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Romance दो कतरे आंसू

प्रदीप के मुंह से कांपती हुई आवाज निकली- ‘दीदी।’

‘बेटी।’ बाबूजी की आवाज भी कांप गई।

‘बाबूजी, भैया।’ सुषमा ने गम्भीरता से कहा, ‘मैं नहीं जानती कि वह कौन-सी शिकायत थी जिसने आपको और बाबूजी को मुझे बेसहारा छोड़ कर आने पर मजबूर कर दिया। मैंने अपनी जिम्मेदारी आज तक पूरी की थी। तुम्हें वहां तक ले आई जहां बाबूजी का बोझ मेरे कंधों से तुम्हारे कंधों पर चला गया।’

‘मगर तुम सिर्फ बाबूजी का बोझ लेकर चले आए। अपनी दीदी को छोड़कर उस दोराहे पर जहां तुम्हारी दीदी के अंदर दो द्रौपदियां पैदा हो गयी थीं। उनमें से एक सुषमा इतनी जहरीली बन गई थी, जिसकी फुंकार से भी समाज और सोसायटी में जहर फैल जाती, जहां लोग बड़े-बड़े दावे करते हैं। ऊंची-ऊंची डीगें हांकते हैं। लेकिन सच्चाई जब सामने आती है तो बाप भाई तक गर्ज पूरी हो जाने पर सुषमा को अकेला छोड़ जाते हैं।’

‘मगर जब मेरे क्रोध, झुंझलाहट का नशा उतरा तो मैंने सोचा कि अगर आज मैंने ऐसी सुषमा को जन्म दिया तो कल समाज में पता नहीं कितनी द्रौपदियां पैदा हो जाएंगी। मेरे जैसे द्रौपदियों को अपने खून से नफरत हो जाएगी। कोई सुषमा अपने बाप को नई जिंदगी नहीं देगी। अपने भाई की परवरिश नहीं करेगी।’

‘इसलिए मैंने पहली सुषमा को मार डाला और उस सुषमा को नया जन्म दिया जिसे देश और समाज में एक बाप और भाई की रक्षा की जरूरत होती है। आज मैं अपना सब-कुछ छोड़ आई हूं, अपना फ्लैट, बैंक बेलैंस।’

‘सारा ऐशो-आराम का सामान छोड़कर अपने बाप और भाई की रक्षा में आई हूं। कल तक मैंने अपनी जिम्मेदारी निभायी थी। अब तुम निभाओ। चाहे भूखा रखकर, चाहे दाल-चावल खिलाकर।’

प्रदीप धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसने झुककर सुषमा के पांव छुए और भर्राई हुई आवाज में कहा- ‘मुझे माफ कर दो दीदी, मैं मैं....।’

‘पप्पू- मेरे भैया!’

सुषमा ने प्रदीप को उठाकर गले लगाया। दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे और बाबूजी की आंखें भी भीगी हुई थी।

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सुषमा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने स्त्री की हुई साफ साड़ी पहन रखी थी। सिर पर आंचल बराबर कर लिया था। इस तरह कि उसका कुछ चेहरा भी छिपा रहे फिर भी उसे डर लग रहा था कि कहीं वे लोग उसे सुषमा वर्मा मॉडल गर्ल के रूप में न पहचान लें।

असल में कल ही रात प्रदीप ने आकर बड़ी खुशी-खुशी बताया था कि जिस दफ्तर में वह काम करता है, उस दफ्तर में एक अच्छी पगार पर काम करने वाला किसी गरीब मगर पढ़ी-लिखी लड़की से शादी करना चाहता है। किसी ने प्रदीप का नाम ले दिया। कृष्ण ने प्रदीप से बात की तो प्रदीप हक्का-बक्का रह गया। कृष्ण ने कहा कि मैंने जिंदगी में इतनी लड़कियां देखी हैं कि उसे खूबसूरती और बदसूरती की तमीज नहीं रह गई है। अब तो मैं खुद भी लड़की देखने की इच्छा नहीं रखता। मगर मेरे मां-बाप नहीं हैं। और लड़की के रिश्तेदार भी नहीं हैं इसलिए मेरे दोस्त की मां ही लड़की को देखने आएगी वह भी इसलिए कि लड़की कानी-भैंगी या लूली-लंगड़ी न हो और बस लड़की जरूर हो।

और आज कृष्ण के दोस्त की मां और बहन लड़की को देखने आ रहे थे। सुषमा का दिल बार-बार धड़क रहा था।

अचानक प्रदीप आया और सरगोशी में बोला, ‘आ गए वह लोग।’

‘सुषमा का दिल धक से रह गया।

‘बस, तुम जल्दी से मिठाई लेकर आ जाओ।’

सुषमा मिठाई की थाली लेकर बाहर आई तो एक छः साल की बच्ची और एक बूढ़ी औरत मौजूद थे। सुषमा ने इत्मीनान का सांस लिया, क्योंकि बूढ़ी औरत या बच्ची उसे मॉडल-गर्ल की हैसियत से क्या पहचानेंगी? उसने मिठाई रखी तो बच्ची खुश होकर बोली-

‘मम्मी! भाभी, तो सचमुच भैया से भी ज्यादा खूबसूरत हैं।’

‘बेटी, शादी के पहले भाभी नहीं कहते। बुरी बात है।’

‘मम्मी! कृष्ण भैया लोट-पोट हो जाएंगे भाभी को देखकर।’

औरत ने अपना चश्मा ठीक किया और सुषमा को पास बुलाकर कहा- ‘बैठ जाओ बेटी।’

सुषमा सिमटी-सिकुड़ी बैठ गई और बूढ़ी ने पूछा-

‘क्या पढ़ा है तूने?’

‘जी, बी. ए. किया है।’

‘घर का काम-काज तो कर लेती हो?’

‘जी, सब कर लेती हूं।’

‘भैयाजी।’ बूढ़ी ने बाबूजी से कहा, ‘हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि कृष्ण का मुकद्दर इतना तेज है। हमें तो लड़की बहुत पसन्द है।’

‘मगर हमारे पास देने-दिलाने को कुछ भी नहीं है।’

‘वह उसने सब-कुछ मेरे ऊपर छोड़ दिया है। आप शादी की तैयारी करें और मुहूर्त निकलवा लीजिए, कृष्ण को जरा जल्दी है।’

‘जी, मैं कल ही पुरोहित से मुहूर्त निकलवाऊंगा।

बाबूजी की आंखों में खुशी के आंसू नजर आ रहे थे और उधर सुषमा की दिल धक्-धक् कर रहा था। इसलिए नहीं कि कृष्ण से उसकी शादी होने वाली है। इसलिए कि उसने उसे सुषमा वर्मा मॉडल-गर्ल की हैसियत से पहचान लिया तो क्या होगा। मगर फिर उसने दिल-ही-दिल में फैसला कर लिया कि वह जिन्दगी का सबसे बड़ा झूठ बोलेगी कि वह मॉडल-गर्ल कभी नहीं थी। वह सारा जीवन यह झूठ बनाए रखेगी। जिस झूठ से किसी को नुकसान न हो, भगवान् भी उसे बनाए रखने में सहायता करता है। फिर वह निश्चिन्त हो गई।

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बारात के हंगामे ठण्डे हो चुके थे। शायद आखिरी बाराती भी चला गया था। सुषमा दुल्हन बनी एक कमरे में बैठी थी। यह कमरा कृष्ण के दोस्त का फ्लैट था। फिर कदमों की हल्की-हल्की आहट के साथ दरवाजा खुला। फिर सुषमा का दिल जैसे गले में आकर अटक गया। उसने घूंघट की ओट से देखा, कृष्ण चिटखनी बन्द कर रहा था।

सुषमा खड़ी हो गई। कृष्ण उसके नजदीक आया तो कदमों में झुक कर उसके पैर छुए और कृष्ण ने कन्धों से पकड़कर उसे उठाते हुए कहा-

‘तुम्हारी जगह कदमों में नहीं दिल में है।’ फिर कृष्ण ने उसे पलंग पर बिठाया और उसका घूंघट उठा दिया और आश्चर्यजनक आवाज निकली- ‘हाय! सुषमा वर्मा मॉडल गर्ल या नीला जैक्सन!’

सुषमा ने चौंककर गर्दन उठाई तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर एटम बम दे मारा हो। क्योंकि उसका दूल्हा कृष्ण तो दरअसल वह के. के. था, जिसके साथ रियाजुद्दीन बिल्डर्स के फ्लैट में वह नीला जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में एक रात गुजार चुकी थी।

सुषमा को ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे बहुत ऊंची पहाड़ी से नीचे लुढ़का दिया हो और वह किसी गहरी खाई की तरफ चली जा रही हो।

उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया, मगर सुषमा अब अपने ऊपर काबू पा चुकी थी। उसने कृष्ण को तेजी से मुड़कर बाहर की तरफ जाते हुए देखा तो वह दोनों हाथों को फैलाकर उसका रास्ता रोकी हुई बोली-

‘कहां जा रहे हैं, आप?’

‘मेरा रास्ता छोड़ दो, वरना मेरे हाथों तुम्हारा खून हो जाएगा।’ कृष्ण हांफता हुआ तेज-तेज बोला।

‘मगर मेरा दोष?’

‘दोष अरे बेगैरत, तुम्हें शर्म नहीं आती पूछते हुए। वह भी इतनी बेबाकी से।’

‘किसी पर इल्जाम लगाया जाए तो क्या वह अपना दोष नहीं पूछेगा?’

‘बकवास बन्द कर। तेरी मक्कारी और अदाकारी तेरी असलियत पर पर्दा नहीं डाल सकती।’

‘कौन-सी असलियत, आप खुलकर बात क्यों नहीं करते?’

‘मेरी जबान से ही सुनना चाहती है तो सुन ले- क्या तू वही वेश्या नहीं है जो रिजाजुद्दीन बिल्डर्स के फ्लैट में मेरे साथ एक रात गुजार चुकी है, पूरे पन्द्रह हजार रुपये में।’

‘हे भगवान्! सुषमा सीने पर हाथ रखकर पीछे हट गयी, ‘यह आप क्या कह रहे हैं।’

‘मक्कार औरत, वहां तू मुझे नीला जैक्सन बनकर मिली थी और फिर सुषमा वर्मा के नाम से बहुत मशहूर मॉडल गर्ल भी रही हो ।’

‘मैं नीला जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में आपके साथ रात गुजार चुकी हूं। फिर एक बहुत मशहूर मॉडल-गर्ल भी रही हूं?’

‘पब्लिसिटी फिल्मों की सबसे मशहूर और लोकप्रिय हीरोइन। और आप मुझे एक खोली से ब्याह कर लाए हैं। मेरे अपाहिज पिता और गरीब भाई के पास आपको दहेज तक देने के लिए पैसा नहीं था।’

‘वह सब नाटक भी तो हो सकता है।’

‘यह आपकी गलतफहमी भी तो हो सकती है। क्या इस धरती पर एक शक्ल की दो लड़कियां नहीं हो सकतीं?’

‘नहीं, मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं। नीला जैक्सन और तुम में जर्रा बराबर भी फर्क नहीं है।’

‘नाथ!’ सुषमा की आवाज भर्रा गई। उसने फर्श पर बैठकर कृष्ण के पांव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाकर कहा-

भगवान् के लिए मेरी बात मानिए, मैं वही नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं। जरूर आप किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं।’

‘हां, मैं गलतफहमी का शिकार तो हुआ हूं और वह भी तुम्हारे पिता और तुम्हारे भैया की शराफत देखकर।’

फिर सुषमा को बाजू से उठाया और बोला, ‘अब मेरा फैसला उन्हीं दोनों दगाबाजों के सामने होगा।’

सुषमा गिड़गिड़ाती हुई रह गई और कृष्ण उसे खींचता हुआ बाहर ले आया।

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रघुुनन्दन और प्रदीप उछल पड़े। दरवाजा तेजी से खुला था।

फिर कृष्ण सुषमा का बाजू पकड़े हुए अन्दर आया। उसने सुषमा को बाबूजी के पैरों के पास फेंकते हुए गुर्रा कर कहा, ‘सम्भालिए अपनी गन्दगी की पोटली, जो आपने धोखे से मेरे सिर पर रख दी। यह तो अच्छा हुआ उसकी बदबू फैलने से पहले ही मैं चौकन्ना हो गया।’

सुषमा सिसक रही थी। बाबूजी और प्रदीप के चेहरे फक्क पड़ गए।

‘मगर, मगर हुआ क्या?’

‘मुझसे पूछते हो।’ कृष्ण ने फुंकारकर कहा, ‘शर्म नहीं आई तुम्हें इतनी बड़ी मक्कारी करते हुए। एक वेश्या को मेरे सर पर थोप दिया।

‘नहीं-नहीं यह झूठ है।’ सुषमा रोती हुई गिड़गिड़ाई।

‘अगर यह झूठ है तो खा अपने बाबूजी की सौगन्ध, तुमने मिस नील जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में मेरे साथ रात नहीं गुजारी थी? और तुम सुषमा वर्मा बनकर मॉडल-गर्ल के रूप में पब्लिसिटी-फिल्मों में काम नहीं करती थी?’

‘बाबूजी की सौगन्ध। बाबूजी की सौगन्ध।’ सुषमा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके होंठों पर ताला डाल दिया हो। जिस बाबूजी को बचाने के लिए उसने कृष्ण के हाथों अपने आपको पन्द्रह हजार में बेचा था उसी बाबूजी की झूठी सौगन्ध वह कैसे खा सकती है- ‘नहीं नहीं, यह नहीं हो सकता।’

‘बस, खुल गई ना असलियत।’

‘कमीनी बेहया।’ बाबूजी ने कांपती आवाज में कहा, ‘तू हमारे मुंह पर कालिख पोतने से पहले मर क्यों न गई?’

फिर बाबूजी की एक बैसाखी सुषमा की पीठ पर पड़ी। वह हल्की-सी चीख के साथ गिर पड़ी। बाबूजी की बैसाखी पड़ती रही। सुषमा के शरीर पर चोटों के निशान बनते गए। प्रदीप ने उसे बचाया नहीं। सुषमा खामोशी से पिटती रही और बाबूजी की जुबान से गालियां निकलती रहीं।

मारते-मारते बाबूजी थक गए और फिर धम्म से बिस्तर पर बैठ गए, उनकी दोनों बैसाखियां गिर चुकी थीं। मार खाने के बाद सुषमा ने बड़ी शांति से बाबूजी की तरफ देखा, उसकी आंखों में अब न आंसू थे और न चेहरे पर कोई भाव। वह बड़ी गम्भीरता से बोली-

‘अपना फर्ज पूरा कर चुके, बाबूजी?’

बाबूजी ने हांफते हुए कहा, ‘चली जा यहां से। मेरी आंखों से दूर हो जा।’

‘जरूर चली जाऊंगी, आप अपना फर्ज पूरा कर चुके हैं, लेकिन मेरा फर्ज अभी बाकी है।’

‘क्या बकती है?’

‘हां बाबूजी, मेरा एक फर्ज अभी बाकी रह गया है, यह बताना कि बेटी का भविष्य बाप के अपने व्यवहार पर निर्भर करता है।’

‘मैंने तुझसे कहा था कि तू वेश्या बन जा?’

‘जी नहीं, मगर फिर भी एक बाप को यह विश्वास होना चाहिए कि लड़की की जात स्वयं उसकी अपनी इज्जत के लिए नाजुक शीशा होती है। जब उनके मुकद्दर में एक शीशा आ जाए तो उसे सम्भाल कर रखना उनका अपना कर्त्तव्य होता है। आपने बड़ी दीदी और मंझली दीदी की शादी के लिए, उनके दहेज के लिए बीस हजार की बड़ी रकम के लिए मैनेजर के सामने हाथ फैलाए। उसने पहले घर आकर खाना खाया। यह देखा कि अगर आपको बीस हजार दिलवाता है तो उसके बदले में उसे क्या लाभ होगा।

‘यहां खाना खाकर उसने मुझे देखा। और बीस हजार के बदले उसने आपसे कहा था कि चेक लेने आप मुझे उसके पास भेजें।’

‘सुषमा।’ बाबूजी की आवाज कांप गई।

‘आपको याद है बाबूजी, उस रोज मैंने कितनी बार आपसे कहा था कि मैं मैनेजर के पास नहीं जाऊंगी लेकिन आपकी कल्पना में केवल आपकी दो लड़कियों के लग्न-मण्डप घूम रहे थे। आपने यह नहीं सोचा कि आप मैनेजर के पास मुझे भेज रहे हैं तो मैं भी तो आपकी बेटी हूं। आपने यह भी नहीं सोचा कि आखिर मैनेजर ने सिर्फ मुझे ही चेक लेने के लिए क्यों बुलाया है? उसने चेक आपको क्यों नहीं दे दिया? इसलिए कि वह आपसे बीस हजार का बदला चाहता था। उसके बदले उसने आपकी बेटी की इज्जत लूट ली। आपकी बेटी के पास कुछ नहीं बचा। तब उसने बजाए मौत की गोद में जाने के, अपने अपाहिज बाप की देखभाल के लिए, अपने भाई के भविष्य के लिए, कृष्ण के साथ अपने शरीर का पहला और आखिरी सौदा किया।’

बाबूजी कुछ न बोले। उनके शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी और फटी-फटी आंखों के कोनों पर आंसुओं की दो बूंदें जमी हुई थीं।

17

सुषमा ने कुछ देर ठहरकर सिसकी ली और फिर बाबूजी की ओर मुड़कर भर्राई हुई आवाज में बोली-

“बाबूजी, अगर आपके मन में न्याय है तो मुझे बताइए, क्या मैं सचमुच पापी हूं?”

अचानक वह रघुनन्दन का चेहरा ध्यान से देखकर चौंक पड़ी और जल्दी से आगे बढ़कर उसने उनके घुटने पकड़कर कंपकंपाती आवाज में पुकारा- “बाबूजी!”

और रघुनन्दन की गर्दन एक ओर ढलक गई। सुषमा हड़बड़ाकर पीछे हटती हुई कानों पर दोनों हाथ रखकर पागलों की तरह चिल्लाई-

“बाबूजी!”

प्रदीप हड़बड़ाकर बाबूजी की ओर झपटा और उन्हें टटोलता हुआ बोला- “बाबूजी-! बाबूजी-!”

लेकिन रघुनन्दन की आत्मा उनका शरीर त्याग कर अनन्त में लीन हो चुकी थी।

प्रदीप बाबूजी के घुटनों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। और सुषमा आंखें फाड़े किसी पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी रही।

धीरे-धीरे प्रदीप की सिसकियां कम हुईं। वह सीधा खड़ा हुआ और उसके चेहरे पर गहरा तूफान मचलता दिखाई देने लगा। उसने सुषमा की ओर मुड़कर मुट्ठियां भींचकर कंपकंपाती आवाज में कहा-

‘चैन मिल गया तुम्हारे मन को अब तो?”

“प्रदीप भैया-!” सुषमा कांप उठी।

“मत कहो मुझे अपनी गन्दी जबान से भैया। तुम बहन और बेटी के नाम पर एक कलंक हो। यह ठीक है कि बाबूजी ने तुम्हें प्रेम के पास चेक लेने के लिए भेजकर भूल की थी। प्रेम ने उनकी भूल का अनुचित लाभ उठाया। तुमने उसे मार डाला। उसकी मृत्यु के बाद तुम्हारा पाप धुल गया था। क्योंकि उस पाप में तुम्हारी मर्जी शामिल नहीं थी। लेकिन‒

“लेकिन बाबूजी के इलाज के लिए तुमने जानबूझकर खुद को कृष्ण के हाथों बेचा। और वह भी एक अड्डे पर जाकर। क्या जरूरत थी तुम्हें ऐसा करने की? ज्यादा-से-ज्यादा बाबूजी मर ही तो जाते। आज भी तो मर गए। अगर तब मर गए होते तो आज अपने दिल में यह सदमा लेकर न मरते कि उनकी बेटी ने किस तरह उनके चेहरे पर कालिख पोती है। किस तरह उनके खानदान को कलंक लगाया है! जिस दफ्तर में मैं काम करता हूं उसी मैं कृष्ण भी काम करता है। क्या वह लोगों को बतायेगा नहीं कि एक इज्जतदार कहलाने वाले भाई-बहन कैसे हैं? क्या मुंह लेकर जाऊंगा मैं उस दफ्तर में? किस किस की व्यंग-भरी मुस्कराहटों पर सामना करूंगा?”

“सुषमा, तुम हमारे परिवार पर एक अभिशाप बनकर पैदा हुई हो। तुमने मुझे पढ़ाकर कोई अहसान नहीं किया। क्योंकि तुम्हारी उस डिग्री से अब मुझे गन्दगी की बू महसूस होती है। तुम इसलिए मॉडल गर्ल बनी थीं कि कारों में घूम सको, जी भरकर ऐश कर सको। तुम पूरे परिवार के माथे पर कलंक हो। तुम बाबूजी की खूनी हो। अच्छा होता कि अपने बाप के सामने अपनी गन्दी जबान खोलने से पहले तुम मर गई होतीं। तुम जैसी बेगैरत, बेशर्म, वेश्या को जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”

सुषमा की आंखें फटी हुई थीं। सांसें तेज-तेज चल रही थीं। उसने बड़बड़ाने के अंदाज में कहा-

“हां, तुम ठीक कहते हो प्रदीप मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं। मुझे मर ही जाना चाहिए- मुझे मर ही जाना चाहिए।”

फिर वह धीरे-से आगे बढ़ी और बाबूजी के पैर छूने के लिए झुकी तो अचानक प्रदीप झपटकर बीच में आ गया और घृणा भरे स्वर में बोला- “मत छुओ अपने अपवित्र हाथों से बाबूजी के चरण। मरने के बाद तो उनकी आत्मा को चैन लेने दो।”

सुषमा सिसक कर पीछे हटी और फिर रोती हुई दौड़कर कमरे से निकल गई। वह दौड़ी चली जा रही थी और उसके कानों में प्रदीप के वाक्य गूंज रहे थे-

“तुम बाबूजी की खूनी हो।”

“तुम्हें जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”

“तुम्हें मर जाना चाहिए।”

“हां, सचमुच मुझे मर ही जाना चाहिए।”

‘तुम्हें जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”

“शायद यही दुनिया की रीत है।”

“इस दुनिया में जो दूसरों को जिन्दा रहने का अधिकार देते हैं, लोग उसी से जिन्दा रहने का अधिकार छीन लेते हैं।”

“मैंने अपनी बहनों का घर बसाने के लिए अपनी आबरू की बलि दे दी। आज वे लोग खुश हैं। लेकिन मुझसे घृणा करती हैं। वे बहनें जिनके लिए मैंने अपना पहला और अन्तिम प्यार लुटा दिया।”

“मैंने बाबूजी को जिन्दा रखने के लिए खुद को बेचा।”

“आज प्रदीप कहता है कि मैं उनकी खूनी हूं।”

“मैंने अपना सुख-चैन त्यागकर प्रदीप को पढ़ाया।”

“आज जिस डिग्री से वह रोजी कमाता है उसमें उसे गन्दगी की बू महसूस होती है।”

“और मेरा भाई मुझे वेश्या कहता है।”

‘सचमुच मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”

“मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”

रोते-रोते वह एक ऊंची चट्टान पर चढ़ती चली गई। और फिर उसने चट्टान से टकराती हुई समुद्र की बिफरी हुई लहरों में छलांग लगा दी। उसका बदन एक चट्टान से टकराया और फिर लहरों पर हिचकोले लेने लगा।

और फिर धीरे-धीरे उसकी आंखों में फैला हुआ अंधेरा गहरा होता चला गया।

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सुषमा ने अपने पपोंटों पर रोशनी के झमाके महसूस किए। फिर अचानक उसकी आंखें खुल गई। वह कुछ पल पलकें झपकाती रही। धीरे-धीरे उसके मस्तिष्क में बीती हुई घटनाओं की याद ताजा होती चली गई और दूसरे ही पल वह हड़बड़ाकर उठकर बैठ गई। उसे याद था कि उसने समुद्र में छलांग लगाई थी। आत्महत्या करने के लिए। लेकिन-लेकिन वह यहां कैसे पहुंच गई? उसने इधर-उधर देखा। वह एक छोटी-सी खोली थी जिसमें बहुत ही थोड़ा-सा सामान रखा था।

सुषमा की समझ में अभी कुछ नहीं आया था कि अचानक खोली का दरवाजा खुला और दूसरे पल सुषमा को ऐसा लगा जैसे उसके माथे से कोई बहुत भारी चीज टकराई हो। उसका समूचा अस्तित्व हिल गया और आंखें फटी रह गईं।

उसके सामने महेश खड़ा था। उसका पहला प्यार जिसके होंठों पर एक मीठी-सी मुस्कराहट थी। हाथों में कुछ पैकेट और दवा की शीशी थी। वह आगे बढ़ा और सारी चीजें एक स्टूल पर रख दीं। फिर सुषमा की ओर देखने लगा।

सुषमा के होंठों से कंपकंपाती आवाज निकली-

“म-म-महेश-तुम-?”

“शुक्र है तुमने मुझे पहचान तो लिया। वरना मैंने तो सुना था कि जो लोग पागल हो जाते हैं किसी को भी नहीं पहचान सकते।”

“पागल-?”

“और क्या? जिसका दिमाग सही होगा वह इस तरह अपनी जिन्दगी खत्म करने की कोशिश करेगा जिस तरह तुमने की थी? वह तो संयोग से उस समय जुहू बीच पर मैं चने बेच रहा था। मैंने तुम्हें दौड़ते हुए देखा तो मैं भी तुम्हारे पीछे दौड़ने लगा। तुम्हें पुकारा लेकिन तुमने मेरी आवाज ही नहीं सुनी।

“जानती हो मुझे कितनी मेहनत करनी पड़ी थी, तुम्हें पानी से निकालने के लिए हाथ-पांव जैसे पत्थर हो गए थे। सिर में चोट लगी थी। फिर तुम्हें अस्पताल ले गया। तुम्हारे पेट में ढेर सारा पानी भर गया था। अगर उसी समय तुम्हें मेडिकल एड न मिलती तो भगवान न जाने क्या होता! आज चार दिन के बाद तुम्हें होश आया है। मैं तुम्हें अभी थोड़ी देर पहले ही अस्पताल से लेकर यहां पहुंचा था।”

“महेश-” सुषमा की आवाज भर्रा गई।”

फिर वह महेश के सीने से लगकर सिसक पड़ी।

महेश ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा-

“पगली, तुम जानती हो आत्महत्या दुनिया का सबसे बड़ा पाप है।”

“लेकिन मेरे लिए तो मुक्ति का एकमात्र मार्ग यही था। तुमने मुझे क्यों बचाया महेश?”

“इसलिए कि तुम्हीं तो मेरी जिन्दगी हो। आज तक मैं केवल इसी आस पर जिन्दा रहा हूं कि मेरा प्यार सच्चा है तो एक-न-एक दिन तुम मुझे जरूर वापस मिल जाओगी।”

“महेश, अगर तुम मेरे बारे में सब कुछ जानते होते तो शायद ऐसा न कहते। तुम मुझसे प्यार करते हो, मेरे देवता हो। मैं तुम्हें धोखे में नहीं रख सकती। और यह भी जानती हूं कि तुम सब कुछ जानने के बाद निश्चय ही मुझसे घृणा करने लगोगे।”

“क्या बताओगी तुम?” महेश फीकी-सी हंसी के साथ बोला, “यही कि जिस रात मैं तुम्हारी मांग में सिन्दूर भरने के लिए महालक्ष्मी मन्दिर की सीढ़ियों पर खड़ा तुम्हारी राह देख रहा था उस रात प्रेम ने तुम्हारी पवित्रता नष्ट कर दी थी। तुमने अपने पिता को बचाने के लिए अपने आपको पन्द्रह हजार रुपये में कृष्ण को बेच दिया था। कृष्ण ने तुम्हें ऐन सुहागरात के समय इसलिए ठुकरा दिया कि वह तुम्हारे शरीर से पहले भी खेल चुका था। और जब ये सारी बातें बाबूजी के सामने आईं तो सदमें से वह अपनी जान दे बैठे और फिर तुम्हारे भाई ने तुम्हें वेश्या कहकर घर से निकाल दिया।”

“महेश।” सुषमा कांपती हुई आवाज में बोली, “तुम यह सब जानते हो?”

“हां, जब तुम्हें अस्पताल पहुंचाकर मैं प्रदीप और तुम्हारे बाबूजी को खबर करने गया था तब प्रदीप ने घृणा भरे शब्दों में मुझे यह सब बताया था।”

“और यह सब जानकर भी तुम्हें मुझसे घृणा नहीं हुई?”

“घृणा-?” महेश ने उसका चेहरा दोनों हाथों में ले लिया, “सुषमा मैं प्रदीप नहीं हूं। शंकर या प्रकाश भी नहीं हूं। बाबूजी नहीं हूं... और सुषमा किसी भी औरत का इन सब रिश्तों से साथ उस समय तक का होता है जब तक कि उसकी मांग में सिन्दूर न भर जाए। और जो औरत की मांग में सिन्दूर भरता है उसके साथ उसे पूरा जीवन बिताना होता है और मांग में सिन्दूर भरने का वास्तविक अधिकारी वह होता है जो सच्चे मन से प्यार करता है।

“सिन्दूर तो तुम्हारी मांग में कृष्ण ने भी भरा था। लेकिन वह आदमी जिसे हर रात नई औरत के बदन को चखने का चस्का हो उसे पत्नी की नहीं ऐसी दासी की जरूरत होती है जो उसके घर की देखभाल कर सके। अगर उसने सच्चे मन से तुम्हारे साथ फेरे लिए होते तो शायद वह ऐसा न करता लेकिन जिस काम में मन की लगन शामिल न हो उसके सच नहीं समझा जा सकता। इसी तरह उससे फेरे भी सच्चे नहीं थे।”

“जहां तक तुम्हारे भविष्य का प्रश्न है प्रेम ने तुम्हारे साथ जो कुछ किया उसकी जिम्मेदार तुम नहीं हो इसलिए तुम्हारी पवित्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। फिर तुमने अपने बाबूजी को बचाने के लिए खुद को कृष्ण के हाथों बेचा। ऐसा कदम कोई तुम जैसी ही लड़की उठा सकती थी। जो अपने परिवार को अत्यधिक चाहती हो। कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो पेशेवर वेश्याओं को प्यार करने लगते हैं और फिर उन्हें अपना लेते हैं तुम्हारे साथ तो यह बात भी नहीं है। और सबसे बड़ी बात यह है सुषमा कि भगवान ने शायद तुम्हारी मांग में सिन्दूर भरने का अधिकार केवल मुझे दिया है। क्योंकि मेरा प्यार सच्चा है। इसलिए भगवान ने तुम्हें कहां-कहां से गुजारकर इस चने बेचने वाले की कोठरी में पहुंचा दिया।”

महेश ने एक ठंडी लम्बी सांस ली, खोली को चारों ओर से देखा फिर सुषमा की ओर मुस्कराते हुए बोला-

“यह मिस सुषमा वर्मा जैसी विख्यात और लोकप्रिय मॉडल गर्ल का सुन्दर और सुसज्जित फ्लैट तो है नहीं। यहां कोई नौकरानी भी नहीं है। कहीं आने जाने के लिए कार भी नहीं है। इस छोटी-सी खोली में रहकर तुम्हें खाना भी स्वयं पकाना पड़ेगा। बर्तन और कपड़े भी धोने पड़ेंगे। झाडू भी लगानी पड़ेगी। राशन की दुकान पर लाइन में लगकर काफी दूर से राशन भी लाना पड़ेगा। क्योंकि मैं एक मामूली चने बेचने वाला हूं। लेकिन इस खोली में तुम्हें एक दौलत जरूर मिलेगी- वह दौलत है मेरे प्यार की दौलत।”

“महेश।” सुषमा फिर सिसककर महेश के कन्धे से लग गई- “तुम कितने महान हो महेश, तुम कितने महान हो।”

“महान तो वह ऊपरवाला है जिसने मेरी वर्षों की तपस्या के बाद तुम्हें वापस लौटा दिया। कभी-कभी मैं सोचता था कि क्या मेरे प्यार में कोई सच्चाई नहीं? लेकिन उसके घर देर है अन्धेर नहीं। अब यह छोटा-सा घर बसेगा। जिसके सपने मैं न जाने कब से देख रहा था।”

सुषमा सिसकती रही।

महेश ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा-

“पगली, भला खुशी के मौके पर कोई रोता है?”

फिर उसने कहा- “ठहरो।”

वह उठकर एक सन्दूक के पास चला गया। उसने सन्दूक खोलकर एक डिबिया निकाली और एक मंगलसूत्र। वह उन दोनों चीजों को लेकर सुषमा के पास आ गया।

“सुषमा, इस डिबिया को पहचानती हो? यह वही सिन्दूर की डिबिया है जिसे लिए मैं महालक्ष्मी मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठा तुम्हारी राह देख रहा था। और यह वह मंगलसूत्र है जो मां ने अपनी बहू के लिए खरीदा था। यह मंगलसूत्र और यह सिन्दूर न जाने कब से तुम्हारे गले और मांग के लिए तरस रहे थे। आज भगवान ने इन्हें तुम्हारे गले में सजने और मांग में भरने का मौका दिया है। मां का अरमान था कि मैं सेहरा बांधकर और घोड़ी पर सवार होकर तुम्हारे घर जाऊं। और तुम्हें डोली में बैठाकर घर लाऊं। मां का यह सपना पूरा नहीं हो सका। आज न बारात है न बाराती। लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि आज मेरी मां की आत्मा को कितनी शान्ति मिलेगी।”

सुषमा का दिल धड़क रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रही हो।

महेश ने सिन्दूर की डिबिया खोली। उसमें से एक चुटकी सिन्दूर निकाला और फिर यों ही महेश का हाथ सुषमा की मांग की ओर बढ़ा, बड़ी जोर से फटाक की आवाज के साथ खोली का दरवाजा खुल गया। और सुषमा एक चीख मारकर खड़ी हो गई।

महेश ने मुड़कर देखा। दरवाजे में कृष्ण खड़ा था। उसके साथ एक पुलिस-इन्सपेक्टर और चार कांस्टेबल थे।

कृष्ण ने सुषमा की ओर हाथ उठाकर कहा-

“इंस्पेक्टर साहब, यही है मेरी पत्नी सुषमा। और यह है वह बदमाश जो एक शरीफ बाप की बेटी और एक शरीफ आदमी की विवाहिता पत्नी की मांग में सिंदूर भर रहा है।”

महेश के होंठ कुछ कहने के लिए खुले लेकिन फिर उसने यह सोचकर जल्दी से अपने होंठ बन्द कर लिए कि अगर उसने सच्ची बात बता दी तो सुषमा की आबरू नीलाम हो जाएगी।

कृष्ण ने इंस्पेक्टर से कहा-

“हमारी शादी को आज पांचवां दिन है। मेरे पास डाक्टर का सर्टीफिकेट हैं। मैं रात को दो पैग व्हिस्की पिए बिना सो नहीं सकता। सुहागरात को भी मैंने पी ली थी। मेरी पत्नी को यह बात नागवार गुजरी थी। इसलिए यह रूठकर अपने पिता के घर चली गई थी। लेकिन बाप और भाई ने इस पर दबाव डाला था कि यह उसकी ससुराल वापस चली जाए। लेकिन सुषमा पर उस समय पागलपन सवार था। यह घर से यह कहकर भाग आई कि मैं मर जाऊंगी लेकिन ससुराल नहीं जाऊंगी। मैंने सोचा कि रूठ गई हैं। दो-चार दिन में अपने आप लौट आएगी। वह तो संयोग से मुझे मेरा साला आज सुबह मिल गया। मैंने उससे सुषमा के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह तो घर से न जाने कहां चली गई। मैं कल सारे दिन पुलिस स्टेशनों और अस्पतालों की खाक छानता रहा। शाम को एक अस्पताल से पता चला कि सुषमा नाम की एक लड़की को एक चने बेचने वाला डूबने से बचाकर लाया था और अब वह उसे अपने घर ले गया है। अस्पताल से ही इस बदमाश के घर का पता चला। जरा इस बदमाश की हिम्मत तो देखिए, एक विवाहिता औरत की मांग में सिन्दूर भर रहा है।”

इंस्पेक्टर महेश की ओर देखने लगा।

महेश ने धीरे से कहा-

“साहब, भूल हो गई। मैंने समझा था कि अब इन्हें इनके पति तो अपनायेंगे नहीं, मैंने सोचा था इसी बहाने मेरा घर बस जाएगा। इनकी सुन्दरता देखकर मेरा ईमान डगमगा गया था।”

“जानते हो, तुम्हें कितने वर्ष की सजा हो सकती है?”

“जानता हूं साहब। और मैंने जो भूल की है उसकी सजा भुगतने को तैयार हूं।”

यह कहकर महेश ने अपने दोनों हाथ इंस्पेक्टर की ओर बढ़ा दिए इंस्पेक्टर ने उसके हाथों में हथकड़ियां डाल दीं। महेश सख्ती से होंठ भींचकर अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रहा था।

सुषमा की रुलाई एकदम फूट पड़ी।

कृष्ण ने आगे बढ़कर सुषमा का हाथ पकड़कर कहा-

“चलो सुषमा, पति पत्नी में ऐसे झगड़े तो होते ही रहते हैं। इतनी-सी बात के लिए क्या कोई अपना घर छोड़ देता है?”

सुषमा कुछ न बोली। जहां उसे अपना दिल बैठता हुआ महसूस हो रहा था, वहां उसे कृष्ण की बातों पर आश्चर्य भी हो रहा था। क्या यह वही कृष्ण है जिसने पहली ही रात उसका घूंघट उठाते ही उसे पहचान लिया था कि उसका पहला ग्राहक वही था। और कितनी बेदर्दी और घृणा से उसने सुषमा को ठुकरा दिया था। अगर उस दिन कृष्ण यह सब न करता तो उसके पिता की मृत्यु न होती।

18

कृष्ण का बेडरूम सुहागरात वाली रात से भी अधिक सुन्दर सजा हुआ था। चारों और खुशबूएं बिखरी हुई थी। मसहरी चारों ओर से फूलों की लड़ियों से ढकी हुई थी। बिस्तर पर रंग बिरंगे खुशबूदार फूल बिखरे हुए थे।

सुषमा आज भी पहली रात की तरह दुल्हन बनी बैठी थी। उसके बदन पर सुहाग की कीमती जोड़ा था। गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर था। सारा बदन सोने के जेवरों से लदा हुआ था। लेकिन उस रात और आज की रात में बहुत अंतर था। उस रात उसने महेश के बारे में सोचा तक नहीं था। उसने महेश को अपने दिमाग से निकाल दिया था। उसे महेश जैसे देवता को अपना अपवित्र शरीर अर्पित करते हुए घृणा हो रही थी।

लेकिन आज उसकी आंखों के आगे बार-बार महेश का चेहरा घूम जाता था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसका दिल मसोस रहा हो। और धीरे-धीरे खून की एक एक बूंद निचोड़ रहा हो। महेश के साथ थोड़ी देर रहकर उसने उसकी भावनाएं जान ली थीं। उसे ऐसा लगा था जैसे उसे एक नया जीवन मिल गया हो वह एक छोटे से घर के सपने देखने लगी थी जिसमें उसके और महेश के अतिरिक्त और कोई नहीं था। महेश दिन भर चने बेचने के बाद घर लौटता तो वह घर के काम काज से छुट्टी पाकर मुस्कराकर उसका स्वागत करती। उसे खाना खिलाती। पंखा झलती। उसके कपड़े धोती। उसके पांव दबाती।

लेकिन सारे सपने बिखर गए।

तभी घड़ी ने ग्यारह बजाए। वह चौंक पड़ीं और फिर उसे ख्याल आया कि वह कृष्ण की विवाहिता पत्नी है। जीवन-भर साथ निभाने का वचन दिया है। कल तक वह जो भी थी लेकिन आज वह किसी की विवाहिता पत्नी है। भारतीय नारी के लिए उसका पति भगवान के समान होता है। अब कृष्ण ही उसका सर्वस्व है। महेश के बारे में सोचना भी उसके लिए पाप है।

अचानक दरवाजे पर आहट हुई। वह चौंककर सीधी बैठ गई।

दरवाजा खुला और कृष्ण अंदर आ गया। वह जल्दी से पलंग से उतरकर नीचे खड़ी हो गई।

कृष्ण ने पलटकर दरवाजा बंद कर दिया।

सुषमा ने महसूस किया कि वह नशे में है।

कृष्ण लड़खड़ाता हुआ उसकी ओर बढ़ा। सुषमा ने झुककर उसके पांव छुए।

कृष्ण ने उसके कन्धे पकड़कर, उसे ऊपर उठाते हुए प्यार भरे स्वर में कहा- “यह क्या करती हो डार्लिंग। तुम्हारा स्थान इन कदमों में नहीं इस दिल में है।”

“दासी का स्थान तो चरणों में ही होता है, नाथ।”

“हिन्दुस्तानी एकदम हिन्दुस्तानी।” कृष्ण मुस्कराकर बोला, “क्षमा करना, मैं आज फिर पीकर आया हूं।”

“मैं जानती हूं। आपको दो पैग पिए बिना नींद नहीं आती।”

“लेकिन तुम्हें बुरा तो नहीं लगा।”

“जो बात आपको अच्छी लगती है, भला मुझे बुरी क्यों लगेगी?”

‘कितनी अच्छी हो तुम?” कृष्ण ने उसे पलंग पर बैठाते हुए कहा, “मैं भी कितना बड़ा गधा हूं कि मैंने पहली रात को ही तुम्हारा इतना बड़ा अपमान किया।”

“आप अपनी जगह गलत नहीं थे।”

“कुछ भी समझ लो सुषमा, मैं उस समय नशे में था। मैंने जीवन का एक बहुत बड़ा भाग ऐय्याशी में बिताया है। किसी देश या किसी प्रान्त की लड़की ऐसी न होगी जिसका उपयोग मैंने न किया हो। कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि जिस लड़की के साथ मैंने रात बिताई है वह कुछ साल बाद किसी की पत्नी के रूप में दिखाई दी है।”

“इसीलिए मैंने सोचा था कि शादी करूंगा तो किसी घरेलू और अनपढ़ लड़की से करूंगा। लेकिन शादी तुम्हारे साथ हो गई। और जब तुम पहली बार मेरे सामने आई तो मुझे यह सोचकर जबर्दस्त धक्का लगा कि हो सकता है मुझसे पहले भी तुम किसी और के हाथ बिक चुकी हो। और कभी तुम्हारा कोई पुराना ग्राहक तुम्हें पत्नी के रूप में मेरे साथ देख ले।

“क्रोध और नशे ने मेरा मानसिक संतुलन नष्ट कर दिया था। मैंने तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दिया। लेकिन मैं बहुत ही उलझन में फंस गया था। मैंने यह बात सपने में भी नहीं सोची थी कि मेरी जरा-सी मूर्खता तुम्हारे पिता की मृत्यु का कारण बन जायेगी और तुम आत्महत्या करने की ठान लोगी।”

कुछ पल रुककर कृष्ण ने कहा-

“कल प्रदीप ने बताया कि किस तरह तुम्हारे घर लौट आने के सदमे ने बाबूजी की जान ले ली। और तुमने आत्महत्या कर ली। उसने यह भी बताया कि तुमने बाबूजी के चरणों की सौगन्ध खाकर रहा था कि तुमने पहली और अन्तिम बार अपने आपको मेरे ही हाथों बेचा था। और वही सौगन्ध तुमने सुहागरात को भी खाई थी। लेकिन तब मैंने तुम्हारी सौगन्ध पर विश्वास नहीं किया था।

“लेकिन तुम्हारे बाबूजी के स्वर्गवास और तुम्हारी आत्महत्या की खबर ने मुझे झंझोड़कर रख दिया। मुझे विश्वास हो गया कि अगर तुम झूठी होतीं तो आत्महत्या न करतीं। मैं पागल-सा हो गया था कि तुम मुझे मिल जाओ तो मैं तुमसे अपने अन्याय की क्षमा मांग लूं।

“फिर अचानक मुझे दो दिन पहले की अखबार में प्रकाशित एक खबर याद आ गई जिसमें लिखा था कि एक दुल्हन ने समुद्र में कूदकर आत्महत्या की कोशिश की थी। लेकिन उसे एक चने बेचने वाले ने बचा लिया था। तब मुझे ख्याल आया कि वह दुल्हन कहीं तुम्हीं तो नहीं हो। मैं सीधा अस्पताल भागा। वहां से मुझे तुम्हारे और चने वाले का नाम-पता मालूम हुआ और फिर मैं पुलिस को लेकर ठीक समय पर वहां पहुंच गया।

और सुषमा, पुलिस के सामने मुझे जो झूठ बोलना पड़ा उसके लिए मैं शर्मिन्दा हूं। लेकिन अगर मैं झूठ न बोलता तो तुम्हारी आबरू पर आंच आ जाती।”

“आप ठीक कहते हैं। आपका वह झूठ मेरे लिए करोड़ों सच से बड़ा है। आपने मेरे उजले माथे पर दाग लगने से बचा लिया और सब कुछ भूलकर मुझे स्वीकार कर लिया। मेरे लिए इससे बढ़कर सौभाग्य और क्या हो सकता है।”

कृष्ण ने सुषमा को बांहों में भरकर कहा-

“तुम कितनी अच्छी हो सुषमा। तुम कितनी सुन्दर हो। तुम्हें पाकर मैं अपने आपको कितना भाग्यशाली समझ रहा हूं उसका तुम अनुमान नहीं लगा सकतीं।”

“नाथ।” सुषमा ने आंखें मूंद लीं।

और कृष्ण ने हाथ बढ़ाकर लाइट का स्विच ऑफ कर दिया।

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सुषमा किचन में खाना बना रही थी कि अचानक घंटी बज उठी।

सुषमा चौंक पड़ी। उसने जल्दी से किचन से निकलकर दरवाजा खोल दिया।

“आ गए आप?” कृष्ण को देखकर उसने मुस्कराते हुए कहा।

कृष्ण ने अन्दर आकर सुषमा को अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूम लिए।

“क्या करते हो, दरवाजा खुला है।” सुषमा ने उसकी बाहों में से छूटने की कोशिश करते हुए कहा।

“तो क्या हुआ! तुम मेरी पत्नी हो।” कृष्ण मुस्कराते हुए बोला- “सच मानो एक पल के लिए तुम्हें दूर रखने को जी नहीं चाहता। जाने क्या जादू कर दिया है तुमने मुझपर।”

“यह तो मेरा सौभाग्य है। लेकिन एक बात कहूं- अगर आपको पीनी है तो घर बैठकर पिया कीजिए। आप कहेंगे तो मैं अपने हाथों से पैग बना दिया करूंगी।”

“ओह डार्लिंग, सो नाइस ऑफ यू। तुम जैसी पत्नी किसी भाग्यवान को ही मिलती है।”

“अच्छा बस, इतनी प्रशंसा न कीजिए कि मेरा दिमाग खराब हो जाए। हाथ-मुंह धो लीजिए। खाना बन चुका है।

“वैरी गुड। मैं अभी आता हूं।” कृष्ण ने कहा और बाथरूम में चला गया।

सुषमा किचन की ओर जा रही थी कि दरवाजे की घंटी फिर बज उठी। सुषमा ने वापस दरवाजा खोल दिया।

और जैसे ही उसकी नजर दरवाजे में खड़े व्यक्ति पर पड़ी वह चौंक पड़ी-

“दर्शन, तुम-!”

“हां, मालकिन,,” दर्शन ने अन्दर आते हुए कहा, “यह आपको अचानक क्या हो गया था? आप कहां गायब हो गई थीं?”

“पहले तुम यह बताओ कि तुम यहां तक पहुंच कैसे?”

“बड़ी मुश्किल से आपके भाई से वहां का पता मिला है। उन्होंने बताया कि आपने शादी कर ली है और कृष्ण बाबू के साथ यहां रहती है।”

“ओह-!”

“उधर हम लोग सख्त परेशान हैं। दर्जनों बार घनश्याम का फोन आ चुका हैं। दो बार वह खुद भी आ चुके हैं। कहते हैं, उनकी फर्म का दिवाला निकाला जा रहा है। आर्डर पर आर्डर कैंसिल हो रहे हैं, उनकी फिल्मों के आप की वजह से।”

“दर्शन, अब कभी उनका फोन आए या वह खुद आयें तो उनसे कह देना कि मैंने शादी कर ली है और अब मैं एक घरेलू स्त्री के रूप में जिन्दगी बिताना चाहती हूं।”

“जो हुक्म मालकिन, लेकिन आपका फ्लैट, आपकी कार और बैंक-बैलेंस।”

इससे पहले कि सुषमा कोई उत्तर देती कृष्ण आ गया। उसने दर्शन को देखकर पूछा- “यह कौन है सुषमा?”

“सॉरी यह मेरे अतीत के साथी हैं जब मैं मॉडल गर्ल थी। इनका नाम दर्शन है इसके अलावा जूली नाम की एक लड़की भी है।”

“ओहो, और वह फ्लैट, वह बैंक-बैलेंस-।”

“ये सब भी उसी जमाने के हैं।”

“फ्लैट तुम्हारी अपनी सम्पत्ति है?”

“जी हां।”

“कमाल है! तुम्हारे पास अपना फ्लैट मौजूद है और हम लोग यहां किराए के फ्लैट में रहते हैं। तुम्हारे पास कार मौजूद है और मुझे टैक्सी में ऑफिस जाना पड़ता है।”

“तो क्या यह फ्लैट आपका नहीं है?”

कृष्ण ने मुस्कराकर कहा-

“डार्लिंग, मैं ढाई हजार रुपये माहवार पाने वाला नौकर हूं। अपने वेतन के अनुसार ही मुझे अपना रहन-सहन रखना पड़ता है। इतनी रकम कहां से आती कि अपना फ्लैट लेता। रह गई कार वह तो कम्पनी की ओर से मिली हुई थी। आज भी कार वर्किंग आर्डर में नहीं है।”

“देखिए हम किसी तरह गुजारा कर लेंगे। लेकिन मैं उस कमाई का एक भी पैसा नहीं चाहती जिसके सदमे ने मेरे बाबूजी की जान ली है।”

“डोन्ट बी सिली डार्लिंग,” कृष्ण ने मुस्कराकर कहा, “तुमने जो सौगन्ध खाई है उसके अनुसार तुम्हारी अपनी कोई भी चीज अनुचित नहीं। हां भगवान न करे तुमने पेशा किया होता तो वह अनुचित होता है।”

“मालकिन,” दर्शन हाथ जोड़कर बोला, “मैं और जूली आपकी चीजों की कब तक देखभाल करेंगे?”

“डोन्ट वरी दर्शन, हम लोग कल सुबह ही फ्लैट में आ जाएंगे।”

“लेकिन...”

“डार्लिंग, अपनी सम्पत्ति ठुकराना मूर्खता है और फिर यह सम्पत्ति तुमने मेहनत की कमाई से खरीदा है। उन पर तुम्हारा पूरा-पूरा अधिकार है।”

“लेकिन वहां मेरे पुराने साथी मुझे परेशान करेंगे।”

“वह सब मैं संभाल लूंगा। तुम चिन्ता मत करो।” कृष्ण ने कहा और फिर दर्शन से बोला, “अरे दर्शन, तुम खड़े क्यों हो? बैठो- चाय पीकर जाना।”

“नहीं मालिक, जूली अकेली है, वह बच्ची है, बहुत डरती है।”

“बच्ची है? कितनी बड़ी है?”

“कोई आठ-दस वर्ष की है।”

“ठीक है। कोई बात नहीं तुम जाओ।”

दर्शन चला गया।

सुषमा के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें उभर आई थीं। उसने धीरे से कहा-

“पता नहीं, मेरा दिल क्यों डर रहा है। इससे तो अच्छा कि हम उस फ्लैट को बेचकर नया फ्लैट खरीद लें।”

“देखो डार्लिंग,” कृष्ण ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुए कहा, “जब किसी लड़की का विवाह हो जाता है तो उसकी रक्षा का भार उसके पति पर आ जाता है। मेरे होते हुए तुम्हें कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अब तुम जल्दी से खाना लगाओ। बड़े जोरों की भूख लग रही है।”

थोड़ी देर बाद वे दोनों डाइनिंग टेबल पर थे।

“आपने दर्शन से कह दिया होता वह सवेरे टेम्पो लेकर आ जाता।”

“किसलिए?”

“यह सामान फर्नीचर वगैरह।”

कृष्ण ने एक जोरदार कहकहा लगाकर कहा-

“बहुत भोली हो डार्लिंग। भला ढाई हजार रुपये पाने वाले के पास इतना कीमती फर्नीचर कैसे हो सकता है? यह सब किराए का है। हां किचन के बर्तन हमारे हैं। वे सब कार में आ जायेंगे। मैं सुबह जाकर कार ले आऊंगा।”

सुषमा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

“तुम्हारा बैंक-बैलेंस कितना होगा?”

“यही कोई एक लाख।”

“एक....लाख....।” कृष्ण के हाथ से निवाला छूट गया।

“क्यों....?” सुषमा ने आश्चर्य से कहा।

“अरे डार्लिंग, पत्नी का बैंक-बैलेंस एक लाख हो और पति को ढाई हजार की नौकरी करनी पड़े।”

“जी, मैं समझी नहीं।”

“एक लाख से तो हम करोड़ों कमा सकते हैं। मैंने कल ही एक बहुत बड़ी फर्म का विज्ञापन देखा था। वह अच्छे मुनाफे पर पचास हजार के शेयर बेच रही हैं। अगर हम एक लाख के दो शेयर खरीद लें तो पांच से दस हजार रुपये तो घर बैठे ही मिल जाया करेंगे।”

“जैसा आप उचित समझे, कीजिए। यह सारी सम्पत्ति अब आपकी है।” सुषमा ने धीरे से कहा।

“देखा पत्नी हो तो ऐसी समझदार और आज्ञाकारी। सचमुच मैं संसार का सबसे भाग्यशाली आदमी हूं।”

सुषमा कुछ नहीं बोली।

कृष्ण के चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी। आंखों में एक विचित्र-सी चमक थी।

19

कृष्ण ने जिस आखिरी घोड़े पर दस हजार का दांव लगाया था वह भी हार गया। उसने टिकट फाड़कर फेंक दिया और अपनी साथी एक खूबसूरत सोसाइटी-गर्ल के कन्धे लड़खड़ाती आवाज में बोला-

“चलो डार्लिंग।”

“अब मुझे कहां ले जाओगे?” सोसायटी गर्ल ने उस का हाथ कन्धे पर से हटाते हुए मुस्कराकर कहा, “मुझे कोई दूसरा ग्राहक देखने दो। तुम तो सारे पैसे हार गए।”

कृष्ण ने कहकहा लगाकर कहा- “वे दस हजार गए तो क्या हुआ। अभी मेरे पास पांच हजार और हैं।”

उसने नोटों की एक गड्डी निकालकर दिखाई।

“लेकिन इनमें से एक हजार तो मैं ही ले लूंगी।”

“फिर भी चार हजार बच जाएंगे। काफी देर से पी नहीं है। गला सूख गया है। चलो किसी अच्छे होटल में डिनर लेंगे।”

“मैं रात बारह बजे से ज्यादा नहीं ठहरूंगी।”

“यहां भी कौन ठहरेगा! घर पर एक पतिव्रता पत्नी इन्तजार कर रही होगी। पति का धर्म है कि अपनी पतिव्रता पत्नी को आधी रात से ज्यादा भूखा न रखे। क्योंकि वह मेरे बिना खाना नहीं खाती।”

“तो तुम मेरे साथ भी खाना खाओगे और उसके साथ भी।”

“तुम्हारे साथ तो बस पीऊंगा। और तुम्हें खाते देख कर खुश होऊंगा।”

दोनों ने कहकहे लगाए और कार में जा बैठे।

कार चल पड़ी तो सोसायटी गर्ल ने पूछा-

“एक बात बताओगे कृष्ण?”

“पूछो।”

“शादी होते ही क्या तुम्हारी लाटरी निकल आई है। पिछले हफ्ते से अब तक तुम लगभग एक लाख रुपये हार चुके हो। कहते हो, तुमने अपना फ्लैट भी ले लिया है। बढ़िया कार में घूमते हो। मैंने सुना है गबन के मामले में तुम्हें नौकरी से हटा दिया गया है क्या यह सच है?”

कृष्ण ने फिर जोरदार कहकहा लगाया और कहा-

“डार्लिंग, सच है या झूठ इसका फैसला तो समय ही करेगा। शादी के बाद एक लाटरी जरूर हाथ लग गई है।”

“कैसी लाटरी?”

“यह रहस्य है। इसे रहस्य ही रहने दो।”

थोड़ी देर के बाद कार एक शानदार होटल में कम्पाउण्ड में पहुंचकर रुक गई।

सोसायटी गर्ल की खुशी की सीमा न रही। ऐसे शानदार होटल में उसे बहुत कम आने का मौका मिलता था।

दोनों कार से उतरकर दरवाजे की ओर बढ़े तो दरबान ने बड़े अदब से सलाम किया। कृष्ण ने गर्दन हिलाकर सलाम का जवाब दिया और सोसायटी गर्ल के साथ अन्दर चला गया

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रात को लगभग साढ़े बारह बजे दरवाजे की घंटी बजी तो सुषमा चौंककर जाग उठी। वह मेज पर सिर रखे-रखे ही सो रही थी। उसने जल्दी से उठकर दरवाजा खोल दिया।

कृष्ण, लड़खड़ाता हुआ अंदर आया और सुषमा के गले में बांहें डालकर मुस्कराया-

“डार्लिंग, तुमसे कितनी बार कहा है कि अगर मुझे देर हो जाया करे तो खाना खा लिया करो। इस तरह तो तुम्हारा स्वास्थ्य खराब हो जाएगा।”

“मैंने आपसे भी तो प्रार्थना की है कि बाहर पीकर मत आया कीजिए।”

“ओह, डार्लिंग पुराने दोस्त हैं। छूटते-छूटते ही तो छूटेंगे। वे घेर लेते हैं तो मजबूर हो जाता हूं।”

चलिए हाथ-मुंह धो लीजिए मैं खाना गर्म करती हूं।”

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थोड़ी देर के बाद दोनों डाइनिंग टेबल पर थे।

खाना खाने के बाद सुषमा ने कहा-

“कल अदालत में आपकी तारीख है।”

“तारीख? कृष्ण के मस्तिष्क को झटका लगा।

“जी हां, दस बजे तक आपको अदालत में पहुंचना है।”

“लेकिन तुम्हें किसने बताया?”

“आपके वकील का फोन आया था। वह पहले वाले फ्लैट पर गया था। वहां से पता लेकर यहां आया था।”

“क्या कहा था उसने?”

“दस बजे तक आप।”

“मेरा मतलब है।”

“जी।” सुषमा ने नजरें झुकाकर कहा, “उसने बताया था कि आप पर किसी इल्जाम में केस चल रही है। और आपकी नौकरी भी छूट गई है।”

कृष्ण सन्नाटे में रह गया। फिर धीरे-धीरे सुषमा के पास आया और उसके कन्धों पर हाथ रखकर बोला-

“तुम्हें इस खबर से बहुत सदमा पहुंचा होगा।”

“सदमा तो मुझे इस बात पर हुआ कि आपने मुझसे यह बात क्यों छिपाई? पति-पत्नी के बीच क्या ऐसी बातें छिपाई जाती हैं?”

“जानता हूं सुषमा। लेकिन यह भी जानती हूं कि तुम कितनी वफादार पत्नी हो। इस खबर को सुनकर तुम्हें दुख होगा बस इसलिए मैंने तुम्हें यह बात नहीं बताई थी। क्या इसके लिए तुम मुझे क्षमा नहीं कर सकती?”

“कैसी बातें करते हैं आप? क्षमा मांगकर मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं।”

“तुम सचमुच देवी हो, सुषमा।” कृष्ण ने भारी आवाज में कहा, “मैं सचमुच पापी हूं जो इतनी-सी बात के लिए मैंने तुम्हें इतना मानसिक कष्ट पहुंचाया।”

“भगवान के लिए ऐसा मत कहिए। मुझे कोई कष्ट नहीं पहुंचा।”

सुषमा उसके सीने से लग गई।

कृष्ण उसके बालों को चूमने लगा।

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कृष्ण जब सुबह कोर्ट जाने लगा तो सुषमा भगवान से प्रार्थना करने लगी कि कृष्ण को सफलता मिले। उसने कृष्ण के पैरों की धूल माथे पर लगाते हुए कहा- “भगवान आपको सफलता देगा।”

“तुम जैसी पत्नी की तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान ने चाहा तो इस केस में मेरी विजय होगी। क्योंकि मुझ पर गबन का इल्जाम लगाया गया है, वह एकदम झूठा है। रकम असिस्टेन्ट मैनेजर ने गायब की थी जो मेरे काम और मेरी तरक्की से जलता था।”

“भगवान हमेशा सच्चे का साथ देता है। जाइए, भगवान ने चाहा तो विजय आपकी होगी।”

कृष्ण के जाने के बाद सुषमा कुछ देर दरवाजे की ओर देखती रही और फिर एक ठंडी सांस लेकर किचन की ओर चल दी।

तभी टेलीफोन की घंटी बज उठी। उसने जल्दी से रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया और बोली-

“यस-।”

“कौन-मिस सुषमा वर्मा?”

“स्पीकिंग।”

“शुक्र है तुम मिल गई। मैं सावित्री एडवरटाइजिंग का घनश्याम बोल रहा हूं।”

“फरमाइए-।” सुषमा का लहजा कुछ रूखा था।

“मुझे आपकी इतने दिन की गैरहाजिरी से!”

“क्षमा कीजिएगा। मैंने माडलिंग बिल्कुल छोड़ दी है। भविष्य में टेलीफोन करने का कष्ट न करें।”

यह कहकर सुषमा ने रिसीवर रख दिया।

वह मुड़ी ही थी कि उसकी नजर दर्शन पर पड़ी। उसने पूछा-

“दर्शन, क्या मेरी हिदायत के बाद भी घनश्याम का फोन आया था?”

“जी नहीं।”

“हूं।” वह कुछ सोच में पड़ गई।

“मालकिन, राशन खत्म हो चुका है। शायद कल तक और चल जायेगा।”

“ओहो, साहब आ जायें तो याद दिलाना। मैं उनसे पूछूंगी कि हमने जो शेयर खरीदे थे उनके मुनाफे की किश्त अभी तक क्यों नहीं मिली?”

“मालकिन,” दर्शन ने डरते-डरते कहा, “एक बात कहूं?”

“हां कहो।”

“आप नाराज तो नहीं होंगी?”

“ऐसी क्या बात है?”

“मुझे तो ऐसा लगता है कि साहब ने शेयर खरीदे ही नहीं है।”

“क्या बकते हो।”

“मालकिन, मेरा एक दोस्त रेस का शौकीन है। रोजाना रेस खेलता है। लेकिन दस रुपये से ज्यादा कभी नहीं लगाता। उसने मालिक को वहां देखा था?”

“तो क्या हुआ? अगर हजार-पांच सौ लगा भी दिए होंगे तो क्या बुराई है। कोई दोस्त जिद करके ले गया होगा।”

“मालकिन यही तो बात है। उनके साथ कोई दोस्त नहीं था।”

“फिर?”

“एक लड़की थी और दोनों नशे में थे।”

“हो सकता है लड़की ही हो।”

“यह बात आपको बुरी नहीं लगी, मालकिन।”

“नहीं दर्शन। क्योंकि मैं उनके अतीत से परिचित हूं। सबकुछ जानने के बाद ही मैंने शादी की है। इन्हें शराब पीने की आदत है। लड़कियों के साथ की भी। और ये आदतें किसी पेड़ की शाखें तो होती नहीं कि उन्हें काट कर फेंक दिए जाए। आदतें तो जाते-जाते ही जाती हैं। चली जायेंगी कभी-न-कभी। और फिर ऐसी हरकतों को भी एक उम्र होती है। अभी वह जवान हैं। स्वस्थ हैं। जब उम्र ढलने लगेगी तो अपने आप घर की चारदीवारी याद आ जायेगी। और दर्शन, अब तो वह कैसे भी हों। मैं उनकी पत्नी हूं, मुझे हर हालत में अपने धर्म का पालन करना होगा।”

“भगवान आपको शक्ति दे।”

सुषमा ने अपने कंगन उतारकर कहा-

“लो, इन्हें बेचकर राशन ले आओ। बाकी बाद में देखा जाएगा।”

“मालकिन-!” दर्शन की आवाज कांप उठी।

“दर्शन, औरत के गहने उसका श्रृंगार भी होते हैं और बुरे समय के साथी भी। तुम जाओ। भगवान परिस्थितियां ठीक कर देगा तो फिर बन जायेंगे।”

दर्शन की आंखें भीग गई। और फिर आंसू पोंछता हुआ वह चला गया।

दर्शन के जाने के बाद सुषमा ने जूली को कुछ हिदायतें दीं और फिर नहाने चली गई।

लगभग आधे घंटे के बाद नहा-धोकर वह पूजा के कमरे में जाने ही वाली थी कि अचानक दरवाजे की घंटी बज उठी। उसने बढ़कर दरवाजा खोल दिया।

दरवाजे पर घनश्याम खड़ा था।

“आप-!” उसने आश्चर्य से कहा।

“क्या मैं अन्दर भी नहीं आ सकता?”

“आइए-आइए।” वह पीछे हट गई।

उसने जूली को पुकारकर चाय लाने को कहा।

घनश्याम जूली से बोला- “चाय रहने दीजिएगा। मेरे पास समय बहुत कम है। मैं आपसे सिर्फ दो बातें करने आया हूं।”

“फरमाइए।”

“आपने टेलीफोन पर तो इस तरह बात की थी, कि!”

“लेकिन मैंने आपका अपमान नहीं किया था। और फिर आप मेरे घर आये हैं। घर आए मेहमान का अपमान करना तो और भी बड़ा पाप है। फिर आप मेरे बॉस भी रह चुके हैं।”

“आप यह क्यों कहती हैं कि रह चुके हैं?”

“इसलिए कि मैंने माडलिंग छोड़ दी है।”

“लेकिन क्यों? इस निर्णय का कोई कारण भी तो होगा?”

“क्या जरूरी है कि मैं अपने व्यक्तिगत जीवन की हर बात किसी को बताऊं?”

“देखिए मिस वर्मा, आप प्रसिद्धि के उस शिखर पर है जहां दौलत इंसान के कदम चूमती है। जो लोग आती हुई दौलत को ठुकराते हैं, कभी-कभी दौलत उनसे बहुत ही भयंकर प्रतिशोध लेती है। आप नहीं जानती कि आपके कारण हमारी फर्म को कितनी हानि उठानी पड़ रही है। जो भी कम्पनी विज्ञापन फिल्में बनवाने आती है, वह आप ही को पूछती है। हम बहाना बना देते हैं। लेकिन आर्डर हाथ से निकल जाता है। इन दिनों टाटा ने एक नया टैल्कम पाउडर निकाला है और लीवन ब्रदर्स ने एक नया शैम्पू। इन दोनों कम्पनियों के आर्डर कल शाम को ही मिले हैं। लेकिन उनकी शर्त यही है कि उनकी फिल्मों में आप ही काम करेंगी।

“मिस वर्मा, अगर से आर्डर हमारे हाथ से निकल गए तो हमें बहुत बड़ा नुकसान पहुंचेगा। क्योंकि ये दोनों बड़ी फर्में भी हमारी प्रतिद्वन्द्वी फर्म की मुट्ठी में चली जायेंगी। अगर आप चाहें तो मैं आपको एक लाख रुपये से पांच लाख रुपये तक एडवांस दे सकता हूं। ये रुपये आपके पारिश्रमिक में से तब तक नहीं काटे जायेंगे। जब तक आप नहीं कहेंगी, चाहे इसके लिए दस साल क्यों न बीत जायें। विश्वास कीजिए इन दिनों इतनी विज्ञापन-फिल्मों के आर्डर आ रहे हैं कि शायद एक महीने में आप लाख-सवा लाख कमा लें।”

“कह चुके आप?” सुषमा ने गम्भीर होकर कहा- “अब मेरा उत्तर भी सुन लीजिए। मैं दस लाख लेकर भी काम नहीं करूंगी। आप मेरे पास आए हैं इसलिए मैं ऐसा कोई शब्द जुबान पर नहीं लाना चाहती जिससे आपका अपमान हो।”

घनश्याम ने एक ठंडी सांस ली और उठते हुए बोला-

“ठीक है मिस वर्मा। मैं जा रहा हूं। मैंने टाटा और लीवर ब्रदर्स से यह कहकर एक सप्ताह का समय ले लिया था कि मिस वर्मा बीमार हैं। मेरी ओर से आपके पास सोचने के लिए पूरा एक सप्ताह पड़ा है। मेरा विचार है, आती लक्ष्मी का आप अपमान नहीं करेंगी। गरीबी संसार का सबसे बड़ा रोग ही नहीं, सबसे भयंकर अभिशाप है। शायद आपको इसका अनुमान न हो।”

घनश्याम के जाने के बाद सुषमा सन्नाटे में बैठी रह गई। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसके कानों में घनश्याम का एक-एक शब्द गूंज रहा था।

निर्धनता कितना बड़ा अभिशाप है इसका उसे अनुभव था। उसे अपने पति कृष्ण का गबन का केस याद आ रहा था। अगर उसे सजा हो गई तो? यह सोचकर वह झुरझुरी लेकर रह गई। दर्शन का यह विचार भी सम्भवतः, सही हो कि कृष्ण ने शेयर खरीदे ही न हों। हे भगवान, अगर कृष्ण को कुछ हो गया तो क्या होगा? कुछ भी हो, अब तो वह मेरे पति हैं।

सुषमा की आंखों के आगे सारे रिश्तेदारों के चेहरे घूम गए और उसके में सब के प्रति घृणा का सागर उमड़ उठा। बाबूजी सदमे से मर चुके कृष्ण को सजा हो गई तो में अकेली रह जाऊंगी। मैं क्या करूं भगवान‒ मैं क्या करूं?

सुषमा का दिल अनायास भर आया और आंखें भीग उठीं।

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घंटी की आवाज सुनकर सुषमा ने दरवाजा खोल दिया।

सामने कृष्ण खड़ा था। वह इस तरह झूम रहा था। जैसे नशे में धुत्त हो। उसका चेहरा उतरा हुआ और सफेद पड़ गया था।

सुषमा ने बेचैनी से पीछे हटते हुए पूछा‒

“क्या हुआ स्वामी?”

कृष्ण लड़खड़ाता हुआ अंदर आया और थका-थका सा गिर गया। सुषमा जल्दी से उसके पास पहुंची और बेचैनी से बोली-

“भगवान के लिए बताइए ना, मेरा दिल बैठा जा रहा है।”

“सुषमा!” कृष्ण भारी लहजे में बोला, “शायद मैं केस हार जाऊंगा।”

“नहीं, ” सुषमा के मस्तिष्क को एक झटका-सा लगा।

“हां, सुषमा दूसरी पार्टी के पास केस लड़ने के लिए पैसे की कमी नहीं है। मैं जिस फर्म से निकाला गया हूं, उसके सारे कर्मचारी मेरे विरुद्ध गवाही दे रहे हैं। तुम्हारा भाई प्रदीप तक मेरे खिलाफ गवाही दे रहा है।”

“हे भगवान्! अब क्या होगा!?” सुषमा की आवाज भर्रा गई।

“होगा क्या? सजा, बदनामी। और उसके बाद कोई फर्म मुझे नौकरी नहीं देगी। सोचता हूं, मैं तुम्हारे लिए कितना मनहूस सिद्ध हुआ हूं। मेरे साथ शादी होते ही तुम्हारी परेशानियों का दौर शुरू हो गया।”

“नहीं-नहीं, भगवान के लिए ऐसा मत कहिए। पति तो पत्नी के लिए भगवान होता है। और भगवान कभी मनहूस नहीं होते। अब तो आपका दुःख भी मेरा ही दुख है। हम दोनों के दुख अलग-अलग थोड़े ही है।”

कृष्ण की आंखें भीग गई। उसने सुषमा का चेहरा दोनों हाथों में लेकर कहा- “तुम कितनी अच्छी हो। कितनी साफ और नेक दिल लेकिन मैं कितना कमीना हूं। मैं तुम जैसी देवी को धोखा दिया। शायद भगवान इसी अपराध का मुझे दंड दे रहे हैं।”

“कैसा धोखा?”

“सुषमा मैंने तुमसे छिपाया था कि मेरी नौकरी चली गई है। और मुझ पर गबन का केस चल रहा है। मेरे पास केस लड़ने के लिए पैसा नहीं था। बीस-पच्चीस हजार रुपए दोस्तों से लेकर खर्च कर चुका था। तुम तो जानती ही हो कि मैं कितना बुरा आदमी था। मैंने पैसे को कभी पैसा नहीं समझा। अंधाधुंध खर्च किया। शराब पर, ऐय्याशी पर और उसका परिणाम गरीबी की शक्ल में तुम्हारे सामने हैं।”

“मुकदमे के लिए और रुपयों की जरूरत थी। वकील बिना फीस लिए पेशी पर जाने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। गवाहों को तोड़ने के लिए भी रुपए की जरूरत थी। मैंने तुमसे शेयर खरीदने के बहाने जो रुपया लिया था, वकील और डाक्टरों को दे दिया। मैं शेयर नहीं खरीद सका।”

सुषमा के दिल को एक जोरदार धक्का लगा। उसे चक्कर-सा आ गया। आंखों के आगे अंधेरा छा गया।

कृष्ण ने आंखों में आंसू भरकर दोनों हाथों में उसका चेहरा ले लिया और भर्राई हुई आवाज में बोला-

“मैं जानता था कि यह जानकर तुम्हें दुख होगा। सचमुच मैं बहुत कमीना हूं। बहुत ही स्वार्थी और नीच हूं। लेकिन तुम्हारी सच्चाई, सादगी और शराफत ने मेरी आत्मा तक को झंझोड़ कर रख दिया है। अब मैं तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहता। हो सके तो मुझे क्षमा कर देना सुषमा।”

फिर वह सुषमा के हाथ अपनी आंखों से लगाकर रोने लगा।

सुषमा की आंखें भीग गई। उसने भर्राई आवाज में कहा-

“भगवान के लिए मुझसे बार-बार क्षमा मांग कर मुझे पाप में मत घसीटिए। मेरा जो भी कुछ है, सब आपका ही है।”

“तुम सचमुच कितनी महान हो सुषमा। अगर भगवान ने मुझे सजा से बचा लिया तो मैं तुम्हारे लिए मजदूरी करूंगा। ठेला खींचूगा। होटल में बैरागीरी करूंगा। लेकिन तुम्हें कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दूंगा।”

“घबराइए नहीं। भगवान ने चाहा तो आपको सजा नहीं होगी। मेरी पूजा और मेरा विश्वास अकारथ नहीं जायेगा।”

“सुषमा, पूजा और विश्वास अदालत के फैसले को नहीं बदल सकते। और न नोटों की गड्डियां बनकर मुझे मुक्त करा सकते हैं।”

“दूसरी पेशी कब है?”

“ठीक आठ दिन के बाद।”

“फैसला कब तक होगा?”

“आज आखिरी पेशी थी। फैसला अगली पेशी पर सुनाया जाएगा। अगर सजा हुई तो पांच साल से कम की नहीं होंगी।”

“कोई उपाय नहीं है इस सजा से बचने का?”

“है क्यों नहीं। अगर गबन की रकम फर्म को दे दी जाए तो केस खत्म हो सकता है।”

“आप मेरे गहने बेच दीजिए। यह फ्लैट और कार बेच दीजिए और गबन की रकम लौटा दीजिए। हम झोपड़ी में रह लेंगे।”

“नहीं!” कृष्ण ने फीकी-सी मुस्कराहट के साथ कहा, “सचमुच तुम बहुत सीधी हो। क्या तुम्हारे गहने, फ्लैट और कार बेचकर दस लाख रुपये इकट्ठे हो सकते हैं?”

“दस लाख!”

“हां सुषमा। इन लोगों का कमीनापन देखा। मैंने दस लाख का गबन किया है। दोस्तों से कर्ज लेकर केस लड़ रहा था। तुम्हारा एक लाख रुपया भी फूंक दिया। तुम्हीं सोचो मैं दस लाख रुपया कैसे इकट्ठा कर सकता हूं!”

सुषमा का दिमाग बुरी तरह झनझना रहा था। भयंकर आंधियां और तूफान मचल रहे थे। और उसके कानों में एक ही आवाज गूंज रही थी-दस लाख-दस लाख-दस लाख।

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सुषमा सारी रात सो नहीं सकी। कृष्ण ने खाना भी नहीं खाया था और एक क्वार्टर व्हिस्की हलक में उंड़ेलकर बेखबर सो गया था। लेकिन सुषमा सारी रात करवटें बदलती रही थी और सोचती रही थी कि इतनी बड़ी रकम का इन्तजाम कैसे किया जाए? और अगर इन्तजाम नहीं हुआ तो कृष्ण को सजा हो जाएगी और वह कम-से-कम पांच साल के लिए जेल चला जाएगा।

पांच वर्ष वह अकेली कैसे बिताएगी। कोई और सहारा देने वाला भी तो नहीं है। क्या उसे फिर अपनी पुरानी जिन्दगी में लौट जाना पड़ेगा।

सुषमा के कानों में घंटियां-सी बजने लगीं। उनके बीच घनश्याम की आवाज गूंज रही थी। दौलत को ठोकर मारकर उसे अपना दुश्मन मत बनाइए। निर्धनता मानव जीवन का सबसे भंयकर अभिशाप है। इसका आपको अनुमान नहीं है। मैं आपको एक लाख से दस लाख तक एडवांस देने को तैयार हूं। आपको निर्णय करने के लिए एक सप्ताह का समय देता हूं....मैं आपको एक लाख से दस लाख तक एडवांस देने को तैयार हूं।- मैं आपको एक लाख से दस लाख तक एडवांस देने को तैयार हूं।

अगर कृष्ण को सजा होने के बाद मुझे उस जिन्दगी में वापस जाना पड़ा तो क्या लाभ? अगर वापस जाना ही है तो क्यों न अपने पति को सजा से बचा लूं? लेकिन-क्या कृष्ण भी राजी हो जायेगा दोबारा उसके मॉडल बनने पर?

वह सोचती रही फिर बिना किसी निर्णय पर पहुंचे ही उसकी आंख लग गई।

सपने में उसने कृष्ण को सजा होते देखी। कृष्ण हथकड़ियां पहनकर जेल चला गया है और वह किसी के घर बर्तन मांज रही है। झाडू दे रही है। घर का मालिक उसे दबोच लेता है- कभी वह किसी स्कूल में पढ़ा रही है। स्कूल से लौटते हुए रात हो जाती है। वह वापस आ रही है। अचानक कुछ गुण्डे उसे घेर लेते हैं। वह किसी ऑफिस में काम कर रही है। उसका बॉस उसे बुलाता है और साउन्ड-प्रूफ कमरा बन्द करके उसे दबोच लेता है। फिर वह देखती है कि वह सड़क-पर बेतहाशा भाग रही है। उसके पीछे-पीछे बहुत सारे आदमी कहकहे लगाते हुए दौड़ रहे हैं। कोई उसकी साड़ी खींचता है। कोई बांह पकड़ता है। कोई उसे दबोच लेना चाहता है।

सुषमा का सारा बदन पसीने में तर हो गया। फिर उसने अचानक देखा कि उसके और आदमियों की उस भीड़ के बीच एक आदमी आ खड़ा होता है। वह भीड़ और उसके बीच एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा हो जाता है।

वह कृष्ण है।

अचानक उसकी आंख खुल गई। उसने देखा, वह पसीने में तर थी। दिन की धड़कनें कनपटियों पर धमक रही थीं। सांस धौंकनी की तरह चल रही थी।

लेकिन कृष्ण बेसुध सोया पड़ा था। उसका पति कृष्ण, वास्तव में औरत को एक मर्द का सहारा कितनी जरूरी है। उसे कृष्ण पर प्यार आ गया और उसके कन्धे पर गाल टिका कर लेट गई और आंखें मूंद लीं। उसे लगा जैसे उसके सिर पर से कोई बहुत बड़ी बला टल गई हो।

उसने निर्णय कर लिया कि भले ही कुछ भी हो वह कृष्ण को सजा नहीं होने देगी।

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कृष्ण चुपचाप नाश्ता कर रहा था। उसके माथे पर शिकने थीं और आंखों में उलझन के चिह्न।

सुषमा चुपचाप कृष्ण को देख रही थी।

सहसा कृष्ण ने उसकी ओर देखकर चौंककर कहा-

“अरे, तुम नाश्ता नहीं कर रहीं?”

“करूंगी, पहले आप कर लीजिए।”

“मैं तो कर चुका हूं। मैंने इतनी देर से देखा ही नहीं था कि तुम इसी तरह हाथ पर हाथ धरे बैठी हो।”

“मैं आपको देख रही थी। आप बहुत उलझन में डूबे हुए हैं।”

“क्या करूं सुषमा, उलझन के सिवा जिन्दगी में अब रह ही क्या गया है।”

“इस उलझन का कोई हल सोचा है आपने?”

“एक ही हल है लेकिन सफलता की आशा बहुत ही कम है।”

“वह क्या?”

“जाकर फर्म के मालिक के पांव पकड़ लूं। अपनी भूल मानकर उनसे गिड़गिड़ा कर अपनी जिन्दगी की भीख मांगू। और उनसे कहूं कि मुझे फिर वही नौकरी दे दें और मेरी तनख्वाह में से अपनी रकम काटते रहें।”

“अगर वह न माने तो?”

“तो, हथकड़ियां पहनने से पहले कुछ खा लूंगा।”

“आत्महत्या करेंगे?” सुषमा कांप उठी।

“तो फिर क्या करूं?”

“एक हल है। अगर आप आज्ञा दें तो।”

“वह क्या?”

“मैं फिर से मॉडलिंग शुरू कर दूं।”

“क्या?” कृष्ण हड़बड़ाकर खड़ा हो गया- “नहीं, नहीं। यह नहीं हो सकता। मेरी पत्नी लोगों के सामने इस तरह अपने शरीर की नुमाइश करे। यह मैं हरगिज बर्दाशत नहीं कर सकता।”

“मेरी बात तो सुनिए,” सुषमा ने कहा, “देखने वाले सिर्फ तस्वीरें ही तो देखते हैं। और फिर आप ही ने तो कहा था कि आदमी की अपनी नीयत साफ होनी चाहिए।”

“लेकिन सुषमा, इससे मेरे खानदान की बदनामी होगी।”

“मैंने उसका भी हल सोच लिया है।”

“आप किसी को यह मत बताइए कि मॉडल गर्ल सुषमा, आपकी पत्नी हैं वैसे भी विवाह हो जाने के बाद माडलिंग गर्ल की मार्केट ठंडी पड़ जाती है। मैं भी किसी को नहीं बताऊंगी कि मैं विवाहिता हूं।”

“लेकिन तुम तो मां बनने वाली हो। हमारा पहला बच्चा होने वाला है।”

“इस बीच मैं किसी बहाने से छुट्टी ले लूंगी। हम दोनों कहीं दूर चले चलेंगे। किसी को कानों-कान खबर भी न होगी।”

“लेकिन इतना बड़ा रिस्क लेने पर भी क्या दस लाख रुपये का इन्तमाज हो जाएगा?”

“हां, हो जाएगा।”

“किस तरह?”

“मैं पहले जहां काम करती थी मुझे वहां फिर काम मिल जाएगा। पीछे उन्होंने कई बार फोन किया था। कल कम्पनी के मालिक घनश्याम खुद भी आए थे। उन्होंने एक लाख से दस लाख तक एडवान्स देने के लिए कहा था।”

“दस लाख?” कृष्ण की आंखें फट गई।

“आपको शायद मालूम नहीं इन दिनों मैं मार्केट में टॉप पर हूं। उनके यहां जितने भी आर्डर आते हैं, उनमें सबकी मांग सुषमा वर्मा ही होती है। मेरे काम न करने के कारण, उनकी कम्पनी ठप होती चली जा रही है। इस समय दो बड़ी कम्पनियों, लीवर ब्रदर्स और टाटा ने भी मेरी फर्माइश की है। उन्होंने उनसे एक सप्ताह की मोहलत ले ली है।”

कृष्ण कुछ सोचते हुए धीरे-से बैठ गया।

“दस लाख आज ही मिल जायेंगे और आप केस से मुक्त हो जायेंगे। उसके बाद कोई और नौकरी तलाश कर लीजिएगा। जब सावित्री एडवर्टाइजर्स के दस लाख पूरे हो जायेंगे तो मैं काम छोड़ दूंगी।

“यह निर्णय तुमने सोच समझकर किया है?”

“केवल आपकी आज्ञा की देर है।”

“तुम्हें किसी तरह का खतरा तो नहीं है।”

“बिल्कुल नहीं। अगर आप जेल में न हो तो।”

“तो फिर सुषमा, आदमी को मौका कभी नहीं खोना चाहिए।”

“क्या मतलब?”

“तुम उन लोगों से दस के बजाय पन्द्रह लाख मांगो। इस शर्त पर कि जब तक तुम न कहोगी यह रकम काटी नहीं जाएगी। दस लाख देकर मैं छुटकारा पा जाऊंगा। इस फ्लैट को बेचकर हम कोई दूसरा फ्लैट ले लेंगे। ताकि लोग मुझे और तुम्हें देखकर पहचान न सकें। दूसरी बात, मैं अब नौकरी के झंझट में नहीं फंसना चाहता। नौकर काम करते हैं और मालिक कुर्सी तोड़कर लखपति बन जाते हैं। पांच लाख रुपयों से मैं अपना कन्स्ट्रक्शन का काम शुरू कर दूंगा। आजकल इस बिजनेस की बड़ी वैल्यू है। ‘रहेजा’ बिल्डर्स को देखो। देखते-ही-देखते अरबपति हो गए। ‘रिजवी’ बिल्डर्स को देखो। आज कहां है। मैं डिजाइनर हूं। मैं भी ‘सुषमा बिल्डर्स’ के नाम से फर्म खोल लूंगा। फिर हम किसी के मोहताज नहीं रहेंगे। और न हमारे बच्चे हर महीने मेरी तनख्वाह की राह देखा करेंगे।”

“आप ठीक कहते हैं।” सुषमा ने जैसे सपने में डूबे-डूबे कहा, “हमारा अपना कारोबार होगा। शानदार बंगला होगा। और हम अपने बच्चों के साथ आराम से रहेंगे।”

कृष्ण उसके चेहरे को देखता रह गया।

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घनश्याम सुषमा को देखते ही हड़बड़ाकर खड़ा हो गया। उसे ऐसी खुशी हुई जैसे कोई बहुत बड़ा खजाना उसके हाथ लग गया हो।

उसने हर्ष-भरे स्वर में कहा- “आइए, आइए मिस वर्मा! मैं जानता था कि आप जरूर आयेंगी। पधारिए।”

“धन्यवाद।” सुषमा ने कहा और बैठ गई।

घनश्याम ने पूछा-

“कहिए, कोल्ड-ड्रिन्क लेंगी या चाय कॉफी?”

“कुछ नहीं। इस समय तो केवल काम की बात।”

“हां, हां, आज्ञा कीजिए।” घनश्याम के स्वर में बेचैनी थी।

“देखिए, मेरी सबसे पहला शर्त है, पन्द्रह लाख एडवान्स।”

“चलिए, स्वीकार है।”

“दूसरी शर्त है, पहले एक फिल्म के लिए जो पारिश्रमिक मुझे मिलता था उससे तीन गुना पारिश्रमिक लूंगी।”

“ठीक है।”

“तीसरी शर्त है- जब मैं चाहूंगी और जितने दिनों के लिए चाहूंगी मुझे छुट्टी देनी पड़ेगी। लेकिन जाने से पहले एक-एक हफ्ते में तीन-तीन हफ्ते का काम निबटाकर जाऊंगी। और आने के बाद इसी तरह का काम पूरा कर दूंगी।”

“क्या इस शर्त के पीछे कोई विशेष कारण है?”

“वैसे तो यह मेरा पर्सनल मामला है। इससे आपको कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। फिर भी आपको बता देने में कोई हर्ज नहीं है। मेरे एक बहुत ही निकट के रिश्तेदार को कैंसर हो गया है। उन्हीं के लिए मैं यह सब कर रही हूं। उन्हें इलाज के लिए अमेरिका भेज रही हूं। हो सकता है बीच-बीच में मुझे भी जाना पड़े।”

“कोई बात नहीं। हमें आपकी हर शर्त मंजूर है। लेकिन हमारी भी एक शर्त होगी।”

“बताइए।”

“हम आपसे एक नया कान्ट्रेक्ट करेंगे। जिसके अनुसार आपको पांच वर्ष तक केवल हमारी कम्पनी में ही काम करना पड़ेगा। पांच वर्ष के बाद इस अवधि को आपकी इच्छा से बढ़ाया जा सकता है या कान्ट्रेक्ट खत्म किया जा सकता है।”

“मुझे स्वीकार है।” सुषमा ने ठंडी सांस लेकर कहा।

20

सुषमा हड़बड़ाकर जल्दी से उठकर बैठ गई। उसने देखा जूली उसके बिस्तर के पास जमीन पर बैठी थी और रजाई पर गाल रखे बेखबर सो रही थी। सुषमा का बदन थरथर कांप उठा। उसने भयभीत नजरों से उस खिड़की की ओर देखा। जिसके अन्दर से एक स्याहपोश को निकलते देखा था। और जिसे देखते ही वह चीख मारकर जाग उठी थी। लेकिन खिड़की बन्द थी। बेडरूम में हल्की-हल्की चांदी जैसी सफेद रोशनी फैली हुई थी।

लेकिन सुषमा को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह झिलमिल चांदनी में किसी ऐसे बियावान और विस्तृत जंगल में खड़ी हो जिसमें हर ओर से मौत का खतरा मंडरा रहा हो।

अपने दिल को तसल्ली देने की कोशिश करती हुई वह धीरे-से सरककर लेट गई। पहले उसका जी चाहा कि वह जूली को जगाकर कह दे कि वह अपने कमरे में जाकर सो जाए। लेकिन फिर न जाने क्यों उसे ऐसा लगा कि आज की रात उसके लिए बड़ी भारी रात है। बैडरूम में अकेला नहीं रहना चाहिए।

वह कुछ देर तक जूली के मासूम चेहरे को देखती रही। फिर उसकी नजरें कार्निस पर रखी टाइमपीस पर चली गई जिसकी टिकटिक की आवाज ने उसे अपने दिल की धड़कनों में घुलती हुई-सी महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे उसकी आंखों के सामने एक दृश्य उभर आया। वह किसी फिल्म की शूटिंग कर रही है। और शूटिंग करते-करते उसे हल्का-सा चक्कर आ जाता है।

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जैसे आंखों के आगे अचानक अंधेरा छा गया। सुषमा के हाथ से कपड़े का वह टुकड़ा छूटकर हवा में लहराता हुआ चला गया जिसके कारखाने की विज्ञापन फिल्म बन रही थी।

डायरेक्टर ने चिल्लाकर कहा- “कट-कट-कट-।”

फौरन कैमरे का स्विच ऑफ कर दिया गया। उसकी साथी लड़कियों ने लपककर उसे संभाल लिया। घनश्याम ने तेजी से उसके पास आकर कहा- “क्या बात है मिस वर्मा? आपकी तबीयत तो ठीक है?”

तब तक सुषमा अपने आपको संभाल चुकी थी। उसने जल्दी-से कहा-

“आई एम आल राइट, कैरी ऑन।”

“नो मिस वर्मा, आप हमारी कम्पनी के लिए बहुत मूल्यवान हैं। हम आपको दांव पर नहीं लगा सकते। शूटिंग कल भी हो सकती है। आज आप आराम कीजिए।”

“थैंक्स बॉस।”

घनश्याम ने पैक-आप करने का आर्डर दिया और सुषमा को उसकी कार तक छोड़ने आया था।

सुषमा ने कार के पास आकर कहा-

“मुझे अफसोस है, आपका काफी नुकसान होगा।”

“हमारा नुकसान आपकी सेहत से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। लेकिन बात क्या है? लगता है, आप किसी मानसिक उलझन में फंसी हुई हैं।”

“शायद आपका अनुमान ठीक है।” सुषमा ने धीरे से कहा, “असल में मेरे जो रिश्तेदार अमेरिका में कैंसर का इलाज करा रहे हैं, जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। मैं उन्हें अपने सगे माता-पिता से भी अधिक प्यार करती हूं। मेरी अनुपस्थिति में उन्हें कुछ हो गया तो मैं अपने आपको जीवन-भर क्षमा नहीं कर सकूंगी।”

“कब मिली थी आपको यह खबर?”

“कल ही तो मिली थी।”

“तो आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

“यही सोचकर कि आपके पास काम बहुत है। मेरी अनुपस्थिति से आपको बहुत नुकसान होगा।”

“मिस वर्मा, आपकी महीने-दो-महीने की अनुपस्थिति से हमें थोड़ा बहुत नुकसान होता है। लेकिन उसे हम कुछ हफ्तों में कवर कर लेते हैं। आप हमारी कम्पनी के लिए इतनी मेहनत करती हैं तो क्या वह हमारा कर्तव्य नहीं कि हम आपका ध्यान रखें।”

“आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

“आप जब भी चाहें, छुट्टी लेकर अमेरिका चली जाएं।”

“मैं आपको कल बता दूंगी।”

“ओ. के. अगर आप ड्राइविंग कर पाने की स्थिति में न हों तो मैं अपना ड्राइवर भेज दूं?”

“नो थैंक्स- अब मैं ठीक हूं।”

घनश्याम ने कार का दरवाजा खोल दिया। सुषमा कार में जा बैठी। कुछ देर के बाद उसकी कार सड़क पर दौड़ रही थी।

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सुषमा को बड़े गोपनीय ढंग से डाक्टर निर्मला सिंह इंस्पेक्शन रूम में ले गई। जिनके चेहरे पर हम समय ममता-भरी नमीं रहती थी। उन्होंने सुषमा का अच्छी तरह निरीक्षण किया और फिर प्यार-भरी मुस्कराहट के साथ कहा-

“बेटी, तीसरा महीना लग चुका है। अगले महीने से तुम इसे छिपा नहीं सकोगी।”

सुषमा सोच में पड़ गई।

डॉक्टर निर्मला सिंह ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुए पूछा- “किस सोच में पड़ गई तू?”

“आंटी, सोचती हूं- इस समय-?” सुषमा कहते-कहते रुक गई।

“देखो बेटी,” निर्मला सिंह ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मैं जानती हूं, तुम एक ऐसे प्रोफेशन में हो, जिसमें मां बनने के बाद औरत की इमेज खत्म हो जाती है। और फिर धीरे-धीरे उसका मार्केट ठंडा होता चला जाता है। लेकिन तुम केवल एक बच्ची की मां हो। और वह भी तीन-सवा तीन साल से ज्यादा की नहीं है। इन तीनों सालों में तुम उसे उसके तीन भाई-बहनों से वंचित कर चुकी हो। कोई ऑपरेशन ऐसा भी हो सकता है कि तुम मां बनने के लिए तरसती रह जाओ। इस बार तुम्हारी हालत और तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि तुम बेटे की मां ही बनोगी। तो फिर क्यों अपनी बच्ची को भाई से वंचित करना चाहती हो? तुम्हें भी तो बुढ़ापे का सहारा चाहिए। बेटी तो दूसरे घर चली जायेगी। लेकिन बेटा तो तुम्हारे घर का चिराग बनेगा।”

सुषमा की आंखों में एक विचित्र-सी चमक लहराई। और फिर वह किसी सोच में डूब गई।

निर्मला सिंह ने उसकी ठोड़ी पकड़कर पूछा-

“क्या सोचने लगी बेटी?”

“जी, मैं सोच रही थी कि सिर्फ एक ही वर्ष की तो बात है। उसके बाद मुझे कान्ट्रेक्ट से मुक्ति मिल जाएगी। मेरे पति ने दिल्ली में जो बिजनेस शुरू किया है वह भी ठीक ढंग से सैट हो चुका होगा। मैं चुपके से दिल्ली चली जाऊंगी। वहां कोई मुझे जान भी न पायेगा कि मैं वही सुषमा वर्मा हूं जो कभी सर्वश्रेष्ठ मॉडल गर्ल मानी जाती थी।”

“तुम्हारे पति का बिजनसे कितना चल चुका है?”

“अच्छा खासा है। एक बंगला ले लिया है। कार ले ली है। हर सप्ताह मुझसे मिलने आते हैं। शनिवार की रात को प्लेन से आते हैं। और सोमवार को सुबह के प्लने से चले जाते हैं। इसीलिए मैं आज तक आपको उनसे नहीं मिला सकी।”

“मैं बिना मिले ही जान चुकी हूं कि तुम एक-दूसरे को कितना प्यार करते हो। लेकिन मैं चाहती हूं कि तुम इस बार डॉली के भाई को आने ही दो।”

“कल शनिवार है। वह कल रात आयेंगे। मैं उनसे सलाह करके आपको बता दूंगी।”

“बताओगी क्या, तुम उन्हें मेरे पास ले आना। मैं उसके कान खींचकर उससे कहूंगी कि अब मेरी बेटी को ज्यादा तकलीफ मत दो।”

अचानक टेलीफोन की घंटी बज उठी। निर्मला सिंह ने रिसीवर उठा लिया.... “यस?”

फिर वह कुछ मिनट तक कुछ सुनती रहीं। फिर सुषमा से बोलीं-

“बेटी, शायद किसी ने तुम्हारी कार पहचान ली है।”

“क्या मतलब?” वह उछल पड़ी। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“एक हस्बेंड़-वाइफ आये हैं। हस्बेंड पूछ रहा था कि यह गाड़ी तो मॉडल गर्ल सुषमा वर्मा की लगती है। नर्स ने उसे झुठला दिया है।”

“यह तो बड़ी गड़बड़ हुई। अब मैं बाहर कैसे जाऊंगी।”

“तुम बराबर वाले कमरे में जाकर बैठो। क्योंकि बाहर निकलने के लिए तो तुम्हें हॉल में से ही जाना पड़ेगा।”

“लेकिन इतनी रात में भला कौन आ गया?”

“कभी-कभी जरूरतमंद आ जाते हैं। मेरा जी तो नहीं चाहता लेकिन औरत हूं इसलिए दया आ जाती हैं। सोचती हूं, इस एक औरत की वजह से औरतों की पूरी जात ही बदनाम हो जायेगी।”

सुषमा दूसरे कमरे में चली गई।

“कुछ देर के बाद डॉक्टर निर्मला सिंह के कमरे में किसी आदमी की आवाज सुनाई दी-

“हैलो डॉक्टर-।”

“हैलो।”

आदमी की आवाज सुनकर सुषमा बुरी तरह चौंक पड़ी। उसका मस्तिष्क सांय-सांय करने लगा। उसने दरवाजे में जरा सी झिरी बनाकर देखा तो उसे लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर कोई बम दे मारा हो। क्योंकि वह आदमी और कोई नहीं, उसका पति कृष्ण ही था जिसके साथ एक लड़की थी। वह लड़की बम्बई के होटलों की सब से अधिक प्रसिद्ध और रईसजादों की चहेती सोसायटी गर्ल थी जो बम्बई में हीरोइन बनने का सपना लेकर आई थी। लेकिन दलालों के जाल में फंसकर हीरोइन बनने का सपना लेकर आई थी। लेकिन दलालों के जाल में फंसकर हीरोइन बनने के बजाय कालगर्ल बन गई थी। लेकिन उसने बहुत जल्दी अपने आपको इस पेशे में ढालकर अपनी कीमत बढ़ा ली थी। उसे अपने धन्धे के सारे गुर मालूम हो गए थे।

सुषमा को लगा जैसे उसका दिल बैठा जा रहा हो।

कृष्ण निर्मला सिंह से कह रहा था-

“डॉक्टर आंटी, यह मिसेज सक्सेना हैं।”

“मिसेज रूबी सक्सेना, “निर्मलासिंह ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा, “यानी तुम्हारी तीसरी पत्नी।”

“जी-।”

“पहली बार तुम्हारे साथ नीमा कोहली थी। दूसरी बार मिसेज अमानत थी और अब मिसेज सक्सेना।”

“आपको याददाश्त बहुत तेज है आंटी।” कृष्ण मुस्कराया।

“आपका पहला नाम मिस्टर अशोक था। पता नहीं आपका असली नाम क्या है-।” तो मिस्टर अशोक अगर डॉक्टर को याददाश्त कमजोर हो जाए तो वे फेफड़ों के बजाय दिल का ऑपरेशन कर बैठे। अब आप अपना उद्देश्य बताइए।”

“उद्देश्य?” कृष्ण ने ठंडी सांस लेकर मुस्कराते हुए कहा, “जब आप उद्देश्य जान ही चुकी हैं तो फिर हमसे क्यों पूछ रही हैं?”

फिर उसने नोटों की एक गड्डी डॉक्टर के सामने फेंकते हुए कहा-

“आपकी फीस एडवांस। दस हजार। कल का टाइम बताइए।”

फिर न जाने क्या-क्या बातें होती रहीं। सुषमा उन्हें सुन नहीं पाई। क्योंकि उसके दिल और दिमाग में तो आंधियां चल रही थीं।

21

रूबी की चाल में थोड़ी-सी लड़खड़ाहट और आंखों में नशे की लाली थी। वह जब हैंडिल घुमाकर कमरे में पहुंची तो अपने सामने एक औरत को बैठा देखकर उछल पड़ी। उस औरत का चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।

रूबी लड़खड़ाती हुई पलटकर बोली-

“आइ एम सारी- मैं शायद गलत कमरे में आ गई।”

“नहीं मिस रूबी, आप सही कमरे में ही आई हैं। मैंने ही आपको एंगेज किया है। यह रही आपकी फीस।”

सुषमा ने धीरे-से कहा और पर्स से नोटों की एक गड्डी निकालकर मेज पर डाल दी।

रूबी ने नोटों की गड्डी उठा ली और फिर कहकहा लगा कर बोली-

“कमाल है। लगता है जैसे मैं कोई सपना देख रही हूं।”

“मैंने भी एक सपना देखा था। बहुत ही भयानक और डरावना। मैं आपसे उसी सपने के बारे में जानना चाहती हूं। आप भी औरत हैं। और मैं भी औरत हूं। इसलिए आप मेरे दुःख को जरूर समझेंगी।”

रूबी के होंठों की मुस्कराहट अचानक गायब हो गई। उसने नोटों की गड्डी वापस मेज पर रख दी और सुषमा की ओर देखकर सहानुभूति भरे स्वर में बोली-

“मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूं बहन?”

“कल रात आप जिस आदमी के साथ थीं उसका नाम क्या है?”

“किस समय? कल मैं सुबह से रात के ग्यारह बजे तक थी। ग्यारह बजे के बाद शिफ्ट बदल गई थी।”

“जो आदमी आपको डॉक्टर निर्मला सिंह के यहां ले गया था।”

“ओह, वह-मिस्टर के. के. यानी कृष्ण कुमार अग्रवाल।”

“आप उन्हें कब से जानती हैं।”

“जानती तो दिल्ली कॉलेज से ही हूं। जब हम दोनों साथ-साथ पढ़ते थे। नई मुलाकात यहां आकर हुई, जब मैं एक शरीफ घरेलू लड़की से रूबी बन चुकी थी।”

“कितने दिन पहले की बात है?”

“दो महीने हो गए।”

“क्या वह दो महीने से लगातार आपके साथ ही हैं?”

चढ़ते सूरज की सभी पूजा करते हैं। मुझे स्थायी रूप से कई रईस अपने साथ रखना चाहते थे। मैंने कहा जो सबसे ज्यादा बोली लगायेगा मैं उसी के साथ रहूंगी। सबसे बड़ी बोली कृष्ण ने लगाई थी। तभी से मैं उनके साथ हूं। हम दोनों कल तक एक-दूसरे के पाबन्द थे। लेकिन अब हमारा समझौता समाप्त हो चुका है। उसने मुझे एक मुसीबत से छुटकारा दिलाया है। वह मुझे अपने बंगले में रखेगा और अब मैं केवल उसी तक सीमित रहूंगी।”

“बंगला? कहां है उसका बंगला?” सुषमा ने आश्चर्य से पूछा।

“उसका अपना नहीं है, किराये का है। दो हजार रुपये महावार में मालाबार हिल पर। एक पारसी बुढ़िया का बंगला है। वह भी एक कमरे में वहीं रहती है। उसे कृष्ण की रंगीनियों पर कोई आपत्ति भी नहीं है।”

“क्या आपको पता है कि आपसे पहले कोई और लड़की भी कृष्ण के साथ रहती थी?”

“पारसी बुढ़िया कह रही थी कि बम्बई की शायद ही कोई सोसायटी गर्ल उससे बची होगी। उसका एक दलाल है जो दस-पन्द्रह दिन के बाद किसी-न-किसी विदेशी घुमक्कड़ लड़की को ले आता है। कभी अमेरिकन, कभी ईरानी, कभी थाईलैंड की और कभी अफ्रीकन-!”

“उसका मासिक खर्च तुम्हारे अनुमान से कितना होगा?”

“कम-से-कम पन्द्रह हजार,” रूबी ने कहा और फिर सुषमा को बड़े ध्यान से देखते हुए बोला, “लेकिन तुम उसके बारे में इतनी इन्क्वारी क्यों कर रही हो?”

“बहन, किसी आदमी के बारे में इस तरह की पूछताछ कौन औरत कर सकती हैं?”

“ओह!” रूबी के मस्तिष्क को एक झटका-सा लगा। फिर वह धीरे से बोली, “इसका मतलब है कि तुम कृष्ण की पत्नी हो। लेकिन वह तो कहता है कि मैं अभी तक कुंवारा हूं।”

“कहने से न तो वह कुंवारा हो सकता है और न सच्चाई झूठ में बदल सकती है।”

रूबी सन्नाटे में रह गई।

सुषमा ने भर्राई हुई आवाज में कहा-

“अच्छा बहन, तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद।”

लेकिन जब सुषमा दरवाजे की ओर बढ़ने लगी तो रूबी ने पलटकर कहा- “ठहरो बहन-?”

सुषमा ठिठककर रुक गई।

रूबी ने नोटों की गड्डी उठाकर उसके पास आकर कहा-

“पहली बात-तुमने जो मुझसे पूछा है उसके बारे में कृष्ण को कुछ बताऊं या नहीं?”

“इस समय अगर कुछ न कहोगी तो मैं तुम्हारी आभारी होऊंगी।”

“दूसरी बात- तुम्हारी आवाज इतनी सुन्दर और आकर्षक है। तुम्हारे हाथ-पांव इतने खूबसूरत है। मुझे पूरा-पूरा विश्वास है कि तुम्हारा चेहरा भी इतना ही सुन्दर होगा। क्या मैं तुम्हारे चेहरे की एक झलक देख सकती हूं?”

“क्या करोगी देखकर?”

“यह देखना चाहती हूं कि तुम जैसी पत्नी के होते भी कृष्ण परायी औरतों के पीछे क्यों भागता रहता है। अगर मेरी जैसी औरत का पति ऐसा करे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।”

“क्या मतलब?”

“बहन!” रूबी की आवाज भर्रा गई। “जब मैं दिल्ली कॉलेज में पढ़ रही थी। तब मैं कई बार ब्यूटी कम्पीटीशन में फर्स्ट आई थी। ड्रामों में हमेशा हीरोइन के रोल किए। उस जमाने में मेरे कॉलेज का एक गरीब लड़का मुझसे प्यार करता था। मैं अक्सर उसके प्यार का मजाक उड़ाया करती थीं। एक लड़का भी मेरा मित्र था जो मुझे बम्बई के कई फिल्म-डायरेक्टरों के जाली पत्र दिखा कर कहा करता था कि उसके पीछे कई फिल्म डायरेक्टरों से बहुत ही घनिष्ट सम्बन्ध हैं। वह मुझे बड़ी आसानी से फिल्मों में हीरोइन का रोल दिला सकता है। मैं उसके झांसे में आ गई। और मैंने बिना कुछ सोचे-समझे अपने आप को उसके हवाले कर दिया।”

रूबी एक पल रुकी और फिर ठंडी सांस भरकर बोली-

“लेकिन कुछ दिनों के बाद ही हम दोनों के मिलाप का फल प्रकट होने लगा। मैं घबरा उठी। मैंने उस लड़के को बताया तो वह उसी दिन से गायब हो गया। उसकी फाइनल परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। मुझमें इतना साहस न था कि मैं किसी लेडी डॉक्टर से सहायता लेती या और किसी से इस बात की चर्चा करती।

“जब मुझे और कोई रास्ता सुझाई न दिया तो मैंने एक दिन उस गरीब लड़के के पैरों में गिरकर गिड़गिड़ा कर कहा कि मेरी इज्जत उसके हाथों में है। वह मुझे एक मन्दिर में ले गया और उसने मेरे साथ शादी कर ली। लेकिन इस बात पर नाराज होकर मेरे पिता ने मुझे घर से ही नहीं निकाल दिया बल्कि उत्तराधिकार से भी वंचित कर दिया। मैं उस लड़के के साथ बम्बई चली आई। यहां आकर हम दोनों नौकरी खोजने लगे।

“तभी मैं कुछ दलालों के जाल में फंस गई। उन्होंने मुझे हीरोइन बनवा देने का झांसा दिया। और फिर मैं हीरोइन के बजाय सोसायटी गर्ल बन गई। दूसरी बार आबरू लुटने के बाद मुझमें इतना साहस नहीं रह सका था कि मैं अपने पति का सामना कर सकूं। मैंने डाक्टर निर्मला सिंह की सहायता से मुसीबत से छुटकारा पा लिया और फिर अपने गरीब पति के पास वापस नहीं गई। क्योंकि मुझे अपना पहला वाला मालदार प्रेमी मिल गया था। जानती हो बहन, वह कौन था?”

“कौन?”

“कृष्ण।”

सुषमा के मस्तिष्क को एक जोरदार झटका लगा।

रूबी ने भर्राई हुई आवाज में कहा-

“पहले तो मेरा जी चाहा था कि इसका खून कर दूं। लेकिन फिर मैंने सोचा कि इसका खून कर देने से मुझे कोई लाभ नहीं होगा। बल्कि इससे मित्रता कर लेने से लाभ होगा। और मैंने उसके साथ फिर मित्रता कर ली।”

“कृष्ण को अपनी पहली करतूत पर कोई लज्जा नहीं आई?” सुषमा बोली।

“नहीं। जिनकी आत्मा मर जाती है उन्हें किसी बात पर कोई ग्लानि नहीं होती।”

कुछ देर तक खामोशी छाई रही। फिर रूबी ने कहा-

“बहन, क्या तुम मेरी छोटी-सी कामना पूरी नहीं करोगी।”

“मैं क्षमा चाहती हूं बहन। मेरी बात का बुरा मत मानना। लेकिन शायद यह अवसर उचित नहीं है। लेकिन जब कोई अवसर आयेगा तो कृष्ण की पत्नी की हैसियत से में तुम्हें अपनी सूरत दिखाऊंगी। शायद यह अवसर जल्द ही आ जाए।”

“मैं समझ गई जो तुम कहना चाहती हो।”

“ऐसी सूरत में क्या मैं तुम्हें कृष्ण के बंगले पर ही तलाश करूं?”

“नहीं!” रूबी ने कड़वाहट-भरे लहजे में कहा, “शायद कृष्ण के बंगले में मैं अन्तिम बार ही जाऊं। अपना सामान लाने के लिए।”

“फिर?”

“किसी भी होटल में। किसी भी नाइट क्लब में। अब रूबी इतनी अप्रसिद्ध नहीं कि तुम उसे खोज न सको।”

“अच्छा बहन, धन्यवाद।”

सुषमा ने कहा और दरवाजे की ओर बढ़ने लगी।

“ठहरो बहन।”

“हां, कहो।”

“ये रुपये तो लेती जाओ। तुमने मेरे समय का मूल्य चुकाया है। और अब मैं तुम्हें एक बहन के नाते इन्हें प्रेजेन्ट के रूप में दे रही हूं।”

सुषमा ने चुपचाप रुपये पर्स में रख लिए और तेजी से बाहर निकल आई।

थोड़ी देर के बाद उसकी कार सड़क पर दौड़ रही थी।

उसके दिमाग में जैसे एक भूचाल आया हुआ था। तो यह बिजनेस किया था कृष्ण ने दिल्ली में जाकर। बिजनेस के बहाने उसने चार साल पहले पांच लाख रुपए ले लिए थे। और अब हर महीने दस-पन्द्रह हजार रुपये यह कहकर ले रहा था कि अभी शुरू-शुरू में बिजनसे में जितना भी लगाया जाये अच्छा है। जब तुम नौकरी छोड़ दोगी तब उसमें से पैसे निकालना शुरू करेंगे। इसका मतलब है वह मेरी मेहनत और मेरी दौलत को ऐय्याशी में फूंक रहा है। बंगला किराये पर ले रखा है। शराब और औरत उसकी जिन्दगी है। रूबी जैसी मासूम लड़की की जिन्दगी तबाह करने वाला भी वही है।

हे भगवान, वह कौन-सी महसूस घड़ी थी जब कृष्ण के साथ मेरे फेरे पड़े थे। और अब मैं उसके दूसरे बच्चे की भी मां बनने वाली हूं। कृष्ण जैसे बाप का मेरे बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? मैंने तो उसे भारतीय नारी की तरह भगवान मानकर पूजा था।

सुषमा का दिल भर आया। उसने कार सड़क के किनारे रोक दी और स्टेयरिंग पर सिर टिकाकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगी।

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सुबह जब सोकर उठी तो उसका सिर बहुत भारी था। आंखों के पपोटे सूजे हुए थे। उसने अपने बराबर बेसुध सोयी पड़ी डॉली को देखा। उसकी आंखें एकदम भर आईं। फिर उसने डॉली का माथा चूमा और उसके सिर पर हाथ फेरने लगी। वह गहरे सोच में डूबी हुई थी। कुछ उसने रिसीवर उठाकर नम्बर डायल किये और फिर रिसीवर कान से लगा लिया।

कुछ देर बाद दूसरी ओर से आवाज आई-

“यस-घनश्याम स्पीकिंग।”

“सर, मैं सुषमा बोल रही हूं।”

“ओहो, मिस वर्मा, क्या बात है? आपकी आवाज कुछ भारी लग रही है।”

“मेरी तबियत ठीक नहीं है। अमेरिका से खबर मिली है कि मेरे रिश्तेदार की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मुझे आज से ही छुट्टी मिल जाए?”

“आप जब भी चाहें, छुट्टी ले लीजिए।”

“थैंक्स-सर।”

सुषमा ने रिसीवर रख दिया और सोच में डूबी बैठी रही।

वह सोच रही थी कि दुनिया में कोई भी बिना लालच के किसी से नहीं जुड़ता क्या मतलब पूरा हो जाने के बाद सारे रिश्ते टूट जाते है? और जब तक मतलब पूरा नहीं होता लोग जोंक की तरह चिपटकर खून चूसते रहते हैं?

अचानक जूली की आवाज ने उसे चौंका दिया-

“मेम साहब, बैड टी।”

सुषमा ने चाय लेते हुए कहा-

“मैं बना लूंगी। बेबी उठ जाए तो स्कूल के लिए तैयार कर देना।”

“स्कूल की तो आज छुट्टी है, मेम साहब।”

“क्यों?”

“आज रक्षाबन्धन है ना।”

“रक्षा-बन्धन?”

सुषमा के दिल पर जैसे एक घूंसा-सा लगा। उसकी आंखों के आगे प्रदीप का चेहरा घूम गया। छोटा-सा प्रदीप जब तीनों बहनें उसे राखी बांधा करती थीं। कितना प्यार करती थी सुषमा उसे। उसी ने उसका भविष्य बनाया और जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो उसने सुषमा को दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर किया। बाप के मर जाने के बाद भी उसे सुषमा पर दया नहीं आयी। लोग कहते हैं कि केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां भाई अपनी बहन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। मैंने प्रदीप के लिए क्या नहीं किया? लेकिन प्रदीप ने जो मेरे साथ व्यवहार किया क्या वह उचित था?

तभी जूली की आवाज सुनाई दी-

“मेम साहब, चाय ठंडी हो रही है।”

सुषमा ने चौंककर आंसू रोक लिए और चाय पीने लगी।

उसकी आंखें शून्य में न जाने कहां टिकी हुई थीं।

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सुषमा के हाथ में राखी थी और वह अंधेरे में चुपचाप खड़ी थी। अपने उसी घर के पास जिसमें वह पैदा हुई थी। जिसमें उसका बचपन हंसते-खेलते बीता था। उसकी शरारतों की धूम थी। लोग उसकी शरारतों से कभी नाराज नहीं होते थे सभी उसे प्यार करते थे। लेकिन आज?

आज वह उसी घर के पास इस तरह खड़ी थी जैसे चोर या बहुत बड़ी अपराधी हो जो कानून की नजरों से बचने के लिए अंधेरे में खड़ी हो। हर राहगीर की आहट पर उसका दिल जोर-जोर से धड़क उठता था। जब राहगीर गुजर जाता था तो वह फिर गली के छोर की ओर देखने लगती थी।

रात के लगभग ग्यारह बजे प्रदीप गली में घुसता दिखाई दिया। सुषमा के दिल को जोरदार झटका लगा। वह संभलकर खड़ी हो गई। उसकी सांसें तेज हो गईं।

थोड़ी देर के बाद प्रदीप घर के दरवाजे के सामने आ खड़ा हुआ और दरवाजे में लगा ताला खोजने लगा।

सुषमा को उसकी कलाई पर दो राखियां बंधी दिखाई दीं। प्रदीप, संध्या और रजनी से राखी बंधवाकर लौटा था।

सुषमा ने बड़ी कठिनाई से अपने आप संभालकर धीरे-से कहा-

“भैया-!”

प्रदीप जोर से उछल पड़ा। उसके हाथ से ताला छूटते-छूटते बचा। फिर वह आंखें फाड़कर अंधेरे में देखने की कोशिश करते हुए बोला-

“कौन-?”

“मैं!” सुषमा की आवाज थरथर कांप रही थी, “तुम्हारी बहन, सुषमा।”

प्रदीप ने ठंडी सांस लेकर धीरे-से कहा‒

“यहां क्या कर रही हो, खड़ी हुई?”

“तुम्हारा इंतजार।”

“किस लिए?”

“भैया, आज रक्षा-बन्धन है ना।”

“हूं! तो तुम अपने भैया को राखी बांधने आई हो? प्रदीप ने व्यंग्य से कहा।

“क्या बहन भाई को राखी नहीं बांध सकती?”

“सुषमा, मेरा तुम्हारा रिश्ता तो उसी दिन टूट गया था जिस दिन सदमे से बाबूजी का हार्टफेल हुआ था।”

“प्रदीप‒।”

“बाबूजी की हत्यारी से राखी बंधवाकर मैं अपनी कलाई पर खून का दाग नहीं लगवाना चाहता। मेरी सिर्फ दो बहनें हैं। जिनसे मैं राखी बंधवा चुका हूं।”

“भैया!” सुषमा की आवाज भर्रा गई- “आखिर मैंने ऐसा क्या पाप किया है जो तुम लोग मुझे समझने की कोशिश नहीं करते।”

“तुम अपने पाप अपने मुंह से गिना चुकी हो। और अब क्या तुम कोई भला काम कर रही हो? तुम्हें कृष्ण ने दोबारा अपना लिया था। हमने सोचा था अब तुम एक शरीफ घरेलू औरत की तरह रहोगी। पति का घरबार और अपने बच्चों की देखभाल करोगी। लेकिन जब बिल्ली के मुंह खून लग जाता है तो वह चैन से कैसे बैठ सकती है। आज भी लोग जब मुझे सुनाने के लिए जोर-जोर से तुम्हारी चर्चा करते हैं तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है।”

“भैया, मैं तो दोबारा इस लाइन में नहीं आना चाहती थी। तुम और बाबूजी जैसा चाहते थे। मैं वैसी बनकर रहना चाहती थी। लेकिन कृष्ण को बचाने के लिए मुझे फिर वही लाइन अपनानी पड़ी।”

“कृष्ण को क्या फांसी लग रही थी? या उसे कैंसर हो गया था?” प्रदीप ने कटुता से कहा, “वह तो अच्छी खासी नौकरी कर रहा था। तुमने उसके साथ किराए के फ्लैट में रहना मंजूर नहीं किया। तुम अपने फ्लैट में चली गई। तुम्हारे पुराने व्यापारियों ने तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ा। तुम उस चमक-दमक को छोड़ नहीं पाईं। मजबूर होकर कृष्ण ने तुम्हें काम करने की इजाजत दे दी। वरना तुम तो उसे तलाक देने को तैयार हो गई थीं। मैं कृष्ण को अच्छी तरह जानता हूं। तुम्हीं ने उसकी नौकरी छुड़वाई। कृष्ण को ढाई हजार रुपये माहवार मिलते थे। इतनी रकम तो तुम्हारी गाड़ी के पेट्रोल पर खर्च हो जाती होगी। जिस दिन कृष्ण ने नौकरी से इस्तीफा दिया था, कितना रोया था। उसने रोते हुए मुझसे कहा था कि आज से उसे अपनी पत्नी की कमाई पर गुजारा करना पड़ेगा।”

“यह झूठ है भैया‒!”

“मैं जानता हूं कि इस दुनिया में तुमसे ज्यादा सच्ची, नेक और शरीफ औरत कोई नहीं हैं।”

“मेरी बात तो सुनो, भैया।”

“तुम यहां से चली जाओ, सुषमा। किसी ने तुम्हें यहां देख लिया तो मैं मुंह दिखाने के भी काबिल नहीं रहूंगा।”

प्रदीप ने कहा और तेजी से अंदर घुसकर दरवाजा बंद कर लिया।

सुषमा के होंठ कांपते रह गए। उसके हाथ में पकड़ी राखी कांप रही थी। आंखों से टपटप आंसू गिर रहे थे।

वह तेजी से पलटी और अपनी कार की ओर चल पड़ी।

कुछ देर के बाद उसकी कार सड़क पर दौड़ रही थी।

तो यह है कृष्ण का वास्तविक रूप। उस पर गबन का कोई केस नहीं चल रहा था। उसने मेरी दौलत से ऐय्याशी करने के लिए जान-बूझकर नौकरी छोड़ी है। अपनी एय्याशियों के लिए मुझे मॉडल गर्ल बनाया है। लोग भारतीय नारी की जरा-सी भूल पर उसका जीना-दूभर कर देते हैं लेकिन उनके विधान में पुरुष के बड़े-से-बड़े अपराध के लिए कोई दंड नहीं है। राम ने मिथ्या लांछन पर अपनी सती साध्वी पत्नी सीता को त्याग दिया था। पुरुष अनादिकाल से ही नारी पर अत्याचार करता चला गया है।

अगर कृष्ण मुझे दोबारा मॉडल-गर्ल बनने पर मजबूर न करता तो मैं एक घरेलू नारी की तरह अपना जीवन बिताती। और तब मुझे अपने भाई के दरवाजे पर से राखी को लेकर वापस न लौटना पड़ता।

कृष्ण मेरा पति नहीं, मेरा दुश्मन है। अगर सुहागरात को मुझे बाबूजी के पास लौट जाने के लिए मजबूर न कर देता तो उनकी मृत्यु न होती। प्रदीप मुझसे इतनी घृणा न करता। मैं मरने गई तो महेश ने बचा लिया। अगर मैं महेश की ही पत्नी होती तो उस खोली में आराम और इत्मीनान से जिन्दगी बिता देती।

कृष्ण मुझे महेश की खोली में से क्यों लेकर आया? यह बात मैं आज समझ पाई हूं। उसने केवल धन के लालच में मुझे दोबारा अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। मैं तुझे कभी भी क्षमा नहीं करूंगी कृष्ण, कभी क्षमा नहीं करूंगी।

सुषमा के होंठ सख्ती से भिंच गए।

कार की रफ्तार और भी तेज हो गई।

22

कृष्ण ने कोट उतारकर बाजू पर डाल रखा था। उसके बाल बिखरे हुए थे। टाई की गांठ ढीली थी।

उसने टैक्सी फ्लैट के सामने रुकवा दी। टैक्सी का किराया दिया और एयर बैग कन्धे पर लटकाकर टैक्सी से उतर आया।

उसने दरवाजे पर पहुंचकर घंटी बजाई। कुछ देर के बाद जूली ने दरवाजा खोल दिया।

“हैलो साहब।” उसने पीछे हटते हुए कहा।

कृष्ण अन्दर चला गया।

जूली की गोद में डॉली थी लेकिन उसने डॉली की ओर नजर उठाकर भी देखा।

जूली ने डॉली से कहा-

“बेबी, तुम्हारे पापा आ गए। वेलकम बोलो।”

“पापा, गुड ईवनिंग!” नन्ही डॉली ने बड़ी मासूमियत से कहा।

“गुड ईवनिंग,” कृष्ण ने बेरुखी से कहा और कोट तथा एयरबैग एक सोफे पर फेंककर बैठ गया।

“साहब, क्या दिल्ली से अभी आ रहे हैं?”

“हां, प्लेन से उतरकर सीधा चला आ रहा हूं। मेमसाहब कहां है?”

“वह कहीं गई हैं।”

“और दर्शन?”

“वह अपनी बहन से राखी बंधवाने गया है।”

कृष्ण ने एक लम्बी सांस लेकर बैग में से बोतल निकाल ली और फिर मुंह से लगा ली।

जूली ने पूछा- “साहब, गिलास और पानी लाऊं?”

“नहीं। मेमसाहब कब तक आयेंगी?”

“पता नहीं, साहब।”
 
कृष्ण ने एक लम्बा घूंट भरा और फिर जूली को देखने लगा। जूली दस-ग्यारह साल की भोली-भाली लड़की थी।

कृष्ण ने नजरें जूली पर टिकाकर रह गईं। उसने बोतल से कई घूंट भरकर कहा- “बेबी, बहुत देर में सोती है।”

“जब मेम साहब घर में होती हैं तब तो जल्दी सो जाती हैं।”

“इसे बेडरूम में सुला आ।”

“क्यों?”

“मेरे सिर में बहुत दर्द है, जरा मालिश कराऊंगा।”

“तेल तो होगा नहीं, साहब।”

“तो यूं ही दबा देना।”

“तो फिर यहीं बैठाए लेती हूं बेबी को।”

“नहीं, बच्ची है। तू सिर दबायेगी तो समझेगी कि तू मुझे मार रही है।”

जूली हंसकर बोली‒

“अच्छा साहब, बेबी को बेडरूम में छोड़ आती हूं।”

“इसके सामने कुछ खिलौने डाल देना।”

“अच्छा साहब।”

जूली बेड रूम में चली गई।

कृष्ण ने टाई खोलकर एक ओर फेंक दी और बोतल फिर मुंह से लगा ली।

कुछ देर बाद जूली ने आकर कहा‒

“लाइए साहब, आपका सिर दबा दूं।”

और फिर सोफे के पीछे खड़ी होकर वह कृष्ण का सिर दबाने लगी।

कृष्ण ने एक लम्बा घूंट भरकर कहा‒

“जूली, तू नौकरी, क्यों करती है?”

“मजबूरी है, साहब। बाप मर गया। मां अपाहिज है। भाई छोटा है। घर में कोई कमाने वाला नहीं है। उनके गुजारे के लिए नौकरी करनी पड़ रही है।”

“च्-च्-च् तब तो इतने थोड़े से पैसों में गुजारा मुश्किल से ही होता होगा।”

“गुजारा तो आराम से हो जाता है। मेम साहब बहुत अच्छी है।”

“फिर भी कभी-न-कभी जरूरत तो पड़ती ही होगी।”

कृष्ण ने सौ रुपये का नोट निकालकर जूली को देते हुए कहा, “ले, इस रख ले। और जब कभी कोई परेशानी हो मुझे बता देना। एक से लेकर हजार तक जितने की भी जरूरत हो।”

जूली शायद कृष्ण की नीयत भांप गई थी। फुर्ती से पीछे हटती हुई, बोली- “नहीं साहब, मुझे नहीं चाहिए।”

“अरी- ले ले ना।”

“नहीं साहब- बेबी रो रही है- मैं उसे देखती हूं।”

जूली जाने लगी तो कृष्ण ने झपटकर उसे दबोच लिया।

जूली के मुंह से चीख निकली ही थी कि कृष्ण ने उसका मुंह दबा दिया। जूली दस-ग्यारह साल की मासूम लड़की थी। वह अपनी शक्ति के अनुसार छूटने की कोशिश करने लगी।

तभी बेडरूम में से डॉली निकल आई। वह जूली को कृष्ण के हाथों में छपटाते देखकर चिल्ला उठी-

“जूली-।”

कृष्ण ने खूंखर नजरों से बच्ची को घूरते हुए गुर्राकर कहा-

“अंदर जा हरामजादी-!”

लेकिन डॉली अन्दर जाने के बजाय जोर-जोर से रोने लगी।

कृष्ण को बहुत गुस्सा आ रहा था। उसका जी चाहा कि डॉली का गला घोंटकर उसे मार डाले। लेकिन वह जूली को छोड़ नहीं सकता था। उसे डर था कि छूटते ही जूली चीख-चीखकर मुहल्ला इकट्ठा कर लेगी। उसके ऊपर पागलपन सवार हो गया था। वह हर हालत में उस पर काबू पाना चाहता था।

अचानक फटाक की आवाज के साथ दरवाजा खुला और दरवाजे में सुषमा को देखते ही कृष्ण की पकड़ ढीली पड़ गई। जैसे उसके हाथों का दम निकल गया हो।

उसने फीकी-सी हंसी के साथ हांफते हुए कहा-

“तुम आ गई सुषमा-?”

जूली कृष्ण के पंजे से निकलकर सुषमा से लिपट गई। उसका सारा बदन नन्ही-सी चिड़िया की तरह थर-थर कांप रहा था। उसने रोते हुए कहा- “बचाइए मेम साहब.... फार गॉड सेक, मुझे बचाइए।”

“घबराओ मत बेटी।” सुषमा ने उसकी पीठ पर थपकी दी।

“मेम साहब-अब मैं यहां काम नहीं करूंगी।”

तभी डॉली रोती हुई सुषमा के पैरों से आ लिपटी।

सुषमा ने उसे उठाकर गोद में ले लिया।

डॉली ने रोते हुए कहा-

“मम्मी, पापा जूली को मार रहे थे।”

सुषमा ने उसे पुचकारकर जूली की गोद में दे दिया और बोली-

“जूली, बेबी को अंदर ले जाओ।”

जूली डॉली को लेकर सहमी-सहमी कांपती हुई अंदर चली गई।

कृष्ण ने संभलकर मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा-

“मैं तो-म-म-मजाक कर रहा था जूली से डार्लिंग।”

सुषमा ने कुछ नहीं कहा। उसने दरवाजा बंद किया और अंदर चली गई।

कुछ देर के बाद वह लौटी तो उसके हाथ में रिवाल्वर था।

कृष्ण के हाथ-पांव फूल गए। चेहरा फक्क पड़ गया। वह हड़बड़ाकर बोला-

“द-द- सुषमा डार्लिंग, यह क्या कर रही हो?”

“खामोश।” सुषमा ने बहुत ही खुश्क लहजे में कहा, “बैठो, उस कुर्सी पर बैठो। अगर तुमने एक सेकंड की भी देर की तो सारी गोलियां तुम्हारे सीने में उतार दूंगी। मुझे कुछ नहीं हो सकेगा। जूली की हालत और मासूम बच्ची की गवाही और तुम्हारी पिछले कारनामे अदालत मुझे साफ बरी कर देगी।”

“म-म-मगर...।”

“बैठो” सुषमा सांप की तरह फुंकार कर बोली।

कृष्ण जल्दी से कुर्सी पर बैठ गया।

सुषमा ने जूली को पुकारकर कहा-

“बेबी को बैठाकर यहां आओ, जूली।”

“बेबी रो रही है, मेम साहब।”

“कोई बात नहीं। रोने दो।”

जूली आ गई। लेकिन कृष्ण को देखकर इस तरह कांपने लगी, जिस तरह भेड़िए को देखकर बकरी कांपने लगती है।

सुषमा ने जूली से कहा-

“मेरे कमरे में से डोरी ले आओ।”

जूली चली गई।

कृष्ण ने हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करते हुए कहा-

“यह तुम क्या कर रही हो, डार्लिंग?”

“बैठ जाओ!” सुषमा फुंफकारकर बोली- “वरना गोली मार दूंगी।”

कृष्ण झटके से बैठ गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था।

जूली डोरी ले आई तो सुषमा ने कहा-

“जूली, इसके हाथ कुर्सी के हत्थे से बांध दो।”

“म-म..... मेम साहब!” जूली कांप उठी।”

“डरो मत, अगर इसने चूं भी की तो फौरन गोली मार दूंगी।”

जूली ने डरते-डरते कृष्ण के हाथ पांव बांध दिए और फिर गर्दन भी कुर्सी के पीछे बांध दी।

सुषमा ने कहा-

“जूली- इसके मुंह पर थूको।”

“न-न- नहीं-!”

“जल्दी करो जूली, बेबी रो रही है।”

जूली ने बड़ी कठिनाई से उसके मुंह पर थूका।

कृष्ण की गर्दन हिलकर रह गई। थूक उसके माथे से बहकर नाक और गाल पर से होता हुआ होंठों में आ घुसा।

कृष्ण थूकने लगा तो सुषमा ने गुर्राकर कहा-

“थूकते क्यों हो? जब तुम उसे चूमते तो तुम्हें इसी थूक का मजा चखने को मिलता।”

“सुषमा!” कृष्ण ने गुस्से से कहा, “तुम हद से बढ़ रही हो। तुम भूल रही हो कि मैं तुम्हारा पति हूं।”

“हूं नहीं, थे। अब तुम अपने उस अधिकार को खो चुके हो।”

“क्या मतलब?”

“तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं कृष्ण, जो जी चाहे, चुन लो। मैं अपने लीगल एडवाइजन को बुला रही हूं। जो यह जानते हैं कि मेरी शादी तुम्हारे साथ हुई है। उनसे तलाकनामा तैयार करा देती हूं। तुम उस पर दस्तखत कर दो। और ठीक बारह घंटे के अंदर-अंदर बम्बई छोड़ दो। वरना तुम जहां भी देखे गए एक्सीडेन्ट में मर जाओगे।

“दूसरा रास्ता, तुम जानते हो कि घनश्याम के संबंध बम्बई के बड़े-बड़े गुंडों से हैं। मैं तुम्हें बेहोश कर दूंगी। बेबी को यहां से हटा दूंगी और घनश्याम के गुंडों को बुलाकर कहूंगी कि बदमाश बहुत दिनों से मेरे पीछे पड़ा था। वे गुंडे बड़े आराम से तुम्हारा गला घोंट देंगे और तुम्हारी लाश कहीं ले जाकर गाड़ देंगे। किसी को कानों कान खबर भी न होगी।”

कृष्ण सिर से पांव तक कांप उठा। सारा नशा हिरन हो गया। रंग सफेद पड़ गया। होंठ सूख गए। उसने बड़ी मुश्किल से होंठों पर जीभ फेरकर थूक निगलकर कहा-

“सुषमा, तुम्हें अचानक यह क्या हो गया? मैं मान लेता हूं कि जूली के साथ मुझे ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन मैं नशे में था और नशे में आदमी अपने होश हवास खो बैठता है। तुम कहो तो मैं जूली के पांव पकड़कर माफी मांग लेता हूं। मैं वायदा करता हूं कि आज के बाद शराब को कभी हाथ तक न लगाऊंगा। जो इंसान को जानवर बना देती है। मैं तुम्हारा पति हूं। एक भारतीय नारी का पति उसके लिए भगवान होता है। तुम अपने भगवान का अपमान कर रही हो।”

“तुम मुझे जो उपदेश दे रहे हो, उसे मैं बचपन से ही सुनती चली आ रही हूं। लेकिन ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। गाड़ी एक पहिए पर कभी नहीं चलती। तुमने तो सुहागरात को ही सारे वचन तोड़ दिए थे। मेरे रोने गिड़गिड़ाने पर भी तुम नहीं पसीजे थे। अगर उस दिन तुमने मुझे घर से न निकाला होता तो मेरे बाबूजी की जान नहीं जाती।”

कहते-कहते सुषमा का गला भर आया। उसने भर्राई आवाज में कहा-

“मेरे बाबूजी सदमे से मर गए। भाई ने घर से निकाल दिया। मैंने आत्महत्या करने की कोशिश की तो महेश ने मुझे बचाया और नया जन्म दे दिया। उसने सब कुछ जानने के बाद भी मुझे अपनाना चाहा। मेरी मांग में सिन्दूर भरना चाहा। लेकिन इसी बीच तुमने नई स्कीम सोच ली, तुम मुझे महेश से छीनकर ले आए। अगर उस दिन महेश ने मेरी मांग में सिंदूर भर दिया होता तो मैं आज एक चने बेचने वाले की पत्नी होती। लेकिन मैंने एक भारतीय नारी का धर्म निभाया। मैं तुम्हारे साथ चली आई। मुझे उस समय पता नहीं था कि तुम मुझे केवल इसलिए लेकर आए हो कि मुझे फिर उसी चमक-दमक की दुनिया में भेजकर मेरी कमाई पर जिन्दगी गुजारना चाहते हो। ऐय्याशी करना चाहते हो।”

“यह झूठ है सुषमा, मैं तो?”

“चुप रहो!” सुषमा गुर्राकर बोली- “मेरे सामने तुम्हारे अतीत का एक-एक पन्ना खुल चुका है। तुम बचपन से ही आवारा और ऐय्याश हो तुमने दिल्ली कॉलेज में पढ़ाई के समय कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की को फिल्मी दुुनिया के सब्जबाग दिखाकर उसकी आबरू लूट ली थी और जब वह गर्भवती हो गई तुम उसे छोड़कर बम्बई भाग आए, तुमने बम्बई आकर नौकरी कर ली और ऐय्याशी करने लगे। तुमने मुझे एक रात के लिए पन्द्रह हजार रुपये में खरीदा और पता चलने पर मुझे घर से निकाल दिया। बाद में तुमने सोचा कि तुमने सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को छोड़ दिया है तो तुम मुझे धोखा देकर फिर अपने घर ले आए। तुमने झूठ बोला था कि तुम पर गबन का मुकदमा चल रहा है। और अगर गबन की रकम जमा न की गई तो तुम्हें पांच साल की सजा हो सकती है।

“मैंने एक वफादार पत्नी के नाते तुम्हें सजा से बचाने के लिए दोबारा मॉडल गर्ल का धन्धा अपना लिया। मेरे मॉडल गर्ल बनने के बाद तुमने नौकरी छोड़ दी। तुमने मेरे भाई को बहकाया कि मैं अपनी इच्छा से मॉडल गर्ल बन गई हूं और अब तुम्हें मेरा सेक्रेटरी बनकर रहना पड़ेगा वरना मैं तुम्हें छोड़ दूंगी।

“तुमने गबन की झूठी कहानी गढ़कर मुझसे दस लाख रुपये हथिया लिए। और फिर बिजनेस का बहाना करके पांच लाख रुपये ले लिए ताकि तुम मुझसे दूर रहकर, जी भर कर ऐय्याशी कर सको। तुमने मालाबार हिल पर दो हजार रुपये माहवार किराए पर बंगला ले रखा है। जिसमें तुम हर रोज एक नई लड़की के साथ ऐश करते हो। आजकल तुम्हारे साथ दिल्ली कॉलेज की वही लड़की रह रही है जिसको तुमने धोखा देकर आबरू लूटी थी। और अब जिसका नाम रूबी है।”

“यह झूठ है!”

“बकवास मत करो। झूठ सिर्फ वह होता है जो सुना जाए। तुम लेडी डॉक्टर निर्मला सिंह के यहां कई बार नए-नए नाम बदलकर लड़कियों को ले जा चुके हो। जिस समय तुम रूबी को लेकर डॉक्टर निर्मला सिंह के यहां गए थे, मैं वहां मौजूद थी, मैंने तुम्हारी और डॉक्टर सिंह की एक-एक बात सुनी थी। फिर मैंने एक ग्राहक बनकर रूबी को एंगेज किया और जब पता चला कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं तो उसने मुझे सब कुछ बता दिया। और तुम्हारा घिनौना रूप मेरे सामने स्पष्ट हो गया।

“तुम वासना की आग में इतने अन्धे हो चुके हो, मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। तुम कितने गिरे हुए हो, तुमने आज जूली जैसी कम उम्र मासूम बच्ची पर हमला करके उसका सबूत दे दिया है। इंसान तो दूर एक जानवर भी इतना नीचे नहीं गिर सकता। तुम्हारी बेटी तुम्हारे सामने खड़ी रो रही है और तुम वासना से अन्धे होकर उसे गालियां दे रही हो। कल जब यह बच्ची बड़ी होगी तो क्या इस दृश्य को भूल जाएगी जो इसने आज देखा है। तुम्हारी इस हरकत से दुनिया की सभी लड़कियों को अपने बाप से घृणा हो जाएगी। और तुम जैसे बाप का उसकी औलाद पर क्या प्रभाव पड़ेगा, स्पष्ट है।”

“अब पानी सिर से गुजर चुका है। तुम दिल्ली में कारोबार और हर शनिवार को दिल्ली से आने और सोमवार को वापस चले जाने का नाटक बहुत खुले हो। मैं एक भारतीय नारी हूं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पति के हर अन्याय और अत्याचार को सहती रहूं। अपने अधिकार के लिए अपना मुंह भी न खोलूं। अगर भारतीय पति का यही चरित्र है तो मैं इस परम्परा को ही बदल डालूंगी। क्योंकि मैं केवल भारतीय पत्नी ही नहीं भारतीय मां भी हूं। मेरी बच्ची के भविष्य की जिम्मेदारी मुझ पर है। इसलिए तुम्हारा मेरी बच्ची से दूर रहना बहुत जरूरी है कि ताकि उस पर तुम्हारी परछाई तक न पड़ने गाए- जल्दी बोलो, तुम्हें कौन-सा रास्ता पसन्द है? अगर सवेरा हो गया तो तुम्हारी लाश को कल सारे दिन घर में ही रखना पड़ेगा।”

कृष्ण कांप उठा। फिर कांपती हुई आवाज में बोला-

“तुम वकील को बुला सकती हो।”

सुषमा ने पास ही रखे टेलीफोन पर से रिसीवर उठा लिया।

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लगभग एक घंटे के बाद कृष्ण ने कांपते हाथों से तलाकनामे पर दस्तखत कर दिए।

सुषमा ने तलाकनामा संभालते हुए कहा-

“इस समय रात के दो बजे हैं। अगर कल दिन के दो बजे तक तुमने बम्बई नहीं छोड़ी तो याद रखो तुम्हें दुनिया छोड़नी पड़ेगी। और एक बात और भी याद रखो-आज के बाद अगर तुम्हारी जुबान पर मेरा नाम भी आया तो तुम्हारी जबान जड़ से कटवा दी जाएगी। नाउ यू गेट आउट।”

“क्या मैं अन्तिम बार अपनी बच्ची को प्यार कर सकता हूं।”

“हरगिज़ नहीं। मैं तुम्हारी परछाई भी अपनी बच्ची पर नहीं पड़ने दूंगी। फौरन यहां से निकल जाओ।”

कृष्ण ने चुपचाप अपना कोट उठाया और हारे हुए जुआरी की तरह बाहर निकल गया।

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कृष्ण अपने बंगले में पहुंचा तो रात के तीन बज रहे थे।

वह थके-थके कदमों से रूबी के कमरे में पहुंचा तो रूबी अपने कपड़े एक अटैची में रख रही थी।

कृष्ण ने चुपके से कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया और दबे पांव रूबी की ओर बढ़ने लगा।

रूबी को कृष्ण को आने का बिल्कुल पता नहीं चला। वह अपना सामान अटैची में रखती रही।

अचानक कपड़ों की सरसराहट सुनकर उसने चौंककर नजरें उठाई और कृष्ण को देखकर बुरी तरह चौंक पड़ी।

“तुम आ गए?”

“हां, लेकिन तुम कहां जा रही हो?”

“अपने पति के पास।”

“ओहो, आज अचानक पति की याद कैसे आ गई?”

“बहुत पाप कर चुकी हूं। एक पत्नी की तड़प देखकर मुझे ख्याल आया कि मेरा पति भी मेरे लिए इसी तरह तड़पता होगा।”

“कौन थी वह पत्नी?”

“तुम्हारी पत्नी।” रूबी ने जहरीली मुस्कराहट के साथ कहा।

कृष्ण ने झपटकर रूबी की गर्दन दबोच ली और दांत पीसकर गुर्राया-

“कमीनी, कुतिया, तो तूने ही उसे बहकाया था जो उसने मेरी हर ओर से इनक्वायरी कर डाली। तेरी वजह से मैं पलभर में राजा से भिखारी बन गया। मेरी पत्नी ने मुझसे तलाक ले लिया और तू चैन की जिन्दगी बिताने अपने खसम के पास जा रही है। तूने मुझे बर्बाद किया है। मैं तुझे जिन्दा नहीं छोड़ूंगा।”

कृष्ण के हाथों में फंसी रूबी मचलती तड़पती रही। लेकिन उसकी पकड़ रूबी की गर्दन पर बढ़ती रही। उसके मुंह से आवाज तक न निकल सकी, धीरे-धीरे रूबी की शक्ति और चेतना उसका साथ छोड़ती चली गई। उसके हाथ-पांव ढीले होकर लटक गए। आंखें फटी रह गई। जीभ बाहर निकल आई। कृष्ण ने उसे छोड़ा तो वह कटी शाख की तरह फर्श पर जा गिरी।

कृष्ण ने इत्मीनान से आगे बढ़कर अलमारी में से स्कॉच की बोतल निकाली और उसका कार्क खोलकर एक ही सांस में पूरी बोतल खाली कर दी। फिर खड़ा-खड़ा कुछ सोचता रहा। अचानक वह लड़खड़ाते कदमों से टेलीफोन की ओर बढ़ने लगा।

उसने नम्बर डायल करके रिसीवर कान से लगा लिया।

“येस-मिस वर्मा हिअर।” दूसरी ओर से सुषमा की आवाज आई।

“मिस वर्मा!” कृष्ण ने होंठ भींचकर कहा, “जिस नागिन ने मेरे चैन को डसा था मैंने उसका फन कुचल डाला है।”

“क्या-?” दूसरी ओर से सुषमा चीख उठी, “क्या तुमने रूबी को मार डाला?”

“हां मिस-वर्मा! आज तुम्हारी बारी थी। तुमने अपनी मनमानी कर ली है। कल मैं बम्बई छोड़ दूंगा। लेकिन एक-न-एक दिन बम्बई जरूर लौटूंगा। इतने चुपके से कि किसी को कानों कान खबर तक न हो सकेगी। और फिर तुम्हें भी वहीं पहुंचा दूंगा जहां रूबी को पहुंचाया है।”

फिर उसने उत्तर की प्रतीक्षा न करके फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। अलमारी में से एक अटैची निकालकर उसमें कपड़े और अपना बटुआ चैक करने लगा। कुल एक हजार रुपया थे। उसने बटुआ जेब में रखकर अटैची उठाई और दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।

और फिर जैसे ही उसने दरवाजा खोला वह हड़बड़ाकर पीछे हट गया।

सामने रिवॉल्वर ताने एक पुलिस-इंस्पेक्टर खड़ा था। उसके पीछे छः कांस्टेबल थे। उनके साथ ही बंगले की मालकिन पारसी बुढ़िया अपने नौकर और चौकीदार के साथ खड़ी थी।

बंगले की मालकिन ने कांपती हुई आवाज में कहा-

“इसके कमरे से शोर शराबे की आवाज आ रही थी। हम अपना चौकीदार और नौकर को बुलाकर अपने कमरे में छिप गया था। फिर हमने अपनी आंखों से रोशनदान से इस आदमी की रूबी का गला घोंटते हुए देखा था। हमारा नौकर और चौकीदार ने भी देखा और तब चौकीदार को भगाकर आपको बुलाया।”

इंस्पेक्टर के इशारे पर एक कांस्टेबल ने बढ़कर कृष्ण के हाथों में हथकड़ियां डाल दीं।

कृष्ण की आंखों के आगे फांसी का फन्दा नाच उठा। उसके हाथ से अटैची छूटकर नीच गिर गई।

23

अचानक अलार्म बज उठा। सुषमा इस तरह उछल पड़ी जैसे किसी ने उसके सिर पर बम दे मारा हो। वह हड़बड़ाकर सीधी बैठ गई। जूली भी जाग गई।

जूली ने आंखें मलते हुए कहा-

“अब आपकी तबियत कैसी है, मेम साहब?”

“ऐं...ठीक है-बिल्कुल ठीक है।”

“ठहरिए, मैं आपके लिए चाय लेकर आती हूं।”

जूली बाहर चली गई।

सुषमा के कानों में अब भी कृष्ण की आवाज गूंज रही थी- “आज तुम्हारा है इसलिए मैं बम्बई से जा रहा हूं। लेकिन एक दिन मैं जरूर लौटूंगा। इस तरह कि किसी को कानों कान खरब तक न होगी। और फिर तुम्हें भी वहीं पहुंचा दूंगा जहां रूबी को पहुंचाया हैं।”

सुषमा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे पता था कि रूबी की हत्या के अपराध में कृष्ण को दस वर्ष की सश्रम कारावास की सजा हो गई थी। क्योंकि गवाहों के अनुसार रूबी एक पेशेवर वेश्या थी। बंगले की मालकिन और उसके नौकरों के बयान के अनुसार वह कृष्ण की रखैल थी। और गिरफ्तारी के समय कृष्ण नशे में था।

कृष्ण ने अदालत में सुषमा का नाम तक नहीं लिया था।

इस घटना को दस वर्ष बीत चुके थे। कृष्ण या तो छूट गया होगा या छूटने ही वाला होगा।

वह जानती थी कि घनश्याम के गुंडे अब उसकी कोई सहायता नहीं करेंगे। क्योंकि उसने घनश्याम को ठुकराकर उसे बहुत दुख पहुंचाया था। वह उसे भूला नहीं था और फिर अब वह उस उम्र में आ गई थी जहां उसका आकर्षण तेजी से समाप्त होने लगा था।

उसके बच्चे अब बड़े-बड़े हो गए थे। और उन बच्चों के कारण ही अपने आपको कमजोर समझ रही थी।

तभी जूली चाय लेकर आ गई।

सुषमा की विचार- श्रृंखला छिन्न-भिन्न हो गई।

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