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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#19

मैं- नियति शायद यही चाहती थी .

मैने भी डायन के जैसे बात नियति पर डाल दी.

ओझा मेरी बात सुनकर मुस्कुरा पड़ा.

ओझा- सही कहा तुमने नियति पर इतने लोगो पर संकट है कुछ मारे गए कुछ मारे जायेंगे. क्या तब भी तुम नियति का ही बहाना लोगे.

मैं- इन्ही गाँव वालो ने दो मासूमो को फांसी से लटका दिया सिर्फ इस कसूर के लिए की वो प्रेम कर बैठे थे . उनकी नियति क्या फांसी थी .

ओझा- तो क्या इसी कुंठा के कारण तुम उसका साथ दे रहे हो.

मैं- मैं किसी का साथी नहीं हूँ, गाँव में हुई प्रत्येक मौत का दुःख है मुझे . और फिर ये मेरा काम नहीं है गाँव वालो ने समाधान के लिए आपको बुलाया है आप उपाय करो .

ओझा- जितना मुझसे हो सकेगा मैं करूँगा. पर मेरा प्रश्न अब भी यही है की उसने तुम्हे क्यों छोड़ दिया.

मैं-जब उस से मिलो तो पूछ लेना महराज.

ओझा के यहाँ से मैं आ तो गया था पर मेरे मन में बेचैनी थी . मन कही लग ही नहीं रहा था . मैं जानता था की ओझा देर सवेर उसे तलास कर ही लेगा. दिल के किसी कोने में निशा को लेकर फ़िक्र सी होने लगी थी . दूसरी तरफ आस-पास के गाँवो के लोग भी आज आने वाले थे . सामूहिक बैठक करने ताकि इस मुसीबत का कोई हल निकाला जाये.

निशा से मिलना बहुत जरुरी था पर घर से बाहर कैसे जाऊ मैं ये समस्या भी मेरे लिए तैयार खड़ी थी .

"क्या बात है देवर जी कुछ परेशां से लगते हो " भाभी ने पूछा मुझसे

मैं- ऐसी तो कोई बात नहीं भाभी

भाभी- तो फिर चेहरे पर ये उदासी क्यों

मैं- मुझे आपकी आज्ञा चाहिए

भाभी- किसलिए

मैं- मुझे थोड़ी देर के लिए जाना है कही रात को , वादा करता हूँ जल्दी ही वापिस आ जाऊंगा.

भाभी- ये मेरे हाथ में नहीं है पिताजी ने तुम पर बंदिश लगाई है , उनके हुकुम की तामिल न हुई तो फिर तुम जानते ही हो

मैं- भाभी, मेरा जाना जरुरी है .

भाभी- गाँव का माहौल इतना तनावपूर्ण है तुम्हे अब भी बाहर घुमने की पड़ी है . घर में किसी को भी मालूम होगा तो फिर डांट मुझे ही पड़ेगी वैसे ही लोग कहते है की मेरे लाड ने बिगाड़ दिया है तुम्हे.

मैं-ठीक है भाभी मैं नहीं जाता

भाभी- तुम तो नाराज हो गए. सुनो रात को पिताजी और तुम्हारे भैया जब ओझा के पास जायेंगे तो तुम निकल जाना पर समय से वापिस आ जाना पर तुम वादा करो तुम जिस से भी मिलते हो जो भी करते हो उस से परिवार की प्रतिस्ठा पर कोई आंच नहीं आएगी

मैं- मुझे ख्याल है परिवार का भाभी .

पर ये रात भी मेरी परीक्षा लेने वाली थी आज क्योंकि पिताजी अकेले ही गए ओझा के पास भैया घर पर ही रह गए थे . खैर, मैंने बहुत इंतजार के बाद ये सुनिश्चित कर लिया की सब लोग गहरी नींद में है तो मैं घर से निकल गया और गाँव को पार करके अपनी मंजिल की तरफ दौड़ गया.

एक बार फिर से वो तालाब और काली मंदिर मेरी आँखों के सामने थे . कड़ाके की ठण्ड में भी मेरा गला खुश्क था . मैं तालाब से पानी पी ही रहा था की अचानक से पानी में से एक साया ऊपर उठ कर सामने आ गया .

"कबीर " बोली वो

कसम से मेरा दिल को दौरा ही आ गया था . जिस तरह से वो सामने आई थी मेरी नसे फट ही जाती .

"जान ही लेनी है तो सीधा ही ले लो न ऐसे डराने की क्या जरूरत थी " मैंने हाँफते हुए कहा .

निशा-मैं तो नहा रही थी मुझे क्या मालूम था तुम ऐसे आ निकलोगे

मैं- मुझे तो आना ही तुमसे मिलने

निशा- आओ फिर

निशा तालाब की दिवार पर ही बैठ गयी . मैं भी उसके पास गया .

मैं- ठण्ड में पानी में जाने की क्या जरुरत थी तुम्हे

वो- मुझे फर्क नहीं पड़ता

मैं- फिर भी ,

निशा- ठीक है अपना कम्बल दे दो मुझे , राहत के लिए

मैंने अपना कम्बल उसे ओढा दिया .

निशा- इतनी बेचैनी क्यों मुझसे मिलने के लिए

मैं- कुछ सवालो ने मुझे पागल किया हुआ हैं

निशा- मेरे पास कोई जवाब नहीं तेरे सवालो का

मैं- दुनिया कहती है की ये तमाम क़त्ल डायन कर रही है .

निशा- कुछ तो लोग कहेंगे.

मैं- वो एक छोटा सा बच्चा था . अपने हाथो से दफनाया मैंने उसे .

निशा खामोश रही .

मैं- निशा, मैं जानता हूँ तू अलग है . मैं नहीं जानता की डायन कैसी होती है वैसी जो दुनिया मानती है या फिर वैसी जो मेरे साथ बैठी है. तूने मुझे कुछ नहीं किया . दो मुलाकातों में अपनी सी लगी मुझे . तेरे साथ उस सुनहरी आंच को तापना . तेरे साथ इस बियाबान में होना ये लम्हे बहुत खास है . पर गाँव में होती मौतों को भी नहीं झुठला सकता मैं . तू भी बता मैं क्या करू

निशा- कुछ मत कर. कुछ मत कह कबीर.

मैं- वो मौते कैसे रुकेंगी निशा. जब एक आदमी मरता है तो वो अकेला नहीं मरता उसके साथ उसका परिवार जो उस पर आश्रित होता है वो भी मरता है हर रोज मरता है .

निशा- तेरे मन की बात समझती हूँ मैं

मैं- निशा, तू चाहे तो तू मेरा रक्त पी ले. तू जब भी चाहे मैं हाज़िर हो जाऊंगा. तेरी प्यास तू मेरे रक्त से बुझा पर गाँव वालो का अहित मत कर.

मैंने अपनी जेब से उस्तरा निकाला और अपनी हथेली काट कर निशा के सामने कर दी.

रक्त की धारा को देख कर निशा की आँखों में आई चमक को मैंने अन्दर तक महसूस किया पर बस एक लम्हे के लिए .

"कबीर, पागल हुआ है क्या तू " निशा ने तुरंत अपनी ओढनी के किनारे को फाड़ा और मेरी हथेली पर बाँध दिया .

"क्या हुआ निशा, मेरा खून उतना मीठा नहीं क्या जो तुझे पसंद नहीं आया. " मैंने कहा

निशा - कबीर तू जा यहाँ से

मैं- मैं नहीं जानता तेरा मेरा क्या नाता होगा. पर निशा मैं इस से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता . गाँव वालो ने ओझा बुलाया है . वो आज नहीं तो कल तेरे बारे में मालूम कर ही लेगा. मैं हरगिज नहीं चाहता तुझे कोई भी नुकसान हो .

निशा- एक डायन की इतनी परवाह किसलिए कबीर

मैं- डायन नहीं होती तब भी इतनी ही फ़िक्र होती तेरी.

निशा- मुझे इतना मानता है तो मेरी भी सुनेगा क्या

मैं- तेरी ही तो सुनने आया हूँ.

निशा- तो फिर विशबास कर मुझ पर

मैं- बिसबास है इसीलिए तो तेरे साथ यहाँ पर हूँ

निशा- तो फिर ठीक है कल दोपहर को मैं तेरे गाँव में आउंगी . उस ओझा से मुलाकात करुँगी . अगर उसके इल्जाम साबित हुए कबीर तो इस डायन का वादा है तुझसे ये सूरत फिर न दिखाउंगी तुझे.

मैं- नहीं निशा, तू ऐसा कुछ नहीं करेगी ओझा गाँव की हद , गाँव की हर दिशा को कील रहा है .

निशा बस मुस्कुरा दी . निशा ने कल गाँव में आने का कह दिया था . ओझा के सामने जब वो आयेगी तो क्या होगा ये सोच कर मैं घबरा गया था पर असली घबराहट क्या होती है ये मुझे तब मालूम हुआ जब मैं वनदेव के पत्थर के पास पहुंचा ..... मैंने देखा. मैंने देखा की.................

 
#21

सर्दी की उस दोपहर में सूरज का ताप जैसे थम ही गया था . मैं एक नजर निशा और दूसरी नजर ओझा को देखता .

निशा- ओझा, किस बात की देर है अब शिकारी भी है शिकार भी है . मौका भी है दस्तूर भी है जिसके दर्शन की चाह थी तुझे तेरे सामने है . तड़प रही हूँ मैं तेरी उन सिद्धियों के ताप में पिघलने के लिए . अब देर न कर. मैं बड़ी हसरत लेकर आई हु तेरे स्थान से अगर मैं खाली गयी तो फिर तेरी ही रुसवाई होगी.

कुछ पलो के लिए अजब सी कशमकश रही और फिर वो हुआ जिसकी मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी .

ओझा ने अपने कदम आगे बढ़ाये और अपना सर निशा के कदमो में झुका दिया .

"मुझसे भूल हुई " ओझा ने हाथ जोड़ कर कहा

मैं ये देख कर हैरान रह गयी .

निशा-ये धूर्तता का धंधा जो तुम जैसो ने खोल रखा है . भोले इंसानों की श्रधा का सौदा करते हो तुम लोग. आस्था जैसी पवित्र भावना को चंद सिक्को , अपनी ठाठ-बाठ के लिए तुम लोग इस्तेमाल करते हो . दो चार झूठे मूठे मन्त्र सीख कर तुम लोग जो करते हो न उसे पाप कहते है ओझा. मैं चाहूँ तो इसी वक्त गाँव वालो के सामने तेरा ऐसा जलूस निकालू तेरा की तेरी सात पीढ़िया तंत्र के नाम से कांपे . ये लोग तुझे यहाँ लाये क्योंकि इनको विश्वास था और विश्वास घात करने वाला तू, रात होते होते अपनी इस दूकान को बंद करके तू नो दो ग्यारह नहीं हुआ न तो मैं फिर आउंगी और ऐसा हुआ तो अगले दिन का सूरज तेरे भाग्य में नहीं होगा.

"चल कबीर यहाँ से " निशा ने कहा और हम वहां से आ गये.

मैं- मुझे तो मालूम ही नहीं था की ये ठग है .

निशा- छोड़ उस बात को अब बता

मैं- मैं क्या बताऊ सरकार .समझ ही नहीं आ रहा की क्या कहूँ

निशा- तेरे गाँव आई हूँ . तेरी मेहमान हूँ.

मैं- बता फिर कैसे मेहमान नवाजी करू सरकार तेरी .

निशा-दिखा मुझे तेरा गाँव , दिखा यहाँ की रोनके

मैं- सच में तेरी ये इच्छा है

निशा- तुझे क्या लगता है

निशा को दिन दिहाड़े साथ लेकर घूमना थोडा मुश्किल क्या पूरा ही मुश्किल था मेरे लिए. गाँव वालो ने हमें साथ देख ही लेना था . परेशानी खड़ी हो जानी थी मेरे लिए .

निशा- क्या हुआ किस सोच में डूब गए कोई परेशानी है क्या .

मैं- नहीं बिलकुल नहीं. साइकिल पर बैठेगी मेरी

निशा- आगे बैठूंगी

उसने जिस दिलकश अंदाज से जो कहा कसम से उसी लम्हे में मैं अपना दिल हार गया था . लहराती हुई हवाओ ने अपनी बाहें खोल दी थी हमारे लिए. निशा की लहराती जुल्फे मेरे गालो को चूम रही थी . बढ़ी शोखियो से साइकिल के हैंडल को थामे वो बस उस लम्हे को जी रही थी . जब उसका जी करता वो साइकिल की घंटी को जोर जोर से बजाती . उसके चेहरे पर जो ख़ुशी थी मेरे दिल को मालूम हुआ की करार क्या होता है. गाँव के आदमी औरते हमें देखते पर अब किसे परवाह थी .

गाँव की कुछ खास जगह जैसे की जोहड़. डाक खाना और हमारा मंदिर उसे दिखाया . वापसी में हम हलवाई की दूकान के पास से गुजरे मैंने उस से जलेबी चखने को कहा पर उसने मना किया . फिर हम गाँव की उस हद तक आ पहुंचे जहाँ से हमारे रस्ते अलग होते थे . उसने मेरे काँधे पर हाथ रखा और बोली- कबीर, कसम से आज बहुत अच्छा लगा मुझे .

मैं- तेरा जब दिल करे तू आ जाया कर

निशा- नहीं कबीर ये मुमकिन नहीं है ये उजाले मेरे लिए नहीं है

मैं- तो फिर ये राते तो अपनी है न तू बस इशारा कर मुझे ये गाँव रातो को भी बड़ा खूबसूरत लगता है .

निश मेरी बात सुन कर मुस्कुरा पड़ी .

वो- अभी जाना होगा मुझे

मैं- तालाब तक चलू मैं

निशा- नहीं . तुझे याद है ना अब पन्द्रह दिन मैं तुझसे हरगिज नहीं मिलूंगी तू अपना वादा याद रखना

मैं- ये पन्द्रह दिन कितनी सालो से बीतेंगे मेरे लिए

निशा- इतनी भी आदत मत डाल कबीर. एक बात हमेशा याद रखना तेरे मेरे बीच वो दिवार है जो कभी नहीं टूट पायेगी. मैं चलती हूँ अब तू भी जा

दिल चाहता था की दौड़ कर मैं उसे अपने आगोश में भर लू और फिर कभी खुद से दूर नहीं जाने दू पर ये मुमकिन नहीं था तो मैंने भी साइकिल गाँव की तरफ मोड़ दी और घर पहुँच गया . न जाने क्यों सब कुछ महका महका सा लग रहा था . मैंने अपना रेडियो चालू किया और छज्जे पर रख कर आवाज कुछ ऊंची कर दी.

ढलती शाम में शाम में किशोर के नगमे सुनना उस वक्त मेरे लिए सब से सुख था . खुमारी में हमे तो ये मालूम भी न हुआ की कब भाभी सीढियों पर खड़ी हमें देख कर ही मुस्कुरा रही थी .

"ये जानते हुए भी की राय साहब घर पर है बरखुरदार इतनी ऊँची आवाज में रेडियो बजा रहे हो . " भाभी ने मेरे पास आते हुए कहा .

मैं- हमको क्या डर है राय साहब का . अपनी मर्जी के मालिक है हम भाभी

भाभी- अच्छा जी ,हमें तो मालूम ही नहीं था ये वैसे आज से पहले ये हुआ नहीं कभी .

मैं- दिल किया भाभी कभी कभी दिल की भी सुननी चाहिए न

भाभी- दिल की इतनी शिद्दत से भी न सुनो देवर जी की पूरा गाँव ही गवाह हो जाये.

भाभी की ये बात सुन कर मेरे होंठो की मुस्कान गायब हो गयी .

भाभी- हमारे देवर की शिद्दत को पुरे गाँव ने महसूस किया है आज . जब हमें मालूम हुआ है तो फिर किसी से छुपा तो रहा नहीं न कुंवर जी . वो वजह जिसके लिए हमारा देवर रातो को गायब रहता था आज मालूम हो ही गया . तो अब बिना देर किये बता भी दो क्या नाम है उस बला का जिसने हमारे देवर की नींद चुराई हुई है .

मैं- ऐसा कुछ भी नहीं है भाभी , वो लड़की को मुसाफिर थी राह पूछ रही थी मैंने बस उसकी मदद की थी उसे मंजिल पर पहुँचाने में .

भाभी- उफ्फ्फ ये बहाने. चलो कोई नहीं मत बताओ पर इतना ध्यान रखना ये जो भी है दिल्ल्ल्गी ही रहे. आशिकी से आगे मत बढ़ना . मोहब्बते रास नहीं आती इस ज़माने को उस रस्ते पर चलने की सोचना भी मत . सोचना भी मत .

मैं- मैंने कहा न भाभी ऐसा वैसा कुछ भी नहीं है .

मैं सीढियों से उतरा ही था की तभी किसी ने खींच कर मुक्का मारा मुझे और मेरा संतुलन बिगड़ गया . .................

 
#22

"कमीने कुत्ते तुझे छोडूंगी नहीं मैं . "चंपा ने एक मुक्का और मारा मेरी पीठ पर .

मैं- आह. खता तो बता मेरी

चंपा- मुझसे ही पूछ रहा है . मुझे तो खेत तक साथ ले जाने में ज़माने भर की दुहाई देता था और बेलिहाज बेशर्म किसी दूसरी के साथ तू गाँव भर में चक्कर काट रहा था .

मैं- शांत हो जा झाँसी की रानी. गुस्सा थूक दे. और मेरी सुन, वो तो कोई मुसाफिर थी पता बूझ रही थी मेरा उस से भला क्या लेना देना.

चंपा- तेरी इन चिकनी बातो पर अब नहीं फिसलने वाली मैं. मैं ही पागल थी जो तेरे पीछे पड़ी रही .

मैं- सुन तो सही चंपा तू भी न बेकार ही इतना गुस्सा कर रही है .

चंपा- हाँ ये भी मेरा ही दोष है .

"अरे क्या तुम लोग कुत्ते-बिल्ली के जैसे लड़ रहे हो इतने बड़े हो गए हो बचपना कब जायेगा तुम्हारा " भाभी ने सीढयो से उतरते हुए कहा .

मैं-कुछ नहीं भाभी बस यूँ ही

भाभी- ठीक है , ठीक है चंपा तुम मेरे साथ चलो

भाभी उसके साथ बाहर चली गयी . मैं भी गाँव की तरफ चल दिया. गाँव भर में चर्चा थी की ओझा अचानक से वापिस चला गया था . गाँव वालो की इस बात से और घबराहट बढ़ गयी थी . मैं पंच के घर गया उसके लड़के को देखने के लिए. उसे खाट से बाँध कर रखा गया था . बदन एक दम पीला पड़ चूका था पर जिस तरह से वो हाथ पैर मार रहा था उस से लगता था की ताकत है अभी भी .

मैं बस सोचता रहा की बहनचोद ये क्या बला थी . क्या देख लिया इसने जो ये पगला गया . मैं लगातार जंगल के चक्कर लगा रहा था पर एक पल भी मेरे सामने ऐसा कुछ नहीं आया था . वापसी में मैं मंगू के घर पर गया .

मैं- मंगू रात को खेतो पर चलेगा क्या

मंगू की माँ ने सख्त मना कर दिया . उसके जज्बात भी समझता था मैं . इतनी घटनाओ के बाद हर कोई घर से बे टाइम निकलने से पहले सोचेगा . घर वापस आते समय मुझे मूतने की इच्छा हुई तो मैंने एक कोना पकड़ा और मूतने लगा. मूतते समय मैंने अपने लिंग को देखा ये अभी भी वैसे ही सूजा हुआ था . इन तमाम बातो के चक्कर में इस पर मेरा जरा भी ध्यान नहीं गया था .

मैंने थोड़ी देर विचार किया और फिर बैध जी के घर की तरफ कदम बढ़ा दिए. पर वहां जाकर मालूम हुआ की वो किसी का इलाज करने गया हुआ था . ये दूसरी या तीसरी बार था जब मैं इस मामले में उससे मिलने आया था और वो मिल नहीं पाया. खैर अब घर तो जाना ही था . रोटी-पानी के बाद मैं चाची के पास पहुँच गया .

थोड़ी देर अलाव के पास बैठा . गर्म दूध पीकर तबियत खुश हो गयी .

चाची- किस सोच में डूबा है

मैं- कुछ नहीं चाची

चाची- सारा दिन गायब था . रात को भी नहीं था . जेठ जी को मालूम हुआ तो तेरे साथ मुझे भी परेशानी होगी.

मैं- मैं भी परेशां हु चाची .

चाची- बता तो सही क्या परेशानी है तुझे.

मैं- ये अभी भी सुजा हुआ है

मैंने सकुचाते हुए चाची से कहा तो चाची की त्योरिया चढ़ गयी .

चाची- वैध को नहीं दिखाया न तूने

मैं- गया था पर वो मिला ही नहीं, मुझे लगता है की कुछ हो गया है सुजन उतर ही नहीं रही है .

चाची- दर्द है क्या अभी भी .

मैंने अपना सर चाची के कंधे पर रख दिया. चाची के जिस्म की खुशबु मुझ पर सुरूर बन कर छाने लगी. मैंने उसकी गर्दन पर चूमा.

चाची- उफ़ तेरी ये शरारते

चाची उठ कर लालटेन के पास चली गयी और उसकी लौ धीमी करने लगी. मैंने पीछे से चाची को अपनी बाँहों में भर लिया और चाची के मुलायम पेट को सहलाने लगा. मैंने एक ऊँगली चाची की नाभि में डाल दी . चाची के नितम्ब मेरे लिंग पर रगड़ खाने लगे. चाची मीठी आहें भरते हुए कसमसाने लगी मेरी बाँहों में .

चाची- कबीर मत कर न

मैं- मैं क्या कर रहा हूँ, कुछ भी तो नहीं कर रहा न

मैं अपने हाथ थोडा और ऊपर ले गया और चाची की छातियो को अपनी मुट्ठी में भर लिया .

चाची- मान जा न

चाची मेरे आगोश से निकल गयी और बिस्तर लगाने लगी. चाची जब झुकी तो उसके चूतडो के कसाव ने मेरे दिल पर छुरिया चला दी. चाची ने अपनी ओढनी उतार कर रख दी और बिस्तर पर चढ़ते हुए बोली- आजा सोते है

मैं चाची के साथ रजाई में घुस गया.

चाची- कैसा रहा आज का दिन

मैं- ठीक ही था . खेतो पर मजदूरो ने साफ़ मना कर दिया अहि की वो रात को वहां नहीं रहेंगे. भैया ने भी उन्हें हाँ कह दिया है . मंगू भी नहीं जाएगा उसकी माँ कहती है की जब तक हालात ठीक नहीं हो जाते उसे नहीं भेजेगी.

चाची- सही निर्णय है

मैं चाची से थोडा चिपक गया बोला- रखवाली की समस्या हो गयी है . गेहूं-सरसों की फ़िक्र नहीं है पर सब्जियों में जंगली पशु घुस गए तो मेहनत बर्बाद हो जायेगी. चंपा ने भी बताया की सब्जियों में नुक्सान हो रहा है .कल से मैं अकेला ही रहूँगा वहां पर

चाची- नहीं बिलकुल नहीं . नुक्सान होता है तो होता रहे . अकेले वहां रहना ठीक नहीं है . जेठ जी कुछ न कुछ हल निकाल लेंगे.

मैं थोडा सा टेढ़ा हुआ तो मेरा तना हुआ लिंग चाची के हाथ को छू गया .

चाची- आज ये इतना गुस्से में क्यों है

मैं- तुम खुद ही क्यों नहीं पूछ लेती इस से

मैंने चाची के हाथ को अपने लंड पर रख दिया. चाची का बदन कांप गया. पर उसने हाथ हटाया नहीं .

मैं- तुमने जो उस दिन किया था मुझे बड़ा करार मिला था

चाची- तब उसकी जरूरत थी अब नहीं है

चाची ने मेरे लंड पर धीरे धीरे अपनी उंगलियों की पकड़ मजबूत की .

मैं- ये सुजन कब तक रहेगी

चाची- पूरी उम्र भी रह जाये तो भी फायदे की बात है

मैं- कैसा फायदा

चाची- बेशर्म सब कुछ जानते हुए भी मुझसे ही कहलवाना चाहता है

मैं- कह क्यों नहीं देती फिर
 
#23

चाची - कहने को है ही क्या भला

मैं- और करने को , करने को तो है न बहुत कुछ

चाची- आज क्या हुआ है तुझे

मैं- मैं तुम्हे वैसे ही देखना चाहता हूँ जैसे की उस दिन देखा था कुवे वाले कमरे में

चाची- मुझे विश्वास है वैसी हालत में तू पहले भी देख चूका होगा मुझे

मैं- नहीं. बस उस दिन ही देखा था और देखता ही रह गया था

चाची- ऐसा क्या देखा था

मैंने अपने हाथ चाची की नितम्बो पर रखे और कहा- इनकी गोलाई और भारी पन को महसूस किया था मैंने. खिड़की से तुम्हारे झूलते उभारो को देखा था . जब चंपा अपने होंठ तुम्हारी चूत से लगाये थी तो मुझे भी प्यास थी उस काम रस को पीने की

चाची- बेशर्म ऐसे सीधे सीधे ही नाम लेता है

मैं- चूत को चूत नहीं कहते तो फिर क्या कहते है तुम ही बताओ न

चाची- मुझे लगता है ब्याह करना पड़ेगा तेरा जल्दी ही

मैं- ब्याह तो आज नहीं कल हो ही जायेगा पर जब तुम कुछ बताओगी ही नहीं तो मैं क्या कर पाउँगा दुनिया कल तुम्हे ही कहेगी की फलानी का भतीजा कुछ कर नहीं पाता

चाची बड़े आराम से मेरे लंड को सहला रही थी .

चाची- भतीजा घाघ है दुनिया जानती है

मैं- थोडा तुम भी जान लो न

मैंने चाची के लहंगे को कमर तक उठा दिया और चाची के चूतडो को सहलाते हुए गांड के छेद तक अपनी उंगलिया पहुंचा दी. चाची मेरी उंगलियों के अहसास से पिघलने लगी.

चाची- कबीर,इस रस्ते पर चलने का अंजाम क्या होगा.

मैं- जब अंजाम पर पहुंचेगे तब फ़िक्र करेंगे मंजिल की अभी तो सफ़र है सामने

मैं खुद इतना उत्तेजित हो चूका था की क्या बताऊ चाची की गांड का छेद का स्पर्श मेरे तन में इतनी मस्ती भर रहा था की मैं पागल ही हो गया था .

"कच्छे से अन्दर हाथ डाल लो चाची " कांपते होंठो से बड़ी मुश्किल से मैंने कहा.

"एक बार फिर सोच ले कबीर, रुकना है तो अभी रुक बाद में अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं रहेगा. " इस बार चाची की आवाज लडखडा रही थी .

मैं- अपनी चाची से प्यार करना कोई गुनाह तो नहीं उसे वो सुख देना जिसके लिए वो तरस रही है . मैं अपनी चाची का ख्याल नहीं रखूँगा तो फिर कौन रखेगा .

"बात सिर्फ इतनी नहीं है की मुझे इस जिस्म को पाना है . उस रात जब मैंने तुमको चंपा के साथ देखा तो उन सिस्कारियो में मैंने उस दुःख को भी महसूस किया चाची जो तुम अपने मन में छिपाए हुए हो. चाचा के जाने का गम जिस को दिन में तो तुम हम सब के साथ रह कर भूल जाती हो पर हर रात , न जाने कितनी रात तुमने अकेले काटी है . उस रात मेरे मन ने महसूस किया तेरे दर्द को चाची. मैं आज इस पल में जानता हूँ मैं आने वाले कल में भी जानूंगा .हर पल. हर घडी. हर दफा ये गलत ही रहेगा चाची -बेटे के बीच जो जिस्मानी रिश्ता होगा पर तेरी मेरी नजर में गलत नहीं होगा. क्योंकि मेरे होते हुए तू दुखी नहीं रहेगी. तू इस घर की रौनक है, मालकिन है . तेरे आँचल की छाया में हम पले है .बचपन में कितनी राते तू जागी ताकि हम आराम से सोये. तेरे अहसानों को तो मैं कभी उतार ही नहीं सकता मंदिर में उस मूर्त के बाद हमारे लिए ममता की मूर्त रही तू. उस रात मैंने तमाम बातो पर गौर किया चाची फिर मैंने ये निर्णय लिया " मैंने चाची से कहा

चाची ने मुझसे कुछ नहीं कहा बस वो मुझसे लिपट गयी . चाची ने अपने होंठो को मेरे होंठो पर लगा दिया और मुझे चूमने लगी. उसके नैनों से गिरते आंसुओ की गर्मी मैंने अपने गालो पर महसूस की. मैंने चाची को अपने ऊपर खींच लिया . और चाची के चूतडो को अपने हाथो में थाम लिया. मैं सच कहता हूँ चाची की गांड बेहद नर्म और गदराई हुई थी बिलकुल रुई के गद्दों जैसी.

जितना उन्हें मसलो और मस्ता जाए ऐसी मस्त गांड . मैंने चाची को पलटा और अपने निचे ले लिया. और उसके चेहरे को बेस्ब्रो की तरह चूमने लगा. चूमते चूमते मैंने चोली को खोल दिया उपर से वो निर्वस्त्र हो चुकी थी मैंने लहंगे को भी हटा दिया. बिस्तर पर एक गदराई घोड़ी आज मचल रही थी मैने चाची की जांघो को फैलाया और चाची की चूत मेरे सामने थी . काले घने बालो के बीच गुलाबी चूत क्या ही कहना चाची की चूत की पंखुड़िया गहरे काले रंग की थी जिन्हें देखते ही दीवाना हो जाये.

मैंने अपनी हथेली चूत पर रखी और मुट्ठी में भर के उसे दबाने लगा.

"स्सीई " चाची के मुख से मादक आवाजे निकलने लगी थी .चूत से बहते पानी ने मेरी हथेली को भिगो दिया था मैंने बीच वाली ऊँगली को अन्दर सरकाया . कसम से मेरे लंड ने ऐसा झटका खाया जैसे चूत को सलामी ही दी हो . धीरे धीरे मैं ऊँगली को अन्दर बाहर करने लगा.

कुछ देर मैं ऐसा ही करता रहा फिर मैंने अपने होंठ वहां लगा दिए और एक चुम्बन लिया. चाची के चूतडो में कम्पन महसूस किया मैंने. अब मैंने मुह खोला और अपनी जीभ से चूत को रगडा .

"आह, कबीर मत कर " चाची ने अपने दोनों हाथो से मेरे सर को थाम लिया मैंने एक बार फिर वैसा ही किया मेरी थोड़ी के बाल चाची की नाजुक चूत से रगड़ खाए तो चाची का रोम रोम कांप गया . अपनी बलिष्ठ भुजाओ का प्रयोग करते हुए मैंने चाची की जांघो को विपरीत दिशा में फैला दिया और चूत को चूसने लगा. पर मैं ये सब थोड़ी देर ही कर पाया क्योंकि चाची ने तभी मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मेरे लंड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर रगड़ने लगी. उफ्फ्फ्फ़ मेरा क्या हाल कर रही थी वो . और फिर वो बोली- अन्दर घुसा इसे.

चाची ने मेरे सुपाडे की खाल को पीछे किया और मैंने थोडा जोर लगाया जैसे ही लंड का अगला हिस्सा चाची की चूत में गया मैं तो जन्नत को ही पा गया . मैंने और जोर लगाया और आधा लंड अन्दर कर दिया .

चाची- कीड़े की वजह से ज्यादा मोटा हो गया है फट गयी मेरी तो .

मैं- कीड़े की वजह से ही तो आज चुद रही हो तुम

मैंने एक धक्का और लगाया और चाची में पूरी तरफ से समा गया . चाची ने मुझे अपनी बाँहों में कैद कर लिया और हमारी चुदाई शुरू हो गयी . गुलाबी होंठो का रस पीते हुए मैंने चाची को वो सुख देने का प्रयास किया जिस पर उका हक़ बनता था . बहुत मजे से मैंने उन होंठो का रस पिया . अपने चूतडो को ऊपर निचे उठाते हुए चाची चुदाई में मेरा भरपूर सुख दे रही थी .

जब वो झड़ी तो ऐसे झड़ी की रेगिस्तान की मिटटी पर किसी ने जी भर के मेघ बरसा दिए हो. चादर ऐसी गीली हुई की मूत ही दिया हो . चाची की चूत से टपकते काम रस ने मेरी जांघो तक को भिगो दिया. आसमान में उड़ना क्या होता है मैंने चाची पर चढ़ कर जाना था उस रात को .

काम वासना की तरंग ने जब गरम जिस्मो को ताल दी तो चुदाई महक ही जानी थी . ऐसा नहीं था की मैंने हस्तमैथुन नहीं किया था पर चुदाई का मजा क्या होता है ये मैंने आज ही जाना था . चरम पर पहुँच कर मैंने अपना लंड बाहर खींचा और चाची के पेट पर वीर्य की पिचकारियो को गिरा दिया.

उस रात दो बार हम एक हुए .सुबह जब आँख खुली तो देखा की मैं नंगा ही बिस्तर पर पड़ा था . मैंने कपडे पहने और बाहर आ गया. घडी में सात बज रहे थे . बाहर आकर मैंने हाथ मुह धोया और घुमने निकल गया. करीब डेढ़-दो बजे मैं वापिस आया तो मंगू और उसका बाप पिताजी से कुछ बात कर रहे थे तो मैं भी शामिल हो गया .

मैं- क्या बात चल रही है मुझे भी बताओ जरा.

मंगू- चंपा के रिश्ते के लिए आज वो लोग आ रहे है

मैं- और तू अब बता रहा है ये मुझे.

मंगू- मूझे भी अभी अभी ही मालूम हुआ.

तभी बाहर से कुछ आवाजे आये गाँव का हलवाई अपना साजो सामान लेकर आ गया था .

पिताजी ने सब परिवार को इकट्ठा किया और बोले- चंपा केवल राम सिंह की ही नहीं बल्कि इस घर की भी बेटी है . राम सिंह के घर से जायदा तो उसने यहाँ इस घर में समय बिताया है . इस घर में हमेशा से चार बच्चे थे . अभिमानु, कबीर, मंगू और चंपा. हमने अपनी बेटी के लिए एक योग्य लड़का देखा है जो आज अपने परिवार संग यहाँ आ रहे है सब ठीक रहा तो बात आगे बढाई जाएगी.

रामसिंह काका ने पिताजी के आगे हाथ जोड़ दिए और बोला- राय साहब हम मामूली किसान है , आपने जो भी फैसला किया है चंपा के लिए बढ़िया ही होगा पर जैसा आपने बताया लड़का बैंक में चपरासी है . हम कहाँ उसकी हसियत को पकड़ पाएंगे.

पिताजी- रामसिंह तुमने सुना नहीं शायद चंपा हमारी भी बेटी ही है . मेहमानों के स्वागत में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. हलवाई जल्दी से अपना जांचा जनचाओ और मिठाई बनानी शुरू करो. लडको तुम भी काम में हाथ बंटाओ. दोपहर बाद का समय निर्धारित किया है मेहमानों के आने का .

मैं और मंगू तुरंत बैठक की सफाई करने लगे. सारे परदे नए लगाये. तकिये लिहाफ बिस्तर सब सलीके से किये गए. बस इंतज़ार था तो आने वालो का ......................
 
#24

जिस ज़माने में माँ-बाप ही रिश्ते कर देते थे पिताजी ने पहल की थी की पहले लड़का-लड़की एक दुसरे को देख कर पसंद कर ले तो ही बाकि की बाते आगे बढाई जाएगी. हलवाई के पास बैठे मैं इस इन्सान के बारे सोच रहा था की क्या है इसके मन में. ये वही इन्सान है जिसके लाली वाले मामले में रुडियो की बेडियो में पाँव जकड गए थे . और आज ये नयी रीत चला रहा था. वो राय साहब जिसके एक इशारे पर आस पास के कई गाँवो का जीवन रुक जाता और बढ़ जाता था वो राय साहब उस दिन पंचायत में दो लोगो की जान नहीं बचा सका . मैं बेशक मिठाइयो के पास बैठा था पर मेरे मन में कड़वाहट भर गयी.

पर अभी इस कड़वाहट को मन में ही दबा लेना सही था क्योंकि चंपा की ख़ुशी में कोई रंग में भंग पड़े वो भी मेरी वजह से ये तो बहुत गलत होगा.

"देवर जी , तुम भी तैयार हो जाओ " भाभी ने मुझे बुलाया

मैं- अपना क्या है भाभी , कपडे ही तो बदलने है

भाभी- मैंने कपडे रख दिए है तुम्हारे जब जी करे पहन लेना.

सबकी निगाहों को बेसब्री से इंतज़ार था मेहमानों का. और जब घोडा गाड़ी दरवाजे पर आकर रुकी तो दिल झूम गया . वो कुल पांच लोग थे . लड़का, उसके माँ बाप और दो उस लड़के के जीजा. सब लोगो का खूब आदर-सत्कार किया गया . नाश्ते पानी के बाद चंपा कोचाची और भाभी लेकर आई. और उस दिन मैंने पहली बार गौर किया की चंपा किस हद तक खूबसूरत थी. क्यों वो कहती थी की गाँव के तमाम लड़के उसके दीवाने थे. गुलाबी साडी में उसका गोरा रंग . दूध में किसी ने जैसे गुलाब घोल दिया हो . उसके हाथो में हरी चुडिया . माथे पर मांग-टीका . कसम से नजर हटी ही नहीं उस मरजानी के चेहरे से.

लड़का जिसका नाम शेखर था वो भी गबरू जवान था . उसके हाथो की सख्ती बता रही थी की कसरत का शौक रहा होगा उसे और फिर अपने गाँव में वो पहला था जिसने सरकारी नौकरी प्राप्त की थी . उस ज़माने में ये एक ख्वाब ही था. चंपा के भाग ही खुल जाने थे . हम सब दिल से खुश थे उसके लिए.

पहली नजर में ही चंपा भा गयी उन लोगो को . लड़के की माँ ने शगुन में कंगन और कुछ आभूषण देकर चंपा के सर पर हाथ रख दिया. रिश्ता पक्का होते ही मंगल गीत शुरू गए.

मैंने इशारे से चंपा से पूछा- लड़का पसंद है .

उसने हाँ में सर हिलाया . हम सब बहुत खुश थे . सगाई की रस्म के बाद उनलोगों ने वापिस जाने की बात की क्योंकि अँधेरा घिरने लगा था . तभी भैया ने पिताजी के कान में कुछ कहा

पिताजी- मेरी आप सब से गुजारिश है की आप लोग आज हमारी मेहमाननवाजी का लुत्फ़ ले और सुबह आपके वापिस लौटने की व्यवस्था की जाएगी.

शेखर- राय साहब , कच्ची रिश्तेदारी में ऐसे रुकना थोडा अच्छा नहीं है

पिताजी- हम तुम्हारी बात समझते है शेखर बाबु, बरसों बाद ये ख़ुशी की घड़ी आई है आप हमारी विनती समझे और आज हमारे मेहमान बने.

अब राय साहब की बात को भला कौन मना करे. पर मेरे मन में था की क्यों रोका गया है इन्हें, बाद में मुझे मालूम हुआ की चूँकि इन्हें लौटने में रात हो जाती और जंगल से गुजरना होता . सुरक्षा की दृष्टि से भैया ने ये निर्णय लिया था की इनकी वापसी सुबह ही हो. मैंने भैया की हाँ में हाँ मिलाई . फिर मैं चंपा के पास गया .

चंपा- तेरा पत्ता कट गया कबीर.

मैं- पर मुझे ख़ुशी है और बिश्वास की भी शेखर बाबु तुझे बहुत प्यार करेंगे . ज़माने भर की खुशिया तेरे दामन में भर देंगे . जब तू यहाँ आकर अपनी ससुराल के किस्से सुनाया करेगी तो हमें कितनी ख़ुशी होगी तू नहीं जानती चंपा.

चंपा ने अपना सर मेरे काँधे पर रखा और बोली- तू इतना सरल क्यों है कबीर .

मैं- जो है तेरे सामने ही है . वैसे तू शेखर बाबु के सामने अब मत जाना

चंपा- क्यों भला

मैं- तेरे हुस्न में खो गया है वो मौका लगा तो शादी से पहले ही रगड़ देगा तुझे.

चम्पा हंस पड़ी और बोली- ये मौका तेरे पास भी तो था

मैं- मेरी बात और है

फिर भाभी के आ जाने से हमारी बाते बंद हो गयी . शेखर बाबु के सत्कार में मैंने और मंगू ने कोई कमी नहीं रखी. जब वो लोग सो गए तो मैं और मंगू भी खाना खाने बैठ गए. हमने दबा के बर्फियो पर हाथ साफ किया.

मंगू- कुंवर. बड़े भाई ने बोतल खोल रखी है .अपन भी दो घूँट ले लेटे तो

मैं- पागल हुआ है क्या भैया नाराज होंगे .

मंगू- भुने हुए काजू की तश्तरी तो ले ही सकते है न . याद ही नहीं कब खाए थे .

मैं- हाँ ये सही है चल फिर .

हम लोग भैया के कमरे में गए . भैया ने मेज पर पूरी महफ़िल लगा रखी थी . हम दोनों जाकर कालीन पर बैठ गए .

भैया- अरे उधर क्यों बैठे हो ऊपर आओ . ठंडा है फर्श

मैं- नहीं भैया इधर ही ठीक है .

भाई- तुम्हारी मर्जी

भैया ने गिलास को होंठो से लगाया और कुछ घूँट भरे फिर हमारी तरफ देख कर बोले- क्या

मंगू- भैया, थोड़े काजू मिल जाते

भैया-बस इतनी सी बात, इसमें सकुचाने की क्या बात है . ले लो जितने चाहिए तुम लोग भी न छोटी छोटी बातो के लिए परमिशन लेते रहते हो .

भैया ने तश्तरी हमारी तरफ की तो हमने अपनी अपनी मुट्ठी भर ली . पर हम उठे नहीं वहां से काजू खाते रहे बैठे बैठे. भैया ने खाली गिलास को फिर से भरा और हमारी तरफ देख कर बोले- क्या. चलो अब

मंगू- भैया

भैया- क्या हुआ और काजू चाहिए क्या . एक काम करो तुम तश्तरी ही ले जाओ

मंगू- भैया काजू नहीं चाहिए

भैया- क्या चाहिए फिर

मैं- भैया ठण्ड बहुत है हमें भी दो दो ढक्कन मिल जाते तो थोड़ी गर्मी सी हो जाती .

भैया- नहीं बिलकुल नहीं

मैं- भैया दवाई है , जुकाम ठीक हो जायेगा भैया बस दो ढक्कन

भैया- पिताजी को मालूम होगा न तो तुम्हारे साथ मुझे भी मार पड़ेगी. याद हैं न पिछली बार भी दो ढक्कन बोल कर बोतल ही गायब कर दी थी तुमने .

मंगू- भैया काजू सूखे सूखे कैसे उतरेंगे गले के निचे

भैया- ठीक है पर एक एक पेग ही मिलेगा

हमने हाँ में गर्दन हिलाई और अपने अपने गिलास आगे कर दिए. इच्छा तो हमारी और भी थी पर चूँकि पिताजी घर पर थे तो भैया ने सिर्फ एक पेग ही दिया. बहुत रात तक हम लोग बाते करते रहे हंसी मजाक करते रहे . भैया को हमने बातो में पिघला कर और गिलास भरवा लिए. फिर जब हम दोनों निचे आये तो देखा की हलवाई के कुछ लोग अभी भी सामान जमा कर रहे थे .

मैं- अरे तुम लोग गए नहीं अभी तक.

कारीगर- कुवर. तक़रीबन लोग तो चले गए. मुझे याद आया की कल पडोसी गाँव में हमारा काम है तो ये बड़ी कडाही पहुंचानी है बस ये लेने ही मैं बापिस आया था . तुम इसे लदवा दो

मैं- कोई बात नहीं . तुमने आज बहुत बढ़िया काम किया था मैं इस कडाही को लेकर तुम्हारे साथ चलूँगा.

नशे के मारे मेरा सुरूर बन गया था .

कारीगर- नहीं कुंवर मैं चला जाऊंगा

मैं- अरे नहीं यार. मैं भी चलूँगा तुम्हारे साथ . मैंने कढाई और थोड़े उसके सामान को बैल गाडी में लादा और उसके साथ बैठ गया .एक तो ठण्ड जबर ऊपर से देसी दारू का सुरूर . बैलो को हांकते हुए हम लोग गाँव से बाहर की तरफ निकल गए. कच्चे रस्ते पर बैलो के गले में लटकी घंटिया जब बजती तो क्या ही कहना . हम लोग थोड़ी दूर और आगे पहुंचे ही थे की सड़क के बीचो-बीच कोई खड़ा था .

मैं- अरे भाई , रस्ते से हट जा .

पर वो टस से मस नहीं हुआ .

मैं- ओ भाई , हट न यार. तुझे भी चलना है तो बैठ जा गाड़ी में

पर उसने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं .एक तो मैं नशे में था ऊपर से हवा की वजह से मैं झूम रहा था .

मै गाड़ी से उतरा और उसके पास गया - रे बहनचोद , सुन न रही क्या तुझे. कुंवर कबीर तुझे हटने को कह रहा है तू भोसड़ी के अफसर बन रहा है हट बहन के लंड

मैंने उसे धक्का दिया . वो मेरी तरफ पलटा . जब वो मेरी तरफ पलटा तो .................................

 
#25

होश आया तो बदन दर्द से टूट रहा था . छाती पर बैलगाड़ी का पहिया पड़ा हुआ था . उसे हटाया , सर अभी भी घूम रहा था . गाडी के पहियों में लगने वाली लोहे की शाफ्ट का कुछ हिस्सा मेरी जांघ में घुसा हुआ था . दोनों बैलो के विक्षत शव जिन्हें बुरी तरफ से चीर-फाड़ा गया था मेरे पास ही पड़े थे. पहिये को हटाना चाहा तो हाथ से ताकत लगी ही नहीं दर्द हुआ सो अलग पाया की कंधे पर एक गहरा जख्म था मांस उखाड़ा गया था वहां का .

मैंने आँखे बंद कर ली और पड़े पड़े ही रात को क्या हुआ याद करने की कोशिश की पर याद आये ही नहीं . जैसे तैसे मैंने पहिये को हटाया और जांघ से वो लोहे का टुकड़ा निकाला. रक्त की मोटी धारा बह रही थी मिटटी और कपडा लगा कर मैंने खून को बहने से रोकने की कोशिश की .

उसी शाफ़्ट को पकड़ कर मैं खड़ा हुआ . मैंने देखा थोड़ी दूर वो कडाही उलटी पड़ी थी तब मुझे याद आया की कारीगर भी था मेरे साथ और अब वो दूर दूर तक नहीं दिख रहा था .

"कारीगर, कारीगर " मैंने दो तीन बार आवाज लगाई पर कोई जवाब नहीं आया. मेरा दिल अनिष्ट की आशंका से घबराने लगा. एक बार फिर परिस्तिथिया ऐसी थी की मैं ही गुनेहगार माना जाता और इस बार तो बचाव में भी कुछ नहीं था . शाफ़्ट का सहारा लिए लिए मैं वैध जी के घर तक बड़ी मुश्किल से पहुँच गया.

"कुंवर क्या हुआ तुम्हे " वैध ने मुझे घर के अन्दर लिया और पूछा मुझसे

मैं- पता नहीं क्या हुआ है वैध जी , आप मेरे भैया तक सुचना पहुंचा दीजिये

वैध- जरुर पर पहले मैं निरिक्षण कर लू . मरहम पट्टी कर दू.

जांघ पर टाँके लगा दिए थे पर जब वैध काँधे को देख रहा था तो उसकी आँखों में दहशत देखि मैंने.

वैध- किस जानवर से पाला पड़ा था कुंवर शिकार करते समय

मैं- मालूम नहीं वैध जी. पर इतना जरुर है की जानवर नहीं था हमला करने वाला

वैध- यहाँ पर टाँके भी काम नहीं आयेंगे . ऐसे ही भरने देना होगा इस जख्म को मरहम पट्टी के सहारे ही .

पीठ में एक बड़ी कील भी थी उसे भी वैध ने निकाला और बोला- तुम कहते हो याद नहीं है हालत देख कर लगता है की संघर्ष खूब हुआ है .

वैध क्या कह रहा था मुझे सुनाई ही नहीं दे रहा था . मैं इस बात से घबराया था की अगर ये हमलावर वो ही था जिसने हरिया और बाकी लोगो का शिकार किया था तो क्या मेरी हालत भी वैसी ही हो जाएगी. क्या मेरे पास भी अब सिमित समय ही रह गया है .

"कबीर, मेरे भाई " भैया आन पहुंचे थे .

भैया- कबीर क्या हुआ तुझे . किसने किया ये . नाम बता मुझे उसका . मेरे भाई की तरफ आँख उठाने की किसकी हिम्मत हो गयी मैं आग लगा दूंगा उसको. उन हाथो को उखाड़ दूंगा जिन हाथो ने मेरे भाई को छूने की हिमाकत की है .

जीवन में पहली बार मैंने भैया को क्रोध में देखा था . भैया ने मुझे अपने सीने से लगाया . उनकी आँखों से बहते आंसू मेरे सीने पर गिरने लगे.

मैं- कुछ नहीं हुआ है भैया मामूली ज़ख्म है

भैया- मामूली जख्म भी मेरे रहते कैसे लग जायेंगे मेरे भाई को . तू बस इतना बता की क्या हुआ कौन लोग थे वो .

मैं- मुझे कुछ याद नहीं है भैया. जब होश आया तो मैं घायल था बस ये ही याद है .

शाम तक घर घर तक ये खबर पहुंच गयी थी की राय साहब के लड़के पर हमला हुआ है .सब लोग मेरे आगे पीछे फिर गए थे पर तमाम बातो के बीच कोई उस कारीगर की बात नहीं कर रहा था. जैसे की किसी को फ़िक्र ही नहीं थी की वो था या नहीं था . और मैं सब जानते हुए भी उसका जिक्र नहीं कर पा रहा था . इतना बेबस मैंने खुद को कभी नहीं पाया था .

पिताजी की आंखो में मैंने पहली बार नमी देखि थी उस दिन . चाची तो बेहोश ही हो गयी थी ये खबर सुन कर. भाभी मेरे पास ही बैठी रही .

पिताजी- हमारे लाख मना करने के बावजूद भी घर से बाहर जाने की क्या मज़बूरी थी . जिसके लिए तुम अपनी जान की परवाह भी नहीं करते हो

मैं- गलती हो गयी पिताजी

पिताजी- तुम तो गलती कह कर पल्ला झाड लोगे कबीर, अगर तुम्हे कुछ भी हो जाता तो हम पर क्या बीतती एक पल सोच कर देखो. इस बूढ़े आदमी की हिम्मत की परीक्षा मत लो बेटे, इस बूढ़े में इतनी हिम्मत नहीं है की जवान बेटे की अर्थी को कंधा दे सके. अवश्य ही कोई पुन्य था जो आड़े आ गया वर्ना मारने वाले ने कमी थोड़ी न छोड़ी थी.

भाई- पिताजी मैं जल्दी ही पता कर लूँगा की कौन लोग थे इसके पीछे

पिताजी- मेरे बेटे पर हमला करने की गुस्ताखी करने वाले की हिम्मत की दाद देनी होगी पर सवाल ये है की आखिर किस की हमसे दुश्मनी हो सकती है कौन ऐसा सांप पैदा हो गया .

भाई- कुचल देंगे उस सांप को पिताजी .

मैं- आप लोग यु ही बात को बड़ी कर रहे है , कोई जानवर ही रहा होगा.

भाई- तुम चुप रहो फिलहाल

उनके जाने के बाद मैंने वैध से पूछा की घर कब जा सकता हूँ.

वैध- मुझे थोड़ी तस्सली हो जाये उसके बाद

मैं- कैसी तस्सली

वैध- तुम जानते हो

मैं समझ गया वैध देखना चाहता था की मुझमे भी बाकि लोगो जैसे लक्षण आते है या नहीं .

एक पूरी रात वैध की निगरानी में रहने के बाद मैं घर आ गया.

भाभी- जी तो करता है की मैं बहुत मारू तुमको. हमारे लाड-प्यार का आखिर कितना नाजायज फायदा उठाओगे तुम .

मैंने कुछ नहीं बोला

भाभी- अब क्यों गूंगे बने हुए हो देख लिए न मनमर्जी करने का नतीजा . घर में मेहमान आये थे पर बेगैरत को क्या पड़ी थी इनको तो चस्का लगा था उसी लड़की के पास मुह मारने गए थे न

मैं- ऐसा कुछ नहीं था भाभी . मैंने गलती मान तो ली न

भाभी- हर बार का यही नाटक है , बस गलती मान लो.

भैया- बस भी करो अब , इसे आराम करने दो

भाभी- हाँ मैं कौन होती हूँ इन्हें कुछ कहने वाली.

मैं- भाभी माफ़ी दे भी दो

भाभी- तुम्हे कुछ हो जाता तो हमारा क्या होता सोचा तुमने

भाभी ने मुझे सीने से लगाया और रोने लगी . एक मैं था जिसके लिए सारा परिवार इधर उधर भाग रहा था एक बेचारा वो कारीगर था जिसका कोई जिक्र ही नहीं था . उस लम्हे में मुझे खुद से नफरत हो गयी .
 
अंततः चाची ही वो प्रथम महिला बनी जिसके संग कबीर ने संभोग सुख प्राप्त किया। इस दौरान दोनों के मध्य हुई वार्ता ने ना केवल चाची के भीतर छिपे कबीर के प्रति प्रेम को उजागर किया अपितु कबीर की भी एक नई तस्वीर सामने रखी। कबीर का चाची के साथ इस हद तक आगे बढ़ना, केवल आकर्षण ही इसका कारण नहीं था। बल्कि, जो कुछ उसने चाची को आज तक सहते देखा था उसके कारण कबीर ने ये कदम उठाया। जैसा कि कबीर ने कहा ही, अपने पति की मृत्यु के बाद चाची की मनोदशा निश्चित ही दयनीय रही होगी, उसके बावजूद उन्होंने सदैव कबीर को प्रेम दिया, और शायद कभी भी उसे मां के प्यार से वंचित नहीं रहने दिया, शायद यही एक रास्ता था जिससे कबीर उनके कष्ट कुछ कम कर सकता था।

कबीर ने भले ही मंज़िल और सफर का तर्क देकर चाची की बात को टाल दिया था पर ये सत्य है कि एक ना एक दिन इस रिश्ते के परिणाम उन्हें अपने सामने अवश्य मिलेंगे। अब ये नियति के हाथ में है कि एक सुखद और कुशल परिवार के रूप में अच्छे नतीजे मिलेंगे, या फिर...

खैर, अब चम्पा के लिए भी रिश्ता आ गया है। पहले ही उसने तो कबीर को चेताया था की कभी भी वो पराई हो जायेगी। परंतु, शायद कबीर ही कभी भी वो सीमा ना लांघ पाया जो उसकी दोस्ती को खराब कर देती। कबीर के निर्णय को गलत ठहराना मूर्खता होगी, परंतु मैं जिज्ञासु हूं जानने के लिए कि कबीर क्या महसूस करता है चम्पा के लिए? उसे गुलाबी साड़ी में देखकर जो कबीर ने सोचा, और चम्पा जब भी नजदीकी की पहल करती थी, उसपर कबीर की प्रतिक्रियाएं.. ऐसा नहीं था कि कबीर के अंदर कोई अलग भावना नहीं थी चम्पा के लिए।

बस मंगू की दोस्ती के चलते कबीर उन्हें उजागर नहीं कर पाया। चाची के साथ उसे देखने के बाद वैसे भी अच्छा खासा बदलाव भी आया था कबीर की सोच में। अब देखना ये है कि कबीर, जैसा वो दिखा रहा है कि वो बेहद प्रसन्न है चम्पा के विवाह से, क्या वो सत्य है, या फिर एक टीस उठ रही है उसके दिल में जिसे चम्पा की बेहतरी के लिए वो छुपाए बैठा है... देखना ये भी रोचक रहने वाला है कि क्या चम्पा अपनी नियति को स्वीकार करेगी? क्योंकि अब तक की सभी घटनाओं का मेरे मुताबिक यही सार निकलता है की चम्पा की भावनाएं कबीर के प्रति केवल आकर्षण ही थी, ऐसे में शायद दोनों कामयाब हो जाएं अपने रिश्ते को दोस्ती तक ही सीमित रखने में।

शेखर का रिश्ता चम्पा के लिए हर तरीके से अच्छा है। क्योंकि कबीर से चम्पा का विवाह, मुझे नहीं लगता कभी भी, किसी भी सूरत में ये संभव हो पाता। ऐसे में उसे एक सुंदर भविष्य मिल रहा है, और शेखर भी अच्छा लड़का ही प्रतीत हुआ है, बाकी देखते हैं कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है। बहरहाल, सत्य मैं राय साहब भी घटना और स्थान के मुताबिक अपने कायदे बदल ही लेते हैं। एक लाली वाला मामला और एक चम्पा वाला...

प्रतीत होता है की उस कारीगर का भी काम तमाम हो चुका है। लगता यही है कि उसी नरभक्षी जीव ने कबीर पर हमला किया था, पर ये भी एक सवाल है की कबीर को कुछ याद क्यों नहीं? क्या उसके सर पर भी चोट आई है, यदि हां, तो संभव है की वो कुछ समय की घटना को स्मरण ना कर पा रहा हो। एक बात तो स्पष्ट है कि वो जीव, कबीर को मारना नहीं चाहता। परंतु, ये कहना गलत होगा की वो कबीर को तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता, क्योंकि अच्छी खासी चोटें आईं हैं कबीर को।

मेरे ख्याल में हुआ कुछ यूं होगा कि जब कबीर ने उस व्यक्ति को पुकारा तो उसने उस कारीगर पर हमला कर दिया होगा (ये मानकर चलते हैं कि उसकी रक्त पिपासा कबीर से जुड़ी नहीं है), तब शायद उस कारीगर को बचाने के लिए कबीर उससे भीड़ गया। फलस्वरूप, दोनों के मध्य हाथापाई हुआ जिसका नतीजा हमारे सामने है। वैद ने भी यही कहा था कि बड़े संघर्ष के निशान दिखाई पड़ रहे थे कबीर के शरीर पर। निशा ने कहा था कि 15 दिन तक वो नही मिलेगी, पर मुझे लगता है कि शायद जल्दी ही उससे भेंट होने वाली है कबीर की...

कारीगर पर किसी का भी ध्यान नहीं गया और ये बात कबीर को कचोट रही है। पर यही शायद समाज का सत्य है, जो स्वीकार करना ही पड़ता है। खैर, अब इस घटना से एक बात तो साफ हो गई कि राय साहब भी बहुत प्यार करते हैं अपने बेटे से पर किसी भी पारंपरिक हिंदुस्तानी पिता की ही तरह नारियल समान हैं। हृदय से प्रेम से भरे हुए और ऊपरी आवरण सख्त। अभिमानु के साथ तो कबीर के प्रेम पर किसी को संदेह हो ही नहीं सकता।

अब सवाल यही है कि आखिर वो जीव है कौन? क्या मकसद है उसका? कबीर से क्या सरोकार है उसका और क्या कारण है कि वो कबीर की जान बारंबार बख्श दे रहा है। रहस्य गहराता जा रहा है और लगता नहीं की जल्दी कबीर को कोई मार्ग मिलने वाला है।

सभी भाग बहुत ही खूबसूरत थे भाई। चाची संग कबीर के प्रेम मिलाप का अच्छा वर्णन किया आपने, अच्छा लगा देख कर की कबीर आकर्षण से ऊपर उठकर चाची की प्रसन्नता के बारे में विचार करता है। रहस्य भी बराबर बना हुआ है कहनी में को रोचकता को बढ़ाता जा रहा है।

अगली कड़ी की प्रतीक्षा में...
 
#26

मुझे फ़िक्र थी तो उस कारीगर की जिसकी कोई चर्चा नहीं थी. सुबह मैं लंगड़ाते हुए ही गाँव का चक्कर लगा आया पर सब वैसा ही था जैसा की रोज होता था . जांघ की चोट के दर्द के बावजूद मैं उस स्थान पर गया जहाँ उस रात वो घटना हुई थी . बैलो के शरीर में जो कुछ बचा था उसे जानवरों ने फफेड लिया था टूटी गाडी चीख कर कह रही थी की उस रात कुछ तो हुआ था यहाँ पर क्या हुआ था ये मुझे याद नहीं आ रहा था.

कोई तो मिले. कोई तो बताये की ये साला मामला क्या था. गाँव में इस से पहले तो ये सब कभी नहीं हुआ था . क्या हुआ जो कभी दो चार साल में किसी के पशु को जंगली जानवरों ने हमला कर दिया हो पर इंसानों के साथ बहुत कम ऐसी वारदाते हुई थी और अब रुक ही नहीं रही थी .

वापिस आकर मैं चाची के पास बैठ गया .

चाची- घायल है फिर भी चैन नहीं है तुमको

मैं- हाथ पैर जुड़ न जाये इसलिए थोडा टहलने गया था बस वैसे भी इतनी गहरी चोटे नहीं है. और फिर तुम हो न पास मेरे . तुम जब अपने लबो का रस मुझे पिलाओगी तो फिर मैं देखना कैसे ठीक हो जाऊंगा.

चाची ने मेरी बात सुनकर इधर उधर देखा और बोली- ये सब बाते तभी करना जब हम दोनों अकेले हो . दीवारों के भी कान होते है .

मैं- हाँ पर बोलो न रस पिलाओगी न

चाची- हाँ बाबा हाँ

मैं- और निचे के होंठो का

मेरी बात सुनकर चाची का चेहरा शर्म से लाल हो गया .

चाची- धत बेशर्म

मैं- बोलो न तुम्हे मेरी कसम

चाची- तुझे जो भी पीना है पी लेना बस

मैं- ऐसे नहीं वैसे बोलो जैसे मैं सुनना चाहता हूँ

चाची- मौका लगते ही मेरी चूत का रस पी लेना

जब चाची ने ऐसा कहा तो उनके होंठो की कंपकंपाहट ने बता दिया की टांगो के बीच में कुछ गीला हो चला है .

मैं- चाची आपको क्या लगता है गाँव वालो पर कौन हमले कर रहा है

चाची- अभिमानु ने दिन रात एक कर दिया है उसे पकड़ने को . जब से तुम पर हमला हुआ है वो एक पल को भी चैन नहीं लिया है . राय साहब ने भी रातो को गश्त बढ़ा दी है . गाँव में अफवाहे अलग ही है .

मैं- गाँव वाले तो चुतिया है

चाची- पर हम लोग तो नहीं है न गाँव को आग लग जाये हमें फर्क नहीं पड़ता पर तुमको आंच भी आई तो हमें बहुत फर्क पड़ेगा.

मैं- कोई सुराग भी तो नहीं लग रहा है . ऊपर से पिताजी ने सख्त कहा है की रात को बाहर नहीं निकलना तुम ही बताओ मैं क्या करू

चाची- तुम्हे कुछ करने की जरुरत नहीं है अभिमानु और जेठ जी देख लेंगे इस मामले को . आज तक गाँव की हर समस्या को जेठ जी ने सुलझाया है इसे भी सुलझा लेंगे. एक वो न लायक मंगू कहाँ रह गया , उस से कहा था की दो मुर्गे ले आना

मैं- आ जायेगा थोड़ी बहुत देर में उलझ गया होगा किसी काम से .

काम से मुझे याद आया खेतो का .

मैं- चाची अब खेतो पर मैं अकेला ही रहूँगा . इन हालातो में मजदुर वहां रुकना नहीं चाहते जो की जायज भी है

चाची- भाड़ में गयी खेती तुझे अकेले जाने दूंगी तूने सोचा भी कैसे.

मैं- नुकसान बहुत होगा.

चाची- तो फिर मैं भी तेरे साथ ही चलूंगी

मैं- यहाँ तुम्हे आराम है

चाची- वहां भी आराम ही रहेगा. वैसे भी जेठ जी ने तुम्हारी जिम्मेदारी मुझे दी हुई है. जब तुम ठीक हो जाओगे तो फिर हम चलेंगे वहां

तभी मंगू आ गया.

चाची- कहाँ रह गया था रे तू

मंगू- मुर्गा पकड़ा. काटा साफ़ किया समय तो लगे ही .

चाची- हाँ समय की कीमत तू ही जाने है बस .

चाची मुर्गा लेकर अन्दर चली गयी . रह गए हम दोनों

मंगू- भाई, तू ये सब मत कर. मैं जानता हूँ तेरे दिल में गाँव वालो के लिए फ़िक्र है पर इन मादरचोदो के लिए अपनी जान को दांव पर लगाना कहाँ की बहादुरी है . मैं वैध के दरवाजे पर ही बैठा रहा अन्दर आने की हिम्मत ही न हुई मेरी . तुझे कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा.

मैं- कुछ नहीं होगा मंगू सब ठीक है

मंगू- पर ऐसा क्या है जो रातो को ही निकलना जरुरी है

मैं- मुझे भी नहीं मालूम पर जब मालूम होगा तो सब से पहले तुझे बताऊंगा. सुन रात को खाना साथ ही खायेंगे

मंगू- नहीं भाई, घर पर भी एक मुर्गा दे आया हूँ

मैं- मौज है फिर तो .

तभी मैंने सामने से भाभी को आते देखा

भाभी- क्या खुराफात कर रहे हो दोनों

मंगू- कुछ नहीं भाभी सा , बस ऐसे ही बाते चल रही थी .

भाभी- अगर मुझे मालूम हुआ की घर से बाहर रात को जाने की कोई भी योजना है तो दोनों की खाल उधेड़ दूंगी.

मैं- भाभी आप जब चाहे चेक कर लेना यही सोता हुआ मिलूँगा आपको

भाभी- बेहतर रहेगा. चाची कहाँ है

मैं - अन्दर है

भाभी के जाने के बाद मैं मंगू से मुखातिब हुआ और उसके आगे कारीगर का जिक्र किया .

मंगू- भाई, उसका कोई पक्का ठिकाना नहीं है , परिवार है या नहीं कोई नहीं जानता हलवाई के पास काफी समय से काम कर रहा था और एक नुम्बर का दारुबाज है . चला गया होगा कहीं दारू के चक्कर में .

मैं- वो चाहे जैसा भी हो वो अपने घर काम करने आया था उसकी सुरक्षा अपनी जिमेदारी थी मेरे भाई .

मंगू- थी तो सही पर अब कहाँ तलाश करे उसकी .

मैंने मंगू की पीठ पर धौल जमाई तो वो कराह उठा .

मैं- क्या हुआ

मंगू- कुछ नहीं बड़े भैया के साथ अखाड़े गया था . उन्होंने उठा कर पटक दिया तो दर्द सा हो रहा है . भैया इतनी कसरत कर कर के कतई पहाड़ हो रखे है .

मैं- हाँ यार, मुझे भी ऐसे लगा था पहले तो मैं कई बार उनको पछाड़ देता था पर अब तो वो काबू में ही नहीं आ रहे.

मंगू- मैंने तो सोच लिया है बड़े भैया का आशीर्वाद लेकर दुगुनी कसरत करूँगा.

मैं- भैया में और अपने में फर्क है मेरे दोस्त. भैया सेठ व्यापारी आदमी है अपन है किसान . अपन तो खेती में ही टूट लेते है तू बता भैया कब जाते है खेतो में .

मंगू- बात तो सही है पर ताकत तो बढ़ानी ही है

मैं- सो तो है

फिर मंगू वापिस चला गया . करने को कुछ खास था नहीं तो खाना खाने के बाद मैंने बिस्तर पकड़ लिया . बेशक मैं चाची की लेना चाहता था पर चाची चाहती थी की थोडा ठीक होने के बाद ही किया जाये. चाची के गर्म बदन को बाँहों में लिए मैं गहरी नींद में सोया पड़ा की जानवरों की आवाजो से मेरी नींद उचट गयी . कानो में सियारों के रोने की आवाज आ रही थी .

"गाँव में सियार " मैंने अपने आप से कहा और बिस्तर से उठ कर बाहर आया . मैंने दरवाजा बंद किया और लालटेन को रोशन किया. रौशनी की उस लहर में मेरी नींद से भरी आँखों ने गली के बीचो बीच जो देखा बस देखता ही रह गया ...................
 
#27

गली के बीचो बीच एक सियार खड़ा था जो मुझे देखते ही उच्छल कर चबूतरे पर चढ़ गया और मेरे पास आकर बैठ गया . अपने पंजो को बार बार धरती पर रगड़ कर वो कुछ इशारा सा कर रहा था और फिर वो गली में आगे की तरफ चला गया मैंने लाठी का सहारा लिया और उसके पीछे पीछे हो लिया . जल्दी ही मैं एक बार फिर से गाँव के बाहर उस रस्ते पर था जो जंगल की तरफ जाता था . मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था . सियार न जाने कहाँ गायब हो गया था . चलते चलते एक बार फिर मैं उस जगह पर था जहाँ से ये सब शुरू हुआ था .

"कबीर " अंधेरो में से किसी ने मेरा नाम पुकारा और मैंने तुरंत ही इस आवाज को पहचान लिया .

"निशा , कहा हो तुम " मैंने जवाब दिया

निशा- तुम्हारे पास ही हूँ.

अचानक से ही वो मेरे सामने आ गयी .

निशा- कैसे हो तुम

मैं- बढ़िया तुम्हे देख कर और बढ़िया

निशा मुस्कुराई .

मैं- ऐसा लग रहा है जैसे मुद्दतो बाद मिले है

निशा- मुद्दतो बाद ही तो मिल रहे है .कोशिश तो थी की पन्द्रह दिन बाद ही मुलाकात होती पर देखो एक बार फिर हम यहाँ है .

मैं- हाँ तो ठीक ही हैं न , मुलाकाते होती रहनी चाहिए न .वैसे तुम्हे परेशानी न हो तो मेरे कुवे पर चले . ठण्ड बहुत है वहां आराम रहेगा.

निशा- क्यों नहीं .

कुवे पर आकर मैंने अलाव जलाया और कमरे का दरवाजा बंद कर लिया .

निशा- ऐसे क्या देख रहा है

मैं- क्यों न देखू ऐसे, इस चेहरे से मेरी नजर हटती ही नहीं

निशा- उफ्फ्फ ये बहाने तारीफों के .

मैं- बता नहीं सकता कितनी शिद्दत से तुमसे मिलना चाहता था .

निशा- ये चाह भी न कमाल ही हैं न एक इन्सान को डायन के दर्शनों की इतनी गहरी अभिलाषा और एक डायन के तस्सवुर में इन्सान का अक्स. हे नियति तेरे खेल निराले.

मैं- एक डायन इन्सान की दोस्त नहीं हो सकती क्या

निशा- हो सकती क्या हो गयी है दोस्त, तभी तो अपने अँधेरे तुमसे बाँट रही है .

मैंने देखा की निशा के चेहरे पर वो नूर नहीं था .

मैं- कुछ थकी थकी सी लगती हो

निशा- उजालो में जाने की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है न

मैं- बताओ कुछ अपने बारे में

निशा- क्या बताऊ मैं वो अँधेरा हूँ जिसका कोई उजाला नहीं

मैं- अंधेरो में जला एक दिया ज़माने भर को रौशनी की नयी दिशा दिखा सकता है .

निशा- मेरे अँधेरे इतने गहरे है की रौशनी ने भी उम्मीद छोड़ दी है . जब से तुमसे मिली हूँ बाते करने लगी हूँ

मैं- तुम बाकि लोगो में घुल-मिल नहीं सकती क्या

निशा- ये इंसानी कौम बड़ी मतलब परस्त होती है कबीर. अपने फायदे के लिए तो ये किसी के आगे भी झुक जाते है और काम होने के बाद मैं कौन तो खामखा. तूने देखा नहीं कैसे लोग पागल है पीर-फकीरों के पीछे मैं पूछती हूँ भला किसलिए .

मैं- सहमत हूँ पर तुम चाहो तो लोगो के मन में जो डायन के प्रति जो सोच है वो बदल सकती हो . तुम उन्हें बता सकती हो की डायन वैसी नहीं जो वो सोचते है . डायन वैसी होती है जो मेरे सामने है

निशा- जैसे हर इन्सान एक जैसा नहीं होता वैसे हर डायन भी सामान नहीं होती . हो सकता है की मैं तुम्हारे प्रति नरम हु बाकि दुनिया के लिए क्रूर .

मैं- मैं जिस डायन को जानता हूँ वो कभी क्रूर नहीं हो सकती ये मेरा मन कहता है

निशा- मन बावरा होता है

उसने मेरे काँधे पर सर रखा और मैंने उसके ऊपर कम्बल डाल दिया . अलाव की अलख चिटकती रही . जब आँख खुली तो मैंने खुद को अकेले पाया. भोर होने में थोड़ी ही देर थी मैं वापिस गाँव के लिए चल दिया. घर पहुंचा तो चाची जाग चुकी थी . मैंने बहाना बनाया की टहलने चला गया था . पर उनकी आँखे बता रही थी की वो सहमत नहीं थी मेरी बात से.

"ये किसके ख्याल है जो अब तुम्हे मालूम भी नहीं होता की कोई आया है " भाभी ने चाय का कप मेरे पास रखते हुए कहा .

मैं- भाभी कब आई आप

भाभी- वो ही तो हमने पूछा की आहट तक भूल गए हो हमारी तुम

मैं- क्या भाभी आप भी

भाभी- हम सोचते है की चंपा के ब्याह के बाद तुम्हारा नम्बर भी लगा ही दे

मैं- शायद हम इस बारे में बात कर चुके है भाभी

भाभी- बाते तो होती ही रहेंगी तुम बताओ कैसी लड़की पसंद आएगी तुम्हे

मैं- सुबह सुबह क्यों मेरी टांग खींच रही है आप

भाभी- कोई तो होगा ख्याल तुम्हारा अब यूँ ही तो नहीं कोई खोया रहता .

मैं- भाभी सुनना चाहती हो तो सुनो मुझे डायन पसंद है .

मेरी बात सुन कर भाभी के हाथो में जो चाय का कप था वो निचे गिर गया . भाभी की आँखों में दहशत देखि मैंने और मुझे समझ आया की गलती हो गयी है

मैं- मैं मजाक कर रहा था भाभी, मुझे भला किसी को पसंद करने की क्या जरूरत है जब आप हो इस काम के लिए. आप ले आना आपकी ही परछाई कोई

मैंने माहौल को हल्का करने की कोशिश की . तभी पिताजी की आवाज आई तो मैं उनके पास चला गया.

पिताजी- कबीर हम काम के सिलसिले में बाहर जा रहे है आने में कुछ वक्त लगेगा पर इसका मतलब ये मत समझना की तुम्हे छूट रहेगी मनमर्जी की समझ रहे हो न

मैंने हाँ में सर हिलाया.

पिताजी- दूसरी बात चंपा को लेकर मलिकपुर जाना वहां का सुनार हमारा पुराना जानकार है वो जो भी पसंद करे वो गहने बनाने का कहना सुनार को . न जाने कब शेखर बाबु के यहाँ से ब्याह का संदेसा आ जाये गहने बनाने में समय तो लगेगा ही .

मैंने फिर से हाँ में सर हिलाया.

पिताजी- सबसे महत्वपूर्ण बात ये हमारा गाँव है इसका हर परिवार हमारा अपना परिवार है . इसकी सुरक्षा हमारा दायित्व है रात को चोकिदारी टूटनी नहीं चाहिए.

मैं- जी वैसा ही होगा.

दोपहर होते होते पिताजी चले गए . भैया-भाभी के साथ थे मैंने मौका सही समझा और चाची को पकड़ लिया.........
 
#28

"दिन में बिलकुल नहीं कबीर " चाची ने मुझे अपने से दूर करते हुए कहा

अब हम करे तो क्या करे. मैं मंगू के घर चला गया .

चंपा- तू हमेशा तभी आता है जब घर मे कोई नहीं होता , क्या इरादे है तेरे

मैं-इरादे होते अगर मेरे तो तू ये सवाल नहीं करती

चंपा- मैं भी किस पत्थर के आगे सर फोड़ रही हूँ. और बता

मैं- कल तुझे मेरे साथ मलिकपुर चलना है . पिताजी ने कहा है की चंपा अपनी पसंद के गहने बनवा आएगी.

चंपा - उसकी जरूरत नहीं है तुम लोगो के बहुत अहसान है हम पर इतना अच्छा वर-घर चुना मेरे लिए और भला क्या मांगू मैं.

मैं- कैसी बाते करती है तू , ये घर भी तेरा है वो घर भी तेरा है

चंपा- पर फिर भी मैं नहीं चलूंगी मलिकपुर

मैं- मत चल मुझे क्या है राय साहब को फिर तू ही जवाब देगी

चंपा - बिलकुल मैं जवाब दूंगी. कबीर , तू मेरी भी तो सुन

मैं- हम तो सबकी ही सुनते है बस इस ग़रीब की कोई नहीं सुनता तेरे घर आये है चाय पानी तो पूछ ले बेईमान

चंपा- ये भी तो तेरा ही घर है और अपने घर में कोई पूछता नहीं है जो चाहिए ले लेता है

मैं- लेनी तो मैं तेरी चाहता हूँ जानेमन

चंपा- हाय मेरे राजा , यही पर सलवार खोल दू क्या

हम दोनों ही हंस पड़े.

चंपा- वैसे वो लड़की जिसे तू साइकिल पर बिठाये था मुझ सी सुन्दर नहीं है

मैं- मुझे भी ऐसा ही लगता है

चंपा- कौन थी कहाँ की थी ये तो बता दे जुल्मी

मैं- तुझे क्या लगता है तुझसे छिपाता मैं, तुझे ही तो जलाना था

चंपा- देख मैं तो कोयला ही हो गयी अब तो बता दे.

मैं- अगर तू कल मलिकपुर चलेगी तो मैं बता दूंगा

चंपा - तू जहाँ कहेगा वहां ले चल पर जिस काम के लिए तू कह रहा है वो नहीं हो पायेगा.

मैं- क्या मेरा कोई हक़ नहीं तुझ पर

चंपा- मेरे दिल से पूछ जो तेरे लिए ही धडकता है

मैं- तो फिर चल और पसंद कर ले अपने लिए गहने

चंपा- तू कोई काला डोरा ला दे मुझे सोने से महंगा लगेगा मुझे.

मैं- ठीक है तो रह अपनी जिद पर .

चंपा- तू मोहब्बत करता है क्या उस लड़की से

मैं- ये दुनिया करने भी देगी मुझे मोहब्बत, लाली के जैसे मुझे भी लटका देगी .

चंपा- गाँव में तो यही चर्चा है की राय साहब का लड़का रातो में किसी औरत के पास ही जाता है

मैं- गाँव वाले फिर बताते नहीं की उनमे से किसकी बेटी-बहुओ के पास जाता हु मैं .

चंपा- अपनी बदनामी कौन करेगा

,मैं-तुझे भी ऐसा ही लगता है क्या

चंपा- नहीं , क्योंकि अगर तू ठरकी होता तो अब तक चढ़ गया होता मुझ पर . वैसे सच बताना तेरा दिल नहीं करता क्या ये सब करने को

मैं- दिल करता है बहुत ज्यादा करता है जवानी जब खून में दौड़ती है तो रातो को नींद आना बड़ा मुश्किल हो जाता है पर क्या करे . लेने को तो तेरी ले लू पर थोड़ी देर के मजे के लिए मैं कितनी नजरो से गिर जाऊंगा. तुझसे नजरे क्या मिला पाउँगा. इस दलदल में जो गिरे तो फिर निकला नहीं जायेगा चंपा. मुझे क्या मालूम नहीं है गाँव की कितनी औरतो चाहती है मेरे निचे लेटना पर वो प्रयास नहीं करती मेरे मन को छूने का . मुझे इ पल भी परवाह नहीं है की मैं राय साहब का बेटा हूँ मेरा दिल उसके लिए धडकता है जो इस कबीर को कबीर समझती है .

चंपा- वही तो मैं पूछ रही हूँ उस मरजानी का नाम तो बता दे जिसने मेरी सोतान बनने की ठानी है

मैं- बता भी दूंगा तो तू मानेगी नहीं

चंपा- बता तो सही

मैं- वो एक डायन है .

चंपा का गुलाबी चेहरा एक दम से सफ़ेद हो गया.

"क्क्क्क क्या क्या कहा तूने " उसने कांपती आवाज में कहा

मैं- यही की वो एक डायन है .

चंपा- ऐसा मत बोल नाम मत ले . तुझे किसी ने बताया नहीं की जो भी उसका जिक्र करता है रात को उसके घर आ जाती है वो .

मैं- क्या बकवास कर रही है तू

चंपा उठी उसने उपले जलाये और उन पर राई मिर्च डाल कर पुरे घर और दरवाजे पर तभी धुँआ किया और फिर दरवाजे को पानी से धोया

मैं- तू तो सच में सिरियस हो गयी .

चंपा- मैंने कहा न जिक्र मत कर उसका .

चंपा का दिल रखने के लिए मैंने बात बदल दी . जब उसकी माँ आ गयी तो हम दोनों चाची के पास चल दिए.

चाची- क्या बात है कहाँ गायब हो तुम लोग

मैं- बस इधर उधर

चाची- चंपा मैं कबीर के साथ खेतो पर जाउंगी तो तू सोने मत आना ,

चंपा- जी चाची . वैसे आप कहे तो मैं भी चलू दो से भले तीन

चाची- तेरी माँ का कलेजा टहल जायेगा फिर. वैसे भी आजकल जो हालत है कोई भी माँ-बाप औलाद की चिंता तो करेगी ही बेशक तू वहां हमारे साथ रहेगी पर इधर वो परेशां रहेगी. तेरे लिए कुछ नए गरम कपडे निकाले है ले जाना वो .तेरी माँ से कहना की पांच किलो घी पहुंचाए .


वो दोनों अपनी बातो में लग गयी मैंने कुर्सी चबूतरे पर डाली और सुस्ताते हुए चंपा की बात पर गौर करने लगा. उसने कहा था जो भी जिक्र करता है उसके घर पर आ जाती है डायन और मैंने महसूस किया की जब मैंने भाभी को डायन के बारे में बताया था उसी रात निशा ने मुलाकात का संदेसा लिए सियार को भेज दिया . क्या ये एक संयोग था .
 
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