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शाम के समय जब अंशु ने फोन द्वारा पता चलाया कि चंद्रभाल कोठी अब तक नहीं लौटा है तो उसका दिल एक परिचित भय के कारण धड़क उठा था। फिर रात को उन्हें जब दोबारा कोठी से फोन द्वारा पता चला कि चंद्रभाल का कोई पता नहीं चला तो उनके दिल की धड़कनों ने ही उन्हें बता दिया था कि चंद्रभाल इस समय कहां जा सकता है। मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी को बढ़ते अंधकार के साथ संदेह होने लगा था कि चंद्रभाल कुल की मान-मर्यादा ठुकराकर रजनी के पास भाग गया हैं-शायद रजनी को साथ लाने के लिए...साथ लाकर उनके सामने प्रस्ताव रखने के लिए कि वे रजनी को स्वीकार करते हैं या नहीं। स्वीकार नहीं करेंगे तो वह रजनी के साथ सदा के लिए कोठी छोड़ देगा। रजनी के लिए एक बार पहले भी तो उनका बेटा कोठी छोड़ने को तैयार हो गया था। विवश होकर मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी हाथ मलते रह गए थे। रजनी को कोसते तथा धिक्कारते हुए उनकी जुबान नहीं थकती थी। एक दो कौड़ी की लड़की ने उनके घर के शांति भंग कर रखी थी।
परन्तु मार्तण्ड सिंह तुले बैठे थे कि बेटा घर छोड़ता है तो छोड़े, परन्तु वह रजनी को अपनी बहू के रूप में कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्हें अपनी मान-मर्यादा प्यारी थी, अपने कुल की इज्जत प्यारी थी, अपना वह वचन प्यारा था, जो उन्होंने निर्भय सिंह तथा अंशु को दिया था। अपने बेटे की दीवानगी देखकर उनकी धर्मपत्नी की समझ में नहीं आ रहा था कि वह रजनी से उसका पीछा कैसे छुड़ाए। जिस ध्येय से उन्होंने बेटे को पिछली बार घर छोड़ने से रोका था, उसके पूरा होने की संभावना जाती रही थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जब बेटा रजनी को लेकर आएगा तो वह उससे क्या बातें करेंगी। उन्होंने बेटे का निर्णय अपने पति पर छोड़ दिया था। इसके अतिरिक्त वह कर भी क्या सकती थी?
उधर पिछली रात जब खाने की मेज पर अंशु नहीं आई थी तथा खाना खाने से इंकार करते, हुए उसने स्वास्थ्य ठीक न होने का बहाना बना दिया था तो निर्भय सिंह उसके कमरे में पहुंच गए थे। बेटी का मुखड़ा उदास देखा तो चिन्तित हो उठे थे। उसकी उदासी निर्भय सिंह को भेद भरी लगी थी। जब उन्होंने अपनी बेटी से पूछा तो अपने पिता की छाती पर सिर रखकर अंशु सिसक उठी थी। पिता का सहारा मिला तो अंशु ने सिसकियों के मध्य उन्हें चंद्रभाल के विषय में सब-कुछ बताकर अपने दिल का भय प्रकट कर दिया था-ऐसा न हो कि चंद्रभाल रजनी से विवाह करके उसे लाने गया हो।
बेटी की बात सुनकर निर्भय सिंह सन्न रह गए थे। यदि चंद्रभाल ने रजनी के गांव जाकर उससे वास्तव में विवाह कर लिया, तब क्या होगा? हां, तब क्या होगा? रजनी को उन्होंने मन-ही-मन खूब गंदी बातें कहना आरंभ कर दिया था। उनकी मान-मर्यादा उनका भविष्य तथा बेटी का सुखमय जीवन, उसकी प्रसन्नताएं केवल चंद्रभाल पर निर्भर कर रही थीं। उन्हें चंद्रभाल के इस प्रकार रजनी के पास भाग निकलने की आशा जरा भी नहीं थी। कुछ सोचकर उन्होंने बेटी को विश्वास दिला दिया था कि यदि चंद्रभाल का विवाह होगा तो केवल उसी के साथ और किसी के साथ कभी नहीं होगा। परन्तु अंशु ने अपने पिता से जरा भी आशा नहीं बांधी थी। उसे चंद्रभाल से सच्चा प्यार था, इसलिए उसने चंद्रभाल की प्रसन्नताओं पर अपनी प्रसन्नताएं भेंट चढ़ा देने का निश्चय कर लिया था। उसने सोच लिया था कि अब चंद्रभाल से कभी नहीं मिलेगी, परन्तु उसका प्यार अपने दिल से कभी अलग नहीं करेगी। वही उसका पहला प्यार था, कही उसका अंतिम प्यार रहेगा। नारी का केवल एक ही प्यार उसके जीवन भर के लिए बहुत होता है। चंद्रभाल का प्यार अपने दिल में बसाए वह अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत कर देगी। पिछली रात वह चंद्रभाल के बिछड़ने के गम में आंसू बहाती रही थी और सोचती रही थी कि ऐसी स्थिति में चंद्रभाल को प्राप्त करने से लाभ भी क्या, जब उसका दिल केवल रजनी के लिए ही सुरक्षित है? परन्तु निर्भय सिंह चंद्रभाल की ओर से तब भी निराश नहीं हुए थे। सारी रात वह इसी उलझन में डूबे हुए थे कि किस प्रकार रजनी को सदा के लिए चंद्रभाल के जीवन से अलग करें और सुबह होते ही उन्होंने मार्तण्ड सिंह से फोन द्वारा बात की थी। उन्होंने दिल का कपट छिपाते हुए पूछा था, 'अरे भई, चंद्रभाल आया कि नहीं?'
'अभी तक तो नहीं आया।' मार्तण्ड सिंह ने उत्तर दिया था।
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह रजनी के पास चला गया हो?'
मुझे भी यही संदेह है।' मार्तण्ड सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था।
यदि उसने रजनी से वहां विवाह कर लिया, तब क्या होगा ?'
'तब मैं उसे कोठी में दाखिल नहीं होने दूंगा।' मार्तण्ड सिंह ने दृढ़ शब्दों में कहा था, 'उसे मैं कोठी से सदा के लिए निकाल बाहर करूंगा।'
'हू।' निर्भय सिंह एक गहरी सांस लेकर चुप हो,गए थे। सोचने लगे थे कि चंद्रभाल को कोठी से निकालने में उनका अपना क्या लाभ होगा? उन्होंने पूछा था, 'चंद्रभाल के लौटने की संभावना है?
'पूरी संभावना है। मुझसे तो दूर, वह अपनी मां से भी मिले बिना चला गया है और साथ में, मेरी बड़ी गाड़ी भी ले गया है इसलिए वह एक बार तो अवश्य ही यहां आएगा और वह भी रजनी को साथ लेकर-हमारे सामने प्रस्ताव रखने कि...।'
कि तुम रजनी को अपनी बहू स्वीकार करते हो या नहीं?' निर्भय सिंह ने मार्तण्ड सिंह की बात काटते हुए बहुत गंभीर स्वर में पूछा था।
'हां।' मार्तण्ड सिंह ने फूलती सांसों के साथ अपना वचन निभाते हुए कहा था, 'परन्तु तुम जानते हो कि मैं उस नीच लड़की को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता।'
निर्भय सिंह मार्तण्ड सिंह पर खिसियाकर रह गए थे। मार्तण्ड सिंह का रजनी को अस्वीकार करने का यह अर्थ तो नहीं कि चंद्रभाल रजनी को छोड़कर अंशु से विवाह कर लेगा। अपने भविष्य तथा बेटी के सुखमय जीवन पर खतरा बना देखकर उनका मन हुआ था कि वह मार्तण्ड सिंह को दो-चार गालियां सुना डालें। उन्होंने मन-ही-मन एक योजना बनाते हुए भेद भरे ढंग से पूछा था, 'चंद्रभाल के लौटने की संभावना कब तक की जा सकती है?,
__ 'यदि कुसुम्पटी से वह चल दिया होगा तो उसे आज यहां किसी भी समय पहुंच जाना चाहिए।'
'कुसुम्पटी?'
'रजनी कुसुम्पटी में ही रहती है ना?' मार्तण्ड सिंह ने कहा था।
'ओह!' निर्भय सिह सोच में डूब गए थे। फिर इसके बाद उन्होंने बात समाप्त कर दी थी। रजनी का पूरा पता पूछकर वह किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न नहीं करना चाहते थे।
परन्तु मार्तण्ड सिंह तुले बैठे थे कि बेटा घर छोड़ता है तो छोड़े, परन्तु वह रजनी को अपनी बहू के रूप में कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्हें अपनी मान-मर्यादा प्यारी थी, अपने कुल की इज्जत प्यारी थी, अपना वह वचन प्यारा था, जो उन्होंने निर्भय सिंह तथा अंशु को दिया था। अपने बेटे की दीवानगी देखकर उनकी धर्मपत्नी की समझ में नहीं आ रहा था कि वह रजनी से उसका पीछा कैसे छुड़ाए। जिस ध्येय से उन्होंने बेटे को पिछली बार घर छोड़ने से रोका था, उसके पूरा होने की संभावना जाती रही थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जब बेटा रजनी को लेकर आएगा तो वह उससे क्या बातें करेंगी। उन्होंने बेटे का निर्णय अपने पति पर छोड़ दिया था। इसके अतिरिक्त वह कर भी क्या सकती थी?
उधर पिछली रात जब खाने की मेज पर अंशु नहीं आई थी तथा खाना खाने से इंकार करते, हुए उसने स्वास्थ्य ठीक न होने का बहाना बना दिया था तो निर्भय सिंह उसके कमरे में पहुंच गए थे। बेटी का मुखड़ा उदास देखा तो चिन्तित हो उठे थे। उसकी उदासी निर्भय सिंह को भेद भरी लगी थी। जब उन्होंने अपनी बेटी से पूछा तो अपने पिता की छाती पर सिर रखकर अंशु सिसक उठी थी। पिता का सहारा मिला तो अंशु ने सिसकियों के मध्य उन्हें चंद्रभाल के विषय में सब-कुछ बताकर अपने दिल का भय प्रकट कर दिया था-ऐसा न हो कि चंद्रभाल रजनी से विवाह करके उसे लाने गया हो।
बेटी की बात सुनकर निर्भय सिंह सन्न रह गए थे। यदि चंद्रभाल ने रजनी के गांव जाकर उससे वास्तव में विवाह कर लिया, तब क्या होगा? हां, तब क्या होगा? रजनी को उन्होंने मन-ही-मन खूब गंदी बातें कहना आरंभ कर दिया था। उनकी मान-मर्यादा उनका भविष्य तथा बेटी का सुखमय जीवन, उसकी प्रसन्नताएं केवल चंद्रभाल पर निर्भर कर रही थीं। उन्हें चंद्रभाल के इस प्रकार रजनी के पास भाग निकलने की आशा जरा भी नहीं थी। कुछ सोचकर उन्होंने बेटी को विश्वास दिला दिया था कि यदि चंद्रभाल का विवाह होगा तो केवल उसी के साथ और किसी के साथ कभी नहीं होगा। परन्तु अंशु ने अपने पिता से जरा भी आशा नहीं बांधी थी। उसे चंद्रभाल से सच्चा प्यार था, इसलिए उसने चंद्रभाल की प्रसन्नताओं पर अपनी प्रसन्नताएं भेंट चढ़ा देने का निश्चय कर लिया था। उसने सोच लिया था कि अब चंद्रभाल से कभी नहीं मिलेगी, परन्तु उसका प्यार अपने दिल से कभी अलग नहीं करेगी। वही उसका पहला प्यार था, कही उसका अंतिम प्यार रहेगा। नारी का केवल एक ही प्यार उसके जीवन भर के लिए बहुत होता है। चंद्रभाल का प्यार अपने दिल में बसाए वह अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत कर देगी। पिछली रात वह चंद्रभाल के बिछड़ने के गम में आंसू बहाती रही थी और सोचती रही थी कि ऐसी स्थिति में चंद्रभाल को प्राप्त करने से लाभ भी क्या, जब उसका दिल केवल रजनी के लिए ही सुरक्षित है? परन्तु निर्भय सिंह चंद्रभाल की ओर से तब भी निराश नहीं हुए थे। सारी रात वह इसी उलझन में डूबे हुए थे कि किस प्रकार रजनी को सदा के लिए चंद्रभाल के जीवन से अलग करें और सुबह होते ही उन्होंने मार्तण्ड सिंह से फोन द्वारा बात की थी। उन्होंने दिल का कपट छिपाते हुए पूछा था, 'अरे भई, चंद्रभाल आया कि नहीं?'
'अभी तक तो नहीं आया।' मार्तण्ड सिंह ने उत्तर दिया था।
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह रजनी के पास चला गया हो?'
मुझे भी यही संदेह है।' मार्तण्ड सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था।
यदि उसने रजनी से वहां विवाह कर लिया, तब क्या होगा ?'
'तब मैं उसे कोठी में दाखिल नहीं होने दूंगा।' मार्तण्ड सिंह ने दृढ़ शब्दों में कहा था, 'उसे मैं कोठी से सदा के लिए निकाल बाहर करूंगा।'
'हू।' निर्भय सिंह एक गहरी सांस लेकर चुप हो,गए थे। सोचने लगे थे कि चंद्रभाल को कोठी से निकालने में उनका अपना क्या लाभ होगा? उन्होंने पूछा था, 'चंद्रभाल के लौटने की संभावना है?
'पूरी संभावना है। मुझसे तो दूर, वह अपनी मां से भी मिले बिना चला गया है और साथ में, मेरी बड़ी गाड़ी भी ले गया है इसलिए वह एक बार तो अवश्य ही यहां आएगा और वह भी रजनी को साथ लेकर-हमारे सामने प्रस्ताव रखने कि...।'
कि तुम रजनी को अपनी बहू स्वीकार करते हो या नहीं?' निर्भय सिंह ने मार्तण्ड सिंह की बात काटते हुए बहुत गंभीर स्वर में पूछा था।
'हां।' मार्तण्ड सिंह ने फूलती सांसों के साथ अपना वचन निभाते हुए कहा था, 'परन्तु तुम जानते हो कि मैं उस नीच लड़की को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता।'
निर्भय सिंह मार्तण्ड सिंह पर खिसियाकर रह गए थे। मार्तण्ड सिंह का रजनी को अस्वीकार करने का यह अर्थ तो नहीं कि चंद्रभाल रजनी को छोड़कर अंशु से विवाह कर लेगा। अपने भविष्य तथा बेटी के सुखमय जीवन पर खतरा बना देखकर उनका मन हुआ था कि वह मार्तण्ड सिंह को दो-चार गालियां सुना डालें। उन्होंने मन-ही-मन एक योजना बनाते हुए भेद भरे ढंग से पूछा था, 'चंद्रभाल के लौटने की संभावना कब तक की जा सकती है?,
__ 'यदि कुसुम्पटी से वह चल दिया होगा तो उसे आज यहां किसी भी समय पहुंच जाना चाहिए।'
'कुसुम्पटी?'
'रजनी कुसुम्पटी में ही रहती है ना?' मार्तण्ड सिंह ने कहा था।
'ओह!' निर्भय सिह सोच में डूब गए थे। फिर इसके बाद उन्होंने बात समाप्त कर दी थी। रजनी का पूरा पता पूछकर वह किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न नहीं करना चाहते थे।