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Guest
वो-क्या हाल है
मैं-बस जी रहे है तुम बताओ
वो-तुम बिन तड़प रही हु
मैं-दोस्त की बहन हो ऐसी बाते ना किया करो तुम
वो-तुम समझते जो नहीं वो
वो उठकर मेरे पास आई और बोली-आखिर क्या कमी है जो मेरी तरफ देखते ही नहीं एक बार मेरे पास तो आओ जन्नत का दरवाजा खोल दूंगी
मैं-कहा ना ऐसी बाते मत किया कर
वो-तो कैसी बाते करू
मैं-मुझे नहीं पता
वो-दिल में आग तूने लगायी हुई है और बात कर रहा है ,सुन देख मुझे ऐसी वैसी मत जानियो वो तो दिल तुझपे आ गया है और तू नखरे कर रहा है
मैं-चल नाराज न हो आ बैठ पास मेरे देख मैंने कब कहा की तू ख़राब है पर तेरा भाई मेरा दोस्त है तो ठीक नहीं लगता
वो-तू टेंशन ना ले उसकी
मैं-देख ले सोच ले
वो-सोच लिया तू बोल तो सही
मैं-ठीक है तो फिर ये कहके मैंने उसका बोबा दबा दिया तो वो भी मुझसे छेड़छाड़ करने लगी की तभी मामा आ गए उन्होंने एक नजर मुझ पर डाली और अपने कमरे में चले गए रवीना के जाने के बाद मैं सो गया
दो चार दिन बाद की बात है की नाना और मामा में कुछ बात हो रही थी तो मैंने अपने कान लगा दिए ,दरअसल मामा नहीं चाहते थे की मैं उनके घर पे रहु,मेरे ऊपर बहुत खर्च हो रहा था हॉस्पिटल बिल्स दवाइया तो मैंने उसी टाइम बोल दिया की मेरा बाप मेरे लिए खूब पैसा छोड़के गया है आपको जरुरत नहीं है
पर नाना ने कहा की वो खुद कमाते है और अपनी बेटी की एक मात्र निशानी बोझ नहीं है उनपे पर मैं खुद्दार था मामा कीबाते तीर की तरह मेरे सीने में चुभ गयी थी ,मैंने उसी समय उसी हालात में घर छोड़ने का फैसला ले लिया पर मेरे नाना ने अपनी कसम देकर रोक लिया
तो मैंने भी कह दिया की मैं कच्चे छप्पर में रहूँगा इनकी शान इनको मुबारक ,उस पूरी रात मैं सोचता रहा वक़्त ने कितना बेबस कर दिया था मुझे अपनों में ही बेगाना जो हो गया था
वक्त गुजरने लगा था पैसो की कमी तो थी नहीं मुझे पर नाना का मान रखना भी जरुरी था अपने आप से जूझते हुए शायद ऐसे ही जीना था मुझे
पर इतना होंसला था की वक़्त के हर सितम को सेह ही लेना था और फिर क्या फरक पड़ना था था ,वहा था ही कौन जो मेरे बेजुबान आंसुओ की आवाज सुनता दिन अपनी रफ़्तार से कट रहे थे
हालात पहले से बहुत बेहतर हो गयी थी पसीने का दाम जो चुकाया था उस शाम मैं गन्ने के खेत किनारे बैठा था की तभी रवि की बहन आ निकली
हालात पहले से बहुत बेहतर हो गयी थी पसीने का दाम जो चुकाया था उस शाम मैं गन्ने के खेत किनारे बैठा था की तभी रवि की बहन आ निकली उसने मुझे देखा और मेरे पास आके बैठ गयी
मैं-तू इस टाइम इधर
वो-हाँ थोडा घूमने निकली थी
मैं-और बता
वो-क्या बताऊ बस तड़प रही हु तेरे करीब आने को और तू है की सब जानते हुए भी नासमझ बनता है
मैं- क्या करु अपनी भी मजबूरिया है
वो-मुझे कुछ पता नहीं, आज रात मैं तेरे पास आउंगी और इस बार मैं खाली हाथ नहीं जाने वाली
मैं-बड़ी आई आने वाली किसी को पता चलेगा तो
वो-वो मेरी मुश्किल है
मैं-मुझे क्या जो करना है कर
वो-पगले, तुझे ही तो करना है
कुछ देर बाद वो चली गयी मैं घर आया कपडे उतार के नहा ही रहा था की मैंने देखा मामा किसी से फ़ोन पे बात कर रहा था
मामा-नहीं नहीं अभी जल्दी मत करो सब्र करो वैसे भी अगर किसी को शक हुआ तो फिर बड़ी दिक्कत होगी मैं अपनी और से पूरी कोशिश कर रहा हु पिताजी ना होते तो अब तक काम निपट चूका होता तुम टेंशन ना लो मैं सब संभाल लूंगा
फिर उसने फ़ोन काट दिया पर मैंने जो भी बात सुनी थी उस से इतना तो अंदाजा हो गया था की कुछ तो गड़बड़ है पर क्या ये कैसे पता करू
खैर खाना खाकर लेटा ही था गाँव में वैसे भी लोग जल्दी सो जाते है बस मेरे जैसो को ही नींद नहीं आती है तो किसी के आने की आहाट हुई मैंने देखा तो रवि की बहन थी
मैं-रवीना तू यहाँ
वो-मैंने कहा था ना की आउंगी
मैं-पागल लड़की, किसी ने देख लिया तो गड़बड़ हो जायेगी
वो-किसी को कुछ पता नहीं चलेगा देख आज मेरी मनचाही करदे
मैं भी कई दिनों से प्यासा ही था तो मैंने सोचा की आज इसकी खुजली मिटा ही देता हु मैंने रवीना को अंदर लिया और अपनी बाहों में भर लिया तो वो मुझसे चिपक गयी मेरे दोनों हाथ अपने आप उसके नितम्बो पे पहुच गए मैं उनको दबाते हुए उसको चूमने लगा
वो भी खुलकर मेरा साथ दे रही थी एक बार जो लड़की के जिस्म का स्पर्श मिला मैं बेकाबू होने लगा बहुत देर तक उसके होंठ चूसे मैंने बस अब मैं उसको नंगी देखना चाहता था मैंने उसकी सलवार के नाड़े में उंगलिया फंसाई और उसकी गाँठ को खोल दिया
उसने खुद अपनी कुर्ती को उतारा उफ़ ब्रा-पेंटी में क्या गजब लग रही थी ब्रा को खोलते ही मैं उसकी चूचियो पे टूट पड़ा कई दिन हो गए थे ऐसी ठोस गेंदों से खेले हुए रवीना की छातियो को भीचते हुए मैं उसकेगोरे गालो को खाने लगा था
रवीना को आज मैं इस हद तक उयतेजित कर देना चाहता था की फिर वो सबकुछ भूल जाए इधर उसने भी मेरे कच्छे में हाथ डाल दिया और अपनी मनपसन्द चीज़ से खेलने लगी मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसके पेट पर हाथ फिराने लगा
वो तड़पने लगी जवानी की आग के शोले भड़कने लगे बड़े प्यार से मैंने उसके अंतिम वस्तर को भी उतार दिया पट्ठी पूरी तरह से तैयार होकर आई थी मेंन जगह पर एक बाल भी नहीं था एक दम सफाचट उसकी योनि पे जो हल्का सा गुलाबीपन था क्या मस्त लग रहा था
मैं भी बिस्तर पर चढ़ गया और अपने लण्ड को उसकी चूत पे रगड़ने लगा तो रवीना के बदन में मस्ती चढ़ने लगी ,मेरा सुपाड़ा उसकी चूत में घुसने को बेकरार हो रहा था मैंने भी दवाब डालना शुरू किया उसकी चूत पर बोझ पड़ने लगा दरार चौड़ी होने लगी
रवीना की टाँगे फैलने लगी उसकी आँखों में खुमारी बढ़ने लगी उसकी गीली चूत के रस से लिपटा मेरा सुपाड़ा धीरे से आगे को सरक रहा था और अबकी बार जो मैंने जोर लगाया वो चूत के छल्ले को फैलाते हुए आगे को सरक गया
रवीना की साँसे गहरी होने लगी थी पर उसके होंठो पे एक मुस्कान सी थीमैंने एक झटका और लगाया आधे से ज्यादा हिस्सा अंदर चला गया था मेरा बोझ रवीना पे पड़ने लगा था उसके चेहरे पे मिले जुले भाव आ रहे थे
ऐसे ही अगले कुछ पलो में उसने मेरे पुरे लण्ड को अपनी चूत में घोंट लिया था मैं बस उसपे पड़ा हुआ उसके होंठो का रस चाट रहा था वो अपने हाथो से मेरे कंधो को सहला रही थी मेरे किस्स का जवाब देते हुए
फिर उसने अपनी कोमल टांगो को मेरी कमर पर लपेट लिया और हमारी कार्यवाही शुरू हो गयी लण्ड अंदर सरकते ही मैं समझ गया था की इसने ज्यादा चुदाई नहीं करवाई है बड़ा टाइट माल थी मेरे धक्को पर नशा चढ़ता जा रहा था उसको हमारे होंठ जैसे चिपक ही गए थे
उसकी मस्ती भरी आहे मेरे मुह में ही घुल गयी रवीना भी निचे से धक्के लगा रही थी उसकी मारने में बहुत मजा आ रहा था वैसे भी कई दिनों बाद चूत का मजा मिल रहा था तो मैं इस लम्हे को अच्छे से फील करना चाह रहा था रवीना पूरी तरह से मस्ती में डूब गयी थी