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प्रदीप के मुंह से कांपती हुई आवाज निकली- ‘दीदी।’
‘बेटी।’ बाबूजी की आवाज भी कांप गई।
‘बाबूजी, भैया।’ सुषमा ने गम्भीरता से कहा, ‘मैं नहीं जानती कि वह कौन-सी शिकायत थी जिसने आपको और बाबूजी को मुझे बेसहारा छोड़ कर आने पर मजबूर कर दिया। मैंने अपनी जिम्मेदारी आज तक पूरी की थी। तुम्हें वहां तक ले आई जहां बाबूजी का बोझ मेरे कंधों से तुम्हारे कंधों पर चला गया।’
‘मगर तुम सिर्फ बाबूजी का बोझ लेकर चले आए। अपनी दीदी को छोड़कर उस दोराहे पर जहां तुम्हारी दीदी के अंदर दो द्रौपदियां पैदा हो गयी थीं। उनमें से एक सुषमा इतनी जहरीली बन गई थी, जिसकी फुंकार से भी समाज और सोसायटी में जहर फैल जाती, जहां लोग बड़े-बड़े दावे करते हैं। ऊंची-ऊंची डीगें हांकते हैं। लेकिन सच्चाई जब सामने आती है तो बाप भाई तक गर्ज पूरी हो जाने पर सुषमा को अकेला छोड़ जाते हैं।’
‘मगर जब मेरे क्रोध, झुंझलाहट का नशा उतरा तो मैंने सोचा कि अगर आज मैंने ऐसी सुषमा को जन्म दिया तो कल समाज में पता नहीं कितनी द्रौपदियां पैदा हो जाएंगी। मेरे जैसे द्रौपदियों को अपने खून से नफरत हो जाएगी। कोई सुषमा अपने बाप को नई जिंदगी नहीं देगी। अपने भाई की परवरिश नहीं करेगी।’
‘इसलिए मैंने पहली सुषमा को मार डाला और उस सुषमा को नया जन्म दिया जिसे देश और समाज में एक बाप और भाई की रक्षा की जरूरत होती है। आज मैं अपना सब-कुछ छोड़ आई हूं, अपना फ्लैट, बैंक बेलैंस।’
‘सारा ऐशो-आराम का सामान छोड़कर अपने बाप और भाई की रक्षा में आई हूं। कल तक मैंने अपनी जिम्मेदारी निभायी थी। अब तुम निभाओ। चाहे भूखा रखकर, चाहे दाल-चावल खिलाकर।’
प्रदीप धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसने झुककर सुषमा के पांव छुए और भर्राई हुई आवाज में कहा- ‘मुझे माफ कर दो दीदी, मैं मैं....।’
‘पप्पू- मेरे भैया!’
सुषमा ने प्रदीप को उठाकर गले लगाया। दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे और बाबूजी की आंखें भी भीगी हुई थी।
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सुषमा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने स्त्री की हुई साफ साड़ी पहन रखी थी। सिर पर आंचल बराबर कर लिया था। इस तरह कि उसका कुछ चेहरा भी छिपा रहे फिर भी उसे डर लग रहा था कि कहीं वे लोग उसे सुषमा वर्मा मॉडल गर्ल के रूप में न पहचान लें।
असल में कल ही रात प्रदीप ने आकर बड़ी खुशी-खुशी बताया था कि जिस दफ्तर में वह काम करता है, उस दफ्तर में एक अच्छी पगार पर काम करने वाला किसी गरीब मगर पढ़ी-लिखी लड़की से शादी करना चाहता है। किसी ने प्रदीप का नाम ले दिया। कृष्ण ने प्रदीप से बात की तो प्रदीप हक्का-बक्का रह गया। कृष्ण ने कहा कि मैंने जिंदगी में इतनी लड़कियां देखी हैं कि उसे खूबसूरती और बदसूरती की तमीज नहीं रह गई है। अब तो मैं खुद भी लड़की देखने की इच्छा नहीं रखता। मगर मेरे मां-बाप नहीं हैं। और लड़की के रिश्तेदार भी नहीं हैं इसलिए मेरे दोस्त की मां ही लड़की को देखने आएगी वह भी इसलिए कि लड़की कानी-भैंगी या लूली-लंगड़ी न हो और बस लड़की जरूर हो।
और आज कृष्ण के दोस्त की मां और बहन लड़की को देखने आ रहे थे। सुषमा का दिल बार-बार धड़क रहा था।
अचानक प्रदीप आया और सरगोशी में बोला, ‘आ गए वह लोग।’
‘सुषमा का दिल धक से रह गया।
‘बस, तुम जल्दी से मिठाई लेकर आ जाओ।’
सुषमा मिठाई की थाली लेकर बाहर आई तो एक छः साल की बच्ची और एक बूढ़ी औरत मौजूद थे। सुषमा ने इत्मीनान का सांस लिया, क्योंकि बूढ़ी औरत या बच्ची उसे मॉडल-गर्ल की हैसियत से क्या पहचानेंगी? उसने मिठाई रखी तो बच्ची खुश होकर बोली-
‘मम्मी! भाभी, तो सचमुच भैया से भी ज्यादा खूबसूरत हैं।’
‘बेटी, शादी के पहले भाभी नहीं कहते। बुरी बात है।’
‘मम्मी! कृष्ण भैया लोट-पोट हो जाएंगे भाभी को देखकर।’
औरत ने अपना चश्मा ठीक किया और सुषमा को पास बुलाकर कहा- ‘बैठ जाओ बेटी।’
सुषमा सिमटी-सिकुड़ी बैठ गई और बूढ़ी ने पूछा-
‘क्या पढ़ा है तूने?’
‘जी, बी. ए. किया है।’
‘घर का काम-काज तो कर लेती हो?’
‘जी, सब कर लेती हूं।’
‘भैयाजी।’ बूढ़ी ने बाबूजी से कहा, ‘हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि कृष्ण का मुकद्दर इतना तेज है। हमें तो लड़की बहुत पसन्द है।’
‘मगर हमारे पास देने-दिलाने को कुछ भी नहीं है।’
‘वह उसने सब-कुछ मेरे ऊपर छोड़ दिया है। आप शादी की तैयारी करें और मुहूर्त निकलवा लीजिए, कृष्ण को जरा जल्दी है।’
‘जी, मैं कल ही पुरोहित से मुहूर्त निकलवाऊंगा।
बाबूजी की आंखों में खुशी के आंसू नजर आ रहे थे और उधर सुषमा की दिल धक्-धक् कर रहा था। इसलिए नहीं कि कृष्ण से उसकी शादी होने वाली है। इसलिए कि उसने उसे सुषमा वर्मा मॉडल-गर्ल की हैसियत से पहचान लिया तो क्या होगा। मगर फिर उसने दिल-ही-दिल में फैसला कर लिया कि वह जिन्दगी का सबसे बड़ा झूठ बोलेगी कि वह मॉडल-गर्ल कभी नहीं थी। वह सारा जीवन यह झूठ बनाए रखेगी। जिस झूठ से किसी को नुकसान न हो, भगवान् भी उसे बनाए रखने में सहायता करता है। फिर वह निश्चिन्त हो गई।
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बारात के हंगामे ठण्डे हो चुके थे। शायद आखिरी बाराती भी चला गया था। सुषमा दुल्हन बनी एक कमरे में बैठी थी। यह कमरा कृष्ण के दोस्त का फ्लैट था। फिर कदमों की हल्की-हल्की आहट के साथ दरवाजा खुला। फिर सुषमा का दिल जैसे गले में आकर अटक गया। उसने घूंघट की ओट से देखा, कृष्ण चिटखनी बन्द कर रहा था।
सुषमा खड़ी हो गई। कृष्ण उसके नजदीक आया तो कदमों में झुक कर उसके पैर छुए और कृष्ण ने कन्धों से पकड़कर उसे उठाते हुए कहा-
‘तुम्हारी जगह कदमों में नहीं दिल में है।’ फिर कृष्ण ने उसे पलंग पर बिठाया और उसका घूंघट उठा दिया और आश्चर्यजनक आवाज निकली- ‘हाय! सुषमा वर्मा मॉडल गर्ल या नीला जैक्सन!’
सुषमा ने चौंककर गर्दन उठाई तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर एटम बम दे मारा हो। क्योंकि उसका दूल्हा कृष्ण तो दरअसल वह के. के. था, जिसके साथ रियाजुद्दीन बिल्डर्स के फ्लैट में वह नीला जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में एक रात गुजार चुकी थी।
सुषमा को ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे बहुत ऊंची पहाड़ी से नीचे लुढ़का दिया हो और वह किसी गहरी खाई की तरफ चली जा रही हो।
उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया, मगर सुषमा अब अपने ऊपर काबू पा चुकी थी। उसने कृष्ण को तेजी से मुड़कर बाहर की तरफ जाते हुए देखा तो वह दोनों हाथों को फैलाकर उसका रास्ता रोकी हुई बोली-
‘कहां जा रहे हैं, आप?’
‘मेरा रास्ता छोड़ दो, वरना मेरे हाथों तुम्हारा खून हो जाएगा।’ कृष्ण हांफता हुआ तेज-तेज बोला।
‘मगर मेरा दोष?’
‘दोष अरे बेगैरत, तुम्हें शर्म नहीं आती पूछते हुए। वह भी इतनी बेबाकी से।’
‘किसी पर इल्जाम लगाया जाए तो क्या वह अपना दोष नहीं पूछेगा?’
‘बकवास बन्द कर। तेरी मक्कारी और अदाकारी तेरी असलियत पर पर्दा नहीं डाल सकती।’
‘कौन-सी असलियत, आप खुलकर बात क्यों नहीं करते?’
‘मेरी जबान से ही सुनना चाहती है तो सुन ले- क्या तू वही वेश्या नहीं है जो रिजाजुद्दीन बिल्डर्स के फ्लैट में मेरे साथ एक रात गुजार चुकी है, पूरे पन्द्रह हजार रुपये में।’
‘हे भगवान्! सुषमा सीने पर हाथ रखकर पीछे हट गयी, ‘यह आप क्या कह रहे हैं।’
‘मक्कार औरत, वहां तू मुझे नीला जैक्सन बनकर मिली थी और फिर सुषमा वर्मा के नाम से बहुत मशहूर मॉडल गर्ल भी रही हो ।’
‘मैं नीला जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में आपके साथ रात गुजार चुकी हूं। फिर एक बहुत मशहूर मॉडल-गर्ल भी रही हूं?’
‘पब्लिसिटी फिल्मों की सबसे मशहूर और लोकप्रिय हीरोइन। और आप मुझे एक खोली से ब्याह कर लाए हैं। मेरे अपाहिज पिता और गरीब भाई के पास आपको दहेज तक देने के लिए पैसा नहीं था।’
‘वह सब नाटक भी तो हो सकता है।’
‘यह आपकी गलतफहमी भी तो हो सकती है। क्या इस धरती पर एक शक्ल की दो लड़कियां नहीं हो सकतीं?’
‘नहीं, मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं। नीला जैक्सन और तुम में जर्रा बराबर भी फर्क नहीं है।’
‘नाथ!’ सुषमा की आवाज भर्रा गई। उसने फर्श पर बैठकर कृष्ण के पांव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाकर कहा-
भगवान् के लिए मेरी बात मानिए, मैं वही नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं। जरूर आप किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं।’
‘हां, मैं गलतफहमी का शिकार तो हुआ हूं और वह भी तुम्हारे पिता और तुम्हारे भैया की शराफत देखकर।’
फिर सुषमा को बाजू से उठाया और बोला, ‘अब मेरा फैसला उन्हीं दोनों दगाबाजों के सामने होगा।’
सुषमा गिड़गिड़ाती हुई रह गई और कृष्ण उसे खींचता हुआ बाहर ले आया।
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रघुुनन्दन और प्रदीप उछल पड़े। दरवाजा तेजी से खुला था।
फिर कृष्ण सुषमा का बाजू पकड़े हुए अन्दर आया। उसने सुषमा को बाबूजी के पैरों के पास फेंकते हुए गुर्रा कर कहा, ‘सम्भालिए अपनी गन्दगी की पोटली, जो आपने धोखे से मेरे सिर पर रख दी। यह तो अच्छा हुआ उसकी बदबू फैलने से पहले ही मैं चौकन्ना हो गया।’
सुषमा सिसक रही थी। बाबूजी और प्रदीप के चेहरे फक्क पड़ गए।
‘मगर, मगर हुआ क्या?’
‘मुझसे पूछते हो।’ कृष्ण ने फुंकारकर कहा, ‘शर्म नहीं आई तुम्हें इतनी बड़ी मक्कारी करते हुए। एक वेश्या को मेरे सर पर थोप दिया।
‘नहीं-नहीं यह झूठ है।’ सुषमा रोती हुई गिड़गिड़ाई।
‘अगर यह झूठ है तो खा अपने बाबूजी की सौगन्ध, तुमने मिस नील जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में मेरे साथ रात नहीं गुजारी थी? और तुम सुषमा वर्मा बनकर मॉडल-गर्ल के रूप में पब्लिसिटी-फिल्मों में काम नहीं करती थी?’
‘बाबूजी की सौगन्ध। बाबूजी की सौगन्ध।’ सुषमा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके होंठों पर ताला डाल दिया हो। जिस बाबूजी को बचाने के लिए उसने कृष्ण के हाथों अपने आपको पन्द्रह हजार में बेचा था उसी बाबूजी की झूठी सौगन्ध वह कैसे खा सकती है- ‘नहीं नहीं, यह नहीं हो सकता।’
‘बस, खुल गई ना असलियत।’
‘कमीनी बेहया।’ बाबूजी ने कांपती आवाज में कहा, ‘तू हमारे मुंह पर कालिख पोतने से पहले मर क्यों न गई?’
फिर बाबूजी की एक बैसाखी सुषमा की पीठ पर पड़ी। वह हल्की-सी चीख के साथ गिर पड़ी। बाबूजी की बैसाखी पड़ती रही। सुषमा के शरीर पर चोटों के निशान बनते गए। प्रदीप ने उसे बचाया नहीं। सुषमा खामोशी से पिटती रही और बाबूजी की जुबान से गालियां निकलती रहीं।
मारते-मारते बाबूजी थक गए और फिर धम्म से बिस्तर पर बैठ गए, उनकी दोनों बैसाखियां गिर चुकी थीं। मार खाने के बाद सुषमा ने बड़ी शांति से बाबूजी की तरफ देखा, उसकी आंखों में अब न आंसू थे और न चेहरे पर कोई भाव। वह बड़ी गम्भीरता से बोली-
‘अपना फर्ज पूरा कर चुके, बाबूजी?’
बाबूजी ने हांफते हुए कहा, ‘चली जा यहां से। मेरी आंखों से दूर हो जा।’
‘जरूर चली जाऊंगी, आप अपना फर्ज पूरा कर चुके हैं, लेकिन मेरा फर्ज अभी बाकी है।’
‘क्या बकती है?’
‘हां बाबूजी, मेरा एक फर्ज अभी बाकी रह गया है, यह बताना कि बेटी का भविष्य बाप के अपने व्यवहार पर निर्भर करता है।’
‘मैंने तुझसे कहा था कि तू वेश्या बन जा?’
‘जी नहीं, मगर फिर भी एक बाप को यह विश्वास होना चाहिए कि लड़की की जात स्वयं उसकी अपनी इज्जत के लिए नाजुक शीशा होती है। जब उनके मुकद्दर में एक शीशा आ जाए तो उसे सम्भाल कर रखना उनका अपना कर्त्तव्य होता है। आपने बड़ी दीदी और मंझली दीदी की शादी के लिए, उनके दहेज के लिए बीस हजार की बड़ी रकम के लिए मैनेजर के सामने हाथ फैलाए। उसने पहले घर आकर खाना खाया। यह देखा कि अगर आपको बीस हजार दिलवाता है तो उसके बदले में उसे क्या लाभ होगा।
‘यहां खाना खाकर उसने मुझे देखा। और बीस हजार के बदले उसने आपसे कहा था कि चेक लेने आप मुझे उसके पास भेजें।’
‘सुषमा।’ बाबूजी की आवाज कांप गई।
‘आपको याद है बाबूजी, उस रोज मैंने कितनी बार आपसे कहा था कि मैं मैनेजर के पास नहीं जाऊंगी लेकिन आपकी कल्पना में केवल आपकी दो लड़कियों के लग्न-मण्डप घूम रहे थे। आपने यह नहीं सोचा कि आप मैनेजर के पास मुझे भेज रहे हैं तो मैं भी तो आपकी बेटी हूं। आपने यह भी नहीं सोचा कि आखिर मैनेजर ने सिर्फ मुझे ही चेक लेने के लिए क्यों बुलाया है? उसने चेक आपको क्यों नहीं दे दिया? इसलिए कि वह आपसे बीस हजार का बदला चाहता था। उसके बदले उसने आपकी बेटी की इज्जत लूट ली। आपकी बेटी के पास कुछ नहीं बचा। तब उसने बजाए मौत की गोद में जाने के, अपने अपाहिज बाप की देखभाल के लिए, अपने भाई के भविष्य के लिए, कृष्ण के साथ अपने शरीर का पहला और आखिरी सौदा किया।’
बाबूजी कुछ न बोले। उनके शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी और फटी-फटी आंखों के कोनों पर आंसुओं की दो बूंदें जमी हुई थीं।
17
सुषमा ने कुछ देर ठहरकर सिसकी ली और फिर बाबूजी की ओर मुड़कर भर्राई हुई आवाज में बोली-
“बाबूजी, अगर आपके मन में न्याय है तो मुझे बताइए, क्या मैं सचमुच पापी हूं?”
अचानक वह रघुनन्दन का चेहरा ध्यान से देखकर चौंक पड़ी और जल्दी से आगे बढ़कर उसने उनके घुटने पकड़कर कंपकंपाती आवाज में पुकारा- “बाबूजी!”
और रघुनन्दन की गर्दन एक ओर ढलक गई। सुषमा हड़बड़ाकर पीछे हटती हुई कानों पर दोनों हाथ रखकर पागलों की तरह चिल्लाई-
“बाबूजी!”
प्रदीप हड़बड़ाकर बाबूजी की ओर झपटा और उन्हें टटोलता हुआ बोला- “बाबूजी-! बाबूजी-!”
लेकिन रघुनन्दन की आत्मा उनका शरीर त्याग कर अनन्त में लीन हो चुकी थी।
प्रदीप बाबूजी के घुटनों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। और सुषमा आंखें फाड़े किसी पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी रही।
धीरे-धीरे प्रदीप की सिसकियां कम हुईं। वह सीधा खड़ा हुआ और उसके चेहरे पर गहरा तूफान मचलता दिखाई देने लगा। उसने सुषमा की ओर मुड़कर मुट्ठियां भींचकर कंपकंपाती आवाज में कहा-
‘चैन मिल गया तुम्हारे मन को अब तो?”
“प्रदीप भैया-!” सुषमा कांप उठी।
“मत कहो मुझे अपनी गन्दी जबान से भैया। तुम बहन और बेटी के नाम पर एक कलंक हो। यह ठीक है कि बाबूजी ने तुम्हें प्रेम के पास चेक लेने के लिए भेजकर भूल की थी। प्रेम ने उनकी भूल का अनुचित लाभ उठाया। तुमने उसे मार डाला। उसकी मृत्यु के बाद तुम्हारा पाप धुल गया था। क्योंकि उस पाप में तुम्हारी मर्जी शामिल नहीं थी। लेकिन‒
“लेकिन बाबूजी के इलाज के लिए तुमने जानबूझकर खुद को कृष्ण के हाथों बेचा। और वह भी एक अड्डे पर जाकर। क्या जरूरत थी तुम्हें ऐसा करने की? ज्यादा-से-ज्यादा बाबूजी मर ही तो जाते। आज भी तो मर गए। अगर तब मर गए होते तो आज अपने दिल में यह सदमा लेकर न मरते कि उनकी बेटी ने किस तरह उनके चेहरे पर कालिख पोती है। किस तरह उनके खानदान को कलंक लगाया है! जिस दफ्तर में मैं काम करता हूं उसी मैं कृष्ण भी काम करता है। क्या वह लोगों को बतायेगा नहीं कि एक इज्जतदार कहलाने वाले भाई-बहन कैसे हैं? क्या मुंह लेकर जाऊंगा मैं उस दफ्तर में? किस किस की व्यंग-भरी मुस्कराहटों पर सामना करूंगा?”
“सुषमा, तुम हमारे परिवार पर एक अभिशाप बनकर पैदा हुई हो। तुमने मुझे पढ़ाकर कोई अहसान नहीं किया। क्योंकि तुम्हारी उस डिग्री से अब मुझे गन्दगी की बू महसूस होती है। तुम इसलिए मॉडल गर्ल बनी थीं कि कारों में घूम सको, जी भरकर ऐश कर सको। तुम पूरे परिवार के माथे पर कलंक हो। तुम बाबूजी की खूनी हो। अच्छा होता कि अपने बाप के सामने अपनी गन्दी जबान खोलने से पहले तुम मर गई होतीं। तुम जैसी बेगैरत, बेशर्म, वेश्या को जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
सुषमा की आंखें फटी हुई थीं। सांसें तेज-तेज चल रही थीं। उसने बड़बड़ाने के अंदाज में कहा-
“हां, तुम ठीक कहते हो प्रदीप मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं। मुझे मर ही जाना चाहिए- मुझे मर ही जाना चाहिए।”
फिर वह धीरे-से आगे बढ़ी और बाबूजी के पैर छूने के लिए झुकी तो अचानक प्रदीप झपटकर बीच में आ गया और घृणा भरे स्वर में बोला- “मत छुओ अपने अपवित्र हाथों से बाबूजी के चरण। मरने के बाद तो उनकी आत्मा को चैन लेने दो।”
सुषमा सिसक कर पीछे हटी और फिर रोती हुई दौड़कर कमरे से निकल गई। वह दौड़ी चली जा रही थी और उसके कानों में प्रदीप के वाक्य गूंज रहे थे-
“तुम बाबूजी की खूनी हो।”
“तुम्हें जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
“तुम्हें मर जाना चाहिए।”
“हां, सचमुच मुझे मर ही जाना चाहिए।”
‘तुम्हें जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
“शायद यही दुनिया की रीत है।”
“इस दुनिया में जो दूसरों को जिन्दा रहने का अधिकार देते हैं, लोग उसी से जिन्दा रहने का अधिकार छीन लेते हैं।”
“मैंने अपनी बहनों का घर बसाने के लिए अपनी आबरू की बलि दे दी। आज वे लोग खुश हैं। लेकिन मुझसे घृणा करती हैं। वे बहनें जिनके लिए मैंने अपना पहला और अन्तिम प्यार लुटा दिया।”
“मैंने बाबूजी को जिन्दा रखने के लिए खुद को बेचा।”
“आज प्रदीप कहता है कि मैं उनकी खूनी हूं।”
“मैंने अपना सुख-चैन त्यागकर प्रदीप को पढ़ाया।”
“आज जिस डिग्री से वह रोजी कमाता है उसमें उसे गन्दगी की बू महसूस होती है।”
“और मेरा भाई मुझे वेश्या कहता है।”
‘सचमुच मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
“मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
रोते-रोते वह एक ऊंची चट्टान पर चढ़ती चली गई। और फिर उसने चट्टान से टकराती हुई समुद्र की बिफरी हुई लहरों में छलांग लगा दी। उसका बदन एक चट्टान से टकराया और फिर लहरों पर हिचकोले लेने लगा।
और फिर धीरे-धीरे उसकी आंखों में फैला हुआ अंधेरा गहरा होता चला गया।
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‘बेटी।’ बाबूजी की आवाज भी कांप गई।
‘बाबूजी, भैया।’ सुषमा ने गम्भीरता से कहा, ‘मैं नहीं जानती कि वह कौन-सी शिकायत थी जिसने आपको और बाबूजी को मुझे बेसहारा छोड़ कर आने पर मजबूर कर दिया। मैंने अपनी जिम्मेदारी आज तक पूरी की थी। तुम्हें वहां तक ले आई जहां बाबूजी का बोझ मेरे कंधों से तुम्हारे कंधों पर चला गया।’
‘मगर तुम सिर्फ बाबूजी का बोझ लेकर चले आए। अपनी दीदी को छोड़कर उस दोराहे पर जहां तुम्हारी दीदी के अंदर दो द्रौपदियां पैदा हो गयी थीं। उनमें से एक सुषमा इतनी जहरीली बन गई थी, जिसकी फुंकार से भी समाज और सोसायटी में जहर फैल जाती, जहां लोग बड़े-बड़े दावे करते हैं। ऊंची-ऊंची डीगें हांकते हैं। लेकिन सच्चाई जब सामने आती है तो बाप भाई तक गर्ज पूरी हो जाने पर सुषमा को अकेला छोड़ जाते हैं।’
‘मगर जब मेरे क्रोध, झुंझलाहट का नशा उतरा तो मैंने सोचा कि अगर आज मैंने ऐसी सुषमा को जन्म दिया तो कल समाज में पता नहीं कितनी द्रौपदियां पैदा हो जाएंगी। मेरे जैसे द्रौपदियों को अपने खून से नफरत हो जाएगी। कोई सुषमा अपने बाप को नई जिंदगी नहीं देगी। अपने भाई की परवरिश नहीं करेगी।’
‘इसलिए मैंने पहली सुषमा को मार डाला और उस सुषमा को नया जन्म दिया जिसे देश और समाज में एक बाप और भाई की रक्षा की जरूरत होती है। आज मैं अपना सब-कुछ छोड़ आई हूं, अपना फ्लैट, बैंक बेलैंस।’
‘सारा ऐशो-आराम का सामान छोड़कर अपने बाप और भाई की रक्षा में आई हूं। कल तक मैंने अपनी जिम्मेदारी निभायी थी। अब तुम निभाओ। चाहे भूखा रखकर, चाहे दाल-चावल खिलाकर।’
प्रदीप धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसने झुककर सुषमा के पांव छुए और भर्राई हुई आवाज में कहा- ‘मुझे माफ कर दो दीदी, मैं मैं....।’
‘पप्पू- मेरे भैया!’
सुषमा ने प्रदीप को उठाकर गले लगाया। दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे और बाबूजी की आंखें भी भीगी हुई थी।
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सुषमा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने स्त्री की हुई साफ साड़ी पहन रखी थी। सिर पर आंचल बराबर कर लिया था। इस तरह कि उसका कुछ चेहरा भी छिपा रहे फिर भी उसे डर लग रहा था कि कहीं वे लोग उसे सुषमा वर्मा मॉडल गर्ल के रूप में न पहचान लें।
असल में कल ही रात प्रदीप ने आकर बड़ी खुशी-खुशी बताया था कि जिस दफ्तर में वह काम करता है, उस दफ्तर में एक अच्छी पगार पर काम करने वाला किसी गरीब मगर पढ़ी-लिखी लड़की से शादी करना चाहता है। किसी ने प्रदीप का नाम ले दिया। कृष्ण ने प्रदीप से बात की तो प्रदीप हक्का-बक्का रह गया। कृष्ण ने कहा कि मैंने जिंदगी में इतनी लड़कियां देखी हैं कि उसे खूबसूरती और बदसूरती की तमीज नहीं रह गई है। अब तो मैं खुद भी लड़की देखने की इच्छा नहीं रखता। मगर मेरे मां-बाप नहीं हैं। और लड़की के रिश्तेदार भी नहीं हैं इसलिए मेरे दोस्त की मां ही लड़की को देखने आएगी वह भी इसलिए कि लड़की कानी-भैंगी या लूली-लंगड़ी न हो और बस लड़की जरूर हो।
और आज कृष्ण के दोस्त की मां और बहन लड़की को देखने आ रहे थे। सुषमा का दिल बार-बार धड़क रहा था।
अचानक प्रदीप आया और सरगोशी में बोला, ‘आ गए वह लोग।’
‘सुषमा का दिल धक से रह गया।
‘बस, तुम जल्दी से मिठाई लेकर आ जाओ।’
सुषमा मिठाई की थाली लेकर बाहर आई तो एक छः साल की बच्ची और एक बूढ़ी औरत मौजूद थे। सुषमा ने इत्मीनान का सांस लिया, क्योंकि बूढ़ी औरत या बच्ची उसे मॉडल-गर्ल की हैसियत से क्या पहचानेंगी? उसने मिठाई रखी तो बच्ची खुश होकर बोली-
‘मम्मी! भाभी, तो सचमुच भैया से भी ज्यादा खूबसूरत हैं।’
‘बेटी, शादी के पहले भाभी नहीं कहते। बुरी बात है।’
‘मम्मी! कृष्ण भैया लोट-पोट हो जाएंगे भाभी को देखकर।’
औरत ने अपना चश्मा ठीक किया और सुषमा को पास बुलाकर कहा- ‘बैठ जाओ बेटी।’
सुषमा सिमटी-सिकुड़ी बैठ गई और बूढ़ी ने पूछा-
‘क्या पढ़ा है तूने?’
‘जी, बी. ए. किया है।’
‘घर का काम-काज तो कर लेती हो?’
‘जी, सब कर लेती हूं।’
‘भैयाजी।’ बूढ़ी ने बाबूजी से कहा, ‘हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि कृष्ण का मुकद्दर इतना तेज है। हमें तो लड़की बहुत पसन्द है।’
‘मगर हमारे पास देने-दिलाने को कुछ भी नहीं है।’
‘वह उसने सब-कुछ मेरे ऊपर छोड़ दिया है। आप शादी की तैयारी करें और मुहूर्त निकलवा लीजिए, कृष्ण को जरा जल्दी है।’
‘जी, मैं कल ही पुरोहित से मुहूर्त निकलवाऊंगा।
बाबूजी की आंखों में खुशी के आंसू नजर आ रहे थे और उधर सुषमा की दिल धक्-धक् कर रहा था। इसलिए नहीं कि कृष्ण से उसकी शादी होने वाली है। इसलिए कि उसने उसे सुषमा वर्मा मॉडल-गर्ल की हैसियत से पहचान लिया तो क्या होगा। मगर फिर उसने दिल-ही-दिल में फैसला कर लिया कि वह जिन्दगी का सबसे बड़ा झूठ बोलेगी कि वह मॉडल-गर्ल कभी नहीं थी। वह सारा जीवन यह झूठ बनाए रखेगी। जिस झूठ से किसी को नुकसान न हो, भगवान् भी उसे बनाए रखने में सहायता करता है। फिर वह निश्चिन्त हो गई।
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बारात के हंगामे ठण्डे हो चुके थे। शायद आखिरी बाराती भी चला गया था। सुषमा दुल्हन बनी एक कमरे में बैठी थी। यह कमरा कृष्ण के दोस्त का फ्लैट था। फिर कदमों की हल्की-हल्की आहट के साथ दरवाजा खुला। फिर सुषमा का दिल जैसे गले में आकर अटक गया। उसने घूंघट की ओट से देखा, कृष्ण चिटखनी बन्द कर रहा था।
सुषमा खड़ी हो गई। कृष्ण उसके नजदीक आया तो कदमों में झुक कर उसके पैर छुए और कृष्ण ने कन्धों से पकड़कर उसे उठाते हुए कहा-
‘तुम्हारी जगह कदमों में नहीं दिल में है।’ फिर कृष्ण ने उसे पलंग पर बिठाया और उसका घूंघट उठा दिया और आश्चर्यजनक आवाज निकली- ‘हाय! सुषमा वर्मा मॉडल गर्ल या नीला जैक्सन!’
सुषमा ने चौंककर गर्दन उठाई तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर एटम बम दे मारा हो। क्योंकि उसका दूल्हा कृष्ण तो दरअसल वह के. के. था, जिसके साथ रियाजुद्दीन बिल्डर्स के फ्लैट में वह नीला जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में एक रात गुजार चुकी थी।
सुषमा को ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे बहुत ऊंची पहाड़ी से नीचे लुढ़का दिया हो और वह किसी गहरी खाई की तरफ चली जा रही हो।
उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया, मगर सुषमा अब अपने ऊपर काबू पा चुकी थी। उसने कृष्ण को तेजी से मुड़कर बाहर की तरफ जाते हुए देखा तो वह दोनों हाथों को फैलाकर उसका रास्ता रोकी हुई बोली-
‘कहां जा रहे हैं, आप?’
‘मेरा रास्ता छोड़ दो, वरना मेरे हाथों तुम्हारा खून हो जाएगा।’ कृष्ण हांफता हुआ तेज-तेज बोला।
‘मगर मेरा दोष?’
‘दोष अरे बेगैरत, तुम्हें शर्म नहीं आती पूछते हुए। वह भी इतनी बेबाकी से।’
‘किसी पर इल्जाम लगाया जाए तो क्या वह अपना दोष नहीं पूछेगा?’
‘बकवास बन्द कर। तेरी मक्कारी और अदाकारी तेरी असलियत पर पर्दा नहीं डाल सकती।’
‘कौन-सी असलियत, आप खुलकर बात क्यों नहीं करते?’
‘मेरी जबान से ही सुनना चाहती है तो सुन ले- क्या तू वही वेश्या नहीं है जो रिजाजुद्दीन बिल्डर्स के फ्लैट में मेरे साथ एक रात गुजार चुकी है, पूरे पन्द्रह हजार रुपये में।’
‘हे भगवान्! सुषमा सीने पर हाथ रखकर पीछे हट गयी, ‘यह आप क्या कह रहे हैं।’
‘मक्कार औरत, वहां तू मुझे नीला जैक्सन बनकर मिली थी और फिर सुषमा वर्मा के नाम से बहुत मशहूर मॉडल गर्ल भी रही हो ।’
‘मैं नीला जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में आपके साथ रात गुजार चुकी हूं। फिर एक बहुत मशहूर मॉडल-गर्ल भी रही हूं?’
‘पब्लिसिटी फिल्मों की सबसे मशहूर और लोकप्रिय हीरोइन। और आप मुझे एक खोली से ब्याह कर लाए हैं। मेरे अपाहिज पिता और गरीब भाई के पास आपको दहेज तक देने के लिए पैसा नहीं था।’
‘वह सब नाटक भी तो हो सकता है।’
‘यह आपकी गलतफहमी भी तो हो सकती है। क्या इस धरती पर एक शक्ल की दो लड़कियां नहीं हो सकतीं?’
‘नहीं, मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं। नीला जैक्सन और तुम में जर्रा बराबर भी फर्क नहीं है।’
‘नाथ!’ सुषमा की आवाज भर्रा गई। उसने फर्श पर बैठकर कृष्ण के पांव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाकर कहा-
भगवान् के लिए मेरी बात मानिए, मैं वही नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं। जरूर आप किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं।’
‘हां, मैं गलतफहमी का शिकार तो हुआ हूं और वह भी तुम्हारे पिता और तुम्हारे भैया की शराफत देखकर।’
फिर सुषमा को बाजू से उठाया और बोला, ‘अब मेरा फैसला उन्हीं दोनों दगाबाजों के सामने होगा।’
सुषमा गिड़गिड़ाती हुई रह गई और कृष्ण उसे खींचता हुआ बाहर ले आया।
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रघुुनन्दन और प्रदीप उछल पड़े। दरवाजा तेजी से खुला था।
फिर कृष्ण सुषमा का बाजू पकड़े हुए अन्दर आया। उसने सुषमा को बाबूजी के पैरों के पास फेंकते हुए गुर्रा कर कहा, ‘सम्भालिए अपनी गन्दगी की पोटली, जो आपने धोखे से मेरे सिर पर रख दी। यह तो अच्छा हुआ उसकी बदबू फैलने से पहले ही मैं चौकन्ना हो गया।’
सुषमा सिसक रही थी। बाबूजी और प्रदीप के चेहरे फक्क पड़ गए।
‘मगर, मगर हुआ क्या?’
‘मुझसे पूछते हो।’ कृष्ण ने फुंकारकर कहा, ‘शर्म नहीं आई तुम्हें इतनी बड़ी मक्कारी करते हुए। एक वेश्या को मेरे सर पर थोप दिया।
‘नहीं-नहीं यह झूठ है।’ सुषमा रोती हुई गिड़गिड़ाई।
‘अगर यह झूठ है तो खा अपने बाबूजी की सौगन्ध, तुमने मिस नील जैक्सन बनकर पन्द्रह हजार रुपये में मेरे साथ रात नहीं गुजारी थी? और तुम सुषमा वर्मा बनकर मॉडल-गर्ल के रूप में पब्लिसिटी-फिल्मों में काम नहीं करती थी?’
‘बाबूजी की सौगन्ध। बाबूजी की सौगन्ध।’ सुषमा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके होंठों पर ताला डाल दिया हो। जिस बाबूजी को बचाने के लिए उसने कृष्ण के हाथों अपने आपको पन्द्रह हजार में बेचा था उसी बाबूजी की झूठी सौगन्ध वह कैसे खा सकती है- ‘नहीं नहीं, यह नहीं हो सकता।’
‘बस, खुल गई ना असलियत।’
‘कमीनी बेहया।’ बाबूजी ने कांपती आवाज में कहा, ‘तू हमारे मुंह पर कालिख पोतने से पहले मर क्यों न गई?’
फिर बाबूजी की एक बैसाखी सुषमा की पीठ पर पड़ी। वह हल्की-सी चीख के साथ गिर पड़ी। बाबूजी की बैसाखी पड़ती रही। सुषमा के शरीर पर चोटों के निशान बनते गए। प्रदीप ने उसे बचाया नहीं। सुषमा खामोशी से पिटती रही और बाबूजी की जुबान से गालियां निकलती रहीं।
मारते-मारते बाबूजी थक गए और फिर धम्म से बिस्तर पर बैठ गए, उनकी दोनों बैसाखियां गिर चुकी थीं। मार खाने के बाद सुषमा ने बड़ी शांति से बाबूजी की तरफ देखा, उसकी आंखों में अब न आंसू थे और न चेहरे पर कोई भाव। वह बड़ी गम्भीरता से बोली-
‘अपना फर्ज पूरा कर चुके, बाबूजी?’
बाबूजी ने हांफते हुए कहा, ‘चली जा यहां से। मेरी आंखों से दूर हो जा।’
‘जरूर चली जाऊंगी, आप अपना फर्ज पूरा कर चुके हैं, लेकिन मेरा फर्ज अभी बाकी है।’
‘क्या बकती है?’
‘हां बाबूजी, मेरा एक फर्ज अभी बाकी रह गया है, यह बताना कि बेटी का भविष्य बाप के अपने व्यवहार पर निर्भर करता है।’
‘मैंने तुझसे कहा था कि तू वेश्या बन जा?’
‘जी नहीं, मगर फिर भी एक बाप को यह विश्वास होना चाहिए कि लड़की की जात स्वयं उसकी अपनी इज्जत के लिए नाजुक शीशा होती है। जब उनके मुकद्दर में एक शीशा आ जाए तो उसे सम्भाल कर रखना उनका अपना कर्त्तव्य होता है। आपने बड़ी दीदी और मंझली दीदी की शादी के लिए, उनके दहेज के लिए बीस हजार की बड़ी रकम के लिए मैनेजर के सामने हाथ फैलाए। उसने पहले घर आकर खाना खाया। यह देखा कि अगर आपको बीस हजार दिलवाता है तो उसके बदले में उसे क्या लाभ होगा।
‘यहां खाना खाकर उसने मुझे देखा। और बीस हजार के बदले उसने आपसे कहा था कि चेक लेने आप मुझे उसके पास भेजें।’
‘सुषमा।’ बाबूजी की आवाज कांप गई।
‘आपको याद है बाबूजी, उस रोज मैंने कितनी बार आपसे कहा था कि मैं मैनेजर के पास नहीं जाऊंगी लेकिन आपकी कल्पना में केवल आपकी दो लड़कियों के लग्न-मण्डप घूम रहे थे। आपने यह नहीं सोचा कि आप मैनेजर के पास मुझे भेज रहे हैं तो मैं भी तो आपकी बेटी हूं। आपने यह भी नहीं सोचा कि आखिर मैनेजर ने सिर्फ मुझे ही चेक लेने के लिए क्यों बुलाया है? उसने चेक आपको क्यों नहीं दे दिया? इसलिए कि वह आपसे बीस हजार का बदला चाहता था। उसके बदले उसने आपकी बेटी की इज्जत लूट ली। आपकी बेटी के पास कुछ नहीं बचा। तब उसने बजाए मौत की गोद में जाने के, अपने अपाहिज बाप की देखभाल के लिए, अपने भाई के भविष्य के लिए, कृष्ण के साथ अपने शरीर का पहला और आखिरी सौदा किया।’
बाबूजी कुछ न बोले। उनके शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी और फटी-फटी आंखों के कोनों पर आंसुओं की दो बूंदें जमी हुई थीं।
17
सुषमा ने कुछ देर ठहरकर सिसकी ली और फिर बाबूजी की ओर मुड़कर भर्राई हुई आवाज में बोली-
“बाबूजी, अगर आपके मन में न्याय है तो मुझे बताइए, क्या मैं सचमुच पापी हूं?”
अचानक वह रघुनन्दन का चेहरा ध्यान से देखकर चौंक पड़ी और जल्दी से आगे बढ़कर उसने उनके घुटने पकड़कर कंपकंपाती आवाज में पुकारा- “बाबूजी!”
और रघुनन्दन की गर्दन एक ओर ढलक गई। सुषमा हड़बड़ाकर पीछे हटती हुई कानों पर दोनों हाथ रखकर पागलों की तरह चिल्लाई-
“बाबूजी!”
प्रदीप हड़बड़ाकर बाबूजी की ओर झपटा और उन्हें टटोलता हुआ बोला- “बाबूजी-! बाबूजी-!”
लेकिन रघुनन्दन की आत्मा उनका शरीर त्याग कर अनन्त में लीन हो चुकी थी।
प्रदीप बाबूजी के घुटनों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। और सुषमा आंखें फाड़े किसी पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी रही।
धीरे-धीरे प्रदीप की सिसकियां कम हुईं। वह सीधा खड़ा हुआ और उसके चेहरे पर गहरा तूफान मचलता दिखाई देने लगा। उसने सुषमा की ओर मुड़कर मुट्ठियां भींचकर कंपकंपाती आवाज में कहा-
‘चैन मिल गया तुम्हारे मन को अब तो?”
“प्रदीप भैया-!” सुषमा कांप उठी।
“मत कहो मुझे अपनी गन्दी जबान से भैया। तुम बहन और बेटी के नाम पर एक कलंक हो। यह ठीक है कि बाबूजी ने तुम्हें प्रेम के पास चेक लेने के लिए भेजकर भूल की थी। प्रेम ने उनकी भूल का अनुचित लाभ उठाया। तुमने उसे मार डाला। उसकी मृत्यु के बाद तुम्हारा पाप धुल गया था। क्योंकि उस पाप में तुम्हारी मर्जी शामिल नहीं थी। लेकिन‒
“लेकिन बाबूजी के इलाज के लिए तुमने जानबूझकर खुद को कृष्ण के हाथों बेचा। और वह भी एक अड्डे पर जाकर। क्या जरूरत थी तुम्हें ऐसा करने की? ज्यादा-से-ज्यादा बाबूजी मर ही तो जाते। आज भी तो मर गए। अगर तब मर गए होते तो आज अपने दिल में यह सदमा लेकर न मरते कि उनकी बेटी ने किस तरह उनके चेहरे पर कालिख पोती है। किस तरह उनके खानदान को कलंक लगाया है! जिस दफ्तर में मैं काम करता हूं उसी मैं कृष्ण भी काम करता है। क्या वह लोगों को बतायेगा नहीं कि एक इज्जतदार कहलाने वाले भाई-बहन कैसे हैं? क्या मुंह लेकर जाऊंगा मैं उस दफ्तर में? किस किस की व्यंग-भरी मुस्कराहटों पर सामना करूंगा?”
“सुषमा, तुम हमारे परिवार पर एक अभिशाप बनकर पैदा हुई हो। तुमने मुझे पढ़ाकर कोई अहसान नहीं किया। क्योंकि तुम्हारी उस डिग्री से अब मुझे गन्दगी की बू महसूस होती है। तुम इसलिए मॉडल गर्ल बनी थीं कि कारों में घूम सको, जी भरकर ऐश कर सको। तुम पूरे परिवार के माथे पर कलंक हो। तुम बाबूजी की खूनी हो। अच्छा होता कि अपने बाप के सामने अपनी गन्दी जबान खोलने से पहले तुम मर गई होतीं। तुम जैसी बेगैरत, बेशर्म, वेश्या को जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
सुषमा की आंखें फटी हुई थीं। सांसें तेज-तेज चल रही थीं। उसने बड़बड़ाने के अंदाज में कहा-
“हां, तुम ठीक कहते हो प्रदीप मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं। मुझे मर ही जाना चाहिए- मुझे मर ही जाना चाहिए।”
फिर वह धीरे-से आगे बढ़ी और बाबूजी के पैर छूने के लिए झुकी तो अचानक प्रदीप झपटकर बीच में आ गया और घृणा भरे स्वर में बोला- “मत छुओ अपने अपवित्र हाथों से बाबूजी के चरण। मरने के बाद तो उनकी आत्मा को चैन लेने दो।”
सुषमा सिसक कर पीछे हटी और फिर रोती हुई दौड़कर कमरे से निकल गई। वह दौड़ी चली जा रही थी और उसके कानों में प्रदीप के वाक्य गूंज रहे थे-
“तुम बाबूजी की खूनी हो।”
“तुम्हें जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
“तुम्हें मर जाना चाहिए।”
“हां, सचमुच मुझे मर ही जाना चाहिए।”
‘तुम्हें जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
“शायद यही दुनिया की रीत है।”
“इस दुनिया में जो दूसरों को जिन्दा रहने का अधिकार देते हैं, लोग उसी से जिन्दा रहने का अधिकार छीन लेते हैं।”
“मैंने अपनी बहनों का घर बसाने के लिए अपनी आबरू की बलि दे दी। आज वे लोग खुश हैं। लेकिन मुझसे घृणा करती हैं। वे बहनें जिनके लिए मैंने अपना पहला और अन्तिम प्यार लुटा दिया।”
“मैंने बाबूजी को जिन्दा रखने के लिए खुद को बेचा।”
“आज प्रदीप कहता है कि मैं उनकी खूनी हूं।”
“मैंने अपना सुख-चैन त्यागकर प्रदीप को पढ़ाया।”
“आज जिस डिग्री से वह रोजी कमाता है उसमें उसे गन्दगी की बू महसूस होती है।”
“और मेरा भाई मुझे वेश्या कहता है।”
‘सचमुच मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
“मुझे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं।”
रोते-रोते वह एक ऊंची चट्टान पर चढ़ती चली गई। और फिर उसने चट्टान से टकराती हुई समुद्र की बिफरी हुई लहरों में छलांग लगा दी। उसका बदन एक चट्टान से टकराया और फिर लहरों पर हिचकोले लेने लगा।
और फिर धीरे-धीरे उसकी आंखों में फैला हुआ अंधेरा गहरा होता चला गया।
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