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Thriller कांटा

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“अरे वही श्री-श्री के एक्सीडेंट की मनहूस खबर बीच में आ टपकी थी।" मदारी ने उसे याद दिलाया “ऊपर वाले से दुआ करो कि इस बार बीच में कोई फच्चर न आए और मेरा काम समूचा निबट जाए।”

अजय की पेशानी पर बल पड़ गए थे। उस पुलिसिये का यूं अचानक दोबारा वहां आना उसे बहुत आंदोलित कर रहा था।

"लेकिन आखिर बात क्या है इंस्पेक्टर?" प्रत्यक्षतः उसने सुसंयत स्वर में पूछा लेकिन मन ही मन वह विचलित हो उठा था।

“आज भी यहीं खड़े-खड़े बातों का समापन करेंगे या मुझे अंदर तशरीफ लाने की इजाजत देंगे?"

“तुम्हें जो कुछ भी कहना है ऐसे ही कहो इंस्पेक्टर।"

मदारी के चेहरे पर मायूसी फैल गई।

“लाहौल बिला कूब्बत।” वह मुंह बिगाड़ता हुआ बोला।

"तुमने क्या कहा इंस्पेक्टर?"

“अभी कहां कहा है श्रीमान, अब कहने वाला हूं।" मदारी अपने सदाबहार अंदाज में बोला “वह क्या है कि आपके लिए मेरे पास एक से बढ़कर एक दो बुरी खबर हैं। बराय मेहरबानी आप यह बताने का कष्ट करें कि आप उसमें से कौन सी खबर पहले सुनना पसंद करेंगे? पहली, कम बुरी वाली या दूसरी, ज्यादा बुरी वाली?"

"लेकिन क्या हुआ है इंस्पेक्टर?” अजय का दिल धड़क उठा “आखिर बात क्या है?"

"चलिये मैं आपको पहले कम बुरी खबर सुनाता हूं।" मदारी बड़े इत्मिनान से बोला, जैसे कि उसे पता नहीं कितनी बड़ी

खुशखबरी सुनाने जा रहा हो “आपके भूतपूर्व एम्प्लायर श्री-श्री के इकलौते दामाद मरहूम संदीप महाजन का इंतकाल हो गया है।"

"क्या?” अजय चौंक पड़ा “स...संदीप मर गया?"

"खुद नहीं मरा जजमान....।” मदारी अपलक उसके चेहरे को देखता हुआ बोला “मार दिया गया उसका कत्ल कर दिया गया। अभी थोड़ी देर पहले ही वह बहादुर इस फानी दुनिया से फना हो गया।"

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“म...मगर यह कैसे हुआ इंस्पेक्टर? मेरा मतलब है संदीप को आखिर किसने मारा?"

+

“यह भी उसी बहादुर आदमी का कारनामा लगता है, जिसने बीते रोज श्रीमती का फातिहा पढ़ा था।”

"तुम्हारा मतलब है कि जिसने संजना को मारा था?"

“आपने एकदम सही समझा श्रीमान और मारने का स्टाइल भी तो देखो, एकदम श्रीमती वाला ही है।"

“वह कैसे?”

मदारी ने शराफत से उसे वह भी बता दिया कि कैसे रीनी ने फोन पर संदीप और कोमल की सारी बातें सुन ली थी और फिर कैसे हिंसक होकर उसने संदीप को मारने के लिए उस पर रिवॉल्वर तान दिया था। मगर इससे पहले कि वह संदीप को शूट कर पाती, संदीप ने एकाएक पासा पलट दिया था।

और फिर इसके पहले कि वह रीनी को कोई नुकसान पहुंचा पाता, किसी ने पीछे से उसे शूट कर दिया था।

“एकदम पिछले शूटआउट का रिवीजन है।” फिर मदारी बोला “हूबहू वही किस्सा है। जरा सा भी तो फर्क नहीं है दोनों मामले में।”

“और इसीलिए तुम्हारा अंदाजा है इंस्पेक्टर कि संदीप का कातिल भी वही है जिसने संजना का कत्ल किया है।"

“यह मेरा अंदाजा नहीं भगवान, यह साबित हो चुका है।"

“क...कैसे साबित हो चुका है?"

"जिस रिवॉल्वर से पहले संजना श्रीमती को शूट किया गया था, उसी रिवॉल्वर से संदीप श्रीमान का भी फातिहा पढ़ा गया है। फारेंसिक टीम की फौरी जांच से ही यह स्थापित हो चुका

“महज इसी से तुम्हारा ख्याल है कि दोनों का कातिल एक ही है।" "क्या मेरा ख्याल गलत है भगवान?"

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"इस कड़ी में तुमने लाल साहब का नाम क्यों नहीं लिया? कत्ल तो उन्हें भी किया गया है?"

“आपने दुरुस्त फरमाया जजमान। लेकिन उसकी दो वजह हैं।”

“वह क्या?”

“पहली बात तो यह है कि श्री-श्री को गोली नहीं मारी गयी थी।”

“और दूसरी वजह?"

“दूसरी वजह यह है कि उनके कातिल का पता चल चुका है। यह उस महान अपराधी गोपालम् का जांबाजी भरा कारनामा है, जो हाल में अपनी उम्रकैद की सजा काट कर बाहर गया था। और इस काम के लिए उसे दूसरे कदरन कम महान अपराधी जनाब सहगल साहब ने सुपारी दी थी।"

“तो फिर यह दोनों कत्ल भी उसी क्रिमिनल गोपाल ने क्यों नहीं किए हो सकते?"

“आपका कहना मुनासिब है जजमान । इसीलिए मैंने भी इस तरफ अपनी तफ्तीश का पूरा जोर लगाया। लेकिन मुझे दूर-दूर तक एक भी ऐसी वजह नजर नहीं आयी जो कि उस गोपालम् को संजना श्रीमती और संदीप श्रीमान का दुश्मन ठहराती हो?"

“लाल साहब भी तो उस शूटर के दुश्मन नहीं थे। बल्कि आप ही कहते हैं कि वह उसके दोस्त थे और उन्होंने गोपाल की बहुत मदद की थी। फिर भी गोपाल ने उन्हें खत्म कर दिया?"

"इसका भी मैंने मुकम्मल संज्ञान लिया है श्रीमान। लेकिन नतीजा खाक भी नहीं निकला।"

"क..क्या मतलब?"

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“माना कि दोनों ही मरहूम काफी फंदेबाज टाइप के इंसान थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी में काफी कर्मकांड किए थे। इसीलिए मैंने उनकी जिंदगी के बीते लम्हों को छलनी लेकर खूब-खूब खंगाला है। लेकिन उनकी जिंदगी में मुझे ऐसा कोई भी खता खाया इंसान नजर नहीं आया, जो उन दोनों से कत्ल की हद तक तक अदावत रखता हो। और जब कोई ऐसी अदावत ही नहीं रखता तो फिर वह उनके कत्ल की सुपारी भला क्या लगाएगा?"

“ओह।"

“ऐसे फड़नवीस तो अकेले अपने श्री-श्री एक हजार पैंसठ ही थे, जिनके दुश्मनों की तादाद चीन की दीवार से भी ज्यादा लम्बी-चौड़ी थी।"

“इसीलिए तुम्हारा ख्याल है कि उन दोनों का कातिल गोपाल नहीं हो सकता?"

"क्या आपको नहीं लगता श्रीमान?"

“यानि कि लाल साहब का कातिल दूसरा है, और संजना और संदीप का कातिल दूसरा है?”

“आप बिल्कुल सही समझे भगवान ।”

“फिर भी कोई तो वजह होगी इंस्पेक्टर संदीप और संजना के कत्ल की?"

“यह भी आपने खूब कहा जजमान। सरासर वजह है। बिना वजह के तो इस धरती पर पत्ता भी नहीं खड़कता।"

"क्या वह वजह मालूम हुई?"

"यकीनन।"

"क...क्या वजह है? आखिर क्यों संदीप और संजना का कत्ल हुआ?"

“वह तो साफ दिखाई दे रही है अंडमान। जिन हालात में वह दोनों कत्ल हुए, अगर न होते तो वह दोनों परलोक सिधार जाते जिन पर उन दोनों महान आत्माओं ने रिवॉल्वर तान रखे थे।”

“म...मैं कुछ समझा नहीं इंस्पेक्टर?"

"इसमें भला न समझने वाला क्या है। एकदम सीधी सी बात है। अगर संदीप और संजना नाम की महान आत्माओं का फातिहा न पढ़ा जाता तो वह दोनों महान आत्माएं अपने जतिन श्रीमान और रीनी श्रीमती का फातिहा पढ देतीं।"

“इ...इसका मतलब कातिल को पहले से मालूम था कि...।" अजय के स्वर में व्यंग उभरा “जतिन और रीनी के साथ क्या होने वाला था। वह न हो पाए इसीलिए वह पहले से मौकाए वारदात पर छुपकर बैठा था और फिर जैसे ही वह मुनासिब मौका आया, उसने गोली चला दी। ठीक ।”

“पुलिस की टांग खींचने का घास खाने वालों को हक होता है श्रीमान।" मदारी गहरी सांस भरता हुआ बोला।

“घ...घास खाने वाले ?” अजय उलझकर बोला “यह कौन हुआ?" “आम आदमी भगवान । लेकिन आप उनसे थोड़ा सा ऊपर हैं।

बहरहाल आप क्या सोचते हैं यह अहमियत नहीं रखता। इसमें केवल सरकार के इस तनख्वाह हलाल इंस्पेक्टर का सोचा अहमियत रखता है। और मेरी सोच यही है कि उन दोनों कत्लों की वजह अपने जतिन श्रीमान और रीनी श्रीमती ही हैं, जिन्हें उसने बचा लिया।"

"तुम्हारा मतलब है कि कातिल ने उन्हें कत्ल होने से बचा लिया?” “आपने बजा फरमाया जजमान।"

“तब तो कातिल उन दोनों का शुभचिंतक हुआ? उनका कोई अपना हुआ?"

“भयंकर शुभचिंतक बोलो श्रीमान। बहरहाल शुभचिंतक तो आप भी बहुत लोगों के होंगे और बहुत लोग आपके भी होंगे। मगर क्या पहले कभी आपके किसी शुभचिंतक ने आपके लिए किसी का कत्ल किया है या आपने किसी अपने की शुभचिंता में किसी और का कत्ल किया है?"

“न...नहीं।” अजय ने स्वीकार किया और पहलू बदलकर मदारी को देखने लगा।

“सो देयर।” मदारी लापरवाही से बोला।

“तब तो तुम्हारे लिए ऐसे आदमी को तलाश करना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। ऐसा शख्स तो आसानी से पकड़ में आ जाएगा।"

“यह इतना आसान भी नहीं है भगवान।"
 
"व....वह कैसे?"

“कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली।"

"क...क्या मतलब?"

“समझें श्रीमान। कहां रीनी श्रीमती, जो कि आसमान की सितारा है श्री-श्री जैसी हस्ती की इकलौती लाड़ली है। जबकि

कहां वह जतिन श्रीमान, जो आप ही की तरह श्री-श्री की कंपनी के महज एक मुलाजिम। अब आप ही बताए, किसी फन्ने खां के लिए इन दोनों की अहमियत एक बराबर आखिर कैसे हो सकती है? या फिर...।” उसने जरा ठहरकर तिरछी निगाहों से अजय को देखा, फिर आगे बोला “हो सकती हैं...?"

“न...नहीं हो सकती।” अजय ने हिचकिचाते हुए स्वीकार किया “काफी पेचीदा मामला लगता है।"

“आप खुद ही देख लीजिए श्रीमान। अगर ऐसा न होता तो क्या सरकारी तनख्वाह की पाई-पाई हलाल करने वाले इंस्पेक्टर को यह मिस्ट्री सुलझाने में इतना वक्त लगता?"

“क..क्या तुम यही बताने के लिए यहां मेरे पास आए हो?"

"अजी तौबा कीजिए श्रीमान। सरकार का यह नमक हलाल इंस्पेक्टर आपको इतना गैर-जिम्मेदार लगता है, जो सरकारी पेट्रोल को इतनी बेरहमी से इस्तेमाल करेगा।"

त....तो फिर?” अजय फिर आशंकित हो उठा था।

“वैसे बात बहुत ज्यादा खास नहीं है जजमान, मगर फिर भी बात तो सरासर है।"

"लेकिन बात क्या है इंस्पेक्टर?"

“दरअसल...।” मदारी ने एकात्मक अपनी कमर में खोंसी हड़कड़ी निकालकर अजय के चेहरे के सामने लहराई और फिर वह पहले जैसे ही सहज भाव से बोला “मैं आपको गिरफ्तार करने आया हूं भगवान । यू आर अंडर अरेस्ट।”

“व्हाट!"

अजय एकाएक जैसे आसमान से गिरा था। वह भौंचक्का सा होकर मदारी का मुंह देखने लगा।

कितनी ही देर तक सहगल की वह हालत रही।

बात ही ऐसी थी।

टैक्सी ड्राइवर की नकली पगड़ी और दाढ़ी-मूंछ हटते ही जो चेहरा नजर आया था, वह गोपाल का चेहरा था। जिसकी आंखों में सहगल को साफ-साफ अपनी मौत नजर आयी थी। जबकि गोपाल की जैसे बरसों की मुराद पूरी हो गई थी।

उस शातिर अपराधी के चेहरे पर सुकून के भाव आ गए थे।

"हे...हे. हे..।" वह एक खतरनाक हंसी हंसकर फिर बोला। उसका लहजा सहगल का मजाक उड़ाने वाला था “ड्राइवर भी फर्जी, पैसेंजर भी फर्जी। कैसी रही बाबा।”

"त...त..तुम?" बोलने की कोशिश में सहगल हकलाया और आंखें फाड़-फाड़कर गोपाल को देखता हुआ बोला “तुम?"

“मैं ही है न बाबा।” गोपाल बड़ी मुहब्बत से बोला। फिर उसने एक फरमाइशी आह भरी “शुक्र है कि अपने बाबा ने मेरे को पहचान लिया। अब...।" उसकी निगाह सहगल की सरदार वाली पगड़ी और दाढ़ी-मूंछ पर घूमी “इस बहरूप की जरूरत नक्को। इसको उतारकर अलग कर ले। या फिर ठहर, यह काम मैं खुद करता हूं।" उसने झपट्टा मारकर एक ही झटके में सहगल की पगड़ी उछाल दी और उसके चेहरे से नकली दाढ़ी-मूंछ खींचकर अलग कर दी। अब सहगल अपने असली चेहरे में उसके सामने था।

“जी आया नूं।" गोपाल से नाटकीय अंदाज में बोला। फिर उसने हाथों से सहगल की बलैया ले डाली “कितना अरसा हो गया इस सूरत को देखे हुए, जरा सी भी तो नहीं बदली। नजर न लग जाए किसी की।"

"क....क्या नहीं बदली?" सहगल हकलाया और अपलक गोपाल को देखने लगा था।

“तेरी सूरत भोलेनाथ, और क्या? बीस साल पहले जब तू मेरे गैंग में काम करता था तो कैसा मरगिल्ला हुआ करता था जवानी की तौहीन उड़ाता था। औरों पे जवानी में शबाब आता है, पर तेरे को तो बुढ़ापे में आया। नहीं? हा...हा...हा.हा।"

गोपाल ने जोर से अट्टहास किया।

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“द...देख गोपाल...।” सहगल एकाएक पुरजोर स्वर में बोला। उसके लहजे में घिघियाहट साफ झलक रही थी “मैं...।"

“अभी सुनेगा न।” गोपाल ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया था “खातिर जमा रख बाबा, मैं तेरी बात ठोककर सुनेगा। पण पहले तेरे को मेरी बात सुनना होगा। वैसे...।” सहसा वह ठिठका फिर उसे घूरकर बोला "तेरे को ऐसा तो नहीं लग रहा कि मैं तेरा नाम भूल गया होयेगा।"

“न...नहीं। मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।”

“बराबर बोला बाबा। मैं साला बादशाह अपने पंटर का नाम कैसे भूल जाएगा। सवाल ही नहीं उठता। हा...हा...हा..।" उसने फिर से जोर का अट्टहास किया। लेकिन फिर एकाएक खामोश हो गया।

सहगल टकटकी लगाकर उसे देखने लगा था।

"मगर तेरे को तो अपना नाम याद है या फिर तू अपना नाम भूल गया?" गोपाल ने पूछा “बोल बाबा। तेरे को अपना नाम याद है न?"

"ह...हां।” सहगल ने कठिनता से सहमति में अपना सिर हिलाया और कसमसाकर बोला “य..याद है।"

“अच्छा।" गोपाल ने हैरान होने का दिखावा किया, जैसे कि उसे सहगल की बात पर विश्वास न हुआ हो, फिर बोला “तो फिर एक बार जरा ऊंचा बोलकर बता ताकि मेरे को यकीन आ जाए।”

सहगल हिचकिचाया।

“तूने सुना नहीं बाबा।” गोपाल का लहजा सर्द हुआ था “लगता है ऊंचा सुनने लगा है कान में कोई नुक्स आ गया है।"

“स...स...साबिर।” सहगल ने कहा।

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“क्या बोला, मैंने सुना नहीं। जरा फिर से बोल।"

“सा...साबिर ।” सहगल ने दोहराया।

"शाबाश।” गोपाल खुश हो गया “यानि कि तेरे को अपना नाम याद है। अब आगे बोल ।”
 
“आ...आगे क्या बोलू?"

"तेरा नाम तो काफी बढ़िया था, फिर बदल क्यों डाला। साबिर बाबा से सहगल बाबा क्यों बन गया?"

"वो मैं...मैं..."

“मिमिया मत साबिर बाबा। मिमियाने वाले लोग मेरे को पसंद नहीं। मिमियाये बिना बता।"

“वह दरअसल सब तुम्हारे गिरफ्तार होने की वजह से हुआ। तुम्हारे बाद हम सबको भी अपनी गिरफ्तारी का खौफ सताने लगा था, इसीलिए...।"

“इसीलिए तूने अपना नाम बदल दिया साबिर बाबा से सहगल बाबा बन गया। ठीक?”

“ह...हमें अपनी-अपनी राह तो लगना ही था। और फिर अकेले मैंने ही तो ऐसा नहीं किया था। गैंग के दूसरे तमाम आदमी भी गिरफ्तारी के खौफ से अंडरग्राउंड हो गए थे और अपनी पुरानी पहचान के साथ वे इस शहर में बने नहीं रह सकते थे। सबको अपनी पहचान बदलनी जरूरी थी।"

“इसी वास्ते तू अपनी पहचान बदलकर सहगल बाबा बन गया।” गोपाल खून के धूंट पीता हुआ बोला “मेरे दूसरे पंटरों ने भी ऐसा ही किया। बराबर?"

"ह...हां।” सहगल ने पहलू बदला।

“और फिर उसके बाद तू सीधा उस जानकी की कंपनी का एकाउंटेंट बन गया? नहीं?"

"नहीं।"

"क्या नहीं?"

"तुम्हारा गैंग छोड़ने के बाद कितने ही सालों तक मैं पुलिस के खौफ से अंडरग्राउंड बना रहा। उसके बाद....।"

“मगर तेरे को पुलिस का इतना खौफ क्यों था? मेरे बाकी के पंटर को पुलिस का खौफ क्यों था? गैंग का मुखिया तो मैं था

जो गिरफ्तार हुआ था। तुम लोग कहां गिरफ्तार हुए थे?"

“नहीं हुए थे। लेकिन सब कुछ तुम्हारी जुबान के ऊपर था। अगर पुलिस तुम्हारी जुबान खुलवाने में कामयाब हो जाती तो...।" उसने जानबूझकर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।"

"तो तुम सारे के सारे पंटर भी गिरफ्तार हो जाने वाले थे।" गोपाल ने उसका वाक्य पूरा किया “यह कहना चाहता है तू?"

"ह...हां।” उसने कठिनता से सहमति में सिर हिलाया।

"मैंने लिया तुम हरामखोरों में से किसी का नाम? पुलिस मेरी जुबान खुलवा पाई ?"

“न...नहीं। मगर..."

“खैर जाने दे।” वह पुनः बातों का छोर पकड़ता हुआ बोला “आगे बता। अंडरग्राउंड होने के बाद फिर तूने क्या किया?

जानकी लाल सेठ की नौकरी कर लिया?"

"नहीं। वह बहुत बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी थी, जहां इतनी जल्दी मुझे एकाउटेंट की नौकरी नहीं मिलने वाली थी।"

"क्यों नहीं मिलने वाली थी? तेरे पास एकाउंटेंट की डिग्री तो बराबर थी वह भी एक दम असली। चौबीस कैरेट सोने जैसी खरी।"

"ह...हां थी।” मगर उस कम्पनी के लिहाज से मैं प्रैशर था।

“कहां फ्रैशर था। मेरे साथ कितने साल तूने काम किया था?" "लेकिन... म..मैं वहां उसका हवाला नहीं दे सकता था। कहीं भी तुम्हारी नौकरी का जिक्र नहीं कर सकता था।"

“इसीलिए तूने दूसरी छोटी-मोटी कंपनियों में नौकरी करके पहले अनुभव बटोरा। ठीक?"

"ह..हां।"

“लेकिन साले, हरामी, हलकट, तुझे छोटी-मोटी नौकरी करने की जरूरत ही क्या थी? मेरा इतना सारा रोकड़ा था तो तेरे पास, जो तू हथियाकर भाग निकला था।"

“व...व..वो..."

“अरे भाई, मैं ठहरा स्साला हिस्ट्रीशीटर। रोकड़ा तो मैं खूब कमा सकता था लेकिन उसको कहीं इन्वेस्ट नहीं कर सकता था, जबकि तेरे साथ ऐसा नहीं था। तेरा तो कोई पुलिस रिकार्ड तक नहीं था, इसीलिए मैंने वह सारा पैसा तेरे नाम पर इन्वेस्ट किया था, और उस पर सरकार को बाकायदा टैक्स भी चुकाता था।" वह रुका, उसने फिर प्रश्नसूचक नेत्रों से सहगल को देखा “मेरा सब मिलाकर टोटल कितना नावां बनता होगा? बीस करोड़ से कम तो क्या बनता होगा?"

सहगल जवाब देने के बजाय थूक निगलने लगा।

“वह सारा का सारा रोकड़ा तेरे ही हाथ में तो था वीर मेरे। मेरी सारी चल-अचल सम्पत्ति बेचकर तू उसे डकार गया था

और वह हर घड़ी तेरे पास था। इतने रोकड़े पर तो सारी जिंदगी ऐश किया जा सकता था, फिर भी तू पचास हजार की

एकाउंटेंट की नौकरी पर मरता रहा? क्यों बाबा?"

सहगल इस बार भी कोई जवाब न दे सका। वह व्यग्र भाव से पहलू बदलने लगा।

"अरे बोल बाबा। गूंगा हो गया क्या? और कुछ नहीं तो यही बोल दे कि जमा पूंजी में इजाफा न हो और केवल खर्च ही होता रहे तो एक दिन कुबेर का खजाना भी खाली हो जाता है. या फिर दसरी वजह भी बता दे कि दनिया को शक हो जाता। लाजिमी भी है, आदमी कुछ कमाए धमाए न, केवल दोनों हाथों से खर्च करे तो शक होना लाजिमी होता है। अरे बोल मेरे शेर, तू गूंगा क्यों हो गया?"

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“ग..गोपाल।” सहगल के होंठ हिले। वह सकुचाता हुआ बोला “मेरे से बहुत बड़ी गलती हुई है। मेरे को माफ कर दे।"

“अरे नहीं साबिर बाबा।" गोपाल जल्दी से बोला “तेरे से किधर गलती हुई। गलती तो मेरे से हुई है तेरे पर भरोसा करने की गलती। याद है न तुझे, अपनी एकाउंटेंट की डिग्री लिये बीस साल पहले तू सड़कों पर धक्के खाता घूम रहा था, मगर तुझे कोई दो हजार की नौकरी देने को भी राजी नहीं था। तब मैं ही तुझे मिला था। मैंने तुझे दस हजार की नौकरी दी थी, फिर तुझे अपना पार्टनर बना लिया था। लाखों-करोड़ों की प्रापर्टी तेरे नाम कर दी थी। कितनी बड़ी गलती की थी मैंने।"

सहगल का सिर झुकता चला गया।

“उस वक्त जबकि मैं गिरफ्तार हुआ था, मुझे मदद की बहुत सख्त जरूरत थी।" गोपाल ने कहा “उस पुलिसिये ने मेरा केस कमजोर करने के लिए मेरे से तीन करोड़ की रिश्वत मांगी थी, जो कि अगर उस वक्त मैं उसे दे देता तो वह मेरा केस बहुत कमजोर कर देता और मैं मुश्किल से साल भर की जेल काटकर वापस आ जाता। और मैं यह कर सकता था तीन करोड़ की उसकी मांग आराम से पूरी कर सकता था। इसीलिए मैंने तुझे बुलाया था। कितनी बार तुझे संदेशा भिजवाया था। लेकिन तू नहीं आया, गधे की सींग बन गया।"

“म...म...मेरे से भारी गलती हुई गोपाल।"

"जिसका खामियाजा मुझे पन्द्रह साल की जेल काटकर चुकाना पड़ा।" गोपाल ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं थी “अगर मैंने अपनी पैंतरेबाजी न दिखाई होती और अपने जानकी लाल सेठ को ब्लैकमेल न किया होता तो शर्तिया मेरे को फांसी की सजा मिलती। और इधर तू मेरी दौलत पर ऐश करता रहा। क्या सोचा था तूने, मेरे को कभी आजादी नहीं हासिल होने वाली थी म..मैं फांसी पर चढ़ा दिया जाने वाला था?"

“म...मैं अपनी गलती कबूल करता हूं गोपाल ।”

“अभी और सुन साबिर बाबा अभी और सुन। तेरे को मेरी पल-पल की खबर थी। तेरे को यह भी मालूम था कि मैं कब जेल से छूटकर बाहर आने वाला था। और तू यह भी जानता था कि उसके बाद मेरा निशाना तू होगा और मैं तेरे टुकड़े इस शहर में फैला देने वाला था। इसीलिए...।”

सहगल ने झटके से गरदन उठाई और सवालिया निगाहों से उसे देखने लगा।

“तूने मेरा माकूल इंतजाम सोच लिया था।” गोपाल ने अपनी बात पूरी की “तूने मुझे ठिकाने लगाने का तरीका भी सोच लिया था बहुत शानदार तरीका। मगर जिससे एक तीर से दो-दो शिकार होने वाले थे। याद आया कुछ तेरे को?”

“म..मैं..."

“तू जानता था कि जेल से बाहर आने के बाद मुझे रुपयों की जरूरत होगी ढेर सारे रुपयों की। और उसका मेरे पास एक ही हुनर है सुपारी। इसीलिए तूने मेरे पास जानकी की सुपारी भिजवाई उस जानकी की जो मेरा पुराना क्लाइंट था, मगर जो आज जानकी से जानकी लाल बन चुका था जानकी लाल सेठ बन चुका था उससे भी बड़ी बात, तेरा दुश्मन बन चुका था ऐसा जानी दुश्मन जिसने तेरे को सात साल के लिए अंदर भिजवाया था।"

सहगल इस बार विरोध करने का हौसला न जुटा सका।

"तू असल में पैदाइशी कमीना है साबिर बाबा।” गोपाल अपने होंठ भींचता हुआ बोला “जिस थाली में खाता है उसी में छेद करने की तेरी पुरानी आदत है, वरना कम से जानकी लाल सेठ तेरा दुश्मन नहीं बना होता।" वह एक पल के लिए ठिठका, फिर आगे बोला “बहरहाल, जानकी लाल सेठ का काम तमाम करने के लिए तूने उस पटाखा के जरिए मेरे को अप्रोच किया था।

क्या नाम था उस हसीन गुड़िया का?"

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-

सहगल ने जवाब देने का उपक्रम न किया।
 
“मैंने तेरे से कुछ पूछा है?" गोपाल का लहजा कठोर हुआ था। “स...संजना।” सहगल हड़बड़ाकर बोला।

“वही। वाकई गजब की हसीन थी साली। तू उसके जरिए मेरे को शीशे में उतारना चाहता था, ताकि तू मेरे को जानकी लाल सेठ के कत्ल के इल्जाम में दोबारा पंद्रह साल के लिए अंदर भिजवा पाता। और यूं एक तीर से तेरे दोनों शिकार तेरे रास्ते से हट जाते और तू फिर आइंदा पंद्रह साल तक बेखौफ जीता रह सकता था।"

“य..यह झूठ है।”

“ठहर जा हरामी।” गोपाल ने कहर भरे स्वर में पूछा “मैंने तेरे से कब पूछा कि यह सही है या नहीं है।"

सहगल ने अपने होंठ भींच लिए।

“तेरे को यह पूछना चाहिए था बाबा कि जब मेरे को सब कुछ मालूम था, फिर भी मैंने जानकी लाल सेठ का फातिहा क्यों पढ़ा? क्यों जानबूझकर दोबारा अपनी उम्रकैद का इंतजाम किया था। पूछ, जल्दी पूछ।”

सहगल मुंह बाए उसे देखता रह गया।

"चल, मैं तेरे पूछे बिना ही मैं तेरे को बताए देता हूं।” गोपाल उसकी पता नहीं कितनी पुश्तों पर अहसान करता हुआ बोला "तुझे यह जानकर जरूर गश आ जाएगा कि तू मुझे जानकी लाल सेठ के कत्ल की सुपारी देता या न देता, उसका तो मेरे हाथों मरना निश्चित था। जेल से बाहर आते ही सबसे पहला काम मेरा यही था कि मैं उसे कुत्ते की मौत मारने वाला था। उसकी जिंदगी तो केवल तभी तक सलामत थी जब तक कि मैं जेल से बाहर नहीं आया था। अब पूछ कि ऐसा क्यों? जानकी लाल सेठ ने मेरा क्या बिगाड़ा था, उल्टा उसने तो मेरे पर अहसान ही किया था। पूछ हरामी, जल्दी पूछ।



सहगल मुंह से कुछ न बोला। लेकिन उसके चेहरे के जर्रे-जर्रे पर वह सवाल उभर आया था।

"क्योंकि वह मेरी ब्लैकमेलिंग से तंग आ गया था।" गोपाल ने बताया “और आता भी क्यों नहीं, मैं जेल में रहकर भी पिछले पंद्रह साल से उसे बराबर ब्लैकमेल कर रहा था उसे नींबू की तरह निचोड़ रहा था, क्योंकि उसकी जान मेरी मुट्ठी में थी। अगर वह मेरा कहना नहीं मानता तो मैं उसे पलक झपकते तबाह कर सकता था जेल की हवा खिला सकता था। और मैं जब तक जिंदा था, उसके ऊपर खतरे की तलवार बनकर लटकता रहने वाला था। अब यह मत पूछने लग जाना कि ऐसा क्यों था। क्योंकि वह मैं तुझे हरगिज भी नहीं बताने वाला।"

"न...नहीं पूलूंगा।"

"शाबाश। आखिरकार जानकी लाल सेठ ने अपने ऊपर लटकती उस खतरे की तलवार को हमेशा के लिए हटाने का फैसला कर लिया था।” गोपाल ने बताया, फिर उसके चेहरे पर सवालिया निशान उभरे "जानता है इसके लिए उसने क्या किया था?"

"क...क्या किया था?" सहगल ने उत्सुक भाव से पूछा।

“उसने जेल में ही मुझे खत्म करवाने का इंतजाम कर दिया था। उसने एक ऐसे कांट्रेक्ट किलर को मेरे कत्ल की सुपारी लगाई थी, जो जेल के अंदर घुसकर कत्ल करने की भी सलाहियत रखता था। और वह किलर सचमुच ऐसा कर सकता था। असल में तो वह इसी काम का स्पेशलिस्ट था। जानकी लाल सेठ ने इस बार बहुत ही सोच समझकर दांव लगाया था, जिसकी कामयाबी के पूरे चांस थे। मगर जानता है क्या हुआ था।"

सहगल के चेहरे पर सस्पेंस के भाव गहरा गए थे।

"वह कांट्रेक्ट किलर मेरा शागिर्द निकल आया। समझा कुछ, जिस किलर को जानकी लाल सेठ ने मेरे कत्ल की सुपारी दी थी, वह मेरा अपना शागिर्द निकल आया। वह अपने तरीके से जेल में मेरे पास पहुंचा तो जरूर, लेकिन मुझे कत्ल करने के लिए नहीं, बल्कि मुझे खबरदार करने के लिए कि मेरी सुपारी लगाई जा चुकी थी। वह तो शुक्र है कि वह मेरा शागिर्द निकल आया और उसने मुझे बता दिया, लेकिन अगर ऐसा न हुआ होता तो क्या होता।”

सहगल टकटकी लगाए गोपाल को ही देख रहा था।
 
“अपने मुरीद उस किलर को तो मैंने वहां से रुख्सत कर दिया।" गोपाल ने आगे कहा “लेकिन जो हुआ उसने मेरे खून को किस कदर उबाला होगा, तू समझ ही सकता है बाबा। जानकी लाल सेठ का इलाज सचमुच मेरे लिए जरूरी हो गया था। अपनी दौलत के दम पर वह मेरे खिलाफ कोई भी गुल खिला सकता था और उसका माकूल इलाज केवल उसकी मौत ही थी, जिसे कि देने की मैं कसम खाए बैठा था। अगर तूने थोड़ा सा धैर्य रखा होता तो तेरा वह काम मुफ्त में ही हो जाने वाला था, जिसके लिए तूने मेरे पर लाखों रुपये खर्च किये।” वह पलभर के लिए रुका, फिर उसने सहगल को देखा

“अभी कुछ समझा बाबा।"

"ह...हां।” सहगल फंसे कंठ से बोला।

“लेकिन पछताने का नहीं है। तब किस्मत तेरे पर मेहरबान थी, आज मेरे पर मेहरबान है। अभी एक नजीर मेरे पास और

सहगल के चेहरे पर फिर सवालिया निशान उभरे।

“वह नजीर तू है साबिर बाबा खुद तू।” गोपाल ने अपनी तर्जनी अंगुली खंजर की तरह उसकी तरफ तान दी।

“क...क्या मतलब।" सहगल हचकचाया।

“अभी देख, तेरे को कत्ल करने के वास्ते तो मैं तेरे को पाताल से भी ढूंढ निकालने वाला था। उसके लिए मेरे को यह इंतजार किधर था कि कोई इसके लिए मेरे को तेरे कत्ल की सुपारी पेश करे। मगर देख, मेरे पास तेरी सुपारी भी आ गई। अभी बोल, किस्मत मेरे पर मेहरबान है कि नहीं।"

“क्या?” उसके उस नए रहस्योद्घाटन पर सहगल बुरी तरह से चौंका था “म...मेरी सुपारी तुम्हें किसने दी?"

“क्या करेगा जानकर बाबा। अभी तू जिधर जाने वाला है उधर तेरे से इस बारे में कोई नहीं पूछेगा।"

"न...नहीं।"

“और अब तेरे को...।" उसकी निगाह सहगल की बगल में रखे सूटकेस पर पलभर के लिए ठिठकी, फिर वह बोला “यह शहर छोड़कर भी जाने की जरूरत नहीं हैं। मैं आ गया है न तेरे को सीधे इस दुनिया से ही रुख्सत करने के वास्ते।"

“न...नहीं।” सहगल सूखे पत्ते की तरह कांप गया था “मुझे मारकर तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।”

“तेरे को न मारने से क्या हासिल हो जाएगा कुत्ते-कमीने?”

“म...मेरे पास बहुत दौलत है। वह सारी की सारी मैं तुम्हें दे दूंगा। इस सूटकेस में...।” उसने अपने सूटकेस को थपथपाया “पचास लाख का कैश है। इसे तुम चाहो तो अभी ले जा सकते हो।"

“ला।” गोपाल ने अपनी चौड़ी हथेली उसके सामने फैला दी। सहगल ने अपने पास रखा सूटकेस उठाकर फौरन उसे पकड़ा दिया।

“मगर यह सब तेरी दौलत कैसे हुई हरामी।” गोपाल सूटकेस एक तरफ रखने के बाद बोला "तेरी सारी दौलत तो वैसे ही मेरी है, जो पन्द्रह साल पहले तूने मेरे से हथिया ली थी। उसे तू अपनी कैसे कह सकता है?"

“उ...उसके लिए मैं तुमसे पहले ही माफी मांग चुका हूं।" सहगल घिघियाया “फिर से मांग रहा हूं, गोपाल। मेरे को माफ कर दे, प्लीज।"

"ऐसा?"

“ह..हां...हां।"

“तो फिर माफी की तरह मांग न। तू तो ऐसे मांग रहा है जैसे कि माफी नहीं, मेरे से हिस्सा मांग रहा हो। माफी तो हाथ जोड़कर, पांव पकड़कर मांगी जाती है।"

सहगल के अंदर उम्मीद रोशन हुई।

“मैं...मैं तुम्हारे पांव पकड़ने के लिए तैयार हूं।” वह जल्दी से बोला। “तो फिर जल्दी से पकड़। मेरे पांव इधर नीचे हैं।”

सहगल झट से उठा और अगली सीटों की पुश्त से होकर बेहद असुविधापूर्ण ढंग से आगे उसके पैरों की तरफ झुक गया।

गोपाल की आंखों में एकाएक शैतानी चमक कौंध गई।

उसने अपने सधे हाथों से चमचमाता सा खंजर निकाला और उसे इत्मिनान से सहगल की गरदन में उतार दिया।

अजय को ले जाकर पुलिस स्टेशन के लॉकअप में बंद कर दिया गया और लॉकअप के दरवाजे को बाहर से ताला

लगाकर सिपाही वहां से चला गया।
 
इंस्पेक्टर उसके साथ पुलिस स्टेशन नहीं आया था। वह रास्ते में ही था जबकि उसके मोबाइल पर एक फोन आया था। उसके बाद मदारी फौरन पुलिस कार से उतर गया था और फिर वह दोबारा अजय को नजर नहीं आया था।

उसकी पुलिस टीम ही उसे पुलिस स्टेशन लेकर पहुंची थी और उसे लॉकअप में बंद कर दिया गया था।

..

उस गिरफ्तारी का अजय ने भरपूर विरोध किया था और मदारी से चीख-चीखकर गिरफ्तारी की वजह पूछी थी। उसे किस आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा था, जानना चाहा था, लेकिन उस अफलातूनी इंस्पेक्टर ने एक लफ्ज भी नहीं बताया था।

और फिर लॉकअप में पहुंचते ही अजय चौंक पड़ा। उसकी वजह लॉकअप में पहले से मौजूद लोग थे। वह एक नहीं, दो-दो लोग थे, जिन्हें अजय बखूबी पहचानता था। वह दोनों लोग जतिन और कोमल थे। पहला मेल, दूसरा फीमेल, जिन्हें कि नियमानुसार एक ही लॉकअप में बंद नहीं किया जा सकता था। लेकिन वह दोनों एक ही लॉकअप में मौजूद थे।

और अब तीसरा मुल्जिम अजय भी वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। उसे वहां पहुंचा देखकर जतिन और कोमल भी चौंके थे तथा आश्चर्य से उसे देखने लगे थे। लेकिन फिर लगभग फौरन ही उन लोगों ने अपने आश्चर्य पर काबू पा लिया।

“बहुत खूब।” जतिन अजय को देखकर बोला “तो तुम भी यहां तशरीफ ले आए।"

“अब तो बस एक ही आदमी की कमी रह गई है।” कोमल एक विद्रूपपूर्ण हंसी हंसकर बोली “अपने बॉस सहगल साहब।"

“वह भी बस आता ही होगा।” जतिन बोला।

+

"म...मगर यह सब आखिर क्या हो रहा है?" अजय उन दोनों को देखता हुआ व्यग्र भाव से बोला “उस इंस्पेक्टर ने तुम दोनों को आखिर क्यों गिरफ्तार किया है?"

“क्या पता क्यों गिरफ्तार किया है।” कोमल मुंह बिगाड़ती हुई बोली "कमबख्त ने इस बारे में एक लफ्ज भी नहीं बताया। तुम अपनी सुनाओ। तुम्हें क्यों गिरफ्तार किया गया है?"

“मैंने भी उससे चीख-चीखकर पूछा, मगर उसने एक शब्द भी नहीं बताया।”

"अजीब बात है।” जतिन बड़बड़ाया “उसने हममें से किसी को भी हमारी गिरफ्तारी की वजह नहीं बताई।"

"अ...और सारे नियम-कानून को ताक पर रखकर उसने लेडीज और जेंट्स को एक ही लॉकअप में बंद किया है। यह तो सरासर धांधली है गैर कानूनी है। इसके लिए उस इंस्पेक्टर के खिलाफ केस करूंगी।"

“जरूर करना।” अजय ने कहा “वैसे वह इंस्पेक्टर भी इस बात को जानता होगा।"

“इसके बावजूद उसने ऐसा किया?"

“हां। वह वीआरएस लेने वाला है। शायद इसीलिए उसे अपनी नौकरी की परवाह नहीं है।" जतिन ने कहा।

"लेकिन वह गया कहां है?” वह सवाल कोमल ने पूछा था।

“शायद अपने बॉस सहगल को लाने गया है।” अजय ने संभावना जताई “अगर ऐसा है तो बहुत जल्द हम चारों यहां अपनी आखिरी मीटिंग कर रहे होंगे। उसके बाद हमारा अगला मुकाम या तो जेल होगी या फिर फांसी।"

“फ....फांसी।" जतिन सकपकाया “फांसी किसलिए?"
 
"भूल गए, हम सब जानकी लाल के कत्ल की साजिश में शामिल थे।”

“शी..ऽ।” जतिन ने अपने मुंह पर अंगुली रखकर उसे चुप रहने का इशारा किया और दबे स्वर में बोला “धीरे बोलो। यह पुलिस स्टेशन है।

” “उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।” अजय मुंह बनाता हुआ बोला था “मुझे पूरा यकीन है कि हमारी पोल खुल चुकी है और हमारे खिलाफ उस इंस्पेक्टर के हाथ पुख्ता सबूत लग चुके हैं।"

“वह कैसे?" कोमल के साथ ही जतिन के चेहरे पर भी सवाल उभरा।

"मत भूलो कि संदीप ने अपनी मौत से पहले हम चारों से फोन पर बातें की थीं। उसका मोबाइल भी उसकी लाश के करीब ही पड़ा मिला है। सहगल का भांडा तो पहले ही फूट चुका है, संदीप के मोबाइल ने हमारा भी फोड़ दिया होगा।"

“म..मदारी ने तुम्हें यह बताया था?"

“नहीं। उसने केवल संदीप के कत्ल की घटना का जिक्र किया था। उसके बाद समझने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। और अब वह अजीबोगरीब इंस्पेक्टर शायद सहगल को गिरफ्तार करने ही गया है।"

"लेकिन सहगल तो अंडरग्राउंड है।"

“सुना है कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं।"

“लिहाजा...।” जतिन फिक्रमंद भाव से बोला “हम सबका खेल खत्म।"

"ऐसा ही लगता है।” अजय ने बड़ी कठिनता से सहमति में सिर हिलाया। फिर सहसा उसकी निगाह कोमल पर फोकस हुई “तुम्हें बहुत ज्यादा अफसोस होगा।"

"गिरफ्तार होने का?" कोमल बोली।

“और संदीप की मौत का भी।" कोमल के चेहरे के भाव तत्काल चेंज हुए।

-

"ऑय एम सॉरी।” अजय ने कहा “लेकिन आखिर यह सब क्या हो रहा है? जानकी लाल हम सबका दुश्मन था। उसकी मौत के साथ ही सारा किस्सा खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन किस्सा तो अब लगता है कि शुरू हुआ है।"

"तुम आखिर कहना क्या चाहते हो अजय?" जतिन ने असमंजस भरे भाव से पूछा।

“पहले संजना, फिर संदीप। यह कत्ल आखिर कौन कर रहा है

और उससे भी अहम सवाल यह कि क्यों कर रहा है?"

“उससे ज्यादा अहम सवाल यह है कि अगर उसने ऐसा नहीं किया होता तो क्या होता।” जतिन हल्के आवेश से बोला

"इस बात को मेरे से ज्यादा बेहतर दूसरा कोई भी नहीं समझ सकता कि अगर उसने ऐसा न किया होता तो मैं आज जिंदा नहीं होता। वह कमीनी संजना मेरी जान ले चुकी होती। अलबत्ता संदीप का मुझे कुछ खास नहीं पता।"

"मगर मुझे पता है।” अजय ने कहा “अगर ऐन वक्त पर कातिल ने संदीप को भी शूट न किया होता तो संदीप ने भी रीनी को खत्म कर दिया होता।"

"तब तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है। कातिल जो भी है कम से कम हमारा दुश्मन नहीं है।” जतिन सोचपूर्ण भाव से बोला “खास तौर पर मेरा और रीनी का।"

"तुमने ठीक कहा जतिन।” अजय उसकी ओर देखता हुआ बोला “मेरा भी यही ख्याल है कि ऐसे में तो तुम्हें अंदाजा होना चाहिए कि कातिल आखिर कौन हो सकता है?"

“म...मैंने कोशिश तो बहुत की लेकिन मुझे कोई ऐसा शख्स याद नहीं आ रहा।"

“फिर कोशिश करो। वह शख्स रीनी का भी शुभचिंतक है।" “यही तो पेचीदगी है। रीनी जानकी लाल की बेटी है और जानकी लाल मेरा दुश्मन था। फिर उसकी बेटी के किसी शुभचिंतक ने आखिर मेरी मदद क्यों की? उसे तो उल्टा मेरा दुश्मन होना चाहिए।"

.

“मैं भी जानकी लाल की बेटी हूं।” कोमल बीच में बोली "लेकिन मैं तुम लोगों की दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त हूं। दुश्मन तो मैं भी जानकी लाल की थी। इसीलिए...।" उसने जानबूझकर आगे का वाक्य अधूरा छोड़ दिया था।

“मैंने हर तरह से सोचा लेकिन मैं फिर कह रहा हूं। मुझे ऐसा कोई शख्स याद नहीं।"

“अपने अतीत पर एक नजर डालो। हो सकता है तुम्हारे अतीत से उसका ताल्लुक हो। बहरहाल यह बहुत जरूरी है।"

"क...क्या जरूरी है?"

“हम इस वक्त मुसीबत में हैं। हमें जरूर पुलिस ने जानकी लाल के कत्ल की साजिश में गिरफ्तार किया है। और केवल वही शख्स है जो इस वक्त हमारी मदद कर सकता है।"

“ओह।"

"और मुझे तो अभी तक यह भी नहीं पता नहीं कि तुम दोनों आखिर कौन हो? तुम्हारी जानकी लाल से क्या दुश्मनी थी? इसके बावजूद तुम दोनों उसके मुलाजिम क्यों थे?"
 
अजय और जतिन की निगाहें आपस में मिलीं। कोमल का वह सवाल उन दोनों के लिए अप्रत्याशित था। जिसके लिए ये तैयार नहीं थे।

“वैसे मुलाजमत की बात तो कुछ-कुछ समझ में आती है।" कोमल बारी-बारी से दोनों को देखती हुई बोली “जानकी लाल की जिंदगी में उनकी मौत से पहले उन पर एक दो नहीं पूरे तीन बार जानलेवा हमला हुआ था, जिसमें वह बस किस्मत से ही बचा था। पहली बार उसकी कार के ब्रेक फेल कर दिए गए थे। दूसरी बार उसके कोल्ड ड्रिंक में जहर मिलाकर उसे मारने की कोशिश की गई थी और तीसरी बार...।"

दोनों ने अपलक कोमल को देखा।

+

+

.

“तीसरी बार तो तुम्हें मालूम है कि...।" कोमल उनकी निगाहों का मतलब समझती हुई बोली “वह मैं ही थी जिसने उसकी सुपारी लगाई थी, लेकिन मेरी बदकिस्मती कि वह कमीना फिर भी जिंदा बच गया। लेकिन...।” उसकी निगाहें फिर अजय व जतिन पर स्थिर हो गईं “उससे पहले उस पर वह दोनों जानलेवा हमले किसने कराये थे, यह आज भी एक रहस्य है।

और अगर मैं गलत नहीं तो यह कारनामा जरूर तुम दोनों का है। बोलो मैंने ठीक कहा न?"

“अ...अब इस सवाल के कोई मायने नहीं रह जाते कोमल ।" अजय जल्दी से बोला “वह किस्सा खत्म हो चुका है। जानकी लाल अपने अंजाम को पहुंच चुका है।"

“मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया है।” कोमल संतुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाती हुई बोली “और अब मैं यह भी समझ गई कि तुम लोगों ने महज एक मकसद के लिए जानकी लाल सेठ की मुलाजमत कबूल किया था। उसके करीब रहकर ही उस पर वार करने का मौका हासिल किया जा सकता था। लेकिन तुम लोगों को लेकर मेरा सवाल अभी सवाल ही बना हुआ है तुम लोगों की आखिर मेरे मरहूम बाप से क्या अदावत थी?"

“क..क्या अभी इस सवाल का जवाब देना जरूरी है कोमल?" जतिन पहलू बदलता हुआ बोला।

“बहुत जरूरी है। और घबराओ मत, मैं तसल्ली कर चुकी हूं। यहां आस-पास हमारी बातें सुनने वाला कोई नहीं है। इस लॉकअप के अंदर कोई स्पाई कैमरा या रिकार्डर भी नहीं लगा है। पहले...।" वह अजय की ओर घूमी "तुम बताओ।"

“सॉरी कोमल ।” अजय ने खेद जताया “मुझे अब यह बताने मैं कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसके लिए यह मुनासिब मौका है।"

“मेरे ख्याल से तो यही सबसे मुनासिब मौका है। वैसे पता नहीं क्यों मुझे अंदेशा हो रहा है हम अजनबी होकर भी अजनबी नहीं हैं। हमारे बीच कुछ ऐसा है जो हमें किसी रिश्ते में बांधे हुए है।"

“म...मुझे ऐसा नहीं लगता।”

"लेकिन मेरे अंदेशे भी गलत नहीं होते। क्या तुम मुझे अपने पिता का नाम बताने की जहमत फरमाओगे।" ।

“म...मेरे पिता का नाम?” अजय व्याकुल हो उठा था।

“बात तुम्हारी ही हो रही है। और देखो, झूठ बोलने की कोशिश मत करना, मुझे झूठ पकड़ना आता है। अब बोलो भी, तुम खामोश क्यों हो?”

अजय सोच में नजर आने लगा था।

“नि...निमेष।” फिर वह धीरे से बोला “मेरे पिता का नाम निमेष था।"

“ओह।" कोमल सोच में नजर आने लगी थी, जबकि जतिन हौले से चौंक पड़ा था। लेकिन उसने अपना चौंकना अजय पर उजागर नहीं होने दिया था। कोमल बोली “यह नाम कुछ सुना हुआ लग रहा है। यह निमेष कहीं प्रबीरदास के बेटे का नाम

तो नहीं है।"

“त...तुम प्रबीरदास को जानती हो?” अजय चौंककर कोमल को देखने लगा था।

“हां। मैंने यह दोनों नाम रीनी के मुंह से सुने थे। वह शायद रीनी की मां के पिता और रीनी के नाना थे। और निमेष, निमेष उन्हीं प्रबीरदास का गोद लिया बेटा था। मगर रीनी कहती थी कि प्रबीरदास उसे अपने सगे बेटे से ज्यादा चाहते

थे।"

“हां...हां।” तब अजय के सब्र का बांध टूट गया। वह किसी हद तक उत्तेजित होकर बोला “मैं उन्हीं निमेष का बेटा हूं। यह अलग बात है कि उन्होंने भी मुझे गोद लिया हुआ था। और रीनी की मां सरला उन्हीं प्रबीरदास की इकलौती बेटी थी, जिसे जानकी लाल ने अपने प्यार के जाल में फंसाकर उनसे शादी की थी और फिर वह शैतान प्रबीरदास की करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक बन गया था।"

अजय के उस रहस्योद्घाटन ने अकेले कोमल को ही नहीं जतिन को बुरी तरह से चौंकाया था।

“उस कंगले जानकी लाल ने महज दौलत की खातिर यह सब किया था।” अजय उत्तेजना के हवाले हुआ कहता गया “वह

यह भी जानता था कि वक्ती तौर पर भले ही प्रबीरदास अपनी बेटी सरला की जिद के आगे झुक गया हो और उसने जानकी लाल को अपना दामाद कबूल कर लिया हो लेकिन बहुत जल्द वह जानकी लाल की असलियत सामने ले आने वाला था

और उसका सरला से तलाक करा देने वाला था। और प्रबीरदास यकीनन यह करके रहता, मगर शातिर जानकी लाल उसके इरादों को पहले ही भांप गया था। फिर इससे पहले कि प्रबीरदास कामयाब होता, उसने उसे खत्म कर दिया था उसका नामोनिशान मिटा दिया था।"

जतिन और कोमल हक्के-बक्के अजय को देख रहे थे।
 

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