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परन्तु चंद्रमाल में अंशु के प्रति वह लंदन जैसी बात नहीं रह गई र्थी। वह रजनी के विषय में सोचता रहता। इन चार वर्षों में वह कैसी हो गई होगी? कली से फूल बनने में उस पर कैसा निखार आया होगा? वह उसे याद भी करती है या नहीं? उसे ऐसा महसूस हो रहा था, मानो जो जवानी के दिन उसने लंदन में अंशु के साथ व्यतीत किए थे, वह उसका बचपन था तथा जो बचपन उसने रजनी के साथ बिताया था, वह सयानापन था। कभी-कभी बचपन ही प्यार की ठोस नींव होता है और आज रजनी आ गई थी। आकर उसने अपने प्यार का ठोस प्रमाण दे दिया था।
चंद्रभाल अंशु के साथ नृत्य करते हुए रजनी के विषय में ही सोच रहा था। वह सोच रहा था कि कब यह पार्टी समाप्त हो और कब वह रजनी से जा मिले। उसे, पूरा विश्वास था कि रजनी इस समय उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। रजनी को आज नृत्य के मध्यान्तर में देखकर उसे विश्वास नहीं होता था कि वह इतनी सुन्दर हो गई होगी। उसकी बात उसे याद आ रही थी-फूलों से खेलने वाले कांटों-की परवाह नहीं करते। रजनी को अपने प्यार पर कितना अधिक विश्वास था! अपने भविष्य से निश्चित वह अब तक उसे प्यार किए जा रही थी।
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'बहुत खोए हुए हो!, सहसा नृत्य के मध्य अंशु ने उसकी आखों में झांका। वह बहुत देर से महसूस कर रही थी कि चंद्रभाल में उसी समय से कुछ परायापन उत्पन्न हो
गया है, जबसे रजनी की उससे भेंट हुई है।
परन्तु चंद्रभाल कोई उत्तर देने के बजाए मुस्करा दिया। वह अंशु को बताता भी क्या? वह जानता था, अंशु ने उससे बहुत सारी आशाएं बांध रखी हैं, परन्तु यह समये नहीं था उसे कुछ बताने का, बताकर उसका दिल तोड़ने का। आखिर उसका दोष ही क्या था?
वह स्वयं तो अंशु की संगति में रजनी को भूल बैठा था। चंद्रभाल इधर रजनी के विचारों में खोया हुआ था और उधर रजनी -अपने क्वार्टर में अपना अतीत दोहरा रही थी। बचपन के वन भी क्या थे!
सहसा अनेक कारों के होंने एक साथ गंजे तो कुछेक के आगे-पीछे भी। बाबा के कमरे की खिड़की पर बैठी रजनी चौंक गई। अपने विचारों में तल्लीन वह अपने अतीत से बाहर आ गई। होने के स्वर सुनकर उसकी दृष्टि स्वयं ही कोठी के बगल वाली चहारदीवारी पर उठ गई, जहां कारों की अनगिनत हैडलाइट्स एक-दूसरे से टकराकर आपस में गुंथती हुई कोठी पर फैल गई थीं। कार का स्वर तेज होता और फिर धीमा होने से पहले उस पर दूसरी कार के इंजन का स्वर छा जाता। जाने कब आर्केस्ट्रा की धुन रुक गई थी, रजनी को कुछ पता ही नहीं चला। पार्टी समाप्त हो गई थी। मेहमान जा रहे थे। धीमे-धीमे कारा की हेडलाइट्स गुम हो गई।
चांदनी छिटक आई। घटते चंद्रमा की रात थी यह। चंद्रमा देर से क्षितिज पर आया था, फिर भी कोठी के ऊपर आने के कारण चांदनी में वातावरण नहा रहा था। अंतिम जाती कार का स्वर भी जाने कहां लुप्त हो गया तो कोठी सन्नाटे में डूब गई।
चंद्रभाल अंशु के साथ नृत्य करते हुए रजनी के विषय में ही सोच रहा था। वह सोच रहा था कि कब यह पार्टी समाप्त हो और कब वह रजनी से जा मिले। उसे, पूरा विश्वास था कि रजनी इस समय उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। रजनी को आज नृत्य के मध्यान्तर में देखकर उसे विश्वास नहीं होता था कि वह इतनी सुन्दर हो गई होगी। उसकी बात उसे याद आ रही थी-फूलों से खेलने वाले कांटों-की परवाह नहीं करते। रजनी को अपने प्यार पर कितना अधिक विश्वास था! अपने भविष्य से निश्चित वह अब तक उसे प्यार किए जा रही थी।
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'बहुत खोए हुए हो!, सहसा नृत्य के मध्य अंशु ने उसकी आखों में झांका। वह बहुत देर से महसूस कर रही थी कि चंद्रभाल में उसी समय से कुछ परायापन उत्पन्न हो
गया है, जबसे रजनी की उससे भेंट हुई है।
परन्तु चंद्रभाल कोई उत्तर देने के बजाए मुस्करा दिया। वह अंशु को बताता भी क्या? वह जानता था, अंशु ने उससे बहुत सारी आशाएं बांध रखी हैं, परन्तु यह समये नहीं था उसे कुछ बताने का, बताकर उसका दिल तोड़ने का। आखिर उसका दोष ही क्या था?
वह स्वयं तो अंशु की संगति में रजनी को भूल बैठा था। चंद्रभाल इधर रजनी के विचारों में खोया हुआ था और उधर रजनी -अपने क्वार्टर में अपना अतीत दोहरा रही थी। बचपन के वन भी क्या थे!
सहसा अनेक कारों के होंने एक साथ गंजे तो कुछेक के आगे-पीछे भी। बाबा के कमरे की खिड़की पर बैठी रजनी चौंक गई। अपने विचारों में तल्लीन वह अपने अतीत से बाहर आ गई। होने के स्वर सुनकर उसकी दृष्टि स्वयं ही कोठी के बगल वाली चहारदीवारी पर उठ गई, जहां कारों की अनगिनत हैडलाइट्स एक-दूसरे से टकराकर आपस में गुंथती हुई कोठी पर फैल गई थीं। कार का स्वर तेज होता और फिर धीमा होने से पहले उस पर दूसरी कार के इंजन का स्वर छा जाता। जाने कब आर्केस्ट्रा की धुन रुक गई थी, रजनी को कुछ पता ही नहीं चला। पार्टी समाप्त हो गई थी। मेहमान जा रहे थे। धीमे-धीमे कारा की हेडलाइट्स गुम हो गई।
चांदनी छिटक आई। घटते चंद्रमा की रात थी यह। चंद्रमा देर से क्षितिज पर आया था, फिर भी कोठी के ऊपर आने के कारण चांदनी में वातावरण नहा रहा था। अंतिम जाती कार का स्वर भी जाने कहां लुप्त हो गया तो कोठी सन्नाटे में डूब गई।