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Raj sharma stories चूतो का मेला compleet

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मैंने फिर उस से कुछ नहीं कहा बस तबियत से चार रोटी टांक दी और पिस्ता की दो चार पुप्पिया ली और घर आ गया , गनीमत थी सब लोग सोये पड़े थे तो मैंने चुपके से दरवाजे को अन्दर से कुण्डी लगायी और अपनी खाट पकड़ ली , कुछ तो चूत मारने की थकान थी कुछ रोटियों का असर तो नींद आ गयी जबरदस्त वाली ना कोई सपना आया ना कुछ और बस सो रहा तह मैं गहरी नींद में की किसी ने हिला कर जगा दिया , आँखों को मसलते हुए मैंने देखा की चाचा सामने खड़े है

मैं- सोने दो न क्यों परेशान कर रहे हो

वो- उठा तो सही ,

मैंने- नींद भारी आँखों से घडी पर नजर डाली सुबह के साढ़े चार हो रहे थे, अब उस बख्त क्या दिक्कत हो गयी जो जगा दिया

चाचा- मुझे काम से जाना है जरा सहर छोड़ आ बस अड्डे तक

मेरा तो दिमाग ही घूम गया सुबह सुबह गांड क्यों नहीं मार लेते मेरी , अब कौन जायेगा इनको छोड़ने पर मरता क्या ना करता तो खटारा स्कूटर को मारी किक और चाचा को लेकर शहर की तरफ बढ़ चला , अब सुबह सुबह कहा धरना देंगे ये, बड़े ही दुखी मन से उनको छोड़ के आया मैं घर में सन्नाटा पसरा पड़ा था मैं चाची को बताने गया तो देखा की वो सोयी पड़ी है उनकी साडी चुचियो पर से सरक गयी थी ब्लाउज में मस्त ऊपर नीचे होती उनकी गोल मटोल छातिया मेरे मन को भटकाने लगी पर चाची थी अपनी कर भी क्या सकते थे पर मन ना मन तो दो चार मिनट लिया नजारा लंड गरम होने लगा तो निकल लिया वहा से

मेरी तो नींद हुई ख़राब अब क्या करू सोचा की बिमला के पास पहूँच जाऊ पर इतनी सुबह सुबह किवाड़ पिटूँगा तो कोई और भी जाग सकता फिर क्या कहूँगा तो ये प्लान भी किया कैंसिल, सोचा की पिस्ता के पास पहूँच जाऊ उसको जगा दू एक बार इर से चूत मार लूँगा पर दिन निकलने वाला भी था काफ़ी समस्या थी तो इर बस अपनी खाट ही पकड़ ली और आँखे मीच ली थोड़ी देर के लिए , सुबह सुबह को जो मीठा सा लटका आता है ना नींद का एक बार आँख लग जाये तो फिर 9 बजे से पहले आँख नहीं खुलनी

और वो ही हुआ मेरे साथ, मैं जगा तो पिताजी ऑफिस जा चुके थे मम्मी मंदिर गयी हुई थी घर पर मैं और चाची ही थे , मैंने उन्हें देखा ऐसा लगता था की वो जैसे अभी अभी नहा कर ही निकली है बदन पर जो पतली सी साडी लपेटी थी उन्होंने उसमे से उनका बहुत बदन दिख रहा था गीले जिस्म से साडी बिलकुल चिपकी पड़ी थी उनको देखने का मेरा नजरिया एक दम से बदल आया उस दिन , चाची ने भी समझ लिया की मैं उनको ताड़ रहा हूँ तो वो जल्दी से अपने कमरे में चली गयी मैं भी घर से बाहर निकला और दूकान की तरफ चल पड़ा इस उम्मीद में की पिस्ता के ही दर्शन कर लूँगा रस्ते में

पर उम्मीद से क्या होता है कुछ भी नहीं ,नहीं हुए दर्शन अब दिन का टेम तो डायरेक्ट रिस्क भी ना ले सकू मैं ऐसे ही दुकान पर टाइम पास कर रहा था की तभी वहा पर मंजू आई कुछ सामान लेने के लिए, मंजू मेरी हमउमर ही थी पर मुझसे एक क्लास छोटी थी, हम लोग वैसे तो एक ही मोहल्ले में रहते थे पर कभी उस से इतना कुछ बोल चाल हुआ नहीं था मेरा, कभी कभार के सिवाय ,दिखने में भी ठीक ठाक सी ही थी वो ना ज्यादा सुन्दर ना ज्यादा डाउन में थी , मंजू जब झुककर सब्जी उठा रही थी तो उसकी चुन्नी सरक गयी ढीले सूट में से उसके नटखट गेंदे मुझे दिख गयी तो मेरी नजर वहा पर रुक गयी मंजू भी भांप गयी की मैं क्या देख रहा हूँ

उसने अपने आंचल को काबू में किया और मंद मंद सी मुस्कुरा पड़ी तो मैं भी हस दिया उसने अपना सामान लिया और चल पड़ी, थोड़ी दूर जाने के बाद उसने पलट कर एक नजर फिर से देखा और आगे को बढ़ गयी मेरा तो दिमाग ही खराब हो गया एक बोतल कोका कोला की गटकने के बाद मैं घर गया तो मम्मी ने कहा की जाके रतिया काका की दूकान से पशुओ के लिए एक बोरी खल की ले आ और एक पीपा तेल का ले आईयो , आजकल मुझे घर के कामो में कोई दिलचस्पी रह नहीं गयी थी पर अपनी भी मजबुरिया थी तो साइकिल उठा कर पहूँच गया काका की दुकान पर

खल की बोरी लादी , काका को तेल की कही तो वो बोले-“बेटा , दूकान में जो तेल है न उसकी काफ़ी लोगी ने शिकायत दी है की उसमे झाग ज्यादा आता है तो हम इस तेल को बेच नहीं रहे है , तू एक काम कर घर जा वहा पर कुछ नए पीपे है ताजा माल मंगवाया है तो घर से ले ले अब तुझे ख़राब तेल तो दे नहीं सकता ना ”

मैं- जी काका ,जैसा आप कहे

वो- बेटा, घर पे तेरी काकी होगी तो उनसे कह दियो की आज दोपहर का खाना ना भेजे मैं जरा शहर को जाऊंगा

मैं- जी, कह दूंगा

गर्मी में बोरी को ढोना किसी सजा से कम नहीं था मैंने बोरी को प्लाट में रखा और फिर काका के घर पहूँच गया दो तीन आवाज दी तो मंजू निकल कर आई

मैं- काकी है क्या

वो- नहीं है , कही गयी है क्या काम है

मैं- वो काका ने कहा की घर से तेल का पीपा ले लेना

वो- अन्दर आ जाओ

मंजू को जी भर के देखा और फिर मैं उसके पीछे पीछे घर के अन्दर चला गया , उसने मुझे बैठने को कहा और रसोई में चली गयी, तुरंत ही वो पानी लेकर आई और गिलास मुझे देते हुए बोली- कौन से तेल का पीपा लेना है

मैं- मतलब

वो- अरे मतलब, सरसों का या फिर सोयाबीन का

मैं- जो तुम्हारी मर्ज़ी हो दे दो, मैं तो लेने पर हूँ

मंजू ने बड़ी गहरी नजरो से देखा मुझे और बोली- क्या कहा तुमने

मैं- अरे, मेरा मतलब सरसों के तेल का पीपा दे दो

वो आओ मेरे साथ , मैं और मंजू घर के पीछे वाले हिस्से में आ गए यहाँ पर उन्होंने गोदाम टाइप बनाया हुआ था मंजू बोली –“नया तेल ना उधर ऊपर की तरफ है रुको मैं उतार कर देती हूँ ”

उस कमरे में चारो तरफ बोरिया राखी हुई थी और एक साइड में ऊपर की तरफ तेल के काफ़ी पाइप रखे हुए थे कमरे में मिली-जुली गंध फैली थी तेल के कारण फर्श भी थोडा सा चिकना सा हुआ पड़ा था मैंने कहा – तुम रहने दो मैं उतार लेता हूँ

मंजू- अरे मैं उतार देती हूँ , मेरा तो रोज का काम है

वैसे तो वहा पर सीढ़ी भी राखी थी पर मंजू बोरियो पर चढ़ पर पीपा उतारने लगी उसकी कोशिश में मेरा ध्यान तेल से ज्यादा उसकी कुर्ती जो ऊपर हो गयी थी तो मैं उसकी गांड के साइज़ पर ज्यादा ध्यान लगा रहा था , तेल का पंद्रह किलो का पीपा मंजू की नाजुक कलाई ऊपर से बोरी पर बैलेंस गड़बड़ाया हुआ, मंजू का ध्यान थोडा सा आउट हुआ और बस हो गया पीपा हाथ से छुट गया और धडाम से आ गिरा फर्श पर वाह रे छोरी ! चारो तरफ तेल फ़ैल गया ऊपर से मंजू भी फिसली बोरी से मैं उसको पकड़ने आगे को भगा उसको थोडा सा थाम सा लिया था पर इधर तेल पर मेरा पैर फिसला और ऊपर से वो आ गिरी मुझ पर

पैर जो फिसला मेरा तो फिसलता ही चला गया मंजू को जो थोडा सा थाम रखा था मैंने उसको लिए लिए ही मैं नीचे बोरियो से जा टकराया मैं उसके नीचे वो मेरे ऊपर तेल में सने हुए, पीठ में शायद चोट सी लग गयी थी पर उस से ज्यादा सुकून इस बात का था की मंजू मेरे ऊपर थी उसके संतरे जैसी चूचिया मेरे सीने पर अपना बोझ डाले पड़ी थी मैंने उठने की कोशिश में मंजू के कुलहो को कस के मसल दिया

“आह” उसने एक सिसकी सी ली , मैंने उसको अपने ऊपर से साइड में किया और उठने लगा पर वह रे तेल क्या खूब साथ दे रहा था तू मेरा उठने की कोशिश में फिर से फिसल गया इस बार मंजू के हाथ की जगह उसका बोबा मेरे हाथ में आ गया , गजब ही हो गया मेरी टाइट पकड़ उसे बोबा बुरी तरह भींच गया “aahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh ” चिल्लाई एक दम से मंजू, तो घबरा कर मैंने उसको छोड़ दिया और वो फिर से मेरे ऊपर आ गिरी इस बार मैंने कोई कोशिश नहीं की उसको हटाने की मुझे तो मजा ही आ रहा था

मेरे मन में पता नहीं क्या आया मैं उसकी गांड को धीरे धीरे सहलाने लगा , मेरे हाथ को अपनी गांड की दरार में महसूस करके मंजू का तन बदन कांप गया , वो बोली- अब छोड़ो भी मुझे उठने दो

मंजू उठी मैं भी बोरी का सहारा लेकर उठा , उसकी सलवार पूरी तरह तेल से गीली हो गयी थी मस्त लग रही थी वो , मेरे कपडे भी ख़राब हो गए थे

मैं- सीढ़ी से ना उतार सकती थी क्या, मैंने कहा था मैं ले लेता हूँ देख क्या हो गया

वो- क्या हो गया , पीपा तो तुमसे भी गिर सकता था ना

मैं- हां पर मेरे कपडे तो खराब हो गए है ना अब मैं घर कैसे जाऊंगा , लोग देखेंगे तो हसेंगे

वो- तो तुम्हे किसने कहा था हीरो बन् ने को

मैं- एक तो तेरे हाड टूटने से बचा लिए और ये बोलती हो

वो- अच्छा बाबा

मैं- मुझे तो पीपा दे मैं जाता हूँ

वो- तू अभी जा, मैं इधर की सफाई करके तुम्हारे घर दे आउंगी तेल

मैं- ना मैं तो लेके ही जाऊंगा, घर पे मुझे डांट पड़ेगी

तो- फिर इतंजार कर

मैं- क्यों करू इंतज़ार , मुझे क्या और काम नहीं है

वो- होंगे काम तो मैं क्या करू देख इधर चारो तरफ कितनी फिसलन हो गयी है पहले इसको साफ़ करुँगी फिर तेल दूंगी

मैं- अभी दे मुझे तो

वो- क्या कहा

मैं- अभी दे तेल मुझे

वो – ना देती क्या कर लेगा

मैं- तेरे बापू को कह दूंगा

वो जा कहदे

मैं- मंजू टाइम ख़राब ना कर देख कितनी बदबू आ रही है मुझसे, तू पीपा निकाल मैं नहाऊंगा जाते ही

वो- कहा न मैं पंहूँचा दूंगी

मैं- मैं ने कहा की लेके जाऊंगा

वो- कैसे ले लेगा

मैं- अच्छी तरह ले लूँगा

वो- लेके दिखा

मैं- क्या लेके दिखाऊ

जब मंजू को मेरी बात का मतलब समझ आया तो वो बुरी तरह से शर्मा गयी उसकी नजरे नीची हो गयी मुझे हँसी आ गयी , लड़की बुरी तरह से झेंप गयी थी मैंने उसको ज्यादा तंग करना उचीत नहीं समझा और कहा ठीक है तू पंहूँचा देना पर एक शर्त है मेरी तू आना चार बजे

वो- ठीक है

 


मैं वहा से फिर घर आ गया और बाथरूम में घुस गया कपडे धोने में नहाने में काफ़ी देर लग गयी तीन बार साबुन लगाई पर तेल की बॉस न गयी शरीर , नहा कर मैंने अपने बदन पर बस एक तौलिया लपेटा और अपने कमरे में आ गया मैंने देखा चाची मेरे कमरे में थी और वो एल्बम देख रही थी जिसमे मेरी, जोधपुर वाली तस्वीरे थी, ये कहा हाथ लग गयी इनके

मैं- चाची, ऐसे किसी के पर्सनल सामान को नहीं देखना चाहिए

चाची- आज कल कुछ ज्यादा ही पर्सनल नहीं हो गए हो तुम , वैसे तस्वीरे अच्छी है

मैं- चाची उनको वापिस दे दो और जाओ यहाँ से

वो- क्यों जाऊ, मैं भी तो देखू की बेटा जोधपुर में क्या गुल खिला के आया है

मैं- आपको तो बस बात का पतंगड़ बनाना आता है

वो- बदतमीज होते जा रहे हो दिन दिन तुम

मैं- आप मेरी तस्वीरे दो मुझे अभी के अभी

वो- ना देती क्या कर लेगा

मै- छीन लूँगा

वो- छीन के दिखा

मैं उनके पास गया और तस्वीरे लेने लगा जोर आज्माईश पर उतार आई चाची जी मुझे डर था की कही वो उन तस्वीरों को मम्मी को न दिखा दे फिर ना कोई जवाब दिया जाता और रंगाई होनी थी वो अलग तो इसी कशमकश में मेरा तोलिया साला धोखा दे गया और वो खुल गया मैं हो गया नंगा चाची ने लजब मुझे नंगा देखा , मेरे हवा में झूलते हुए लंड को देखा तो उनका मुह खुला का खुला रह गया , आपाधापी में मुझे समझ नहीं आया करू तो क्या करू , अब

मैंने खुद को संभाला और जल्दी से तौलिये को फिर से लपेटा शर्म बहुत आ रही थी चाची कमरे से जाने लगी दरवाजे पर पहूँच कर उन्होंने मुझे बहुत गहरी नजर से देखा और फिर बाहर को चली गयी

सबकुछ इतना जल्दी हो गया था की कुछ समझ ही ना आया खैर, अब मैं आया तैयार होकर तो चाची बोली- मैं जीजी के पास प्लाट में जा रही हूँ, शाम को ही आउंगी, घर का ध्यान रखना और घर पर ही रहना

बोलकर वो चली गयी मैं टीवी देखने लगा , घर पर को था नहीं तो मन में खुराफात आने लगी मैं बिमला के घर गया तो वहा पर ताला लगा था अब ये साली कहा गयी, दिमाग खराब सा हो गया तो वापिस आ के सो गया अब जैसा मैं वैसे ही मेरे सपने , मुझे ऐसा सपना आ रहा था की जैसे मैं पिस्ता की ले रहा हूँ बस मेरा छुटने को ही हो रहा था की किसी ने मुझे जगा दिया तो मेरे मुह से निकल गया – “बस पिस्ता दो मिनट की बात है , रुक जरा ”

“क्या बात है जरा मुझे भी तो पता चले ”

मेरी आँख एक दम से खुल गयी, नींद छूमंतर हो गयी , मैंने देखा सामने मंजू खड़ी थी ,

मैं- क्या बात हो गयी

वो- तुम ही कह रहे थे, पिस्ता दो मिनट की बात है

मैं- मैं ऐसा क्यों कहूँगा , भला

वो- वो तो तुम जानो

मैंने खुद की हालात पे गौर किया शरीर पसीने पसीने हो रहा था मैंने छत की तरफ देखा तो पंखा बंद पड़ा था बिजली नहीं थी ,

मैं- मंजू जरा फ्रिज सी थोडा पानी लाइयो

वो पानी लेकर आई पानी पीकर मैंने पुछा – तुम कब आई

वो- जब तुम पिस्ता की बात कर रहे थे

मैं- कब कर रहा था

वो- नींद में उसका सपना देख रहे थे तुम

मैं- नाही नहीं

वो- और नहीं तो क्या , वैसे तुम भी उसके सपने देखते हो पता नहीं था

मैं- फ़ालतू की बात न कर ये बता तू यहाँ कैसे आई

वो- तुमने ही तो बुलाया था

मैं- कब

वो- बड़े भुल्लाक्कड़ हो तुम, सुबह तुमने ही तो कहा था की चार बजे आना , देख मैं आ गयी

मैं- याद आया तेल कहा है

वो- कभी तेल के सिवाय भी इधर उधर देख लिया करो और भी है कुछ हसीं ज़माने में

मैं- हाँ वैसे तुम भी मस्त खूबसूरत हो

वो- अच्छा , आने के काकी को कहूँगी

मैं- कह दी, अब तेरे लिए क्या मैं सच भी न बोलू

वो- पीपा संभाल अपना मैं तो चली

मैं- ऐसे कैसे चली थोड़ी देर रुक जा घर पे कोई नहीं है

वो- कोई नहीं है तभी तो ना रुक रही

मैं- सबकुछ छोड़ ये बता, कहा रहती है तू आजकल दिखती नहीं

वो- मैं तो इधर ही रहती हूँ , तुम्हारी नज़ारे औरो से हेट तो मैं दिखूंगी ना

मैं- क्या कुछ भी बोलती रहती है

वो- सची तो बोली, उधर तो तुम नीनू से चिपके रहते हो और यहाँ पिस्ता पिस्ता करते हो तो बताओ हमारी तरफ कब ध्यान जायेगा तुम्हारा

मैं- क्या पिस्ता पिस्ता कर रही हो मेरा उस से क्या लेना देना

वो- आच्छा , सपने में वो आये तुम्हारे और तुम कहो क्या लेना देना

मैं- कल को तू सपने में आ गयी तो तुमसे भी लेना देना हो जायेगा इसका मतलब

वो- तुम्हारे सपने तुम जानो मुझे क्या मैं चलती हूँ देर हो रही है

मैं- कहा जाएगी जो देर हो रही है घर ही तो जाना है थोड़ी देर रुक जाएगी तो कौन सा आफत आ जाएगी

वो- एक लड़के एक लड़की का ऐसे अकेले में रुकना गुनाह होता है

मैं- तुम कहो तो ये गुनाह मैं अपने सर ले लू

वो- ना, इतनी मेहरबानी की जरुरत नहीं है

मैं- तो तुम कर दो मेहरबानी

वो- कैसे

मैं- ऐसे, कहकर मैंने मंजू को पकड लिया और सीधा उसको किस कर दिया मंजू के लाल होंठ कैद हो गए मेरी कैद में ,झुंझला कर उसने मुझे परे किया और गुस्से से बोली- आने दे काकी तो तेरी तो सारी मस्ती निकलवा दूंगी, दो बात क्या कर ली हंस कर तू तो सर चढ़ गया , अब देख तेरा क्या हाल करवाउंगी , तू तो गया मैं तुझे क्या समझती थी तू क्या निकला जा रही हूँ तेरी मम्मी के पास

मैं- मंजू सुन तो सही , सुन तो सही

पर वो कहा सुने, गुस्से में पैर पटकते हुए वो गयी वहा से मैंने अपना माथा पीट लिया आज तो गांड पक्का टूटने ही वाली थी , सारी आशिकी गांड में घुस गयी मेरी तो, अब हम क्या करे पटाने चले थे नयी चूत गांड मरवाने की नोबत आ गयी , मंजू के चक्कर में हाल बुरा होना था अब किया क्या जाये काफ़ी देर हो गयी सोचते सोचते शकल चूहे जैसी हो गयी , शाम हो गयी मैं वैसे ही टेंशन में बैठा रहा मम्मी घर आई पर उन्होंने कोई रिएक्शन न दिया नार्मल सी ही लग रही थी इधर मैं सावधान था रात हो गयी उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पुछा तो मुझे लगा की मंजू ने शिकायत की की नहीं

उसकी असमंजस में रात बीत गयी , अगली सुबह पहूँच गए शहर पढने को, नीनू आज ये नहीं थी मैं क्लास में जा रहा था की मुझे मंजू दिखी तो मैं दोड़ कर उसके पास गया और बोला- मंजू बात करनी है

वो- दूर हो जा मुझसे मुझे ना करनी कोई बात वात

मैं- एक बार मेरी बात सुन तो ले फिर नाराज हो लेना

वो- हट जा मेरी क्लास का टाइम हो रहा है, तमाशा मत कर मंजू चली गयी पूरा दिन मेरा मन नहीं लगा फिर दोपहर बाद मैं घर आया भूख भी लग रही थी पर रोटिया भा भी नहीं रही थी, अजीब परिस्तिथि थी ये भी दिमाग ख़राब वो अलग कुछ सोच कर मैंने एक लैटर लिखा जिसमे बार बार मंजू से माफ़ी मांगी थी और शाम को उसके घर की तरफ चल पड़ा , वो बारने में झाड़ू लगा रही थी मैंने गली में इधर उधर देखा कोई ना था मैंने धीरे से वो पर्ची मंजू की तरफ फैंक दी

मंजू ने घूरते हुए मेरी तरफ देखा और फिर उस पर्ची को झट से उठा कर अपनी कुर्ती में डाल लिया मैं वहा से कट लिया और अपने खेत की तरफ बढ़ गया दिमाग में उधेड़बुन लिए खेत में कौन सा चैन मिला अपने को वहा जाकर ढेर सारी खरपतवार को साफ़ किया जो सब्जिया लगाई थी उनको ठीक से देखा की कोई दिक्कत तो ना हो रही जब घर के लिए चला तो अँधेरा सा होने लगा था मैं जानबूझ कर मंजू के घर की तरफ से निकला पर वो ना दिखी तो घर को हो लिए

घर आते है ऐसे लगता था की जैसे सारे जहाँ की मुसीबते मुझ पर ही टूट पड़ी हो , आज फिर घर में दाल बनी थी मेरा तो दिमाग ही दाल हो गया था हफ्ते में ४-५ बार यही बेस्वाद खाना खाना पड़ता था और शिकायत कर नहीं सकते , बेमन से रोटिया तोड़ने के बाद मैं चाची के कमरे में गया और बोला- मेरा एल्बम मुझे वापिस दे दो

चाची- ले जा, वर्ना तुझे नींद नहीं आएगी

मैं वापिस होने लगा तो वो बोली- इधर आ

मैं उनके पास गया तो वो एल्बम में मेरी और नीनू की राजस्थानी ड्रेस वाली फोटो को देख पर बोली- ये तस्वीर अच्छी है , इसको फ्रेम करवा के अपने कमरे में लगवा लेना

मैंने चाची को इस तरह से देखा जैसे की उनके सर पर सींग निकल आये हो

वो- तुम्हारी दोस्त है

मैं- मेरे साथ पढ़ती है

वो-हां , तो दोस्त है तुम्हारी

मैं- नहीं बस साथ पढ़ती है

वो- बेटा, तुम झूठ क्यों बोलते हो आजकल

मै- हां, मेरी दोस्त है

वो- अच्छी बात है , तो छुपाते क्यों हो

मैं- बस ऐसे ही

वो-डरते हो

मैं- डरना तो पड़ता ही है

वो- तो फिर दोस्ती कैसी जो छुपानी पड़ते है

मैं- आज आपको हो क्या गया है

वो- बस तुम्हे कुछ समझाने की कोशिश कर रही हूँ

मैं- क्या

वो- ज़माने का दस्तूर , देखो बेटा हम नहीं चाहते की हमारी औलाद हमसे कुछ छुपाये, जानती हूँ तुम्हारी उम्र विद्रोही है, खून में उबाल है पर साथ ही तुम्हारे ऊपर कुछ जिम्मेदारिया है , इस घर की कुछ आस है तुमसे पर इसका मतलब ये नहीं है की तुम अपनी इन छोटी छोटी बातो को भी हमसे छुपाओ,

मैं- आप सही कह रही है पर एक लड़की और एक लड़के की दोस्ती को कोई नहीं समझता

वो- अगर तुम सही हो तो छुपाने की कभी जरुरत नहीं पड़ेगी , जाओ आराम करो

मैं अपने कमरे में आ गया और उनकी कही बातो को समझने की कोशिश करने लगा पर हमारा छोटा सा दिल तमाम ज़माने की परेशानियों से घिरा कहा उनकी गहरी बात को समझ पता अगले दिन इतवार था तो खूब देर तक सोने का इरादा करके बिस्तर को पकड़ लिया पर नींद साली दगा कर गयी , लाख जतन किया करवटे बदले कभी इस तरफ कभी उस तरफ पर वोही बेचैनी जो कही खो सी गयी थी दुबारा मुझ पर हावी होने लगी थी मैं कमरे से बाहर आया और छत पर बैठ गया रात की ख़ामोशी बेताब थी मुझसे बात करने को पर मेरे पास शब्द नहीं थे, रति की याद बड़ी जोर से आने लगी मुझे

 


मुझे एक तलब सी लगने लगी की काश मेरे पंख होते तो झट से उड़ कर उसके पास पहूँच जाऊ , वो कुछ बोले उस से पहले ही भर लू उसको अपने आगोश में किसी बादल की तरह टूट कर बरस जाऊ उस पर, सीने में दर्द सा होने लगा था रात के ढाई बज रहे थे सब लोग दुबके थे बिस्तर में, खोये थे अपने अपने सपनो में और एक हम परेशान बिना किसी बात के ये दिलो के मसले भी बड़े अजीब होते है समझ कुछ नहीं आता बस एक दर्द से जूझना पड़ता है कुछ मिलता नहीं इसमें पर फिर भी करना पड़ता है

सुबह होने को आई मुझे करार नहीं आया चार बजे चाची उठी उन्होंने मुझे देखा और बोली- नींद नहीं आई

मैं- पता नहीं कुछ परेशानी सी है

वो- होता है बेटा होता है

मैं- क्या होता है

वो- खुद ही समझ जाओगे

मैं- पहेलियाँ न बुझाओ आप

वो- थोड़ी देर में नीचे आ जाना चाय पीने

मैं- ठीक है

नीचे गया तो मम्मी भी जाग चुकी थी वो बोली- आज तो जल्दी जाग गया

मैं- जी

वो- रोज ही जल्दी जगा कर स्वास्थ्य पर ध्यान दिया कर

मैं मन ही मन सोच रहा था की घर वाले भी अजीब है , घर की क्या अहमियत क्या होती है ये बहुत बाद में जाकर पता चला चाय की चुस्किया लेते हुए मैं अपनी और नीनू की ही तस्वीर को देख रहा था उसकी वो प्यारी सी मुस्कान मुझे बहुत अच्छी लगती थी ,ये बड़ा ही अजीब सा रिश्ता था उसका और मेरा की लिखने का जो सोचु तो शब्द कम पड़ जाये पर बतया ना जाये की वो मेरी क्या लगती थी , दिन निकल आया था नाश्ता पानी करके मैं जो मोहल्ले की दूकान पर आया तो पता चला की लड़के लोग आज नहर में नहाने जा रहे थे , अपना भी मन था पर आज पिताजी की भी छुट्टी थी तो रिस्क नहीं ले सकता था पर मेरा बागी मन नहीं माना तो मैं भी हो लिया उनके साथ

वो नादान उम्र, वो अल्हडपन न कोई चिंता ना फ़िक्र, रगड़ रगड़ कर मजा लिया नहर में नहाने का, समय का कुछ भान नहीं रहा जब घर आये तो दिल घबरा रहा था बाल मेरे बिखरे से थे चेहरे पर खुश्की थी पिताजी आँगन में ही बैठे थे पुछा उन्होंने- कहा गए थे

मैं- जी यही था

वो- यहाँ तो हम थे

मैं- खेलने गया था

वो- शकल से तो कुछ और लग रहा है ,नहर में नहा के आये हो ना कितनी बार मना किया है मानते क्यों नहीं तुम

मैं- जी नहाने नहीं गया था

वो – झूट मत बोलो

मैंने फिर से मन किया और कान पे एक रेह्प्ता आ टिका, आँखों के आगे सितारे नाच गए , रंगाई शुरू हो गए तीन चार थप्पड़ टिकते गए एक के बाद एक पिताजी को गुस्सा इस बात का था की झूठ क्यों बोलता हूँ मैं , किसे ने नहीं छुटाया , मार पड़ती रही जब देखो मारते ही रहते थे घरवाले समझ क्या रखा मुझे पर चुप रहना ही बेहतर समझा कुछ बोलता तो और मार पड़ती गाल लाल हो गया था मैं अपने कमरे में आके बैठ गया , मन कर रहा था की भाग जाऊ यहाँ से कही दूर पर अपना यही फ़साना था यही दास्ताँ थी रोज़ का था तो कुछ कर नहीं सकती थे

जब कुछ मूड ठीक हुआ तो मैं घर सी बाहर निकला और मोहल्ले के तरफ चल पड़ा तो रस्ते में ही मंजू मिल गयी आँखे चार हुई उसने धीरे से एक कागज़ निकाला और गिरा कर चली गयी हमारी चाल हम पर ही बड़े चाव से मैंने उसे उठाया और जेब में रख लिया

अब लेटर था उसका हाथ में कुछ तो लिखा ही होगा खुद को किसी नवाब से कम न समझते हुए मैं घर आया भागकर और कागज को खोल कर देखा तो मेरा तो माथा ही घूम गया पूरा कागज़ कोरा था बस कोना मुड़ा हुआ था , ये कैसा मजाक था या फिर उसका कोई इशारा था मुझे कुछ समझ ना आये ये कैसी मुश्किल थी कैसा फ़साना था कुछ तो था ही वर्ना ऐसे ही कोना मोड़ कर वो कागज न देती पर ये क्या इशारा था , कभी कभी तो मैं सोचता था की ज़माने के हिसाब से मैं मंदबुद्धि तो न रह गया

हमे तो उम्मीद थी मंजू दो बात कहेगी चाहे कडवी ही सही पर उसने तो उलझा ही डाला था , रात हो गयी खूब दिमाग लगाया पर कुछ समझ आये ही ना , मोका देख कर मैंने पिस्ता को फ़ोन किया तीन बार मिलाया पर हर बार उसकी माँ ही हेल्लो हेल्लो करती रही तो वो आस भी गयी , समस्या बहुत गंभीर कोई उपाय न मिले एक और रात मेरी अब ऐसे ही कटने वाली थी , एक बार मैं छत की मुंडेर पर बैठा चाँद को ताक रहा था चांदनी एक बार फिर से मेरी बेबसी पर हंस रही थी सवाल तो बहुत थे पर जवाब कोई न मिले

पता नहीं कितनी रात बीत गयी चाची के कमरे का दरवाजा खुला , उठी होंगी पानी- पेशाब के लिए मुझे फिर से उसी हाला में देख कर वो मेरे पास आई और बोली- आज भी नींद नहीं आ रही क्या , कोई परेशानी है क्या शाम को भी कुछ उलझे उलझे से लग रहे थे

मैं- जी कुछ नहीं बस ऐसे ही थोड़ी सी बेचैनी है

वो- आज कल तुम कुछ ज्यादा ही बेचैन नहीं हो रहे हो

मैं- बस जा ही रहा हूँ सोने को

वो मेरे बालो में हाथ फिराते हुए बोली- चलो बताओ क्या परेशानी है

मैं- पहले आप वादा करोगी की किसी को बताओगी नहीं

वो- चल ठीक है वादा

मैंने वो कोरा कागज़ उनकी आँखों के सामने कर दिया

चाची ने उसको देखा कुछ देर और फिर उनको हँसी आ गयी , मुझे हुई उलझन

वो- किसने दिया है तुम्हे ये

मैं- वो नहीं बता सकता

चाची- तो ठीक है मैं भी तुम्हारी उलझन नहीं सुल्झाउंगी

मैं- चाची, मेरा विश्वास करो, मैं अभी नहीं बता सकता पर वादा करता हूँ सही समय पर कुछ छुपाऊ भी नहीं गा

वो- बेटा, सो जाओ जाकर रात बहुत आ गयी है , जवान लडको का बिना बात के रातो को यु जागना ठीक नहीं रहता

मैं- मुझे नींद नहीं आती

वो- उस कागज़ को मुझे थमाती हुई- बेटा ये तुम्हारी परीक्षा है देखो तुम पास होते हो या फ़ैल

चाची पानी पीकर गयी सो हम रह गए चुतिया की तरह , खैर, सुबह हुई दो रातो की नींद से आँखे होवे बोझिल पर मन बावरा कहा माने किसी को उलझा था उस डोर से जो मंजू ने जोड़ दी थी बिना बात के साली दो शब्द ही लिख देती पर जैसा की चाची ने कहा था , कुछ तो था ही उस कोरे कागज़ में ही पिताजी और चाचा अपने अपने काम पर चले गए थे मम्मी गयी थी मंदिर, मैं चाची के पास रसोई में गया

वो- हां भई, बताओ कैसे दर्शन दिए रसोई में

मैंने फिर से वो कागज़ उनको दे दिया

वो- बेटा, मैंने कहा न जब तक तुम न बताओगे की किसने दिया मैं तुम्हारी मदद नहीं करुगी

अजीब उलझन में उलझा दिया रे मंजू तूने , अब कौन मेरी परेशानी दूर करे मैंने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और बैठक में आके बैठ गया और गहरी सोच में डूब गया , चाची भी थोड़ी देर बाद आ गयी और मेरी और देख कर मुस्कुराने लगी, ले लो मेरी बेबसी का मजा

चाची- वैसे कब तक देना है जवाब तुमको

मैं- किस चीज़ का

वो- मुझे बना रहे हो

मैं- चाची, मेरी टांग मत खीचो मैं बहुत परेशां हूँ

वो- बेटा, तुम्हारी हरकतों से एक दिन कुनबे को परेशानी होने वाली है हमे लगता तो था की तुम जवान हो गए हो पर इतने हो गए हो ये सोचा नहीं था

मैं कुछ नहीं बोला और उठने लगा तो उन्होंने मुझे बिठा दिया और बोली-पढाई कैसी चल रही है इस बार पास तो हो जाओगे ना

मैं- जी बिलकुल हो जाऊंगा कोई दिकत नहीं है

वो- बेटा तुम्हारी हरकतों से कभी कभी शक होता है वैसे कहो तो तुम्हारी मम्मी को बता दू वो दे देंगी तुम्हे जवाब

मैं- कल ही तो पिताजी ने ने खाल उतारी थी , आपको ठीक नहीं लग रहा तो कर दो शिकायत और मार खा लूँगा मेरा कौन सा कुछ घिस जाना है वैसे भी आजतक मार ही तो खाई है मैंने

चाची- सब तुम्हारी भलाई के लिए ही है

मैं- हां जी सब समझता हूँ मैं

वो- समझते हो तो जवाब दो पत्र का

मैं- पहले सवाल तो पता चल जाये

 


चाची ने अपना पेट पकड़ लिया और खिलखिला के हंसने लगी , बाह रे दुनिया किसी की परेशानी किसी के हंसने का कारण बन जाते है

मैं- ठीक है आप मत बताओ मैं सवाल करने वाली से ही बोल दूंगा की मुझे समझ ना आया

वो- हां ये सही रहेगा वो भी समझ लेगी की किस मुर्ख से बात करने चली है वो

मैं- चाची ये अहसान करदो, आप जो कहोगे वो करूँगा चाहे कितना भी काम करवा लेना कर दो ना मेरी मदद

चाची- जा एक कलर पेन लेकर आ केसरिया वाला

मैं दोड़ कर गया और पेन लेकर आया उन्होंने कागज़ पे कुछ लिख दिया और बोली- दे देना जिसे देना है

मैंने देखा उस पर कुछ भी ना लिखा था बस आधे से ज्यादा कागज़ को उन्होंने रंग दिया था

मैं- ये कैसा जावाब है

वो- जैसा उसका सवाल है

मैं- सवाल क्या है वो तो बता दो

वो- वो पूछ रही है की कोरे कागज़ सी है मेरी जिंदगी तुम क्या लिखोगे

मैं- और आपने क्या लिखा ये

वो- यही की तुम्हारे जीवन में रंग लेकर आया हूँ

मैंने अपना सर पीट लिया हाय रे मंजू तुझे क्या गम हो गया जो हमे भी उलझा डाला इस तरह से तूने सीधे सीधे ना पुछ लेती की बात क्या है , खैर चलो बात तो आगे बढ़ी जैसे तैसे करके

Chachi-खाना बनाने जा रही हूँ क्या खाओगे

मैं- जो रोज खाता हूँ वो ही खाऊंगा कौन सा मेरे लिए कुछ स्पेशल बनेगा

वो- आज तो बना ही दूंगी , बेटा प्रेम की राह जो चल पड़ा है

- ये मजाक था या आपका ताना

वो- बता क्या खायेगा

मैं- ऐसी बात है तो बना दो नमकीन चावल और बूंदी का रायता

वो- ठीक है बनाती हूँ

चाची रसोई में चली गयी मैं बिमला की तरफ चला गया पर फिर से उसके घर पर ताला लटका हुआ था ये रोज रोज ताले को देख कर मेरा दिमाग सटकने लगा मैं घर आया और चाची से पुछा तो उन्होंने बताया की बिमला एक स्कूल में लग गयी है तो दोपहर बाद ही आती है , साला जिसे देखो तरक्की कर आहा है एक मैं ही हूँ बस नाकाबिल चाची रसोई में लगी थी मैंने अचानक से ही पूछ लिया की आपको कैसे पता चला की वो कोरे कागज़ के सवाल का तो उनकी सांस अटक गयी वो बोली- तेरा काम हो गया न तो निकल ले खाना बन जायेगा तो बोल दूंगी पर मैं ढीठ एक नुम्बर का पर वो कैसे बताती मुझे सबके अपने अपने दिन होते है जवानी के तो फिर जाने दिया

खाने के टाइम तक मम्मी भी आ गयी थी उन्होंने बताया की उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं है तो मैं चाची के साथ प्लाट में चला जाऊ, तो दोपहर बाद मैं और चाची दोनों प्लाट में चल दिए सर पर बाल्टी रखे चाची मटकते हुए मेरे आगे आगे चली जा रही थी साडी में वो बहुत ही कमाल की लगती थी या मुझे ही लगती थी ऊपर से उनकी हाइट करीब 5फूट थी तो वो भी एक फैक्टर था , उनके पैरो में पड़ी पायल उनके हर कदम के साथ साथ बजती थी मैं सोचने लगा चाचा ही सही है ऐसे मस्त माल को हथिया लिया थोड़ी जलन सी हो रही थी

रस्ते में मुझे पिस्ता मिल गयी वो भैंसों को पानी पिलाने लायी थी , मुझे देख कर वो मुस्कुराई और इशारा किया मैंने भी जवाब दिया की चाची साथ है तो थोडा हिसाब से पर उसको तो ऐसे मोको पर ही शरारत सूझती थी

चाची- क्या हुआ जल्दी जल्दी चल ना

मैं- चल तो रहा हूँ

पिस्ता बड़ी अदा से मुस्कुराते हुए बड़ी अदा से मेरे पास से अपनी चोटी को लहराते हुए निकल गयी मेरे दिल पर बिजलिया गिराते हुए ये ख्वाब बड़ा हसीं लगा करता था पर ये भी पता था की हर ख्वाब की तरह इसको भी कभी ना कभी टूटना ही था , मुझे डर लगता था की क्या होगा उस दिन जब ये ख्वाब टूट जायेगा , अब मैं क्या करता ख्वाब की तक़दीर में तो टूटना ही लिखा होता है देखो कब तक जिया जाये इस ख्वाब को कब तक मियाद इसकी

चाची भैंसों को चारा मिलाने लगी मैं घास काटने लगा मुझे ये काम कभी भी पसंद नहीं थे पर मेरी बहुत ही मजबुरिया थी घास काटते काटते मैं थक गया पर घास उतनी के उतनी मेरे बदन में खुजली मचने लगी चाची मेरे पास आई और बोली- इधर लकड़ी ख़तम होने को आई है, कल जाके काट लाना

मै- ना जाऊंगा मैं, आप और मम्मी चले जाना मेरे कोई लिख दी है

चाची- ठीक है मैं या तेरी मम्मी में से कोई तेरे साथ चलेगा हर बात पे रोया मत कर अब घर के काम भी तो जरुरी है अब तुम थोड़ी मदद कर दो तू हमारी भी मदद भी हो जाती है और वैसे भी काम करने में कभी शर्म नहीं होनी चाहिए

मैं- ठीक है जी

चाची थोड़ी देर बाद दूध निकालने लगी वो बैठी हुई थी उनके बैठने का तरीका ऐसा था की उनके घुटने पेट से लग रहे थे, जिस से उनके बोबे ऊपर को हो गए थे उनका बिलाउज़ भी थोडा खुले गले का था उनके आधे से ज्यादा बोबे को ऊपर को हो गए थे मुझे दिख रहे थे, उनके उभारो की घाटी जैसे मुझे खुला आमंत्रण दे रहे थे पर क्या करू बस ठंडी आह ही भर सकते थे उस माल पर अपना कोई हक़ नहीं था और कोशिश् मैं कर नहीं सकता था तो बस आँखों से निहार ही सकता था

चाची को भी पूरा आभास था की मेरी नजरे कहा पर है पर घर में इतना तो होता ही रेहता है तो उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया वहा के काम को निपटा कर मैंने कहा मैं घुमने जा रहा हूँ और कट लिया वहा से , चक्कर जो लगाना था मंजू के घर का , और किस्मत की बात देखिये मंजू अपने घर के बहार कुर्सी पर बैठी थी मैं इस तरह से उसके पास से निकला उसकी गोदी में अपने पत्र गिरा गया बिना उसकी तरफ देखे मैं गली में मुड गया धड़कने कुछ बढ़ सी गयी थी

अब अपना कोई ठिकाना तो नहीं था तो पैरो को मोड़ लिया घर की तरफ घर के कोने की तरफ मुडा तो देखा की चाचा किसी औरत से हस हस के बात कर रहे थे मैं कोने पर ही ही खड़े होकर देखा तो पता चला की चाचा बिमला से बड़ा हस हस के बात कर रहे थे , बिमला से मैं आश्चर्य से भर गया , बिमला के वो चाचा ससुर लगते थे मैंने देखा की बिमला ने उनसे घूँघट भी नहीं किया हुआ था और बड़ा रस लेके बात कर रही थी चाचा ने बिमला के कंधे को थप थापाया मुझे ये बात बहुत अजीब लगी क्योंकि पहले तो उनका रिश्ता इस टाइप का नहीं था और फिर अंदाज दोस्ताना

मैं तेजी से घर की तरफ बढ़ा उन्होंने जैसे ही मुझे देखा तो बिमला ने झट से बड़ा सा घूँघट निकाल लिया और अपने घर में अन्दर चली गयी चाचा मेरे पास आये और बोले- पूछ रहा था की किसी चीज़ की कोई जरुरत तो नहीं अब इसके भाई साहब और भाभी जी तो चंडीगढ़ है और इसका पति तो विदेश है , तो ये हमारी जिमेवारी है

मैं- पर चाचा जी मैंने तो कुछ पुछा ही नहीं

चाचा आगे बढ़ गए मैं वाही रुक गया पता नहीं क्यों मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगा उस पल दिमाग में कुछ टेंशन सी हो गयी थी घर पे भी मैंने चाचा को देखा वो नार्मल से ही दिख रहे थे , पता नहीं क्या बात थी या मुझे ही बस कुछ ऐसा लग रहा था की बिमला से जैसे वो हस हस कर बात कर रहे थे अब इतना तो मैं भी नासमझ नहीं था ना उस रात रोटिया बड़ी मुस्किल से गले से उतरी मेरी खाने के बाद मैंने अपनी साइकिल ली और घर से निकल रहा था की चाचा ने मुझे टोक दिया

वो- कहा जा रहे हो

मैं-जी सब्जियों में पानी देना है तो खेत में जा रहा हूँ

वो- बेटा, तू अपनी पढाई पे ध्यान दे, मैं पानी दे दूंगा तू घर रह खेत में मैं जाऊंगा

 


मैं चौंक गया क्योंकि चाचा इस से पहले खेत में तभी जाते थे जब फस जाते थे वो वर्ना कभी काम का कभी थकन का बहाना मार देते थे, मेरे अन्दर का जासूस जागने लगा मैंने साइकिल को अन्दर कर दिया और अपने कमरे में आ गया घंटे भर में सब लोग सो गए थे घर में घोर अँधेरा छाया हुआ था मेरे मन में बहुत कुछ चल रहा था एक बार फिर से वोही छत थी वो ही चाँद था और वो ही मैं था रात फिर से खामोश थी मेरे मन में भावनाए उमड़ रही थी कुछ सोच कर मैं घर से बाहर आया और अपने खेत की तरफ चल पड़ा दबे पांव मैं कुएँ पर गया तो मैंने देखा की कुएँ पर कमरे में ताला लगा था चाचा तो थे नहीं यहाँ पर

अब ये कहा गए, दूर दूर तक बस ख़ामोशी की चादर फैली हुई थी , मेरे दिमाग में तभी जैसे लट्टू जल गया मैं वहा से तेजी से बिमला के घर की तरफ चला, मेन गेट अन्दर से बंद था मैं अपनी छत से उसकी छत पर उतर गया सब कुछ शांत ही लग रहा था मैं नीचे की तरफ गया ख़ामोशी जो थी वो मुझे बड़ा परेशान कर रही थी मैं अन्दर को पंहूँचा चारो तरफ अँधेरा था हर बल्ब बुझा हुआ था , मेरा दिल बड़ी जोर जोर से धड़क रहा था सब ठीक ही लग रहा था मैंने सोचा खामखा ऐसे ही शक नहीं करना चाहिए था चल अब घर तो मैं वापिस सीढियों की तरफ बढ़ा ही था की मेरे कानो में जो खनक गूंजी उसे मैं बहुत अच्छे से पहचानता था आऔच ”

ओह आह , क्या करते है थोडा आराम से चूसिये ना

ये शब्द सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए , कमरे का दरवाजा तो बंद था पर खिड़की खुली थी अँधेरे से कुछ दिख तो रहा नहीं था पर सुन तो सकता ही था

चाचा- ओह बिमला कितना कसा हुआ माल हो तुम , तुम्हारा पति एक नुम्बर का गांडू है जो तुम्हे यहाँ छोड़ कर कमाने चला गया वहा पर

बिमला- चाचा जी, आह्ह्ह्हह्ह मैं चिंता करू आप हैं ना मेरा ख्याल रखने को आह थोडा सा आराम से चूसिये ना बोबो पर निशाँ हो जायेंगे

चाचा- आज मत रोक मुझे मेरी जान आज पूरी रात तबियत से चोदुंगा तुझे जरा मेरे लंड को अपने हाथ में तो ले

मुझे समझ नहीं आ रहा था की ये क्या हो रहा है , दिल तो कर रहा था की दोनों की गांड पर एक एक लात दू पर मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकता था पर उसी टाइम सोच लिया था की बिमला की तो गांड लाल करूँगा ही जरुर , पता था की बस अब चुदाई ही चलेगी पूरी रात मुझमे और वहा पर खड़े रहने की शक्ति नहीं थी मुझे पता नहीं क्यों विशवास नहीं हो रहा था की चाचा ऐसे निकलेंगे मैं वहा से खिसक लिया और वापिस घर आ गया दिल में पता नहीं क्यों ऐसे लगता था की जैसे ज़माने भर का दुःख भर दिया हो किसी ने

हालाँकि कायदे की बात तो ये थी की बिमला की अपनी मर्ज़ी थी की वो किसी से भी चुदे, पर चाचा जो धोखा चाची को दे रहे थे वो गलत था , मेरी आँखों के सामने मेरा ही अक्स आ गया मैं जो पिस्ता के साथ करता था मैंने जो रति के साथ किया वो भी तो किसी और की अमानत थी ना शायद दुनिया का कुछ ऐसा ही दस्तूर रहा हो आज जब खुद को दर्द हुआ तो अच्छे बुरे का ख्याल आया मैं रगड़ रगड़ कर पिस्ता को चोदता तह उसकी कल को शादी होगी वो क्या सोचेगा जब उसको पता चलेगा की उसके चेक पर कोई और साइन कर गया , रति को भी मैं खूब चोदा था मेरे मन में तमाम वो लोग घुमने लगी सर फटने को आया कहा तक भागता मैं सच तो यही था बदलने वाला नहीं था जरा सा भी

मैं क्या कर सकता था बिमला की चूत में आग लगी थी , उसके शरीर की जरूरते थी , वो बहार भी चुदवा सकती थी पर ठीक था की घर की भीत घर में ही गिर रही थी , पर मुझे उस बात का डर था जब ये बात खुलेगी मुश्क कभी छुपते भी तो नहीं मैं उस चाँद को घूर रहा था बिना बात के , मेरी तन्हाइयो का वो ही तो साथी था कभी कुछ बोलता नहीं था पर फिर भी मेरा साथी था

“लगता है अभी तक तुम्हारी उलझन सुलझी नहीं है ” मैंने पलट कर देखा तो चाची खड़ी थी बदन पर ढीली सी मैक्सी खुले बाल कमर तक आते हुए, ऊपर से चांदनी रात

मैं- क्या करू चाची, ये नींद भी मेरी दुश्मन होई पड़ी है , कमबख्त आती ही नहीं

वो- ये लगातार तीसरी रात है जब मैंने तुम्हे यहाँ देखा है

मैं- जी सो जाऊंगा थोड़ी देर में

चाची- मेरे साथ आओ

मैं उनके कमरे में आ गया उन्होंने मुझे बेड पर बिठाया और बोली- मुझे अपनी चाची नहीं दोस्त समझो और बताओ की वास्तव में तुम्हे क्या परेशानी है

मैं- मुझे नहीं पता

वो- क्या गर्लफ्रेंड से कुछ बोल चाल हुई

मैं- मेरी कोई गर्लफ्रेंड है ही नहीं

वो- झूट मत बोलो

मैं- सच हो बोल रहा हूँ

वो- चलो मान लिया फिर क्यों परेशानी है क्यों जागते हो रातो को

मैं- बस ऐसे ही

वो- ऐसे ही क्यों , मैं तो नहीं जागती ऐसे ही किसी और घरवाले को देखा है ऐसे ही जागते हुए

मैं चुप रहा

वो- मुझे तुमपे पूरा विशवास है , पर तुम बताओ की क्या तुम्हे ऐसा लगता है की तुम्हे किसी से प्यार हो गया है

मैं- कभी लगता है कभी नहीं लगता

वो- मतलब तुम किसी लड़की की वजह से परेशान हो

मैं- बिलकुल नहीं

अब मैं उनको क्या बताता की समस्या उनकी है समाधान वो मुझे बता रही है

वो- तो पढाई का टेंशन है

मैं- नहीं जी नहीं है

वो- कोई भूत प्रेत का पंगा है क्या , कोई दीखता है क्या

मैं- आजतक तो नहीं दिखा

वो- बेटे, तुम मेरी बात को समझो पहले इस तरह सी जागना गलत है शरीर को नींद की भी आवश्यकता होती है कल को तुम्हारी मम्मी पिताजी जो पता चलेगा तो क्या सोचेंगे और फिर तुम डांट खाओगे वो अलग

मैं- अब नींद नहीं आती तो मैं क्या करू

वो- तो ठीक है दिन उगते ही तैयार रहना तुम्हे डॉक्टर को दिखाउंगी

मैं- उसकी जरुरत नहीं है

वो- तुम कल चल रहे हो बस और अभी तुम इधर ही सो जाओ मेरे पास में ही क्या पता फिर से बची खुची रात को भटकते फिरोगे

 
मेरे पास और कोई चारा भी नहीं था तो मैं जाके सो गया मन में उलझने थी , माथे पर परेशानियों की शिकन थी दर्द भी अपना था पीड़ा भी अपनी थी कहते भी तो किस से कहते हमाम में सब नंगे जो थे आँखों को मींच लिया था देर सवेर नींद आ ही जानी थी, सुबह आँख खुली ओ देखा चाची कमरे में थी नहीं मेरी नजर घडी पर पड़ी थो टाइम ज्यादा हो रहा था मैं तुरंत भगा नीचे को , नहाने धोने का भी टाइम न था तो बस मुह को ही धोकर बालो को भिगोकर मैं दोड़ पड़ा शहर को , आज मुझे मेरे सारे पीरियड्स अटेंड करने थे

नीनू आज भी ना आई थी , अब उसको क्या हुआ कहा बिजी हो राखी है वो दिमाग ही खराब करके रखा है उसने तो, पूरा दिन मेरा बस पढाई में ही बीता , फिर मैं लाइब्रेरी गया कुछ किताबे चाहिए थी मुझे लाइब्रेरी के पास एक पेड़ के नीचे ही मुझे मंजू बैठी मिल गयी , हाथो में ढेर सारी किताबे उठाये मैं उसके पास गया , उसने मुझे देखा और बोली- “तुम पढ़ते भी हो ”

मैं- ना मैं तो यहाँ बस टाइम पास करने को आता हूँ, वैसे तुम यहाँ कर क्या रही हो , तुम्हारी क्लास तो दोपहर से पहले ही खतम हो जाती है

वो- मेरा आई कार्ड, गम हो गया था , तो दूसरा बनवाने की एप्लीकेशन दी है बीस दिन हो गए बाबूजी चक्कर कटवा रहा है आज आना कल आना

मैं- तो पहले बोलना था ना , आ मेरे साथ

मैं मंजू को लेकर बाबूजी के पास गया और पुछा- की इसका कार्ड क्यों न बना रहे आप

वो- तू के इसका वकील है, टाइम नहीं है , फुर्सत में आना

मैं- सर, कितने दिन से ये चक्कर काट रही है कार्ड तो आज ही बनाओगे आप

वो- धमकी देता है मुझे

मैं- जो भी समझ लो कार्ड अभी बनेगा

वो- नहीं देता क्या कर लेगा

मैं- ना, बनता तो लिख के दे दो ,

वो- जा अपना काम कर

मैं- बाबूजी, ये लड़की बहुत परेशां है कार्ड के बिना , और फिर आपको देर भी कितनी लगनी है दो मिनट का ही तो काम है

वो- कहा न टाइम नहीं है बाद में आना

मैं- बाद में कब

वो- बाद में चल निकल यहाँ से

मेरा दिमाग खराब हो गया वैसे मुझे गुस्सा बहुत कम आता था पर उस दिन कण्ट्रोल नहीं हुआ

मैं- बस बहुत बाबूजी बाबूजी कह लिया कार्ड अभी बना के दे वर्ना ठीक न रहेगी

वो- धमकी देता है , चल अभी ले चलता हूँ प्रिंसिपल के पास

मैंने साले की गुद्दी पकड़ ली और बोला- बहन के लंड, बाबूजी तू लेके चलेगा, भोसड़ी के मैं ले चलता हूँ तुजे साले, मैंने उसको रख के दिया एक उसकी आँखे घूम गयी , दो तीन खीच के दिए साले को और घसीट ते हुए लेके गया प्रिंसिपल के पास, स्टूडेंट्स जमा होने लगे, और भी स्टाफ मेम्बेर्स आ गए और पूछने लगे की क्या हुआ क्या हुआ

मैं- सर, ये बाबूजी इस स्टूडेंट का कार्ड नहीं बना के दे रहा और इसके साथ अश्लील हरकत करने की कोशिश कर रहा था

ये बात सुनते ही स्टूडेंट्स का पारा गरम हो गया और नारे बाज़ी करने लगे , कुछ लड़के बाबूजी को मारने को चढ़ गए, प्रिंसिपल भागते हुए आये और मामले को शांत करने का प्रयास करने लगे , मैंने मंजू को कह दिया की तू बोल दियो की बाबूजी ने तेरा हाथ पकड़ लिया अकेल्रे में

बाबूजी के सिट्टी –पिट्टी गम हो गयी प्रिंसिपल ने सबको अपने ऑफिस में बुलाया और मामले को रफा दफा करने का प्रयास करने लगे

मैं- नहीं सर ,अ अप पुलिस को बुलाओ इस बाबूजी को डालो जेल में

बात इज्ज़त की थी , प्रिंसिपल ने दुसरे बाबूजी को बुलाया और मंजू के कार्ड को तुरंत बनाने को कहा और उस घटिया बाबु को ससपेंड करने की और विभागीय जांच की बात कही , अपने को क्या लेना देना था मंजू का कार्ड बन गया अपना काम हो गया था तो आगे कुछ भी हो क्या फरक पड़ना था , करीब घंटे भर बाद मैं और मंजू घर चलने को थे , मैं साइकिल पर किताबो का घट्ठाद लाद रहा था , मंजू बोली- उसने कब मेरा हाथ पकड़ा था वैसे

मैं- तेरा कार्ड बन गया ना मोज कर

वो- हां , पर बदनामी तो हुई न कल को सब सोचेंगे की क्या पता ये लड़की हो ही ऐसी , कार्ड तो देर सवेर बन ही जाता

मैं- साला कोई भी तेरी तरफ ऊँगली भी कर दे न तो मेरे पास आ जाना तेरे को कहा ना मोज कर

वो- हो गयी मेरी मौज तो , दिमाग खराब हो गया है मेरा तो

मैं- घर चलते है वैसे ही आज बहुत लेट हो गया है

हम लोग साइकिल को घसीट ते हुए गाँव की तरफ चल पड़े, अक्सर हम कच्चे रस्ते से आते- जाते थे ताकि थोडा टाइम बच जाये पर आज साला दिन ही खराब था , ऊपर से थोड़ी देर बाद मंजू की साइकिल हो गयी पंक्चर , हुई मुसीबत , अब साला वापिस जाये पंक्चर लगवाने को तो और देर लग जानी थी तो मैं भी उसके साथ पैदल पैदल हो लिया गाँव की तरफ अजीब सी फीलिंग हो रही थी

मैं उस से बात करते हुए- मंजू एक बात कहनी थी

वो- तो कह दो

मैं- वो उस दिन मेरे घर पे जो हुआ, माफ़ कर देना मुझे

वो- तुम मेरी जगह होते तो माफ़ कर देते

मैं चुप रहा

वो- चल ठीक है मुह मत लटकाओ

मैं- तुमने उस लैटर का जवाब नहीं दिया

वो- क्या जवाब देना था

मैं- कुछ तो दे देती

वो- तुम्हारे सामने हूँ, तो अभी जवाब दे देती हूँ, लैटर की क्या जरुरत है

मैं- ना, तुम लैटर में ही दे देना

वो- क्यों, सामने हिम्मत नहीं होती है क्या, उस दिन तो हवस जाग रही थी

मैं- अब जाने भी दे उस बात को

वो- क्या जवाब दू, तुमको तुमने माफ़ी मांगी थी मैंने माफ़ किया बात ख़तम

मैं- बस ऐसे ही

वो- तो तुम क्या चाहते हो मुझसे , दोस्ती करना चाहते हो

मैं- तुम्हे क्या लगता है

वो- मेरे लगने ना लगने से क्या होता है आजकल सब को हर लड़की से बस एक ही ऊम्मीद होती है

मैं- क्या उम्मीद

वो- अब इतने भी नासमझ भी नहीं हो तुम देखो ये बाते है तो बहुत कुछ है और नहीं तो कुछ भी नहीं है , तुम्हारे और मेरे चाहने से क्या होता है कुछ भी नहीं , एक लड़की और एक लड़का जब बात चीत शुरू करते है तो बहुत परेशानिया होती है , चाहे कुछ भी भावनाए हो पर किसी को पता चल जाये तो फिर मुसीबत हो जाती है कोई समझता ही नहीं है , दोस्ती करो फिर प्यार हो जाता है फिर और परेशानिया हो जाती है साथ रहने को जी करे पर बंदिशे इतनी होती है की आदमी उलझ कर ही रह जाता है, खुद की नजरो में गिर जाए, घरवालो की नजरो में गिर जाये तुम बताओ तो क्या किया जाये

मैं- पर, मंजू मैंने तो कुछ कहा ही नहीं ऐसा

वो- जब तुमने मुझे किस किया था तो तुमने अपने इरादे बता दिए थे पर मंजू इतनी सस्ती नहीं है की कोई भी उसको इस्तेमाल कर जाये, हँसी- मजाक अपनी जगह होता है हर लड़की ऐसे ही किसी के नीचे नहीं लेट जाती

 


उसकी बात मेरे मन में उतर गयी थी बहुत गहरी , मुझे ऐसे लगा की जैसे किसी ने चाकू से काट दिया हो मुझे धीरे से , कितनी सरलता से उसने मुझे आइना दिखा दिया था ,

मैं- मंजू , तू एक बार मुझे आजमा तो ले

वो- तुम क्या कोई वादा हो जो किसी कसोटी पर परख लू

मैं- तो क्या तुम मेरी मित्रता के निवेदन को स्वीकार नहीं करोगी

वो- मैं सोच के बताउंगी, कुछ समय देना मुझे और चाहे मैं हां कहू या ना मेरे निर्णय का सम्मान करना

मैं- ठीक है

वो हल्का सा मुस्कुरा पड़ी

वो- वैसे, मैं पहले तुम्हे बस पढ़ाकू टाइप ही समझती थी पर तुम तो बड़े चालु हो

मैं- अब जो भी हूँ, जैसा भी हूँ बस ऐसा ही हूँ

वो- हां देखा मैंने

मैं- तो फिर कब दोगी

वो- क्या

मैं- जवाब और क्या

वो- कहा न थोडा वक़्त दो

मैं- वैसे उस दिन तुम्हे किस किया तो अच्छा लगा

वो- बेशरम, इंसान हो तुम एक नंबर के

मैं- बता भी दो न

वो- तुम्हारी मम्मी को शिकायत कर दूंगी

मैं- एक किस दे दो, फिर चाहे कितनी ही मार पड़ जाये

वो- कहो तो अभी कपडे उतार दू, तुम्हारे लिए घटिया सोच के प्राणी

मैं- चल ठीक है मजाक अपनी जगह तू अपनी जगह जाने दे , गाँव आने वाला है तेज तेज चल वैसे ही आज लेट में लेट हो गए है

मैं अपनी गली के मोड़ पर रुक गया मंजू अपनी गांड को हिलाती हुई आगे को बढ़ गयी घर के बाहर ही बिमला मिल गयी वो मुझे देख के हँसी, पर मैंने उसे अनदेखा कर दिया और घर में चला गया किताबो को टेबल पर रखा कपडे निकाले और कच्छे- बनियान में ही मैं खाट पर पसर गया , थोड़ी देर सुस्ताने के बाद मैं नीचे आया तो मम्मी बोली- कामचोर, आज लकड़ी काटने जाना था तो तुम जान के लेट आया है ना

मैं- एक नोकर रख लो आप लोग, और भी काम होते है मुझे, अब पढाई छोड़ दू और पिल जाऊ इस घर में ही

मम्मी- कितनी पढाई करते हो वो तो रिजल्ट बता ही देगा तुम्हारा ,

मैं- कल काट लाऊंगा काफी लकडिया फिर काफ़ी दिन की गई आज माफ़ी दो

हम बात कर ही रहे थे की चाची भी प्लाट में से आ गयी , और हमारी बातो में शामिल हो गयी

मैं- कुछ पैसे दे दो मुझे ,

वो- क्या करोगे

मैं- रेडियो के सेल लाने है

चाची- हां, तो ले आना कौन मन कर रहा है

मम्मी- इसको इतनी छुट मत दे, दिन दिन इसकी फरमाइश बढती ही जा रही है , वैसे परसों जो पचास का नोट लिया था उसका क्या किया

मैं जेब से वो नोट निकालते हूँ- ये रहा लो वापिस ले लो चैन आ जायेगा आपको जब देखो बस पीछे हो पड़े रहते है चैन नहीं लेने देंगे कभी

घर से निकल कर मैं मंजू के बाप की दूकान पर चला गया और वाही टाइम पास करने लगा एक साला पिस्ता का भाई ड्यूटी पता नहीं कब जायेगा ताकि वो फ्री हो और मेरे सुख के दिन आये मैं पिस्ता के बारे में सोच रहा ही था की तक़दीर देखो सामने से वो ही चलती हुई आ रही थी दुकान की तरफ , उसने बिना मेरी तरफ देखे अपना सामान लिया और मुड पड़ी मैं भी रस्ते सिर हो लिया पास से गुजरते हुए मैंने पुछा- कब मिलोगे सरकार

पिस्ता धीरे से बोली- नानी बीमार है ज्यादा, कल हम सब वाही जा रहे है देखो कब तक आना होगा

मैं सुनके तेजी से आगे चल पड़ा, एक और बुरी खबर बिमला से तो मुझे नफरत ही हो गई थी पर मेरा ही नुक्सान था हाथ से एक चूत जो निकल गयी थी पर मैंने सोच ही लिया था की उसकी तरफ तो अब नहीं जाना है तो करे क्या कहा से लाके दे लंड को जुगाड़ , रात के खाने के बाद चाचा ने फिर से खेत में जाने का प्रोग्राम बना लिया मैं मन में- हां, मुझे तो पता ही है की आप कहा पानी दोगे मुझे हँसी आ गयी

चाचा- क्या हुआ बिना बात के क्यों हस रहा है

मैं- वैसे ही

उन्होंने मुझे घूरा और चले गए हाथ में चादर, और बैटरी लेकर जैसे किसान नंबर वन का अवार्ड इनको ही मिलेगा मैं अपने कमरे में आ गया आज कुछ नोट्स बनाने थे तैयारिया करनी थी मैंने रेडियो चलाया काफ़ी दिनों बाद आज , इसको सुनकर भी बड़ा मस्त लगता था एक लगाव सा होता था उस से किताबो में मन जो लगाने की भरपूर कोशिश की पर हर पन्ने में मुझे बस रति का चेहरा नजर आये, उसकी यादे भी कभी दिन में नहीं आती थी बस रात को ही हमला करती थी मुझ पर

अब मैं दुनिया से तो भाग सकता था पर अपने आप से कहा जाता , वो एक हफ्ता जो रति के साथ जिया था मैंने वो भुलाये ना भूले मुझे करू तो क्या करू याद बहुत आये उसकी पर वो दूर इतनी की भागकर मिलने भी नहीं जा सकता ये मासूम का दिल मेरा और हज़ार मुश्किलें कापी में कहा तो मुझे नोट्स बनाने थे कहा मैं रति के बारे इ लिखने लगा, मेरा खुद पर तो कोई काबू था ही नहीं बस जी रहा था मैं तो खामखा में ही ११-१२-१-२-३ बज गए एक दो झपकी आई के न आई कुछ पता नहीं

चाची उठी पानी –पेशाब को मेरे कमरे में जलती लाइट, खुला दरवाजा देख कर वो अन्दर आ गयी मैं टेबल अपर ही सर रखे पड़ा था , उन्होंने वो कॉपी देखि और ले गयी अपने साथ , सुबह मैं उठा 7 बजे, अपनी हालात में गोर फ़रमाया तो पता चला की कॉपी कहा गयी इधर- उधर ढूँढा पर मिले कैसे कमरे में हो तो मिले, यार कोई देख ले तो समस्या हो जाये जाड़ा सा चढ़ गया मेरे को घनी गर्मी में , पता नहीं क्या सारी मुसीबतों को किसी ने मेरा ही पता बता दिया हो जैसे अपने दिमाग में थोड़ी टेंशन हो रही थी इसलिए बिना रोटी खाए ही शहर के लिए निकल लिए

नीनू आज भी ना आई थी मुझे उस पर बहुत गुस्सा आने लगा था वो होती तो उस से अपने मन की बात कर लेते पर चलो जैसा हमारा नसीब , जो है ठीक है एक दो टॉपिक थे जो क्लियर न हो रहे थे तो मास्टर को पकड़ लिया मैंने अब पढाई पे भी ध्यान देना बहुत जरुरी था , दोपहर हो गयी थी मेरी तीन क्लास और बची थी भूख लगी वो अलग इच्छा तो दो समोसे खाने की थी पर जेब में बस 5 का ही सिक्का था तो उस से चने खरीद लिए और उनको ही चबाने लगा

की मंजुबाला के दर्शन हुए, अपनी सहेलियों को छोड़कर वो मेरे पास आई और बोली- चने खा रहे हो

मैं- तुम भी खा लो

वो- ना क्लास है मेरी

मैं- कहा जाओगी इतना पढ़ कर,

वो- तुम कहा जाओगे

मैं- मैं कहा पढता हूँ

वो- मैं क्लास में जाती हूँ आधे घंटे बाद मुझे मिलना

मैं- ठीक है

 
मैं भी अपनी किताबे देखने लगा पर मेरा मन बार बार चाचा और बिमला की तरफ जा रहा था मैंने सोचा की क्या मुझे चाची को बता देना चाहिए , पर जब बात खुलेगी तो बिमला मुझे भी लपेट सकती थी क्योंकि मैं भी तो उस से आशिकी मार चूका था ,मैं हर बार सोचता था की माँ चुदाय दुनिया दारी मैं क्यों टेंशन लू पर घूम फिर कर बात वाही आ कर अटक जाती थी

उधेड़बुन में समय बीत गया मंजुबाला भी आ गयी और बोली- चल अब एक हफ्ते की तो टेंशन हटी

मैं- क्या हुआ

वो- तुझे ना पता के

- क्या

वो- कल से वार्षिक- उत्सव शुरू हो रहा है तो काफ़ी कार्यक्रम होंगे एक हफ्ते पढाई तो होगी ना तो मैं तो आने से रही

मैं- मैं भी ना आऊंगा

मैं- मंजू तूने जवाब ना दिया

वो- किस बात का

मैं- वो जो उस दिन ............

वो- अच्छा अच्छा, तो देख बड़ी विकट समस्या है की तुम्हे क्या जवाब दू,

मैं- समस्या क्या होनी है या तो हां या न बस इतनी तो बात है

वो- इतनी बात होती तो बता ही देती तेरे से

मैं- तो कैसी बात है

वो- देख तू मुझे अच्छा तो लगता है पर तू विश्वास लायक नहीं है

मैं- कैसे

वो- तेरा पहले से ही पिस्ता से चक्कर चल रहाहै और तू मुझे भी फ़साना चाहता है क्या पता और कोई लड़की भी सेट हो तेरे से बता फिर कैसे फीलिंग आएगी

मैं- तू के कसम बनावेगी मने

वो- ना जी ना, पर थम तो मेरे से लुगाई सुख की उम्मीद लगाये हो

मैं- तो मन कर दे ख़तम कर बात को तू अपने रस्ते मैं अपने रस्ते

वो- यार बात ख़तम भी तो न हो रही, जब जब अकेली होऊ हूँ तो तेरा ख्याल आता है

मैं- तो हां कर दे

वो- कर दूंगी, पर तू वादा कर तू मेरे सिवा किसी और लड़की को न देखेगा, खासकर उस पिस्ता को

मैं- मैंने तो सुना था की दोस्ती में शर्ते नहीं होती

वो- मेरे से दोस्ती करनी है तो मेरी बात मान ले

मैं- तो मेरा जवाब सुन , की ठीक है मुझे तुझसे और सबसे उस चीज़ की आस है पर कही ना कही मेरे अन्दर ज़मीर भी है , तुझ से दोस्ती के लिए मैं पिस्ता को छोड़ दू, वो न हो पायेगा वो लाख ख़राब है हज़ार ऐब है उसमे पर दोस्त है वो मेरी , और जो सच्ची दोस्ती होती है ना वो कभी रिश्तो को तोलती नही है , मंजू बेशक मैं लम्पट टाइप हूँ पर दिल बहुत साफ़ है सोने सा खरा तेरा शुक्रिया जो तूने मुझे इस असमंजस से निकाल दिया

मैंने अपनी साइकिल उठाई और घर आ गया आते ही मैंने कपडे बदले और जंगल में चला गया सीधा आज लकडिया काटनी थी मुझे मेरे साथ चाची भी आई हुई थी मैं फटाफट से लकडियो को मचका रहा था वो इकठ्ठा कर रही थी दो जने होने से थोडा टाइम की बचत हो जानी थी और तो क्या था चाची ने आज हलकी नीली साड़ी पहनी हुई थी एक दम पटाखा लग रही थी मैं पेड़ पर चढ़ा हुआ था वो नीचे थी तो उनकी चूचियो का भरपूर दर्शन हो रहा था मुझे मेरा लंड बार बार परेशान कर रहा था मुझे

चाची- थोड़ी फ़ालतू लकडिया काट लेटे है कुछ साइकिल पर ले चलेंगे और कुछ मैं सर पर

मैं- जैसी आपकी मर्ज़ी

मैं तेजी से लकड़ी काट रहा था शाम हो गयी थी वैसे ही अभी करीब आधा पोना घंटा और लग ही जाना था मैं जो डाली काट रहा था वो थोड़ी भारी सी थी मैंने चाची से कहा की आप थोडा दूर हो जाओ पता नहीं किस तरफ को गिरेगी , वो हट गयी और नीचे से छड़ियो को सलीके से लगाने लगी वो एक भारी लकड़ी को उठा रही थी की पास से एक दम से एक खरगोश निकल भगा चाची एक दम से थोडा सा डर गयी और उनका बैलेंस बिगड़ गया वो छड़ियो पर गिर गयी

“”आह, रे मरी रे आह रे “

वो चिल्लाई तो मेरा ध्यान उन पर गया मैं तेजी से नीचे उतरा और भगा उनकी तरफ चाची पीठ के बल छड़ियो पर गिरी पड़ी थी उनकी कोहनी कांटो से बुरी तरह चिल गयी थी, बदन में काफ़ी जगह कांटे चुभ गए थे आँखों से उनकी आंसू टपकने लगी मैंने जल्दी स उनको उठाया उनके पैर के तलवे में एक बड़ा सा काँटा पार हो गया था मैंने तुरंत उसको निकाला चाची की सुबकिया चालू होने लगी थी मैंने उनके काफ़ी कांटे निकाले पेट पर भी झार्रात लगी थी वो खड़ी थी

मैं उनके टांगो को देखने लगा जहा जहा कांटे थे निकालने लगा कमबख्त उस छड़ी में कांटे भी बहुत थे मेरे हाथ धीरे धीरे से ऊपर आते जा रहे थे उनकी मांसल जांघो को हलके से सहला रहा था मैं काँटों को ढूंढ रहा था इसी कोशिश में मेरे हाथ उनके कुलहो पर पहूँच गए थे, अब सिचुएशन कोई भी हो हम पर किसका जोर , मैं उनकी गांड को दबाने लगा तो चाची सिसक पड़ी, वहा पर भी चार पांच कांटे थे मैंने वो भी निकाले एक को खीच रहा था तो चाची को तेज दर्द हुआ , कांटे की नोक गांड में धंसी पड़ी थी “आह, आराम से ”

काँटों के बहाने से मैंने दो तीन बार और उनकी गांड को मसला मेरा लंड तो खड़ा ही रहता था एक बार और प्यार से मैंने गांड पर हाथ फेरा और फिर बोला- हो गया , और कही है तो बताओ

चाची ने अपने पैर को बढ़ाया पर उसमे से खून निकल रहा था उनको बहुत दर्द हो रहा था मैंने थोड़ी सी मिटटी वहा पर लगायी ताकि खून बंद हो जाये, ये देसी कीकर के कांटे भी बहुत तकलीफ पहूँचाते है , चाची वाही जमीं पर बैठ गयी मैं समझ गया की वो चल तो ना पाएंगी मैंने सोचा पहले इनको घर छोड़ के आऊंगा फिर लकड़ी ले जाऊंगा , मैंने उनको जैसे तैसे करके साइकिल पे बिठाया और घर को चल पड़ा गाँव के अड्डे पर ही चाची के पाँव में पट्टी करवाई और दवाई भी ली

चाची को घर छोड़ कर मैं वापिस आया अब लकडिया ज्यादा थी तो मुझे तीन चक्कर लगाने पड़े इन सब में थकन बहुत हो गयी मुझे पर काम तो करना ही पड़े, ना करे तो किसको कहे, घर आया तो मम्मी चाची के पास ही बैठी थी मैंने कहा अब ठीक हो तो वो बोली- हां, थोडा दर्द हो रहा है

मैं- दवाई ले लो ठीक हो जायेगा

चाची को दर्द में कराहते हुए देख कर मेरे गले से रोटी ना उतरी उस शाम , चाचा ने चाची को डांटा की थोडा ध्यान से काम करना चाहिए, आजकल उनके रवैये में बहुत परिवर्तन हो गया था , मुझे उनकी बात सुनकर गुस्सा आया जिसे मैंने बहुत मुस्किल से रोका , मैं और मम्मी चाची के कमरे में बैठे थे तो मम्मी बोले तेरे चाचा तो खेत में गए तू मेरा बिस्तर इधर ही कर दे मैं सो जाती हूँ तेरी चाची के पास रात को इसे मेरी जरुरत पड़ेगी

मैं- आप तकलीफ ना करो मेरा कमरा भी तो इधर ही है मैं खाट इधर बिछा लूँगा वैसे भी मुझे कुछ नोट्स बनाने है तो सोना तो है नहीं

मम्मी थोड़ी देर बाद नीचे चली गयी , मैं सोचने लगा की परायी चूत के चक्कर में इंसान कितना बदल जाता है थोड़े दिन पहले चाची कितनी प्राण प्यारी लगती थी चाची उनको और बिमला तो सुन्दरता में चाची के आगे कही नहीं ठहरती थी पर चूत का चक्कर ही ऐसा होता है, क्या करे दवाई के असर से चाचि की आँख लग गयी मैं उनके चेहरे को देखने लगा वैसे थी वो माल एक नंबर का मेरा लंड खड़ा होने लगा उनके बारे में सोच ते सोचते पर मैंने अपने दिल से इन बुरे ख्यालो को दूर किया

 


सोचने लगा की जब चाची को पता चलेगा की चाचा और बिमला में अवैध संबध है तो क्या होगा , बार बार मुझे ये सवाल बहुत परेशान करता था उस रात मैंने सोचा की मैं चाचा से बात करूँगा कल के कल और फिर भी बात न बनी तो बिमला को लाइन पे लाना होगा ये एक बहुत ही विकट समस्या थी जिसका समाधान इतना भी आसन नहीं था अपने को पहले चाहिए था सबूत ताकि वो लोग ऐन टाइम पर मना ना कर सके की हम तो जी पाक साफ़ है

अगले दिन सब लोग अपने अपने काम धंधे पर चले गए चाची अन्दर आराम कर रही थी मम्मी को कुछ काम था तो वो पिताजी के साथ शहर चली गयी थी मैं बिमला के घर गया और जाते ही उसको अपनी बाहों में भर लिया और चूमने लगा पर उसने मुझे परे कर दिया और बोली- हटो, अभी नहीं मुझे बहुत काम है

उसकी आँखे थोड़ी सूजी सूजी लग रही थी अब पूरी रात जो गांड मरवाए तो नींद कहा से पूरी हो

मैं- भाभी कितने दिन हुए आज करने दो

वो- कहा न अभी नहीं

बिमला से मुझे इतने कठोर व्यवहार की उम्मीद थी नहीं और मैं तो वैसे भी उसको जांच रहा था मैं अपने घर आ गया और बहार चबूतरे पर बैठ गया बिमला ने अपना किवाड़ बंद कर लिया मैंने सोचा साली एक बार सबूत का जुगाड़ कर लू फिर तेरी गांड तो ऐसी तोडूंगा याद रखेगी बस समय की बात है मैंने सोचा की कपडे ही धो लू तो मैंने चबूतरे पर लग गया मैं कपडे धो रहा था की मंजू दिखी सामने से आते हुए , मैंने कपड़ो पे ध्यान दिया मैं उसको नहीं देखना चाहता था

पर वो तो आई ही थी मेरे पास

मंजू- बात करनी है तुझसे

मैं- उस दिन कर तो ली थी

वो- तू तो मेरी बात का बुरा मान गया

मैं- ना बुरा किस लिए मान ना, तू अपनी जगह सही मैं अपनी जगह सही

वो- देख सच में कुछ बात करनी है

मैं- तो कर ले किसने रोका है

वो- यहाँ नहीं खुले में

मैं- अन्दर आ जा

चाची ऊपर थी तो मैं उसको मम्मी पापा के कमरे में ले आया और बोला= बता के कहना है

वो- मुझे तेरी दोस्ती मंजूर है

मैं- देख ले फिर शर्त लगाती फिरे गी

वो- ना वो तोमैं तुझे देख रही थी

मैं- देख लिया या कसर है

वो- अब कितनी शर्मिंदा करेगा

मैं- मंजू, देख ले सोच ले समझ ले , कल तो तू कहेगी ये मत कर वो मत कर वो मुझ से ना होगा

वो- सब सोच के तेरे पास आई हूँ

मैं – ठीक है फिर अब किस करू

वो-ना कोई आ जायेगा

मैं- आने दे फिर

वो- मैं अब चलती हूँ पर जल्दी ही मिलूंगी तुझसे

वो चलने को हुई तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और मंजू को बिस्तर पर गिरा दिया और चढ़ गया उसके ऊपर

वो- जाने देना

मैं- थोड़ी देर तो रुक जा

मैंने मंजू के होंठो को अपने होंठो मेंदबा दिया थोड़ी ना नुकुर के बाद वो मेरा साथ देने लगी काफ़ी दिन बाद मोका मिला था तो मुझसे कण्ट्रोल नहीं हो रहा था किस के बाद मैं उसकी छातियो को मसलने लगा मंजू गरम होने लगी मैंने उसकी सलवार के नाड़े में अपनी उंगलिया फसाईं तो उसने मुझे रोक दिया और बोली-अभी नहीं फिर कभी

मैंने उसकी चूत को कस के मसला और फिर उसको जाने दिया मन तो नहीं था पर क्या कर सकते थे

मैं- कब मिलोगे

वो- बता दूंगी मैंने फिर से उसको किस किआ वो शरमाते हुए भाग गयी

थोड़ी देर बाद चाची नीचे आ गयी और बोली- कोई आया था क्या

मैं- नहीं तो

वो- कुछ आवाजे आ रही थी

मैं- नहीं तो , मैं तो कपडे धो रहा था बस पानी पीने आया था

चाची- तेरी कॉपी मैंने वापिस रख दी है

मैं- आपको बिना पूछे दुसरे की चीज़ नहीं लेनी चाहिए

वो- तू दूसरा थोड़ी न है , वैसे नाम अच्छा है तेरी गर्लफ्रेंड का रति

मैं- वो मेरी गर्लफ्रेंड नहीं है, वो मेरी कोई नहीं है कुछ नहीं लगती मेरी

चाची- झगडा हुआ क्या उस से

मैं- नहीं तो उस से और झगडा कभी नहीं

तो- मानते क्यों नहीं

मैं- कुछ बाते मानी नहीं जाती है

वो- दो लगाऊंगी तो सारा दर्शनशास्त्र बाहर निकल आएगा

मैं- छोड़ो, इस बात को वो कौन है क्या लगती है मेरी ये बात ऐसी है की आप समझ नहीं पाओगे मैं बता नहीं पाउँगा

वैसे आपको आराम करना चाहिए

वो- मैं ठीक हूँ अब ,चल अब बता रति के बारे में मेरा भी थोडा टाइम पास हो जायगा

मैं- वो कोई टाइम पास करने की चीज़ नहीं है वो बस एक अहसास है और मैं कुछ नहीं बताने वाला क्योंकि कुछ राज़ राज़ ही ठीक रहते है

वो- तो फिर ठीक है आने दे जीजी को , आज तेरे सारे राज़ वो ही उगाल्वएँगी

मैं- बस आप धमकी ही देते रहा करो कुछ भी पूछ लो पर रति के बारे में मत पूछो बस इतना ही कह सकता हूँ की किसी इबादत जैसे है मेरे लिए

वो- बेटा, तू कुनबे का नाम रोशन करेगा एक दिन

मैं- चाची, मैं आपसे एक वादा करता हूँ,की जिस दिन वाकाफ़ी में मेरे पास कुछ होगा ना मैं आपसे नहीं छिपाऊंगा आप मेरे लिए चाची कम दोस्त ज्यादा है , पर रति का नाम फिर से कभी अपनी जुबान पर ना लाना

वो हसने लगी मैं वापिस कपडे धोने लगा

५-६ दिन ऐसे ही गुजर गए चाचा बीच में बस एक दिन घर रहे थे बाकी फुल टाइम बिमला की चुदाई चालु थी बीच में मैंने एक बार फिर से बिमला को ट्राई किया था पर बंदी ने साफ़ मना कर दिया की आजकल उसे बहुत काम रहता है मैं समझ गया की उसका काम चाचा से चल रहा है तो वो मुझे घास क्यों डालेगी चलो कोई ना मैं हर मुमकिन कोशिश कर रहा था की कैसे उनके खिलाफ सबूत इकट्ठा करू पर किस्मत साथ नहीं दे रही थी , उस दोपहर को जब मैं खेत से घर आ रहा था तो मंजू खुद से दरवाजे पर खड़ी थी गली सुनसान पड़ी थी उसने मुझे इशारा किया तो मैं झट से घर में घुस गया

मंजू की साँसे बड़ी तेज चल रही थी मैंने पुछा- कोई नहीं है क्या

वो- नहीं है तभी तो तुमको बुलाया

मैं- कहा गए-

वो- बाबा दिल्ली गए है माँ भी

मैं- तेरा भाई

वो- दूकान पे है रात ही आएगा

मैं- तो क्या इरादा है

वो- तुझे ना पता क्या

मैंने उसकी कमर में हाथ डाला और उसको किस करने लगा मंजू की चूत आज मिलने वाली थी मंजू बोली- यहाँ नहीं पीछे चल गोदाम में

 


हम दोनों वहा पर आ गए , काफ़ी देर तक उसको चूमने के बाद मैंने उसके कपडे उतारने शुरू किया जल्दी ही वो ब्रा- कच्छी में थी उफ्फ्फ साली ग़दर पीस थी मंजू तो मैंने उसकी ब्रा को खोल दिया और चूची को दबाने लगा मंजू की गरम साँसे उबलने लगी , उसकी ३२” की चूचिया बहुत ही नरम थी धीरे से मैंने उसकी कच्छी को भी उतार दिया वो अपने हाथो से अपनी चूत को छुपाने लगी मैं भी नंगा हो गया मेरे लंड को देख कर वो बोली- बहुत मोटा है ये तो

मैं- तभी तो तुझे मजा आएगा मैंने मंजू को बोरी पर लिटा दिया और उसके अंग अंग को चूमने लगा मंजू अपनी आहो को रोकने की कोशिश करने लगी पर आज कहा उसकी आहे रुकने वाली थी आज तो आग लगने वाली थी उसके गोदाम में, मैंने उसकी चूत को जो चूमना शुरू किया मंजू की हालात पतली हो हो गयी उसके जबड़े भींच गए आँखे बंद होने लगी “ओह!मंजू क्या गरम चूत है तेरी” मेरी जीभ उसकी चूत के खट्टे पानी को पीकर तृप्त होने लगी मंजू अपनी टांगो को लगातार पटक रही थी मैं काफ़ी दिनों बाद आज चूत के रस को चख रहा था

मंजू-जल्दी से करलो ना

मैं- क्या हुआ

वो- आह कही कोई आ ना जाये

मैं ठीक है

मैंने लंड पर थूक लगाकर उसको अच्छे से चिकना किया और उसकी चूत की फानको पर रगड़ने लगा मंजू आहे भरने लगी , गीली चूत चिकना लंड मेरे पहले धक्के में ही आधा लंड उसकी चूत में चला गया मंजू ने एक आह सी भरी उसकी टाँगे खुलती चली गयी मैं समझ गया की ये भी सील्पैक ना मिली पपर ज्यादा ध्यान चूत मारने में था मैंने दो तीन झटके मार कर लंड को पूरा ठेल दिया अन्दर तक

मंजू- आह कितना मोटा है तुम्हारा , दर्द होने लगा है चीर ही डाला तुमने तो

मैं- बस अभी सेट हो जायेगा

मैं मंजू के ऊपर लेट गया वो मेरे बोझ से दबने लगी मैं थोड़ी देर बाद लंड को आगे पीछे करने लगा चूत में चिकनाई की कोई कमी नहीं थी तो जल्दी ही मंजू भी चुदाई का लुत्फ़ उठाने लगी उसने खुद अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए उसकी टांगो से रगड़ खाते हुए मैं उसको चोदने लगा उसका बदन हल्का हल्का सा कांप रहा था उसकी चूत में लंड मजे ले रहा था मैं काफ़ी दिन बाद चूत मार रहा था तो जोश भी ज्यादा चढ़ रहा था मंजू की टाँगे अपने आप ऊपर को होने लगी थी fuchcccccccc फुछ्ह्ह्हह्ह्ह्ह करते हुए चूत के पानी में सना हुआ मेरा लंड कोहराम मचाये हुए था

गोदाम में बहुत गर्मी थी पर चूत की गर्मी के आगे वो भी फीकी लग रही थी मैं मंजू के गले पर आये पसीने क चाट रहा था मंजू किसी नागिन की तरह बल खा रही थी aaahhhhhhhhhhhhh aahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh थोदाआआआआआआ धिरीईईईईईई धिरीईई आह मैं तूऊऊऊओ मरीईईईईईईईईईईईईईईईइ रीईईईईईईए अआः

aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa आः रे आह आह

करते हुए मंजू चुदाई के सागर में डुबकी पे डुबकी लगा रही थी मुझे साथ लिए लिए मैंने अब उसकी दोनों टांगो को अपने कंधो पर रखा और फिर से गप गप मंजू की लेने लगा जब जब मेरा लंड चूत में जाता मंजू की चूचिया हिलती पसीने में चूर हम दोनों अपने जिस्मो की आग को शांत करने में लगे हुए थे मंजू थोडा सा उठ सी गयी थी तो चूत और अच्छे तरीके से लंड पर कस गयी चुदाई में और मजा आने लगा हाय रे मंजू क्या मस्त माल है तू पहले क्यों नहीं चुदवा लिए तूने रीईईईईईईईईईईईए

मंजू के कुलहो को मजबूती से थामे हुए मैं अब तेजी से उसको चोदने लगा था मंजू की आँखे बंद हो गयी थी होठ कांप रहे थे चूत की फांके दो विपरीत कोनो पर अटकी पड़ी थी मंजू

की चूत से कामरस धीरे धीरे करके रिस रहा था मंजू-“ पैर दुखने लगे है , टाँगे नीचे कर दो ना आआहा ”

मैंने उसको नीचे किया और मंजू को थोड़ी से टेढ़ी कर दिया उसने अपनी टांग को ऊपर उठा लिया मैंने एक हाथ से उसकी चूची पकड़ी और अपने लंड को चूत के मुलायम दरवाजे लगा दिया मंजू ने अपने चुतद पीछे को कर लिए मैं उसके बोबे को मसलते हुए उसकी फिर से लेने लगा , मंजू मस्त होने लगी और मैं भी उसकी रसीली चूत को बड़े मजे से मैं चोद रहा रहा था uffffffffffffffff ये जिस्मो की गर्मी कितनी आग भरी होती है जिस्मो में कितना बुझाऊ मैं इसको ये बुझती ही नहीं

मंजू के कमर को कसके पकडे मैं ताबड़तोड़ लंड को चूत में घिस रहा था ,तभी मंजू ने एक गहरी ठंडी आह भरी और उसका बदन अकड गया उसका बदन धम्म से निढाल हो गया जैसे उसमे सांस ही ना बची हो मंजू स्खलित हो गयी थी वो लम्बी लम्बी सांस ले रही थी थोड़ी देर बाद वो धीमे से बोली- अब उठ भी जाओ ना

मैं- कैसे उठ जाऊ मेरा तो हुआ ही नहीं है

वो- नहीं हुआ है अभी तक ,मेरी तो जान निकलने आई है अब सहन नहीं हो रहा है

मैं- बीच ने मत छोड़ , बस कुछ देर कि तो बात है

मंजू की चूत जैसे सूख ही गयी पर मैं तो चोदुंगा ही जबतक मेरा काम ना हो, मंजू अपने पैर पटकने लगी अब कभी बालो को नोचे कभी अपने नाखूनों को मेरी पीठ पर रगड़े मंजू मेरे नीचे पड़ी पड़ी हुई बावरी पर उस दिन साला मुझे क्या हो गया था , मेरा पानी छुट ही न रहा था मंजू रोने को आई उसकी चूत में दर्द सा होने लगा था पर अपनी भी तो मज़बूरी थी ना, मंजू बोली- दो मिनट सांस तो लेने दे फिर कर लियो

मैंने लंड को बहार निकाल लिया और मंजू की चूची पीने लगा मैं फिर से उसको गरम करने की कोशिश करने लगा सुपुद सुपद करके मैं उसको अपनी गोदी में बिठाये हुए अपने लबो को उसकी चूचियो पर रगड़ने लगा जल्दी ही मंजू मेरे बालो में प्रेमपूर्वक हाथ फिराने लगी उसके बदन में फिर से वासना की तरंगे दोड़ने लगी थी , मैंने मंजू को घोड़ी बनाया और अपने मुह को उसके कुलहो में दे दिया

उसकी चूत मेरी जीभ को महसूस करते ही फिर से लपलपाने लगी , मंजू की गांड के छेद को अपनी ऊँगली से सहलाते हुए मैं उसकी रसीली चूत को पिए जा रहा था किसी मय के प्याले की तरह उसकी गांड में मैं अपनी ऊँगली घुसाने लगा तो मंजू आहे भरने लगी थोड़ी सी ऊँगली जो गांड में घुसी तो मंजू ने चुतड को भींच लिया और बोली वहा नहीं वहा नहीं उसकी चूत फिर से गीली हो गयी थी, तो मैंने उसे घोड़ी बनाये ही अपने लंड को चूत पर रख दिया और उसके कुलहो पर दोनों हाथ रख लिए और लगा दिया धक्का मंजू थोडा सा आगे को सरकी पर मैंने सरकने नहीं दिया

 
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