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Thriller इंसाफ

मैं कैसे उसे समझाता कि मर्द से धोखा खाना औरत का प्रारब्ध था । आदिकाल से ऐसा ही चला आ रहा था । कैसे समझाता कि प्यार और वासना में सूई की नोक जितना ही फर्क होता था । कैसे समझाता कि मर्द की भंवरे वाली फितरत नहीं बदल सकती थी ।

“शायद ये आपका भ्रम हो !” - फिर भी मैंने उसे तसल्ली देने की कोशिश की ।

उसने जवाब न दिया, मुझे लगा कि वो अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रही थी ।

मैं उठ कर उसके पहलू में पहुंचा और उसकी पीठ थपथपाकर उसे सांत्वना देने लगा ।

वो हौले से मेरे साथ आ लगी, उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया और आंखें बन्द कर लीं ।

मैंने उसका वो गाल सहलाया जो मेरे कन्धे के साथ लगा हुआ था और उसके जो आंसू पोंछे जिनका कोई वजूद नहीं था । मेरा दूसरा हाथ उसके कन्धों के गिर्द से सरक कर पीठ पर पड़ा, पीठ से कमर तक पहुंचा और और भी उत्तर दक्षिण कई जगह भटका ।

उसने कोई ऐतराज न किया ।

मैंने और हिम्मत की, मैंने दायें हाथ की एक उंगली उसकी ठोढी के नीचे टिकाकर उसका चेहरा ऊंचा किया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये ।

वो कसकर मेरे साथ लिपट गयी ।

कई क्षण यथापूर्व स्थिति बनी रही । फिर एकाएक वो मेरे से अलग हुई ।

“दरवाजा खुला है ।” - वो हांफती सी बोली ।

“लेकिन” - मैं बोला - “केयरटेकर के आने में तो अभी बहुत वक्त है ।”

“इत्तफाकन जल्दी आ सकता है ?”

“ओह ! तो दरवाजा बन्द करें ।”

“जाने दो अब ।”

मैंने जाने दिया ।

वो किसी की ब्याहता बीवी थी, किसी की माशूक थी, फिर भी उस पर ‘अवेलेबल’ का साइन बोर्ड लगा हुआ था । तभी तो सयाने कहते हैं कि औरत अभिसाररत भी हो तो एक हाथ फ्री रखती है ताकि किसी दूसरे कद्रदान, मेहरबान को वेव करने का स्कोप बना रहे ।

त्रिया चरित्रम्, पुरुषस्य भाग्यम्; दैवो न जानियेत्, कुतो मनुष्य: ।

मैं उस घड़ी उसका चरित्र देख रहा था और अपना भाग्य देख रहा था ।

बाज औरतें पंचायती हुक्का होती हैं जिन्हें कोई भी गुड़गुड़ा सकता है ।

फर्क भी क्या पड़ता था !

कहीं कोई मीटर तो लगा हुआ था नहीं ! फिर फिरंगियों की जुबान में कहते ही हैं कि ‘वन्स ए केक इज कट, नोबॉडी मिसिज ए पीस’ ।

यानी एक बार संतरा छिल जाये तो एक फांक की घट बढ़ का क्या पता लगता था ।

उस विषय पर से अपना ध्यान हटाने के लिये मैं बोला - “आपकी सार्थक के शेफाली की तरफ झुकाव वाली बात मुझे कतई हजम नहीं हो रही । जरूर ये आपका वहम है ।”

“तुम कहो” - वो बोली - “कि शेफाली का झुकाव तुम्हारी तरफ है तो मैं मान लूंगी मेरा वहम है ।”

उसकी उस बात ने मेरे सामने धर्म संकट खड़ा कर दिया था ।

क्या मैं उसकी खातिर झूठ बोलूं ? और नहीं तो इसलिये झूठ बोलूं कि अभी खातिर करा के हटा था !

“मेरी उससे हालिया मुलाकात है ।” - मैं बोला - “अभी पिछले शुक्रवार ही मैं उससे पहली बार मिला था ।”

“तो ?” - वो बोली ।

“शेफाली भली लड़की है ।”

गुजश्ता सारी रात मेरे साथ गुत्थमगुत्था थी भली लड़की ।

“वो तो वो है !” - उसने मेरी राय को मोहरबन्द किया ।

“माधव धीमरे की बाबत क्या कहती हैं ?”

“सार्थक उसका अस्सी हजार रुपये का कर्जाई था । जिस रात श्यामला का कत्ल हुआ था, उस रात धीमरे ने अपनी रकम कलैक्ट करने के लिये मोतीबाग जाना था । उससे पहले हमारी सीक्रेट मीटिंग प्लेस पर सार्थक मुझे मिला था और तब मैंने धीमरे को लौटाने के लिये उसे अस्सी हजार रुपये दिये थे । उसकी धीमरे से मुलाकात का दस बजे का टाइम पहले से फिक्स था लेकिन” - उसके चेहरे पर एक रंगीन मुस्कान आई - “तुम जानते ही होगे दो चाहने वालों की सीक्रेट मुलाकात में क्या होता है ! वन थिंग लीड्स टु एनदर । टाइम का पता ही नहीं चला ।”

“आखिर कब फ्री हुआ, वहां से कब गया सार्थक ?”

“ग्यारह तो बज ही गये थे । मेरे खयाल से साढ़े ग्यारह होने वाले थे या हो चुके थे ।”

“आप लोगों की सीक्रेट मीटिंग प्लेस से मोतीबाग में उसका घर कितनी दूर था ?”

“ज्यादा दूर नहीं था । बड़ी हद दस मिनट में मोतीबाग पहुंचा जा सकता था ।”

“ये है वो सीक्रेट प्लेस ?”

“नहीं ।”

“आपके पति को मालूम है कि जिस रात श्यामला का कत्ल हुआ था, उस रात आप सार्थक के साथ थीं ?”

“मेरे खयाल से नहीं । मेरे घर लेट पहुंचने की वजह से कुछ सूझ गया हो तो बात दूसरी है वर्ना नहीं ।”

“उसे आपके लौटने की खबर लगी थी ?”

“हां ।”

“कुछ बोला नहीं ? कोई कमेंट न किया ?”

“भई, हम एक दूसरे से तभी कलाम करते हैं जब तकरार करनी हो, लड़ना झगड़ना हो ।”

“आई सी । बाई दि वे, सार्थक की बाबत एक गुड न्यूज है मेरे पास ।”

“क्या ?”

“उसकी जमानत की रकम का इन्तजाम हो गया है । कल वो रकम जमा करा दी जायेगी, फिर परसों या उससे अगले दिन वो बाहर आ जायेगा ।”

उसकी शक्ल से न जाने क्यों मुझे यूं लगा जैसे उस गुड न्यूज से उसे कोई गुडनैस हासिल नहीं हुई थी ।

“क्या बात है ?” - मैं पूछे बिना न रह सका - “आपको इस खबर से कोई खुशी न हुई ?”

वो खामोश रही ।

“शायद आप समझती हैं वो आजाद हो कर आपकी बाबत मुंह फाड़ेगा ।”

“वो बात नहीं है ।”

“तो ?”

“उसका आजाद होना उसके लिये खतरनाक साबित हो सकता है, उसका कोई बुरा अंजाम हो सकता है ।”

“आपके पति के किये ?”

“शरद के किये । उसका मिजाज वैसे ही वायलेंट है, आजकल और वायलेंट हो गया है ।” - वो एक क्षण ठिठकी, फिर बोली - “उस रोज क्लब में बहुत बढ़िया हैंडल किया तुमने उसे । बहन को हिट करने लगा था । कामयाब हो जाता तो बुरा होता । तुम्हारी वजह से तो लोगों को पता ही न चला कि उसका इरादा क्या था !”

“शरद की फौजदारी नहीं चलेगी ।”

“कैसे रोकोगे ?”

“जैसे शुक्रवार को रोकी थी । सार्थक बाहर आ जायेगा तो मैं उसे अपने साथ अपने घर में रखूंगा ।”

“तुम ऐसा करोगे ?”

“इरादा तो है ! उसी ने मना कर दिया तो बात दूसरी है ।”

“आखिर क्या होगा ?”

“आखिर वो बरी होगा । जब आप इतने दावे के साथ कहती हैं कि कातिल माधव धीमरे है तो क्यों नहीं होगा ! ऊपर वाले के घर देर है, अन्धेर नहीं है ।”

“लेकिन कहने से क्या होता है ! कोई साबित भी तो करके दिखाये कि कातिल वो है !”

“होगा । आखिर साबित होगा । और किसी तरीके से नहीं होगा तो आपकी गवाही से होगा ।”

“उससे सार्थक बरी होगा, धीमरे मुजरिम थोड़े ही साबित हो जायेगा ?”

“पुलिस भी तो कुछ करेगी ? जब वो बरी हो जायेगा तो क्या के किसी आल्टरनेट कैंडीडेट पर तवज्जो नहीं देगी ? और फिलहाल तो आल्टरनेट कैंडीडेट धीमरे ही दिखाई दे रहा है ।”

“हूं ।”

“गवाही की बाबत आपका क्या इरादा है ?”

“मैं एडवोकेट महाजन पर जाहिर कर चुकी हूं । जब तक मेरे पति के मन्त्री पद का कोई फाइनल नतीजा सामने नहीं आ जाता, मैं कोर्ट में खड़ी होकर गवाही देने को तैयार नहीं ।”

“ये आपका दृढ़ निश्चय है ?”

“हां ।”

“ठीक है फिर” - मैं उठ खड़ा हुआ - “फिर तो कुछ कहना सुनना । बाकी नहीं रह गया । फिर तो मुझे इजाजत दीजिये ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया और खुद भी उठ कर खड़ी हुई ।

मेरे साथ वो मेन डोर पर पहुंची ।
 
वहां मैं एक क्षण को ठिठका, उसकी तरफ घूमा - “हाउ अबाउट वन फार दि रोड ?”

तत्काल वो मेरी बांहों में आ गयी ।

प्रगाढ़ आलिंगन और चुम्बन का आदान प्रदान हुआ ।

औरत और कुछ समझे न समझे, फाश इशारा गोली की तरह समझती है ।

अपने आपको सब्र का सबक देते हुए मैं उससे अलग हुआ । मैं कोठी से बाहर निकल कर सड़क पर पहुंचा और अपनी कार में सवार हुआ ।

तभी मुझे एक बीएमडब्ल्यू कार वहां पहुंचती दिखाई दी । वो और करीब आ गयी तो मैंने देखा उसे एक वर्दीधारी ड्राइवर चला रहा था और उसकी पिछली सीट पर सांसद आलोक निगम विराजमान था ।

उसकी खुर्दबीनी निगाह का शिकार होते मैंने अपनी कार को रफ्तार दी ।

पता नहीं उसको खबर लगी थी या नहीं कि तभी मैं उसी की कोठी में से बाहर निकला था ।

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अगले दिन सार्थक की जमानत हो गयी ।

लेकिन कागजी कार्यवाही मुकम्मल होने में और उसे रिहा किये जाने में शाम हो गयी ।

तब पूर्वनिर्धारित प्रोग्राम के तहत उसे मेरे हवाले कर दिया गया । वकील ने उसे समझा दिया कि क्यों ऐसा किया जाना जरूरी था, उसने खामोशी से समझ लिया । यानी उसे मेरे साथ रहने से कोई ऐतराज नहीं था ।

मीडिया की तवज्जो से सार्थक को एडवोकेट महाजन ने बचाया । उसकी जगह वो मीडिया के रूबरू हुआ । सार्थक की जगह उसने मीडिया को बयान दिया कि इतने दिन जेल में गुजारे होने की वजह से वो बीमार हो गया था ।

जबकि वो पूरी तरह से हट्टा कट्टा और तन्दुरुस्त था ।

पिछले साल भगवान दास रोड शिफ्ट करने से पहले मैं ग्रेटर कैलाश पार्ट वन के एक छोटे से फ्लैट में रहता था जो कि इमारत की पहली मंजिल के फ्रंट में था । मेरे से वाकिफ लोगबाग ये तो जानते थे कि मैंने वहां से शिफ्ट कर लिया था लेकिन ये नहीं जानते थे कि ग्रेटर कैलाश वाला फ्लैट अभी भी मेरे कब्जे में था और वैसे ही फर्निश्ड था जैसे मैं वहां रहता था तो था । वहां से मैंने कुछ नहीं हटाया था, भगवान दास रोड वाले फ्लैट के लिये मैंने हर चीज नयी खरीदी थी । मुझे सार्थक को वहां ले के जाना श्रेयस्कर लगा ।

उसने मेरे दो कमरों के फ्लैट का मुआयना किया जिसमें बैडरूम बड़ा था और सिटिंग रूम छोटा था ।

“एक ही बैडरूम है ।” - वो होंठों में बुदबुदाया ।

“लेकिन उसमें बैड किंग साइज है ।” - मैंने आगाह किया - “आठ गुणा आठ फुट साइज की ।”

“मैं ड्राईंगरूम के सोफे पर सो सकता हूं ।”

“कड़ाके की ठण्ड का मौसम है । सोच लो ।”

“मुझे कोई प्राब्लम नहीं होगी । कम्बल एक एक्स्ट्रा दे देना ।”

“मर्जी तुम्हारी । तो आखिर जमानत हो ही गयी !”

“हां, भई । नर्क से छुटकारा मिला ।”

“फंसे बुरे !”

“किस्मत की बात है । मालिक के हाथ है ।”

“तुम इसलिये फंसे क्योंकि तुम्हारा भाई तुम्हें ठीक से सपोर्ट न कर सका । तुम्हें मजबूत एलीबाई न दे सका ।”

“अब उस बात का जिक्र बेकार है ।”

“जिक्र बेकार नहीं है अगरचे कि उसने जानबूझ कर अपनी एलीबाई को बंगल न किया हो !”

“जानबूझ के ?”

“हां ।”

“नानसेंस ! वो भला क्यों करेगा ऐसा ?”

“कत्ल में अगर उसका रोल है तो क्यों नहीं करेगा ?”

“कैसा रोल ?”

“अगर तुमने नहीं किया तो कत्ल उसने किया हो सकता है ।”

“अटर नानसेंस ! कातिल माधव धीमरे है ।”

“किसी का नाम ले देने से कोई कातिल नहीं बन जाता । इलजाम तभी अपने पैरों पर खड़ा हो पाता है जबकि उसे सबूतों की मजबूत सपोर्ट हासिल हो । तुम्हारे पास धीमरे के खिलाफ कोई सबूत नहीं है ।”

“सबूत तुम तलाश करो । सुना है मोटी फीस पर काम कर रहे हो ! दिखाओ कुछ करके । करो कोई करतब ?”

“मेरे पास कोई जादू का डण्डा नहीं है जो मैं...”

“अच्छा, नहीं है ! वकील तो कुछ और ही कहता था !”

“क्या कहता था ?”

उसने जवाब न दिया ।

“पीडी का काम तफ्तीश से चलता है । तुम भी मेरी तफ्तीश का हिस्सा हो । मालूम !”

“हूं तो क्या ?”

“तो ये कि जो पूछूं उसका जवाब दो ।”

“पूछो ।”

“श्यामला का किसी से अफेयर था ?”

“मुझे खबर नहीं ।”

“हो सकता था ?”

“होने को क्या नहीं हो सकता !”

“तुम्हारे से ठीक पेश आती थी ? जैसे एक निष्ठावान पत्नी को पति से, पति परमेश्वर से पेश आना चाहिये ?”

वो परे देखने लगा ।

“जवाब दो ।” - मैंने जिद की ।

“नहीं ।” - वो कठिन स्वर में बोला ।

“तुम्हारे वैवाहिक अधिकारों को नजरअंदाज करती थी ?”

“हां । अक्सर ।”

“मैं शेफाली से मिला था । वो कहती है कि श्यामला और शरद में गहरे ताल्लुकात थे ।”

“गहरे ताल्कुकात से क्या मतलब है तुम्हारा ?”

“ऐसे वैसे ताल्कुकात थे ।”

“पागल हुए हो ! वो भाई बहन थे ?”

“शेफाली ने अपनी आंखों से देखा ।”

“क्या ? क्या देखा ?”

“वही जो नहीं देखना चाहिये था ! जो नहीं होना चाहिये था !”

“सच कहते हो ?”

“अगर शेफाली सच कहती है तो सच कहता हूं ।”

“और क्या कहती है ?”

“और भी बहुत कुछ कहती है । जो कहती है उसे खुद समझो । गन्दगी कुरेदने का नामुराद काम मेरे से क्यों कराते हो ?”

“हूं ।”

वो खामोश हो गया ।

मैं उसके दोबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

वो दोबारा बोला तो उसके स्वर में उग्रता नहीं थी, बल्कि दयनीयता थी ।

“शेफाली ने एक दो बार ऐसा हिन्ट तो दिया था” - वो दबे स्वर में बोला - “लेकिन वो नाकाबिलेयकीन बात थी इसलिये मैं समझा था कि मैं हिन्ट को गलत कैच कर रहा था । खोल के करने लायक बात नहीं थी, आखिर वो मेरी साली थी और वो एक बेहूदा सब्जेक्ट था । दूसरे, मैं जानता था वो अपनी छोटी बहन को कोई खास पसन्द नहीं करती थी । वजह मुझे मालूम नहीं लेकिन वो श्यामला से कुढ़ती थी । इसलिये भी मैंने सोचा कि उस मामले में वो नाहक एक की आठ लगा रही थी ।”

“मुझे तो वो सच बोलती जान पड़ी थी ! बहुत इमोशनल थी वो इस मामले में । रोने लगी थी ।”

“तो सच कहती होगी । देखो, भाई, वो नाम के भाई बहन थे । असल मैं न उनकी मां एक थी, न बाप एक था । उस लिहाज से उनके ताल्लुकात कोई ऐसे तो हाहाकारी नहीं थे कि सुन कर कान पक जाते ! फिर कमउम्री की बातें थी ! बड़े लोगों की बातें थीं । जितना ज्यादा कोई बड़ा उतनी ज्यादा पोल उसके ढोल में । नहीं ?”

“हां । चलो, माना कि वो कमउम्री का जुनून था । अब सवाल ये है कि क्या श्यामला की शादी के बाद भी उसके और शरद के बीच वो ताल्लुकात कायम थे !”

“भई, ये वाहियात बात है, मैं इसके जिक्र से परेशान हूं । मैं दूसरे तरीके से एक बात बोलता हूं ।”

“बोलो ।”

“जब मैं ‘रोज़वुड’ में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी करता था तो शरद मेरे से बहुत अच्छी तरह से पेश आता था, सोशल स्टेटस में इतना फर्क होने के बावजूद मेरे से दोस्त जैसा बर्ताव करता था । लेकिन ज्यों ही उसे मेरे श्यामला से अफेयर का हिन्ट मिला, वो बेरुखी दिखाने लगा । हमने शादी कर ली तो बिल्कुल ही होस्टाइल हो गया । तब उसके मिजाज में एकाएक आयी तब्दीली मेरी समझ से बाहर थी लेकिन अब जबकि तुम दावे के साथ ये एक नयी बात बता रहे हो तो जो असल बात पहले मेरी समझ में नहीं आयी थी वो अब कील ठोक के आ रही है । जरूर वो मेरे से इसलिये खफा था क्योंकि मैं उसके सामान का मालिक बन बैठा था ।”

“हूं ।”

“अब मेरे को ये भी याद पड़ता है कि वो दोनों बहुत लड़ते झगड़ते रहते थे लेकिन अब तो लगता है कि वो तकरारबाजी दिखावा था, असलियत पर पर्दा डालने का ड्रामा था । हे भगवान ! मर्द जब पति बन जाता है तो कैसे अक्ल और आंख दोनों का अंधा हो जाता है !”

जैसे वो कुछ कम था ! शादीशुदा, उम्र में बड़ी औरत से अफेयर था और जाहिर यूं कर रहा था जैसे बड़ा फेथफुल हसबैंड था । यानी एक ही काम जब मर्द करे तो ‘होता है, यार । चलता है, भई,’ औरत करे तो गोली मार देने के काबिल । मर्द करे तो एडवेंचरिस्ट, औरत करे तो छिनाल । कैरेक्टरलैस !

“तुम्हारे से शादी कर लेने को” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “हो सकता है शरद ने इस निगाह से देखा हो कि उसके साथ धोखा हुआ था, दगाबाजी हुई थी । इस लिहाज से क्या वो श्यामला का कातिल हो सकता है ?”

“मैं इस बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कर सकता । लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि शरद मिजाज का तीखा है, बहुत जल्दी भड़कता है, किसी से भी पंगा लेने को, झगड़ा मोल लेने को हर घड़ी तैयार रहता है । खुद मेरे साथ कई बार यूं बददिमागी से पेश आया था कि हाथापाई की नौबत का गयी थी । ऊपर से हैवी ड्रिंकर है । ऐसा शख्स जाने अनजाने क्या न कर गुजरे, पता लगता है !”

“ये बात तो तुम्हारी ठीक है ! उसके मिजाज का मजा तो मैं भी चख चुका हूं ।”

“अच्छा ! कैसे ? कब ?”

मैंने उसे शुक्रवार के ‘रोज़वुड’ के वाकये की बाबत बताया ।

“कमाल है !”

“इतने बखेड़े खड़े करता है, कभी पुलिस के फेर में नहीं पड़ा ?”

“पड़ता है । रोडरेज के मामलों में कई बार पुलिस आती है लेकिन ज्यों ही पता चलता है किसका बेटा है, किसका भांजा है, पुलिस वाले दूसरी पार्टी को दोषी ठहराने लगते हैं । एक बार मेरे से भी लड़ा था तो पुलिस आ गयी थी । ज्यों ही उन्हें पता लगा कि वो बड़े बिल्डर का बेटा था, एमपी का भांजा था और मैं नेपाली था तो तो फौरन झगड़ा शुरू करने के लिये मुझे जिम्मेदार ठहराने लग गये थे । यहां तक बोले कि हम नेपाली गैरकानूनी ढ़ण्ग से हिन्दोस्तान में घुस आते थे और यहां की अमन शान्ति भंग करते थे ।”

“गलत है । नाजायज है ।”

“मेरे मोतीबाग के एक पड़ोसी ने ही एक बार मेरी ये गत बनाई थी ।”

“किसने ?”

“जो सड़क के पार ऐन हमारे सामने रहता है ।”

“दर्शन सक्सेना ?”

“यही नाम होगा !”

“क्या हुआ था ?”

“छोटी सी तकरार हुई । गुस्से में मेरे मुंह से निकल गया ‘आई विल किल यू’ । उसने पुलिस बुला ली । मैंने समझाने की कोशिश की कि कोई झगड़े की गर्मागर्मी में ऐसा कहता है तो कर थोड़े ही डालता है ! लोग बाग ताव में आकर मां की गाली देते हैं, बहन की गाली देते हैं तो जाके मां बहन से बलात्कार तो नहीं करने लगते ! सब-इन्सपेक्टर को बराबर मेरी बात जंची लेकिन ज्यों ही उसे पता चला कि मैं नेपाली था, पलटी खा गया । सारे बखेड़े के लिये मुझे जिम्मेदार ठहराने लग गया । बड़ी मुश्किल से जान छूटी ।”

“तकरार की वजह क्या थी ?”

“वजह तो बड़ी थी, इतनी बड़ी कि मैं सब न दिखाता तो वैसी तकरार कई बार हो चुकी होती ।”

“क्या वजह थी ?”

“जासूसी करता था । श्यामला को ताड़ता था । और ये उसका एकाध बार का नहीं, हमेशा का शगल था ।”

“क्या करता था ?”

“दूरबीन से हमारे घर को बीनता रहता था । कई बार देखा मैंने । उसकी कोठी में बेसमेंट है जिसकी वजह से कोठी सड़क के लैवल से पांचेक फुट ऊंची है । अपने ड्राइंगरूम की खिड़की से मैंने कई बार उसे हमारे घर पर दूरबीन फोकस किये देखा था ।”

“ओह !”

“अक्सर बहाने से हमारे यहां आता था और श्यामला से बतियाने लगता था ।”

“ठरकी था !”

“या मैंटल था । मैंने धमकाया उसे एकबार कि अगर मैंने फिर कभी उसकी दूरबीन अपने घर पर फोकस देखी तो दूरबीन उसके हलक में घुसेड़ दूंगा ।”

“पक्की बात कि हलक ही बोला था ?”

वो हंसा, तत्काल संजीदा हुआ ।

“पुलिस को रपट लिखवाने की न सोची ?”

“पुलिस ! हा हा हा । एक बार थोड़ा पकड़ के झिंझोड़ा भर था तो आई थी न पुलिस ! मुझे दोषी करार दे कर गयी थी ।”

“दूरबीन से देखता क्या था ?”

“अब क्या बोलूं क्या देखता था ! जो देखता था उसके लिये श्यामला भी जिम्मेदार थी ।”

“वो कैसे ?”

“घर में नंगी फुंगी फिरती थी । तरीके से तन नहीं ढ़ंक के रखती थी । गर्मियों में बई बार तो बस छोटी सी निक्कर चढ़ा लेती थी और और कुछ भी नहीं ।”

“ब्रा भी नहीं ?”

“न ! मैंने कई बार टोका, नहीं सुनती थी । कहती थी ऐसे वो कम्फर्टेबल फील करती थी ।”

“पर्दा ! घर की फरनिशिंग में एक आइटम पर्दा भी होती है ?”

“नहीं पड़ा होता था ड्राईंगरूम की खिड़की पर । टोकने पर कह देती थी खींचना भूल गयी । असल में जो करती थी, जानबूझ कर करती थी क्योंकि नुमायश का शौक था । जिस्म की नुमायश करके खुश होती थी, सुख पाती थी ।”

“फिर पड़ोसी ही तो पूरी तरह से गलत न हुआ न !”

“क्यों न हुआ ? श्यामला बेगैरत होकर दिखाती थी तो उसकी गैरत तो नहीं मर गयी थी ! बुजुर्गी में कदम था उसका ! अपना नहीं तो अपनी उम्र का ही लिहाज करता !”

उसकी लॉजिक में नुक्स था लेकिन मैंने उसे न टोका ।

“तुम श्यामला पर हाथ उठाते थे ?”

“कौन कहता है ? शेफाली ?”

“शरद ।”

“तुम्हारे से बोला ?”

“पुलिस से बोला । पुलिस से मेरे को मालूम हुआ ।”

“कमीना साला !”

“ये बोलो कि बात सच है कि नहीं ?”

“एक बार, सिर्फ एक बार ऐसी नौबत आयी थी । हमारे में भीषण तकरार छिड़ गयी थी जो कि कोई नयी बात भी नहीं थी । गुस्से में वो एक वास उठा कर मुझे मारने दौड़ी थी । मार्बल का वास था । एक ही वार मुझे हस्पताल पहुंचाने के लिये काफी होता । तब मैंने उसे एक झापड़ रसीद किया था - वो भी उसको चोट पहुंचाने के लिये नहीं, उसके होश ठिकाने लगाने के लिये । बस वो एक वाकया हुआ था हाथ उठाने का जिसका कि मैं गुनहगार हूं । कोई कहता है कि ऐसा अक्सर होता था तो झूठ बोलता है, बकवास करता है ।”

“आई सी ।”

उसकी बातों से और कुछ साबित होता या न होता, एक बात तो साबित होती थी ।

उसे अपनी बीवी की मौत का कोई अफसोस नहीं था । उसकी बाबत वो जरा जज्बाती नहीं था, पेरिशेबल आइटम की तरह उसका जिक्र कर रहा था ।

“रॉक डिसिल्वा के बारे में क्या कहते हो ?” - मैं बोला - “कभी उसका श्यामला की तरफ कोई रुझान नोट किया था ?”

“नानसेंस ! अरे वो गे है । हर किसी को मालूम है ।”

मैं पूछना चाहता था कि कैसे हर किसी को मालूम था लेकिन तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी ।

मैंने काल रिसीव की ।

संगीता निगम लाइन पर थी ।

लेकिन वो मेरे से नहीं, मेरे मेहमान से बात करना चाहती थी ।

मैंने फोन सार्थक की तरफ बढ़ा दिया ।

सार्थक ने तनिक हड़बड़ाते हुए फोन थामा और कान से लगाया ।

दूसरी तरफ से आती आवाज सुनाई देते ही उसका मिजाज तब्दील हुआ, वो उछलकर खड़ा हुआ और लम्बे डग भरता बैडरूम में दाखिल हो गया ।

माशूक की काल जो ठहरी ! मेरे सामने कैसे रिसीव कर सकता था !

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मैं फरीदाबाद पहुंचा ।

सार्थक को मैं सख्त हिदायत देकर आया था कि बेवजह वो घर से बाहर कदम न रखे । उसकी हर सुख सुविधा का इन्तजाम मैं या तो करके आया था या उसे समझा के आया था कैसे कौन सा इन्तजाम फोन पर हो सकता था ।

मैटल बाक्स कारपोरेशन का आफिस तलाश करने में मुझे कोई दिक्कत न हुई ।

उनका इलैक्ट्रिकल इंजीनियर दर्शन सक्सेना वहां मौजूद था ।

उसके छोटे से केबिन में मेरी उससे मुलाकात हुई ।

मुझे देखकर वो हैरान हुआ, फिर जब मालूम पड़ा कि मैं उसी से मिलने आया था तो उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये ।

“मैंने घर नहीं पहुंचना था ?” - वो बोला ।

“दरअसल” - मैंने निर्दोष मुस्कराहट से उसे नवाजा - “मैं इधर से गुजर रहा था । सोचा, मिलता चलूं ।”

“इधर से गुजर रहे थे !” - उसके स्वर में अविश्वास का स्पष्ट पुट था ।

“दूसरे, मैं उतावला जरा ज्यादा हूं ।”

“क्या चाहते हो ?”

“छोटी मोटी बात करना चाहता हूं ।”

“करो ।”

मैंने दूरबीन से सार्थक की कोठी में तांक झांक वाली बात उसे सरकाई ।

वो बहुत खफा हुआ ।

“क्या बकवास है ये ?” - वो गुस्से से बोला ।

“ये बकवास है कि आप अपने ड्राईंगरूम की खिड़की में खड़े होकर दूरबीन के जरिये अक्सर श्यामला को ताड़ते थे ?”

“हां, बकवास है । उस मादर... सार्थक ने बोला होगा ऐसा !”

“बोला तो उसी ने है !”

“फेंकता है साला । चण्डूखाने की उड़ाता है । क्योंकि मेरे खिलाफ है । क्योंकि एक बार मेरे गले पड़ा था तो मैंने पुलिस बुला ली थी । बड़ी मुश्किल से गिरफ्तार होने से बचा था । तभी से कुढ़ता भुनता है कमीना । अब वाही तबाही बक के तब की भड़ास निकालता है ।”

“हो सकता है ।”

“है ।”

“जरूर । जरूर । आपके पास तो, खुदा खैर करे, दूरबीन भी नहीं होगी !”

वो सकपकाया ।

“या है बाई चांस ?”

“है । लेकिन उस वाहियात काम के लिये नहीं है जिसका वो साला गोरखा मेरे पर इलजाम लगाता है ।”

“तो किस काम के लिये है ?”

“बर्ड वाचिंग के लिये है । हॉबी है मेरी बर्ड वाचिंग जिसके लिये मैं अक्सर ओखला जाता हूं असोला जाता हूं ।”

“बढ़िया हॉबी है । बर्ड्स को वाच करने का शौक मेरे को भी है लेकिन मैं वो जुदा तरीके से पूरा करता हूं और मेरा शौक चिड़िया फाख्ता तक ही सीमित है ।”

उसके चेहरे पर उलझन के भाव आये । प्रत्यक्षत: मेरी बात का मर्म उसके पल्ले नहीं पड़ा था ।

मैंने तसवीरों वाला वो लिफाफा जेब से निकाला जो शेफाली परमार की फैंसी मेड ने मुझे दिया था । मैंने उसमें से माधव धीमरे की तसवीर निकाली और उसे पेश की ।

“पहचानते हैं ?” - मैंने सवाल किया ।

“कहना मुहाल है । ...हम्म ...ये कम्प्यूटर प्रिंट आउट है इसलिये शार्प नहीं है । कैमरा प्रिंट होता तो... है कौन ये । क्या नाम है ?”

“नाम माधव धीमरे है । रोज़वुड क्लब में मैनेजर है । नेपाली है ।”

“नेपाली है ! ओह ! ओह ! अब आया पहचान में । ये शख्स सामने कोठी में आता जाता था । हाल ही में आया था । शायद नशे में था, क्योंकि कमला ओसवाल की कोठी की घन्टी बजा दी थी ।”

“आपको कैसे मालूम ?”

“कमला ने खुद बताया था । उसके गेट पर पहुंव जाने के बाद भी जिद कर रहा था कि सही जगह पहुंचा था । बड़ी मुश्किल से टला था ।”

“लगता है कमला ओसवाल से आपके अच्छे ताल्लुकात हैं !”

“हैं तो सही ।”

“फ्रेंडली ?”

“वो भी । लेकिन खबरदार जो और कुछ कहा ।”

“हो गया, जनाब, मैं खबरदार ।”

“वो तनहा औरत है । मेरी तरह कोठी में अकेली रहती है । कई बार फुरसत में मिलने चला जाता हूं एक चाय की प्याली शेयर करके लौट आता हूं । ऐनी प्राब्लम इन दैट ?”

“नो, सर, नो प्रॉब्लम । अच्छे पड़ोसियों को तो ऐसे मिलते जुलते रहना ही चाहिये ।”

“वही तो ?”

“कत्ल की रात को क्या आपने इस शख्स को देखा था ?”

“नहीं ।”

“जनाब, जरा सोच के जवाव दीजिये । दरख्वास्त है ।”

“सोच के ही जवाब दिया है । नहीं देखा था ।”

“अब ये तसवीर देखिये ।” - मैंने उसे शिखर बराल की तसवीर दिखाई ।

उसने एक उड़ती निगाह तसवीर पर डाली ।

“ये तो वही है !” - फिर बोला ।

“वही कौन ?”

“भई, वही कम्बख्त जो मेरे गले पड़ा था ।”

“सार्थक ?”

“हां ।”

“ये सार्थक की तसवीर है ?”

“हां ।”

“पक्की बात ?”

“पक्की कच्ची बात का क्या मतलब ?”

“प्लीज, जवाब दीजिये ।”

“हां, पक्की बात ।”

“जनाब, ये सार्थक के भाई की फोटो है ।”

“क्या बोला ?”

“ये सार्थक के बड़े भाई शिखर की फोटो है ?”

“तो... तुमने मुझे उल्लू बनाया !”

“नहीं, जनाब । खाली आपकी याददाश्त को, आपकी मेंटल अलर्टनैस को चैक किया ।”

“वो भी क्यों किया ?”

“सर, आई एम इनवैस्टिगेटिंग ए केस । जो जरूरी समझा, वो किया ।”

“मोटे तौर पर ये सारे गोरखे साले एक जैसे ही लगते हैं ।”

“लेकिन होते तो नहीं एक जैसे ! फिर आप कोई मामूली आदमी तो हैं नहीं ! आप तो श्यामला के मर्डर के केस में पुलिस के गवाह हैं !”

“यू सैड इट, मिस्टर प्राइवेट डिटेक्टिव, मैं पुलिस का गवाह हूं और पुलिस के पास अपनी गवाही दर्ज करा चुका हूं । केस की बाबत मेरा तुम्हारे से कोई बात करना जरूरी नहीं । ए वर्ड टु दि वाइज । नाओ, प्लीज गो अवे ।”

“अभी । अभी । एक आखिरी बात और । प्लीज ।”

“बोलो वो भी ।”

“आपने अपने बयान में कहा था कि कत्ल की रात आपने सार्थक बराल को सफेद आई-10 पर सवार अपनी कोठी से कूच करते देखा था । ठीक ?”

उसके नेत्र यूं सिकुड़े जैसे दिमाग पर जोर दे रहा हो ।

“ठीक ?”

“हां ।” - वो कठिन स्वर में बोला - “ठीक ।”

“लेकिन सार्थक के पास तो आई-10 नहीं है ! उसके पास तो सान्त्रो है !”

“सफेद है न ?”

“हां ।”

“तो मैंने सान्त्रो देखी होगी ! एक ही जैसी तो लगती हैं दोनों ।”
 
“मैं भी यही कहना चाहता था । आपको तमाम गोरखा सूरतें एक जैसी लगती हैं, अभी आपको कार में भी कनफ्यूजन है कि सफेद सान्त्रो देखी थी या सफेद आई-10 देखी थी । या शायद सफेद रिट्ज देखी थी । क्या इसका ये मतलब नहीं कि उस रात आपने किसी और को देखा था लेकिन क्योंकि वो सार्थक की कोठी से निकला था इसलिये आपने उसे सार्थक समझ लिया था ।”

“नहीं, ये मतलब नहीं ।”

“क्यों ? क्यों ये मतलब नहीं ?”

“क्योंकि निकल लेने की हड़बड़ी में वो मेरी स्विफ्ट की टेल लाइट तोड़ कर गया था । तब उसकी भी हैडलाइट टूटी थी । अगर उस रात उसकी कार की एक हैडलाइट टूटी पायी गयी थी तो मैंने उसी को देखा था ।”

तभी उसके केबिन का दरवाजा खुला, चौखट पर एक उसी की उम्र का आदमी प्रकट हुआ और बोला - “सक्सेना, तुम्हारा इस्तीफा कबूल हो गया है लेकिन वो पहली तारीख से इफैक्टिव होगा । यानी ये महीना तुमने ड्यूटी पर आते रहना है । ओके ?”

उसने अनमने भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

वो व्यक्ति दरवाजे पर से गायब हो गया ।

सक्सेना की सूरत से साफ जाहिर हो रहा था कि वो खबर मेरी मौजूदगी में डिलीवर किया जाना उसे नागवार गुजरा था ।

“नौकरी छोड़ रहे हैं ?” - मैं बोला ।

“अभी सुना तो तुमने !” - वो भुनभुनाया ।

“कोई बेहतर जॉब मिल गयी ?”

“नहीं, सन्यास धारण करके कैलाश मानसरोवर जा रहा हूं । चलोगे ?”

“नहीं, जनाब, मैं संसारी ही ठीक हूं ।” - मैं उठ खड़ा हुआ - “इजाजत चाहता हूं । सहयोग का शुक्रिया ।”

उसने जवाब न दिया ।

******************************************************************
 
मेरा उस रोज का अगला पड़ाव पुलिस हैडक्वार्टर था ।

इंस्पेक्टर देवेन्द्र यादव गर्मजोशी से मेरे से मिला ।

बेटे का बाप बनने की खुशी अभी भी उसके चेहरे पर थी अलबत्ता उस रोज न उसने कलेवा की फैंसी मिठाई पेश की, न उसे मेहमान के लिये कोई चाय काफी याद आयी ।

“अब तो तसल्ली हो गयी न कि लड़का ही हुआ है ?” - उसके सामने बैठता मैं बोला ।

“हां ।” - वो हंसा ।

“मेल फिक्सचर ऐन चौकस ?”

“हां, भई ।”

“फिर तो शक्ल देख ली होगी ?”

“हां ?”

“किस पर है ?”

“अरे, शेर बच्चे की शक्ल शेर पर ही होगी ।”

“यानी उस रोज का मूंछ का ताव काम आ गया । शिवेन्द्र सिंह यादव अपने रोबीले बांके छबीले बाप का अक्स है ?”

“हां ।”

“फिर से बधाई ।”

“बधाई कबूल । कैसे आया ? ...नहीं पहले मेरी बात सुन ।”

“कोई खास बात है ?”

“तेरे लिये खास है ।”

“सुनाओ ।”

“तेरी शिकायतें पुलिस के पास पहुंच रही हैं ।”

“कौन कर रहा है ?”

“वही लोग कर रहे हैं जिनसे तू पंगे ले रहा है ।”

“मसलन कौन ?”

“अमरनाथ परमार ने की है । तूने उसके घर में घुसकर उसके साथ बद्जुबानी की ।”

“झूठ ! बल्कि उसने मेरे साथ बेजा व्यवहार किया । मुझे बेइज्जत करके निकाला, दुत्कार के भगाया ।”

“शर्मा, बिना बुलाये मेहमान का ऐसी शिकायत करना नहीं बनता । वो बड़ा आदमी है, रसूख वाला आदमी है, वीआईपी है । उससे अप्वायंटमेंट लेकर उससे उसकी बिजनेस प्लेस पर मिलने की जगह उसकी कोठी पर पहुंच गया ! क्या हैसियत है तेरी उसके मुकाबले में ?”

“अगर बेटी के खून से उसके हाथ रंगे पाये गये तो तमाम रुतबा, हैसियत, रसूख धरा रह जायेगा । तब वो वीआईपी नहीं होगा, सजा का मुन्तजिर मुजरिम होगा ।”

“ख्वाब देख रहा है ।”

“और किसने की शिकायत ?”

“उसके सुपुत्र शरद परमार ने जिससे तूने कई लोगों के सामने रोज़वुड क्लब में मारपीट की ।”

“कुपुत्र शरद परमार । और मारपीट न की, खाली एक छोटी सी धक्की दी जो उस शराब की बैरल से सम्भाली न गयी, नाहक लुढ़क गया । वो भी इसलिये दी क्योंकि बहन से गन्दी, गाली गलौज की, बल्कि गटर वाली जुबान बोल रहा था और शरेआम उस पर हाथ उठाने जा रहा था ।”

“‘रॉक्स’ में जा के पंगा लिया । बारमैन के गले पड़ने की कोशिश की । मालिक दखलअन्दाज हुआ तो टला ।”

“ऐसा मालिक ने, रॉक डिसिल्वा ने कहा ?”

“हां ।”

“यानी छाज तो बोले ही बोले, छलनी भी बोले !”

“शुक्र मना कि मुंह जुबानी शिकायतें हुईं, एफआईआर की नौबत नहीं आयी । इसलिये तू सेफ है । फिलहाल । फिलहाल बोला मैंने ।”

“सुना मैंने ।”

“अमरनाथ परमार बड़ा आदमी है । रूलिंग पार्टी का एक पावरफुल नेता और सिटिंग एमपी उसका साला है । और भी बहुत ऊपर तक उसकी पहुंच है । उसके साथ पगा लेगा तो पछतायेगा ।”

“कातिल निकला तो एमपी बचा लेगा ? ऊपर तक की पहुंच बचा लेगी ?”

“निकाल के दिखा ।”

“कोशिश में तो हूं !”

“जब कामयाब हो जाये तो पसरना । अभी काबू में रह ।”

“सलाह के लिये शुक्रिया ।”

“शुक्रिया तो हुआ, सलाह मानेगा भी कि नहीं ?”

“मानूंगा ।”

“अच्छा करेगा । अपना ही भला करेगा । अब बोल, क्या किया अब तक ? क्या तीर मारा ?”

“बोलता हूं लेकिन पहले तुम बोलो ।”

“मैं क्या बोलूं ? कल सार्थक की जमानत हो गयी, मालूम पड़ा ही होगा । न मालूम पड़ने वाली कोई बात ही नहीं । आज अखबार में बाकायदा न्यूज थी ।”

“मैंने देखी थी ।”

“हमने बाजरिया सरकारी वकील जमानत की भारी मुखालफत की थी लेकिन बीस लाख की कैश बेल हमारी मुखालफत पर भारी पड़ी । बताओ तो ! किसी गुमनाम डोनर ने बेल अमाउन्ट को सप्लीमेंट करने के लिये छ: लाख रुपये कैश सरका दिये । हमें डोनर का पता लग जाये सही, फिर सबसे पहले उससे यही सवाल करेंगे कि क्या वो वाइट मनी है ! वाइट मनी है तो पेमेंट चैक या ड्राफ्ट से क्यों न की ! उस पर टैक्स भरा ? इतनी हैवी कैश ट्रांजेक्शन कानूनन जुर्म है । डोनर काबू में आ जाये सही, बहुत कुछ एक्सप्लेन करना पड़ेगा उसे ।”

“आयेगा तब न !”

“क्यों नहीं आयेगा ? ऐसी बातें नहीं छुपती । अन्त पन्त खुल के रहती हैं । देखना, वो खुद ही डींग हांकने लगेगा कि उसकी वजह से छोकरे की जमानत हो पायी थी ।”

“मुझे उम्मीद नहीं । उसने ऐसा करना होता तो आगे कैश सरकाने का रिस्क न लिया होता जिसमें कि भांजी मारी जा सकती थी ।”

“तू छोड़ वो बातें । तू न पुलिस की सलाहियात को जानता है, न ह्यूमन नेचर को ज्यादा समझता है । तू ये बोल, कैसे आया ?”

“कुछ पूछने का खयाल लाया ।”

“क्या पूछना चाहता है ?”

“तुमने बोला था कि कत्ल की रात को माधव धीमरे ‘रॉक्स’ में था । कैसे मालूम ? कोई एलीबाई पेश की ?”

“की न ! पहले बोला तो था ! वो वहां शरद परमार की सोहबत में था ।”

“शरद परमार उस रात फुल टुन्न था । इतना कि नशे में बहन की कार ठोक दी थी । उसकी आई-10 को बिजली के खम्बे में दे मारा था ।”

“मालूम है । कार भी देखी थी मैंने । कोई खास डैमेज नहीं किया था । खाली बायीं हैडलाइट फोड़ी थी ।”

“मैं अभी फरीदाबाद से आ रहा हूं जहां कि मैं उसकी वर्क प्लेस पर दर्शन सक्सेना से मिला था । यादव साहब, हत्या की रात का वो पुलिस का गवाह है सार्थक के खिलाफ लेकिन नहीं जानता कि सार्थक जो कार चला रहा था वो सान्त्रो थी या आई-10 थी । जमा, रात का वक्त था और आसमान में कोई पूर्णमासी का चान्द नहीं निकला हुआ था । और जमा, उसकी कोठी के सामने की दो स्ट्रीट लाइट्स के बल्ब फ्यूज थे । अभी और जमा, अपनी जुबानी कबूल करता है कि उसे सारे नेपाली एक जैसे लगते हैं ।”

“ऐसा कहता है वो ?”

“बराबर कहता है । अपनी सोच का सबूत भी दिया ।”

“कैसे ?”

“मैंने उसे शिखर बराल की तसवीर दिखाई, उसने उसे सार्थक बताया ।”

“सच कहता है, शर्मा ?”

“अरे, मैं ऐसी बात में झूठ क्यों बोलूंगा जिसकी तसदीक दूसरे सिरे से की जा सकती है ? बात करना उससे ।”

“मैं करूंगा ।”

“मेरा सवाल ये है कि क्या ऐसा गवाह कोर्ट में टिक पायेगा ?”

वो चिन्तित दिखाई देने लगा ।

“ये सरकारी वकील की सिरदर्द है ।” - फिर तनिक झुंझलाता सा बोला - “उसका काम है सुनिश्चित करना कि गवाह ने पुलिस को जो बयान दिया है, वो उससे हिलने न पाये ।”

“वो सुनिश्चित न कर पाया तो किरकिरी तो पुलिस की होगी !”

“हां, यार ।”

“इस सन्दर्भ में अब माधव धीमरे की एलीबाई पर पुनर्विचार करो । क्या उसके इस दावे में झोल नहीं हो सकता कि कत्ल की रात को वो शरद परमार के साथ ‘रॉक्स’ में था ?”

“भई, सिर्फ वो ही तो ऐसा नहीं कहता ! ओनर रॉक डिसिल्वा इस बात की तसदीक करता है । बारमैन विशू मीरानी इस बात की तसदीक करता है ।”

“मैं दोनों से मिल चुका हूं । मुझे दोनों में से कोई भी खास भरोसे का, ऊंचे किरदार का आदमी नहीं लगा था ।”

“तुमने इस बाबत उनसे सवाल किया था ?”

“सीधे सवाल नहीं किया था, घुमा के कुछ पूछा था ।”

“क्या ?”

“कुछ बोला था जो इशारे में पूछने जैसा ही था ।”

“अरे, क्या ? क्या बोला था ?”

“ये कि पड़ोस की कमला ओसवाल कहती है कि कत्ल की रात को उसने माधव धीमरे को मकतूला की कोठी में दाखिल होते देखा था ।”

“ब्लफ मारा ?”

“हां ।”

“क्यों ?”

“उन्हें हिलाने के लिये । अगर धीमरे की एलीबाई में कोई झोल था तो ये बात उसे बढ़िया हिला सकती थी ।”

“वो तुझे झूठा करार दे सकता था ।”

“मुझे झूठा करार देने के लिये उसे कमला ओसवाल को बीच में लाना पड़ता जो कि उपलब्ध नहीं ।”

“हूं ।”

“यादव साहब, मुझे तो कमला ओसवाल की कोठी को लगी आग में भी कोई भेद लगता है ।”

“क्या भेद लगता है ? एक हादसा था वो । बेध्यानी में कहीं सुलगा हुआ सिग्रेट छोड़ दिया जो कि कोठी को लगी आग की वजह बना ।”

“आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि हादसा था ।”

“मैं कहता हूं ।”

“ठीक है । अब एक दूसरी बात पर विचार कीजिये ।”

“वो भी बोलो ।”

“अमरनाथ परमार देवली के एक खास इलाके में आनन फानन जमीन और मकान खरीद रहा है क्योंकि उसका दुबई के किसी बिल्डर के साथ मेजर टाईअप वजूद में आने वाला है । उस प्रोजेक्ट में उसका एमपी साला भी उसकी मदद कर रहा है ।”

“वो क्या मदद कर रहा होगा ?”

“सुनिश्चित करता होगा कि सरकारी महकमात से डीलिंग में उसे कोई दिक्कत पेश न आयें जो कि आ सकती हैं क्योंकि काफी सारी खरीद बेनामी से हो सकती है । बेनामी की खरीद में खरीदार से सवाल हो जाता है कि वो इनवेस्टमेंट का सोर्स उजागर करे । कमेटी वाले अड़चनें लगाने लगते हैं । रजिस्ट्रार के दफ्तर में प्रॉपर्टी ट्रांसफर और रजिस्ट्रेशन में खुल्ली रिश्वत चलती है । ऐसी समस्यायें परमार के साथ पेश न आयें, इसका ध्यान नेताजी रखता होगा ।”

“हो सकता है, भई ।”

“और सबसे करारी बात ये है कि बेनामी डीलर में कमला ओसवाल की एक्टिव पार्टीसिपेशन है ।”

“अच्छा !”

“अब तक जो सवा सौ मकान परमार ने खरीदे हैं उनमें से तीस अकेली कमला ओसवाल के नाम हैं ।”

“क्या बात करता है !”

“यकीन करो मेरा । ये कनफर्म्ड न्यूज है ।”

“चलो, कबूल कि ये सब कुछ है । इसका कत्ल के केस से क्या रिश्ता है ?”

“आग के केस से हो सकता है ।”

“क्या ?”

“ये कि आग इत्तफाकन न लगी, इरादतन लगाई गयी ।”

“क्यों ?”

“कमला ओसवाल के लिये वार्निंग के तौर पर । बेनामी खरीद के मामले में कोई ऐसे ही किसी का भरोसा नहीं कर लेता, पहले उस शख्स को अच्छी तरह से हिला डुला के देखा जाता है, अच्छी तरह से परखा जाता है, उसे मुकम्मल तौर पर वफादार पाया जाता है तो तभी उस पर भरोसा किया जाता है लेकिन फिर भी लालच के हवाले कोई न कोई दगाबाजी पर उतर आता है । तब ताकत वाले लोग उसे लाइन पर वापिस लाने के लिये ताकत इस्तेमाल करते हैं । समझो कि कमला ओसवाल लाइन से बाहर जा रही थी, उसको लाइन पर लाने के लिये पहला कदम ये उठाया गया कि उसका घर जला दिया गया । नहीं बाज आयेगी तो अगली बार और गम्भीर वार्निंग होगी ।”

“शर्मा, बहुत खतरनाक बात कर रहा है !”

“तुम खतरे की छोड़ो, तुम बोलो ये बात तुम्हें मुमकिन लगती है या नहीं ?”

“जैसे तू कह रहा है, वैसे तो लगती है !”

“मैं और कहूं तो कमला ओसवाल गायब भी इसी वजह से है ।”

“जो शक्ल तुम बात को दे रहे हो, उसकी रू में हो सकता है । लेकिन तुम्हारा ये अन्दाजा ही तो है कि आग लगी नहीं, लगाई गयी थी ! इस बात को साबित करने के लिये तो तुम्हारे पास कुछ नहीं है न !”

“कुछ तो है !”

“क्या ?”

“मैं कोठी में घुसा था...”

“क्या ! शर्मा, दैट इज ट्रैसपासिंग ! दैट इज ऐन इललीगल एक्ट ।”

“अरे, सुनो तो ।”

“ओके । सुनाओ ।”

“कोठी में फ्रंट यार्ड को बैक यार्ड से कनैक्ट करने वाला साइड से एक छोटा सा अनकवर्ड पैसेज है । उस रास्ते से मैं पिछवाड़े में गया था जहां कि एक बरामदा है और जहां बिजली के मीटर हैं । वहां मैंने कुछ देखा था ।”

“क्या ?”

“इस बात की चुगली करने वाला कुछ कि आग सिग्रेट से नहीं, शार्ट सर्कट से लगी थी ।”

“क्या !”

“कुछ तारें यूं नंगी की गयी थीं कि शार्ट सर्कट होता ही होता ।”

“यानी वो आग एक्सीडेंट नहीं था, बाजरिया इलेक्ट्रिक शार्ट सर्कट अरेंज की गयी थी ।”

“हां ।”

“यानी अब एक आरसन (ARSON) का केस खड़ा है पुलिस तफ्तीश के लिये ।”

“मेरी बात पर ऐतबार लाओ तो खड़ा है वर्ना क्या फर्क पड़ता है !”

“नजरअन्दाज तो नहीं किया जा सकता अब इस बात को ! मैं मोतीबाग थाने से और फायर ब्रिगेड से बात करूंगा ।”

“करना ।” - मैं उठता हुआ बोला - “मैं फिर आऊंगा ।”

“फोन करना ।”

मेरी भवें उठी ।

“मिजाज क्या दिखाता है ? खाली मोतीबाग में ही तो कत्ल नहीं होता ! ये दिल्ली है, दो करोड़ की आबादी वाली । यहां रोज कत्ल की वारदात होती है । तू भूल गया जान पड़ता है कि मैं किस महकमे में हूं !”

“भूल ही गया था । ठीक है, फोन करूंगा ।”

******************************************************************
 
मैं सैनिक फार्म पहुंचा ।

‘रॉक्स’ पर उल्लू बोल रहे थे ।

मेन डोर पर एक गत्ते का साइन लटक रहा था जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में दर्ज था :

BAR IS CLOSED

बार बन्द है

वहां ये जानने का कोई साधन नहीं था कि बार उस रोज बन्द था, थोड़े अरसे के लिये बन्द था या हमेशा के लिये बन्द था । मैं वहां से रवाना हुआ, मैंने ग्रेटर कैलाश का रुख किया ।

मेरे अपने फ्लैट पर पहुंचने तक टाइम पांच से ऊपर का हो चुका था ।

सार्थक फ्लैट में नहीं था ।

बाहरले कमरे में सैंटर टेबल पर रखी ऐश ट्रे के नीचे एक कागज फड़फड़ा रहा था । मैंने कागज वहां से निकाला और उस पर निगाह दौड़ाई ।

वो एक रुक्का था जिस पर दर्ज था :

यहां दम घुट रहा है ।

हवा खाने जा रहा हूं । लौटता हूं ।

सार्थक

नाम के नीचे सवा एक बजे का टाइम दर्ज था । तब सवा पांच बजे थे । चार घंटे से हवा जा रहा था पट्ठा ।

मैं नीचे ग्राउन्ड फ्लोर पर पहुंचा ।

ग्राउन्ड फ्लोर पर मेरे वयोवृद्ध लैंडलार्ड ओक साहब रहते थे जो कि विद्वान व्यक्ति थे और इंगलैंड अमरीका तक मशहूर इतिहासविज्ञ थे । हर घड़ी बाहरले बरामदे में पाये जाते थे जो कि उनकी स्टडी केस थी, रिलैक्सेशन प्लेस थी, रैस्टरूम था । बरामदे में एक अरामदेय दीवान था, जब जरूरत महसूस करते थे उस पर पड़ जाते थे, उठते थे तो रॉकर पर शिफ्ट हो जाते थे और अपने लिखने पढ़ने के शौक में मशूगल हो जाते थे ।

मैंने उनसे अपने मेहमान की बाबत सवाल किया ।

मालूम हुआ उन्होंने सवा एक बजे उसे वहां से रुखसत पाते नहीं देखा था ।

क्या बड़ी बात थी ! उनकी तवज्जो तो कहीं और ही होती थी । उनसे पूछना ही गलत था । पूछ कर यूं समझिये कि मैंने उम्मीद के खिलाफ उम्मीद की थी कि उन्होंने कुछ देखा होगा ।

मैं वापिस फ्लैट में लौटा ।

मैंने एडवोकेट महाजन को काल लगाई लेकिन काल न लगी ।

काल बैक की प्रतीक्षा में मैंने बैडरूम में जा कर टीवी चलाया और बैड पर ढ़ेर हो गया ।

सात बजे उसकी काल आयी ।

मेरे मुंह खोल पाने से पहले ही वो बोल पड़ा - “सॉरी, तुम्हारी काल की तरफ तवज्जो न दे सका । बहुत बिजी था । अभी फारिग हुआ ।”

“क्या हुआ ?” - मैंने सशंक भाव से पूछा ।

“बुरा हुआ । शिखर बराल हस्पताल में है ।”

“अरे ! क्या हुआ उसे ?”

“फौजदारी हुई । खोपड़ी खुल गयी । दो पसलियां टूट गयीं । छोटी मोटी चोटें तो कई आयीं ।”

“लेकिन हुआ क्या ?”

“कहता है माधव धीमरे और शरद परमार ने धुन दिया ।”

“लेकिन क्यों ?”

“मालूम नहीं । अभी वो ठीक से कुछ बताने की हालत में नहीं है ।”

“लेकिन माधव धीमरे और शरद परमार का नाम साफ लिया ?”

“हां ।”

“कब की बात है ?”

“दोपहर के करीब की ।”

“कहां हुई फौजदारी ?”

“सैनिक फार्म की शापिंग माल की पार्किंग में ।”

“कोई, गवाह ?”

“कोई नहीं ।”

“पुलिस को बयान दे चुका ?”

“टूटा फूटा । डिटेल में बयान अभी देगा जबकि ऐसा कर पाने के काबिल हो जायेगा ।”

“आपको खबर कैसे लगी ?”

“पुलिस से लगी । पुलिस में एक वाकिफ था जो जानता था कि मैं सार्थक का वकील था । उसने सोचा उसके भाई के साथ हुए हादसे में मेरी दिलचस्पी होगी । उसने फोन लगा दिया मुझे ।”

“जब शिखर ने अपने हमलावरों की निशानदेयी की है तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया ? गिरफ्तार न सही, पूछताछ के लिये तो तलब किया होना चाहिये !”

“अभी वो दोनों उपलब्ध नहीं हैं ।”

“या मजाल नहीं हो रही परमार के पिल्ले पर हाथ डालने की...”

“शर्मा, माइन्ड मुलर लैंग्वैज ।”

“...‘रोज़वुड’ के मैनेजर पर हाथ डालने की क्योंकि परमार उसका प्रेसीडेंट है !”

“फोन कैसे किया था ?”

“मेरे पास भी बुरी खबर थी, सोचा आप सुनना चाहेंगे ।”

“ओ, गॉड । क्या ?”

“सार्थक गायब हो गया है ।”

“गायब हो गया है ! तुम्हारे फ्लैट से ?”

“हां । मैं उसे चेता के गया था कि उसने वहां से बाहर कदम नहीं रखना था लेकिन दोपहर को निकल किया । पीछे रुक्का छोड़ गया ‘दम घुट रहा है, हवा खाने जा रहा हूं, लौटता हूं’ ।”

“नहीं लौटा ?”

“सात घंटे हो गये हैं । अभी तक तो नहीं लौटा !”

“तुम्हारा क्या खयाल है, लौटेगा ?”

“मुझे तो उम्मीद नहीं । लौटना होता तो कबका लौट आया होता । जिम्मेदार बन के दिखाया होता तो गया ही न होता । मुझे तो लगता है कि न सिर्फ खिसक गया, बल्लि अब ऐसा गायब होगा कि ढूंढ़े नहीं मिलेगा ।”

“ईडियट ! सुपर ईडियट !”

“मैं !”

“अरे नहीं, भई, सार्थक । जो कत्ल के केस में हुई बेल जम्प करने का नतीजा नहीं जानता । बेल की रकम तो जब्त होगी ही, यूं अपने अपराध को समझो कि उसने खुद मोहरबन्द कर लिया । कम्बख्त ने ये भी न सोचा कि कितनी मेहनत से, कितनी मशक्कत से ‘सार्थक को इंसाफ दो’ कमेटी ने उसके लिये इतनी बड़ी रकम जमा की थी । खुद को तो मुसीबत में डाला ही, अपने हिमायतियों को भीं कोलोसल लैट डाउन दिया । पुलिस उसकी तलाश में जमीन आसमान एक कर देगी । कोर्ट की जो हमदर्दी उसे हासिल हुई थी, मूर्ख ने खुद उस पर खाक डाल दी । अब उसके खिलाफ नानबेलेबल वारन्ट जारी होगा, आल पायन्ट बुलेटिन जारी होगा, कोर्ट ने उसकी हरकत का और गम्भीर संज्ञान लिया तो शूट एट साइट आर्डर जारी होगा ।”

“ओह, नो !”

“वाई नो । भगोड़ा है वो । यही दर्जा होगा अब उसका कानून की निगाह में ।”

“ओह !”

“शर्मा, तुमने भी जो जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गयी थी, उसे गम्भीरता से नहीं लिया । मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी ।”

“क्या करता मैं ! उसको हथकड़ी बेड़ी पहना कर रखता ! गन ले के हर घड़ी उसके सिरहाने खड़ा होता ? मुझे मालूम होता कि वो ऐसी हरकत करेगा - बल्कि आपको मालूम होता - तो क्या आप उसकी बेल करवाने की कोशिश करते ! वो भी की तो क्या आपको उसके मिजाज की, उसके मंसूबे की कोई भनक थी ! थी तो क्यों आपने उसे मेरे मत्थे मंढा ?”

“तुम्हें मालूम है क्यों ऐसा किया गया था ! ताकि वो मीडिया की प्रोबिंग, पब्लिक की निगाहों से दूर रहता ।”

“यानी आपको इमकान नहीं था वो फरार हो जायेगा ?”

“नहीं था ।”

“तो मुझे कैसे होता ?”

“ठीक ! ठीक ! लेकिन अब एक बड़ी प्राब्लम तो मुंह बाये खड़ी है न ! उसकी जमानत की एक अहम शर्त ये भी थी कि हर सुबह दस बजे उसने अपने थाने की हाजिरी भरनी थी और ये हाजिरी उसके वकील ने - यानी कि मैंने - सुनिश्चित करनी थी । अब कल क्या करूंगा मैं ! कैसे ये बात आम होने से रोकूंगा कि मेरा क्लायंट बेल जम्प कर गया था ?”

“क्या पता वो लौट आये !”

“ऐसी होपफुल सोच की कोई वजह ?”

“वजह तो कोई नहीं ! बस, उम्मीद के खिलाफ उम्मीद की है ।”

“नहीं पूरी होने वाली ।”

“आपके मुंह में घी शक्कर ।”

“अरे, मैंने कोई बुरा बोल नहीं बोला, सिर्फ ये कहा है कि ऐसे उम्मीदें पूरी नहीं होतीं । वो कहते नहीं कि इफ विशिज वर हार्सिज, ऐवरीबॉडी वुड हैव बिन राइडिंग दैम ।”

“एक बात बतायें । उसके शुभचिन्तक का, उस रहस्यमय दानकर्ता का जिसने छ: लाख रुपये नकद सरकाये, सार्थक की फरारी से कोई रिश्ता हो सकता है ?”

“हो तो सकता है, भई । खुद तुम्हारा क्या खयाल है ?”

“मेरे को तो पूरा पूरा रिश्ता उसी का लगता है । सार्थक ने कतई कोई ऐसा मिजाज नहीं दिखाया था कि वो खिसक जाने की फिराक में था । मेरे फ्लैट में टिका रहने को वो राजी था । बस, एक सवाल उसने किया था कि मैं घर में विस्की रखता था या नहीं, और कैन्ड स्टॉक की क्या पोजीशन थी ।”

“इसका मतलब है उसे बहकाया गया । जो कदम उसने उठाया उसके लिये प्रोम्प्ट किया गया और ये काम सीक्रेट डोनर ने किया !”

“उसको कैसे खबर हो सकती थी कि प्रोम्प्ट करने के लिये वो कहां उपलब्ध था !”

“सार्थक सीक्रेट डोनर को जानता होगा...”

“मैं नहीं मानता ।”

“...तुम्हारे पीठ फेरते ही खुद उसने उसे फोन किया होगा ! ऐसे उसे मालूम हुआ होगा कि सार्थक कहां था ।”

“हूं ।”

“फिर अभी गारन्टी कहां है कि सब किया धरा सीक्रेट डोनर का है !”

“कोई तो इस काम में उसका स्पांसर बराबर है । इतना बड़ा कदम वो अपने बलबूते पर नहीं उठा सकता । कोई स्पांसर मुझे सूझता है तो वो सीक्रेट डोनर ही है ।”

“शिखर ?”

“हस्पताल में न पड़ा होता तो मैं उसके नाम पर विचार कर लेता ।”

“ससुरा ?”
 
“उसके जले पर नमक छिड़कने नहीं आने वाला । वो तो उसकी बेल के ही खिलाफ था । बाकायदा बयान दिया था ऐसा । बेटी के कातिल की वो मदद करेगा ?”

“शायद मन साफ हो गया हो ! सार्थक उसको विश्वास दिलाने में कामयाब हो गया हो कि वो श्यामला का कातिल नहीं था !”

“इतने थोड़े समय में ?”

मैं खामोश रहा ।

“ससुरा उसका हिमायती ! नो, आई कैननाट बाई इट ।”

“तो ?” - मैं बोला ।

“पता लगाओ क्या माजरा है ! सीक्रेट डोनर को एक्सपोज करके बताओ । या उसका या उनका अता पता निकाल कर बताओ, जिसने या जिन्होंने सार्थक को फरार होने के लिये उकसाया, उसकी मदद की । मैं तुम्हारी फीस डबल कर दूंगा ।”

“जी !”

“आईल डबल युअर फी, शर्मा ।”

“डू आई हैव युअर वर्ड ?”

“यू हैव माई अनब्रेकेबल वर्ड ।”

“मैं करता हूं ।” - मैं जोश से बोला - “पूरी कोशिश करता हूं ।”

मैंने सम्बन्धविच्छेद किया और ‘पिकाडिली’ साउथ एक्स का - वो रेस्टोबार जिसमें सार्थक नौकरी करता था - फोन लगाया और मैनेजर प्रधान से बात की ।

“सार्थक की जमानत हो गयी है ।” - मैं बोला - “मालूम पड़ा ?”

“हां ।” - आवाज आयी - “आज के पेपर से मालूम पड़ा ।”

“आई सी । ‘पिकाडिली’ पहुंचा ?”

“नहीं !”

“भई, ड्यूटी पर बहाल होने नहीं, आपसे मिलने आया हो !”

“नहीं, नहीं आया ।”

“शायद आये । आये तो मेरे को खबर कीजियेगा । मुझे उससे जरूरी काम है लेकिन मेरा उससे कांटैक्ट नहीं हो पा रहा ।”

“ओके ।”

“एक बात और बताइये । सार्थक आपसे पनाह मांगे तो उसे हासिल होगी ?”

“कैसी पनाह ?”

“मीडिया की तवज्जो से बचके रहने के लिये वो कुछ अरसा आपके घर रहने की खाहिश करे तो आप उसकी मदद करेंगे ?”

“मुश्किल है ।”

“अच्छा ।”

“मैं छोटे से किराये के फ्लैट में रहता हूं । तीन बच्चे हैं । मेरे स्टे-इन मेहमान रख पाने के साधन नहीं हैं ।”

“ठीक ! कहां रहते हैं ?”

उसने मालवीय नगर का एक पता बताया ।

मैंने शेफाली परमार का फोन बजाया ।

तत्काल वो लाइन पर आयी ।

“राज बोल रहा हूं ।” - मैं बोला ।

“ओ, मिस्टर शर्मा, मैं तुम्हें याद ही कर रही थी ।”

“वजह ?”

“फौजदारी ।”

“फिर ?”

“हां । दिल्ली वायलेंस की राजधानी बनती जा रही है । यहां हर किसी का खून गर्म ही नहीं, उबाल पर है । रोडरेज के जितने केस दिल्ली में रोजाना होते हैं, शायद ही कहीं और होते हों । लेकिन वो किस्सा फिर कभी ।”

“तुम्हारे साथ हुई फौजदारी ? शरद फिर भड़क गया ?”

“नहीं मेरे साथ नहीं...”

“शुक्र है !”

“किसी ने सार्थक के भाई शिखर को ठोक दिया । हस्पताल में है । पुलिस पापा के फार्महाउस पर तफ्तीश के लिये पहुंची थी क्योंकि पुलिस को दिये अपने बयान में उसने शरद की निशानदेयी की है !”

“उस बात की मुझे खबर है । वो अपनी दुरगत के लिये शरद परमार और माधव धीमरे को जिम्मेदार ठहराता है ।”

“तुम्हें ऐतबार आता है शिखर की बात पर ?”

“बेऐतबारी की कोई वजह तो नहीं दिखाई देती !”

वस्तुत: एक वजह दिखाई तो मुझे देती थी लेकिन मैं उस घड़ी उसे जुबान पर न लाया ।

“पापा का मूड बहुत खराब है ।” - वो कह रही थी ।

“क्यों ? शिखर की बात पर यकीन आ गया है उन्हें ?”

“यकीन तो नहीं आ गया लेकिन शरद के मिजाज से तो वाकिफ हैं न वो ! ऊपर से उन्हें अन्देशा है कि पुलिस शरद को हिरासत में ले सकती थी । मेरे सामने अपने वकील से बात कर रहे थे और उससे ऐन्टीसिपेटरी बेल की बाबत मशवरा ले रहे थे ।”

“शरद खुद क्या कहता है ?”

“कहता है उसका उस वाकये से कोई वास्ता नहीं ।”

“साबित कर सकता है ? वाकये के वक्त की अपने हक में कोई गवाही पेश कर सकता है ?”

“मालूम नहीं । लेकिन जो वक्त उस वारदात के वाकया हुई होने का बताया जाता है, वो वक्त उसका ‘रॉक्स’ में हाजिरी भरने का होता है ।”

मैंने इस बात का जिक्र न किया कि ‘रॉक्स’ बन्द था क्योंकि मुझे खबर नहीं थी कि उस पर ‘क्लोज्ड’ का नोटिस आज ही टांगा गया था या पहले से टंगा हुआ था ।

“पता नहीं कैसे दिन गुजर रहे हैं !” - वो कह रही थी - “क्या होने जा रहा है !”

“कुछ तो हो भी चुका है ।”

“क्या ?”

“सार्थक की जमानत हो गयी है, खबर है न ?”

“हां ।”

“जमानत होते ही गायब हो गया है ।”

“ग - गायब हो गया है !”

“सीधी जुबान में कहा जाये तो फरार हो गया है । बेल जम्प कर गया है जो गम्भीर मसला है - उसके लिये भी और बेल कराने वालों के लिये भी ।”

“गॉड !”

“सब ठीक हो जायेगा ।”

“झूठी तसल्ली है, फिर भी शुक्रिया ।”

“मिलता हूं ।”

मैंने फोन डिसकनैक्ट किया और अहिल्या बराल को काल लगाई ।

“सार्थक वहां आया था ?” - मैंने पूछा ।

“नहीं ।”

उसने यूं तपाक से जवाब दिया कि वो मुझे झूठ बोलती लगी ।

“आपसे मिलने नहीं आया ?” - मैं फिर बोला ।

“नहीं । हैरान हूं ।”

“शिखर की खबर लगी ?”

“हां । पुलिस ने उसकी बाबत फोन किया तो लगी । जान निकल गयी मेरी । दौड़ी हस्पताल गयी । अभी लौटी हूं ।”

“शायद आपकी गैरहाजिरी में सार्थक वहां आया हो !”

“तो हस्पताल पहुंचता । मैं उसकी बाबत पड़ोस में बोल के गयी थी ।”

“आई सी । अब शिखर कैसा है ?”

“ठीक नहीं है ।” - उसका स्वर रुआंसा हुआ ।

“मैडम, ये वक्त तो नहीं ऐसी बातें करने का लेकिन एक बात पूछने की फिर भी इजाजत दीजिये ।”

“पूछो ।”

“श्यामला के कत्ल की रात को शिखर कहां था ?”

“घर था । उस रात - जैसा कि उसने अपने बयान में भी कहा था - साढ़े नौ बजे घर लौट आया था । लेकिन साढ़े ग्यारह के करीब सार्थक की काल आने पर घर से फिर निकला था ।”

“लौटा कब था ?”

“मुझे खबर नहीं । मैं जल्दी सो जाती हूं ।”

“फिर भी उसके साढ़े ग्यारह बजे जाने की खबर है ?”

“बोल के गया था ।”

“ओह !”

“लौटा कब, ये नहीं मालूम । उसके पास मेनडोर की चाबी होती है इसलिये उसका कालबैल बजाना जरूरी नहीं होता ।”

“आई सी ।”

“मुझे अपने बेटों का आसरा है ।” - मुझे उसकी सिसकी सुनाई दी - “दोनों ही मुसीबत में हैं । कैसे बीतेगी परदेस में !”

मैंने हौले से लाइन डिसकनैक्ट कर दी ।

जिन्दगी इम्तहान लेती है ।

कभी रूबरू मिल के वृद्धा को समझाऊंगा कि दो सुखों के बीच का वक्फा दुख होता था, दो दुखों के बीच का वक्फा सुख होता था । यदि आप सुखी हैं तो समझिये दुख आने वाला है, दुखी हैं तो समझिये सुख मोड़ पर खड़ा है, बस आप तक पहुंचने ही वाला है । जैसे रात जाती है तो दिन आ जाता है, दिन जाता है तो रात आ जाती है, वैसे ही दुख जाता है तो सुख आ जाता है, सुख जाता है तो दुख आ जाता है । दुख सुख का पहिया चलता है, यही नसीबा कहलाता है ।

******************************************************************
 
रात के एक बजे फोन की निरन्तर बजती घन्टी ने मुझे गम्भीर निद्रा से झकझोर कर जगाया ।

उस रात मैं ग्रेटर कैलाश वाले फ्लैट पर ही टिका था क्योंकि उम्मीद के खिलाफ उम्मीद कर रहा था कि जैसे एकाएक सार्थक वहां से चल दिया था, वैसे ही एकाएक लौट आयेगा ।

मैंने काल रिसीव की ।

लाइन पर घबराई बौखलाई, बल्कि आतंकित, सगीता निगम थी ।

“मिस्टर शर्मा ?”

“यस ।”

“आई एम सॉरी आई कॉल्ड यू ऐट सच एन अनगॉडली आवर लेकिन...”

“इट्स आल राइट, मैडम ।

“बात बहुत जरूरी है ।”

“मैं सुन रहा हूं ।”

“बात... सार्थक की बाबत है...”

“मैडम, आप रात की इस घड़ी का खयाल कीजिये और जो कहना है, भूमिका बांधे बिना कहिये ।”

“आज रात लेट नाइट में रॉक डिसिल्वा निगम साहब से मिलने आया था । इत्तफाक से मुझे उनके वार्तालाप के कुछ अंश सुनाई दे गये थे । वो सार्थक के बारे में ऐसी बातें कर रहे थे जिनसे मुझे एक ही अन्दाजा हुआ कि उसका कोई नया बुरा होने वाला था उस पर कोई नयी मुसीबत टूटने वाली थी । और वजह मैं बनने वाली थी ।”

“आप बनने वाली थीं ! कहीं आपने बोल तो नहीं दिया था कि सार्थक कहां था... आई मीन, जेल से छूटने के बाद वो कहां गया था ?”

“नहीं, नहीं ! वो नहीं बोला था मैंने । लेकिन पिछली रात हमारी बहुत तू तू मैं मैं हुई थी । तब कुछ ऐसी बातें मेरे मुंह से निकल गयी थीं जो नहीं निकलनी चाहिये थीं । कुछ अपने भड़के मिजाज में मैंने खुद कह दी थी...”

“ड्रिंक किए थीं ?”

“भई, वो रुटीन है मेरी ईवनिंग की । आई एम ए वैरी फ्रस्ट्रेटिड वूमेन, मिस्टर शर्मा ।”

“आई अंडरस्टैण्ड । आप कहिये जो कह रही थीं !”

“वो... वो क्या है कि... कि अपने उस वक्त के आपे से बाहर मिजाज के तहत मैं ये भी बोल बैठी थी कि कत्ल की रात को कत्ल के वक्त के आसपास सार्थक मेरे साथ था ।”

“ओह, नो ।”

“मैंने बोला न, कुछ बातें मुंह से निकल गयी थीं और कुछ नशे की वजह से... मैंने.. मैंने बोला न, आई वाज ड्रंक ।”

“ऐसा और क्या बोला ?”

“और बोला कि मैं सार्थक के हक में कोर्ट में गवाही देने का फैसला कर चुकी थी ।”

“गॉड ! कल इतना कुछ बोल दिया और आज छुप कर उन लोगों की खुफिया बातें सुन लीं !”

“उनको नहीं मालूम कि मैंने उनकी बातें सुनी थीं ।”

“आपको क्या मालूम ?”

“सुनी होती तो एक नया फसाद खड़ा हो गया होता ।”

“जो कि नहीं हुआ ?”

“हां ।”

“फिर आप खौफजदा क्यों हैं ?”

“प - पता नहीं ।”

“कहां हैं आप इस वक्त ? साकेत में ?”

“नहीं, आर पी. रोड पर ।”

“आप चाहती हैं मैं वहां पहुंचूं ?”

“चाहती तो हूं... क्योंकि मुझे किसी की सपोर्ट की जरूरत है लेकिन...”

“क्या लेकिन ?”

“ये सरकारी कोठी है, आर.पी. रोड हाई सिक्योरिटी एरिया है, रात की इस घड़ी तुम्हारे यहां आने से मेरी तो कोई मदद होगी नहीं, तुम्हारे लिये प्राब्लम खड़ी हो जायेगी ।”

“तो फिर...”

“कल आना । दस बजे । तब तक निगम साहब जा चुके होंगे ।”

“फिलहाल आपको वहां कोई खतरा नहीं ? आप...”

“वो जाग गये जान पड़ते हैं, मैं...”

“आप हैं कहां ?”

“बाथरूम में । कट करती हूं ।”

काल डिसकनैक्ट हो गयी ।

नींद तो उड़ ही गयी थी इसलिये मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और वस्तुस्थिति पर विचार करने लगा ।

स्थिति उसकी कल्पना से ज्यादा गम्भीर हो सकती थी । अगर सांसद की और रॉक डिसिल्वा की उस खुफिया मन्त्रणा का सब्जैक्ट सार्थक था तो ये उसके वजूद के लिये खतरे की गम्भीर घन्टी थी । अगर आलोक निगम ने सार्थक को ठिकाने लगवाने का फैसला कर लिया था तो वही अंजाम उसकी बीवी का भी हो सकता था । बेवफाई को कोई जोरावर हसबैंड यूं ही माफ नहीं कर देता, वो एक पार्टनर को सजा का मुश्तहक समझता है तो यकीनन दूसरे को भी समझता । सार्थक उसके लिये काला चोर था और बीवी का भी उसे कुछ मीठा नहीं था । वो चुटकियों में ऐसा इन्तजाम करा सकता था कि दोनों भुंगों की तरह मसल दिये जाते ।

उस औरत की जान को खतरा मुझे बराबर जान पड़ता था लेकिन मामला वीआईपी का था । पोलिटिकल वीआईपी का था, रात की उस घड़ी मैं कुछ नहीं कर सकता था । मैं पुलिस को काल लगाता तो अफवाहें फैलाने के इलजाम में वो लोग मेरे को ही थाम लेते ।

फिर मैंने तसवीर के दूसरे रुख पर गौर किया ।

आलोक निगम पोलिटिकल लीडर था, अपने कैरियर के मौजूदा दौर में वो कोई स्कैण्डल खड़ा होना अफोर्ड नहीं कर सकता था । बाद में - उसके मंत्री पद का फैसला हो जाने के बाद में - जो होता सो होता, अभी संगीता निगम का कोई अहित नहीं होने वाला था ।

और सार्थक के किसी अहित का इन्तजाम करने से पहले उसको लोकेट किया जाना जरूरी था जो कि मौजूदा हालात में मुश्किल साबित हो सकता था ।

लिहाजा मेरी अक्ल ने आखिरी फैसला यही किया कि फिलहाल स्थिति यथापूर्व ही रहने वाली थी ।

मैंने सिग्रेट को तिलांजलि दी, लाइट ऑफ की और फिर नींद के हवाले हो गया ।

******************************************************************
 
फोन की घंटी बजी ।

लाइन पर एडवोकेट महाजन था ।

मैंने घड़ी पर निगाह डाली तो पाया आठ बज चुके थे ।

मैंने काल रिसीव की ।

“बुरी खबर है ।” - बिना दुआ सलाम वो बोला ।

सवेरे अखबार आता था, दूध आता था, यूअर्स ट्रूली के यहां बुरी खबर आती थी ।

“सार्थक की ?” - मैं बोला - “एनकाउन्टर में मार गिराया पुलिस ने ?”

“अरे, नहीं, भई ।”

“ओह ! महज गिरफ्तार हुआ !”

“अरे, सुनो, भई ।”

“सॉरी !”

“मेरे को उसका फोन आया था सुबह सवेरे ।”

“कहां से ?”

“पता नहीं । कोई लैंडलाइन का फोन था । शायद किसी पीसीओ से बोल रहा था ।”

“क्या बोला ?”

“बोला क्या, बोल के नाशुक्रापन दिखाया । बोला, उसे अब किसी लीगल रिप्रेजेंटेशन की जरूरत नहीं थी ।”

“क्यों ? क्यों जरूरत नहीं थी ?”

“क्योंकि उसका इस मुल्क के कायदे कानून से विश्वास उठ गया था ।”

“ऐसा बोला वो ? ‘इस मुल्क’ बोला ?”

“हां ।”

“इसका तो एक ही मतलब हो सकता है ।”

“क्या ?”

“वो वापिस नेपाल खिसक लेने का हिन्ट दे रहा था ।”

“मुझे भी ऐसा ही लगा था । इसीलिये तुम्हारी राय जानने के लिये मैंने तुम्हें फोन लगाया ।”

“मैं भी नाशुक्रा ही कहूंगा उसे जिसने ‘सार्थक को इंसाफ दो’ वाली सारी मूवमेंट पर ही थूक दिया । इतनी मेहनत से हुई लाखों की कलैक्शन को यूं राइट ऑफ कर दिया ! वकील साहब, जो उसने सोचा है, वो पुलिस के जेहन में भी आयेगा । नहीं पहुंच पायेगा नेपाल ।”

“फिर तो हो सकता है हम उसकी नीयत की बाबत गलत अन्दाजे लगा रहे हों !”

“लेकिन वो ये भी तो बोला कि उसे किसी लीगल रिप्रेजेंटेशन की जरूरत नहीं थी !”

“जरूर किसी और कॉन्टेक्स्ट में कहा उसने ऐसा जिसका मैंने ये - गलत - मतलब लगाया कि वो बतौर वकील मुझे डिसमिस कर रहा था ।”

“तो फिर फोन ही क्यों किया उसने आपको ?”

“बहुत कम्पलैक्स किरदार है इस लड़के का । मिले तो कुछ समझ में आये !”

“ठीक ।”

“मेरा मार्निंग में कोर्ट में एक केस है जो मुझे सारा दिन बिजी रखेगा । मैं चाहता हूं तुम संगीता निगम से मिलो और मालूम करो कि क्या उसके पास भी सार्थक की कोई फोन काल आयी थी ?”

“मैं मिलूं ?”

“क्या हर्ज है ? कोई नया काम तो नहीं करोगे ! एक बार मिल तो चुके हो !”

“आप फोन क्यों नहीं लगाते ?”

“लगाया था । जवाब नहीं मिला था ।”

“ओह !”

मैं सोचने लगा कि उसे संगीता निगम की मिडनाइट काल की बाबत बताऊं या न बताऊं । मैंने बताने का फैसला किया । मैंने बताया ।

“यानी कि” - वो बोला - “उससे मिलने तो तुमने जाना ही जाना है । फिर मेरे जाने को कहने पर झिझक के क्यों दिखा रहे थे ?”

“नेता कोई खतरनाक कदम उठा सकता है ?”

“भई, बीवी को तो शायद माफ कर दे लेकिन बीवी के यार को माफ नहीं करने वाला ।”

“ओह !”

“जोरावर जोर आजमाने से बाज नहीं आता ।”

“क्या करेगा ? मरवा देगा ?”

“आये दिन फैटल रोड एक्सीडेंट होते हैं, लोग बाग कारों की, बसों की, ट्रकों की चपेट में आ के मरते ही रहते हैं । ऐसी एक एक्स्ट्रा मौत की कहां कहीं हाजिरी लगेगी !”

“आपका इशारा पकड़ा मैंने । अब एक बात बताइये ।”

“पूछो ।”

“अभी पुलिस को ये इमकान न होगा कि उनका जमानती गायब था । लेकिन जब वो दस बजे की हाजिरी पर थाने नहीं पहुंचेगा तो क्या होगा ?”

“आज कुछ न हो, इसका इंतजाम मैंने किया है । मेरा एक जूनियर थाने जायेगा जो उन्हें खबर करेगा कि सार्थक एकाएक बीमार पड़ गया था, थाने नहीं पेश हो सकता था । वो लोग मैडीकल सर्टिफिकेट की मांग करेंगे जिसके लिये आज का टाइम तो जरूर ही देंगे । जमा, मैं नामी वकील हूं मेरा भी कोई लिहाज होगा उन्हें । बहरहाल आज का दिन टल जायेगा, कल की कल देखेंगे ।”

“ठीक !”

“शर्मा, फिलहाल तुमने भी किसी को ये नहीं कहना है कि सार्थक गायब है । ताकीद है ।”

“कोई सवाल करे तो झूठ बोलूं ?”

“हां । मेरे को मालूम है ऐसा तुम कोई पहली बार नहीं करोगे । या करोगे ?”

मैंने जवाब न दिया ।

लाइन कट गयी ।

******************************************************************
 
मैं राजेन्द्र प्रसाद रोड पहुंचा ।

तब तक दस बज चुके थे ।

मेरे साथ शेफाली परमार थी जिसने मेरी दरख्वास्त पर मेरे साथ आना कबूल किया था । मैंने उसे बताया था कि मैं संगीता निगम से मिलना चाहता था लेकिन सांसद की सरकारी कोठी में उस तक पहुंचने में मुझे दिक्कत का सामना करना पड़ सकता था जबकि भांजी को मामी से मिलने से कोई न रोकता ।

और मैं पुछल्ला ।

सिक्योरिटी गार्ड शेफाली को पहचानता था इसलिये भीतर दाखिल होने में हमें कोई दिक्कत पेश न आयी ।

हमने यार्ड में कदम रखा ।

रास्ते में मैं शेफाली को सार्थक और संगीता के सीक्रेट लव अफेयर की बाबत बता चुका था । वो चमत्कृत थी कि उसके जीजा का उसकी मामी से अफेयर था ।

मैंने बंगले के मेनडोर पर पहुंचकर कालबैल बजाई तो दरवाजा मेड ने खोला । उसने शेफाली का अभिवादन किया, मैं क्योंकि मालकिन की भांजी के साथ था इसलिये मेरा भी अभिवादन किया ।

“साहब गये ?” - शेफाली ने पूछा ।

“जी हां ।” - जवाब मिला - “आज जल्दी चले गये थे ।”

“मेम साहब ?”

“वो अभी बाहर नहीं आयीं ।”

“बाहर नहीं आयीं ! कहां से बाहर नहीं आयीं ?”

“बैडरूम से ।”

“भई, दस बज रहे हैं । जा के जगाती उन्हें !”

“हुक्म नहीं है ।”

“क्या मतलब ?”

“मैडम का हुक्म है घंटी सुने बिना उनके पास नहीं जाना । किचन में घन्टी है । उनके पास उसका कार्डलैस बटन है । घंटी बजा कर बुलाती हैं तो जाती हूं ।”

“कोई मार्निंग टी वगैरह सर्व नहीं करती ?”

“करती हूं । लेकिन वो भी जब घन्टी बजे ।”

“हूं । जा ।”

मेड चली गयी ।

“तुम ठहरो ।” - शेफाली मेरे से बोली - “मैं देखती हूं ।”

वो पिछवाड़े को जाते गलियारे की तरफ बढ़ चली ।

पीछे मैं खामोश खड़ा प्रतीक्षा करता रहा ।

वो अंग्रेज के वक्त के बंगले थे जिनमें ऐश्वर्य की कमी थी लेकिन जिनमें रहना, रह पाना, शान की, अभिमान की बात थी ।

एक जोर की चीज वातावरण में गूंजी ।

जनाना चीज !

शेफाली के अलावा और किसकी होती !

मैं उधर झपटा जिधर शेफाली गयी थी ।

बंगले में पृष्ठभाग में एक विशाल बैडरूम था जिसका दरवाजा खुला था और शेफाली उसकी चौखट थामे पेंडुलम की तरह झूल रही थी । उसका चेहरा फक था और आंखों में गहन आतंक के भाव थे ।

“क्या हुआ ?” - मैं व्यग्र भाव से बोला ।

कोशिश करने पर भी उसके मुंह से बोल न फूटा, होंठ फड़फड़ा के रह गये, उसने अटैच्ड बाथरूम की तरफ उंगली उठा दी ।

मैंने चौखट से भीतर कदम डाला, ठिठका, मैंने सिर उठा कर नथुने फुलाये और जोर से सांस खींची ।

वातावरण में एक अजीब सी गन्ध व्याप्त थी ।

क्षीण लेकिन तीखी । जैसी किसी चीज के सुलगने से आती है ।

शायद वहां कोई स्प्रे इस्तेमाल किया गया था ।

मैंने बैडरूम क्रॉस किया और बाथरूम पर पहुंचा । दरवाजा खुला था । मेरी भीतर निगाह पड़ी तो मैं वहीं थमक कर खड़ा हो गया ।

बाथटब में वो मरी पड़ी थी । उसकी पथराई आंखें मुझे चौखट पर से ही दिखाई दे रही थीं । बाथटब पानी से भरा हुआ था और जिस पोजीशन में वो थी, उसमें पानी उसकी भवों तक आ रहा था ।

भारी कदमों से चलता मैं टब के करीब पहुंचा । मैंने झुक कर उसकी सूरत का मुआयना किया तो मुझे उसकी मेरी ओर की कनपटी पर एक गूमड़ दिखाई दिया जो इतना बड़ा था कि बालों से बाहर झांक रहा था ।

बाथ टब मार्बल का था ।

हादसा !

बाथटब में उतरी, पांव फिसला, कनपटी टब की साइड से टकराई तो होश खो बैठी । फिर बेहोशी में ही टब के पानी में डूब के मर गयी ।

मैंने पानी को छुआ ।

वो अभी पर्याप्त गर्म था । यानी हादसा हुए ज्यादा देर नहीं हुई थी । ज्यादा देर हुई होती तो पानी ठण्डा हो चुका होता ।

मैं उठ कर सीधा हुआ, आदतन मैंने बारीक, खोजी निगाह हर तरफ दौड़ाई ।

सिंक के नीचे एक स्टील की, गोल, वेस्ट पेपर बास्केट पड़ी थी जिसे मैंने बाहर खींचा और भीतर झांका । उसमें सिर्फ तीन चार गुच्छा मुच्छा टिशूज थे और -

पोलीथीन की एक लम्बी, गोल, छपी हुई नलकी थी ।

मैंने उसको वहां से उठाया ।

सिगारेलो । मेड इन पुर्तगाल ।

वो वैसे चुरुट का रैपर था जैसा मैंने रॉक डिसिल्वा को पीते देखा था ।

अब वो क्षीण, गन्ध भी कोई राज न रही जो कि वातावरण में व्याप्त थी ।

वो खास पुर्तगाली चुरुट की ही तीखी गन्ध थी जो अपना महत्व खुद जता रही थी, बल्कि अपनी कहानी खुद कह रही थी ।

अभी जो मैं वाकये की बाबत फैसला करके हटा था, अब उस पर पुनर्विचार जरूरी था ।

क्या वाकेई वो हादसा था ?

मैंने रैपर को वापिस बास्केट में डाला, मोबाइल कैमरे से रैपर को फोकस करके बास्केट की तसवीर खींची, बास्केट पर से अपने फिंगरप्रिंट्स पोंछ कर मिटाये और फिर बास्केट को सिंक के नीचे यथास्थान सरका दिया ।

मैं बाथरूम से निकल कर वापिस शेफाली के पास पहुंचा । वो अभी भी चौखट पर खड़ी थी, अलबत्ता उसका झूलना बन्द हो गया था ।

उसके पास मेड खड़ी थी, शायद उसी ने आ कर शेफाली को सम्भाला था ।

शेफाली की चीख की आवाज जरूर बंगले के आयरन गेट तक नहीं पहुंची थी वर्ना सिक्योरिटी गार्ड भी वहां होता ।

“एमपी साहब को खबर करनी होगी !” - मैं शेफाली से सम्बोधित हुआ - “फोन करो उन्हें ।”

शेफाली ने मेड की तरफ देखा ।

“मैंने किया था ।” - मेड जल्दी से बोली - “साहब फोन नहीं ले रहे ।”

“ओह !”

“उनके आफिस में फोन लगाया था तो कोई बोला था कि वो वहां नहीं थे लेकिन वो परमार साहब के यहां हो सकते थे ।”

“वहां फोन किया ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“नम्बर नहीं मालूम ।”

“पुलिस को ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“मैडम ने बोला नहीं ।”

ट्रेंड मेड थी । हुक्म के मुताबिक ही काम करती थी ।

“तुम करो ।” - मैं शेफाली से बोला ।

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

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