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Kamvasna Story - जिम्मेदारी (कुछ नयी कुछ पुरानी)

अध्याय 74

"उसने पुनिया का नाम ले लिया हम सब पकड़े जाएंगे "

आरती रो रही थी लेकिन उसका ममेरा भाई सुरेश अब भी शांत था,वो उसके डर को समझ रहा था लेकिन फिर भी उसे अपने पर भरोषा था,

"कुछ भी नही होगा तुम ऐसे रहो जैसे तुम हमेशा से रहती थी,और रही पुनिया की बात तो वो इतनी पुरानी बात है की किसी का भी ध्यान उसपर नही जाएगा ,इन लोगो ने इतने पाप किये है की इन्हें याद भी नही होगा की कोई पुनिया नाम का व्यक्ति भी है जिसकी इन्होंने जिंदगी बिगड़ दी थी .."सुरेश का स्वर ठंडा था लेकिन इरादों में गर्मी अभी भी बाकी थी ,आरती सुरेश के कांधो पर हाथ रख देती है और उसके छाती में अपना सर रख देती है,

"तुम ही मेरे एक अपने हो भाई तुम्हारे लिए मैं सबकुछ कर सकती हु लेकिन ,,,,डर लगता है की तुम्हे ही खो ना दु ,ये दुश्मनी हमारे लिए नही है भाई हमने तो अपनी आधी जिंदगी बिता दी है अब और हमे क्या चाहिए हमे एक दूसरे का साथ तो मिल ही रहा है..

आरती अभी सफेद साड़ी में लिपटी हुई थी जो उसके बदन के हर एक करवट का बयान करता था,जवानी में ही वो बेचारी विधवा हो गई थी जिसका दर्द समझने वाला ये सुरेश ही तो था,अपनी बहन के लिए उसने खुद भी शादी नही की थी ,ना ही उसका कोई था ना ही आरती का ,आरती की शादी सुरेश की मर्जी के खिलाफ हुई थी,ऐसे भी किसी की इतनी हिम्मत नही थी की वो तिवारियो के सामने कुछ कह पाए,सुरेश तो अपनी जान भी दे देता लेकिन आरती के पिता ने उसे रोक दिया ,वो जानता था की भले ही आरती का ब्याह सबसे रसूखदार खानदान में हो रहा है लेकिन फिर भी वो लोग कैसे है खासकर आरती का पति,एक नंबर का ऐयास था ,उसकी नजर जब आरती के हुस्न पर पड़ी तो वो उसे पाने को बेताब हो गया,वो अच्छे घर की लड़की थी इसलिए उसने उससे शादी की सोची ,अब तिवारियो को कौन ना कह सकता था,पिता भी मजबूर होकर अपनी बेटी को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया .

सुरेश कुछ नही भूल पाया था वो आरती को बेपनाह प्यार करता था लेकिन ...लेकिन वक्त के हाथो मजबूर हो गया था,तभी उसे पुनिया मिला,पुनिया से उसका संबंध बहुत ही पुराना था,जब सुरेश वनः विभाग का कर्मचारी हुआ करता था तब पुनिया भी उस गांव का निवासी था,पुनिया भी ठाकुरो और जमीदारो की दुश्मनी का सताया हुआ एक व्यक्ति था ,लेकिन पुनिया गायब हो चुका था ,जो उसे कुछ ही सालो पहले उसके संपर्क में आया था,पुनिया और सुरेश दोनो का ही मकसद एक ही था ,बस पुनिया की दुश्मनी ठाकुरो से भी थी लेकिन सुरेश की सिर्फ तिवारियो से ,सुरेश अपनी बहन के हालात को देखकर सालो से जल रहा था आज उसे एक उम्मीद दिखी थी,उसने अपनी प्यारी बहन को उस दरिंदे की बीवी बनते देखा था और फिर उसके विधवा हो जाने के बाद उसे तड़फते हुए ,वो जानता था की उसकी बहन के संबंध अपने ही भतीजे से थे ,जिस्म की प्यास में जलते अपनी बहन को वो कह भी क्या सकता था ,और अब विजय ...सुरेश के लिए ये सब सहन करना हमेशा से मुश्किल रहा लेकिन आरती उससे कुछ भी नही छुपाती थी ,सुरेश भी अपनी मजबूरी का घुट पी जाता था ,

आरती उससे चिपकी हुई खुद को बहुत ही हल्का महसूस कर रही थी वही सुरेश भी अपनी बहन को गले से लगाए हुए उसके बालो को सहला रहा था वो कुछ सोच में डूबा हुआ था,

"इतना मत सोचो भाई जो होगा देखा जाएगा बस मुझसे वादा करो की तुम कभी इस लड़ाई में आगे नही आओगे ,जो भी हमारे साथ हुआ वो हो चुका है और हम दोनो ही इससे उबर चुके है ,क्या इतना काफी नही की मैं तुम्हारी बांहो में अपनी जिंदगी बिताऊँ "

सुरेश उसके माथे को चूमता है ,हा उन दोनो की मोहोब्बत सिर्फ जज़्बाती नई जिस्मानी भी थे ,सुरेश के लिए वो बहन से बहुत ज्यादा था वही आरती भी उसके लिए हमेशा खुद को खोले रखती थी लेकिन वो हमेशा तो साथ नही रह सकते थे ,

सुरेश ने उसके चहरे को ऊपर उठाया और उसके होठो में एक चुम्मन झड़ दिया दोनो के होठ मिले उसे एक दूजे के होठो में समा गए,वो काफी देर तक एक दूसरे को चूमते रहे ..आरती की आंखों में आंसू था

"मुझे बस इतना ही चाहिए ,मैं पूरी जिंदगी बस इतने में ही निकाल दूंगी "

सुरेश उसके आंखों में आये पानी को अपने होठो में समा लेता है,

"क्या क्या सपने थे हमारे,हम एक दूसरे से शादी करना चाहते थे,मैं तुम्हे अपने बच्चे की मा बनाना चाहता था लेकिन ...विजेंदर की मौत के कारण हमे अपने बच्चे को भी गिराना पड़ गया ,उसकी हवस के कारण हम एक नही हो सके आज भी हमे इस भाई बहन के चोले में रहकर एक दूसरे से मिलना पड़ता है ,हम खुलकर एक दूसरे को गले भी नही लगा सकते ,समाज मर्यादा मैं तो सब कुछ तोड़ने वाला था ना आरती लेकिन ,....लेकिन ये दर्द अब नही सहा जाता मैं तुम्हे उनके चुंगुल से आजाद करा देना चाहता हु ,हम कही दूर चले जाएंगे आरती एक दूसरे की बांहो में जिंदगी बिताने "

सुरेश ने फिर से आरती के होठो को अपने होठो से मिला लिया था,आरती के आंखों से बहता पानी उसके होठो तक आता जो सुरेश के जीभ में लगकर एक नमकीन सा अहसास उसे दे रहा था,उसके गुलाबी होठ थोड़े खुले हुए थे वो उसके ऊपरी होठो को चूस रहा था ,जो किसी गुलाब की पंखुड़ियों की तरह नाजुक थे ,उम्र के इस पड़ाव में भी आरती के अंदर वही नाज़ुकता का आभास सुरेश को होता था जो उसके नवयौवन में होता था,सुरेश के हाथ आरती के कमर से होते हुए उसके पुष्ट नितम्भो पर चले गए ,जो मुलायम तो थे लेकिन अभी भी अपनी आकृति नही खोये थे,वो वैसे ही गोल थे जैसे उसकी पहली छुवन में हुआ करते थे,वो आरती को अपनी ओर खिंचता है,

"भाई मुझे अपनाने के लिए तुम्हे किसी समाज की स्वीकृति की जरूरत नही है ,मैं तुम्हारी थी और तुम्हारी ही रहूंगी ,हा ये जिस्म की गर्मी मुझे अपने जिस्म को औरों को सौपने पर मजबूर कर देता है लेकिन यकीन मानो की मैं तुम्हारे अलावा आज तक किसी को भी अपने दिल से नही लगाई हु,मेरे लिए तो तुम ही हो मेरे भाई,और ये कोई भाई बहन का चोला नही ये तो हमारा प्यार है जिसे हमने भाई बहन के रिस्ते का नाम दे दिया है ,प्यार तो हमारा तब भी था जब हम एक दूसरे के साथ बचपन में खेला करते थे,तब भी था जब तुमने पहली बार मुझसे कहा था की मैं बहुत ही सुंदर हु और मैं शर्मा गई थी,तब भी था जब तुम्हारे हाथो ने पहली बार मेरे शरीर को एक मर्द के जैसे छुवा था ,तब भी था भाई जब तुम्हरे होठ पहली बार मेरे होठो से मिले थे,"आरती रोने लगती है लेकिन बोलती जाती है ,

"तब। भी तो था ना भाई जब तुमने पहली बार मेरे यौवन को पाना चाहा था और मुझसे वादा किया था की मैं तुम्हारी ही रहूंगी जिंदगी भर के लिए ,तब भी था जब तुमने पिता जी के सामने मुझे अपनी बीवी बनाने की बात की थी और उन्होंने तुम्हारे हाथ पैर तोड़ दिए थे ,तब भी था जब तुमने मुझे अपना बनाया था ,यही तो कमरा है ना भाई जंहा तुमने मेरा कौमार्य तोड़ा था और मेरे मांग में अपने नाम का सिंदूर डाला था,तब भी था भाई जब मेरे जिस्म को पहली बार मेरे समाज के सामने के पति ने भोगा था,तब भी था जब ये जिस्म राकेश और विजय के नीचे था ,तूने मुझे जब अपना बना लिया था भाई मैं तो तब ही से तेरी हु ,हमारे रिस्ते का नाम चाहे जो हो लेकिन मेरा ये जिस्म और मेरा मन सदा से तुम्हारे लिए ही था है और रहेगा "

आरती का पूरा चहरा आंसुओ से भीग चुका था,वही हाल सुरेश का भी था ,वो उसे अपनी ओर जोरो से खीचकर उसे अपने सीने से लगा लेता है ,

"मैं हर उस आदमी को बर्बाद कर दूंगा जिसके कारण तुम मुझसे अलग हुई ,,जैसे मैंने तुम्हारे पिता को दुनिया से रुखसत किए जैसे मैंने तुम्हारे पति को गोली मारी ,हमारे बीच कोई भी आये मैं उसे नही छोडूंगा ...आरती तुम मेरी हो तुम्हारे जिस्म को भोगने वालो को भी इसका हिसाब देना होगा,राकेश और विजय को भी तुम्हरे जिस्म से खेलने का पूरा हिसाब देना होगा आरती "वो जोरो से उसके होठो को अपने होठो में मिला कर चूसने लगता है,आरती भी अपने भाई के प्यार के उफान अब रोकना नही चाहती थी..दोनो ही बिस्तर में गिरते है और एक दूसरे में डूब जाते है....
 
अध्याय 75

"ह्म्म्म पुनिया नाम कुछ सुना सुना सा लगता है"

किसी अनजान आवाज ने अजय के कान खड़े कर दिए थे,वो जल्दी से कमरे में घुसा जंहा डॉ,बाली,और वो शख्स पहले से मौजूद थे ,

"ओह अजय आओ आओ इनसे मिलो ये विकास है हमारे बहुत पुराने दोस्त है ,आजकल ये आईएएस बन गए है,मैंने तुम्हे बताया था ना "डॉ के कहने पर अजय बड़ी इज्जत से विकास से हाथ मिलता है ,और पास ही बैठ जाता है,डॉ ने उसे विकास के बारे में बता चुका था,

"सर आप कह रहे थे कुछ पुनिया के बारे में "

अजय विकास का ध्यान फिर से पुनिया के तरफ ले गया

"ओह हा ,जिसने तुम्हारे ऊपर हमला करवाया था ना,तुम्हे ही बताया था की उसका नाम पुनिया है ,ये नाम मैंने कही सुना तो है बस याद नही आ रहा है की कहा ,"

"याद करो यार इस आदमी को पकड़ लिया तो समझो सब कुछ पकड़ में आ जाएगा ,"डॉ ने जोर डाला और विकास याद करने की कोशिस करने लगा लेकिन फिर भी उसे कुछ याद नही आ रहा था

"कोई पुरानी दुश्मनी लगती है यार तुम्हारे परिवार से पहले तुम्हारे पिताजी और फिर ये सब ..डॉ क्यो ना जूही को इस केस में लगा दे ,अब वो dsp बन गई है"

जूही डॉ और विकास की बहुत पुराने पहचान की थी और विकास की पत्नी काजल की सहेली भी थी,जूही अपने काबिलियत की वजह से पूरे पोलिस डिपार्टमेन्ट में मशहूर थी,बड़े बड़े केस उसने हैंडल किये थे ,और इसके ही वजह से उसे इतने प्रमोशन मिले की आरक्षक से वो dsp बन चुकी थी,

"इस काम के लिए सही रहेगी ??" डॉ ने थोड़ी चिंता जताई

"क्यो नही ,वैसे भी आजकल वो खाली बोर ही हो रही है "

"सर जिसे लगाना है आप लगा दीजिये लेकिन उस पुनिया और उस तांत्रिक का पता लगना बहुत ही जरूरी हो गया है,"

"हम्म तुम अपने चुनाव में ध्यान दो अजय बाकी का काम हम सम्हाल लेंगे "डॉ ने अजय को सांत्वना देते हुए कहा,

"डॉ कैसे ध्यान दु मैं ,मेरे लिए मेरे परिवार से ज्यादा जरूरी और क्या है और चुनाव घर में बैठकर तो जीता नही जाएगा ,उसके लिए सभी को बाहर निकलना ही पड़ेगा "

"तुम फिक्र मत करो घर को किला बना देंगे ,हमारे बॉडीगार्ड सादे कपड़े में हमेशा तुमलोगो के साथ रहेंगे,"

बाली ने दृढ़ता से कहा

"फिक्र मत करो मैं एक अच्छी सुरक्षा एजेंसी को जानता हु ,वो तुम्हे वैसे ही सुरक्षा देंगे कवर जैसे किसी बड़े नेता या VIP की होती है,किसी को पता भी नही चलेगा की तुम सुरक्षा घेरे में हो और तुम निश्चिंत भी रहोगे ,साथ ही अगर किसी ने तुम्हारे ऊपर हमले की कोसिस की तो और भी अच्छा होगा क्योकि वो पकड़ा जाएगा "विकास के सुझाव से अजय को थोड़ी राहत मिली ...

उन लोगो की बैठक खत्म हो जाती है ,वही खिड़की के बाहर से दो कान उनकी बाते सुन रहे थे ,वो झट से वहां से निकल जाता है और पुनिया को काल लगा कर सभी बाते बताता है ,

"ह्म्म्म विकास जी ,और जूही कोई बात नही दोनो मेरे पुराने परिचित है मैं उन्हें देख लूंगा,विकास को तो याद ही नही आएगा की मैं कौन हु ,और रही जूही की बात तो उसे तो मैं ऐसे घुमाउंगा की वो साये का पीछा ही करती रह जाएगी "

इधर

अजय अपने कमरे में बैठा हुआ कुछ सोच रहा था की सोनल की आहट से उसका ध्यान सोनल की तरफ गया ,

"भइया आप पागल हो गए हो "

अजय सोनल के चहरे का उड़ा हुआ होशं देखकर घबरा गया था

"क्या हुआ "

"क्या हुआ ,आप पूछ रहे हो क्या हुआ ? आई कांट विलिभ इट ,अपने खुसबू से क्या कहा ?"वो अब भी गुस्से में थी

"वही जो सच है "

"सच है ,अपने सोचा भी की उसके ऊपर क्या गुजरेगी "

"तू जानती है की सच क्या है ,तेरे और विजय के बीच भी तो ."

"आपको लगता है की हमारे बीच जो भी हुआ उसे समाज कभी भी स्वीकार करेगा ?"सोनल की आंखों में आंसू आ गए थे

"लेकिन मैं उस लड़की से कैसे झूट बोल सकता था जिसे मैं प्यार करता हु "

"भैया बात सिर्फ प्यार की नही है समझने की है ,अच्छा क्या खुसबू आपको कहती की उसने नितिन से सेक्स किया है और रोज करती हो तो आपको कैसा लगता "

अजय एक गहरी सोच में पड़ गया

"तेरा मतलब है की मेरे और निधि के बीच जो हुआ ,तेरे और विजय के बीच जो हुआ वो सब गलत था "

"नही मैं नही मानती की वो गलत था लेकिन समाज के लिए तो गलत ही ना ,सेक्स का रिश्ता भाई बहन के बीच नही होता भइया क्योकि समाज के लिए सेक्स गलत है ,और सेक्स हवस की निशानी होती है ना की प्यार की "

सोनल को अब लग रहा था की ये रिश्ता जो अनजाने में ही भाई और बहनों के बीच बन गया वो बहुत ही दुखदेने वाला हो रहा है.

"आप को क्या जरूरत थी बताने की ,जो हो गया वो हो गया ना ,"सोनल फुट फुट कर रोने लगी थी .

अजय उसके कंधे में हाथ रखता है और उसे प्यार से सहलाता है ,

"मैं खुसबू से कोई झूट नही बोल सकता ,चाहे वो कोई भी क्यो ना हो ,वो मेरे लिए मेरी जान है ,चाहे वो मेरे बारे में कुछ भी समझे मुझे उसकी कोई भी फिक्र नही है ,और रही बात मेरे और निधि के रिस्ते की वो उसने ना कोई हवस थी ना है और ना ही होगी ,वो मेरी प्यारी बहन है जिसके सामने मैं कुछ नही छिपता अब हो गया सेक्स हमारे बीच तो क्या कर सकता हु ,लेकिन हम दोनो में से किसी का भी ये मकसद तो कभी था ही नही ,ना ही भविष्य में ये करने का कोई मकसद है ."

सोनल गुस्से से अजय को देखती है ,लेकिन अजय थोड़े आश्चर्य में था क्योकि ये गुस्सा झूठा गुस्सा था एक शिकायत लेकिन होठो में आने से रोकी गई मुस्कान ,उसकी आंखे सोनल के चहरे के भाव को देखकर बड़ी हो जाती है ,

वही सोनल अपने जेब से मोबाइल निकाल कर उसे कान में लगा लेती है,यानी वो अभी किसी के साथ लाइन में थी ,अजय को बात समझ आ जाती है ,

"मैंने कहा था की मेरे भइया तेरे लिए और अपनी बहनों के लिए दोनो के लिए पागल है ,इन्हें सही गलत से कोई भी वास्ता नही है इन्हें बस प्यार ही दिखाई देता है और प्यार ही समझ आता है "

वो अजय की ओर मोबाइल बड़ा देती है अजय भी समझ चुका था की लाइन में खुसबू ही थी ,

"हैल्लो "

उधर से बस रोने की आवाज आ रही थी .

"हलो इतना क्यो रो रही हो "

"तो और क्या करू "ये वाक्य बड़ी मुश्किल से बोला गया था और आवाज अजय के पीछे से आ रही थी ,वो मुड़ा देखा तो खुसबू आंखों में आंसुओ की बाढ़ लिए खड़ी हुई थी,यानी वो कमरे के बाहर ही खड़ी थी और मोबाइल से बाते सुन रही थी,

"तो दोनो प्रेमी जोड़े बात करो मुझे इजाजत दो "सोनल अपना मोबाइल अजय के हाथो से लेकर कमरे से निकल जाती है ,खुसबू अब अजय के पास ही खड़ी थी ,आंखों से आंसू अब भी बंद नही हो रहे थे,

"ह्म्म्म तो ."अजय उसे देखता हुआ बोला

खुसबू ने ना में सर हिलाया

"क्या "

"कुछ नही ,आप को ."

वो फिर से चुप थी

"आपको क्या "

"आपको क्या समाज के वसूलों की कोई परवाह नही है"

वो थोड़ी डरती हुई बोल गई

"किसने बनाया है उसे "

खुसबू नजारे उठाकर अजय को देखती है लेकिन कुछ नही बोलती

"समाज ने उसे अपनी सहूलियत के लिए बनाया है ,तो हम उसे अपनी सहूलियत के हिसाब से बदल भी तो सकते है "

अजय की बात तो बिल्कुल स्पष्ट थी लेकिन लॉजिकल नही थी

'लेकिन .."खुसबू कुछ बोलने को हुई ही थी की अजय ने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपनी ओर खिंच लिया जिससे खुसबू घबरा गई और अजय के चहरे को आश्चर्य से देखने लगी

"देखो ,एक लड़की और एक लड़के के बदन का शादी से पहले इस तरह संपर्क में आना भी तो गलत है ना लेकिन फिर भी हम ऐसे खड़े है ,तो क्या हम गलत है.....हा समाज के नजरो में तो है ,लेकिन क्या हम अपनी नजर में गलत है ,...नही क्योकि हम एक दूसरे से प्यार करते है और अगर प्यार नही भी करते तो भी ये गलत नही था क्योकि हमे इसकी जरूरत होती,और जब एक लड़की और एक लड़का दोनो ही अपनी मर्जी से सेक्स करे या शारीरिक संपर्क में आये तो वो गलत नही हो सकता ."

"लेकिन निधि आपकी बहन है."खुसबू की आवाज बहुत ही धीरे थी..

"लेकिन प्यार तो मैं उससे भी करता हु और जो हुआ वो प्यार में हुआ ना ही जानबूझकर "

"प्यार में कोई ऐसा करता है क्या वो भी इतने बार "

खुसबू अब भी सुबकने लगी

"जब तुम्हे ये सब गलत लगता है तो फिर क्यो आ गई तुम मेरे पास "

"क्योकि मैंने आपको अपना पति मान लिया है ,और अब आप जैसे भी रहो आप ही मेरे पति हो "

"अच्छा"अजय के चहरे में एक मुस्कान आ गई

"लेकिन हम भी तो भाई बहन है"

"हमारी बात और है हम तो शादी करने वाले है"

अजय उसे और भी कस लेता है,अब उसका हाथ खुसबू के नितम्भो में था ,उसे एक शरारत सूझती है और वो उसके पिछवाड़े को जो की टाइट सलवार में उभरकर निकल रहे थे जोरो से दबाता है ,

"आउच ."खुसबू की रोनी सूरत और भी रोनी हो जाती है जिसे देखकर अजय को और मजा आता है

"कोई प्यार व्यार है आपको हवस के पुजारी हो आप "वो शिकायत भरे लहजे में कहती है लेकिन अजय फिर से उसे अपनी ओर जोरो से खीचकर उसके नितम्भो को मसलता है जिससे खुसबू उसके बांहो में मचलने लगती है,अजय के मजबूत शरीर के आगे वो एक गुड़िया ही थी,

"मेरी जान प्यार हो या हवस अजय कोई भी काम अधूरे में नही करता ,जो करता है पूरे दिल से करता है "अजय के फिल्मी स्टाइल के डायलॉग ने खुसबू के होठो में मुस्कुराहट ला दी लेकिन फिर भी वो उसे छुपाए रखी और जैसे ही पहला मौका मिला वो अजय से दूर हो गई

"भाग जाओ ,और अपना प्यार और हवस अपनी लाडली बहन पर ही दिखाओ "अजय कुछ कह या कर पता इससे पहले ही वो हंसते हुए वँहा से भाग गई ,अजय अब भी सोच में था की ये क्या हुआ ,खुसबू ने उसे माफ किया की नही ...उसकी हँसी से इतना तो पता चल गया था....
 
अध्याय 76

चुनावी रण अपने चरम पर पहुच गया था,सभी पार्टियां जी जान लगा रही थी लेकिन अजय इसमें बिल्कुल भी इंटरेस्ट नही दिखा रहा था,उसे तो अपने परिवार पर हमला करने वाले ही ही खोज थी ,चुनाव का पूरा दारोमदार खुसबू , सोनल और नितिन ने सम्हाल लिया था,चुनाव में मार्केटिंग वाले फंडे लगाए जा रहे थे ,चुनाव की रणनीति बनाने वाले एक्सपर्ट बुलाये गए थे,अजय और निधि पर हुआ हमला इस क्षेत्र के राजा पर हुए हमले के रूप में प्रचारित किया जा रहा था,3-4 सीटो पर जीत के आसार तो पहले भी थे लेकिन अब केशरगढ़ के पूरे क्षेत्र जो पहले रियासत का हिस्सा हुआ करती थी और आसपास के क्षेत्रों में भी अजय की पार्टी का दबदबा कायम होने लगा था,15 विधानसभा सीटे तो निश्चित तौर पर इनके पलड़े में गिरने वाली थी,और वही ये पूरी ताकत झोंक रहे थे,कुछ और जगहों पर भी आसार अच्छे थे लेकिन उन्हें भी पता था की 15 सीटो के साथ वो किंग मेकर बन जाएंगे ,उनके बिना सरकार बनाना सम्भव ही नही हो पायेगा,क्योकि कोई पार्टी को क्लियर बहुतमत के आसार नही थे,लेकिन अभी से कुछ कहना कोई भी ठिक नही समझ रहा था,तैयारी और प्रचार जोरो में था,निधि और अजय पूरी तरह से आराम कर रहे थे,युवाओं को जोड़ने ,मार्केटिंग और रणनीति बनाने की जिम्मेदारी खुसबू नितिन और सोनल के जिम्मे थी वही अगर कोई बाहुबली वाला काम हो तो,रैली निकालनी हो ,हल्ला मचाना हो तो विजय और किशन आगे आते,और धनुष छात्रों का नेतृत्व कर रहा था,उसकी शाख और सोच कमाल की थी ,कुल मिलाकर वो बेहतरिन टीम थे जो की कम से कम अपने क्षेत्र में अजेय हो गई थी,बाकी पुरानी पार्टियो ने भी उनके सीटो पर मेहनत कम कर दी थी और अपनी अपनी सीटे पक्की करने में लगे थे,इन दो परिवारों के सामने इनके ही इलाके में ऐसे भी कोई कहा टिकने वाला था.

इधर

एक गाँव की टापरी में एक 6 फुट से भी लम्बा भगवा रंग पहने बाल बढ़े और दाढ़ी में चहरा पूरी तरह से ढका हुआ एक साधु घूम रहा था ,वो एक चाय की टपरी में रुका

"जय जय शिव संभु "

उसकी दमदार आवाज ही उसके व्यक्तित्व को बयान करने को काफी थी ,चाय वाले और वँहा बैठे हुए कुछ लोग उसे बड़ी ही आस्था से देखने लगे ,चहरे का तेज ही इतना कमाल का था साथ ही साथ ही उसके व्यक्तित्व और आवाज ने सब के ऊपर एक गहरा असर छोड़ ही दिया,

चाय वाला हाथ जोड़े खड़ा हो गया,

"क्या चाहिए बाबा "

बाबा के चहरे में एक मुस्कान खिल गई

"कुछ नही बेटा एक चाय ही पिला दे "

उसकी आवाज गहरी और शालीनता से भरी हुई थी ,

"आइये आइये बैठिए "

एक आदमी अपने कुर्सी से उठता है

"आप कहा से है बाबा आपको पहले कभी देखा नही "

"अभी अभी हम इस ओर आये है ,हम भारत भ्रमण में है ,हमारे गुरु जो हिमालय के योगी है उन्होंने हमे आदेश दिया की बेटा जाओ और देश में घूम घूम कर लोगो में भगवान की आस्था जगाओ "

"बाबा आप तो बहुत ही कम उम्र के दिखाई देते है ,क्या उम्र है आपकी "एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति जो थोड़ा पढ़ा लिखा लग रहा था उसने प्रश्न दागा,

"सुना नही है क्या ..जाती ना पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान "बाबाजी खिलखिला कर हँसने लगे उनकी निश्छल हँसी से सभी अभिभूत हो गए .

"बाबा जी चाय "

उन्होंने ने चाय का प्याला उठाया पीने लगे

"बाबाजी आप कहा कहा गए "एक नवयुवक बोल उठा

"सब अभी पूछ लोगे क्या ,इस गांव में कुछ दिन रुकूँगा ,तालाब के पास के मंदिर में कोई पुजारी रहता है क्या "

"जी बाबाजी पुजारी जी तो गांव में रहते है लेकिन मुखिया जी अगर मान जाय तो आप वँहा रह सकते है"

"तो चलो मुखिया का घर दिखा दो "

चाय पीकर बाबाजी मुखिया के घर की ओर चल पड़े

चुनाव के रिजल्ट आये और अजय की पार्टी राज्य की तीसरी बड़ी पार्टी बन कर उभरी,सबसे ज्यादा सीटे बंसल की पार्टी को मिला था,100 विधानसभा सीटो के राज्य में 42 बंसल को और 30 उसके विरोधी पार्टी को मिले थे,बहुमत किसी का भी नही था ,अजय की पार्टी 25 सीट के साथ तीसरी बड़ी पार्टी थी और 3 निर्दलीय विधायक चुने गए थे,स्वाभाविक था की अजय जिसका भी साथ देता वही सरकार बनाता,दोनो पार्टीयो ने मुख्यमंत्री के अलावा कोई भी पद देने की पेशकश की थी,अजय के परिवार का बंसल से सम्बन्ध बहुत ही पुराना था ,इसलिए अजय और पार्टी ने बंसल के नाम पर मुहर लगा दी,धनुष को उपमुख्यमंत्री के साथ गृह दिया गया,वही निधि को भी जो की पूरे चुनाव से दूर थी संस्कृति और खेल विभाग दिया गया,वो सबसे कम उम्र की मंत्री बनी,ठाकुर और तिवारी परिवार का कोई और सदस्य ना ही मंत्रिमंडल में था ना ही चुमाव लड़ा था,लेकिन उनकी पार्टी के जीते हुए सदस्यों को अलग अलग मंत्रालय दिया गया था,..अजय के लिए ये बस एक बोझ कम होने की तरह ही था,क्योकि उसे राजनीति से ज्यादा फिक्र उस शख्स की थी जो उनके ही बीच रहकर उनके लिए खतरा पैदा कर रहा था,और भाई बहन ने मंत्री बनने से उसे एक पवार सी मिल गई थी,पैसा और पवार तो उसके पास पहले भी बहुत था लेकिन अब सत्ता की पवार भी थी
 
अध्याय 77

अजय की गाड़ी एक घने जंगल में बनी पगडंडी पर चल रही थी,वो अकेला ही था और हांफ रहा था,गाड़ी में बैठे हुए भी ऐसा लग रहा था जैसे की वो कई किलोमीटर दौड़कर आया हो,पास ही एक धमाका होता है और अजय के गाड़ी के एक पहिये में जाकर गोली लगती है ,गाड़ी थोड़ी लड़खड़ाती है लेकिन रुकती नही ,वो अपने ही स्पीड में चली जा रही थी,टायर के चिथड़े उड़ गए लेकिन अजय ने गाड़ी नही रोकी आखिरकार एक छोटे मिसाइल सा बम आकर उसकी गाड़ी से टकराया जब तक अजय कुछ समझता उससे पहले ही बड़ा धमाका हो चुका था,..............

इधर

फोन पर पुनिया सभी कुछ सुन रहा था और साथ ही उसके चहरे का रंग भी बदलने लगा

"एक अकेला आदमी और तुम सब फिर भी वो तुम्हारे अड्डे को तबाह करके चला गया,"

"क्या मतलब की मर गया होगा लाश मिली की नही "

"नही मिली पागल हो गए हो जब तुम कह रहे हो की उसे बम से उड़ा दिया तो लाश तो मिलनी ही चाहिए थी."

"और ढूंढो ,,,वो कोई आम आदमी नही है ,इस स्टेट का राजा है और अब दो मंत्रियों का भाई ..जगह जगह पोलिस और आर्मी तुम लोगो की तलाश में निकल पड़ी होगी जाओ और ढूंढो उसे "

पुनिया ने फोन पटका,अगर अजय जिंदा होगा तो उसका क्या हाल करेगा ये सोच कर ही उसकी रूह कांप जा रही थी ,.और अगर वो मर गया तो उसके परिवार वाले एक एक को चुन चुन कर मरेंगे ..

"ओफ़ अब क्या करू"पुनिया के मुह से अनायास ही निकला

इधर

ठाकुरो की हवेली में मातम परसा हुआ था,अखबारों की मुख्य खबर अजय की मौत ही थी,निधि पागलो जैसे घुमसुम सी बैठी थी वही बाकी लोगो का भी हाल बुरा ही था,जैसे रोते रोते आंसू सुख चुके हो ,मातम और सांत्वना का दौर कई दिनों तक जारी रहा लेकिन फिर भी अभी तक कोई भी पूरी तरह से सही नही हो पाया था,गार्डन में बाली और डॉ बैठे हुए बात कर रहे थे

"अब सोचता हु की सोनल और विजय की भी शादी कर ही दु ,घर के थोड़ी रौनक तो वापस आएगी ,बच्चों के चहरे अब देखे नही जाते "

बोलते बोलते बाली की आंखे नम हो गई थी

"हूऊऊ लेकिन क्या तुम्हे पता है की उन्हें कोई पसंद है की नही "

डॉ की बात से बाली ने चहरा ऊपर किया और आश्चर्य से डॉ को देखने लगा ,डॉ एक गहरी सांस लेकर कहने लगा

"सोनल नितिन को पसंद करती है वही अजय खुसबू को पसन्द करता था,जो हाल इस घर का है वही हाल अभी उस घर का भी है,अगर तिवारी मान जाए तो मेरी मानो और सोनल और नितिन की शादी कर दो ,दोनो परिवारों में खुसी थोड़ी तो लौटेगी और शायद इस रिस्ते के लिए सोनल भी ना ना कहे .."

बाली गहरे सोच में पड़ जाता है

"देखो जंहा तक मैं समझता हु इस स्थिति में यही उचित होगा ,...सोनल को मनाना ही पड़ेगा ,मुझे डर तो निधि का है अजय के जाने के बाद वो तो मुर्दो की तरह से हो गई है ...अगर ऐसा ही चला तो ..उसे कही बाहर ले जाओ ,सुना है पास के ही गांव में एक बाबा जी ठहरे हुए है कुछ दिनों से उनके पास चलते है ."

"हम्म्म्म कुछ तो करना ही पड़ेगा वरना सभी फूल यू ही मुरझा जाएंगे "

बाली अपने मन ही मन कहता है..

सोनल और नितिन पूरे परिवार के सामने खड़े थे,

"लेकिन बाली ये दोनो तो भाई बहन है,"महेंद्र ने जोर देकर कहा

"जब इन्हें प्यार हुआ तो इन्हें भी कहा पता था की ये दोनो भाई बहन है "बाली ने अपनी बात रखी

सभी घर के सबसे बुजुर्ग रामचन्द्र तिवारी जो की सोनल के नाना और नितिन के दादा थे की ओर देखने लगे,

"बेटा प्यार ना जात देखता है ना ही धर्म ना ही रिस्ते ये तो बस हो जाता है,इनकी बात मान लो घर में थोड़ी खुसी तो आएगी"रामचंद्र ने नम आंखों से कहा,

वही खड़ी खुसबू जो की सुबक रही थी अपने दादा के नजदीक जाकर उनसे लिपट गई और अपने पिता की ओर देखते हुए बोली

"मैं भी अजय से प्यार करती थी पापा ,लेकिन अब वो नही रहे ,दादा जी सही कहते है अजय जी ने भी मुझे समझाया था लेकिन प्यार कुछ भी तो नही देखता ,इन दोनो की शादी अजय का भी सपना था."

सभी की स्वीकृति तो मिल गई लेकिन सोनल शादी को तैयार नही हो पा रही थी ,डॉ की सलाह पर सभी पास के गाँव वाले बाबा जी के पास जाने को राजी हो गए ,बाबाजी जो की हिमालय से आये थे और देश का भ्रमण कर रहे थे,वो अभी पास ही के गांव में थे,वो इस इलाके में कुछ दिनों से घूम रहे थे कभी गायब हो जाते तो कभी फिर से आ जाते,लोगो में इनकी ख्याति फैल रही थी ,सभी परिवार उनके पास पहुचा जो की गांव के सरपंच के घर रुके हुए थे,लेकिन निधि वँहा जाने को राजी ही नही थी ,जब वो वापस आये तो सोनल शादी को राजी हो चुकी थी ,विजय अपनी बहन को भी दुख से उबरना चाहता था इसलिए जबरदस्ती निधि को बाबा जी के पास ले गया,उस समय बाबा जी अपने कमरे में बैठे हुए ध्यान में मग्न थे,उनकी लंबी चौड़ी काया देखकर वो किसी पहलवान से लगते थे,घनी दाढ़ी में उनका चहरा छिपा हुआ था लेकिन चहरे का तेज सभी तक पहुचता था,निधि और विजय के आने के बाद ही उन्होंने अपनी आंखे खोली निधि और उनकी आंखे मिली जैसे एक झटका निधि को लगा,वो वही पर बैठ गई और बाबाजी के चहरे को ध्यान से देखने लगी उसके ऐसे देखने पर बाबा मुस्कुराए और सभी को जाने का आदेश दिया,वँहा अभी बस निधि विजय और बाबा जी ही थे,

"ऐसे क्या देख रही हो ."

"आपकी आंखे किसी को याद दिलाती है"निधि का स्वर रुंधा हुआ था जबकि बाबा जी के चहरे में मुस्कान यथावत थी

"किसकी "

"मेरे भइया की ,"

"अच्छा "बाबाजी के चहरे की मुस्कान और भी चौड़ी हो गई निधि ने विजय को देखा तो वो भी मुस्कुरा रहा था निधि को समझते देर नही लगी वो उठी और भागी,बाबा से लिपट गई,वो अभी भी पद्मासन लगाए बैठे थे वो गिर गए थे और निधि उनके ऊपर थी ,निधि ने उनके गालो पर दो तमाचे जोर जोर के जड़ दिए ,निधि की आंखों से सैलाब बाहर आ रहा था वो कुछ भी बोलने और करने की स्तिथि में नही थी,बाबा ने उसके मुह को चूमा लेकिन वो हट गई

"अरे ऐसे गुस्सा क्यो हो रही हो ."

चटाक ,फिर से एक झापड़ अजय के गालो में था

"अरे बाबा माफ करो "

चटाक

"अब "

चटाक

अजय हार गया और निधि को अपनी बांहो में जकड़ लिया और निधि के गालो में प्यार भरी पप्पी ले ली,

इधर विजय भी ये सब देखकर इमोशनल हो गया था,बहुत देर तक वो ऐसे ही लेटे रहे निधि उठी और जाने लगी

"अरे रुको तो क्या हुआ "

चटाक ,निधि ने रोते हुए अजय को चुप रहने का इशारा किया ,और उसकी दाढ़ी को खिंचा

"आउच दर्द होता है रुको "लेकिन निधि कहा मानने वाली थी उसने इतने जोर से अजय की दाढ़ी को खिंचा की अजय के त्वचा से खून आने लगी और निधि के हाथो में उसकी दाढ़ी थी ,निधि उसके पास ही बैठी और उसके गालो को सहलाया अजय के होठो में एक मुस्कान और 'चटाक चटाक चटाक '

निधि रोटी रही और तब तक अजय को मरती रही जब तक की वो थक ही नही गई और फिर रोते हुए ही फिर से अजय के सीने से लिपट गई ,

"ये सब क्या है भइया आप ने मेरी जान ही निकाल दी थी,आप खुद को समझते क्या है कुछ भी करोगे और कभी सोचा है की हमारा क्या होगा ,कभी मेरे बारे में या खुसबू के बारे में सोचा अपने वो बेचारी पत्थर जैसी हो गई है ,लेकिन इसकी आपको क्या परवाह होगी ."अजय बस निधि के बालो को सहलाता रहा उसके पास बोलने को था भी कुछ नही उसे पता था की उसकी प्यारी बहन किस दुख से गुजरी है,उसकी आंखों में भी आंसू थे लेकिन कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी तो पड़ता है ,

अब अजय ने फिर से अपनी दाढ़ी लगा ली थी और निधि उसके सामने ही बैठी थी,वो हल्के हल्के मुस्कुराते हुए उसे देख रही थी,

"अब बताओगे की ये सब क्या है."

"ह्म्म्म असल में जिसने हमे किडनैप किया ,जिसने हमारे माता पिता की जान ली उस पुनिया का सुराग इकठ्ठा करने के लिए मैं इस रूप में यहां रह रहा हु,अभी तक ये बात बस डॉ को पता थी ,असल में ये उनका ही प्लान था,डॉ के दोस्त विकास जो की अब IAS बन चुके है,वो पहले पास के ही कस्बे में कुछ दिन फारेस्ट अधिकारी के रूप में काम करते थे,उस समय वो पुनिया और जग्गू से मिले थे,तब तक उनके साथ सबकुछ ठिक ही चल रहा था ,फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ की वो दोनो ही गायब हो गए,मुझे इतनी जानकारी विकास जी ने दी ,हमने पता लगाने की बहुत कोशिस की पर कोई भी सुराख नही मिल पा रहा था फिर मैं उस कस्बे में गया और वहां कुछ दिन बाबा बन कर रहा,बातो ही बातो में मैंने पता लगाया की आखिर क्या हुआ था,जो भी उनके साथ हुआ वो सचमे दुखदाई था,पुनिया और जग्गू बहुत ही अच्छे दोस्त थे,और खुशहाली से रहते थे,वो आम गांव के इंसानों की तरह ही थे,लेकिन आफत तब आयी जब वीरेंद्र तिवारी यानी हमारे मामा जी जो की अब नही रहे और बजरंगी चाचा,कलवा चाचा के भाई की नजर इनकी बीवियों पर पड़ी ,वो लोग ऐसे भी बहुत ही ऐयास किस्म के लोग थे,उन्होंने हर हाल में उनकी बीवियों को पाना चाहा नतीजा ये हुआ की वो उन्हें घर से उठा के ले गए और जग्गू और पुनिया कुछ भी नही कर पाए ,दोनो ने जब इसकी शिकायत बाली चाचा से की तो वो भी उन्हें समझा कर भेज दिए,बीवियां तो वापस आ गई लेकिन उसके बाद वो कभी भी उनकी नही रह गई,उनका उपयोग बजरंगी,विजेंद्र और यहां तक की बाली चाचा ने भी रंडियों की तरह करना शुरू कर दिया,ना ही पुनिया कुछ कर पाया ना ही जग्गू,आखिर पुनिया टूट ही गया और उसने जमकर विरोध किया जिसकी सजा सभी को मिली,दोनो के घर को जला दिया गया जग्गू के पैर काट दिये,पुनिया को एक बात पता चल गई थी की उसकी बीवी के साथ उन्होंने जबर्दति नही की थी बल्कि उसने ही अपने मर्जी से अपना जिस्म सौपा था वो पुनिया से खुस नही थी,उसने बदला लिया ,जब आग घर में फैली थी तो उसने अपनी पत्नी को मार दिया और अपने एक बेटे के साथ गायब हो गया,वही जग्गू भी कुछ दिनों के बाद वँहा से कही चला गया,सालो के बाद दोनो फिर से मिले अब पुनिया कोई साधारण आदमी नही रह गया है,वो नक्सलयो का सरदार है,और उनके जरिये ही हमारे ऊपर हमले करवाता आ रहा है,मैं पुनिया और जग्गू दोनो तक पहुचने में कामियाब रहा,लेकिन मैं उनको जड़ से खत्म करना चाहता था,क्योकि ना जाने इस साजिस में कौन कौन शामिल है,ये तो जाहिर है की हमारे परिवार वालो ने बहुतों के साथ ज्यादती की है अब ये मेरी जिम्मेदारी है की मैं इसे ठिक करू,ना सिर्फ पुनिया और जग्गू बल्कि ऐसे और भी कई परिवार हो सकते है,इनकी मदद कौन कर है मुझे ये पता लगाना था ,मुझे इनपर कोई भी गुस्सा नही रह गया है क्योकि इन्होंने अपने हक की लड़ाई लड़ी लेकिन एक स्टेज में जाकर हिंसा गलत हो जाती है,जिन्हें उन्हें सजा देनी थी वो दे चुके है,उन्होंने वीरेंद्र मामा को मारा,लेकिन हमारे माता पिता तो बेकसूर थे,अब वो दोनो ही हमारे पूरे परिवार के दुश्मन है..उनकी नफरत हमारे परिवार की सभी लड़कियों के ऊपर है ,जो हमारे परिवार के मर्दो ने उनकी बीबियों के साथ किया था अब वो हमारी औरतों के साथ करना चाहते है,इसलिए मुझे सभी का पता लगाना था,कोई हमारे परिवार के अंदर रहकर भी उनकी मदद कर रहा है,और वो अजय बनकर नही हो सकता था ,तो मैंने और डॉ ने ये खेल खेला,मैं अजय के रूप में उनके एक अड्डे में गया ,हमने सब कुछ प्लान किया हुआ था की जैसे ही वो बम्ब फोड़े मुझे खुद जाना है ,डॉ के आदमी वँहा मुझे बचने के लिए मौजूद थे और मैंने कपड़े भी ऐसे पहने थे की मुझे ज्यादा चोट नही आयी,मैं सुबह गायब हुआ और शाम को फिर से बाबा बन कर दूसरे गांव में चला गया,बाबा बनकर इनके बीच ही रहकर सब कुछ पता लगाना बहुत आसान है,..."

अजय की बातो को निधि बड़े ही ध्यान से सुन रही थी,

"आप क्या भूल गए की मैं एक मंत्री हु ,आप बस बोलो की ये पुनिया है कौन मैं स्टेट की पूरी पोलिस लगा दूंगी "निधि के आंखों में गुस्सा था,

"नही निधि अब और गलती नही कर सकते,हा मैं जानता हु की पुनिया और जग्गू कौन है और कहा है लेकिन इनको पकड़ना कर मार देने से कुछ नही हो जाएगा,हमे जड़ तक इन्हें साफ करना होगा"

निधि मन मसोज के रह गई

"और किन्हें पता है की आप जिंदा हो ,क्या खुसबू जानती है."

"नही खुसबू को कुछ दिन और ना ही पता चले तो बेहतर है,पहले बस डॉ को ही पता था ,कल सोनल और विजय को भी पता चल गया,और आज तुम्हे,बस लेकिन देखो मेरी याद में रोना मत छोड़ना नही तो सभी को शक हो जाएगा "निधि जाकर अजय से लिपट गई ......
 
अध्याय 78

विजय घर की छत पर खड़ा हुआ अपने गांव का नजारा देखता हुआ,सिगरेट पी रहा था,रात के 11 बज चुके थे घर में एक सन्नाटा छा चुका था,अजय के जाने के बाद से ही ये माहौल था,उसे अब पता था की अजय कही नही गया है लेकिन फिर भी वो ,सोनल और निधि अपने को थोड़ा दुखी ही दिखाते थे,..

वो बड़े दिनों से ही परेशान चल रहा था आज वो बड़े दिनों के बाद शांति से सिगरेट के कस लगा रहा था,उसे किसी के आने की आवाज सुनाई दे,पायलों से ये तो समझ आ चुका था की कोई लड़की ही होगी,

"कहा कहा ढूंढ रही हु तुझे और तू यंहा पर है,ला इधर दे "सोनल को देखकर विजय ने अपना सिगरेट फिर से निकाल लिया जो की वो थोड़ा छुपा लिया था था,सोनल ने उसके हाथो से सिगरेट छीनकर कस लगाने लगी ,और दीवाल के पास खड़ी होकर देखने गांव की तरफ देखने लगी,विजय ने उसे पीछे से जकड़ लिया ,और अपना सर उसके कन्धे पर रख दिया ,

"आज बहुत दिनों के बाद चैन आया "विजय उसे जोरो से अपने शरीर से चिपकाते हुए बोला ,

"हम्म मुझे भी ,तुम्हारे लिए तो जैसे मैं गायब ही हो गई थी ,इतने दूर रहते थे तुम मुझसे "

सोनल ने भी अपने भाई के बालो में हाथ फेरा,

"क्या करू यार पहले चुनाव फिर भाई की ये खबर ,...कुछ समझ ही नही आता था की क्या करू,अब सुकून है बस भाई इसे जल्दी से खत्म करे फिर हम पहले की तरह जिंदगी जी पाएंगे,बना किसी की फिक्र के एक दूसरे की बांहो में ."विजय बड़े ही प्यार से सोनल के गालो में हल्की सी पप्पी लेता है,

"हम्म लेकिन क्या तुम भूल गए की मेरी भी शादी हो रही है ,फिर मैं यंहा थोड़ी ना रहूंगी "सोनल की आवाज थोड़ी गंभीर थी,जिसे सुनकर अचानक ही विजय को याद आया की जिस बहन के साथ उसने बचपन बिताया था ,जिसके साथ जवानी के रंग देखे थे वो जाने वाली है,ये सोच कर ही विजय की आंखे भर आई ,वो अपने होठो को सोनल के कंधे पर रख कर सोच में डूब गया था,उसके आंखों से एक बून्द टपककर सोनल के कंधों में गिरा जिसका गिला अहसास सोनल को उसके मनोदशा के बारे में सचेत कर रहा था,वो पलटी और विजय की आंखों में देखने की कोशिस करने लगी वही विजय उससे आंखे बचा रहा था,

"इधर देख "सोनल ने विजय के चहरे को उठाया और उसकी आंखों में देखा ,

"ओह मेरा शैतान सा बहादुर भाई आज रो रहा है,"सोनल के चहरे में हल्की मुस्कुराहट थी जो अपने भाई के प्यार को देखकर आयी थी,

"मैं कहा रो रहा हु ,वो बस आंखों में थोड़ा कचरा चला गया "विजय का स्वर भरा हुआ था लेकिन उसने बहुत कोशिस की कि वो ठिक से बोल पाए ,

"अच्छा"सोनल की मुस्कान थोड़ी और बढ़ गई और वो उसके सीने से लागकर उसके आंखों से बहते हुए पानी को अपने होठो में समा लिया ,वो विजय के गालो को प्यार से सहलाने लगी ,विजय का हाथ भी अब उसकी कमर को थाम चुका था,वो और नजदीक आयी ,अब उसका चहरा विजय के चहरे के पास ही था,वो हल्की सी फूक विजय के आंखों में मारी ,जिससे विजय के चहरे में भी एक मुस्कान आ गई ,

"शैतान कही की "विजय ने हल्के से कहा,

"अब ये शैतानियां अपने पति को दिखाना वही सम्हालेगा तुझे "विजय थोड़ी हँसने की कोसिस करने लगा लेकिन उसका गला अब भी भरा हुआ था,

"भाई रो ले ,मैं जानती हु तुझे रोना आ रहा है"

"मुझे क्यो रोना आएगा "विजय लगभग रोते हुए बोला ,जिससे सोनल थोड़ी हँस पड़ी वो जानती थी की विजय उसे कितना प्यार करता है और उसके जाने की बात सुनकर वो कितना भावुक हो गया है,

"अच्छा तो जब मैं शादी कर के चली जाऊंगी तो मुझे याद करेगा ना "सोनल ने उसके गालो को सहलाते हुए कहा,

"चुप कर अब "विजय का बांध टूट पड़ा वो सोनल को कस कर जकड़े हुए रोने लगा,सोनल के चहरे में एक मुस्कुराहट थी लेकिन उसकी आंखे गीली थी ,वो विजय के बालो को सहलाये जा रही थी ,और विजय इस लंबे चौड़े खतरनाक आदमी को देखकर कोई कैसे कह सकता था की वो अपनी बहन की बांहो में किसी बच्चों की तरह रो रहा होगा,

"मेरा प्यारा भाई चुप हो जा "

सोनल उसे बच्चों जैसे ही पुचकारने लगी ..

"अच्छा पहले रुलाती है फिर चुप करा रही है,कामिनी तू तो पति के साथ जाकर खुस हो जाएगी और कभी सोचा है की तेरा भाई तेरे बिना कितना अकेला हो जाएगा "वो सोनल को और भी कस लिया ,सोनल को इससे थोड़ा दर्द होने लगा लेकिन इस प्यार के सामने उस दर्द की क्या औकात थी,उसने भी अपने बांहो की पकड़ को और मजबूत किया और जंहा उसके होठ पहुचे वही को चूमने लगी ,विजय थोड़ा हटा और सोनल के चहरे को पकड़कर उसे चूमने लगा,उसके गीले होठो के कारण सोनल का पूरा चहरा लार से गीला हो रहा था लेकिन उसने विजय को नही रोका ,उसके चहरे में मुस्कान थी जो अपने भाई की इस बेताबी की वजह से थी...

जब वो अलग हुए तो विजय थोड़ा गंभीर हो गया,

"क्या हुआ फिर के मुह लटका लिया तूने "

सोनल ने बड़े ही प्यार से विजय के बालो में हाथ फेरा,

"अब तू नितिन की अमानत है,तुझे खुलकर प्यार नही कर सकता "

सोनल विजय की बात का मतलब समझ गई थी ,वो हल्के से हँसी ,

"अच्छा खुलकर या खोलकर ? साले सब समझ रही हु तू क्या बोल रहा है,और किसने कहा की मैं किसी की अमानत हो गई हु,मैं नितिन से प्यार करती हु और उससे मेरी शादी होने वाली है इसका मतलाब क्या है,की मैं तुझसे दूर हो जाऊंगी,"

विजय सोनल के चहरे को देख रहा था जो की इस अंधेरे में भी खिला हुआ मालूम हो रहा था,

"लेकिन .."

"क्या लेकिन "सोनल ने उसका हाथ पकड़ कर अपने कमर में ठिका दिया,और धीरे से बोली

"जब तक मैं हु तब तक मेरे भाइयो का मुझपर पूरा हक है,.अगर मैं इस दुनिया में ना रही तो बात और है"

विजय ने उसके होठो में उंगली रख दी

"पागल हो गई है क्या ये क्या बोल रही है,"

"अगर जैसा निधि के साथ हुआ अगर मेरे साथ हो जाता तो ,...और अगर भैया की जगह कोई और होता तो "सोनल की आंखों में एक अनजाना सा डर दिख रहा था,

"अब वो नही बच पायेगा ,भैया को पता है की वो कौन है इसका मतलाब ये है की उसपर 24 घंटे नजर रखी जा रही होगी,अब हमे चिंता की कोई आवश्यकता नही है"

"फिर भी "

सोनल ने हल्के मूड में कहा ,

"मैं उसकी माँ चोद देता "विजय गुस्से में बोला

वही सोनल जोरो से हँसी ,

"तुझे चोदने के अलावा आता ही क्या है साले "

सोनल की हँसी और उसके बात करने के बिंदास अन्दाज ने विजय के चहरे को खिला दिया था,वो अपनी सोनल को ऐसे ही देखना चाहता था ,उसने सोनल के कमर को जोरो से भिचा ,सोनल के मुख से एक आह निकल गई,

वो आकर सीधे विजय के सीने से जा लगी ,विजय उसकी आंखों में देखने लगा और उसके हाथ उसके पीठ पर चलने लगे,सोनल ने अपना सर विजय के कंधे में रख दिया ,

विजय एक गहरी सांस लेकर आसमान की ओर देखता है,इस प्यार भरे मौसम में उसकी जान उसके बांहो में थी इससे ज्यादा उसे क्या चाहिए था ,वो भावनाओ से भर गया था और उसने सोनल के चहरे को उठाकर उसके होठो में अपने होठो को टिका कर उसके होठो के रस को चूसने लगा,जिस्म का मिलान में जब हवस गायब हो जाय तो वो प्यार बन जाता है कुछ ऐसा ही इनके साथ हो रहा था,

दोनो के ही आंखों में प्यार के मोती थे और होठो में एक दूजे के होठ,वो एक दूजे के बालो में अपनी उंगलिया घुमा रहे थे और उनकी सांसे एक दूजे की सांसो से टकरा रही थी ,दोनो के नथुने से आती गर्म हवा दोनो के चहरे में पड़ती हुई मुलायम अहसास दे रही थी ,जब दोनो ही अलग हुए तो दोनो के चहरे में मुस्कान और आंखों में आंसू थे,

वो फिर से होठो के मिलान में व्यस्त हो चुके थे,विजय का हाथ अब सोनल के भरे हुए नितम्भो तक को सहला रहा था ,जिससे विजय के लिंग में असर होने लगा,जब वो अकड़ कर सोनल के योनि के द्वार पर टकराने लगा तो अचानक ही विजय ने सोनल को झटके से अलग किया ,सोनल अब भी मुस्कुरा रही थी,

"अब क्या हुआ तुझे "

"अब नही हो पायेगा यार ,पता नही साला ये क्यो ऐसे तन जाता है बार बार "विजय को अपने ही लिंग पर आज गुस्सा आ रहा था,लेकिन उसकी इस बात से सोनल जोरो से हँसने लगी,

"तुझे कितने दिन हो गए सेक्स किये हुए "

उसकी बात से विजय थोडा चौका,लगता था की जमाना बीत चुका है,

"याद नही यार,बहुत दिन हो गए "

"अरे पगले ,जो आदमी एक भी दिन लड़की के बिना नही रहता था वो इतने दिनों से खाली है तो उसका लिंग तो अकडेगा ही ना ,और तेरी सभी छमिया लोग कहा मर गई आजकल "

"सभी को छोड़ दिया पता नही मन ही नही होता कुछ करने का"

सोनल अपने भाई के चहरे पर प्यार से हाथ घुमाने लगी ,

"तू जब ऐसा बोलता है तो मुझे तेरी चिंता हो जाती है,बोल नही करू क्या शादी.तेरे साथ रहूंगी जिंदगी भर "

सोनल की बात से विजय को उसके ऊपर बहुत प्यार आता है और वो उसके चहरे को पकड़ कर एक जोर की पप्पी उसके गालो में दे देता है,

"पगली कही की ,अब वो बात नही रह गई तेरे भाई में शायद मैं अब बड़ा हो गया हु "

"बड़ा या बुड्डा "सोनल फिर से खिलखिलाई

"क्या पता मेरी जान ,चल आज मेरे साथ सो ,अगर मन किया और कुछ हो गया तो बताना की बड़ा हुआ हु या बुड्डा "विजय ने शरारती अंदाज में कहा

"अरे मेरी जान तू कभी बुड्डा हो सकता है क्या,बस अब तू वो बच्चा नही रहा जिसे सिर्फ सेक्स चाहिए था ,नही तो अभी तक मुझे बचाता क्या ,बड़ा समझदार हो गया है मेरा भाई,लेकिन मुझे वो नासमझ वाला ही पसंद है "दोनो ही हँस पड़े और विजय के कमरे में चले गए
 
अध्याय 79

रात की रंगीनियां थी और हल्की सी सर्दी,बिस्तर में विजय लेटा हुआ बस सोनल को निहार रहा था,आंखों में अपने बहन का वो मचलता रूप था जिसे देखकर शायद मर्दो की जांघो के बीच कुछ कुछ होने लगे, लेकिन विजय के लिए उसकी बहन बस हवस मिटाने का कोई जरिया नही थी,वो उसकी परी थी,वो उसे प्यार भरी निगाहों से निहार रहा था ,उसकी आंखों में सोनल की उज्वल छटा थी,उसका वो रोशन चहरा ,चांद सा चमकदार लेकिन बिना किसी दाग के,वो मुस्कुराती हुई विजय के पास आई ,अभी अभी वो नहा कर निकली थी,सिर्फ अपने भाई के लिए ,.......सिर्फ अपने प्यारे भाई के लिए उसने वो महंगी सुगंध अपने शरीर में लगाई थी,सिर्फ अपने भाई के लिए उसने वो झीना सा कपड़ा पहना था जिसमे उसके जिस्म का हर भराव नजर आता,सिर्फ अपने भाई के लिए वो अपने शादी से पहले उसके साथ सोने को राजी थी जबकि वो जानती थी की कुछ भी हो सकता है,वो जानती थी की अगर विजय आगे बढेगा तो वो रोक नही पाएगी,वो क्या चाहती थी..?शायद कुछ भी नही ,...विजय क्या चाहता था..???

शायद कुछ भी नही .

बस दोनो को ही एक दूजे का साथ चाहिए था,एक दूजे का अहसास जो जिस्म से होकर मन की गहराइयों में चली जाती थी,एक एक छुवन जो ऊपरी त्वचा के गहरे पहुचता था...

उसकी मुस्कुराहट ही तो थी जो विजय के दिल का सुकून थी ,उस मर्द कहलाने वाले विजय के आंखों में ना जाने कब आंसू की बूंदे छलकने लगी थी,सोनल के लिए ना जाने आज उसे ऐसा क्या प्यार आ रहा था,वो बार बार उसके जुदा होने के अहसास से भर जाता था,..

सोनल भी जानती थी की उसका भाई उसे कितना प्यार करता है,वो उसके लिए कुछ भी कर सकता था,कुछ ही दिनों में किसी और की हो जाने का अहसास जंहा सोनल के दिल में एक झुरझुरी सी पैदा करता था वही अपने भाई से जुदाई की बात सोच कर भी वो सहम उठती थी,लेकिन वो अपने को सम्हाल लेती ,क्योकि उसे विजय को सम्हालना था,वो मचलती हुई विजय के पास आयी और बिस्तर में पसरते हुए विजय की गोद में जा गिरी.

विजय के सामने अब उसका चहरा था,रात में भी सोनल अपने होठो में लाली लगाना नही भूली थी ,वो भी उसके भाई के लिए ही तो था,विजय उसके बालो में हाथ डालकर उसे अपनी ओर खिंचा लेकिन सोनल के उपर उठाने से विजय का नीचे होना ज्यादा सहूलियत भरा था,सोनल थोड़ी आकाश में उठी तो विजय भी थोड़ा नीचे झुका,दोनो के ही होठ मिले,रुकने का ठहराने का कोई भी इरादा किसी का भी नही था,होठो को होठो में ही मिलाए हुए दोनो ही बिस्तर में लेट चुके थे,विजय सोनल के बाजू में आकर लेटा था,होठ मिले हुए ही थे और सांसे भी मिलने लगी थी,आंखों में आंसू की थोड़ी थोड़ी धारा समय समय पर बह जाती थी.

"सोनल आई लव यू "

विजय ने उसके होठो को छोड़ते हुए कहा,

"ये कोई बोलने की बात है क्या भाई "सोनल हल्के से मुस्कुरा दी ,दोनो फिर से प्यार के सागर में गोते खाने लगे थे,विजय का शरीर अब सोनल और अपने कपड़ो की दूरी बर्दस्त नही कर पा रहा था ,धीरे धीरे ही सही लेकिन एक एक कपड़े जिस्म से उतरते जा रहे थे,कुछ ही देर में दोनो के बदन के बीच कोई भी दीवार नही बची थी,विजय के लिंग ने सोनल की योनि को छूना शुरू कर दिया था,अपने भाई की बेताबी को सोनल बखूबी समझती थी,लेकिन कुछ करना भी तो पाप होता,वो दोनो कुछ भी नही करना चाहते थे,वो बस होने देना चाहते थे,किसी ने इतनी जहमत नही की कि लिंग को उसकी मंजिल तक पहुचाये,सोनल की योनि में उगे हुए हल्के हल्के बाल जब जब विजय के लिंग से टकरा कर रगड़ खाते दोनो का मुह खुल जाता था,योनि ने अपना रस छोड़ना शुरू कर दिया था,वही विजय का मुह सोनल के भरे है स्तनों का मसाज अपने होठो से कर रहा था,निप्पलों में जैसे कोई रस भरा हुआ वो विजय उसे चूसें जा रहा है,सोनल के हाथ विजय के सर को सहला रहे थे ,वो कभी विजय के ऊपर आती तो कभी नीचे इसी गहमा गहमी में दोनो के शरीर की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी,जंहा विजय अपने कमर को हिलाने लगा था वही सोनल भी अपने कमर को उचकाए जा रही थी लेकिन लिंग था की अंदर जाने का नाम ही नही लेता,वो बस सोनल के योनि के से रगड़ खाये जा रहा था,विजय का कमर थोड़ा ऊपर हुआ ,सीधे तने लिंग ने योनि की गहराइयों के ऊपर की दीवार पर थोड़ी जगह बनाई,इस बार योनि इतनी गीली थी की लिंग को भिगोने लगी विजय किसी माहिर खिलाड़ी की तरह बेलेंस बनाये हुए कमर को नीचे करता गया,सोनल ने भी अपने शरीर को सीधा ही रखा था ताकि लिंग की दिशा भटक ना जाए,थोड़ा अंदर जाने पर ही सोनल ने विजय को मजबूती से पकड़ लिया उसके दोनो हाथ विजय के नितम्भो पर टिककर उसे जोर दे रहे थे,और विजय बड़े ही एकाग्रता से अपने लिंग को बिना छुवे ही सोनल की योनि में प्रवेस करा रहा था,गीलेपन के कारण विजय का लिंग जल्दी ही सोनल की गहराइयों में समा गया ,

"आह भाई "सोनल के मुझ से मादकता भरी सिसकी निकली ,

"ओह ओह आह आह भाई ओह"उसके हाथ अब विजय के सर में तो कभी उसकी कमर में घूम रहे थे विजय ने अपने होठो को सोनल के होठो में डाल दिया और उसकी कमर एक निश्चित लय में सोनल के जांघो के बीच चलने लगी,दोनो ही अपने होश में नही रहे थे,सिसकिया और आनन्द के अतिरेक से निकलने वाली किलकारियों से कमरा गूंजने लगा था ...

कमरे के बाहर खड़ी दो काने इन आवाजो को सुन रही थी और अपने प्यार की याद में गुम थी उसकी आंखों में आंसू था,वो निधि थी,..सोनल और विजय की आवाजो ने उसके मन में एक बेचैनी सी जगा दी थी ,वो भी अपने भइया से वैसा ही प्यार करना चाहती थी जैसा सोनल कर रही थी लेकिन ,,,,,,,,,,,

लेकिन वक्त ने दोनो को बहुत दूर कर दिया था...
 
अध्याय 80

सोनल की शादी का दिन था,कड़ी सुरक्षा के बीच शादी होनी थी,कोई भी मेहमान बिना चेकिंग के अंदर नही आ रहा था,पास के गांव वाले बाबा (जी की अजय ही था) को विशेष निमंत्रण दिया गया था,

शादी अपने सबाब में चल रही थी वही अजय,डॉ,जूही और विकास अपने ही कामो में व्यस्त थे....अजय ने आज ही का दिन मुकर्रर किया था सभी घर वालो के सामने उसका पर्दाफाश करने के लिए ,बस वो एक गलती करता और वो उसे पकड़ लेते उन्हें मालूम चल गया था की आज पुनिया क्या करने वाला है ,जग्गू उनके कब्जे में था,उसने ही बताया था की पुनिया आज खुसबू को किडनैप करने वाला है...

शादी अपने सबाब में पहुच गई थी,बाबा बना हुआ अजय खुसबू के पास ही बैठा था,वो उसकी सुंदरता को घूर रहा था जो की दुख में मिलकर कम हो गई थी.

आखिर वो उठी और अंदर चले गई ,अजय उसका पीछा नही कर सकता था,जूही उसके पीछे हो ली और हुआ वही जिसतरह किशन की शादी में निधि को किडनैप करने की कोशिस की गई थी वैसे ही अब खुसबू को किडनैप करने की कोशिस की गई,एक महिला ने उसके मुह में एक रुमाल रखने की कोशिस की लेकिन ...

जूही झपट कर उस महिला को दबोच लिया ,और उसके मुह में ही रुमाल रख दिया वो महिला धीरे धीरे शांत हो गई,वो लोग अभी लेडिस टॉयलेट में थे,खुसबू हैरान थी जूही ने उसे शांत रहने को कहा और विकास और डॉ को खबर दे दी,दोनो ही वँहा पहुचे ,जूही ने खुसबू से नाटक करने को कहा और वो बेहोशी का नाटक करने लगी,जूही महिला की साड़ी को पहन कर उसे घसीटते हुए बाहर ले गई तभी एक आदमी वँहा पहुच गया ,

"लाओ मा जी मैं इसे ले जाता हु,"

जूही का चहरा नही दिखने की वजह से उसने जूही को ही वो महिला समझ लिया था,डॉ और विकास ने उसके सर पर बंदूक रख दिया ,

"अब तुम्हारा खेल खत्म "और बंदूक की चोट से उसे बेहोश कर दिया.

इधर शादी खत्म हो चुकी थी,रात काफी हो चुकी थी और सोनल की बिदाई का वक्त आ चुका था,थोड़े देर बाद ही सोनल की बिदाई थी ,की डॉ ने घर के सभी सदस्यों को एक जगह इकट्ठा होने का आग्रह किया साथ ही पुलिस के जवानों की भी भीड़ वँहा लग गई थी,सभी लोग आश्चर्य से देख रहे थे की आखिर माजरा क्या है..

"जिसके लिए अजय ने अपने जीवन के कीमती पलो का बलिदान किया ,जो हमारे परिवार का सबसे बड़ा दुश्मन था वो आज पकड़ा जा चुका है,और हम उसे आप लोगो के सामने ला रहे है,"डॉ माइक में बोल रहा था सभी लो एक हाल में बैठे हुए सभी आश्चर्य से भर गए थे,डॉ ने बाबा की ओर इशारा किया ,सभी बाबा को देखने लगे वो स्टेज में आया और अपनी दाढ़ी और बाकी का मेकअप निकाल दिया ,निधि और सोनल खुद खुद कर तालिया बजा रहे थे वही बाकियों की हालत खराब हो गई थी,खुसबू रोये जा रही थी वही हाल बाकियों का भी था,सभी अजय को देखकर ना सिर्फ हैरत में पड़ गए थे बल्कि बहुत ही भावुक भी हो चुके थे लेकिन अजय बस मुस्कुराता रहा ,

"मैं पहले तो आप सभी से माफी चाहूंगा की मैंने आप लोगो को इतना दुख दिया,चाचा जी ,खुसबू "बाली की आंखे अपने भतीजे को जिंदा देखकर रुकने का नाम ही नही ले रही थी,वही खुसबू बैठ गई थी वो खड़े होने की हिम्मत भी नही कर पा रही थी,

"ये रुप और मारने का नाटक मुझे करना पड़ा क्योकि मैं जानता था की कोई एक नही बल्कि कई लोग है जो हमारे परिवार के दुश्मन है..मैं सभी को ढूंढना चाहता था और ढूंढ लिया ये एक बड़ी पुरानी जिम्मेदारी मेरे पूर्वजो ने मेरे ऊपर छोड़ी थी की मैं एक राजा का धर्म निभाऊ और अपने लोगो की अपने परिवार की ,और समाज के लोगो की रक्षा करू,आज वो जिम्मेदारी भी पूरी हुई....

इस मिशन में मैं जितना अंदर गया मुझे पता चला की ये लोग और कोई नही हमारे ही सताए हुए लोग है,इनसे मेरी पूरी सहानभूति है इसलिए मैं इन्हें कोई भी कठोर दंड नही देना चाहता मैं चाहता हु की ये लोग खुसी से रहे,और कानून इन्हें जो सजा देनी है वही दे,लेकिन मैं इन्हें माफ कर देना चाहता हु....

मुझे इस खेल के मास्टर माइंड का तो पता था लेकिन ये नही की हमारे घर में इनका साथ कौन कौन दे रहा है,इसलिए मैंने आज का भी इंतजार करने की सोची ,आज इन्होंने खुसबू को किडनैप करने का प्लान बनाया था और यही उन्होंने गलती कर दी और पकड़े गए ,,,,,

तो ये वो लोग है जिन्होंने हमारे घर में रहकर हमशे गद्दारी की .."

पोलिस के आदमी एक महिला और एक पुरुष को वँहा लाते है जिन्हें देखकर घर के सभी सदस्यों की आंखे फटी की फटी रह गई,ये रेणुका की मा,और रेणुका का पति बनवारी था...

"नही अजय भइया आपसे कोई गलतफहमी हुई है मेरी माँ और ये ऐसा नही कर सकते ,"रेणुका रो पड़ी वो आगे बड़ी लेकिन विजय ने उसके कांधे पर अपना हाथ रखकर उसे सांत्वना दी ,

"मुझे माफ कर दे मेरी बहन लेकिन ये सच है ,और इन्होंने कुछ भी गलत नही किया ,तुम्हारी मा ने जो भी किया उसके पीछे हमारे परिवार की गलती थी,तुम जो एक नॉकर की बेटी की तरह अपनी जिंदगी गुजर रही हो तुम असल में ठाकुरो का खून हो,तुम मेरी बहन हो बाली चाचा का खून ,इनके गलती की वजह से तुम्हे ऐसी जिंदगी बितानी पड़ी...माफी तो हमे तुमसे मांगनी चाहिए बहन माफी तो हमे चाची से मांगनी चाहिए ."

पर कमरा चुप हो गया था,बाली को समझ ही नही आ रहा था की वो कैसे अपने चहरे को छिपाए ,वो वँहा से जाने लगा,"रुकिए चाचा जी ..अभी नही इस खेल का असली मास्टर माइंड तो अभी हमने पेश ही नही किया है ...लाओ उसे "

कमरे में पुनिया को लाया जाता है सभी फिर से चौक जाते है लेकिन इस बार उतने नही

"किशोरीलाल "बाली के मुह से निकल जाता है,ये किशोरीलाल था बनवारी का पिता और रेणुका का ससुर.

वो खा जाने वाली निगहो से बाली और तिवारियो को देखने लगा ,किसी को भी उसपर अभी तक कोई भी शक नही हुआ था,पास ही खड़ा सुरेश भी खुद सहम रहा था कही उसका राज भी ना खुल जाए लेकिन उसके बारे में किसी ने कुछ भी नही कहा ,...

"आखिर इसने ऐसा क्यो किया "दूल्हा बने हुए नितिन ने प्रश्न किया ,अजय सभी बाते बताता गया,महेंद्र तिवारी और बाली का सर झुक गया था,साथ ही पूरा तिवारी और ठाकुर परिवार अपने बड़ो के किये पर शर्मिदा था,बाली और महेंद्र आकर पुनिया उर्फ किशोरीलाल के कदम में गिर गये ,

"मुझे माफ कर दो पुनिये मुझे माफ कर दो ,बनवारी मुझे माफ कर दो बेटा,जवानी के जोश में हमसे बहुत से पाप हो गए ,अब इसका पछतावा करने से कोई भी लाभ नही लेकिन ,,,मैं जानता हु की हमारे पाप माफी के काबिल नही है लेकिन फिर भी मुझे मांफ कर दो .."

बाली और महेंद्र के आंखों में सच में प्रायश्चित के आंसू थे,बिना कुछ बोले ही पुनिये ने अजय की ओर देखा ,

"अगर मैं पूरे तिवारियो और ठाकुरो को भी मार देता तो भी शायद मेरी आत्मा को वो सकून नही मिलता जो की आज मिला है,मैं इनको इससे ज्यादा क्या इनके किये की सजा दूंगा की इन्होंने पूरी दुनिया के सामने ही मुझसे माफी मांग ली,अपने सभी सगे संबंधियों के सामने ..मैं तो बदले की आग में ये भी भूल गया था की जिन्हें मैं सजा देना चाहता था उन सभी की तो कोई गलती ही नही है,मैं तो मासूम से बच्चों को सजा देना चाहता था...तुम जीते अजय क्योकि तुम सच के साथ थे ,मेरा बदला सही होकर भी मैं हार गया क्योकि मैंने गलत तरीके अपनाए ...भगवान तुम्हे खुस रखे तुम्हारे परिवार को खुस रखे मेरा बदला तो पूरा हुआ और तुम्हे जो सजा देनी है तुम दे सकते हो."

पुनिया की बातो से सभी के आंखों में आंसू आ गए थे,

"मैं कौन होता हु सजा देने वाला,अपने जो भोगा है उसके सामने और क्या सजा दी जा सकती है,मैं आपको कानून के हवाले कर रहा हु,वो जो भी फैसला करे वो मंजूर है,और आज से रेणुका इस घर की बेटी बनकर इस घर में रहेगी और बनवारी इस घर का दामाद,...पुनिये और रेणुका की माँ ने आंखों ही आंखों में अजय का आभार व्यक्त किया,पोलिस केवल पुनिया को ही ले गई ,रेणुका की माँ और बनवारी को ले जाने से अजय ने ही रोक दिया ...वो उनसे मांफी मांग कर अपने ही घर में रहने का निवेदन करने लगा लेकिन दोनो ही अब वँहा रहना सही नही समझ कर वँहा से निकल गए,साथ ही रेणुका भी चली गई...अजय ने आगे उनको बहुत आर्थीक सहायता की जिससे बनवारी एक अच्छा बिजनेसमैन बनकर उभरा ,पुनिया और जग्गू ने अपने सभी गुनाहों को कुबूल लिया जिसमे कई कत्ल बलात्कार और किडनैपिंग जैसे जुर्म थे (जैसा की पुनिया नक्सलियों से भी मिला हुआ था और पहले से ही बहुत से अपराध कर रहा था)पुनिया को 14 सालो की और जग्गू को 7 साल की सजा हुई थी....

अजय अब अपनी सभी जिम्मेदारी से मुक्क्त था,उसने वो रास्ता अपनाया था जो कभी किसी ने नही अपनाया ,प्रेम का रास्ता ,वो अपने दुसमनो को भी प्रेम से ही जीत लेता,इसी तहकीकात में उसे आरती और सुरेश के बारे में भी पता चला था,उसने स्टेज में तो कुछ नही कहा लेकिन बाद में सबके साथ सलाह कर उसने आरती की शादी सुरेश से करा दी,जो इतने सालो में नई हो पाया जिसके लिए ना जाने कितनी जाने गई वो अजय ने कर दिखाया था....



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