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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#107

उसकी गर्म सांस मेरे होंठो से टकराने लगी. दो पल वो मुझे घूरती रही .

अंजू- समझता क्या है तू खुद को . कुछ नहीं है तू राय साहब का नाम न हो तेरे साथ तो दुनिया तुझे झांट बराबर न समझे.

मैं- डार्लिंग, हम राय साहब को झांट बराबर नहीं समझते और तुमने चौधरी रुडा की बेटी होकर क्या उखाड़ लिया इस ज़माने में . अपने आशिक के कातिल को न तलाश पाई तुम क्या घंटा प्यार करती थी तुम उस चूतिये से, हमको जरा भी परवाह नहीं है अपने नाम की , किस खानदान के है हम क्या ही फर्क पड़ता है , हम किसान है, यही हमारी पहचान है , धरती का सीना चीर कर फसल उगा देता हूँ मैं और तुम पूछती हो की किस बात का घमंड है .

मैंने पलट कर अंजू को दिवार के सहारे लगा दिया और उसके नाजुक गुलाबी होंठो पर अपने होंठ रख दिए. वो कसमसाने लगी पर हम भी अपनी मर्जी के मालिक थे , जब तक सांस फेफड़ो से जुदा होने को नहीं आ गए उसके लबो का रस चखता ही रहा जब उसे छोड़ा तो होंठो पर खून की बूंदे लरज रही थी .

अंजू- तेरी ये गुस्ताखी बहुत महंगी पड़ेगी तुझे

मैं- हम को देखो, हमारी गुस्ताखिया देखो. बड़ा नशा है इन होंठो में इस गुस्ताखी की जो भी सजा होगी मंजूर है हमें.

मैंने उसे कमरे में धकेला और अन्दर आ गया. गुस्से से वो मुझे देखती रही . मैंने रजाई ओढ़ी और आँखे बंद कर ली. सुबह जब निचे आया तो मौसम बड़ा प्यारा हो रहा था होली बस कुछ दिन दूर थी और उतना ही दूर था मैं अपनी जान से . देखा की भाभी ने पुजारी को बुलवाया हुआ था और गहन चर्चा में डूबी थी . मैं भी उनके पास गया

भाभी- तुम्हारे लिए ही बुलाया है कुंवर पुजारी जो को . मुहूर्त देख रहे है

मैं- अब क्या जरुरत है भाभी , फाग के दिन का कहा तो था आपने

भाभी- मैंने कहा था उसे ले आना, फेरे तो लेने ही होंगे न

पुजारी- छोटी ठकुराइन , मैं फिर कहता हूँ आपको एक बार फिर सोच लेना चाहिए

भाभी- हम क्या सोचे, जिसे सोचना था उसने ही नहीं सोचा आप देखिये कब शादी हो सकती है और हमें सुचना दे दीजियेगा.

मैं गली में आया तो देखा की अंजू दातुन कर रही थी .

मैं- इतना मत घिसो टूट जायेंगे ये

अंजू- कमीने बदबू नहीं गयी है अभी तक

मैं- बाहर से ही तो चूमा था मैंने

अंजू- मैं अभिमानु से कहूँगी ये बात

मैं- भैया से ही क्या सारी दुनिया से कह दे . पर मंगू को उठा ले .

अंजू- तू क्यों नहीं करता ये काम

मैं- बचपन का साथी है वो मेरा चाहे वो गिर गया हो मेरी आँखों में शर्म बाकि है

अंजू- देखि तेरी शर्म मैंने .

मैं- रमा से मिलने जाऊंगा मैं चलेगी क्या साथ

अंजू- मैं क्या करुँगी

मैं- रमा इस खेल का वो मोहरा है जिसकी काट किसी के पास नहीं

अंजू- नहीं आना मुझे

मैं- इक बात बता तुझे अगर कुछ छिपाना होता तो तू जंगल में कहाँ छिपाती

अंजू- ऐसी जगह जो बेहद आम होती , जो सबके सामने तो होती पर उसे कोई देख नहीं पाता

मैं- और ऐसी जगह कहाँ पर होगी

अंजू- वो मैं निर्धारित करती

"प्रकाश भोसड़ी का ऐसा क्या जानता था चाचा के बारे में , क्या चाहता था वो चाचा से " मैंने खुद से सवाल किया

चाय नाश्ते के बाद मैं एक बार फिर कुवे पर पहुँच गया . ये चाबी किस ताले की हो सकती थी , कुवे पर एक ही ताला था जो कभी लगाते थे कभी नहीं ऐसी कोई तो जगह होगी जहाँ पर चाचा अपनी अय्याशिया कर पाता होगा और उसकी गाडी , इतनी बड़ी चीज को छुपाना आसान तो नहीं वो भी जब गाडी राय साहब के भाई की हो

खेतो पर खड़े मैं जंगल को घूर रहा था , न जाने क्यों मेरा मन कह रहा था की गाडी इसी जंगल में कहीं छिपी है . अगर निशा वाला खंडहर गुप्त हो सकता था तो इस जंगल में ऐसा कोई और ठिकाना भी हो सकता था . पर इतने बड़े और गहरे जंगल में कहाँ तलाशा जाये .

" ऐसी जगह जो बेहद आम होती , जो सबके सामने तो होती पर उसे कोई देख नहीं पाता " अंजू की कही बात के महत्त्व को समझ रहा था मैं. अँधेरा होने तक जितना मैं तलाश सकता था मैंने उतना कोशिश किया पर हाथ खाली रहे. घर आते ही मैं नहाने चला गया हलवाई की बनाई आलू-पूरी की खुसबू से घर महक रहा था .

नए सूट सलवार में चंपा क्या खूब सज रही थी . उसका गोरा रंग गुलाबी हो गया था ब्याह की हल्दी का निखार चढ़ने लगा था उस पर. मैंने चाची को इशारा किया की आज तो कर दे मेहरबानी पर उसने आँखे चढाते हुए मना किया. मैंने देखा अंजू मेहमानों को खाना परोस रही थी . मैंने उसे आवाज दी पर उसने अनदेखा किया मैं रसोई में गया . छिपे हुए कमरे पर ताला लटक रहा था.

मैने ताले को तोड़ दिया और कमरे में घुस गया . दरवाजा बंद किया और एक बार फिर मैं अभिमानु भैया के अतीत में था. कमरा वैसा ही था जैसा पहले था . ढेरो किताबे, पुराने कपडे. मेरी नजर एक पुराने लकड़ी के छोटे संदूक पर पड़ी जो शायद मेरी नजरो से छिपा रह गया था . मैंने उसे खोला , धुल से सनी कुछ चीजे पड़ी थी . एक पुराणी घडी.एक एल्बम था जिसमे भैया के बचपन की तस्वीरे थे और कुछ जवानी के शुरूआती दिनों की रही होंगी . हालत बुरी थी दीमक खा चुकी थी . ज्यादातर तस्वीरे जंगल की थी , पेड़ो के इर्द-गिर्द कच्चे रस्ते के पास तस्वीरों में कुछ खास नहीं था , मैंने खास जहमत नहीं उठाई अल्बम को मैंने फेंक ही दिया था . किताबो के ढेर में सर खपाते हुए मैं सोच में डूबा था , कुछ तो खटक रहा था मुझे, तभी मैंने अलबम वापिस उठाया . एक तस्वीर में भैया चाचा के साथ खड़े थे . ये कहाँ थे , सर खुजाते हुए मैं सोचने लगा. मैंने वो तस्वीर निकाली और जेब में रख ली.


"तेरे हिस्से का सच तेरी दहलीज में ही छिपा है " निशा की कहीं बात अचानक ही मुझे याद आ गयी.
 
#108

बाहर आते ही मैं भाभी से टकरा गया . जो थोडा गुस्से में थी .

भाभी-ताला क्यों तोडा चाबी मांग लेते मुझसे

मैं- नया लगा लो

भाभी- किस चीज की तलाश है तुमको

मैं- भैया ने आपको नहीं बताया क्या

भाभी- नहीं तुम ही बता दो

मैं-मैं पल पल मर रहा हूँ भाभी, अपने हिस्से की जिन्दगी तलाश रहा हूँ

भाभी इस से पहले की कुछ और कहती सरला आ गयी रसोई में तो मैं वहां से बाहर निकल गया. बाहर आकर मैंने सरला से कहा की थोडा दूध ले आए मेरे लिए. मैंने पत्तल ली और खाना खाने के लिए बैठ गया . अंजू ने मुझे देखा तो मेरे पास आई.

अंजू- इतने बड़े होकर भी दूध पीते हो .

मैं-पीना तो मैं बहुत कुछ चाहता हूँ पर तुम बुरा मान जाओगी

अंजू- मैं क्यों बुरा मानूंगी बताओ क्या पीना चाहते हो मैं ले आती हूँ

मैं- रहने दे तू

अंजू पास ही बैठ गयी और मेरे साथ ही खाना खाने लगी.

अंजू- पूरा दिन कहा गायब थे .

मैं- तुझे याद आ रही थी क्या मेरी .

अंजू- इतना भी नहीं है तू की मरी जा रही हूँ तेरी याद में

मैं- तो फिर क्यों पूछती है कहीं भी जाऊ मैं

अंजू- तू भी नहीं था अभिमानु भी नहीं था . अकेली का टाइम पास नहीं हो रहा था मेरा.

मैं- तू कहे तो पूरी रात टाइम पास कर सकते है

अंजू- इस से आगे भी दुनिया है तू कब तक इसी में अटका रहेगा.

मैं- जहाँ तक तुझे समझा है , प्रकाश से तेरे सम्बन्ध वैसे नहीं थे जैसे तू बताती है

अंजू- मैंने आज मंगू से बात करने की कोशिश की थी पर वो राय साहब के साथ कहीं चला गया .

मैं- तुझे बुरा नहीं लगा जब तूने देखा की प्रकाश रमा को चोद रहा था तेरे जैसी गदराई साथी होने के बाद भी वो रमा के पास गया अजीब है न

अंजू- कितनी बार कहा है मेरे निजी मामले में मत घुस

मैं- घुसने तो तूने नहीं दिया परकाश को वर्ना वो क्यों जाता रमा के पास

अंजू- मुह तोड़ दूंगी तेरा

मैं- शायद तेरे नसीब ने चुदाई का सूख है ही नहीं

अंजू- तू खुश रह मैं जा रही हूँ

मेरी निगाह चाची पर थी जिसकी मटकती गांड मुझे पागल किये हुए थी. कितने ही दिन बीत गए थे मैंने चाची को नहीं पेला था . कुवे पर चुदाई का रिस्क नहीं ले सकता था मैं निशा अगर आ निकली तो मामला काबू से बाहर हो सकता था . लोगो से भरे घर में कहा चूत मारू खाना खाते हुए मैं ये ही सोच रहा था

जिन्दगी में इतना सब कुछ हो रहा था की मैं करू तो क्या करू कल रात आदमखोर को छत पर देख कर मैं समझ गया था की ये साला भी कुछ न कुछ करने की ताक में है . खैर मैं चाची के पास गया .

मैं- चाची कुछ भी कर आज देनी ही पड़ेगी

चाची- देखती हूँ जगह भी तो नहीं है न

मैं- सुन मेरी बात , बिस्तर सीढियों पर बने छज्जे पर लगा ले. सबके सोने के बाद उधर मिलेंगे सीढियों का दरवाजा बंद कर लेंगे किसी के आने का डर भी नहीं रहेगा.

चाची- चल ठीक है

मैंने मौका देख कर चाची की गांड को सहला दिया. आंच तापते हुए मुझे इंतज़ार था सबके सोने का ताकि चूत का सूख प्राप्त कर सकू . तभी बाप की गाडी आ गयी वो सीधा अपने कमरे में गया और दरवाजा बंद कर लिया. मैं हमेशा सोचता था की ये बंद दरवाजे के पीछे करता क्या होगा. धीरे धीरे करके बत्तिया बुझने लगी.पूरी तरह से सुनिश्चित करने के बाद मैं चाची के घर जा ही रहा था की गली में मूतने के लिए रुक गया. मूत ही रहा था की मैंने राय साहब को पैदल ही घर से बाहर निकलते देखा.

इतनी रात ओके बाप कहाँ जा रहा था एक तरफ चूत थी एक तरफ ये जानने की इच्छा की बाप कहाँ जा रहा था. मैंने तुरंत पीछा करना शुरू किया. थोड़ी दूर पीछा करने के बाद मैं समझ गया था की बाप कहाँ जा रहा था . वो रमा के घर जा रहा था . राय साहब के घर में घुसते ही मैं पीछे वाली खिड़की की तरफ गया और जब वहां पहुंचा तो हैरान रह गया . खिड़की पर अंजू पहले से ही मोजूद थी .

"ये बहन की लौड़ी यहाँ क्या कर रही है " मैंने खुद से कहा और अंजू से थोड़ी दुरी बना कर खड़ा हो गया. खिड़की से अन्दर दिख रहा था . कमरे में राय साहब थे थोड़ी देर बाद रमा भी कमरे में आई, पूर्ण रूप से नग्न रमा शायद नाहा कर आई थी क्योंकि बदन से पानी टपक रहा था . उनकी चुदाई शुरू हो गयी . अंजू खिड़की से हट गयी और मेरी तरफ आने लगी.

मैं- हट क्यों गयी अपने मामा की रास लीला तो देख ले

अंजू- रमा पर नजर थी मेरी पर यहाँ तो कुछ और ही चल रहा है

अंजू का सीना तेजी से ऊपर निचे हो रहा था .

मैं- मैंने तुझसे कहा था न मेरा बाप वैसा नहीं है जैसा दीखता है

अंजू-चल चलते है यहाँ

मैं- कहाँ चलेंगे

अंजू-घर और कहा

मैं- बात तो सुन

अंजू-घर चल कर करेंगे जो भी बात करनी होगी.

मैं- ऐसा क्यों लगता है की तू कुछ छिपा रही है मुझसे

अंजू- मैं क्या छिपा रही हूँ तू ही बता

मैं- देख अंजू , तेरी जो भी तलाश है रमा उसकी बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है . ये औरत उनसब से चुद रही है जिनको हम जानते है

अंजू- जानती हूँ ,

मैं- इतना तो मालूम कर ले इ मेरा बाप क्यों पेल रहा है इसे.

अंजू- करुँगी पता

मैं- तेरा मन करता है क्या चुदाई करने का

अंजू- करेगा तब भी तुजसे नहीं करुँगी ये सब

मैं- क्यों

अंजू- मेरी मर्जी .

घर आते ही अंजू चौबारे मे जाने लगी. मैं चाची के पास जाने को मुड़ा ही था की अंजू ने मुझे आवाज दी.

"अब कहाँ जा रहा है "

मैं- एक काम याद आ गया निपटा के आता हूँ

अंजू- काम तो चोबारे में भी करना होगा , आजा ऊपर.

मैं- ठीक है .

ऊपर जाने से पहले मैंने सोचा की दरवाजा बंद कर देता हूँ . मैंने दरवाजे को पकड़ा और गीलेपन से मेरा हाथ सन गया......................मैंने तुरंत पीछे मुड कर देखा अंजू सीढियों पर नहीं थी पर गली में दरवाजे के ठीक सामने............
 
#109

गली में दरवाजे के ठीक सामने आदमखोर खून से लथपथ खड़ा था उसकी पीली आँखे मेरी आँखों से मिली . उसने मुझे देख कर गुर्राया . उसके नुकीले दांत जिनसे रक्त टपक रहा था . मैं समझ गया था की आज ये किसी का तो शिकार कर आया है . अत्याप्र्त्याषित रूप से उसने मुझे लात मारी. मैं जरा भी तैयार नहीं था वार के लिए हवा में उड़ता हुआ मैं लोहे के दरवाजे से जा टकराया.

"आईईईई " बड़ी तेज लगी थी मुझे. बहुत ही मुश्किल से संभल पाया मैं .

"रुक साले , तुझे आज मैं बताता हूँ " मैं उसकी तरफ लपका पर वो तेज था उसने मुझे छकाया और एक बार फिर से उठा कर पटक दिया. गिरते हुए मैंने एक बात पर गौर किया कभी ये साला हाथ ही नहीं धरने देता कभी ये वार करता नहीं माजरा क्या है ये. किस्मत देखो, ब्याह के कारन पूरी गली की सफाई करवा दी गयी थी तोऐसा कुछ भी नहीं था जो हमले में इस्तेमाल किया जा सके.

तीसरी बार जब उसने मुझे चबूतरे पर पटका तो मेरा सब्र टूट गया.

मैं- ठीक है फिर .

मैंने उसके अगले वार को थाम लिया पर उसके पंजे मेरे कंधो में धंस जाने को बेताब लग रहे थे आज. उसके बदन से आती ताजा रक्त की महक मुझ पर भी असर करने लगी थी. बदन में दौड़ता रक्त सुन्न होने लगा था . दिल अचानक से ही करने लगा की सामने वाले का सीना चीर दू और उसके ताजा खून को अपने होंठो से लगा लू. न जाने मुझे क्या हुआ मैंने उसकी गर्दन पकड कर उसे ऊपर उठा लिया. उसकी पीली आँखों में मैंने हैरानी देक्खी.

अब बारी मेरी थी. मैंने उसके पेट में लात मारी वो सीधा चाची के चबूतरे पर जाकर गिरा. चबूतरे का फर्श एक पल में तड़क गया. पर वो आदमखोर तुरंत ही उठ कर लपका मुझ पर . इस बार मैं सावधान था मैंने उसे हवा में ही लपका और सामने दिवार पर दे मारा. दिवार का कोना झड़ गया. बाहर हो रही उठापटक से लोग भी जाग गए और बाहर आने लगे. चाची दौड़ते हुए बाहर आई , आदमखोर को देखते ही उसकी चीख निकल गयी. आदमखोर चाची की तरफ लपका पर मैंने फुर्ती दिखाते हुए उसका पैर पकड़ लिया और अपनी तरफ खींचा.

"चाची अन्दर जा और किवाड़ बंद कर ले. " मैं चिल्लाया पर चाची जरा भी नहीं हिली डर के मारे जम ही गयी वो . दो चार लोग और बाहर आये मामला संगीन हो सकता था आदमखोर को यहाँ से हटाना बेहद जरुरी हो सकता था .

मैंने उसे धक्का दिया और गली के बाहर की तरफ भागा. वो मेरे पीछे आया. मैं यही चाहता था . एक दुसरे को छकाते हुए हम लोग गाँव से बाहर आ चुके थे. अब मैदान साफ़ था वो था और मैं था . आज की रात मैं बड़ी शिद्दत से ये किस्सा खत्म कर देना चाहता था .

"बता क्यों नहीं देता तू क्या पहचान है तेरी " मैंने उसे सड़क से खेत की पगडण्डी पर घसीटते हुए कहा. उसने एक नजर आसमान की तरफ देखा और ऐसा मुक्का मारा मुझे की तारे ही नाच गए मेरी आँखों के सामने, नाक से खून बहने लगा. इम्पैक्ट इतना जोर का था की लगा कहीं नाक ही न टूट गयी हो.

पैने नाखून मेरी जाकेट को उधेड गए एक पल में ही . वो पूरी तरह से छा चूका था . इस से पहले की नाखून छाती में घुस जाये. मैंने पूरा जोर लगा कर उसे अपने से दूर धकेला. आदमखोर के अन्दर मैं नयी उर्जा को महसूस कर रहा था . जिस खेत में हम लड़ रहे थे वहां पर कंक्रीट के छोटे खम्बे लगे थे तारबंदी में मैंने वो खम्बा उखाड़ लिया और उसके सर पर वार किया.

वार सटीक जगह पर हुआ था ,एक पल को वो चकराया और मैंने बिना देर किये दो चार वार उसके सर पर लगातार किये. उसका घुटना निचे हुआ और अगला वार उसके कंधे पर हुआ . वो बुरी तरह से चीखा और फिर उसकी लात मेरे पेट पर पड़ी. दर्द से दोहरा हो गया मैं जब तक मैं संभला वो रफू चक्कर हो गया. इक बार फिर से मैं पकड़ नहीं पाया था उसे. अपने सीने पर हुए जख्म को रगड़ते हुए मैं सडक पर आया और सोचने लगा की किस तरफ गया होगा ये.

अगर वो जंगल की तरफ भागा था तो उसे तलाश कर पाना असंभव था इस रात के समय में . लंगड़ाते हुए मैं वापिस गाँव की तरफ चल दिया. गाँव में घुसा ही था की मैंने अंजू को देखा , खून से लथपथ सर से रिसता खून , पैरो में लचक . मैं हैरान हो गया उसे देख कर मेरा शक कहीं न कहीं यकीन में बदल रहा था की अंजू ही वो आदमखोर है .

"कबीर, तू ठीक है न मैं तुझे ही देखने आ रही थी " इस से पहले की अंजू और कुछ कहती मैंने उसकी गर्दन पकड़ी और उसे धर लिया.

मैं- बस बहुत हुआ नाटक बंद कर , अब तेरे पास छिपाने को कुछ नहीं बचा. तू ही है वो आदमखोर . तुझे ठीक वहीँ पर चोट लगना जहाँ उस आदमखोर को लगी थी पुष्टि करती है मेरे शक की और फिर तू भी जानती थी की घायल अवस्था में तू जायदा दूर नहीं जा पायेगी तो रूप बदल लिया.

अंजू- दम घुट रहा है मेरा छोड़ मुझे

मैं- अब कोई नाटक नहीं

"कबीर छोड़ दे अंजू को " ये आवाज भाभी की थी जो चाची और कुछ गाँव वालो के साथ हाथो में लालटेन, लट्ठ लिए हमारी तरफ ही आ रही थी .

मैं- इसे छोड़ दिया तो बहुत नुकसान हो जायेगा भाभी

भाभी- इसे कुछ हो गया तो नुकसान हो जायेगा कबीर

मैं- आप नहीं जानती भाभी

भाभी- जानती हूँ तभी कह रही हु, आदमखोर का हमला इस पर ही हुआ था . पड़ोसियों की दो भैंसों को मारने के बाद आदमखोर ने अंजू पर ही हमला किया था छत से गिरने के कारन ही इसे चोट लगी है . अफरा तफरी में ये घर के बगल में घायल मिली . जब इसे मालूम हुआ की तुम आदमखोर के पीछे हो तो अपनी चोट भूल कर ये इधर ही दौड़ पड़ी.

भाभी की बात सुन कर मैंने अंजू को छोड़ दिया . भाभी ने उसे संभाला पर मेरा मन नहीं मान रहा था .

घर आने के बाद मैंने देखा की सब लोगो में अजीब सी दहशत फैली हुई थी मैंने सबको आश्वस्त किया की घबराने की कोई बात नहीं है. चंपा से मैंने पानी गर्म करने को कहा और अपने जख्मो को देखने लगा. चूँकि अब कोई वैध तो था नहीं , मैने शहर के डाक्टर का दिया डब्बा निकाला और अपने जख्मो पर मरहम लगाने लगा.

यदि अंजू नहीं थी वो आदमखोर तो फिर कौन था , और अंजू पर हमला करने का उसका कोई मकसद था या फिर बस अंजू उसका शिकार थी और लोगो की तरह सर में दर्द होने लगा था . मैंने चाची से थोडा दूध लाने को कहा और वहीँ आँगन में एक गद्दा बिछा कर लेट गया.
 
#110

सुबह उठा तो बदन दर्द से ऐंठा पड़ा था. बड़ी मुश्किल से मैं उठ पाया. मैंने देखा की आँगन में ही राय साहब, चाची, भैया, भाभी और अंजू सब लोग गहरा विचार -विमर्श कर रहे थे. मैंने पहली बार राय साहब के माथे पर चिंता की लकीरे देखि. उठ कर मैंने हाथ -मुह धोये और बाहर निकल आया. पीछे से मैंने भैया की आवाज सुनी पर मैं अभी रुकना नहीं चाहता था .

चाची के यहाँ से मैंने कपडे बदले और अपने खेतो पर आ गया. सुबह की ताजी हवा मुझे सकून दे रही थी . दिमाग में कल रात की ही बात घूम रही थी , अंजू नहीं तो फिर कौन हो सकता था वो आदमखोर,आखिर कौन था वो जिस पर काबू पाया ही नहीं जा रहा था , कहाँ से वो आता था कहाँ वो गायब हो जाता था .

दूसरा मुझे भोसड़ी के चाचा वाली गुत्थी ने उलझाया हुआ था , बहन का लौड़ा न जाने कहाँ गायब था . उसके चक्कर में अलग ही रायता फैला हुआ था . प्रकाश को किस चीज की तलाश थी जो वो चाचा से चाहता था . चाचा के बाद सिर्फ एक चीज गायब थी जो उसकी गाडी थी और गाडी को छुपाने के लिए बड़ी जगह चाहिए थी, पर वो जगह थी कहाँ पर ये सोचने की बात थी . मैंने भैया की गाडी को अपनी तरफ आते देखा. जल्दी ही वो मेरे पास थे.

भैया- छोटे, आगे से चाहे कुछ भी हो जाए आग लगनी है लग जाये तु उस आदमखोर के सामने नहीं आएगा. मैं देखूंगा अब इस मामले को . कल रात तुझे कुछ हो जाता तो

मैं- कुछ हुआ तो नहीं भैया . वैसे भी वो मेरी पकड़ से जायदा दूर नहीं है अगली मुलाकात में मैं उसे जरुर मार दूंगा.

भैया- तूने शायद सुना नहीं मैंने क्या कहा तुझसे.

मैं- भैया, आपने कभी इस बात पर विचार किया की चाचा के साथ साथ उसकी गाडी भी गायब है , और क्या गायब है चाचा का सामान में से

भैया- कबीर तुझे क्या जरुरत है ये सब सोचने की तेरे खेलने -कूदने के दिन है तू मौज कर .

मैं- चाचा हमारे परिवार का सदस्य है , हमारा खून का रिश्ता है उस से . घर की एक दिवार है वो . उसके बिना हम क्या

भैया- समझता हूँ पर हम हर मुमकिन कोशिश करके देख चुके है

मैं- क्या आप जानते हो की चाचा रमा से प्यार करता था .

भैया- रमा एक खिलौना थी बस जिससे चाचा खेलता था .

मैं- हो सकता है , पर चाचा चाहता था उसे

भैया- वो चाचा और रमा के बिच की बात थी . और यदि तुझे ऐसा लगता है तो ये बात तेरे तक ही रखना चाची के सामने मत करना उसको दुःख होगा.

मैं- उसे तो उम्र भर का दुःख हो ही गया है .

भैया- पिताजी ने कहा है की वो जल्दी ही आदमखोर के किस्से को ख़त्म कर देंगे

मैं- उनको फुर्सत आएगी तो सोचेंगे न परिवार, गाँव के बारे में

भैया- ऐसा क्यों कहता है

मैं- आप ही मालूम कर लो आजका कहाँ बीत रहा है उनका समय

भैया- तू कहता है तो मैं देख लूँगा.

दोपहर तक भैया मेरे साथ ही रहे फिर वो चले गए. पर मुझे चैन नहीं था. कुछ तो मुझसे छूट रहा था . एक बार फिर मैं निशा के खंडहर पर गया. वो भुला दिए गए कमरे एक बार फिर मेरे सामने थे. अजीब सी ख़ामोशी चीखना चाहती थी पर शायद मैं नहीं सुन पा रहा था . एक बार फिर मैंने गहन रूप से दुसरे कमरे की तलाशी लेनी शुरू की , दिवालो को फिर देखा की क्या पता कोई और छिपा दरवाजा हो. कौन था वो जो यहाँ पर रंडियों को चोद रहा था .

मान लिया जाये की चाचा यहाँ आता था तो मेरे अनुमान को दो बाते गलत साबित करती थी , रमा-सरला को यहाँ केक बारे में मालूम नहीं था दूसरी बात की गाडी ये ईमारत जिस इलाके में थी गाड़ी का आना मुमकिन नहीं था .

"जरुरी नहीं की जंगल में सिर्फ तुम ही हो जो अपने जिन्दगी जी रहे हो तुमसे पहले न जाने कितने आये कितने गए. कितनो के राज छिपाए है ये जंगल " भाभी की कही बात मेरे जेहन में गूँज रही थी.

"तुम ख़ामोशी से खड़े नहीं रह सकते तुमने कुछ तो छिपाया है क्या है वो दिखाओ मुझे , " मैंने दीवारों से कहा और यकीन मानिये उस दिन मैंने जाना की लोग ठीक ही तो कहते है की दीवारों के भी कान होते है . इन दीवारों ने बहुत कुछ देखा था बहुत कुछ सुना था .

पहले वाले कमरे की दीवारों पर जो खरोंचे थी उन खरोंचो में कुछ लिखा गया था , अक्सर लोग पेड़ के तनो पर , पुराणी इमारतों की दीवारों पर नाम लिख देते है. यहाँ भी किसी ने कुछ लिखा था जो लकीरों की वजह से स्पस्ट तो नहीं था पर रौशनी की इतनी किरण बहुत थी मेरे लिए.

"त्रिदेव की कहानी ढूंढो , उनको पा लिया तो सब कुछ पा लिया " अंजू के कहे शब्द मुझे राह दिखा रहे थे. रुडा-विश्वम्बर दयाल-सुनैना. बेशक ये तीनो नाम त्रिदेव की तरफ इशारा करते थे पर ये मेरी मंजिल नहीं थे. मेरी मंजिल कुछ और था, मेरी मंजिल ये अक्षर थे जिन्हें अजीब तरीके से उकेरा गया था ,

अक्षर मेरी समझ में आ नहीं रहे थे तभी मुझे कुछ सोचा मैंने चिमनी की कालिख उस जगह पर मली और अँधेरे ने जो मुझे दिखाया, मेरा तो दिमाग ही घूम गया. ऐसा लगा की मेरी जान किसी ने निकाल ली हो. हो सकता था की मेरा अनुमान गलत साबित हो जैसे की मैंने पहले भी त्रिदेव को गलत समझ लिया था और अगर अब की बार मैंने सही समझा था तो मामला हद से जायदा संगीन था , हद से ज्यादा उलझ गया था . इन अक्षरों के बारे में सवाल पूछने का समय आ गया था .

वापिस आते हुए मैं कुवे पर गया तो देखा की सरला वहां पर मोजूद थी,

मैं- इस वक्त यहाँ पर तुम्हे तो घर पर होना चाहिए था न

सरला- नंदिनी ठकुराइन के साथ आई हूँ

मैं- कहाँ है भाभी

सरला- यही है , कह कर गयी है की थोड़ी हवा खाकर आती हूँ

मैं- घर में इतना काम है और भाभी यहाँ आई है . किस तरफ गयी है वो

सरला ने आगे की तरफ इशारा किया तो मैं चल दिया. भाभी क्यों आई थी कुवे पर ये सवाल मन में लिए .

मैंने भाभी को देखा जो जमीन के डोले पर बैठी थी .उन्होंने मुझे देखा और बोली- कहाँ गायब थे तुम

मैं- जरुरी काम था , आप यहाँ कैसे

भाभी- मैं जान गयी हूँ की प्रकाश को किसने मारा है

मैं- आपको कैसे मालूम हुआ

भाभी- ये तो पूछ लो की किसने मारा.

मैं- बताओ

भाभी ने जो नाम मुझे बताया मेरा दिल धक् से रह गया.................

 
#111

भाभी और मेरे बीच ख़ामोशी छाई हुई थी , पर दिल में तूफान आया हुआ था .

भाभी- जानती हूँ तुझे यकीन नहीं आयेगा पर तेरी दोस्ती के आगे भी दुनिया है कबीर.

मैं- ऐसी क्या वजह थी जिसके लिए मंगू ने परकाश को मारा

भाभी- वजह है कबीर, वजह है राय साहब है वो वजह. प्रकाश राय साहब को ब्लैकमेल कर रहा था. बाद जब हद से आगे बढ़ गयी तो राय साहब ने अपना काँटा निकाल लिया

मैं- और आपको कैसे पता चला ये .

भाभी- मैंने राय साहब और मंगू को बात करते समय सुना था .

मैं- पिताजी के टुकडो पर पलने वाले नौकर ने ही पिताजी को ब्लेकमेल किया पर क्यों

भाभी- इसकी तह तो नहीं निकाल पाई पर प्रकाश श्याद वसीयत के चौथे पन्ने के हक़ की मांग कर रहा था .

मैं- पर चौथे पन्ने में कुछ भी तो नहीं था .

भाभी- कबीर मैं कभी नहीं चाहती थी की तुम इस परिवार के अतीत को देखो पर मैं रोक नहीं पाई. आज मैं बेचैन हूँ , मैं आने वाले कल को देख रही हूँ . और उस कल को मैं देखना नहीं चाहती.

मैं- आने वाला कल खूबसूरत होगा भाभी

भाभी- राय साहब को अपना गुरुर सबसे प्यारा है वो कभी नहीं झुकेंगे

मैं- आसमान भी झुकता है , झुकाने वाला चाहिए.

भाभी- इसी बात से तो मैं डरती हूँ.

मैं- मंगू से आज ही बात करूँगा मैं

भाभी- ये ठीक समय नहीं

मैं- बात करना बेहद जरुरी है , अंजू को मालूम हुआ तो आग लग जाएगी और जलना मुझे पड़ेगा. मंगू की क्या मज़बूरी है की वो राय साहब का पालतू बन गया है ये जानना ही होगा. राय साहब के पापो में उसका भी हाथ है .

मैं- त्रिदेव की कहानी बता क्यों नहीं देती भाभी मुझे तुम

भाभी- तू अपने जीवन की नयी शुरात करने जा रहा है कबीर. मैं एक बार फिर कहूँगी इन बातो को जानने की जिद छोड़ और आगे बढ़. वो चार दीवारे जिन्हें तुम घर कहते हो, वो घर मर चूका है कबीर. उसके जनाजे के बोझ को तुम उठा नहीं पाओगे . सपना देखा है तुमने, उसे पूरा करो. अंजू आदमखोर नहीं है विश्वास करना मेरी बात पर.

भाभी के जाने के बाद भी बहुत देर तक मैं उनकी कही बाते समझने की कोशिश करता रहा . वसीयत का चौथा पन्ना जिसे मैं देख नहीं पाया था राय साहब ने जो बताया वो मैंने मान लिया था .

"तुम अकेले नहीं हो जिसने अपने राज यहाँ छिपाए है , तुमसे पहले और भी थे जिन्होंने अपनी जिन्दगी इस जंगल में जी है "

"तेरे हिस्से का सच तेरी दहलीज में है "

मेरा सर इतना भारी हो गया था की मैं पागल ही हो जाता अगर वहां से नहीं चलता तो. जेब में पड़ी चाबी मेरे घर का हिस्सा ही तो थी . चाचा की अमानत जिसका न जाने क्या मोल था . घर आने के बाद मैं नहाया और आंच के पास बैठ गया . अंजू से दो चार बार नजरे मिली तो सही पर बात नहीं हो पाई.

रात का अन्धकार मुझे लील ही जाने वाला था की , सामने खड़ी उसे देख कर बस देखता ही रह गया. डाकन एक बार फिर से मेरी दहलीज पर खड़ी निहार रही थी मुझे. मैंने एक नजर बाप के कमरे पर डाली एक नजर ऊपर चौबारे पर और उसकी तरफ चल दिया. उसने पीठ मोड़ी और बाहर की तरफ चली की मैंने उसका हाथ पकड़ लिया .

"अपने घर आई है तू , कब तक बचेगी " मैंने कहा

निशा-बचना तो तुझे है मेरे सनम . ये जिन्दगी जो तू दांव पर लगाये हुए है ये मेरी अमानत है .

मैं- तो फिर अपनी अमानत को थाम ले बाँहों में , चोरी छिपे क्यों मिलना फिर ज़माने को बता दे की इश्क किया है इस डाकन ने .

निशा- बस तुझे देखना चाहती थी .

मैं- थाम ले फिर इस रात को और देख जी भर के मुझे . आ मेरे साथ इन खुशियों में शामिल हो .

निशा- तू जानता है न मुझे खुशिया रास नहीं आती

मैं- आदत डाल ले तू अब

मैंने निशा को अपनी तरफ खींचा और आगोश में भर लिया. उसकी सांसे मेरी साँसों में उलझने लगी.

निशा- क्या चाहते हो

मैं- तुमसे प्यार करना

निशा- करती तो हूँ तुमसे प्यार

मैं- जताती क्यों नहीं फिर

निशा- आ चल फिर साथ मेरे, यहाँ की हवा ठीक नहीं

मैं- चल फिर.

उसका हाथ थामे मैं उसके साथ चलते हुए खेतो पर आ गया.

निशा- मुझे मालुम हुआ की कल फिर तू भिड़ा उस आदमखोर से

मैं- हाथ लगते लगते रह गया .

निशा- कबीर, अब जब हम दोनों जिन्दगी के ऐसे मोड़ पर है,तुझे ये समझना होगा की तुझ को अगर कुछ हो गया तो फिर मेरा क्या होगा. पहले कभी मेरा हाल ऐसा ना हुआ पर कुछ दिनों से मैं डरती हूँ तुझे खोने से.

मैं- तू मेरे साथ है तो फिर क्या हो सकता है मुझे . पर मुझे तुझसे कुछ बताना है .

निशा- सुन रही हूँ

मैंने उसे तमाम बाते बताई, वसीयत के चौथे पन्ने का जिक्र भी किया . बहुत देर तक वो सोच में डूबी रही फिर बोली- चल, देखते है सुनैना की समाधी को .

मैं- इस वक्त

निशा- हाँ अभी इसी वक्त.

हम दोनों चल दिए. जंगल में अन्दर घुसते गए. और फिर एक जगह आकर निशा ने गलत राह पकड़ ली.

मैं- इधर कहा जा रही है.

निशा- सुनैना की समाधी नहीं देखनी क्या

मैं- पर वो तो उस रस्ते पर है न

निशा ने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोली- कल के हमले के बाद शायद हिल गए हो तुम या फिर अँधेरे का असर है . आ जल्दी से .

मैं कुछ नही बोला बस उसके पीछे चलता गया . कुछ देर बाद वो एक जगह रुकी जहाँ पर बड़े पत्थरों से एक समाधी बनाई गयी थी जिसे चिना नहीं गया था . कच्चे पत्थर रखे थे एक के ऊपर एक .

निशा- तो आ गए हम

मैं- निशा ये सुनैना की समाधी नहीं है

निशा- क्या बोल रहा है तू कबीर. बंजारों की समाधी का नहीं मालूम क्या तुझे कच्ची चिनाई वो ही तो करते है . और फिर मुझे नहीं मालूम होगा क्या इस जगह के बारे में

मैं- अगर ये सुनैना की समाधी है तो फिर वो जगह क्या है .

निशा- कौन सी जगह

मैं- वसीयत के चौथे पन्ने का सच वही छिपा है निशा, हमें अभी के अभी वहां पर जाना होगा.
 
#112

मैंने निशा को साथ लिया और हम लोग उस जगह पर आ गए जहाँ पर पिताजी मुझे लेकर आये थे. समाधी अभी भी वैसी ही थी जैसा मैं उसे छोड़ कर गया था .

मैं- अगर वो सुनैना की समाधी थी तो ये किसकी समाधी है

निशा- मैं क्या जानू , पर इतना जानती हूँ की सुनैना की समाधी वहां है जहां मैं तुझे लेकर गयी थी चाहे तो तस्दीक कर ले.

मैं- मानता हु तेरी बात तो फिर राय साहब ने झूठ क्यों कहा. क्या छिपा रहे थे वो.

निशा- अब आये है तो ये भी तलाश लेते है , जंगल बड़ा रहस्यमई है , इसकी ख़ामोशी में चीखे है लोगो की . देखते है यहाँ की क्या कहानी है. उम्मीद है ये रात दिलचस्प होगी.

मैंने मुस्कुरा कर देखा उसे. अपनी जुल्फों को चेहरे से हटाते हुए वो भी मुस्कुराई और टूटी समाधी को देखने लगी.

निशा- यहाँ भी धन पड़ा है

मैं- यही तो समझ नही आ रहा की ऐसा कौन हो गया जो खुले आम अपने धन को फेंक गया. अजीब होगा वो सक्श जिसे दुनिया की सबसे मूल्यवान धातु का मोह नहीं.

पता नहीं निशा ने मेरी बात सुनी या नहीं सुनी वो उन दो कमरों की तरफ बढ़ गयी थी . पत्थर उठा कर बिना किसी फ़िक्र के उसने बड़े आराम से दोनों कमरों के ताले तोड़ दिए. उसके पीछे पीछे मैं भी अन्दर आया. कमरे बस कमरे थे , कुछ खास नहीं था वहां . एक कमरा बिलकुल खाली था , दुसरे में एक पलंग था जिसकी चादर बहुत समय से बदली नहीं गयी थी . मैंने निशा को देखा जो गहरी सोच में डूब गयी थी .

मैं- क्या सोच रही है

निशा- इस जगह को समझने की कोशिश कर रही हूँ. इन कमरों का तो नहीं पता पर जहाँ तक मैं समझी हूँ तेरे कुवे और मेरे खंडहर से लगभग समान दुरी है यहाँ की . इस सोने को देखती हूँ , तालाब में पड़े सोने को देखती हूँ तो सोचती हूँ की कोई तो ऐसा होगा जो इन तीनो जगह को बराबर समझता होगा. पर यहाँ लोग आते है खंडहर पर कोई आता नहीं

निशा कुछ कह रही थी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था .इस जगह से बड़ी आसानी से कुवे पर और निशा के खंडहर पहुंचा जा सकता था तो इस जगह का इस्तेमाल चुदाई के लिए भी सकता था . खंडहर का कमरे में चुदाई हो सकती थी तो यहाँ भी हो सकती थी, और अगर मामला चुदाई का था तो चाचा वो आदमी हो सकता था जो दोनों जगह के बारे में जानता होगा

मैं- ठाकुर जरनैल सिंह वो आदमी हो सकता है निशा जिसका सम्बन्ध तीनो जगह कुवे, यहाँ और खंडहर से हो सकता है. वसीयत का चौथा पन्ना हो न हो चाचा के बारे में ही है. और अगर चाचा तीनो जगह इस्तेमाल करता था तो पिताजी भी करते होंगे क्योंकि आजकल वो भी चाचा की राह पर ही चल दिए है , दोनों भाइयो के बीच झगडा किसी औरत के लिए ही हुआ होगा.

निशा- क्या लगता है तुझे रमा हो सकती है वो औरत .

मैं- चाचा के जीवन म तीन प्रेयसी थी , कविता, सरला और रमा. सबसे जायदा सम्भावना रमा की है . कविता हो न हो उस रात चाचा से मिलने ही आई होगी , पर बदकिस्मती से उसकी हत्या हो गयी.

निशा- पर ठाकुर जरनैल कहाँ है और छिपा है तो क्यों , किसलिए

मैं- कहीं चाचा तो आदमखोर नहीं . जब कविता उस से मिली उस समय शायद उसका रूप बदला हो और उसने कविता को मार दिया हो. सम्भावना बहुत ज्यादा है इस शक की क्योंकि कई बार मैंने भी महसूस किया है की आदमखोर से कोई तो ताल्लुक है मेरा. इसी बीमारी के कारन चाचा को छिप कर रहना पड़ रहा हो .

निशा- ऐसा है तो विचित्र है ये .

मैं- जंगल ने जब इतने राज छिपाए हुए है तो ये राज भी सही . राय साहब ने चौथा पन्ना इसलिए ही रखा होगा की चाचा का राज कभी कोई समझ नहीं पाये. जब जब राय साहब काम का बहाना करके गाँव से गायब होते है तो जरूर वो अपने भाई की देख रेख ही करते होंगे. राय साहब अक्सर चांदनी रातो में ही गायब होते है .

निशा- पुष्टि करने के लिए हमें इस जगह की निगरानी करनी होगी.

मैं- मैं करूँगा ये काम. चाचा से मिलने को सबसे बेताब मैं हूँ . बहुत सवाल है मेरे उनसे. पर एक चीज खटक रही है अभी भी मुझे की गाड़ी कहाँ छिपाई गयी चाचा की .

निशा- ठाकुर साहब इधर है तो गाडी भी यही कहीं होनी चाहिए. देखते है

हम लोग बहुत बारीकी से निरक्षण करने लगे. ऐसा कुछ भी नहीं था जो असामान्य हो .

"मैं उसे वहां छिपाती जहाँ वो सबकी नजरो में तो हो पर उस पर किसी का ध्यान नहीं जाए " अंजू के शब्द मेरे जेहन में गूंजने लगे.

"क्या है वो जो आम होकर भी खास है . " मैंने खुद से कहा.

मेरे ध्यान में आया की कैसे खंडहर में मुझे वो कमरे मिले थे . मैंने वैसे ही कुछ तलाशने का सोचा . एक बार फिर मैं उस कमरे में आया जहाँ कुछ भी नहीं था . अगर इस कमरे में कुछ भी नहीं था तो इसे बनाया क्यों गया . कुछ तो बात जरुर थी . सब कुछ देखने के बाद भी निराशा मुझ पर हावी होने लगी थी .

"मैं सोच रही हूँ की जब सुनैना यहाँ नहीं तो फिर उसकी समाधी यहाँ क्यों बनाई " निशा ने कहा

मैं- समाधी, निशा, समाधी. ये कोई समाधी नहीं है निशा ये एक छलावा है . जिसमे मैं फंस गया . दिखाने वाले ने जो दिखाया मैं उसे ही सच मान बैठा. दिखाने वाले ने मुझे सोना दिखाया मैं उसमे ही रह गया. जो छिपाया उसे सोने की परत ने देखने ही नहीं दिया.

निशा- क्या .

मैं- आ मेरे साथ .

एक बार फिर हम लोग समाधी के टूटे टुकडो पर थे.

मैं- मैंने इसे गलत हिस्से में खोदा. बनाने वाले या यूँ कहूँ की छिपाने वाले ने बहुत शातिर खेल रचा निशा. जो भी देखता पहले हिस्से को ही देखता , पहले हिस्से में उसे सोना मिलता, धन का लालच निशा, फिर उसे और कुछ सूझता ही नहीं . जबकि खेल यहाँ पर हैं .

मैंने समाधी के पिछले हिस्से को देखा तो ऊपर की नकली परत हटते ही कुछ सीढिया मिली.

निशा- सुरंग

मैं- हाँ सुरंग, अब देखना है की ये खुलती कहाँ है .

निशा ने कमरे में रखी चिमनी उठा ली और हम सीढियों से उतरते गए. अन्दर जाते ही निशा ने चिमनी जला की और मैंने परत वपिस लगा दी. मैं नहीं चाहता था की किसी को मालूम हो हम लोग यहाँ है . एक एक करके निशा सुरंग की मशालो को जलाती गयी और चलते हुए हम लोग ऐसी जगह पहुँच गए जहाँ की हमने तो क्या किसी ने भी कल्पना की ही नहीं होगी.
 
#113

आँखे जो देख रही थी , समझ नही आ रहा था की आँखे झूठ कह रही या दिल नहीं मान रहा था . जंगल ने जो छिपाया हुआ था कोई सोच भी नहीं सकता था. हमारी आँखे मशाल की रौशनी में उस पीली धातु को देख रही थी जिसके पीछे इन्सान पागल हो जाये. धरती ने अपनी कोख में इतना सोना छिपाया हुआ था जो इस जन्म में तो क्या कई जन्म तक गिना नहीं जा सके. हम धरती के निचे सोने की खान में थे.

"तो ये है जंगल का वो सच जो सबसे छिपाया गया है. जो भी हो रहा है इसके लिए ही हो रहा है. प्रकाश इस सच को जान गया होगा जिसकी कीमत उसने जान देकर चुकाई. अंजू इस जगह की तलाश में है " मैंने कहा

निशा- सोना रक्त से शापित है. कोई ताज्जुब नहीं इसे पाने की कोशिश करने वाले को जान देनी पड़ी.

मैं- ये सोना राय साहब का भी नहीं हो सकता , कब्ज़ा है उनका बस .

निशा- अब क्या

मैं- दूसरा मुहाना देखते है कहाँ खुलेगा.

खान में चलते चलते हम आगे बढ़ने लगे. कुछ देर बाद ऊपर जाने को वैसी ही सीढिया थी जैसी की हम समाधी से होकर आये थे. निशा ने ऊपर की परत को सरकाने की कोशिश की तो हमारे लिए एक आश्चर्य और था.

मैं क्या हुआ

निशा- ताला लगा है इस पर कुछ दे मुझे तोड़ने के लिए

तभी मुझे कुछ ध्यान आया . मैंने जेब से चाबी निकाली और निशा को देते हुए बोला- ये चाबी लगा जरा.

और किस्मत देखो. चाबी घूम गयी . और साथ में मेरी आँखे भी . तो ठाकुर जरनैल सिंह का ताला था ये . ताला खोलते ही निशा आगे उस जगह में घुस गयी. मशाल की रौशनी में देखा की वो एक बड़ा कमरा था . कमरा ही कहना उचित था उसे. खान के किसी हिस्से को काट कर बनाया गया . जिसमे दो पलंग पड़े थे. छोटा मोटा जरुरत का समान था जिस पर मिटटी ने कब्ज़ा कर लिया था. पलंग खस्ताहाल थे. साफ़ मालूम होता था की बरसों से यहाँ किसी ने दस्तक नहीं दी .

निशा ने आस-पास तलाशी लेनी शुरू की , उसे वो ही नंगी तस्वीरों वाली किताबे मिली जिनके कागज वक्त की मार के आगे पीले पड़ चुके थे. पर उसका ध्यान किताबो से जायदा उस छोटे बक्से पर था जो गहनों से भरा था .

मैंने उसके हाथ से बक्सा लिया और गौर से देखने लगा. मेरा दिल इतनी जोर से धडक रहा था की पसलियों में दर्द होने लगा. मैं बहुत कुछ समझ रहा था . ये गहने , अगर मैं सही समझा था तो ये वो गहने होने चाहिए थे जो चाचा ने मलिकपुर के सुनार से बनवाये थे. इन गहनों का यूँ लावारिस पड़े होना बहुत कुछ ब्यान करता था .

चाचा और राय साहब के बिच जिस झगडे की बात मुझे सरला ने बताई थी वो झगडा कभी भी चूत के लिए नहीं हुआ था . वो झगड़ा हुआ था इस सोने के लिए.

"कबीर इधर आ " निशा की आवाज ने मेरा ध्यान तोडा मैं उसके पास गया. दो पल में ही हम लोग ऐसी जगह खड़े थे जहाँ से मेरा कुवा थोड़ी ही देर थे. हम लोग खेतो पर थे. खेतो पर एक तरफ घने पेड़ो के पास. ये एक गुप्त रास्ता था . आज मुझे समझ आया की क्यों पिताजी ने मेरे बार बार कहने पर भी इन पेड़ो को कटवाया क्यों नहीं था .

प्रकाश , अंजू को इस गुप्त रस्ते की तलाश थी . इस गुप्त रस्ते को वो लोग कभी खोज ही नहीं पाये थे .

निशा- ठाकुर जरनैल सिंह ही वो आदमी है जो तीनो जगह से जुड़ा है. कमरे में मिले समान पुष्टि करते है इस बात की .

मैं- नहीं , चाचा कुवे और समाधी से तो जुड़ा है पर खंडहर से नहीं .

निशा- क्यों

मैं- समझ , चाचा के पास जब यहाँ इतना सोना पड़ा था तो वो सोना पानी में और उस कमरे में क्यों छिपाएगा . दूसरी बात रमा और सरला ने कभी नहीं कहा की चाचा उनको खंडहर में ले जाता था . हमेशा ये ही कहा की चाचा हमेशा उनको कुवे पर ही लाता था , और चाचा इतना तो समझदार रहा ही होगा की वो इस राज को अपने सीने में ही दबाये रखता. इतने बड़े खजाने का जिक्र करना मुश्किल होता किसी के लिए भी .

निशा- तो फिर खंडहर पर सोना कैसे पहुंचा.

मैं- चोरी मेरी जान, किसी ने यहाँ से चोरी की . सोने को खंडहर में ले गया. और खास बात ये की ये काम एक बार में नहीं किया गया. बार बार किया गया.

निशा- हो सकता है पर गौर करने वाली बात ये भी है की अय्याशी का समान इधर भी उधर भी है . ठाकुर साहब रसिया थे हो सकता है की वो ही अपने भाई की पीठ में छुरा घोंप रहे हो.

मैं- हो सकता है पर फिर चाचा की रांडो को खंडहर की जगह क्यों नहीं मालूम

निशा- सम्भावना कबीर, हो सकता है की झगडे के बाद चाचा ने अपनी राह अलग चुन ली हो . उन्होंने अपना ठिकाना खंडहर में बनाया हो पर इस से पहले की वो अपनी दोस्तों को वहां ले जा पाते बदकिस्मती से वो गायब हो गए.

मैं- मुझे लगता है की राय साहब का हाथ है चाचा के गायब होने में

निशा- हालात देखते हुए शक कर सकते है

मैं- बस चाचा की गाडी मिल जाये तो बात बन जाये

निशा- सुन एक काम कर. कल तू बैंक जा , वहां मालूम कर चाचा ने अपने खाते से कब कब लेन देन कियाहै . आदमी को पैसे की जरूरत तो पड़ेगी ही . अगर इतने दिन से वो सोना लेने नहीं आया तो इसका मतलब है की उसने पहले ही अपना जुगाड़ कर लिया होगा.

मैं- कल देखता हूँ .

निशा- किसी को भी भनक नहीं होनि चाहिए की हम जानते है इस राज को . हम यहाँ आने वाले को रंगे हाथ पकड़ेंगे. तभी कोई बात बनेगी.

मैं- सही कहा तूने .

निशा ने आसमान की तरफ देखा और बोली- मेरे जाने का समय हो गया है

मैं- मत जा

निशा- कुछ दिनों की बात है फिर तो तेरे साथ ही रहना है न .

उसके जाने के बाद मैंने कुवे पर बने कमरे का दरवाजा खोला और बिस्तर में घुस गया. सुबह होने में थोड़ी ही देर थी. पर मैं आने वाले तूफान को समझ नहीं पा रहा था .
 
#

आँख खुली तो दोपहर हो रही थी ,अलसाया बदन लिए मैं मुश्किल से उठा. हाथ मुह धोये . गाँव पहुँच कर सबसे पहले मैं मंगू से ही मिला उसे साइड में लेकर गया.

मैं- कुछ जरुरी बात करनी है तुझसे

मंगू- हाँ भाई .

मैं- तूने प्रकाश को क्यों मारा.

मेरी बात सुनकर मंगू के चेहरे का रंग उड़ गया पर मैं हरगिज नहीं चाहता था की वो नजरे चुराए.

मैं- मंगू , तू मेरा दोस्त है और मैं उम्मीद करता हूँ की तू मुझे सच बताये.

मंगू-वो राय साहब पर दबाव बना रहा था

मैं- किस चीज का दबाव

मंगू- यही की राय साहब उसे वसीयत का एक टुकड़ा दे दे और साथ में चंपा को भी उसके पास भेजे.

मैंने एक गहरी साँस ली.

मैं- क्या था उस वसीयत में

मंगू- नहीं जानता. राय साहब ने इतना ही कहा की उनका पाला हुआ सपोला उनको डसना चाहता है , उसका फन कुचल दिया जाए.

मैं- ऐसा क्या था प्रकाश के पास की वो राय साहब को ब्लेकमेल करने की जुर्रत कर पाया.

मंगू- नहीं जानता, राय साहब ने कहा उसे मार दे मैंने मार दिया .

मैं- कल को राय साहब कहेगा की कबीर को मार दे तू मुझे भी मार देगा.

मंगू- कैसी बाते कर रहे हो भाई

मैं- तूने गलत राह चुनी है मेरे दोस्त. इस राह पर तुझे कुछ नहीं मिलेगा . मेरा बाप तुझे इस्तेमाल कर रहा है जब उसका मन भरेगा तुझे लात मार देगा. बाकि तेरी मर्जी है.

मंगू- मैं कविता के कातिल की तलाश के लिए कर रहा हूँ ये सब.

मैं- काविता तुझे कभी नहीं चाहती थी , वो बस तेरा इस्तेमाल कर रही थी. इस बात को जितना जल्दी समझ लेगा तेरी जिन्दगी उतनी ही आसान होगी.

मंगू- झूठ कह रहे हो तुम

मैं- तेरी दोस्ती की कसम मैंने तुझसे कभी झूठ नहीं बोला.

मंगू के जाने के बाद मैंने सोचा की बाप चुटिया के मन में आखिर चल क्या रहा है. कैसे मालूम हो की वो क्या करना चाहता है क्या कर रहा है. थोड़ी देर बाद मैंने अंजू को देखा , उसके पास गया .

मैं- कैसी हो अब

अंजू- बेहतर तुम बताओ

मैं-तुम्हे ठीक लगे तो क्या तुम मेरे साथ सुनैना की समाधी पर चल सकती हो

अंजू- अभी

मैं- अभी

अंजू - ठीक है मेरी गाड़ी की चाबी ले आओ ऊपर से

हम दोनों जंगल की तरफ चल पड़े और ठीक उसी जगह पहुँच गए जहाँ निशा मुझे ले गयी थी .पत्थरों के टुकड़े अभी भी वैसे ही पड़े थे .

अंजू- देख लो जो देखना है

मैं- बुरा मत मानना पर मैं वो सोना देखना चाहता हूँ

अंजू ने कंधे उचकाए और समाधी के कुछ पत्थर हटा कर एक हांडी जो की बेहद पुराणी थी काली पड़ चुकी थी बाहर निकाल ली. हांडी का ढक्कन हटाते ही मैंने देखा की वो सोने से लबालब भरी थी .

अंजू ने सही कहा था मुझे.

मैं- रख दो इसे वापिस

अंजू- तुमको चाहिए क्या सोना

मैं- नहीं

अंजू- फिर क्यों देखना चाहते थे तुम इसे.

अंजू की आवाज में उतावलापन लगा मुझे.

मैं- मुझे लगा था की सुनैना ने सोना निकाला था ये एक अफवाह है .

अंजू- सच तुम्हारे सामने है .

मैं- आओ चलते है

वापसी में मुझे ध्यान आया की बैंक जाना था . अंजू को छोड़ने के बाद मैं सीधा मेनेजर के पास गया और चाचा के खाते की जानकारी मांगी. मनेजेर ने मुझे ऊपर से निचे तक देखा और बोला- कुंवर, अगर ठाकुर लोग अपना धन बैंक में रखने लगे तो उनका रसूख क्या ही रह जायेगा. बैंक ठाकुरों के दरवाजे पर जाते है ठाकुर बैंक नहीं आते. ठाकुर जरनैल सिंह का कोई खाता नहीं यहाँ.

मामला अब और उलझ गया था . मैं मलिकपुर गया उन गहनों को लेकर सुनार ने पुष्टि कर दी की वो गहने उसने ही चाची के लिए बनाये थे. रात को मैं थोड़ी देर भाभी के पास बैठा इधर उधर की बाते की . अंजू साथ थी तो खुलकर मैं कुछ कह नहीं पा रहा था . सबके सोने के बाद मैं चाची को छत पर ले गया और सीढियों का किवाड़ बंद करते ही अपने आगोश में भर लिया.

चाची- कबीर, थोड़े दिन सब्र कर ले फिर खूब बिस्तर गर्म करुँगी तेरा.

मैं- ज्यादा देर नहीं लगाऊंगा.

मैंने चाची को घुटनों के बल झुकाया और उसके लहंगे को कमर तक उंचा कर दिया. चाची के मादक नितम्बो को चूमते हुए मैंने उनको चौड़ा किया और चाची की झांटो से भरी चूत पर अपने होंठ रख दिए.

"सीईईईईई कबीर " चाची चाह कर भी अपने पैरो को कांपने से नहीं रोक पाई. जीभ का नुकीला कोना चाची की चूत के दाने पर रगड पैदा कर रहा था जिस से वो भी उत्तेजित होने लगी थी . मैं जानता था की समय कम है. मैंने लंड पर थूक लगाया और चाची की चूची मसलते हुए उसे चोदने लगा.

चाची के गाल चूमते हुए , ठंडी रात में छत पर चुदाई का अपना ही सूख था . चाची थोडा और झुक गयी मैंने अपने हाथ उसके कन्धो पर रखे और पूरी रफ्तार से चूत मारने लगा. चुदाई का दौर जब रुका तो हम दोनों पसीने से लथपथ थे.

चाची- कर ली अपनी मनचाही, अब ब्याह तक कुछ न कहना मुझसे.

मैं - दो मिनट रुक फिर जाना निचे.

चाची- अब क्या है .

मैंने वो गहनों का डिब्बा चाची के हाथ में दे दिया. और बोला- ये गहने कभी चाचा ने तेरे लिए बनवाए थे, आज गहने लाया हूँ किसी दिन चाचा को भी ले आऊंगा. बहुत दुःख झेल लिए तूने तेरे हिस्से का सुख अब ज्यादा दिन दूर नहीं है तुझसे.

चाची ने उन गहनों को देखा , फिर मुझे देखा और बिना कुछ कहे वो वहां से चली गयी. निचे आने के बाद मैं कुछ खाने के लिए रसोई में गया . मैंने देखा की कमरे के दरवाजे पर अब ताला नहीं लगा है . खाना खाने के बाद मैं भैया के पुराने कमरे में चला गया हजारो किताबो ने अपने अन्दर न जाने क्या छिपाया हुआ था .

मैंने लैंप मेज पर रखा और एक किताब ऐसे ही उठा ली. दो चार पन्ने पलटे ही थे की बेख्याली में मेरा हाथ लैंप के शीशे पर लग गया . लैंप मेज पर गिर गया और उसकी नीली लौ मेज की लकड़ी पर फ़ैल गयी. उस नीली रौशनी में मुझे मेज पर कुछ उकेरा गया दिखा. और जब मैंने उसे समझा तो एक बार फिर से मेरे पास कहने को कुछ नही था.
 
#115

सुबह मेरा सर बहुत दुःख रहा था .कल की रात बड़ी मुश्किल से बीती थी. मैंने भैया को देखा जो आँगन में ही बैठे मालिश करवा रहे थे . मैं उनके पास गया .

भैया- सही समय पर आया है छोटे, तू भी बदन खोल ले .

मैं- फिर कभी , अभी कुछ बात करनी है .

भैया - क्या

साथ ही उन्होंने मालिश वाले को जाने को कहा

मैं- चाचा का पता चल गया है जल्दी ही वो घर आयेंगे

भैया- क्या, कहाँ है चाचा

मैं- जहाँ भी है उन्होंने कहा है की वो सही समय का इंतज़ार कर रहे है घर लौटने को .

भैया- कहाँ है वो बता मुझे अभी के अभी मैं जाऊंगा उनको लेने

जीवन में पहली बार मुझे अधीरता लगी भैया के व्यवहार में .

मैं- उन्होंने कहा था की आते ही वो सबसे पहले आपसे ही मिलेंगे.

तभी मैंने राय साहब को आते देखा तो मैं उठ कर उनके पास चला गया .

मैं- प्रकाश को मरवाने की क्या जरूरत आन पड़ी थी

पिताजी- तुझे कोई मतलब नहीं इस से

मैं- मतलब है मुझे. जानने की इच्छा है की इतने रसूखदार इन्सान को प्रकाश क्यों ब्लेकमेल कर रहा था .

पिताजी- अभी इतने नहीं हुए हो की हमसे आँख मिला कर बात कर सको

मैं- इतना हो गया हूँ की आप नजरे झुका कर बात करेंगे.

पिताजी- तेरी ये जुर्रत , जानता है किसके सामने खड़ा है घर में शादी नहीं होती तो अभी के अभी तुम्हारी पीठ लाल हो चुकी होती.

मैं- किस शादी की बात करते है आप. अपनी बेटी समान लड़की को तो खुद ख़राब कर चुके हो. दो कौड़ी की रमा के साथ राते रंगीन करने वाला ये इन्सान रसूख की बात करते अच्छा नहीं लगता. वैसे भी मै चाचा से मिल कर आया हूँ जल्दी ही वो घर लौट आयेंगे.

पिताजी ने धक्का दिया मुझे और अपने कमरे में चले गये.

"वसीयत के चौथे पन्ने का राज जान गया हूँ मैं , जल्दी ही आपको बेनकाब करूँगा " मैंने पीछे से कहा पर पिताजी ने जैसे सुना ही नहीं.

सुबह ऐसी थी तो दिन कैसा होगा मैंने चाय की चुस्की लेते हुए सोचा. जेब से चाचा की तस्वीर निकाल कर मैं कुछ देर देखता रहा और फिर वापिस उसे जेब में रख लिया.

दिन भर मैं घर में ही रहा . सबको देखता रहा . घर के छोटे मोटे काम किये. भैया-पिताजी दोनों ही घर पर थे. भैया ने ज्यादातर समय आराम करते हुए ही बिताया .सब अपनी मस्ती में मस्त थे पर मुझे चैन नहीं था . एक बात और जिसकी मुझे बेहद फ़िक्र थी की निशा को लाने के बाद रखूँगा कहाँ, बेशक भाभी ने स्वीकारती दे दी थी पर राय साहब के रहते ये मुमकिन नही था .

मैं एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ से बन कुछ नहीं सकता था पर बिगड़ना सब कुछ था .जो मैं करने जा रहा था उसके क्या परिणाम होंगे ये नहीं जानता था मैं . पर इतना जरुर जानता था की चार दिन बाद पूनम की रात थी , चंपा का ब्याह था और दो दिन बाद फाग के दिन मुझे निशा को लेने जाना था .

रात के सन्नाटे में ख़ामोशी से मैं इंतज़ार कर रहा था, जरा जरा सी आहट मुझे चेता रही थी की मैं अकेला नहीं हूँ यहाँ पर जंगल भी जाग रहा है . और ये जागा हुआ जंगल अपनी हद में इन्सान के आने से खफा तो था. इंतज़ार करना मुश्किल हो रहा था पर मैंने सुना था की सब्र का फल मीठा होता है .

देर, बहुत देर में बीतने लगी थी , तनहा रात में खड़े खड़े मुझे कोफ़्त होने लगी थी .झपकी लगभग आ ही गयी थी की कुछ आवाजो से मेरे कान खड़े हो गए. शाल ओढ़े उसे अपनी तरफ आते देख कर मेरे होंठो पर अनचाहे ही एक मुस्कान आ गयी . मैं जानता था की कोई तो जरुर आयेगा पर कौन ये देखने की बात थी .

कुवे की मुंडेर पर झुक कर उसने कुछ देर देखा. और फिर मुंडेर पर उसके हाथ चलने लगे. लग रहा था की वो साया कुछ तलाश कर रहा है . धीमी सांसे लेते हुए मेरी नजर एक एक क्रियाकलाप पर जमी थी. कुवे पर कुछ तो था . तभी उस साए का हाथ कही लगा और , और फिर वो हुआ जो कोई सोच भी नहीं सकता था .

साए ने पास पड़ी कुदाल उठाई और जमीन खोदने लगा. बहुत देर तक वो खोदता रहा और फिर उसने हाथो से मिटटी हटानी शुरू की जब उसके हाथ किसी चीज से लगे तो वो शांत हो गया. कुछ देर उसकी उंगलिया कुछ टटोलती रही और जब वो सुनिश्चित हो गया तो उसने गड्ढा भरना शुरू किया.

यही समय था उस साये से रूबरू होने का.

मैं दबे पाँव उसके पीछे गया और , उसे पकड लिया. हाथ लगाते ही मैं जान गया की वो कोई औरत है. मैंने उसे कमरे की तरफ धक्का दिया और तुरंत बल्ब जला दिया. अचानक हुई रौशनी से उसकी आँखे चुंधिया गयी पर जब मेरी नजर उसके चेहरे पर पड़ी तो चुन्धियाने की बारी मेरी थी .

उस चेहरे को देखते ही मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयी . जुबान को जैसे लकवा मार गया हो. समझ नहीं आ रहा था की कहूँ तो क्या कहूँ कभी सोचा नहीं था की ऐसे हालात हम दोनों के दरमियान होंगे. वो मुझे देखती रही मैं उसे देखता रहा. वो चाहती तो भाग सकती थी पर नहीं, शायद जानती थी की अब जाएगी तो कहाँ जाएगी.

गड्ढा जो उसने खोदा था मैंने उसमे झाँक कर देखा , और जो देखा दिल धक्क से रह गया. मैं वही दिवार का सहारा लेकर बैठ गया.

"क्यों, क्यों किया तुमने ऐसा " मैंने पूछा

"और कोई चारा नहीं था मेरे पास " उसने हौले से कहा.
 
#116

गड्ढे में पड़े कंकाल के टुकड़े चीख चीख कर बता रहे थे की क्यों राय साहब और अभिमानु उसे तलाश नहीं कर पाए थे, करते भी कैसे वो तो यहाँ दफ़न था और उसे दफ़न करने वाली कोई और नहीं बल्कि उसकी अपनी पत्नी थी, वो पत्नी जिसने इतने बड़े राज को बड़े आराम से छिपाया हुआ था .मुझे शक तो उसी पल हो गया था जब उन गहनों को देख कर भी चाची की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी. मैंने तभी ये जा फेंकने का सोच लिया था और किस्मत देखो चाची फंस गयी थी .

मैं- क्यों किया ये सब , जरा भी नहीं सोची की अगर राय साहब को मालूम हुआ तो क्या करेंगे वो तुम्हारे साथ.

चाची- आदमी के पापो का घड़ा जब भर जाता है न कबीर तो वो घड़ा अपने आप नहीं फूटता , किसी न किसी को हिम्मत करनी पड़ती है उसे फोड़ने के लिए, जिसे तू अपना चाचा समझता है न वो राक्षस था और राक्षसों का अंत होना ही उचित है. मैं नहीं मारती तो अभिमानु मार देता छोटे ठाकुर को मैंने बस अभिमानु के हाथ गंदे नहीं होने दिए.

मैं- तो क्या भैया जानते है इस बात को

चाची- एक वो ही तो है जो सबके किये पर मिटटी डाले हुए है

मैं बहुत कुछ समझ रहा था चाचा की मौत को भैया ने चाची की वजह से छिपाया था अगर पिताजी को मालुम होती तो वो बक्शते नहीं चाची को .

मैं- तो वो क्या कारण था जो तुमने अपने हाथो से अपना सुहाग उजाड़ दिया.

चाची - सुहाग के नाम कर कालिख था ये आदमी. सच कहूँ तो आदमी कहलाने के लायक ही नहीं था ये नीच. हवस में डूबे इस आदमी ने रमा की बेटी का बलात्कार किया था . एक मासूम फूल को उजाड़ दिया था इसने. ये बात अभिमानु को भी मालूम हो गयी थी, अपनी शर्म में उसने जैसे तैसे इस बात को दबा दिया. रमा ने बहुत गालिया दी उसे. पर वो चुप रहा . सब सह गया ताकि परिवार की बदनामी न हो . पर तेरा चाचा सिर्फ वही तक नहीं रुका. उसने वो किया जो करते हुए उसके हाथ कांपने चाहिए थे.

चाची ने पास रखे मटके से गिलास भरा और अपना गला तर किया. कुछ देर वो खामोश रही पर वो दो लम्हों की ख़ामोशी मुझे बरसो के इंतज़ार सी लगी.

चाची- छोटे ठाकुर ने अंजू का बलात्कार किया था .

चाची के कहे शब्दों का भार इतना ज्यादा था की मैंने खुद को उस बोझ तले दबते हुए महसूस किया. .

चाची- अंजू का हमारे घर में बहुत बड़ा ओहदा है, जैसे की तू और अभिमानु ,हमारे घर की सबसे प्यारी बेटी अंजू. सुनैना को बहुत मानते थे जेठ जी. उनकी कोई बहन नहीं थी शायद इस वजह से, सुनैना की मौत के बाद अंजू को दो पिताओ का प्यार मिला. रुडा और जेठ जी. ये रमा की बेटी की मौत के कुछ दिनों बाद की बात होगी. अंजू अक्सर कुवे पर आती थी . इस जंगल में बहुत जी लगता था उसका. पर एक शाम नशे में धुत्त तेरे चाचा की आँखों पर वासना की ऐसी पट्टी चढ़ी की वो समझ नहीं पाया की जिस वो भोग रहा है वो उसके ही घर की बेटी है .

मैं और अभिमानु जब यहाँ पहुंचे तो अंजू को ऐसी हालात में देख कर घबरा गए. हमारे सीने में ऐसी आग थी की उस पल अगर दुनिया भी जल जाती न तो कोई गम नहीं होता. जब अंजू ने उसके गुनेहगार का नाम बताया तो हमें बहुत धक्का लगा. एक तरफ बेटी की आन थी दूसरी तरफ पति का पाप. मैंने अपनी बेटी को चुना. छोटे ठाकुर को तो मरना ही था , मैं नहीं मारती तो चौधरी रुडा मार देता. अभिमानु मार देता या फिर जेठ जी मार देते. मेरा दिल बहुत टुटा था, उस इन्सान की हर खता माफ़ की थी मैंने , पर अगर ये पाप माफ़ करती तो फिर कभी खुद से नजरे नहीं मिला पाती. अपनी बेटी के न्याय के लिए मैंने छोटे ठाकुर को मार दिया और यहाँ दफना दिया ताकि कोई उसे तलाश नहीं कर पाए.

"दर्द सिर्फ तेरे हिस्से में नहीं है , यहाँ बहुत है जिन्होंने दर्द पिया है , दर्द जिया है " अंजू के कहे ये शब्द मेरे कलेजे को बेध रहे थे .

तो ये था वो सच जो मेरी दहलीज में छिपा था .ये था वो राज वो भैया हर किसी से छिपाने की कोशिश कर रहे थे . अब मैंने जाना था की अंजू क्यों इतनी अजीज थी मेरे घर में . मैं समझा था की सोने के लिए ये सब काण्ड हुए है पर असली कारण ये था .

नफरत से मैंने चाचा के कनकाल पर थूका और उस गड्ढे को वापिस मिटटी से भरने लगा. जिन्दगी वैसी तो बिलकुल नहीं थी जिसे मैं सोचते आया था . समझते आया था . अगर मेरे सामने ऐसी हरकत चाचा ने की होती तो मैं भी उसे मार देता . फर्क सिर्फ इतना था की भैया और चाची उसकी मौत को छिपा गए थे मैं सरे आम चौपाल पर मारता उसे, ताकि फिर कोई कीसी की बहन-बेटी की आबरू तार-तार न कर सके.

चाची के गले लग कर बहुत रोया मैं उस रात. घर वापसी में मेरे कदम जिस बोझ के तले दबे थे वो मैं ही जानता था .मैंने देखा की भैया छज्जे के निचे सोये हुए थे, मैं उनके बिस्तर में घुसा, झप्पी डाली और आँखे बंद कर ली.

सुबह मैं उठा तो देखा की अंजू आँगन में बैठी थी . मैं उसके पास गया.

अंजू- क्या हुआ क्या चाहिए.

मैंने उस से कुछ नहीं कहा. बस उसके पांवो पर हाथ लगा कर अपने माथे पर लगा लिया. मेरे आंसू उसके पैरो पर गिरने लगे. उसने मुझे अपने पास बिठाया और बोली- क्या हुआ .

मैं कह नहीं पाया उस से की क्या हुआ. मेरा गला जकड़ गया . उसके सीने से लग कर मैं बस रोता ही रहा . वो मेरी पीठ सहलाती रही . बिना बोले ही हम लोग बहुत कुछ समझ गए थे.

मैं भाभी के पास गया और उनसे निशा के बारे में बात की . कल निशा को लेकर आना था मुझे.

भाभी- ले आ उसे देखा जायेगा जो होगा

मैं- कुछ पैसे चाहिए थे , शहर जाकर कपड़े गहने लाने है उसके लिए

भाभी- ये तेरा काम नहीं है , मैं देख लुंगी उसे. मैंने पूजारी को बता दिया है चंपा के फेरे होते ही तुरंत तुम दोनों के फेरे करवा देगा .

निशा को तो मैं ले ही आने वाला था पर मुझे उस से पहले कुछ राज और मालूम करने थे , गले में पड़े लाकेट को पकड़ कर मैंने दाई बाई घुमाया और सोचने लगा की मेज पर उकेरे शब्द और उन चुदाई की किताबो का क्या नाता हो सकता है .
 
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