S
StoryPublisher
Guest
अपडेट 189
दिलीप- जब मैं ठाकुर के घर आया तो सब ठीक था
रात का खाना ख़ाके मैं रूम में आके लेट गया
तभी कोई गेट नॉक करने लगा
मैं जाके गेट खोला तो देखा वँया खड़ी थी
दिलीप- कुछ चाहिए आपको
वँया- नही मैं तो यह पूछने आई थी कि कल गाओं चलोगे ना
दिलीप- किस लिए
वँया- भूल गये कल हमारा रिज़ल्ट है
दिलीप- चलूँगा
[मेरी बात सुनके वँया चली गयी]
और मैं बेड पे लेट गया
सुबह ठाकुर और उसकी फॅमिली गाओं की तरफ चल पड़े
दोपहर तक हम लोग गाओं पहुँच गये
गाओं बहुत सुंदर था
मैं यानी शक्ति गाओं घूमने लगा
ऐसे ही यह दिन भी बीत गया
जब मैं ठाकुर के घर आया तो देखा वँया एक जगह अकेली बैठी हुई है
मैं उसके पास गया
लेकिन वो उठ गयी और जाने लगी
मैं उसका हाथ पकड़ लिया
वो मूड कर मेरे गाल पे थप्पड़ मार दी
इससे पहले कि वो मुझे दूसरा थप्पड़ मारती मैं उस्केव अपनी बाहो में खींच लिया
मेरी बाहो में आते ही वो शांत हो गयी
वँया- तुम सच मे सब कुछ भूल गये हो
दिलीप- [मेरी तो कुछ समझ में नही आया कि वँया क्या बोल रही है
वैसे पिछले 2 सालो में मेरे साथ क्या हुआ मुझे खुद कुछ याद नही है
वँया- यह तुम्हारा सर्टिफिकेट तुम अपने क्लास में फर्स्ट आए हो
[मैं वो सर्टिफिकेट ले लिया
फिर वँया चली गयी मैं रूम में आके सोचने लगा कि क्या सच में पिच्छले 2 साल से इनके साथ हूँ
[उधर वँया रो रही थी
वँया- देखो ना मैं तुम्हारे लिए पूरे स्कूल में फर्स्ट आई हूँ और तुम्हे कुछ याद ही नही है
उधर विद्या दी तुम्हारी वजह से इतनी परेशान हैं
प्लीज़ जल्दी से ठीक हो जाओ
देखो अगर तुम ठीक हो जाओगे तो सब खुश रहेंगे मैं तुम्हारी हर बात मानूँगी
प्लीज़ ठीक हो जाओ
[इधर मैं लेटा हुआ था तभी कोई गेट नॉक करने लगा
मैं गेट खोला तो देखा सामने ठाकुर खड़ा है
ठाकुर अंदर आ गया और अलमारी के पास अपना हाथ पीछे ले गया
तभी अलमारी साइड हो गयी
और उसकी जगह एक ख़ुफ़िया रास्ता आ गया
फिर ठाकुर मेरे पास आ गया
बड़े मामा- अंदर जाओ अंदर जाके तुम्हे एक रूम दिखेगा जिसपे वीर प्रताप सिंग लिखा है उस रूम में जाना तुम्हारे हर सवाल का जवाब तुमको मिल जाएगा
[मैं बिना ठाकुर की बात का जवाब दिए अंदर चला गया आगे बढ़ते हुए मुझे वो रूम दिखा मैं उस रूम में घुस गया रूम में
अंधेरा था मैं लाइट का स्विच ढूँढने लगा
मुझे लाइट का स्विच मिल गया मैं लाइट ऑन किया और रूम को अच्छी तरह से देखने लगा
4 टेबल पे बहुत सारे बुक्स रखे हुए थे
मैं दीवार पे देखने लगा मेरी नज़र एक फोटो पे पड़ी तो मेरा दिमाग़ घूम गया
एक फोटो में मेरी माँ और दूसरा आदमी मतलब वो मेरे पापा नही थे
वो कोई और था
रूम में एक अलमारी भी था
मैं उस अलमारी के पास गया
अलमारी खोला तो एक बड़ी सी डाइयरी और एक वीडियो कॅमरा था
डाइयरी के उपर एक लेटर भी था
मैं वो लेटर खोला
लेटर में लिखा था
पहले पूरी डाइयरी पढ़ लो फिर वीडियो कॅमरा ऑन करना
आपको माँ की कसम
मैं सोच में पड़ गया कि लिखने वाले को जैसे पता था कि मैं डाइयरी पढ़ने आउन्गा
मेरी जिंदगी में ऐसा दिन भी आना था
जब मैं 3 साल का था तब मेरे पापा मुझे इटली ले गये वो बचपन से मुझे कहते आए कि मेरी माँ की मौत का ज़िम्मेदार
ठाकुर धर्मेश वीर प्रताप सिंग है
मेरी माँ का भाई....