इधर अनीस शाज़िया को पकड़ कर वही लिटा देता है....और उसकी चुचियो को आपस मे पकड़ कर सटा देता है और वसीम उसकी चुचियो की दरार में थर्मामीटर घुसेड़ देता है और अपना एक हाथ से शाज़िया की चूत पे फेरने लगता है....और इसका पुरा आनंद लेने के लिए शाज़िया अपनी टांगो को पूरा फैला लेती है......और वसीम अपनी तीन उंगलिया उसकी चुत में घुसेड़ कर घपाघप उसको उसके चरम की तरफ ले जाने लगता हूँ अनीस और जीशान भी कुछ नही बोलते.......
कुछ ही देर में शाज़िया की साँसे तेज होने लगती है...और अनीस फटाक से शाज़िया की चुचियो में रखी थर्मामीटर को निकाल कर जीशान की तरफ बढ़ा देता है और उसकी चुचियो को चूसने लगता है....जीशान भी कुछ करता लेकिन उसने पहले बुखार देखने की सोची और ये देख कर वो बड़ा खुश हुआ कि शाज़िया का बुखार अब नियंत्रण में था और कुछ दवाइयों के डोज लेने के बाद वो ठीक हो जाएगी....
इधर दादा पोते ने मिल कर शाज़िया को उसके चरम की तरफ तेजी से पहुचाने में लगे थे और हुआ भी ऐसा ही .....शाज़िया एक संतुष्टिपूर्ण चरम का आनंद लेते हुए झड़ी थी.... और उसकी चीख ये बताने के लिए काफी थी कि वो अब पूरी तरह दे संतुष्ट हो चुकी है.....
जीशान बिचारा मुह ही देखता रह गया.....और शाज़िया झड़ गयी....
जीशान - मुझे तो मौका ही नही मिला....और शाज़िया हसने लगती है साथ ही साथ अनीस और वसीम भी....
अनीस - कोई बात नही मेरे भाई मा कौन सा भागी जा रही है जब मन हो तब मा हमारे लिये अपनी टांगे खोल देगी.....
शाज़िया उसकी इस बात पे शर्मा कर रह जाती है....
तभी जीशान मुह बनाता हुआ कहता है ठीक है ठीक है...चलो नाश्ता करते है....
अब शाज़िया उठ कर अपना गिरा हुआ पेटिकोट उठा कर पहन लेती है और फिर सब नाश्ता करने लगते है और नाश्ता करने के दरमियान ही जीशान बाकियो को शाज़िया के बुखार का हाल भी बता देता है.....
नाश्ते के टेबल पे जीशान शाज़िया को बोलता है...
जीशान - माँ भइया ने आपके लिए एक बहु ढूंढ रखी है.....नाम वाम का पता नही बाकी सब अनीस भइया ख़ुद बताएंगे....
अनीस को इस हमले की उम्मीद नही थी और सब के हाथ एकाएक रुक गए थे....
शाज़िया - अनीस की तरफ देखते हुए ....
शाज़िया - जीशान क्या बोल रहा है अनीस.....
अनीस - वो मा मैं एक अपने आफिस की लड़की को पसंद करता हु....रजनी नाम है हम दोनो एक दूसरे को प्यार करते है शादी करना चाहते है.....
शाज़िया - वो सब तो ठीक है मगर मेरा क्या हमारे बीच जो रिश्ता बन गया है उसका क्या....क्या उसे पता है ये सब के बारे में.....वो कैसे इन सब को अपनाएगी अपनाएगी भी या नही कैसे पता....हे भगवान....शाज़िया की बेचैनी को देखते हुये जीशान ने कहा शांत हो जाओ मा पहले अनीस भाई की बात तो सुन लो वो क्या कहना चाह रहे है.....
अनीस - मा मैं आपको सब बताता हूं तुम प्लीज शांत हो जाओ दरअसल मा मेरा ट्रांसफर होने वाला है कुछ दिनों में और जीशान की पढ़ाई और पार्ट टाइम जॉब यही कि है और फिर हम यही के रहने वाले है और अब अनजान सहर में फिर से सब कुछ शुरू से स्टार्ट करना हमारे बस की बात नही है तो मैं वह अकेला ही जाऊंगा और इसीलिए मैंने रजनी को अपनी तरफ से शादी की बात छेड़ी....
वसीम - ये तू क्या बोल रहा है बेटा.... हम तुझसे अलग कैसे रहेंगे... पागलो वाली बात मत कर हम सब साथ जाएंगे....रही बात तेरे प्यार की तो वो तो तू आज ना तो कल करता ही और जीशान बेटा भी आज ना तो कल शादी करेगा ही....ये तो जीवन की सच्चाई है.....मगर बेटा ये सब फैसलो के लिए तू कम से कम हमसे हमारी राय ले सकता था
अनीस - दादू जान मैं बताने वाला ही था मगर जीशान ने और रजनी ने नीचे आ कर सब गड़बड़ कर दिया....मेरे आफिस ना जाने से वो परेशान हो कर यहां चली आ रही थी और ये सब हो गया....
शाज़िया - तो तेरा मतलब तू हमे हम सब को यहां छोड़ कर चला जायेगा....और कहा जायेगा किस शहर में
अनीस- मा जबलपुर..... और मा मैं बराबर आता रहूंगा न मिलने.....और अभी मेरे जाने में वक़्त है माँ घबराओ मत....
शाज़िया - मैं कहा कुछ बोल रही हु वैसे भी नई नवेली दुल्हन के सामने मेरे जैसे विधवा की कहा औकात....ठीक है बेटा जल्दी रजनी और उसके घर वालो से मिल कर बात पक्की कर आते है....क्यों बाबूजी ठीक है ना....
अनीस - रुको मा मैं आपका दिल दुखाना नही चाहता था और आपने औकात की बात कर के अपना दुख जाहिर कर दिया है....मैं आपको इतनी आसानी से नही छोड़ कर जाने वाला.....अभी वक़्त है माँ....
इधर शाज़िया की आंखों में आंसू थे क्योंकि उसे अब उन सब की आदत हो गयी थी और उसके सुहाग के मिटने के बाद उसके जीवन मे सूनेपन को इन् लोगो ने दूर किया था और अभी इन् रंगों के आये हुए ज्यादा समय भी नही हुआ था और उनमे से एक ने जाने की फरमाइश कर डाली जो शाज़िया को बर्दाश्त के बाहर हो रहा था.....और वो भी उसके सामने एक और चुदायी कि मूरत आने वाली थी और अगर वो भी इन् सब का हिस्सा बनती है तो फिर उसका जीवन में वो बात नही रह पाएगी जो आज है और वो इसी बात से चिंतित हो रही थी.....
और अगर अनीस चला जाता है तो उसकी कमी उसको खलेगी दोनो ही सूरतो में शाज़िया चिंतित हो रही थी....
अनीस शाज़िया के करीब जाता है और उसे गले लगा लेता है और कहता है बस अब रोना मत मा मैं कही नही जा रहा हु मैं रजनी से बात करूंगा.....
इतने में जीशान आ कर कहता है माँ तुम इस बात से निश्चिन्त रहो मैं तुम्हे कभी अकेला नही छोड़ने वाला.... मेरी दुनिया ही तुम हो और भइया की भी और दादू तो कब से तुम्हारे इससे दुनिया मे घुसने को बेताब है...और वो बोल कर हस देता है....उसका ये कहने का मतलब था कि माहौल थोड़ा ठंडा हो जाये मगर वसीम के मन मे एक आस की लौ जल गई थी कि आज नही तो कल वो भी शाज़िया को चोदेगा.....इतने में अनीस शाज़िया की पेटीकोट की डोरी को खींच देता है और शाज़िया नीचे से नंगी हो जाती है और वो उसके गर्दन और कानों को चूमने लगता है और इधर जीशान बिना ब्लाउज खोले उसकी चुचियो को बेदर्दी की तरह बाहर निकाल देता है और उन्हें चूसने लगता है और अपनी दो उंगलिया शाज़िया की गांड में घुसा देता है जिससे शाज़िया चिहुँक जाती है इधर अनीस शाज़िया की चूत को हाथों में ले कर मसलने लगता है और शाज़िया भी उसकी उंगलियो को रास्ता देते हुए अपनी टांगे फैला लेती है और अनीस झट से उसके अंदर दो उंगलिया प्रवेश करा देता है और वो प्रवेश इतना जोरदार था कि शाज़िया की जोरदार चीख निकल जाती है अब शाज़िया को दोहरा मजा मिल रहा था जिसमे दर्द और उत्तेजना का मिश्रण था....और तभी वसीम जो कि अपनी धोती में से लन्ड बाहर निकाल कर हिलाते हुए कहता है अरे बच्चो कमरे में तो चलो.....
कमरे में जाने से पहले शाज़िया की चूत को मसलते हुए अनीस ने एक करारा चमाट लगाया जिससे शाज़िया की दर्द भरी चीख निकल गयी और पहली बार उसने अनीस को गाली दे कर बोला क्या करता है हरामजादे...उफ़्फ़ मार डाला आह आह कितनी जोर से मारा है.......और उधर जीशान ने शाज़िया के चुतड़ों पर दो चमाट खीच कर लगाए....जिससे उसके चुतड़ों में थिरकन आ गयी और उसे देख कर जीशान नीचे झुक कर उसके चुतड़ों को चूमा इससे दोहरे मार से शाज़िया तड़प उठी और उसकी आँखों मे वासना और दर्द साफ साफ दिख रहा था जिसे देख कर अनीस और जीशान शाज़िया को प्यार से बोले कयामत ढाती हो मा कयामत...और फिर वे उठ कर शाज़िया को नंगी हालत में कमरे की तरफ ले जाने लगा....इधर वसीम कमरे में उनके साथ गया मगर वो जानता था कि उसको कुछ हाथ नही लगने वाला इसलिए वो दरवाजे से ही लौटने लगा.....
शाज़िया वसीम को जाते देख उनको आवाज दे कर बोली....बाबूजी आप कहा जा रहे है इधर आइये....हमारे साथ इधर ही रुकिए....
शाज़िया की आवाज में जो मादकता थी उससे अनीस और जीशान दोनो और उत्तेजित हो रहे थे और साथ ही साथ सोच भी रहे थे कि माँ सोच क्या रही है....वसीम बोला कोई बात नही बहु मैं इधर ही ठीक हु....और वो वापिस बाहर बरामदे में आ कर सोफे पे बैठ कर शाज़िया के गिरे हुए पेटीकोट को सूंघने लगता है और उसके साथ साथ मुठ मारने लगता है....
इधर कमरे में शाज़िया अपने दोनों नंगे हो चुके बेटो से कहती है.......
शाज़िया- बच्चो मैं सोच रही थी कि जब बाबूजी मेरे साथ हर चीज कर रहे है मेरा ख्याल भी रखते है घर का सब काम भी करने में हाथ बटाते है तो फिर उनको इस चीज से दूर क्यों रखु जबकि उन्होंने कभी भी मेरे साथ जबर्दस्ती नही करनी चाही अगर वो चाहते तो मुझे कब का भोग लगा चुके होते क्योंकि ऐसे कई मौके आये है जब मैं उनके सामने नंगी हुई हु और एक तरह से उन्हें खुला आमंत्रण भी दिया मगर उन्होंने कभी उसका फायदा नही उठाया....इसलिए मैं चाहती हु की वो भी तुमदोनो के साथ साथ मुझे भोगे.....वसीम के लिए ऐसी बाते सुन कर अनीस और जीशान को भी की बात कही न कही से सही ही बोली है माँ ने....और दादू है भी अपने घर के जबकि वो घर मे रह कर भी कभी हमारी मर्जी के खिलाफ नही गए....इधर शाज़िया ने जिस तरह से वसीम के लिए दोनों बेटों से बात करि थी उस अंदाज़ से वो खुद में शर्मा गयी थी कि कैसे उसे उसके सुसर का लन्ड की प्यास उसकी तरफ खीच ले गयी और अपने दोनों बच्चो के सामने बेबाकी से बोल गयी.......
अनीस और जीशान हस कर बोले वाह मा अनीस भाई के जाने से पहले अपने लिए एक जुगाड़ लगा ही लिया....
शाज़िया - चुप करो और बोलो कैसे उनको बुलाऊ.... क्योंकि उनको तुमदोनो की बात अभी तक जेहन में बैठी हुई है जो तुम दोनो ने उनसे कहा था कि तुमदोनो के अलावा मेरे साथ किसी का हक़ नहीं है मगर अब हालात क्या है तुमदोनो देख चुके हो....
अनीस फिर से शाज़िया की चूत पे चमाट लगाता है और शाज़िया उछल जाती है और धम से बिस्तर पे गिर जाती है और अपनी चुत को सहलाने लगती है और कहती है कि ये क्या नया सीखा है तूने हाँ..... आह कितनी जोर से मारता है ....
जीशान शाज़िया के हाथों को हटा कर देखता है उसकी चुत बहुत ज्यादा लाल हो गयी थी... जिसे जीशान चाटने लगता है और शाज़िया की दर्द भरी आहे अब लज्जत भरी आहो में बदल जाती है और अनीस कहता है कि बस कर छोटे अभी माँ को दादू के पास जाने दो आज उनको भी अपनी दुनिया मे शामिल कर ही लेते है जब हमारी रानी मा का ही आदेश हो गया हो तो हमे कोई ऐतराज़ नही है....
जीशान - जी भइया ....शाज़िया जो जीशान के चुत चटाई से जोर जोर से साँसे ले रही थी उसकी तरफ देख कर दोनों बोले जाओ मा दादू को मौका दो....और उद्धघाटन करवाओ अपनी चुदी हुई चुत का....
जीशान - हा माँ और साथ ही साथ अपनी भारी भरकम गांड का भी.....उफ़्फ़ मा अब तुम्हारी इस मंझि हुई जवानी पे तुम्हारे ससुर का भी राज होगा.....शाज़िया अब उठ कर खड़ी हो गई थी और अनीस और जीशान को बोली....मैं उन्हें बुलाने जाती ह और अगर वो वही शुरू हो गए तो तुमदोनो वही आ जाना....
शाज़िया का कहने का मतलब साफ था कि अभी उसके ससुर और उसके बीच मे कोई नही चाहिए जब जरूरत होगी तब आना.....
अनीस और जीशान एक स्वर में बोले जैसी आपकी इच्छा मा.....
और शाज़िया नंगी ही कमरे से बाहर चली जाती है हॉल में जहाँ वसीम शाज़िया का पेटीकोट लिए हुए सूंघ कर मुठ मारने में लगा हुआ था.....शाज़िया ने जब ये दृश्य देखा तो उसे बड़ी दया आयी कि हे भगवान सामने नंगी औरत होंते हुये भी बिचारे की ये दशा.....वो तेज कदमो के साथ चलते हुये वसीम के पास पहुची और उसके हाथ से पेटीकोट ले कर फेंक दिया.... और वसीम उठ खड़ा हुआ और बोला....क्या बात है बहु....तुम यहाँ कोई परेशानी हो गयी क्या......
शाज़िया वसीम के कंधे पे हाथ रख कर उसे वापिस सोफे पे बिठाती हुई खुद घुटनो पर बैठ कर उसके तरफ देख कर बोली.... जी बाबूजी परेशानी तो है और उसे ही दूर करने आई हूं यहां आपके पास....
शाज़िया धीरे धीरे वसीम की तरफ देखते हुए नीचे झुक कर उसके लन्ड को मुह में ले लेती है और वसीम मजे के सातवे आसमान पर पहुच जाता है.....और वो शाज़िया के सिर को अपने लन्ड की तरफ दबाने लगता है शाज़िया की चुसाई और तेज तेज होने लगती है वो साथ साथ उसके गोलियों को भी अपने मुह का शिकार बना रही थी.....
वसीम - आह बहु ये क्या कर रही हो तुम जाओ बच्चो के पास वो राह देखते होंगे तुम्हारी.....आआआठहठह बहु ओफ्फो आह शाज़िया क्या कर रही हो....अब बर्दाश्त नही हो रहा बहु.....
इतना सुनते ही शाज़िया झट से खड़ी होती है और अपनी दोनों टांगे फैला कर वसीम के लन्ड को पकड़ते हुए उसे अपनी चुत के मुहाने पे लगा कर उसके इर्दगिर्द बैठने लगती है जिससे कि वसीम का लन्ड उसकी चुत में घुसने लगता है.....
इधर वसीम भौचक्का से उसे देखने लगता है हालांकि उसका लन्ड अब भी खड़ा ही था और जब तक वसीम कुछ बोलता या करता तब तक शाज़िया की चूत वसीम के लन्ड को निगल चुकी थी.... और वसीम का लन्ड सीधा शाज़िया की बच्चेदानी पे लग रहा था....
शाज़िया इस एहसास से ही झड़ गयी कि जब ये अंदर बाहर करेंगे तब कहा तक पहुचेगा उनका लन्ड.....और इधर वसीम अब कुछ बोलने करने की स्तिथि में नही था.... तभी शाज़िया ने आगे बढ़ते हुए एक बार उसके लन्ड पे कूदी....
जो मानो वसीम पल भर में समझ गया....और वसीम ने एक झटके में अपना मुह उसकी चुचियो पे लगाया और दोनो हाथ से उसकी कमर को पकड़ते हुए अपने लन्ड को अंदर बाहर करना शुरू कर दिया..... वसीम आज पहली बार शाज़िया को पेलने की खुशी उसके चेहरे पे मिलाजुला असर कर रही थी जिसमे चोदने की खुशी और ये नई बात होने का आश्चर्यपन भी था.....कुछ झटकों के बाद शाज़िया की एक करारी आह निकली जिससे वसीम उत्तेजित हो अब सारे एहसासों को पीछे छोड़ते हुए.... उसे सोफे पे वही लिटा दिया और खुद जमीन की तरफ आ कर उसकी चुत में छेद करने लगा....।
और अब वसीम के झटकों से शाज़िया की दर्द और लिज्जत भरी आहे पूरे हॉल में गूंजने लगी.....वो अपने दोनों हाथ सोफे के पीछे की तरफ कर के उसके कपड़े को मरोड़ने की नाकाम कोशिश करते हुए अपनी उत्तेजना और दर्द को कंट्रोल कर रही थी इससे उसकी छातियां काफी बड़ी और चुसाउ लग रही थी जिसे वसीम ने चूस चूस कर गिला कर रखा था.... जबकि वसीम का लन्ड उसकी चुत के हर कोने में हलचल मचा रहा था.....शाज़िया को वसीम का लन्ड उसके पेट तक महसूस हो रहा था.....और वसीम की ताकत कर क्या कहना ऐसे लग रहा था जैसे कि आज तक जितना उसने बर्दाश्त किया था आज वो सारी की सारी कसर निकाल लेने वाला था....वसीम शाज़िया की चूत में ताबड़तोड़ ठुकाई कर रहा था.....
इधर अनीस और जीशान लन्ड को हिलाये जा रहे थे और अपनी माँ की धुआंदार चुदायी अपने दादू के हाथों देख रहे थे.....
इधर हॉल में वसीम अब थक चुका था धक्के लगाते लगाते जिस बात को शाज़िया ने बखूबी जान लिया था इसलिए वो चुदते हुए बोली बाबूजी आप नीचे आ जाइये.... और अगले ही पल शाज़िया वसीम के ऊपर थी ठीक वैसे ही जैसे चुदायी शुरू हुई थी....
इधर दोनो भाइयों ने आपस मे फैसला लिया यही सही वक्त है शाज़िया के पास जाने का....और वो दोनों भाई हॉल में शाज़िया के पास आ पहुचते है और कहते है......
अनीस जीशान- मा अब जरा हमे भी आराम दो....आह क्या चुदायी हो माँ वाह ....और दादू जान आप अपने अपनी सारी बर्दाश्त की हद को आज पार कर डाला ....शाज़िया और वसीम रुक जाते है दोनों के दोनों हाफ रहे थे....इतने में शाज़िया को जीशान दादू के गोद से उतार देता है और शाज़िया की चूत से वसीम का लन्ड निकल जाता है....
अनीस - दादू अब आपको मा की गांड का भी सैर करना चाहिए क्यों मा है ना ....इतने में वसीम उठ खड़ा हुआ और जीशान फट से सोफे पे लेट गया और शाज़िया को भी अपनी तरफ खीच लिया.....अनीस ने शाज़िया को जीशान पे लेटने में मदद की औऱ जीशान ने अपना लन्ड झट से शाज़िया की चूत पे सेट किया और अगले ही पल शाज़िया की एक मादकता से भरी चीख निकली....और जीशान अपनी गर्मी शाज़िया पे निकालने लगा जबकि इधर अनीस शाज़िया के मुह की ओर गया औऱ शाज़िया ने उसके सामने आते ही गप्प से उसका लन्ड अपने मुह में भर लिया और अब हालात ऐसे थे कि शाज़िया के चुत में जीशान का लन्ड और मुह में अनीस का और उसकी दोनो चुचिया जीशान के मुह पे तांडव मचा रही थी और उसी को अनीस अपने हाथों में ले कर बेदर्दी से मसल रहा था और उसकी घुंडीयो को कस कर अपने उंगलियो ने भीच रहा था जिससे शाज़िया की चुत और भी ज्यादा बह रही थी....
दर्द और मजे से शाज़िया दोहरी हो चुकी थी मगर चुत की प्यास ऐसी की बुझते न बुझे.....
इधर वसीम शाज़िया की गांड की फाकों को अलग कर के उसके छेद को देख रहा था....जिस गांड को आज तक उसने छुआ सेका दवाई लगाई जिसको सोच सोच कर मुठ मारा आज उसी गांड ने अपना मूसल घुसाने वाला था....उसने शाज़िया की गांड को बेदर्दी की तरह इस क़दर अलग किया कि शाज़िया के चूतड़ अब दो हिस्सों में फट कर अलग हो जाएगी....इस प्रहार से शाज़िया के मुह से अनीस का लन्ड बाहर निकाल दिया और जोर से चीखी और बोली बाबूजी बस कीजिए मेरे चुतड़ों के साथ आप क्या कर रहे है....इधर वसीम उसके चुतड़ों को फैलाये जा रहा था और शाज़िया की चीख तेज होती जा रही थी....और अनीस अपना लन्ड शाज़िया के चीखते मुह पे रगड़ रहा था और नीचे से झटके लगते जीशान ने शाज़िया के चुत को एक पल के लिए भी आराम से नही रहने दिया ......थपाथप उसके लन्ड से शाज़िया की ठुकाई चालू थी....
इधर वसीम को अनीस ने कहा दादा अब डाल दो देखो मा कैसे चीख रही है आपके लौड़े के लिए....और इससे पहले शाज़िया ये कहती कि गांड के छेद को गीला कर दे उससे पहले ही वसीम ने शाज़िया के कमर के इर्दगिर्द अपने पाव रखे एक पैर सोफे पे और एक जमीन पे और एक ही पल में शाज़िया की सूखी गाँड़ में वसीम ने लगभग आधा लन्ड पेल दिया जिससे शाज़िया की गेंद फट गई और एक बहुत ही तेज चीख निकल गयी
एक पल के लिए सब रुक गए क्योंकि चीख काफी तेज थी जो कि उनके लिये ठीक नही था....लेकिन तभी अनीस ने शाज़िया के बाल पकड़े और झट से अपना लन्ड उसके मुह में ठूस दिया और तभी वसीम ने भी एक और झटका मारा और पूरा लन्ड शाज़िया की सूखी गाँड़ में पेल दिया....और शाज़िया को बेहोशी जैसी आ गयी क्योंकि वसीम ने उसकी गाँड़ को ऐसे चोदा था जैसे उसकी कुवारी गाँड़ उसे मिली हो....और सभी ने अपना एक भी पल बिना गवाए शाज़िया की तीन तरफा चुदायी शुरू कर दी......
अब शाज़िया को सहना बहुत ही मुश्किल हो रहा था मगर उसके तीनो छेदों में घपाघप लन्ड अंदर बाहर हो रहे थे......जो कि रुकने वाले नही थे....और उसकी गोल मटोल चुचियो की दुर्दशा करने में उन तीनों के हाथ और मुह अलग ही लगे हुए थे....बिचारि शाज़िया अपने इससे दर्द और लिज्जत से भरी चुदायी को आज दरकिनार करने का सोचा क्योंकि आज उसने अपने ससुर को भी एक विधुर के जीवन जीने से बचाया था इतने दिन तड़पाने के बाद आज शाज़िया ने खुद को उसके दोनों बेटों और एकमात्र ससुर को भी सौप दिया था और आज अपने दर्द के कारण वो नही चाहती थी कि इनकी ये उत्तेजना से परिपूर्ण चुदायी की रस्म अधूरी रह जाये.....
दो घण्टो तक सब ने अपनी जगह बदल बदल कर शाज़िया के हर छेद को अच्छे से चौड़ा किया....और नतीजा ये हुआ कि शाज़िया में जान एकदम नही बची थी.....और अंत मे सबने अपने अपने हिसाब से जगह पकड़ कर सुस्ताने लगे जबकि शाज़िया धम्म से वही हॉल में नंगी टाइल्स की ठंडी जमीन पे नंगी अपने दोनों हाथ और पैर फैलाये...चुत से बहते रस जो पता नही तीनो में से किसका था के साथ लेटी हुई थी औऱ अपनी थकान और साँसों को काबू करने में मशगुल थी.....
शाज़िया की चुदाई के बाद सब वैसे ही कुछ देर तक पड़े रहने के बाद.....जीशान उठा और बोला की भाई आज चलो कही घूम कर आया जाए और माँ का भी मन बहल जाएगा......
तभी अनीस सोचता है की आज अच्छा मौका है माँ को रजनी से मिलवाने का....आज उनको मिलवा देता हु और आज ही सारी बाते भी निपटा लूँगा...
अनीस को इस् तरह से सोचते देख जीशान उसके पास गया और उससे फुसफुसा कर बोला क्या भाई रजनी भाभी को बुलाने की सोच रहे क्या......
अनीस - अबे साले तूने मेरे मन की बाते कह दी सोच तो यही रहा हु की आज तुम सब की मुलाक़ात करवा दु...वैसे भी मेरे बाहर जाने का दिन नजदीक है अब...जितनी जल्दी हो सके सब काम निपटा ही लेना चाहिए........इधर शाज़िया जो की अब तक नंगी अपनी टांगे फैलाये लेटी हुयी थी रफ़ीक झुका और जमीन पे उसके पास बैठ कर बोला
रफ़ीक - बहू आज से मुझे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं रहेगी....बल्कि अब तो मै अपनी जिंदगी को और मजे से जीऊँगा....इस्स बात पे शाज़िया उठ बैठी और रफ़ीक ने देखा की उसकी आंखो मे आसू थे....रफ़ीक कुछ कहता इससे पहले शाज़िया अपनी भरी हुयी आंखो से बोली बाबूजी मुझे माफ कर दीजिये मैंने आपको इतने दिन इस्स वासना की अग्नि मे जलने पे मजबूर किया.... मुझे मालूम ही नहीं चला की मै क्या पाप कर रही हु अंजाने मे ही सही मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी....और इतना कह कर उसने रफ़ीक को अपने छाती से सटा लिया...और रफ़ीक शाज़िया की भारी भरकम चूचियो के बीच पीसने का आनंद से प्रफुल्लित हो उठा ...और अगले ही पल उसने शाज़िया की एक चुचि को अपने मुह मे भर लिया.....
और एक बार फिर शाज़िया अभी कुछ देर पहले के चुसाई और कटाई के दर्द के कारण ...हल्के से चीख उठी...जिधर अनीस और जीशान शाज़िया और रफ़ीक के इस्स खूबसूरत मिलन को देख कर मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे.....
तभी जीशान शाज़िया के पीछे गया और जमीन पे बैठते हुये शाज़िया की गाँड के आधे नुमाइंदा हो रहे हिस्से पे हाथ घुमाते हुये एक जबर्दस्त चिमटी काट लेता है और चिमटी काटना जारी रखते हुये शाज़िया से कहता है की माँ अभी पूरी रात पड़ी है...चलो तैयार हो जाओ फिर घर आने के बाद हम तीनों तुम्हारी सेवा आज एक नए अंदाज़ मे करेंगे जिसे सुन अनीस बोला नहीं भाई....बिलकुल भी नहीं.....वो दर्द माँ सहन नहीं कर पाएगी.....
तभी शाज़िया रफ़ीक के चेहरे को अपने सिने से हटाते हुये दर्द मे कराहती कहती है क्यू बे कमीने ऐसी कौन सी अंदाज़ की बाते कर रहे हो तुमदोनों जो मै सहन नहीं कर पाऊँगी.... हा बोलो...
जीशान - क्यू इतनी उतावली हो रही हो माँ...वो सब रात को पता चल जाएगा.....शाज़िया बोली ठीक है तो मेरा भी ये चैलेंज है मै कोई भी दर्द सहन करूंगी चाहे वो कैसा भी दर्द क्यू ना हो....ज्यादा से ज्यादा चुदाई होगी और क्या हो सकता है...और वो हस देती है जबकि अनीस कहता है नहीं माँ तुम्हें ये नहीं कहना चाहिए था....
फिर सब तैयार होते है और बाहर जाने के लिए निकलते है.....
आज अनीस ने ओला की कैब बूक कर रखी थी....जिसे देख शाज़िया बोली क्या बात है आज चार पहिया से ले जा रहे ....शाज़िया ने एक सादी सी ऑरेंज रंग की साड़ी पहनी थी और एक काला रंग का ब्लाउज़....और जीशान ने उसको वो दोनों कपड़े बिना पेटीकोट के पहनाए थे बस उसकी कमर पर एक नाड़े जैसा रस्सी बांध कर उसकी साड़ी को टिकाया था....
अगर इस्स वक़्त शाज़िया कही भींग जाती तो उसकी कंचन काया उजागर हो जाती....शाज़िया जानती थी की उसके तीनों आशिको ने उसे मिल कर ये कपड़े पहनाए है तो वो कही भी जाये वे लोग उसके साथ छेरखानी किए बगैर रहेंगे नहीं.....और शाज़िया की चुत को अब मिलने वाले तीन तीन लंडो का स्वाद उसके रग रग मे बस चुका था जिसके कारण उसकी भी प्यास हमेशा अब लगी रहती थी जहा मौका हाथ लगता था वो बिना चुदवाए नहीं रहती थी...
मगर आज बात कुछ और थी....वे लोग बाहर खाना खाने जाने वाले थे... और शाज़िया ये जानती थी की उसकी चुत की सवारी उनके लड़ करे या फिर उनके हाथ मगर सवारी तो होनी ही थी ये तय है......इधर अनीस को बड़ी ही अजीब सी स्थिति से गुजरना पड़ रहा था ...क्योकि उसे रजनी की मुलाक़ात आज अपने परिवार से करवा देनी थी.....
इधर अनीस ने मौका देख रजनी को उसके बताए पते पे अच्छे से सज कर आने का न्योता दे दिया था.....जिसके बाद रजनी ने आज खुद को अच्छे से तैयार किया था और वो निकल पड़ी थी अपने अनीस को अपना बनाने के तरफ एक कदम बढ़ाते हुये.....
आज रजनी ने ब्लू रंग की समीज और उजले रंग की सलवार पहनी थी जिसके नीचे उसने बकायदा टेप ब्रा और अपनी मनपसंद जाली वाली चड्डी पहनी थी जो की अनीस को बहुत ज्यादा पसंद थी.....
इधर शाज़िया और बाकी लोग कार मे बैठ कर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले थे....आलम ये था की जीशान आगे ड्राईवर के बगल मे बैठा था....और पीछे रफ़ीक और अनीस के बीच मे शाज़िया...शाम के 7:30 बज रहे थे सड़क पर अंधेरा लगभग लगभग हो चुका था....जीशान बार बार पीछे मुड़ मुड़ कर उनलोगों को देख रहा था...क्यूकी उनदोनों ने शाज़िया के बदन से खेलना शुरू कर दिया था...और इधर शाज़िया की हालात खराब होने लगी थी.....बहुत मुश्किल से शाज़िया अपनी सिसकियो को रोक रही थी.... वहशियाना तरीके से अनीस और रफ़ीक उसे पागल बनाने मे लगे थे...उस तरह से शाज़िया ज़ोर ज़ोर से चीखना चाहती थी....
दरअसल अनीस शाज़िया के चुत के लबो को खोल कर बड़ी बेदर्दी से मसल रहा था और साथ ही साथ उसकी चुत मे तीन तीन उंगलिया पेल रहा था जबकि रफ़ीक शाज़िया की कमर मे हाथ घुसा कर उसके दोनों पैरो मे दूरी बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रहा था जिससे शाज़िया की चुत और ज्यादा ही बहने लगी थी...वो बार बार अपनी आखे बड़ी बड़ी कर के अनीस और रफ़ीक की तरफ देखती मगर वे लोग तो बस मजे लौटने मे लगे थे...... इधर जीशान मुह बनाए उन तीनों को देख रहा था.....और साथ ही साथ ड्राईवर पे भी ध्यान रख रहा था...... तभी अनीस के जादुई हाथो ने अपना कमाल दिखा दिया और शाज़िया की हल्की सी चीख निकाल गयी झड़ते वक़्त.....जब तक वे लोग होटल पाहुच नहीं गए तब तक शाज़िया की चुत वैसे खुली राखी रफ़ीक और अनीस ने.....जिसे कभी अनीस तो कभी रफ़ीक सहलाता....शाज़िया बार बार कहती की रहने दो मत करो फिर से गरमी चढ़ जाएगी मुझे लेकीन वो मना नहीं कर रही थी.....खैर जैसे तैसे वे लोग होटल पहुँचे और बाहर निकलते ही अनीस ने कहा...माँ हमारे साथ कोई और भी है....
अनीस पास मे खड़ी रजनी की तरफ इशारा करते हुये उसे पास बुलाता है और वो आ कर सीधे पहले शाज़िया और फिर रफ़ीक के पैर छूती है...और उठ कर जीशान को स्माइल पास करती है.....शाज़िया रजनी को देख कर कहती है ये जरूर मेरे बेटे की पसंद होगी.....और वो उसका सर पकड़ कर चूम लेती है और कहती है... वाह अनीस तू तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला.... इतनी सुंदर बहू मेरे लिए ढूंढ रखी थी मुझे बताया तक नहीं....
रफ़ीक भी बीच मे बोला हा बेटा अनीस हमे तो लड़की पसंद है...वो रजनी से मुखातिब होते हुये कुछ कहने ही वाला था की अनीस बोल पड़ा अरे भाई सारी की सारी बातें यही खड़े खड़े कर लोगे क्या चलो अंदर चलते है....और खाना खाते खाते बाते भी हो जाएंगी....सब को यह बात सही लगी और वो खाना खाने ही तो आए थे....सब अंदर गए जबकि जीशान और अनीस खाना का ओर्डर देने के लिए निकाल लिए... इधर शाज़िया और रफ़ीक रजनी से बोले बेटे तुम्हारे घर मे और कौन कौन है....
इस बात पे रजनी भावुक हो कर बोली....मैं एक अनाथालय में पली बढ़ी हु...वही की दायीं माँ ने मेरा भरण पोषण किया और आज मैं जिस मुकाम पे हु वो सब उनके बदौलत ही हु....वो मेरी सगी मा न सही लेकिन सगी मा से बढ़ कर है मेरे लिये.... मेरे जीवन मे उनके बाद अगर किसी ने प्यार के दो शब्द बोले तो वो है अनीस जी.....उन्होंने मेरे रंग रूप और मेरे काबिलीयत को जाना और मुझे अपने काबिल समझा.... और अब तो मुझे मेरे पूरा परिवार मिल गया है आप सब के रूप में आप जैसी मा और दादू जैसे दादु और जीशान जैसे देवर जो कि छोटे भाई से कम नही मेरे लिए....इतना कह कर रजनी सर झुका कर सिसकने लगती है....
जिसे देख शाज़िया उठ कर उसके पास जाती है और उसे अपने गले से लगा लेती है....और कहती है एक जोर का लगाऊँगी अगर आज के बाद किसी को याद कर के रोई तो....इतने में अनीस और जीशान एक वेटर के साथ वहां आ पहुचते है...
अनीस - अरे भाई क्या वार्तालाप हो रही है तुमदोनो में जरा हमे भी तो बतलाओ....
शाज़िया - कुछ नही बस अपनी बहू से कुछ बाते कर रही थी....
उसके बाद सबने ख़ाना खाया और फिर उसी दौरान शादी की बात भी तय कर डाली.... आज से ठीक एक महीने बाद शादी का दिन तय किया था....
होटल से बाहर आने के बाद शाज़िया वसीम और जीशान तीनो एक साथ घर के लिए निकल गए जबकि अनीस और रजनी एक दूसरे के साथ....
होटल से निकालने के बाद सब लोग घर पहुँचे अभी इधर अनीस रजनी को उसके घर के पास ले कर पहुँचा और वही अंधेरे मे उसे पकड़ कर उसके लबो को चूसने लगा साथ ही साथ रजनी की चूचियो को भी मसलने लगा जिसमे रजनी उसका पूरा साथ दे रही थी....अभी कुछ ही पल बीते होंगे की अनीस का फोन बजा जिससे उनदोनों का ध्यान भटका और रजनी उससे शर्माती हुयी वही छोड़ कर अपने घर के अंदर भाग गयी...
इधर अनीस अपना फोन रिसीव करता है उधर से जीशान था...
जीशान - भाई घर पहुँचा दिये या नहीं....अभी और वक़्त लगने वाला है...
अनीस - नहीं भाई रास्ते मे ही हु घर ही आ रहा हु....बोलो क्या हुआ....
जीशान - भाई एक नारियल की रस्सियों का गुछा लेते आना.....
अनीस - क्यू वो क्यू भला उसका क्या करोगे...
जीशान - भाई आप समझा करो यार आज माँ को उसके चैलेंज के अनुसार दिखाना तो पड़ेगा न की दर्द भरी चुदाई किसे कहते है.....
अनीस - अबे साले क्या खुराफाती आइडिया सोचा है मेरे भाई मेरा तो सोच कर ही ठनकने लगा है... यानि की माँ की आज बॉनडेज वाली चुदाई होगी....ओहोहों वाह भाई मजा आने वाला है आज तो वैसे तूने माँ को इसके बारे मे बतलाया है की नहीं....
जीशान - हा भाई बतलाया भी हु और तैयार भी कर रहा हौ...अभी दादू जान उसको नंगी कर के उसके बदन को चिकना कर रहे है....फिलहाल माँ के काँख चूत गाँड पैर इन् सभी जगह के बाल साफ कर रहे है दादू क्रीम की पूरी बॉटल दादू ने खाली कर डाली है ये माँ पे दूसरी मर्तबा उन्होने क्रीम लगा रखा है....यहा तक की उन्होने माँ के गांद को फैला कर उसमे एक चिकने लकड़ी के टुकड़े को फसा कर उसके अंदर तक क्रीम लगाया है जिससे की माँ के बदन पे एक भी बाल तो ना ही रहे साथ ही साथ उसके अंदरूनी हिस्सो पे भी बाल एकदम ना रहे और उसस वक़्त माँ की जलन के कारण हालत देखने वाली थी मगर माँ को दादू और मैंने अपने नीचे दबा रखा था....
अनीस - क्या मतलब एक राउंड चुदाई की कर ली क्या तुमदोनो ने....
जीशान - अरे नहीं मेरे भाई दरअसल माँ के पीठ पर मै बैठा था और टाँगो पे दादू जिससे माँ हिल भी नहीं पा रही थी बस अपनी जलन के मारे चिल्ला रही थी की अरे बस भी करो अब जला कर ही मानोगे क्या बहुत जल रही है बेटा अब छोड़ भी दो आह ओहह आहह ...और अपने हाथो को बिस्तर पे पटक रही थी.....मैंने क्रीम की बॉटल पकड़ रखी थी जिसे लगाने का काम दादू कर रहे थे.....
अनीस - अबे सालो कुछ देर रुक नहीं सकते थे इस् काम के लिए उफ़्फ़ क्या क़यामत ढाई तुमलोगों ने माँ पे बेचारी..... चल मै आया रस्सी ले कर कितने गुछे ले लूँगा...बोलो...
जीशान - भाई 4 गुछे ले लेना.... आज माँ को अच्छे से रगड़ना है...लाल लाल कर दंगे आज तो .....क्यू माँ है ना.....
शाज़िया - पता नहीं क्या और कैसे कैसे तू ये सब सोच लेता है मेरे साथ करने के लिए....और वो झूठ मूठ का रोने वाले अंदाज़ मे कहती है या अल्लाह कहाँ फसी मै आज.... आज तो मेरी खैर नहीं.....
जीशान - ठीक है भाई तुम रस्सिया ले कर आओ बाकी इंतेजाम मैंने कर रखा है....
अनीस - बाकी इंतेजाम ....... से तेरा क्या मतलब है क्या क्या है बता मुझे अभी ही क्यूकी मुझसे रहा नहीं जा रहा.....