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Romance हरसिंगार/रानु

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शाम के समय जब अंशु ने फोन द्वारा पता चलाया कि चंद्रभाल कोठी अब तक नहीं लौटा है तो उसका दिल एक परिचित भय के कारण धड़क उठा था। फिर रात को उन्हें जब दोबारा कोठी से फोन द्वारा पता चला कि चंद्रभाल का कोई पता नहीं चला तो उनके दिल की धड़कनों ने ही उन्हें बता दिया था कि चंद्रभाल इस समय कहां जा सकता है। मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी को बढ़ते अंधकार के साथ संदेह होने लगा था कि चंद्रभाल कुल की मान-मर्यादा ठुकराकर रजनी के पास भाग गया हैं-शायद रजनी को साथ लाने के लिए...साथ लाकर उनके सामने प्रस्ताव रखने के लिए कि वे रजनी को स्वीकार करते हैं या नहीं। स्वीकार नहीं करेंगे तो वह रजनी के साथ सदा के लिए कोठी छोड़ देगा। रजनी के लिए एक बार पहले भी तो उनका बेटा कोठी छोड़ने को तैयार हो गया था। विवश होकर मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी हाथ मलते रह गए थे। रजनी को कोसते तथा धिक्कारते हुए उनकी जुबान नहीं थकती थी। एक दो कौड़ी की लड़की ने उनके घर के शांति भंग कर रखी थी।

परन्तु मार्तण्ड सिंह तुले बैठे थे कि बेटा घर छोड़ता है तो छोड़े, परन्तु वह रजनी को अपनी बहू के रूप में कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्हें अपनी मान-मर्यादा प्यारी थी, अपने कुल की इज्जत प्यारी थी, अपना वह वचन प्यारा था, जो उन्होंने निर्भय सिंह तथा अंशु को दिया था। अपने बेटे की दीवानगी देखकर उनकी धर्मपत्नी की समझ में नहीं आ रहा था कि वह रजनी से उसका पीछा कैसे छुड़ाए। जिस ध्येय से उन्होंने बेटे को पिछली बार घर छोड़ने से रोका था, उसके पूरा होने की संभावना जाती रही थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जब बेटा रजनी को लेकर आएगा तो वह उससे क्या बातें करेंगी। उन्होंने बेटे का निर्णय अपने पति पर छोड़ दिया था। इसके अतिरिक्त वह कर भी क्या सकती थी?

उधर पिछली रात जब खाने की मेज पर अंशु नहीं आई थी तथा खाना खाने से इंकार करते, हुए उसने स्वास्थ्य ठीक न होने का बहाना बना दिया था तो निर्भय सिंह उसके कमरे में पहुंच गए थे। बेटी का मुखड़ा उदास देखा तो चिन्तित हो उठे थे। उसकी उदासी निर्भय सिंह को भेद भरी लगी थी। जब उन्होंने अपनी बेटी से पूछा तो अपने पिता की छाती पर सिर रखकर अंशु सिसक उठी थी। पिता का सहारा मिला तो अंशु ने सिसकियों के मध्य उन्हें चंद्रभाल के विषय में सब-कुछ बताकर अपने दिल का भय प्रकट कर दिया था-ऐसा न हो कि चंद्रभाल रजनी से विवाह करके उसे लाने गया हो।

बेटी की बात सुनकर निर्भय सिंह सन्न रह गए थे। यदि चंद्रभाल ने रजनी के गांव जाकर उससे वास्तव में विवाह कर लिया, तब क्या होगा? हां, तब क्या होगा? रजनी को उन्होंने मन-ही-मन खूब गंदी बातें कहना आरंभ कर दिया था। उनकी मान-मर्यादा उनका भविष्य तथा बेटी का सुखमय जीवन, उसकी प्रसन्नताएं केवल चंद्रभाल पर निर्भर कर रही थीं। उन्हें चंद्रभाल के इस प्रकार रजनी के पास भाग निकलने की आशा जरा भी नहीं थी। कुछ सोचकर उन्होंने बेटी को विश्वास दिला दिया था कि यदि चंद्रभाल का विवाह होगा तो केवल उसी के साथ और किसी के साथ कभी नहीं होगा। परन्तु अंशु ने अपने पिता से जरा भी आशा नहीं बांधी थी। उसे चंद्रभाल से सच्चा प्यार था, इसलिए उसने चंद्रभाल की प्रसन्नताओं पर अपनी प्रसन्नताएं भेंट चढ़ा देने का निश्चय कर लिया था। उसने सोच लिया था कि अब चंद्रभाल से कभी नहीं मिलेगी, परन्तु उसका प्यार अपने दिल से कभी अलग नहीं करेगी। वही उसका पहला प्यार था, कही उसका अंतिम प्यार रहेगा। नारी का केवल एक ही प्यार उसके जीवन भर के लिए बहुत होता है। चंद्रभाल का प्यार अपने दिल में बसाए वह अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत कर देगी। पिछली रात वह चंद्रभाल के बिछड़ने के गम में आंसू बहाती रही थी और सोचती रही थी कि ऐसी स्थिति में चंद्रभाल को प्राप्त करने से लाभ भी क्या, जब उसका दिल केवल रजनी के लिए ही सुरक्षित है? परन्तु निर्भय सिंह चंद्रभाल की ओर से तब भी निराश नहीं हुए थे। सारी रात वह इसी उलझन में डूबे हुए थे कि किस प्रकार रजनी को सदा के लिए चंद्रभाल के जीवन से अलग करें और सुबह होते ही उन्होंने मार्तण्ड सिंह से फोन द्वारा बात की थी। उन्होंने दिल का कपट छिपाते हुए पूछा था, 'अरे भई, चंद्रभाल आया कि नहीं?'

'अभी तक तो नहीं आया।' मार्तण्ड सिंह ने उत्तर दिया था।

कहीं ऐसा तो नहीं कि वह रजनी के पास चला गया हो?'

मुझे भी यही संदेह है।' मार्तण्ड सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था।

यदि उसने रजनी से वहां विवाह कर लिया, तब क्या होगा ?'

'तब मैं उसे कोठी में दाखिल नहीं होने दूंगा।' मार्तण्ड सिंह ने दृढ़ शब्दों में कहा था, 'उसे मैं कोठी से सदा के लिए निकाल बाहर करूंगा।'

'हू।' निर्भय सिंह एक गहरी सांस लेकर चुप हो,गए थे। सोचने लगे थे कि चंद्रभाल को कोठी से निकालने में उनका अपना क्या लाभ होगा? उन्होंने पूछा था, 'चंद्रभाल के लौटने की संभावना है?

'पूरी संभावना है। मुझसे तो दूर, वह अपनी मां से भी मिले बिना चला गया है और साथ में, मेरी बड़ी गाड़ी भी ले गया है इसलिए वह एक बार तो अवश्य ही यहां आएगा और वह भी रजनी को साथ लेकर-हमारे सामने प्रस्ताव रखने कि...।'

कि तुम रजनी को अपनी बहू स्वीकार करते हो या नहीं?' निर्भय सिंह ने मार्तण्ड सिंह की बात काटते हुए बहुत गंभीर स्वर में पूछा था।

'हां।' मार्तण्ड सिंह ने फूलती सांसों के साथ अपना वचन निभाते हुए कहा था, 'परन्तु तुम जानते हो कि मैं उस नीच लड़की को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता।'

निर्भय सिंह मार्तण्ड सिंह पर खिसियाकर रह गए थे। मार्तण्ड सिंह का रजनी को अस्वीकार करने का यह अर्थ तो नहीं कि चंद्रभाल रजनी को छोड़कर अंशु से विवाह कर लेगा। अपने भविष्य तथा बेटी के सुखमय जीवन पर खतरा बना देखकर उनका मन हुआ था कि वह मार्तण्ड सिंह को दो-चार गालियां सुना डालें। उन्होंने मन-ही-मन एक योजना बनाते हुए भेद भरे ढंग से पूछा था, 'चंद्रभाल के लौटने की संभावना कब तक की जा सकती है?,

__ 'यदि कुसुम्पटी से वह चल दिया होगा तो उसे आज यहां किसी भी समय पहुंच जाना चाहिए।'

'कुसुम्पटी?'

'रजनी कुसुम्पटी में ही रहती है ना?' मार्तण्ड सिंह ने कहा था।

'ओह!' निर्भय सिह सोच में डूब गए थे। फिर इसके बाद उन्होंने बात समाप्त कर दी थी। रजनी का पूरा पता पूछकर वह किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न नहीं करना चाहते थे।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
'रजनी कुसुम्पटी में ही रहती है ना?' मार्तण्ड सिंह ने कहा था।

'ओह!' निर्भय सिह सोच में डूब गए थे। फिर इसके बाद उन्होंने बात समाप्त कर दी थी। रजनी का पूरा पता पूछकर वह किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न नहीं करना चाहते थे।

ये थी निर्भय सिंह की मार्तण्ड सिंह के साथ आज सुबह की बातें। इसके बाद जैसे ही उन्होंने रजनी के अपहरण की बात सोची तो एक नये विचार से उनकी आखें चमक उठीं थीं। उनकी जवानी लौट लाई थी-स्वेतंत्रता से पहले की जवानी। रजनी के विचार से उनकी आखों में नशा छा गया था। होंठों से लार टपकने लगी थी। रजनी के अपहरण द्वारा वह अपना तथा बेटी का भविष्य ही उज्जल नहीं बना सकते थे, वरन् उसकी जवानी भरी सुन्दरता से अपनी वासना की उस भूख को भी मिटा सकते थे, जो रजनी को एक ही बार देखने के बाद उनके अंदर उत्पन्न हो गई थी। उसे लूटने के बाद वह उसकी हत्या द्वारा सदा के लिए उसे अपने रास्ते से हटा सकते थे। निर्भय सिह का दिल ऐसी बात सोचते हुए जरा भी नहीं कांपा, स्वतंत्रता से पहले तो उनके लिए ये बिल्कुल साधारण बातें थीं। अपनी वासना की भूख मिटाने का अधिकार तो उन्हें मानो अपने बाप-दादों से प्राप्त हुआ था।

अपहरण का प्रबंध गुण्डों द्वारा निर्भय सिंह ने तुरंत ही कर दिया था-गुण्डों तथा बदमाशों को कुसुम्पटी के रास्ते में भेजते हुए अपहरणकर्ताओं को उन्होंने विशेष आदेश दिया था कि चंद्रभाल को हाथ न लगाएं।

उन्होंने निश्चय कर लिया था कि आज रजनी उनके गुण्डों तथा बदमाशों के हाथ नहीं लगी तो वह इसके बाद भी उसका अपहरण कराने से नहीं चूकेंगे-चाहे रजनी चंद्रभाल के साथ विवाह करे, या न करे, चंद्रभाल के साथ मार्तण्ड सिंह की कोठी में रहे या अलग। दो-चार दिन रजनी यदि चंद्रभाल के साथ एक रखैल के समान रह लेगी तो उन्हें क्या अंतर पड़ेगा? अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए, अपनी बेटी का भविष्य उज्जल बनाने के लिए तथा अपनी मान-मर्यादा सुरक्षित करने के लिए आज वह वर्षों बाद एक बार फिर अपनी वास्तविकता पर उतर आए थे।

इस समय निर्भय सिंह मार्तण्ड सिह की कोठी में बैठे पति-पत्नी को आश्वासन दे रहे थे, क्योंकि उन्हें अपने गंदे इरादों की सफलता पर पूरा विश्वास था। अपने गुण्डों का पूरा प्रबंध करने के बाद वह एक घंटा पहले ही कोठी पहुंचे थे। वह अंशु को भी कोठी लाना चाहते थे परन्तु अंशु ने आने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। कोठी में उसकी उपस्थिति के समय यदि चंद्रभाल रजनी को लिए आ धमका तब क्या होगा? अपने प्यार का अपमान, अपने विश्वास की दुर्गति देखकर क्या उसका दिल टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाएगा? निर्भय सिंह अपनी काली करतूत के विषय में उसे कुछ बताते भी कैसे? बेटी को उनसे धृणा न हो जाती?

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सहसा एक कार कोठी के मुख्य द्वार में प्रविष्ट हुई और पोर्टिको के समीप रुकी। कार का स्वर मार्तण्ड सिंह तथा उनकी पत्नी पहचानते थे। मार्तण्ड सिह की धर्मपत्नी के मुख पर रौनक आ गई। खड़ी होती हुई वह बोलीं, 'हमारा बेटा आ गया!' उन्होंने किसी की बात की प्रतीक्षा नहीं की और वह बाहर बरामदे की ओर लपक गईं।

मार्तण्ड सिंह क्रोध में सोफे पर ही बैठे रहे।

मार्तण्ड सिंह की पत्नी बरामदे में पहुंची तो ट्रक-चालक बाबा तथा रजनी कार से बाहर निकल चुके थे। बाबा ने अपना सूटकेस कार से निकालकर हाथ में लटका लिया था। शायद कार को यहां से सीधे अस्पताल जाना पड़े। यूं भी अब कार में अपना सूटकेस छोड़ना उसके लिए उचित नहीं था। वह तथा रजनी कार से कुछ दूर सहमे-सहमे खड़े थे। मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी ने उन दोनों को देखा तो उनके क्रोध का पारा आकाश पर चढ़ गया। आंखों में धृणा की चिनगारियां दहक उठीं।

'तुम?' शेरनी के समान गरजती हुई वह आगे बढ़ीं-बरामदे की सीढ़ियां उतरने के लिए।

रजनी का दिल कांप गया।सहमकर उसने अपने बाबा की बांह पकड़ ली।

'मालकिन...।' तभी चालक मार्तण्ड सिंह की पत्नी की बात काटता हुआ आगे बढ़ा। लगभग रोकर चिन्ता प्रकट करते हुए उसने कहा, 'मालकिन, दुर्घटना में छोटे मालिक घायल हो गए हैं। वे बेहोश पड़े हैं।'

'क्या?' मार्तण्ड सिंह की पत्नी के सीढ़ियां उतरते पग डगमगा गए। वह गिरते-गिरते बचीं। संभलकर वह कार की ओर दौड़ी। अपने लाड़ले को कार के अंदर घायल तथा बेहोश पड़ा देखा तो छाती पीट ली। द्वार खोलकर तुरंत बेटे पर गिर पड़ी और चीख-चीखकर रो पड़ी। उनकी चीख सुनकर अंदर से मार्तण्ड सिंह तथा निर्भय सिंह भी निकल आए। रजनी तथा बाबा को देखा तो उनके मन में भी क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। निर्भय सिंह के प्रयत्न पर पानी फिर गया था। मार्तण्ड सिंह ने बेटे की स्थिति गंभीर देखी तो कारण जाने बिना मन हुआ कि इस नाना और नातिन को अपने हाथों से दंडित करे। निर्भय सिंह को चंद्रभाल के घायल होते का एक ही कारण समझ में आया...अपहरण के समय चंद्रभाल ने रजनी को बचाने के लिए अपनी जान लड़ा दी होगी। फिर चंद्रभाल को घायल करके उनके गुण्डों ने रजनी का अपहरण करना चाहा होगा तो वहां जनता आ गई होगी।
 
'नीच! पापिन!' सहसा मार्तण्ड सिंह की पत्नी अपने बेटे के शरीर पर से सिर उठाकर कार में से ही रजनी पर बरस पड़ी। उन्होंने चीखकर कहा, 'मेरे लाल की यह दुर्दशा करने के बाद क्या अब भी तेरा मन नहीं भरा, जो यहां खड़ी है? कमीनी, नमकहराम, क्या तुझे अपना मुंह काला करने के लिए मेरा ही बेटा मिला' निकल जा इस कोठी से, निकल जा इसी समय!' मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी जोश में आकर कार से बाहर निकल पड़ी। वह रजनी की ओर इस प्रकार बढ़ीं, मानो उसका मुंह नोंच लेंगी।

उफ, इतना बड़ा अपमान? रजनी ने सुना तो उसका मन किया कि धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। आकाश उसके सिर पर गिर पड़े और उसका दम निकल जाए। रजनी की आखें छलक आई। दिल फटने लगा। यहां वह किस आशा से आई थी और क्या हो गया! ऐसी स्त्री से वह क्या आशा रख सकती थी जो भरे समाज में उसे कलंकित कर रही थी। मार्तण्ड सिंह की पत्नी घायल शेरनी के समान उसकी ओर बढ़ रही थी, परन्तु रजनी ने अपने बचाव में एक कदम भी पीछे नहीं हटाया।

अपना मुखड़ा उसने नीचे झुका लिया। बाबा उसी प्रकार खड़ा रहा। अपनी सफाई में उसने भी एक शब्द कहने की आवश्कयता नहीं समझी। इस समय उसकी मालकिन जिस क्रोध में थीं, उस क्रोध में उन्हें कोई भी नहीं समझा सकता था। अपने लाड़ले की घायल स्थिति देखकर उनका जोश में आना स्वाभाविक था, परन्तु जिस ढंग से वह उसकी नातिन को बदनाम कर रही थीं, वह बाबा को सख्त चोट पहुंचा रहा था, परन्तु स्थिति इतनी नाजुक थी कि उसने चुप रहने में ही भलाई समझी।

मार्तण्ड सिंह की पत्नी रजनी के सामने आईं। रजनी का रक्त जमने लगा। मार्तण्ड सिंह की पत्नी मुख्यद्वार की ओर हाथ द्वारा संकेत करके पूरी ताकत से चीखीं, 'निकल जाओ!' उनके स्वर में बिजली जैसी कड़क थी।

ट्रक चालक रंजनी को नहीं जानता था। परन्तु चंद्रभाल के घायल होने का कारण वह जानता था। उसी के ट्रक ने तो चंद्रभाल की वह स्थिति की थी। न वह उसके ट्रक से घायल होता और न इस बेचारी लड़की को इतनी गंदी-गंदी बातें सुननी पड़ती। रजनी के प्रति उसका मन सहानुभूति से भर गया। उसका पक्ष लेकर उसने सफाई देना आवश्यक समझा। उसने कहा, परन्तु मालकिन, छोटे मालिक की यह स्थिति तो...।'

'तुम चुप रहो!' अचानक निर्भय सिंह ने ट्रक चालक को डांट दिया। वह नहीं चाहते थे कि इस समय कोई ऐसी बात उत्पन्न हो, जिससे रजनी के प्रति मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी के दिल में समाई घृणा नाममात्र भी कम हो। कम होने के बजाए इस धृणा का अधिक से अधिक बढ़ना ही उनके लिए हितकर था। रजनी जितना अधिक इस कोठी के वातावरण में अपने प्रति धृणा महसूस करेगी, उतना ही वह चंद्रभाल की बनने में भय खाएगी।

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चालक सहमकर खामोश हो गया। उसने सोचा, इस समय मालिक लोग क्रोध में हैं। उसने कुछ कहना उचित नहीं होगा, होश में आने के बाद छोटे मालिक स्वयं ही अपने माता-पिता को गुण्डों के आक्रमण वाली बात बता देंगे।

रजनी और अधिक देर तक वहां नहीं खड़ी रह सकी। अपने बाबा के साथ वह सिर झुकाए मुख्यद्वार की ओर बढ़ गई, चलते-चलते उसने सुना, चंद्रभाल की माताजी उसके पिता से कह रही थी, 'आप खड़े क्यों हैं? जल्दी चलिए डाक्टर के पास। यदि मेरे बेटे को कुछ हो गया तो मैं प्राण दे दूंगी।'

रजनी मन-ही-मन भगवान से अपने कुंवर साहब के जीवन के लिए भीख मांगने लगी कि उसे वह प्राप्त हों या न हों, परन्तु उनका जीवन अवश्य बच जाए।

मार्तण्ड सिंह अपने बेटे की स्थिति देखकर घबरा गए थे। उन्होंने निर्भय सिंह को देखा।

अपनी योजना की असफलता के कारण निर्भय सिंह मन-ही-मन खिसियाते हुए रजनी को जाता हुआ देख रहे थे। वह सोच रहे थे, कि कम्बख्त आज हाथ आया शिकार उनकी आखों के सामने से निकला जा रहा है। आज वह अगर उनके हाथ आ जाती तो इसकी यौवन भरी सुन्दरता द्वारा अपनी राज रंगीन करते हुए वह इसे छठी का दूध याद दिला देते।

गंगू नें जब कार स्टार्ट करके मुख्यद्वार की ओर बढ़ाई तो मुख्यद्वार से निकलती रजनी को देखकर निर्भय सिंह को उसका जाना एक बार फिर अखरा। मन-ही-मन उन्होंने सोचा कि यदि रजनी के यहां पहुंचने की संभावना उन्हें थोड़ी-सी भी होती तो रजनी के अपहरण का प्रबंध वह उसके लौटते समय भी करने से नहीं चुकते।

रजनी के समीप से जब कार निकली तो उसने पलकें उठाकर कार की ओर देखने का जरा भी साहस नहीं किया, परन्तु उसके कान कोठी की मालकिन का स्वर सुनने से वंचित नहीं रह सके। कोठी की मालिकन अब भी उसे धिक्कार रही थी, कोस रही थीं और उसकी मृत्यु की कामना कर रही थी।
 
परन्तु रजनी के विचारों से अनभिज्ञ बाबा के विचार बिलकुल उलट थे। मालकिन ने रजनी पर कलंक लगाते हुए उसका भी अपमान किया था। मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी के शब्द उसके कानों में अब तक पिघले सीसे के समान उतर रहे थे। उसके कानों के अंदर मानो नसें फट जाना चाहती थीं। यदि उसने इस कुल का नमक नहीं खाया होता, यदि यह विषय रजनी तथा चंद्रभाल के प्यार का नहीं होता, तो वह भी उस स्त्री को जवाब देना जानता था।

चंद्रभाल की कुसुम्पटी में कही बात पर वह कैसे विश्वास कर सकता था कि मां प्यार में उसका साथ दे रही हैं? मां ने अपने बेटे के प्यार में साथ देने वाली बात अवश्य कही होगी, परन्तु दिल से नहीं कही होगी। उन्होंने अपने बेटे को केवल ढांढस देने के लिए ही ऐसा कहा होगा, ताकि उनका बेटा रजनी से दूर रह सके। दूर रहकर उसके प्यार में कमी आ जाए, रजनी को भूलने में उसे आसानी हो जाए।

बाबा ने सोचा, छोटे मालिक का रजनी से अचानक बिछड़ने के पश्चाव रजनी को इतने दिनों बाद लेने आना क्या यह सिद्ध नहीं करता कि मालकिन ने उन्हें झूठा वचन देकर रोके रखा था? यदि मालकिन अपने बेटे के प्यार के पक्ष में होतीं, तो कम-से-कम बेटे की प्रेयसी को इतनी गंदी बातें नहीं कहतीं, जो आज उन्होंने कड़ी थी। उसने निश्चय कर लिया, अब वह शीघ्र ही रजनी के विवाह का प्रबंध करेगा-अपने ही वर्ग के घराने में। जो फूल जिस भूमि को है, वहां खिलता है तो अधिक अच्छा लगता है। अपने नये घर में रजनी को जब अपने पति का प्यार मिलेगा तो वह अपना कटु अतीत भूलने में समर्थ हो जाएगी।

अस्पताल के एक प्राइवेट कमरे में चंद्रभाल बेहोश पड़ा था। अस्पताल में आए उसे एक घंटे से अधिक हो गया था। दुर्घटना में उसके शरीर का रक्त बहुत निकल गया था, इसलिए उसे इस समय रक्त दिया जा रहा था। मार्तण्ड सिंह, उनकी धर्मपत्नी, निर्भय सिंह और अंशु वहीं बैठे हुए थे। अंशु लगभग आधा घंटा पहले आई थी...अपने पिता का फोन प्राप्त करके। यद्यपि उसने पिछली ही रात प्रण किया था कि वह चंद्रभाल से कभी नहीं मिलेगी, परन्तु दुर्घटना की बात सुनते ही वह चंद्रभाल को देखने के लिए तड़प उठी थी।

इस समय सभी को चंद्रभाल की चिन्ता लगी हुई थी। निर्भय सिंह भी चंद्रभाल के प्रति बहुत चिन्तित थे, परन्तु उनकी चिन्ता के पीछे उनका स्वार्थ था। यदि चंद्रभाल को कुछ हो गया तो उनका क्या होगा? रजनी से उन्हें अब भी खतरा था, चंद्रभाल स्वस्थ होने के बाद दोबारा रजनी के पास न चला जाए। चंद्रभाल के स्वस्थ होने से पहले वह ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देना चाहते थे कि अब चंद्रभाल तथा रजनी का मिलन कभी न हो। इस बार का मिलन चंद्रभाल तथा रजनी के लिए पहले से भी कहीं अधिक बेताबियां लेकर आएगा। दोनों दीवाने सदा के लिए एक हो जाएंगे और फिर जब चंद्रभाल को अपने घर में शरण नहीं मिल सकेगी तो वह रजनी को लेकर कहीं दूर भाग जाएगा। दिल्ली में उनके विवाह के बाद भी वह रजनी के अपहरण की आशा रख सकते हैं, परन्तु जब वह चंद्रभाल के साथ कहीं दूर जाकर बस जाएगी, तब वे क्या करेंगे? निर्भय सिंह अस्पताल के कमरे में एक घंटे से बैठे इन्हीं विचारों में तल्लीन थे। इस समय वह एक चिन्ता से मुक्त थे कि रजनी तथा चंद्रभाल का विवाह नहीं हुआ था।

चंद्रमाल को अस्पताल में भर्ती करने तथा अंशु को इस दुर्घटना के विषय में फोन द्वारा सूचित करने से पहले निर्भय सिंह ने पूछा था, 'यदि चंद्रभाल ने रजनी से विवाह कर लिया होगा, तब क्या होगा?'

'असंभव!' मार्तण्ड सिंह ने स्पष्ट इंकार किया था। वह कैसे?' निर्भय सिंह ने आश्चर्य से पूछा।

यदि रजनी का विवाह हो गया होता तो उसका बाबा उस समय हमें यह बात अवश्य बताता, जब चंद्रभाल की मां रजनी को धिक्कारते हुए उस पर कलंक लगा रही थी।'

निर्भय सिंह की समझ में बात आ गई थी। रजनी का विवाह यदि चंद्रभाल से हो गया होता तो अवश्य ही उसका बाबा रजनी पर इतना बड़ा दोष लगते देखकर कभी चुप नहीं रहता। कम-से-कम वह अपनी मालकिन को इतना तो बता ही देता कि वह अपने घर की लाज, अपने कुल की लक्ष्मी तथा अपनी बहू को गाली दे रही हैं। परन्तु यदि रजनी का विवाह हो भी गया होता तो इससे निर्भय सिंह के लिए कोई अंतर नहीं पड़ता। विवाह होने न होने की चिन्ता न करते हुए ही तो आज सुबह उन्होंने रजनी के अपहरण का प्रबंध किया था। रजनी का विवाह हो गया होता, तब भी वह इस समय इसी ताक में रहते। अब भी, ताक में थे। वह सोच रहे थे कि चंद्रभाल के स्वस्थ होने से पहले यदि वह उसके अपहरण का प्रयत्न करें तो इस काम में आसानी हो जाएगी।

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सहसा कमरे में एक डाक्टर प्रविष्ट हुआ। नर्स रक्त पहुंचाने वाली सुई निकालने लगी। डाक्टर सिरहाने टंगा चार्ट उठाकर उस पर कुछ लिखने लगा। नर्स से चंद्रभाल के हाथ से रक्त पहुंचाने वाली सुई अभी निकाली ही थी कि चंद्रभाल की पलकें कांप गई। उसके होंठ भी कांप उठे। उसे होश आ रहा था। कांपते होंठों से बहुत मद्धिम स्वर में निकला, 'रजनी...रजनी...।' चंद्रभाल ने मानो अपने प्रेयसी को बहुत दूर से पुकारा था। अंशु को ऐसा लगा, मानो उसके कानों के पास किसी ने तोप रखकर चला दी हो। अंशु की छाती में बहुत जोर का दर्द उठा। आखें छलक पड़ी।
 
चंद्रभाल ने अपने अनजानेपन में उसकी आखों के सामने उसके अरमानों का गला घोंट दिया था। उससे यह दर्द अब और नहीं सहन हो रहा था।

निर्भय सिंह ने चंद्रभाल के होंठों से रजनी का नाम सुना तो चाहा कि लपककर वह चंदभाल के होंठों पर अपनी हथेली रखकर दबा दें। चंद्रभाल ने मानो रजनी का नाम लेकर उनके मुंह पर एक तमाचा मार दिया था। उन्होंने अपनी बेटी को देखा। उसकी आखों में आंसू देखकर वह तड़प उठे। उनकी बेटी के साथ तो यह खुला अत्याचार था।

मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी को भी चंद्रभाल का यह दीवानापन अच्छा नहीं लगा, परन्तु वह कर भी क्या सकते थे? उन्होंने अंशु को देखा। अंशु की स्थिति इतनी दयनीय थी कि दोनों ही तड़प उठे। इतनी अच्छी-सी बेटी, प्यारी और सुन्दर और मूर्ख चंद्रभाल है कि उसे छोड़कर उस कलमुंही पर अपनी जान दिए जा रहा है। तभी चंद्रभाल ने अपनी आंखें खोली। उसके सिर पर पट्टी बंधी हुई थी। सिर फटा जा रहा था। शरीर का अंग-अंग टूट रहा था। उसकी आखों के दर्पण पर उसके माता-पिता तथा निर्भय सिंह और अंशु के साथ डाक्टर तथा नौं की छाया पड़ी तो वह चौंक गया। वह कहां है ? उसने कमरे का निरीक्षण किया तो उसे ज्ञात हुआ कि वह किसी अस्पताल के प्राइवेट कमरे में है। फिर उसकी आंखों में दुर्घटना का सारा दृश्य घूम गया तो वह चौंक पड़ा। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी बेहोशी के बाद वे बदमाश रजनी का अपहरण करने में सफल हो गए हों? वह तड़पकर चीख उठा, 'रजनी...रजनी...।' उसने एक झटके के साथ उठने का प्रयास किया। उठकर रजनी को ढूंढ लेना चाहा। उसे अपने जीवन से अधिक रजनी की चिन्ता थी। परन्तु तभी डाक्टर ने लपककर उसे पकड़ लिया। उस पर काबू पाते हुए उसे लिटा दिया1 परन्तु एक झटके से उठते-उठते चंद्रभाल का निर्बल शरीर बेजान-सा हो गया था। डाक्टर ने उसे लिटाया तो उस पर एक बार फिर बेहोशी छाने लगी।

अंशु के लिए अब ये बातें उसकी सहनशक्ति से बाहर हो गईं। कोई उसके दिल पर छुरी रखकर चलाए और वह आह भी न करे? आंसू गालों पर बह आए। उसने अपने निचले होंठ को दांतों से काटा। फिर तुरन्त कमरे से बाहर निकल गई। निर्भय सिंह अपनी बेटी के दिल की स्थिति समझ रहे थे। बेटी की स्थिति देखकर उनके दिल पर स्वयं भी छाले पड़ गए थे। चंद्रभाल पर मन-ही-मन दांत पीसते हुए उठे और फिर अंशु को सांत्वना देने के लिए कमरे से बाहर निकल गए।

बाहर निकलने का मन मार्तण्ड सिंह का भी हुआ तथा उनकी धर्मपत्नी का भी। उनके कुल की होने वाली लक्ष्मी की यह दुर्दशा-इतना बड़ा अपमान! परन्तु दोनों उठ नहीं सके। चंद्रभाल की स्थिति और गंभीर हो गई थी। अंशु तो उनके घर की होने वाली बहू थी, परन्तु चंद्रभाल तो उनका बेटा था। उसके पास उनका रहना अत्यंत आवश्यक था। अंशु को तो वह बाद में भी समझा सकते थे।

डाक्टर चंद्रभाल के लिए चिन्तित हो उठा था। चंद्रभाल जिस झटके से उठा था, उस झटके से ऐसी स्थिति में उसके मस्तिष्क का संतुलन डगमगा सकता था। वह पागल हो सकता था, क्योंकि चोट सिर में लगी थी। शरीर निर्बल था। उसने तुरंत एक नर्स को इंजेक्शन लाने की आज्ञा दी। परन्तु चंद्रभाल बेहोश नहीं हुआ। रजनी को देखने के जोश में वह जिस झटके से उठा था, उससे उसे चक्कर-सा आ गया था। उसके सोचने-समझने की शक्ति क्षण भर के लिए शिथिल पड़ गई थी और जब उसकी स्थिति संभली तो अंशु तथा निर्भय सिंह कमरे से बाहर जा चुके थे। चंद्रभाल कुछ क्षण उसी प्रकार लेटा रहा। चंद्रभाल को याद था कि उसकी टक्कर एक ट्रक से हुई थी। शायद ट्रक रुक गया था, क्योंकि आंखें बंद होते-होते उसने अंतिम क्षणों में देखा था कि ट्रकों का कारवां रुक रहा था। भगवान पर विश्वास करते हुए उसने आशा बांध ली कि इतने सारे ट्रकों तथा अन्य लोगों के सामने उन बदमाशों को रजनी का अपहरण करने का साहस नहीं हुआ होगा। इस आशा ने इस समय चंद्रभाल को स्वयं पर काबू पाने की शक्ति प्रदान की। उसने सब्र से काम लिया और सोचा, रजनी तथा बाबा को उसे यहां तक पहुंचाने में कितना अधिक कष्ट हुआ होगा! उसे विश्वास था कि रजनी तथा बाबा के अतिरिक्त उसे यहां कोई पहुंचा ही नहीं सका होगा। गरीब बाबा ने अपनी रही-सही पूंजी लगाकर किसी ट्रक-चालक को पकड़ लिया होगा, ताकि रजनी के चन्द्रमा को डूबने से बचा लें। चंद्रमा डूब जाए तो रजनी रात भर शबनम के आंसू बहाती रहती है। जब रजनी की आखों में शबनम के आंसू नहीं होते तो गम का काला लबादा ओढ़कर वह सिसकती रहती है। चंद्रभाल ने जानना चाहा, रजनी उसे पहुंचाकर कहां चली गई? इस समय वह कहां है? क्या उसकी इस भलाई का प्रभाव उसके माता-पिता पर कुछ पड़ा है? उसने गर्दन घुमाकर कमरे के वातावरण का निरीक्षण किया। उसने मानो पहली बार कमरे में उपस्थित लोगों पर ध्यान दिया-डाक्टर, नर्स, मां, पिताजी। उसने पूछा, 'मां, रजनी कहां है?'
 
उसके इस प्रश्न पर मार्तण्ड सिंह के शरीर में आग लग गई। उनका बेटा और उन्हीं के सामने उनके टुकड़ों पर पली एक लड़की के लिए प्यार से इस प्रकार पूछ रहा है? क्या इतनी बदनामी करने के बावजूद उसका मन नहीं भरा है? उन्होंने चंद्रभाल को घूरकर देखा। चंद्रभाल कांप गया। उसकी ऐसी स्थिति पर भी उसके पिताजी का दिल नहीं पिघला? उसके दिल को चोट पहुंची। उसने मां को देखा। मां भी रुष्ट थीं। उसकी चिन्ता बढ़ी। इन लोगों ने कहीं रजनी के साथ कोई दुर्व्यवहार तो नहीं किया? उसने डाक्टर तथा नर्स की चिन्ता किए बिना फिर पूछा, 'मां, रजनी कहा है?'

मार्तण्ड सिंह से अब और अधिक सहन नहीं हो सका। हर बात की एक सीमा होती है। क्रोध में उन्होंने पैर पटका और उठकर कमरे से बाहर निकल गए। चंद्रभाल का दिल टूट गया, उसने बड़ी असहाय दृष्टि से मां को देखा। पिता के इस सख्त व्यवहार पर उसकी आंखों में आंसू आ गए थे।

'रजनी चली गई-अपने घर।' मां ने जैसे रक्त का चूंट पीकर कहा।

___ 'तुमने उसे रोका नहीं?, चंद्रभाल ने निराश होकर पूछा।

'क्या अब भी इतनी बदनामी करने के बाद तुम्हारा दिल नहीं भरा है?' मां ने मन-ही-मन रजनी को धिक्कारते हुए पूछा। डाक्टर वहीं खड़ा बहुत ध्यान से चंद्रभाल के मुख पर उतरती-चढ़ती छाया को देख रहा था। अपने रोगी की आंखों में आंसू देखकर वह उसके दिल की स्थिति समझने का प्रयास कर रहा था। यह रजनी कौन है? रजनी का उसके रोगी से क्या संबंध है? क्यों उसका रोगी होश में आने के बाद रजनी के लिए इतना अधिक तड़प उठा था? जिस ढंग से चंद्रभाल ने अपनी मां से रजनी के लिए बातें की थी, उससे डाक्टर को बहुत कुछ समझने में आसानी हो रही थी। यदि रजनी उसके रोगी की प्रेमिका है तो क्या उसका रोगी होश में आने के पश्चात् रजनी के बिना स्वस्थ होने में सफल हो सकता है?

डाक्टर ने अंशु के लिए भी सोचा। वह लड़की, जो कुछ देर पहले यहां खड़ी थी, वह मरीज के होंठों द्वारा रजनी का नाम सुनते ही क्यों उदासी की छाया बन गई थी? क्यों उसकी आंखों में आसू छलक आए थे? क्यों वह कमरे से बाहर निकल गई थी? डाक्टर ने बहुत कुछ समझा और नहीं भी। डाक्टर को किसी के व्यक्तिगत जीवन या किसी की निजी बातों से कोई संबंध नहीं था, परन्तु वह अपने रोगी को मानसिक उलझनों से अवश्य छुटकारा दिला देना चाहता था, ताकि वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जाए। मनुष्य का मन और मस्तिष्क रोगी हो तो वह कभी स्वस्थ नहीं हो सकता। चंद्रभाल की दर्द भरी स्थिति देखकर उसे विश्वास हो चला था कि यदि इसके दिल में समाया दर्द कम नहीं होगा तो स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता ही जाएगा। ‘

अंशु कमरे से बाहर निकलने के बाद कुछ देर तक बरामदे में एक खंभे के समीप खड़ी हो गई थी। अस्पताल छोड़ने से पहले उसने अपने आंसू पोंछे। अपनी स्थिति संभाली और जब चलने को हुई तो वहां से उसके पिताजी आ गए थे।

___ 'बेटी!' अपनी लाडली को समझाते हुए वह कह रहे थे,

'इस प्रकार अपना दिल छोटा मत करो। थोड़ा साहस से काम लो। मेरा विश्वास करो, चंद्रभाल केवल तुम्हारा नहीं हुआ तो रजनी भी उसकी कभी नहीं बन सकेगी। इस बात का मैं तुम्हें वचन देता हूं बेटी!'

'उफ अंशु ने अपने पिताजी को समझा देना चाहा कि अब उसमें चंद्रभाल को प्राप्त करने की इच्छा जरा भी नहीं है। चंद्रभाल को प्राप्त करके वह करेगी भी क्या, जिसकी सांसों में रजनी ही रजनी रची हुई है, आंखों में रजनी की छवि बसी हुई है तथा होंठों पर रजनी का नाम लिखा हुआ है। क्या उसे कभी ऐसा स्थान प्राप्त हो सकता है? आखिर उसे इन दो प्रेमियों के बीच दीवार बनने का क्या अधिकार है? किसी के मजार पर अपनी खुशियों का महल नहीं बनाया जाता। वह चंद्रभाल को चंद्रभाल की इच्छा के विरुद्ध कभी भी स्वीकार नहीं कर सकेगी। उसने अपने पिताजी को समझाने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी अपनी ओर मार्तण्ड सिंह को आता देखकर वह खामोश हो गई।
 
मार्तण्ड सिंह कमरे से निकलने के बाद सीधे यही आए थे। अंशु तथा निर्भय सिंह को देख उनके क्रोध में कुछ कमी आई। अंशु की तड़पती स्थिति पर ध्यान दिया तो स्वयं भी तड़प उठे। आखिर इस बच्ची का क्या दोष है,

हरसिंगार जो इसे झूठ दिलासे में रखकर वह इतनी बड़ी सजा उठाने पर विवश कर रहे हैं? इसमें कोई संदेह नहीं की अंशु जैसी बहू उन्हें नहीं मिल सकती थी। उनके मूर्ख बेटे की वास्तविकता जानने के बावजूद अंशु उसे प्यार किए जा रही थी। उनके घर की लक्ष्मी बनने की वह इच्छुक थी। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि उसके निःस्वार्थ प्यार से लाभ उठाकर वे उसे तड़पने पर विवश करें, रोने पर विवश करें।

उन्होंने अंशु को अपने बंधन से स्वतंत्र कर देना चाहा। आखिर कब तक वह उसे चंद्रभाल को प्राप्त करने की दिलासा देते रहेंगे। परन्तु फिर उन्होंने ऐसा करने यानी अंशु से कुछ कहने या उसे निराश करने का साहस नहीं किया। उन्होंने स्वयं ही तो अंशु को विश्वास दिलाया था कि उसका प्यार साकार होकर रहेगा। उन्होंने ही तो अंशु को अपने घर की लक्ष्मी बनने का स्वप्न दिखाया था। अब क्या वह अपने वचन से इतनी जल्दी पलट जाएं। क्या वह ऐसा करते हुए अंशु तथा निर्भय सिंह की दृष्टि में नहीं गिर जाएंगे? क्या इन्हें उनकी बात का अफसोस नहीं होगा? क्या इन्हें उनसे घृणा नहीं हो जाएगी? क्या शादी-ब्याह एक खेल-तमाशा है, जिसे करने का वायदा उन्होंने कल दे दिया और आज तोड़ दिया?

उन्होंने असहायता प्रकट करते हुए कहा, 'बेटी, मैं जानता हूं इस समय तेरे दिल पर क्या बीत रही है, परन्तु मैं तुझे विश्वास दिलाता हूं कि ये बातें जो तूने अभी चंद्रभाल के होंठों से सुनी, केवल उसके होंठों की हैं। दिल का इसमें जरा भी लगाव नहीं है। यह उसका बचपना है-दीवानापन है। इस बात का उसे स्वयं भी आभास हो जाएगा-बहुत शीघ्र ही। बेटी, जब कोई बात अपनी सीमा से बाहर हो जाती है तो अंत अपने-आप हो जाता है। यह प्रकृति का नियम है।'

अंशु ने उन्हें भी समझा देना चाहा कि बचपना ही प्यार की नींव है, दीवानापन ही प्यार की सीमा है परन्तु इस विषय पर बात करके उसने अब अपना मन और खराब करना उचित नहीं समझा। अपने असफल प्यार का परिणाम देखकर उसके दिल में चुभन हो रही थी। यहां उसका दम घुट रहा था, इसलिए वह पलटी और अस्पताल से बाहर जाने वाले रास्ते पर बढ़ गई।

अंशु को इस प्रकार अचानक जाते देखकर मार्तण्ड सिंह ने निर्भय सिंह को देखा-अब?

'सब ठीक हो जाएगा।' निर्भय सिंह ने मार्तण्ड सिंह के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, 'अंशु अभी बच्ची है। धीरे-धीरे समझ जाएगी।' निर्भय सिंह को संतोष था कि मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी अंशु की भावनाओं का इतना अधिक ध्यान रखते हैं।

कुछ देर बाद अस्पताल में चंद्रभाल के मित्रों का आना शुरू हो गया। मार्तण्ड सिंह के परिचित लोग भी आने लगे। चंद्रभाल की दुर्घटना की सूचना उनके जानने वालों में जंगली आग की तरह फैल गई थी। पिछले दिन चंद्रभाल के कोठी से गुम रहने पर उसकी माताजी ने चंद्रभाल के जिन-जिन मित्रों से फोन द्वारा उसके विषय में पूछताछ की थी, उनमें से कुछ ने आज सुबह से कोठी पर फोन करके चंद्रभाल के लिए पूछते हुए अपनी चिन्ता प्रकट की थी। कुछ मित्रों ने चंद्रभाल के अस्पताल पहुंचने के बाद भी कोठी में फोन किया था और उन्हें चंद्रभाल की दुर्घटना वाली बात ज्ञात हो गई थी। कुछ मित्र चंद्रभाल को पूछने उसकी कोठी भी पहुंच गए थे। वहां जब नौकरों से दुर्घटना की बात मालूम करते-करते रजनी की बात भी आग गई तो मित्रों पर रजनी तथा चंद्रभाल के प्रेम का भेद खुल ही गया था। फिर एक से दूसरे तथा दूसरे से तीसरे मित्र तक पहुंचते-पहुंचते यह बात मार्तण्ड सिंह के परिचित लोगों में भी फैल गई थी।

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चंद्रभाल की इस पसंद पर सभी को आश्चर्य था। अंशु से सबको सहानुभूति हो गई थी। अस्पताल के कमरे में बैठकर जब मार्तण्ड सिंह के मित्र यह बात छेड़ते तो उन्हें ऐसा लगता था, मानो सब मिलकर उन पर कीचड़ उछाल रहे हों। बात थी ही कीचड़ उछालने वाली। चंद्रमाल ने एक नौकर की बेटी से प्रेम करके इस समय अपनी जो हालत बना ली थी, उस पर कौन नहीं हंसता? चंद्रभाल की। माताजी भी रजनी पर मन-ही-मन बल खाकर रह जाती थीं, जिसके कारण आज सारे शहर को उन पर हंसने का अवसर मिल रहा था। रजनी को लेकर जब बातें अधिक बढती तो निर्भय सिंह स्पष्ट शब्दों में उस विषय पर बातें करने से मना कर देते थे। तब मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी निर्भय सिंह की सराहना किए बिना नहीं रहते थे। रजनी का विषय समाप्त करके निर्भय सिंह मानो उन्हें सबके सामने लज्जित होने से बचा लेते थे। मार्तण्ड सिंह ने सोच लिया था कि चंद्रभाल के स्वस्थ होते-होते वह उसे ऐसी शर्त रखकर झुकाएंगे, जिससे वह कभी इंकार नहीं कर सकेगा।

उनकी धर्मपत्नी भी कुछ ऐसी ही बातें सोच रही थी। परन्तु चंद्रभाल अपने माता-पिता के विचारों से अज्ञात अपनी ही धुन में अटल था। उसके प्यार के रास्ते में अब कोई नहीं आ सकता। वह अपनी रजनी को प्राप्त करके ही रहेगा। इस बार जब वह रजनी को लेकर आएगा तो ऐसी घटना नहीं घटेगी।
 
चंद्रभाल कभी सोच भी नहीं सकता था कि उस अपहरण के पीछे निर्भय सिंह जैसे व्यक्ति का भी हाथ हो सकता था। निर्भय सिंह ने रजनी के विषय में किसी प्रकार की शिकायत नहीं की थी। इसके अतिरिक्त निर्भय सिंह के सामने अपनी सुन्दर बेटी के लिए लड़कों की कमी भी क्या थी? चंद्रभाल की दृष्टि में निर्भय सिंह के पास सभी कुछ तो था-धन, प्रतिष्ठा। ऐसे कुल की लड़की को कौन अपने घर की लक्ष्मी बनाना नहीं पसंद करता? उसके माता-पिता स्वयं भी अंशु को चाहते हैं। वह भी अंशु को दिल की रानी बना लेता यदि उसे रजनी से प्यार नहीं हो गया होता।

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एक सप्ताह हो गया-चंद्रभाल को अस्पताल में भर्ती हुए। उसके सिर का घाव भरने लगा। कभी-कभी अचानक चक्कर-सा आ जाता तो उसकी आंखों के सामने अंधकार छा जाता था। 'ब्रेन हैमरेज' होने से बच गया था, वरना वह तो पागल ही हो जाता। दुर्घटना में उसकी छाती पर भरपूर लात पड़ी, इसलिए छाती में भी दर्द उठ जाता था। मार्तण्ड सिंह सुबह-शाम अपने बेटे को देखने आ जाते थे। चंद्रभाल उन्हें देखता तो दृष्टि दूसरी ओर कर लेता। ऐसा न हो कि पिताजी रजनी का विषय ले बैठे। मार्तण्ड सिंह रजनी का विषय उठाना चाहते थे, परन्तु अभी उसका समय नहीं आया था। वह प्रतीक्षा में थे कि उनका बेटा स्वस्थ हो जाए तो उसे समाज की ऊंच-नीच की बातें समझाकर, कुल की मान-मर्यादा का वास्ता देकर तथा मूल्यवान जीवन का मूल्य बताकर सही रास्ते पर ले आएं। चंद्रभाल की मांजी रात में उसी के कमरे में सोती थीं। दिन के समय उसे नौकरों पर छोड़कर वह कोठी चली जाती थीं। चंद्रभाल के मित्र तो उसे देखने आते ही रहते थे, परन्तु निर्भय सिंह के साथ अंशु भी आने पर विवश थीं-अपने पिता की आज्ञा के कारण। चंद्रभाल अंशु की आखों का सूनापन देखता तो उसके दिल में टीस उठती। वह सोचने पर विवश हो जाता कि इस लड़की को उससे अब भी क्यों आशा बंधी हुई है। परन्तु अंशु को उससे अब कोई आशा नहीं थी। वह तो मानो अपने पिता की आज्ञा पर अपना एक कर्तव्य पूरा करने के लिए आती थी। चंद्रभाल से वह एक भी बात नहीं करती थी। चंद्रभाल ही उससे बातें कर लेता था, उसके स्वास्थ्य के विषय में पूछ लेता था। वह अवसर की तलाश में रहता कि अंशु से एकांत में क्षमा मांग लें, उसे समझा दे कि वह रजनी को प्यार करता है, स्वस्थ होते ही वह उसके पास चला जाएगा, इसलिए वह उसकी आशा छोड़ दे। उसे क्या पता था कि अंशु उससे पहले ही आशा छोड़ बैठी है। एक दिन चंद्रभाल को देखने उसकी फैक्टरी का ट्रक चालक आया। वही ट्रक-चालक जो उसे रजनी तथा बाबा के साथ कोठी पहुंचा गया था। तब कमरे में मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी नही थे।

वही केवल एक नौकर था। ट्रक-चालक ने हाथ जोड़कर नमस्ते करने के बाद चंद्रभाल से उसके स्वास्थ्य के विषय में पूछा। फिर उससे क्षमा मांगते हुए जब उसने बताया कि उसी के ट्रक से टकराकर उसकी यह स्थिति हुई थी तो चंद्रभाल चौंक गया। कुछ सोचकर उसने कमरे में पहले से उपस्थिति नौकर को बाहर जाने का हुक्म दिया। वह चला गया तो चंद्रभाल ने पूछा, 'तो क्या तुम्हीं मुझे अस्पताल में पहुंचा गए थे?'

'अस्पताल में नहीं मालिक, मैं तो आपको कोठी ले गया था।' ट्रक-चालक ने कहा।

चंद्रभाल ने एक क्षण सोचा। फिर पूछा, 'तुम्हारे साथ रजनी भी आई थी

'रजनी?'

'हां, वह लड़की, जिसे तुमने मेरे लिए रोते देखा होगा।' चंद्रभाल ने कहा।

__ 'रोते नही मालिक, तड़पते देखा था-छाती पीट-पीटकर।' ट्रक-चालक ने कहा, 'उसकी स्थिति मुझसे देखी नहीं जाती थी मालिक! जब मैं कार में आपको लेकर चला तो सारे रास्ते वह आपकी छाती से लिपटी आंसू बहाती रही, परन्तु कोठी पर पहुंचते ही मालकिन ने...।' ट्रक-चालक अपनी मालकिन की शिकायत मालिक के बेटे से करने का साहस नहीं कर सका तो चुप हो गया।

'मालकिन ने क्या कहा उससे?' चंद्रभाल की चिन्ता बढी। रजनी की स्थिति का अनुमान लगाकर उसका दिल तड़प उठा। उसने ट्रक-चालक को पूरी बात करने पर उत्साहित किया।
 
ट्रक-चालक सकुचाया, परन्तु फिर उसने एक-एक बात बता दी! हर वह बात, जो चद्रभाल की माताजी ने रजनी को धिक्कारते हुए कही थी तथा किस प्रकार उसे अपमानित किया था। चंद्रभाल ने सुना तो मां की क्रूरता पर उसे विश्वास नहीं हुआ। मां को यदि ऐसा ही व्यवहार करना था तो उन्होंने उसे वचन क्यों दिया था कि वह रजनी के विषय में पिताजी से बात करेंगी? प्रकट था कि उसे उन्होंने कोठी से जाने से केवल इसीलिए बहलाकर रोका था, ताकि वह रजनी से दूर रहकर उसे भूल जाए या उसका विचार छोड़ दे। ट्रक-चालक कह रहा था, 'मैंने मालकिन को बताना भी चाहा कि आप मेरे ट्रक से घायल हुए हैं, उस लड़की का इसमें कोई दोष नहीं, परन्तु मुझे किसी ने कुछ कहने का अवसर ही नहीं दिया।'

चंद्रभाल मन-ही-मन क्रोध में बल खाने लगा। जिस समय मां रजनी को इस प्रकार धिक्कार रही थीं, उस समय वह घायल स्थिति में भी होश में होता, तब क्या होता? अवश्य ही उसका दम न निकल जाता? मां की बातों पर ध्यान देकर चंद्रभाल का दम घुटने लगा।

उस शाम जब मां तथा पिताजी आए तो चंद्रभाल क्षण भर के लिए भी स्वयं को नहीं रोक सका। माता-पिता के पीछे-पीछे नौकर भी था-एक हाथ में टिफिन कैरियर लिए तथा दूसरे हाथ में दूध का थर्मस लटकाए। एक नौकर पहले ही कमरे में उपस्थित था। परन्तु चंद्रभाल ने उनकी उपस्थिति का ध्यान नहीं रखा। मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी अभी कुर्सियों पर ठीक से बैठे भी नहीं थे कि चंद्रभाल ने उठकर बैठते हुए कहा, 'मां, रजनी जब मुझे कोठी पर लेकर आई थी तो उस समय क्यों तुमने उस पर गंदे-गंदे दोष लगाए? क्या अधिकार था तुम्हें ऐसा कहने का?'

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रजनी का नाम सुनकर मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी भड़क उठे। उनके आते ही बेटे ने किस पापिन का नाम ले लिया। अवश्य ही किसी नौकर ने यहां आकर उनकी कही बातें चंद्रभाल को बता डाली हैं। मार्तण्ड सिंह ने चंद्रभाल को घूरकर देखा। लड़का हाथ से निकला जा रहा है। अब उनकी उपस्थिति का भी ध्यान नहीं करता। उनकी धर्मपत्नी कह रही थी, 'मेरा अधिकार तू मुझे बताने चला है?

क्यों न कहूं मैं उसे, जिसने मेरे खानदान की मान-मर्यादा मिट्टी में मिला दी है?'

'मां, तुम्हें जो कुछ कहना था, मुझसे कहतीं। उसे तुमने क्यों कहा?' चंद्रभाल ने कहा, 'उसे मैं लेकर आ रहा था। वह अपने-आप नहीं आई थी।

'वह अपने आप आये या तुम उसे लेकर आओ, हमें इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।' सहसा उसके पिताजी ने कहा, 'इस बार तो हमने उसे जाने दिया, परन्तु आइंदा उसने हमारी कोठी के मुख्यद्वार में भी कदम रखने का साहस किया तो उसके लिए बहुत बुरा होगा।' मार्तण्ड सिंह ने उसे सावधान किया।

'पिताजी!' चंद्रभाल ने जोश में कहना चाहा, परन्तु फिर स्वयं पर काबू पाते हुए धैर्य से बोला, ठीक है पिताजी, अब वह आपकी कोठी पर कभी नहीं आएगी और अब आप मुझे भी अपनी कोठी में कदम रखते हुए कभी नहीं देखेंगे।' 'क्या हमने तुम्हें इसीलिए पाल-पोसकर इतना बड़ा किया था कि एक दिन तुम उस कमीनी और नीच लड़की के लिए हमें छोड़कर चले जाओ?' मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी ने कहा।

'मां!' चंद्रभाल मां पर चीखते-चीखते रह गया। अपने-आप पर काबू पाते हुए उसने कहा, 'मां, उसे इतनी गंदी बातें मत कहो...मां!' 'कहूंगी और हजार बार कहूंगी।' मां ने धृणा से रजनी पर दांत पीसते हुए कहा, 'जिस नागिन ने हमारे घर का सुख-चैन डंस लिया, उसे मैं जो भी कहूं कम है। वह नमकहराम है, नीच है, कमीनी...।'

चंद्रभाल से रजनी के लिए इतनी गंदी बातें सहन नहीं हो सकीं। मां की बातें उसके कानों में पिघले सीसे के समान उतरने लगीं तो उसे ऐसा लगा, मानो कानों के पर्दे फट जाएंगे। अपने कानों पर हथेलियां रखकर एक झटके से खड़े होते हुए वह चीख पड़ा, 'मां!' उसने मानो अपनी मां को डांट दिया था।

उसकी चीख सुनकर अपनी बात अधूरी छोड़ते हुए उसकी मां भी क्रोध में एक झटके के साथ खड़ी हो गई थीं। जिस संतान को उन्होंने अपनी कोख से जन्म दिया, अपना रक्त पिला-पिलाकर पाला-पोसा, जिसकी हर इच्छा को पूरा किया, इस उम्र को पहुंचाया, आज उसी संतान ने एक तुच्छ लड़की के पीछे अपनी मां को डांट दिया, उस पर क्रोध में चीख पड़ा और वह भी उनके नौकरों के सामने! मां से इतना बड़ा अपमान सहन नहीं हो सका तो उनका शरीर कांपने लगा।
 
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