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'अंशु कोठी आई थी। आने पर मुझसे मिली थी, परन्तु तुरंत ही वापस चली गई।' सहसा चंद्रभाल की मां ने कहा, जह तो चंद्रमाल से मिली भी नहीं।'
'जी?' निर्भय सिंह कुछ समझा नहीं।
'जाने क्या बात थी! कुछ परेशान-सी थी।' चंद्रभाल की मां ने चिन्ता प्रकट की'मैंने पूछा तब भी कुछ नहीं बताया।
निर्भय सिंह चिन्तित हो उठे। परन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं।, उन्हें सब से काम लेकर अंशु की प्रतीक्षा करनी थी, इसलिए वह उसकी प्रतीक्षा,करने लगे।
मंगनी की रस्म अदा हो गई, पार्टी भी आरंभ हो गई, परन्तु अंशु नहीं आई तो निर्भय सिंह की चिन्ता बढ़ने लगी। जब कुछ और समय बीत गया तो निर्भय सिंह ने अपनी कोठी में फोन किया। ऐसा तो नहीं कि अंशु अपनी कोठी वापस चली गई हो? कोठी में फोन की घंटी बजती रही। फिर किसी ने फोन उठाया।
आवाज आईआवाज अंशु की ही थी।
निर्भय सिंह ने स्वर पहचाना तो चैन की सांस ली। बोले, अंशु बेटी, तुम कोठी क्यों चली आई? पार्टी में क्यों नहीं आईं?'
'डैडी, मैं...मैं' दर्द में डूबा हुआ अंशु का स्वर काप रहा था। वह मानो रो पड़ना चाहती थी।
'क्या बात है बेटी? तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक है ना?' निर्भय सिंह की चिन्ता बड़ी।
उनके समीप ही मार्तण्ड सिंह भी खड़े थे।
अंशु को कोठी मे सुरक्षित जानकर वह संतुष्ट हो गए थे, परन्तु जैसे ही उन्होंने निर्भय सिह को चिन्तित देखा, वह भी चिन्तित हो उठे।
_ 'डैडी...डैडी...मै बहुत परेशान हूं। मुझे चंद्रभाल ने धोखा दिया है।' अंशु की सिसकी निकल गई।
चंद्रभाल के नाम पर निर्भय सिंह ने तुरन्त रिसीवर अपने कान से पूर्णतया सटा लिया था।
चंद्रभाल से ही तो उनकी सारी आशाएं बंधी थीं। उन्होंने मार्तण्ड सिंह को देखा। उन्होंने फोन की बात नहीं सुनी थी। सुन लेते तो उनके संबंध में परिवर्तन आ सकता था। चंद्रभाल ने अंशु को जाने किस सिलागले में धोखा दिया था? उन्होंने फोन पर कहा,'तुम परेशान मत हो। मैं आता हूं।' निर्भय सिंह ने बात न बढ़ाकर फोन रख दिया और कुछ सोचते हुए एक गहरी सांस ली।
'क्या कोई खास बात हो गई है?' मार्तण्ड सिंह ने चिन्तित होकर पूछा।
___ 'उसकी तबियत ठीक नहीं है।' निर्भय सिंह ने झूठ का सहारा लिया। चंद्रभाल के विषय में पूरी वास्तविकता जाने बिना वह कैसे कुछ कह सकते थे?
'हम भी साथ चलें?' मार्तण्ड सिंह ने सहानुभूति प्रकट की।
'कोई ऐसी बात होगी तो मैं स्वयं फोन कर दूंगा।' निर्भय सिंह ने अंशु से पहले एकांत में सब कुछ जान लेना आवश्यक समझा।
'चंद्रमाल को साथ लेते जाओ।' मार्तण्ड सिंह ने अपना समझकर राय दी।
'जी?' निर्भय सिंह कुछ समझा नहीं।
'जाने क्या बात थी! कुछ परेशान-सी थी।' चंद्रभाल की मां ने चिन्ता प्रकट की'मैंने पूछा तब भी कुछ नहीं बताया।
निर्भय सिंह चिन्तित हो उठे। परन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं।, उन्हें सब से काम लेकर अंशु की प्रतीक्षा करनी थी, इसलिए वह उसकी प्रतीक्षा,करने लगे।
मंगनी की रस्म अदा हो गई, पार्टी भी आरंभ हो गई, परन्तु अंशु नहीं आई तो निर्भय सिंह की चिन्ता बढ़ने लगी। जब कुछ और समय बीत गया तो निर्भय सिंह ने अपनी कोठी में फोन किया। ऐसा तो नहीं कि अंशु अपनी कोठी वापस चली गई हो? कोठी में फोन की घंटी बजती रही। फिर किसी ने फोन उठाया।
आवाज आईआवाज अंशु की ही थी।
निर्भय सिंह ने स्वर पहचाना तो चैन की सांस ली। बोले, अंशु बेटी, तुम कोठी क्यों चली आई? पार्टी में क्यों नहीं आईं?'
'डैडी, मैं...मैं' दर्द में डूबा हुआ अंशु का स्वर काप रहा था। वह मानो रो पड़ना चाहती थी।
'क्या बात है बेटी? तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक है ना?' निर्भय सिंह की चिन्ता बड़ी।
उनके समीप ही मार्तण्ड सिंह भी खड़े थे।
अंशु को कोठी मे सुरक्षित जानकर वह संतुष्ट हो गए थे, परन्तु जैसे ही उन्होंने निर्भय सिह को चिन्तित देखा, वह भी चिन्तित हो उठे।
_ 'डैडी...डैडी...मै बहुत परेशान हूं। मुझे चंद्रभाल ने धोखा दिया है।' अंशु की सिसकी निकल गई।
चंद्रभाल के नाम पर निर्भय सिंह ने तुरन्त रिसीवर अपने कान से पूर्णतया सटा लिया था।
चंद्रभाल से ही तो उनकी सारी आशाएं बंधी थीं। उन्होंने मार्तण्ड सिंह को देखा। उन्होंने फोन की बात नहीं सुनी थी। सुन लेते तो उनके संबंध में परिवर्तन आ सकता था। चंद्रभाल ने अंशु को जाने किस सिलागले में धोखा दिया था? उन्होंने फोन पर कहा,'तुम परेशान मत हो। मैं आता हूं।' निर्भय सिंह ने बात न बढ़ाकर फोन रख दिया और कुछ सोचते हुए एक गहरी सांस ली।
'क्या कोई खास बात हो गई है?' मार्तण्ड सिंह ने चिन्तित होकर पूछा।
___ 'उसकी तबियत ठीक नहीं है।' निर्भय सिंह ने झूठ का सहारा लिया। चंद्रभाल के विषय में पूरी वास्तविकता जाने बिना वह कैसे कुछ कह सकते थे?
'हम भी साथ चलें?' मार्तण्ड सिंह ने सहानुभूति प्रकट की।
'कोई ऐसी बात होगी तो मैं स्वयं फोन कर दूंगा।' निर्भय सिंह ने अंशु से पहले एकांत में सब कुछ जान लेना आवश्यक समझा।
'चंद्रमाल को साथ लेते जाओ।' मार्तण्ड सिंह ने अपना समझकर राय दी।