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Thriller कांटा

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“बहुत चालाकी से उसने यह सब किया था।” अजय आगे बोला “कुछ इस तरह कि वह कत्ल नहीं एक हादसा लगता। बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन प्रबीरदास का खानदानी कारोबार था। उन दिनों उनकी कम्पनी आईटीओ के करीब एक सौ फुट से ज्यादा ऊंची इमारत बना रही थी, जिसका काम अपने आखिरी चरण में था और उसी समय प्रबीरदास उसके मुआयने के लिए वहां पहुंचे थे। मेरे पापा निमेष वहां पहले से मौजूद थे। फिर अचानक वहां एक भीषण हादसा पेश आया था और कंस्ट्रक्शन में लगी उस क्रेन मशीन की लिफ्ट अचानक टूट गई थी, जो भारी मेटीरियल और लोगों को सौ फुट ऊपर पहुंचाती थी। उस हादसे में अकेले प्रबीरदास ही नहीं, मेरे पापा की भी मौत हो गई थी और कोई यह तक साबित नहीं कर सका था कि वह कोई हादसा नहीं बल्कि कत्ल था कत्ल का सोचा समझा षड्यंत्र था।"

अजय खामोश हो गया और गहरी-गहरी सांसें भरने लगा था। कोमल और जतिन अपलक उसे ही देख रहे थे।

"ओह । तो यह बात है।" सहसा कोमल बोली। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गए थे “तो तुम निमेष के बेटे और प्रबीरदास के नाती हो। रीनी के ममेरे भाई हो अ...और मेरे भी। देखा, मेरा अंदाजा कितना सही निकला।”

अजय के लिए कोमल की नजर अब पूरी तरह बदल गई थी। लेकिन अजय के जख्म ताजा हो गए थे।

“वह बुलंद इमारत आज भी जानकी लाल के गुनाह की निशानी के तौर पर महफूज है।" अजय ने आगे कहा “और उसे मैं हर रोज अपने फ्लैट की टैरेस पर बैठकर निहारता आया हूं। गुजरने वाले वक्त के साथ जानकी लाल बहुत ताकतवर हो । गया। मैं अकेला चाहकर भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था लेकिन मैं उसे छोड़ भी नहीं सकता था। इसीलिए मैं उसके और करीब आ गया। वह मुझे हरगिज भी नहीं पहचान सकता था, इसीलिए मैंने उसकी कम्पनी में नौकरी कर ली। तुमने बिल्कुल ठीक कहा था कोमल, मैंने केवल उस शैतान से नजदीकी बढ़ाने के लिए ही उसकी नौकरी की थी, महज पैसों के लिए नहीं। पैसा तो मेरे पास निमेष मेरे लिए बहुत छोड़कर गए थे, जिस पर जानकी लाल काबिज नहीं हो सका था और मेरे बालिग होते ही वह सारा रुपया मुझे हासिल हो गया था।

आज भले ही जानकी लाल दुनिया में नहीं है, लेकिन यह अफसोस मुझे हमेशा सालता रहेगा कि वह मेरे अपने हाथों कुत्ते की मौत नहीं मरा।”

अजय खामोश हो गया और फिर गहरी-गहरी सांसे भरने लगा। कितनी ही देर तक फिजां में पैना सन्नाटा छाया रहा, फिर उस सन्नाटे को कोमल ने ही तोड़ा।

“खैर...।” वह जतिन की ओर मुखातिब होकर बोली “और तुम्हारा क्या किस्सा है जतिन?"

“म..मेरा किस्सा वहां से शुरू होता है जहां से अजय का किस्सा खत्म होता है।” जतिन अजय पर एक सरसरी निगाह डालता हुआ बोला।

“म...मैं कुछ समझी नहीं। साफ-साफ कहो जतिन?”

“जानकी लाल ने अपने अतीत का कोई भी गुनाह अकेले नहीं किया था।” जतिन कुछ पलों की खामोशी के बाद बोला था “कोई था जिसने कदम-कदम पर जानकी लाल का साथ दिया था। जिसने कंधों से कंधा मिलाकर उसके हर गुनाह में बराबरी की शिरकत की थी और उसके लिए अपनी जान की परवाह नहीं की थी।"

“ए...ऐसा आदमी तो...।” अजय चिंहुककर जतिन को देखता हुआ बोला “सौगत था जानकी लाल का लंगोटिया यार।"

"तुमने ठीक कहा दोस्त ।” जतिन ने सहमति में सिर हिलाया “उसका नाम सचमुच सौगत ही था। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि फिर सौगत का क्या अंजाम हुआ था? जानकी लाल तो जिंदा था, मगर वह अपने हसीन लम्हों को देखने के लिए जिंदा क्यों नहीं बचा था?"

"न...नहीं।” अजय के चेहरे पर उत्सुकता के भाव आ गए थे "फिर सौगत के साथ क्या हुआ था?"

“सौगत मर गया था। उसकी कार का अचानक एक्सीडेंट हो गया था। एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी थी।"

“आई सी।"

"लेकिन वह रोड एक्सीडेंट का स्वाभाविक मामला नहीं था। क्योंकि जिस ट्रक ने उसे ठोका था, वह कोई बाहरी ट्रक नहीं बल्कि प्रबीरदास की कंस्ट्रक्शन कम्पनी का एक वोल्वो ट्रक था। और उसे कंपनी का कोई ड्राइवर नहीं बल्कि एक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर चला रहा था। जिसका अपना एक गैंग था और जिसका काम भाड़े पर कत्ल करना और अपहरण करके फिरौती वसूल करना था। उस गैंग के सरगना का नाम गोपाल था।"

“स...समझ गई।” कोमल के मुंह से अनायास ही निकल गया "तो उस कुख्यात किलर से जानकी लाल सेठ की वाकफियत का यह राज है। उसने बरसों पहले उसके गैंग की मदद से सौगत का कत्ल करवाया था। मगर...।"

सहसा कोमल के माथे पर बल पड़ गए। उसने जतिन ने पूछा “सौगत से तुम्हारा क्या रिश्ता था।"

“म...मैं उन्हीं सौगत का बेटा हूं।” जतिन ने बता दिया “और मेरे पिता के बदले की आग मेरे सीने में धधक रही थी। और मेरे पिता की आत्मा जैसे मुझे धिक्कार रही थी कि उसका कातिल आज भी जिंदा घूम रहा है। लेकिन...।" वह एकाएक रुक गया, फिर कुछ रुककर बोला “अब सब ठीक है। और मुझे खुशी है कि आज मेरा इंतकाम पूरा हो गया। जिस मकसद को लेकर मैं जानकी लाल सेठ की कंपनी में आया था, वह पूरा हो गया। अब मुझे इस नौकरी की कोई जरूरत नहीं है। अगर आज मैं गिरफ्तार न हुआ होता तो मैं आज ही कंपनी से रिजाइन देकर यह शहर छोड देने वाला था। लेकिन...।" उसने आह भरी और अपने वाक्य को अधूरा छोड़ दिया और पहलू बदलने लगा।

उसके चुप होते ही वातावरण में एक फिर खामोशी छा गई।
 
"बहुत खूब।” फिर उस खामोशी को कोमल ने ही तोड़ा। माहौल का खिंचाव उसके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था। वह बोली “और अगर मैं गलत नहीं तो इंस्पेक्टर मदारी को हमारे बारे में सब कुछ मालूम है। उसने हमारा अतीत ढूढ निकाला है। और..."

“और क्या?” अजय ने उसे सवालिया निगाहों से देखा।

“उसने जानबूझकर हम तीनों को एक ही लॉकअप में बंद किया है।” कोमल ने अपनी बात पूरी की “और जानबूझकर

हमें आपस में बात करने का मौका दिया है।"

"मेरा भी यही ख्याल है।" अजय और जतिन के सिर स्वयमेव सहमति में हिले, फिर अजय बोला “किसी कत्ल के केस में पुलिस मरने वाले का अतीत काफी बारीकी से खंगालती है,

और उस कत्ल के तमाम सस्पेक्ट का भी, जो कि हम लोग यकीनन थे। और इन्वेस्टीगेटर अगर मदारी जैसा हो तो उसके लिए यह सब जान लेना ज्यादा मुश्किल नहीं है।” वह एकाएक कोमल की तरफ घूमा “लेकिन तुम्हारा क्या अतीत है कोमल?"

"मेरा अतीत तो सारे शहर को मालूम है।” कोमल वितृष्णा से बोला। “तुम्हारे बारे में सारा शहर केवल इतना जानता है कि तुम्हारी मां को जानकी लाल ने धोखा दिया था। उनके साथ । पहले उसने पत्नी का रिश्ता बनाया, फिर जब वह गर्भवती हो गई, यानि जब तुम उनके गर्भ में आ गई तो उसने तुम्हें बाप का नाम देने से इंकार कर दिया। लेकिन तुम्हारी मां ने भी ठान लिया था कि वह अपनी बेटी को उसका हक दिलाकर ही रहेंगी। उसके लिए उन्होंने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी थी और उसमें उनकी जीत भी हुई थी। उन्होंने अदालत में यह साबित किया था कि तुम जानकी लाल की बेटी थी।"

“तुमने ठीक कहा।” कोमल सहमति में सिर हिलाती हुई असहिष्णुता से बोली। उसके चेहरे पर जानकी लाल के लिए हिकारत के भाव आ गए थे “दौलतमंद बन जाने के बाद जानकी लाल एक नम्बर का अय्याश भी बन गया था। उसे सोने के लिए हर रोज एक नई लड़की की ख्वाहिश होती थी। जिस किसी भी नौजवान हसीन लड़की पर उसका दिल आ जाता था, वह उसे हासिल करके रहता था और उसे हासिल करते ही उसकी सूरत भी भूल जाता था उसकी एक रात की कीमत देकर उसे दुत्कार देता था। जो बिकती नहीं थी उसके साथ वह फ्लर्ट करता था, प्यार का नाटक करता था।

आखिरकार उसका भी वही हश्र होता था। मगर मेरी मां...।"

अजय व जतिन उसे ही देख रहे थे।

“मेरी मां इसकी अपवाद साबित हुई थी। उन्होंने जानकी लाल के हाथों बिकने से इंकार कर दिया था और अपने हक से नीचे कोई समझौता नहीं किया था। मजबूरन जानकी लाल को उन्हें उनका हक देना पड़ा था। और क्योंकि उसकी ब्याहता बीवी तो सरला थी लिहाजा मुझे उसकी सौतेली बेटी का दरजा हासिल हुआ।”

कोमल शांत हुई तो लॉकअप में घुप्प सन्नाटा छा गया।

तभी एक पुलिसिया वहां पहुंचा। तीनों की निगाह उसकी ओर उठ गई।

“तुम लोगों में से अजय कौन है?” उसने सवाल किया।

“मैं हूं।” अजय ने सशंक भाव से उसे देखा “मगर बात क्या है?”

“एक लड़की आयी है।” उसने बताया “तुमसे मिलना चाहती है।"

"ल...लड़की...।" अजय के जेहन में सुगंधा का नाम गूंज गया। उसने आशंकित भाव से पूछा “कौन लड़की?"

“अभी मालूम हो जाएगा।"

पुलिसिया पलटकर उल्टे पांव वापस लौट गया।

लॉकअप में तीन-तीन लोगों की मौजूदगी के बावजूद सन्नाटा गहराता चला गया।

“सत्यानाश।” महरौली की उस सुनसान सड़क पर मौजूद लाश को देखता हुआ मदारी अपने जबड़े भींचकर बोला “सुपर सत्यानाश।”

“कि...किसका।” उसके साथ पुलिस टीम में मौजूद सब-इंस्पेक्टर शर्मा हड़बड़ाकर बोला “किसका सत्यानाश हो गया सर?”

“मेरे वीआरएस का।" मदारी ने बताया “यह कमबख्त सारे के सारे कत्ल जैसे मेरे वीआरएस का ही इंतजार कर रहे थे। अब अगर ऐसे में मैंने वीआरएस का ख्याल भी किया तो इंस्पेक्टर मदारी का नाम धूल में मिल जाएगा। सारा महकमा यही कहेगा, कि मदारी कल्लों की यह मिस्ट्री हल नहीं कर पाया, इसीलिए वीआरएस ले लिया।" वह फिर कलपा “डबल सत्यानाश ।"

"लिहाजा अब आप तभी वीआरएस लेंगे सर जबकि आप कातिल को गिरफ्तार कर लेंगे?"

“अबे शर्मा जजमान।” मदारी उसे घूरकर बोला “क्या तू चाहता है कि मैं वीआरएस ले लूं?"

“बि...बिल्कुल नहीं सर।” शर्मा हड़बड़ाकर बोला “सवाल ही नहीं उठता।"

“तो फिर वीआरएस की बात ही क्यों कर रहा है। यह क्यों नहीं कहता कि अब मै अपना वीआरएस लेने का इरादा मुल्तवी कर दूं।”

"त...तो फिर आपकी मैडम फॉरेन टूर पर कैसे जा पाएंगी?" “उसके लिए मैं अपने प्राविडेंट फंड से लोन ले सकता हूं, जिससे बीवी की समस्या हल हो सकती है।"

“इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है सर।” शर्मा ने खुशी जाहिर की “य..यह ख्याल आपको पहले क्यों नहीं

आया?"

"हर काम अपने वक्त पर ही होता है शर्मा श्रीमान। फिलहाल तुम इस लाश पर ध्यान दो।” मदारी की निगाह पुनः लाश पर स्थिर हो गई जो कच्ची सड़क पर औंधे मुंह पड़ी थी। लाश की पीठ पर गोली का सूराख नजर आ रहा था, जहां से बहकर ढेर सारा खून नीचे इकट्ठा था। जख्म से तब भी खून रिस रहा था।
 
"बहुत खूब।” फिर उस खामोशी को कोमल ने ही तोड़ा। माहौल का खिंचाव उसके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था। वह बोली “और अगर मैं गलत नहीं तो इंस्पेक्टर मदारी को हमारे बारे में सब कुछ मालूम है। उसने हमारा अतीत ढूढ निकाला है। और..."

“और क्या?” अजय ने उसे सवालिया निगाहों से देखा।

“उसने जानबूझकर हम तीनों को एक ही लॉकअप में बंद किया है।” कोमल ने अपनी बात पूरी की “और जानबूझकर

हमें आपस में बात करने का मौका दिया है।"

"मेरा भी यही ख्याल है।" अजय और जतिन के सिर स्वयमेव सहमति में हिले, फिर अजय बोला “किसी कत्ल के केस में पुलिस मरने वाले का अतीत काफी बारीकी से खंगालती है,

और उस कत्ल के तमाम सस्पेक्ट का भी, जो कि हम लोग यकीनन थे। और इन्वेस्टीगेटर अगर मदारी जैसा हो तो उसके लिए यह सब जान लेना ज्यादा मुश्किल नहीं है।” वह एकाएक कोमल की तरफ घूमा “लेकिन तुम्हारा क्या अतीत है कोमल?"

"मेरा अतीत तो सारे शहर को मालूम है।” कोमल वितृष्णा से बोला। “तुम्हारे बारे में सारा शहर केवल इतना जानता है कि तुम्हारी मां को जानकी लाल ने धोखा दिया था। उनके साथ । पहले उसने पत्नी का रिश्ता बनाया, फिर जब वह गर्भवती हो गई, यानि जब तुम उनके गर्भ में आ गई तो उसने तुम्हें बाप का नाम देने से इंकार कर दिया। लेकिन तुम्हारी मां ने भी ठान लिया था कि वह अपनी बेटी को उसका हक दिलाकर ही रहेंगी। उसके लिए उन्होंने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी थी और उसमें उनकी जीत भी हुई थी। उन्होंने अदालत में यह साबित किया था कि तुम जानकी लाल की बेटी थी।"

“तुमने ठीक कहा।” कोमल सहमति में सिर हिलाती हुई असहिष्णुता से बोली। उसके चेहरे पर जानकी लाल के लिए हिकारत के भाव आ गए थे “दौलतमंद बन जाने के बाद जानकी लाल एक नम्बर का अय्याश भी बन गया था। उसे सोने के लिए हर रोज एक नई लड़की की ख्वाहिश होती थी। जिस किसी भी नौजवान हसीन लड़की पर उसका दिल आ जाता था, वह उसे हासिल करके रहता था और उसे हासिल करते ही उसकी सूरत भी भूल जाता था उसकी एक रात की कीमत देकर उसे दुत्कार देता था। जो बिकती नहीं थी उसके साथ वह फ्लर्ट करता था, प्यार का नाटक करता था।

आखिरकार उसका भी वही हश्र होता था। मगर मेरी मां...।"

अजय व जतिन उसे ही देख रहे थे।

“मेरी मां इसकी अपवाद साबित हुई थी। उन्होंने जानकी लाल के हाथों बिकने से इंकार कर दिया था और अपने हक से नीचे कोई समझौता नहीं किया था। मजबूरन जानकी लाल को उन्हें उनका हक देना पड़ा था। और क्योंकि उसकी ब्याहता बीवी तो सरला थी लिहाजा मुझे उसकी सौतेली बेटी का दरजा हासिल हुआ।”

कोमल शांत हुई तो लॉकअप में घुप्प सन्नाटा छा गया।

तभी एक पुलिसिया वहां पहुंचा। तीनों की निगाह उसकी ओर उठ गई।

“तुम लोगों में से अजय कौन है?” उसने सवाल किया।

“मैं हूं।” अजय ने सशंक भाव से उसे देखा “मगर बात क्या है?”

“एक लड़की आयी है।” उसने बताया “तुमसे मिलना चाहती है।"

"ल...लड़की...।" अजय के जेहन में सुगंधा का नाम गूंज गया। उसने आशंकित भाव से पूछा “कौन लड़की?"

“अभी मालूम हो जाएगा।"

पुलिसिया पलटकर उल्टे पांव वापस लौट गया।

लॉकअप में तीन-तीन लोगों की मौजूदगी के बावजूद सन्नाटा गहराता चला गया।

“सत्यानाश।” महरौली की उस सुनसान सड़क पर मौजूद लाश को देखता हुआ मदारी अपने जबड़े भींचकर बोला “सुपर सत्यानाश।”

“कि...किसका।” उसके साथ पुलिस टीम में मौजूद सब-इंस्पेक्टर शर्मा हड़बड़ाकर बोला “किसका सत्यानाश हो गया सर?”

“मेरे वीआरएस का।" मदारी ने बताया “यह कमबख्त सारे के सारे कत्ल जैसे मेरे वीआरएस का ही इंतजार कर रहे थे। अब अगर ऐसे में मैंने वीआरएस का ख्याल भी किया तो इंस्पेक्टर मदारी का नाम धूल में मिल जाएगा। सारा महकमा यही कहेगा, कि मदारी कल्लों की यह मिस्ट्री हल नहीं कर पाया, इसीलिए वीआरएस ले लिया।" वह फिर कलपा “डबल सत्यानाश ।"

"लिहाजा अब आप तभी वीआरएस लेंगे सर जबकि आप कातिल को गिरफ्तार कर लेंगे?"

“अबे शर्मा जजमान।” मदारी उसे घूरकर बोला “क्या तू चाहता है कि मैं वीआरएस ले लूं?"

“बि...बिल्कुल नहीं सर।” शर्मा हड़बड़ाकर बोला “सवाल ही नहीं उठता।"

“तो फिर वीआरएस की बात ही क्यों कर रहा है। यह क्यों नहीं कहता कि अब मै अपना वीआरएस लेने का इरादा मुल्तवी कर दूं।”

"त...तो फिर आपकी मैडम फॉरेन टूर पर कैसे जा पाएंगी?" “उसके लिए मैं अपने प्राविडेंट फंड से लोन ले सकता हूं, जिससे बीवी की समस्या हल हो सकती है।"

“इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है सर।” शर्मा ने खुशी जाहिर की “य..यह ख्याल आपको पहले क्यों नहीं

आया?"

"हर काम अपने वक्त पर ही होता है शर्मा श्रीमान। फिलहाल तुम इस लाश पर ध्यान दो।” मदारी की निगाह पुनः लाश पर स्थिर हो गई जो कच्ची सड़क पर औंधे मुंह पड़ी थी। लाश की पीठ पर गोली का सूराख नजर आ रहा था, जहां से बहकर ढेर सारा खून नीचे इकट्ठा था। जख्म से तब भी खून रिस रहा था।
 
लाश के करीब ही सहगल का सूटकेस छिटका पड़ा था। और करीब ही वह इंडिका बेंज की टैक्सी लावारिस सी खड़ी थी, जिसके अंदर गोपाल ने सुमेश सहगल का कत्ल किया था।

“म..मैं इस लाश का काफी बारीकी से मुआयना कर चुका हूं सर ।” शर्मा ने बताया "इसे उस वक्त शूट किया गया है जबकि यह उस कार से अभी बाहर निकला था। कातिल ने इसे पीछे से गोली मारी है, और गोली का जख्म इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहा है कि इसे भी भारी कैलीबर के रिवॉल्वर से शूट किया गया है।"

“हूं।” मदारी ने संजीदगी से हुंकार भरी, फिर बोला “यानि कि जिससे पहले संजना श्रीमती और फिर संदीप श्रीमान का शूट

आउट हुआ है?"

"यह मेरा केवल अंदाजा है सर। इसकी तस्दीक तो पोस्टमार्टम के बाद ही होगी कि इसका कत्ल सचमुच उसी भारी कैलीबर की रिवॉल्वर से हुआ है या नहीं।"

"लेकिन यह दिवगंत आत्मा आखिर है कौन?"

“इसका चेहरा नजर नहीं आ रहा सर। इसे सीधा करना पड़ेगा।” “जरूर करो शर्मा भगवान। लेकिन बहुत ही ऐहतियात से, वरन शर्मा ने सहमति में सिर हिलाया, फिर उसने अपने पुलिसिया बूट की नोक से सावधानी पूर्वक लाश

को पलटा तो मरने वाले का चेहरा भी नजर आने लगा।

वह इतना कुख्यात चेहरा था कि अकेले मदारी ने ही नहीं, शर्मा ने भी उसे फौरन पहचान लिया। उसके चेहरे पर विस्मय के भाव आ गए।

“ग...गोपाल।" शर्मा के होठों से वह लफ्ज खुद ही निकल गया था। “जय गोविंदम्, जय गोपालम् ।” मदारी बोला और उसके होंठ सीटी बजाने वाले अंदाज में सिकुड़कर गोल हो गए फिर वह बोला “तो यह भद्रपुरुष भी परलोकवासी हो गए।"

शर्मा ने आहिस्ता से सिर हिलाकर उसकी बात का अनुमोदन किया। फिर वह दोनों इंडिका के करीब पहुंचे और उसके

अंदर मौजूद सहगल की लाश का दोबारा मुआयना किया, जिसकी गरदन में मूठ तक खंजर पैवस्त था।

“कुछ समझे हनुमान।” मदारी अर्थपूर्ण भाव से शर्मा से बोला।

“ज...जी।” शर्मा सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला “समझा तो सही।"

"क्या?"

“यह शातिर आदमी सुमेश सहगल अंडरग्राउंड था और बहरूप बनाकर चुपचाप इस शहर से भाग रहा था। वह किलर गोपाल उसे हाईजैक करके यहां ले आया और फिर उसने इसे बेरहमी से कत्ल कर दिया।"

"बहुत खूब।” मदारी ने प्रशंसात्मक भाव से उसे देखा।

“उसके बाद गोपाल यहां से जाने के लिए कार से बाहर निकला, मगर वह नहीं जानता था कि कोई उसके लिए भी घात लगाए बाहर बैठा है। और जैसे ही वह बाहर निकला उसने गोपाल को शूट कर दिया।"

“लेकिन सवाल तो यह है कि श्रीमान कि अपने गोपाल ने सहगल अंडमान का फातिहा क्यों पढ़ा?"

“य...यह तो मेरी समझ से बाहर है सर।"

“और वह फन्ने खां कौन है जिसने गोपालम जैसे पैंतालीस मारखां का बैंड बजाया?"

“आई डोंट नो सर।"

“और अगर यह मान लें कि...।" मदारी ने फिर अगला सवाल किया “श्री-श्री का बैंड बजाने वाला गोपालम् था तो बाकी

इतने सारे लोगों का बैंड आखिर किसने बजाया? उन बाकी सारे लोगों में अपना गोपालम् भी शामिल है।"
 
“ऑय एम सॉरी सर।” शर्मा खेद भरे स्वर में बोला “इन सवालों का जवाब मेरे लिए किसी रहस्य से कम नहीं है।" सहसा वह रुक गया, फिर वह सवालिया निगाहों से मदारी को देखता हुआ बोला “क...कहीं यह काम अजय, जतिन और कोमल में से तो किसी का नहीं है?"

"लेकिन वह तीनों मासूम तो इस वक्त हमारे हवालात की हवा खा रहे हैं। और वहां बैठकर वे बेचारे यह कारनामा कैसे दिखा सकते हैं?"

“ओह। मगर नैना तो आजाद है सर और उसके तारे भी इस मामले में गहराई तक जुड़े हुए हैं। क्या वह कातिल नहीं हो सकती है?"

“होने को तो इस दुनिया में क्या नहीं हो सकता भगवान। लेकिन उस नैना कजरारे में कोई भेद है।"

“क...कैसा भेद सर?"

“मैंने इस तरफ काफी ठोक-बजाकर देखा है और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि ऊपर से चट्टान जैसी सख्त दिखने वाली

नैना कजरारे असल में वैसी है नहीं जैसी कि वह दुनिया को नजर आती है।”

"त...तो फिर?"

“ऊपर से सख्त, कठोर वह श्रीमती असल में अंदर से मोम की तरह मुलायम और पिलपिली है और वह खुद को हमेशा श्री-श्री की सुहागिन मानती आयी है और श्री-श्री की मौत के बाद अब वह खुद को उनकी विधवा मानती है।"

“य...यह आप क्या कह रहे हैं सर।" शर्मा चकित होकर बोला। “वही जो सच है।"

“लेकिन जानकी लाल से उसकी वह प्रतिद्वंदिता...?"

"वह सब कारोबारी खेल थे वह उसकी कारोबारी दुनिया की प्रतिद्वंदिता थी। प्रतिद्वंदी होना और रकीब होना, दोनों बहुत

अलग चीजें हैं। और..."

“और क्या सर?”

“श्री-श्री की मौत वाले मामले में उनकी कार से नैना कजरारे की कार का टकराना महज इत्तेफाक था। वह इत्तेफाक के अलावा और कुछ नहीं था। श्री-श्री की कार को ठोककर उनका क्रियाकर्म करने वाला दुष्ट पापी उधर मरा पड़ा है।"

“य...यह आपके मुंह से मैं एकदम नई बात सुन रहा हूं सर।"

"इसमें मेरा क्या कसूर ।”

“अ..और वह तीनों, जिन्हें आज आपने गिरफ्तार किया है?"

“उन पर कातिल नहीं, बल्कि केवल कत्ल के षड्यंत्र में शामिल होने का इल्जाम है श्री-श्री के कत्ल की साजिश में शरीक होने का इल्जाम है।"

“लेकिन कातिल फिर भी एक रहस्य बना हुआ है।"

"बजा फरमाया श्रीमान।" मदारी ठंडी सांस भरता हुआ बोला "फिलहाल तुम ऐसा कह सकते हो। वैसे इस मामले में जहां तक मेरी बात है तो मुझे पूरा यकीन है कोई भी रहस्य अब ज्यादा देर तक रहस्य नहीं रहने वाला। रहस्यों से परदा खिसकने का वक्त शायद अब आ पहुंचा है, बस भोलेनाथ के इशारे का इंतजार है। जय भोलेनाथ।"

सलाखों के पार सुगंधा को देखते ही अजय का दिल जोर जोर से धड़क उठा। वह शांत और स्निग्ध भाव से अपलक अजय को ही देख रही थी। उसका हमेशा खिला-खिला सा रहने वाला खूबसूरत चेहरा उस वक्त मुरझाया सा प्रतीत हो रहा था। आंखों के पपोटे सूज गए थे। ऐसा लगता था कि जैसे कि वहां आने से पहले वह जी भरकर रोई थी।
 
लेकिन उस वक्त वह शांत थी और उसके चेहरे के जर्रे-जर्रे पर छाई वह शांति किसी गुजर जाने वाले तूफान के बाद की शांति को ताजा कर रही थी और वह एक जबरदस्त कशमकश के हवाले मालूम पड़ती थी।

जतिन और कोमल ने भले ही सुगंधा को पहली बार देखा

था। लेकिन उसका नाम उनके लिए अजनबी नहीं था और अजय की जिंदगी में उसकी अहमियत से भी वे बखूबी वाकिफ थे।

सुगंधा को उस हाल में देखकर अजय मन ही मन तड़प उठा। क्या हालत बना ली थी उस लड़की ने अपनी।

“सुगंधा।” वह विवशता से अपने होंठ काटता हुआ बोला "तुम यहां?"

“क्यों? क्या मुझे यहां नहीं आना चाहिए था?” सुगंधा के होंठ कंपकंपाये। वह शिकायत भरे स्वर में बोली।

“न...नहीं। यह तो मैंने नहीं कहा।"

"मुझे पहले से ही तुम्हारे पर संदेह था पार्टनर ।” सुगंधा बोली “इसीलिए मैंने तुम्हें टोका भी था। लेकिन तुमने मुझसे झूठ बोला।”

“आ...ऑय एम सॉरी सुगंधा।” अजय का सिर झुक गया "लेकिन मैंने जो किया, उस पर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है। मैंने अपना अतीत आज तक तुमसे छुपाकर रखा था। लेकिन मेरे जीने का मकसद केवल बदला था इंतकाम था। जानकी लाल इंसान नहीं शैतान था। जिसने अकेले मेरे परिवार को ही बल्कि ..."

“म...मगर मेरा मकसद तो तुम ही थे पार्टनर ।” सुगंधा ने झटके से सिर उठाया और उसकी बात बीच में ही काटकर बोली “केवल तुम।"

“आ..ऑय एम सॉरी सुगंधा।” अजय के स्वर में अफसोस का पुट आ गया था “कभी-कभी ना चाहते हुए भी इंसान के साथ ज्यादती हो जाती है। लेकिन तुम्हें इरादतन मैंने चोट नहीं पहुंचाई।"

“तुम्हारे ऊपर एक बहुत ही संगीन इल्जाम है पार्टनर, जिसकी तुम्हें बहुत लम्बी सजा मिलेगी।”

“म..मुझे किसी सजा का अफसास नहीं है सुगंधा। आज मैं अपने आपको बहुत हल्का महसूस कर रहा हूं। हां, तुम्हारे साथ जो हुआ उसका मुझे जरूर अफसोस है।"

“तुम्हारे अफसोस करने भर से सब ठीक हो जाएगा पार्टनर? मेरा प्यार मुझे वापस मिल जाएगा।"

“किसी एक इंसान पर जाकर दुनिया खत्म नहीं हो जाती सुगंधा। यह दुनिया बहुत बड़ी है और यह कभी खत्म नहीं होने वाली। अब तुम्हें अपना आइंदा रास्ता खुद तलाश करना होगा। मैं तुम्हें अभी इसी वक्त से आजाद करता हूं, मगर तुम्हें खोने का गम मुझे हमेशा रहेगा।” जतिन और कोमल चौंककर अजय को देखने लगे थे। कितनी आसानी से वह कितनी बड़ी बात कह गया था।

सुगंधा उसे देखती रह गई।

अजय ने उसकी तरफ से चेहरा घुमा लिया और सुगंधा की तरफ सलाखों से पीठ टिकाकर अपने दर्द को पीने की कोशिश करने लगा।

"चलो अच्छा ही हुआ कि तुमने मुझे खुद आजाद कर दिया पार्टनर।” सहसा सुगंधा बोली। उसके लहजे में इस बार एक अजीब सी कठोरता समाई हुई थी “वैसे सच पूछो तो तुम्हारे पास अब और कोई रास्ता भी नहीं था।"

अजय वापस सुगंधा की ओर पलटा। कोमल और जतिन भी आश्चर्य से सुगंधा की तरफ देखने लगे थे।

“मुझे आगे क्या करना है, मैं सोचकर ही यहां आयी हूं पार्टनर।" सुगंधा अपने एक-एक शब्द पर जोर देती हुई बोली “और उसे तुम्हें बताने में मुझे ऐतराज नहीं है। मैं भले ही तुम्हारा पहला प्यार नहीं थी लेकिन तुम मेरा पहला प्यार थे।

और पहला तो पहला प्यार होता है, उसे भुलाना आसान नहीं होता। अगर मैं इस शहर में इस मुल्क में रही तो तुम्हें भुला नहीं पाऊंगी, इसीलिए मैंने यह शहर और यह मुल्क छोड़ने का फैसला कर लिया है।"

"क...क्या मतलब?"

“मैं यह मुल्क छोड़कर जा रही हूं पार्टनर । अमेरिका वाली मेरी नौकरी का ऑफर अभी मेरे लिए खुला है, जो मेरे बचपन का सपना था। मेरा पासपोर्ट-वीजा तैयार है। म... आज शाम की फ्लाइट से यूएसए जा रही हूं।" वह एक पल लिए रुकी, फिर उसने आगे जोड़ा “हमेशा-हमेशा के लिए।”
 
अजय के होठों से बोल न फूट सका। वह भौंचक्का सा सुगंधा को देखता रह गया। कितनी जल्दी और कितना माकूल रास्ता खोज लिया था उसने अपने लिए।

“म...मैं तुम्हें भूलने की कोशिश करूंगी।” सुगंधा ही बोली “जो कि मेरे लिए आसान नहीं होगा, लेकिन जो तुम्हारे लिए बहुत आसान होगा। आखिर पहले भी तो तुम किसी को भुला चुके हो आलोका को।”

अजय की जुबान तालू से जा चिपकी। उसके जेहन में एक भयानक हलचल मच गई थी।

.

.

“फिर भी अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो मुझे म...माफ कर देना।” सुगंधा का स्वर लरज गया था “मैं फिर याद दिलाती हं आलोका तो अपने प्यार का इम्तहान नहीं दे सकी. लेकिन मैंने तुमसे वादा किया था कि मैं इस इम्तहान में पास होकर दिखाऊंगी। देख लो, मैंने अपना वादा निभाया, मैं अपने इम्तहान में पास हो गई। अलविदा पार्टनर।”

वह अंतिम अल्फाज कहते-कहते सुगंधा अपनी फूट पड़ने वाली हिचकी को न रोक सकी। वह मुड़ी और अपनी हिचकी को रोकने की कोशिश करती वहां से भागती चली गई।

सुगंधा तो चली गई लेकिन जाते-जाते भी वह उसके चित्त के ठहरे हुए पानी में आलोका नाम का कंकड़ फेंककर लहरें उठा गई थी। और उस वक्त अजय यह सोचे बिना न रह सका कि आज अगर सुगंधा की जगह आलोका होती तो वह क्या करती? क्या वह भी वही करती, जो सुगंधा ने किया?

क्या वह भी उसे उस भंवर में छोड़कर अपनी राह लग जाती? अजय के दिल से कोई जवाब न आया, लेकिन उसकी सोचों में हठात उस टिटहरी का अक्स उडता नजर आने लगा.. जिसके अंडे एक बार फिसलकर समुद्र में गिर गए थे। मगर हार मानने की जगह वह नन्हीं टिटहरी समुंदर से भिड़ गई थी और फिर अपने उन अंडों को हासिल करने के लिए वह अपनी चोंच से समुद्र खाली करने में जुट गई थी।

टिटहरी का वह अक्स अजय के जेहन में यूं ही नहीं उभरा था। उस अक्स के रूप में शायद वह अजय के सवाल का जवाब उभरा था और क्या जवाब उभरा था।

अजय अपने आंसुओं को बहने से न रोक सका।

प्राची झिझकती हुई नैना के सामने नैना सिर झुकाए मेज पर फैले कागजों में व्यस्त थी।

“अ...आपने मुझे बुलाया मैडम?" प्राची सकुचाती सी बोली। नैना ने तत्क्षण अपना मेज पर झुका चेहरा उठाकर प्राची को देखा। लम्बी, छरहरी काया वाली प्राची ने उस वक्त काली जींस और बिना बांहों वाली काली टॉप पहन रखी थी, जो उसके भरे हुए गोरे बदन पर खूब फब रही थी। प्राची के घने-लम्बे बाल उसकी पीठ पर कमर तक फैले हुए थे और उस वक्त वह रोज की

अपेक्षा कुछ ज्यादा ही हसीन व आकर्षक लग रही थी।

“हां।” नैना सहमति में सिर हिलाती हुई बोली, फिर उसने सामने वाली खाली पड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया “बैठो।"

“थ..थैक्यू मैम।" प्राची ने सहमति में सिर हिलाया, फिर वह झिझकती हुई कुर्सी पर बैठ गई और ध्यानपूर्वक अपनी बॉस

का चेहरा देखने लगी।

यह पता नहीं प्राची का वहम था या फिर सच, लेकिन पिछले कई रोज से अपनी बॉस का मूड उसे काफी बदला-बदला सा महसूस हो रहा था। खासतौर से प्राची को लेकर उसकी कठोरता काफी बढ़ गई थी। और अकेले प्राची ही क्यों बाकी लोगों के साथ भी वह काफी उखड़े तरीके से पेश आ रही थी।

उसके मिजाज में वह तब्दीली, प्राची को अच्छी तरह से याद था कि जानकी लाल की मौत के बाद से ही आयी थी। पिछले दो-तीन दिनों से तो प्राची के साथ भी अच्छा बर्ताव नहीं कर रही थी। उसके किरदार पर शक तो वह पहले भी जताती रही

थी, खासतौर पर उसके नाम और चेहरे को लेकर।

लेकिन फिर वह सामान्य हो जाती थी और उससे स्वाभाविक तरीके से पेश आने लगती थी।

मगर पिछले दो-तीन रोज से तो उसका संदेह जैसे स्थायी होकर रह गया था। इसी बात ने प्राची को विचलित कर रखा

था।

अलबत्ता उसकी वजह प्राची की समझ में हरगिज भी नहीं आ सकी थी। इसीलिए वह उस वक्त सकुचाती सी नैना के सामने बैठी थी।

“संदीप के बाद सुमेश के कत्ल की खबर तो तुम्हें लग ही गई होगी?” उस खबर ने प्राची को चौंकाया था।

"ओह, तो सुमेश सहगल भी मारा गया?” वह धीरे से बोली।

“यानि कि नहीं लगी?" नैना गौर से उसके चेहरे के भावों को करती हुई बोली “तब तो उस किलर गोपाल के अंजाम से भी तुम अंजान होगी, जिसने जानकी लाल का कत्ल किया था?"

“क..क्या वह भी मारा गया?"

“क्या सचमुच तुम्हें यह नहीं पता प्राची?” नैना ने संदिग्ध भाव से उसे देखते हुए पूछा।

“आ...आप मुझ पर इल्जाम लगा रही हैं मैडम।" प्राची ने शिकायत की “मैंने यह भी महसूस किया है कि पिछले कुछ दिनों से मुझे लेकर आपका मिजाज भी काफी बदला हुआ है। माफ कीजिएगा मैडम, मगर यह ठीक नहीं है।"

"क...क्या ठीक नहीं है?" नैना ने उसे घूरकर देखा।

“मेरा मतलब है कि मैं आपकी सेक्रेटरी हूं, जो कि अपने बॉस की कारोबारी और उससे अलग जिंदगी का भी एक अहम हिस्सा होता है।" प्राची ने जस्टीफाई किया “इसीलिए बॉस और सेक्रेटरी के रिश्तों में यह तल्खी ठीक नहीं है।”

“ओह।” उसकी बेबाकी पर नैना तनिक हड़बड़ाई, लेकिन फौरन ही उसने खुद को संयत कर लिया “मगर इसमें तल्खी वाली क्या बात है और मैंने तुम पर क्या इल्जाम लगाया है?"

“आपने जुबान से नहीं लगाया, मैडम लेकिन आपकी निगाहें और आपका मिजाज मुझ पर साफ-साफ इल्जाम लगा रहे

“ओहो। काफी स्मार्ट हो गई हो और समझदार भी?"

“यह सब तो मैं पहले से ही थी मैडम और इसीलिए आपने मुझे अपनी सेक्रेटरी माना था। वरना किसी बेवकूफ और

खरदिमाग को तो आप अपनी सेक्रेटरी हरगिज भी नहीं बनाने वाली थीं।"

“यह तो खैर तुमने ठीक कहा।” नैना उसकी बेबाकी से प्रभावित हुए बिना न रह सकी थी।

“और आपके साथ पेश आने वाले इस खून-खराबे वाले मसले में भी मैंने केवल आपकी मर्जी और इजाजत से दिलचस्पी लेना शुरू किया था, वरना यह मेरे काम के दायरे में नहीं आता, उस काम के दायरे में जिसके लिए आपने मुझे अपनी सेक्रेटरी रखा है। और जहां तक सुमेश और गोपाल की मौत का सवाल है तो मुझे उनसे कोई हमदर्दी नहीं है। वह दोनों ही बहुत कमीने इंसान थे इस धरती पर बोझ थे और वह संदीप महाजन भी कोई अच्छा आदमी नहीं था।"

“मुझे तुमसे इत्तेफाक है प्राची। लेकिन लगता है तुम नाराज हो गई।” “जाने दीजिए मैडम। अब अगर आपको मेरी जरूरत नहीं है तो मैं आपके कहे बिना ही अपना रिजाइन दे रही हूं। यहां से जाने के बाद मेरा रिजाइन आपके पास पहुंच जाएगा।"

“अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो तुम बेशक रिजाइन दे सकती हो। लेकिन जाने से पहले मेरे एक सवाल का जवाब जरूर देती जाओ।"
 
“अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो तुम बेशक रिजाइन दे सकती हो। लेकिन जाने से पहले मेरे एक सवाल का जवाब जरूर देती जाओ।"

“क...कैसा सवाल ?" प्राची के चेहरे पर शंका के भाव आ गए। “वह कौन था जिसने तुम्हें मेरी इस नौकरी के लिए उकसाया था

और उसने तुम्हें मेरी सेक्रेटरी बनवा दिया?"

"व्हाट रबिश!” प्राची उछल पड़ी और तमककर बोली “यह कैसा वाहियात सवाल है।"

“सवाल तो वाहियात नहीं है।” नैना के होठों पर एकाएक मुस्कान आ गई, जैसे कि प्राची की उस हालत पर उसे आनंद

आ रहा था। उसने कहा “और देखो, मुझसे तमीज से बात करो। मैं तुम्हारी बॉस हूं।"

“अब आप मेरी बॉस नहीं हैं। मैं अपना रिजाइन दे रही हूं।"

"तुमने अभी रिजाइन दिया नहीं है। और जब तक ऐसा नहीं होता,

मैं तुम्हारी बॉस हूं और बॉस का हुक्म तुम्हें मानना ही पड़ेगा।"

"लेकिन आपका सवाल वाजिब नहीं है। आपने अपनी सेक्रेटरी के लिए अखबार में विज्ञापन दिया था। जिसे पढ़कर मैं

आपके पास आयी थी और मुझे किसी और ने नहीं खुद आपने अपनी पर्सनल सेक्रेटरी चुना था।"

“मार्वलस। पहले तुम कहां काम करती थीं?"

“प...पहले?"

"किसकी सेक्रेटरी थी? उसका और उसकी फर्म का क्या नाम था?” “म...मैंने इससे पहले कभी नौकरी नहीं की?"

"क...क्यों?"

“तब मेरे हालात ऐसे नहीं थे कि मुझे नौकरी करने की नौबत आती। तब अपने पापा के लिए सेक्रेटरी का चुनाव मैं खुद करती थी। मगर फिर एकाएक सब कुछ बदल गया। मेरे पापा का सारा कारोबार डूब गया और...।"

“और तुम्हारे नौकरी करने की नौबत आ गई।” नैना ने उसकी बात पूरी की “राइट। और तुम्हारी नौकरी की शुरुआत मेरी सेक्रेटरी की इस नौकरी से हुई। यानि कि यह तुम्हारी पहली नौकरी है। लिहाजा आगे के लिए अब कोई सवाल ही नहीं बचता। हैव ए गुड स्टोरी।"

“यह कहानी नहीं सच्चाई है, मैडम मेरी अपनी सच्चाई।"

“सच्चाई मुझे मालूम है।"

“क...क्या?" प्राची चौंकी थी। उसके चेहरे पर आशंका के भाव आ गए "सच्चाई मालूम है आपको?"

“यही कि तुम्हें यहां केवल मेरी जासूसी के लिए ही भेजा गया है, जिसे कि तुम बखूबी अंजाम दे रही हो। मेरी और इस कंपनी से जुड़े तमाम सीक्रेट्स तुम किसी को पास ऑन कर रही हो?"

वह प्राची पर निहायत ही गंभीर आरोप था। लेकिन जिसे सुनकर क्या मजाल जो प्राची जरा सी भी चौंकी हो।

“नानसेंस ।” उसके विपरीत उसने बुरा सा मुंह बनाया, जैसे कि उसने कोई बचकानी बात सुन ली हो। फिर वह बोली “मेरे लिए इससे बड़ा जोक दूसरा नहीं हो सकता मैडम। मेरी सेवाओं का आपने मुझे अच्छा सिला दिया है।"

“अब तुम स्मार्ट बनने की कोशिश कर रही हो?” नैना उसे घूरकर बोली।

“स्मार्ट तो मैं वैसे ही हूं। उसके लिए मुझे बनने की क्या जरूरत है। आपको मुझ पर इतना घटिया इल्जाम लगाते हुए शर्म आनी चाहिए थी।"

"मेरे पास सबूत है।"

“क्या सबूत है?”

“जब मैं यहां अपने आफिस में किसी के साथ होती हूं तो तुम छुपकर यहां की जासूसी करती हो यहां होने वाली सारी बातें सुनती हो।”

"ओहो!"

“उसके बाद वह तमाम नोट्स किसी को शेयर करती हो।”

“सबूत क्या है? आपने जो कहा उसका सबूत पेश कीजिए।" क्या मजाल जो प्राची जरा सा भी विचलित हुई हो।

"स..सबूत?"

“जानती तो होंगी ही कि सबूत क्या होता है। ऐसे तो मैं भी आप पर इल्जाम लगा सकती हूं कि जब मैं अपने ब्वाय फ्रैंड के साथ बैडरूम में होती हूं तो आप इधर दरवाजे के की-होल से झांकती हैं और यह जानने की कोशिश करती हैं कि अंदर क्या हो रहा है कैसे हो रहा है?"

"तुम मेरी सोचों से कहीं ज्यादा स्मार्ट और हाजिरजवाब हो प्राची लेकिन मेरे पास सबूत है।"

"क्या सबूत है?"

“यह रहा।” नैना ने मेज की दराज से निकालकर एक लिफाफा उसके सामने मेज पर सरका दिया।

प्राची की आंखें सिकुड़ीं। उसने लिफाफा उठाकर उसका मुआयना किया। यह देखकर उसके माथे पर बल पड़ गए कि वह किसी मोबाइल फोन की बिलिंग थी। उसकी आउटगोइंग, इनकमिंग काल्स और उससे भेजे गए तमाम एसएमएस की डिटेल्स थी।
 
और वह किसी और की नहीं, खुद उसके अपने मोबाइल फोन की डिटेल्स थी।

“ठीक से देखो।” तभी नैना का व्यंगात्मक स्वर उसके कानों में पड़ा “यही सबूत है।”

“वह तो मैं देख रही हूं।" प्राची पूर्ववत सहज भाव से बोली। उसका चेहरा पहले की तरह ही सामान्य हो गया था “यह मेरे मोबाइल फोन की डिटेल्स है, जो कि आपने मेरी इजाजत के बिना हासिल की है और जो सरासर ऐटीकेट के खिलाफ है। लेकिन यह सबूत कैसे है?"

“इसमें एक खास मोबाइल है, जिसका नम्बर नाइन सेवन सिक्स जीरो टू सेवन नाइन टू नाइन वन है। तुम्हें नजर

आया?"

“जी हां।"

“यही वह मोबाइल नम्बर है, जिस पर तुम यहां की सारी रिपोर्ट दिया करती हो।”

“आ....आपके इस दावे की वजह?” प्राची ने एकटक नैना की

आंखों में देखा था।

“क्योंकि यही वह इकलौता नम्बर है जिस पर लगभग हर रोज तुम बात करती हो।"

“ऐसे तो और भी कई नम्बर हैं जिन पर मैंने हर रोज बात की है और उनमें से ज्यादातर नम्बर आपके क्लाइंट के हैं।"

"हां, सच है। लेकिन उनमें से ऐसा एक भी नम्बर नहीं है जिस पर तुमने दिन में दस बार काल की हो, जिस पर तुमने रात में भी बात की हो और...एमएसएस भी किया हो। माई डियर सेक्रेटरी, ऐसा केवल एक ही नम्बर है, जो मैंने तुम्हें बताया है।"

“और महज इतने से ही आपने यह अंदाजा लगा लिया कि यह वही नम्बर है, जहां मैं आपके सीक्रेट्स बताती हूं?"

“अपनी गलती दुरुस्त करो प्राची, यह मेरा अंदाजा नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह वही नम्बर है?"

“तब तो आपने इस नम्बर के बारे में जरूर पता किया होगा? आपके लिए यह पता करना ज्यादा मुश्किल तो नहीं?"

"तुमने बिल्कुल सही कहा। मैंने इस नम्बर के बारे में दरयाफ्त

की है। वह भला मैं क्यों न करती?"

"तब तो आपको आपके सवाल का जवाब मिल गया होगा।" प्राची के स्वर में व्यंग उभरा “आपको मालूम हो गया होगा कि वह कौन है जिसने मुझे आपकी जासूसी के लिए यहां भेजा है?"

“यही तो समस्या है।" नैना ने गहरी सांस ली।

“यानि कि नहीं मालूम हो सका?"

"नहीं। यह नम्बर दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी के नाम पर रजिस्टर्ड है, जिसका नाम रविन्द्र कुमार है।"

“तो क्या हुआ? दिल्ली पुलिस का डीसीपी भी इंसान ही होता है और उस रविन्द्र कुमार को आपके सीक्रेट्स की जरूरत हो सकती है?"

“तंज मत कसो और मुझे इसका रहस्य बताओ। उस डीसीपी से तुम्हारा क्या संबंध है?"

"क्या यह बताना जरूरी है?"

“बहुत जरूरी है।”

"तो फिर सुनिए मैडम। उस डीसीपी के बेटे का नाम इंद्र है

और वह मेरा ब्वॉय फ्रेंड है।"

"व्हॉट?"

“क्या व्हाट? क्या मेरा कोई ब्वायफ्रेंड नहीं हो सकता? क्या मैं नौजवान नहीं हूं? क्या मैं हसीन नहीं हूं?"

"तुम निस्संदेह गजब की हसीन हो और भरपूर जवान भी।

और तुम्हारे बेशुमार ब्वॉयफ्रेंड भी हो सकते हैं। लेकिन यह बात मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि वह लड़का तुम्हारा

ब्वायफ्रेंड नहीं है। सच तो यह है कि तुम्हारा कोई ब्वायफ्रेंड नहीं है। क्योंकि...।" नैना एकाएक खामोश हो गई और गहरी खोजपूर्ण निगाहों से प्राची को देखने लगी।

“आप चुप क्यों हो गईं मैडम?” उसे खामोश देख प्राची ने उसे उकसाया “अपनी बात पूरी कीजिए।"

“क्योंकि तुम एक विधवा हो?” नैना ने अपनी बात पूरी कर दी “यू आर ए विडो।”

प्राची के चेहरे पर एकाएक जबरदस्त हलचल नजर आयी। वह हक्की-बक्की सी होकर नैना का मुंह देखने लगी।

"ऑय एम सॉरी प्राची।” नैना इस बार जब बोली, तो उसका लहजा एकदम बदला हुआ था “लेकिन मेरा इरादा तुम्हारा दिल दुखाना नहीं है। न ही मैं तुम्हारे दिल के जख्मों को कुरेदना चाहती हूं। क्योंकि मैं खुद एक औरत हूं और मेरी मांग भी तुम्हारी तरह ही सूनी है। फर्क बस इतना है कि तुम्हारी मांग कुदरत ने उजाड़ी है और मेरी किस्मत ने।

और...और दोनों के साथ ही यह नाइंसाफी बहुत कमसिन उम्र में हुई है।"

प्राची ने अपना चेहरा उठाकर नैना को देखा। एक ही पल में कितनी बदल गई थी वह।

"इ...इसका मतलब...।" वह अविश्वास से आंखें फैलाकर बोली “आपको मेरे बारे में सब कुछ मालूम है?"

“हां।” नैना ने आहिस्ता से सहमति में सिर हिलाया “मुझे तो यह भी मालूम है कि प्राची तुम्हारा असली नाम नहीं है। तुम्हारा यह नाम भी तुम्हारे चेहरे की तरह ही नकली है।"

“य..यह आप क्या कह रही हैं मैडम?"

प्राची चिहुंककर नैना को देखने लगी थी। “वही जो सच है। प्राची तुम्हारा असली नाम नहीं है।"

"त...तो फिर मेरा असली नाम क्या है?" “वह मैं तुम्हारे मुंह से ही सुनना चाहती हूं।"

"लेकिन जब मेरा कोई और नाम है ही नहीं तो मैं कैसे बता सकती हूं।"

“तुम्हें शायद मेरी बात का यकीन नहीं आया। तुम्हें लगता है कि मैं झूठ बोल रही हूं तुम्हें ब्लफ देने की कोशिश कर रही हूं। असल में मुझे तुम्हारा असली नाम नहीं मालूम।”

“ए..ऐसी बात नहीं है मैडम ।"

“यही बात है।” नैना ने अपने शब्दों पर जोर दिया था “खैर...अगर यह तुम मेरी जुबान से ही सुनना चाहती हो तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है। मैं बताती हूं, तुम्हारा असली नाम आलोका है।"

वह नाम घन की तरह प्राची के जेहन से टकराया था। वह सन्नाटे में आ गई।

एक चमचमाती बीएमडब्ल्यू पुलिस स्टेशन के कम्पाउंड में पहुंचकर रुक गई। फौरन उसका ड्राइविंग डोर खुला और उसके वर्दीधारी शोफर ने लपककर कार का पिछला दरवाजा खोला।

अगले पल बीएमडब्ल्यू से एक बेहद रोबीला पठान नीचे उतरा। पठान ने घुटनों तक लटकता कीमती पठानी सूट पहन रखा था,

जिसका रंग बादामी था। उसी रंग की पाजामी थी। उसका चेहरा घनी दाढ़ी से ढका था, जो उसके सीने तक झूल रही थी। आंखों पर टिंट ग्लास का बेशकीमती चश्मा। दाहिने गाल पर बड़ा सा काला तिल, सिर पर मुसलमानी टोपी।

उसकी मुकम्मल शख्सियत में ऐसा कुछ था कि पुलिस स्टेशन में बाहर पहरे पर मौजूद हथियारबंद पुलिसिये उसकी ओर आकर्षित हुए बिना न रह सके थे।

उसके रौब से थर्राया एक वर्दीधारी पुलिसिया लपककर उसके पास पहुंचा।

“फरमाइए जनाब।” वह पठान की खुशामद सी करता बोला "मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूं।"

.

“इंस्पेक्टर मदारी से मिलना है।" पठान रौबदार स्वर में बोला “क्या वह पुलिस स्टेशन में है?"

“जी जनाब।” पुलिसिया पूर्ववत अदब से बोला “आप मेरे साथ आइए।” पुलिसिया उसे मदारी के आफिस तक छोड़ गया।

मदारी ने पहले सिर से पांव तक, फिर पांव से सिर तक उसका मुआयना किया। मदारी जैसा पुलिसिया भी उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सका था। उसने बैठने के लिए उसे कुर्सी पेश की।

"शुक्रिया।" पठान उसके सामने कुर्सी पर पसरता हुआ बोला। "सुस्वागत श्रीमान ।” मदारी अपनी तीखी निगाहें पठान के चेहरे पर फोकस करता हुआ बोला “मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूं।” “हम इसीलिए आए हैं इंस्पेक्टर।” पठान बदस्तूर रौब से

बोला “वैसे भी तुम्हें आवाम की खिदमत के लिए ही तो यहां बैठाया गया है।"

“इसमें क्या शक है जजमान।” मदारी ने फौरन उसके सुर में सुर मिलाया “हम आपके और घास खाने वालों के खिदमतगार ही तो हैं।"

“लाहौल विला कूव्वत।” पठान ने मदारी को घूरकर देखा और अपनी बड़ी-बड़ी आंखें निकालता हुआ बोला “यह घास खाने वाला तुमने किसे फरमाया इंस्पेक्टर?"

"आपको नहीं फरमाया भगवान।” मदारी ने फौरन स्पष्टीकरण पेश किया “वह तो मैंने घास खाने वालों को ही फरमाया है।"

"खुदा खैर करे। मगर वह कौन हुआ?"

मदारी ने वह भी बताया।

"बहुत खूब मियां इंस्पेक्टर।" पठान उसकी व्याख्या से खुश हो गया और अपनी तोंद को खम देकर हो...हो करता हुआ बोला “क्या व्याख्या किया है तुमने आम आदमी की। हम

खुश हुए। हो...हो...हो..हो।”

+

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वह फिर अपनी तोंद उछालता हुआ जोर से हंसा।

“खैर... ।” मदारी विषय पर वापस आता हुआ बोला “आपने अभी तक अपनी तारीफ नहीं बताई ? न ही खिदमत का कोई जिक्र किया? वैसे आप जैसे महापुरुषों की खिदमत करके मुझे बहुत खुशी होगी।"

“मैं वही बताने जा रहा हूं।"

“धन्यवाद भगवान।"

“मुझे खबर मिली है इंस्पेक्टर कि तुमने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है और वह इस वक्त भी यहां हवालात में

"सत्य वचन श्रीमान।" मदारी ने निःसंकोच स्वीकार किया

“ऐसे महापुरुषों और महास्त्रियों को पकड़कर हवालात की हवा और ‘लात' खिलाना ही तो मेरा पेशा है। इसीलिए

सरकार मुझे अपनी मोटी तनख्वाह देती है, जिसकी कि यह इंस्पेक्टर पाई-पाई हलाल करके दिखाता है। वैसे जिन भद्रपुरुषों का आपने जिक्र किया, उनके नाम क्या हैं?"

“वह तीन लोग हैं।” पठान ने बताया “जिनमें दो लड़के और एक लड़की है। लड़कों के नाम जतिन और अजय हैं जबकि लड़की का कोमल।”

"ओह।" मदारी प्रत्यक्षतः पहले जैसी ही लापरवाही से बोला। लेकिन उन तीनों के जिक्र पर वह मन ही मन चौकन्ना हो गया था “तो आप इन तीनों महानुभावों की बात कर रहे हैं। वैसे गिरफ्तार करने की हिमाकत तो की है मैंने इन भद्रजनों को। और इस वक्त वह तीनों इसी पुलिस स्टेशन के हवालात की हवा खा रहे हैं। अलबत्ता उन्हें 'लात' खिलाने का मैंने सख्त परहेज किया हैं।"

“यह तुमने बहुत अच्छा किया इंस्पेक्टर। वरना अब तक तुम्हारी यह वर्दी उतर गई होती।" पठान का लहजा सर्द हुआ था।

"आं।" मदारी हड़बड़ाया था। आगंतुक से उसे ऐसे सख्त अल्फाजों की अपेक्षा नहीं थी। वह एक बार फिर पठान पर निगाहें गड़ाता हुआ बोला “यह आपने मुझसे कहा है भगवान?"

"तुम्हारे अलावा यहां दूसरा तो कोई मुझे नजर नहीं आ रहा।" “ओह। यह तो खैर आपने बजा फरमाया।"

“किस जुर्म में तुमने उन तीनों को हवालात में डाला है इंस्पेक्टर?" पठान ने अगला सवाल किया “उन लोगों ने क्या किया है?"

"कुछ खास तो नहीं किया जजमान।" मदारी सकुचाता हुआ बोला “उन पर कत्ल से जुड़ा एक छोटा-मोटा इल्जाम है, जिसमें उन तीनों ने शिरकत की थी। और जिसकी सजा भी

कुछ खास नहीं है। उन्हें बड़ी हद आठ-दस साल बामुशक्कत जेल में रहना पड़ सकता है।"

“तुम्हारा मतलब है कि उन तीनों पर कत्ल का इल्जाम है?" पठान मदारी को कठोर निगाहों से देखता हुआ बोला।

“जी नहीं बलवान।" मदारी ने फौरन इंकार में सिर हिलाया “कत्ल तो किसी और ही फरिश्ते ने किया था। लेकिन उसके कत्ल की साजिश में, बता ही चुका हूं कि उन तीनों ने शिरकत की थी। ऐसे कुछ और खुदा के बंदे थे, मगर

बदकिस्मती से वह सारे के सारे वक्त से पहले ही फना हो गए। लेकिन अब बड़ा सवाल यह उठता है भगवान कि आप कौन है और किस हैसियत से यह पूछताछ कर रहे हैं?"

“उन तीनों ने किसके कत्ल का षड्यंत्र रचा था?" पठान ने मदारी का सवाल जैसे सुना ही नहीं था।

"था एक भद्रपुरुष। जिसने अपनी मुकम्मल जिंदगी में कर्मकांडों के अलावा और कुछ नहीं किया था। और जिसके दुश्मनों की तादाद हनुमान की पूंछ से कहीं ज्यादा लम्बी थी।"

“मैं तुमसे उसका नाम पूछ रहा हूं इंस्पेक्टर?"

“वैसे तो मैं सरकार के अलावा और किसी की पूछताछ में विश्वास नहीं रखता श्रीमान, जिसकी कि मैं तनख्वाह पाता हूं। लेकिन क्योंकि आप घास खाने वाले नहीं हैं इसलिए बताए देता हूं। उसका नाम श्री-श्री एक हजार पिच्चासी जानकी लाल मरहूम था।”

“व...वह जो ब्लूलाइन कंस्ट्रक्शन का मालिक था।"

“आपने एकदम सही समझा जजमान। मैं उन्हीं ब्लू लाइन वाले लौहपुरुष की बात कर रहा हूं। लेकिन भगवान, आपने अभी तक अपना नाम नहीं बताया काम धाम भी नहीं बताया।"

“वह तीनों निर्दोष हैं इंस्पेक्टर।" पठान ने इस बार भी उसका सवाल अनदेखा कर दिया था। उसने अधिकारपूर्ण स्वर में कहा “इसलिए उन्हें लॉकअप में रखने का तुम्हें कोई हक नहीं है। उन्हें फौरन रिहा कर दो।"
 
“व...वैसे तो....।" पठान के तेवरों से सकपकाया मदारी बोला “मैं नौकरी के दरम्यान सरकार के अलावा और किसी का हुक्म नहीं मानता श्रीमान जिसकी कि...।"

"तुम तनख्वाह पाते हो।" पठान उसकी बात लपकता हुआ बोला “यह बात तुम मुझे पहले भी बता चुके हो। लेकिन लगता है तमने मेरी बात नहीं सनी।"

“सुना तो खैर मैंने दोनों कान से है जजमान। लेकिन समझ में नहीं आया कि क्यों छोड़ दूं मैं उन्हें और उन भद्रजनों के निर्दोष होने का दावा आप इतनी मजबूती से कैसे कर सकते

"क्यों कि जिसके कत्ल के इल्जाम में तुमने उन्हें गिरफ्तार कर रखा है, वह मरा नहीं जिंदा है। और जब उसका कत्ल ही नहीं हुआ तो तुम उस जुर्म में किसी को कैसे गिरफ्तार कर सकते हो।”

“अरे भगवान, क्यों इंस्पेक्टर मदारी को धड़का लगा रहे हैं।" मदारी चौकन्ना होकर बैठ गया। उसके जेहन में कुछ अटकने सा लगा था “वैसे तो मैं काफी समझदार हूं, लेकिन यह बात मैं बिल्कुल नहीं समझ सकता कि मुर्दा आखिर जिंदा कैसे हो सकता है।"

“जानकी लाल कभी मरा ही नहीं था इंस्पेक्टर ।” पठान ने अपने एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला “और जब वह मरा ही नहीं था तो मुर्दे के जिंदा होने का सवाल कहां उठता है।"

"इसका क्या मतलब हआ जजमान।"

"इसका वही मतलब हुआ जो तुम समझकर भी नासमझ बन रहे हो इंस्पेक्टर। जानकी लाल जिंदा है।"

"तो फिर वह मुझे क्यों नहीं नजर आ रहा?"

“अभी नजर आने लगेगा।"

“कैसे? जादू के जोर से?"

“ऐसा ही समझ लो।” पठान ने कहा और फिर एकाएक उसके होठों पर रहस्यमय मुस्कराहट उभर आयी। फिर उसने अपने चेहरे पर मौजूद टिंट ग्लास का चश्मा उतारकर मदारी के सामने मेज पर रख दिया।

मदारी ने इस तरह सामने रखे चश्मे को देखा जैसे कि उसमें से जानकी लाल के प्रकट होने की उम्मीद कर रहा हो। लेकिन उसकी वह उम्मीद पूरी न हुई।

उसके बाद पठान ने अपने सीने तक झूलती नकली दाढ़ी तथा मूंछों के साथ-साथ दाहिनी तरफ नजर आ रहा काला तिल भी मेज पर रख दिया। फिर सबसे अंत में उसने अपने अधगंजे सिर पर रखी मुसलमानी टोपी को अलग कर दिया।

अब वह अपने असली चेहरे के साथ मदारी के सामने था, जिसे मदारी ने फौरन पहचाना और उसे पहचानते ही उसका दिमाग घूम गया।

उसके सामने जीता जागता जानकी लाल बैठा था।

“आ..आलोका...?" प्राची अवाक सी होकर नैना को देखने लगी थी। कितनी ही देर बाद उसके होंठों से निकला।

“हां। और...।” नैना उसे ध्यानपूर्वक देखती हुइ इत्मिनान से बोली “अपने पापा के बारे में तुमने बिल्कुल गलत नहीं कहा था। वह सचमुच कभी एक बड़े आदमी हुआ करते थे। वह स्टॉक मार्केट से जुड़े थे और एक बहुत बड़ी शेयर ब्रोकिंग कंपनी के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट थे, जो लगभग रोजाना ही बिजनेस चैनल पर दिखाई देते थे। स्टॉक मार्केट की उन्हें बहुत गहरी समझ थी और बाजार के इन्वेस्टर उनके दीवाने थे, क्योंकि उनकी एनालिसिस बहुत सटीक होती थी। और बाजार चाहे चढ़े अथवा गिरे, उनके निवेशक हमेशा मुनाफे में रहते थे। मगर फिर अचानक उन्हें खन का कैंसर हो गया। उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। उनके इलाज में उनकी सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई। इसके बावजूद उन्हें बचाया न जा सका।”

प्राची उर्फ आलोका की आंखें सजल हो गईं।

.

“क...क्या आप मेरे पापा को जानती थीं?" वह पूछे बिना न रह सकी।

"व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानती थी। मैं उन्हें बस वैसे ही जानती थी कि जैसे स्टॉक मार्केट से जुड़ा हर शख्स जानता

था। एक निवेशक के तौर पर मैं भी तुम्हारे पापा की फैन थी और उनकी एडवाइज पर मैंने बाजार में बहुत पैसा कमाया।

दूसरे शब्दों में कहूं तो मेरी कंपनी को यहां तक पहुंचाने में तुम्हारे पिता का बहुत बड़ा योगदान है, जिसे मैं हरगिज भी भुला नहीं सकती।"

“मगर पापा के गर्दिश के दिनों में उन्हें हर किसी ने भुला दिया था।”

“यही तो इस दुनिया का दस्तूर है।" नैना ने

असहाय भाव से सिर हिलाया “यहां केवल उगते सूरज को देखा जाता है। लेकिन यह सच है कि अगर मुझे तुम्हारे पापा के बारे में मालूम होता तो मैं उनकी मदद जरूर करती। लेकिन उस वक्त मुझे कुछ भी मालूम न हो सका। यह सब तो मुझे तुम्हारी तफ्तीश से पता चला, मगर तब तक देर हो चुकी थी। फिर भी मुझे खुशी है कि तुमने अपना फर्ज बेहतर निभाया और आखिरी वक्त में अपने पिता की बहुत सेवा की थी।"

प्राची उर्फ आलोका के चेहरे पर ना जाने कितने रंग आकर चले गए। “और हां।" नैना को जैसे एकाएक याद आया था। उसने आलोका को देखकर पूछा “जिससे तुम्हारी शादी हुई, वह तुम्हारा जेंटलमैन नहीं था। जबकि तुमने तो अपने जेंटलमैन से प्यार किया था उसे टूट-टूटकर चाहा था। फिर उसे धोखा क्यों दिया?"

आलोका के चेहरे के फिर कई रंग बदले। “आ...आप यह भी जानती हैं?" उसके होंठों से निकला।

“यह तो मेरे सवाल का जवाब नहीं है। वैसे मुझे नहीं पता तुम्हारा जेंटलमैन कहां है, लेकिन वह जहां भी होगा यह सवाल आज भी उसके सीने में कसक रहा होगा।"

आलोका कोई जवाब न दे सकी। जज्बातों के भंवर ने उसका सुंदर चेहरा विकृत कर दिया।

“कितना चाहा था तुमने उसे।” नैना ने उसे कुरेदा “और मैं जानती हूं तुम दोनों की चाहत बहुत सच्ची और निश्छल थी। फिर तुमने उस बेकसूर को आखिर किस बात की सजा दी?"

“आ...आप यह सब जानकर क्या करेंगी मैडम?” आलोका के होंठ हिले।

"शायद कुछ कर सकूँ। वैसे अब तो तुम्हें यह समझ जाना चाहिए कि मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूं और तुम्हारी अहमियत मेरे लिए सेक्रेटरी से बहुत ज्यादा है। तुम उस इंसान की बेटी हो जिसका मैं बहुत सम्मान करती हूं, और खुद को जिसकी अहसानमंद समझती हूं। अगर मेरी कोई बेटी होती तो आज शायद वह तुम्हारी जैसी ही होती।"

आलोका चौंककर नैना को देखने लगी, जो आज उसे अपनी बॉस कम और एक ममतामयी मां ज्यादा प्रतीत हुई थी। जिसके अंदर बेऔलाद होने की गहरी कसक थी।

आलोका अपने जज्बातों को न रोक सकी और हिचकियों से रो पड़ी।

नैना ने उसे रोने दिया। वह जानती थी कि आंसुओं के साथ गुबार सा बह जाता है और दिल हल्का हो जाता है।

आखिरकार आलोका ने अपने आंसू पोंछ डाले।

“म...मैं मजबूर थी मैडम...।” फिर वह कातर भाव से बोली "और जिंदगी के एक दोराहे पर आकर खड़ी हो गई थी, जहां मुझे अपने प्यार और मौत की दहलीज पर खड़े पिता की

आखिरी ख्वाहिश में से किसी एक को चुनना था। और मैंने अपने पिता की आखिरी अरदास को चुना।”

“म...मैं कुछ समझी नहीं आलोका?"

“मेरे पिता ने मेरा रिश्ता बचपन में ही तय कर दिया था। वह उनके एक करीबी दोस्त का बेटा था।” आलोका ने बताया “और पापा चाहते थे कि उनकी मौत से पहले मैं सुहागिन बन जाऊं। मेरा घर बस जाएगा और उनकी मौत के बाद मुझे बेसहारा और अनाथ होकर दुनिया की ठोकर न खानी पड़े।"

“त...तुमने उन्हें अपने प्यार के बारे में बताया नहीं था?"

"कैसे बताती। पापा उस वक्त मृत्यु शय्या पर थे, और इस बात से बहुत आतंकित थे कि उनकी मौत के बाद एक

खूबसूरत, जवान और बेसहारा लड़की का यह दुनिया क्या हश्र करेगी। ऊपर से उन्होंने अपने उस दोस्त को वचन दे रखा था। और उस दोस्त ने भी अपना फर्ज निभाया था। उसने आखिरी वक्त तक हमारा साथ नहीं छोड़ा था।"

“इसलिए तुम उन्हें इंकार न कर सकी? अपना प्यार कुर्बान कर दिया, अपने पिता की पसंद के लड़के से शादी कर ली? है न?"

“और मैं क्या करती मैडम। कब्र में पांव लटकाये बैठे अपने पिता को इंकार करने का हौसला कैसे जुटाती। हो सकता था वह मेरा इंकार सहन न कर पाते और वह सदमा ही उनकी जान ले लेता। अगर ऐसा हो जाता तो आपको क्या लगता है, मैं उस कलंक के साथ जी सकती थी?"

“क्या तुम्हारे जेंटलमैन को यह सच्चाई मालूम है?"

“नहीं। मैंने उसे इस बारे में एक शब्द भी नहीं बताया था। मैंने तो उसे पापा की बीमारी के बारे में भी कुछ नहीं बताया था।"

"लेकिन सुहागिन तो तुम फिर भी न रह पाई? क्या हुआ था तुम्हारे पति को?”

“एक्सीडेंट।" आलोका बोली “जो कि इस शहर के लिए साधारण सी बात है। मगर उस रोड एक्सीडेंट ने इस अभागिन की दुनिया वीरान कर दी और शादी के छः महीने बाद ही मैं विधवा हो गई।"

“आई सी।” नैना ठंडी सांस भरकर रह गई।

"मेरी उस वक्त क्या हालत हुई होगी, आप समझ ही सकती हैं मैडम।” आलोका कहती गई “लेकिन मेरी हालत से जैसे किसी को कोई सरोकार ही नहीं था। मेरी ससुराल वालों ने मुझे ही उस एक्सीडेंट का जिम्मेदार ठहराया और मुझे मनहूस कहकर उस घर से निकाल दिया, जो शादी होते ही अपने पति को खा गई थी। मैं खुद ही अपने आपको मनहूस समझने लगी थी, जिसके जीने का न कोई मकसद था, न ही सहारा। म...मैंने उसी रोज खुद को खत्म करने का फैसला कर लिया।

और उसी रोज मैंने खुदकुशी के इरादे से एक तेज रफ्तार कार के आगे छलांग लगा दी।”

"ओह नो। फिर क्या हुआ?" नैना ने हकबकाकर पूछा।

“व...वह हुआ मैडम, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। इतनी खतरनाक रफ्तार से जा रही उस भारी भरकम कार के सामने छलांग लगा देने के बाद मेरे जिंदा बच जाने का कोई चांस नहीं था, क्योंकि वह कार मुझे सड़क पर बहुत दूर तक घसीटती चली गई थी। लेकिन फिर भी करिश्मा हो गया और अस्पताल में मुझे बचा लिया गया।"

“यह सचमुच किसी करिश्मे से कम नहीं था।” नैना ने स्वीकार किया “मगर चोटें तो तुम्हें बहुत आयी होंगी।"

"बहुत ज्यादा। आप सोच भी नहीं सकती मैडम। कार के नीचे दूर तक घिसटने के कारण मेरे हाथ-पांव और मेरा चेहरा पूरी तरह उधड़ गया था और बहुत ज्यादा भयानक हो गया था।"
 

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