[color=rgb(184,]खजाने की तलाश[/color]
[color=rgb(184,]Update 21[/color]
तीसरी बार तो मैंने पूरा इन्तिजाम कर लिया था. मैंने अपनी कापी बाहर लिखवाने के लिए भेज दी थी. किंतु ऐन मौके पर चूक हो गई. जिस लड़के को मैंने कापी लिखने के लिए दी थी उसने तो अपना काम कर दिया किंतु जिस लड़के को कापी यूनिवर्सिटी के अन्दर पहुंचानी थी वह लेट हो गया. और उस समय पहुँचा जब कापियां जमा हो चुकी थीं."
"यह तो रियली बहुत अफ़सोस की बात है. किंतु इस बार तुम क्या कर रहे हो?"
"इस बार तो कोई चिंता की बात नहीं है. क्योंकि इस बार हमने इस मांग को लेकर धरना दिया है की इक्जाम के प्रश्न पत्र वी.सी. और रजिस्ट्रार के अलावा छात्रसंघ के अध्यक्ष को भी दिखाए जाएँ. वह अध्यक्ष मैं ही हूँ. वी.सी. ने हमारी मांग मान लेने का आश्वासन दे दिया है."
लड़की ने इधर उधर देखा फ़िर कहा, "काफ़ी अन्धकार छा गया है. अब वापस चलना चाहिए."
"अरे अभी रुको. अभी टाइम ही कितना हुआ है." लड़के ने रोकते हुए कहा.
"बात यह है की यहाँ काफ़ी सन्नाटा हो गया है. और मुझे डर लग रहा है."
"अरे मेरे होते हुए तुम्हें किस बात का डर. पता है, पिछले चुनाव में मैंने अपने प्रतिपक्षी से ज़ोर से बात कर ली थी तो वह कांपने लगा था. भला मेरे होते हुए किसकी इतनी हिम्मत की वह यहाँ आ सके."
"कोई व्यक्ति न सही, भूत और जिन तो आ सकते हैं."
"बकवास. मैं भूतों और जिन्नों को नहीं मानता. और मान लिया वे होते भी हैं तो हमारा क---क्या ब---बिगाड़ लेंगे!" अन्तिम शब्द कहते कहते लड़के की आवाज़ थर्राने लगी और ऑंखें भय से फ़ैल गईं.
"क्या हुआ तुम्हें?" फ़िर लड़की ने लड़के के इशारे पर पीछे मुड़कर देखा और उसकी चीख निकल पड़ी. क्योंकि पीछे दो लंबे तड़ंगे ऊपर से नीचे तक एकदम काले जिन खड़े थे.
"त--तुम सही कह रह थी. वाकई में भूत प्रेत होते हैं. भ--भागो." फ़िर लड़के ने विपरीत दिशा में दौड़ लगा दी और लड़की भी उसे पुकारते हुए पीछे पीछे भागी, "डियर, तुम तो कह रहे थे की हम एक दूसरे से कभी जुदा नही होंगे और तुम तो मुझे छोड़कर भागे जा रहे हो."
"अजीब मनुष्य हैं ये लोग. हम लोग तो इनसे पूछने वाले थे की पानी कहाँ मिलेगा. और ये लोग तो भाग खड़े हुए." मारभट ने कहा.
"यह युग हमें कभी समझ में नहीं आ सकेगा. आओ, हम स्वयें ही पानी ढूंढते हैं." सियाकरण ने कहा. फ़िर वे लोग यूनिवर्सिटी के अन्दर घुस गए. उन्हें देखकर लोग इधर उधर भागने लगे. अपने कमरों में घुसकर लड़कों ने बाहर से दरवाज़ा बंद कर लिया. वे लोग माहौल से बेखबर पानी की तलाश कर रहे थे. फ़िर उन्हें एक हौज़ दिखाई पड़ गया. उनकी ऑंखें पानी देखकर चमक उठीं और उन्होंने हौज़ में छलाँग लगा दी.
उधर हॉस्टल में किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था की हॉस्टल में दो भूत घुस आए हैं. अतः जैसे ही ये लोग नहाकर हौज़ से बाहर निकले, पुलिस ने इन्हें चारों ओर से घेर लिया.
ये तो मनुष्य हैं. फ़िर इन्हें भूत कौन कह रहा था?" एक इंसपेक्टर ने कहा.
"मैं तो ओझा जी को भी साथ लेता आया था. भूतों को काबू में करने के लिए." एक सिपाही ने कहा. उसके साथ बड़ी दाढी और जटाओं वाले गेरुआ वस्त्रधारी एक महाशय खड़े थे.
तुम यहाँ क्या हंगामा कर रहे थे?" इंसपेक्टर ने डपट कर उनसे कहा.
सियाकरण और मारभट ने एक दूसरे की ओर देखा, फ़िर सियाकरण बोला, "ये भी कोई दानेदार लगता है. भाग लो वरना हम फ़िर कोठरी में बंद कर दिए जायेंगे." फ़िर वे लोग सरपट दौड़ पड़े. इससे पहले कि इंसपेक्टर इत्यादि कुछ कर पाते, वे लोग दो तीन गलियां फलांगते हुए गायब हो चुके थे.
चोटीराज और चीन्तिलाल हाल के हंगामे से काफी घबरा उठे थे. और इसी चक्कर में दौड़ते हुए एक गली में घुस गए. उस गली से निकलने के बाद वे एक अन्य सड़क पर पहुँच गए. सामने ही एक इमारत दिखाई पड़ रही थी. ये लोग दौड़ते हुए उसमें घुस गए. अन्दर घुसने पर उन्होंने दो व्यक्तियों को सामने ही खड़ा पाया. इन व्यक्तियों की दाढियां सीने तक झूल रही थीं और सर सफाचट थे. आँखों पर मोटे मोटे चश्मे चढ़े हुए थे.
"मि० मैडमैन, एक पेशेंट और आया." पहले ने कहा.
"यह कैसे कह सकते हो? हो सकता है दोनों ही पेशेंट हों." दूसरे ने कहा.
"इम्पोसिबिल, एक तो लेकर आया है. अतः वह पेशेंट हो नहीं सकता."
"किंतु दोनों में से पेशेंट हैं कौन मि० पेंचराम?" दूसरे ने पूछा.
"यह तो उन्ही से पूछ लो. वैसे मेरा विचार है की वो वाला पेशेंट है." पहले ने चोटीराज की ओर संकेत किया.
"पागलों के बीच रहकर तुम भी आधे पागल हो गए हो. जो पागल और सही के बीच अन्तर नहीं कर पा रहे हो. मुझे पूरा विश्वास है की दूसरा वाला पागल है." दूसरे ने कहा. दोनों वास्तव में पागलखाने के डॉक्टर थे और वह इमारत एक पागलखाना थी.
"क्यों, तुममें पेशेंट आई मीन मरीज़ कौन है?" पहले ने उन दोनों से पूछा. इस पर चोटीराज अपनी भाषा में कुछ बोला जिसे ये लोग समझ नहीं पाये.
"मैं कह रहा था की यही पागल है. पता नहीं क्या बडबडा रहा है."
"हम लोग बहुत दूर से दौड़ते हुए आ रहे हैं." चीन्तिलाल भी बोल उठा.
"ओह! उल्टा सीधा तो दूसरा भी बोल रहा है. इसका मतलब की वह भी पागल है." दूसरे ने कहा.
"हमारे अस्पताल में यह पहला केस है जब दो पागल एक दूसरे को भरती कराने आए हैं." पहले ने अपना चश्मा ऊँगली से ऊपर चढाते हुए कहा.
"इन लोगों को भी रूम नं० अट्ठारह में पहुँचा दिया जाए. वहां काफ़ी जगह है." दूसरे ने कहा. फ़िर उन्होंने प्राचीन युगवासियों के हाथ पकड़े और अपने साथ ले जाने लगे.
"चोटीराज, क्या इन मनुष्यों की ऑंखें कुछ भिन्न नहीं हैं?" चीन्तिलाल ने गौर से दोनों के चश्मे देखते हुए कहा.
"हाँ हैं तो. मुझे तो पूरी तरह ये उल्लू की ऑंखें लग रही हैं. कितना बदल गया है संसार. मनुष्य की ऑंखें तक बदल गईं हैं."
उधर मि० पेंचराम ने मैडमैन को संबोधित किया, "मि० मैडमैन, आपका क्या विचार है? इनका पागलपन किस प्रकार का है?"
"मेरा विचार है की ये बड़बोला से पीड़ित हैं. जिसमें व्यक्ति हर समय कुछ न कुछ बडबडाता रहता है."
चोटीराज जो की मैडमैन के साथ चल रहा था, उसने मैडमैन के चश्मे पर हाथ डाल दिया. और मैडमैन का चश्मा नीचे गिर पड़ा.
"यह क्या? इसकी तो ऑंखें ही गिर पड़ीं!" चीन्तिलाल ने आश्चर्य से कहा.
कहानी जारी रहेगी
My Stories Running on this Forum
1. Letters from a Friend in Paris-classic story
2. Hindi- मजे - लूट लो जितने मिले
3. Fanny Hill: Memoirs of a Woman of Pleasure
4. खजाने की तलाश
My Completed Stories ..
चौदहवे दिन मस्त पंजाबन को चोद कर औलाद दी
सहेली का हलाला अपने शौहर से करवाया
हलाला के बाद