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जाल पार्ट--70
गतान्क से आगे......
"म्र्स.मेहरा मुझे सिर्फ़ आपको ढूँदने का काम दिया गया था.आप दोनो के ज़ाति मामलो मे पड़ने का मेरा ना इरादा है ना ही ख्वाहिश."
"मिस्टर.मोहन,शायद समीर ने आपको बताया नही कि मैने उस से साफ-2 कहा था कि वो मुझे ढूँढने की कोशिश ना करे वरना वही होगा जो मैने अभी पहले कहा था & आपने जिस दिन मुझे ढूँढने का काम अपने हाथ मे लिया,चाहते या ना चाहते हुए आप भी हमारे ज़ाति मामले का हिस्सा बन गये.अब ये बात समीर को बताइए & मुझे चंद दिन यहा सुकून से गुज़रने दीजिए.गुडबाइ!",बलबीर अपने मोबाइल को देख कर सर हिला रहा था.
रंभा ने मोबाइल किनारे रखा & सामने समंदर की लहरो को देख उसका दिल उनसे खेलने को मचल उठा.उसने पिच्छली शाम ही देवेन की पसंद के कुच्छ स्विमस्यूट्स खरीदे थे.आज वक़्त था उनमे से 1 को ट्राइ करने का.वो मुस्कुराती हुई अपने कमरे मे गयी & जब लौटी तो उसके गोरे जिस्म पे 1 सफेद 2-पीस बिकिनी थी.रंभा घर के पिच्छले हिस्से मे बने लॉन के आख़िर मे बनी सीढ़ियो से नीची उतरी & 1 गेट खोल बीच पे आ गयी.यहा काफ़ी दूरी पे घर बने थे & बीच भी लगभग खाली ही था.उसे बस इक्का-दुक्का लोग या तो सुन्बाथ लेते या फिर कही आते-जाते दिख रहे थे.रेत पे चलते हुए वो समंदर के पानी मे उतर गयी & लहरो से खेलने लगी.उसे बड़ा मज़ा आ रहा था तैरने मे.लहरे उसके जिस्म को अपनी बाहो मे भर उच्छलती तो उसका दिल रोमांच से भर जाता.देर तक वो किसी जलपरी की तरह पानी मे अठखेलिया करती रही.
जी भर के तैरने के बाद वह पानी से निकली & घर की तरफ बढ़ी.घर की ओर देखते ही वो चौंक गयी.जिस जगह खड़ी हो वो बलबीर से बात कर रही थी वाहा पे अब विजयंत मेहरा खड़ा उसे देख रहा था.रंभा को गुजरात के समंदर के किनारे की वो सवेरे की मुलाकात याद आ गयी & उसका दिल धड़क उठा.वो धीमे कदमो से गेट तक पहुँची,उसे खोला & अंदर गयी.विजयंत उसे देखे जा रहा था & उसकी आँखो मे वही कुच्छ समझने का सा भाव था.
रंभा सीढ़िया चढ़ उसके करीब पहुँची.उसका गीला जिस्म धूप मे चमचमा रहा था.विजयंत की निगाहें उसके चेहरे पे जमी थी जिसे भीगे गेसुओ से टपकती बूंदे चूम रही थी.उसने अपना हाथ आगे बढ़ा के रंभा को तौलिया थमाया & उसकी निगाहें उसके चेहरे से नीचे उसके गीले चमचमते बदन को चूमने लगी.रंभा का धड़कता दिल मस्ती से भर उठा था.उसके बिकिनी के ब्रा मे 2 नुकीले उभार उभर आए थे..क्या इसे याद है वो सुबह जब मैने इसकी मौजूदगी मे झुर्मुट की आड़ मे कपड़े बदले थे?
"थॅंक्स.",उसने तौलिया लिया & अपने बाई तरफ के 2 बड़े पौधों के पीछे चली गयी.उनके बड़े-2 पत्तो की आड़ मे अपने प्रेमी को देखते हुए वो तौलिए से अपने गाल सुखाने लगी.
"रंभा.",वो अपने सीने पे तौलिए को दबा रही थी जब उसके ससुर ने उसका नाम पुकारा.
"हूँ.",विजयंत ने पत्तो को नीचे किया.उसकी निगाहें बहू के सीने पे रखे तौलिए पे थी.
"तुमने कोई अच्छा काम किया है.",रंभा के माथे पे शिकन पड़ गयी..ये कैसा सवाल था?,"..तुमने कुच्छ अच्छा किया है.",..अब वो समझी..गुजरात मे उसने उसकी सेमेंट के दाम वाली बात बताने पे तारीफ की थी..उसे वही याद आ रहा था.विजयंत के हाथ उसके सीने पे रखे तौलिए को थामे हाथो पे आ गये थे.
"हां,बताइए क्या अच्छा किया है?",विजयंत ने तौलिया नीचे गिरा दिया & उसके हाथ पकड़ के सीने से हटा दिए & उसके क्लीवेज को देखने लगा.
"कुच्छ अच्छा किया है..",वो झुका & उसकी गर्दन चूमने लगा.
"उउन्न्ञन्..याद कीजिए डॅड,क्या अच्छा किया था?",वो उसके क्लीवेज पे लगी बूँदो को अपनी ज़ुबान से चख रहा था.उसकी ज़ुबान & गर्म साँसे रंभा के सीने को तपते हुए उसे मस्त कर रही थी.उसके हाथ ससुर के मज़बूत जिस्म को महसूस करने को मचल रहे थे.उसने अपनी उंगलिया विजयंत की उंगलियो से अलग की & उसके कंधे थाम लिए & उसके सर को चूमने लगी.
"आपने मुझे ऐसे देखा है कभी..ऊहह..?",विजयंत उसके क्लेवगे को चूस रहा था.उसने उसके बाल पकड़ सर को उपर किया & उसकी आँखो मे देखा,"..बोलिए देखा है आपने मुझे कभी ऐसे?"
"शायद..नही..कुच्छ..धुँधला सा....है..!",उसके माथे पे शिकन गहरी हो रही थी.रंभा ने उसके सीने पे हाथ रख उसे पीछे रेलिंग पे बिठा दिया & उसके कंधो पे बाहे जमा उसके चेहरे को हाथो मे भर लिया & चूम कर उसके माथे की सलवटो को दूर करने लगी.
"कोई बात नही..परेशान मत होइए.सब याद आ जाएगा..ऊव्ववव..!",विजयंत के हाथ उसकी मोटी गंद को दबाने लगे थे & वो चिहुनक के आगे हो गयी थी.विजयंत का चेहरा उसके सीने मे घुस गया था & 1 बार फिर उसके क्लीवेज पे उसके गर्म होंठ अपने निशान छ्चोड़ने लगे थे.रंभा ने उसके सर को बाहो मे पकड़ सीने पे ज़ोर से दबाया & और आगे हो गयी.विजयंत के हाथ उसकी पॅंटी मे घुस उसकी गंद की कसी फांको को मसल रहे थे.
"आपको समीर याद है डॅड..शिप्रा..रीता..बोलिए?..आननह..!",उसकी पॅंटी को नीचे कर वो उसकी गंद को दबोचते हुए उसके क्लावेज को काट रहा था.रंभा ने उसके बाल पकड़ उसके सर को अपने सीने से अलग किया & उसकी टी-शर्ट को उपर खींचा.विजयंत ने उसकी बिकिनी टॉप के कप्स से उसकी मोटी छातियो बाहर निकली & उन्हे मसलने लगा.रंभा ने अपने नाख़ून उसकी नाभि से लेके निपल्स तक चलते हुए उसे झुक के चूमा तो वो बहुत ज़ोर से उसकी ज़ुबान चूसने लगा.
"नही.",वो उसकी चूचिया चूस रहा था & उसकी कमर को जकड़े हुए उसकी गीली पीठ & गंद को अपने हाथो से मसल रहा था.
"ट्रस्ट..डेवाले..पंचमहल..क्लेवर्त..होटेल वाय्लेट....ये नाम जानते हैं आप?..ओईईईईई..!",विजयंत ने उसकी पॅंटी उपर की & फिर उसकी टाँगे फैला के उसे अपनी गोद मे बिठा लिया था & उसे बाहो मे भींच उसके निपल्स काट रहा था,"..दाँत मत लगाइए..दर्द होता है..हान्न्न्न्न..ऐसे ही..वी माआआ..ऐसे ही चुसिये..हाईईईईईईईईई..!",नीचे हाफ-पॅंट मे क़ैद विजयंत का लंड उसकी बिकिनी बॉटम के गीले कपड़े से ढँकी उसकी उतनी ही गीली चूत को चूम रहा था & उपर उसका ससुर उसकी चूचियो को अपने मुँह मे पूरा भरने की कोशिश करता हुआ चूस रहा था.रंभा तो मस्ती मे पागल हो गयी & पीछे झुक के अपने बाल पकड़ उनमे बेचैनी से हाथ फिराते हुए झड़ने लगी.विजयंत की मज़बूत बाहे उसे पीछे गिरने से रोके हुई थी.
"कुच्छ नही याद आ रहा आपको?",रंभा संभली तो सीधी हुई & उसकी पीठ को नोचते हुए उसे चूमने लगी.गंद आगे-पीछे कर वो ससुर के लंड को छेद रही थी.
"नही.",विजयंत ने उसकी कमर पकड़ उसे उठाया & उसे घुमा के चौड़ी रेलिंग पे लिटा दिया & अपनी पॅंट उतार दी.रंभा ने उसका लंड पकड़ उसे अपनी ओर खींचा & लेटे-2 ही उसे मुँह मे भर लिया & चूसने लगी.
"ये याद है आपको डॅड?",रंभा ने लंड मुँह से निकाल उपर कर उसके आंडो को अपने सामने किया & 1 को मुँह मे भर लिया.
"हान्न्न्न्न्न..आहह..!",रंभा हैरान हो गयी.
"सच ये याद है आपको?",वो आंडो के उपर की त्वचा को अपने दन्तो मे बहुत हल्के से पकड़ के खींच रही थी.
"हां..याद है..",रंभा ने लंड को ज़ोर से हिलाया & फिर उसके सूपदे को चूसा.
"& क्या याद है आपको?",वो उठ बैठी & ससुर की कमर को बाहो मे भर उसकी गंद को दबोचते हुए उसके पेट के बालो मे अपने गालो & नाक को रगड़ने लगी.
"बस यही..आहह..!",वो उसके बालो मे बेचैनी से हाथ फिराते हुए उसके सर को अपने पेट मे दबा रहा था.रंभा ने दाए हाथ से उसके लंड को पकड़ अपनी चूचियो के बीच की वादी मे दबाया & फिर उसकी नाभि मे जीभ घुसाते हुए अपनी दोनो छातियो को बाहर से थाम लंड को उनके बीच क़ैद कर उसे हिलाने लगी.
"यही की आप ये सब करते थे मेरे साथ?"
"हान्न्न्न्न..ओह..!",विजयनत्न की आँखे बंद थी & उसके चेहरे पे लकीरे खीच गयी थी..मज़े की या उलझन की-ये रंभा की समझ मे नही आ रहा था.
"कहा करते थे ये सब मेरे साथ आप?",वो बदस्तूर लंड को अपनी मखमली चूचियो के बीच दबा हिलाए जा रही थी.
"कमरे मे.",विजयंत के माथे की शिकने फिर गहरी हो रही थी.
"कैसे कमरे मे?..किसके कमरे मे?..किसी घर के कमरे मे या फिर कही & के?",उसने लंड को ज़ोर से हिलाते हुए & सवाल किए.
"नही याद मुझे..बिल्कुल नही..आहह..!",विजयंत चीखा.उसके माथे की शिकने अब बहुत गहरी हो गयी.आँखे बिल्कुल मीची हुई थी & वो रंभा के बालो को अब इतनी ज़ोर से खींच रहा था की उसे दर्द होने लगा था.
"कोई बात नही.छ्चोड़ दीजिए याद करना.",रंभा समझ गयी कि अब & सवाल करना विजयंत के लिए नुकसानदेह हो सकता था.उसने लंड को चूचियो की क़ैद से आज़ाद किया & लेट गयी,"..आइए अब वो कीजिए जो आपको याद है डॅड.इस जिस्म को प्यार कीजिए..",नशीली निगाहो से देखते हुए उसने अपने हाथो से अपनी चूचियाँ आपस मे ज़ोर से दबाई,"..जी भर के खेलिए इस से..",उसके हाथ सीने के उभरो से फिसलते हुए उसके पेट से होते हुए उसकी पॅंटी पे आए.उसने अपने घुटने मोडते हुए अपनी टाँगे फैलाई & अपने हाथ चूत पे दबा दिए,"..& अपनी & मेरी,दोनो की प्यास बुझा दीजिए जैसे आप हमेशा बुझाते हैं!"
बहू की बातो ने विजयंत के माथे की शिकनो को दूर कर दिया था.उसकी ज़हनी परेशानिया दूर हो गयी थी & उसे अब बस जिस्मानी चाहत का होश था.उसने रंभा के हाथ उसकी पॅंटी से अलग किए & उसे उतार दिया.रंभा ने पनती उतरते ही फिर से अपने हाथो से अपनी चूत को च्छूपा लिया.विजयंत ने उसके चेहरे को देखा.रंभा के अधखुले होंठ & नशे से बोझल पलके चीख-2 के उसके मस्ताने हाल को बयान कर रही थी.विजयंत बहुत जोश से भर गया था.
"उउम्म्म्म.....आन्न्न्नह..हान्ंनणणन्..उउन्न्ह..!",वो झुका & रंभा के हाथो को चूमने लगा & उसकी उंगलियो के बीच ऐसे ज़ुबान फिराने लगा मानो वो उंगलिया चूत की फांके हों & उनके बीच की जगह चूत की दरार.रंभा मस्ती मे सर दाए-बाए झटकते हुए आहे भरने लगी.विजयंत की ज़ुबान ने उसकी उंगलियो को इतना छेड़ा की वो मस्ती से आहत हो उन्हे मोड़ने लगी & अपनी चूत को नुमाया कर दिया.ऐसा करते ही विजयंत की ज़ुबान ने उसकी कोमल उंगलियो को छ्चोड़ उसकी नाज़ुक,गुलाबी चूत को अपना निशाना बनाया & कुच्छ ही देर मे रेलिंग पे खुले आसमान के नीचे कमर हिलाती रंभा झाड़ रही थी.
"आननह..!",विजयंत फ़ौरन उठा & रैलैन्ग पे दाया घुटना जमाते हुए अपना लंड रंभा की रस बहाती चूत मे घुसा दिया.रंभा ने दर्द & मस्ती से जिस्म को कमान की तरह मोड़ा & अपनी चूचियो को अपने ही हाथो से दबाने लगी.विजयंत रैलैन्ग पे घुटना जमा उसे चोदने मे जुट गया.रंभा अपनी छातियो से खेलती मस्ती भरी आँखो से उसके चेहरे को देख रही थी..क्या उसे बस उसका & अपना रिश्ता याद था?..& कुच्छ भी नही..हां,तभी तो कल भी उसने उसका आँचल थाम उस रोका था & फिर..,"..ऊव्ववव..!",वो करही.उसके ससुर के धक्के अब बहुत गहरे हो गये थे & उसकी चूत की दीवारो को उसका लंड बुरी तरह रगड़ रहा था.
विजयंत ने उसके हाथ उसकी छातियो से अलग किए & उन्हे बुरी तरह दबाने लगा..बस यही बात रंभा की समझ मे नही आ रही थी..पहले का बड़ी गर्मजोशी मगर उतनी ही कोमलता से उसे छुने वाला विजयंत अब इस जूंगलिपने के साथ उस से क्यू पेश आ रहा था?..हां..ड्र.पोपव..इस सवाल का जवाब दे सकते थे..उसका दिमाग़ थोड़ी देर को इन सवालो से जूझने के बाद फिर से वापस जिस्म की मस्ती के ख़यालो से भर गया था.
उसने अपने सीने को रौन्दते हाथो को थाम विजयंत को आगे खींचा तो वो उसके उपर गिर गया.रंभा ने अपने नाख़ून उसकी गंद मे धंसा दिए & उसके बाए कान मे जीभ फिराते हुए कमर उचकाने लगी.विजयंत अपने दाँत पीसते हुए बस धक्के पे धक्के लगाए जा रहा था.बेचैनी मे वो कभी रंभा के चेहरे तो कभी चूचियो को चूमता या बस सर उठाये आहे भरने लगता.
"आननह..दद्द्द्द्द्द्दद्ड..!",रंभा ने ज़ोर से आह भरी & विजयंत की कंधो मे नाख़ून धँसाते हुए अपनी चूचियाँ उपर उचकाई & सर पीछे कर लिया.उसकी आँखे बंद थी & चेहरे पे झड़ने की खुमारी के भाव.
गंद मे नाख़ून धंसते ही विजयंत के धक्के अपनेआप तेज़ हो गये & उसका बदन झटके खाने लगा.रंभा की चूत की मस्तानी हर्कतो से विवश हो वो भी झाड़ गया था.आँखे बंद किए सर उपर उठाए वो उसकी चूत की कसावट से बहाल हो आहे भर रहा था.
कुच्छ पलो बाद दोनो प्रेमियो ने 1 साथ आँखे खोली & 1 दूसरे को देखा.विजयंत की नज़रे रंभा के बाई ओर रेलिंग के नीचे गयी & रंभा को उनका रंग बदलता दिखा.वो समझ गयी कि कुच्छ गड़बड़ होने वाली थी.उसना फ़ौरन गर्दन घुमा रेलिंग के नीचे देखा.वाहा कुच्छ भी नही था बल्कि दूर-2 तक बीच खाली पड़ा था,"डॅड..क्या हुआ?"
मगर विजयंत ने जैसे उसका सवाल सुना ही नही था.उसके चेहरे को देख ऐसा लग रहज़ा था मानो वो बहुत तकलीफ़ मे हो,बहुत दर्द हो रहा हो उसे,"नही..सोनियाआआ..!",वो चीखा & उसकी आँखे उलट गयी & वो रंभा के सीने पे गिर गया.
"डॅड!..क्या हुआ?!..उठिए..!",रंभा ने उसके भारी-भरकम जिस्म को धकेला तो वो कटे पेड़ की तरह लॉन की घास पे गिर गया.वो बहुत घबरा गयी.उसने फ़ौरन उसकी धड़कन & सांस चेक की..दोनो ठीक थे.वो बेहोश हो गया था.तभी 1 कार के रुकने की आवाज़ आई.वो भागती हुई घर के सामने की ओर गयी.देवेन अपनी चाभी से मेन गेट खोल कार अंदर लगा रहा था,"..देवेन..जल्दी आइए..जल्दी!",देवेन ने जल्दी से गेट लॉक किया & उसके पीछे-2 अंदर आया.
"क्या हुआ?",दोनो की नंगी हालत देख उसे समझने मे देर नही लगी कि कुच्छ देर पहले दोनो कर क्या रहे थे.
"डॅड..बेहोश हो गये.",रंभा की आवाज़ कांप रही थी.
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क्रमशः.......
JAAL paart--70
gataank se aage......
"mrs.mehra mujhe sirf aapko dhoondne ka kaam diya gaya tha.aap dono ke zati mamlo me padne ka mera na irada hai na hi khwahish."
"mr.mohan,shayad sameer ne aapko bataya nahi ki maine us se saaf-2 kaha tha ki vo mujhe dhoondane ki koshish na kare varna vahi hoga jo maine abhi pehle kaha tha & aapne jis din mujhe dhoondne ka kaam apne hath me liya,chahte ya na chahte hue aap bhi humare zati mamle ka hissa ban gaye.ab ye baat sameer ko bataiye & mujhe chand din yaha sukun se guzarne dijiye.goodbye!",balbir apne mobile ko dekh kar sar hila raha tha.
rambha ne mobile kinare rakha & samne samandar ki lehro ko dekh uska dil unse khelne ko machal utha.usne pichhli sham hi deven ki pasnad ke kuchh swimsuits kharide the.aaj waqt tha unme se 1 ko try karne ka.vo muskurati hui apne kamre me gayi & jab lauti to uske gore jism pe 1 safed 2-piece bikini thi.rambha ghar ke pichhle hisse me bane lawn ke aakhir me bani seedhiyo se nichi utri & 1 gate khol beach pe aa gayi.yaha kafi doori pe ghar bane the & beach bhi lagbhag khali hi tha.use bas ikka-dukka log ya to sunbath lete ya fir kahi aate-jate dikh rahe the.ret pe chalte hue vo samandar ke pani me utar gayi & lehro se khelne lagi.use bada maza aa raha tha tairne me.lehre uske jism ko apni baaho me bhar uchhalti to uska dil romanch se bhar jata.der tak vo kisi jalpari ki tarah pani me athkheliya karti rahi.
ji bhar ke tairne ke baad vp pani se nikli & ghar ki taraf badhi.ghar ki or dekhte hi vo chaunk gayi.jis jagah khadi ho vo balbir se baat kar rahi thi vaha pe ab Vijayant Mehra khada use dekh raha tha.rambha ko Gujrat ke samandar ke kinare ki vo savere ki mulakat yaad aa gayi & uska dil dhadak utha.vo dhime kadmo se gate tak pahunchi,use khola & andar gayi.vijayant use dekhe ja raha tha & uski aankho me vahi kuchh samajhne ka sa bhav tha.
rambha seedhiya chadh uske karib pahunchi.uska gila jism dhoop me chamchama raha tha.vijayant ki nigahen uske chehre pe jami thi jise bhige gesuo se tapakti boonde chum rahi thi.usne apna hath aage badha ke rambha ko tauliya thamaya & uski nigahen uske chehre se neeche uske gile chamchamate badan ko chumne lagi.rambha ka dhadakta dil masti se bhar utha tha.uske bikini ke bra me 2 nukile ubhaar ubhar aaye the..kya ise yaad hai vo subah jab maine iski maujudgi me jhurmut ki aad me kapde badle the?
"thanks.",usne tauliya liya & apne bayi taraf ke 2 bade paudhon ke peechhe chali gayi.unke bade-2 patto ki aad me apne premi ko dekhte hue vo tauliye se apne gaal sukhane lagi.
"rambha.",vo apne seene pe tauliye ko daba rahi thi jab uske sasur ne uska naam pukara.
"hun.",vijayant ne patto ko neeche kiya.uski nigahen bahu ke seene pe rakhe tauliye pe thi.
"tumne koi achha kaam kiya hai.",rambha ke mathe pe shikan pad gayi..ye kaisa sawal tha?,"..tumne kuchh achha kiya hai.",..ab vo samjhi..gujrat me usne uski cement ke daam vali baat batane pe tarif ki thi..use vahi yaad aa raha tha.vijayant ke hath uske seene pe rakhe tauliye ko thame hatho pe aa gaye the.
"haan,bataiye kya achha kiya hai?",vijayant ne tauliya neeche gira diya & uske hath pakad ke seene se hata diye & uske cleavage ko dekhne laga.
"kuchh achha kiya hai..",vo jhuka & uski gardan chumne laga.
"uunnnn..yaad kijiye dad,kya achha kiya tha?",vo uske cleavage pe lagi boondo ko apni zuban se chakh raha tha.uski zuban & garm sanse rambha ke seene ko tapate hue use mast kar rahi thi.uske hath sasur ke mazbut jism ko mehsus karne ko machal rahe the.usne apni ungliya vijayant ki ungliyo se alag ki & uske kandhe tham liye & uske sar ko chumne lagi.
"aapne mujhe aise dekha hai kabhi..oohhhh..?",vijayant uske clevage ko chus raha tha.usne uske baal pakad sar ko upar kiya & uski aankho me dekha,"..boliye dekha hai aapne mujhe kabhi aise?"
"shayad..nahi..kuchh..dhundhla sa....hai..!",uske mathe pe shikan gehri ho rahi thi.rambha ne uske seene pe hath rakh use peechhe railing pe bitha diya & uske kandho pe baahe jama uske chehre ko hatho me bhar liya & chum kar uske mathe ki salwato ko door karne lagi.
"koi baat nahi..pareshan mat hoiye.sab yaad aa jayega..oowwww..!",vijayant ke hath uski moti gand ko dabane lage the & vo chihunk ke aage ho gayi thi.vijayant ka chehra uske seene me ghus gaya tha & 1 baar fir uske cleavage pe uske garm honth apne nishan chhodne lage the.rambha ne uske sar ko baaho me pakad seene pe zor se dabaya & aur aage ho gayi.vijayant ke hath uski panty me ghus uski gand ki kasi fanko ko masal rahe the.
"aapko sameer yaad hai dada..Shipra..Rita..boliye?..aannhhhhh..!",uski panty ko neeche kar vo uski gand ko dabochte hue uske clavage ko kaat raha tha.rambha ne uske baal pakad uske sar ko apne seene se alag kiya & uski t-shirt ko upar khincha.vijayant ne uski bikini top ke cups se uski moti chhatiyan bahar nikali & unhe maslane laga.rambha ne apne nakhun uski nabhi se leke nipples tak chalate hue use jhuk ke chuma to vo bahut zor se uski zuban chusne laga.
"nahi.",vo uski choochiya chus raha tha & uski kamar ko jakde hue uski gili ptih & gand ko apne hatho se masal raha tha.
"Trust..Devalay..Panchmahal..Clayworth..Hotel Violet....ye naam jante hain aap?..ouiiiiiiii..!",vijayant ne uski panty upar ki & fir uski tange faila ke use apni god me bitha liya tha & use baaho me bhinch uske nipples kaat raha tha,"..dant mat lagaiye..dard hota hai..haannnnn..aise hi..oui maaaaaa..aise hi chusiye..haiiiiiiiiii..!",neeche half-pant me qaid vijayant ka lund uski bikini bottom ke gile kapde se dhanki uski utni hi gili chut ko chum raha tha & upar uska sasur uski chhatiyo ko apne munh me pura bharne ki koshish karta hua chus raha tha.rambha to masti me pagal ho gayi & peechhe jhuk ke apne baal pakad unme bechaini se hath firate hue jhadne lagi.vijayant ki mazbut baahe use peechhe girne se roke hui thi.
"kuchh nahi yaad aa raha aapko?",rambha sambhli to seedhi hui & uski pith ko nochte hue use chumne lagi.gand aage-peechhe kar vo sasur ke lund ko chhed rahi thi.
"nahi.",vijayant ne uski kamar pakad use utahya & use ghuma ke chaudi railing pe lita diya & apni pant utar di.rambha ne uska lund pakad use apni or khincha & lete-2 hi use munh me bhar liya & chusne lagi.
"ye yaad hai aapko dad?",rambha ne lund munh se nikal upar kar uske ando ko apne samne kiya & 1 ko munh me bhar liya.
"haannnnnn..aahhhhh..!",rambha hairan ho gayi.
"sach ye yaad hai aapko?",vo ando ke upar ki tvacha ko apne danto me bahut halke se pakad ke khinch rahi thi.
"haan..yaad hai..",rambha ne lund ko zor se hilaya & fir uske supade ko chusa.
"& kya yaad hai aapko?",vo uth baithi & sasur ki kamar ko baaho me bhar uski gand ko dabochte hue uske pet ke balo me apne galo & naak ko ragadne lagi.
"bas yehi..aahhhh..!",vo uske baalo me bechaini se hath firate hue uske sar ko apne pet me daba raha tha.rambha ne daye hath se uske lund ko pakad apni choochiyo ke beech ki vadi me dabaya & fir uski nabhi me jibh ghusate hue apni dono chhatiyo ko bahar se tham lund ko unke beech qaid kar use hilane lagi.
"yehi ki aap ye sab karte the mere sath?"
"haannnnn..ohhhhhh..!",vijayantn ki aankhe band thi & uske chehre pe lakire khicnh gayi thi..maze ki ya uljhan ki-ye rambha ki samajh me nahi aa raha tha.
"kaha karte the ye sab mere sath aap?",vo badastur lund ko apni makhmali choochiyo ke beech daba hilaye ja rahi thi.
"kamre me.",vijayant ke mathe ki shikane fir gehri ho rahi thi.
"kaise kamre me?..kiske kamre me?..kisi ghar ke kamre me ya fir kahi & ke?",usne lund ko zor se hilate hue & sawal kiye.
"nahi yaad mujhe..bilkul nahi..aahhhhhhhhh..!",vijayant chika.uske mathe ki shikane ab bahut gehri ho gayi.aankhe bilkul meechi hui thi & vo rambha ke baalo ko ab itni zor se khinch raha tha ki use dard hone laga tha.
"koi baat nahi.chhod dijiye yaad karna.",rambha samajh gayi ki ab & sawal karna vijayant ke liye nuksandeh ho sakta tha.usne lund ko choochiyo ki qaid se azad kiya & let gayi,"..aaiye ab vo kijiye jo aapko yaad hai dad.is jism ko pyar kijiye..",mashili nigaho se dekhte hue usne apne hatho se apni chhatiya aapas me zor se dabayi,"..ji bhar ke kheliye is se..",uske hath seene ke ubharo se fisalte hue uske pet se hote hue uski panty pe aaye.usne apne ghutne modte hue apni tange failayi & apne hath chut pe daba diye,"..& apni & meri,dono ki pyas bujha dijiye jaise aap humesha bujhate hain!"
bahu ki baato ne vijayant ke mathe ki shikano ko door kar diya tha.uski zehani pareshaniya door ho gayi thi & use ab bas jismani chahat ka hosh tha.usne rambha ke hath uski panty se alag kiye & use utar diya.rambha ne panty utarte hi fir se apne hatho se apni chut ko chhupa liya.vijayant ne uske chehre ko dekha.rambha ke adhkhule honth & nashe se bojhal palke chikh-2 ke uske mastane haal ko bayan kar rahi thi.vijayant bahut josh se bhar gaya tha.
"uummmm.....aannnnhhhhhh..haannnnnn..uunnhhhhhh..!",vo jhuka & rambha ke hatho ko chumne laga & uski ungliyo ke beech aise zuban firane laga mano vo ungliya chut ki fanke hon & unke beech ki jagah chut ki darar.rambha masti me sar daye-baye jhatakte hue aahe bharne lagi.vijayant ki zuban ne uski ungliyo ko itna chheda ki vo masti se aahat ho unhe modne lagi & apni chut ko numaya kar diya.aisa karte hi vijayant ki zuban ne uski komal ungliyo ko chhod uski nazuk,gulabi chut ko apna nishana banaya & kuchh hi der me railing pe khule aasman ke neeche kamar hilati rambha jhad rahi thi.
"aannhhhhh..!",vijayant fauran utha & railaing pe daya ghutna jamate hue apna lund rambha ki ras bahati chut me ghusa diya.rambha ne dard & masti se jism ko kaman ki tarah moda & apni chhatiya apne hi hatho se dabane lagi.vijayant railaing pe ghutna jama use chodne me jut gaya.rambha apni chhatiyo se khelti masti bhari aankho se uske chehre ko dekh rahi thi..kya use bas uska & apna rishta yaad tha?..& kuchh bhi nahi..haan,tabhi to kal bhi usne uska aanchal tham us roka tha & fir..,"..oowwww..!",vo karahi.uske sasur ke dhakke ab bahut gehre ho gaye the & uski chut ki deewaro ko uska lund buri tarah ragad raha tha.
vijayant ne uske hath uski chhatiyo se alag kiye & unhe buri tarah dabane laga..bas yehi baat rambha ki samajh me nahi aa rahi thi..pehle ka badi garmjoshi magar utni hi komalta se use chhune vala vijayant ab is junglipane ke sath us se kyu pesh aa raha tha?..haan..Dr.Popov..is sawal ka jawab de sakte the..uska dimagh thodi der ko in sawalo se jujhne ke baad fir se vapas jism ki masti ke khayalo se bhar gaya tha.
usne apne seene ko raundate hatho ko tham vijayant ko aage khincha to vo uske upar gir gaya.rambha ne apne nakhun uski gand me dhansa diye & uske baye kaan me jibh firate hue kamar uchkane lagi.vijayant apne dant peeste hue bas dhakke pe dhakke lagaye ja raha tha.bechaini me vo kabhi rambha ke chehre to akbhi chhatiyo ko chumta ya bas sar utahye aahe bharne lagta.
"aannhhhhhhhhh..daddddddddd..!",rambha ne zor se aah bhari & vijayant ki kandho me nakhun dhansate hue apni chhatiyan upar uchkayi & sar peechhe kar liya.uski aankhe band thi & chehre pe jhadnhe ki khumari ke bhav.
gand me nakhun dhanste hi vijayant ke dhakke apneaap tez ho gaye & uska badan jhatke kahne laga.rambha ki chut ki mastani harkato se vivash ho vo bhi jhad gaya tha.aankhe band kiye sar upar uthaye vo uski chut ki kasawat se behaal ho aahe bhar raha tha.
kuchh palo baad dono premiyo ne 1 sath aankhe kholi & 1 dusre ko dekha.vijayant ki nazre rambha ke bayi or railing ke neeche gayi & rambha ko unka rang badalta dikha.vo samajh gayi ki kuchh gadbad hone wali thi.usna fauran gardan ghuma railing ke neeche dekha.vaha kuchh bhi nahi tha balki door-2 tak beach khali pada tha,"dad..kya hua?"
magar vijayant ne jaise uska sawal suna hi nahi tha.uske chehre ko dekh aisa lag rahja tha mano vo bahut taklif me ho,bahut dard ho raha ho use,"nahi..Soniyaaaaaa..!",vo chikha & uski aankhe ulat gayi & vo rambha ke seene pe gir gaya.
"dad!..kya hua?!..uthiye..!",rambha ne uske bhari-bharkam jism ko dhakela to vo kate ped ki tarah lawn ki ghas pe gir gaya.vo bahut ghabra gayi.usne fauran uski dhadkan & sans check ki..dono thik the.vo behosh ho gaya tha.tabhi 1 car ke rukne ki aavaz aayi.vo bhagti hui ghar ke samne ki ro gayi.deven apni chabhi se main gate khol car andar laga raha tha,"..deven..jaldi aaiye..jaldi!",deven ne jaldi se gate lock kiya & uske peechhe-2 andar aaya.
"kya hua?",dono ki nangi halat dekh use samajhne me der nahi lagi ki kuchh der pehle dono kar kya rahe the.
"dad..behosh ho gaye.",rambha ki aavaz kanp rahi thi.
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kramashah.......
गतान्क से आगे......
"म्र्स.मेहरा मुझे सिर्फ़ आपको ढूँदने का काम दिया गया था.आप दोनो के ज़ाति मामलो मे पड़ने का मेरा ना इरादा है ना ही ख्वाहिश."
"मिस्टर.मोहन,शायद समीर ने आपको बताया नही कि मैने उस से साफ-2 कहा था कि वो मुझे ढूँढने की कोशिश ना करे वरना वही होगा जो मैने अभी पहले कहा था & आपने जिस दिन मुझे ढूँढने का काम अपने हाथ मे लिया,चाहते या ना चाहते हुए आप भी हमारे ज़ाति मामले का हिस्सा बन गये.अब ये बात समीर को बताइए & मुझे चंद दिन यहा सुकून से गुज़रने दीजिए.गुडबाइ!",बलबीर अपने मोबाइल को देख कर सर हिला रहा था.
रंभा ने मोबाइल किनारे रखा & सामने समंदर की लहरो को देख उसका दिल उनसे खेलने को मचल उठा.उसने पिच्छली शाम ही देवेन की पसंद के कुच्छ स्विमस्यूट्स खरीदे थे.आज वक़्त था उनमे से 1 को ट्राइ करने का.वो मुस्कुराती हुई अपने कमरे मे गयी & जब लौटी तो उसके गोरे जिस्म पे 1 सफेद 2-पीस बिकिनी थी.रंभा घर के पिच्छले हिस्से मे बने लॉन के आख़िर मे बनी सीढ़ियो से नीची उतरी & 1 गेट खोल बीच पे आ गयी.यहा काफ़ी दूरी पे घर बने थे & बीच भी लगभग खाली ही था.उसे बस इक्का-दुक्का लोग या तो सुन्बाथ लेते या फिर कही आते-जाते दिख रहे थे.रेत पे चलते हुए वो समंदर के पानी मे उतर गयी & लहरो से खेलने लगी.उसे बड़ा मज़ा आ रहा था तैरने मे.लहरे उसके जिस्म को अपनी बाहो मे भर उच्छलती तो उसका दिल रोमांच से भर जाता.देर तक वो किसी जलपरी की तरह पानी मे अठखेलिया करती रही.
जी भर के तैरने के बाद वह पानी से निकली & घर की तरफ बढ़ी.घर की ओर देखते ही वो चौंक गयी.जिस जगह खड़ी हो वो बलबीर से बात कर रही थी वाहा पे अब विजयंत मेहरा खड़ा उसे देख रहा था.रंभा को गुजरात के समंदर के किनारे की वो सवेरे की मुलाकात याद आ गयी & उसका दिल धड़क उठा.वो धीमे कदमो से गेट तक पहुँची,उसे खोला & अंदर गयी.विजयंत उसे देखे जा रहा था & उसकी आँखो मे वही कुच्छ समझने का सा भाव था.
रंभा सीढ़िया चढ़ उसके करीब पहुँची.उसका गीला जिस्म धूप मे चमचमा रहा था.विजयंत की निगाहें उसके चेहरे पे जमी थी जिसे भीगे गेसुओ से टपकती बूंदे चूम रही थी.उसने अपना हाथ आगे बढ़ा के रंभा को तौलिया थमाया & उसकी निगाहें उसके चेहरे से नीचे उसके गीले चमचमते बदन को चूमने लगी.रंभा का धड़कता दिल मस्ती से भर उठा था.उसके बिकिनी के ब्रा मे 2 नुकीले उभार उभर आए थे..क्या इसे याद है वो सुबह जब मैने इसकी मौजूदगी मे झुर्मुट की आड़ मे कपड़े बदले थे?
"थॅंक्स.",उसने तौलिया लिया & अपने बाई तरफ के 2 बड़े पौधों के पीछे चली गयी.उनके बड़े-2 पत्तो की आड़ मे अपने प्रेमी को देखते हुए वो तौलिए से अपने गाल सुखाने लगी.
"रंभा.",वो अपने सीने पे तौलिए को दबा रही थी जब उसके ससुर ने उसका नाम पुकारा.
"हूँ.",विजयंत ने पत्तो को नीचे किया.उसकी निगाहें बहू के सीने पे रखे तौलिए पे थी.
"तुमने कोई अच्छा काम किया है.",रंभा के माथे पे शिकन पड़ गयी..ये कैसा सवाल था?,"..तुमने कुच्छ अच्छा किया है.",..अब वो समझी..गुजरात मे उसने उसकी सेमेंट के दाम वाली बात बताने पे तारीफ की थी..उसे वही याद आ रहा था.विजयंत के हाथ उसके सीने पे रखे तौलिए को थामे हाथो पे आ गये थे.
"हां,बताइए क्या अच्छा किया है?",विजयंत ने तौलिया नीचे गिरा दिया & उसके हाथ पकड़ के सीने से हटा दिए & उसके क्लीवेज को देखने लगा.
"कुच्छ अच्छा किया है..",वो झुका & उसकी गर्दन चूमने लगा.
"उउन्न्ञन्..याद कीजिए डॅड,क्या अच्छा किया था?",वो उसके क्लीवेज पे लगी बूँदो को अपनी ज़ुबान से चख रहा था.उसकी ज़ुबान & गर्म साँसे रंभा के सीने को तपते हुए उसे मस्त कर रही थी.उसके हाथ ससुर के मज़बूत जिस्म को महसूस करने को मचल रहे थे.उसने अपनी उंगलिया विजयंत की उंगलियो से अलग की & उसके कंधे थाम लिए & उसके सर को चूमने लगी.
"आपने मुझे ऐसे देखा है कभी..ऊहह..?",विजयंत उसके क्लेवगे को चूस रहा था.उसने उसके बाल पकड़ सर को उपर किया & उसकी आँखो मे देखा,"..बोलिए देखा है आपने मुझे कभी ऐसे?"
"शायद..नही..कुच्छ..धुँधला सा....है..!",उसके माथे पे शिकन गहरी हो रही थी.रंभा ने उसके सीने पे हाथ रख उसे पीछे रेलिंग पे बिठा दिया & उसके कंधो पे बाहे जमा उसके चेहरे को हाथो मे भर लिया & चूम कर उसके माथे की सलवटो को दूर करने लगी.
"कोई बात नही..परेशान मत होइए.सब याद आ जाएगा..ऊव्ववव..!",विजयंत के हाथ उसकी मोटी गंद को दबाने लगे थे & वो चिहुनक के आगे हो गयी थी.विजयंत का चेहरा उसके सीने मे घुस गया था & 1 बार फिर उसके क्लीवेज पे उसके गर्म होंठ अपने निशान छ्चोड़ने लगे थे.रंभा ने उसके सर को बाहो मे पकड़ सीने पे ज़ोर से दबाया & और आगे हो गयी.विजयंत के हाथ उसकी पॅंटी मे घुस उसकी गंद की कसी फांको को मसल रहे थे.
"आपको समीर याद है डॅड..शिप्रा..रीता..बोलिए?..आननह..!",उसकी पॅंटी को नीचे कर वो उसकी गंद को दबोचते हुए उसके क्लावेज को काट रहा था.रंभा ने उसके बाल पकड़ उसके सर को अपने सीने से अलग किया & उसकी टी-शर्ट को उपर खींचा.विजयंत ने उसकी बिकिनी टॉप के कप्स से उसकी मोटी छातियो बाहर निकली & उन्हे मसलने लगा.रंभा ने अपने नाख़ून उसकी नाभि से लेके निपल्स तक चलते हुए उसे झुक के चूमा तो वो बहुत ज़ोर से उसकी ज़ुबान चूसने लगा.
"नही.",वो उसकी चूचिया चूस रहा था & उसकी कमर को जकड़े हुए उसकी गीली पीठ & गंद को अपने हाथो से मसल रहा था.
"ट्रस्ट..डेवाले..पंचमहल..क्लेवर्त..होटेल वाय्लेट....ये नाम जानते हैं आप?..ओईईईईई..!",विजयंत ने उसकी पॅंटी उपर की & फिर उसकी टाँगे फैला के उसे अपनी गोद मे बिठा लिया था & उसे बाहो मे भींच उसके निपल्स काट रहा था,"..दाँत मत लगाइए..दर्द होता है..हान्न्न्न्न..ऐसे ही..वी माआआ..ऐसे ही चुसिये..हाईईईईईईईईई..!",नीचे हाफ-पॅंट मे क़ैद विजयंत का लंड उसकी बिकिनी बॉटम के गीले कपड़े से ढँकी उसकी उतनी ही गीली चूत को चूम रहा था & उपर उसका ससुर उसकी चूचियो को अपने मुँह मे पूरा भरने की कोशिश करता हुआ चूस रहा था.रंभा तो मस्ती मे पागल हो गयी & पीछे झुक के अपने बाल पकड़ उनमे बेचैनी से हाथ फिराते हुए झड़ने लगी.विजयंत की मज़बूत बाहे उसे पीछे गिरने से रोके हुई थी.
"कुच्छ नही याद आ रहा आपको?",रंभा संभली तो सीधी हुई & उसकी पीठ को नोचते हुए उसे चूमने लगी.गंद आगे-पीछे कर वो ससुर के लंड को छेद रही थी.
"नही.",विजयंत ने उसकी कमर पकड़ उसे उठाया & उसे घुमा के चौड़ी रेलिंग पे लिटा दिया & अपनी पॅंट उतार दी.रंभा ने उसका लंड पकड़ उसे अपनी ओर खींचा & लेटे-2 ही उसे मुँह मे भर लिया & चूसने लगी.
"ये याद है आपको डॅड?",रंभा ने लंड मुँह से निकाल उपर कर उसके आंडो को अपने सामने किया & 1 को मुँह मे भर लिया.
"हान्न्न्न्न्न..आहह..!",रंभा हैरान हो गयी.
"सच ये याद है आपको?",वो आंडो के उपर की त्वचा को अपने दन्तो मे बहुत हल्के से पकड़ के खींच रही थी.
"हां..याद है..",रंभा ने लंड को ज़ोर से हिलाया & फिर उसके सूपदे को चूसा.
"& क्या याद है आपको?",वो उठ बैठी & ससुर की कमर को बाहो मे भर उसकी गंद को दबोचते हुए उसके पेट के बालो मे अपने गालो & नाक को रगड़ने लगी.
"बस यही..आहह..!",वो उसके बालो मे बेचैनी से हाथ फिराते हुए उसके सर को अपने पेट मे दबा रहा था.रंभा ने दाए हाथ से उसके लंड को पकड़ अपनी चूचियो के बीच की वादी मे दबाया & फिर उसकी नाभि मे जीभ घुसाते हुए अपनी दोनो छातियो को बाहर से थाम लंड को उनके बीच क़ैद कर उसे हिलाने लगी.
"यही की आप ये सब करते थे मेरे साथ?"
"हान्न्न्न्न..ओह..!",विजयनत्न की आँखे बंद थी & उसके चेहरे पे लकीरे खीच गयी थी..मज़े की या उलझन की-ये रंभा की समझ मे नही आ रहा था.
"कहा करते थे ये सब मेरे साथ आप?",वो बदस्तूर लंड को अपनी मखमली चूचियो के बीच दबा हिलाए जा रही थी.
"कमरे मे.",विजयंत के माथे की शिकने फिर गहरी हो रही थी.
"कैसे कमरे मे?..किसके कमरे मे?..किसी घर के कमरे मे या फिर कही & के?",उसने लंड को ज़ोर से हिलाते हुए & सवाल किए.
"नही याद मुझे..बिल्कुल नही..आहह..!",विजयंत चीखा.उसके माथे की शिकने अब बहुत गहरी हो गयी.आँखे बिल्कुल मीची हुई थी & वो रंभा के बालो को अब इतनी ज़ोर से खींच रहा था की उसे दर्द होने लगा था.
"कोई बात नही.छ्चोड़ दीजिए याद करना.",रंभा समझ गयी कि अब & सवाल करना विजयंत के लिए नुकसानदेह हो सकता था.उसने लंड को चूचियो की क़ैद से आज़ाद किया & लेट गयी,"..आइए अब वो कीजिए जो आपको याद है डॅड.इस जिस्म को प्यार कीजिए..",नशीली निगाहो से देखते हुए उसने अपने हाथो से अपनी चूचियाँ आपस मे ज़ोर से दबाई,"..जी भर के खेलिए इस से..",उसके हाथ सीने के उभरो से फिसलते हुए उसके पेट से होते हुए उसकी पॅंटी पे आए.उसने अपने घुटने मोडते हुए अपनी टाँगे फैलाई & अपने हाथ चूत पे दबा दिए,"..& अपनी & मेरी,दोनो की प्यास बुझा दीजिए जैसे आप हमेशा बुझाते हैं!"
बहू की बातो ने विजयंत के माथे की शिकनो को दूर कर दिया था.उसकी ज़हनी परेशानिया दूर हो गयी थी & उसे अब बस जिस्मानी चाहत का होश था.उसने रंभा के हाथ उसकी पॅंटी से अलग किए & उसे उतार दिया.रंभा ने पनती उतरते ही फिर से अपने हाथो से अपनी चूत को च्छूपा लिया.विजयंत ने उसके चेहरे को देखा.रंभा के अधखुले होंठ & नशे से बोझल पलके चीख-2 के उसके मस्ताने हाल को बयान कर रही थी.विजयंत बहुत जोश से भर गया था.
"उउम्म्म्म.....आन्न्न्नह..हान्ंनणणन्..उउन्न्ह..!",वो झुका & रंभा के हाथो को चूमने लगा & उसकी उंगलियो के बीच ऐसे ज़ुबान फिराने लगा मानो वो उंगलिया चूत की फांके हों & उनके बीच की जगह चूत की दरार.रंभा मस्ती मे सर दाए-बाए झटकते हुए आहे भरने लगी.विजयंत की ज़ुबान ने उसकी उंगलियो को इतना छेड़ा की वो मस्ती से आहत हो उन्हे मोड़ने लगी & अपनी चूत को नुमाया कर दिया.ऐसा करते ही विजयंत की ज़ुबान ने उसकी कोमल उंगलियो को छ्चोड़ उसकी नाज़ुक,गुलाबी चूत को अपना निशाना बनाया & कुच्छ ही देर मे रेलिंग पे खुले आसमान के नीचे कमर हिलाती रंभा झाड़ रही थी.
"आननह..!",विजयंत फ़ौरन उठा & रैलैन्ग पे दाया घुटना जमाते हुए अपना लंड रंभा की रस बहाती चूत मे घुसा दिया.रंभा ने दर्द & मस्ती से जिस्म को कमान की तरह मोड़ा & अपनी चूचियो को अपने ही हाथो से दबाने लगी.विजयंत रैलैन्ग पे घुटना जमा उसे चोदने मे जुट गया.रंभा अपनी छातियो से खेलती मस्ती भरी आँखो से उसके चेहरे को देख रही थी..क्या उसे बस उसका & अपना रिश्ता याद था?..& कुच्छ भी नही..हां,तभी तो कल भी उसने उसका आँचल थाम उस रोका था & फिर..,"..ऊव्ववव..!",वो करही.उसके ससुर के धक्के अब बहुत गहरे हो गये थे & उसकी चूत की दीवारो को उसका लंड बुरी तरह रगड़ रहा था.
विजयंत ने उसके हाथ उसकी छातियो से अलग किए & उन्हे बुरी तरह दबाने लगा..बस यही बात रंभा की समझ मे नही आ रही थी..पहले का बड़ी गर्मजोशी मगर उतनी ही कोमलता से उसे छुने वाला विजयंत अब इस जूंगलिपने के साथ उस से क्यू पेश आ रहा था?..हां..ड्र.पोपव..इस सवाल का जवाब दे सकते थे..उसका दिमाग़ थोड़ी देर को इन सवालो से जूझने के बाद फिर से वापस जिस्म की मस्ती के ख़यालो से भर गया था.
उसने अपने सीने को रौन्दते हाथो को थाम विजयंत को आगे खींचा तो वो उसके उपर गिर गया.रंभा ने अपने नाख़ून उसकी गंद मे धंसा दिए & उसके बाए कान मे जीभ फिराते हुए कमर उचकाने लगी.विजयंत अपने दाँत पीसते हुए बस धक्के पे धक्के लगाए जा रहा था.बेचैनी मे वो कभी रंभा के चेहरे तो कभी चूचियो को चूमता या बस सर उठाये आहे भरने लगता.
"आननह..दद्द्द्द्द्द्दद्ड..!",रंभा ने ज़ोर से आह भरी & विजयंत की कंधो मे नाख़ून धँसाते हुए अपनी चूचियाँ उपर उचकाई & सर पीछे कर लिया.उसकी आँखे बंद थी & चेहरे पे झड़ने की खुमारी के भाव.
गंद मे नाख़ून धंसते ही विजयंत के धक्के अपनेआप तेज़ हो गये & उसका बदन झटके खाने लगा.रंभा की चूत की मस्तानी हर्कतो से विवश हो वो भी झाड़ गया था.आँखे बंद किए सर उपर उठाए वो उसकी चूत की कसावट से बहाल हो आहे भर रहा था.
कुच्छ पलो बाद दोनो प्रेमियो ने 1 साथ आँखे खोली & 1 दूसरे को देखा.विजयंत की नज़रे रंभा के बाई ओर रेलिंग के नीचे गयी & रंभा को उनका रंग बदलता दिखा.वो समझ गयी कि कुच्छ गड़बड़ होने वाली थी.उसना फ़ौरन गर्दन घुमा रेलिंग के नीचे देखा.वाहा कुच्छ भी नही था बल्कि दूर-2 तक बीच खाली पड़ा था,"डॅड..क्या हुआ?"
मगर विजयंत ने जैसे उसका सवाल सुना ही नही था.उसके चेहरे को देख ऐसा लग रहज़ा था मानो वो बहुत तकलीफ़ मे हो,बहुत दर्द हो रहा हो उसे,"नही..सोनियाआआ..!",वो चीखा & उसकी आँखे उलट गयी & वो रंभा के सीने पे गिर गया.
"डॅड!..क्या हुआ?!..उठिए..!",रंभा ने उसके भारी-भरकम जिस्म को धकेला तो वो कटे पेड़ की तरह लॉन की घास पे गिर गया.वो बहुत घबरा गयी.उसने फ़ौरन उसकी धड़कन & सांस चेक की..दोनो ठीक थे.वो बेहोश हो गया था.तभी 1 कार के रुकने की आवाज़ आई.वो भागती हुई घर के सामने की ओर गयी.देवेन अपनी चाभी से मेन गेट खोल कार अंदर लगा रहा था,"..देवेन..जल्दी आइए..जल्दी!",देवेन ने जल्दी से गेट लॉक किया & उसके पीछे-2 अंदर आया.
"क्या हुआ?",दोनो की नंगी हालत देख उसे समझने मे देर नही लगी कि कुच्छ देर पहले दोनो कर क्या रहे थे.
"डॅड..बेहोश हो गये.",रंभा की आवाज़ कांप रही थी.
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क्रमशः.......
JAAL paart--70
gataank se aage......
"mrs.mehra mujhe sirf aapko dhoondne ka kaam diya gaya tha.aap dono ke zati mamlo me padne ka mera na irada hai na hi khwahish."
"mr.mohan,shayad sameer ne aapko bataya nahi ki maine us se saaf-2 kaha tha ki vo mujhe dhoondane ki koshish na kare varna vahi hoga jo maine abhi pehle kaha tha & aapne jis din mujhe dhoondne ka kaam apne hath me liya,chahte ya na chahte hue aap bhi humare zati mamle ka hissa ban gaye.ab ye baat sameer ko bataiye & mujhe chand din yaha sukun se guzarne dijiye.goodbye!",balbir apne mobile ko dekh kar sar hila raha tha.
rambha ne mobile kinare rakha & samne samandar ki lehro ko dekh uska dil unse khelne ko machal utha.usne pichhli sham hi deven ki pasnad ke kuchh swimsuits kharide the.aaj waqt tha unme se 1 ko try karne ka.vo muskurati hui apne kamre me gayi & jab lauti to uske gore jism pe 1 safed 2-piece bikini thi.rambha ghar ke pichhle hisse me bane lawn ke aakhir me bani seedhiyo se nichi utri & 1 gate khol beach pe aa gayi.yaha kafi doori pe ghar bane the & beach bhi lagbhag khali hi tha.use bas ikka-dukka log ya to sunbath lete ya fir kahi aate-jate dikh rahe the.ret pe chalte hue vo samandar ke pani me utar gayi & lehro se khelne lagi.use bada maza aa raha tha tairne me.lehre uske jism ko apni baaho me bhar uchhalti to uska dil romanch se bhar jata.der tak vo kisi jalpari ki tarah pani me athkheliya karti rahi.
ji bhar ke tairne ke baad vp pani se nikli & ghar ki taraf badhi.ghar ki or dekhte hi vo chaunk gayi.jis jagah khadi ho vo balbir se baat kar rahi thi vaha pe ab Vijayant Mehra khada use dekh raha tha.rambha ko Gujrat ke samandar ke kinare ki vo savere ki mulakat yaad aa gayi & uska dil dhadak utha.vo dhime kadmo se gate tak pahunchi,use khola & andar gayi.vijayant use dekhe ja raha tha & uski aankho me vahi kuchh samajhne ka sa bhav tha.
rambha seedhiya chadh uske karib pahunchi.uska gila jism dhoop me chamchama raha tha.vijayant ki nigahen uske chehre pe jami thi jise bhige gesuo se tapakti boonde chum rahi thi.usne apna hath aage badha ke rambha ko tauliya thamaya & uski nigahen uske chehre se neeche uske gile chamchamate badan ko chumne lagi.rambha ka dhadakta dil masti se bhar utha tha.uske bikini ke bra me 2 nukile ubhaar ubhar aaye the..kya ise yaad hai vo subah jab maine iski maujudgi me jhurmut ki aad me kapde badle the?
"thanks.",usne tauliya liya & apne bayi taraf ke 2 bade paudhon ke peechhe chali gayi.unke bade-2 patto ki aad me apne premi ko dekhte hue vo tauliye se apne gaal sukhane lagi.
"rambha.",vo apne seene pe tauliye ko daba rahi thi jab uske sasur ne uska naam pukara.
"hun.",vijayant ne patto ko neeche kiya.uski nigahen bahu ke seene pe rakhe tauliye pe thi.
"tumne koi achha kaam kiya hai.",rambha ke mathe pe shikan pad gayi..ye kaisa sawal tha?,"..tumne kuchh achha kiya hai.",..ab vo samjhi..gujrat me usne uski cement ke daam vali baat batane pe tarif ki thi..use vahi yaad aa raha tha.vijayant ke hath uske seene pe rakhe tauliye ko thame hatho pe aa gaye the.
"haan,bataiye kya achha kiya hai?",vijayant ne tauliya neeche gira diya & uske hath pakad ke seene se hata diye & uske cleavage ko dekhne laga.
"kuchh achha kiya hai..",vo jhuka & uski gardan chumne laga.
"uunnnn..yaad kijiye dad,kya achha kiya tha?",vo uske cleavage pe lagi boondo ko apni zuban se chakh raha tha.uski zuban & garm sanse rambha ke seene ko tapate hue use mast kar rahi thi.uske hath sasur ke mazbut jism ko mehsus karne ko machal rahe the.usne apni ungliya vijayant ki ungliyo se alag ki & uske kandhe tham liye & uske sar ko chumne lagi.
"aapne mujhe aise dekha hai kabhi..oohhhh..?",vijayant uske clevage ko chus raha tha.usne uske baal pakad sar ko upar kiya & uski aankho me dekha,"..boliye dekha hai aapne mujhe kabhi aise?"
"shayad..nahi..kuchh..dhundhla sa....hai..!",uske mathe pe shikan gehri ho rahi thi.rambha ne uske seene pe hath rakh use peechhe railing pe bitha diya & uske kandho pe baahe jama uske chehre ko hatho me bhar liya & chum kar uske mathe ki salwato ko door karne lagi.
"koi baat nahi..pareshan mat hoiye.sab yaad aa jayega..oowwww..!",vijayant ke hath uski moti gand ko dabane lage the & vo chihunk ke aage ho gayi thi.vijayant ka chehra uske seene me ghus gaya tha & 1 baar fir uske cleavage pe uske garm honth apne nishan chhodne lage the.rambha ne uske sar ko baaho me pakad seene pe zor se dabaya & aur aage ho gayi.vijayant ke hath uski panty me ghus uski gand ki kasi fanko ko masal rahe the.
"aapko sameer yaad hai dada..Shipra..Rita..boliye?..aannhhhhh..!",uski panty ko neeche kar vo uski gand ko dabochte hue uske clavage ko kaat raha tha.rambha ne uske baal pakad uske sar ko apne seene se alag kiya & uski t-shirt ko upar khincha.vijayant ne uski bikini top ke cups se uski moti chhatiyan bahar nikali & unhe maslane laga.rambha ne apne nakhun uski nabhi se leke nipples tak chalate hue use jhuk ke chuma to vo bahut zor se uski zuban chusne laga.
"nahi.",vo uski choochiya chus raha tha & uski kamar ko jakde hue uski gili ptih & gand ko apne hatho se masal raha tha.
"Trust..Devalay..Panchmahal..Clayworth..Hotel Violet....ye naam jante hain aap?..ouiiiiiiii..!",vijayant ne uski panty upar ki & fir uski tange faila ke use apni god me bitha liya tha & use baaho me bhinch uske nipples kaat raha tha,"..dant mat lagaiye..dard hota hai..haannnnn..aise hi..oui maaaaaa..aise hi chusiye..haiiiiiiiiii..!",neeche half-pant me qaid vijayant ka lund uski bikini bottom ke gile kapde se dhanki uski utni hi gili chut ko chum raha tha & upar uska sasur uski chhatiyo ko apne munh me pura bharne ki koshish karta hua chus raha tha.rambha to masti me pagal ho gayi & peechhe jhuk ke apne baal pakad unme bechaini se hath firate hue jhadne lagi.vijayant ki mazbut baahe use peechhe girne se roke hui thi.
"kuchh nahi yaad aa raha aapko?",rambha sambhli to seedhi hui & uski pith ko nochte hue use chumne lagi.gand aage-peechhe kar vo sasur ke lund ko chhed rahi thi.
"nahi.",vijayant ne uski kamar pakad use utahya & use ghuma ke chaudi railing pe lita diya & apni pant utar di.rambha ne uska lund pakad use apni or khincha & lete-2 hi use munh me bhar liya & chusne lagi.
"ye yaad hai aapko dad?",rambha ne lund munh se nikal upar kar uske ando ko apne samne kiya & 1 ko munh me bhar liya.
"haannnnnn..aahhhhh..!",rambha hairan ho gayi.
"sach ye yaad hai aapko?",vo ando ke upar ki tvacha ko apne danto me bahut halke se pakad ke khinch rahi thi.
"haan..yaad hai..",rambha ne lund ko zor se hilaya & fir uske supade ko chusa.
"& kya yaad hai aapko?",vo uth baithi & sasur ki kamar ko baaho me bhar uski gand ko dabochte hue uske pet ke balo me apne galo & naak ko ragadne lagi.
"bas yehi..aahhhh..!",vo uske baalo me bechaini se hath firate hue uske sar ko apne pet me daba raha tha.rambha ne daye hath se uske lund ko pakad apni choochiyo ke beech ki vadi me dabaya & fir uski nabhi me jibh ghusate hue apni dono chhatiyo ko bahar se tham lund ko unke beech qaid kar use hilane lagi.
"yehi ki aap ye sab karte the mere sath?"
"haannnnn..ohhhhhh..!",vijayantn ki aankhe band thi & uske chehre pe lakire khicnh gayi thi..maze ki ya uljhan ki-ye rambha ki samajh me nahi aa raha tha.
"kaha karte the ye sab mere sath aap?",vo badastur lund ko apni makhmali choochiyo ke beech daba hilaye ja rahi thi.
"kamre me.",vijayant ke mathe ki shikane fir gehri ho rahi thi.
"kaise kamre me?..kiske kamre me?..kisi ghar ke kamre me ya fir kahi & ke?",usne lund ko zor se hilate hue & sawal kiye.
"nahi yaad mujhe..bilkul nahi..aahhhhhhhhh..!",vijayant chika.uske mathe ki shikane ab bahut gehri ho gayi.aankhe bilkul meechi hui thi & vo rambha ke baalo ko ab itni zor se khinch raha tha ki use dard hone laga tha.
"koi baat nahi.chhod dijiye yaad karna.",rambha samajh gayi ki ab & sawal karna vijayant ke liye nuksandeh ho sakta tha.usne lund ko choochiyo ki qaid se azad kiya & let gayi,"..aaiye ab vo kijiye jo aapko yaad hai dad.is jism ko pyar kijiye..",mashili nigaho se dekhte hue usne apne hatho se apni chhatiya aapas me zor se dabayi,"..ji bhar ke kheliye is se..",uske hath seene ke ubharo se fisalte hue uske pet se hote hue uski panty pe aaye.usne apne ghutne modte hue apni tange failayi & apne hath chut pe daba diye,"..& apni & meri,dono ki pyas bujha dijiye jaise aap humesha bujhate hain!"
bahu ki baato ne vijayant ke mathe ki shikano ko door kar diya tha.uski zehani pareshaniya door ho gayi thi & use ab bas jismani chahat ka hosh tha.usne rambha ke hath uski panty se alag kiye & use utar diya.rambha ne panty utarte hi fir se apne hatho se apni chut ko chhupa liya.vijayant ne uske chehre ko dekha.rambha ke adhkhule honth & nashe se bojhal palke chikh-2 ke uske mastane haal ko bayan kar rahi thi.vijayant bahut josh se bhar gaya tha.
"uummmm.....aannnnhhhhhh..haannnnnn..uunnhhhhhh..!",vo jhuka & rambha ke hatho ko chumne laga & uski ungliyo ke beech aise zuban firane laga mano vo ungliya chut ki fanke hon & unke beech ki jagah chut ki darar.rambha masti me sar daye-baye jhatakte hue aahe bharne lagi.vijayant ki zuban ne uski ungliyo ko itna chheda ki vo masti se aahat ho unhe modne lagi & apni chut ko numaya kar diya.aisa karte hi vijayant ki zuban ne uski komal ungliyo ko chhod uski nazuk,gulabi chut ko apna nishana banaya & kuchh hi der me railing pe khule aasman ke neeche kamar hilati rambha jhad rahi thi.
"aannhhhhh..!",vijayant fauran utha & railaing pe daya ghutna jamate hue apna lund rambha ki ras bahati chut me ghusa diya.rambha ne dard & masti se jism ko kaman ki tarah moda & apni chhatiya apne hi hatho se dabane lagi.vijayant railaing pe ghutna jama use chodne me jut gaya.rambha apni chhatiyo se khelti masti bhari aankho se uske chehre ko dekh rahi thi..kya use bas uska & apna rishta yaad tha?..& kuchh bhi nahi..haan,tabhi to kal bhi usne uska aanchal tham us roka tha & fir..,"..oowwww..!",vo karahi.uske sasur ke dhakke ab bahut gehre ho gaye the & uski chut ki deewaro ko uska lund buri tarah ragad raha tha.
vijayant ne uske hath uski chhatiyo se alag kiye & unhe buri tarah dabane laga..bas yehi baat rambha ki samajh me nahi aa rahi thi..pehle ka badi garmjoshi magar utni hi komalta se use chhune vala vijayant ab is junglipane ke sath us se kyu pesh aa raha tha?..haan..Dr.Popov..is sawal ka jawab de sakte the..uska dimagh thodi der ko in sawalo se jujhne ke baad fir se vapas jism ki masti ke khayalo se bhar gaya tha.
usne apne seene ko raundate hatho ko tham vijayant ko aage khincha to vo uske upar gir gaya.rambha ne apne nakhun uski gand me dhansa diye & uske baye kaan me jibh firate hue kamar uchkane lagi.vijayant apne dant peeste hue bas dhakke pe dhakke lagaye ja raha tha.bechaini me vo kabhi rambha ke chehre to akbhi chhatiyo ko chumta ya bas sar utahye aahe bharne lagta.
"aannhhhhhhhhh..daddddddddd..!",rambha ne zor se aah bhari & vijayant ki kandho me nakhun dhansate hue apni chhatiyan upar uchkayi & sar peechhe kar liya.uski aankhe band thi & chehre pe jhadnhe ki khumari ke bhav.
gand me nakhun dhanste hi vijayant ke dhakke apneaap tez ho gaye & uska badan jhatke kahne laga.rambha ki chut ki mastani harkato se vivash ho vo bhi jhad gaya tha.aankhe band kiye sar upar uthaye vo uski chut ki kasawat se behaal ho aahe bhar raha tha.
kuchh palo baad dono premiyo ne 1 sath aankhe kholi & 1 dusre ko dekha.vijayant ki nazre rambha ke bayi or railing ke neeche gayi & rambha ko unka rang badalta dikha.vo samajh gayi ki kuchh gadbad hone wali thi.usna fauran gardan ghuma railing ke neeche dekha.vaha kuchh bhi nahi tha balki door-2 tak beach khali pada tha,"dad..kya hua?"
magar vijayant ne jaise uska sawal suna hi nahi tha.uske chehre ko dekh aisa lag rahja tha mano vo bahut taklif me ho,bahut dard ho raha ho use,"nahi..Soniyaaaaaa..!",vo chikha & uski aankhe ulat gayi & vo rambha ke seene pe gir gaya.
"dad!..kya hua?!..uthiye..!",rambha ne uske bhari-bharkam jism ko dhakela to vo kate ped ki tarah lawn ki ghas pe gir gaya.vo bahut ghabra gayi.usne fauran uski dhadkan & sans check ki..dono thik the.vo behosh ho gaya tha.tabhi 1 car ke rukne ki aavaz aayi.vo bhagti hui ghar ke samne ki ro gayi.deven apni chabhi se main gate khol car andar laga raha tha,"..deven..jaldi aaiye..jaldi!",deven ne jaldi se gate lock kiya & uske peechhe-2 andar aaya.
"kya hua?",dono ki nangi halat dekh use samajhne me der nahi lagi ki kuchh der pehle dono kar kya rahe the.
"dad..behosh ho gaye.",rambha ki aavaz kanp rahi thi.
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kramashah.......