मिशेल के मांसल नितम्ब दबाते हुए पूछा.

"अहम्म्म्म" मिशेल को उत्तर नहीं सूझा. फिर यकायक उसने जैसन के मुंह को अपनी और खींचा और एक गहरा चुम्बन लिया.

"सच है, अभी जैसा कोई समय नहीं. मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ. अभी. शायद मुझे दुनिया में अभी कुछ और नहीं चाहिए." जैसन ने आग्रह किया.

"उउउउउउउह, मैं भी चाहती हूँ जैसन. पर ईव और बच्चे"

"उनकी चिंता न करो, वो इतनी जल्दी नहीं आने वाले। आ जाओ."

"इन कपड़ों के साथ? तुम कपड़े तो निकालो."

जैसन की ऑंखें मिशेल पर से हठ नहीं रही थीं. मिशेल आकर उसके गले लग गई.

"ओह जैसन! कितने दिनों बाद मिले हो. तरस गई थी मैं तुम्हारे लिए."

"मैं भी, सिस, मी टू. पर अब दो सप्ताह यहीँ हूँ. और तुम्हारे परिवार में अब लगता है म्हारे देश का खुलापन भी आ गया है, तो हम इसका पूरा बेनिफिट लेंगे."

जैसन ने जल्दी में अपने कपड़े उतारे और मिशेल को चूमते हुए उसे बिस्तर पर लिटा दिया. मिशेल के दोनों पांव फैलाकर अपना मुंह मिशेल की सुबकती चूत पर रखा और भूखों की तरह चाटने लगा. मिशेल की चूत तो पहले ही से पनियाई हुई थी, जैसन की जीभ अंदर जाते ही उसने पानी छोड़ दिया. मिशेल से भी अब रहा नहीं जा रहा था. डेविड ने उसके शरीर की अग्नि को प्रज्ज्वलित कर दिया था. अब वो चाहती थी कि जैसन देर न करे और जल्दी से उसे चोद दे, जैसे कि उसका बेटा और पति चोदते हैं.

"ओहहहह जैसन, माई डार्लिंग ब्रदर. अब मुझे चोद ही डालो, मुझसे सहन नहीं हो रहा. पुट योर कॉक इन माई पूसी."

जैसन ने दो उँगलियों को उसकी चूत में चलते हुए हलकी गर्जना के साथ कहा," येअहह बेबी सिस , मैं अब अपने मोटे लंड से तुम्हारी पूसी की धज्जियाँ उड़ा दूंगा."

"प्रॉमिसेस, प्रॉमिसेस!" मिशेल ने मचलते हुए उत्तर दिया, "बोलो मत करके दिखाओ."

"अपने पाँव और फैलाओ. क्योंकि बिग ब्रदर अपना ये लंड तुम्हारी चूत में पेलने वाला है."

जैसन ने अपना लंड चूत के मुंह पर रखा और धीरे धीरे अंदर डालने लगा.

"तुम्हें मेरा लंड बहुत पसंद है न, सिस ?"

मिशेल ने हामी भरी.

"अब पेल दो पूरा, अब देर मत करो, फक मी लॉन्ग एंड हार्ड."

"ओके, सिस ! एज़ यू विश." कहते हुए जैसन ने एक लम्बा शॉट मारा और पूरा लंड अंदर पेल दिया.

"आह!" मिशेल ने सीत्कार भरी. "क्या तुम ऐलिस को भी ऐसे ही चोदते हो?"

"एह एह यह." जैसन ने अपने लंड को अंदर बाहर करते हुए कुछ बुदबुदाया.

"तुम्हें उसकी चूत का स्वाद बहुत पसंद होगा, है न?" मिशेल ने जैसन को उकसाते हुए पूछा, "उउउउउउउह, फक!'

"और तुम्हें डेविड के लंड का स्वाद पसंद होगा. क्यों, सिस ?" जैसन ने प्रश्न किया.

"बहुत ज्यादा, मामा। " डेविड ने पीछे दरवाज़े से टिप्पणी की. "अरे मॉम, तुम चुदते हुए इतना हल्ला क्यों करती हो? मुझे किचन तक सुनाई दे रहा था."

मिशेल ने डेविड की ओर सिर किया तो देखा वो दरवाज़े से टेक लगाकर मुस्कुरा रहा था. स्विमिंग ट्रंक्स में से उसका तना हुआ लौड़ा टेंट बनाये हुआ था. जैसन की तो साँस रुक गई. उसने धक्के मारना बंद कर दिया और हतप्रभ खड़ा हो गया.

"डेविड!" मिशेल ने डांटने के अंदाज़ में कहा, "तुम दरवाज़ा खटखटाना कब सीखोगे? तुमने तो हमें डरा ही दिया."

डेविड ने उनकी बात को नकारते हुए जैसन को सम्बोधित किया, "हेलो जैसन अंकल, मॉम की चूत बहुत स्वादिष्ट और रसीली है, है न?"

जैसन और मिशेल इस प्रश्न पर हक्के बक्के हो गए.

अंततः मिशेल ने कहा "डेविड, इतनी अश्लीलता की कोई ज़रुरत नहीं थी. "
 
Back
Top