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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#79


भाभी ने मुझे धक्का देकर दिवार से लगा दिया और बोली- तेरी हर गुस्ताखी को मैंने जाने दिया . सोचा की बच्चा है खेलने के दिन है पर मेरी ढील का ये मतलब नहीं की तू जो मन किया वो करेगा. आसमान में तुझे उड़ने दिया है तो मत भूलना की तेरे पर करतना भी जानती हु.

मैं- जो भी किया तुमसे बताया. जितना किया तुमको बताया कुछ भी नहीं छिपाया तुमसे. हमसे तुम्हारा दर्जा सबसे ऊपर रखा आजब ही सबसे पहले सिर्फ तुमको ही बताया .

भाभी- चंपा का ब्याह सर पर खड़ा है तू नया तमाशा मत खड़ा कर

मैं- मैं भी जानता हूँ इसलिए पहले चंपा का ब्याह होगा फिर मैं करूँगा.

भाभी- ये मुमकिन नहीं होगा , आज नहीं कल नहीं कभी नहीं

मैं- अब फर्क नहीं पड़ता , चाहे मुझे घर क्यों न छोड़ना पड़े उसका साथ नहीं छुटेगा उसका हाथ थाम आया हूँ .

भाभी- कर ले फिर अपने मन की . जब तूने फैसला ले ही लिया है तो फिर हम कौन है जो तेरा भला बुरा सोचे.

मैं- किस मिटटी की बनी हो तुम जो औरत अपनी मोहब्बत के लिए क्या कुछ कर गयी वो मेरी मोहब्बत को स्वीकारती क्यों नहीं

भाभी- क्योंकि मैं तुझे मरते हुए नहीं देख सकती .

मैं- कौन मारेगा मुझे

भाभी- जब मरेगा तो जान ही जायेगा. तुझे जहाँ भी मुह मारना है मार ले पर इतना समझ ले चंपा के ब्याह तक तेरे तमाशे इस घर से, इस गाँव से दूर रहे. मैं हरगिज नहीं चाहती की तेरी वजह से ब्याह में कोई उंच-नीच हो .

मैंने भाभी के पांवो को हाथ लगाया और बोला- चंपा के ब्याह के बाद उसे ले आऊंगा.

मैने मंगू को जगाया और बताया की कुवे पर घर बनाना है जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी .

मंगू- अभिमानु भैया से कहो पैसे तो वो ही देंगे

मैं- तू पैसो की चिंता मत कर काम शुरू करवा .

मंगू- ठीक है अभी पुजारी जी के पास जाता हूँ और ठीक समय देख कर नींव भरवाई करवा देते है .

मैं- सोच क्या रहा है फिर अभी जा

तभी चंपा भी आ गयी .

चंपा- कुवे पर क्यों मकान बना रहा है

मैं- ब्याह कर रहा हूँ मैं . इधर तेरी डोली उठी अगले दिन मैं अपनी दुल्हन लाया.

चंपा ये सुनकर मुस्कुरा पड़ी- कौन है वो जरा हमें भी तो बता

मैं- डायन

मेरी बात सुनकर उसकी मुस्कराहट तुरंत गायब हो गयी.

चंपा- मैं सोचती थी तू मजाक करता है क्या सच में

मैं- तेरी कसम .

चंपा- पर कैसे. घर वालो को मालूम होगा तब क्या होगा.

मैं- तब की तब देख लूँगा. ब्याह तो उसी से करूँगा.

चंपा- तुझसे कुछ जरुरी बात करनी है

मैं- अभी नहीं , मुझे बहुत काम है बाद में मिलते है

मैं चंपा के घर से निकला. न जाने क्यों ये सुबह बड़ी खूबसूरत लग रही थी .मैं मलिकपुर के लिए निकल गया रमा से मिलना बेहद जरुरी था .

"इतनी सुबह मेरे ठिकाने पर क्या बात है " रमा बोली

मैं- तूने ये क्यों नहीं बताया की चाचा ने तेरे पति को मारा था .

रमा- छोटे ठाकुर कातिल नहीं थे मेरे पति के .

मैं- इतना यकीं कैसे

रमा- क्योंकि जब मेरा पति मरा तब मैं छोटे ठाकुर के साथ थी .

ये कुछ कह रही थी चाची ने कुछ कहा था .समझ नहीं आई ये बात मुझे.

मैं- तो फिर कौन था कातिल

रमा- नहीं जानती , पर जबसे मेरे आदमी ने छोटे ठाकुर और राय साहब के झगडे को देखा था तबसे वो परेशान रहने लगा था . घंटो किसी सोच में डूबा रहता . कई कई दिन तक घर नहीं आता फिर एक दिन वो मर गया.

मैं- क्या उसकी लाश जंगल में मिली थी

रमा- नहीं खेतो में.

सरला ने भी कहा था राय साहब और चाचा में झगडा हुआ था पर किस बात को लेकर और रमा के पति ने क्या सुन लिया था ऐसा को सुध बुध हो बैठा था वो.

मैं- तेरा घर इंतज़ार कर रहा है तू वापिस आजा . मैं तेरे घर को नया बनवा दूंगा.

रमा- मैं जहाँ हु ठीक हूँ

मैं- बस एक सवाल और

रमा-क्या

मैं- त्रिदेव की क्या कहानी है

रमा- कौन त्रिदेव

मैं- कोई नहीं . क्या तू ये बता सकती है की रुडा और मेरे पिता की दुश्मनी किस बात को लेकर है .

रमा-कहते है की बरसों पहले दंगल में रुडा ने राय साहब को पटक दिया था तबसे ही खटास है .

पिताजी को पहलवानी का शौक था इसमें कोई शक नहीं था क्योंकि हमारे घर में सदा से अखाडा बना था. और फिर खेल की हार को भला दिल पर कौन लेता है दुश्मनी की जड गहरी रही होगी. तभी मुझे परकाश वकील जाता दिखा मैं दौड़ कर उसके पास गया .

परकाश- तुम यहाँ

मैं- तुमसे मिलने ही जा रहा था देखो तुम मिल गए .

वकील- मुझसे क्या काम

मैं- वसीयत का चौथा पन्ना देखना है मुझे

वकील- फिर से तुम्हे समझाना पड़ेगा की ऐसा कुछ नहीं था .

मैं- देखो वकील बाबु, मैं प्यार से कह रहा हूँ मान जाओ छोटी सी बात है ये बड़ी न करो. जो मुझे चाहिए बता दो. मैं ऊँगली टेढ़ी नहीं करना चाहता

वकील- देखो कबीर. प्यार से कह रहा हूँ छोटी सी बात है जिद मत करो वसीयत के तीन हिस्से है मान लो

मैं- भोसड़ी के हमारी बिल्ली हामी से म्याऊ तुझे शाम तक का वक्त देता हूँ चौथा पन्ना मेरे हाथ में लाकर नहीं रखा तो फिर उलाहना मत देना और रोना तो बिलकुल ही मत की मैंने क्या किया तुम्हारे साथ और माफ़ी मैं लूँगा नहीं .

वकील- ये धौंस किसी और पर दिखाना , अभिमानु के भाई हो इसलिए बर्दाश्त कर रहा हूँ तुमको वर्ना न जाने क्या कर देता मैं

मैं- ठीक है फिर ये भी देखते है . तेरे हलक में हाथ डाल कर जानकारी निकाल लूँगा मैं और मर्द है तो ये बात तेरे मेरे बिच ही रहे मेरे भाई के सामने जाकर रोया तू तो मैं समझ लूँगा की नामर्द से करार कर आया कबीर.

वकील- जब तेरा दिया समय पूरा हो जाये न तो आ जाना.

मैं- ठीक है सारा दिन तेरा रात को इसी ठेके पर तू इंकार करना मुझे फिर तू क्या तेरा सारा गाँव देखेगा.

वकील ने मेरे कंधे को थपथपाया और बोला- आना जरुर रात को .

 
#80

अपने अन्दर के जानवर को मैंने बहुत रोका था पर परकाश मेरी आँखों में खटक गया था मैंने निर्णय कर लिया था की रात को इसकी ऐसी गांड तोडूंगा की ये याद रखेगा. वापिस आया तो कुवे पर मंगू के साथ भैया भी मोजूद थे. मैंने एक नजर सरला पर डाली और भैया के पास गया .

भैया- मालूम हुआ की तू यहाँ मकान बनाना चाहता है

मैं- जी

भैया- वो घर किसका है फिर , तू वहां नहीं होगा तो फिर वो घर कैसा घर रहेगा

मैं- मेरा ज्यादातर समय यही इन्ही खेतो पर बीता है भैया , इसी जगह से मुझे प्यार है यही बसना है मुझे

भैया- पर वो जगह जिसे तू छोड़ना चाहता है वो घर है हमारा. तेरी जो भी वजह रही हो. तू यहाँ मकान बनाना चाहता है बना पर घर तो वो ही रहेगा.

मैं- आपके मन को समझता हूँ पर मेरी मजबुरिया है

भैया- रिश्तो में मज़बूरी नहीं मजबूती की जरुरत होती है छोटे. अभिमानु अभी इतना कमजोर नहीं हुआ है की उसके जीते जी उसके भाई को कहीं और बसना पड़े.

मैं- क्या कह रहे है आप भैया, मेरे यहाँ रहने से क्या आपका और मेरा रिश्ता कमजोर हो जायेगा कदापि नहीं .

भैया- तो फिर ऐसी क्या वजह है जो तूने इतना बड़ा निर्णय ले लिया.

मैं-कोई नहीं समझता मेरे मन की , मैं राय साहब के नाम के बोझ को नहीं ढोना चाहता भैया. उस घर में मेरा दम घुटता है , अपनी मर्जी से जहाँ जी नहीं सकता वहां रहने का क्या फायदा .

मैंने भैया को सच बता दिया.

भैया- नाखून कभी उंगलियों से अलग नहीं हो सकते छोटे, तुझे क्या लगता है कितना आसान है ऐसे भागना . भागना यदि कोई समाधान होता तो मैं बरसो पहले तेरी राह पर चल पड़ा होता.

मैं- काश आप समझ सकते

भैया- काश तू समझ पाता छोटे.

तभी मैंने भाभी को आते देखा और हमारी बात बंद हो गयी.

"क्या बाते हो रही है " भाभी ने पूछा

भैया- तुम्हारा देवर घर छोड़ना चाहता है

भाभी- जानती हूँ , जनाब को इश्क हुआ है ब्याह करना चाहते है हमारे देवर जी

भैया ने हम दोनों को देखा और बोले- हाँ तो कोई बड़ी बात नहीं है , इस उम्र में इश्क नहीं करेगा तो कब करेगा , करवा देते है ब्याह, छोटे तू मुझे लड़की के परिवार के बारे में बता मैं अभी जाकर रिश्ते की बात कर आता हूँ और तू चाहेगा जभी कर देगे .

भाभी- बताओ देवर जी अपने भैया को कौन है वो जिसने मेरे देवर पर जादू किया हुआ है , कहाँ की है , किसकी बेटी है

भाभी के व्यंग्य को खूब पहचाना मैंने

मैं- नहीं जानता भैया .

भैया- जानता नहीं और बात इतनी आगे बढ़ गयी .पर कोई बात नहीं तू बता देना उस से पूछ कर .

मैं- जी

भाभी- भाभी पूछना क्या है जी, देवर जी के साथ हम अभी चलते है उसके घर जब देवर जी ने पसंद कर लिया है तो हमें भी पसंद है आज ही रोक देते है उसे.

भैया- हाँ ये भी ठीक कहा.

मैं- उसकी जरुरत नहीं है भैया.

भैया- भई बिना परिवार से मिले कैसे हो पायेगी ब्याह की बात .

मैं- जब समय आएगा तब मैं बता दूंगा आपको

भैया- जैसा तू चाहे मेरे भाई.

भैया खेतो की दूसरी तरफ चले गए जहाँ मंगू ट्रेक्टर चलाना सीख रहा था .

भाभी- बताया क्यों नहीं अपने भाई को उसके बारे में

मैं- बता दूंगा

भाभी- बताओ तो सही मैं भी देखना चाहती हूँ अपने आशिक देवर को .

मैं- मार लो ताने तुम्हे ख़ुशी मिलती है तो

भाभी- मेरी ख़ुशी के भला क्या ही मायने है .

मैंने भाभी की बात पर ध्यान नहीं दिया और ट्रेक्टर की तरफ चल दिया. शाम तक हम सब उसे ही चलाना सीखते रहे. रात को मैं मलिकपुर की तरफ जा ही रहा था की जंगल में ही मुझे परकाश मिल गया.

मैं- बढ़िया हुआ तू यही मिल गया

प्रकाश- तेरी ही राह देख रहा था मैं .

मैं- तो देर किस बात की

प्रकाश- तेरी जिद है तो ये भी सही.

अगले ही पल हम गुत्थम गुत्था हो गये. उसके वार को मैंने सर झुका कर बचाया और उसकी कमर में हाथ डाल कर उसे पटकने की कोशिश की पर बन्दे की पकड़ मजबूत थी . उसने मेरे पैर में अडंगी लगाई मैंने फिर से उसका पैर पकड़ा और हवा में उछाल दिया पर वो भी खिलाडी था .

"ये बचकानी हरकते कबीर , कच्चे हो तुम " उसने मेरा उपहास उड़ाया

मैं- तेरा नाश टल सकता है वकील मुझे बस वो चौथा हिस्सा दे दे.

वकील- तेरी औकात नहीं है उसे पाने की उसे समझने की .

मैंने उसकी बाहं पकड़ी और उसे एक पेड़ के तने पर दे मारा . पर उसकी फुर्ती बेमिसाल थी . उसने लकड़ी का एक टुकड़ा उठा कर मेरी पीठ पर दे मारा. कांटो से मेरी शर्ट उधड गयी .

"सिर्फ एक बार और कहूँगा बता दे मुझे उस चौथे हिस्से के बारे में " मैंने कहा

वकील- दम है तो पूछ कर दिखा.

मैं मामले को लम्बा नहीं खींचना चाहता था . क्योंकि मैं चाहता नहीं था ये सब करना पर ये चूतिये का बच्चा मुझे मजबूर कर रहा था . मैंने उसके घुटने पर लात मारी उसके गिरते ही मैंने उसे धर लिया. उसका मुह खून सन चूका था मेरे लगातार पड़ते मुक्को की वजह से . तभी उसने पलटी और अब पाला उसकी तरफ था.

मैंने उसे अपने ऊपर से फेंका और जो लकड़ी उसने मेरी पीठ पर मारी थी वो उठा ली. बिना सोचे समझे मैंने उसकी रेल बनानी शुरू की . पर वो साला घाघ था इस खेल को समझता था . जैसे ही मैं उस पर हावी होता वो मेरे ख्याल तोड़ देता. ताजे खून की महक मुझ पर नशा सा करने लगी थी . एक उन्माद सा चढ़ रहा था मुझ पर. यही वो पल था जहाँ मुझे रुकना था क्योंकि यहाँ से आगे बढ़ता तो फिर मेरे हाथो से कुछ ऐसा हो जाना था जो मैं नहीं करना चाहता था .

मैंने उसे पटका और पीठ मोड़ कर चल दिया . पर उस बहन के लोडे को भी चुल मची थी .

"क्या हुआ बच्चे , इतने में ही हार मान ली . जब गांड में दम न हो तो पंचायत में नेता नहीं बनना चाहिए " उसने पीछे से कहा.

मैं- साले बक्श रहा हूँ तुझे , मैं नहीं चाहता की तेरी मौत हो मेरी वजह से

वकील- तू क्या मारेगा मुझे, तेरी औकात ही क्या है . मर्द वो होते है जो सामना करते है तू तो साले पीठ दिखा गया .

मैं- मुझे वो कागज चाहिए . एक कागज के टुकड़े के लिए क्यों मरता है तू

वकील-तुझे क्या लगा था तू मेरे घर जायेगा उस रंडी के साथ मुझे खबर नहीं होगी.

मैं- गया था फिर जाना पड़ा तो फिर जाऊंगा

मैने गुस्से से वकील के पेट में लात मारी. एक मुक्का और दिया साले को .

"रुक जाओ दोनों , ये क्या तरीका है " इस आवाज को सुनते ही मेरे होश उड़ गए. मेरा बाप सामने से आ रहा था .

राय साहब- जानवरों की तरह लड़ रहे हो शर्म लिहाज है की नहीं .

मैं- इसकी ही इच्छा थी की मरम्मत करू मैं इसकी

पिताजी- लानत है हमारी औलाद ये घटिया हरकते कर रही है .

प्रकाश- ये वसीयत के चौथे हिस्से को देखना चाहता है

पिताजी- तो दिखा देते इसे. एक कागज के टुकड़े के लिए खून बहाया जा रहा है क्या ही कहे तुम दोनों से . प्रकाश तुम घर जाओ और मरहम पट्टी करो और तुम हमारे साथ आओ अभी .

"हम अभी जिन्दा है , हमारे नौकरों पर जोर चलाने की जगह तुम्हे हमारे पास आना चाहिए था, तुमको चौथा हिस्सा देखना है न आओ हमारे साथ हम तुम्हारी इच्छा पूरी करते है " पिताजी ने मुझे कार में बिठाया और मैं उनके साथ चलते हुए एक ऐसी जगह पर आ पहुंचा जो मेरे ख्यालो से भी परे थी.
 
#81


जंगल का न जाने ये कौन सा कोना था जहाँ पर पिताजी मुझे लेकर आये थे. जंगल के हिस्से को काट कर के बसावट बनाई गयी थी . देखे तो कुछ भी खास नहीं पर समझे तो बहुत ख़ास. एक छप्पर , छोटा सा आंगन और आँगन में तीन पेड़ एक साथ एक जड में जिनके चारो तरफ एक समाधी जैसा चबूतरा बना हुआ था .

पिताजी- ये है वसीयत का वो चौथा हिस्सा जिसने हमने अपने लिए रखा है , ताकि हम जब ये दुनिया छोड़ कर जाये तो सकून से जाए. हमारी बस यही इच्छा है की जब हम मरे तो हमारी राख को इसी चबूतरे में दफना दिया जाये.

कुछ देर तो मैं समझ ही नही पाया की बाप कह क्या रहा है .

पिताजी- परकाश सही कहता था उसे इस टुकड़े में बारे में कुछ नहीं मालूम ,

मैं- फर्क नहीं पड़ता , मैं जानना चाहता हूँ इस जगह को

पिताजी-ये पेड़ देख रहे हो , इनमे से एक मैं हूँ, एक रुडा है और एक है सुनैना . ये तीन पेड़ हमने अपने बचपन में लगाये थे . कहने को तो ये जगह कुछ भी नहीं है और हम कहे तो सब कुछ है . हमने अपना बचपन , जवानी यही पर जिया . तीन दोस्तों की कहानी , ये तीन पेड़ किसी ज़माने के त्रिदेव कहलाते थे. मैं रुडा और सुनैना , ऐसा कोई दिन नहीं होता जब हम यहाँ नहीं मिलते थे . पर सुख के दिन कभी नहीं रहते बेटे, एक दिन सुनैना चली गयी . रुडा छोड़ गया रह गए हम सिर्फ हम.

मैंने अपना माथा पीट लिया और चबूतरे के पास बैठ गया. त्रिदेव को मैं भैया की तस्वीर में ढूंढ रहा था जबकि त्रिदेव की कहानी मेरे बाप से जुडी थी.

मैं- सुनैना कौन थी .

पिताजी- रुडा की बेटी की माँ

मैं- मतलब रुडा की पत्नी .

पिताजी - हमने ऐसा तो नहीं कहा

मैं- मतलब तो ये ही हुआ न

पिताजी- रिश्तो की डोर बड़ी नाजुक होती है कबीर पर उसकी मजबूती बहुत होती है . मेरा रुडा और सुनैना का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था , हमारी दोस्ती जिन्दगी से कम नहीं थी . अब जब जिक्र हुआ है तो हमें कोई गिला नहीं तुम्हे बताने में. सुनैना बंजारों की बेटी थी . मैं और रुडा बचपन के साथी थे, न जाने कब वो हमारा तीसरा हिस्सा बन गयी. बंजारों की बेटी में कुछ गुण बड़े दुर्लभ थे. उम्र के एक पड़ाव पर रुडा और सुनैना एक दुसरे से इश्क कर बैठे. जाहिर है ये ऐसा मर्ज है जो छिपाए नहीं छिपता . रुडा के पिता को जब मालूम हुआ की बात इतना आगे बढ़ गयी है तो उन्होंने रुडा को किसी काम से बाहर भेज दिया और सुनैना को मरवा दिया. सुनैना उस समय प्रसव के दिनों में थी , मरते मरते उसने एक बेटी को जन्म दिया .

मैं- समझता हूँ पर रुडा और आपके बीच दुश्मनी क्यों हुई.

पिताजी- हमारी कमी के कारन, हम सुनैना को बचा नहीं पाए. जब तक हम पहुंचे सुनैना अपनी अंतिम सांसे गिर रही थी . चूँकि उसी समय प्रसव हो रहा था बड़ी मुश्किल घडी थी वो . हमारी दोस्त मर रही थी पर उसकी कोख से जीवन जन्म ले रहा था . बच्ची को हमारे हाथो में देकर वो रुखसत हो गयी . तभी रुडा आ पहुंचा स्तिथि ऐसी थी की उसने हमें ही कातिल समझ लिया और हमचाह कर भी उसे समझा नही पाए. बच्ची को हमसे छीन कर वो चला गया . ऐसी लकीर खिंची फिर की त्रिदेव बस नाम रह गया.

एक गहरी ख़ामोशी के बीच मैं अपने बाप को समझने की कोशिश कर रहा था .

मैं- तो ये थी आपके और रुडा के बीच दुश्मनी की वजह

पिताजी- दुश्मनी नहीं ग़लतफ़हमी जो कभी दूर नहीं हो सकी

मैं- सब बाते ठीक है पर फिर वो ही लड़की रुडा से नफरत क्यों करती है .

पिताजी- ये सच बड़ा विचित्र होता है , अंजू समझती है की उसके पिता की वजह से उसकी माँ जिन्दा नहीं है , वो रुडा को ऐसे आदमी समझती है जो उसकी माँ का हाथ थामा तो सही पर निभा न सका.

मुझे क मिनट भी नहीं लगा अब समझने में की इस समाधी में कही सुनैना के अवशेष है .

"यही वो जगह थी जिसे हम अपने लिए रखना चाहते थे , यही वो जगह थी जिसे हम छुपाना चाहते थे . यही है वसीयत का वो चौथा टुकड़ा जिसके बारे में बस हम जानते थे और अब तुम जानते हो " पिताजी ने कहा.

मैं- मैं आपसे सिर्फ दो सवाल और पूछना चाहता हूँ मुझे विश्वास है की पूरी ईमानदारी से जवाब देंगे आप . पहला सवाल आपके कमरे में चूडियो के टुकड़े किसके थे.

पिताजी- तुम्हारी माँ के. तुम्हारी माँ का पुराना सामान आज भी सहेजा हुआ है हमने. कुछ कमजोर लम्हों में हम देख लेते है उनको जो टुकड़े तुमने चुराए वो वही थे .

मैं- जिस घर की बहु सोने की चूड़ी पहनती है उस घर की मालकिन कांच की चुडिया पहनती थी बात हलकी नहीं है पिताजी

पिताजी- तुमने जाना ही कितना था तुम्हारी माँ को. दूसरा सवाल क्या है तुम्हारा .

मैं- चाचा के साथ आपका झगडा क्यों हुआ था .

पिताजी- अगर तुम्हे यहाँ तक की जानकारी है तो चाचा के बारे में काफी कुछ जान गए होंगे. उसकी हरकते परिवार का नाम ख़राब कर रही थी . छोटे भाई की अय्याशियों को हम हमेशा नजरंदाज करते थे. पर पानी सर से ऊपर उठने लगा था. हमारे लाख मना करने के बाद भी उसकी हरकते शर्मिंदा कर रही थी एक दिन गुस्से में हमारे मुह से निकल गया की हमें कभी शक्ल न दिखाना और आज तक हम उस बात के लिए पछताते है . वो ऐसा गया की आज तक नहीं लौटा.

पिताजी को इतना भावुक मैंने कभी नहीं देखा था . कुछ देर वो अकेले खड़े अँधेरे में घूरते रहे और फिर बोले- चलते है वापिस.

दूर कहीं, धुंध ने जंगल को अपने आगोश में कस लिए था . अँधेरे में लहराते हुए सबसे बेखबर डाकन चले जा रही थी उस पगडण्डी पर . कदम जानते थे की मंजिल कहा है उसने कुवे पर बने कमरे के दरवाजे को धकेला और अन्दर देखते ही उसके माथे पर बल पड़ गए.

"हैरान क्यों हो, मुझे तो आना ही था न " अन्दर बैठे सख्स ने डाकन से कहा.......

 
#82

"हाँ तुम्हे तो आना ही था , मैं सोच ही रही थी की कबीर ने तुमको बता दिया होगा उसके बाद तुम्हे आना ही था " निशा ने शांति से कहा और दिवार के पास बैठ गयी.

भाभी- कबीर तो नादान है पर तुम्हे तो रुकना चाहिए था .

निशा- अब देर हो चुकी है नंदिनी

निशा ने भाभी को उसके नाम से पुकारा .

भाभी- देर हुई नहीं है अंधेर हो रहा है ये . बड़ी मुश्किल से थमा है वक्त का पहिया , पुराना लहू अभी सूखा भी नहीं है और तुम सब बर्बाद करना चाहती हो .

निशा- मैं बस जीना चाहती हूँ, मैं उसके लिए , मैं उसके साथ जीना चाहती हूँ उसने मुझे सिखाया है की जिन्दगी क्या होती है .

भाभी- पर तुम्हारा साथ उसे मौत के करीब ले जायेगा.

निशा- सब नियति के हाथ में है .

भाभी- तू समझती क्यों नहीं

निशा- समझा है इसलिए ही तो कबीर का हाथ थामा है .

भाभी- देख, तू चाहे कबीर के साथ कुछ भी कर , समझ रही है न , चोरी छिपे मिल कोई दिक्त नहीं पर ये ब्याह की जिद छोड़

निशा- तुझे क्या लगता है नंदिनी कबीर को मेरे जिस्म की प्यास है . वो चाहता है मुझे. वो तुम सब जैसा नहीं है उसे मुझसे कुछ नहीं चाहिए वो बस मुझे हँसते हुए देखना चाहता है . अक्सर वो मुझसे कहता है की भाभी एक औरत जिसने अपने प्यार को पाया है वो उसके प्यार को क्यों नहीं समझती और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता उसे देने के लिए.

भाभी- वो समझता भी तो नहीं है जबसे तुझसे मिला है वो पहले वाला कबीर नहीं रहा .

निशा- मैंने कुछ नहीं किया सब नियति का खेल है

भाभी- नियति , कितना आसन है न नियति की आड़ लेना

निशा- मुझे आड़ की क्या जरुरत नंदिनी.

भाभी- अब तू जिद पर ही आ गयी है तो ये ही सही पर इतना कह देती हूँ मेरे देवर की एक बूँद भी रक्त की धरा पर गिरी न तो ठीक नहीं होगा.

निशा- ठीक तो पहले भी नहीं था तू तब भी खामोश थी तू आज भी खामोश है नंदिनी .वक्त बदल गया पर हालात नहीं बदले नंदिनी.

भाभी- काश तुम समझ पाती

निशा- काश.......................

भाभी- समझती हूँ , मेरे ही आंचल तले पला है वो जानती हु तुमसे मोहब्बत उसकी जिद नहीं है हद से ज्यादा चाहता है वो तुमको, तुम्हे पाने के लिए कुछ भी कर जायगा वो मैं इस बात से डरती हूँ . तक़दीर ने हम सबको ऐसे मोड़ कर लाकर खड़ा कर दिया है की सामने अँधेरे के कुछ नही दीखता.

निशा- ये अँधेरा ही नियति है .

भाभी- तुम एक बार फिर सोच लो. तुम्हारा एक फैसला सब कुछ बदल देंगा

निशा- फैसला हो चूका है मैंने कबीर का हाथ थाम लिया है

भाभी- ये नियति के खेल ........... ठीक है फिर

भाभी आगे बढ़ी और कमरे से बाहर निकल गयी.

बाप की कहानी सुन कर मैं सोच में डूबा हुआ था . रुडा, विशम्बर दयाल और सुनैना. क्या ये प्रेम त्रिकोण हो सकता था . क्या रुडा का कहना की सुनैना की मौत के पीछे पिताजी का हाथ था सच हो सकता था . तमाम सवालों के जवाब के लिए मुझे रुडा का पक्ष जानना बेहद जरुरी था . दूसरी बात ये चाचा किधर गायब था . ऐसी कौन सी जगह थी जहाँ पर वो बिना किसी की नजरो में आये अपनी जिन्दगी जी रहा था . क्या सरला या रमा आज भी चाचा से चोरी छिपे मिलती होंगी क्या उस रात कविता चाचा से ही मिलने गयी थी जंगल में.

पर चाचा चोरी छिपे कही रह रहा था तो क्या उस चूतिये को कभी अपनी लुगाई की याद नहीं आती होगी. अपनी लुगाई को प्यासी छोड़ कर बाहर मजा करना , चलो मान लिया बाहर की चूत चाहिए थी पर रह तो सकता था न घर में.

सुबह आँख खुली तो मैंने पाया की घर पर पुजारी आया हुआ है मालूम हुआ की चंपा के ब्याह के लिए हल्दी की गाँठ आज शेखर बाबु के घर भेजी जाएगी. अब बस कुछ दिनों की बात थी फिर चंपा पराई हो जानी थी.पर मुझे तसल्ली ये थी की चंपा के ब्याह के तुंरत बाद मैं निशा से ब्याह कर लेता.

दोपहर तक रेस साहब, मंगू , उसका बाप और भैया शेखर बाबु के घर की तरफ रवाना हो गए थे. मैं सरला से मिलने खेतो की तरफ चल दिया. वहां पहुँचते ही मैंने उसे पास बुलाया और हमारी बाते शुरू हुई.

मैं- तूने और तेरी दोस्तों ने कभी कोशिश नहीं की चाचा को तलाशने की

सरला- की थी पर कुछ नहीं हुआ

मैं- ऐसी कौन सी जगह हो सकती है जहाँ चाचा बिना किसी की नजर में आये तुम सबको चोद भी सकता था और किसी को मालूम भी न हो

सरला- एक अरसा बीत चूका है कुंवर. तुम चाहो तो मैं जल उठा लू हाथ में मैंने उनको नहीं देखा.

मैं- आज रात को तुम्हारे घर आ जाऊ

सरला- अगर मेरा ससुर और बच्चे आज नहीं लौटे तो जरुर आ सकते हो .

मैं- ठीक है जाकर काम करो और शाम को समय से लौट जाना

एक बार फिर मैं उसी कमरे में खड़ा था जिसे मैंने तलाश किया था. इस बार मैंने रौशनी की अच्छी व्यवस्था की थी ये काई लगी दीवारे कुछ तो छिपाए हुए थी. गहनता से देखने पर मुझे एक लोहे की जंग खाई हुई खूँटी दिखी जिसे हिलाने पर एक छोटा दरवाजा सरका. दिवार के पार एक कमरा और था. जाले और धुल देख कर अंदाजा लगाया जा सकता था की बरसो से किसी ने कदम नहीं रखे थे यहाँ पर.

मैंने जाले हटाये और कमरे को देखा. कमरे में पलंग पड़ा था जिसके पायो में अब दीमक थी. दो कुर्सिया थी . इस बियाबान जंगल में पलंग कुर्सिया होने का मतलब था की इंसानी आमद की बसावट थी यहाँ, पलंग पर पड़े बिस्तर के निचे मुझे नंगी तस्वीरों वाली कुछ किताबे मिली जिनके पन्ने वक्त की मार झेल नहीं पाए थे. मुझे नोटों की गड्डी भी मिली जो अब किसी काम की नहीं रही थी .पलंग के निचे एक छोटा सा बक्सा था जिसने सोना भरा था . खरा सोना

"तस्वीरों का होना इशारा था की चाचा को मालूम था इस जगह के बारे में अपनी रांडो को यही लाकर चोदता होगा वो पर सोना मेरे विचार बदल रहा था क्या ये सोना चाचा का था अगर हाँ तो उसने पानी के निचे क्यों छिपाया और ऐसा क्या किया था उसने की उसे इतना सोना मिला " इन सवालो ने मेरे सर में दर्द कर दिया.......................

 
#83

मैंने रमा को सुना था, मैंने सरला को सुना था पर तीसरी कड़ी कविता से कोई बात नहीं हो पाई थी, उसकी मौत का मलाल था, वो जिन्दा होती तो इस गुत्थी को सुलझाने में मेरी बड़ी मदद कर सकती थी . रुडा से हर हाल में मुझे उसका पक्ष जानना था पर पिछले कुछ समय से जो हालात रहे थे क्या वो तैयार होगा मुझसे बात करने को ये भी था. बहुत कोशिश की पर भाभी अपने सीने में न जाने क्या दबाये हुई थी. अतीत के पन्ने का ऐसा क्या राज था जो जानते सभी थे बताता कोई नहीं था.

शाम को मैं भाभी के साथ खाना खा रहा था तो मैंने एक बार फिर से बातो का सिलसिला शुरू किया

मैं- भाभी,रुडा और पिताजी के बिच दुश्मनी की वजह सुनैना थी . पर क्या आपको नहीं लगता की दो दोस्तों को एक दुसरे पर इतना विश्वास तो होना चाहिए था न.

भाभी- विश्वास की डोर बड़ी कच्ची होती है कबीर. दरअसल सब कुछ परिस्तिथियों पर निर्भर होता है , कभी कभी आँखे वो देखती है जो नहीं होता . जब सुनैना मरी ठीक उसी समय रुडा का वहां पहुंचा और राय साहब को खून से लथपथ देखना. ये ठीक वैसा ही है जब कविता की मौत के बाद मैंने तुम पर शक किया था .

मैं- मैं हर हाल में अतीत के पन्नो को पढना चाहता हूँ

भाभी- दुसरो की जिंदगियो में झांकना एक तरह की बदतमीजी होती है . उन जिंदगियो से तुम्हारा क्या लेना देना .

मैं- लेना देना है , क्योंकि मैं भी अब उन कहानियो का एक पात्र हूँ.

भाभी- यही तो बदकिस्मती है

मैं- आप बता क्यों नहीं देती मुझे की अतीत में क्या हुआ था

भाभी- मैं अतीत का एक पहलु हूँ बस, मैं अभिमानु से जुडी हूँ यही मेरा सच है यही मेरा आज है यही मेरा कल था. रही बात तुम्हारे पिता की , चाचा की तो उनकी कहानी में हम सब जुड़ गए क्योंकि हम सब परिवार की डोर से बंधे है. और परिवार एक ऐसी चीज है जिसे एक सूत्र में बांधे रखने के लिए हमें बहुत कुछ करना पड़ता है .

मैं- ऐसी बात थी तो फिर चंपा और राय साहब के रिश्ते के बारे में मुझे क्यों बताया .

भाभी- तुम्हारे अटूट स्नेह के कारन कबीर. चंपा से तुम कितना स्नेह करते हो मुझसे छिपा नहीं है . पर उसी स्नेह , उसी निश्छलता का कोई गलत फायदा उठाये तो उसके पक्ष को जाहिर होना ही चाहिए न .

मैं- पर अगर दोनों की सहमती है तो क्या बुराई है भाभी .

भाभी- यही तो दोगलापन है कबीर , दोनों की सहमती पर क्या मायने है इस सहमती के.ये सब खोखली बाते है , यदि कोई नियम है तो फिर सबके लिए समान क्यों नहीं ये तुमने पूछा था मुझसे उस दिन जब लाली को मार कर लटका दिया था मेरे पास उस दिन कोई जवाब नहीं था . लाली और उसका प्रेमी के बीच भी तो सहमती थी न . आज मेरा भी यही सवाल है की पूजनीय राय साहब खुद इस घ्रणित कार्य में लिप्त क्यों है.

मैं- तो क्या पिताजी के सुनैना से भी इस प्रकार के सम्बन्ध हो सकते थे .

भाभी- उन तीनो की कहानी में हमें बस इतना मालूम है की रुडा और राय साहब की दुश्मनी का कारन सुनैना की मौत थी .

मैं- और चाचा , उसका क्या

भाभी- उसका जाना एक पहेली है जिसे आज तक सुलझाया नहीं गया.

मैं- रुडा और चाचा के सम्बन्ध भी ठीक नहीं थे उसका क्या कारन

भाभी- काश मुझे मालूम होता.

उस रात मैं चाची की लेना चाहता था पर अभिमानु भैया घर पर नहीं थे तो भाभी ने अपना बिस्तर चाची के पास लगा लिया . मैंने सरला के घर जाने का सोचा. मुझे देखते ही उसके होंठो पर मुस्कुराहट आ गयी . मैंने बिना देर किये उसे पकड़ लिया और चूमने लगा. सरला का हाथ मेरे लंड पर पहुँच गया . इतनी बेसब्री थी की कुछ पलो में ही हम दोनों नंगे एक दुसरे से चिपके हुए थे.

"आग बहुत है तुझमे " मैंने उसके नितम्बो को मसलते हुए कहा.

सरला- कल मेरा ससुर और बच्चे आ जायेंगे फिर रात को मौका मिलना मुश्किल होगा. आज की रात जी भर कर चोद लो मुझे.

मैं- फिर कुछ ऐसा कर की ये रात भुलाये न भूले भाभी,

मैंने सरला की गांड के छेद को सहलाया , तभी मुझे उन नंगी तस्वीरों वाली किताब के एक पन्ने का ध्यान आया जिसमे एक आदमी ने औरत की गांड में लंड डाला हुआ था . मैंने सरला के साथ ये करने का सोचा. पर तभी सरला घुटनों के बल बैठ गयी और मेरे लंड को अपने मुह में भर लिया. अब मुझे लंड की सुजन की कोई परवाह नहीं थी क्योंकि मैं जान गया था की इसकी मोटाई ही वो वजह थी जो औरते इसे चूत में लेने को मचल जाती थी.

सरला को अपना मुह ज्यादा खोलना पड़ रहा था पर वो मजे से चूस रही थी . मुझे मानना पड़ा था की चचा ने इन रंडियों को चुदाई की गजब कला सिखाई थी . सरला ने अब लंड को मुह से निकाला और मेरे अन्डकोशो को मुह में भर कर जीभ से चाटने लगी. ये एक ऐसी हरकत थी जिससे मैंने अपने घुटने कांपते हुए महसूस किये.

"ओह सरला,,,,, क्या चीज है तू " मैंने होंठो से उसकी तारीफ निकले बिना रह न सकी. तारीफ सुन कर उसकी आँखों में चमक आ गयी वो और तलीनता से चूसने लगी. ये मजा चाची ने कभी नहीं दिया था मुझे.

तभी वो उठ खड़ी हुई और बिस्तर पर चढ़ कर घोड़ी बन गयी . इतने मादक नितम्ब देख कर कोई कैसे रोक पाए खुद को. मैंने बड़े प्यार से सरला के कुलहो को मसला . बिना बालो की लपलपाती चूत जो रस से भीगी हुई थी और उसकी गांड का भूरा छेद. अपनी नाक से रगड़ते हुए मैंने उसे सूंघा उफ्फ्फ्फ़ ऐसी उत्तेजना पहले कभी चढ़ी नहीं मुझे पर. सरला की गांड चची से बड़ी थी तो और भी नशा था उसका.

"पुच " अपने होंठो से मैंने सरला की गांड के छेद को चूमा. भूकंप सा कम्पन मैंने सरला के जिस्म में महसूस किया. गांड को चूसते चाटते हुए मैंने अपनी दो उंगलिया सरला की चूत में घुसा दी और अन्दर बाहर करने लगा. सरला के मुह से निकलती गर्म आहे उस कमरे में ठण्ड को पिघलाने लगी थी . सब कुछ भूल कर मैं बस उसके जिस्म में खो सा गया था . सरला की चूत हद से जायदा रस बहा रही थी . दोनों छेदों इ मस्ती सरला ज्यादा देर तक नहीं झेल पाई और सिसकारी भरते हुए झड गयी . बिस्तर पर पड़ी वो लम्बी सांसे ले रही थी .

"मुझे गांड मारनी है तेरी " मैंने अपने मन की बात कही उस से .

कुछ देर बाद सरला उठी और सरसों का तेल ले आई. मैं समझ गया की क्या करना है औंधी पड़ी सरला के छेद पर मैंने तेल लगाया और अपनी एक ऊँगली गांड में सरका दिया. एक पल उसने बदन को कसा और फिर ढीला छोड़ दिया. जितनी अन्दर जा सकती थी ऊँगली मैंने खूब तेल लगया और फिर अपने लंड को भी तेल से चिकना कर लिया.

सरला- जबरदस्ती न करना कुंवर. जब मैं कहूँ रुको तो रुकना, दोनों का सहयोग रहेगा तभी तुम ये मजा ले पाओगे.

मैंने हाँ कहा और अपना लंड उसकी गांड के चिकने छेद पर लगा दिया. सरला के कहे अनुसार मैं धीरे धीरे लंड को अन्दर डालने लगा. उसे दर्द हो रहा था पर वो भी मुझे ये सुख देना चाहती थी . तेल की वजह से काफी आसानी हो रही थी . थोडा थोडा करके मैं उसकी गांड में घुसा जा रहा था फिर उसने रुकने को कहा और धीरे धीरे लंड आगे पीछे करने को कहा. चूत मारने से काफी अलग अनुभव था ये क्योंकि गांड का छल्ला काफी कसा हुआ था लंड पर दबाव ज्यादा था. पर कहते है न की कोशिश करने वालो की हार नहीं होती. हमने भी मंजिल को पा ही लिया. मैंने सरला के गालो को दोनों हाथो में थामा और उसके गर्म जिस्म को चोदने लगा.

मैंने उस रात जाना था की क्यों चाचा इन औरतो के जिस्म का दीवाना था .सरला ने सच में समां बाँध दिया था . उसने मुझे वो सुख दिया था जो बहुत कम लोगो को नसीब होता है . मैंने जब उसकी गांड में अपना वीर्य छोड़ा तो ऐसा लगा की किसी ने जिस्म से जान ही निचोड़ ली हो . उस रात हमने दो बार चुदाई की . आधी रात से कुछ ज्यादा का समय रहा होगा मैं उसके घर से निकल कर जा रहा था . मैं गली में मूतने को रुका ही था की मैंने वैध के घर में एक औरत को जाते हुए देखा. इतनी रात में वैध के घर में कौन औरत जा सकती है. मेरा मूत ऊपर चढ़ गया वापिस से . वो औरत घर में घुस गयी . मैंने मालूम करने का सोचा की कौन होगी ये . मैं घूम कर कविता के कमरे वाली खिड़की के पास पहुंचा उसे धक्का दिया और मैं घर में घुस गया. अन्दर से दो लोगो की आवाजे आ रही थी मतलब की वैध भी घर में ही था. दबे पाँव मैं वैध के कमरे की तरफ गया और वहां जाकर जो मैंने देखा मेरी आंखे जैसे जम ही गयी............................

 
#84


वैध और रमा बिस्तर पर एक दुसरे संग लिपटे पड़े थे. मेरी आँखे ये देख कर हैरान थी की एक बुजुर्ग रमा जैसी औरत की ले रहा था . रमा और वैध के ऐसे सम्बन्ध होगने कोई सोच भी नहीं सकता था . वैध मुझे शुरू से ही कुछ अजीब तो लगता था पर इतना घाघ होगा ये सोचा नहीं था. खैर, मुझे इतंजार करना था . कुछ देर बाद चुदाई ख़त्म हुई और दोनों बिस्तर पर बैठ गए.

रमा- वैध, तुमने वादा किया था मुझसे

वैध- तेरे काम में ही लगा हूँ

रमा- कितने साल बीत गए ये सुनते सुनते तुमने बदले में मेरा जिस्म माँगा था मैंने तुमको वो भी दिया आज तक देती आ रही हूँ और कितना इंतज़ार करना होगा

वैध- जिस्म देकर कोई अहसान नहीं किया तूने , अपनी लाज बचाने का सौदा था वो . ठाकुर से चुद रही थी थोडा मैंने चोद लिया तो क्या हुआ .

रमा- तूने सौदा किया था मुझसे

वैध- रंडिया कब से सौदा करने लगी. तू और वो साली तेरी दोस्त कविता रंडिया ही तो थी .ठाकुर की रंडिया , उसको घर में रखा था जब बाहर चुद रही थी तो घर वालो से क्यों नहीं , मैंने भी चोद लिया तो क्या गुनाह किया .

तो वैध भी चोदता था कविता को. साला हद ठरकी निकला ये साला. हिकारत से मैंने थूका.

रमा- गरीब की आह में आवाज नहीं होती वैध पर जब लगती है न तो बड़ी जोर से लगती है .

वैध- धमकी दे रही है तू मुझे

रमा- मैं सिर्फ इतना चाहती हूँ की तू अपना वादा निभा

वैध- तो समझ ले की मैंने वादा तोड़ दिया.

रमा- तू ऐसा नहीं कर सकता , तुजे अंजाम भुगतना होगा इसका.

वैध- जानती नहीं तू मेरे ऊपर किसका हाथ है

रमा- जानती हूँ "

वैध- जानती है तो जब भी बुलाऊ आया कर और चुद कर चुपचाप चली जाया कर

रमा इस से पहले कुछ कहती अन्दर से निकल कर मैं उन दोनों के सामने आकर खड़ा हो गया. दोनों की गांड फट गयी मुझे अचानक से देख कर.

मैं- किसका हाथ है तेरे सर पर वैध

"कुंवर आप यहाँ " वैध की आँखे बाहर आने को हो गयी .

मैं- ये मत पूछ मैं यहाँ क्यों ये बता की तेरे सर पर किसका हाथ है जो तू रमा से किया अपना वादा नहीं निभा रहा . औरत की चूत इतनी भी सस्ती नहीं की तू चोद ले और बदले में उसे कुछ न दे.

वैध मिमियाने लगा.

मैं- रमा से क्या वादा किया था तूने , मैं सुनना चाहता हूँ और अगर तेरी जुबान तुरुन्त शुरू नहीं हुई तो ये रात बहुत भारी पड़ेगी तुझ पर .

वैध- मैं अभिमानु ठाकुर से कहूँगा की तुम चोरी से मेरे घर में घुसे और मुझे पीटा

मैं- ये कर ले तू पहले, चल भैया के पास अभी चल रमा को तूने चोदा मैं गवाह हूँ वो ही करेंगे तेरा फैसला .

वैध के बदन में बर्फ जम गयी .

मैं- तो बता फिर क्या वादा था वो.

वैध की शकल ऐसी थी की रो ही पड़ेगा . मैंने एक थप्पड़ मारा उसके गाल पर और उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी .

वैध- मैंने रमा से वादा किया था की वो अगर मेरे साथ सोएगी तो मैं उसे बता दूंगा की इसकी बेटी को किसने मारा था

वैध की बात ने मुझे भी हिला कर रख दिया था . जिस सवाल को मैं बाहर तलाश रहा था उसे इस चुतिया ने अपने सीने में दफ़न कर रखा था . रमा की आँखों से आंसू बहने लगे , मैं समझ सकता था एक माँ के दिल पर क्या बीत रही होगी. औरत चाहे जैसी भी हो पर उसका माँ का स्वरूप , उसका दर्जा बहुत बड़ा होता है .

मैं- वादा निभाने की घडी आ गयी है वैध, मैंने भी रमा से एक वादा किया है तू बता मुझे कौन था वो हैवान

वैध ने थूक गटका और बोला- ठाकुर जरनैल सिंह, छोटे ठाकुर ने मारा था रमा की बेटी को .

वैध की आवाज बेशक कमजोर थी पर उसके शब्दों का भार बहुत जायदा था .

मैं- होश में है न तू

वैध- झूठ बोलने का साहस नहीं है मुझमे

चाचा ने अपनी ही प्रेयसी की बेटी का क़त्ल कर दिया था . रमा तो ये सुनकर जैसे पत्थर की ही हो गयी थी .

मैं-रमा तुझसे वादा किया है मैं चाचा को तलाश कर लूँगा तेरी आँखों के सामने ही उसे सजा दूंगा.

रमा की आँखों से झरते आंसुओ के आगे मेरे शब्द कमजोर थे मैं जानता था . दर्द आंसू बन कर बह रहा था . रमा कुछ नहीं बोली , दरवाजा खोल कर घर से बाहर निकल गयी .रह गए हम दोनों

मैं- बड़ा नीच निकला तू वैध. दिल करता है की अभी के अभी तुझे मार दू पर अभी तुझसे कुछ और सवाल करने है जिनके सही सही जवाब चाहिए मुझे, बता भैया के साथ कहाँ जाता है तू .

वैध- कही नहीं जाता मैं

मैं- सुना नहीं तूने

मैंने फिर से एक थप्पड़ मारा.

मैं- बेशक तेरी वफ़ादारी रही होगी भैया से पर आज की रात यदि मुझे तेरा कत्ल करके तेरी रूह से भी अपने जवाब मांगने पड़े न तो भी मैं गुरेज नहीं करूँगा. अब तू सोच ले.

वैध-उनको तलाश है

मैं- किस चीज की तलाश

वैध- ऐसी दवा की जो प्यास को काबू कर सके.

मैं- कैसी प्यास

वैध- रक्त तृष्णा को काबू करना चाहते है वो .

ये रात साली कयामत ही हो गयी थी . भैया को रक्त की प्यास थी . मेरा तो सर ही चकरा गया .

मैं- भैया को रक्त की प्यास , तो क्या भैया ही वो आदमखोर है

वैध- नहीं वो नहीं है .

मैं- तो फिर कौन है किसके लिए भैया को दवा की तलाश है

वैध- नहीं जानता न उन्होंने कभी बताया. अभिमानु को दवाओ का ज्ञान मुझसे भी जायदा है जंगल में अजीब बूटियों की तलाश रहती है उनको वो मुझे सहयोग के लिए ले जाते है .

मैं- क्या कभी भैया ने उस आदमखोर का जिक्र किया तुमसे

वैध- नहीं कभी नहीं .

मैं- कब से जारी है ये तलाश ,

वैध- ठीक तो याद नहीं पर करीब ५-७ साल से वो लगातार इसी प्रयास में लगे है .

मैं- क्या कभी किसी पुरे चाँद की रात को तू भैया के साथ रहा है

वैध- नहीं , कभी नहीं .

मैं- और कोई ऐसी बात जो तुझे लगता है की मुझे बतानी चाहिए

वैध- बस इतना ही

मैं- आज के बाद रमा की तरफ आँख भी उठा कर नहीं देखेगा तू . मुझे मालूम हुआ की इस कमरे में हुई कोई भी बात हमारे सिवा किसी को भी मालूम हुई तो तेरा अंतिम दिन होगा वो.

वैध के घर से निकल तो आया था पर कदमो में जान नहीं बची थी , या तो मेरा भाई ही वो आदमखोर था और वो नहीं था तो फिर किसकी रक्त तृष्णा का इलाज तलाश रहा था वो . आने वाले कल का सोच कर मेरी आत्मा कांप गयी.

 
#85

चौपाल के पेड़ के निचे बैठे बैठे मैंने सोचा की सूरजभान को पकडूँगा दिन उगते ही . उस से ही शुरू करूँगा अब जो भी होगा किसी का लिहाज नहीं करूँगा. मैंने रमा से वादा किया था की उसकी बेटी के कातिल से मैं बदला लूँगा पर वो कातिल मेरा चाचा था . खून ही खून को बहाने वाला था . सुबह होते ही मैं मलिकपुर पहुँच गया . सूरजभान मुझे रमा की दुकान के पास ही मिल गया . मैं उसके पास गया .मुझे देख कर वो चौंक गया.

सूरजभान- तू यहाँ क्या कर रहा है

मैं- तुझसे ही मिलने आया हूँ

सूरज-मुझसे, भला मुझसे क्या लेना देना तेरा

मैं- कुछ बात करनी थी तुझसे , सिर्फ बात करनी है फिर मैं लौट जाऊंगा.

सूरज ने कुछ पल सोचा फिर अपने कंधे उचकाए और बोला- ठीक है

हम दोनों पास में बड़ी एक बेंच पर बैठ गए .

मैं- देख सूरजभान मैं मानता हूँ की पिछला कुछ वक्त हम दोनों के लिए ठीक नहीं रहा , तेरे मेरे बिच जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था . मेरे कुछ सवाल है जिनके जवाब मैं तुझसे चाहता हूँ

सूरज- मेरी कोई मंशा नहीं थी तुझसे झगडा करने की . खैर जो हुआ सो हुआ बता क्या पूछना चाहता है तू

मैं- क्या वजह है की अभिमानु भैया मुझसे ज्यादा तुझे चाहते है

सूरज- ऐसा नहीं है , वो बस मेरी मदद कर रहे है मेरे व्यापार को शुरू करने में .

मैं- पर किसलिए

सूरज- कभी बताया नहीं पर शायद नंदिनी दीदी ने कहा हो उनसे .

मैं- भैया ने काफी सालो से मलिकपुर की तरफ देखा भी नहीं था फिर ऐसा क्या हुआ की वो लौट आये यहाँ

सूरज- कबीर तेरी मेरी उम्र लगभग एक सी ही है , मुझे क्या मालूम की पहले क्या हुआ था और क्या नहीं .

मैं- तू समझ नहीं रहा है मेरी बात को सूरजभान, भैया कुछ तो ऐसी बात करते होंगे तुझसे जो तू समझ नही पाता होगा. कोई तो बात उनका व्यवहार तू इतने साथ रहता है उनके कुछ तो खटकता होगा तुझे.

सूरज- भैया बहुत अच्छे है , तू भाग वाला है कबीर जो तेरे सर पर बड़े भाई का हाथ है . कभी कभी मुझे जलन होती है तुझसे की काश तेरी जगह मैं होता.

मैं- समझ सकता हूँ नंदिनी भाभी और भैया की प्रेम कहानी मलिकपुर में ही शुरू हुई थी उसके बारे में बता दे कुछ जानता है तो .

सूरज- मैं छोटा था तब पर फिर भी इतना जानता हूँ की पिताजी और तेरे चाचा दोनों इस ब्याह के खिलाफ थे , पिताजी और ठाकुर जरनैल की तब ताजा ताजा लड़ाई हुई थी किसी बात को लेकर . उसी समय अभिमानु भैया और नंदिनी दीदी के प्रेम वाली बात सामने आ गयी थी .

मैं- कोई है जो आसपास के गाँव वालो को मार रहा है ,

सूरज- तलाश में हूँ उसकी

मैंने सूरजभान के कंधे पर हाथ रखा और बोला- हमारे दरमियाँ जो भी हुआ नहीं होना चाहिए था . कुछ बाते समझनी चाहिए थी मुझे .

सूरजभान से मिलकर मुझे इतना समझ आया था की रुडा और चाचा के बीच जो बात हुई थी ठोस ही रही होगी वर्ना चाचा ये जानते हुए भी रुडा किसी ज़माने में राय साहब का दोस्त रहा था रुडा का गिरेबान नहीं पकड़ता . शायद यही बात चाचा और पिताजी के झगडे का कारन रही होगी. दोपहर में खेतो पर भैया मिले .

मैं- आपसे बात करनी थी भैया

भैया- हाँ, पर पहले तू मेरी मालिश कर दे.

मैं- जरुर

भैया ने अपनी शर्ट उतारी और औंधे लेट गए . मैंने तेल लिया भैया की पीठ पर मालिश करने लगा. मैंने देखा की पीठ पर काफी खरोंचे थी .

मैं- ये चोट कैसी पीठ पर

भैया- कीकर काटी थी कांटे लग गए कुछ

मुझे यकीं नहीं हुआ इस बात का क्योंकि भैया ने खेती या पेड़ो का काम मेरे देखते देखते कभी ही किया हो

भैया- कुछ कह रहा था तू .

मैं- भैया गाँव की सब औरते अपने अपने परिवार के साथ राजी ख़ुशी रहती है मुझे चाची की फ़िक्र होती है , वो कहती नहीं पर उनका दुःख समझता हूँ मैं

भैया- जानता हु तू क्या कहना चाहता है छोटे, पर हम कर भी तो नहीं सकते कुछ चाचा न जाने कहाँ गायब हो गया मैं थक गया , हार गया उसे ढूंढते हुए. गाँव शहर जहाँ भी जिसने भी बताया वाही गया उसे तलाशने पर वो नहीं मिला कभी भी .

मैं- अगर पिताजी चाचा से झगडा नहीं करते तो क्या पता चाचा हमारे साथ होते.

भैया- पिताजी चाचा को बहुत चाहते थे

मैं- आप मुझे कितना चाहते है भैया

भैया- तुझे क्या लगता है कितना चाहता हूँ मैं तुझे

मैं- आप मुझे जरा भी नहीं चाहते भैया

भैया ने पीठ मोड़ी और मेरी तरफ होकर बोले- फिरसे बोल जरा

मैं- आप मुझे नहीं चाहते , अगर चाहते तो उस तस्वीर को कमरे से नहीं हटाते मुझे बता देते की वो तस्वीर किसकी है .

भैया- बस इतनी सी बात के लिए अपने भाई के प्यार पर सवाल उठा रहा है तू छोटे

मैं- सवाल तो बहुत है पर आप जवाब नहीं देंगे

भैया- और क्या है वो सवाल

मैं- आप हमेशा से जानते थे न की रमा की बेटी को चाचा ने मारा था .

भैया खामोश से हो गए.

मैं- आप जानते थे न भैया. आप जानते थे फिर भी आपने छिपाया इस बात को

भैया- छिपाता नहीं तो क्या करता मैं छोटे

मैं- आप समझा सकते थे चाचा को रोक सकते थे

भैया- काश मैं कर पाता उसे न जाने किस चीज का जूनून था , रुडा से लड़ाई करके आया था वो . फिर घर आते ही पिताजी से लड़ पड़ा . तेरी भाभी और मेरा ब्याह नहीं होने देना चाहता था वो .

मैं- क्या दिक्कत थी चाचा को इस रिश्ते से

भैया- आजतक नहीं मालूम हुआ किसी को

मैं- जंगल में क्या तलाशते है आप

भैया- मुझे भला क्या जरुरत है कुछ तलाशने की सब कुछ तो है मेरे पास

मैं- पक्का कुछ नहीं तलाशते आप

भैया- साफ साफ बोल न छोटे

मैं- कुछ नहीं तलाशते तो तलाशनी शुरू कर दीजिये भैया , जिस रक्त तृष्णा की दवा आप ढूंढते है न आपके भाई को भी उसकी जरुरत पड़ने वाली है बहुत जल्द.

मैंने अपना राज भैया के सामने खोल दिया था मैं जानता था की मेरा भाई हद से ज्यादा मुझे चाहता है उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाना था मुझे अब ...........................
 
#86

मैं- मुझे भी उस दवा की जरुरत पड़ेगी भैया,

मैंने फिर से कहा . भैया की नजरे बस देखती रही मुझ को पर वो कुछ बोले नहीं , एक शब्द. मेरे कान बेकरार थे उनके मुह से कुछ भी सुनने को . पांच, दस, बीस, तीस मिनट बीते भैया कुछ न बोले. शून्य में ताकते रहे वो .

"भैया, कुछ तो बोलिए " मैं भैया को ख्यालो की दुनिया से धरातल पर लाया.

भैया- रूपांतरण हुआ

मैं- नहीं काबू है अभी तो मेरा खुद पर , पर नहीं जानता कब तक रख पाऊंगा.

भैया- तेरा भाई अभी जिन्दा है , भरोसा रख कुछ नहीं होगा तुझे, मैं होने ही नहीं दूंगा कुछ तुझे. ये बात किसी और को मत बताना. चाहे कुछ भी हो जाये मत बताना.

भैया ने मुझे दिलासा तो दिया था पर उनके चेहरे का तेज खो गया था . भैया वहां से चले गए . मैं खेतो में घुमने चल पड़ा कुछ दूर जाने पर मैंने चंपा को देखा अकेले पगडण्डी पर बैठे हुए.

मैं- यहाँ क्यों बैठी है

चंपा- बस ऐसे ही , तुम बताओ आजकल मिलते ही नहीं न जाने कहाँ गायब रहते हो .

मैं- कुछ जरुरी काम पुरे कर रहा हूँ. तेरे ब्याह के बाद मैं भी शादी करके जीवन शुरू करना चाहता हूँ .

चंपा- तूने बताया नहीं कौन है वो

मैं-सबसे पहले तुझे ही बताया था

चंपा ने इधर उधर देखा और बोली- क्या तू सच में डाकन से ही ब्याह करेगा.

मैं- सच में ही

चंपा- पागल हुआ है तू.

मैं- पागल ही सही , दीवानों को ये जमाना पागल ही समझता है खैर तू बता कैसी कट रही है तेरी.

चंपा- बस जी रही हूँ, जबसे तू रूठा है लगता है बदन का एक हिस्सा टूट गया है .

मैं- मैं कहाँ रूठा तुझसे. मुझे कोई गिला नहीं तुझे , ये तेरी जिन्दगी है इसे तुझे जीना है . तू अपनी मर्जी से जी , जीना भी चाहिए .

चंपा- गलतिया तो इंसानों से ही होती है न

मैं- कोई गलती नहीं मानता मैं इसे. दो पक्षों की रजामंदी है तो कोई गलती नहीं . तू भी अपने दिल से इस मलाल को निकाल दे. जब से तेरी हंसी रूठी है घर की रौनक ही गायब हो गयी . और फिर कहे भी तो किस हक़ से हमाम में तू भी नंगी मैं भी नंगा . रिश्तो की डोर तुझसे भी टूटी मुझसे भी टूटी. तुझे गलत कहा तो मैं सही कैसे हुआ फिर. मेरे मन की ब्यथा मैं तुझे नहीं बता सकता तू अपने मन की बात मुझे नहीं बता सकती . बस इतना जरुर याद रखना कबीर चंपा के साथ पहले भी था और हमेशा रहेगा.

इस से पहले की चंपा की आँखों से आंसू गिर पड़ते मैंने उसके चेहरे को हाथो में लिया और उसके गुलाबी लबो को चूम लिया.

""दोस्ती में शर्ते नहीं होती, दोस्ती में बंधन नहीं होता. दोस्ती में मजबुरिया नहीं होती दोस्ती बस दोस्ती होती है . ये कभी मत भूलना कबीर की दोस्त है तू. " मैंने चंपा के सर पर हाथ फेरा .

रिश्तो की इस भूलभुलैया में उलझे हुए मैं इतना तो समझ गया था की अभिमानु भैया के लिए कितनी मुश्किल रही होगी इस परिवार को एक सूत्र में थामे रखना. कुछ देर खेतो पर रहने के बाद मैं रमा के पुराने घर पर पहुँच गया . मजदूरो ने तक़रीबन काम ख़तम कर दिया. घर तैयार था बस रमा को वापिस लाना था यहाँ.

मलिकपुर जाने से पहले मैं कपडे बदलने के लिए घर गया . अपने चौबारे में था ही की भाभी आ गयी .

मैं- भाभी, थोड़ी मदद चाहिए

भाभी- क्या चाहिए बताओ

मैं- कुवे पर एक कमरा बनाना है , भैया हाँ नहीं कह रहे आप कहेंगी तो आपका कहा नहीं टालेंगे वो.

भाभी- उन्होंने बताया था मुझे इस बारे में

मैं- आप तो जानती हो मना लो न भैया को

भाभी- वो कभी नहीं मानेंगे .

मैं- भैया नहीं मानेगे तो तुम मान जाओ भाभी

भाभी- जब तुमने फैसला कर ही लिया है तो मेरा मानना ना मानना क्या रह गया.

मैं- उस को नहीं छोड़ सकता बड़ी मुश्किल से उसने हाँ की है उसका हाथ छोड़ा तो जमाना रुसवा करेगा मुझे और आगे कोई मोहब्बत नहीं करेगा

भाभी- मोहब्बत , हम्म्म, मोहब्बत कैसी है तुम्हारी मोहब्बत महज कुछ मुलाकातों को मोहब्बत मान बैठे हो तुम . कितने समय से जानते हो तुम उसको. जानते क्या हो तुम उसके बारे में. मानती हूँ की मोहबत में सवाल-जवाब नहीं होते, उंच-नीच नहीं होती. कुछ भी नहीं होता . बस हो जाता है प्रेम. पर प्यारे देवर जी, जिसे हम चाहते है उसके बारे में हमें थोडा बहुत तो मालूम होना चाहिए न . मैं जानती हूँ की तुम उसका साथ नहीं छोड़ोगे पर मेरा एक कहा जरुर मानना,

मैं- जी भाभी

भाभी- जैसा की तुमने कहा की चंपा के ब्याह के अगले दिन ही तुम उससे ब्याह रचाने का सोच रहे हो . तो डाकन से जाकर कहना की जब तुम उसे लेने आओगे तो वो दिन के उजाले में लेने आओगे. होली के दिन जब फाग से ये धरती अम्बर रंग होगा तब तुम उसे लेने आओगे . अंधेरो की रानी उजालो को कैसे संभालती है देखना है मुझे.

मैं- परीक्षा लेना चाहती हो हमारी मोहब्बत की

भाभी- वो आशिकी ही क्या जिसमे इम्तिहान न हो.

मैं- ये भी सही

चोबारे से निचे आया तो आँगन में ही चाची मिल गयी.

चाची- कहाँ भागमभाग रहता है तू आजकल

मैं- कल करना चाहता था पर भाभी सो गयी तुम्हारे पास

चाची- उसके अलावा भी मेरा तुमसे कोई रिश्ता है न

मैं- बिलकुल

चाची- बहुरानी ने बताया की तू ब्याह करने वाला है कम स कम मुझे तो बता ही देता .

मैं- तुम्हे मिलवा ही दूंगा उस से चाची बस कुछ दिनों के बात है .

ये कह कर मैं चलने लगा तो चाची ने मुझे टोका.

चाची- कबीर रुक एक मिनट.

मैं- क्या हुआ

चाची- जेठ जी को तो बता दे कम से कम. बेहतर होगा की लड़की के घर वो ही जाये

मैं- समय आएगा तो बता दूंगा चाची.

हल्का अँधेरा होते होते मैं मलिकपुर पहुँच गया रमा के ठेके पर .

"तुम यहाँ , " उसने पूछा मुझसे

मैं- तुम्हे लेने आया हूँ.

रमा- कहाँ चलना है

मैं- घर, तुम्हारे घर.

 
#८७


रमा- अब मेरा उस जगह से कोई वास्ता नहीं रहा

मैं- घर तो घर होता है . माना की दुःख के बादल थे घने पर कभी तो सुख की किलकारी भी गूंजी होगी वहां पर. यदि मैं कहूँ की तेरे जख्मो पर मरहम लगा दूंगा तो गलत होगा. पर मैं एक नयी जिन्दगी जीने में तेरी मदद कर सकता हु रमा. तेरी बीती जिन्दगी में हमारे परिवार के कारन दुःख आये, माफ़ी मांगता हूँ ये जानते हुए भी की मेरी माफ़ी तुझे कुछ भी वापिस नहीं लौटा पायेगी. पर फिर भी मेरी विनती है की तू अपने घर चल.

रमा- तुम समझते क्यों नहीं कुंवर, अब मेरी जिन्दगी यही है . जो है जैसा है वैसा ही रहने दो. कभी कभी मिलने आते रहना बहुत रहेगा मेरे लिए.

मैं समझता था उसके दिल के हालात मैंने फिर ज्यादा जोर नहीं दिया . मुझे रुडा से मिलना था पर बहुत कोशिशो के बाद भी बात बन नहीं रही थी . वापसी में मैंने परकाश की गाडी को जंगल में देखा .

"ये चूतिये की गाड़ी इस वक्त जंगल में क्या कर रही है " मैंने सोचा और गाड़ी की तरफ बढ़ा पास जाकर देखा की प्रकाश किसी औरत को चोद रहा था . वैसे तो मेरी इच्छा नहीं थी ये सब देखने की पर मन के किसी कोने से आवाज आई की देख तो ले कौन है ये . मैं जितना पास हो सकता था उतना हुआ पर एक तो जंगल का अँधेरा उपर से धुंध समझ आ नहीं रहा था . ना ही वो दोनों आपस में कोई बात कर रहे थे .

औरत के हाथ गाड़ी के बोनट पर टिके हुए थे और परकाश पीछे से उसकी कमर थामे उसे पेल रहा था .

"जल्दी कर , देर हो गयी है " मैंने उस औरत की खनकती चूडियो के बीच आवाज सुनी.

प्रकाश- चिंता मत कर गाड़ी से छोड़ आऊंगा तुझे बहुत दिनों बाद मिली है तू पूरा मजा लूँगा तेरी चूत का.

फिर वो औरत कुछ नहीं बोली बस चुदती रही . दिल कह रहा था की आगे बढ़ कर पकड़ ले और देख की कौन औरत है पर मैं ऐसा कर नहीं सका. थोड़ी देर बाद उनकी चुदाई खत्म हुई तो परकाश ने गाडी मलिकपुर की जगह मेरे गाँव वाले रस्ते पर मोड़ ली. मैं और हैरान हो गया ये औरत मलिकपुर की नहीं थी . मेरे गाँव की औरत का प्रकाश के साथ चुदाई सम्बन्ध .

अब मैंने सोचा की ये तो देखना ही पड़ेगा पर तभी गाडी स्टार्ट हुई और तेजी से आगे बढ़ गयी . ये जानते हुए भी की मैं गाड़ी की रफ़्तार नहीं पकड़ पाउँगा मैं उसके पीछे भागा. होना ही क्या था मैं पीछे रह गया बहुत पीछे. खैर, जब मैं कुवे पर पहुँचने वाला था तो दूर से ही कमरे के जलते बल्ब को देख कर मैं समझ गया था की कोई मोजूद है वहां पर .

कुवे पर पहुँचते ही मैंने हाथ पाँव धोये और पानी पी ही रहा था की मैंने पाया की सरला थी वहां पर .

मैं- तू इतनी रात को यहाँ क्या कर रही है .

सरला- वो मंगू की वजह से देर हो गयी.

मैं- उसकी वजह से कैसे.

सरला- वो मछली पकड़ने गया कह कर गया था की जल्दी ही आऊंगा फिर साथ चलेंगे. मैंने सोचा की कुछ मछली मैं भी ले जाउंगी . पर देखो कब से राह देख रही हु उसकी.

मैं- मैंने तुझसे कहा था की शाम होते ही तू घर चली जाया कर.

सरला- गलती हुई कुंवर, आगे से ध्यान रखूंगी.

मैं- और वो चुतिया ऐसी कितनी मछली पकड़ेगा.

मैं जानता था की गाँव में सबसे जायदा मछली मंगू को ही पसंद थी . पर अकेली औरत को छोड़ कर ऐसे जाना बेवकूफी ही थी .

मैं- चल गाँव चलते है वो आ जायेगा.

सरला ने हाँ में सर हिलाया मैंने कमरे की कुण्डी लगाई ही थी की मंगू आता दिखा मुझे . मुझे देख कर मंगू खुश हो गया और बताने लगा की कितनी मछली पकड़ी उसने. पर मैंने उसे थोडा गुस्सा किया और समझाया की आगे से ऐसे काम नहीं करे. खैर फिर हम तीनो बाते करते हुए गाँव पहुँच गए. मैंने मंगू से कहा की जल्दी से पका लेना खाना मैं उसके घर ही खाऊंगा फिर सरला को उसके घर छोड़ने चला गया.

उसका ससुर आज भी नहीं आया था .

सरला- कुंवर, आज भी आओगे क्या

मैं- नहीं . आज मुझे कुछ काम है .

दरअसल मैं सरला के जिस्म की आदत नहीं डालना चाहता था खुद को. दूसरी बात मेरे दिमाग में ये बात थी की परकाश किस औरत को चोद रहा था . गाँव की औरत पटाना उसके लिए मुश्किल नहीं था क्योंकि राय साहब के काम की वजह से वो काफी आता-जाता था गाँव में . सरला की बड़ी इच्छा थी पर मैंने उसे मना किया और मंगू के घर पहुँच गया. मछली-रोटी का भोजन करके आत्मा त्रप्त हो गयी . मैंने वही चारपाई पर बिस्तर लगाया और रजाई ओढ़ कर पसर गया. प्यास के मारे मेरी आँख खुली तो उठ कर मैं सुराही से पानी पी रहा था की मेरी नजर पास वाली चारपाई पर पड़ी, मंगू वहां नहीं था . घर का दरवाजा खुला पड़ा था .

"ये कहाँ गया इतनी रात को " मैंने खुद से सवाल किया और कम्बल ओढ़ कर घर के बाहर गली में आ गया. मेरे दिमाग में एक ख्याल आया मैं सीधा सरला के घर गया दबे पाँव अन्दर घुसा , उसे मैंने सोते हुए पाया. न जाने मुझे लगा था की शायद मंगू ने सरला को भी पटा लिया हो. पर अनुमान गलत था .

अब उसे तलाशना मुमकिन नहीं था. वो कहीं भी किसी भी दिशा में जा सकता था . पर सवाल ये था की किस वजह से वो घर से बाहर निकला था इस ठिठुरती रात में. अब मेरा भी मन उचट गया था मैं वापिस मंगू के घर नहीं गया क्योंकि नींद टूट गयी थी . मैं कुवे की तरफ जाने के लिए गाँव से बाहर निकल गया. पगडण्डी पर पैर रखते ही उस जलते बल्ब को देख कर एक बार फिर मैं समझ गया था की कुवे पर कोई है , पर इतनी रात को कौन हो सकता है , क्या मकसद है आने वाले का सोचते हुए मैं कमरे के पास पंहुचा और उसे हल्का सा धक्का दिया. दरवाजा खुलते ही मेरी आँखे हैरत से फ़ैल गयी . ......................

 
#88

कमरे में मेरे बिस्तर पर लेटे हुए अंजू कोई किताब पढ़ रही थी . हमारी नजरे मिली

अंजू- तुम यहाँ इस वक्त

मैं- ये सवाल तो मुझे आपसे पूछना चाहिए वैसे ये कमरा मेरा ही है

अंजू- हाँ , मेरा मन था इधर आने का फिर घूमते घूमते रात ज्यादा हुई तो मैं यही रुक गयी.

न जाने क्यों मुझे उसकी बात झूठ लग रही थी.

मैं- बेशक मुझसे ज्यादा आप जंगल को जानती है पर इतनी रात को आपका यहाँ होना कारन कोई साधारण नहीं है.

अंजू- ये तो तुम पर निर्भर करता है की तुम कैसे समझते हो इस बात को.

उसने बिस्तर से उठने की जरा भी जहमत नहीं उठाई, जैसे उसे मेरे होने न होने से कोई फर्क पड़ा ही नहीं हो. मैं घास पर बैठ गया और कम्बल को थोडा और कस लिया.

मैं- जैसा मैंने कहा , इस जंगल में इन रातो में भटकने का हम सब का अपना अपना कारण है , ये जानते हुए भी की उस आदमखोर के रूप में मौत कभी भी सामने आकर खड़ी हो सकती है हम खुद को फिर भी रोक नहीं पा रहे . ये साधारण तो बिलकुल नहीं है . आप मुझसे बहुत ज्यादा जानती है , इस जगह को पहचानती है मैं आपके उसी ज्यादा में से थोडा कम जानना चाहता हूँ . मेरा पहला सवाल ये है की आपने मुझे ये लाकेट क्यों दिया, सिर्फ मुझे ही क्यों .

अंजू ने अपनी किताब साइड में रखी और बोली- पहली बार मैं तुमसे मिली थी कोई भेंट तो चाहिए थी न देने को .

मैं- खूबसूरत औरते झूठ बोलते हुए थोड़ी और निखर जाती है .

मेरी बात सुनकर अंजू मुस्कुरा पड़ी.

अंजू- इसे तारीफ समझे या ताना, ये लाकेट हमने तुम्हे क्यों दिया तुम जान जाओगे. दूसरी बात हम यहाँ क्यों है ,जैसा तुमने कहा हम सब के अपने अपने कारण है

मैं- रुडा की बेटी , रुडा के दुश्मन की जमीं पर रात को अकेली . सवाल तो उठेगा ही .

अंजू- जितना हक़ रुडा का है उतना ही मुझ पर राय साहब का भी है,दोनों से ही मुझे बेइंतिहा स्नेह मिला

मैं- तो फिर रुडा से क्यों नाराजगी है आपकी

अंजू- मैं आसमान में उड़ना चाहती हूँ , मेरे बाप को मेरी उड़ान पसंद नहीं वो मेरे कदमो में बेडिया चाहता है .

मैं- कैसी बेडिया

अंजू- वैसे हमें कोई जरुरत नहीं है तुम्हे ये किस्से बताने की पर चूँकि इस रात अब तुम हमारे साथ हो , बातो का सिलसिला है तो चलो बता ही देते है , तुम्हारी भाभी नंदिनी में हिम्मत थी वो आगे बढ़ गयी , हम कमजोर थे पीछे रह गए. और फिर पीछे रहते ही गए. हम अपनी पसंद से शादी करना चाहते थे हमारी पसंद हमारे बाप को मंजूर नहीं थी . करते तो क्या करते. हम चाहते तो घर से भाग जाते , पर इसमें नुकसान हमारा ही होता चौधरी साहब हमारे प्यार को मरवा देते. आज हम जिस भी हालात में है कम से कम तसल्ली तो है की हमारा प्यार हमारे साथ है .

मैं सोचता था की मैं ही आशिक हूँ पर इस जंगल में न जाने कितनी प्रेम कहानिया बिखरी पड़ी थी . अंजू ने लेटे हुए ही करवट ली और निचे रखे थर्मस से पानी का कप भरने लगी. उसकी चुडिया स्टील से थर्मस से टकराई और उस खनक ने मेरे कान हिला दिए. यही खनक तो मैंने सुनी थी , हाँ यही थी बिलकूल यही थी . मेरा तो सर ही घूम गया अभी मोहब्बत का किस्सा बताने वाली अंजू , ये अंजू ही तो चुद रही थी परकाश से.

मैं- एक बात पुछु

अंजू- हाँ

उसने पानी की घूँट भरी.

मैं- एक तरफ तो आप इतनी शिद्दत से अपनी मोहब्बत का जिक्र कर रही है और दूसरी तरफ कुछ घंटे पहले आप जंगल में वकील प्रकाश के साथ थी .

अंजू ने कप वापिस रखा और बोली- दुसरो के निजी पलो में ताका-झांकी बदतमीजी समझती जाती है .

मैं- मेरी नजर में उस नीच, गलीच प्रकाश के साथ चुदाई करना ज्यादा बड़ी बदतमीजी है .

मैंने जानबूझ कर चुदाई शब्द पर जोर दिया.

अंजू- इसे हम तुम्हारी पहली खता समझ कर माफ़ कर रहे है कबीर. दुबारा अपने शब्दों पर काबू रखना . खैर, जैसा हमने थोड़ी देर पहले कहा ये तुम पर निर्भर करता है की हम चीजो को कैसे समझते है . कभी तुमने इस बात पर गौर क्यों नहीं किया की प्रकाश ने कभी ब्याह क्यों नहीं किया . क्योंकि वो हमसे प्यार करता है . हम दोनों एक दुसरे से बेंतेहा प्यार करते है . ये एक ऐसा सच है जिसे हम छिपा भी नहीं सकते , बता भी नहीं सकते.

रुडा की बेटी वकील से प्यार करती थी , बहनचोद ये जिन्दगी मुझे न जाने क्या क्या दिखा रही थी .

मैं- बेशक प्रेम अँधा होता है पर इतना भी नहीं की दुष्ट इन्सान से ही इश्क कर बैठे.

अंजू- वो तुम्हे गलत लगता है क्योंकि तुम्हारा और उसका व्यवहार आपस में ठीक नहीं है. पर हमारे लिए क्या है वो हम जानते है उसकी नेकी , ईमानदारी इसलिए कम नहीं हो जाती की तुम्हे वो घटिया लगता है .

साले ने रुडा की बेटी से ही प्रेम किया था .

मैं- ये आपकी और उसकी बात है . न मुझे पहले कुछ लेना देना था न अब न आगे. मैं इस लाकेट के बारे में जानना चाहता हूँ .

अंजू- ये बस यूँ ही तो है , तुम्हे पसंद नहीं तो बेझिझक हमें वापिस दे सकते हो. हम बुरा नहीं मानेंगे.

मैं- ठीक है आप आराम करो मैं चलता हूँ .

अंजू- अरे इतनी रात कहाँ जाओगे.

मैं- ये जंगल मेरा भी घर है , कहीं न कहीं तो पनाह मिल ही जाएगी. वापसी में मैं मोहब्बत के बारे में सोचता रहा , ये दोनों लोग इसलिए अलग अलग रह रहे थे की मोहब्बत है , पर ये कैसी मोहब्बत थी जिसमे जुदाई थी . यहाँ मैंने महसूस किया की मैं मोहब्बत के बारे में कुछ नहीं जानता. चलते चलते मैं उस मोड़ पर आ गया जहाँ से एक रास्ता निशा के पास ले जाताथा दूसरा गाँव की तरफ.

बेशक बड़ी तममनना थी मुझे निशा का दीदार करने की पर न जाने क्यों मेरे कदम गाँव की तरफ बढ़ गए. जब मैं गाँव में पहुन्चा तो देखा की लोग घरो से बाहर निकले हुए थे. इतनी रात में लोगो का घर से बाहर होना किसी अनिष्ट की आशंका से दिल धाड़ धाड़ करने लगा. और जब मैं मोहल्ले में पहुंचा तो देखा की वैध की लाश उसके घर के बाहर पड़ी थी . ..................................

 
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