चुदाई का एक और दौर गुजर गया था रति मेरे आगोश से निकली और अपने कपडे पहन ने लगी मैंने भी आपके कपड़ो को दुरुस्त किया , रति चुपचाप रोटिया बनाने लगी मैं नीनू को फ़ोन करने के लिए एसटीडी पर चला गया ,उसने मुझसे स्पॉट बताया जहा हम मिलने वाले थे मैं उस से बात तो कर रहा था पर मेरा मन पूरी तरह से रति क चारो तरफ ही घूम रहा था , वापिस आकर मैंने खाना खाया और अपना बैग लेकर चल पड़ा ,मन तो नहीं कर रहा था पर नीनू भी मेरे लिए बहुत महत्त्व रखती थी , उस से भी तो नाता था अपना और उसको नाराज़ कर सकू इतनी हिम्मत नहीं थी मुझे
तय समय पर मैं पंहूँचा, नीनू पहले से ही मेरा इंतज़ार कर रही थी
कैसे हो , पुछा उसने
मैं-“ठीक हूँ, तुम बताओ ”
वो- मैं भी ठीक हूँ, कल तो जबरदस्त बारिश हुई ना,
मैं- हाँ हुई तो
वो-यार मैंने ऐसी बारिश पहले नहीं देखि कभी वो भी बिना मोसम के
मै- ये बिन मौसम की बारिशे भी अजीब होती है यार,
वो- तुम्हे क्या हुआ अब
मैं- कुछ होना चाहिए था क्या
वो- कुछ उखड़े से लगते हो
- कुछ नहीं यार , दिल पर एक बोझ सा लगता है,
- अक्सर कुछ हो तो उसको शेयर कर लेना चाहिए मन हल्का हो जाता है
बात तो सही थी उसकी पर कैसे बताता की रति पिछले चार दिनों में कितनी अपनी सी लगने लगी थी मुझे , क्यों मेरी हर सांस जैसे उसका ही नाम ल रही थी मैं नहीं जानता की मेरे मन में उसके लिए ये क्या था , क्या ये प्यार था या बस आकर्षण ही था कुछ तो था जो उस से इतना जुड़ाव लगने लगा था मुझे , शायद रहा होगा किसी जन्म में कुछ वास्ता उस से, वर्ना यु ही कोई अपना सा कहा लगा करता है
नीनू- “आओ एक चाय पीते है , साथ में तुम्हे जोधपुर की एक फेमस चीज़ भी चखाती हूँ ”
हमने पास ही थडी पर दो चाय और मिर्चिवड़ा बोला , लोग कहते हैं की जोधपुर आकर मिर्चिवड़ा न खाया तो आना बेकार , पूरी ही हरी मिर्च को बसन के घोल में पकाते है, जोधपुर की गरम दोपहर में गरम चाय के साथ इसका स्वाद, बस जबरदस्त से कम क्या कहूँ मैं, नीनू की हर बात में कोई ना कोई क्लास होती थी पर सादगी के साथ, यही उसकी सबसे अच्छी बात थी , ऊपर से उसकी और मेरी पसंद भी बहुत हद तक एक जैसे ही थी ,
चाय की चुस्कियां लेटे हुए मैंने पुछा-“ये कब पता चलता है की प्यार हो गया हैं ”
वो-एक दम से मेरी तरफ देखते हुए-“ तुम्हे हो गया क्या ”
मैं- मुझे लगने लगा है शायद से
वो- शायद से क्या हो गया या नहीं
मैं- तुझे क्या लगता हैं
वो- तेरे मन की मैं क्या जानू
मैं- तो फिर कौन जाने
वो- पता नहीं
मैं- नीनू , तूने किया किसी से प्यार
वो- ना, रे, अभी तक तो नहीं किया अब मेरी तरफ कौन देखे मैं कौन सी श्रीदेवी हूँ
मैं- कुछ तो बता ,
वो- ये तो प्यार करने वाला ही बता सके है यार, वैसे जो फिल्मो में दिखाते है वैसा कुछ हो रहा हैं क्या तुझे
मैं- ना रे, बस कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा मन मेरा भटका सा लगे है , बस रोने को जी चाहे
वो- बावला हुआ के
मैं- हाँ बावला हुआ हूँ
वो- देख, ये प्यार व्यार कुछ ना होवे है, क्यों अपना टाइम इस सब के बारे में खराब करते हो, तुम्हे मैं जब से जानती हूँ , तुम्हारा मन तो तबसे ही भटका भटका सा लगता हैं ,ये जो अजीब सी हरकते करते हो ना तुम , मुझे ये पागलपन के लक्षण लगते है, कल ही मेरे मामा बता रहे थे की पागल भी काफ़ी प्रकार के होते है मुझे तो लगे है घर पहूँचते ही तुम किसी डॉक्टर को दिखा ही लो एक बार .
मेरे मन में प्रबल इच्छा हुई की इसकी गांड पे लात दू, हम तो अपना दुखड़ा रो रहे है, इनको बकचोदी सूझ रही हैं
मैं- हाँ, वापिस चलते ही डॉक्टर को दिखा आऊंगा क्या पता बीमारी बढ़ जाए आगे
नीनू- मुझे कुछ कपडे खरीदने है तूम चलो मेरे साथ, उसके बाद तुम्हे मस्त लंच करवाउंगी
मैं- चल ले चल तेरी मर्ज़ी जहा हो वाही पर ले चल
लफ्जों की सौदे बाज़ी में उलझ कर रह गया था , मुझे पता था की नन्दू को अंदाजा हो चला था की मैं जो उस से कह रहा था, बात बड़ी गहरी थी पर शायद थोडा सा झिझक रही थी और मैं रति के प्रति अपनी भावनाओ को उसको चाह कर भिब बता नहीं पा रहा था , पर वो जो किसी आंधी- तूफ़ान की तरफ मेरी जिंदगी में आगयी थी उसका क्या , मेरे समूचे अस्तित्व को हिला कर रख दिया था रति ने, मानता हूँ की जिस्मानी रिश्ता जुड़ गया था उसके साथ पर मेरा और उसका रिश्ता था क्या, वो समझ नहीं आ रहा था