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Thriller इंसाफ

“भई, इसका बेहतर जवाब तो ऐसा भौंकने वाला ही दे सकता है । हो सकता है दोस्ती बराबर उंस वाली न हो । जितना शरद उसे अपना दोस्त समझता हो, उतना वो शरद को नहीं समझता होगा और ये बात शरद से बड़ी चालाकी से छुपाकर रखता होगा ।”

“हो सकता है ।”

उसने अपना मग खाली किया और कलाई घड़ी पर निगाह डाली ।

“एक आखिरी सवाल ।” - मैं जल्दी से बोला - “सार्थक के घर तुम्हारा आना जाना अक्सर होता था ?”

“होता तो था !”

“उसकी घर में गैरमौजूदगी में भी ?”

“तुम्हारा मतलब है श्यामला से मिलने ?”

“यही समझ लो ।”

“नहीं । ऐसा इत्तफाक तभी होता था जब श्यामला खुद मुझे बुलाती थी । वो मुझे फोन करके बुलाती थी, मैं जाता था तो मालूम होता था कि सार्थक घर पर नहीं था ।”

“बुलावे की वजह क्या होती थी ?”

“कोई खास नहीं । कभी कभार कोई काम होता था जो वो समझती थी कि मैं सार्थक से बेहतर कर सकता था या मैं ही कर सकता था । कभी मां का हाल चाल जानने के लिए बुलाती थी । कभी ये शिकवा करने के लिए बुलाती थी कि हम लोग उनसे मिलते जुलते नहीं थे ।”

“कत्ल की रात को भी उसका बुलावा था ? उसके बुलावे पर तुम वहां गये थे ?”

“नहीं ।” - वो सहज भाव से बोला ।

“पक्की बात !”

“हां ।”

वार्तालाप उससे आगे न चला ।

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अमरनाथ परमार की कोठी एक फार्म हाउस में थी और सैनिक फार्म्स के इलाके के उस हिस्से में थी जहां और भी छोटे बड़े कई फार्म थे । फार्म को सड़क से अलग करता एक विशाल फाटक था जो उस घड़ी बन्द था । बन्द फाटक के बाजू में वाचमैन बॉक्स था ।

मैंने कार का हार्न बजाया ।

एक वर्दीधारी वाचमैन बॉक्स से निकलकर मेरे करीब पहुंचा ।

“परमार साहब घर पर हैं ?” - मैंने पूछा ।

“आप कौन ?” - वाचमैन बोला ।

“उनका एक मुलाकाती ।”

“नाम बोलिए ।”

मैंने अपना एक विजिटिंग कार्ड उसे थमाया ।

“यहीं रुकिये ।” - वो बोला और वापिस चला गया ।

मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा ।

सिग्रेट समाप्त हुआ तो फाटक खुला और उसका एक पल्ला थामे वाचमैन मुझे दिखाई दिया । उसने हाथ हिला कर मुझे इशारा किया ।

तत्काल मैंने कार आगे बढ़ाई । फाटक के पार एक लम्बी राहदारी थी जिसके दोनों तरफ पेड़ थे और रंग बिरंगे फूलों की क्यारियां थीं । आगे राहदारी अर्धवृत्ताकार में घूमी, फिर मुझे कोटा स्टोन की बनी वैभवशाली कोठी दिखाई दी । मैं उसकी पोर्टिको में पहुंचा तो कोठी के आगे की सीढ़ियों पर मुझे एक सूटधारी युवक खड़ा दिखाई दिया । मैं कार से बाहर निकला तो उसने मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया । उसके पीछे मैं कोठी के भीतर दाखिल हुआ तो मैंने स्वयं को एक डबल हाइट वाली लॉबी में पाया जो कि किसी फाइव स्टार होटल की तरह सुसज्जित थी ।

“यहां रुकिये ।” - वो बोला ।

फिर ‘रुकिये’ !

वो आगे बढ़कर पिछवाड़े के एक दरवाजे के पीछे गायब हो गया ।

मैंने मुंह बाये चारों तरफ निगाह दौड़ाई ।

क्या ठाठ थे ! क्या बादशाही थी ! क्या शाहखर्ची का ताजमहल जैसा इश्तिहार था !

किसी श्याने ने कहा है कि अमीर का किफायत से रहना जरूरी नहीं होता । उसको राज शर्मा का जवाब है कि जो किफायत से रह सकता हो, उसका अमीर होना भी जरूरी नहीं होता ।

तभी वहां का शाह और शाहजादा वहां पहुंचे ।

अमरनाथ परमार बलिष्ठ शरीर का स्वामी, साठ के पेटे में पहुंचा आदमी था, उसके बाल तमाम के तमाम सफेद थे लेकिन चेहरे पर रौनक थी, चमक थी । बालों के विपरीत उसके भवें और मूंछ काली थीं । जो चैक की शर्ट, नीली जींस और महरून पुलोवर पहले था । गले में उसने वैसे रेशमी स्कार्फ बांधा हुआ था जैसे फौजी अफसरान यूनीफार्म के साथ बांधते थे ।

उसके साथ जो नौजवान था, वो सूट पहने था, क्लीनशेव्ड था और उससे आधी उम्र का जान पड़ता था । फैमिली रिजेम्बलेस मुझे उसमें साफ दिखाई दी जो मेरे अन्दाजे की तसदीक करती थी कि वो उसका सुपुत्र शरद परमार था ।

मेरा विजिटिंग कार्ड उस घड़ी उसके हाथ में था ।

मैंने सीनियर परमार का अभिवादन किया ।

गर्दन के खम के साथ उसने मेरा अभिवादन स्वीकार किया, हाथ मिलाने की कोई पेशकश उसने न की ।

“यस ?” - वो भावहीन स्वर में बोला ।

“मेरा नाम राज शर्मा है” - मैं सादर बोला - “मैं प्राइवेट डिटेक्टिव हूं ।”

“वो तो तुम्हारे कार्ड पर भी दर्ज है ! चाहते क्या हो ? स्टेट युअर बिजनेस ।”

“वो क्या है कि...”

“किसी ऐसे केस पर काम कर रहे हो जिसमें हमारा कोई दखल है ?”

“जी हां ।”

“एक्सप्लेन ।”

“आप एडवोकेट विवेक महाजन से वाकिफ हैं ?”

“हां ।”

“मुझे उन्होंने रिटेन किया है ।”

“किसलिये ?”

“सार्थक बराल के केस पर काम करने के लिये ।”

“क्या काम करने के लिये ?”

“उसे बेगुनाह साबित करने का काम करने के लिये ।”

तत्काल उसका मिजाज बदला ।

पुत्र का भी ।

“वाट !” - वो कहरभरे स्वर में बोला - “तुम्हारी - एक कातिल के हिमायती की - यहां कदम रखने की जुर्रत हुई !”

“मुझे यकीन दिलाया गया है कि सार्थक आप की बेटी का कातिल नहीं है ।”

“आउट !” - बेटा बाप से भी ज्यादा कहरबरपा लहजे में फुंफकारा ।

वो नथुने फैलाता यूं आगे बढ़ा जैसे मुझे रौंदता हुआ गुजर जाने का इरादा रखता हो ।

बाप ने उसके रास्ते में बैरियर की तरह हाथ फैला कर उसे ऐसा कर पाने से रोका, फिर उसने भी जैसे सुपुत्र के साथ डुएट गाया - “गैट आउट दिस मिनट । एक मिनट में दफा हो जाओ वर्ना ट्रेसपासिंग के इलजाम में गिरफ्तार करा दूंगा ।”

“कैसी ट्रैसपासिंग ! मैं बाइजाजत यहां आया हूं ।”

“बोलना पुलिस को । अभी जाते हो या...”

“आपका भड़कना मेरी समझ से बाहर है । आपने जवान बेटी गंवाई है, आपका कातिल के लिए रोष समझ में आता है लेकिन आप इस अहम बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि अगर सार्थक कातिल नहीं है तो कातिल छुट्टा घूम रहा है । क्या आप नहीं चाहते कि असल कातिल जल्द-अज-जल्द कानून की गिरफ्त में दिखाई दे और...”

“गैट दि हैल आउट आफ हेयर डैम यू !” - शरद गर्जा ।

“दफा हो जाओ ।” - बाप ने सुर में सुर मिलाया ।

मैंने असहाय भाव से गर्दन हिलायी, मुझे कुछ कहने का मौका देना तो दूर, वो दोनों तो मुझे जुबान खोलने देने को तैयार नहीं थे ।

कूच करने के अलावा कोई चारा नहीं था । वहां फौजदारी होती तो अंतपंत उन्हीं की सुनी जाती । ऐसे ही तो कहा नहीं जाता कि अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर होता है ।

मैंने एक उंगली से पेशानी को छूकर बनावटी सैल्यूट मारा और घूमकर वापिस लौट चला ।

बाप बेटा मेरी पीठ पर निगाहों से भाले बर्छियां बरसाते रहे ।

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ।

लेकिन पीडी के धंधे में वो कोई बड़ी बात नहीं थी । दुलार और फटकार साथ साथ ही चलते थे ।

******************************************************************
 
मेरी सारे दिन की भागदौड़ ‘कोजी कार्नर’ में जाकर खत्म हुई ।

वो कनाट प्लेस में स्थित एक बार था जो शाम की तफरीह के लिये मेरा फेवरेट अड्डा था । रेगुलर होने की वजह से वहां मैं खूब जाना पहचाना जाता था और मेरा दर्जा वहां प्रिविलेज्ड कस्टमर का था ।

मैं बार पर पहुंचा और एक बार स्टूल पर काबिज हुआ ।

तत्काल काउन्टर की परली तरफ से बारमैन जुत्शी मेरे करीब पहुंचा । उसने यूं तपाक से मुझे सलाम ठोका कि काउन्टर पर बैठे जिन कस्टमर्स ने वो बात नोट की, वो हैरान दिखाई देने लगे ।

“वही ?” - जुत्शी बोला ।

‘वही’ से उसका इशारा रैड लेबल की तरफ था । लेकिन जब मैं फीस कमा लेता था तो अपने लैवल को चन्द दिनों के लिए तो अपग्रेड कर ही लेता था । वैसे भी मेरा मानना है कि ज्यादा कमाने के लिए खुद को मोटीवेट करने का बेहतरीन तरीका यही था कि ज्यादा खर्चा करना शुरू कर दीजिये ।

“ग्लैनमोरांजी !” - मैं बोला – “लार्ज । विद आइस एण्ड वाटर । नो सोडा ।”

“यस, सर ।” - वो तपाक से बोला – “राइट अवे, सर ।”

उसने गिलास को खासतौर से मेरे लिए नैपकिन से रगड़ कर चमकाया और मेरा ड्रिंक तैयार करके मेरे सामने रखा । गिलास के बाजू में उसने रोस्टिड पीनट्स का एक बाउल रखा ।

मैंने अपना डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिग्रेट सुलगाया ।

सिग्रेट के कश लगाता मैं विस्की चुसकने लगा ।

वाह ! जीना कितना आसान था ! - मैंने तृप्तिपूर्ण भाव से होंठ चटकाये - सांस अन्दर, सांस बाहर, दो टाइम खाना, विस्की की आप्शन, हो गया जीना ।

आधे घंटे में मैंने एक पैग खत्म किया, फिर दूसरा आर्डर किया ।

साहबान, आपने कभी सोचा है कि भगवान ने शराब क्यों बनाई ?

इसलिये बनायी ताकि बद्सूरत औरतों को भी मर्द का प्यार हासिल हो सके ।

तभी मुझे अहसास हुआ कि कोई मेरे दायें पहलू में आ खड़ा हुआ था । मैंने अपने जाम पर से सिर उठा कर उधर देखा ।

एडवोकेट महाजन मुस्कराया ।

“अरे, वकील साहब !” - हैरानी जताता मैं बोला - “आप यहां !”

“हल्लो !” – वो पूर्ववत् मुस्कराता बोला ।

“कैसे आये ? इत्तफाक से या मालूम था मैं यहां था ?”

“उम्मीद थी तुम्हारे यहां होने की ?”

“अच्छा !”

“हां । जब तुम्हारे बारे में पड़ताल की थी तो ये भी मालूम पड़ा था कि ये तुम्हारा फेवरेट वाटरिंग होल था, शाम को तुम अक्सर यहां होते थे । किसी काम से होटल जनपथ आया था, लेट फारिग हुआ, मन में आया देखूं शायद तुम यहां होवो ।”

“बढ़िया । वैलकम । मैं आपके लिये ड्रिंक आर्डर करता हूं । कौन सी विस्की पीते हैं ?”

“मैं ड्रिंक नहीं करता ।”

“क्या ! ड्रिंक नहीं करते ! अरे, जनाब पीते नहीं तो जीते कैसे हैं ?”

वो शिष्ट भाव से हंसा ।

मन ही मन मैं खुश था कि वो ड्रिंक नहीं करता था । ग्लैनमोरांजी का पैग पन्द्रह सौ रुपये का आता था ।

“तो कोई कोल्ड ड्रिंक ?”

“आरेंज जूस ।”

मेरे इशारे पर जुत्शी ने तत्काल उसे आरेंज जूस सर्व किया ।

उसने गिलास से गिलास टकरा कर चियर्स बोला ।

“और सुनाइये” - मैं बोला – “कैसे मिजाज हैं ?”

“सुनाता हूं । लेकिन मैं ये सोच के आया था कि कुछ सुनने को मिलेगा ।”

“अच्छा !”

“हां । उधर विंडो के पास एक टेबल खाली है, ऐतराज न हो तो वहां चलके बैठते हैं ।”

“अरे, जनाब, ऐतराज कैसा ! ठीक है ।”

अपने अपने गिलास सम्भाले बार पर से हम दोनों टेबल पर शिफ्ट हुए ।

“मेरे लायक कोई खबर ?” - वो संजीदगी से बोला – “केस की बाबत कोई प्रॉग्रेस ?”

“वकील साहब, मैं डिटेक्टिव हूं” - मैंने गिला किया – “गिली गिली करके जादू दिखाने वाला जादूगर तो नहीं ! जादू कर के तो नहीं दिखा सकता न मैं !”

“लिहाजा अभी कुछ नहीं किया ?”

“क्यों नहीं किया ! सारा दिन शहर में धक्के खाते गुजारा । केस से ताल्लुक रखते कई लोगों से मिला । कहीं सहयोग मिला, कहीं बेरुखी का सामना करना पड़ा, कहीं फटकार पड़ी, कहीं दुत्कार मिली ।”

“दुत्कार भी !”

“आल पार्ट आफ ए गेम । बुकेज एण्ड ब्रिकबैट्स... दोनों मिलते हैं ।”

“ओह !”

“लेकिन हाथ कुछ न आया । कुछ बातों की तसदीक हुई, नया खास कुछ न मालूम हुआ ।”

“हूं ।”

“लेकिन होगा । क्यों नहीं होगा ! आज नहीं तो कल राज शर्मा की फेमस लक अपना रंग दिखायेगी, दिखा के रहेगी ।”

“मैं उस वक्त का इन्तजार करूंगा । बाई दि वे, किस किस से मिले ?”

मैंने तमाम नाम लिये ।

“ब्रिकबैट्स से कहां नवाजे गये ? आई मीन, दुत्कार की नौबत कहां आई ?”

“अमरनाथ परमार के दौलतखाने पर । बाप बेटा दोनों ने खातिर कर दी ।”

“डांट कर भगा दिया गया । और रुकने की जुर्रत करता तो शायद पीट के भगाया जाता ।”

“फिर तो शुक्र मनाओ कि परमार का साला नेता जी वहां न हुआ । संसद सदस्य है, उसके साथ सरकारी सिक्योरिटी होती है । वो होता तो पीट कर भगाया जाना मामूली बात होती ।”

“जीजा जी की खातिर फौजदारी से गुरेज न करता नेता जी ?”

“ऐन यही होता । इलैक्शन आते हैं तो परमार सांसद आलोक निगम के लिए अपने खजाने खोल देता है । साला उसके लिए इतना भी न करता ! एक हाथ दूसरे हाथ को धोता है, भाई । कभी नेता ने भी तो अपने सरकारी रसूख के खजाने उसके लिए खोले थे !”

“सही फरमाया आपने । आपकी जानकारी के दायरे में कोई ऐसा शख्स है जो प्रॉपर्टी के धंधे को समझता हो ! आई मीन जो रीयल एस्टेट बिजनेस में हो ?”

“है तो सही ऐसा एक शख्स ! मेरा क्लायंट रह चुका है, इसलिये वाकिफ है । पवन सेठी नाम है । रीयल एस्टेट के धंधे का कीड़ा है । बतौर कंसलटेंट काम करता है । बड़े बड़े लोग इस सिलसिले में उससे मशवरा करते हैं, मोटी फीस भरते हैं । बात क्या है ?”

“सार्थक की मां अहिल्या बराल कहती है कि परमार उसको रीयल एस्टेट के बिजनेस में सैट करना चाहता था ।”

“क्या बात करते हो !”

“प्रॉक्सी के तौर पर ।”

“यानी उसके जरिये बेनामी खरीद करना चाहता था ?”

“मेरे को ऐसा ही जान पड़ा था ।”

“हूं ।”

“आपके पवन सेठी के जरिये इस सिलसिले में कोई विस्तृत, अन्दरूनी जानकारी हासिल हो सकती है ?”

“भई, अगर बेनामी खरीद का चक्कर है तो जरूरी तो नहीं कि वो एक ही जगह केन्द्रित हो ! वो बड़ा बिल्डर है, बड़ा कॉलोनाइजर है, उसकी ऐसी एक से ज्यादा चैनल हो सकती हैं ।”

“अगर अहिल्या बराल को कल्टीवेट करने की कोशिश कर रहा था तो होगी ही । मेरा सवाल ये था कि क्या इस सिलसिले में कोई - मुकम्मल नहीं हो तो औनीपौनी ही सही - जानकारी हासिल हो सकती है ?”

“मैं... सेठी से बात करूंगा ।”

“इन स्ट्रिक्ट कंफींडेंस !”

“दैट गोज विदाउट सेइंग ।”

“देवली में जो नयी कॉलोनी खड़ी हो रही है, उससे कहियेगा कि उसकी तरफ वो पहले तवज्जो दे ।”

“क्या तवज्जो दे ?”

“एक एक नये मकान के मालिक का नाम पता करे । ये कोई मुश्किल काम नहीं । प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन का रिकार्ड पब्लिक डोमेन में होता है । रजिस्ट्रार के दफ्तर से - बल्कि कमेटी के दफ्तर से भी, आखिर हाउस टैक्स लगना होता है - ये जानकारी हासिल हो सकती है ।”

“तुम्हारा मतलब है उस कॉलोनी का कॉलोनाइजर परमार है ?”

“लार्ड माउन्टबेटन अंग्रेज था ?”

“ओह ! मैं बात करूंगा सेठी से ।”

“यस, प्लीज ।”

कुछ क्षण खामोशी रही । उस दौरान मैंने सिग्रेट सुलगा लिया ।

बिना उसको आफर किये ।

पता नहीं ड्रिंक करने के अलावा वो और क्या क्या नहीं करता था । स्मोकर होता तो मेरी देखादेखी अपनी पसन्द की ताबूत की कील निकाल कर सुलगा चुका होता या मेरे से मांग चुका होता ।

पता नहीं जो लोग कोई ऐब नहीं करते थे, उनको मौत कैसे आती थी !

“आप सुनाइये फिर” - मैं बोला - “‘सार्थक को इंसाफ दो’ अभियान कैसा चल रहा है ?”

“ठीक ही चल रहा है ।” - वो गहरी सांस लेता बोला ।

“लगता है और जोर नहीं पकड़ रहा !”

“और जोर तो पकड़ ही नहीं रहा, जोर घटता लग रहा है । अन्देशा है कि अभियान कहीं बैठ ही न जाये !”

“दैट्स टू बैड । जमानत की रकम के लिए कलैक्शन में अभी कितनी कसर है ?”

“काफी । छ: लाख कम हैं ।”

“आपके फीस ले चुकने के बाद ? मेरे को फीस दे चुकने के बाद ?”

“हां ।”

“ऐसा न होता तो रकम पूरी हो जाती ?”

“हां ।”

“यानी आपने पांच लाख फीस ली ?”

उसने जवाब न दिया ।

अब मुझे अपना लाख का चैक पहले जैसा नहीं लुभा रहा था ।

“मोतीबाग वाली कोठी भी तो है !” - एकाएक मैं बोला – “वो क्या किराये की है ?”

“नहीं ।”

“तो फिर वो अब किस काम की ? वाइफ मर गयी, हसबैंड जेल में है । छूट जायेगा तो मां के साथ रह लेगा । कोठी की तो जमानत की रकम से कई गुना ज्यादा कीमत होगी !”

“मालिक सार्थक तो नहीं !”

“जी ।”

“उस कोठी का मालिकाना तक श्यामला को हासिल है क्योंकि उसके पिता ने उसे फाइनांस किया था ।”

“बड़ा काम किया !”

“बेटी के लिए ।”

“जिसकी हरकत से बाप खफा था ।”

“फिर भी था तो बाप ही ! पुत्री कुपुत्री हो सकती है, पिता कुपिता तो नहीं हो सकता !”

“सही फरमाया आपने ।”

“आगे क्या इरादा है !”

“खोजबीन जारी रखने का ही इरादा है । लेकिन एक बात है, वकील साहब ।”

उसकी भवें उठी ।

“आप चाहें तो मेरा काम आसान कर सकते हैं ।”

“कैसे ?”

“जो राज आपने पोशीदा रखा हुआ है, उसे मेरे साथ शेयर कीजिये ।”

“ये मुमकिन नहीं ।”

“फिर तो केस की प्रॉग्रेस लखनऊ वाया सहारनपुर ही होगी । कान को सीधे से पकड़ने की जगह गर्दन पर से घुमा कर पकड़ना होगा ।”

वो खामोश रहा ।

“तुमने माधव धीमरे से बात की ?” - फिर बोला ।

“अभी नहीं ।” - मैं बोला – “आज टाइम नहीं लगा । कल करूंगा । लेकिन मैंने केस के इनवैस्टिगेटिंग आफिसर इंस्पेक्टर देवेन्द्र यादव से उसकी बाबत बात की है । बकौल उसके धीमरे के पास अपने डिफेंस के लिए मजबूत एलीबाई है । उसकी निगाह में नम्बर वन सस्पैक्ट अभी भी सार्थक है ।”

“कोई नम्बर टू भी है ?”

“है, लेकिन वो माधव धीमरे नहीं है ।”

“वो कौन है !”

“शेखर बराल । सार्थक का बड़ा भाई ।”

“नानसेंस !”

“कबूल । लेकिन सैंस चाहते है, जनाब, तो सार्थक की सीक्रेट एलीबाई को जुबान दीजिये ।”

जवाब में लम्बी खामोशी व्याप्त हुई ।

“सब कुछ मैं तुम्हें नहीं बता सकता” - फिर वो निर्णायक भाव से बोला – “लेकिन हिंट दे सकता हूं ।”

“हिंट ही दीजिये ।”

“मैं तुम्हारे अन्दाजे की तसदीक करता हूं कि असल में मुझे किसी और ने रिटेन किया है, क्लायंट एक औरत है - वो औरत है कत्ल की रात को जिसके साथ सार्थक परमार हमबिस्तर था । आई बात समझ में !”

“आई ।”

यार की गलियां, सब रंगरलियां यूअर्स ट्रूली की समझ में नहीं आयेंगी तो और किसकी समझ में आयेंगी !

“वो एक इज्जतदार, हैसियत वाली, रसूख वाली औरत है, सोसायटी में जिसकी इज्जत को महफूज रखना, दागदार होने से बचाया जाना जरूरी है । सार्थक इस बात को समझता है और इस बाबत जिम्मेदार है । वो थोड़े किये उस औरत की बाबत जुबान नहीं खोल सकता । यही उस औरत की भी दरख्वास्त है, बल्कि हुक्म है, कि उसके नाम को लेकर स्कैण्डल खड़ा न होने पाये ।”

“शादीशुदा है ?”

“क्या फर्क पड़ता है ! ऐसे मामलों में गैरशादीशुदा की इज्जत-अजमत शादीशुदा की इज्जत से कम तो नहीं होती !”

“शादीशुदा नहीं है ?”

“मैंने नहीं कहा । जबरन मेरे से कुछ कहलवाने की कोशिश न करो । मैंने शुरू में ही कहा था कि सब कुछ मैं तुम्हें नहीं बता सकता ।”

“इतना तो बता दो लोकल है कि इम्पोर्टिड !”

“क्या मतलब ?”

“हिन्दोस्तानी है या नेपाली !”

“हिन्दोस्तानी है ।”

“आपने फरमाया वो बाहैसियत औरत है, वो उसकी जमानत क्यों नहीं भरती ?”

“डोंट टाक नानसेंस । उसका ऐसा करना खुद को एक्सपोज करना होगा । जो काम वो होने नहीं देना चाहती, उसके होने में वो खुद निमित्त बनेगी ?”

“आपकी मार्फत ! यूं कि उसका नाम बीच में न आये !”

“उसने ऐसी कोई पेशकश मुझे नहीं की ।”

“मैं उससे मिलना चाहता हूं ।”

“नानसेंस ! जिसका तुम्हें नाम तक नहीं बताया जा सकता, उससे तुम्हें मिलने कैसे दिया जा सकता है ?”

“आप किसकी तरफ हैं ?”

“क्या मतलब ?”

“अपनी क्लायंट उस औरत की तरफ या सार्थक की तरफ ?”

उसने जवाब न दिया, आरेंज जूस का अपना गिलास उठा कर उसने यूं उसमें अपनी नाक घुसेड़ ली जैसे इतना करने से जो अदृष्य मानव बन गया हो ।

“मैं समझता हूं कि आपको सार्थक के हितचिन्तन के लिए रिटेन किया गया है...”

“क्लायंट के हितचिन्तन के लिए भी ।”

“ठीक । ठीक । लेकिन मेन मुद्दा सार्थक का हितचिन्तन है । ऐसा न होता तो आपने मुझे, एक पीडी को, रिटेन न किया होता । नहीं ?”

“ह-हां ।”

“किस उम्मीद में ? कि पीडी अपनी डिटेक्टिंग से उसे बेगुनाह साबित कर दिखायेगा ?”

“हां ।”

“लिहाजा आप बाखूबी जानते समझते हैं कि सार्थक को उसकी मौजूदा दुश्वारियों से निजात दिलाने का ये भी एक तरीका है कि असल कातिल का पर्दाफाश हो, उसके चेहरे से नकाब नुचे, उसकी हकीकत पब्लिक के, कानून के सामने उजागर हो ?”

“हां, भई । क्या कहना चाहते हो ?”

“ये कि फिर इस बात को कैसे जायज ठहराया जा सकता है कि आप अपने ही अप्वायंटिड पीडी की राह में रोड़े अटकायें ?”

“यू आर टाकिंग नानसेंस ।” - वो मुंह से गिलास हटा कर अप्रसन्न भाव से बोला – “यू आर गिवन ए फ्री हैण्ड । यू आर फ्री टु डिटेक्ट वाट ऐवर यू कैन । यू आर फ्री टु डिटेक्ट आईडेंटिटी आफ दैट लेडी टू । जब तुम्हें रिटेन किया गया था, तुम्हारी फीस भरी गयी थी तो साथ में, याद करो, कोई कंडीशंस नहीं खड़ी की गयी थी कि फलां फलां काम तुमने नहीं करना था । यू हैव ए फ्री हैण्ड । मालूम करो, वो औरत कौन है । कोई नहीं रोकेगा तुम्हें उस लाइन पर काम करने से । लेकिन मेरे से उम्मीद न करो कि अपने क्लायंट की मर्जी के खिलाफ इस सिलसिले में मैं तुम्हारी कोई मदद करूंगा । अभी आयी बात समझ में ?”

“आई । प्लीज काम डाउन ।”

“ये न भूलो कि जो रकम तुम्हें हासिल हुई है, वो पहली है, आखिरी नहीं है ।”

“आई एम ग्रेटफुल । अब इस मसले से किनारा करें तो कैसा रहे ?”

“मुझे कोई ऐतराज नहीं ।” - उसका लहजा नर्म पड़ा – “और क्या कहना चाहते हो ?”

“श्यामला तलाक पर विचार कर रही थी । क्या उसके उस इरादे के पीछे आपकी वो रहस्यमयी रमणी थी ?”

“मेरे खयाल से नहीं । सार्थक कहता है, यकीन से कहता है, कि श्यामला को इस बात का कोई इमकान नहीं था कि वो कहीं और मुंह मार रहा था ।”
 
कोई जरूरी नहीं था । इन मामलों में बीवियां बहुत गहरी मार करती हैं । हर खाविन्द सोचता है, खुद को भरमाता है, कि उसकी बीवी नादान है, कुछ नहीं जानती, जबकि बीवी सबकुछ जानती होती है । वो खाली ऐसे मौके का इन्तजार कर रही होती है जब कि उसकी जानकारी मैक्सीमम डैमेज करे ।

“आखिर” - मैं बोला – “जब पानी बिल्कुल ही सिर से ऊंचा हो जायेगा, तब वो सार्थक की गवाह बनने को तैयार होगी ? शपथ ग्रहण करके कोर्ट में गवाही देगी ?”

“मुनहसर है ।”

“किस बात पर ?”

“नहीं बता सकता ।”

“आपके रिकार्ड की सूई ‘नहीं बता सकता’ पर बहुत अटकती है ।”

“मेरे को क्लायंट की कुछ हिदायात हैं जिन पर अमल करना मेरे लिये जरूरी है । तुम कातिल को तलाश करने में कामयाब हो गये तो कोर्ट कचहरी की, गवाहियों की जरूरत ही नहीं रह जायेगी ।”

“ये बात तो ठीक है !”

“मैं अब चलता हूं ।” - एकाएक वो उठ खड़ा हुआ ।

“यहां फिश बहुत अच्छी बनती है ।” - मैं बोला – “डिनर करके जाइयेगा ।”

“मैं नानवैज नहीं खाता । जहां नानवैज बनता हो वहां का वैज भी नहीं खाता ।”

“औलाद तो कोई होगी नहीं !”

“क्या बोला ?”

“जब कुछ करते ही नहीं तो सोचा सैक्स भी नहीं करते होंगे !”

“शट अप !”

“क्या मैं आपकी चरणरज ले सकता हूं ?”

“क्या !”

“आज ही मालूम पड़ा कि दिल्ली शहर में भी सात्विक, शुद्ध, पवित्र, संस्कारी, हरद्वारी लोग बसते हैं ।”

उसने घूर कर मुझे देखा ।

जो सूरत से दिखाई देता है जो कितना भ्रामक, कितना गुमराह करने वाला हो सकता है ! मैं सोचता था कि वो वकील न होता तो पिम्प होता, जेबकतरा होता । कितना गलत सोचता था !

“आई वान्ट डेली रिपोर्ट !” - वो शुष्क भाव से बोला – “आज इत्तफाक से करीब था इसलिये तुम्हें यहां देखने चला आया, हो सकता है फिर ऐसा इत्तफाक न हो । मुझे बिना याद दिलाये तुम्हारी तरफ से डेली रिपोर्ट हासिल होनी चाहिए ।”

“भले ही कोई प्रॉग्रेस न हो !” - मैं भवें उठाता बोला ।

“हां, भले ही कोई प्रॉग्रेस न हो ।”

“ऐसा ही होगा ।”

“क्योंकि मेरी भी जिम्मेदारी है किसी को आगे रिपोर्ट करने की ।”

“अरे, जनाबेआला, बोला न, ऐसा ही होगा ।”

“गुड नाइट ।”

वो चला गया ।

मेरे दो पैग बर्बाद करके ।

तरंग के नाम पर झुनझुना भी हाथ नहीं आया था । संजीदा बातें करते कहीं नशा होता था !

अब मैंने शाम ढले का अपना जरूरी काम स्टैप वन से शुरू करना था ।

वापिस बार पर पहुंच कर ।
 
Chapter 2

लैंडलाइन की निरन्तर बजती घंटी ने मुझे जगाया ।

मैंने मोबाइल उठा कर उसकी क्लॉक पर निगाह डाली ।

आठ बजने को थे ।

मैंने हाथ बढ़ा कर फोन का रिसीवर उठाया और माउथपीस में बोला - “थैंक्यू । आई एम अवेक ।”

और फोन वापस क्रेडल पर रख दिया ।

तत्काल घंटी फिर बजी ।

मैंने फिर रिसीवर उठाया ।

“अरे, भई बोला न, जाग गया हूं ।” - मैं झुंझलाया सा बोला ।

“जाग गये हो तो बधाई ।” - एक जनाना आवाज मेरे कान में पड़ी - “मुझे क्यों बता रहे हो ?”

“यू आर स्पीकिंग फ्रॉम फ्रंट डैस्क ?”

“वाट द हैल !”

“सॉरी ! मे आई नो हू इज स्लीपिंग... आई मीन स्पीकिंग ?”

“मैं शेफाली परमार बोलती हूं ।”

“शेफाली परमार ! ओ, सॉरी अगेन ।”

“तुम क्या समझे थे ?”

“दरअसल मुझे सपना आ रहा था कि मैं कहीं किसी होटल में था और फ्रंट डैस्क पर बोल के सोया था कि मुझे आठ बजे जगा दिया जाये । फोन बजा तो मैं उसे वेकअप काल समझा ।”

“कमाल है ! अब जाग गये हो ?”

“हां ।”

“कौन बोल रहे हो ?”

“शाहरुख ।”

“वाट नानसेंस !”

“वाई नानसेंस ? आ के रुख देखो, न शाह का लगे तो बोलना ।”

“अरे, भई, राज शर्मा बोल रहे हो न ?”

“हां । वो मेरा घर का नाम है ।”

“मैंने नाम बताया । नाम से कुछ समझ में आया ?”

“आया ।”

“क्या ?”

“आप लंकापति की बेटी हैं, मेघनाद की बहन हैं ।”

“मैं मजाक पसन्द करती हूं लेकिन दिन चढ़ते ही नहीं ।”

“आई सी ।”

“कल जब तुम पापा की कोठी पर आये थे तो मैं बाई चांस वहीं थी । माहौल तल्ख न हो उठा होता तो कल ही मुलाकात हो जाती । अपना जो विजिटिंग कार्ड तुम पीछे छोड़ के गये थे, वो तुम्हारे जाते ही मेरे भाई ने पुर्जा पुर्जा करके डस्टबिन में डाल दिया था । घन्टा लगा के मैंने वो पुर्जा पुर्जा वापस जोड़ा तो तुम्हारा नम्बर मालूम पड़ा ।”

“बहुत जहमत की !”

“तुम्हारी जो बात जीजा जी के बारे में कल न हो सकी...”

“जीजा जी !”

“भई, सार्थक बराल ।”

“ओह ! सॉरी ।”

“...वो बात आज करना चाहते हो ?”

“किसके साथ ?”

“मेरे साथ ।”

“आपके साथ, जो कि मकतूला श्यामला की बड़ी बहन हैं ?”

“हां ।”

“जहेनसीब । क्यों नहीं !”

“रोज़वुड क्लब से वाकिफ हो ?”

“अब हूं ।”

“गुड ! वहां मिलना मुझे । लंच मेरे साथ करना ।”

“किस वक्त ?”

“भई, लंच लंच के वक्त ही होता है, ब्रेकफास्ट या डिनर के वक्त तो नहीं होता !”

“सॉरी ! कोई मुझे वहां घुसने देगा ?”

“परमार्स के गेस्ट को रोकने की किसकी मजाल होगी ?”

“ठीक ! तो मैं एक-डेढ़ बजे...”

मैंने बुरा सा मुंह बनाया ।

लाइन कट चुकी थी ।

मैंने भी फोन वापिस क्रेडल पर पटका ।

वो काल मुझे हैरान कर रही थी ।

एक तो उस लड़की का अपनी तरफ से फोन आना ही हैरानी की बात थी, दूसरे यूं आनन फानन आना तो बहुत ही ज्यादा हैरानी की बात थी ।

उस सन्दर्भ में एक नयी बात मेरे जेहन में आयी ।

क्या सार्थक की सीक्रेट एलीबाई वो थी ? क्या सार्थक का अपनी साली से अफेयर था ? क्या शेफाली परमार वो महिला थी, बाजरिया एडवोकेट विवेक महाजन जिसने मुझे हायर किया था ?

हो तो सकता था ! आखिर जितना बड़ा ढोल होता था, उतनी ही बड़ी पोल निकलती थी । धन कुबेर बाप की लाड़ली बेटी के लिए बड़े वकील पर, फेमस पीडी पर लाखों का खर्चा करना क्या बड़ी बात थी !

क्या बड़ी बात थी !

******************************************************************
 
ग्यारह बजे के करीब मैं साउथ एक्सटेंशन के उस रेस्टोबार में पहुंचा, जहां अपनी आजादी के दिनों में सार्थक बराल स्टीवार्ड की नौकरी करता था ।

रेस्टोबार का नाम ‘पिकाडिली’ था ।

भीतर की साजसज्जा भी ऐसी थी जैसे कि लन्दन में हो । उस घड़ी वो खुला तो था लेकिन कस्टमर का नामोनिशान नहीं था ।

मैं एक कोने की टेबल पर जाकर बैठा ।

तत्काल एक वेटर मेरे बाजू में आ खड़ा हुआ ।

“इस घड़ी मैनेजर साहब हैं ?” - मैंने पूछा ।

“सर, यू मीन मिस्टर प्रधान ?” - अंग्रेज का बच्चा बोला ।

“भई, अगर चन्द ही दिनों में बदल नहीं गये तो वही ।”

“हैं, सर ।”

“ये कार्ड ले के जाओ” - मैंने अपना एक विजिटिंग कार्ड उसे सौंपा – “और जा कर उन्हें बोलो कि सार्थक बराल का फ्रेंड राज शर्मा उनसे मिलना चाहता है ।”

सार्थक के नाम पर उसके नेत्र फैले, कम से कम वहां कोई उसके अंजाम से बेखबर नहीं हो सकता था, आखिर अभी कल तक वो वहां नौकरी करता था ।

उसने सहमति में सिर हिलाया, फिर बोला – “एण्ड यूअर आर्डर, सर ?”

“अभी आर्डर दिया तो है मैंने !” - इस बार मैं शुष्क स्वर में बोला – “मिस्टर प्रधान के पास मेरा कार्ड और मैसेज ले के जाने का आर्डर ! कोई बात आसानी से समझ में नहीं आती ?”

वो सकपकाया, फिर सॉरी बोलता वहां से रुखसत हुआ ।

पीछे मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा ।

मैं दरयाफ्त करके आया था कि सार्थक की मैनेजर से अच्छी पटती थी, वस्तुत: उसी की सिफारिश से उसे वहां नौकरी मिली थी ।

पांच मिनट बाद एक काले सूट में सजा धजा व्यक्ति मुझे अपनी ओर बढ़ता दिखाई दिया ।

मैंने सिग्रेट को ऐशट्रे में झोंका और होशियार हो के बैठा ।

वो मेरी टेबल के करीब पहुंचा तो मैंने उठ कर उसका स्वागत किया ।

उसने तपाक से मेरे साथ हाथ मिलाया, फिर हम दोनों आमने सामने बैठे ।

“प्राइवेट डिटेक्टिव !” - वो बोला ।

मैंने मुस्करा कर, सिर नवा कर वो गुनाह कुबूल किया ।

“पहली बार किसी प्राइवेट डिटेक्टिव से मिलने का इत्तफाक हुआ !”

“हर कोई यही कहता है ।” - मैं बोला ।

“सार्थक की वजह से आये हो ?”

“हां ।”

“अच्छा लड़का है । मुझे तो यकीन नहीं आता कि अपनी बीवी का कत्ल उसने किया है ।”

“कोर्ट को भी यकीन न आये तो बात बने न !”

“दोस्त है आप का ?”

“नहीं । दोस्त तो सुना है आपका है और यही वजह मुझे यहां लायी है ।” - मैं एक क्षण ठिठका फिर बोला - “मैं बतौर पीडी उसके केस पर काम कर रहा हूं ।”

“आई सी ।”

“उसकी बाबत आपकी जाती राय क्या है ?”

“अच्छा लड़का है । यहां मुस्तैदी से, जिम्मेदारी से काम करता था । कभी कोई शिकायत का मौका नहीं देता था ।”

“अभी उसकी नौकरी की यहां क्या पोजीशन है ?”

“भई, डिसमिस तो नहीं किया गया है लेकिन उसका ज्यादा देर इन्तजार तो मुमकिन नहीं होगा न ! एक रीजनेबल टाइम तक इन्तजार किया जायेगा कि उस पर लगा इलजाम हट जाये या उसकी जमानत हो जाये, ऐसा नहीं होगा तो...”

उसने असहाय भाव से कंधे उचकाये ।

“गिरफ्तारी के बाद कभी उससे मिले ?”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“आपका दोस्त था, दोस्ती के नाते कभी उसकी मरहूम बीवी से मिलने का इत्तफाक हुआ हो ?”

“एक दो बार उसके घर जाने का इत्तफाक हुआ तो था । तब उसकी बीवी से भी मिलना हुआ था । एक बार तो ड्रिंक-डिनर के लिए इनवाइट किया गया था । मैं वाइफ के साथ उसके घर गया था ।”

“इस धंधे में ऐसी छूट मिल जाती है ?”

“भई, एक वीकली ऑफ तो हर किसी को मिलता है । उसने अपने ऑफ के दिन मुझे इनवाइट किया था, तब मैंने यहां से छुट्टी कर ली थी ।”

“बीवी कैसी लगी थी ?”

“ठीक लगी थी । सुन्दर थी...”

“मेरा सवाल उसके मिजाज की बाबत था !”

“एक दो मुलाकातों में मिजाज का क्या पता लगता है ! मेहमान से तो हर कोई अच्छा अच्छा ही पेश आता है न ! मिजाज दुरुस्त न हो तो उस पर वक्ती पर्दा डाल के रखता है न !”

“ऐसी बात सार्थक के साथ तो न होगी ! उससे तो आपकी रोज की मुलाकात थी ! नो ?”

“यस । जब जॉब एक जगह थी तो... यस ।”

“अन्दरूनी बातचीत होती होगी ! दुख सुख बांटना होता होगा !”

“हां ।”

“आपको कभी कोई हिंट मिला कि उसका किसी गैर औरत से अफेयर था ?”

“था ऐसा ?”

“लगता तो है !”

“था तो क्या बड़ी बात है ! अपनी औरत कद्र न करे तो बाहर कहीं कद्रदान ढूंढ़ना ही पड़ता है ।”

“ऐसा था ? वो कहता था ऐसा ?”

“कहता नहीं था लेकिन... मैं बात को दूसरे तरीके से कहता हूं । देखो, पति पत्नी में जन्म जन्मांतर का रिश्ता माना जाता है, पत्नी को पति की अर्धांगिनी माना जाता है और उसके हर दुख सुख का साथी माना जाता है । लेकिन श्यामला ने ऐसा मिजाज नहीं दिखाया था, उसने ऐसा मिजाज दिखाया था जैसे वो सुख की ही साथी थी, दुख के साथ से उसने क्या लेना देना था ! ऐसा तब उजागर हुआ था जब सार्थक मारिजुआना के साथ पकड़ा गया था । तब कानून की निगाह में उसने उतना बड़ा गुनाह नहीं किया था जितना बीवी की निगाह में किया था ।”

“वो एडिक्ट था !”

“अरे, कभी कभार मौज में, शौक में, फैंसी में, कश लगा लेता था, एडिक्ट-वेडिक्ट कुछ नहीं था । कोई डोप पुशर तो नहीं था न ! कुछ था तो बस कैजुअल यूजर था ।”

“कैजुअल यूजर के पास एक टाइम में पचास ग्राम गांजा का क्या काम !”

“कोई काम नहीं था । यही तो पंगा पड़ा । मेरे से पूछो तो...”

“हां, हां, बोलिये ।”

“पता नहीं कहना ठीक होगा या नहीं !”

“ठीक होगा । क्योंकि जो कुछ भी आप कहेंगे, वो आगे कहीं नहीं जायेगा ।”

“पक्की बात !”

“जी हां, पक्की बात ।”

“तो सुनो” - वो तनिक आगे को झुका और धीमे स्वर में बोला - “मेरे खयाल से तो वो माल उसके भाई का था ।”

मेरे नेत्र फैले ।

“उसके भाई शिखर का मिजाज उसके अपने मिजाज से बिल्कुल जुदा था । जैसे मैं स्वाभाविक तौर पर सार्थक का भरोसा कर सकता था, वैसे उसके भाई का भरोसा नहीं कर सकता था । हवाबाज बन्दा था । इसी बात से जाहिर होता था कि एक स्टैडी जॉब तक तो कर नहीं पाता था । मेरे को तो पूरा यकीन है कि वो पचास ग्राम गांजा शिखर का था जिसे कि सार्थक भाई की अमानत के तौर पर अपने पास रखे था । ये उसकी बद्किस्मती हुई कि पकड़ा गया । अब खुद को बचाने के लिए भाई को तो नहीं फंसा सकता था न !”

“सार्थक ने कहा था कि माल उसके भाई का था ?”

“साफ, दो टूक नहीं कहा था लेकिन कई तरह के हिंट तो कई बार मुझे मिले थे । मसलन उसके बताये ही मुझे मालूम हुआ था कि उसका भाई ड्रग्स लेता था ।”

“सार्थक इतना तो नादान नहीं था कि जानता न हो कि पोजेशन आफ ड्रग्स गम्भीर अपराध होता था !”

“नादान नहीं था, जज्बाती था । क्योंकि छोटा, पांच साल छोटा भाई था ।”

“फिर भी क्यों फंसा भाई की खातिर ?”

“क्योंकि खुद जो पाक साफ था । जैसे भाई की रिप्यूट थी, वैसे उसकी ऐसी कोई रिप्यूट नहीं थी । इसी वजह से उसने सोचा होगा कि ड्रग्स के मामले में उसकी तरफ किसी को तवज्जो नहीं जाने वाली थी । फिर शिखर बड़ा भाई था, सार्थक ने राम के लिए लक्ष्मण भी तो बनके दिखाना था ! पट्ठे को मुलाहजे ने, बेजा जज्बात ने फंसाया ।”

“हूं । तो आपने फरमाया कि आपको यकीन नहीं आता कि सार्थक ने अपनी बीवी का कत्ल किया होगा ?”

“हां ।”

“सुना है उनकी बनती नहीं थी, अक्सर तकरार होती रहती थी !”

“तो क्या हुआ ? कौन हिन्दोस्तानी औरत है जो कभी मर्द से नहीं झगड़ती ! कौन ऐसा मर्द है जिसकी कभी बीवी से शिकवा शिकायत नहीं होती ! बर्तन खड़कते ही हैं । इतने से नौबत खून खराबे की आ जाती हो तो आये दिन घर घर खून की नदियां बहें ।”

“ठीक !”

“मैरीड कपल्स फर्स्ट क्वर्ल, दैन फक एण्ड फारगेट ।”

“पते की बात कही !”
 
“कत्ल पर आमादा कोई नहीं हो जाता ।”

“श्यामला का भाई कहता है कि सार्थक अक्सर श्यामला पर हाथ उठा बैठता था ?”

“कौन कहता है ?”

“पुलिस का इनवैस्टिगेटिंग आफिसर कहता है ।”

“नानसेंस । सार्थक ऐसा नहीं था । वो औरत पर - वो भी अपनी बीवी पर - हाथ नहीं उठा सकता था ।”

“साला शरद परमार ऐसा कहता है ।”

“उसकी क्या बात है ! जिस शख्स के कोई खिलाफ हो, उसके बारे में वो कुछ भी बकता है । फिर शरद परमार क्यों नहीं बकेगा ! साला साला जो ठहरा !”

“अपने दोस्त को बहुत बढ़िया डिफेंड कर रहे हैं आप !”

“मुझे उससे हमदर्दी है, खासतौर से इसलिये कि उसके इन-लॉज़ तो उसके साथ ऐसे पेश आ रहे हैं जैसे साबित हो भी चुका हो कि वो बीवी का हत्यारा था, बस अभी फांसी होने की देर थी । मिस्टर शर्मा” – वो व्यग्र भाव से बोला - “मुझे नहीं पता कि तुम कितने काबिल पीडी हो लेकिन अगर श्यामला के असल कातिल को ढूंढ़ निकालोगे तो ये सार्थक पर ऐसा उपकार होगा जिसके लिए जो जन्म जन्मान्तर के लिए तुम्हारा कजाई होगा ।”

“अगर वो बेगुनाह है तो बेगुनाह साबित हो के रहेगा । ऊपर वाले के घर देर है अन्धेर नहीं है । असली कातिल की तलाश में मैं अपनी कोई कोशिश उठा नहीं रखूंगा ।”

“मिस्टर शर्मा, अगर ऐसा आप कर सके तो ‘पिकाडिली’ में आपके लिये ये महीना ड्रिंक्स आन दि हाउस ।”

“फिर तो मैं जरूर ही करूंगा । इतना बड़ा इंसैंटिव भला मैं कैसे छोड़ सकता हूं !”

“यू आर मोस्ट वैलकम । फिर यहां सार्थक ही आप को सर्व करेगा ।”

“सूपर !”

******************************************************************

एक बजे मैं रोज़वुड क्लब पहुंचा ।

और रिसैप्शन पर पेश हुआ ।

“आई एम राज शर्मा ।” - मैं बोला – “मैं यहां...”

“यस, सर ।” - रिसैप्शनिस्ट तपाक से बोला – “यू आर एक्सपैक्टिड ।”

उसने करीब खड़े एक वेटर को रोका और उसे मुझे मैडम शेफाली परमार के पास पहुंचाने का हुक्म दिया ।

वेटर ने मुझे मेन हाल में पहुंचाया जहां कि बार से दूर, उसके दूसरी तरफ के सिरे की एक टेबल पर वो मुझे लेकर आया जहां कि शलवार कमीज और मैचिंग कार्डीगनधारी एक युवती बैठी थी ।

मुझे उसमें वो फैमिली रिजेम्बलेंस न दिखाई दी जो पिछले रोज शरद में दिखाई दी थी ।

“हल्लो !” - मैं जबरन मुस्कराता बोला ।

उसने सिर उठाया ।

“मिस्टर शर्मा !” - वो बोली ।

“दि ओनली वन ।” - मैं सिर नवा कर बोला ।

“आफकोर्स ! आफकोर्स ! प्लीज सिट डाउन ।”

“थैंक्यू । शेफाली ही हो न !”

“हां ।”

“जिसने मुझे सुबह काल करके सोते से जगाया था !”

“आई एम सॉरी । मालूम होता कि लेट उठते हो तो लेट फोन करती ।”

“नैवर माइन्ड ।”

“थैंक्यू । मे आई आफर यू ए ड्रिंक बिफोर वुई आर्डर लंच ?”

“यस, प्लीज । आई नैवर से नो टु ए फ्री ड्रिंक ।”

“वाट विल यू हैव ?”

“ऐनी सिंगल माल्ट । बैगर्स आर नाट चूजर्स ।”

“यू टाक नाइस । विल ग्लैनफिडिक डू ?”

“इट दिल डू वैरी वैल ।”

उसने वेटर को बुला कर अपने लिये ‘मिंट जेलप’ काकटेल और मेरे लिये ग्लैनफिडिक का आर्डर दिया ।

आर्डर सर्व हुआ ।

हम दोनों ने ‘चियर्स’ बोला ।

“कल पापा और शरद” - फिर वो बोली - “तुम्हारे से ठीक से पेश नहीं आये, इसका मुझे अफसोस है ।”

“नैवर माईन्ड । जो बीत गयी, सो बीत गयी ।”

“सो नाइस आफ यू । तो तुम पापा से सार्थक के बारे में कुछ बात करना चाहते थे ?”

“हां ।”

“क्यों ?”

“मैं डिटेक्टिव हूं मेरा काम है डिटेक्ट करना । ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करने की कोशिश करना ।”

“भले ही वो किसी काम की न निकले ।”

“वो बाद की बात होती है । भूसे से गेहूं अलग करना बाद की बात होती है ।”

“हूं । जो पूछना है, अब मेरे से पूछो ।”

“तुम्हें सब मालूम है ?”

“सब कैसे मालूम होगा ? कहां से मालूम होगा ? लेकिन जो पापा को मालूम है, जो शरद को मालूम है, वो मुझे मालूम है । हम आपस में कुछ नहीं छुपाते ।”

“दैट्स वैरी गुड ! वैरी एनकरेजिंग !” - मैंने एक क्षण ठिठक कर विस्की का एक घूंट पिया फिर बोला – “सुना है सार्थक कभी यहां बतौर रिसैप्शनिस्ट एम्पलायड था ?”

“ठीक सुना है । तभी तो श्यामला को अपने पर आशिक करवाया था !”

“सुना है तब उसने किसी मेम्बर के अपने पास सेफकीपिंग के लिए छोड़े गये बैग से दस हजार रुपये चुराये थे ?”

“ऐसा एक वाकया हुआ जरूर था लेकिन जो तुमने सुना है, उसमें दो खामियां हैं ।”

“अच्छा ?”

“हां । रकम दस नहीं, चार हजार थी और वो हरकत सार्थक की नहीं, उसके बड़े भाई शिखर की थी ।”

“शिखर की थी ! उसका यहां क्या काम ?”

“कोई काम नहीं । लेकिन आता था अक्सर । कभी भाई से मिलने । कभी किसी कैजुअल या परमानेंट जॉब की तलाश में ।”

“कैजुअल भी !”

“कभी कोई बड़ी ईवेंट होती है तो यहां ऐसी गुंजायश होती है । जैसे आजकल यहां आल इन्डिया चैस टूर्नामेंट का आयोजन है ।”

“लिहाजा वो अभी भी यहां चक्कर लगाता है !”

“नहीं, अब नहीं । तभी तक आता था, जब तक सार्थक यहां एम्पलाई था ।”

“आई सी । तो तुम्हारे खयाल से शिखर ठीक बन्दा नहीं था !”

“मिलके देखो । फिर खुद फैसला करना इस बाबत ।”

“मिला तो हूं ! लेकिन इस निगाह से नहीं मिला था ।”

“इस बार इस निगाह से मिल लेना ।”

“सोचूंगा मैं इस बारे में । बाई दि वे, क्या करती हो ?”

“क्या करती हूं ?”

“आई मीन, वाट इज युअर लाइन आफ बिजनेस ?”

“ओ, दैट ! कोई इन्डीपेंडेंट लाइन आफ बिजनेस नहीं है । पापा के रीयल एस्टेट बिजनेस में उनका हाथ बंटाती हूं ।”

“जायन्ट फैमिली का कन्सैप्ट इस सिलसिले में काफी कारगर साबित होता है ।”

“मैं जायंट फैमिली नहीं हूं । मैं अलग रहती हूं । सैक्टर तीन, पुष्पा विहार में मेरा अपना फ्लैट है । आना कभी ।”

“आई विल हैव दि ऑनर । भाई भी अलग रहता है ?”

“नहीं, वो ममी पापा के साथ रहता है । उसे पापा की छत्रछाया रास आती है । मुझे इन्डीपेंडेस पसन्द है ।”

मैंने अपलक उसे देखा ।

“जो सोच रहे हो, वही बात है ।” - वो निर्भीक भाव से बोली – “वही बात है जो मन में है लेकिन जुबान पर नहीं ला पा रहे हो । आई हैड ए लिव-इन रिलेशन विद ए गाई । जायन्ट फैमिली में ऐसा कैसे चलता !”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“यू सैड यू हैड !” - फिर बोला ।

“हां । अफसोस कि चला नहीं ।”

“उसी का नुकसान हुआ !”

“तुम ऐसा सोचते हो तो शुक्रिया ।”

“शिकायत क्या हुई उसे ?”

“बता दूं ?”

“मर्जी है तुम्हारी ।”

“कहता था मैं तो कटखनी, जंगली बिल्ली थी ।”

“अरे !”

“कहता था तो कहता था, समझता था तो समझता था, लेकिन साला हरामी साल बाद बोला ऐसा ।”

“फिर तो भंवरा हुआ ! कली का रस चूसा और उड़ गया ।”

“हां ।” - उसने गहरी सांस ली - “उस वाकये के बाद ही मुझे ढ़ण्ग से मर्द की जात समझ में आयी ।”

“देर आयद दुरुस्त आयद । अलग रहने की बस यही एक वजह है ? इन्डीपेंडेंस पसन्द है !”

उसने जवाब न दिया ।

“एक वजह का मुझे कुछ अन्दाजा हो रहा है । इजाजत हो तो बोलूं ?”

“बोलो ।”

“बाप से, भाई से मिजाज नहीं मिलता ! नाइत्तफाकी रहती है !”

“है तो ऐसा ही कुछ कुछ । कोई मेरी जिन्दगी को रिमोट से कंट्रोल करने की कोशिश करे, ये मुझे गंवारा नहीं, भले ही वो मेरा बाप हो, भाई हो ।”

“तुम्हारी कोई गलती नहीं । इन्हीं खयालात, इन्हीं जज्बात की वजह से नौजवान नस्ल को बागी बोला जाता है ।”

“यू हैव ए प्वायंट देयर ।”

“इस सिलसिले में जबरदस्ती के जीजा जी सार्थक का भी कहीं दखल था ?”

“तुमने ठीक बोला उसे जबरदस्ती का जीजा जी । फैमिली सेंटीमेंट्स की रू में ये मेजर प्राब्लम थी उसके साथ । मैं तो कभी भी पूरी तरह से उसको अपना रिश्तेदार तसलीम न कर सकी !”

“पिता ? भाई ?”

“उनका भी ऐसा ही मिजाज था ।”

“तुम्हारी जाती राय क्या है ? सार्थक श्यामला का कातिल है ?”

“नहीं ।”

“नहीं ?”

“नहीं । हो सकता है श्यामला से उसकी शिकवा शिकायत हो, बतौर बीवी उसे नापसन्द करने लगा हो - मर्द की जात जो ठहरा ! - एण्ड दैन फैंसी वियर्स आफ यू नो...”

“आई नो ।”

“लेकिन उसने श्यामला का कत्ल किया हो, ये मैं नहीं मान सकती ।”

“शायद गैरइरादतन ऐसा कर बैठा हो ! हालात ऐसे बन गये हों कि वो हादसा उसके हाथों हो गया हो !”

“कैसे... कैसे हालात बन गये हों ?”

“तकरार में हमलावर तुम्हारी बहन हो, वो चारभुजी मूर्ति उठाकर वार करने के इरादे सार्थक पर झपटी हो, सार्थक ने बचाव में मूर्ति छीन ली हो और भड़क कर पलटवार कर दिया हो जिसका नतीजा श्यामला की मौत की सूरत में सामने आया हो !”

“नो, आई कैन नाट हैव इट । दैट्स दू फारफैच्ड ।”

“हैरानी है उस शख्स की ऐसी तरफदारी कर रही हो जिससे नापसन्दगी का इजहार करके हटी हो !”

“मैं नापसंदगी को नाइंसाफी का रास्ता नहीं बना सकती ।”

“वैरी नोबल आफ यू । लेकिन उसको बेगुनाह करार देने की कोई और वजह तो नहीं ?”

“और वजह क्या ?”

“तुम बोलो ।”

“नहीं, और कोई वजह नहीं ।”

वो प्रत्याशित जवाब था । अगर वो रहस्यमयी रमणी थी तो कैसे मेरे सामने अपनी जुबानी कबूल कर सकती थी कि कत्ल की रात को कत्ल के आसपास सार्थक उसके आगोश में था ।

लेकिन अगर बाई प्रॉक्सी वो ही मेरी क्लायंट थी तो देर सबेर इस बाबत मुझे अपना राजदां बना सकती थी । आखिर क्लायंट और पीडी का रिश्ता मरीज और डाक्टर जैसा होता था । जैसे मरीज को डाक्टर से कुछ नहीं छुपाना चाहिये, वैसे ही क्लायंट को भी प्राइवेट डिटेक्टिव से कुछ नहीं छुपाना चाहिये ।

लेकिन उस मामले में दिल्ली अभी दूर थी; अभी वो कबूल तो करती कि वो मेरी क्लायंट थी !

“तो” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “दो साल के शादीशुदा वक्फे में ही सार्थक तुम्हारी बहन को नापसन्द करने लगा था ?”

“इस सवाल का बेहतर जवाब सार्थक दे सकता है ।”

“ठीक ! लेकिन वो सवाल पूछने के लिए उपलब्ध नहीं है ।”

“दैट्स युअर प्राब्लम ।”

“अच्छा, ये ही बताओ कि मिजाज कैसा था ? खुशमिजाज था ? मिलनसार था ?”

“असल में कैसा है या था, मैं नहीं जानती लेकिन जैसा मुझे लगा, वो मैं बता सकती हूं ।”

“वो ही बताओ !”

“मिलनसार तो... नहीं था । पर्दादारी बहुत थी उसके किरदार में । थोड़े किये किसी पर ऐतबार नहीं लाता था । मुसीबत में है, फिर भी मुझे शक है कि विवेक महाजन से पूरी तरह से खुल कर नहीं बोला होगा ।”

“विवेक महाजन से वाकिफ हो ?”

“नहीं, खाली नाम से वाकिफ हूं । सार्थक से ताल्लुक रखती खबरें मेरे तक पहुंचती रहती हैं - आखिर मेरा जीजा है - इसलिये मुझे मालूम है कि अपने बचाव के लिये जो वकील उसने चुना है, वो एडवोकेट विवेक महाजन है ।”

“हूं ।”

“यू वांट एनदर ड्रिंक ?”

मैंने अपने गिलास पर निगाह डाली ।

खाली !

बातों में मुझे पता ही नहीं लगा था कि कब मैंने उसे खाली कर दिया था । अलबत्ता उसकी तवज्जो खाली जाम की तरफ गयी थी ।

“यस ।” - मैं बोला - “प्लीज ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया और वेटर को इशारा किया ।

तत्काल मुझे नया ड्रिंक सर्व हुआ ।

अपनी काकटेल को उसने रिपीट न किया । उसका ‘मिंट जेलप’ का लम्बा गिलास अभी आधा भरा हुआ था ।

“तो” - नया जाम चुसकता मैं बोला – “सार्थक से ताल्लुक रखती खबरें तुम तक पहुंचती रहती हैं ?”

“हां । तमाम नहीं तो तकरीबन पहुंचती रहती हैं । क्यों पूछ रहे हो ?”

“उसके अफेयर की खबर पहुंची ?”

“अफेयर ! सार्थक का !”

“हां । मैंने सुना है ऐसा कि उसके किसी से निहायत खुफिया, नाजायज ताल्लुकात थे ।”

“मैंने नहीं सुना । इस बाबत मैंने कुछ नहीं सुना । ऐसी कोई खबर कभी मुझ तक नहीं पहुंची ।”

“आई सी ।”

“लेकिन सार्थक का अफेयर ! हैरानीहै ! यकीन नहीं आता कि वो श्यामला को चीट कर रहा था । क्या पता श्यामला के हरदम उखड़े मिजाज की यही वजह हो कि उसे इस बात की खबर थी । उसे मालूम था उसका हसबैंड उसके साथ बेवफाई कर रहा था । इस मामले में कोई औरत सहनशील बनके नहीं दिखा सकती; उसका जलना, कुढ़ना, कलपना स्वाभाविक होता है । खाविन्द की बेवफाई शादीशुदा औरत की बहुत बड़ी हत्तक हैजिसे वो बर्दाश्त नहीं कर सकती । ये हत्तक उसे आग का गोला बना सकती है । तुमने वो मसल सुनी होगी कि हैल हैथ नो फ्यूरी लाइक ए वुमेन स्कार्न्ड ।”

“सुनी है । तो ये वजह थी उन दोनों में अक्सर होने वाली भीषण तकरार की !”

“मुमकिन है ।”

“तुम्हारे पापा या भाई को या दोनों को ये अफेयर वाली बात मालूम हो सकती है ?”

“भई, वो मर्द लोग हैं, ज्यादा दुनियादार हैं, उनके रिसोर्सिज जुदा हैं, हो सकता है मालूम हो !”

“श्यामला तलाक का इरादा बना चुकी थी और अपना इरादा बड़े परमार साहब पर उजागर भी कर चुकी थी । तुम्हें मालूम हुई थी ये बात ?”

“हां, ये बात तो मालूम हुई थी, क्योंकि घर में जायन्ट डिसकशन का मुद्दा बन गयी थी ।”

“तलाक इसलिए क्योंकि उसका पति उसे धोखा दे रहा था ?”

“और क्या वजह होगी ?”

“हो तो सकती है और वजह !”

“क्या मतलब ?”

“जिस मर्ज का मारा सार्थक था उसकी श्यामला भी हो !”

“तुम्हारा मतलब है श्यामला का भी कोई अफेयर चल रहा हो ?”

“शायद ।”

तत्काल वो संजीदा हुई, खामोशी से उसने अपनी काकटेल चुसकी ।

मैं उसके बोलने की प्रतीक्षा करने लगा ।

“यकीन नहीं आता ।” - आखिर वो बोली ।

“एक दूसरी बात सुनो और बोलो कि उस पर यकीन आता है ! तुम्हारे भाई ने पुलिस को बयान दिया है कि सार्थक श्यामला पर हाथ उठाता था ।”

“झूठ बोलता है साला !” - वो आवेग से बोली ।

“साला ?”

“मेरा भाई ।”

“क्यों ? क्यों झूठ बोलता है ?”
 
“क्योंकि उसे - मेरे पापा को भी - पूरा यकीन है कि सार्थक ने श्यामला का खून किया है । अपने यकीन को मजबूती देने के लिये और उसे आगे थोपने के लिए वो कुछ भी कह सकता है, क्योंकि वो सार्थक को फांसी पर झूलता देखना चाहता है ।”

“तुम्हारा पिता भी ?”

“हां ।”

“लेकिन तुम नहीं ! क्योंकि तुम्हारी निगाह में वो बेगुनाह है, उसने कत्ल नहीं किया !”

“हां ।”

“वो श्यामला पर हाथ नहीं उठा सकता ?”

“नहीं उठा सकता । सार्थक कैसा भी है, इतनी निम्न कोटि की हरकत वो नहीं कर सकता ।”

“फिर भी की हो तो ?”

“तो जरूर श्यामला ने अपनी किन्हीं हरकतों से उसे ऐसा करने के लिए उकसाया होगा ।”

“ये सार्थक की बड़ी तरफदारी है, जबकि वो तुम्हें कोई खास पसन्द भी नहीं था, और बहन पर कुछ ज्यादा ही सख्त आक्षेप है ।”

“मिस्टर शर्मा, मैं बाई हैबिट कंट्रोवर्शियल हूं क्योंकि कंट्रोवर्शियल फैमिली से बिलांग करती हूं ।”

“तुम्हारे पिता को सार्थक नापसन्द था, फिर भी उन्होंने बेटी की शादी उससे होने दी ।”

“इस सिलसिले में दो बातें काबिलेगौर हैं । एक तो हमेशा नापसन्द नहीं था, होता तो क्लब की मुलाजमत में हरगिज न रह पाता । पापा क्लब के प्रेसीडेंट हैं, उनकी मर्जी के बिना यहां पत्ता नहीं हिलता, कैसे सार्थक यहां रिसैप्शनिस्ट की नौकरी पर बना रह पाता ।”

“दूसरी बात ?”

“पापा शादी नहीं रोक सकते थे । जवान जहान लड़की पर जोर जबरदस्ती नहीं की जा सकती, की जा सकती है तो हमेशा नहीं की जा सकती । पापा श्यामला को ताले में बन्द करके नहीं रख सकते थे । वो ऐसी कोई कोशिश करते तो पहला मौका हाथ आते ही श्यामला सार्थक के साथ भाग जाती । यूं वो पापा की रिप्यूट को ज्यादा डैमेज करती ।”

“सुना है सार्थक और शरद में कभी अच्छी दोस्ती स्थापित थी !”

“कभी । अब का हाल तो ये है कि सार्थक को फांसी होगी तो शरद खुशी खुशी जल्लाद का रोल अदा करने की पेशकश करेगा ।”

“ओह ! अब एक नाजायज सवाल करने की इजाजत दो ।”

“पूछो वो भी ।”

“श्यामला कैरेक्टर की कैसी थी ? मैं शादी से पहले के दौर की बात कर रहा हूं ।”

“खराब ।”

“क्या बोला ?”

“रंगीन मिजाज थी । कोई लाइन मारे तो खफा होकर दिखाने की जगह पूरा भाव देने लगती थी ।”

“पूरा ?”

“हां । जो समझ रहे हो, उस सैंस में भी पूरा ।”

“कमाल है !”

मैं उससे पूछने ही लगा था कि क्या श्यामला के माधव धीमरे से भी दोस्ताना ताल्लुकात थे कि दो सजी धजी, जगमग जगमग महिलायें हमारी टेबल के करीब पहुंची । दोनों के बाल बड़े स्टाइलिश ढ़ण्ग से कटे हुए थे । एक के बाल काले थे जिनमें कहीं कहीं लाल लटें थीं, दूसरी के डाई कराये हुए भूरे थे ।

दोनों के जिस्म पर इतने जेवर थे कि ज्वेलरी की चलती फिरती दुकान जान पड़ती थीं; कोई भी देखता तो जरूर कहता कि सारा सोना दरीबे में ही नहीं था । इतना तो तब पहने थीं जबकि क्लब में मौजूद थीं, किसी शादी ब्याह में दिखाई दी होतीं तो शायद दरीबे की जगह दुबई का हवाला देना पड़ता ।

वो दोनों टेबल पर पहुंची तो शेफाली उठकर उनसे मिली ।

तब मैंने नोट किया कि दोनों के हाथ में ड्रिंक्स थे जो लाल रंग की वजह से और गिलास के रिम पर लेमन की स्लाइस टंगी होने की वजह से ब्लडी मेरी जान पड़ते थे । उनकी तमतमाई हुई सूरतों से लगता था कि वो उनके फर्स्ट ड्रिंक भी नहीं थे ।

उनकी आमद पर शेफाली का उठकर खड़ा होना जाहिर करता था कि वो नहीं चाहती थी कि वो दोनों उसके साथ टेबल शेयर करतीं ।

“हमने डिस्टर्ब तो नहीं किया ?” - भूरी बोली ।

“अरे, नहीं ।” - शेफाली ने जवाब दिया - “जरा भी नहीं ।”

“दूर से गोला कबूतर देखा” - लाल-काली धूर्त भाव से बोली - “करीब से देखने का दिल कर आया ।”

शर्तिया नशे में थी - मैंने मन ही मन सोचा - नार्मल होती तो ऐसी बात कहती !

“हल्लो ! हाउ आर यू ?”

मैं हड़बड़ाया, मुझे समझने में देर लगी कि वो मेरे से मुखातिब थी ।

“फाइन, मैम” - मैं बोला – “थैंक्यू फार आस्किंग ।”

“गोले कबूतर तो” - भूरी बोली - “मैंने सुना है जोड़ों में उड़ते हैं । तुम्हारा जोड़ा कहां छुपा है, भई ?”

वो भी बराबर नशे में थी ।

“मैं कम्पीटीटर साथ ले के नहीं चलता ।”

“अरे, लाना था न ! उसे हम सम्भाल लेतीं ! जैसे शेफाली ने तुम्हें सम्भाला हुआ है !”

“या वो आपको सम्भाल लेता ।”

वो खिलखिला कर हंसी, नशे वाली उमुक्त हंसी !

लाल-काली ने हंसी में उसका साथ दिया ।

तब शेफाली ने उनका परिचय दिया ।

भूरी का नाम संगीता निगम था ।

निगम ! ऐनी रिलेशन विद एमपी आलोक निगम !

और लाल-काली का बांसुरी कुशवाहा ।

“मुझे उम्मीद नहीं थी आज तुम्हारे यहां होने की ।” - संगीता शेफाली से सम्बोधित हुई - “क्योंकि तुम्हारी आई-10 पार्किंग में नहीं दिखाई दी थी मुझे !”

“वर्कशाप में है ।” - शेफाली बोली - “शरद ने ठीक दी । बिजली के खम्बे में दे मारी ।”

“काफी डैमैज हुआ ?”

“काफी तो नहीं लेकिन वर्कशाप भेजने लायक तो हुआ ही ।”

“रैश चलाता है । मैंने देखा एक दो बार ।”

“सभी का यही हाल है ।”

“चल न !” - बांसुरी उसको कोहनी से टहोकती बोली - “इन दोनों ने कोई अपनी बातें करनी होंगी !”

“हां, यार ।”

“अगली बार जब भी यहां आओ” - बांसुरी मेरी तरफ देखती बोली - “तो भाई को साथ लेके आना ।”

“भाई !” - मेरी भवें उठी ।

“गोला कबूतर ! जो तुम्हारा जोड़ा है ! या जिसका तुम जोड़ा हो ! फालोड ?”

“लाउड एण्ड क्लियर, मैम ।”

“दैट्स लाइक ए गुड ब्वाय ।”

इठलाती बल खाती दोनों वहां से चली गयीं ।

शेफाली वापस बैठ गयी । तब उसने मुझे उनका परिचय दिया ।

“संगीता मेरी मामी है ।” - वो बोली ।

“तुम्हारा मतलब है एमपी आलोक निगम की पत्नी है ?” - मैं बोला ।

“हां ।”

“इतनी उम्र की लगती तो नहीं थी ! वो तो तुम्हारी हमउम्र जान पड़ती थी !”

“है न कमाल ! बेफिक्र जिन्दगी हो तो ऐसा ही होता है । तब सजना और बजना दो ही तो काम होते हैं । जवानी ने कहां जाना है पल्ला झाड़ के !”

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा ।

ऐसा न लगा कि मेरे हैरान होने की उसको कोई परवाह हुई हो ।

“दूसरी बांसुरी कुशवाहा थी ।” - वो बोली - “मामी की पुरानी सखी है ।”

“तुम्हारी मामी से ज्यादा खूबसूरत थी !”

“बाली उमरिया में मिस इण्डिया कंटैस्ट में फर्स्ट रनर अप थी ।”

“जरूर होगी । मिस यूनीवर्स में भी होती तो मुझे कोई हैरानी नहींहोती । शान थी ऊपर वाले की, जो रूप देने पर आता है तो खजाने खोल देता है ।”

“लार टपक रही है ?”

“दिखाई दे गयी ?”

“साफ ।”

“मैं भी क्या करूं ! ऊपर वाले ने मुझे बनाया ही ऐसा है ।”

“कैसा ?”

“लवर आफ ब्यूटी । तभी तो मेरा मिजाज लड़कपन से आशिकाना है ।”

“काफी खुशफहम आदमी जान पड़ते हो !”

“जान क्या पड़ता हूं, हूं ही ऐसा । दूसरे को हो न हो, खुद की खुद को कद्र तो होनी चाहिये न !”

“मैं तुम्हारे लिये रिपीट आर्डर करूं ?”

“क्या ! ओह, नो । नैवर । मेरे उस्ताद का सबक है कि वन ड्रिंक इज नाट एनफ एण्ड थ्री आर वन टू मैनी ।”

“अच्छा सबक है । तो लंच आर्डर करें ।”

“ठीक है ।”

मेरे से मशवरा करके उसने लंच आर्डर किया ।

जो हमें दो वेटरों ने सर्व किया ।

“माधव धीमरे से वाकिफ हो ?” - लंच के दौरान मैंने वो सवाल किया जो मेरे जेहन में बज रहा था ।

“हां, भई ।” - वो बोली - “मैनेजर है वो यहां का । तुम जानते हो उसे ?”

“सिर्फ नाम से वाकिफ हूं ।”

“नाम से कैसे वाकिफ हो ?”

“सार्थक ने वाकिफ कराया । अब यहां हूं तो उससे मिलके ही जाऊंगा । तुम मुलाकात करा देना, सहूलियत होगी ।”

“आज तो नहीं हो सकेगी मुलाकात ।”

“वजह ?”

“आज उसका वीकली ऑफ है ।”

“आज ! शुक्रवार को !”

“रोटेट होता रहता है ।”

“ओह ! बताओ कुछ उसके बारे में !”

“क्या बताऊं ! खुशमिजाज नौजवान है । नेपाली है लेकिन यहां कोई उससे नाक नहीं चढ़ाता । सब उसे पसन्द करते हैं । इस वजह से सबका दोस्त है ।”

“श्यामला का भी था ?”

“क्या कहना चाहते हो ?”

“खास कुछ नहीं । महज एक सवाल पूछा ।”

“भई, जब सब का था तो श्यामला का भी था ।”

“आई सी । बहरहाल कोई खामी नहीं उसमें । सब कुछ उजला ही उजला है, काला कुछ नहीं ! सलेटी भी कुछ नहीं !”

वो खामोश हो गयी ।

जवाब के इन्तजार में मैं उसकी तरफ देखता रहा ।

“भई, ऐसा तो कोई नहीं होता आज की दुनिया में ।” - आखिर वो बोली - “हर किसी के ढ़ोल में कोई न कोई पोल तो होती ही है !”

“उसके ढोल में कौन सी पोल है ?”

“भई, पुख्ता कुछ नहीं लेकिन ढंकी छुपी अफवाह है कि ड्रग्स के धंधे में कोई दखल है उसका । कोई कोई कहता कि बुकी भी है ।”

“रेस का ?”

“हां ।”

“उसमें तो गैरकानूनी कुछ नहीं !”

“गैरकानूनी न सही लेकिन नाजायज तो है न ! अनइथिकल तो है न ! जब यहां का फुल टाइम मुलाजिम है तो और धंधों में टांग फंसा के रखने का क्या मतलब ?”

“कोई मतलब नहीं । लेकिन ये भी तो बोला न, कि अफवाह है, पुख्ता कुछ नहीं !”

“हां, बोला तो सही !”

“और ?”

“और शरद का दोस्त है । काफी गहरी छनती है दोनों में ।”

“श्यामला का भी था ?”

“मिस्टर शर्मा, प्लीज डोंट ट्राई टु पुट वर्ड्स इन टु माई माउथ ।”

“सॉरी !”

“नैवर माइन्ड । तुम बात को यूं समझो कि वो फैमिली फ्रेंड है । श्यामला फैमिली थी इसलिये उसका भी फ्रेंड था । शरद का जरा ज्यादा फ्रेंड था ।”

“सार्थक कत्ल के आल्टरनेट कैंडीडेट के तौर पर उसका नाम लेता है ।”

“नानसेंस !”

“सार्थक उसका कर्जाई था । अस्सी हजार रुपये का ।”

“अच्छा !”

“हां । सार्थक कहता था कि रकम की वापिसी की बाबत उस पर दबाव बनाने के लिए वो श्यामला को निशाना बनाने का इरादा रखता था ।”

“कैसे ?”

मैंने बताया ।

“ओ, माई गॉड !” - वो नेत्र फैलाती बोली - “ओ माई गुड गॉड ! बट दैट इज शियर नानसेंस !”

“सार्थक ऐसा कहता है ।”

“बकता है । कैद की तनहाई में उसका दिमाग हिल गया है इसलिये उलटी सीधी सोचता है, ऐसी बातों को इरादतन हवा देता है जो उस पर से फोकस हटा सकें । पर ऐसा नहीं होने वाला । पुलिस वाले क्या पागल बैठे हैं ? वो सब समझते हैं । दूसरे, मैंने सुना है कत्ल की रात को कत्ल के वक्त के आसपास माधव धीमरे शरद के साथ था । धीमरे की जगह तुमने सार्थक के भाई शिखर का नाम लिया होता तो कोई बात भी थी । मोटे तौर पर शिखर और धीमरे एक ही जैसे हैं लेकिन कोई मुझ से पूछे तो शिखर ज्यादा कम्बख्त है, ज्यादा काईयां है । तुम्हारी जानकारी के लिए सार्थक से पक्का टांका भिड़ने से पहले श्यामला थोड़े अरसे के लिए थोड़ा सा शिखर की ओर भी झुकी थी ।”

“कमाल है !”

“श्यामला के मिजाज की बाबत मैंने बोला तो था ! शी लाइक्ड मेल कम्पनी । शी एनजायड मेल अटेंशन ।”

“अगर ऐसा है तो क्या हो सकता है कि शिखर के साथ उसके ताल्लुकात हाल तक भी बरकरार रहे हों ?”

“जब बात श्यामला की हो तो कुछ भी हो सकता है । शादी करके वो घर बैठ गयी थी । घर बैठना उसके रसिक मिजाज से मेल नहीं खाता था । सार्थक दिन भर घर से बाहर रहता था और वो घर में अकेली बैठी बोर होती थी । ऐसे में उसने दिलजोई का कोई जरिया तलाश कर लिया हो या रिवाइव कर लिया हो तो श्यामला के केस में ये कोई बड़ी बात नहीं ?”

“मरहूम बहन के लिए ऐसे उद्गार प्रकट करना कुछ ज्यादती नहीं उसके साथ ?”

उसने जवाब न दिया ।

“तुम्हारे खुद के कैसे ताल्लुकात थे जीजा जी के साथ ?”

“मैं फ्रैंक जवाब दूंगी तो तुम फिर श्यामला मरहूम के साथ ज्यादती का गिला करने लगोगे !”

“नहीं करूंगा ।”

“तो सुनो । उसको मेरा सार्थक से ज्यादा इन्टीमेट होना पसन्द नहीं था और अपनी नापसन्दगी वो मेरे से छुपाती भी नहीं थी ।”

“वैसे तुम्हारे और सार्थक के बीच कुछ था ?”

“नहीं, कुछ नहीं था ।”

“बहन तुम्हारी कोई खास फेवरेट नहीं थी, तुम्हारे कलेजे से नहीं लगी हुई थी !”

“ऐसा ही था ।”

“वजह ?”

“थी कोई ।”

“तभी तुम्हें उसकी मौत का कोई खास अफसोस नहीं है ।”

“अफसोस है बराबर । हर जवान मौत का मुझे अफसोस है ।”

“वो जवानी में मर गयी, इसलिये अफसोस है, इसलिये नहीं कि बहन थी !”

वो फिर खामोश हो गयी ।

“तुम चाहती हो सार्थक निर्दोष साबित हो, वो अपनी मौजूदा दुश्वारी से निजात पाये ?”

“हां । लेकिन इसलिये नहीं क्योंकि वो मेरी बहन का हसबैंड है, मेरा जीजा है, बल्कि इसलिये कि मुझे यकीन है वो बेगुनाह है ।”

अगला सवाल जो मेरे जेहन में आया, उसे जुबान पर लाने कीमजाल मेरी न हुई । सवाल था : क्या श्यामला का कत्ल सार्थक और उसके सामूहिक षड़यन्त्र का नतीजा था ? क्या इसीलिये उसे बहन की मौत की कोई परवाह नहीं थी और सार्थक की रिहाई के लिए वो व्यग्र थी !

तभी शरद वहां आ धमका ।

उसने कुछ क्षण सन्दिग्ध भाव से मुझे देखा, फिर उसकी तवज्जो बहन की तरफ मुड़ गयी ।

“क्यों इस... इस घौंचू के साथ वक्त जाया कर रही है !” - वो बहन से बोला – “गधे घोड़े में कोई फर्क नहीं मालूम पड़ता तेरे को ?”

वो इतने ऊंचे स्वर में बोला कि आसपास की टेबलों पर बैठे लोगों की भी तवज्जो हमारी तरफ हो गयी ।

“गो अवे ।” - वो दांत पीसती दबे स्वर में बोली ।

“क्यों ? तेरा आगे का प्रोग्राम बिगड़ रहा है ?”

“गो अवे, डैम यू ।”

“जरूर ये जिगालो है जिसे तू खिला पिला के तैयार कर रही है अपनी...”

वो मुट्ठियां भींचती उठके खड़ी हुई, उसने मेज पर से पानी का भरा हुआ गिलास उठाया और पानी उसके मुंह पर फेंक कर मारा ।

मैं सकपकाया । आसार अच्छे नहीं थे । क्या मेरा भाई बहन के बीच के उस ड्रामे में दखलअन्दाज होना बनता था ! जब मैंने भाई को बहन पर झपटने को तत्पर पाया तो फैसला किया, बनता था । मैं कुर्सी से उठा, मैंने बहन पर प्रचण्ड प्रहार करने को तत्पर भाई का हाथ रास्ते में ही थामा और जोर से उसे पीछे को धक्का देते हाथ छोड़ दिया ।

वो धड़ाम से फर्श पर ढ़ेर हुआ, उसके मुंह से यूं सिसकारी निकली जैसे गैस के गुब्बारे में से हवा निकली हो ।

पता नहीं कहां से एकाएक बांसुरी कुशवाहा प्रकट हुई और शरद को सम्भालने लगी ।

“ये क्या हो रहा है ?”

मैं आवाज की तरफ घूमा तो मैंने अपने पहलू में एक हट्टे कट्टे, तन्दुरुस्त, सूरत से गोवानी लगने वाले व्यक्ति को खड़ा पाया । उसके मुंह में एक सुलगा हुआ सिगार दबा हुआ था जिसको मुंह से निकाले बिना ही वो बोला था । सिगार शक्ल में ऐसा था जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था । कसैला धुंआ छोड़ रहा था लेकिन जिसके मुंह में दबा था, उसे धुयें की कोई परवाह नहीं जान पड़ती थी ।

“कुछ नहीं हो रहा, मिस्टर डिसिल्वा ।” - शेफाली बोली - “डियर ब्रदर ज्यादा ड्रिंक कर गया लगता है । बेध्यानी में पांव फिसल गया और गिर गया । अभी उठ खड़ा होगा ।”

तो ये था डिसिल्वा - रॉक डिसिल्वा - क्लब का केटरिंग कांट्रेक्टर और नेबरहुड बार रॉक्स का प्रोप्राइटर !

“आई सी ।” - डिसिल्वा सन्दिग्ध भाव से बोला ।

शरद बांसुरी का सहारा लेकर उठने का प्रयत्न कर रहा था ।

“चलो ।” - शेफाली ने हुक्म दिया, उसने मेरी बांह थामी और मुझे साथ चलाती बाहर को चल दी ।

“बुरा हुआ ।” - रास्ते में मैं बोला ।

“कुछ नहीं हुआ ।” - वो बोली – “हम भाई बहनों में ऐसी फौजदारी चलती ही रहती है । पुराना सिलसिला है ये । गर्म मिजाज है न सबका...”

“पब्लिक में !”

“...कुछ बुरा हुआ तो” - उसने मेरी बात पर ध्यान न दिया, अपनीही झोंक में कहती रही - “ये बुरा हुआ कि लंच में विघ्न पड़ गया जिसके लिये मैं सॉरी बोलती हूं ।”

वो हाल के बाहर तक मेरे साथ आयी ।

“गुड बाई, मिस्टर शर्मा” - वहां ठिठक कर वो बोली - “बैटर लक नेक्स्ट टाइम ।”

“विल देयर बी ए नैक्स्ट टाइम ?”

“यस, आफकोर्स । एण्ड वैरी सून इट विल बी । सी यू ।”

वो मुझे वहीं खड़ा छोड़ कर उलटे पांव हाल में दाखिल हो गयी ।

मैंने पार्किंग की तरफ कदम बढ़ाये जहां कि मेरी कार खड़ी थी ।
 
Chapter 3

आइन्दा दो दिन बेनतीजा गुजरे ।

मेरी भागदौड़ तो बरकरार रही लेकिन नतीजा सिफर निकला, कुछ हाथ न आया ।

सोमवार आया तो मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस दिशा में कदम उठाऊं । वकील को रिपोर्ट चाहिये थी । दो दिन उसने ये बात हज्म कर ली थी कि रिपोर्ट करने को मेरे पास कुछ नहीं था, आइन्दा शायद मिजाज दिखाता ।

फिरंगियों का कहना है, ‘वैन इन कनफ्यूजन, डू नथिंग’ लेकिन यूअर्स ट्रूली का जाती तजुर्बा है कि ‘वैन इन कनफ्यूजन, कंसल्ट रजनी शर्मा’ ।

मैंने रजनी को अपने केबिन में तलब किया ।

“मैं तुझे अपनी हालिया नाकामी की दास्तान सुनाने लगा हूं ।” - मैं बोला - “गौर से सुनना ।”

“यस, सर्र ।”

“संजीदगी से सुनना ।”

“यस, सर ।

मैंने तमाम कथा उसके सामने की और उसे बताया कि बुधवार से मैंने क्या कुछ किया था ।

“मेरे को लगता है” - आखिर में मैं बोला - “केस की रहस्यमयी रमणी शेफाली परमार है ।”

“जीजा का साली से अफेयर ?” - रजनी बोली ।

“क्या बड़ी बात है ! वो कहते नहीं है कि साली आधी घरवाली ! तेरी बहन मेरी शरीकेहयात होती तो क्या मैं तेरे जैसी पटाखा साली पर नीयत मैली करने से बाज आ जाता ?”

“और अभी आप मुझे संजीदगी से सब सुनने की राय देकर हटे हैं !”

मैं हड़बड़ाया ।

“सॉरी !” - फिर बोला ।

“सारी, आधी, तीन चौथाई जैसी भी है, कबूल । आगे बढ़िये ।”

“अब सवाल ये है कि क्या शेफाली बहन के कत्ल में शरीक हो सकती है ?”

“अगर वो ही औरत सार्थक की सीक्रेट एलीबाई है तो हो सकती है । अगर उसकी सार्थक से सैटिंग है तो वो उसके लिए झूठी गवाही दे सकती है ।”

“देती क्यों नहीं ?”

“वकील कहता तो है कि देगी ! जब पानी सिर से ऊंचा उठ जायेगा तो देगी !”

“तब तक सार्थक भुगते ?”

“मजबूरी है । आखिर शेफाली को अपनी इज्जत का भी तो खयाल करना है ! क्या पता आपके किये या कैसे भी कोई करिश्मा हो जाये और उसकी गवाही की नौबत ही न आये !”

“वकील भी यही कहता था, शेफाली का, रहस्यमयी रमणी का, नाम लिये बिना कहता था लेकिन कहता था ।”

“सो देयर ।”

“सार्थक के बड़े भाई शिखर के बारे में क्या कहती हो ?”

“अगर शेफाली ठीक कहती है कि शादी से पहले श्यामला उस पर भी मेहरबान थी तो उसका कहीं न कहीं कोई दखल बनता तो है ! क्या पता जो आग कभी सुलगी थी, उसकी कोई चिंगारी राख के नीचे देर तक दबी रही हो !”

“कविता न कर ।”

“क्या पता शिखर अभी भी श्यामला पर दिल रखता हो !”

“और वो शिखर पर !”

“क्या पता !

“प्रेम त्रिकोण में नौबत कत्ल की आ गयी !”

“क्या बड़ी बात है ! बुरे काम के बुरे नतीजे !

“ओह !”

“ये कहावत आपकी समझ में आ गयी न !”

मैंने घूर कर उसे देखा ।

वो होंठ दबा कर हंसी ।

“उसने सार्थक को एलीबाई देने की कोशिश की थी ?” - मैं आगे बढ़ा ।

“सड़ी हुई एलीबाई दी थी जो हाथ के हाथ बोगस साबित हो गयी थी । वो यही चाहता होगा । उसने एलीबाई दी ही इसलिये थी क्योंकि उसेमालूम था वो सार्थक का कोई भला नहीं करने वाली थी । मेरी मानें तो जानबूझकर उसने झोलझाल एलीबाई दी थी ताकि जब वो झूठी, गढ़ी हुई साबित होती तो पुलिस का सार्थक पर शक दोबाला हो जाता । उसने एलीबाई न दी, एलीबाई देने का ड्रामा किया; यूं कि वो सार्थक का कोई भला तो करती नहीं, बुरा कहीं ज्यादा करती ।”

“यानी शिखर कातिल हो सकता है ?”

“उसकी तमाशे जैसी एलीबाई तो इसी बात की ओर इशाराकरती है ।”

“हूं । क्यों किया होगा उसने कत्ल ?”

“मालूम कीजिये । पता निकालिये । आखिर डिफेक्टिव हैं ।”

“क्या बोला ?”

“आखिर डिटेक्टिव हैं ।”

“मुझे तो कुछ और ही सुनाई दिया था !”

“आपकी क्या बात है ! आप तो आप हैं !”

“खुश्की उड़ा रही है मेरी ?”

“मेरी ये मजाल !”

“मजाल तो तेरी आकाश पताल को छूने वाली हो सकती है लेकिन...खैर । माधव धीमरे के बारे में क्या कहती है ?”

“उसके बारे में क्या कहूं ? आप कहते हैं कत्ल के वक्त की उसके पास एलीबाई है; शिखर जैसी फटेहाल नहीं, परफैक्ट एलीबाई है !”

“वो तो है । लेकिन कत्ल के केसों में अक्सर पर्फेक्शन में ही खोट निकलती पायी गयी है ।”

“निकालिये ।”

“होती तो पुलिस निकाल चुकी होती । जैसे सार्थक की एलीबाई में निकाली थी ।”

“फिर तो हारे को हरि नाम ।”

“हारा कौन ? मैं ?”

“जब आप की कोई पेश नहीं चल रही तो...”

उसने जानबूझ कर वाक्य बीच में छोड़ दिया और होंठ दबा के हंसी ।

“ठहर जा, कम्बख्त !”

“ठहरने को बहुत कहते हैं ! ठहरे को ठहरने को कहना है तो ठहर के कह लेना, अभी तो मतलब की बातें हो रही हैं । हो रही हैं न ?”

“हां ।”

“या ठिठोली चल रही है ?”

“मतलब की बातें हो रही हैं ।”

“मुझे कुछ कहने की इजाजत दें तो अर्ज है कि आप केस पर पुलिसिया स्टाइल से विचार कर रहे हैं ।”

“क्या मतलब ?”

“नाक की सीध में देख रहे हैं, दायें बायें नहीं झांक रहे ।”

“दायें बायें क्या है ?”

“दायें बायें और सस्पैक्ट्स हैं ।”

“नानसेंस ।”

“सम्भावित सस्पैक्ट्स हैं ।”

“कौन ? नाम ले किसी का । सारी कथा पूरी तफसील से मैंने तेरे सामने की है, नाम ले किसी का !”

तभी मेरे मोबाइल की घन्टी बजी ।

मैंने फोन उठ कर स्क्रीन पर निगाह डाली ।

जो नम्बर उस पर दर्ज था, वो मेरी पहचान में न आया ।

मैंने काल रिसीव की ।

“हल्लो ।” - मैं बोला ।

“मिस्टर शर्मा !” - जनाना आवाज आई - “राज शर्मा !”

“यस ।”

“मैं शेफाली बोल रही हूं ।”

“ओह ! हाउ आर यू... सर ।”

“सर !”

“ए वर्ड टु दि वाइज ।”

“कोई सुन रहा है ?”

“हां ।”

“तभी ।”

“कैसे याद फरमाया ?”

“मैं शुक्रवार के लंच के बारे में सोच रही थी जिसमें कि विघ्न आ गया था ।”

“उसमें आप की क्या गलती थी ?”

“वजह तो मैं थी !”

“अरे, जो बीत गयी, सो बीत गयी ।”

“मैं चाहती हूं वो फिर बीते ।”

“जी !”

“निर्विघ्न डिनर की बाबत क्या कहते हो ?”

“कब ?”

“आज ।”

“कहां ?

“मेरे घर ।”

“पता बोलो ।”

“अरे, पुष्पा विहार, सैक्टर थ्री तो मैंने बोला ही था । सैक्टर थ्री पहुंचकर फोन करना, बोलूंगी आगे कहां पहुंचना है ! जो नम्बर स्क्रीन पर आया है वो सेव कर लो ।”

“वक्त पर फोन न लगा तो ?”

“तो सैक्टर थ्री के एक एक घर की घंटी बजाना । या बुलन्द आवाज में गाना गाना - तू कहां ये बता, इस नशीली रात में माने न मेरा दिल दीवाना । लाइक देवानन्द । नो ?”

“यस । टाइम बोलो ।”

“तुम्हें ऐतराज न हो तो मुझे लेट डिनर पसन्द है ।”

“कितना लेट ?”

“नौ, साढ़े नौ ।”

“इट सूट्स मी फाइन ।”

“मैं इन्तजार करूंगी ।”

लाइन कट गयी ।

राज शर्मा । दि लक्की बास्टर्ड !

इस बार तो न मैंने आंखों में अपना फेमस मिकनातीसी सुरमा लगाया था और न सोचा था कि कच्चे धागे से बंधे सरकार चले आयेंगे । इस बार तो न कच्चे धागे की जरूरत पड़ी थी और न मिकनातीसी सुरमे के करतब की ।

“मानसिक व्याभिचार सम्पूर्ण हो गया हो” - रजनी बोली - “तो इस नश्वर संसार में लौट आइये ।”

मैं हड़बड़ाया ।

“क्या बोला ?” - मैंने नकली तेवर दिखाये ।

“किसी बहन जी का फोन था ।”

“तुझे क्या मालूम ?”

“मुझे ही मालूम । मेरी मौजूदगी में किसी मुर्गाबी जैसी बहन जी का फोन हो तो आप सशंक, छुपी निगाह मेरी तरफ दौड़ाने लगते हैं, चेहरे पर चोर जैसी अलर्टनैस का जाती है और आंखों में गुलाबी डोरे तैर जाते हैं ।”

“मुझे चोर कहती है !”

“अभी ये सब नोट किया मैंने ।”

“अरे, डिटेक्टिव मैं हूं या तू ?”

“इन मामलों में आपकी जासूसी नहीं चल सकती, मेरी ही चलती है ।”

“अच्छा, अच्छा । हम कहां थे ?”

“वहीं, जहां अभी भी हैं । यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस के आफिस में ।”
 
“अरे, जो डिसकशन हमारे में चल रही थी, उसमें हम कहां थे ? हां, याद आया । तू किसी सम्भावित सस्पैक्ट का नाम लेने जा रही थी । नहीं ?”

“हां ।”

“अब ले नाम । सुझा कोई आल्टरनेट सस्पैक्ट ।”

रजनी ने सशंक भाव से मेरे मोबाइल की तरफ देखा ।

“मैं इसे स्विच ऑफ कर देता हूं ।”

“बहन जी लैंड लाइन बजा देगी ।”

“मैं उसके फोन को उखाड़ के खिड़की के बाहर फेंकता हूं ।”

वो हंसी ।

मैंने गहरी सांस ली ।

“शाम तक कुछ कह लेगी या अगली सुबह का इन्तजार करना होगा ?”

“दर्शन सक्सेना ।”

“कौन ?”

“दर्शन सक्सेना ।”

“वो कातिल कैसे हो सकता है ? वो तो सार्थक के खिलाफ गवाह है ?”

“आप तो यूं कह रहे हैं जैसे कह रहे हों कि वो औरत कैसे हो सकता है, वो तो मर्द है !”

मैंने मुंह बाये उसकी तरफ देखा ।

“उसकी गवाही में झोल हो सकता है ।” - रजनी आगे बढ़ी - “उसे याद है कि कत्ल की रात कोई बहुत रौशन रात नहीं थी और गली की, आजू बाजू की दो स्ट्रीट लाइट अरसे से फ्यूज थीं । ऐसे माहौल में फासले से उसने कैसे पहचान लिया कि पड़ोसन के डस्टबिन में कुछ फेंकने वाला शख्स सार्थक था ? दूर से तो क्या, मेरे को तो करीब से भी सारे हमउम्र नेपाली एक से जान पड़ते हैं । क्या उसके साथ ऐसा नहीं होगा ?”

“उसने उसको उसकी कोठी से निकलते देखा था !”

“आपने खुद बोला कि वहां नेपालियों की अक्सर आवाजाही रहती थी । और मैंने बोला कि फासले से सारे हमउम्र नेपाली एक से जान पड़ते हैं । ऊपर से आप कहते हैं कि वे नेपाली ड्रेस पहने था । अब आप बताइये कि उस कथित गवाह ने नेपाली ड्रैस पहचानी या ड्रैस पहने शख्स की सूरत पहचानी ?”

“हूं ।”

“मुझे तो ड्रैस का आडम्बर ही इसलिये किया गया लगता है कि कनफ्यूजन पैदा हो, कोई गवाह निकल आये तो उसकी गवाही में झोल पैदा हो ।”

“अच्छा !”

“हां । अब सोचिये कैसे वो - दर्शन सक्सेना - गारन्टी कर सकता था कि उस रात जिसको उसने देखा था, वो सार्थक था ?”

“शिनाख्त और बातों से भी होती है - जैसे हाव भाव से, चाल ढाल से...”

“नहीं भी होती । पड़ोसी कहां तवज्जो देता है पड़ोसी की इन स्पैशलिटीज की तरफ ! खासतौर से जब कि पड़ोसी कोई मिलनसार शख्स भी न हो !”

“उस शख्स ने झूठी गवाही दी ?”

“दी हो सकती है ।”

“किसलिये ?”

“लो ! ये भी अब मुझे ही बताना पड़ेगा ?”

“हां । सयानी, बड़ी अम्मा जो ठहरी तू ।”

वो हंसी, फिर बोली - “अपने गुनाह की पर्दादारी करने के लिए ।”

“गुनाह ! कत्ल !”

“हां ।”

“कातिल वो ? दर्शन सक्सेना ?”

“हो सकता है । अगर सार्थक निर्दोष है तो किसी ने तो कातिल होना ही है, फिर क्यों नहीं वो ?”

“वजह ?”

“फिर पहुंच गये वहीं ! अरे, मालूम कीजिये । आखिर डिफे... डिटेक्टिव हैं आप !”

मैं खामोश रहा । मैंने मेज पर पड़े अपने डनहिल के पैकेट की तरफ हाथ बढ़ाया लेकिन कुछ सोचकर वापिस खींच लिया ।

“आपने माधव धीमरे के नाम पर बतौर मर्डर सस्पैक्ट विचार किया...”

“क्योंकि खुद सार्थक ने ऐसा सुझाया ।”

“काले चोर ने सुझाया । लेकिन विचार किया । फिर क्यों नहीं दर्शन सक्सेना ने कोठी से निकलते धीमरे को देखा हो सकता और उसे सार्थक समझा हो सकता ?”

“अभी सक्सेना को कातिल बोल रही थी, अभी फिर उसको विटनेस के रोल में ले आयी !”

“मैं बड़े पीडी की सैक्रेट्री हूं ।” - वो शान से बोली - “हर सम्भावना पर विचार करती हूं ।”

“और विचार कर । और सोच ।”

“मैंने गंजी नहीं होना ।”

“अरे, यूं मर्द गंजे होते हैं ।”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

“तो सुनिये । देहरादून से आकर मुम्बई जाने वाली सवारी गाड़ी प्लैटफार्म नम्बर तीन की जगह प्लैटफार्म नम्बर सात पर आ रही है । धन्यवाद ।”

मैं हक्का बक्का सा उसका मुंह देखने लगा ।

वो होंठ दबा कर हंसी ।

“तू नहीं सुधर सकती । तुझे कोई नहीं सुधार सकता ।

“जानते है क्यों ?”

“क्यों ?”

“क्योंकि मैं पहले ही सुधरी हुई हूं । सुधरी को कौन सुधारेगा ।”

“मैं झपकी लेने लगा हूं । मतलब की बात पर पहुंच जाये तो मुझे आवाज देना ।”

“कमला ओसवाल ।” - उसका लहजा संजीदा हुआ ।

“क्या कमला ओसवाल ?”

“अगर एक गवाह खुद कातिल हो सकता है तो दूसरा भी हो सकता है - उन्हीं वजुहात से दूसरा भी हो सकता है जिनसे पहला हो सकता है । जो लॉजिक केस के एक गवाह दर्शन सक्सेना पर लागू है, वो दूसरे गवाह कमला ओसवाल पर भी लागू है ।”

मैंने उसकी बात न काटी ।

क्योंकि मेरा फेवरेट कैण्डीडेट अभी भी माधव धीमरे था ।

जिससे अभी तक भी मेरी मुलाकात नहीं हुई थी ।

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मैंने रोज़वुड क्लब फोन किया तो मालूम हुआ कि उस रोज वो दो बजे से पहले क्लब में उपलब्ध नहीं था ।

मैं मदनगीर पहुंचा । माधव धीमरे के आवास तक पहुंचने में मुझे कोई दिक्कत न हुई । वहां मदनगीर के उस हिस्से में काफी नेपाली बसते थे, जिस पहले शख्स से मैंने पता पूछा, उसने न सिर्फ पता बताया, समझाया बल्कि मुझे खुद वहां तक छोड़ के गया ।

पता एक छोटा सा, क्वार्टरनुमा एकमंजिला मकान निकला ।

मैंने कालबैल बजाई ।

तत्काल दरवाजा खुला और चौखट पर एक नेपाली प्रकट हुआ ।

“माधव धीमरे ?” - मैं बोला ।

“कौन पूछ रहा है ?” - वो सन्दिग्ध भाव से बोला ।

मैंने उसे अपना नाम बताया और एक विजिटिंग कार्ड नजर किया ।

“नाम सुना है मैंने ।” - वो बोला - “अभी हाल ही में । यहां कैसे पहुंच गये ? क्या चाहते हो ?”

“दो मिनट बात करना चाहता हूं ।”

“मैं नहीं करना चाहता ।”

“यानी हो माधव धीमरे !”

उसने हामी न भरी । लेकिन इंकार भी न किया ।

सबसे पहले मैंने उसकी शक्ल सूरत, कद काठ का जायजा लिया ।

कद काठ में वो सार्थक जैसा ही था और उसी की तरह क्लीनशेव्ड था । रंगत और सूरत उसकी टिपीकल नेपाली थी, लिहाजा नेपालियों से गैरवाकिफ कोई शख्स फासले से उसकी शिनाख्त सार्थक के तौर पर करता तो कोई बड़ी बात न होती । ठण्ड में उस मौसम में भी वो एक घिसी हुई जींस और बिना स्लीव की गोल गले की काली टी-शर्ट पहने था ।

“शरद परमार ने कहा था” - मैंने झूठ का सहारा लिया - “कि अगर मैं उस के हवाले से तुम्हारे पास पहुंचूंगा तो तुम मेरे से बात करने में हील हुज्जत नहीं करोगे ।”

शरद के नाम से उसका मिजाज बदला, वो चौखट पर से हटा । मैं भीतर दाखिल हुआ तो मैंने खुद को एक माचिस की डिबिया से जरा बड़े कमरे में पाया । उसने एक कुर्सी की तरफ इशारा किया जिसकी बाबत बरबस मुझे सोचना पड़ा कि वो मेरा वजन सम्भाल पायेगी या नहीं ।

सम्भल कर मैं उस पर बैठा ।

“बोलो ।” - मेरे सामने बैठता वो शुष्क स्वर में बोला ।

वो बहुत उतावला हो के दिखा रहा था । लिहाजा कोई भूमिका बनाने का हाल नहीं था ।

“सुना है” - मैं बोला – “हाल में सार्थक बराल से तुम्हारी कोई पंगेबाजी चल रही थी !”

“अगर ये बात करनी है तो... निकल लो ।”

“बात तो यही करनी है !”

“गो अवे ।”

“शरद सुनेगा कि तुम मेरे से ऐसे पेश आये थे तो क्या सोचेगा वो ! मेरी नहीं तो शरद की तो लाज रखो जो इतनी ऊंची हैसियत वाला होके भी तुम्हें अपना दोस्त मानता है !”

उसकी त्योरी ढ़ीली पड़ी ।

मैंने फिर अपना सवाल दोहराया । और जोड़ा - “तुमने उसकी कार की हैडलाइट फोड़ दी थी !”

“कौन बोला ऐसा ?” - वो फिर भड़कने को हुआ - “वो साला सार्थक ही बोला होगा !”

“कोई बोला । तुम बात की तसदीक करो या उससे इंकार करो ।”

“हां, फोड़ी थी मैंने सार्थक की सान्त्रो की हैडलाइट । करता न कुछ मेरे खिलाफ ! कोई एक्शन ले के दिखाता ।”

“उसकी बीवी का भी फाश ढ़ण्ग से जिक्र किया ! धमकी दी कि उसकी गुस्ताखी का खामियाजा श्यामला को भुगतना पड़ेगा । भुगतना पड़ा । जान से गयी बेचारी । लिहाजा जो कहा, वो कर दिखाया !”

“डोंट टाक नानसेंस ! मेरे पास श्यामला के कत्ल की आयरनक्लैड एलीबाई है जिसे कोई नहीं हिला सकता ।”

“लोन शार्किंग तुम्हारा रेगुलर साइड बिजनेस है ।”

“बिजनेस नहीं है, सबाब का, पुन्य का काम है । इस तरीके से मैं फैलो नेपालियों की हैल्प करता हूं साथ में थोड़ी सी अपनी भी हैल्प कर लेता हूं तो क्या गुनाह करता हूं ? मैं कोई साधु महात्मा धर्मात्मा तो नहीं ! वालंटियर तो नहीं ! जो लोगों को फोकट में माली इमदाद पहुंचाऊं ! मुफ्त में कुछ नहीं मिलता इस दुनिया में, मिस्टर । न मुझे, न सार्थक को, न किसी और को । समझे ?”

“तुम रोजवुड क्लब में बतौर मैनेजर मुलाजिम हो । कितनी तनख्वाह है ?”

“तुमसे मतलब ?”

“लाख से कम क्या होगी ! या डेढ़ लाख ! दो लाख !”

“पागल हुए हो !”

“कोई और प्रॉफिटेबल साइड बिजनेस ?”

“किस फिराक में हो ?”
 
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