जय- पता है, तुम्हारी गाँड़ लाखों में एक है। उफ़्फ़फ़, क्या शेप है तुम्हारे चुत्तर का। उसने धीरे धीरे धक्के मारने शुरू किए। कविता के मुंह, से सीत्कारें, उठने लगी। जय ने उसकी गाँड़ पर बने टैटू को छूते हुए, कस कसके उसकी गाँड़ मारने लगा। कविता के पास चीखें मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जय को उसमे बेहद आनंद आ रहा था। गाँड़ मारते हुए, कविता की गाँड़ से हलवा थोड़ा थोड़ा नीचे गिरने लगा। पर जय ने कुछ नही कहा।अब कविता भी दर्द से निकल आनंद के चौखट चूम रही थी।
कविता पीछे मुड़के, जय की ओर देखते हुए, बोली," ऊऊऊ...हहहहहह हां..... ऐसे ही मारो गाँड़। इस रक्षाबंधननन... बहन का तोहफा है। मज़ा आ रहा है ना। हम भाईचोदी रंडी है। ऊऊऊ हहहहहहह आआहह, ऊफ़्फ़फ़।
जय- हम इस पावन अवसर पर तुम्हारी गाँड़ मार रहे हैं दीदी, वो भी अपने लण्ड पर तुम्हारी बंधी हुई राखी के साथ। इससे बड़ा घिनौना रिश्ता हम कायम नही कर सकते। तेरी गाँड़ में जो हलवा है, उससे मज़ा और बढ़ गया है। तुमको अभी लण्ड भी चुसायेंगे। तुम्हारी गाँड़ में हलवा मिक्स तैयार कर रहे हैं। तुम्हारी गाँड़ का स्वाद, हलवे का स्वाद और लण्ड का स्वाद मिक्स हो जाएगा। खाएगी ना।
कविता पे सेक्स और वियाग्रा का नशा चढ़ा हुआ था। उसने जीभ से होंठों को चाटते हुए कहा," उम्म्महह, ऊफ़्फ़फ़ सोचके ही मुंह मे पानी आ रहा है। इस तरह तो और मज़ा आएगा। लाओ दो ना।
जय- सब्र करो रंडी रानी, तुमको मीठा फल मिलेगा। पहले अपनी गाँड़ की चुदाई तो करने दे।" जय उसको करीब पांच मिनट और चोदा, कविता के बार बार कहने पर उसने लण्ड निकाला और कविता भूखी कुतिया की तरह लण्ड चाटने लगी। लण्ड पर चिपचिपा लसलसा पदार्थ लगा हुआ था। कविता ने उसे जी भर के चाटा। कविता की बुर में उसकी पैंटी बाहर आ रही थी, जय ने वो पैंटी उसके मुंह मे घुसा दी। जय ने फिर लण्ड वापिस कविता की गाँड़ में घुसा दिया, और चोदने लगा। कविता के मुंह मे उसकी बुर के रास से भीगी पैंटी थी, जिससे उसकी आवाज़ सिर्फ गूं...गूं.... कर आ रही थी। कविता एक हाथ से अपना बुर रगड़ रही थी। पर दोनों में से कोई अभी रुकने को तैयार नहीं था। थोड़ी देर बाद जय ने फिर लण्ड निकाला, और कविता की खुली चुदी फैली गाँड़ को निहारा। उसने थूक उसकी गाँड़ में थूका। और फिर गाँड़ मारने लगा। जय ने फिर और थोड़ी देर कविता की गाँड़ मारी। फिर कविता के हाथों से कटोरी ले ली। उसने लण्ड निकाला, और उसकी गाँड़ में कटोरी में इकट्ठा थूक और लेर सब डाल दिया। उसने फिर लण्ड वापिस घुसा दिया। कविता की गाँड़ में एक मस्त मीठा मसाला तैयार हो रहा था। जय ने उसकी पैंटी निकालकर अपने गले में डाल लिया। कविता मस्ती में ठुकवाती जा रही थी। उसने बोला,"ऊफ़्फ़फ़, आआहह, ऊईई तुम बिल्कुल वैसे ही कर रहे हो, जैसा हमको चाहिए था। ऊफ़्फ़फ़। हमारी गाँड़ में सब मिला दिया। इसका क्या करेंगे? हमको खिलाओगे ना।
जय- हां डार्लिंग तुम्हारे लिए ही है, तुमको यही खाना है। अभी थोड़ी देर में हम मूठ भी गिरा देंगे। फिर तुम्हारा प्रोटीन भी आ जायेगा इस मीठे मसाले में। और ठहाका लगाके हंसा। कविता भी हंसने लगी। थोड़ी देर बाद जय बोला," ऊफ़्फ़फ़ ओह्ह ओह्ह लगता है मूठ गिरने वाला है। आह....आह।
कविता," आआहह हमारा भी होने वाला है। आह ओऊऊऊ... अंदर ही गिराओगे ना। अपनी बहन को दे दो, अपना ताज़ा ताज़ा मूठ। हमको बहुत मस्त लगता है। आ जाओ चुआ दो। आआहहहहहहहहह
और दोनों एक साथ झड़ गए। जय ने मूठ की 5 6 लंबी पिचकारियां मारी। फिर उसने अपना लण्ड निकाला, और उसकी पैंटी कविता की गाँड़ में ठूस दी।
कविता- ये क्यों ठूस दी।
जय- जहाँ तक तुमको जानते हैं दीदी, तुम कुछ भी बर्बाद नहीं करना चाहोगी। इसलिए पहले तुम लण्ड से सब चाटके साफ करोगी। और जो डिश तुम्हारी गाँड़ में है, उसे तुम्हारी पैंटी रोके रखेगी।
कविता बिल्कुल माधुरी दीक्षित सी मूती से दांत बिखेड़ दी। पर वासना से डूबे उसकी आंखें बिना पालक झपके उसके लण्ड को निहार रही थी। जय के लण्ड पर मटमैले लाल रंग चढ़ा हुआ था। क्योंकि उसमें गाजर का लाल हलवा, थूक, मूठ का मिला जुला मिश्रण था। कविता घुटनो के बल नीचे बैठ गयी। और जय की ओर देखते हुए, लण्ड को उठाकर निचले हिस्से को चाटने लगी। फिर मुस्कुराते हुए बोली," ये तो मीठा है।"
जय हंसते हुए," क्यों नही जान तुम्हारे गाँड़ और गाजर की हलवे की मिठास मिलकर और मीठी हो गयी होगी।" कविता झट से बोली," और तुम्हारा थूक और मूठ भी।" जय और कविता दोनों हंसे। कविता पूरा लण्ड साफ कर गयी और जय के लण्ड जे अंदर बचा खुचा मूठ भी चूस गयी।
फिर जय ने कविता को कटोरी वापिस दे दी। और कविता हगने की पोज़ में बैठ गयी। कटोरी को ठीक गाँड़ के नीचे लगा लिया। कविता," गाँड़ बहुत भारी लग रहा है, जैसे कि हगने के पहले लगता है।"