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Kamukta kahani - गुजारिश 2

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जितना मैं ताई के करीब जाने की कोशिश करता तभी कोई न कोई आकर बीच में पंगा कर देता . झल्लाते हुए मैं बाहर गया तो देखा की बैंक का चपरासी खड़ा है

मैं- क्या हुआ तुझे

चपरासी- भाई, तुमको न मनेजर साहब बुला रहे है

मैं - तू चल मैं आता हूँ

वो- मेरे साथ ही चलो भाई उन्होंने कहा है की साथ लेकर ही आना

मैं- ठीक है चल फिर

कुछ ही देर में हम लोग बैंक पहुँच गए . मैं सीधा मनेजर के कमरे में गया .

मेनेजर- मैं आपकी ही राह देख रहा था.

मैं- पर किसलिए

उसने दराज से एक लिफाफा खोला और बोला- ये वो सारा लेखा जोखा है जो आपने मुझसे माँगा था .

मैं- - मेरी समझ में कहाँ ये सब , मोटा मोटा समझाओ मुझे जरा

मेनेजर ने मुझे हिसाब किताब समझाया .

"और इस पैसे को मैं कब खर्च कर सकता हूँ " मैंने पूछा

मेनेजर- वैसे तो नियम ये है की जब तक आपकी सरपरस्ती ख़त्म नहीं हो जाती आपके चाचा के साइन की जरुरत है पर चूँकि मेरे सम्बन्ध पुराने है आप से तो आप कभी भी ले सकते है पैसे कोई दिक्कत नहीं है .

मैं- और चाचा ने इनमे से कितने रूपये निकाले है

मेनेजर- एक भी नहीं, बल्कि वो तो कभी बैंक में आये भी नहीं है

ये मेरे लिए और अचम्भा था क्योंकि चाचा ने आज तक कभी भी पैसे नहीं निकाले तो घर खर्चे , हमारे लिए जो भी वो कर रहा था वो पैसे कहाँ से आ रहे थे, फिर मैंने सोचा की उसके धंधे से आते होंगे.

मैं- और कुछ जो आप मुझे बताना चाहते है .

मेनेजर- बस यही की अब आप अपनी विरासत संभाले

मैं- कौन सी विरासत , कहाँ महल खड़े है मेरे.

मेनेजर बस मुस्कुरा दिया. मैं बैंक से निकल कर हलवाई की दुकान की तरफ आया ही था की मैंने वहां नीम के चबूतरे पर मीता को बैठे देखा, दीं दुनिया से बेगानी वो आलू-समोसे खा रही थी . हलके आसमानी कपड़ो में बड़ी सोहनी लग रही थी वो . मैंने हलवाई को जलेबी के लिए कहा और चबूतरे की तरफ बढ़ गयी. उसने मुझे देखा , मैंने उसे देखा . वो मुस्कुराई मैं हंसा.

"बस इधर उधर ही घूमते रहते हो क्या तुम " उसने मुझसे कहा

मैं- मेरा गाँव है यहाँ नहीं मिलूँगा तो कहाँ मिलूँगा.

वो- सो तो है

मैं- और कैसी हो .बड़े दिनों बाद मिली हो

वो- परसों तो मिले ही थे हम.

मैं- तेरी जुदाई में दिन भी साल लगते है .

मीता- बाते बनाना कोई तुझसे सीखे

तभी जलेबी आ गयी मैंने दोना उसकी तरफ किया .

"मीठा कम पसंद है मुझे " उसने कहा

मैं- अब आदत डाल ले

वो- किस चीज़ की

मैं- हर उस चीज़ की जो अब तुम्हे पसंद करनी होगी.

वो- कौन सी फिल्मे देखता है तू, तेरी ये हरकते बेशक कइयो को दीवाना बना दे पर मैं उनमे से नहीं हूँ

मैं- इसमें दीवानगी की बात कहाँ आई, बात तो जलेबी की है

वो - ठीक है , ठीक है .

हम लोग अपनी मस्ती में थे, एक आधे लोग आते जाते हमें देख रहे थे पर किसे परवाह थी . मीता का साथ होना वो अहसास था जिसे मैं बार बार महसूस करना चाहता था .

"चल ठीक है , मेरे जाने का समय हुआ चलती हूँ " उसने कहा

मैं- क्या अभी तो मिली अभी जा रही है

वो- जाना तो होगा जिस काम के लिए आई थी वो पूरा हुआ अब घर न जाऊ क्या

मैं- मैं छोड़ देता हु तुझे

वो- रहने दे

मैं- छोड़ ने ये नखरे तू दो मिनट रुक मैं अभी साईकिल लेकर आया .

उसके जवाब की परवाह किये बिना मैं दौड़ कर गया और साइकिल ले आया. वो बैठी और हम चल दिए. मैंने जान बुझ कर वो रास्ता लिया जो मेरी बंजर जमीं की तरफ से होकर जाता था . इधर उधर की बाते करते हुए हम मेरे खेतो पर पहुंचे.

"कुछ देर रुक जरा , फिर चली जाना " मैंने उस से कहा

वो- जाना तो है ही फिर क्या थोड़ी देर क्या ज्यादा देर.

मैंने जवाब नहीं दिया. हम चलते चलते उस बावड़ी की तरफ आ गए .

मैं- इस जमीन को पता नहीं क्या हुआ है , कुवो में पानी भी है फिर भी बंजर है .

मीता- तू मेहनत करना यहाँ , क्या मालूम हरी भरी हो जाये.

मैं- मैंने भी यही सोचा है .

मीता- जमीन को पानी से नहीं बल्कि पसीने से सींचा जाता है , तू इसका मान करेगा ये पेट भरेगी तेरा. ये हमारी माँ है और माँ औलाद के लिए सब कुछ करती है

मैं- नेक विचार है

वो- तो कब से शुरू करेगा तू यहाँ काम करना

मैं- जिस दिन तू भरी दोपहर मिलने आया करेगी , इन्ही खेतो में अपनी प्रेम कहानी की फसल पकेगी.

मीता - इसीलिए मैं तुझसे दोस्ती नहीं करना चाहती थी न दो ही दिन में मोहब्बत की बाते करने लगा. मैं कहती हूँ तुझे ये मोहब्बत की बीमारी न ही लगे तो बढ़िया हो . इश्क का रोग जो लगा न तो फिर उम्र भर इलाज नहीं मिलता .

मैं- और जो अगर तेरा मेरा संजोग हुआ तो

वो- मैं जानती हूँ अपनी हदे.

मैं- पूछना तेरे सितारों से , उन्हें तो सब मालूम है न

मीता मुस्कुराई और बोली- सितारे झूठे होते है .

मैं- तो फिर सच्चा कौन हुआ

मीता-मेरे भाग के दुःख है सच्चे जो हर पल मेरे साथ है , मेरा साथ छोड़ते ही नहीं .

मैं- क्या पता वो भी इंतजार कर रहे हो की कब कोई आये तुझे थामने और वो तेरा साथ छोड़े

मीता- बस बहुत हुई बाते. जाने दे मुझे .

मैं- मेला देखेगी न मेरे साथ

मीता- नहीं बिलकुल नहीं

मैं- क्यों भला , मेरा हाथ दुनिया के आगे थामने से घबरा गयी क्या तू

मीता मेरे पास आई इतना पास की उसकी सांसे मेरी सांसो से टकराने लगी .

"इस दुनिया को इस ज़माने को अपनी जुती की नोक पर रखती हूँ मैं, अर्जुन सिंह के बेटे, अलख के पार रहूंगी मैं .मेरा हाथ थामने की हसरत है न तुम्हे , अगर तुम उस काबिल हुए तो थाम लेना मेरा हाथ किसने रोका है तुम्हे " उसने कहा और अपने रस्ते मुड गयी .

मैं बस उसे जाते हुए देखता रहा .
 
#22

मैं मीता को जाते हुए देखता रहा, मैं चाहता तो उसे रोक सकता था . मेरा यहाँ आने का मकसद ही था उसके साथ वक्त बिताना . उसकी सांवली सूरत मेरी नजरो से हटती ही नहीं थी , उसका दीदार करना ठीक ऐसा ही था जैसे किसी मजदुर को टाइम पर उसकी रोज़ी मिल जाना. जब वो नजरो से ओझल हो गयी तो मैं बावड़ी की तरफ बढ़ा . काफी समय से किसी ने इसकी सफाई नहीं की थी जिस वजह से पानी भी ख़राब था. मैंने इसकी मरम्मत करवाने की सोची .

इस जमीन को हरीभरी करना ही अब मेरा लक्ष्य था . मीता के जाने के बाद मेरा वहां पर रुकना जायज नहीं था तो मैं वापिस गाँव आ गया . शाम को पनघट पर रीना पानी भरने आई. लाल चुनरिया ओढ़े , माथे पर टीका लगाये बड़ी खूबसूरत लग रही थी . उसने मटका साइड में रखा और मेरे पास आकर बैठ गयी .

"ठंडी रेट पर बैठे डूबते सूरज को देखना भी अनोखा है न " उसने कहा

मैं- बड़ी बात ये नहीं है बड़ी बात है इन शामो में तेरे साथ बैठना

रीना- पर कभी न कभी वो दिन भी आयंगे जब ये शामे तो होंगी पर मैं न रहूंगी.

उसने मेरी आँखों में देखा.

मैं- तू हमेशा रहेगी मेरे साथ .

रीना- कभी कभी सोचती हूँ

मैं- क्या सोचती है

रीना- कुछ नहीं , तू भी न कैसी बाते लेकर बैठ गया है मैंने सुना की तूने सुनार से पंगा कर लिया , आखिर तुझे क्या जरुरत थी ऐसे लोगो के मुह लगने की .

मैं- वो मेरे पिता के बारे में उल्टा सीधा बोल रहा था .

रीना- दुनिया तो कुछ न कुछ कहती ही है , अगर हम भी उनके जैसे हो गए तो हममे और उनमे क्या फर्क रहेगा. और तू भला कब से ऐसा गुस्सा करने वाला हो गया .

मैं- तू कहती है तो गुस्सा नहीं करता बस . मैं गुस्सा करना भी नहीं चाहता पर तू तो जानती है न मेरी परेशानियों को घर पर चाची के ताने सहे नहीं जाते और बाहर ये दुनिया वाले करू तो क्या करू.

रीना- तू कुछ मत कर सब तक़दीर पर छोड़ दे, कब तक दुःख के बादल रहेंगे, कभी तो सुख की बरसात होगी न

मैं- कब आयेंगे वो दिन

रीना- आयेंगे,सब का भाग पलटता है तेरा भी पलटेगा तू बस भरोसा रख .

मैंने उसका हाथ थाम लिया और बोला- तू कहती है तो मान लेता हूँ , कल तू कहे तो तुझे कही ले चलू

रीना- कहाँ

मैं- ऐसी जगह , जो कभी जन्नत होती थी.

रीना- जहाँ तेरी मर्जी वहां ले चल , पर तेरी खटारा साईकिल पर न बैठूंगी

मैं- हाँ बाबा मत बैठना

वो- चल फिर चलते है , मामी टोकेगी और देर की तो .

मैं- तुझे कब से परवाह हुई टोकने की .

रीना- बस कुछ दिनों से .

उसने मटका भरा और हम साथ साथ ही मोहल्ले में आ गए. उसकी लहराती जुल्फे, रोशन आँखे , मंद मुस्कान जी करता था बस उसे देखता ही रहू और देखता ही रहता अगर गली में आती चाची ने मुझे टोक न दिया होता- अब क्या घर छोड़ कर आएगा उसे, मैं देख रही हूँ तेवर बदले हुए है तुम्हारे, नाम रोशन करोगे हमारा

मैं- तुम्हारा ना सही किसी न किसी का तो करूँगा ही .

चाची- बेहूदगी, बद्त्मिजिया बहुत बढ़ गयी है तुम्हारी .

मैं- मेरी छोड़ो तुम. मेरी जिन्दगी किसी की गुलाम नहीं है इस जिन्दगी को कैसे जीना है ये मैं देख लूँगा. और मैं आज तुमसे कहता हूँ उस खूबसूरत जिन्दगी में तुम नहीं होगी.

"क्या कहा तूने ," चाची मुझे मारने को को हाथ आगे किया पर फिर हाथ को रोक लिया .

"ठीक ही तो कहा तूने, ये तेरी जिन्दगी है , ठीक कहा तूने " चाची मुझसे दूर हो गयी .

मैं ताई के घर चला गया . ताई अपने कमरे में बैठी थी. मैं भी उसके पास जाकर बैठ गया .

"क्या हुआ तुझे " उसने पूछा

मैं- कुछ भी तो नहीं

ताई- फिर चेहरा क्यों उतरा हुआ है .

मैं- ताई मैं कह रहा था की क्यों न हम सिनेमा देखने चले.

ताई- तेरा ताऊ वहीँ पर गाली बकने लगेगा मुझे.

मैं- कुछ न करेगा वो ऐसा . चल न इसी बहाने सहर घूम आयेंगे.

ताई- न , मुझसे न होगा ये

मैं- ठीक है , पर कल के कल ही कुछ जरुरी काम करने है

ताई- क्या

मैं- कुछ मजदूरो को लेकर तू सुबह ही बावड़ी पर चली जाना , उसकी सफाई करवाना . वहां पर जो भी मरम्मत करवानी है वो करवाओ. मैंने सोच लिया है की मुझे मेरा घर वहीँ पर बनाना है .

ताई- अब ये क्या नयी खुराफात है तुम्हारी

मैं- तुम नहीं समझोगी.चाची के साथ नहीं रहना चाहता मैं

ताई- कितनी बार कहाँ है की ये भी तुम्हारा ही घर है तुम यहाँ रह लो

मैं- यहाँ भी नहीं रह सकता

ताई- क्यों भला

मैं- उसका कारण तुम हो, तुम जानती हो मैं तुम्हे पसंद करता हूँ. तुम्हारे साथ रहा तो कहीं मुझसे कुछ गलत न हो जाये.

ताई- क्या गलत करना चाहते हो तूम

मैंने ताई के चेहरे को अपने हाथो में लिया और बोला- मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूँ तुम्हारे इन लबो को चूमना चाहता हूँ . मैं जानता हूँ ये गलत है , ये पाप है . पर ये पाप करना चाहता हूँ मैं . जब से मैंने तुम्हारे उस रूप को देखा है मैंने , मैं बार बार तुम्हे उसी रूप में देखना चाहता हूँ, हर पल मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है , हर पल मैंने खुद को रोका है

इस से पहले की मेरी बात पूरी हो पाती, ताई ने आगे बढ़ कर मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और अपने होंठो को मेरे होंठो से जोड़ दिया. गीले होंठो का स्पर्श मुझे अन्दर तक भिगो गया . बहुत देर तक ताई और मैं एक दुसरे को चुमते रहे , एक दुसरे को बार बार चूमा हमने. पर बात इस से पहले की और आगे बढ़ पाती, मेरी किस्मत एक बार मुझे धोखा दे गयी.

मुझे ऐसे लगा की मेरी जांघो में गर्मी बहुत बढ़ गयी है , जैसे वो जल उठी है . मैं झटके से ताई से अलग हुआ और जेब में हाथ दिया. वो हीरा जो धागे में पिरोया हुआ था वो बड़ी तेजी से चमक रहा था , जैसे की कोई बल्ब जल रहा हो. वो इतना गर्म हो गया था की मुझे उसे बिस्तर पर फेंक देना पड़ा.

"ये तुम्हे कहा मिला " ताई ने पूछा

मैं- तुम जानती हो ये किसका है ...........
 
#23

"तुम जानती हो ये किसका है " मैंने फिर पूछा

"मुझे नहीं मालूम , " ताई ने कहा

मैं- तुम जानती हो

ताई- तू जा यहाँ से ,

मैं- बताओ ये किसका है

"मैंने कहा न तू जा यहाँ से " ताई ने इस बार थोड़े गुस्से से बोला

मैं- जा रहा हूँ, मत बताओ पर मुझे मालूम है तुम जानती हो ये किसका है

मैं नीम के निचे चबूतरे पर जाकर बैठ गया और सोचने लगा की ताई ने इस धागे को पहले भी देखा है वो जानती है , आँखों के सामने उस हीरे को देख रहा था जिसकी गर्मी अब थोड़ी कम हो गयी थी पर वो गर्म था . जैसे उसमे आग जल रही हो. सफ़ेद हीरे का रंग केसरिया हो गया था . जब कुछ न सोचा तो मैं चबूतरे पर लेट गया और थोड़ी देर के लिए आँखों को मूँद लिया.

न जाने कितनी देर मेरी आँख लगी होगी पर अचानक से कुत्तो के भोंकने की आवाज से मैं जागा तो मैंने देखा की बिजली नहीं थी, पूरा गाँव अँधेरे में डूबा हुआ था .

"ये साले कुत्ते क्यों इतना भोंक रहे है " मैंने उनको गाली दी. पर तभी पायल की आवाज से मुझे महसूस हुआ की गली में कोई है, कोई औरत है . काले अँधेरे में काले कपडे पहले वो आबनूस सी तेजी से जा रही थी . न जाने मुझे क्या हुआ . मैं भी उसी दिशा में चल पड़ा.

छम छम करती वो औरत बस चली जा रही थी , गाँव पीछे बहुत पीछे रह गया था . मुझे उस से कुछ लेना देना नहीं था पर चुल थी की इतनी रात गए ये कौन है , कहाँ जा रही है .अचानक से एक मोड़ पर वो रुक गयी . उसे जैसे किसी का इंतज़ार था .

कुछ देर बाद वहां पर एक आदमी और आ गया . मैं थोडा सा और आगे हुआ ताकि जान सकू ये कौन थे .

"बात मेरे काबू से बाहर निकल चुकी है , उसकी रगों में खून उबाल मार रहा है , मैं चाह कर भी उसे नहीं रोक पाउँगा जो उसे करना है वो करके ही रहेगा " आदमी ने कहा

"पर इसका अंजाम कौन भुगतेगा , " औरत ने कहा

मैं आवाज को पहचानने की कोशिश करने लगा.

"तो मैं क्या करू , कुछ भी तो नहीं समझ आ रहा " आदमी ने कहा .

उसकी आवाज जानी पहचानी तो लग रही थी पर शब्द लडखडा रहे थे उसके शायद नशे में था तो समझ नहीं आ रहा था .

"उसे बाहर भेजने का इंतजाम कर दिया है पर वो मानता नहीं " जब उसने ये बात कही तो मैं समझ गया ये मेरे बारे में थी और ये आदमी चाचा था . पर ये औरत कौन थी जिस से मिलने के लिए उसे इतनी दूर आना पड़ा था .

"मुझे चिंता ये नहीं है, उसने लालाजी से भी तो पंगा ले लिया है, ऊपर से लाला के आदमियों को कोई पेल रहा है , लाला को शक है " औरत ने कहा

चाचा- पर मेरे भतीजे का लाला के आदमियों से कोई लेना देना नहीं

औरत- जानती हूँ, लाला के शक की वजह कोई और ही है , मैंने कोशिश भी की थी पर उसने खुल कर कुछ नहीं बताया . कुछ तो ऐसी बात है जो लाला के दिल की गहराई में दफ़न है.

चाचा- मनीष की तरफ अगर लाला ने बुरी नजर डाली तो मैं चुप नहीं बैठूँगा

"जानती हूँ, पर तुम्हारे भतीजे को भी थोडा देखना चाहिए था न , लाला को थप्पड़ मार दिया उसने " औरत ने कहा

चाचा- जानता हूँ उसकी गलती है , पर लाला को भी भाई का जिक्र नहीं करना था पूरा गाँव जानता है लाल और भाई की कभी बनी नहीं आपस में. मनीष की जगह कोई और भी होता तो वो ये ही करता .

औरत- पर लाला घाघ है

चाचा- परवाह नहीं मुझे. अपनी अगली पीढ़ी के लिए मैं कुछ भी कर जाऊँगा

औरत- अलख के बारे में क्या सोचा, मेले के थोड़े दिन बचे है , मनीष को बताया तुमने

चाचा- कोई जरुरत नहीं उसे बताने की

औरत-अर्जुन का भार कौन उतारेगा , काश वो होता

चाचा- भाई नहीं है तो क्या हुआ मैं तो हूँ, मैं जाऊंगा वहां .

औरत- तुम जानते हो , तुम अलग हो इन सब बातो का बोझ तुम नहीं उठा सकते .

चाचा- अपने परिवार का बोझ तो उठा सकता हूँ न, चाहे मुझे जान देनी पड़े पर मैं मेरे भतीजे को इन सब में शामिल नहीं करूँगा. मेरे जीते जी कुल का दीपक ही बुझ गया तो मेरे जीने का क्या फायदा .

उस औरत ने चाचा का हाथ अपने हाथ में पकड लिया.

"काश ये दुनिया तुम्हे समझ पाती " उसने कहा

चाचा- तुम तो समझती हो न मुझे.

चाचा ने उस औरत की गोद में अपना सर रख दिया. और मैं सोचने लगा की ये औरत कौन है , चाचा के इतनी नजदीक है तो मैं इसे जरुरर जानता हूँ . मैं वहां उन्हें छोड़ तो आया था पर मेरा ध्यान बस फिर इसी बात पर अटक गया था .

अगले दिन मैंने ताई को कुछ पैसे दिए और खेतो का काम याद दिलाया. उसके बाद मैं रीना से मिला तो मालूम हुआ की वो शहर निकल गयी . मुझे बहुत जरुरी बात करनी थी पर अब तो उसका इंतज़ार ही कर सकते थे . मैं कुछ सोच ही रहा था की तभी मुझे सुनार आता दिखा. वैसे तो वो गाड़ी में ही चलता था पर न जाने आज क्यों छतरी लिए पैदल ही जा रहा था . मैं उसके पास गया .

"और लाला कैसा है " मैंने उससे कहा

"पुरे इलाके में लोग हाथ जोड़कर अदब से सेठ जी कहते है मुझे " उसने कहा

मैं- पुरे इलाके में पीठ पीछे तुझे न जाने क्या क्या कहते है लोग

लाला- तेरी हिम्मत की दाद देता हूँ मैं आग से खेलने का बहुत शौक है तुझे

मैं- मैं खुद एक आग हूँ लाला तपिश तो गाल पर महसूस होती ही होगी न तुझे

लाला- जिस दिन तू झुलसेगा न तपिश क्या होती है तब समझेगा तू

मैं- पहले मेरे बाप ने तेरी गांड तोड़ी थी अब मैं तोडूंगा . क्या लाला तेरे तो नसीब ही चुतिया है .

लाला- तेरे बाप को भी यही घमंड था

"खैर लाला , उस दिन तूने मुझसे कहा था की माल तुझे बेच दू, सुन मेरे पास एक ऐसी चीज है जिसमे तेरी दिलचस्पी हो सकती है " मैंने कहा

लाला ने अपनी सुनहरी ऐनक को उतार कर जेब में रखा और बोला- इतना चुतिया नहीं है तू जितना दुनिया तुझे समझती है , सीधा मुद्दे पर आ .

अब जो मैं करने वाला था , मैं जानता था की मैं मेरे ऊपर एक ऐसी मुसीबत ले रहा हूँ जो मुझे बहुत दिनों तक सताने वाली थी . पर मैं वो दांव खेलने जा रहा था जो इस खेल के ऐसे पत्ते मेरे सामने खोल देता जिस से की बाज़ी खुल जाती .
 
#24

"मनीष, उधर क्या कर रहा है , इधर आ मेरे पास " पिछे से ताई ने मुझे आवाज लगाईं

इसे भी अभी ही आना था .

"आ रहा हूँ दो मिनट में " मैंने जवाब दिया

ताई- मैंने कहा न अभी के अभी आ.

खीजते हुए मैं ताई के पास गया .

मैं- क्या हुआ

ताई- सुनार से क्या बात कर रहा था तू.

मैं- अब तुम तो मुझे कुछ बता नहीं रही तो मैंने सोचा उसी से पूछ लू

मेरी बात सुनकर ताई को गुस्सा आ गया .

ताई- जी तो करता है दो चार थप्पड़ लगा दू तुझे , पर मेरा बस नहीं चलता

मैं- बस तो मेरा भी कहाँ चलता है ,

ताई- सुनार से दूर रह,

मैं- नहीं जाऊँगा, पर तुम्हे बताना होगा ये किसका है

ताई- मैं जानती हूँ मेरा तुझ पर कोई जोर नहीं है और तू मेरी सुनेगा भी नहीं

मैं- एक मामूली धागे के लिए इतनी पंचायत कर रही हो

ताई- आम और खास कुछ नहीं होता इस दुनिया में . खाना बना दिया है खा लेना मैं खेत पर जा रही हूँ

मैं- सुन तो सही मेरी बात.

ताई- तू सुन मेरी बात , देवर जी ने तेरा बड़े शहर में पढाई लिखाई का इंतजाम कर दिया है तू वहां चला जा, मेरी ये बात मान जा. तेरी मन चाही कर दूंगी मैं, तू कहे तो तेरे साथ भी चल पडूँगी

ताई ने सीधा सीधा कह दिया की वो चूत देने को तैयार है मुझे.

"मैं तुझे चाहता हूँ , तुजसे प्यार करता हूँ पर ये हमारे बीच कोई सौदा नहीं है , मैं तेरा इस्तेमाल नहीं करना चाहता . मैं यही रहूँगा ये धरती मेरी है इसे छोड़ कर कहाँ जाऊंगा मैं. " मैंने ताई से कहा

"मैं जा रही हूँ " ताई ने कहा और पीठ मोड़ कर चली गयी .

"दोपहर में खेतो पर ही मिलते है " मैंने कहा

जितना मैं सोच सकता था मैंने उस धागे में लटके हीरे के बारे में सोचा. वो खास था ये तो मैं जानता था पर जबसे उसने रंग बदला था , उसकी वो गर्माहट मेरे दिमाग में चढ़ गयी थी . मैं मीता से मिलना चाहता था पर उसकी हिदायत थी की वो खुद ही मिलेगी, मैं रुद्रपुर न जाऊ. तो अब मैं क्या करू.

"अरे मनीष वहां खड़ा क्या कर रहा है , इधर आ जरा " किसी ने मुझे पुकारा तो मेरा ध्यान भंग हुआ .मैंने देखा ये रीना की मामी खड़ी थी .

मैं- हाँ अभी आया

मैं उसके पास गया .

"क्या हुआ " मैंने पूछा

मामी- सबके घर बिजली आ रही है हमारे घर नहीं आ रही देख जरा क्या हुआ है .

मैं- हाँ देखते है .

मैं रीना के घर आ गया . देखा की एक जगह दोनों तार आपस में उलझ गए थे , जिसकी वजह से शार्ट सर्किट हुआ पड़ा था .

मैं- क्या काकी, ये तार कितने पुराने हुए है अब तो बदल दो इन्हें

काकी- तेरे काका से कह कह कर थक गयी हूँ मैं , पूरी छुट्टी इधर उधर टाइम पास करके ही बिता देते है अब आयेंगे तीन चार महीने में तभी कहूँगी.

मैं-काका कम से कम आ तो जाते है , मेरे पिता जो एक बार ड्यूटी गए लौटे ही नहीं .

काकी - तू क्यों उदास होता है , हम सब भी तो तेरा ही परिवार है न .

मैं- काकी वैसे फौज में से कितने दिनों में छुट्टी मिलती है

काकी- कभी तीन चार महीने तो कभी छ महीने में तो आ ही जाते है .

तभी मेरे दिमाग में वो बात आई , जिसपर मुझे शायद सब से पहले गौर करना चाहिए था .

मैं- काकी, मुझे काका से बात करनी है कुछ पूछना है . कैसे बात हो उनसे .

काकी- बात कहा होती है बस चिट्ठी ही आती है ,

ये बात सुनकर मुझे बड़ी हताशा हुई . पर मेरे दिमाग में जो बात आई थी उसने मेरे लिए एक रास्ता खोल दिया था. मैं वहां से चलने को ही था की तभी काकी बोल पड़ी- एक मिनट, याद आया कभी कभी पोस्ट आफिस में फ़ोन आता है तेरे काका का ,

मैं बता नहीं सकता मुझे कितनी ख़ुशी हुई थी ये बात सुनकर . मैं लगभग दौड़ ही पड़ा था .मैं सीधा पहुंचा पोस्टमॉस्टर के पास .

"बाबु साहब एक मदद चाहिए आप से " मैंने कहा

उसने बात पूछी .

मैंने उसे बताई.

"कभी कभी फौजियों के फ़ोन तो आते है पर किस नम्बर से आते है ऐसा बताने की सुविधा तो अपने पास है नहीं " उसने कहा

मैं- बाबु साहब, तो कैसे मालूम हो मुझे

बाबू- भैया,फौजियों के बारे में तो जानकारी फौज के सेंटर पर ही मिल सकती है .

रीना का मामा कुछ दिन पहले ही छुट्टी काट कर गया था. काश मुझे ये विचार पहले आया होता तो पर तभी मेरा ध्यान गया की हमारे गाँव में कई फौजी और है , शायद वो मेरी मदद कर सके . पूरा दिन मैंने इसी गुना भाग में लगा दिया पर मेरी बदकिस्मती देखो उनमे से एक भी छुट्टी नहीं आया हुआ था . पर एक बुजुर्ग बाबा ने मुझे ये जरूर बताया की जहाँ से कोई फौजी भर्ती होता है वहां के सेंटर पर उसका रिकॉर्ड जरुर रखते है . मेरे लिए ये भी बड़ी राहत की बात थी की चलो कुछ तो मिला.

सांझ ढले एक बार फिर मैं रीना के साथ बैठा था पनघट पर .

"मैं अपने पिता को ढूंढने जाऊंगा " मैंने कहा .

रीना- पर कहाँ जायेगा तू .

मैंने उसे अपनी योजना बताई तो वो भी खुश हो गयी .

रीना- तुझे वो मिल जायेंगे इस से बढ़िया भला और क्या होगा. पर तू फिर उन्हें यही पर ले आना, कितने साल हो गए है कहना की अब घर चलो.

मैं- तुझे बता नहीं सकता की क्या या कहना है , बस एक बार वो मिल जाए मुझे.

रीना- समझती हूँ मैं,

मैं- ये बता तू मुझे शहर क्यों नहीं लेकर गयी

रीना- तेरी चाची ने कहा की तू घर पर नहीं है .

मैं- पर मैं तो घर पर ही था उसने ऐसा क्यों कहा

रीना- वो जाने. उस से बात करना ही सजा है , पता नहीं किस बात का घमंड रहता है उसे.

मैं- छोड़ न उसको , क्या बात करनी उसकी

रीना- आज गाँव में न सांग दिखाने वाले आये है , तू आएगा रात को .

मैं- आ जाऊंगा

रीना- न जाने क्यों आजकल तेरे साथ वक्त बिताना अच्छा लगने लगा है .

मैं- इसमें क्या नया है , बचपन से हम साथ ही वक्त बिताते आये है .वैसे तू कल मेरे साथ बैंक चलना तुझे कुछ दिखाना है

रीना- ऐसा क्या है बैंक में

मैं- कुछ ऐसा जिसे देख कर तेरे होश उड़ जायेंगे .
 
#25


"मेरे होश तो उसी दिन से उड़े हुए है जब से माँ का संदेसा आया है , मैं तुझे बता नहीं सकती क्या हाल है तब से मेरा "उसने कहा

मैं- तू उसकी चिंता मत कर , जब तक मैं हूँ तुझे कहीं जाने नहीं दूंगा मैं

रीना-पर मुझे जाना होगा , मेरी मजबुरिया है

मैं- कोई मज़बूरी नहीं तेरी , तू मत सोच इस बारे में . तेरी माँ जब यहाँ आएगी मैं बात कर लूँगा उनसे.

रीना- भला क्या बात करेगा तू उससे

मैं- वो तू मुझ पर छोड़ दे.

रीना- बातो में तो तुझसे कोई नहीं जीत सकता . पर आजकल तू किन बातो में उलझा हुआ है तू मुझसे ही छिपाने लगा है .

मैं- जिंदगी की किताब के बिखरे पन्ने तेरे हाथो में है और तू कहती है की तुझसे छिपाने लगा हूँ, इल्जाम लगाना है तो कुछ ढंग का तो लगा न .

रीना- फिलहाल तो मैं चलती हूँ , रात को चोबारे की छत पर मिलेंगे

मैं - तू चल मैं आता हु थोड़ी देर में .

ठंडी पवन संग लहराती चुन्नी उसकी, हमेशा वो बड़े सलीके से कपडे पहनती थी . उसकी बात ही निराली थी . जब वो साथ होती थी मुझे कुछ कहने की जरुरत नहीं होती थी , मुझे मुझसे जायदा वो समझती थी . पर आज फिर उसने वो बात छेड़ी थी जिसे सुनकर मैं घबरा गया था . मेरे सीने में तेज दर्द हो गया था जुदाई की बात सोच कर. वो कैसे हालात होंगे .

"हे नियति, ये जुल्म मत करना मेरे जो थे सब तो तूने छीन लिए कम से कम इसे तो मेरे भाग में रहने देना ." मैंने देवता के आगे माथा झुकाया.

घर पर आया तो देखा की ताई आँगन में ही बैठी थी.

"आया नहीं तू, " ताई ने कहा

मैं- किसी काम में उलझा था

ताई- तेरी ये उलझने , न जाने किस उधेड़बुन में लगा रहता है

मैं-तुम तो कुछ बताती नहीं , तो मैं तो कोशिश करूँगा ही न .

ताई- मेरे पास छिपाने को भी तो कुछ नहीं

मैं- जानता हु की चाची ने सब कुछ दबा लिया है , पर तूने कभी अपना हिस्सा क्यों नहीं माँगा, तू इस घर की बड़ी बहु है . तूने ये राह क्यों चुनी .

ताई- शायद यही मेरी नियति थी . वैसे भी इन्सान के साथ कुछ नहीं जाता, राजा हो या रंक सबकी दो मुट्ठी राख ही बनती है, सेठ हो या मजदुर शमशान में साथ ही होते है सब.

मैं- फिर भी तूने माँगा क्यों नहीं हक़ जो तेरा है तुझे मिलना चाहिए. मैंने सोचा है कल चाचा से बात करूँगा.

ताई- तुझे क्या लगता है की मेरी क्या चाहत है . नियति ने जो लिखा है वो होता है, नियति के विधान को आज तक कोई बदल पाया है क्या.

मैं- पर तुझे तेरा सुख कहाँ मिला.

ताई- मेरा सुख मेरे सामने बैठा है . दुनिया मुझे पीठ पीछे न जाने क्या क्या कहती है निपूती, बाँझ पर मैंने कभी किसी की बात दिल पर नहीं ली क्योंकि मेरा वंश, मेरा कुल मेरे सामने बैठा है , हम हमेशा तेरे क्षमाप्रार्थी रहेंगे , तेरी परवरिश हम उस तरह से नहीं कर पाए जैसी होनी चाहिए थी .

"ये धन, दौलत, ये जमीने लेकर मैं करती भी क्या . हमारी सबसे अनमोल दौलत तो तुम हो , " ताई ने कहा

मैं- फिर भी मैं चाहता हूँ

"मुझे कुछ नहीं चाहिए ," ताई ने मेरी बात काट दी.

फिर मैंने भी कुछ नहीं कहा . ताई अपना काम करने लगी, मैं चारपाई पर पड़े पड़े बस उसे ही निहारता रहा . इस औरत से मेरा न जाने ये कैसा रिश्ता था , मैं इसे माँ के रूप में भी देखता था, अपने मन की बात भी इस से करता था किसी दोस्त के जैसे और इसके साथ सोने की हसरत भी थी मेरी.

रात को एक बार फिर मैं रीना के साथ चोबारे की छत पर बैठा था .

"ये चाँद कितना खूबसूरत है न " उसने कहा

मैं- हाँ , पर तुमसे जायदा नहीं

रीना- हाँ, बाबा हाँ, वैसे ये कुछ जायदा ही तारीफ नहीं कर दी तुमने .

मैं- सच ही तो कहा , तेरे रोशन चेहरे के आगे ऐसे सौ चाँद भी बेकार है .

रीना- बता मुझको तुझे कैसी मैं लगती हूँ .

मैं- कैसे बताऊ.

रीना- जैसे बताते है वैसे बता.

मैं- तू क्या सुनना चाहती है मुझसे

रीना- जो तू कहना नहीं चाहता

मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- ये चाँद, ये रात , ये तेरा साथ , ये तेरी छुअन , ये होंठो की कंपकंपाहट , ये तेरी बिखरी जुल्फे,लहराता आँचल, ये तेरी शोर मचाती धड़कने ये सब तो जानती है ,

रीना- ये जानती है तो मुझसे क्यों नहीं कहती

मैं- कहने की जरुरत ही नहीं

रीना- हर पल हर लम्हा , हर घडी मैं बेक़रार क्यों रहती हूँ , आजकल बिना बात मैं हंसती रहती हूँ, खुद से बाते करती रहती हूँ .

मैं- तू खुद को जानने लगी है , पहचानने लगी है खुद को .

रीना- और मैं क्या हूँ.

मैं-सावन की पहली बारिश है तू, सौंधी मिटटी को पहली खुशबु है तू, अलसाई भोर की ओस है तू. मैं कुछ कहूँ या न कहू मेरा ताज है तू

वो मेरे पास आई , उसकी गर्म सांसे मेरे होंठो पर गिर रही थी , उसके बदन की तपिश को महसूस किया मैंने. उसने हौले से मेरे माथे को चूमा और फिर अलग हो गयी.

"काश ये रात थम जाये यु ही " उसने कहा

मैं- काश तू रुक जाये मेरे साथ यु ही

इस से पहले की वो और कुछ कहती , निचे मोहल्ले में अचानक से ही चीख पुकार मच गयी . शोर होने लगा तो हम दोनों भाग कर गए और जाकर देखा की ..................................
 
#२7

जिस चीज को पाने की हसरत थी मुझे उसे मुट्ठी में दबा कर मसला ही था की तभी बाहर से कोई दरवाजा जोर जोर से पीटने लगा था. मेरा माथा घूम गया. ये दूसरी बार हुआ था की जब मैंने ताई के करीब आने की कोशिश की तो कोई न कोई आ गया था .

"मैं देखती हूँ " ताई ने अपने कपडे सही किये और बाहर जाने लगी

मैं- रुको मैं भी चलता हूँ , रात का समय है न जाने कौन होगा.

हम दोनों बाहर आये , पर दरवाजे पर कोई नहीं था पूरी गली सुनसान पड़ी थी .

"कौन पीट गया किवाड़ " मैंने झल्लाते हुए कहा

ताई- कोई दिख भी तो नहीं रहा .

मैं- शायद कोई शराबी होगा

मेरे मन में विचार आया की कही ताई का कोई आशिक तो नहीं था , पर मैंने उसके आगे कुछ नहीं कहा . और अगले ही पल मेरी ये शंका भी दूर हो गयी . गली में तमाम लोग अपने अपने घरो से बाहर निकल रहे थे . और एक दुसरे की तरफ हैरानी से देख रहे थे . तभी दूसरी तरफ से दो तीन लोग आये और बोले- जब्बर ने सब को चौपाल पर बुलाया है अभी के अभी .

ताई- तू अन्दर जा मैं देख कर आती हूँ मामला क्या है

मैं- नहीं मैं जाऊंगा,

ताई- मैं भी चलूंगी तेरे साथ .

हम लोग चौपाल पर आये तो देखा की नीम के निचे जब्बर कुर्सी पर बैठा था .पूरा गाँव ही वहां पर जमा था .

"गाँव वालो, आज मेरे दोस्त- मेरे भाई लाला पर जानलेवा हमला हुआ है , और मैं जानता हु की ये जिसने भी किया है वो तुम लोगो में से ही है मैं तुम लोगो से कह रहा हूँ की जो भी है वो अपने आप आगे आ जाये , वर्ना उसे मैं ढूंढ कर निकालूँगा तू फिर ठीक नहीं होगा . लाला मेरे लिए जान से भी बढ़ कर है , हमलावर ने ये वार लाला पर नहीं बल्कि मेरे कलेजे पर किया है " जब्बर ने कहा .

मैंने आस पास नजर उठाकर देखा, लोग उसके खौफ से कांप रहे थे ,डर रहे थे ,

"ये चुतियापा करने को ही तूने पुरे गाँव की नींद ख़राब की जब्बर " मैंने आगे बढ़ कर उस से कहा.

और मेरा ये कहना ही आग लगा गया.

"कौन है तू, और तेरी इतनी हिम्मत की तू मुझसे आँखे मिला कर बाते करे, ये लोग मेरी जुती की तरफ भी नहीं देख पाते" उसने कहा .

मैं- तो बढ़िया जुती पहना कर न और सुन आज तो तेरे आदमियों ने मेरे दरवाजे पर हाथ लगा दिया आगे से ये गलती हुई तो मैं उखाड़ दूंगा उन हाथो को समझ ले मेरी बात को .

जब्बर की आँखे फ़ैल गयी .

"किसका लौंडा है ये , " उसने चीख कर कहा .

मैं उसके सामने गया .

"मेरी शकल देख ले , पहचान ले मैं अर्जुन सिंह का बेटा हूँ " मैंने कहा

मेरी बात सुन कर वो हंसने लगा.

"तेरे चाचा ने मेरे बारे में बताया नहीं क्या तुझे, कैसे उसने मेरे पैर पकडे थे , कैसे जमीन की भीख मांगने आया था वो " उसने कहा

मैं- जमीन तो मैं तेरे हलक में हाथ डाल कर निकाल लूँगा . जिस दिन मेरा दिल करेगा .

जब्बर- चाहूँ तो अभी के अभी तेरी गांड तोड़ दू मैं पर न जाने क्यों दिल कह रहा है की तुझे तडपा तडपा कर मारने में मजा आएगा.

"मनीष तू घर चल अभी के अभी " ताई ने मेरा हाथ पकड़ा

"हाँ लेजा इसे, और समझा के मैं कौन हूँ , पर समझाने का कोई फायदा तो है ही नहीं क्योकि इसे तो मरना ही है न " उसने ताई से कहा .

मैं- तू मारेगा मुझे, शेरो का शिकार करने के लिए शेर होना चाहिए कुत्तो को ऐसे सपने देखने भी गुनाह होते है .

"मालिक के सामने सर उठाता है तेरी ये मजाल " जब्बर का एक आदमी मुझे मारने को दौड़ा .

मैंने पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसके सर पर दे मारी. पल भर में ही सर फूट गया उसका. एक दो तीन चार जब तक वो पस्त नहीं हो गया मैं लोहे की कुर्सी उसे मारते रहा . गाँव में अफरा तफरी मच गयी .

जब्बर कुर्सी से उछल पड़ा मैं उसके पास गया और बोला- मर्द है तो मर्द की तरह रहना , मैं ना जाने कब से इस मौके की तलाश में था की दुश्मनी निभा सकू तुझसे, उस बहन के लोडे सुनार को तो कोई और पेल गया पर मेरा वादा है तुझसे तेरी साँसे मुझसे भीख मांगेगी जिन्दगी की . और सुन इस दुश्मनी में सिर्फ तू होगा या मैं, अगर मेरे पीछे से मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को तूने, तेरे किसी भी आदमी ने नजर उठा कर देखा भी ना, तो फिर ये याद रखना घर परिवार तेरा भी है , .

"बरसों बाद मेरे सामने कोई ऐसा आया है जिसके जोश को ठंडा करने में मुझे मजा आएगा , तेरे साथ खेल खेलूँगा मैं , आज तेरी जिन्दगी बक्श कर जा रहा हूँ मैं पर जल्दी ही तुझे अफ़सोस होगा की क्यों मैंने तेरी जिन्दगी बक्शी " उसने कहा

वो चल कर ताई के पास आया और बोला- अपने पिल्ले को तूने बताया नहीं क्या मेरे बारे में ,

मैं- उसे बताने की जरुरत नहीं , पर तुझे मैं बताता हूँ वो चीज़ जिसे तूने और सुनार ने सोलह साल से छिपा कर रखा था उसका राज अब राज नहीं रहेगा.

मेरी बात सुनकर जब्बर के चेहरे का अहंकार अचानक से बुझ गया . उसकी हंसी गायब हो गयी . उसकी आँखों में मैंने पहली बार कुछ ऐसा देखा जिसे डर कहना उचित होगा.

"मेले तक का समय है तेरे पास, मेरा जो भी कुछ तूने कब्जाया है वापिस कर देना, मेले के बाद अगर मैं लौटा तो तू भी जानता है मैं , मैं नहीं रहूँगा और जब मैं तुझसे हिसाब मांगूंगा न तो तू चूका नहीं पायेगा जब्बर " मैंने कहा .

"मुझे परवाह नहीं है तू इन गाँव के लोगो के साथ क्या करता है , क्योंकि ये नपुंसक लोग है , गुलामी की आदत पड़ गयी है इनको, इनको रगों में बहता खूम जम चूका है , पर मुझे परवाह है , आज तेरे आदमियो ने मेरे दरवाजे पर हाथ लगाया. इन हरामजादो की क्या औकात है जो ये हमें चौपाल पर आने को कहेंगे. क्या कह रहा था तू, मेरे चाचा से पैर पकद्वाये थे तूने, सुन मेरे लिए मेरे बाप से कम नहीं है वो . ये बात मैं नहीं भूलूंगा. और तू भी याद रखना " मैंने कहा .

जब्बर ने कुछ नहीं कहा वो बस चल पड़ा अपनी गाडी में बैठा और न जाने कहाँ चला गया . धीरे धीरे सब चले गयी मैं और ताई रह गए.

मैं- चल तू भी घर

ताई- तुझे ये तमाशा नहीं करना चाहिए था .

मैं- एक न एक दिन तो ये सब होना ही था न , तू भी जानती है ये बता नहीं जानती क्या .

ताई- जानती हूँ पर सोचती थी की कब तक टलेगा ये .

मैं- पर क्यों टालना चाहती थी तू ये

ताई- क्योंकि................
 
चारो तरफ भगदड़ मची हुई थी. मालूम हुआ की किसी ने सुनार पर हमला कर दिया था . कुछ लोग उसे गाड़ी में पटक रहे थे , उसका एक हाथ झूल रहा था, मैंने देखा उसे. पिछले कुछ दिनों से गाँव में बड़ी अजीब अजीब घटनाये हो रही थी , पर सिर्फ उन लोगो के साथ जो या तो जब्बर के साथ थे या सुनार के साथ. रीना को उसके घर छोड़ने के बाद मैं फिर से वारदात वाली जगह पर पहुँच गया .


अब वहां पर कुछ गिने चुने लोग ही थे. किसी से तो बड़ी गहरी दुश्मनी थी इन लोगो की जो वो सीधा ही इन्हें मार रहा था . मैंने घटनास्थल की बड़ी बारीकी से जांच की पर कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिस से कोई अनुमान लगाया जा सके.पर मेरे दिमाग में दो सवाल बड़ी तेजी से दौड़ लगा रहे थे , पहला ये की हमलावर हो न हो हमारे ही गाँव , मोहल्ले का हो सकता है वर्ना इतनी जल्दी वो कैसे भाग गया. दूसरा सवाल ये की आज ही मैं लाला से उस हीरे के बारे में बात करने वाला था और आज ही लाला पर हमला हो गया.

क्या ये कोई इत्तेफाक था या फिर कोई था जो नहीं चाहता था की लाला मेरे से मिले. मुझे दुश्मनी वाला एंगल ज्यादा जंच रहा था क्योंकि पहले जो लोग मारे गए थे उनसे मेरा कोई लेना देना नहीं था . पर फिर भी इस हमलावर में मेरी दिलचश्पी जाग गयी थी . पंडाल में पड़ी कुर्सी पर बैठे बैठे मैं तमाम तरह के अनुमान लगा रहा था . मैं ताई के घर जा रहा था की मेरी नजर गली में खड़ी चाची पर पड़ी.

"तुम क्या कर रही हो यहाँ पर " मैंने कहा

चाची- तुमसे मतलब.

मैं- चलो घर चलते है , कुछ नहीं बचा इस तमाशे में देखने को .

उसने बुरा सा मुह बनाया और मेरे साथ चलने लगी. घर के दरवाजे को खोलने के लिए उसने अपना हाथ उठाया ही था की वो अचानक से करह उठी. उसने दुसरे हाथ से अपना हाथ संभाला. मैंने देखा की उसके हाथ से खून बह रहा था .

"ये चोट कैसे लगी तुमको " मैंने सवाल किया

"तुजसे क्या मतलब है " चाची ने थोड़े गुस्से से कहा.

मैंने हिमाकत करते हुए उसकी बांह को मरोड़ा और उसे दिवार के सहारे लगा दिया.

"आई, कमीने तेरी ये जुर्रत छोड़ मुझे " उसने कहा

मैं- मेरी जुर्रत तूने देखि ही कहा है , ये चोट कैसे लगी तुझे , क्या सुनार पर तूने हमला किया था . तू भी थी न वहां पर

चाची- बांह छोड़ दे मेरी मैं कहती हु .

मैं- ये धौंस किसी और को दिखाना और सीधा मेरे सवाल का जवाब दे, तू थी न वहां पर तूने किया न ये ,

तभी वो हुआ जिसकी मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी , चाची ने पलटा खाया और एक झटके में खुद को मुझ से आजाद करवा लिया और अगले ही पल एक तामाचा खींच कर मेरे मुह पर दे मारा .

"दुबारा मेरे साथ बदतमीजी की तो खाल खींच लुंगी तेरी " चाची ने कहा और दनदनाते हुए घर के अन्दर चली गयी . जबड़े को सहलाते हुए मैं सोच रहा था की ये औरत जितनी दिखती है उस से ज्यादा घाघ है , चाची और ताई दोनों की सख्शियत ही जुदा थी अपने अन्दर न जाने क्या क्या दबाये बैठी थी ये औरते, और तब मुझे समझ आया की दुनिया के राज मुझे बाद में जानने है पहले अपने घर की गुत्थी को सुलझाना होगा.

रात बहुत हुई थी, मैं सोना चाहता था पर अभी अन्दर जाता तो चाची फिर कलेश कर देती तो मैं गयी के यहाँ चला गया . वो कमरे में पलंग पर लेटी थी .

मैं- दरवाजा तो बंद कर लिया करो

ताई- मुझे लगा तू आयेगा

मैं ताई के पास जाकर लेट गया. उसके बदन से आती खुशबू मेरी साँसों में सामने लगी. जैसे ही उसने अपनी पीठ मेरी तरफ की मैंने उसके ऊपर अपनी बांह डाल दी और उसके गोरे,मुलायम पेट को सहलाने लगा. कितना कोमल था वो . मैंने अपनी ऊँगली ताई की नाभि में फिराई

ताई- क्या कर रहा है

मैं- कुछ नहीं .

मेरा दिल कर रहा था की अभी हाथ आगे बढ़ा कर ताई की चुचियो को पकड़ लू और कस कस के मसल दू उनको. मेरी जांघे ताई के कुल्हो से सटी हुई थी . मादक नितम्बो का स्पर्श , मेरे रोम रोम को पुलकित कर रहा था . कांपते होंठो से मैंने ताई की गर्दन के पिछले हिस्से पर एक चुम्बन अंकित किया. ताई के बदन में एक झुर्खुरी दौड़ गयी.

मैंने ताई के चेहरे को अपनी तरफ किया और ताई के गालो को चूमने लगा. मैंने देखा की ताई ने अपनी आँखों को बंद कर लिया था . पर मैं जानता था की शायद यही वो समय था जब मैं उसे अपनी बना सकता था . मैंने अपने होंठो पर जीभ फेरी और ताई के गुलाबी होंठो को अपने मुह में भर लिया.

ताई के होंठो का रस पीते हुए मैंने ताई को सीधी लिटा दिया और अपना एक पैर उसके ऊपर डाल दिया. जब तक मेरा दिल किया मैं उसके होंठो, गालो को चूमता रहा . फिर मैंने ताई के ब्लाउज पर अपना हाथ रखा और ताई की चुचियो को दबाने लगा.

एक दो तीन, चार मैंने गिनते हुए ब्लाउज के हुको को खोला और जालीदार ब्रा में कैद ताई की गदराई चुचिया मेरी आँखों के सामने थी . मैंने ब्रा के ऊपर से ही उनको चूमना शुरू किया , कभी मैं उनको चूमता कभी मैं उनको मसलता . मैंने फिर ब्रा को ऊपर किया और ताई के गहरे भूरे रंग के निप्पल को अपने होंठो से लगा लिया. मैंने ताई के बदन को कांपते महसूस किया. जब मैं उसकी छातियो को पी रहा था तो वो भी मस्ताने लगी . ताई मेरे सर के बालो में हाथ फिराने लगी.

स्तनपान करते हुए मैंने मेरा हाथ ताई की जांघो पर रखा और उनको सहलाने लगा. ताई का लहंगा थोडा ऊँचा हो गया था मैंने उसमे अपना हाथ डाल दिया और ताई की चिकनी जांघो को मसलने लगा. और फिर जब मेरा हाथ दोनों जांघो के बीच उस तपती जगह पर गया जिसकी गर्मी को मैंने अपने जिस्म में उतरते महसूस किया. मैंने मुट्ठी में भर कर ताई की चूत को मसला ही था की .
 
#28

"क्योंकि ये दुनिया वैसी नहीं है जैसी तू सोचता है, ये नफरत ये दुश्मनी कहाँ से शुरू हुई , किसने शुरू की इसको कोई नहीं जानता है सिवाय सुनार, जब्बर और अर्जुन के.ऐसी क्या बात थी जिसके कारण ये लोग एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए . " ताई ने कहा .

मैं- मेरे पिता क्या सच में वैसे ही थे जैसा मुझे बताया गया है या उनके भी कोई राज़ थे, मेरा मतलब वो भी तो गलत हो सकते थे.

ताई -सही और गलत कुछ नहीं होता, वो बस समय का खेल है , जो किसी एक के लिए सही है दुसरे के लिए गलत है .पर मैं इतना जानती हूँ की कुछ ऐसा जरुर हुआ था जिस से ये तीनो जुड़े थे क्योंकि उस खुनी दौर के बाद अर्जुन एक दम शांत हो गया था , न किसी से बोलता था , न उसे खाने पीने की सुध थी , घर परिवार उसके लिए बेमानी हो गए थे , और फिर अचानक से उसने फ़ौज में नौकरी कर ली. हम सब हैरान थे , पर ये भी सच था की उसका इस गाँव से दूर रहना ही ठीक था . और फिर वो ऐसा गया की लौट कर ही नहीं आया.

मैं- और रुद्रपुर की दुश्मनी का क्या , उसके बारे में तो तुम जानती हो न वो तो बता ही सकती हो मुझे.

ताई- बरसों से परम्परा चली आ रही थी की रूप चोदस को मेला लगता था रुद्रपुर में, देवता की अलख जगाई जाती थी , नाच गान होता था , उस दिन किसी को किसी से कोई शिकवा हो तो आपस में जोर आजमाइश करके अपने अहंकार को चूर कर लेते थे लोग. सब सही था , लोग अपनी अपनी जिन्दगी जी रहे थे पर फिर सोलह साल पहले ऐसा मेला आया जिसमे रंगों की जगह रक्त ने सब को भिगो दिया .

मैं- क्या हुआ था उस मेले में .

ताई- तेरे बाप ने ललकार लगाईं थी , आन की उसने प्रण उठाया की वो देवता को सर अर्पित करेगा. तू जानता है ये जो मर्द जात है न इनका अहंकार बहुत होता है , न जाने किस बात का गर्व होता है इनको, अर्जुन ने जो किया लोग उसे गलत मानते है , कुछ सही मानते है . उस मेले में अर्जुन ने ग्यारह घरो के दीपक बुझा दिए.

उसने दुश्मनी की ऐसी दिवार खड़ी कर दी जिसे गिराना मुमकिन नहीं हुआ . खून से लथपथ जब वो घर आया तो किसी ने उसका स्वागत नहीं किया, बल्कि तिरस्कार किया गया पर उसने एक शब्द भी नहीं कहा. तेरे दादा ने हाथ उठाया उस पर क्योंकि उसने गलत किया था पर उसने चु तक नहीं की. उस मनहूस मेले ने बर्बाद कर दिया सब कुछ .

दुश्मनी की लहर में लाशे गिरने लगी, उन लाशो में एक लाश तेरे दादा की भी थी , किसने मारा क्यों मारा कोई नहीं जानता .

ताई ने गहरी सांस ली और बैठ गयी . मैं बस उसे देखता रहा .

"वो मुझे प्यार करते थे " मैंने कहा

ताई- हद्द से जायदा ,

मैं- मैं उनके बारे में जायदा से जय्स्दा जानना चाहता हूँ कोई तो ऐसा होगा जो उन्हें गहराई से जानता होगा , मतलब उनका कोई दोस्त .

ताई- रात बहुत हुई है , थोड़ी देर सोना चाहिए, कल काम बहुत है खेतो पर .

मैं- सो जाना , कम से कम उस हीरे के बारे में तो बता दो. मैं जानता हूँ तुम्हे मालूम है वो राज

ताई- तूने पुछा था न की तेरे पिता को गाँव वाले उतना सम्मान नहीं देते , गाँव वालो को लगता है की तेरे पिता चोर थे, उसने शिवाले में चोरी की थी .

मैं- असंभव वो भला ऐसा क्यों करेंगे.

ताई- क्यों करेंगे ये तो कोई नहीं जानता पर ये हीरा उसी श्रृंगार का हिस्सा है जिसे चोरी कर लिया गया था . अर्जुन ने शिवाले के कपाट बंद कर दिए थे , और चेतावनी दी थी की किसी ने भी कपाट खोले तो वो न जाने क्या कर देगा. और देखो सोलह साल बाद कपाट खोले गए है , कपाट खुलने का मतलब मेला फिर लगना

मैं- पर किसने खोले कपाट

ताई- सब सोचते है की तूने किया है ये काम , वो आदमी रुद्रपुर का इसीलिए आया था तेरे चाचा से बात करने इस मामले में

मैं- पर मैंने ये नहीं किया .

ताई- मैं विश्वास कर लू पर दुनिया नहीं मानेगी

मैं- क्यों नहीं मानेगी

ताई- क्योंकि अर्जुन ने कपाट बंद करते हुए कहा था की कभी ये कपाट खुले तो सिर्फ उसके रक्त से , और उसका रक्त तुम हो .

ये बात मेरे लिए बिजलिया गिराने वाली थी .

"मैं चाहती थी की तुम एक शांत जिन्दगी जियो पर तुम्हारे नसीब में जो लिखा है वो होकर रहेगा, मैंने बहुत कोशिश की पर छिपा नहीं पायी. पर मैं इतना जरुर कहूँगी की दुश्मनी की आग को बुझाने की कोशिश करना क्योंकि इस आग में दर्द के सिवाय कुछ नहीं है " ताई ने कहा और आँखे बंद कर ली.

मैंने जेब से वो हीरा निकाला और उसे देखने लगा. क्या इसे चुराया गया था , और यदि चोरी हुई थी तो उसमे एक नहीं तीन लोगो का हाथ था क्योंकि लाला और जब्बर ने भी उस दिन कहा था की पुरे सोलह साल बाद इसे निकाला है , पर इतने सालो तक छुपाने का क्या मतलब. क्या इन तीनो में लूट के माल के बंटवारे को लेकर झगडा हुआ था जिसके कारण ये लोग आपस में दुश्मन हो गए.

सवाल इतने थे की कहीं मेरे दिमाग की नस न फट जाए. कडिया आपस में जुड़ने तो लगी थी पर उस तरह से नहीं जैसे मैंने सोचा था . मेरे कानो में उस कागज़ पर लिखे शब्द गूँज रहे थे ,"इसका बोझ उठा सको तो ही लेना इसे. "

आखिर किस बोझ की बात थी वो . सुबह उठ कर मैं हाथ मुह धो ही रहा था की तभी रीना किसी बम कि तरफ आकर मुझ पर फट गयी .

"कुत्ते,कमीने तुझे क्या जरुरत थी जब्बर से पंगा लेने की , तू नहीं जानता वो मरवा देगा तुझे, हाथ पैर तुडवा देगा तेरे , तुझे कुछ होश भी है " चिल्लाते हुए बोली वो.

मैं- इस खूबसूरत चेहरे पर गुस्सा बड़ा प्यारा लगता है .

रीना- मैं मार दूंगी तुझे

मैं- मैं तो न जाने कब का मर मिटा हूँ तुझ पर

उसने पास पड़ी ईंट उठा ली और सच में मेरी तरफ फेंकी.

"अरे क्या कर रही है लग जाएगी " मैंने कहा

रीना- जानता है जब मुझे ये मालूम हुआ न तो मेरी जान ही निकल गयी तुझे क्या जरुरत थी ये सब करने की .

मैं- बताता हु, पहले तू शांत हो जा

रीना- क्या ख़ाक शांत हो जा.

मैंने उसका हाथ पकड़ा ही था की चाची आ गयी

"बहुत बढ़िया " उसने हम दोनों को देख कर कहा.
 
#29


"सब कुछ छोड़ कर बस मटरगश्ती करनी है तुमको "

चाची ने ताना दिया.

मैं- तुम को क्या काम है मुझसे .

चाची- अब कहाँ ध्यान है तुम्हारा घर के कामो में .और तुम रीना तुम तो समझदार हो, क्यों इसके साथ बर्बादी के फॉर्म भर रही हो.

मैं- इसको कुछ मत कहो चाची

"ओ हो, अब तो साहब को मेरी हर बात चुभने लगी है , ऐसा क्या गलत कह दिया मैंने " चाची बोली

मैं- तुम यहाँ आई ही क्यों हो

चाची- मैं इसलिए आई हूँ की कल रात जो तूने रायता फैलाया है न वो हमसे न समेटा जाएगा.

मैं- किसी ने तेरी मदद मांगी है क्या , ये मेरी जिन्दगी है मैंने तुझे बता ही दिया है की मुझे इसे कैसे जीना है .

चाची- तू चाहे जो कर , पर हमारे जीवन में बवाल मत खड़ा कर

मैं- मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं , मैं अभी थोड़ी देर में मेरा जो भी सामान है वो उठा लाऊंगा और तेरे आँगन में कभी भी पैर नहीं रखूँगा

रीना- ऐसा मत बोल मनीष

मैं- तू नहीं जानती रीना , पर एक न एक दिन तो ये सब होना ही था तो वो दिन आज ही क्यों नहीं .

रीना- मामी आप बड़ी है , इतनी निष्ठुर न बनो.

चाची- तू चुप रह ये हमारे घर का मामला है

मैं- नहीं रहेगी ये चुप, घर का मामला है न ये भी घर की सदस्य है तुम इसे चुप रहने को कह भी नहीं सकती .

चाची- तुझ को जब्बर से पंगा लेने की क्या जरुरत थी

मैं- उसको उसकी औकात दिखानी जरुरी थी .

चाची- तू तेरी औकात देख, क्या है तू , बिसात क्या है तेरी, ना जाने किसने तेरे कान भर दिए की तू अर्जुन सिंह का बेटा है , शमशेर का पोता है तो तुझे भी पंख लग गए. न जाने किस बात का गुरुर है तुमको , कभी सोचा है की जाने वाले तो चले जाते है पर जो पीछे रह जाते है उनका क्या हाल , उनके दिलो पर क्या गुजरती है . चौधरी शमशेर सिंह की तूती बोलती थी इलाके में पर एक रात कोई ऐसे ही मार कर चला गया. वो रुतबा, शान शोकत, पैसा. क्या काम आया कुछ भी तो नहीं

मेरी बाते कडवी तो लगेंगी तुझे पर सोच कर देख जेठ जी चले गए , सोलह साल बीते एक बार भी उनको तेरी याद आई क्या. तू दिन रात अर्जुन सिंह का बेटा हूँ कहते नहीं थकता, कभी अर्जुन सिंह ने पलट कर भी देखा क्या तुझे, क्या मालूम वो कहाँ पर है, सोच कर देख कैसे जी रहे होंगे वो . क्या मालूम उन्होंने दूसरी शादी कर ली हो. नया परिवार बना लिया हो.

चाची की बात का कोई जवाब नहीं था मेरे पास.

चाची- मुर्ख, मैं तुझे जिन्दगी को समझाना चाहती हूँ ,तेरी दुश्मन नहीं हूँ, तुझे अपने हाथो से पाला है मैंने, इन्ही हाथो से तुझे कंधा नहीं दे पाऊँगी, इसलिए तुझ को समझा रही हूँ इस राह पर मत चल , खुद का नहीं तो हम सब का सोच, बड़ी मुश्किल से संभाला है इस परिवार को , फिर बिखरा तो हम सब भी बिखर जायेंगे.

तू चाहे यहाँ रह या मेरे पास मुझे जरा भी दिक्कत नहीं है है तो एक घर ही , पर तुझे कुछ हुआ तो उस से मुझे दिक्कत है , तेरे चाचा जब्बर से बात कर लेंगे, बात आई गई हो जाएगी.

मैं- उसकी जरुरत नहीं है

चाची रीना के पास आई और बोली- तू ही समझा दे इसे, तेरी तो सुनता है न ,

फिर वो चली गयी . रह गए मैं और रीना .

रीना के बहुत जोर देने पर मैंने उसे हर एक बात बता दी, सिवाय इस बात के के मैं मीता से मिलता था .उसका दिल रखने को मैंने कह दिया की मैं आगे से कोई भी ऐसा वैसा काम नहीं करूँगा.

मेरा मन बहुत विचलित था चाची की कही बाते मेरे दिमाग में घूम रही थी . सबके जाने के बाद मैं अकेला रह गया था , मैंने जेब से वोही धागा निकाला और हथेलियों में घुमाने लगा उसे, अब भी वो गर्म था, पर किसलिए ये साला सवाल मुझे पागल कर रहा था. उसके अन्दर जैसे कुछ सुलग रहा था कुछ पिघल रहा था . तभी मेरे दिमाग में आया की मुझे मीता से मदद लेनी चाहिए.

मैंने तुरंत साइकिल उठाई और मैं रुद्रपुर के लिए निकल गया, एक बार फिर उसके घर पर ताला था . ये मेरे साथ दूसरी बार था जो मुझे ये ताला लटका हुआ मिला था , एक बार फिर मैं हवेली के पास से निकला एक बार फिर मुझे उसकी कशिश ने खींचा. आखिर ऐसा क्या था इस खामोश इमारत में . कभी न कभी तो जाना होगा ही मैंने खुद से कहा . तभी मुझे विचार आया की मुझे उसी ईमारत में जाना चाहिए क्या पता मीता वहां मिल जाए.

वहां से थोड़ी दूर मैंने साइकिल खड़ी की और ईमारत में चला गया. हमेशा के जैसे ही घोर शांति थी , उस छोटी सी बावड़ी में पानी लहरा रहा था . मैंने कुछ घूँट पिए , मेरे हाथ गीले थे, चलते हुए मैं अन्दर पहुंचा मैंने देखा उस बूढ़े बरगद से तमाम धागे उतार दिए गए थे , . कुछ जगह पर नीली- पीली नयी प्रचीरे बाँधी गयी थी. सजावट की तैयारिया थी पर फिलहाल कोई दिख नहीं रहा था .

चलते चलते मैं उस पुराने दरवाजे के सामने पहुंचा जिसे कुछ दिनों पहले मैंने ही खोला था . मैंने दरवाजे की चोखट पर माथा टेका और फिर अन्दर गया, वहां जाकर देखा की कच्चे फर्श पर दुनिया जहाँ की चांदी, मोती, और नजाने क्या क्या बिखरा हुआ था और उस हलके गीले ठन्डे अँधेरे में धोती धोती में आँखे मूंदे दद्दा ठाकुर बैठा हुआ था . उसके सामने एक छोटा सा दीपक जल रहा था , वो कुछ पढ़ रहा था या शायद उसे याद था की क्या पढना है , बोलना है .

मैं आया तो था मीता की तलाश में पर मुझे ये मिल गया था . मैं बिलकुल भी उस को देखना नहीं चाहता था मैंने अपने पैर वापिस किये ही थे की उसने हाथ के इशारे से मुझे रुकने को कहा और अपना काम करता रहा . कोई पन्द्र बीस मिनट बाद उसने आँखे खोली .....

"क्या है ऐसा जो तुझे बार बार यहाँ खींच लाता है " उसने कहा

मैं- बस इधर से गुजर रहा था पानी पीने को रुका था तो सोचा आया हु तो माथा टेक चलू.

ददा- जानता है न तू कहाँ है, कम से कम उसके घर में तो हमें ईमानदार रहना चाहिए, उस से क्या छिपा है .

मैं- ये बात सब पर लागु होती है है न .

ददा- हम सब उसके ही बन्दे है .

मैं- तुम यहाँ किसलिए आते हो, अपने कर्मो का प्रायश्चित करने के लिए क्या

ददा- मैं भी अक्सर इधर से ही गुजरता हूँ न जाने क्यों

मैं- अब तुम इमानदार नहीं हो.

ददा- तुम्हारे बड़े चर्चे है आजकल ,

मैं- तुम क्या सोचते हो

ददा- सच कहूँ तो मेरी दिलचस्पी इस बात में है की अर्जुन के बेटे ने ये कपाट क्यों खोले.

मैं-अच्छा है न, मंदिरों में रौनक रहनी चाहिए , हम उस से वो हम से दूर रहे ये भी तो गलत है न . अच्छा लगा की इन्ही तैयारियों के बहाने ये जगह गुलज़ार होगी

ददा- . भरम है ये , ये जगह भरम के सिवा कुछ भी नहीं

मैं- तुम ज्यादा जानते हो ,

ददा- मैं ये भी जानता हूँ की रुद्रपुर के लड़के तुम्हारे खून के प्यासे है , अर्जुन के बेटे के रक्त से वो इस धरा को सींच देना चाहते है .

मैं- अब दुनिया में हर किसी की हसरते कहाँ पूरी होती है ददा. मुझे अफ़सोस है , वैसे तुम्हारी क्या इच्छा है

ददा- मेरी इच्छा , किसी और ज़माने में ये बात कोई पूछता तो मैं कहता इंतकाम है मेरी इच्छा

मैं- और इस ज़माने में , मैं जानता हूँ मेरा यहाँ होना तुम्हे गवारा नहीं है , तुम चाहते तो हमारी पहली मुलाकात में ही तुम मेरा नुकसान करवा सकते थे, चाहते तो मुझे मरवा सकते थे, यहाँ पर अगर मैं हूँ तो उसमे भी तुम्हारी ही मर्ज़ी है . ये मेला लग रहा है तुम्हारी मर्जी से , दुनिया चाहे जो भी कहे कुछ तो चाहत है तुम्हारी .. तो बताओ

ददा- बरसो पहले यही इसी जगह से किसी ने देवता का श्रृंगार लूट लिया, लोग सोचते है की वो मेरी करतूत थी. ........

दद्दा ठाकुर ने ये बात कह कर मुझे और उलझन में डाल दिया. .
 
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"कहने को तो ये दुनिया मेरे कदमो में है , पर पीठ पीछे लोगो की बाते मेरे कलेजे को छलनी करती है ,आत्मा पर उस बोझ का भार लेकर जीना बहुत मुश्किल है , " ददा ठाकुर ने कहा .

मैं- तुम मेरे पिता को कैसे जानते थे , क्या तुम दोनों दोस्त थे .

ददा- दोस्त और हम, तुम्हे भला ऐसा क्यों लगता है

मैं- क्योंकि तुम्हारा स्वभाव मेरे प्रति नरम है ,

ददा- छोड़ो इन बातो को ,

दद्दा ठाकुर वहां से उठा और बाहर को आगया . मैंने उसके पीछे पीछे आया.

"मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ, देवता को उसका श्रृंगार वापिस मिलना ही चाहिए " मैंने कहा .

दद्दा की गोल आँखे ऊपर से निचे को मुझे जैसे स्कैन कर रही थी .

मैं- मेरा यकींन करो , मेरी भी कुछ उलझाने है जो तुम्हारी उलझनो संग उलझी है.

ददा- मेरे जाने का समय हो गया है , पर मैं इतना जरुर कहूँगा की तुम जितना हो सके रुद्रपुर से दूर रहो. तुम्हे लगता है तुम अर्जुन के बेटे हो , इसलिए खास हो पर ये दुनिया गोल है .वो एक दौर था जिसमे अर्जुन था वो दौर बीत गया . वक्त की धरा मुड रही है, जितना यहाँ से दूर रहोगे सुखी रहोगे, रही बात देवता और मेरी, देवता जानता है मेरे सच को.

ददा ठाकुर के जाने के बाद मैं वहीँ पर बैठा रहा सोचता रहा की इस गोल दुनिया में मैं उस सच के बहुत करीब हूँ, जिसके महीन धागे से ये सब एक दुसरे से उलझे है , इन तमाम लोगो की जिन्दगी में एक ही नाम बड़ा महत्वपूर्ण था अर्जुन चौधरी. पर आखिर क्या कहानी थी अर्जुन सिंह की.

आते आते मुझे थोड़ी देर हो गयी थी बिना बात के, खेत पर ताई के सिवा और कोई नहीं था . जब मैं उसके पास पहुंचा तो वो हाथ मुह धो रही थी .

मैं- अभी तक हो यहाँ

ताई- हाँ, देर हो गयी अच्छा हुआ तू आ गया साथ ही चलते है घर पर .

मैं- चलेंगे थोडा रुक कर. बैठते है थोडा.

मैं ताई के पास ही बैठ गया .

"चाचा नहीं दिख रहा आजकल कहीं गया है क्या " मैंने कहा .

ताई- क्या मालूम, मेरी बातचीत कम ही होती है उस से

मैं- दोनों पति-पत्नी ही चूतिये है .

ताई- ऐसा मत बोल

मैं- सुनार की कोई खबर आई क्या, जिन्दा है या निकल लिया

ताई- अभी कुछ खबर नहीं, सुना है बड़ा गहरा घाव है उसका.

मैं- तुझे क्या लगता है किसने हमला किया होगा उस पर

ताई- मैं क्या जानू, मैं तो तेरे साथ थी न.

"मैंने सोचा है की रुद्रपुर के शिवाले में कुछ योगदान दूँ उसे दुबारा सवांरने में मदद करूँ." मैंने कहा

ताई- और वो तेरी मदद लेंगे, तूने सोचा भी कैसे.

मैं- बाप के कर्जे बेटे को ही चुकाने पड़ते है . जो हुआ मैं उसे वापिस तो नहीं कर सकता पर एक नयी शुरुआत तो कर सकते है न .

ताई- इन पचड़ो से दूर रह , सुनहरा कल तेरे सामने है , अपनी विरासत को संभाल .

मैं- मैंने चाची से वादा किया है की सब उसका ही रहेगा सिवाय इस बंजर जमीन के, मैंने मेरे लिए इसे ही चुना है .

ताई-ये सब बेकार की बाते है ,कुछ तो हसरत होगी तुम्हारी

मैं- सच कहूँ तो मेरी हसरत तुम हो .

ताई- मुझमे ऐसा क्या है

"मुझे बताने की जरुरत नहीं " मैंने कहा

ताई- तो क्या रोकता है तुमको

मैं- वो बारीक़ डोर, जो टूटी तो सब बदल जाएगा.

ताई- फिर ये बेकरारी क्यों, ये हसरत क्यों

मैं- शायद मेरे नसीब का लेख है ये

ताई- तो फिर इसे नसीब पर ही छोड़ दो

मैं- मेरे नसीब में कुछ नहीं लिखा सिवाय बर्बादी के. मेरा सुनहरा कल कभी नहीं आयेगा. मेरे कल में बहते रक्त और दर्द के सिवा कुछ नहीं .

ताई- निष्ठा सच्ची हो तो लेख खुद लिख लेता है इन्सान

मैं- मेरे सितारे ये नहीं मानते.

ताई- तो तू भी मत मान उनकी

मैं- आखिर ऐसा क्या है उस शिवाले में , क्यों खींचता है वो मुझे अपनी और. मेरा नसीब क्यों नहीं मानता की ये कहानी मनीष की है ,

ताई- बेशक ये तेरी कहानी है , इसका हर पन्ना तुझे खुद ही लिखना है.

हल्का हल्का अँधेरा होने लगा था पर दिल की गहराई में एक लौ जल रही थी . उस रोशन होती रात में मैं दोराहे पर खड़ा था , दिल कह रहा था की ये हुस्न जो तेरे सामने है तेरे आगोश में पिघलने को बेताब है, इस हुस्न के रस को अभी पी जा. और दूसरी तरफ मेरा दिमाग था जो कह रहा था की पतन के इस रस्ते पर तू बढ़ तो जायेगा पर जब तू लौटने को देखेगा तो कोई राह नहीं मिलेगी तुझे.

मैं- कुछ नहीं घर चलते है .

मैं ताई को लेकर घर आ गया . गर्मी बहुत थी ऊपर से बिजली भी नहीं थी तो मैं बाहर नीम के निचे चबूतरे पर बैठ गया . की तभी रीना भी आ निकली मेरी तरफ .

मैं- कहाँ जा रही है .

रीना- बस तेरे पास ही आ रही थी .

मैं- आजा बैठ

रीना- आज जब मैं पानी भरने गयी तो वहां पर कुछ औरते कह रही थी की तूने हमला किया है सुनार पर .

मैं- पर तू तो सच जानती है न

रीना- पर मुझे बुरा लगा , गाँव में तेरे बारे में तरह तरह की बाते हो रही है .

मैं- होने दे अपने को क्या फर्क पड़ता है

रीना- अच्छी भली जिंदगी चल रही थी न जाने किसकी नजर लगी है , किस बुरी घडी में तू उलझ गया इस झमेले में .

मैं- सब सही हो जायेगा, तू फ़िक्र मत कर .

रीना- एक तेरी ही तो फ़िक्र है मुझे

मैं- तू साथ है मेरे भला मुझे क्या चिंता , वैसे भी मैंने तुझसे कह तो दिया है की मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करूँगा.

रीना- जानती हूँ पर फिर भी लोगो की बाते

मैं- लोगो का काम है कुछ न कुछ कहना , वो अपना काम करेंगे हम अपना काम करते रहेंगे.

हम बात कर ही रहे थे की तभी दो बाते एक साथ हुई, एक तो बिजली आ गयी और दूसरा ताई ने मुझे आवाज लगाई खाना खाने के लिए.

मैं- रीना तू भी चल

रीना- न बाबा न, थोड़ी देर पहले ही खाना खाया था मैंने

मैं- चल फिर मिलते है .

मैं घर आया . ताई ने खाना परोस रखा था .

"मैं जरा नहा कर आ रही हूँ तू खाना खा ले तब तक. " ताई ने कहा

मैंने हाँ में सर हिलाया. पर मेरी नजर ताई की मटकती गांड से हट ही नहीं रही थी . मैंने दरवाजे की कुण्डी लगाई और बाथरूम की तरफ चल दिया. जिसे करने को मिअने अब तक खुद को रोका था वो आज शायद होकर ही रहना था.

मैंने देखा बाथरूम का दरवाजा बंद नहीं था , ताई की पीठ मेरी तरफ थी , ब्रा-पेंटी में ताई का गदराया बदन , उसने बस अभी अभी ही कपडे उतारे होंगे. मैंने आगे बढ़ कर ताई को अपनी बाँहों में भर लिया और उसके सीने को मसलते हुए ताई की गर्दन को चूमने लगा.

एक पल को ताई चोंकी पर मेरे अहसास को महसूस करते ही वो नार्मल हो गयी.

ताई- क्या कर रहा है

मैं- वाही जो मुझे पहले ही कर देना चाहिए था .

ताई- क्या कर देना चाहिए था तुझे पहले ही

मैं- तेरी ले लेनी चाहिए थी .

ताई- क्या लेनी थी

मैं- चूत, आज चाहे कुछ भी हो जाए बस तू और मैं . ये रात गवाह बनेगी हमारे प्यार की .

मैंने ताई की ब्रा को उतार कर फेंक दिया.

 
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