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Romance हरसिंगार/रानु

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परन्तु चंद्रमाल में अंशु के प्रति वह लंदन जैसी बात नहीं रह गई र्थी। वह रजनी के विषय में सोचता रहता। इन चार वर्षों में वह कैसी हो गई होगी? कली से फूल बनने में उस पर कैसा निखार आया होगा? वह उसे याद भी करती है या नहीं? उसे ऐसा महसूस हो रहा था, मानो जो जवानी के दिन उसने लंदन में अंशु के साथ व्यतीत किए थे, वह उसका बचपन था तथा जो बचपन उसने रजनी के साथ बिताया था, वह सयानापन था। कभी-कभी बचपन ही प्यार की ठोस नींव होता है और आज रजनी आ गई थी। आकर उसने अपने प्यार का ठोस प्रमाण दे दिया था।

चंद्रभाल अंशु के साथ नृत्य करते हुए रजनी के विषय में ही सोच रहा था। वह सोच रहा था कि कब यह पार्टी समाप्त हो और कब वह रजनी से जा मिले। उसे, पूरा विश्वास था कि रजनी इस समय उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। रजनी को आज नृत्य के मध्यान्तर में देखकर उसे विश्वास नहीं होता था कि वह इतनी सुन्दर हो गई होगी। उसकी बात उसे याद आ रही थी-फूलों से खेलने वाले कांटों-की परवाह नहीं करते। रजनी को अपने प्यार पर कितना अधिक विश्वास था! अपने भविष्य से निश्चित वह अब तक उसे प्यार किए जा रही थी।

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'बहुत खोए हुए हो!, सहसा नृत्य के मध्य अंशु ने उसकी आखों में झांका। वह बहुत देर से महसूस कर रही थी कि चंद्रभाल में उसी समय से कुछ परायापन उत्पन्न हो

गया है, जबसे रजनी की उससे भेंट हुई है।

परन्तु चंद्रभाल कोई उत्तर देने के बजाए मुस्करा दिया। वह अंशु को बताता भी क्या? वह जानता था, अंशु ने उससे बहुत सारी आशाएं बांध रखी हैं, परन्तु यह समये नहीं था उसे कुछ बताने का, बताकर उसका दिल तोड़ने का। आखिर उसका दोष ही क्या था?

वह स्वयं तो अंशु की संगति में रजनी को भूल बैठा था। चंद्रभाल इधर रजनी के विचारों में खोया हुआ था और उधर रजनी -अपने क्वार्टर में अपना अतीत दोहरा रही थी। बचपन के वन भी क्या थे!

सहसा अनेक कारों के होंने एक साथ गंजे तो कुछेक के आगे-पीछे भी। बाबा के कमरे की खिड़की पर बैठी रजनी चौंक गई। अपने विचारों में तल्लीन वह अपने अतीत से बाहर आ गई। होने के स्वर सुनकर उसकी दृष्टि स्वयं ही कोठी के बगल वाली चहारदीवारी पर उठ गई, जहां कारों की अनगिनत हैडलाइट्स एक-दूसरे से टकराकर आपस में गुंथती हुई कोठी पर फैल गई थीं। कार का स्वर तेज होता और फिर धीमा होने से पहले उस पर दूसरी कार के इंजन का स्वर छा जाता। जाने कब आर्केस्ट्रा की धुन रुक गई थी, रजनी को कुछ पता ही नहीं चला। पार्टी समाप्त हो गई थी। मेहमान जा रहे थे। धीमे-धीमे कारा की हेडलाइट्स गुम हो गई।

चांदनी छिटक आई। घटते चंद्रमा की रात थी यह। चंद्रमा देर से क्षितिज पर आया था, फिर भी कोठी के ऊपर आने के कारण चांदनी में वातावरण नहा रहा था। अंतिम जाती कार का स्वर भी जाने कहां लुप्त हो गया तो कोठी सन्नाटे में डूब गई।
 
रजनी अपनी खिड़की पर उसी प्रकार बैठी इस सन्नाटे पर कान लगाए रही, बहुत ध्यान से, इस प्रकार, मानो किसी आहट की प्रतीक्षा कर रही हो, बिना किसी आशा के -अकारण ही।

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सहसा कहीं दूर घड़ियाल ने बारह के घंटे बजाए। रात के बारह बज चुके थे। रजनी ने खिड़की पर बैठना उचित नहीं समझा। उस सुन्दरी को कुंवर साहब के साथ देखकर उसका विश्वास अपने प्यार पर से कमजोर पड़ गया था। कुंवरि साहब से क्षण भर की भेंट ने उसका दिल तोड़ दिया था। कुंवर साहब बदल गए हैं। मनुष्य तो एक दिन में बदल जाता है, फिर कुंवर साहब ने तो बदलने में पूरे चार वर्ष लिए, थे। उसके संतोष के लिए यह क्या कम था? कुंवर साहब को उसकी भावनाओं का ध्यान होता तो वह उसके फूल को नीचे से उठाकर वापस नहीं करते। फूल की सुगन को अपने नथुनों द्वारा दिल की गहराई में उतारते। अपने कोट के कॉलर में लगे फूल को निकालकर उसकी जगह उसके उठाए फूल को टांक लेते थे।

आज की संक्षिप्त भेंट ने रजनी के सपनों के महल को एक झटके में तोड़कर धरती पर गिरा दिया था, इसलिए वह किस आशा में अब और अधिक खिड़की के समीप बैठती? कुंवर साहब एक खानदानी युवक हैं। उनकी रगों में जागीरदारों का रक्त है। वह एक तुच्छ लड़की होकर उनसे क्यों इतनी बड़ी-बड़ी आशाएं कर बैठी? दीवानगी में क्यों अपनी वास्तविकता भुला बैठी? रजनी के मन में टीस उठने लगी। दिल तड़पकर रो लेना चाहता था। होंठों पर एक सिसकी चली आई। औखें भी भर आई तो उसने खिड़की पर से उठ जाना चाहा, ताकि चारपाई पर लेटकर चुपचाप औसू बहा ले, परन्तु तभी उसे कोठी के पिछले भाग में दूसरी मंजिल पर बारजे के समीप वाले कमरे के प्रकाश में एक छाया दिखाई पड़ गई। रजनी का दिल धड़क उठा। वह उठते-उठते रह गई। कोठी की छाया खिड़की पर आई। खिड़की के ऊपर शेड था। साथ ही कमरा छाया के पीछे प्रकाशमान था, इसलिए छाया के मुखड़े पर अधंकार था। छाया को रजनी तब भी पहचान गई। छाया कुछेक क्षण उसी, प्रकार खड़ी रही-खामोश-मानो रजनी को खिड़की की ओट से देख रही हो। रजनी के दिल की धड़कन तेज हो गई। अच्छा हुआ जो वह खिड़की के अंदर अंधकार में बैठी थी। रजनी ने अपना दम साध लिया। ऐसा न हो कि हवा के झोंके उसके सांसों की आहट चंद्रभाल के कानों तक पहुंचा दें।

सहसा चन्द्रभाल ने अपनी पॉकेट से एक सिगरेट निकाली। लाइटर द्वारा सिगरेट जलाई तो लाइटर के प्रकाश में उसका मुखड़ा क्षण भर के लिए पहचानने योग्य चमक उठा। उसने लाइटर बुझाते हुए गहरा कश लिया तो सिगरेट जुगनू, के समान चमक उठी। रजनी को ऐसा लगा, मानो चंद्रभाल ने अंधकार में न देख सकने के कारण उसे अपनी उपस्थिति का संकेत दिया था। शायद उसे विश्वास था कि रजनी इतनी रात बीतने पर भी उसकी प्रतीक्षा कर रही है। रजनी का दिल चंद्रभाल की ओर आकृष्ट हो उठा। कुंवर साहब! भला वह कैसे भूल सकते हैं! उसी के लिए तो वह इस समय खिड़की पर खड़े हैं। उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपने संतोष के लिए रजनी ने ऐसा सोचा तो मन के अंदर एक बार फिर आशा के बुझते दीये जल उठने को हो आए। चंद्रभाल ने एक कश लिया। फिर सिगरेट खिड़की से बाहर फेंक दी। वह पलटा और कमरे के अंदर रजनी की दृष्टि से ओझल हो गया। रजनी दिल के अन्दर आशा-निराशा की धड़कन लिए उसी प्रकार चुपचाप बैठी रही।

अचानक रजनी कोठी के पिछले भाग में वही छाया देखकर चौंक गई। उसके क्वार्टर की ओर बढ़ रही थी-तेज पगों के थ चांदनी तथा वृक्षों की छाया से आख-मिचौनी खेलती डुई। रजनी के दिल की धड़कन अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई। उसे पूरा विश्वास हो गया कि कुंवर साहब उसी से मिलने आ रहे हैं। वह उसी के लिए बेचैन हैं। वह अपने-आपको नहीं रोक सकी तुरन्त क्वार्टर से बाहर निकली और फिर चंद्रमाल की ओर दौड़ पड़ी, इस प्रकार मानो जाते ही उसकी बांहों में समा जाएगी। उसे देखते ही चंद्रभाल के पगों में भी तेजी आ गई, इसी प्रकार, मानो ,वह स्वयं भी रजनी को अपनी बांहों में तुरंत समा लेना चाहता हो। वह रजनी को पहचान चुका था। दोनों एक-दूसरे की बांहों में समा जाना (चाहते थे। चार वर्ष की जुदाई की तड़प मानो वे क्षण भर में ही समाप्त कर लेना चाहते थे। उन्हें अब संसार की किसी भी बात की चिन्ता नहीं थी। परन्तु रजनी चंद्रभाल के समीप पहुंचकर अचानक ही रुक गई। चंद्रभाल उसे अपनी बांहों में लेते-लेते रह गया। रजनी के सामने पहुंचकर कर भी रुक गया था। रजनी चंद्रभाल पर अपने दिल की तडप प्रकट कर चुकी थी, इसलिए लजा गई। चंद्रभाल से दृष्टि नहीं मिला सकी तो उसने अपना मुखड़ा नीचे झुका लिया। उसकी गहरी-गहरी सांसों के साथ उसकी छाती का उतार-चढ़ाव बढ़ गया था। चांदनी का सहारा लेकर चंद्रभाल ने रजनी को देखा-ऊपर से नीचे तक --बहुत प्यार भरी दृष्टि से। चांदनी में रजनी का शरीर संगमरमर की मूर्ति के समान उसके सामने खड़ा था। चंद्रभाल मुस्करा दिया। फिर उसने पूरे अधिकार से रजनी की ठोड़ी के नीचे अपने हाथ की दो उंगलियां रखीं। रजनी के शरीर में बिजली दौड़ गई। वह कांप गई। चंद्रभाल ने उसी प्रकार उसका झुका मुखड़ा ऊपर उठाया। रजनी ने चद्रभाल की आखों में झांकने का प्रयत्न करना चाहा, परन्तु साहस नहीं कर सकी तो उसने अपनी पलकें बंद कर ली। उसके नथुने सांसों के उतार-चढ़ाव पर फूल रहे थे। चंद्रभाल रजनी को देखता ही रह गया। फिर उसने कहा, मुझे नहीं देखोगी?' चंद्रभाल का स्वर प्यार की मिठास में डूबा हुआ था।

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रजनी की पलकें फड़फड़ाई। फिर उसने अपनी पलकें खोल दीं। उसकी आखों में चांदनी दूर-दूर तक बिछ गई।

'बहुत सुन्दर हो गई हो?' चंद्रमाल ने एक ठंडी सांस भरी। रजनी की ठोड़ी के नीचे वह उसी प्रकार उंगलियां रखे रहा।

रजनी ने मन में कहा आप भी बहुत सुन्दर हो गए हैं।, होंठों से वह कुछ भी नहीं कह सकी।

'मुझे याद करती थी?' चंद्रभाल ने उसकी ठोड़ी पर से हाथ हटाया।

रजनी ने भी पूछना चाहा, आप भी मुझे याद करते थे?' परन्तु जुबान से वह कुछ भी नहीं कह सकी। होंठ केवल कांपकर ही रह गए, वरन् होंठों पर एक बहुत ही हल्की-सी मुस्कान खली आई-शर्मीली-सी तो उसने अपना सिर नीचे झुका लिया। दृष्टि भी झुका ली।

'नृत्य के समय तो तुम्हें देखकर मैं चौंक ही गया था।' चंद्रभाल ने कहा।
 
रजनी को आखों में उस सुन्दरी की तस्वीर चली आई, जिसे उसने चंद्रभाल के साथ देखा था। मन हुआ कि पूछे, वह लड़की कौन थी? क्या संबंध है उस लड़की का उसके साथ? परन्तु वह साहस नहीं कर सकी। उसके लिए क्या यह कम था कि चद्रभाल उससे इतनी रात गए मिलने चला आया था, उसके प्रति दिल में तड़प बसाए? चंद्रभाल को उससे प्यार नहीं होता तो वह यहां आता ही क्यों?'

'आओ!' चंद्रभाल ने रजनी का हाथ पकड़ा। रजनी के शरीर का रोम-रोम खड़ा हो गया। चंद्रभाल ने कहा,'चलो उधर बैठें।' चंद्रभाल ने लॉन के घने अंधकार में रखी बैंच की ओर इशारा किया, जो उसके बचपन की एक महत्वपूर्ण यादगार थी।

रजनी चंद्रभाल के साथ बैच की ओर बढ़ गई...चुपचाप सिर झुकाए। इस प्रकार, मानो अपने कुंवर साहब की आज्ञा का पालन कर रही थी।

चंद्रभाल ने रजनी को अपने बिल्कुल समीप बिठाया। उससे बहुत सारी बातें कीं, मानो चार वर्ष की जुदाई की बातें आज ही पूरी कर लेनी थी। उसने उसे लंदन के विषय में बताया। रजनी बहुत दिलचस्पी के साथ उसकी बातें सुनती रही...मुस्कराती रही और कभी-कभी चंद्रमाल के पूछने पर'जी' कहकर अपनी पक्षी जैसी आवाज से वातावरण में रस घोलती रही। चंद्रमाल ने जब उसे लंदन के उन नाइट क्लबों, के विषय में बताया, जहां अर्द्धनग्न नृत्य होता था तो रजनी उससे दृष्टि मिलाने के बाद लजा गई। रजनी की लाज भरी अदा के सामने लंदन की रंगीन शामें फीकी पड़ गइ। चंद्रभाल ने उसे बहुत सारी बातें बताई, परन्तु वह बात नहीं बताई, जिसकी रजनी को प्रतीक्षा थी। चंद्रभाल पर रजनी का विश्वास लौट आया था, फिर भी वह एक नारी थी। वह उस सुन्दरी के विषय में सब कुछ जान लेना चाहती थी, जिसके साथ नृत्य करते हुए चंद्रभाल बहुत प्रसन्न दिखाई पड़ रहा था। चंद्रभाल की बांहों में वह सुन्दरी भी तो बहुत प्रसन्न थी।

मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसे उसके मन तथा मस्तिष्क सहित अपने अधीन कर लेना चाहता है। प्यार करने का एक ढंग यह भी है। परन्तु रजनी कुछ पूछने का साहस सीधे ढंग से नहीं बटोर सकी। वह आरंभ से ही चंद्रभाल के बड़प्पन के आगे स्वयं को हीन समझती आई थी, इसलिए इस समय भी उसके अंदर हीन भावना समाई रही। उसने उस सुन्दरी तथा चंद्रभाल के संबंध के विषय में जान लेने के लिए उस सफेद फूल को देखा, जो अंधकार में चंद्रभाल के कोट के कॉलर पर एक सितारे के समान टिमटिमा रहा था। चंद्रभाल इस समय भी अपनी पार्टी के ही वस्त्र पहने हुए था। रजनी की दृष्टि में इस समय अनेक प्रश्न थे।

रजनी ने फूल पर से दृष्टि काफी समय तक नहीं हटाई तो चंद्रभाल बातें करते-करते मानी अचानक ही चौंक गया। उसने रजनी की दृष्टि का मतलब समझने का प्रयत्न किया।

पूछा फूल सुन्दर है ना?' उसने अपने कोट के कॉलर की ओर संकेत किया।

रजनी सोच में पड़ गई। कुंवर साहब उसका मजाक तो नहीं उड़ा रहे हैं? आखिर यह फूल तो इन्हें उसी सुन्दरी ने दिया होगा जो नृत्य में इनके साथ थी? उसने अपना मुखड़ा नीचे झुका लिया।

__ 'मेरे वापस लौटने पर जब तू मुझे यहां नहीं मिली तो अपने बचपन की यादों को ताजा रखने के लिए मैंने स्वयं ही लॉन का सबसे सुन्दर फूल तोड़कर अपने कोट में लगाना आरंभ कर दिया।' चंद्रभाल ने फिर कहा, यह फूल भी मैंने बड़ी कठिनाई से ढूंढकर प्राप्त किया है।'

'जी!' मानो रजनी पूछते-पूछते रह गई। आश्चर्य से उसके होंठ खुले के खुले रह गए।

'हां-आ।' चंद्रभाल ने कहा,'तु क्या सोच रही थी,

अंशु ने फूल दिया है?' उसने मानो उसके दिल की पूछी।

अंशु?' रजनी ने पूछा।

'अरे वही, जो मेरे साथ नृत्य कर रही थी।' चंद्रभान ने लापरवाही से - कहा,'दरअसल मैं स्वयं सोचता रहा था कि तेरा लाया फूल मैंने तुझे क्यों वापस कर दिया। परन्तु क्या करूं, उस समय स्थिति ही ऐसी थी कि मुझे कुछ ध्यान नहीं रहा।' चंद्रभाल ने मानो अपनी सफाई दी।

रजनी के होंठों पर एक मुस्कान खेल गई। चंद्रभाल पर उसका विश्वास दृढ़ हो गया। उसे संसार की मानो सारी प्रसन्नताएं प्राप्त हो गई।

उस रात चंद्रभाल रजनी से एक क्षण भी दूर नहीं होना चाहता था। वह रजनी को मानो सदा के लिए अपनी सांसों में बसा लेना चाहता था। परन्तु तभी कोठी के चौकीदार ने सामने के लीन में एक जोरदार खंकार लगा दी। चंद्रभाल चौंक गया, चौकीदार इस ओर कभी भी आ सकता था। उसने कहा, आओ चलो, तुम्हें छोड़ दूं। बहुत रात बीत चुकी है।'

रजनी चंद्रमाल के साथ उठ खड़ी हुई।

"कल से हम दिन में नहीं मिलेंगे, केवल रात में मिलेंगे और वह भी यहां-नहीं, वहां-अपने कमरे में।' चंद्रभाल ने अपने कमरे की ओर इशारा किया। बात उसने जारी रखी। बोला, लॉन में मिलना उचित नहीं होगा। मैं नहीं चाहता कि कोई ऐसी बात उत्पन्न हो, जिससे तेरी बदनामी हो या तू मुझसे दूर कर दी जाए।'
 
रजनी ने एक क्षण सोचा-वह स्वयं भी तो अपने प्यार की बदनामी का कारण नहीं बनना चाहती। वह जवान हो चुकी है। अब उसे किसी ने कुंवर साहब के साथ एकांत में बातें करते देख लिया तो क्या सोचेगा? यदि कुंवर साहब के पिताजी को पता चल गया तो वह उसे कोठी की चहारदीवारी में फटकने भी नहीं देंगे। शायद उसके बाबा को भी नौकरी से निकाल बाहर करें। कहेंगे कि जिस वंश के टुकड़ों पर पली, उसी वंश के दीपक पर प्यार के डोरे डाल बैठी! रजनी प्यार में दीवानी थी। अपना भविष्य अपने प्यार के हवाले तथा चंद्रभाल पर निछावर कर चुकी थी। उपने चंद्रभाल की आइए पर सिर झुका दिया।

चंद्रभाल ने एक क्षण चौकीदार की आहट ली। फिर बोला'आओ चलो।'

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रजनी चंद्रभाल के साथ चल दी। दोनों एक साथ एक-दूसरे के बिल्कुल समीप चलकर अंधकार की सोमा से बाहर निकले तो चांदनी ने उनका स्वागत किया। सितारे उनके मिलन पर मुस्करा रहे थे। दोनों क्वार्टर के द्वार तक आए। रुक गए। खड़े होकर एक-दूसरे को देखा। शायद चंद्रभाल रजनी से कुछ कहना चाहता था। शायद कुछ कहना शेष रह गया था। रजनी को मानो किसी बात की प्रतीक्षा थी। शायद उसका मिलन अधूरा था। तड़प में अभी कमी रह गई थी। उसने चंद्रभाल को देखा। फिर चंद्रभाल पर दृष्टि बिछा दी।

'रजनी।' सहसा चंद्रभाल ने कहा, बहुत मद्धिम स्वर में गहरी सासों के साथ। रजनी ने उसे देखा। दिल की धड़कन तेज हो गई। वह वह' चंद्रभाल ने कहना चाहा, परन्तु मन की बात होंठों से नहीं निकल रही थी। उसने बात बदल दी। बोला' अच्छा, सुबह मिलेंगे।' चंद्रमाल ने बात समाप्त कर दी।

रजनी के दिल की धड़कन मद्धिम पड़ गई। कुंवर साहब, उससे कुछ कहना चाहते थे। क्यों नहीं मन की बात कह देते?

चंदभाल ने चलने से पहले रजनी की आखों में झांका-बहुत प्यार से, मानो दृष्टि द्वारा उसे प्यार कर रहा हो। फिर वह चलने को पलटा परन्तु मानो दिल यहां से जाने को तैयार नहीं था। दृष्टि की बुझी प्यास काफी नहीं थी। वह रजनी की ओर पलटा और फिर अचानक ही एक झटके में उसने रजनी को अपनी बांहों में समेट लिरग। समेटकर उसने तुरंत रजनी के गुलाब जैसे होंठों पर अपने होंठ रख दिए-ठंडे-ठंडे होंठ-कुंवारे। रजनी चौंक गई। कुछ समझ में नहीं आया कि क्षण भर में क्या हो गया है, परन्तु फिर उसने आत्मसमर्पण कर दिया। लाज के मारे उसने आखें बंद कर लीं। इस लाज में ऐसी प्रसन्नता थी कि उसके कपोल गुलाबी हो गए। शरीर का रोआरोआ कांपकर खड़ा हो गया था।

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जीवन में पहली बार उसने अपने होंठों पर किसी के होंठों की तपिश महसूस की थी, इसलिए शरीर में आग लग गई। चंद्रमाल के गरम-गरम होंठ भी मानो एक युग से प्यार में तप रहे थे। अपने होंठों की आग बुझाने के लिए वह रजनी के होंठों पर अपने होंठ उसी प्रकार रखे रहा। रजनी को वह अपनी बांहों में बहुत सख्ती के साथ समेटे रहा। रजनी का भी मन कर रहा था कि कुंवर साहब उसे कभी नहीं छोड़े जीवन भर उसे इसी प्रकार अपनी बांहों में समाए रहें। उसे इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहिए था, उसने दिल की गहराई से इच्छा की-काश, यह धरती अपनी धुरी पर घूमने के बजाए इसी क्षण रुक जाए, यह समय कभी न ढलेके, कभी नहीं। रजनी चंद्रभाल की आखों में सिमटती ही गई, सिमटती ही गई।
 
कुछ क्षण बाद चंद्रभाल ने रजनी को अपने से अलग किया तो रजनी की सांस फूल रही थी। आखों में गुलाबी डोरे छलक आए थे। चंद्रभाल से दृष्टि मिलाने के बजाए उसने अपनी पलकें झुका लीं।

चंद्रभाल ने रजनी का मुखड़ा अपनी दोनों हथेलियों के मध्य लिया। रजनी ने तब भी दृष्टि नहीं उठाई। चंद्रभाल ने रजनी को प्यार किया, इस बार बहुत हल्के से। उसने रजनी की कनपटी चूमी। उसके दोनों गालों को चूमा। ठोढ़ी तथा गर्दन के गढ़े में प्यार किया। फिर होंठों को हल्के से प्यार करके बोला,सुबह मिलूंगा। हूं?' चंद्रभाल ने रजनी का गाल अपनी उंगलियों से थपथपाया, बहुत हल्के से और फिर पलटकर वह कोठी की ओर लपक गया।

रजनी ने दृष्टि उठाई। चंद्रमाल जा रहा था। वह कोठी की आड़ में लुप्त हो गया तो रजनी ने चंद्रभाल की ओर देखा। वह मुस्करा रहा था, इस प्रकार, मानो उसने उसकी चोरी पकड़ ली। रजनी भी मुस्करा दी। उसने अपने होंठों पर उंगलियां फेरीं। कनपटी तथा कपोलों पर भी उंगलियां फेरीं। अपनी प्रसन्नता पर वह काबू नहीं कर सकी तो पलटकर अपने कमरे में प्रविष्ट हो गई।

उस रात रजनी अपनी चारपाई पर लेटी तो प्रसन्नता के कारण नींद आखों से कोसों दूर थी। किसी करवट भी चैन नहीं पड़ रहा था। दिल अब भी चंद्रभाल की बांहों में जाने को मचल रहा था। होंठों पर चंद्रमाल के होंठों का स्पर्श ताजा था, फिर भी होंठ मानो उसके प्यार को तरस रहे थे। कैसी अनोखी तड़प थी यह-कितनी मीठी! इस तड़प का एहसास रजनी आज पहली बार कर रही थी। अपने कमरे में पलंग पर लेटने के बाद चंद्रभाल को भी नींद नहीं आ रही थी। उसकी बाहें रजनी के शरीर का स्पर्श प्राप्त करने के बाद अब सदा के लिए उसे अपने में समा लेना चाहती थीं। दिल अब तुरंत ही रजनी को सदा के लिए अपना बनाने को तड़प रहा था। रजनी के होंठों द्वारा उसके होंठों की प्यास बुझने के बजाय और बढ़ गई थी। कितने मीठे अधर थे रजनी के-शहद से भी अधिक मीठे! प्यास बुझती भी कैसे?

शाहदरा में अपनी कोठी के अंदर पलंग पर अंशु अब तक करवटें बदल रही थी। इतनी रात बीत गई थी, परन्तु नींद आखों से कोसों दूर थी। बार-बार उसकी आखों के सामने -रजनी का मुखड़ा घूम जाता था। कितनी आशा भरी दृष्टि से उसने चंद्रभाल को देखा था। चंद्रभाल के सामने उसका लाजवंती बनना कितना भेद भरा था। रजनी के शब्द उसके कानों में गूंजते तो वह तिलमिला उठती। बह मन-ही-मन क्रोध में रजनी पर दांत पीसती हुई बड़बड़ा उठती थी-कम्बख्त की यह मजाल कि एक नौकरानी होकर उसे फूल और कांटे का अंतर बताए! उस समय पता होता कि वह एक नौकरानी है तो उससे बात करना तो दूर, वह उसे सीधी आखों से देखती भी नहीं।

नृत्य के बीच उसकी जिज्ञासा बड़ी थी कि वह चंद्रभाल से पूछे, इस रजनी नाम की नौकरानी को वह कब से जानता है? क्यों उसने उस नौकरानी को इतना सिर पर चढ़ा रखा है? परन्तु फिर वह सब करके चुप रह गई थी। रजनी के विषय में कोई पूछताछ करना चंद्रभाल पर संदेह करना होता। चंद्रमाल के साथ उसने लंदन का जीवन व्यतीत किया था, फिर भी चंद्रमाल उसे संकीर्ण समझता। फिर जो बात नहीं होती, वह भी उत्पन्न हो जाती और उसके प्यार की तीन वर्षीय तपस्या निरर्थक चली जाती। अंशु ने रजनी के विषय में जितना सोचा, उतना ही उसके मन में रजनी की ओर से भय उत्पन्न होता चला गया। रजनी सुन्दर थी, अत्यंत सुन्दर थी, इसलिए उसके मन के अंदर भय का बढ़ना स्वाभाविक ही था। उसने तय कर लिया, वह रजनी तथा चंद्रभाल के संबंध की जड़ें ढूंढ निकालेगी। यदि उनके मध्य कोई ऐसी बात हुई तो वह चंद्रभाल से विवाह करने में अब देर नहीं करेगी। लंदन से आए उसे अधिक दिन नहीं हुए थे, फिर भी चन्द्रभाल के माता-पिता उसे अपने बेटे के लिए पसंद कर चुके हैं। आखिर मार्तण्ड सिंह तथा उनकी पत्नी ने उन तस्वीरों को तो देर्खा ही होगा जो उसने लंदन में चंद्रभाल के साथ बहुत प्यार भरे अंदाज में खिंचवाई थीं, हाथों में हाथ डालकर! अंशु के पिता निर्भय सिंह भारत की स्वतंत्रता से पहले राजस्थान के एक बड़े जागीरदार थे। जागीरंदारी खानदान से चली आ रही थी,

इसलिए राजसी ठाठ रक्त में था। एथ्याशी करना मानो उनका खानदानी अधिकार था, इसलिए अपनी तानाशाही का सहारा लेकर गांव की बहू-बेटियों की इज्जत लूटना उनके लिए एक साधारण-सी बात थी। क्या मजाल जो गांव की कोई सुन्दरी उनकी दृष्टि में आकर उनकी पहुंच से बाहर निकल जाए! जिस निवासी ने उनके अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई, उसे निर्भय सिंह अपनी हवेली के सामने वृक्ष के तने से बंधवाकर उस पर अपने हाथों से कोड़े बरसाते थे। जाने कितने निवासियों ने कोड़े खाते-खाते ही जान दे दी थी। जाने कितनी गरीब अबलाओं की मांग का सिन्दूर मिटाने का पाप केवल निर्भय सिंह के ही जिम्मे था। जाने कितनी निर्दोष अबलाएं मण्डप में सुहागिन बनने से पहले ही उठाकर निर्भय सिंह की वासना की भेंट चढ़ा दी गई थी। जाने कितनी मासूम लड़कियों ने निर्भय सिह के बिस्तर की शोभा बनने से पहले ही हवेली पर से छलांग लगाकर जान दे दी थी।
 
जो निर्भय सिंह की वासना का शिकार बनने से नहीं बच सकी थीं, उन्होंने निर्भय सिंह की दरिन्दगी का शिकार होने के बाद अपनी जान दे दी थी। लाश को ठिकाने लगाने के लिए निर्भय सिंह के आदमी हवेली के चारों ओर पहले ही उपस्थिति रहते थे।

निर्भय सिंह के पिता की मृत्यु निर्भय सिंह की भरी जवानी में ही हुई थी, इसलिए उन्होंने अपने शासन का भरपूर लाभ उठाया। गांव के गुंडे उन्होंने पाल रखे थे। निर्भय सिंह के एक इशारे पर वे किसी भी लड़की को रातों-रात उठा लाते थे, डाकुओं के भेष में, या कोई और रूप धारण करके, ताकि लुटने वालों को अपने जागीरदार के विरुद्ध कोई सबूत न मिल सके। अपनी गरीबी के कारण जागीर के निवासी, निर्भय सिंह की वास्तविकता जानने के बावजूद अनजान बनने पर विवश थे। सारी जागीर पर निर्भय सिंह का आतंक छाया हुआ था। जागीर की कुमारियां जवान होने से डरती थीं। कुमारियों को जवान होने से पहले ही उनके माता-पिता उनके हाथ पीले करके उनको विदा कर देना अपना सौभाग्य समझते थे। इसके बावजूद यदि किसी कमसिन लड़की पर निर्भय सिंह का दिल आ जाता तो वह उसे मंडप से भी उठवा लाते थे।

ऐसे ही एक लड़की थी बेला। कली से फूल नहीं बन पाई थी कि निर्भय सिंह का उस पर दिल आ गया। हां, क्या नाम था उसके प्रेमी का? पन्नालाल! -बेला की आयु तेरह-चौदह वर्ष की ही होगी कि उसके घर वालों ने निर्भय सिंह के भय के कारण पन्नालाल से उसका विवाह कर देना चाहा था, परन्तु निर्भय सिंह ने अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए उसे मण्डप से उठवा लिया था। रात-भर वह नन्ही-मुन्नी बच्ची निर्भय सिंह की बांहों में, रही थी, चीखी थी। चिल्लाई थी, परन्तु निर्भय सिंह पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। लेकिन वह लड़की निर्भय सिंह की वासना का भार नहीं सहन कर सकी थी। तड़प-तड़पकर उसने निर्भय सिंह की बांहों में ही अपनी जान दे दी थी। दम तोड़ते समय उस बच्ची ने दृष्टि द्वारा जीवित जला देने वाली जिस घृणा से निर्भय सिंह को देखा था, उसे आज भी निर्भय सिंह याद करके कांप जाते हैं।

बेला की लाश निर्भय सिंह ने रातों-रात ठिकाने लगा दी थी। फिर सुबह जब पन्नालाल ने कुछ व्यक्तियों को लेकर उनसे न्याय की मांग की थी तो निक्य सिंह ने उस पर दोष लगाकर उसे पेड़ से बंधवाने के बाद अपने हाथों से इतने कोड़े मारे थे कि वह बेहोश हो गया था। उसे अपनी जागीर की सीमा के बाहर फिंकवाने के बाद ही निर्भय सिंह ने दम लिया था।

अचानक भारत स्वतंत्र हो गया। 14 अगस्त,1947। स्वतंत्रता प्राप्त होते ही सरकार ने राजाओं, महाराजाओं तथा जागीरदारों की भूमि छीनकर किसानों को दे दी, जो पुश्तों से उस भूमि में बैल के समान हल चलाते आए थे। शासकों की अनावश्यक सुविधाएं छीन ली गई तो उनकी कमर ही टूट गई। इस लपेट में निर्भय सिंह भी आ गए तो लेने के देने पड़ गए। जनता जागरूक होने लगी तो अपने अधिकार की मांग करने लगी। निर्भय सिंह की जनता अपने जागीरदार से पहले ही खार खाए बैठी थी। वह बदला लेने का अवसर तलाश करने लगी। निर्भय सिंह को जब जनता के इरादों का पता चला तो उनकी नींद हराम हो गई।

एक रात निर्भय सिंह को पता चला कि सुबह होने से पहले गांव वाले उनकी हवेली सहित आग लगा देने का इरादा कर चुके हैं। उनके होश जाते रहे। निर्भय सिंह ने रातों रात अपना धन एकत्र किया और फिर सदा के लिए वह गांव छोड़ दिया। वह कलकत्ता जा बसे। वहीं व्यापार किया और विवाह भी कर लिया। अंशु वहीं उत्पन्न हुई थी परन्तु। पत्नी होते हुए निर्भय का स्वभाव नहीं बदला था। अपने धन का लाभ उठाकर वह अपनी प्यास बुझाते ज्यादतियां करने लगे तो वहां भी उनकी जान के लाले पड़ गए। विवश होकर वह सपरिवार दिल्ली चले आए और शाहदरा में नया जीवन आरंभ कर दिया। परन्तु शराब उसी तरह उनके शरीर में दौड़ रही थी, स्वभाव नहीं बदला था। अपनी शान बनाए रखने के लिए आए दिन बड़ी-बड़ी पार्टियां देना वे नहीं भूलते थे।
 
अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए उन्होंने अपनी कोठी में एक तहखाना बनवा रखा था, कुछ ऐसा कि यदि उनकी जबरदस्ती पर कोई चीखे या शोर मचाए तो आवाज बाहर न निकल सके। उनकी इस गंदी आदत को देखते हुए उनकी पत्नी कुढ़-कुढ़कर मर गई तो उनके लिए जीवन में केवल अंशु ही रह गई। अंशु का स्वभाव भी खानदानी है। अपनी । सखियों को आए दिन पार्टी देना वह भी अपनी शान समझने लगी। निर्भय सिंह उसकी हर इच्छा पूरी करते, परन्तु अन्दर ही अन्दर वह खोखले भी होते जा रहे थे। पत्नी की मृत्यु के बाद व्यापार में घाटा होना आरंभ हो गया था। बेटी की इच्छा पर उसे जैसे ही लंदन भेजा, व्यापार की स्थिति और बिगड़ गई। परन्तु व्यापार जारी रखते हुए अपनी शान बनाए रखना अत्यंत आवश्यक था,

क्योंकि अंशु जवान हो चुकी थी। उसका विवाह किसी उच्च कुल में करके वह अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहते थे। ऊंची शान होगी तो कुल भी ऊंचा मिलेगा। यही कारण था कि अपनी शान बनाए रखने के लिए उन्होंने अंशु को शिक्षा के बीच लंदन से नहीं बुलाया कर्ज लेकर अपनी शान स्थिर रखी।

जब एक दिन उन्हें अंशु के पत्रों और तस्वीरों से ज्ञात हुआ कि मार्तण्ड सिंह के बेटे से अंशु का मेल-जोल है तो मार्तण्ड सिंह की माली स्थिति का पता लगाकर उन्होंने मार्तण्ड सिंह से घनिष्ठ संपर्क स्थापित करना आरंभ कर दिया, ताकि अंशु उस घर की बहू बन जाए और तब उनसे सहायता लेकर वह अपना कर्ज उतार दें। आज वह अंदर से कितने खोखले हैं, यह अंशु भी नहीं जानती। व्यापार कभी भी बंद हो सकता है। जो कोठी है, वह बंधक रखी है। कोठी का तहखाना गोदाम के समान गंदा पड़ा है। उनका वश चले तो आज भी उसे रंगमहल बनाकर वह रंगरलियां मनाना नहीं छोड़े। आज भी जवान लड़कियों को देखकर उनका दिल मचल उठता है। जुबान पर कुत्ते के समान लार चली आती है। परन्तु वह धन से विवश हैं। लड़की जवान है। कोई बात हो गईं तो बेटी का विवाह नहीं हो जाएंगे। बेटी की दृष्टि से स्वयं भी गिर जाएंगे। ले-देकर एक पुरानी कार है और गिने-चुने गहने, जिन्हें बेटी के विवाह के लिए उन्होंने सुरक्षित रखा हुआ है। बेटी तथा चंद्रभाल के मेलजोल से उन्हें काफी आशाएं बंधी हुई हैं।

सुबह हुई तो सूर्य की नई किरणें रजनी के लिए प्यार का नया संदेश लेकर आईं। कोठी के सारे ही फूल मुस्करा उठे। भंवरे गुनगुनाने लगे। तितलियों ने नई सुबह का प्रारंभ नृत्य के साथ किया। फिर शाम हुई तो वह अपने साथ दो प्रेमियों के मिलन की बेकरारी भी ले आई। फिर रात आई तो रजनी के जीवन में चांदनी बनकर छिटक गई। रात को चंद्रमा तथा चन्द्रमा को रात मिल जाए तो दोनों में ही निखार उत्पन्न हो जाता है। रजनी तथा चंद्रभाल अब रात में ही एक-दूसरे से मिलते। दिन के उजाले में दोनों एक-दूसरे को केवल दूर से ही देखकर सब कर लेते थे। कभी-कभी जब चंद्रभाल रजनी को एकांत में देखता तो अवसर पाकर टहलने के बहाने रजनी के पास क्षण दो क्षण के लिए चला आता। रजनी की आखों में प्यार से झांकता तो रजनी घबराई हिरनी के समान इधर-उधर देखने लगती।

चंद्रमाल एक-दो बातें करता, रात में मिलने का वायदा होने के पश्चात दोबारा वायदा लेता और फिर चला जाता।

__ दिन के समय चंद्रभाल अधिकतर अपने मित्रों में ही व्यस्त रहता था। अंशु भी चंद्रभाल के साथ चिपकी रहती। जिस दिन अंशु की भेंट रजनी से हुई थी, उसकी अगली सुबह ही अंशु चंद्रभाल की कोठी पर आ धमकी। कोठी के पिछले लीन में घूमने के बहाने उसने रजनी को भी उसके क्वार्टर में खुले द्वार द्वारा देखा था। तब रजनी नीचे पीछे पर बैठी सब्जी काट रही थी। रजनी ने भी उसे देखा था, परन्तु फिर । अनजान बन गई थी। वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहती थी, जिससे उसके प्यार पर औच आए। उसे अपने कुंवर साहब पर पूरा विश्वास था। यदि यह लड़की कुंवर साहब के पीछे पड़ी हुई है तो कुंवर साहब को इससे पीछा छुड़ाने में समय लगेगा। अंशु चली गई थी। उसके बाद भी जब वह कोठी आती तो चंद्रभाल के कमरे की खिड़की पर कुर्सी खींचकर बैठ जाती और चंद्रभाल से बर्ति करने के बहाने संदेह भरी दृष्टि से रजनी के द्वार की ओर देखती रहती थी। इस बात से वह बिल्कुल अनभिज्ञ थी कि रजनी उसे खिडकी की दरार से पहले ही देख चुकी है।

रजनी अंशु की ओर से इतना अधिक सावधान थी कि जब भी कोठी में किसी कार के आने का स्वर सुनती तो खिड़की बंद करके दरार से कुछ देर तक झांकते हुए इस बात की पुष्टि कर लेती कि कौन आया है। वह जानती थी कि अंशु को उस पर संदेह है, इसलिए वह चंद्रभाल के कमरे में आकर खिड़की द्वारा उस पर निगाह रखना आवश्यक समझेगी। यदि अंशु खिड़की पर खड़ी या बैठी होती और तब यदि रजनी को अपने क्वार्टर से बाहर निकलना आवश्यक होता तो वह बाहर निकलकर एक बार भी कोठी पर दृष्टि नहीं उठाती। वह लापरवाही से अपना काम करती और दोबारा अपने क्वार्टर में प्रविष्ट हो जाती। रजनी की इस हरकत से भी अंशु का संदेह दूर नहीं हुआ था। इसका विशेष, कारण था। वह जब भी चंद्रभाल के कमरे में आती थी, उसे एक सुन्दर-सा गुलाब कमरे के गुलदान ,में लगा अवश्य मिलता था। लंदन से वापस आने के बाद चंद्रमाल की फूलों की प्रति यह रुचि अंशु की समझ के बाहर थी। इसके अतिरिक्त नृत्य वाली रात के बाद चंद्रमाल ने उसमें पहले जैसी रुचि लेना भी छोड़ दिया था। यही कारण था कि अंशु अब अधिक-से-अधिक समय तक चंद्रभाल के साथ चिपकी रहती थी। अपनी हर शाम वह चंद्रभाल' के साथ किसी-न-किसी बहाने देर तक बिताती थी-कभी किसी होटल में तो कभी किसी क्लब में। यही कारण था कि चंद्रभाल देर से कोठी लौटता तथा देर से अपने कमरे में प्रविष्ट होता था।
 
चंद्रभाल एक संकोची नवयुवक था। वह एकदम से अंशु पर अपने दिल की बात प्रकट करके उसक दिल तोड़ना नहीं चाहता था।

इसके अतिरिक्त वह जानता था कि अंशु को उसके माता-पिता पसंद कर चुके हैं। उसे इस कुल की लक्ष्मी बनाने का स्वप्न देख रहे हैं। अंशु के साथ उसने जो तस्वीरें लंदन में खिंचवाई थीं, उन्हें देखकर उसखे माता-पिता अनुमान भी क्या लगाते? अंशु का उसकी कोठी में आना-जाना इस प्रकार था, मानो वह अभी से ही इस कुल की लक्ष्मी बन चुकी है।

चंद्रभाल को समय की प्रतीक्षा थी। वह धीमे-धीमे प्रकट करना चाहता था कि उसे अंशु से प्यार नहीं है, वह अंशु का केवल मित्र है। अंशु को उसने कभी प्यार नहीं किया था, उसके लिए उसकी रातों की नींद हराम नहीं हुई थी, परन्तु रजनी को तो देरग्ते, ही उसका दिल मचल उठता था। उसे बांहों में समाकर प्यार कर लेने को दिल तड़प उठता था। रजनी के बिना उसे चैन नहीं मिलता था।

चंद्रभाल अपने कमरे में देर से पहुंचता। आते ही? वह बारजे की ओर जाता, फिर कुछ देर बाद अपने कैमरे की बत्ती बुझा देता। फिर जब रात गहरी हो जाती, रात की खामोशी में कोठी का वातावरण सूना हो जाता, जब मालिक तथा नौकर-चाकर सो जाते, जब चौकीदार कोठी के पिछले भाग का चक्कर लगाकर चला जाता और दोबारा उसके तुरंत लौटने की आशा नहीं रहती तो चंद्रभाल अपने कमरे की बत्ती दोबारा जलाकर बुझा देता। तब तक रजनी हाथ में फूल लिए अपनी खिड़की के समीप अंधकार में बैठी चंद्रभाल की प्रतीक्षा करती रहती। अपने प्यार की याद को सदा ताजा तथा सुगंधित रखने के लिए वह शाम को प्रतिदिन ही लीन का सबसे सुन्दर फूल तोड़कर रख लेती थी। बत्ती जलाने का संकेत चंद्रमाल ने रजनी को पहले ही दिन अपने कमरे में लाकर समझा दिया था।

प्यार करने वाले छिपकर मिलने का रास्ता निकाल ही लेते हैं। संकेत पाकर रजनी बाबा की आहट लेती। आसपास की टोह लेती और फिर अपने कमरे की बत्ती बुझाते हुए अपने क्वार्टर से निकलने का संकेत दे देती। उसके बाद वह दबे पगों कमरे से बाहर निकलती तो उधर से चंद्रभाल भी उसकी ओर बढ आता। चंद्रभाल रजनी के हाथ से फूल लेत।। उसकी सुगन्ध अपने नथुनों द्वारा दिल की गहराई में उतारता और फिर बहुत प्यार से रजनी का हाथ पकड़कर कोठी की ओर बढ़ जाता।

कोठी के दोनों ही ओर, अगल-बगल वाले बरामदे में भी ऊपर की मंजिल पर जाने के मार्ग थे। अपने कमरे में पहुंचते ही चंद्रभाल फूल को एक ओर पहले से रखे गुलदान में रख देता। उसके बाद तुरंत ही रजनी को अपनी बांहों में लपेट लेता। उसे अपने पलंग पर लाकर उसका अंग-अंग चूमता, कुछ इस दीवानगी के साथ कि रजनी बेहाल हो जाती। फिर भी रजनी को बहुत आ_नन्द आता।

चंद्रभाल की संगति में उसे कुछ भी होश नहीं रहता। वह यह भूल जाती कि उसे कुसुम्पटी भी जाना है, अपनी शिक्षा जारी रखनी कुसुम्पटी से आए उसे दस दिन हो चले थे, परन्तु अब वह मानो कभी भी अपने पिता के घर वापस नहीं जाना चाहती थी। उसे अब और शिक्षा प्राप्त करने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती थी। जिस काम के लिए उसने शिक्षा का बहाना लिया था, वह पूरा हो चुका था इसलिए अब उसे कुछ भी नहीं । चाहिए था। उसने अब यह बात सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझी थी कि उसके तथा चंद्रमाल के मध्य धरती तथा आकाश की दूरी है। प्यार करने वाले इन बातों की चिन्ता नहीं करते। उसे अपने प्यार पर विश्वास था। चंद्रभाल के प्यार पर गर्व था। वह जानती थी, समय आने पर चंद्रभाल उसको अपनाने के लिए सारे संसार को ठुकरा देगा। अपने प्यार को सार्थक बनाने के लिए वह किसी की भी चिन्ता नहीं करेगा। अभी तो उसे चंद्रमाल से इस प्रकार खुलकर मिले केवल दस ही दिन हुए थे। वह जानती थी, चंद्रमा से ही रजनी की चांदनी है। चंद्रमा बिना रजनी उदास है, अंधेरी है। परन्तु रजनी से ही चंद्रमा भी है।

रजनी को अपने जीवन की सबसे सुन्दर घड़ियों का आभास अब हो रहा था। दोनों एक-दूसरे की बांहों में बाहें डाले पलंग पर घंटों पड़े रहते। फिर भी दोनों का मन नहीं भरता। प्यार की मिठास ही ऐसी होती है और इस मिठास में हरसिंगार की सुगन्ध सम्मिलित होकर उन्हें प्यार में मदहोश किए रहती।

प्राय: कमरे के अंधकार में खिडकी के समीप खड़े होकर दोनों हरसिंगार को देखते रहते। उनके बचपन के प्यार की निशानी।' फूलों में रजनी की सांसों की सुगन्ध सम्मिलित थी। हवा का एक हल्का-सा झोंका आता तो फूल अपनी टहनी का दामन छोडकर मानो उनके कदमों तले बिछ जाना चाहते थे। खिड़की पर भी चंद्रभाल का एक हाथ रजनी के गले में या कमर पर अवश्य होता था। वह मानो हर क्षण रजनी को अपने से लगाए उसके शरीर का स्पर्श प्राप्त करते रहना चाहता था। रजनी यूं भी उसकी सांसों में बसी हुई थी। कैसा था यह प्यार, अनोखा दीवाना किसी और बात की मानो उन्हें चिन्ता ही नहीं थी।

शाम का समय था। चंद्रभाल अपने एक मित्र की मंगनी में जाने की तैयारी कर रहा था। मंगनी में उसके माता-पिता को भी जाना था। -मंगनी की पार्टी में उधर से अंशु भी- अपने पिता के साथ पहुंचने वाली थी। जब मंगनी का निमंत्रण कार्ड मार्तण्ड सिंह के यहां पहुंचा था तो उस समय चंद्रभाल अपने, माता-पितो के साथ बैठक में बैठा था। मंगनी के निमंत्रण पर मंगनी का विषय उठा तो मार्तण्ड सिंह ने अपनी धर्मपत्नी से कहा था कि अब वह भी चंद्रभाल की मंगनी कर देना चाहते हैं, अंशु के साथ। तब चंद्रभाल ने बात टाल दी थी। उसे लंदन से आए दिन ही कितने हुए थे जो इतनी जल्दी मंगनी करे?
 
मो ने समझाया था कि वह अभी उसकी मंगनी करना चाहते हैं, विवाह नहीं। चंद्रमाल तब भी इंकार कर गया था। उसने तय कर लिया था कि वह मंगनी तथा विवाह करेगा तो केवल रजनी के साथ और किसी के साथ हर्गिज नहीं। इस समय उसने उन पर अपने दिल की बात प्रकट करना उचित नहीं समझा था। यदि वह उन्हें रजनी के विषय में कुछ बताता तो उनका दिल टूट जाता। वह उसके लंदन से आने की खुशी मनाने की बजाए शोक मनाने लगतें। वह पहले अपने माता-पिता के दिल में रजनी का एक स्थान बना लेना चाहता था। यह एक अत्यंत कठिन बात थी, परन्तु, असंभव नहीं थी। उसने आशा के विपरीत आशा करते हुए सोचा, इस आधुनिक काल में छोटे-बड़े का अंतर कौन देखता ह, आखिर रजनी में क्या बुराई है? वह सुन्दर है, सुशील है, शिक्षा भी प्राप्त कर रही है। वह इस कोठी के स्तर से बने-संवरेगी तो रानी लगेगी। तब कौन कह सकेगा कि वह एक मालिन की नातिन है?

…………………………..

इतिहास साक्षी है कि बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं ने सुन्दरता के आगे घुटने टेककर अपनी कनीज या एक साधारण लड़की को अपने महल की रानी बना दिया। पैसे से ही प्यार नहीं तोला जाता। चंद्रभाल ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करना चाहता था, जिससे प्रभावित होकर रजनीं उसके माता-पिता के दिल में अधिक न सही, थोड़ी-सी ही जगह प्राप्त कर ले। इसके बाद उसे अपने प्यार के लिए माता-पिता का दिल जीतने में आसानी हो सकती थी।

चंद्रभाल ने अपने कपड़े बदले, जूते पहने। कबर्ड से टाई निकालकर गले में लपेटता हुआ अपनी ऊंचाई के बराबर दर्पण के सामने आया। टाई की गांठ बांधी। बाल संवारे। फिर गुलाबी कोट उठाकर पहनते हुए वह खिड़की पर आया। कोट के बटन लगाते हुए अचानक वह चौंक पड़ा। कोठी के पीछे, लीन में रजनी गुलाब की फुलवारियों के पास खड़ी एक सफेद फूल तोड़ रही थी। चंद्रभाल मुस्करा दिया। रजनी उसे रात में फूल भेंट करने के लिए ही तोड़ रही थी। चंद्रभाल ने एक क्षण सोचा। पलटकर उसने अंदर देखा...फूलदान में रखे गुलाब की ओर। लाल गुलाब उसके कॉलर की शोभा बनने की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने सोचा, गुलाबी कोट पर लाल गुलाब अधिक शोभा नहीं देगा। क्यों न वह सफेद गुलाब को टांके उसने पलटकर खिड़की से बाहर इधर-उधर देखा। आसपास कोई नहीं था। वह पलटा। फिर तुरंत ही कोठी से बाहर निकलकर पिछले लीन में चला आया। रजनी के पीछे जाकर खड़ा हो गया। रजनी उसकी आहट पाकर पलटी। तभी चौंक पड़ी। बोली आप?'

'हां!' चंद्रभाल ने मुस्कराकर कहा तुम्हें खिड़की से देखा तो चला आया।'

रजनी मुस्करा दी। अपने हाथ में लिए फूल पर उसने दृष्ठी बिछा दी। बिल्कुल सफेद फूल...उसी के समान सुन्दर।

'यह फूल मेरे लिए तोड़ा है ना?' चंद्रभाल ने पूछा।

रजनी के होठों पर एक मुस्कान कांपी। उसने कुछ कहने के बजाय'हां' में सिर हिला दिया।

चंद्रभाल ने फूल लेने के लिए अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया। रजनी ने फूल दे दिया। चंद्रभाल ने फूल लेकर सुधा। उसकी पंखुड़ियों को प्यार किया। रजनी को एयसा लगा, चंद्रभाल ने भरे समाज में उसके होंठों को चूम लिया है। कांपकर उसकी दृष्टि ऊपर उठ गई, चंद्रभाल के कमरे की ओर, परन्तु तभी वह बुरी तरह चौंक गई। कमरे की खिड़की में - अंशु खडी थी। रजनी को वह इस प्रकार घूर रही थी, मानो दृष्टि द्वारा जलाकर राख कर देना चाहती हो। रजनी का मुखड़ा सफेत पड़ गया। चंद्रभाल ने रजनी का उतरा मुखड़ा देखा तो चिंतित हो उठा। रजनी की दृष्टि का पीछा करते हुए उसने गर्दन घुमाई। खिड़की पर अंशु को देखा तो वह भी चौंक गया। अंशु घृणा से एक झटके के साथ अंदर पलटी और फिर आगे बद गई। आज उसने चंद्रभाल तथा रजनी को रंगे हाथों पकड़ लिया था।

चंद्रभाल- ने एक क्षण सोचा, अंशु कोठी कैसे चली आई? उसने रजनी से कहा, मैं रात में मिलूंगा।' और वह कोठी की ओर बढ़ गया।

.

रजनी ने चंद्रभाल को जाते हुए देखा। सोचा...क्या होगा अब उसके प्यार का अंजाम? उसका दिल एक अज्ञात भय के कारण धड़कने लगा। वह सिर झुकाए अपने क्वार्टर की ओर बढ़ गई। चंद्रभाल ने बरामदे में पहुंचकर रजनी का दिया फूल अपने कोट के कॉलर में टांक लिया। फिर सीढ़ियां फलांगता हुआ वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया।

सीढ़ियां फलांगते हुए उसने सोचा, क्या अंशु को उसके ऊपर संदेह हो गया है? उसने निश्चय कर लिया, यदि अंशु ने उसके तथा रजनी के विषय में कुछ पूछा तो यह उसके संदेह की पुष्टि करता हुआ अपने प्यार का भेद उस पर प्रकट कर देगा। यदि अंशु ने नहीं पूछा तो वह उस समय तक के लिए इस भेद को छिपाए रखेगा, जव तक रजनी उसके माता-पिता के दिल में थोड़ा-सा स्थान न प्राप्त कर ले।

चंद्रभाल अपने कमरे में पहुंचा। उसने इधर-उधर देखा। अंशु कहीं नहीं दिखाई दी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। परन्तु तभी उसने कोठी के सामने से कार के स्टार्ट होने का स्वर सुना। उसे संदेह हुआ, अंशुं तो नहीं जा रही है? अवश्य अंशु को उस पर संदेह हो गया है। वह उसके प्यार का भेद जान चुकी है। वह उससे नाराज है। शायद अब कभी बात भी नहीं करेगी। अच्छा ही है, चंद्रभाल ने सोचा, जो बात उसे अंशु को कभी बतानी थी, वह आज अपने आप प्रकट हो गई। परन्तु क्या वह इस बात को केवल अपने तक ही सीमित रखना पसंद कर सकती है? क्या वह उसके माता-पिता को रजनी के विषय में नहीं बताएगी? कर का स्वर तेज होने के बाद मद्धिम होता हुआ गुम हो गया। अंशु चली गई।

सहसा कमरे में मां प्रविष्ट हुई। मां चिन्तित थी। आते ही मां ने पूछा, अंशु से तूने कुछ कह दिया है क्या?'
 
'मैंने ! चंद्रभाल को आश्चर्य हुआ।

'हां।'

'ना।' चंद्रभाल ने उत्तर दिया।

'तो फिर उसकी आखों में आसू क्यों थे?' मां ने आश्चर्य प्रकट किया। बोली, मैंने पूछा, तब भी उसने कुछ नहीं कहा। रोकने पर भी नहीं रुकी। ऐसा लगता था मानो रो पड़ेगी।'

.

.

चंद्रभाल ने कहा, चुझे क्या पता वह क्यों चली गई! मुझसे तो उसकी भेंट भी नहीं हुई!'

मां और अचम्भे में पड़ गई। उन्होंने अंशु से पार्टी में यह बात पूछने का इरादा कर लिया। पार्टी में चलने से पहले जब यह बात उन्होंने अपने पति को बताई तो यह स्वयं आश्चर्य करने लगे।

अंशु बहुत तेज गति के साथ कार चलाती हुई जा रही थी। रजनी से फूल लेते हुए वह चंद्रभाल को देख चुकी थी। रजनी की मीठी मुस्कान तथा उसकी लज्जा देखकर वह सब कुछ-समझ चुकी थी। समझती भी क्यों नहीं? एक नारी थी वह। प्यार की यात्रा कर रही थी। प्यार के यात्री को देखकर ही पहचान सकती थी। रजनी का उसे देखकर चौंकना, फिर मुखड़े का फीका पड़ जाना इस बात का प्रमाण था कि वह चंद्रभाल को प्यार करती है और चंद्रभाल उसे। चंद्रमाल ने जिस ढंग से फूल स्वीकार करके फूल को प्यार किया था, उसे देखने के बाद अंशु को अब और किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी। अपने प्यार की यह दुर्दशा देखकर उसके शरीर में आग लग गई थी।

अंशु को अपने पिता निर्भय सिंह के साथ मंगनी की पार्टी के लिए निश्चित समय से पहले ही अपनी कोठी से निकल जाना पड़ गया था, क्योंकि शहर में उन्हें काम था। निर्भय सिंह ने एक सर्राफ को पुराने गहने देकर नये फैशन में बनाने का डा दे रखा था। अंशु को गहने दिखाकर वह उसकी पसंद, जान लेना चाहते थे। अंशु के विवाह की तैयारी वह अभी से पूर्ण कर लेना चाहते थे। क्या जाने कब अवसर हाथ लग जाए तो वह चट मंगनी पट ब्याह कर सकते थे। परन्तु सर्राफ के यहां सब गहने तैयार नहीं थे, इसलिए उनका वहां अधिक समय नहीं लगा। उसके बाद दोनों उधर से पार्टी में चले गए।

पार्टी आरंभ होने में आधे घंटे की देरी थी। मेहमानों ने अभी आना आरंभ ही किया था।

चंद्रभाल की कोठी यहां से अधिक दूर नहीं थी, इसलिए अपने पिता को पार्टी में छोड़कर वह चंद्रभाल की कोठी चली गई थी, पार्टी, में उसके साथ लौटने के लिए परन्तु वहां पहुंचकर उसकी आखों ने जो दृश्य देखा था, उससे उसके सपनों का सुन्दर महल टूटकर एक झटके में नीचे आ गिरा था, आज ही तो उसने अपने विवाह में पहनने वाले गहने देखे थे। गहनों को गले में पहनकर जब उसने स्वयं को दर्पण में देखा था तो क्षण भर के लिए वह दुल्हन के रूप में खो भी गई थी और आज ही उसके साथ यह घटना घट गई।

अंशु पार्टी में न जाकर अपनी कोठी में पहुंची। इतनी बड़ी चोट खाने के बाद पार्टी में जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। उसे तो इस समय हर वस्तु से धृणा हो रही थी। कार पोर्टिको में खड़ी करने के बाद वह सीधी अपने कमरे की ओर दौड़ी और फिर पलंग पर गिरकर फूट-फूटकर रो - पड़ी। आखिर उसका क्या दोष था, जो उसे इतना बड़ा धोखा दिया गया था? क्या पाप किया था उसने? उसने तो केवल चंद्रभाल को प्यार किया था-सच्चे मन से। यदि चंद्रभाल को किसी और से प्यार था तो उसे धोखे में क्यों रखा! तय किया कि अब वह कभी चंद्रभाल का मुंह नहीं देखेगी।

पार्टी में चंद्रभाल अपने माता-पिता के साथ पहुंचा तो वहां अंशु' नहीं थी। रास्ते भर वह चिन्तित था कि पार्टी, से अंशु का समाना कैसे करेगा, कैसे उसे समझाएगा, परन्तु जब अँशु पार्टी में नहीं दिखाई पड़ी तो उसकी चिन्ता कम होने के बजाए बढ़ गई। अंशु क्यों चली गई? पार्टी में क्यों नहीं आई? अंशु को चंद्रभाल की माताजी भी तलाश कर रही थीं। वह निर्भय से अंशु के विषय में पूछने? के लिए उनके पास जाना चाहती थीं कि तभी निर्भय सिंह उन सबको अंशु के बिना पार्टी में देखकर स्वयं वहां चले आए। आते ही उन्होंने चंद्रभाल से पूछा, अंशु तुम्हारी कोठी गई थी। क्या उससे भेंट नहीं हुई?'

'कोठी में उसे देखा था, परन्तु,,, चंद्रभालू को कुछ समझ नहीं आया कि क्या कहे तो उसने बात अधूरी छोड़ दी।
 
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