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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#47

कदम इतने भारी हो गए थे की क्या ही कहे. दुःख इस बात का नहीं था की निशा नाता तोड़ गयी थी दुःख ये था की जो हुआ गलत हुआ . बेशक वो एक डायन थी पर मेरे लिए वो बस एक दोस्त थी , एक साथी थी जिसके साथ रह कर मैंने जाना था की जिन्दगी कितनी खूबसूरत थी . वो चंद मुलाकाते इस जीवन का सबसे खूबसूरत दौर थी . जिस तरह से वो दिवाली की रात मेरे लिए आई थी . जिस तरह से वो मेरे कंधे पर सर रख कर बैठती थी .

भाभी की बातो से इतना आहत हो जाएगी निशा मैं ये जानता तो कभी नहीं कहता उसे वहां जाने को . जब मैं गाँव पहुंचा तो सब लोग अपने अपने घरो में दुबके हुए थे . बस मैं एक तनहा था . मैं उसी पेड़ के चबूतरे पर बैठ गया जहाँ पर लाली को लटकाया था . मैं सोचने लगा चंपा-मंगू मेरे बचपन के साथी मुझसे न जाने क्या छिपाए हुए थे. मेरी भाभी जिसकी मुस्कान देखे बिना मैंने कभी अन्न ग्रहण नहीं किया था सब लोग पराये हो बैठे थे . और वजह क्या थी , की मैं अपनी जिन्दगी अपनी मर्जी से जीना चाहता था .

घर पहुंचा तो दरवाजा खुला हुआ था चाची शायद जाग गयी थी . मैंने चुपचाप रजाई ओढ़ी और सोने की कोशिश करने लगा. जब जागा तो देर हो गयी थी . मालूम हुआ की पिताजी रात को लौट आये थे और मेरे जागने का इंतज़ार कर रहे थे . मैं तैयार होकर उनके पास गया .

मैं- आपने याद किया पिताजी

पिताजी- बरखुरदार, समझ नहीं आता की तुमसे क्या कहे. तुमने तो जैसे कसम ही खा ली है की राय साहब के नाम को मिटटी में मिला ही दोगे

मैं- क्या भूल हुई मुझसे पिताजी

पिताजी- रुडा और उसके लड़के से झगडा करने की क्या जरूरत थी तुमको.

मैं- उन निचो को सबक सिखा रहा था मैं तो

पिताजी- रुडा हमारा बहुत सम्मान करता है कबीर.

मैं- इस बात से वो सही तो साबित नहीं हो जाता

पिताजी- सही तो तुम भी नहीं हो. राय साहब का लड़का दारू के नशे में नाचने गाने वाले भाँड़ो के साथ चुतड मटका रहा था कितने फक्र की बात है हमारे लिए. कब तक हम तुम्हारी गुस्ताखियों पर पर्दा डालते रहेंगे.

मैं- लड़ाई रुडा के लड़के ने शुरू की थी

पिताजी- तंग आ गए है हम ये बहाने सुन सुन कर

मैं- तो आप ही बताये आप की ख़ुशी के लिए मैं क्या करू.

पिताजी- सुधर जाओ. इस उम्र में अच्छा नहीं होगा की हम तुम्हारी खाल खींचे

मैं खामोश रहा . जानता था की बात बढाने का कोई फायदा नहीं है.

पिताजी- दूसरी बात. हमें कहना तो नहीं चाहिए पर कहना पड़ रहा है . ये जो तुम कहाँ भी अपनी राते काली कर रहे हो . ये याद रखना इस गाँव की तमाम बहन-बेटी-बहुओ को हम एक नजर से देखते है . जवान बेटे को काबू रखना थोडा मुश्किल जरुर होता है बाप के लिए पर मेरी बात याद रखना यदि कोई भी ऐसी-वैसी शिकायत आई की तुमने किसी भी बहन-बेटी को ख़राब किया तो हम ये भूल जायेंगे की तुम हमारा खून हो.

ये चुतिया बात सुन कर मुझे तैश आ गया .

मैं- पिताजी , ये कहना गुस्ताखी ही होगी पर मैं ये गुस्ताखी करूँगा जरुर. आपको अपनी औलाद पर इतना भरोसा तो रखना चाहिए . मैं उलझा हूँ अपने आप में मुझे बस थोडा सकूं चाहिए . मिले तो मेहरबानी इस परिवार की . मेरा किसी भी औरत-भाभी- बहन से कोई ऐसा रिश्ता नहीं है . मेरे कुछ सवाल है जिनका जवाब की तलाश है बस

पिताजी- काम में मन लगाओ उलझने अपने आप सुलझ जाएँगी. कितनी बार कहा है अभिमानु के काम में हाथ बंटाओ या कहो तो कोई और काम धंधा जो भी तुम करना चाहो खोल दू

मैं- किसान हु पिताजी . गुजारे लायक आमदनी धरती दे देती है मुझे और फिर मेरी ख्वाहिशे है ही कितनी

पिताजी- तेरी इस सादगी ने ही मुझे पशोपेश में डाला हुआ है . खैर कल हम शेखर बाबू के घर जायेंगे और हो सका तो विवाह की तारीख पक्की कर आयेंगे. तुम अभी मलिकपुर जाओ सुनार के पास और पूछो की चंपा के गहने कब तक तैयार होंगे.

मैं- चंपा ने गहनों के लिए मन कर दिया

पिताजी ने अपना चश्मा उतारा और बोले- जा जाकर उसे बुला ला.

मैंने चंपा को संदेस दे दिया और वापिस से चाची के घर चला गया जहाँ पर भाभी भी मोजूद थी .

मैं- पिताजी गुस्सा है मुझसे, तुम्हारे पास मौका है और कान भर दो उनके

भाभी- देख रही हो चाची . अब हम पराये हो गए इसके लिए . हम तो इसका भला ही चाहते है न

मैं- काश मैं तुमको बता सकता की मेरे मन में कितनी व्यथा भरी है इस समय . ये रात जो बीती कितनी लम्बी थी मैं ही जानता हूँ.

भाभी- चाची लड़का आशिक हो गया है तुम्हारा

मैं- आशिकी तो अभी शुरू ही नहीं हुई भाभी, जिस दिन उसने कहा मुझसे की थाम ले हाथ मेरा. तुम्हारी कसम इस चोखट पर दुल्हन बना कर खड़ी करूँगा उसे. और कोई भी रोक नहीं पायेगा मुझे.

चाची- तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो बात क्या है और ये किसका जिक्र है मुझे बताओ जरा

भाभी- हमारे कुवर का दिल लग गया है और जिस से लगा है वो एक डाकन है .

मैं- वो डाकन ही मेरी दुल्हन बनेगी

चाची इस से पहले की कुछ कहती चंपा अन्दर आ गयी और बोली- राय साहब ने कहा है की अभी मलिकपुर चलो .

मैं चंपा संग बाहर निकल गया उसे साइकिल पर बिठाया और मलिकपुर की तरफ चल दिए. थोड़ी देर में ही गाँव छूट गया .

चंपा- खामोश क्यों है कुछ तो बोल . क्या नाराज है मुझसे

मैं- नाराज तो हूँ .

चंपा- और ये नाराजगी कैसे दूर होगी

मैं- तू दे देगी तो दूर हो जाएगी .

चंपा- ये तू कह रहा है . ये तू कह ही नहीं सकता तू मुझे जलील करना चाहता है न कबीर.

मैं- जलील तो मेरी जिन्दगी मुझे कर रही है चंपा

चंपा- मैं जानती हूँ . तू जानना चाहता है की मैंने झूठ क्यों बोला पर यकीन कर मेरा

मैं- मुझे फर्क नहीं पड़ता ,

चंपा -तेरी यही जिद है तो तू वादा कर मुझसे तुझे जो मैं बताउंगी वो बात किसी भी तीसरे को मालूम नहीं होगी. ऐसा हुआ तो तू मेरा मरा हुआ मुह देखेगा .

मैंने साइकिल रोकी .

मैं- उस रात तेरे बाहर जाने की वजह क्या थी .

चंपा की आँखों में आंसू भर आये.

"तू यकीन करेगा न मेरा . " चंपा की रुलाई फूट पड़ी .

 
#48


मैं बस चंपा को देखता रहा मुझे इंतजार था सच सुनने का

चंपा- उस रात मैं दाई के पास गयी थी ,

मैं- तुझे दाई से क्या काम पड़ गया .

चंपा- क्योंकि मेरे पास और कोई चारा नहीं था . कबीर मैं पेट से हूँ.

चंपा ने जब ऐसा कहा तो मेरे कदमो के निचे से जमीन सरक गयी. मैंने अपना माथा पीट लिया . मैं सड़क किनारे धरती पर बैठ गया क्योंकि मेरे पैरो में शक्ति नहीं बची थी खड़ा होने की .

चंपा- उस रात मैं तीन लोगो से मिलना चाहती थी तुझसे, दाई से और अभिमानु से . मैं दाई के दरवाजे तक पहुँच तो गयी थी पर मेरी हिम्मत नहीं हुई की उसे बता सकू . फिर मैंने सोचा की तुझे बता दू पर एक बार फिर मैं हिम्मत नहीं कर पाई. तू मंगू वाली बात से वैसे ही नाराज था मेरे पास अब सिर्फ एक रास्ता था की मैं अभीमानु से मदद मांगू . मैं इसी कशमकश में उलझी थी की तभी उस कारीगर ने मुझ पर हमला कर दिया और किस्मत से तू वही आ गया .

मुझे बिलकुल समझ नही आ रहा था की मैं क्या कहूँ .

चंपा- बोल कुछ तो

मैं- कितने दिन का है ये

चंपा- शायद एक महीने का

मैं -तू नहीं जानती तूने क्या किया है . अरे मुर्ख किसी को भी अगर भनक हुई न तो तेरा क्या हाल होगा सोचा तूने.

चंपा- जानती हूँ इसीलिए मैंने सोचा की अभिमानु को सब सच बता दूंगी

मैं- तेरी खाल उतार देता वो .जानती है न अपने छोटो से कितना स्नेह है उसे . तेरी हरकत जान कर भैया मालूम नहीं क्या करते तब तो मरी ही मरी थी तू. पर तू फ़िक्र मत कर , करूँगा कुछ न कुछ . तुझे बच्चा गिराना होगा .

चंपा ने नजरे नीची कर ली.

मैं- अब क्या फायदा . मैंने तुझे कितना समझाया मुझे क्या तू बुरी लगती थी . ये गंद फैलाना होता तो मैं ही रगड़ लेता तुझे. और मंगू की तो मैं गांड ऐसी तोडूंगा याद रखेगा वो . तू जानती है मैं कितना परेशां हूँ भाभी ने मेरा जीना हराम किया हुआ है मेरे से मेरी उलझने नहीं सुलझ रही और तुम लोग रुक ही नहीं रहे रायता फ़ैलाने से.

चंपा- गलती हुई मुझसे . मैं तुझे वचन देती हूँ कबीर मैं आगे से ऐसा कुछ नहीं करुँगी.

मैं- तेरी गांड ना तोड़ दूँ मैं दुबारा ऐसा हुआ तो. बैठ अब मलिकपुर वाला काम निपटाके मैं ले चलूँगा शहर तुझे मेरा दिल तो नहीं कर रहा क्योंकि इस जीव का क्या दोष है . तेरे पापो की सजा इसे भुगतनि पड़ेगी . न जाने इस पाप की क्या सजा होगी.

बुझे मन से हम लोग मलिकपुर की तरफ चल दिए एक बार फिर से. वहां जाकर मैंने सुनार को राय साहब की चिट्ठी दी और चंपा ने अपना नाप दिया. सुनार ने बहुत देर लगाई तरह तरह के गहने दिखाता रहा वो हमें. वापसी में मैंने देखा की हलवाई ताजा जलेबी उतार रहा था चंपा को जलेबी बहुत पसंद थी तो मैंने हलवाई से कहा की थोड़ी जलेबी हमें दे. मैंने सोचा की तब तक मैं साइकिल में हवा भर लेता हूँ .चंपा जलेबी खा ही रही थी की उधर से सूरजभान निकल आया.

"उफ़ आज तो शहद ने शहद को चख लिया " सूरजभान ने चंपा के होंठो से लिपटी चाशनी देखते हुए फब्ती कसी.

चंपा- होश में रह कर बात कर तेरा मुह तोड़ दूंगी

सूरजभान- मुह का मेरा सब कुछ तोड़ दे. ऐसा फूल देख कर दिल कर रहा है की चख लू मैं . बोल क्या खुशामद करू मैं तेरी .

सूरजभान अपनी गाड़ी से उतर कर चंपा के पास गया और उसका हाथ पकड़ लिया

चंपा- हाथ छोड़ मेरा

सूरजभान- तू एक बार दे दे . हाथ क्या मैं जहाँ छोड़ दू.

सूरजभान ने अपनी पकड़ मजबूत कर दी चंपा की कलाई पर .

"माना की घी का कनस्तर खुले में है पर कुत्ते को अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए . हाथ पकड़ ने से पहले सोच तो लेता की इसके साथ कौन है " मैंने उन दोनों की तरफ आते हुए कहा .

सूरजभान ने पलट कर मुझे देखा और उसके चेहरे का रंग बदल गया .

सूरजभान- तू, तू यहाँ

मैं- हाथ छोड़ इसका

सूरजभान- नहीं छोडूंगा, मेरा दिल आ गया है इस पर तू कही और जाकर अपना मुह मार.

मैं- मुझे दुबारा कहने की आदत नहीं है . मेरी बात ख़त्म होने से पहले अगर तूने इसका हाथ नहीं छोड़ा तो तेरा हाथ तेरा कंधा छोड़ देगा .

सूरजभान- एक बार क्या तू जीत गया खुद को खुदा समझ रहा है उस दिन मैं नशे में था वर्ना तेरी हेकड़ी तभी मिटा देता.

मैं- आज तो नशे में नहीं है न तू .

सूरजभान ने चंपा का हाथ छोड़ दिया पर नीचता कर ही दी उसने . उसने चंपा के सीने पर हाथ फेर दिया. और मैंने उसकी गर्दन पकड़ ली.

मैं- भोसड़ी के , तुझे समझ नहीं आया मैंने कहा न ये मेरे साथ है फिर भी बहन के लंड तू मान नहीं रहा . जानना चाहता है , देखना चाहता है मेरे अन्दर जलती आग को.

सूरजभान ने एक मुक्का मेरे पेट में मारा और बोला- अभिमानु आया था . माफ़ी मांग कर गया था वो . कह रहा था की गलती हो गयी उसके भाई से माफ़ करो. उस से जाकर पूछना की सूरजभान कौन है . फिर बात करना . मैं वो आग हूँ जिसमे तू झुलसेगा नहीं जलेगा.

मैं- इतने बुरे दिन नहीं आये है की मेरे जीते जी मेरा भाई किसी से माफ़ी मांगे. तूने तो औकात से बड़ी बात कह दी . शुक्र मना की मैंने भैया से वादा किया है की खून खराबा नहीं करूँगा वर्ना दारा की लाश तूने देखि तो जरुर होगी . सोच मैं तेरे साथ क्या करूँगा.

मेरी बात सुन कर सूरजभान के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी वो पीछे सरक गया . मैंने चंपा का हाथ थामा और दुसरे हाथ में साइकिल लेकर आगे बढ़ गया .

"ये दुश्मनी बड़ी शिद्दत से निभाई जाएगी कबीर. शुरुआत तूने की थी अंत मैं करूँगा. मुझे शक् तो था पर तूने आज मोहर लगा दी . मैं कसम खाता हूँ तू रोयेगा. तू भीख मांगेगा मौत की और मैं हसूंगा " सूरजभान ने पीछे से कहा

मैं- इंतजार रहेगा मुझे उस दिन का

मैंने बिना उसकी तरफ देखे कहा .

सूरजभान- पहला झटका तो तूने देख ही लिया अपनी बर्बाद फसलो को देखना तुझे मेरी याद आयेगी

उसकी ये बात सुनकर मैं बुरी तरह चौंक गया तो क्या नहर टूटने में इस मादरचोद का हाथ था. पर मैंने सब्र किया क्योंकि मेरे साथ चंपा थी . दो पल मैं रुका और बोला- तेरे बाप ने मर्द पैदा किया है तुझे तो ये रांड वाली हरकते मत करना . शेर का शिकार करने के लिए शेर का कलेजा ही चाहिए चूहे का नहीं . जिस दिन तुझे लगे की तू इस काबिल है की कबीर को टक्कर दे सकता है मिलना मुझसे . तेरी एक एक हड्डी को तेरे बंद से निकाल लूँगा.

सूरजभान- वो दिन जल्दी ही आएगा.

मैंने उस को अनसुना किया और आगे बढ़ गया.

 
#49

चंपा- कौन था ये और तुझे कैसे जानता है

मैं- लम्बी कहानी है तू सुन नहीं पायेगी मैं बता नहीं पाउँगा

चंपा- तेरे सामने उसने मुझे पकड़ा तेरा खून नहीं खौला इतना निर्मोही हो गया तू

मैं- खून तो मेरा उस दिन से खौल रहा है . खून तो मेरा तब से उबल रहा है जब से मुझे मालूम हुआ की तेरे पेट में बच्चा है . ये तेरी खुशकिस्मती है जो मैं शांत हूँ, रही बात उस सूरजभान की तो मैं जानता हु मैं क्या कर सकता हूँ इसलिए खुद को रोका है .एक बार बेकाबू हुआ था आज तक पछतावा है मुझे. मेरे मन में बहुत सवाल है चंपा इतने की मैं पूछता रहूँगा तू जवाब देते देते थक जाएगी. फ़िलहाल मेरी इच्छा है की किसी तरह तेरा ब्याह हो जाये और तू यहाँ से राजी ख़ुशी निकल जाये मैं नहीं चाहता की एक और लाली की लाश पेड़ पर टंगी मिले.

चंपा फिर कुछ नहीं बोली. तनहा दिल लिए हम दोनों वापिस घर आये. मैंने उस से चाय बनाने को कहा और हाथ मुह धोनेचला गया . चबूतरे पर बैठ कर मैं चुसकिया ले रहा था की भैया आ गए.

मैं- आपसे मिलने की ही सोच रहा था मैं .

भैया- हाँ छोटे बता क्या कहना था .

मैं- मुझे कुछ पैसे चाहिए थे .

भैया ने दस दस के नोटों की गद्दी निकाली और मुझे दे दी .

मैं- पचास वाली की जरूरत है भाई

भैया ने एक बार मेरी तरफ देखा और बोले- हाँ क्यों नहीं

भैया ने बड़े नोटों की गद्दी मुझे दी.

मैं- एक बात पूछनी थी

भैया- पहेलियाँ क्यों बुझा रहा है जो मन में है सीधा कह न

मैं- सूरजभान से माफ़ी मांगने की क्या जरुरत आन पड़ी थी आपको . आप जानते है की मेरा भाई मेरा गुरुर है और मेरी वजह से मेरे भाई को झुकना पड़े ये बर्दाश्त नहीं होगा मुझे

भैया- तू भी न छोटी छोटी बातो को दिल से लगा लेता है . हम व्यापारी आदमी है . हमें अपना रसूख देखना है हम लोग समय आने पर लोगो को झुकाते है . एक बार बात आई गयी करने के हमें भविष्य में फायदे मिलेंगे.

भैया झूठ बोल रहे थे मैं एक पल में जान गया था . मेरा भाई , मेरा बाप जिनके आगे दुनिया झुकती थी वो किसी के आगे हाथ जोड़ दे. मामला कुछ और ही था . पर मैं भैया के आगे कुछ नहीं बोला.

मैं- भैया , वो चंपा की तबियत कुछ ठीक नहीं है आप की आज्ञा हो तो मैं उसे शहर के डॉक्टर को दिखा लाऊ

भैया- ये कोई पूछने की बात है . जायेगा तो तेरा कन्धा भी दिखा आना

मैंने हाँ में सर हिलाया . तभी भाभी ने भैया को आवाज दी तो वो चले गए .

मेरा दिल कर रहा था की मैं मंगू से पुछु पर चाह कर भी हिम्मत नहीं कर पाया. अँधेरा घिरने लगा था मैंने शाल ओढा और अलाव जला कर बैठ गया . सामने बहुत सी समस्या थी सूरजभान ने मेरी फासले डुबाने को नहर तोड़ दी. मेरे साथ और भी गाँव वालो का नुकसान हुआ था . मैंने सोचा की इस मामले को पांच गाँवो की महापंचायत में उठाऊ पर सूरजभान धूर्त था वो साला साफ़ मुकर जाता और मेरे पास सबूत नहीं था .

जमीनों की रखवाली के लिए मजदुर लगा नहीं सकता था क्योंकि उस हमलावर के खौफ से कोई तैयार नहीं था जान सबको प्यारी थी. आज से चांदनी राते शुरू हो रही थी जितने भी हमले हुए थे इन चांदनी रातो में हुए थे . क्या ये सिलसिला फिर से शुरू होगा ये सोच कर मेरी झुरझुरी छूट गयी .

"खाने में क्या बनाऊ कबीर " चंपा ने मुझसे पूछा तो मेरी तन्द्रा टूटी.

मैं- भूख नहीं है

चंपा मेरे पास बैठी और बोली- जानती हु तू मेरी वजह से परेशां है .

मैं- तेरी वजह से क्यों परेशां होने लगा मैं. मुझे और भी बहुत समस्या है .

चंपा- तेरा हक़ बनता है मुझसे नाराज होने का .

मैं- मेरे हक़ की बात करती है तू . मेरा हक़ था तेरी दोस्ती का मैं अपनी दोस्ती निभा रहा हूँ. मरते दम तक निभाऊंगा .

सर में दर्द हो रहा था तो मैं बिस्तर में घुस गया . न जाने कितनी देर बाद मेरी आँख खुली . कमरे में घुप्प अँधेरा था . प्यास के मारे गला सूख रहा था . मैं पानी के लिए मटके के पास गया . पानी पी ही रहा था की मुझे लगा खिड़की पर कोई है . इतनी रात में हमारी खिड़की पर कौन हो सकता है . मैंने चुपचाप दबे पाँव दरवाजा खोला और खिड़की के पास गया . वहां कोई नहीं था सिवाय सन सनाती सर्द हवा के.

मैं अच्छी तरह से जानता था की मेरा वहम तो कतई नहीं था . चूँकि आज बिजली नही थी तो मुझे दिक्कत हो रही थी अँधेरे में देखने के लिए. तभी भैंसों की चिंघाड़ से मेरे कान सतर्क हो गए. मैं तुरंत उस तरफ भागा ये हमारे पड़ोसियों का तबेला था . मैंने देखा की तबेले का दरवाजा खुला हुआ था और अन्दर एक भैंस दर्द से बिलख रही थी उस पर कोई झुका हुआ था .

"बस बहुत हुआ . बहुत खून पी लिया तूने अब और नहीं " मैंने कहा

वो जो भी था उसने पलट कर मुझे देखा और उसकी लाल आँखे मुझे ऊपर से निचे तक देखने लगी.

"तू जो भी है जैसा भी है . मैं उम्मीद करता हूँ की तू मेरी बात समझ रहा होगा. आज मैं तुझे जाने नहीं दूंगा. आज की रात तू मुझसे मुकाबला कर या तो तू नहीं या मैं नहीं " मैंने जोर देकर कहा.

वो शक्श दो पल मेरे करीब आकर मुझे देखता रहा और फिर उसने दूसरी तरफ छलांग लगा ही दी थी की मैंने उसका हाथ पकड़ लिया

मैं- नहीं . बिलकुल नहीं .

मै पहले ही गुस्से से भरा था ऊपर से इसकी ही तो तलाश थी मुझे . इसे अगर आज जाने देता तो फिर ये किसी न किसी को मारता . मैंने खीच कर मुक्का उसकी नाक पर मारा . वो कुछ कदम पीछे सरका और अगले ही पल उसने मेरी गर्दन पकड़ ली. उसकी मजबूत पकड़ मेरी सांसो को रोकने लगी. मैं छुटने की भरपूर कोशिश कर रहा था पर नाकामी ही मिली मैंने उसके पेट पर लात मारी उसने मुझे हवा में फेंक दिया.

पर आज मैं कोई मौका उसे नहीं देना चाहता था . मैंने उसका पैर पकड़ा और उसे पीछे की तरफ खींचा . इसी बीच उसके नाखून मेरी शर्ट को फाड़ गए. वो भागता इस से पहले ही मैंने उसे पटक दिया. तबेले का दरवाजा जोर की आवाज करते हुए टूट कर बिखर गया. हम दोनों गली में आ गए. वो उठ खड़ा हुआ उसने अपने कंधे चटकाए और दो तीन मुक्के मारे मेरे सीने पर. मुझे महसूस हुई उसकी ताकत .

पर आज कबीर ने ठान लिया था की इस किस्से को यही ख़त्म करना है .

मैं- चाहे जितनी कोशिश कर ले आज या तो तू नहीं या मैं नहीं.

इस बार मैंने उसे उठा कर फेंका तो वो बैलगाड़ी के पहिये में लगे लोहे के टुकड़े से जा टकराया. जोर से चीखा वो .

मैं- जिनको तूने मारा वो भी ऐसे ही चीखे होंगे न.

मैं उसके पास गया और उसके पाँव को मरोड़ने लगा. पर तभी साला गजब ही हो गया.
 
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जब भाभी का दिल भर गया तो उन्होंने बेल्ट फेक दी और मुझे अपने सीने से लगा कर रोने लगी. रोती ही रही. जिन्दगी में पहली बार मैंने भाभी की आँखों में आंसू देखे.

भाभी- किस मिटटी का बना है तू

मैं- तुम जानो तुम्हारी ही परवरिश है

भाभी- इसलिए तो मैं डरती हूँ . तेरी नेकी ही तेरे जी का जंजाल बनेगी

मैं- जब जानती हो तो फिर क्यों करती हो ये सब

भाभी- क्योंकि तू झूठ पे झूठ बोलता है . तू ही कहता है न की मैं भाभी नहीं माँ हु तेरी और तू उसी माँ से झूठ बोलता है . तू नहीं जानता तू किस चक्रव्यूह में उलझता जा रहा है . तू सोचता है की तू जो कर रहा है भाभी को क्या ही खबर होगी. मैं तुझे समझाते हुए थक गयी की नेकी अपनी जगह होती है और चुतियापा अपनी जगह .

मैं-काश आप मुझे समझ सकती

भाभी- मैं तुझसे समझ सकती . अरे गधे , होश कर . खुली आँखों से देख दुनिया को. तुझे क्या लगता है भाभी पागल है जो तेरे पीछे पड़ी है . तू जो भी कर रहा है सब कुछ जानती हूँ मैं . सब कुछ . जो राह तूने चुनी है उस पर तुझे कुछ नहीं मिलेगा धोखे के सिवाय. जो भी रिस्तो के दामन तू थाम रहा है सब झूठे है . मक्कारी का चोला है सब के चेहरे पर यही तो तुझे समझाने की कोशिश कर रही हु मैं.

मैं- मैं बस अपनी दोस्ती का फर्ज निभा रहा हूँ

भाभी- फर्ज निभाने का मतलब ये नहीं की आँखों पर पट्टी बाँध ली जाये.

मैं- मतलब

भाभी- जिसके लिए तूने इतना बड़ा कदम उठा लिया. मुझसे तक तू झूठ बोला जिसके पाप का बोझ अपने सर पर तूने उठा लिया उस से जाकर एक बार ये तो पूछ की किसका है वो .

मैं- मुझे जरूरत नहीं मैं उसे और शर्मिंदा नहीं करना चाहता

भाभी- य क्यों नहीं कहता की तुझमे हिम्मत नहीं है तू उस सच का हिस्सा तो बनना चाहता है पर जानना नहीं चाहता उस सच को .

मैं- तुम जानती हो न सब कुछ बता दो फिर.

भाभी- जानता है पीठ पीछे ये दुनिया मुझे बाँझ कहती है . पर मैंने कभी बुरा नहीं माना क्योंकि अभिमानु कहता है कबीर इस आँगन में है तो हमें औलाद की क्या जरूरत . तू कभी नहीं समझ पायेगा मुझे कितनी फ़िक्र है तेरी. पराई लाली के लिए जब तुझे गाँव से लड़ते देखा तो तेरे मन के बिद्रोह को मैंने पहचान लिया था . उसी पल से मैं हर रोज डरती हूँ , मैं जानती हूँ तुझे . तुझ पर बंदिशे इसलिए ही लगाई क्योंकि मुझे डर है की तू किसी का हाथ अगर थाम लेगा तो छोड़ेगा नहीं और फिर वो घडी आएगी जो मैंने उस दिन देखि थी . अपने बच्चे को उस हाल में कौन देख पायेगी तू ही बता.

मैं खामोश रहा

भाभी- तूने एक बार भी चंपा से नहीं पूछा की उसके बच्चे का बाप कौन है . ये तेरी महानता है पर तुझे मालूम होना चाहिए . तू हिम्मत नहीं करेगा उस से पूछने की , उसे रुसवा करने की पर इतना तो समझ की दोस्ती का मान तभी होता है जब वो दोनों तरफ से निभाई जाए.

मैं- तुम तो सब जानती हो तो फिर तुम ही बता दो न कौन है वो सक्श

भाभी ने एक गहरी साँस ली और बोली- राय साहब

भाभी ने जब ये कहा तो हम दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छा गयी . ये एक ऐसा नाम था जिस पर इतना बड़ा इल्जाम लगाने के लिए लोहे का कलेजा चाहिए था .और इल्जाम भी ऐसा था की कोई और सुन ले तो कहने वाले का मुह नोच ले.

मैं- होश में तो हो न भाभी

भाभी- समय आ गया है की तू होश में आ कबीर और आँखे खोल कर देख इस दुनिया को. जानती हु परम पूजनीय पिताजी पर इस आरोप को सुन कर तुझे गुस्सा आएगा पर मैं तुझे वो काला सच बता रही हूँ जो इस घर के उजालो में दबा पड़ा है .

मैं- मैं नहीं मानता . तुम झूठ कह रही हो .

भाभी- ठीक है फिर तुम्हारे और चाची के बीच जो रिश्ता आगे बढ़ गया है कहो की वो भी झूठ है .

भाभी ने एक पल में मुझे नंगा कर दिया . भाभी मेरे और चाची के अवैध संबंधो के बारे में जानती थी .

मै चुप रहा . कुछ कहने का फायदा नहीं था .

भाभी- कहो की जो मैं कह रही हूँ झूठ है .

मैं सामने खिड़की से बाहर देखने लगा.

भाभी- मैंने तुमसे इस बारे में कोई सवाल नहीं किया क्योंकि चाची की परवाह है तुम्हे पर वकत है की तुम्हे अब फर्क करना सीखना होगा.

मैं- राय साहब बेटी समझते है चंपा को

भाभी- तू जाकर पूछ चंपा से तेरी दोस्ती की कसम दे उसे . तुझे जवाब मिल जायेगा

मैं- क्या चाची के भी पिताजी से ऐसे सम्बन्ध है

भाभी- ये चाची से क्यों नहीं पूछते तुम

मैं- मेरे सर पर हाथ रख कर कहो ये बात तुम भाभी

भाभी मेरे पास आई और बोली- तू रातो के अंधेरो में भटकता है एक बार इस घर के अंधेरो में देख तुझे उजालो से नफरत हो जाएगी.

मैं- और निशा, उसका क्या तुम्हारी वजह से वो छोड़ गयी मुझे

भाभी- उसे जाना था . वो जानती है एक डाकन और तेरा कोई मेल नहीं

मैं- जी नहीं पाऊंगा उसके बिना

भाभी- तो फिर मरने की आदत डाल ले.

मैं- मोहब्बत की है मैंने निशा से उसे भूल जाऊ ये हो नहीं सकता .

भाभी- दुनिया में कितनी हसीना है . एक से बढ़ कर एक तू किसी पर भी ऊँगली रख मैं सुबह से पहले तेरे फेरे करवा दूंगी.

मैं- तुम समझ नहीं रही हो भाभी . तुम समझ सकती ही नहीं भाभी

भाभी- मैं समझना चाहती ही नहीं क्योंकि मुझमे इतनी शक्ति नहीं है की अपने बच्चे को ज़माने से लड़ते देखू.

भाभी उठ कर चली गयी मेरे मन में ऐसा तूफान छोड़ गयी जो आने वाले समय में सब कुछ बर्बाद करने वाला था . सारी दुनिया के लिए पूजनीय, सम्मानीय मेरा बाप अपनी बेटी की उम्र की लड़की को पेल रहा था . पर सवाल ये था की अगर चंपा को राय साहब ने गर्भवती किया था तो फिर वो पिताजी से मदद क्यों नहीं मांगी .....................कुछ तो गड़बड़ थी .

 
मन में मेरे बहुत सवाल थे.मैंने पिताजी को देखा जो आराम से अपने कमरे में बैठ कर जाम पीते हुए अपना काम कर रहे थे. मैं चाची के पास गया तो पाया की वो खाने की तयारी कर रही थी . सफ़ेद लहंगे और नीले ब्लाउज में बड़ी कड़क लग रही थी वो. चाची ने ओढनी नहीं ओढ़ी हुई थी तो तंग ब्लाउज में मचलती छातिया और लहंगे में उनकी मदमस्त जांघे , फूली हुई चूत की वी शेप का उभार साफ दिख रहा था . मैं अपने लंड को खड़ा होने से रोक नहीं पाया.


मैं चाची के पास गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया

चाची- क्या करता है . रात पड़ी है न ये करने के लिए

मैं- आज बड़ी गंडास लग रही हो रुका नहीं जा रहा

चाची- ऐसा क्या है आज

मैंने चाची की चूची को मसला और बोला- इस जोबन से पूछो जो दिन दिन हाहाकारी हुए जा रहा है . ये नितम्ब जब तुम चलती हो तो न कसम से न जाने गाँव के कितने दिल सीने से बाहर आकर गिरजाते होंगे.

चाची- इतनी भी सुन्दर नहीं हूँ मैं ये मस्का मत लगा और बता क्या बात है

मैं- बात क्या होगी बस लेने का मन है मेरा.

चाची- तो मैं कौन सा मना कर रही हूँ . सोयेंगे तब कर लेना

मैं- थी है पर एक बार लहंगा उठाओ मुझे देखनी है

चाची- तू भी न

चाची ने अपना लहंगा पेट तक उठाया . गोरी जांघो के बिच दबी चाची की काले बालो से भरी मदमस्त चूत . उफ्फ्फ मैं सच में ही चाची को हद से जायदा पसंद करने लगा था. मैं उसी पल चूत की एक पप्पी लेना चाहता था पर चाची ने मुझे मौका नहीं दिया. तभी बाहर से मंगू की आवाज आई तो मै बाहर की तरफ चला गया .

मैं- क्या हुआ मंगू

मंगू- वो अभिमानु भैया कहके गए थे की कुवे पर मिले उनसे तो चल

मैं- मुझसे तो कुछ नहीं कहा भैया ने

मंगू- उनसे ही पूछ लेना चल तो सही

मैं- साइकिल निकाल मैं गर्म कपडे पहन लू जरा और हाँ तू चलाएगा साइकिल

मंगू- ठीक है जल्दी आना

भैया ने रात में हमें क्यों बुलाया था खेतो पर सोचने वाली बात थी . खैर, हम दोनों चल दिए कुवे की तरफ .

मंगू- लगता है की आजकल खुराक कुछ ज्यादा खाई जा रही है भारी हो गया है भाई तू

मैं- अच्छा,

मंगू- खिंच नहीं रही साइकिल

मैं- बहाने मत बना

बाते करते हुए हम लोग पहुँच गए देखा की भैया की गाड़ी पहले से खड़ी थी पगडण्डी के पास. हम लोग कुवे पर पहुंचे तो देखा की भैया ने अलाव जलाया हुआ था और बोतल भी खोल रखी थी .

मैं- महफ़िल लगाई हुई है आज तो

भैया-अरे कुछ नहीं, ठण्ड में इतनी तो चाहिए ही

मंगू- सही कहा भैया

मंगू ने बिना की शर्म के बोतल उठाई और अपना जुगाड़ करने लगा.

मैं- यहाँ क्यों बुलाया

भैया- घर पर पिताजी है उनको मालूम होगा तो फिर गुस्सा करेंगे

मैं- सो तो है

मैंने कुछ मूंगफली उठाई और खाने लगा.

भैया- मैंने न कुछ जमीन और खरीदने का सोचा है

मंगू- ये तो बहुत बढ़िया विचार है भैया

भैया- पर सवाल ये है की हम उस जमीन का करेंगे क्या . खेती तो हम पहले ही बहुत बड़े रकबे पर कर रहे है .

मैं- वो आप सोचो . मैं और मंगू तो किसानी करते आये है किसानी ही करेंगे .

मंगू ने भी हाँ में हाँ मिलाई .

भैया- मैंने पिताजी से बात की थी उनका विचार है की चीनी का कारखाना लगा ले हम

मैं- भैया, मजाक के लिए हम लोग ही मिले क्या आपको . चीनी के गन्ना चाहिए और हम उगाते है सरसों. गेहूं . सब्जिया. अपने इलाके में दूर दूर तक गन्ना उगा है ऐसा सुना कभी क्या .

भैया- तुम्हारी बात सही है पर हमें कृषि को नए मुकाम पर ले जाना होगा . मैंने क्रषि अधिकारी से मुलाकात की थी . वो कहता है की मेहनत की जाये तो गन्ने की फसल उग सकती है .सोचो चीनी के लिए खुद का गन्ना होगा तो हमें कितना फायदा होगा. मुझे तुम दोनों पर पूरा भरोसा है . इस बार थोड़ी जमीन पर गन्ना बो कर देखते है . क्या बोलते हो

मंगू- विचार तो ठीक है भैया

भैया ने पेग दिया मुझे .

मैं- करेंगे कोशिश .

बहुत देर तक हम लोग ऐसे ही बैठे अपनी अपनी बाते करते रहे योजना बनाते रहे और फिर घर की तरफ लौट गए. दरवाजा बंद करते ही मैंने चाची को अपनी बाँहों में भर लिया एक तो वो बड़ी खूबसूरत लग रही थी दूजा मुझे भी सुरूर था .

चाची- दारू पीकर आया तू

मैं- भैया बोले ठण्ड में जरुरी होती है

चाची- ये अभिमानु भी न तुझे बिगाड़ ही देगा

मैं- तुम सुधार क्यों नहीं देती मुझे

मैंने चाची के नितम्बो पर हाथ फेरते हुए कहा.

चाची- बल्ब बुझा दे.

मैं- रहने दे रौशनी , इस जिस्म का कभी तो दीदार करने दो मुझे

मैंने दो पल में ही चाची पूरी नंगी कर दिया और खुद के कपड़े भी उतार फेंके. चाची के लाल होंठ अपनी मिठास मेरे मुह में घोलने लगे थे. पांच फूट की गदराई औरत मेरे सीने से लगी मुझे वो सपना दिखा रही थी जिसमे मजा ही मजा था. नितम्बो से फिसलते हुए मेरे हाथ चाची की गुदा पर रगड़ खाने लगे थे. इस हरकत से चाची के बदन में हिलोरे उठने लगी थी .

उसका हाथ मेरे लंड पर पहुँच गया और वो मुट्ठी में लेके उसे हिलाने लगी. सहलाने लगी. मेरी जीभ से रगड़ खाती चाची की जीभ वो आनंद दे रही थी जो शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता. मैंने चाची को पलंग के किनारे झुकाया और चौड़ी गांड को फैलाते हुए निचे बैठ कर चाची की रसीली चूत पर अपने होंठ टिका दिए.

"ओह्ह कबीर " बड़ी मुश्किल से चाची बस इतना ही कह पाई . अगले ही पल मेरी जीभ का कुछ हिस्सा चाची की चूत में घुस चूका था. नमकीन रस का स्वाद जैसे ही मुझे लगा. कसम से मैं पिघलने लगा. जब तक चाची की चूत का रस मेरे चेहरे को भिगो नहीं गया मैं चूत को पीता ही रहा.
 
#53

उत्तेजना से भरे हुए लंड को मैंने चाची की चिकनी चूत पर लगाया और एक ही झटके में अन्दर सरका दिया . चाची के बड़े बड़े चूतडो को थामे मैं वैसे ही झुकाए झुकाए चाची की चूत मारने लगा. चाची की आहों से कमरा गूँज उठा. थप थप मेरे अंडकोष चाची की जांघो से बार बार टकरा रहे थे . थोड़ी देर बाद मैं वहां से हट गया और चाची की पलंग पर पटकते हुए उसके ऊपर चढ़ गया.

चाची के नर्म होंठो को चूसते हुए मैं चाची को चोद रहा था .चाची के हाथ मेरी पीठ पर रगड़ खा रहे थे अपनी दोनों टांगो को बार बार चाची ऊपर निचे कर रही थी .हम दोनों मस्ती के संसार में खो चुके थे. पैंतीस साल की गदराई औरत को ऐसे चोदना ऐसा सुख था जो किसी किसी को ही नसीब होता है . धीरे धीरे हम दोनों अपनी अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे . चाची का बदन बुरी तरह से हिल रहा था . पसीने से चादर गीली होने लगी थी और तभी चाची का बदन अकड़ गया . मीठी आहे भरते हुए चाची ने मुझे अपने आगोश में कस लिया और मैं भी चाची की चूत में ही झड़ने लगा. लिंग की नसों से रुक रुक कर गिरता मेरा वीर्य चाची की चूत की दीवारों को रंग रहा था . तभी चाची ने मुझे धक्का देकर खुद से अलग कर दिया.

"कितनी बार कहा है , अन्दर मत गिराया कर " चाची ने अपना लहंगा पहनते हुए कहा और शाल ओढ़ कर बाहर मूतने चली गयी. मैं नंगा ही पड़ा रहा बिस्तर पर . कुछ देर बाद चाची आई और मेरी बगल में लेट गयी . मैंने रजाई दोनों के ऊपर डाल ली.

चाची- आज तो जान ही निकाल दी ऐसी भी क्या बेसब्री

मैं- आज इतनी गजब जो लग रही तुम.

चाची ने मेरे गाल पर चूमा और बोली- कबीर, मेरी सूनी जिन्दगी में तूने जो रंग भरा है मैं अहसानमंद हु तेरी. मैंने तो सब्र कर लिया था की बस ऐसे ही काटनी है जिन्दगी कभी कभी बस चंपा निकाल देती थी पानी पर जो सुख तूने दिया है न

मैं- तुम्हारे लिए न करूँगा तो फिर किसके लिए करूँगा. वैसे मैं सोचता हूँ की चंपा को भी चोद दू. उसके बदन पर जो निखार आया है न मन डोलने लगा है मेरा.

चाची- अगर वो देती है तो कर ले. उसका मन टटोल ले.

मैं- तुम कहोगी उस से तो जरुर देगी

चाची- मैं अगर उस से कहूँगी तो उसे मालूम हो जायेगा की मैं तुझसे भी चुद रही हूँ जो मेरे लिए ठीक नहीं होगा.

मैं- तो क्या उसे मालूम नहीं अभी

चाची- नहीं , और मैं चाहती भी नहीं की इस रिश्ते की बात किसी को भी मालूम हो

मैं- मुझे लगा की तुम्हारा और चंपा का रिश्ता जैसा है तुमने उसे बताया होगा.

चाची- माना की कभी कभी हम एक दुसरे संग करते है पर उसका और मेरा जो फर्क है मुझे वो भी ध्यान रखना है . मैं राय साहब के परिवार की बहु हूँ उनके भाई की पत्नी अगर ऐसी बाते निकली तो कितनी बदनामी होगी.

मैं- मैंने तो सोचा था की तुम हर बात उसे बताती होगी मेरा काम आसान हो जायेगा.

चाची- अब भी आसान ही है तू . तुझ पर तो वो पहले से ही फ़िदा है .

मैं- भाभी कहती है की उस से दूर रहू चंपा ठीक नहीं है

चाची- हम सब उसे बचपन से जानते है इसी आँगन में काम करते-खेलते हुए वो बड़ी हुई है . तेरी भाभी को शायद लगता होगा की कही तुम दोनों चुदाई न कर लो इसलिए आगाह करती होगी.

मैं- हो सकता है . पर चाची तुम इतने दिन प्यासी रही क्या तुम्हारे मन में ख्याल नहीं आया की पिताजी या बड़े भैया से रिश्ता जोड़ लो.

चाची- मैं तेरी चाची हूँ कोई राह चलती रांड नहीं. तुझसे रिश्ता जोड़ा क्योंकि तुझे समझती हूँ मैं मेरा मन जुड़ा है तुझसे. तेरे साथ सोने से पहले मैंने हजार बार विचार किया था . रही बात जेठ जी की तो अगर उन्हें जरा भी अंदेसा हो जाता तो अब तक गर्दन उतार ली होती मेरी.

मैं- तुम्हे विचार कर लेना चाहिए था चाची. पिताजी भी अकेले है तुम भी और फिर किसी को क्या ही मालूम होता घर की बात घर में रह जाती. पिताजी के मन में भी तो इच्छा होती होगी.

चाची-राय साहब को दुनिया पुजती है कबीर आज तो तूने ये बात बोली है दुबारा ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए. तुझे चंपा की लेनी है . वो तैयार होती है तो कर लेना . मैं तुझसे ही खुश हूँ.

उसके बाद हमारी कोई बात नहीं हुई. चाची अपना सर मेरे सीने पर रखे सोती रही मैं जागता रहा सोचता रहा . सुबह दौड़ लगाकर आया ही था की भैया को देखा कसरत करते हुए तो मैं भी अखाड़े में चला गया .

भैया- सही समय पर आया है आजा

मैं- सुबह सुबह मुझसे हारना चाहते हो भैया

भैया- आ तो सही तू

एक बार फिर हम दोनों एक दुसरे को धुल चटाने की कोशिश करने लगे. भैया की बढती ताकत मुझे हैरत में डाले हुई थी . ये शायद तीसरी-चौथी बार था जो मैं उनसे हारा था .

भैया- लगता है तेरी खुराक कम हो गयी है आजकल. घी-दूध बढ़ा तू छोटे

मैं-आप से ज्यादा कसरत करता हूँ फिर भी आपके आगे जोर कम पड़ने लगा है क्या चक्कर है भैया . मुझे भी बताओ ये राज

भैया- बस मेहनत ही है और क्या . तू इतना भी कम नहीं है मुझे पक्का विशबास है अगली बार तू ही जीतेगा.

भैया ने मेरे सर पर हाथ फेरा और हम वापिस आ गए. मैंने पानी लिया और चबूतरे पर बैठ कर नहा ही रहा था की चंपा आ गयी.

मैं- कैसी है तू. तुझे कहा था न थोडा आराम करना

चंपा- ज्यादा दिन बिस्तर पर रहूंगी तो शक होगा घरवालो को वैसे भी ज्यादा कमजोरी नहीं है

मैं- खेतो पर जा रहा हूँ चलेगी क्या

चंपा- ठीक है

मैंने नहा कर कपडे पहने और कुवे पर पहुँच गए.

मैं- भाभी ने तुझसे क्या कहा

चंपा- वो जानती है इस बारे में

मैं- कुछ कहा तो होगा तुझसे

चंपा- बोली की जो हुआ सो हुआ आगे से ऐसा कुछ न हो .

मैं- मेरे बारे में पूछा

चंपा - नहीं

मैं- क्या उन्होंने तुझसे ये नहीं कहा की किसने रगड़ दिया तुझे

चंपा- नहीं पूछा

मैं- क्यों नहीं पूछा

चंपा- क्योंकि वो जानती है और अगर तू ये सवाल कर रहा है तो तू भी जानता होगा तूने मालूम कर ही लिया होगा . पर मैं अपने मुह से वो नाम कभी नहीं लुंगी.

मैं- जानता हु , मैं फिर भी पूछूँगा

चंपा- जानता है तो मत पूछ . मत जलील कर मुझे तू भी जानता है की मैंने वो नाम लिया तो फिर पहले सा कुछ नहीं रह जायेगा.

हम बात कर ही रहे थे की एक मजदुर भागते हुए मेरे पास आया और बोला- कुंवर , वो .... वो.....

मैं- क्या हुआ

मजदुर- कुंवर मेरे साथ आओ

मै उसके साथ साथ खेतो में थोडा आगे गया तो मैंने जो देखा मेरी आँखों से आंसू गिरने लगे................
 
#54

मेरे मन में आग लगी थी . एक ऐसी आग जो न जाने अब अपने साथ किस किस को झुलसाने वाली थी . मेरे सामने उस नाचने वाली लड़की की लाश पड़ी थी . घुटने टिका कर मैं उसके ऊपर झुका . आँखों से कुछ आंसू उसके ऊपर गिर पड़े.

"ये जान नहीं जानी चाहिए थी, तेरा कर्ज उधार रहा मुझ पर . मैं कसम खाता हूँ जिसने तेरे साथ ऐसा किया मैं उसे मिटटी में मिला दूंगा सूरज भान आज मालिक पुर देखेगा तेरी मौत " मेरे दिल से आह निकली.

"नाचने वालो के डेरे में सुचना भेजो , उन्हें बताओ इसके बारे में " मैने कहा .

मेरे नथुने गुस्से के मारे फूलने लगे थे . जी चाह रहा था की मैं क्या ही कर जाऊ.मैं जानता था ये ओछी ,नीचता किसने की थी .

"क्या हुआ कबीर. " चंपा भी आ पहुंची थी वहां

उसकी एक नजर लाश पर थी और एक नजर मुझ पर .

मैं- घर जा तू

चंपा- तू कहा जा रहा है

मैं-सुना नहीं तूने , घर जा अभी इसी वक्त

मेरा दिमाग हद्द से ज्यादा घूमा हुआ था . मलिकपुर का रास्ता बहुत लम्बा हो गया था मेरे लिए. मेरी नजरे सूरजभान को तलाश रही थी पर वो मिल नहीं रहा था .दारु के ठेके पर मुझे उसके दो चेले मिल गए .

मैं- सुन बे, सूरजभान कहा मिलेगा.

साथी- उस से क्या काम है पहले हमें तो बता दे

मैं- माँ चोदनी है उसकी तू तेरी चुद्वायेगा

मैंने गुस्से से कहा .

वो- रुक जरा मेरे ही गाँव में आकर मुझे ही गाली दे रहा है अभी तेरी गांड तोड़ता हूँ

मैं- आ भोसड़ी के पहले तू ही आ.

उसने लोहे की एक चेन हाथ में ली और मेरी तरफ वार किया . मैंने सर झुका कर बचाया पास में रखा स्टूल उसकी तरफ फेंका. उसने लोहे की जाली की ओट ले ली और ठोकर मारी .

मैं- क्यों मरना चाहता है मुझे बस इतना बता की सूरजभान कहाँ मिलेगा.

तभी उसके दुसरे साथी जिस पर मुझे धयान नहीं था उसने मुझे पीछे से पकड़ लिया. और अगले ने मुझ पर दो तीन वार कर दिए. मेरी नाक से खून निकलने लगा.

साथी- मिट गया जोश, साले, हम से निपट नहीं पा रहा सूरज भैया से लड़ने का ख्वाब देख रहा है

उसकी हंसी मुझे और गुस्सा दिला गयी.

मैं- सिर्फ एक बार और कहूँगा बता कहाँ है वो बहन का लोडा

पर उस चूतिये को तो चुल मची थी खुद ही नेता बनने की . मैंने जैसे ही खुद को आजाद करवाया और अपनी बेल्ट खोल ली. एक बार तो वो दोनों जाने मुझ पर भारी पड़ने लगे थे पर मैंने मामला संभाल लिया . एक को जो ठेके के अन्दर पटका तो मुझे समय मिल गया और मैंने दुसरे को धर लिया. मेरे पास एक ईंट पड़ी थी जो मैंने उसके सर पर दे मारी. तुरंत ही सर फट गया उसका. लहूलुहान हो गया और मुझे वो मौका मिल गया जो चाहिए था.

"ये जो आग मेरे सीने में लग रही है न इसमें मलिकपुर को जला दू तो कोई पछतावा नहीं होगा मुझे. उसकी दुश्मनी मुझसे थी मेरे से निभाता मैंने कहा भी था उस से की जो करना है मेरे साथ करना पर जिसके खून में पानी भरा हो न वो साले क्या जाने मर्दा मरदी की बाते " मैंने दुबारा से ईंट उसके सर पर मारी वो जमीन पर गिर गया .

सूरजभान का दूसरा साथी मुझे देखे जा रहा था .

मैं- आ भोसड़ी के . देखना चाहता था न तू देख परखना चाहता था न परख मुझे

"आई ईईईइ " मेरी बात अधूरी रह गयी पीछे से जोर का वार मेरी पीठ पर हुआ तो मैं धरती पर गिर गया और फिर एक के बाद एक वार होते रहे. दर्द के मारे मैं दोहरा हो गया. मैंने देखा ये सूरजभान था जो हाथो में एक लकड़ी का लट्ठ लिए हुए था .

"मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था कबीर, और देख तू मरने चला आया. " उसने कहा

मैं- मर गए मारने वाले. मरना तो आज तुझे है.

मैंने सूरजभान की टांग पर वार किया वो लडखडाया और मैंने उसके लट्ठ को थाम लिया. एक बार फिर से हम दोनों उलझ गए थे .

सूरजभान- तूने क्या सोचा था दारा को मार कर तू बच जायेगा.

मैं-मुझ पर वार करता मुझे ख़ुशी होती की टक्कर का दुश्मन मिला है पर तूने उस लड़की को मारा .

सूरजभान- मारा ही नहीं उसकी चूत भी मारी. साली बड़ी गजब भी पर या करे उसे सजा देनी भी जरुरी थी .

मैं- मजलूमों पर जोर चलाने वाले ना मर्द होते है .और तेरा फितूर आज उतारना है मुझे. खून का बदला खून चाहिए मुझे

सूरजभान- ये शुरआत तूने की थी दारा को मार कर मैंने बस सूद समेत लौटाया है तुझे .

मैंने उसे अनसुना किया उअर उसके घुटने पर लात मारी.वार जोरदार था वो निचे गिर गया लट्ठ मेरे हाथ में आ गया मैंने सीधा उसके सर पर दे मारा. सूरजभान भैंसे की तरह डकार लिया मैंने एक लट्ठ और मारा खून का फव्वारा बह चला और वो तड़पने लगा.

मैं- क्या रे तू तो अभी से तडपने लगा. ऐसे कैसे चलेगा तुझे क्या मालूम होगा दारा को मैंने कैसे चीरा था . देखो मलिकपुर वालो , देखो इस चूतिये को .

मैंने लट्ठ उठाया और दुबारा से उसको मारने वाला ही था की इ आवाज ने मेरे हाथ रोक लिए.

"रुक जा छोटे " भैया की आवाज थी ये

मैंने देखा की भैया वहां पहुँच गए थे उनके साथ चंपा भी थी.

भैया दौड़ कर मेरे पास आये. मैंने सोचा की वो थाम लेंगे मुझे पर भैया ने दो चार थप्पड़ मार दिए मुझे और मैं हैरान रह गया.

भैया- मैंने तुझसे कहा था न सूरजभान से दूर रहना.

मैं- दूर हो जाऊंगा बस इसकी जान ले लू मैं

भैया- अभी के अभी तू घर जायेगा.

मैं- जरुर जाऊंगा बस एक बार इस को बता दू की मैं कौन हु.

मैंने सूरजभान को लात मारी.

"कबीर,,,,,,,,,,,,,,, " भैया चीख पड़े. जिन्दगी में पहली बार था जब भैया ने मुझे मेरे नाम से पुकारा था . हमेशा वो छोटे ही कहते थे .भैया ने मुझे धक्का दिया बड़ी जोर से लगी मुझे .

भैया- मैं दुबारा नहीं कहूँगा तुझसे .

भैया ने सूरजभान को अपनी गोद में लिया और उसे देखने लगे.

भैया- कुछ नहीं होगा तुझे . मैं हूँ न .


भैया ने घायल सूरजभान को गाड़ी में डाला और चले गए. मैं हैरानी से उन्हें देखता रह गया. मेरे भाई ने इस गलीच की वजह से मुझ पर हाथ उठाया था . मुझ से ज्यादा फ़िक्र भैया को इस नीच की थी ये देख कर मेरा दिल टूट गया.
 
#55

दिमाग सुन्न हो गया था . मेरे भाई ने एक पराये के लिए मुझे धक्का दिया था . मुझसे जायदा मेरे दुश्मन की फ़िक्र थी उसे. सोच कर मैं पागल ही हो गया.

"मैं थोड़ी देर कुवे पर ही रुकुंगा तू घर जा " मैंने चंपा से कहा

चंपा- मैं भी तेरे साथ ही रहूंगी

मैं-तू तो सुन ले मेरी. जा अकेला छोड़ दे थोड़ी देर.

मैं कुवे की मुंडेर पर बैठ गया और सोचने लगा. इस हालत में मुझे निशा की बड़ी कमी महसूस हो रही थी उसके बिना ऐसे लगता था की जैसे आत्मा का एक टुकड़ा निकाल ले गया हो कोई. मैं खुद को कोस रहा था की काश मैंने उस से मोहब्बत का इजहार नहीं किया होता तो वो नहीं जाती. पर वो नहीं थी , मैं था और ये तन्हाई थी .

तीन दिन ऐसे ही गुजर गए भैया का कोई अतापता नहीं था . मैं दिन भर राय साहब को देखता . रात में चोकिदारी करता सोचता की कब ये कुछ करेगा. पर चंपा और रायसाहब का व्यवहार सामान्य ही था . ऐसे ही समय गुजर रहा था और पूनम की शाम को भैया घर आये. काफी थके से लग रहे थे . मैं चबूतरे पर ही बैठा था . मुझे देख कर भैया गाड़ी से उतर कर मेरे पास आये.

भैया- कैसा है छोटे

मैं- जैसा छोड़ कर गए थे वैसा ही हूँ

भैया- नाराज है अभी तक

मैं- क्या फर्क पड़ता है

भैया - समझता हूँ तेरी नाराजगी

मैं- रोकना नहीं चाहिए था मुझे

भाई-- रोकना जरुरी था

मैं- सूरजभान को तो मैं मौका लगते ही मार दूंगा.

भैया- ऐसा नहीं होने दूंगा मैं

मैं- पर क्यों, ऐसा क्या है जो मेरे भाई और मेरे बिच वो नीच आ गया है

भैया- तेरे मेरे बीच कोई नहीं आ सकता छोटे

मैं- तो फिर उस गलीच की इतनी फ़िक्र क्यों आपको

भैया- उसकी चिंता नहीं है . तेरी फ़िक्र है मैं नहीं चाहता तू इस दलदल में फंस जाये

मैं- किस दलदल में

भैया -छोटे, ये खून खराबा हमारे लिए नहीं है

मैं- और उसने जो किया क्या वो ठीक था

भैया- नियति बड़ी निराली होती है छोटे . तेरा दिमाग अभी गर्म है तू समझेगा नहीं पर मैं जानता हु तेरी क्या अहमियत है मेरे लिए . तू मेरी इतनी तो बात मान. इतना तो तुझ पर हक़ है न मेरा

मैं- ठीक है पर आपको भी मुझसे एक वादा करना होगा दुश्मनी मेरी और उसकी है हम दोनों के बेची ही रहे. किसी मजलूम को उसने सताया मुझसे दुश्मनी के चलते तो मैं नहीं सुनूंगा आपकी

भैया- ठीक है .

मैं- दूसरी बात . ऐसा क्या है उस में जो उसके लिए अपने छोटे भाई के सामने खड़े हो गए आप.

भैया -थोड़ी थकान है मैं नहा कर आता हूँ .

भैया ने टाल दी थी बात को पर मेरे मन में जो शंका का बीज था वो जल्दी ही पेड़ बनने वाला था . खैर, रात को मेरी नींद खुली तो मैंने देखा की पूरा बिस्तर गीला हुआ पड़ा था . क्या नींद में ही मूत दिया मिअने अपने आप से सवाल किया. सूंघ कर देखा मूत तो नहीं था . कपडे चिपचिपे हो रहे थे इतना पसीना तो पहले कभी नहीं आया था . दिसम्बर की ठण्ड में पसीना आना क्या ही कहे अब.

बिस्तर से उठ कर मैं गली में गया मूत रहा था की मेरी नजर ऊपर आसमान में चाँद पर पड़ी. अचानक से पैर लडखडा गए मेरे. गला सूखने लगा. मुझे निशा की बात याद आई की पूर्णिमा को काली मंदिर में ही रहना . बदन में अजीब सी खुजली दौड़ने लगी थी मैं अपने जिस्म को खरोंचने लगा.

बिन कुछ सोचे समझे मैं गाँव से बाहर की तरफ दौड़ पड़ा. तन जलने लगा था . जैसे किसी ने आग में झोंक दिया हो मुझे. आव देखा न ताव मैं उसी तालाब में कूद गया. सर्दी के मौसम में जमे हुए पानी ने मुझे अपने आगोश में पनाह दी पर चैन नहीं मिला. पानी भी जैसे मेरा गला घोंट रहा हो. साँस लेने में मुश्किल हो रही थी . जब बिलकुल जोर नहीं चला तो मैं मंदिर में घुस गया और उन काली दीवारों से लग कर खुद को सँभालने की कोशिश करने लगा. आँखे धुंधली होने लगी थी . दिल कर रहा था की जोर जोर से चीखू.

जैसे जैसे रात बढती गयी मेरी तकलीफ बढती गयी . अपने आप से जूझता रहा मैं और जब सुबह का पहर सुरु हुआ तो खांसते हुए मैं वही धरती पर गिर गया. जब आँख खुली तो सब कुछ शांत था मालूम नहीं कितना समय रहा होगा पर दिन था. धुधं ने चारो दिशाओ कोकाबू किया हुआ था . मैं उठा खुद को देखा बदन ठण्ड से कांप रहा था मेरे कपडे सीले थे .

कुवे पर आने के बाद मैंने दुसरे कपडे पहने और रजाई में घुस गया. सोचता रहा की रात को क्या हुआ था .

"कबीर कबीर है क्या यहाँ तू " बाहर से चाची की आवाज आई

मैं- अन्दर हु चाची

चाची अन्दर आई और मुझे बिस्तर में घुसे हुए देख कर बोली- सुबह से गायब है . मुझे फ़िक्र हो रही थी और तू है की यहाँ आराम से पड़ा है . ले खाना खाले .

मैंने जैसे तैसे खाना खाया पर बदन कांप रहा था . चाची ने मेरे माथे पर हाथ रखा और बोली- तुझे तो बुखार है .

मैं-ठीक हो जायेगा.

चाची बर्तन लेकर बाहर जा रही थी तो मेरी निगाह चाची की मदमस्त गांड पर पड़ी . मन बेईमान हो गया.

मैं- किवाड़ लगा लो और आओ मेरे पास

चाची- दिन में नहीं कोई आ निकलेगा.

मैं- आओ तो सही , ये ठण्ड ऐसे ही उतरेगी.

वो कहते है न की आदमी किसी भी हालत में हो उसे इस चीज का चस्का हमेशा ही रहता है . मैंने भी चाची को बिस्तर में घसीट लिया और अपनी मनमानी कर ली सच कहू तो राहत भी मिली मुझे. आराम मिला तो बातो सा सिलसिला शुरू हुआ .

मैं- चाची, माँ के जाने के बाद पिताजी चाहते तो दूसरी शादी कर लेते

चाची- पर उन्होंने नहीं की

मैं- कैसे जिए होंगे वो अकेले. मैं तेरे बिना थोड़ी देर न रह पा रहा पिताजी की भी तो इच्छा होती होगी .

चाची- देख कबीर इच्छा तो सबकी होती ही है. राय साहब की जो हसियत है वो किसी भी औरत को जरा भी इशारा कर दे तो कोई भी अपनी खुशकिस्मती ही समझेगी. अब ज्यादातर तो वो बाहर ही रहते है बाहर कुछ कर लिया हो तो मैं कह नहीं सकती .

मैं- वैसे तुम कोशिश करती तो वो देखते जरुर तुम्हारी तरफ इतना मस्त जुगाड़ घर में है तो

चाची- जिस परिवार से हम आते है न वहां औरतो का सम्मान है

मैं- इतना ही सम्मान है तो अपनी बेटी की उम्र की चंपा को क्यों चोद दिया पिताजी ने ,

मेरी बात सुन कर चाची के चेहरे का रंग उड़ गया .

"क्या कहा तूने , " चाची की आवाज लडखडा गयी ...........
 
#56


"वही जो तूने सुना चाची " मैंने कहा

चाची- तू जानता भी है कितना बड़ा आरोप लगा रहा है तू

मैं- जानता हूँ इसलिए तो तुझसे कह रहा हूँ,देख चाची तुझे मैं बहुत चाहता हूँ.चंपा ने मेरा दिल तोडा है मैं नहीं चाहता की तू भी मेरा दिल तोड़े. तू राय साहब से चुदी न चुदी तू जाने . तेरा राय साहब से कोई ऐसा-वैसा रिश्ता है नहीं है मुझे नहीं जानना पर तू एक फैसला लेगी की तू किसे चुनेगी मुझे या फिर राय साहब को . क्योंकि बहुत जल्दी मैं उनसे सवाल करूँगा की क्यों पेल दिया उन्होंने चंपा को .

चाची- हम दोनों को ही जेठ जी को चुनना पड़ेगा कबीर. यदि उन्होंने ऐसा कुछ भी किया है चंपा के साथ तो चंपा ने विरोध क्यों नहीं किया . इसका एक ही कारण हो सकता है की उसकी भी सहमती रही होगी.

मैं- मान लिया पर गलत हमेशा गलत ही होता है .स सहमती तो लाली की भी उसके प्रेमी संग थी फिर उसी इंसाफ के पुजारी मेरे बाप ने क्यों लटका दिया उनको . जबकि पीठ पीछे वही गलीच हरकत वो खुद कर रहा है .

चाची- तो क्या चंपा के लिए तू अब अपने पिता के सामने खड़ा होगा.

मैं- बात चंपा की नहीं है , बात है गलत और सही की. ये कैसा नियम है जो गरीब के लिए अलग और रईस के लिए अलग.

चाची- ये दुनिया ऐसी ही है जिस दिन तू ये फर्क सीख जायेगा जीना सीख जायेगा.

मैं- जल्दी ही ऐसा दिन आएगा की इस घर के दो दुकड़े हो जायेगे तू किसकी तरफ रहेगी.

चाची- मैं अपने बेटे के साथ रहूंगी.

मैं- तो फिर ठीक है तुम चंपा से ये बात निकलवाओ की कैसे चुदी वो राय साहब से.

चाची- जेठ जी को अगर भनक भी हुई की हम पीठ पीछे कुछ कर रहे है तो ठीक नहीं रहेगा.

मैं- किसकी इतनी मजाल नहीं की मेरे होते तुझे देख भी सके. भरोसा रख मुझ पर

चाची- भरोसा है तभी तो सब कुछ सौंप दिया तुझे.

मैं- तू पक्का नहीं चुदी न पिताजी से

चाची- जल उठा कर कह सकती हूँ

मैंने चाची का माथा चूमा और फिर से उसे बिस्तर पर ले लिया

चाची- अब यहाँ नहीं , घर पर पूरी रात तेरी ही हूँ न

मैं- ठीक है

कुछ देर और रुकने के बाद हम लोग गाँव में आ गए. मैं सीधा भाभी के पास गया जो रसोई में चाय बना रही थी .

मैं- कुछ जरुरी बात करनी है

भाभी- कहो

मैं- कैसे यकीन कर लू मैं की पिताजी और चंपा के अवैध सम्बन्ध है मुझे सबूत चाहिए

भाभी- ओ हो जासूस महोदय. सबूत चाहिए . चाची और तुम जो रासलीला रचा रहे हो उसका सबूत भी साथ दे दो तो कैसा रहेगा.

मैं- जल्दी ही वो समय आने वाला है जब राय साहब से इस बारे में सवाल करूँगा मैं. और बिना सबूत इतना बड़ा इल्जाम लगाना उचित नहीं रहेगा.

भाभी- तो फिर करो चोकिदारी , खुशनसीब हुए तो अपनी आँखों से रासलीला देख पाओगे

मैं- वो तो मालूम कर ही लूँगा मैं

भाभी- तो फिर करो किसने रोका है तुम्हे

मैं- एक बात और ये जो आदमखोर के हमले हुए है इसके बारे में क्या कहना है

भाभी- कहना नहीं करना है

मैं समझ गया की भाभी को अभी भी लगता था की मैं ही हूँ वो आदमखोर .

खैर, मैं बहुत कोशिश कर रहा था की राय साहब और चंपा को पकड पाऊ पर हताशा ही मिल रही थी .ऐसे ही एक रात मैं कुवे पर पहुंचा तो देखा की अलाव जल रहा था और एक कोने में वो बैठी हुई थी . मेरा दिल उसे देख कर इतना जोर से धडकने लगा की कोई ताज्जुब नहीं होता यदि ह्रदयघात हो जाये.

"बड़ी देर की सरकार आते आते , आँखे तरस गयी थी मेरी इस दीदार को " मैंने कहा

निशा- आना ही पड़ा बहुत रोका, बहुत समझाया हजारो बंदिशे लगाये. रस्मे-कसमे सब खाई पर मन नहीं माना देख तेरे पर फिर ले आया मुझे

मैं- मेरा अब मुझमे कुछ नहीं रहा जो था तेरा हुआ .

मैंने आगे बढ़ कर उसे अपनी बाहों में भर लिया. दिल को जो करार आया बस मैं ही जानता था .

निशा- छोड़ भी दे अब

मैं- छोड़ने के लिए नहीं पकड़ा तुझे

निशा- ऐसी बाते करेगा तो फिर नहीं आउंगी मैं

मैं- आना पड़ेगा तुझे, तू आएगी. मुझसे जुदा होकर चैन कहाँ पाएगी.

निशा- चैन ही तो खो गया मेरा . तुझसे मिली फिर मैं खुद से खो गयी

मैं - जानती है तेरे बिना कैसे कटे इतने दिन मेरे

निशा- इसलिए ही तो नहीं आना चाहती थी मैं

मैं- ठण्ड बहुत है

मैंने अलाव अन्दर रखा और निशा को भी अन्दर बुला लिया. दरवाजा बंद किया तो ठण्ड से थोड़ी राहत मिली.

निशा- ऐसे क्या देख रहा है

मैं- तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती

निशा- इस काबिल नहीं हूँ मैं

मैं- मेरे दिल से पूछ जरा

निशा- ऐसी बाते मत कर मुझसे मैं वापिस चली जाउंगी

मैं- तो तू ही बता मैं क्या करू

निशा- वादा कर मुझसे

मैं -कैसा वादा

निशा- की तू मोहब्बत नहीं करेगा मुझसे .

मैं- मोहब्बत हो चुकी है सरकार

निशा- कबीर, जो होना मुमकिन नहीं है वो सपने मत देख. एक डायन और तेरे बिच मोहब्बत नहीं हो सकती जितना जल्दी इस सत्य को समझेगा उतनी तकलीफ कम होगी तुझे. तूने दोस्ती की इच्छा की थी मैंने तेरा मान रखा तू मेरी लिहाज रख

मैं- तुझसे ज्यादा क्या प्यारा है मुझे तेरी यही इच्छा है तो यही सही पर तू भी वादा कर तू ऐसे दूर नहीं जाएगी मुझसे.

निशा- मैं दूर कहा हु तुझसे.

मैं-दूर नहीं तो इन अंधेरो में नहीं मैं उजालो में मिलना चाहूँगा तुझसे

निशा- क्या अँधेरे क्या उजाले मेरे दोस्त

मैं- एक सपना देखा है तेरे साथ जीने का

निशा- मैं हर रोज मरती हूँ

मैंने फिर निशा को उस रात की पूरी बात बताई जिसे सुनकर वो कुछ सोचने लगी.

मैं- क्या सोचने लगी तू

निशा- यही की तेरी किस्मत अच्छी है . उस आदमखोर के काटने के बाद भी तू ठीक है

मैं- मुझे क्या होना है पर एक बार वो हरामखोर पकड़ में आजाये उसका तो वो हाल करूँगा

निशा- ये सोचते सोचते एक अरसा गुजर गया

मैं- तुझे भी तलाश है उसकी

निशा- ये जंगल घर है मेरा , मेरे घर में घुसने की गुस्ताखी की है उसने सजा तो मिलनी चाहिए न

मैं- ऐसी गुस्ताखी तो मैंने भी की

निशा- सजा तुझे भी मिलेगी बस समय की दरकार है . वैसे मलिकपुर में जो भौकाल मचाया है आग लगा रखी है

मैं- नियति ने न जाने क्या लिखा है

निशा चुपके से रजाई में घुस गयी और बोली- दो घडी जीने दे मुझे , थोड़ी देर तेरे आगोश में पनाह दे जरा

मैंने निशा को अपनी बाँहों में भर लिया और उसने मेरे सीने पर अपना सर रख दिया. दिल चाहा की ये रात इतनी लम्बी हो जाये की ख़त्म ही न हो.
 
#57

"नजरे झुका के हमसे छिपा के तुम जा रही हो जाना " मैंने निशा के हाथ को पकड़ते हुए कहा.

निसा- जाग रहे हो तुम.

मैं- तुम ऐसे नहीं जा सकती बिना बताये

निशा- फिर भी जाना तो पड़ेगा ही. जाउंगी नहीं तो दुबारा कैसे आउंगी.

मैं- जाने से पहले इस चाँद से माथे को जी भर के देखने तो दो मुझे .

निशा-तुम्हारी ये दिलकश बाते भटका नहीं सकती मुझे . रात का तीसरा पहर ख़त्म होने को है इन अंधेरो में खो जाने दो मुझे.

मैं- कुछ दूर चलता हु तुम्हारे साथ

निशा- जरुरत नहीं

मैं- फिर भी

मैंने थोडा पानी पिया और फिर उसका हाथ थाम कर चल दिया. जल्दी ही हम दोनों वनदेव के पत्थर के पास थे.

निशा- अब जाने भी दो

मैं- दिल नहीं कर रहा सरकार तुम्हारी जुदाई मंजूर नहीं मुझे

निशा- मैं नहीं थी तब भी तो जी रहे थे न

मैं- जिन्दगी क्या है तुमने ही तो बताया मुझे

वो आगे बढ़ी की मैंने फिर से उसका हाथ थाम लिया.

निशा- फिर भी जाना होगा मुझे .

मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और वो धुंध की चादर में खो सी गयी. मैंने वनदेव के पत्थर को देखा और कहा-बाबा, एक दिन तेरा आशीर्वाद लेंगे हम यही पर. खैर, सुबह मेरी नींद खुली तो देखा की बाहर चूल्हे पर मंगू चाय बना रहा था .

मैं- तू कब आया.

मंगू- थोड़ी देर पहले ही . घर से यहाँ आते आते जम गया सोचा पहले चाय बना लू फिर जगा दूंगा तुमको

मैं- आता हु जरा.

मैं कुछ बाद फ्रेश होकर आया . मंगू ने मुझे चाय का गिलास पकड़ा दिया. आज हद ही जायदा ठण्ड थी .

मैं- मंगू तू कविता से कितना प्रेम करता था .

मंगू जो चाय की चुसकिया ले रहा था उसने घूर कर देखा मुझे

मैं- बता न भोसड़ी के

मंगू-दुनिया कुछ चीजो को कभी नहीं समझ सकती कबीर.

मैं- जानता हूँ पर तेरा भाई सब समझता है

मंगू- वो बहुत अच्छी थी . उम्र में बड़ी होने के बाद भी मैं दिल से चाहने लगा था उसे. अक्सर हम मिलते बाते करते धीरे धीरे हम करीब आ गए.

मैं- क्या उसके पति या ससुर को मालूम था तुम लोगो का

मंगू- नहीं भाई. यदि ऐसा होता तो मैं जिन्दा थोड़ी न रहता दूसरा उसका पति तो शहर में रहता है साल ६ ,महीने में आता था एक दो बार और वैध जी तो कभी इस गाँव में कभी उस गाँव में.

मैं- पर मैं नहीं मानता की तू कविता से सच्चा प्यार करता था .

मंगू- मैंने पहले ही कहा था दुनिया प्यार को नहीं समझती

मैं- अबे चोमू, तू अगर कविता से प्यार करता तो तू उसके कातिल को तलाश जरुर करता . पर तुझे बस उसकी चूत से मतलब था .

मंगू ने चाय का गिलास निचे रख दिया और बोला- मेरे भाई, तू कह सकता है क्योंकि तूने किसी से प्यार नहीं किया तू नहीं जानता की प्रेम क्या होता है . मैंने जब उसकी लाश देखि तो मैं ही जानता हूँ की क्या बीती थी मेरे दिल पर . मैं अभागा तो उसकी लाश को छू भी नहीं पाया.

मंगू का गला बैठ गया. उसकी रुलाई छूट पड़ी.

मंगू- मैं जानता हूँ उसे डाकन ने मारा है . इतनी बेरहमी केवल वो ही कर सकती है

मंगू ने जब डाकन का जिक्र किया तो मेरा दिल धडक उठा . पूरी रात मेरी बाँहों में थी एक डाकन .

मैं- तुझे कैसे मालूम की डाकन ने मारा उसे

मंगू- पूरा गाँव ये ही कहता है . तुझे क्या लगता है मैं इतना बेचैन क्यों हूँ , मुझे तलाश है उसकी जिस दिन वो मेरे सामने आई या तो मैं मर जाऊंगा या फिर उसे मार दूंगा.

मैं- गाँव वालो की बातो कर यकीन मत कर डाकन जैसा कुछ नहीं होता. पर तू चाहे तो कविता के कातिल को तलाश कर सकता है . तूने कभी सोचा की आखिर ऐसी क्या वजह थी की कविता इतनी रात को जंगल में गयी .

मंगू- यही बात तो मुझे उलझन में डाले हुई है भाई की उसे क्या जरूरत थी जंगल में आने की उसके तो खेत भी नहीं है .

मैं- पर मुझे विश्वास है तू इस राज को तलाश कर ही लेगा.

मैंने मंगू से तो कह दिया था पर मैं खुद इस सवाल में उलझा हुआ था अभी तक.

मंगू- मैं तुझे बताना तो भूल ही गया था की राय साहब ने कहा था की कबीर से कहना की दोपहर को घर पहुँच जाये कुछ बेहद जरुरी काम है

मैं- ऐसा क्या जरुरी काम हो गया

मंगू- मुझे क्या मालूम जो कहा तुझे बता दिया. मैं सड़ी सब्जियों को बाहर फेक रहा हु मदद कर दे

मैं- चल फिर.

नंगे पैर कीचड़ से भरे खेत में इस सर्द सुबह में जाना किसी खतरे का सामना करने से कम नहीं था . जैसे जैसे दिन चढ़ता गया और मजदुर भी आते गए. दोपहर को मैं गाँव की तरफ चल दिया. जब घर पहुंचा तो एक गाड़ी हमारे दरवाजे के सामने खड़ी थी जिसे मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा था . मैं राय साहब के कमरे में गया तो भैया और चाची पहले से ही मोजूद थे . मैंने देखा की वहां पर एक आदमी और था जिसे मैं नहीं जाता था .

"हम तुम्हारी ही राह देख रहे थे " राय साहब ने सोने के चश्मे से मुझे घूरते हुए कहा

वो आदमी खड़ा हुआ और बोला- आप सब सोच रहे होंगे की आप ऐसे अचानक यहाँ एक साथ क्यों बुलाये गए. दरअसल राय साहब ने अपनी वसीयत बनवाई है और उनका वकील होने के नाते मेरा फर्ज है की मैं वो आप लोगो को पढ़ कर बताऊ.

मैंने अपने बाप को देखा और सोचा आजकल इसको अजीब अजीब शौक हो रहे है कभी चंपा को रगड़ रहा है कभी वसीयत बना रहा है . पर किसलिए

"वसीयत पर किसलिए पिताजी " मैं और भैया लगभग एक साथ ही बोल पड़े.

पिताजी- हमें लगता है की कुछ जिम्मेदारिया वक्त से निभा देनी चाहिए.

वकील - राय साहब ने अपनी तमाम संपति का आधा हिस्सा अपने भाई की पत्नी को दिया है . वो ये हिस्सा जैसे चाहे जहाँ चाहे जिस भी मकान, जमीन और जो भी राय साहब की मिलकियत है उसमे से अपनी पसंद अनुसार ले सकती है .

वकील ने गला खंखारा और आगे बोला- बाकि हिस्से में से कुवर अभिमानु और कुंवर कबीर का हिस्सा होगा.

भैया- पिताजी मेरा छोटा भाई मेरे लिए सब कुछ है जो है इसका ही है जो मेरा है इसका है . मेरी सबसे बड़ी सम्पति मेरा भाई है .

चाची- जेठ जी , मेरे लिए सबसे बड़ी सम्पति ये परिवार है मेरे दो बेटे अभिमानु और कबीर. आप ये वसीयत बदलवा दीजिये और सच कहूँ तो हमें भला क्या जरूरत है वसीयत की .

ये कहने के बाद भाभी और भैया दोनों कमरे से बाहर चले गए. रह गए हम तीनो. अचानक से राय साहब को वसीयत बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी. मैं इसी सोच में उलझा था .

मैं- वकील साहब , मैं ये वसीयत पढना चाहता हूँ .

वकील- आपको पढने की भला क्या जरूरत कुंवर साहब, राय साहब ने जो किया है सोच समझ कर ही किया है आप बस दस्तखत करे और अपना हिस्सा ले ले.

न जाने क्यों मुझे मन किया की वकील के मुह पर एक मुक्का जड दू.

मैं- फिर भी मैं वसीयत पढना चाहूँगा.

वकील ने पिताजी की तरफ देखा पिताजी ने इशारा किया तो वकील ने मुझे तीन कागज के टुकड़े दिए पर एक कागज का टुकड़ा उसके हाथ में ही रह गया. मैंने तीनो कागज के टुकड़े देखे. जो बंटवारा पिताजी ने किया था वो ही लिखा था . पर मेरी दिलचस्पी उस चौथे टुकड़े में थी जो वकील के हाथ में था .

मैं- मुझे वो कागज भी देखना है

वकील- ये आपकी वसीयत का हिस्सा नहीं है ये मेरे काम का है वो बस साथ में आ गया.

मैं- पिताजी मैं सोचता हूँ की आजतक हमने जो भी शुभ कार्य किया है पुजारी जी से पूछ कर किया है मैं उनसे बात करूँगा यदि वो हाँ कहेंगे तो मैं दस्तखत कर दूंगा.

ये बात मैंनेहवा में फेंकी थी मेरी दिलचस्पी उस चौथे कागज में थी .

पिताजी- तुम जब चाहे दस्तखत करके अपना हिस्सा ले सकते हो . वकील साहब आप जाइये हम कागज वापिस भिजवा देंगे आपको

बाहर चबूतरे पर बैठे मैं सोच रहा था की वकील ने वो चौथा कागज क्यों नहीं दिखाया क्या था उस कागज में ऐसा . ...............
 
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