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“बहुत चालाकी से उसने यह सब किया था।” अजय आगे बोला “कुछ इस तरह कि वह कत्ल नहीं एक हादसा लगता। बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन प्रबीरदास का खानदानी कारोबार था। उन दिनों उनकी कम्पनी आईटीओ के करीब एक सौ फुट से ज्यादा ऊंची इमारत बना रही थी, जिसका काम अपने आखिरी चरण में था और उसी समय प्रबीरदास उसके मुआयने के लिए वहां पहुंचे थे। मेरे पापा निमेष वहां पहले से मौजूद थे। फिर अचानक वहां एक भीषण हादसा पेश आया था और कंस्ट्रक्शन में लगी उस क्रेन मशीन की लिफ्ट अचानक टूट गई थी, जो भारी मेटीरियल और लोगों को सौ फुट ऊपर पहुंचाती थी। उस हादसे में अकेले प्रबीरदास ही नहीं, मेरे पापा की भी मौत हो गई थी और कोई यह तक साबित नहीं कर सका था कि वह कोई हादसा नहीं बल्कि कत्ल था कत्ल का सोचा समझा षड्यंत्र था।"
अजय खामोश हो गया और गहरी-गहरी सांसें भरने लगा था। कोमल और जतिन अपलक उसे ही देख रहे थे।
"ओह । तो यह बात है।" सहसा कोमल बोली। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गए थे “तो तुम निमेष के बेटे और प्रबीरदास के नाती हो। रीनी के ममेरे भाई हो अ...और मेरे भी। देखा, मेरा अंदाजा कितना सही निकला।”
अजय के लिए कोमल की नजर अब पूरी तरह बदल गई थी। लेकिन अजय के जख्म ताजा हो गए थे।
“वह बुलंद इमारत आज भी जानकी लाल के गुनाह की निशानी के तौर पर महफूज है।" अजय ने आगे कहा “और उसे मैं हर रोज अपने फ्लैट की टैरेस पर बैठकर निहारता आया हूं। गुजरने वाले वक्त के साथ जानकी लाल बहुत ताकतवर हो । गया। मैं अकेला चाहकर भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था लेकिन मैं उसे छोड़ भी नहीं सकता था। इसीलिए मैं उसके और करीब आ गया। वह मुझे हरगिज भी नहीं पहचान सकता था, इसीलिए मैंने उसकी कम्पनी में नौकरी कर ली। तुमने बिल्कुल ठीक कहा था कोमल, मैंने केवल उस शैतान से नजदीकी बढ़ाने के लिए ही उसकी नौकरी की थी, महज पैसों के लिए नहीं। पैसा तो मेरे पास निमेष मेरे लिए बहुत छोड़कर गए थे, जिस पर जानकी लाल काबिज नहीं हो सका था और मेरे बालिग होते ही वह सारा रुपया मुझे हासिल हो गया था।
आज भले ही जानकी लाल दुनिया में नहीं है, लेकिन यह अफसोस मुझे हमेशा सालता रहेगा कि वह मेरे अपने हाथों कुत्ते की मौत नहीं मरा।”
अजय खामोश हो गया और फिर गहरी-गहरी सांसे भरने लगा। कितनी ही देर तक फिजां में पैना सन्नाटा छाया रहा, फिर उस सन्नाटे को कोमल ने ही तोड़ा।
“खैर...।” वह जतिन की ओर मुखातिब होकर बोली “और तुम्हारा क्या किस्सा है जतिन?"
“म..मेरा किस्सा वहां से शुरू होता है जहां से अजय का किस्सा खत्म होता है।” जतिन अजय पर एक सरसरी निगाह डालता हुआ बोला।
“म...मैं कुछ समझी नहीं। साफ-साफ कहो जतिन?”
“जानकी लाल ने अपने अतीत का कोई भी गुनाह अकेले नहीं किया था।” जतिन कुछ पलों की खामोशी के बाद बोला था “कोई था जिसने कदम-कदम पर जानकी लाल का साथ दिया था। जिसने कंधों से कंधा मिलाकर उसके हर गुनाह में बराबरी की शिरकत की थी और उसके लिए अपनी जान की परवाह नहीं की थी।"
“ए...ऐसा आदमी तो...।” अजय चिंहुककर जतिन को देखता हुआ बोला “सौगत था जानकी लाल का लंगोटिया यार।"
"तुमने ठीक कहा दोस्त ।” जतिन ने सहमति में सिर हिलाया “उसका नाम सचमुच सौगत ही था। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि फिर सौगत का क्या अंजाम हुआ था? जानकी लाल तो जिंदा था, मगर वह अपने हसीन लम्हों को देखने के लिए जिंदा क्यों नहीं बचा था?"
"न...नहीं।” अजय के चेहरे पर उत्सुकता के भाव आ गए थे "फिर सौगत के साथ क्या हुआ था?"
“सौगत मर गया था। उसकी कार का अचानक एक्सीडेंट हो गया था। एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी थी।"
“आई सी।"
"लेकिन वह रोड एक्सीडेंट का स्वाभाविक मामला नहीं था। क्योंकि जिस ट्रक ने उसे ठोका था, वह कोई बाहरी ट्रक नहीं बल्कि प्रबीरदास की कंस्ट्रक्शन कम्पनी का एक वोल्वो ट्रक था। और उसे कंपनी का कोई ड्राइवर नहीं बल्कि एक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर चला रहा था। जिसका अपना एक गैंग था और जिसका काम भाड़े पर कत्ल करना और अपहरण करके फिरौती वसूल करना था। उस गैंग के सरगना का नाम गोपाल था।"
“स...समझ गई।” कोमल के मुंह से अनायास ही निकल गया "तो उस कुख्यात किलर से जानकी लाल सेठ की वाकफियत का यह राज है। उसने बरसों पहले उसके गैंग की मदद से सौगत का कत्ल करवाया था। मगर...।"
सहसा कोमल के माथे पर बल पड़ गए। उसने जतिन ने पूछा “सौगत से तुम्हारा क्या रिश्ता था।"
“म...मैं उन्हीं सौगत का बेटा हूं।” जतिन ने बता दिया “और मेरे पिता के बदले की आग मेरे सीने में धधक रही थी। और मेरे पिता की आत्मा जैसे मुझे धिक्कार रही थी कि उसका कातिल आज भी जिंदा घूम रहा है। लेकिन...।" वह एकाएक रुक गया, फिर कुछ रुककर बोला “अब सब ठीक है। और मुझे खुशी है कि आज मेरा इंतकाम पूरा हो गया। जिस मकसद को लेकर मैं जानकी लाल सेठ की कंपनी में आया था, वह पूरा हो गया। अब मुझे इस नौकरी की कोई जरूरत नहीं है। अगर आज मैं गिरफ्तार न हुआ होता तो मैं आज ही कंपनी से रिजाइन देकर यह शहर छोड देने वाला था। लेकिन...।" उसने आह भरी और अपने वाक्य को अधूरा छोड़ दिया और पहलू बदलने लगा।
उसके चुप होते ही वातावरण में एक फिर खामोशी छा गई।
अजय खामोश हो गया और गहरी-गहरी सांसें भरने लगा था। कोमल और जतिन अपलक उसे ही देख रहे थे।
"ओह । तो यह बात है।" सहसा कोमल बोली। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गए थे “तो तुम निमेष के बेटे और प्रबीरदास के नाती हो। रीनी के ममेरे भाई हो अ...और मेरे भी। देखा, मेरा अंदाजा कितना सही निकला।”
अजय के लिए कोमल की नजर अब पूरी तरह बदल गई थी। लेकिन अजय के जख्म ताजा हो गए थे।
“वह बुलंद इमारत आज भी जानकी लाल के गुनाह की निशानी के तौर पर महफूज है।" अजय ने आगे कहा “और उसे मैं हर रोज अपने फ्लैट की टैरेस पर बैठकर निहारता आया हूं। गुजरने वाले वक्त के साथ जानकी लाल बहुत ताकतवर हो । गया। मैं अकेला चाहकर भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था लेकिन मैं उसे छोड़ भी नहीं सकता था। इसीलिए मैं उसके और करीब आ गया। वह मुझे हरगिज भी नहीं पहचान सकता था, इसीलिए मैंने उसकी कम्पनी में नौकरी कर ली। तुमने बिल्कुल ठीक कहा था कोमल, मैंने केवल उस शैतान से नजदीकी बढ़ाने के लिए ही उसकी नौकरी की थी, महज पैसों के लिए नहीं। पैसा तो मेरे पास निमेष मेरे लिए बहुत छोड़कर गए थे, जिस पर जानकी लाल काबिज नहीं हो सका था और मेरे बालिग होते ही वह सारा रुपया मुझे हासिल हो गया था।
आज भले ही जानकी लाल दुनिया में नहीं है, लेकिन यह अफसोस मुझे हमेशा सालता रहेगा कि वह मेरे अपने हाथों कुत्ते की मौत नहीं मरा।”
अजय खामोश हो गया और फिर गहरी-गहरी सांसे भरने लगा। कितनी ही देर तक फिजां में पैना सन्नाटा छाया रहा, फिर उस सन्नाटे को कोमल ने ही तोड़ा।
“खैर...।” वह जतिन की ओर मुखातिब होकर बोली “और तुम्हारा क्या किस्सा है जतिन?"
“म..मेरा किस्सा वहां से शुरू होता है जहां से अजय का किस्सा खत्म होता है।” जतिन अजय पर एक सरसरी निगाह डालता हुआ बोला।
“म...मैं कुछ समझी नहीं। साफ-साफ कहो जतिन?”
“जानकी लाल ने अपने अतीत का कोई भी गुनाह अकेले नहीं किया था।” जतिन कुछ पलों की खामोशी के बाद बोला था “कोई था जिसने कदम-कदम पर जानकी लाल का साथ दिया था। जिसने कंधों से कंधा मिलाकर उसके हर गुनाह में बराबरी की शिरकत की थी और उसके लिए अपनी जान की परवाह नहीं की थी।"
“ए...ऐसा आदमी तो...।” अजय चिंहुककर जतिन को देखता हुआ बोला “सौगत था जानकी लाल का लंगोटिया यार।"
"तुमने ठीक कहा दोस्त ।” जतिन ने सहमति में सिर हिलाया “उसका नाम सचमुच सौगत ही था। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि फिर सौगत का क्या अंजाम हुआ था? जानकी लाल तो जिंदा था, मगर वह अपने हसीन लम्हों को देखने के लिए जिंदा क्यों नहीं बचा था?"
"न...नहीं।” अजय के चेहरे पर उत्सुकता के भाव आ गए थे "फिर सौगत के साथ क्या हुआ था?"
“सौगत मर गया था। उसकी कार का अचानक एक्सीडेंट हो गया था। एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी थी।"
“आई सी।"
"लेकिन वह रोड एक्सीडेंट का स्वाभाविक मामला नहीं था। क्योंकि जिस ट्रक ने उसे ठोका था, वह कोई बाहरी ट्रक नहीं बल्कि प्रबीरदास की कंस्ट्रक्शन कम्पनी का एक वोल्वो ट्रक था। और उसे कंपनी का कोई ड्राइवर नहीं बल्कि एक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर चला रहा था। जिसका अपना एक गैंग था और जिसका काम भाड़े पर कत्ल करना और अपहरण करके फिरौती वसूल करना था। उस गैंग के सरगना का नाम गोपाल था।"
“स...समझ गई।” कोमल के मुंह से अनायास ही निकल गया "तो उस कुख्यात किलर से जानकी लाल सेठ की वाकफियत का यह राज है। उसने बरसों पहले उसके गैंग की मदद से सौगत का कत्ल करवाया था। मगर...।"
सहसा कोमल के माथे पर बल पड़ गए। उसने जतिन ने पूछा “सौगत से तुम्हारा क्या रिश्ता था।"
“म...मैं उन्हीं सौगत का बेटा हूं।” जतिन ने बता दिया “और मेरे पिता के बदले की आग मेरे सीने में धधक रही थी। और मेरे पिता की आत्मा जैसे मुझे धिक्कार रही थी कि उसका कातिल आज भी जिंदा घूम रहा है। लेकिन...।" वह एकाएक रुक गया, फिर कुछ रुककर बोला “अब सब ठीक है। और मुझे खुशी है कि आज मेरा इंतकाम पूरा हो गया। जिस मकसद को लेकर मैं जानकी लाल सेठ की कंपनी में आया था, वह पूरा हो गया। अब मुझे इस नौकरी की कोई जरूरत नहीं है। अगर आज मैं गिरफ्तार न हुआ होता तो मैं आज ही कंपनी से रिजाइन देकर यह शहर छोड देने वाला था। लेकिन...।" उसने आह भरी और अपने वाक्य को अधूरा छोड़ दिया और पहलू बदलने लगा।
उसके चुप होते ही वातावरण में एक फिर खामोशी छा गई।