• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller कांटा

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
“लेकिन...।” नैना ने एक उड़ती निगाह उसके फैशन मॉडल जैसे हसीन चेहरे पर डाली, फिर कुछ उलझकर बोली “तुम्हारा चेहरा तो एकदम ठीक है।”

“हां। क्योंकि यह मेरा असली चेहरा नहीं है। मेरी यह सुंदरता तो कास्मेटिक सर्जरी का कमाल है, जो प्राची का चेहरा है। आलोका का चेहरा तो उस एक्सीडेंट ने मुझसे हमेशा-हमेशा के लिए छीन लिया।”

“समझ गई।” नैना के मुंह से बेसाख्ता निकला ।वह निःश्वास भरती हुई बोली “तो यह है तुम्हारे चेहरे की सर्जरी की हकीकत?"

“ज...जी मैडम।" आलोका का चेहरा झुक गया “ऑय एम वैरी सॉरी। म...मैंने इस मामले में भी आपको गुमराह किया था। असल में मुझे वैसी कोई चेहरे की बीमारी नहीं हुई थी, जिसकी वजह से मैंने अपने चेहरे की यह सर्जरी बताई थी।"

“डोंट माइंड बेबी। लेकिन तुम्हारे इलाज और तुम्हारे चेहरे की इस सर्जरी का यह भारी भरकम खर्च किसने उठाया था?"

“उ...उसी ने मैडम, जिसकी कार ने मेरी वह हालत की थी।" “और वह कौन था?"

आलोका हिचकिचाई।

"ओह कम ऑन आलोका। मेरे सवाल का जवाब दो।"

“अ...अजीब इत्तेफाक है मैडम.." आलोक ने कहा “वह शख्स भी मेरे पापा का बहुत बड़ा मुरीद था और उसने भी पापा की एडवाइज पर बहुत पैसा कमाया था।"

“और इस तरह उसे तुम्हारे पापा के अहसानों का बदला चुकाने का मौका हासिल हुआ था? राइट?"

“नहीं। वह सचमुच नेक इंसान था मैडम, जो मेरे पापा की

आपबीती सुनकर अंदर तक हिल गया था। म...मैं अगर आज जिंदा हूं तो इसका श्रेय उसी इंसान को जाता है।"

“वह तो है। आखिर उसने तुम्हारा इतना बेहतर इलाज कराया। तुम्हारे असली चेहरे में न सही, लेकिन तुम्हारी

खूबसूरती उसने तुम्हें फिर से वापस लौटा दी।”

“खुदकुशी के तमन्नाई इंसान को इन चीजों की जरूरत नहीं होती मैडम। उसने इससे कहीं ज्यादा बड़ा काम किया था।"

“ऐसा क्या काम किया था उसने?” नैना ने उत्सुकता जताई। “उसने मुझे खुदकुशी के अवसाद से उबारकर मुझमें जीने का हौसला जगाया था। उ...उसने मुझे जीने का मकसद दिया था।"

“क...क्या मकसद दिया था उसने तुम्हें ?"

“जेंटलमैन।” आलोका का स्वर हौले से लरजा। लेकिन उसने फिर से खुद को संभाल लिया और उसका आत्मविश्वास लौटने लगा था “मेरा जेंटलमैन। जिसकी जॉन उस वक्त खतरे में थी।"

“क...क्या वह शख्स तुम्हारे जेंटलमैन को जानता था?"

"हां। और वह एक मिशन पर निकला हुआ था, जिसमें अगर वह कामयाब हो जाता तो अकेले मेरे जेंटलमैन की ही नहीं,

और भी कई लोगों की जिंदगी बच जाने वाली थी।"

“और तुमने उसकी बात मान ली?"

“क्यों न मानती! मुझे आखिर मेरे जीने का मकसद जो मिल गया था।"

“और तुम्हें मेरे पास भेजने वाला भी वही है? है न

आलोका?" आलोका कसमसाई। फिर वह बेचैनी से पहलू बदलती हुई

बोली “ज..जी हां मैडम। यह सच है, मैं यहां उसी के कहने पर आयी हूं।" साथ ही आलोका ने अपना चेहरा झुका लिया।

“इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं है आलोका, क्योंकि कम से कम तुम्हारी वजह से मुझे कोई नुकसान नहीं हुआ।” नैना ने कहा “इसलिए तुम्हें अपना चेहरा झुकाने की जरूरत नहीं है।"

आलोका ने सकुचाते हुए अपना चेहरा ऊपर उठाया और नैना को देखा।

“तुमने अभी तक उस आदमी का नाम नहीं बताया।” नैना ने सवालिया निगाहों से उसे देखा “उसका नाम क्या है?"

“उ..उसका नाम...।" आलोका हिचकिचाई,? फिर उसने बता दिया “उसका नाम है जानकी लाल।"

"व्हाट?" नैना सकते में आ गई।

“श्री...श्री...।" मदारी के होठों से बेअख्तियार निकला और वह भौंचक्का सा होकर आंखें फाड़-फाड़कर जानकी लाल को देखने लगा “आप?"

उसके चेहरे के जर्रे-जर्रे पर आश्चर्य और अविश्वास के असंख्य भाव आ गए थे।

वह, जो कि सचमुच जानकी लाल था, उसके होठों पर एक रहस्यमय मुस्कराहट उभरी।

“तुमने ठीक पहचाना इंस्पेक्टर ।” जानकी लाल मंद-मंद मुस्कराता हुआ बोला “मैं सचमुच हूं और मुझे जीवित देखकर किसी की

भी यह हालत हो सकती है। लेकिन तुम्हारा इस तरह से चौंकना मेरी समझ से बाहर है।"

"लेकिन क्यों भगवान । मैं क्या इंसानों की श्रेणी में नहीं आता?" मदारी ने पूछा।

“यकीनन आते हो। लेकिन तुम्हारी लिए यह कोई राज नहीं है।” “वह क्यों श्रीमान?"

"क्योंकि तुम इस सच से बखूबी वाकिफ हो।"

___ “कौन से सच से?"

“मेरे जिंदा होने के सच से।" “य...यह आप कैसे कह सकते हैं जजमान?"

"क्योंकि जिस लाश को सारी दुनिया ने मेरी लाश समझा था, वह केवल तुम ही थे जिसने उस पर विश्वास नहीं किया था। इसीलिए तुमने बाद में उस लाश का डीएनए परीक्षण कराया था।"

“आ..आपको यह मालूम है?" मदारी की पहले से फैली आंखें

और ज्यादा फैल गई थीं।

“खेल जब खून का हो तो नजरों को बहुत पैना रखना पड़ता है। और जब सामने तुम्हारे जैसा तनख्वाह की पाई-पाई हलाल करने वाला इंस्पेक्टर हो तो और ज्यादा चौकन्ना रहना पड़ता है। पुलिस की फारेंसिक टीम के उस डॉक्टर गौतम को मेरा डीएनए सैम्पल भी तुम्हीं ने ही उपलब्ध कराया था और तुम्हारी इस कोशिश का रिजल्ट पॉजिटिव आया था।”

“आ..आप तो मेरी सोच से ज्यादा पहुंचे हुए निकले श्री-श्री।" “लिहाजा तुम्हें कबूल करना ही पड़ेगा इंस्पेक्टर कि तुम इस सच से वाकिफ थे कि मैं मरा नहीं जिंदा हूं, और अकेले तुम ही नहीं, मेरा डीएनए टेस्ट करने वाला डॉक्टर गौतम भी इस सच से बाखबर था। यह अलग बात है कि उसने किसी को भी यह नहीं बताया।”

"कैसे बताता श्री-श्री। वह भी आखिर पुलिस के महकमे का आदमी था और फिर वह इंस्पेक्टर मदारी से बाहर नहीं जा सकता था।"

“तब तो तुम्हें यह भी मालूम होगा इंस्पेक्टर कि संजना, संदीप और गोपाल के कत्ल में मेरा ही हाथ था?"

“सरासर मालूम था श्रीमान।" मदारी ने स्वीकार किया “बस जो नहीं मालूम था, वह ये कि उन भद्रजनों के कत्ल आप क्यों कर रहे थे?"

“ओह। लेकिन अब तो तुम्हें मालूम हो गया होगा?"

“सब आपकी रहमत है भगवान।” मदारी नाटकीय स्वर में बोला “लेकिन उसके लिए मुझे बड़ी भयंकर मेहनत करनी पड़ी और आपके साथ-साथ उन तमाम लोगों के अतीत को छलनी से छानकर निकालना पड़ा, जो कि आसान नहीं था। पच्चीस-तीस साल पुराने अतीत को खंगालना आसान कहां होता है? लेकिन खैर, सब बेहतर ढंग से निकल गया और मेरी मुराद पूरी हो गई।"

"लेकिन तुमने यह उजागर क्यों नहीं किया।"

“आपका मतलब है कि आपके जिंदा होने का राज मैंने उजागर क्यों नहीं किया?"

"हां। मेरा यही मतलब था।"

“वह मैंने जानबूझकर नहीं किया था श्रीमान। दरअसल मैं यह उजागर करके आपको चौकन्ना नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था कि आप इसी गफलत में बने रहते कि आप इंस्पेक्टर मदारी को गच्चा देने में कामयाब हो गए थे। और फिर लापरवाही में आप कोई ऐसी गलती कर जाते जो मेरे हाथ आपकी गरदन तक पहुंचा देते।"

“तुम्हारा प्लान तो अच्छा था इंस्पेक्टर।” जानकी लाल की मुस्कराहट गहरी हो गई “लेकिन ऐसा हुआ तो नहीं। तुम्हारे हाथ मेरी गरदन तक पहुंच तो न पाए?"

“पुलिस के काम में देर सवेर का होना लाजिमी है श्री-श्री, क्योंकि पुलिस के पास कोई भी वन प्वाइंट प्रोग्राम नहीं होता। वैसे आप चाहें तो यकीन कर लें, आपकी गिरफ्तारी महज वक्त की बात थी। लेकिन...” उसने ठंडी सांस भरी “शुक्र है कि आप खुद ही सामने आ गए और मेरी जहमत कम हो गई।"

"तुम शायद ठीक कह रहे हो इंस्पेक्टर। चोर-सिपाही के खेल में जीत हमेशा सिपाही की ही होती है।"

“अब तो मुझे पूरा विश्वास हो गया श्रीमान कि आप अजर अमर, अविनाशी हैं और अमृत पीकर दुनिया में आए हैं।" मदारी बोला “और आपके दुश्मनों में वह ताकत नहीं है जो आपका बाल भी बांका कर सकें।" सहसा वह ठिठका, फिर वह जानकी लाल को देखता हुआ बोला “लेकिन इस बार आपके दुश्मनों का दांव बहुत जबरदस्त था, इसके बावजूद आप बच निकले. यह करिश्मा आपने आखिर कैसे किया?"

“तुम्हारा सवाल मुनासिब है इंस्पेक्टर।” जानकी लाल ने कहा "और यह सवाल हर जेहन में चीख रहा है। लेकिन शायद तुम यकीन नहीं करोगे, इस बार करिश्मा हुआ था और उसे मैंने अंजाम नहीं दिया था।"

“तो फिर उसे किसने अंजाम दिया था?"

"इत्तेफाक ने।”

"बात कुछ समझ में नहीं आयी जजमान। वह अधजली लाश आखिर किसकी थी, जो मौकाए वारदात पर आपकी कार के करीब मिली थी, और जिसे हर किसी ने आपकी लाश समझा था और जिसका आपकी लाश के तौर पर अन्तिम संस्कार भी किया गया था।

"मुझे नहीं पता।” जानकी लाल सपाट स्वर में बोला “और विश्वास करो, मैंने उसे वहां नहीं पहुंचाया था।"

"तो फिर?"

“मैंने कहा न इंस्पेक्टर, एक बहुत बड़ा इत्तेफाक था। यह सच है कि उस किलर गोपाल का वार निर्णायक था और मेरी कार दुर्घटनाग्रस्त होकर नीचे यमुना में जा गिरी थी। और यहीं से इत्तेफाक का दखल शुरू होता था, जो कि दोहरा इत्तेफाक था।"

"दोहरा इत्तेफाक?” इंस्पेक्टर मदारी के चेहरे पर सस्पेंस के भाव गहरे हो गए थे।

"नैना को तुम क्यों भूल रहे हो इंस्पेक्टर। वह भी तो आखिर उस वक्त मौकाए वारदात पर मौजूद थी और गोपाल की स्कार्पियो के बाद मेरी कार असंतुलित होकर उसकी कार से जा टकराई थी। उसके बाद ही मेरा ड्राइवर कार से अपना संतुलन खो बैठा था और वह हादसा पेश आया था।”

"मुझे याद है।” मदारी ने सहमति में सिर हिलाया “और मेरी तफ्तीश से भी यही साबित हुआ था कि नैना कजरारे का उस मामले से कोई लेना-देना नहीं था। ऐन उसी समय उनका आपके बराबर से गुजर रहा होना महज एक इत्तेफाक था। मगर दूसरा इत्तेफाक क्या था?"

“वह लाश, जो एक्सीडेंट के बाद मेरी कार के बाहर अधजली हालत में पाई गई। मुझे नहीं पता इंस्पेक्टर कि लगभग मेरे ही उम्र के शख्स की और मेरी ही कद-काठी से मिलती जुलती वह लाश अचानक वहां कैसे आ गई थी और मेरी दुर्घटनाग्रस्त कार से उलझ गई थी, जिसके बाद हालात के मद्देनजर सबने उसे मेरी ही लाश समझा था। लेकिन इस बारे में मेरी अपनी सोच यही है कि वह लाश यमुना में बहती हुई वहां आयी थी और वह उस वक्त वहां किनारे से या तो गुजर रही थी या फिर पहले से अटकी पड़ी थी। जबकि मेरी कार एक्सीडेंट होकर वहां जा गिरी और उसमें आग लग गई।"

“ओहो।” मदारी का सिर समझने वाले भाव से हिला “मगर आप...?”

“मैं पहले ही अपनी साइट के खुले दरवाजे से निकलकर पानी में जा गिरा था। वहां पानी का बहाव बहुत तेज था, जो पलक झपकते मुझे आगे पुल की तरफ बहा ले गया था। और क्योंकि उस वक्त प्रत्यक्षदर्शियों का सारा ध्यान दुर्घटनाग्रस्त कार की तरफ था इसलिए किसी की नजर मुझ पर नहीं पड़ सकी थी और मैं बहता हुआ वहां से दूर निकल गया था।"
 
“ओहो।” मदारी का सिर समझने वाले भाव से हिला “मगर आप...?” “मैं पहले ही अपनी साइट के खुले दरवाजे से निकलकर पानी में जा गिरा था। वहां पानी का बहाव बहुत तेज था, जो पलक झपकते मुझे आगे पुल की तरफ बहा ले गया था। और क्योंकि उस वक्त प्रत्यक्षदर्शियों का सारा ध्यान दुर्घटनाग्रस्त कार की तरफ था इसलिए किसी की नजर मुझ पर नहीं पड़ सकी थी और मैं बहता हुआ वहां से दूर निकल गया था।"

“क्या आपको तैरना आता है?"

"नहीं। शायद इसीलिए मैं बेहोश हो गया था। आगे ही यमुना में बीचो बीच एक मछुआरा अपनी नाव पर मछली पकड़ रहा था। वह मेरे लिए भगवान बन गया और इस तरह एक बार फिर मैं अपनी निश्चित मौत को धोखा देने में कामयाब हो

गया।"

मदारी विस्मित सा होकर जानकी लाल को बस देखता ही रह गया था। वह सचमुच एक अकल्पनीय घटना थी, जिस पर सहज ही विश्वास करना मुमकिन नहीं था।

“मेरी हालत थोड़ी नाजुक हो गई थी।” जानकी लाल पुनः बोला “और मुझे स्वस्थ होने में चौबीस घंटे लग गए थे। इस दरम्यान उस मछुआरे ने मुझे अपनी झोपड़ी में ही रखा था,

काँटा जो कि यमुना के करीब ही थी और उसने मेरे बारे में पुलिस को कुछ नहीं बताया था। उसके बाद फिर जब मैंने अखबारों में अपनी मौत की खबर और उसकी डिटेल पढ़ी तो समझ ही सकते हो इंस्पेक्टर मेरी क्या हालत हुई होगी।”

“तो फिर आपने उसी समय सामने आकर उस खबर का खंडन क्यों नहीं किया?"

“मैं बेवकूफ नही था इंस्पेक्टर। अपने दुश्मनों को उनके मुकाम तक पहुंचाने का वक्त ने मुझे इतना मुफीद मौका दिया

था, जिसे मैं अपना राज फाश करके हरगिज भी नहीं गंवा सकता था।"

“वह कैसे?”

“अपने दोस्तों ही नहीं, अपने दुश्मनों की निगाह में मैं खत्म हो चुका था और वे मेरी तरफ से लापरवाह हो चुके थे। और सभी जानते हैं इंस्पेक्टर कि दुश्मन अगर लापरवाह हो तो उसे उसके अंजाम तक पहुंचाना बहुत आसान होता है।”

"म..मैं समझ गया भगवान मैं सब समझ गया।” मदारी के चेहरे पर समझने वाले भाव आ गए थे। वह गहरी सांस छोड़ता हुआ बोला “मगर...।"

“सवाल अभी बहुत हैं इंस्पेक्टर।” जानकी लाल ने मदारी का वाक्य बीच में ही काट दिया था। वह अपने अल्फाजों पर जोर देता हुआ बोला “लेकिन यह बात अब तुम्हारी समझ में आ गई होगी कि अजय, जतिन और मेरी पहली बेटी कोमल को अब भी तुम्हारा लॉकअप में रखना मुनासिब नहीं है। बेहतर होगा कि तुम उनकी रिहाई का बंदोबस्त करो और उन तीनों को यहीं बुला लो।”

“मेरा भी कुछ ऐसा ही ख्याल है श्रीमान। मगर...।"

-

-

-

“हुज्जत का कोई मतलब नहीं है इंस्पेक्टर।” जानकी लाल ने फिर उसे बोलने नहीं दिया था “और मेरी नियत पर कोई संदेह मत करो। मैं खुद चलकर तुम्हारे पास आया हूं और मेरा यहां से फरार होने का कोई इरादा नहीं है। मैं पूरी तरह से तुम्हारे हवाले हूं और अपना इकबाले जुर्म भी कर रहा हूं।"

"अरे नहीं श्रीमान।” मदारी उछलकर बोला “मुझे आप जैसे महापुरुष की नियत पर कोई संदेह नहीं है। मैं अभी उन तीनों भद्रजनों को आपके सामने पेश करता हूं।" ।

“शुक्रिया इंस्पेक्टर। लेकिन उनके अलावा भी कुछ और लोग हैं जिनको मैं देखना चाहता हूं, और उम्मीद करता हूं कि तुम मेरी इस ख्वाहिश पर ऐतराज नहीं करोगे?"

“आप जैसे प्रतिभावान महापुरुष की ख्वाहिश पर तो ऐतराज का सवाल ही नहीं उठता जजमान।” मदारी तपाक से बोला “आप मुझे केवल उनके शुभ नाम बताएं जिन्हें आप यहां देखने की ख्वाहिश रखते हैं।"

जानकी लाल ने कुछ पलों की खामोशी के बाद उसे बता दिया।

इंस्पेक्टर मदारी और जानकी लाल के अलावा उस वक्त हॉल में अजय, जतिन और कोमल भी मौजूद थे।

थोड़ी देर पहले ही वहां रीनी और नैना भी पहुंच गई थीं। नैना के साथ ही जानकी लाल ने प्राची उर्फ आलोका को भी वहां बुलाया था, जो कि आनन-फानन वहां पहुंचे थे।

और फिर इंस्पेक्टर मदारी के साथ जीते-जागते जानकी लाल को सामने बैठा देखकर हक्के-बक्के रह गए।

मारे अविश्वास के उनके नेत्र फट पड़े। जिस्म का रोया-रोयां खड़ा हो गया था। वह आंखें फाड़े इस तरह जानकी लाल को देखने लगे थे, जैसे कि दुनिया का आठवां अजूबा देख रहे हों।

जो कुछ वे देख रहे थे उस पर उन्हें यकीन करना मुश्किल हो गया और वे अपनी-अपनी जगह पर जड़ हो गए थे जिस्म में एक अजीब सी सनसनी दौड़ती चली गई।

वह केवल रीनी थी जिसकी सनसनी में उत्तेजना भी शामिल थी एक अंजानी और विचित्र सी हर्षमिश्रित उत्तेजना।

“प....पापा।" फिर एकाएक उसके होंठों से चीख सी निकली और वह दौड़कर जानकी लाल से जा लिपटी “आ...आप जिंदा

जानकी लाल ने उसे कसकर अपनी बाहों में भींच लिया। उसने रीनी के समूचे जिस्म पर कम्पन महसूस किया था।

"हां मेरी बच्ची।" जानकी लाल उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फिराता हुआ मुस्कराकर बोला “तेरा पापा जिंदा है, और बहुत सख्त जान है। उसकी जान लेना उसके दुश्मनों के वश की बात नहीं है।”

"लेकिन पापा...।" रीनी तत्क्षण उससे अलग हुई और खुशी से छलछलाते लहजे में बोली “यह करिश्मा कैसे हुआ? मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा। पता है आपके लिए मैं कितना जार-जार रोई हूं।"

"मुझे सब मालूम है बेटी।” जानकी लाल ने उसके बालों में हाथ फिराया। उसके स्वर में एकाएक ममता उमड़ आयी थी।

“त...तो फिर आपने ऐसा क्यों किया? क्यों आप मुझसे दूर चले गए थे। अ...और...।" एकाएक उसका खिला चेहरा मुरझा गया, उस पर क्रोध और उत्तेजना की घटाएं घिर गईं।

“और क्या मेरी नन्ही परी?" जानकी लाल ने उसे प्रश्नसूचक नेत्रों से देखा।

“आ...आपको कुछ पता भी है इस बीच मेरे साथ क्या हुआ?" रीनी अपनी सिसकी को रोक नहीं सकी थी “व...वह कमीना संदीप। वह...।"

“मुझे सब मालूम है पगली।” जानकी लाल उसकी बात काटता हुआ बोला “और यह तो मुझे बहुत पहले से मालूम था कि तेरा संदीप कितना कमीना है। लेकिन तूने ही कभी अपने पापा पर विश्वास नहीं किया।"

“आ... ऑय एम सॉरी पापा।"

“डोंट माइंड माई डॉल। वह कमीना इंसान आज अपने अंजाम को पहुंच गया है।"

“ह...हां। यह तो खैर आपने ठीक कहा मगर..." रीनी ने फिर अपलक जानकी लाल को देखते हुए वह सवाल पूछा जो मदारी को छोड़कर हर किसी के चेहरे पर लिखा था “यह सब

आखिर क्या है? यह चमत्कार कैसे हो गया?"

जानकी लाल की नजरें मदारी से टकराईं। वह बदस्तूर मुस्कराता हुआ बोला “इस सवाल का जवाब तुम्हें इंस्पेक्टर मदारी से मिल जाएगा।"

रीनी समेत सभी की निगाहें मदारी की ओर उठ गई थीं।

मदारी ने ठंडी सांस भरी, फिर थोड़ा ठहरकर उसने सबको जानकी लाल की आपबीती सुना दी।

वह सभी एक बार फिर विस्मित हो उठे।

“म...मगर आपने ऐसा क्यों किया पापा?” फिर सबसे पहले वह सवाल रीनी ने किया था “आपने अपना सच क्यों सबसे छिपाया?"

"अगर मैं ऐसा नहीं करता तो तुझे उस संदीप का असली चेहरा कैसे नजर आता मेरी बच्ची, जिसे तू अपना पति परमेश्वर समझती थी, मगर जो कितने बड़े शैतान का चेहरा था। और फिर उसे उसकी शैतानियत की सजा भी तो देनी थी।"

"इ..इसका मतलब संदीप को गोली आपने ही मारी थी?"

“और मैं क्या करता? अगर उस वक्त मुझे जरा सी भी देर हो जाती तो मेरी यह बेटी आज दुनिया में नहीं होती।"

“व..वह सचमुच बहुत बड़ा शैतान था।"
 
“आई नो माई चाइल्ड। लेकिन यह बात तब तेरे समझ में कहां आई थी। और अकेले तू ही क्यों...।" उसने एकाएक घूमकर कोमल को देखा “तेरी यह बहन भी तो तेरे ही जैसी नादान और भोली है। इसने भी उस कमीने को कब समझा

था। इसे भी तो उस वक्त खलनायक मैं ही नजर आता था। और म..मैं केवल तड़पकर रह जाता था।"

कुछ कहने के लिए कोमल के लब कांपे, लेकिन उसकी आवाज बाहर न निकल सकी।

"और यह समझती भी क्यों नहीं, मैं तो इसका सौतेला बाप था, एक जलील इंसान था, जिसने अपनी सगी बेटी का घर बसाने के लिए अपनी सौतेली बेटी का सिन्दूर उजाड़ दिया।"

“म...मुझे माफ कर दीजिए।” कोमल का चेहरा पश्चाताप की असंख्य लकीरों से भर गया। वह रुआंसी सी होकर बोली "मुझे सच पता चल गया है। आप संदीप को हम दोनों में से किसी के भी सुहाग के रूप में देखना नहीं चाहते थे, लेकिन

रीनी की ममता ने आपको मजबूर कर रखा था। और वह सब आपका नाटक नहीं था। आ...आप सचमुच संदीप और रीनी का तलाक कराकर रहने वाले थे। आय'म एम वैरी सॉरी पापा।"

“प...पापा।” जानकी लाल ने चौंककर उसे देखा। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गए थे। वह जरा हंसकर बोला “आज पहली बार मेरी इस बेटी ने मुझे पापा कहा है। म...मैं निहाल हो गया। काशः तुझे अहसास होता तेरे होंठों से अपने लिए यह सम्बोधन सुनने को मैं कितना तरसा हूं। एक बार फिर मुझे पापा कहो।”

“ऑय एम रियली सॉरी पापा।"

“यह सच है बेटी कि तेरा यह पापा बहुत खराब इंसान है।"

जानकी लाल एक आह भरकर बोला “जिसके गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है और जिसके दामन पर आज भी प्रबीरदास और निमेषदास के बरसों पुराने खून के धब्बे दिखाई देते हैं, और खुद तू भी मेरी एक नाइंसाफी की निशानी है। हालात भले ही कुछ भी रहे हों पगली, लेकिन सच हर हालात में सच ही रहता है और तेरा सच यह था कि तू मेरा खून थी। जिस पर ज्यादती का हौसला तो शैतान भी नहीं जुटा सकता, फिर मैं तो एक इंसान हूं, तेरा अपना खून हूं।"

कोमल की आंखें नम हो गईं। वातावरण में खामोशी छा गई। फिर मदारी ने धीरे से खंखारकर अपना गला साफ किया।

"चलो, एक गुत्थी तो हल हुई।” फिर वह खामोशी को भंग करता हुआ बोला “अब दूसरी पर आइए जजमान और यहां मौजूद बाकी किरदारों की धुंध से भी चादर हटाइए।"

“उसमें कोई चादर अब कहां बची है इंस्पेक्टर।" जानकी लाल बारी-बारी से अजय, जतिन नैना और प्राची उर्फ आलोका पर निगाह डालता हुआ बोला “सबको सब कुछ तो मालूम हो

चुका है। इन सभी ने आपस में अपने नोट्स शेयर करके सब जान लिया है। वह सब जो...।” उसने फिर मदारी को देखा “तुम पहले ही जान चुके हो। अगर मैं उस वक्त गोली न चलाता तो वह शातिर लड़की संजना इस जतिन की जान ले लेती। या फिर यह खुद उसके खून से अपने हाथ रंग डालता।"

“यह तो खैर आपने ठीक कहा जजमान।" मदारी बोला "तो क्या आपने महज इसी लिए संजना श्रीमती का काम तमाम कर दिया?"

“नहीं इंस्पेक्टर। इसके अलावा भी कई वजह थीं। संजना लड़की नहीं एक जहरीली नागिन थी, ऐसी विषकन्या थी, जो अपने हसीन हुस्न से किसी को भी डस सकती थी। सबसे बड़ी बात, वह मेरे करीबी दुश्मन सुमेश सहगल के पिटारे में थी और जो मेरे और मेरी कंपनी के खिलाफ उसका बहुत खतरनाक इस्तेमाल कर रहा था, और आइंदा उससे ज्यादा भयावह इस्तेमाल का इरादा रखता था।"

“लिहाजा उस श्रीमती की मौत अवश्यम्भावी थी?"

"तुमने ठीक कहा इंस्पेक्टर। इस जतिन ने मेरे साथ जो किया, अगर इसकी जगह मैं होता तो मैं भी यही करता। मेरे लिए इसकी नफरत जायज है, आखिर मैं इसके पिता और अपने जिगरी दोस्त सौगत की मौत का जिम्मेदार हूं, जिसने मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेरे हर अच्छे-बुरे काम में जी जान से मेरा साथ दिया और इसके लिए मुझे माफ नहीं किया जा

सकता। मगर इस सारे बखेड़े में एक सच ऐसा भी है जो यह नहीं जानता।"

“और यह सच क्या है श्रीमान?” मदारी ने सस्पेंस भरे स्वर में पूछा। जतिन व अन्य लोगों के चेहरों पर भी कौतूहल के भाव आ गए थे।

“यह सच सौगत से ही ताल्लुक रखता है इंस्पेक्टर।" जानकी लाल ने बताया “और वह ये है कि अंततः सौगत पर भी लालच हावी हो गया था और प्रबीरदास की सारी सम्पत्ति पर वह अकेले काबिज होना चाहता था। इसके लिए उसने मेरे साथ-साथ सरला को ठिकाने लगाने का इंतजाम सोच लिया था। अगर मैं समय रहते उसे ठिकाने नहीं लगता तो उसने अकेले मुझे ही नहीं, मेरी पत्नी और रीनी की मां सरला

को भी ठिकाने लगा दिया होता।"

“न...नहीं...।” जतिन प्रतिरोध भरे स्वर में बोला “यह सच नहीं है। तुम झूठ बोल रहे हो?"

“फिलहाल जिस मुकाम पर मैं खड़ा हूं वहां मुझे झूठ बोलने की कोई जरूरत नहीं है बरखुरदार। जरायम की दुनिया ऐसी ही होती है, जहां कोई दीन-ईमान नहीं होता। जहां केवल हवस और स्वार्थ का ही दखल होता है। मगर...।” उसकी निगाहें अजय की ओर उठीं “असली मुजरिम तो मैं इस लड़के का हूं, जो निमेष का बेटा और प्रबीरदास का पोता है और जो अपने साथ हुई नाइंसाफी को लेकर तिल-तिल सुलग रहा

अजय केवल उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर एक ही पल में न जाने कितने रंग आकर चले गए थे।
 
"और इसीलिए मेरा यह मुमकिन प्रयास था कि इनमें से किसी के साथ भी दोबारा कोई नाइंसाफी न होने पाए।" जानकी लाल कहता गया “इनमें से किसी का भी हाथ खून से न रंगने पाए, फिर चाहे वह कोई संजना हो या जानकी लाल । क्योंकि कत्ल की बहुत भयानक सजा होती है। और अकेले कोमल ही नहीं, यह दोनों भी पहले जिसकी कोशिश कर चुके थे।"

"क...कत्ल की?"

“हां इंस्पेक्टर। यह दोनों मेरे कत्ल की कोशिश कर चुके थे। जरा मेरे ऊपर सबसे पहले हुए दोनों जानलेवा हमले को याद करो, जिसमें पहली मेरी कार के ब्रेक फेल करके और दूसरी कोशिश मेरी कोल्ड ड्रिंक में जहर मिलाकर हुई थी।"

“आ...आपका मतलब है कि वह दोनों कोशिश...।" मदारी झटका सा खाकर बोला “इन्हीं दोनों महापुरुषों ने की थी?"

"हां इंस्पेक्टर। वह काम इन्हीं दोनों का था। लेकिन मुझसे ज्यादा इन दोनों की खुशकिस्मती कि दोनों ही बार यह दोनों नाकाम हो गए और मैं जिंदा बच गया। यह सच है कि वह गुत्थी बेहद उलझी हुई थी और तुम भी पता नहीं लगा पाए थे कि यह किसका काम है?"

"लेकिन आपने पता लगा लिया था?"

अजय और जतिन हकबकाए से जानकी लाल का एक-एक शब्द सुन रहे थे।

“तुमने ठीक कहा इंस्पेक्टर।” जानकी लाल बोला “मैंने अपने जरिए से यह मालूम कर लिया था कि यह काम इन्हीं दोनों का था। और यह जानने के बाद मैं हैरत में पड़ गया था कि इन दोनों ने आखिर यह हिमाकत क्यों की थी? बहरहाल, यह दोनों मेरी कंपनी के मुलाजिम थे और कंपनी में काफी अच्छे ओहदे पर थे। इसके बावजूद इन लोगों ने यह हरकत क्यों की थी?"

“आपने इन लोगों की खबर नहीं ली थी?"

"हरगिज भी नहीं इंस्पेक्टर। अपने दुश्मन को खबरदार करना मेरी फितरत नहीं है। मैंने तो इन्हें भनक भी नहीं लगने दी कि इनकी वह करतूत मुझ पर फाश हो चुकी थी।"

“तो फिर आपने क्या किया?"

“मैंने मामले की तह तक जाने का फैसला किया। और फिर उसी रोज से मैंने इनकी निगरानी का बंदोबस्त कर दिया।

और..."

“और आपके उसी बंदोबस्त ने आपको अंततः इनके अतीत में पहुंचा दिया।” मदारी ने जानकी लाल की बात पूरी कर दी "जिसके तार आपके अपने अतीत से जुड़े थे बरसों पहले अंजाम दिए गए उन गुनाहों से जुड़े थे, जिन्हें आप भूल चुके थे।"

“यह सच है इंस्पेक्टर।" जानकी लाल ने निःसंकोच कबूल किया “मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरे अतीत के गुनाह अब जवान हो चुके थे और आज मुझे डंसने के लिए मेरे दरवाजे पर पहुंच चुके थे। तुम सोच भी नहीं सकते इंस्पेक्टर कि उस वक्त मेरी क्या हालत हुई होगी।"

सभी की निगाहें जानकी लाल पर ही टिकी थीं। अजय और जतिन अवाक से सुन रहे थे।

“फिर आपने क्या किया भगवान?” मदारी ने अपने अंदाज में पूछा।

“मैं उस वक्त एक जबरदस्त अंतर्द्वद में फंस गया था इंस्पेक्टर

और उन हालात में मुझे क्या करना था, यह फैसला करने में, तुम यकीन नहीं करोगे इंस्पेक्टर, मुझे पूरा एक महीना लग गया।"

“ए...एक महीना। यह सचमुच बहुत ज्यादा वक्त था, लेकिन खैर आपका फैसला क्या था? वैसे आपके लिए इन दोनों को भी ठिकाने लगवा देना कोई ज्यादा मुश्किल तो नहीं था?"

“यह भी सच है इंस्पेक्टर। यह मेरे लिए ज्यादा मुश्किल नहीं था। लेकिन यह भी सच है कि मैं अभी पूरी तरह शैतान नहीं बना था। मेरे अंदर का इंसान अभी जिंदा था, जो मेरे अंदर के शैतान की गिरफ्त में सिसक रहा था और जिसने मुझे पूरा शैतान नहीं बनने दिया।"

“और आपने इन दोनों को ठिकाने लगाने का इरादा मुल्तवी कर दिया?”

"हां। केवल इतना ही नहीं, मैंने मन ही मन यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि मैं इन दिलजलों पर कोई आंच नहीं आने दूंगा। इनकी तरफ बढ़ने वाली हर मुसीबत के लिए फानूस बन जाऊंगा। मेरे गुनाहों के प्रायश्चित के लिए इससे बेहतर मौका दूसरा नहीं हो सकता था।” ।

“और उस तरह आपने हाथों में बंदूक उठाकर प्रायश्चित शुरू कर दिया। संजना, संदीप, सहगल और गोपाल, सबको...।”

“सहगल नहीं इंस्पेक्टर..." जानकी लाल ने उसे टोक दिया “सहगल का कातिल गोपाल है, और वह दोनों ही पुराने मुजरिम थे। उसका कत्ल मैंने नहीं गोपाल ने किया था। मगर गोपाल का कत्ल मेरे हाथों हुआ है, और सहगल की असलियत अब तुम्हें पता चल चुकी होगी?"

"सत्य वचन भगवान।"

“अगर कोई सवाल बाकी हो तो तुम बेहिचक पूछ सकते हो।” “मदारी के सवालों का पिटारा तो पूरी तरह खाली हो चुका है

श्रीमान। फिर भी एक सवाल खदक रहा है।"

"वह क्या?"

“मर्डर वैपन कहां है?"

जानकी लाल ने एक क्षण सोचा फिर उसने बिना किसी हुज्जत के अपनी जेब से निकालकर एक रिवॉल्वर मदारी की मेज पर रख दिया।

मदारी ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर रिवॉल्वर पर डाला, फिर उसने उसे उठाकर उसका मुआयना किया।

वह एक अड़तालीस कैलीबर का रिवॉल्वर था। मदारी का सिर संतुष्टिपूर्ण भाव से हिला।

“बस एक आखिरी सवाल और भगवान।” वह जानकी लाल से बोला।

“वह भी पूछो।”

“आपने इन दोनों श्रीमती को यहां क्यों बुलाया?” मदारी का इशारा नैना और प्राची की तरफ था।

“अभी समझ में आ जाएगा।"

जानकी लाल खामोश हुआ तो हाल में पैना सन्नाटा छा गया।

उस तमाम रहस्योद्घाटन ने हर किसी को हिलाकर रख दिया था और अजय व जतिन की लाइन में अब रीनी भी आ खड़ी हुई थी।

और उस लाइन में उसके किरदार का बहुत गहरा दखल था। जानकी लाल की वह सारी ज्यादती उसकी मां के परिवार के साथ हुई थी। उसका पिता रीनी के माता-पिता और भाई का हत्यारा था और उसने महज दौलतमंद बनने के लिए उनके साथ मौत का वह खेल, खेला था। लेकिन साथ ही एक बड़ा सच यह भी था कि एक पिता के रूप में जानकी लाल का किरदार बहुत बुलंद और यादगार था। जिसने अपना हर फर्ज निभाया था और आज अगर वह जिंदा थी तो उसका श्रेय भी

उसके पिता को ही जाता था।

जानकी लाल की तजुर्बेदार निगाहों से उसकी वह मनः स्थिति छुप न सकी थी।

“मैं तेरा भी उतना ही मुजरिम हूं बेटी जितना अजय और जतिन का।” वह रीनी को देखता हुआ बोला “और उसके लिए मुझे तेरी हर सजा मंजूर है। लेकिन भूलकर भी कभी मेरे

दर के पिता पर संदेह मत करना बेटी। संदीप इसलिए भी सजा का हकदार था क्योंकि वह मेरा इतिहास दोहराने की कोशिश कर रहा था। जैसे कभी मैंने तेरी मां सरला को ढाल बनाकर अपनी कामयाबी का इतिहास रचा था, वैसे ही वह भी तेरा इस्तेमाल करके अपनी कामयाबी का रास्ता बनाना चाहता था।"
 
रीनी कुछ नहीं बोली केवल टकटकी बांधे उसे देखती भर रही। “तू भले ही अपने हाथों से मुझे गोली से उड़ा देना बेटी।"

जानकी लाल उससे बोला “लेकिन मेरे जीते जी मुझे मेरे पिता होने का अधिकार कभी मत छीनना, वरना शायद वह मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा।"

“ए....ऐसा... कभी नहीं होगा पापा।” रीनी अपने जज्बातों को रोक न सकी। वह एक बार फिर अपने पापा से लिपट गई

और फूट-फूटकर रोती हुई बोली “दुनिया की कोई भी ट्रेजडी इस सच को नहीं बदल सकती कि आप मेरे लिए सबसे अच्छे पापा हैं और मुझे लेकर आपके सारे अधिकार आपके पास

"शुक्रिया मेरी बच्ची।” जानकी लाल गदगद होकर बोला फिर उसने रीनी को अपने से अलग किया और वह जतिन के करीब पहुंचा।

“मुझे नहीं पता जतिन, मुझे लेकर इस वक्त तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है।” वह पहली बार सीधे उससे ही मुखातिब हुआ था “मझे यह भी नहीं पता कि तमने मझे माफ किया अथवा नहीं, फिर भी इतना जरूर जान लो, गलतियां हर किसी से होती है गुनाह हर कोई करता है, लेकिन अपने गुनाहों के लिए प्रायश्चित कितनों में जागता है। और फिर सौगत भी तो

उतना ही बडा गुनाहगार था जितना कि मैं हं।"

“आ...आपने मेरी सारी शिकायतें दूर कर दी सर।” जतिन कम्पित स्वर में बोला। उसके स्वर में अफसोस स्पष्ट झलक रहा था “अब मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। मैं शायद भूल गया था कि मैं भी एक मुजरिम का ही बेटा हूं। मगर आपने मुझे मुजरिम बनने से बचा लिया।"

"फिर भी शुरूआत तो मैंने ही की थी, इसलिए अंत भी मुझे ही करना होगा। एक बार मैंने ही तुम्हारी दुनिया उजाड़ी थी,

आज मैं इसे अपने हाथों से बसाना चाहता हूं।"

“म...मैं आपको मतलब नहीं समझा सर।"

“देश की इस राजधानी में रोजी ढूंढना आसान है लेकिन जीवनसाथी ढूंढना बहुत कठिन है।” जानकी लाल ने कहा “यहां कदम-कदम पर संजना जैसी विषकन्याएं भरी पड़ी हैं जो दौलत और हवस के लिए किसी के भी जज्बात का खून कर सकती हैं। मेरी बेटी रीनी भले ही विधवा है, लेकिन इसे पाकर कोई भी गर्व कर सकता है। मेरे बाद मेरा सब कुछ इसी का है और इसे मैं आज तुम्हारे हवाले करता हूं। क्या तुम इसे स्वीकार करोगे?"

जतिन हक्का-बक्का रह गया। अकेले जतिन ही नहीं, उसके इस फैसले ने सभी को चौंकाया था। उनके चेहरों पर आश्चर्य के भाव आ गए।

वह केवल रीनी ही थी जो चुपचाप खड़ी थी। उसका चेहरा पहले की तरह ही एकदम सपाट और भावहीन था।

“म....मगर यह कैसे हो सकता है सर?" जतिन चकित होकर बोला। "क्यों नहीं हो सकता?"

“म..मैं इस लायक नहीं हूं सर। म...मेरी हैसियत इतनी बड़ी नहीं है?”

“यह सोचना मेरा काम है।"

“म...मगर...।" जतिन जबरदस्त असमंजस में पड़ गया था। वह रीनी की ओर देखता हुआ बोला “पहले एक बार अपनी बेटी की मर्जी भी तो जान लीजिए सर।"

“इस मामले में मेरी बेटी का तजुर्बा बहुत खराब रहा है बरखुरदार, इसलिए मुझे उसकी मर्जी पूछने की कोई जरूरत नहीं है।"

जतिन की निगाह फिर रीनी से मिली। फिर उसने अपना चेहरा झुका लिया, जो कि उसकी मौन स्वीकृति था।

“शुक्रिया बेटे।” जानकी लाल गदगद होकर बोला “तुमने मेरा दिल का बोझ कम कर दिया।"

फिर वह अजय की ओर पलटा जो स्लेट की तरह सपाट चेहरा लिए उसे ही देख रहा था।

“अब मेरे पास ऐसा कुछ नहीं बचा अजय बेटे, जो तुम्हारे लायक हो।” जानकी लाल खाली-खाली नजरों से उसे देखता हुआ बोला “लेकिन मेरे अलावा भी कोई और है जिसने

तुम्हारे साथ जुल्म किया है, और उसका नाम वक्त है, जिसने पहले ही तुम्हारा आबाद परिवार, उसके बाद तुम्हारी आलोका

और जिंदगी की आखिरी आस को भी छीन लिया।"

उसके शब्दों की अजय पर फौरन प्रतिक्रिया हुई थी। अजय के चेहरे के भाव एकदम से चेंज हुए थे। उस पर एक लहर सी आकर गुजर गई थी।

“तुमने सचमुच वक्त के सितम को बर्दाश्त किया है।" जानकी लाल आगे बोला “लेकिन मत भूलो मेरे बच्चे, वक्त ही जख्म देता है और वक्त ही उन जख्मों का मरहम बनता है। और आज वही वक्त खुद तुम्हारा मरहम लेकर तुम्हारे पास आया है। उस लड़की को देख रहे हो?"
 
अजय की निगाह तत्काल उसकी बताई हुई दिशा में प्राची की तरफ उठी उस प्राची की तरफ जो असल में आलोका थी और जो इतनी मुद्दत के बाद अजय के सामने आयी थी।

मगर कैसी विडम्बना थी कि अजय ने एक बार नजर उठाकर भी उसे नहीं देखा था। उस लड़की को नहीं देखा था जो उसकी जिंदगी का एक मकसद थी और जो उसके ख्वाबों की रूमानी ताबीर थी। न ही उसने उसे पहचाना था।

पहचानता भी जो कैसे? अब उसके पास आलोका का वह चेहरा था ही कहां जो उसकी रग-रग में समाई थी और जो हमेशा अपने कल्चर में यकीन रखती थी। जो सलवार-सूट

जैसी पारंपरिक पोशाक ही पहनती थी, जिसने जींस-टॉप जैसी पारंपरिक पोशाक का कभी समर्थन नहीं किया, लेकिन जो अब केवल वही वैस्टर्न कल्चर वाली पोशाक ही पहनती थी

और उस वक्त भी उसने जींस ही पहन रखी थी।

उसके मस्तक पर अठखेलियां करने वाली बालों की आवारा लट भी न जाने कहां गायब थी, जिसे वह अक्सर फूंक मारकर यथास्थान पहुंचा देती थी। और फिर खुद वह चंचल तितली आलोका भी अब कहां रही थी। कितना कुछ बदल

गया था उसकी जिंदगी में।

सब कुछ बदल गया था।

जानकी लाल का अनुसरण करती अजय की निगाह उस पर फोकस हुई। आलोका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

मगर उफ्फ!

अजय के चेहरे पर पहचान के एक भी तो भाव नहीं आए थे। उन्हीं अजनबी निगाहों से उसे एक नजर देखकर वह पुनः जानकी लाल को देखने लगा था।

"लगता है तुम्हें कुछ भी याद नहीं आया बरखुरदार।" उसकी मनोदशा को समझता जानकी लाल बोला ।

अजय ने इंकार में सिर हिलाया।

“अभी याद आ जाएगा।” जानकी लाल इत्मिनान से बोला। फिर उसने आलोका को अपने करीब आने का इशारा किया।

आलोका हिचकिचाई। उसका दिल एक बार फिर जोर से धड़का। वह जानकी लाल के करीब पहुंचकर ठिठक गई।

अब वह और अजय आमने सामने थे।

“वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है मेरे बच्चो।" जानकी लाल अजय को देखता हुआ बोला “वक्त की आंधी कभी-कभी इंसान के नाम और उसकी पहचान को ही नहीं, उसके असली चेहरे को भी उड़ा ले जाती है, लेकिन फिर भी कुछ बच जाता है। इसे गौर से देखो, शायद तुम्हें कुछ याद आ जाए।"
 
अजय ने उन शब्दों की गहराई को महसूस किया और फिर अनायास ही उसकी निगाहें प्राची के चेहरे पर जाकर स्थिर हो गईं।

उसने उसकी आंखों में गहराई तक झांका। अगले पल उसके चेहरे पर भूकम्प के भाव आए। एक जाना-पहचाना अहसास उसकी सांसों में उतरता चला गया। उसने प्राची को पहचानने में पलभर भी नहीं लगाया।

“आ..आलोका।” वह शब्द खुद ही उसके होठों से फिसल गया था।

“देखा बरखरदार।” जानकी लाल जैसे चैन की लम्बी सांस लेता हुआ बोला “मैंने कहा था न कि शायद तुम्हें याद आ जाए। देख लो क्या खूब याद आया है और क्या खूब याद आया है। मुबारक हो। यही तुम्हारी आलोका है। और...।" वह आलोका से मुखातिब हुआ “तुम्हें तो कुछ बताने की

जरूरत नहीं है बेटी फिर भी तुम्हें याद दिलाता हूं। मैंने अपना वादा निभाया और तुम्हारी जिंदगी का मकसद मैंने तुम्हें दे दिया।अब अपने इस जेंटलमैन को संभाल कर रखना।"

भावावेश के अतिरेक में आलोका के होंठे बरबस कांप उठे। उसने कुछ कहना चाहा लेकिन कामयाब न हो सकी।

“म...मगर यह कैसे हो सकता है?” अजय जींस और टॉप में कसी आलोका को सिर से पांव तक देखता हुआ हक्का-बक्का सा होकर बोला “यह मेरी आलोका कैसे हो सकती है।"

“नहीं होना चाहिए था। लेकिन मैंने अभी कहा न कि...।" जानकी लाल ने उसे आश्वस्त किया “हालात बहुत कुछ बदल देते हैं। इसे भी हालात ने अपना शिकार बना डाला।"

"ल...लेकिन..."

जानकी लाल ने उसे आलोका की आपबीती सुना दी उसकी जिंदगी का सारा दर्दनाक सच बयान कर दिया, जिसे सुनकर

वहां मौजूद शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आंखें नहीं डबडबाई थीं।

“तुम्हें देने के लिए इसके अलावा मेरे पास और कुछ भी नहीं है यंगमैन ।” आखिरकार जानकी लाल अजय से बोला “साथ ही मेरी यह दुआ है कि आइंदा कोई गम तुम्हारी जिंदगी में न आने पाए। इसके बावजूद मुझे न माफ करने का तुम्हें पूरा हक होगा और तुम्हारी हर सजा मुझे खुशी-खुशी कबूल होगी।"

अजय ने आहिस्ता-आहिस्ता अपना चेहरा उठाया और जानकी लाल को देखा। एक बहुत बड़ा तूफान आकर गुजर गया था। उसकी दुनिया उजाड़ने वाले ने ही आज उसकी दुनिया बसाई थी।

अगर जानकी लाल न होता तो उसकी आलोका भी जिंदा नहीं होती। वह अपने आपको मिटा चुकी होती।

वह कल तक जिसके खून का प्यासा था, आज वह कितना बदल गया था। हालात ने कितना बदल दिया था।

अजय जज्बाती हए बिना न रह सका था।

"अभी आपने ही कहा सर कि वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है।” वह अपने होंठ काटता हुआ बोला “देख लीजिए वक्त ने कैसे सब कुछ बदल दिया। फिलहाल मैं इतना ही कह सकता हूं, दुश्मन अगर आप जैसा होता है तो मेरे सारे दोस्त भी दुश्मन हो जाएं।"

“शुक्रिया मेरे बच्चे।” जानकी लाल के चेहरे पर सुकून फैल गया “तुमने मुझे माफ कर दिया, आज मैं बहुत खुश हूं। लेकिन एक बात मैं जरूर कहना चाहता हूं।"

अजय के चेहरे पर सवालिया निशान उभरे।

“तुम्हारे प्यार को मिलाने का सारा श्रेय अकेले मुझे ही नहीं जाता। इस फ्रंट पर कोई और भी है जिसका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। और अगर उसने कुर्बानी नहीं दी होती तो

आज मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाती।"

“आ...आप किसकी बात कर रहे हैं सर? वह कौन है?"

“वक्त आने दो बेटे, खुद-ब-खुद मालूम हो जाएगा।"

सबसे अंत में जानकी लाल नैना की ओर पलटा तो उसे नैना के चेहरे पर एक हलचल नजर आयी, जो लगभग फौरन ही लुप्त हो गई।

“वैसे तो मैंने तुम्हें सिवाय तड़प के और कुछ भी नहीं दिया नैना।” जानकी लाल भरे कंठ से बोला “लेकिन अगर कर सको तो यह विश्वास कर लेना कि मैंने आलोका को किसी गलत इरादे से तुम्हारे पास नहीं भेजा था। अगर ऐसा होता तो आलोका के जरिये मुझे तुम्हारे हर मूवमेंट की खबर थी और मैं तुम्हें हर कदम पर मात दे सकता था, मगर मैंने ऐसा नहीं किया। मैं तो बस हमेशा अपना बचाव करता आया था और कभी जानबूझकर मात भी खा जाता था ताकि तुम्हारा हौसला गिरने न पाए तुम्हारी तरक्की रुकने न पाए।”

“म...मैंने तो तुम पर कभी अविश्वास नहीं किया जानकी ।” नैना का स्वर द्रवित हो गया था “वह तो केवल तुम्हीं थे जो कभी मुझ पर विश्वास न कर सके। फि..फिर भी अगर तुमसे

मुझे कोई शिकायत थी तो आज तुम्हारे इस नये रूप ने उसे

धो दिया और आज मेरी नजरों में तुम्हारा कद बहुत बढ़ गया है बहुत ज्यादा।"

“तो फिर मुझे एक वचन दोगी?"

“अगर तुमने मेरी जिंदगी भी मांगी तो इसी समय दे दूंगी?" “मुझमें अब और पाप करने का हौसला नहीं है नैना। मुझे

पता है

तुम्हारी यह मांग आज भी सूनी क्यों है? क्योंकि तुम आज भी मुझे अपनी मांग का सिंदूर मानती हो। मैं तो तुम्हें तुम्हारा हक न दे सका लेकिन तुम्हें मेरा हक मुझे देना ही होगा।"

“तुम म...मुझसे क्या चाहते हो जानकी?”

“मेरी यह बेटी कोमल भी रीनी की तरह ही भोली है, और यह बदकिस्मत अब दुनिया में बिल्कुल अकेली है। इसे इसकी मां के हिस्से का प्यार दे देना इसे अपनी छत्रछाया में ले लेना।"

“यह तो तुमने कुछ भी नहीं मांगा जानकी ।" नैना रुंधे हुए स्वर में बोली “वह तो तुम न कहते तो भी मैं यही करती। जिंदगी के इस मुकाम पर आखिर मुझे भी औलाद के सहारे की जरूरत है। और अकेले कोमल ही क्यों रीनी की भी तो मां नहीं है। इसे भी तो मां के प्यार की जरूरत है।"

"थैक्यू नैना थॅंक यू वैरी मच।” जानकी लाल का दिल भर आया था। वह गदगद होकर बोला “अब मुझे अपने किसी भी अंजाम की परवाह नहीं। भले ही कानून मुझे फांसी पर ही क्यों न चढ़ा दे।”
 
“म...मैं ऐसा नहीं होने दूंगी। मैं तुम्हारे लिए अदालत में वकीलों की दीवार खड़ी कर दूंगी।”

"उसके लिए मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा।" वातावरण में एक बार फिर सन्नाटा छा गया। आखिरकार जानकी लाल इंस्पेक्टर मदारी की तरफ घूमा।

“मुझे तुमसे भी कुछ कहना है इंस्पेक्टर।” वह मदारी से बोला। “जरूर कहिए श्रीमान।” मदारी बोला “आखिर यह हमारी ड्यूटी है जिसकी कि सरकार हमें तनख्वाह देती है।"

“यह राज अब तुम्हें मालूम हो चुका है कि मुझ पर पूर्व में हुए जानलेवा हमलों में अजय, जतिन और कोमल का हाथ है।

और अगर तुम इस बात के सबूत भी जुटा सकते हो और इन्हें गिरफ्तार भी कर सकते हो?"

“ह...हां।” मदारी असमंजस में पड़ता हुआ बोला “मैं ऐसा कर तो सकता हूं, लेकिन भगवान आप बिल्कुल भी परेशान न हों। मैं ऐसा हरगिज भी नहीं करूंगा, क्योंकि अगर मैंने ऐसा किया तो आपका यह त्याग और यह तपस्या धल में मिल

जाएगी, जो कि अपनी तनख्वाह की पाई-पाई हलाल करने का दंभ भरने वाले इस इंस्पेक्टर को मंजूर नहीं।”

शुक्रिया इंस्पेक्टर!” जानकी लाल के होठों पर एकाएक मुस्कराहट उभरी उसकी चिरपरिचित मुस्कराहट। वह मुक्त कंठ से बोला “मैं तुम्हारा यह उपकार याद रखूगा। अब तुम मुझे गिरफ्तार कर सकते हो?”

उसने अपने दोनों हाथ समर्पण की मुद्रा में मदारी के सामने फैला दिये।

जानकी लाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

हवा का झोंका, पानी का सैलाब और वक्त का लम्हा। यह कभी नहीं रुकते। समय के हर पल के साथ बदल जाते हैं। क्योंकि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है।

अजय, जतिन, कोमल, रीनी और नैना के साथ भी यही हुआ। मुद्दतों के बाद जब उनके जीवन में ठहराव आया तो वे

अपना वह गुजरा पल भूलने की कोशिश करने लगे जो उन्हें तड़पाता था।

रीनी जतिन के लिए अच्छी पत्नी साबित हुई थी और वह उसके प्यार के मरहम से संजना के दिए जख्मों को भुलाने की कोशिश करने लगा। नैना कोमल के लिए ममतामयी मां साबित हुई थी। वह भी संदीप की यादों से उबरने लगी थी। नैना के अतीत की कड़वी यादें धुंधलाने लगी थीं। आलोका के रूप में अजय को मानो एक नई जिंदगी मिल गई थी। अब उसे सारी दुनिया बेमानी लगने लगी थी।

जानकी लाल के खिलाफ अदालत में मुकदमा चल रहा था और अपने वादे के मुताबिक नैना ने उसके लिए अदालत में शहर के नामी वकीलों की पूरी फौज खड़ी कर दी थी। लेकिन जानकी लाल के खिलाफ बेहद मजबूत और सिक्काबंद केस था, जिसमें उसे कोई खास राहत मिलती नजर नहीं आयी थी।

मगर इंस्पेक्टर मदारी ने जानकी लाल से किया अपना वादा निभाया था और अजय, जतिन और कोमल इत्यादि के खिलाफ उसने फिर कोई भी कानूनी पेचीदगी पैदा नहीं की थी।

हालात माफिक होते ही आलोका के स्वभाव में उसका स्वाभाविक चुलबुलापन और उसकी शोखियां धीरे-धीरे वापस लौटने लगीं। लेकिन उसके स्वभाव में अब काफी बुनियादी परिवर्तन आ गया था। अब वह पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व हो गई थी। उस बहारों की मल्लिका को हासिल करने के बाद सुगंधा को याद रखने की अजय के पास कोई वजह नहीं थी, जो उसे मुश्किल वक्त में छोड़कर यूएसए चली गई थी, फिर भी एक कसक बनकर वह अक्सर उसे याद आ जाती थी। इसके बावजूद उसके किरदार में कहीं कुछ ऐसा था जो अजय को चुभने लगता था। लेकिन गुजरते वक्त के साथ उस चुभन का अहसास भी फीका पड़ने लगा। एक दिन आलोका बाजार गई थी और अजय घर में अकेला था। तभी एक कूरियर वाला उसे एक लिफाफा दे गया, जिस पर भेजने वाले का जो नाम लिखा था, वह अजय के लिए कतई अजनबी था। लेकिन वह लिफाफा यूएसए से आया था।

अजय के मस्तक पर अनायास ही बल पड़ते चले गए । कोई अंजाना अहसास बड़ी तेजी से दिल में उभरने लगा। लिफाफा फाड़कर खोला तो उसके अंदर एक लैटर बरामद हुआ, जो सुगंधा की अपनी हैंडराइटिंग में था और जिसमें उसने उसे वही संबोधन दिया था, जिसे वह अक्सर उसे बुलाया करती थी।

"हल्लो पार्टनर।

पूरा विश्वास है, तुम खुश होगे क्योंकि आलोका से अच्छी पत्नी तुम्हारे लिए दुनिया में दूसरी नहीं हो सकती।

लेकिन बेवफा और स्वार्थी तो मैं भी नहीं हूं। मैं तुम्हें आलोका से ज्यादा चाहने का दावा तो नहीं कर सकती लेकिन यह कोशिश तो मैंने यकीनन की थी। शायद इसीलिए जब मुझे पता चला कि तुम्हारी आलोका प्राची के चेहरे में महफूज है

और वह तुम्हारी जिंदगी में वापस लौट सकती है तो मुझे लगा मेरे इम्तहान की घड़ी आ पहुंची है और मुझे यह इम्तहान देना ही होगा और उसमें पास होकर भी दिखाना होगा। यह सच है पार्टनर कि यह इम्तहान आसान नहीं था। अपने जिगर को जिस्म से अलग करके जीना नामुमकिन होता है। यह केवल मैं ही जानती हूं कि यह फैसला लेते हुए मैं कितना तड़पी थी। उस रोज जब मैं लॉकअप में तुमसे मिलने आयी थी तो तुम्हारी गिरफ्तारी के गम में मेरी वह हालत नहीं हुई थी। मेरी उस हालत की वजह आज तुम समझ सकते हो। वैसे तुम्हें लेकर जानकी अंकल ने मुझे पूरा विश्वास दिलाया था कि वह तुम्हें एक दिन की सजा भी नहीं होने देंगे लेकिन मुझे त्याग करना होगा अपने प्यार के इम्तहान में पास होकर दिखाना होगा।

और मैंने पास होकर दिखाया। यहां मैं इस वक्त यू एसए में हूं और मुझे यहां अच्छी नौकरी मिल गई है। जिसमें मैं खुश हूं और मैंने यहां की स्थायी नागरिकता भी हासिल कर ली है। इस पत्र के लिफाफे पर लिखा मेरा पता गलत है। मुझे ढूंढने की कोशिश कभी मत करना । मुझे ईश्वर जैसा ही विश्वास है, आलोका तुम्हें हमेशा खुश रखेगी, तुम दोनों हमेशा मुस्कराते रहोगे क्योंकि तुम्हारी इस मुस्कराहट में अकेले मेरा ही नहीं एक और इंसान का भी त्याग छुपा है। और जो खुशियां त्याग व बलिदान से हासिल होती हैं, वह स्थायी होती हैं, वह

आखिरी सांस तक बरकरार रहती हैं।

सुगंधा” वह एक सर्वथा नया रहस्योद्घाटन था, जिसने अजय को झकझोरकर रख दिया। वह कितनी ही देर तक सुगंधा के उस लैटर को आंसू भरी आंखों से देखता रहा, फिर उसने उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
 
उसे अनायास ही जानकी लाल के वह आखिरी शब्द याद हो आए, जिसमें उसने कुर्बानी का जिक्र किया था, लेकिन उस शख्स का नाम नहीं बताया था, जिसने उसके लिए कुर्बानी दी थी।

मगर अब वह जानता था कि वह शख्सियत सुगंधा थी, जिसने उससे किया अपना वादा निभाया था।

उस दीवानी ने सचमुच अपनी चाहत के इम्तहान में पास होकर दिखा दिया था।

उसका वह त्याग वास्तव में अविस्मरणीय था।

e

n

d
 

Similar threads

S
Replies
14
Views
15
StoryPublisher
S
S
Replies
61
Views
62
StoryPublisher
S
S
Replies
74
Views
75
StoryPublisher
S
S
Replies
108
Views
109
StoryPublisher
S
Back
Top