• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller फरेब

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
चंद्रेश ने कार को कॉटेज के बाहर रोका। कार से उतरकर चंद्रेश ने निरंजन की ओर देख कर बोला, “आइये सर।”

निरंजन ने कॉटेज का बहुत बारीकी से मुआयना किया। फिर बोला, “चलिये।”

गार्डन पार कर के अन्दर आये, तो शान्ति थी। किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं थी। चंद्रेश ने जल्दी ही पूरी कॉटेज का चक्कर लगाया। कहीं कोई नहीं था। चंद्रेश का दिमाग चकरा गया।”कहाँ गयी” मन ही मन सोचा निरंजन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। सामने रखे सोफे पर बैठता हुआ बोला, “मुझे तो कॉटेज में कोई नहीं दिखा।”

“मैं जब गया, वह यही थी।” चंद्रेश ने आश्चर्य से कहा।

“एक बात बताओ मिस्टर मल्होत्रा, जब आप यहाँ से गये थे, तो कॉटेज खुली छोड़ कर गये थे या लॉक लगा के गये थे?” निरंजन ने कुछ सोचते हुए पूछा।

“कॉटेज तो खुली ही छोड़ कर गया था, क्योंकि वह यहाँ से जाने को तैयार नहीं थी। मेरी उससे इसी बारे में बहस हो रही थी।”

“क्या बात कर रहे हैं मल्होत्रा साहब? अन्जान महिला को अपने घर में कैसे छोड़ा आपने? यहाँ से पुलिस को फोन कर के बुला सकते थे।” निरंजन ने आश्चर्य से उसकी और देखते हुए कहा।

“मैंने पुलिस स्टेशन फोन लगाया, लेकिन वहाँ से जवाब आया यह रेलवे स्टेशन है।” चंद्रेश ने उत्तर दिया।

“अब सारी बात मेरी समझ में आ गयी। यह सारा ड्रामा शायद किसी कीमती चीज के कारण हुआ है। आप अपनी सब चीजें देख लें, कहीं कुछ गायब तो नहीं हुआ?” अपने सिर की कैप हटा कर सोफे पर रखते हुए निरंजन बोला।

“नहीं सर सब कुछ वैसा ही है, जैसा की मैं छोड़ कर गया था।” चंद्रेश ने जल्दी से कहा।

“इतनी जल्दी जवाब मत दीजिये। पहले आप एक बार चेक कर लीजिये। उसके बाद मैं चला जाऊँगा।”

“ठीक हैं सर, मैं चेक कर लेता हूँ। वैसे उसे ले जाना होता, तो पहले ही ले जा सकती थी, जब वह दरवाजा खोल चुकी थी। मुझ से मिलने की आवश्यकता नहीं थी।” चंद्रेश पिछले कमरे की तरफ जाता हुआ बोला।

चंद्रेश ने अपने कमरे का पूरा निरीक्षण किया। गुप्त तिजोरी खोली उसमें कैश वैसा ही था। कुछ भी गायब नहीं हुआ था। घर का कीमती सामान भी वैसा ही था, जैसा कि वह छोड़ कर गया था।

वह वापस बैठक में आया। सामने सोफे पर बैठते हुए निरंजन को देखता हुआ बोला।”सब ठीक है सर, कुछ भी गायब नहीं हुआ है।”

“चक्कर समझ में नहीं आया। ठीक हैं मैं चलता हूँ।” निरंजन ने सोफे से उठते हुए कहा।

“अरे सर, ऐसे कैसे जाओगे, आपने हमारे लिये इतना कष्ट किया है तो एक कॉफी मेरे साथ पीनी ही पड़ेगी।” चंद्रेश ने उठते हुए कहा।

“अरे नहीं चंद्रेश जी।” निरंजन ने उसे रोकने की कोशिश की, पर चंद्रेश नहीं रुका, बोला, “बस दो मिनट में तैयार हो जायेगी। वैसे मुझे अपने लिये भी बनानी हैं।” अन्दर से चंद्रेश की आवाज आयी।

निरंजन वापस सोफे पर बैठ गया और न्यूज पेपर के पेज पलटने लगा। दस मिनिट बाद चंद्रेश बिस्कुट, नमकीन और मिठाई के साथ हाजिर हुआ।

“अरे इसकी क्या जरूरत थी।” निरंजन शान्त स्वर में बोला।

चंद्रेश ने सेन्टर टेबल पर ट्रे रख दी और वे लोग बातें करते कॉफी पीने लगे। कॉफी समाप्त करके चंद्रेश ने कप रखा ही था कि उसकी नजर मेन डोर पर चली गयी, तो वह हैरान रह गया। चंद्रेश की नज़रों का पीछा करते हुए निरंजन ने मेन डोर पर नजरें गड़ाई तो वह भी हैरान हो गया।

उन्होंने देखा सामने एक खूबसूरत कयामत खड़ी थी। निरंजन भी उसकी सुन्दरता में खो गया। एक शानदार परी-सा चेहरा लिये हुए वंशिका खड़ी थी। चंद्रेश ने उसे कोहनी से हिलाया। निरंजन महिला के जादू से बाहर निकला।

“सर वह ही है।” चंद्रेश बोला

निरंजन ने वंशिका के चेहरे पर नजर गड़ायी। वंशिका ने भी पलके ना झपकायीं और अदा से निंरजन को देखा

“आपकी तारीफ?” निरंजन पुलिसिया अन्दाज में बोला।

“तारीफ उस खुदा की कीजिये, जिसने हमें बनाया।” महिला ने व्यंग्य से कहा।

“जो पूछा जाये, उसका सही तरीके से जवाब दो।” निरंजन का स्वर कठोर हो गया।

“मेरे घर में खड़े होकर ऐसे सवाल पूछोगे, तो ऐसे ही जवाब मिलेंगे।’’ महिला के स्वर में अकड़ के भाव आ गये। उसके चेहरे से नहीं लग रहा था कि वह पुलिस की वर्दी देख कर घबराई हो या उसके चेहरे पर कोई बेचैनी या परेशानी के भाव आये हों। निरंजन भी हैरान रह गया, ऐसी दंबगई उसने पहली बार देखी। वरना पुलिस को देख कर सच्चे लोग भी घबरा जाते हैं।

“आप का नाम क्या है?” निरंजन ने पूछा।

“क्यों मेरे पतिदेव ने नहीं बताया?” उसके स्वर में व्यंग्य के भाव आ गये।

“यह आपको अपनी पत्नी नहीं मान रहे हैं। इन्होंने आपके विरूद्ध रिपोर्ट लिखवाई है।”

“इस बारे में आप का क्या कहना है?”

“कलयुग में पतिदेव ऐसे ही होते हैं।”

“आप ढंग से जवाब दें, यह कानूनी कार्यवाही है। कोई आप स्टेज पर खड़ी होकर ड्रामा नहीं कर रही, समझीं आप।”

“ठीक है पूछो क्या पूछना चाहते हो?” महिला ने हथियार डालते हुए कहा।

“आप का नाम क्या है?”

“वंशिका अरोड़ा मल्होत्रा।”

“यह अरोड़ा और मल्होत्रा दोनों साथ में कैसे?”

“शादी से पहले मेरा नाम वंशिका अरोड़ा था, जो शादी के बाद मल्होत्रा हो गया।”

“क्या ये सच बोल रही है?” निरंजन ने चंद्रेश को देखते हुए कहा।

“हाँ सर, यह सही कह रही है, पर यह वंशिका नहीं है।” चंद्रेश ने व्यग्र भाव से कहा।

“इसका फैसला करने वाले आप कौन होते हैं? यह फैसला करना मेरा काम है।” निरंजन ने मल्होत्रा को देखते हुए कहा।

“अब मैं आपसे जो सवाल पूछूँगा, उसका जवाब ‘हाँ’ या ‘ना’ में देना। बीच में कुछ भी नहीं बोलना।’’ निरंजन ने मल्होत्रा से कहा।

“जी सर।” मल्होत्रा ने मरे स्वर में जवाब दिया।

“आपकी लव मैरिज है या अरेंज?” निरंजन ने वंशिका की तरफ देख कर पूछा।

“पहले लव, उसके बाद अरेंज।” वंशिका ने जवाब दिया।

निरंजन ने चंद्रेश की तरफ देख कर बोला, “सही या गलत?”

“सही, लेकिन.....?” मल्होत्रा ने जवाब दिया।

“बस।” निरंजन ने वंशिका की तरफ देख कर कहा।

“यह तो कह रहे हैं, मेरी वाईफ काफी दिनों से लापता है, आप का क्या कहना है?”

“मेरा एक्सीडेन्ट हो गया था। होश परसों ही आया, तो चली आयी।” वंशिका ने जवाब दिया।

“कहाँ थी इतने दिन आप?”

“एक वकील ने मेरी जान बचाई। मैं उन के यहाँ सात-आठ दिन थी।”

“आप उनका एड्रैस दे सकती हैं?”

“जी बिलकुल, आप उन से पूछ सकते हैं।”

“ठीक है, मैं पूछताछ करता हूँ।”

“सबसे अहम बात, आप अन्दर कैसे आयी? दरवाजा तो लॉक था।” निरंजन ने पूछा।

“हाँ-हाँ पूछिए निरंजन सर, ये अन्दर कैसे आयी?”

“आप चुप रहिये, आपको भी मौका मिलेगा। पहले मोहतरमा से पूछताछ करने दो।” निरंजन ने मल्होत्रा को रोकते हुए कहा।

“हाँ, तो आप बताइये वंशिका जी?”

“यह वंशिका नहीं है इंस्पेक्टर साहेब।” चंद्रेश जोर से चिल्लाया।

“चुप।” निरंजन खड़ा होकर उसकी आवाज दबाते हुए जोर से चिल्लाया, “एकदम चुप, जब तक आप से न बोला जाये, आप नहीं बोलेंगे।” निरंजन गुस्से में बोला।

चंद्रेश ने नजरें झुकाते हुए पहलू बदला। वंशिका के होंठ पर कुटिल मुस्कान उभरी, जो निरंजन की उस पर पड़ते ही लुप्त हो गयी।

“हाँ, तो मोहतरमा जी, आप अन्दर कैसे आयी?”

“वह भी इनके कारण?” वंशिका ने जबाव दिया।

“मेरे कारण? कैसे?” मल्होत्रा हैरानी से बोला।

“इंस्पेक्टर इनके भूलने की आदत की वजह से हमने घर के मेन डोर की दो चाभी बना रखी हैं, जिसकी एक चाभी बाहर पड़े गमलों में रखी रहती थी। अगर चाभी गिर जाये, तो वहाँ से निकाल ली जाती है। मैं उसी चाभी से मेन डोर खोल कर अन्दर आयी।” वंशिका ने कहा।

“क्या यह सही कह रही है?” निरंजन ने चंद्रेश से पूछा।

“जी सर, पर यह बात इन को कैसे पता चली?” चंद्रेश का स्वर हैरानी से भर गया।

“और तो और मैं कई बात बता सकती हूँ, जो केवल पति-पत्नी के बीच रहती हैं। उदाहरण के तौर पर इनकी दायी जाँघ में तिल का निशान है।” वंशिका ने कहा।

“यह सही कह रही हैं।” निरंजन ने चंद्रेश को देख कर कहा।

“हाँ, यह बात तो है, पर यह कोई भी बता सकता है। इसमें नई बात नहीं।” चंद्रेश ने कहा।

“हाँ ये तो है।” निरंजन ने उसका समर्थन किया।

“हाँ अब आप साबित करो कि यह आपकी पत्नी वंशिका नहीं है।” निरंजन ने चंद्रेश को देख कर कहा।

“यह तो मैं जानता हूँ कि ये मेरी पत्नी नहीं है।” चंद्रेश निरंजन से बोला।

“साबित करो।”

“अभी साबित हो जायेगा, मेरे पास शादी के कुछ फोटो ग्राफ्स हैं। मैं उन्हें आपको दिखाता हूँ।” चंद्रेश सोफे से उठते हुए बोला।

“लेकर आइये।” निरंजन ने कहा।

निरंजन सोफे से उठा और अन्दर कमरे में चला गया।

वंशिका के चेहरे पर खौफ उभरा।

“मैं भी जा सकती हूँ।” वंशिका ने उठते हुए कहा।

“जी नहीं मोहतरमा, आप यहीं विराजिये।” निरंजन ने शान्त स्वर में कहा।

वंशिका पुनः सोफे पर बैठ गयी और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगी। थोड़ी देर में हड़बड़ाते हुए चंद्रेश बाहर निकला। उसके हाथ में एक बीफ्रकेस था, जो उसके हाथ में लटक रहा था। पास में वह निराश होकर बैठ गया। उसका चेहरा लटका हुआ था।

“क्या हुआ मि. चंद्रेश?” निरंजन ने उसकी ओर देख कर पूछा।

“निरंजन सर, इसकी चाभी मिल नहीं रही है और फोटो की एलबम इसके अन्दर है।”

वंशिका के चेहरे पर रौनक लौटी, “यह बहानेबाजी है। कोई सबूत नहीं है मेरे खिलाफ। यह सब झूठ है।” वंशिका बोली।

“तो चाभी नहीं है आप के पास। अब क्या चाहते हैं आप?” निंरजन ने कहा।

“मैं क्या करूं, समझ नहीं पा रहा हूँ।” चंद्रेश उदास स्वर में बोला।

“आपकी इस समस्या को मैं हल कर देता हूँ।” निरंजन ने कहा।

“वह कैसे इंस्पेक्टर साहब?”

“ऐसे समय के लिये हमारे पास मास्टर की नाम की वस्तु पायी जाती है, जो कोई भी ताला खोल देती है।” निरंजन ने मजे लेते हुए कहा।

निरंजन ने अपनी पिस्तौल से एक फायर कर अटैची का ताला तोड़ दिया।

मल्होत्रा खुशी से उछल पड़ा, “अब आयेगा मजा?”

निरंजन ने वंशिका का चेहरा देखा। उसका चेहरा उतर गया। वह बेचैनी से इधर-उधर देखने लगी।

“गई भैंस पानी में। हो गया दूध का दूध पानी का पानी।” चंद्रेश ने अटैची खोली और एक एलबम निकाल कर निरंजन के हाथ में रख दी।

“देख लो सर मेरी सच्चाई सामने आ गयी।” चंद्रेश चहका।

निरंजन ने एलबम खोली और आश्चर्य से वंशिका के लटके चेहरे को देखता रहा। जैसे-जैसे वह एलबम देखता उसका गुस्सा बढ़ता चला जाता। वंशिका का चेहरा उत्तरा हुआ था।

“यह क्या मजाक बना रखा हैं आपने मि. चंद्रेश? आपको मैं पागल दिखायी देता हूँ।” उसने गुस्से में मल्होत्रा को देखते हुए कहा।

“क्या हुआ निरंजन सर?” चंद्रेश बोला।

“आप खुद पहले एलबम देख लें, फिर मुझ से बात करें।” निरंजन ने गुस्से में चंद्रेश से कहा।

चंद्रेश ने एलबम उठाई और ध्यान से एक एक पेज पलटने लगा। उसकी हैरानी बढ़ने लगी।

“यह नहीं हो सकता?” वह जोर से चिल्लाया।

“क्यों नहीं हो सकता?” निरंजन उससे भी तेज स्वर में चिल्लाया।

“क्यों नहीं हो सकता? अटैची आपकी, घर आपका?” निरंजन तेज आवाज में बोला।

निरंजन गुस्से में चंद्रेश को देख रहा था। एलबम में वंशिका और चंद्रेश की तस्वीरें थीं। सारी तस्वीरों में वही वंशिका थी, जो इस वक्त उनके सामने बैठी थी।

वंशिका के चेहरे पर कुटिल मुस्कान उभरी और पल भर में लुप्त हो गयी। उसने आखों में आँसू भरते हुए कहा, “देख लिया सर आपने, पता नहीं ये किस बात से मुझ से नाराज हैं।” उसके स्वर में भोलापन उभरा, “पहले तो ये ऐसे नहीं थे।” रोते हुए वंशिका बोली।

चंद्रेश मल्होत्रा का जी चाह रहा था कि वह अपने बाल नोच ले। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप पर काबू पाया।“यह एक चाल है इंस्पेक्टर साहब। यह फोटो ट्रिक फोटोग्राफी है।”

“अब आपके द्वारा पेश किये गये सबूत ही झूठे हैं। वाह चंद्रेश साहेब, बेशर्मी की भी हद है।” निरंजन ने गुस्से में कहा।

“पता नहीं कैसे फोटोग्राफ बदल गये, मैं नहीं जानता। शायद, मेरे पुलिस स्टेशन जाने के बाद इसने बदल दिये होंगे।’’ चंद्रेश ने वंशिका की तरफ अगुंली उठा कर कहा।

“यह मेरे ऊपर गलत इल्जाम है।” वंशिका बोली।

“चुप कर।” गुस्से में चंद्रेश वंशिका पर डपटा।

“आप मेरी बात समझिए निरंजन सर, यह मेरे खिलाफ कोई गहरी साजिश है।” चंद्रेश निरंजन से बोला।

“मैं सब समझ गया चंद्रेश साहेब। यह आप का पारिवारिक मामला है। इसमें पुलिस का कोई दखल नहीं।”

“यह गलत हो रहा है।” चंद्रेश गुस्से में तेज स्वर में बोला।

“अगर आपकी अपनी पत्नी से नहीं बन रही है, तो इसमें पुलिस क्या कर सकती है? यह आपके घर का मामला है। इसे आपको ही सुलझाना होगा।” निरंजन ने टोपी पहनते हुए शान्त स्वर में कहा।

“लगता है मुझे ऊपर कमिश्नर से बात करनी होगी।” मल्होत्रा ने हताश स्वर में कहा।

“वह आप का अधिकार है। अब मुझे इजाजत दीजिये।” कहकर निंरजन ने बाहर की तरफ कदम बढ़ाये।

अचानक घूम कर बोला, “एक बात कान खोल कर सुन लीजिये चंद्रेश साहेब। मेरे इलाके में किसी भी तरह का क्राइम में सहन नहीं करुँगा। यह आप दोनों को मेरी वैधानिक चेतावनी है।”

कह कर निरंजन मुड़ा और लम्बे कदमों से बाहर की तरफ निकल गया। चंद्रेश का चेहरा मुरझा गया और वंशिका का चेहरा खिल गया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
पुलिस कमिश्नर की कार स्वास्थ्य मंत्री सुन्दर लाल अवस्थी के बँगले की तरफ उड़ी जा रही थी। ड्राइवर कार चलाने में मगन था। पीछे हो रही बातचीत पर उसका ध्यान नहीं था।

पीछे बैठे कमिश्नर से भाटी बोला, “हम दोनों को मंत्रीजी ने एक साथ बुलाया है। जरूर कोई आवश्यक बात होगी?”

कमिश्नर ने सामने काँच की तरफ देखते हुए कहा, “उनके बेटे का मर्डर हुआ है भाटी। उसी सिलसिले में लिये बुलाया होगा।”

“हो सकता है वही बात हो सर, पर आप मुझे वहाँ ले जाकर ठीक नहीं कर रहे हैं।” भाटी ने व्याकुलता से कहा।

“क्यों....?” कमिश्नर ने पूछा

“सर आप जानते हैं मेरा मिजाज गर्म है। अगर मंत्रीजी ने कोई गलत बात कह दी, तो मैं अपने आपको जबाव देने से रोक नहीं पाऊँगा।” भाटी कमिश्नर को देखता हुआ बोला।

कमिश्नर ने इलायची जेब से निकाली और भाटी से कहा, “लो इलायची खाओ।”

“नहीं सर, आप ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया।” भाटी ने कहा।

“भाटी तुम शान्त रहना, जो भी बात होगी मैं सँभाल लूँगा। तुम अपने जज्बात पर काबू रखना।” कमिश्नर ने इलायची मुँह में डाल कर कहा।

“लेकिन सर....?”

“तुम कुछ नहीं बोलोगे। संभल जाओ सामने बँगला दिख रहा है।”

ड्राइवर ने कार शानदार बँगले के सामने रोकी। सामने गेट से दरबान दौड़ता हुआ बाहर आया। ड्राइवर ने काँच खोलते हुए कहा, “कमिश्नर साहब है। मंत्रीजी से मिलना चाहते हैं।”

“ठीक है मैं पता करता हूँ। आप गाड़ी अंदर ले आइये।” गेट खोलकर थोड़ी देर तक वह इन्टरकॉम में व्यस्त रहा, फिर बोला, “जाइये सर, मंत्री साहेब आपका ही इन्तजार कर रहे हैं।” दरबान बोला।

ड्राइवर ने कार आगे बढ़ा दी। कार मेन दरवाजे से होते हुए बंगले के पोर्च में रुकी। कमिश्नर और भाटी दोनों कार से बाहर निकले। बाहर मंत्रीजी का पी.ए. उन्हें रिसीव करने खड़ा था।

“आइये सर, मंत्रीजी आप का ही इंतजार कर रहे हैं।”

“आप कौन हैं?” भाटी ने पूछा।

“मैं उनका पी.ए. हूँ।” वह उन्हें लेकर ड्राइंगरूम में पहुँचा।

“आप बैठिये, मैं नेताजी को आप के आने की खबर दे देता हूँ।” कमिश्नर का सिर सहमति से हिला।

भाटी ने कमरे में नज़रें दौड़ाई। भव्यता का सारा सामान वहाँ मौजूद था। एक-एक चीज कीमती थी। कमरा सजाने में किसी तरह की कंजूसी नहीं की गयी थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी पुराने राजा-महाराजा की कोठी में आ गये हों।

“सर, ऐसा लगता है काली कमाई खूब है नेताजी के पास।” भाटी कमिश्नर के कान में फुसफुसाया।

“चुप करो भाटी, दीवारों के भी कान होते हैं।” कमिश्नर ने धीमे स्वर में गुर्राते हुए कहा।

तभी स्वास्थ्य मंत्री सुन्दर लाल अवस्थी ने वहाँ कदम रखा। पचास से पचपन के बीच की उम्र के नेताजी, थुलथुल शरीर, पेट बाहर निकला हुआ, सिर सफाचट, छोटी मक्कारी से भरी आँखें, क्लीन शेव, छोटा कद, साँवला चेहरा, मोटी गर्दन, जिसमें मोटी-सी सोने की चेन लटक रही थी। नेताजी का जगमग करता सफेद खादी का कुरता-पजामा फब रहा था। सिर पर सफेद टोपी लगाए वे अन्दर आये। भाटी और कमिश्नर उनके सम्मान में उठ खड़े हुए।

“बैठिये कमिश्नर साहब और तुम भी बैठो भाटी।” मंत्रीजी ने शान्त स्वर में कहा।

“जी सर।” कमिश्नर बोला।

“जानते हो हमने तुम्हें यहाँ क्यों बुलाया?” मंत्रीजी ने दोनों हाथ सोफे पर घुमाते हुए कहा।

“जी सर, सुमित अवस्थी के मर्डर केस की प्रोसेस जानना चाहते होंगे आप।” कमिश्नर के बोलने से पहले भाटी बोल उठा।

कमिश्नर ने घूर कर उसे देखा।

“सॉरी सर।” भाटी जल्दी से बोला।

मंत्री जी ने भाटी की तरफ ध्यान न देकर अधेड़ श्रीवास्तव की तरफ नजरें घुमाई।

“आज मुझे अपने बेटे के कातिल की फिक्र नहीं है। वह तो तुम एक न एक दिन पता लगा ही लोगे, पर आज समस्या दूसरी है।” नेताजी बोले।

नेताजी ने एक नौकर को बुला कर चाय-नाश्ता लाने को कहा।”जब तक मैं ना कहूँ, इधर मत आना।” मंत्रीजी ने नौकर से कहा।

“जी मालिक।” नौकर ने सम्मानित लहजे में कहा।

“हाँ तो कमिश्नर साहब, मैं कह रहा था कि मेरे बेटे के कातिल को पकड़ना तो आप लोगों को होगा ही, क्योंकि वह मेरा इकलौता पुत्र था और मुझे उससे बहुत लगाव था।” मंत्री जी ने रुमाल निकालते हुए कहा।

“अगर पुत्र नालायक होता तो और बात थी, पर मैं जानता हूँ सुमित में कोई ऐब नहीं था। उसे तो मेरे नाम, शोहरत और पैसे भी नहीं लुभाते थे। वह अपने में मग्न रहने वाला लड़का था। किसी से कोई बात नहीं करता था। घर में भी शान्त रहता था।” कहते हुए मंत्रीजी की आँखों से आँसू आ गये। उन्होंने रुमाल से उसे पोंछा।

“जी सर, हम आपके जज्बात को समझते हैं और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि कातिल कोई भी हो, जल्द से जल्द कानून के हवाले होगा। आप मेरी बात पर यकीन करें।” भाटी नरम स्वर में बोला।

“मुझे तुम्हारी योग्यता पर पूरा भरोसा है भाटी। आप लोगों को यहाँ बुलाने का दूसरा कारण है।” मंत्रीजी ने कहा।

“फरमाइये सर, ऐसा कौन-सा कारण है, जिसने आपको इतना विचलित कर रखा है?” कमिश्नर ने मंत्रीजी को देखते हुए कहा।

भाटी की नजरें भी मंत्रीजी से टकराई। मंत्रीजी खुद को रोकते हुए बोले, “मिस्टर खान का नाम आप लोगों ने सुन रखा है?”

कमिश्नर ने चौंकते हुए कहा, “आप मिस्टर सोनू खान की बात तो नहीं कर रहे हैं।”

“हाँ, मैं उसी सोनू खान की बात कर रहा हूँ कमिश्नर साहब।”

“लेकिन वह तो अहमदाबाद में सक्रिय था और सुना है की वहाँ की पुलिस ने उसका एनकांउटर कर दिया।” कमिश्नर बोला।

“आपने ठीक सुना है कमिश्नर साहब, पर मसला सोनू खान का नहीं, उसके छोटे भाई अयूब खान का है।” मंत्रीजी पहलू बदलते हुए बोले।

“वह कैसे सर?” भाटी ने पूछा।

“अयूब खान मैच फिक्सिंग से लेकर सट्टा और ड्रग्स के धन्धे में सक्रिय है। उसका आज कल ड्रग्स का कारोबार फल फूल रहा है।” मंत्रीजी बोले।

“यह तो गलत हो रहा हैं सर।” भाटी बोला।

“एक बात शायद आपको मालूम न हो, पर मुझे लगता है कि सुमित को भी ड्रग्स की लत लग गयी थी।” मंत्रीजी बोले।

“आपको कैसे मालूम पड़ा सर?” भाटी ने पूछा।

“उसके व्यवहार से मुझे लगा।” मंत्रीजी बोले।

कमिश्नर का सिर सहमति से हिला।

“जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है कि अयूब खान अब स्कूली बच्चों में यह जहर भर रहा है। उसके एजेन्ट स्कूल, कालेज और थियेटर के आगे अपना माल सप्लाई करते हैं।”

“यह तो बहुत बुरा हो रहा है सर।” भाटी बोला।

“इसलिये मैंने तुम दोनों को यहाँ बुलाया है। मेरी चीफ मिनिस्टर सर से बात हो गयी है। उन्होंने ही मुझे आपको यह केस सौंपने के लिये कहा है।”

“यह आप ने अच्छा किया इससे हमें सुमित अवस्थी वाले केस सुलझाने में मदद मिलेगी” भाटी बोला।

“तुम निर्भय होकर काम करो भाटी, अगर कभी मेरी जरुरत हो, तो मुझसे सम्पर्क कर सकते हो।” मंत्रीजी ने कहा।

“ठीक है सर। आपके इतना कह देने भर से मेरी हिम्मत बढ़ गयी है।” भाटी बोला।

“कमिश्नर श्रीवास्तव, अगर तुम इस केस में किसी स्पेशल ऑफिसर को लेना चाहते हो, तो मुझे इन्फॉर्म कर देना।”

“जी सर, अब हमें आज्ञा दीजिये।” कमीशनर ने उठते हुए कहा।

“ओके, मुझे भी एक मीटिंग में जाना था। बस आप लोगों का इंतजार कर रहा था।” यह कहकर मंत्रीजी उठ खड़े हुए।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
रानो का अड्डा। वहाँ एक गन्दी सी टेबल पर रंगा-बिल्ला बैठे थे। सामने टेबल पर देशी ठर्रे की बोतल और काँच के दो गिलास रखे थे। एक नमकीन का पैकट और भुने चने रखे थे, जो अब खत्म होने की कगार पर थे। बिल्ला भुना हुआ चना मुँह में डालते हुए बोला, “यार तेरी एक बात मुझे समझ में नहीं आती। तू जिसको भी कूटता है, उसे भाई क्यों कहता है।”

कुटिल मुस्कान से रंगा ने जवाब दिया, “कूटना तो उसे है ही, उससे पहले उसे सम्मान दिया जाये, तो मजा ही कुछ और है।”

“तेरी बात मेरी समझ से बाहर है।” बिल्ला ने एक और पैग लेते हुए कहा।

अचानक बोतल खत्म हो गयी। रंगा जोर से चिल्लाया, “अरे कलुवा! कहाँ मर गया रे?”

तभी बाहर से एक बारह बर्षीय लड़का भागते हुए आया। उसने हाफ पेन्ट और सफेद बनियान पहन रखी थी। बनियान का कलर कभी सफेद रहा होगा। अभी वह काला पड़ चुका था।

“क्या हुआ उस्ताद?” आते ही वह बोल पड़ा।

“उस्ताद के बच्चे, बोतल खाली नहीं दिखायी दे रही। जाकर एक बोतल और कुछ बायल अण्डे ले आ।” लड़का जिस तेजी से आया था, उसी तेजी से वापस चला गया।”

“यार, ये इन्तजार के काम से मैं बोर हो जाता हूँ।” बिल्ला ने गुस्से से मुक्का मेज पर मारते हुए कहा।

“खान की बात को मना करने का अन्जाम जानता है ना।” रंगा बोला।

तभी रानो के अड्डे के अन्दर राम सवेक और शंकर दयाल ने प्रवेश किया। दोनों के चेहरे पर मुर्दानगी छाई हुई थी।

काउंटर पर बैठा रानो कह उठा, “आइये हवलदार साहब।”

“अरे काहे का हवलदार, हालत तो कुत्ते से भी बेकार है।” शंकर दयाल ने बुरा-सा मुँह बनाते हुए कहा।

तभी राम सेवक ने चारों तरफ नज़रें घुमाई। रंगा-बिल्ला पर आकर उसकी नज़रें ठहर गयी।

“ओह तो उस्तादों की फौज यहाँ विराजी हुई है।” शंकर दयाल बोला।

तभी रंगा की निगाह भी दोनों पर पड़ गयी, “आ गये हरामखोर, मुफ्त की दारू पीने।” रंगा धीरे से फुसफुसाया। बिल्ला ने नजरें घुमाई। राम सेवक उसी को घूर रहा था।

बिल्ला खिसियानी हँसी हँसता हुआ बोला।”आइये हवलदार साहेब, एक-एक पैग हो जाये।”

“लगता है, दिन पूरे हो गये तुम्हारे।” राम सेवक डपट कर बोला।

“तुम जैसे गुण्डे के साथ जल्लाद ने हमें बैठा देख लिया, तो तुम्हारा तो क्या करे मालूम नहीं, लेकिन हमें उल्टा लटका देगा।” राम सेवक उसे घूरता हुआ बोला।

“हा, हा, हा... कैसा समय आ गया पुलिसवाला पुलिसवाले से डर रहा है।” हँसते हुए बिल्ला ने कहा।

“चुप कर कुत्ते, नहीं तो खाल खींच लूँगा मैं तेरी।” राम सेवक बोला।

“कुत्ता किसको बोला बे?” बिल्ला उठते हुए बोला।

“बैठ जा भाई, आज हवलदार फुलफॉर्म में है।” रंगा बोला।

“खाल खींच के दिखा साले।” बिल्ला ने आँस्तीन की बाँह चढ़ाते हुए कहा।

तभी शंकर दयाल बीच में आ गया, “क्यों बात को बढ़ा रहा है राम सेवक” और वह उसको घसीट कर बाहर ले जाने लगा।

“तू मुझे क्यों खींच रहा है?”

“देखा नहीं पहलवान ने तुझे भाई कहा और जब पहलवान किसी को भाई बोलता है। इसका मतलब उसकी धुनाई पक्की है।” शंकर ने बोला।

“तू मुझे डरा रहा है।?” राम सेवक ने शंकर दयाल को घूरा।

“तुझे मरने का शौक है, तो जाकर खुशी से मर, मैं चला।”

“अरे रुक, मैं भी आता हूँ।” राम सेवक ने भागते हुए शंकर दयाल का पीछा किया।

“तू तो नाराज हो जाता है।” राम सेवक मस्का लगाते हुए बोला।

“जब पहलवान चटनी बनाता तो मालूम होता।” शंकर दयाल व्यंग्य से बोला।

“अब छोड़ वह बात।” राम सेवक उत्सुकता से बोला।

“हम रानो के अड्डे पर जिस काम से आये थे, वह तो हुआ ही नहीं।” राम सेवक ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।

शंकर ने उसका हाथ छुड़ाया, “आज तेरे कारण ही हमारा बना बनाया प्लान बिगड़ गया। फिर कभी प्रोगाम बनायेंगे।” शंकर बोला।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
शाम के आठ बज रहे थे। चंद्रेश मल्होत्रा बैठक में बैठा हुआ था। आज उसका सोफे से उठने का विचार नहीं था, तभी वहाँ वंशिका ने प्रवेश किया। वह उसके सामने आकर सोफे पर बैठ गयी।

“आज क्या खाने का विचार है?” वंशिका ने पूछा।

चंद्रेश ने बैठे-बैठे ही उसे घूर कर देखा।

“अब यह नाटक बन्द करो। तुम्हें मेरी फिक्र करने की जरूरत नहीं है। अब यहाँ कोई नहीं है। तुम बताओ तुम कौन हो?” चंद्रेश ने गुस्से भरी नजरों से उसे देखते हुए कहा।

“ओह! तो मिजाज अब भी नहीं बदले। कोई बात नहीं, मैं खाना बना दूंगी। तुम्हें खाना है, तो ठीक है, नहीं तो मैं खा लूंगी। भाड़ में जाओ तुम।”

यह कह कर वह सोफे से उठ खड़ी हुई। चंद्रेश ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुँह घुमाकर दूसरी तरक घूम गया। थोड़ी देर वैसे ही पड़ा रहा, फिर रजाई उठा कर सोफे पर आ गया। वहाँ एक बुक पड़ी थी। वह उसे उठाकर पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते ही उसकी आँख लग गयी।

अचानक कोई आहट सुन कर उसकी आँख खुल गयी। उसने सामने टंगी घड़ी देखी। साढ़े ग्यारह बज रहे थे। सब तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। आहट फिर हुई, पहले तो उसने अपना वहम समझा था, पर इस बार फुसफुसाहट की आवाज सुनाई दे रही थी।

चंद्रेश दबे पांव उठा और बैडरूम की तरफ बढ़ गया। उसने बैडरूम के पास पहुँच कर कान दरवाजे से लगाए। अन्दर वंशिका फोन पर किसी से बात कर रही थी। धीमी-धीमी आवाज उसके कानों में पड़ने लगी। अचानक कुछ शब्द सुन कर उसका चेहरा खिल उठा। वह वापस अपने सोफे पर आकर लेट गया। अब उसकी नींद पूरी तरह से उड़ चुकी थी।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐

राहुल मकरानी ने अपना मोबाइल उठाया और नम्बर पंच कर के मोबाइल कान से लगाया।

“हैलो निशा, क्या हो रहा है?”

“कुछ नहीं, टीवी देख रही हूँ।” दूसरी तरफ से आवाज कानों में पड़ी।

“बात कहां तक पहुँची।”

“मेरी पूरी कोशिश रहेगी, चंद्रेश के करीब आने की।”

“मैं मुलाकात का इन्तजाम करता हूँ क्योंकि अभी मेरी हालत काफी खराब चल रही है। अभी खान के पालतू कुत्ते आकर मेरी धुनाई कर के गये हैं। अभी मेरी हालत ऐसी नहीं हैं कि हिल सकूँ।” राहुल की आवाज में लड़खड़ाहट थी।

“तुम्हारे कर्म तुम्हें ले डूबेंगे।” निशा ने हँसते हुए कहा।

“ठीक है, कल नक्की लेक पर तुम पहुँचो। हम वहीं से प्लान स्टार्ट करेंगे।” निशा बोली।

“मैं ग्यारह बजे दोपहर को तुम्हरा नक्की लेक पर इंतजार करूंगा।” कह कर राहुल ने फोन काट दिया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
नक्की झील का मनोरम दृश्य चारों तरफ बगीचे थे। लोग नौकायान का लुत्फ ले रहे थे। फोटोग्राफर बीच-बीच में लोगों को डिस्टर्ब कर रहे थे। दिन के साढ़े दस बजे थे। सर्दी में भी आईसक्रीम की सेल बढ़ रही थी। लोग आईसक्रीम का लुत्फ उठा रहे थे। एक बेंच पर निशा ओबेराय और राहुल मकरानी बैठे बात कर रहे थे। दोनों ने चेहरे पर ब्लेक गॉगल्स लगा रखे थे। ऐसा लग रहा था कि दोनों पति-पत्नी हैं। तभी एक फोटोग्राफर उनके पास पहुँचा दोनों की बातों में रुकावट आ गयी।

“कहिये।” राहुल ने उसे घूरते हुए कहा।

“सर आप दोनों की जोड़ी शानदार लग रही है। यदि आप कहें, तो एक दो एक्शन में आपकी फोटो खींच सकता हूँ।” फोटो ग्राफर बोला

“हमें नहीं खिंचवानी है मिस्टर, तुम अपना काम करो।” निशा ने कठोर स्वर में कहा।

“सर मेरे द्वारा खिंची गयी तस्वीर देख लीजिये। चार्ज भी कम हैं और जल्द ही प्रिन्ट-आउट भी दे दूँगा।” फोटोग्राफर ने दयनीय स्वर में कहा।

“मिस्टर फोटोग्राफ, तुम्हें सीधी बात समझ में नहीं आती क्या? हम लोकल हैं और यहाँ जो बोटिंग का ठेका है, वह मेरे मित्र चंद्रेश के पास है। समझे, अब फूटो यहाँ से।”

“ओह! सॉरी सर, मैंने आपको पर्यटक समझा था। आप मल्होत्रा साहब के मित्र हैं।” कहकर फोटोग्राफर वहाँ से चला गया।

“तुम्हारा यह मित्र चंद्रेश मल्होत्रा कितने बजे अपने ऑफिस आता है?” निशा ने गहरी सांस लेते हुए पूछा।

“पता नहीं आज कैसे लेट हो गया? ग्यारह बजे के करीब तक तो आ जाता है।”

तभी राहुल मकरानी का मोबाइल बज उठा। उस पर एक अन्जान नम्बर से कॉल आ रही थी। उसने फोन काट दिया और निशा की तरफ देखते हुए कहा, “अब तक तो उसे आ जाना चाहिये था।”

तभी मोबाइल की रिंग दोबारा बजी। उसने मोबाइल निकाल कर देखा पुनः वह ही नम्बर था। उसने हरा बटन दबाकर फोन उठाया। दूसरी तरफ से अन्जान स्वर कानों में पड़ा, “ मकरानी साहब को इस नाचीज का सलाम।” राहुल के कानों में आवाज गूँजी।

“कौन बोल रहे हैं?”

“मैं कौन बोल रहा हूँ साहब इस बात की चिन्ता ना करें। मैं क्या चाहता हूँ इस बात की चिन्ता करें....।”

“मैं फालतू बात नहीं करना चाहता....” कहकर राहुल ने फोन काटना चाहा।

“ना... ना... ना... मुन्ना, फोन काटने की कोशिश भी ना करना, वरना मैं तुम्हारे और निशा ओबेराय के प्लान की धज्जियाँ उड़ा सकता हूँ, वह भी मात्र दो मिनट में।“ दूसरी तरफ से बोलने वाले शख्स का ठंडा स्वर कानों में गूंजा।

“कौन हो तुम?” राहुल ने घबराये स्वर में पूछा।

“मैं एक सवाल का एक बार ही जबाव देता हूँ। सवाल पूछना मेरा काम है। तुम तो केवल सुनो।”

“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”

“मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ। तुम कहो तो नमूना दिखाऊँ?”

“नहीं।” राहुल काँप गया।

निशा ओबरॉय ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।

“तो जैसा में बोल रहा हूँ, ठीक वैसा ही होना चाहिये।” वह फोन पर राहुल को समझाने लगा।

बात खत्म होने पर राहुल के चेहरे में सर्दी में भी पसीना आने लगा। फोन रखने के बाद उसने रुमाल से अपना पसीना पौछा।

“किसका फोन था?” निशा ने उसकी तरफ देख कर कहा।

“पता नहीं कोई अजनबी था। फोन पर कह रहा था वह सब बातें जानता है। मेरे और तुम्हारे बारे में, रंगा-बिल्ला के बारे में, यहाँ तक की तुम्हारे पति अमन ओबेराय के बारे में भी।” चिन्तित स्वर में राहुल मकरानी बोला।

“अब क्या होगा?” निशा ने व्याकुलता से कहा। उसके गोरे चेहरे पर चिन्ता की लकीर खींच गयी।

“उसने एक काम बताया है। वह करने पर हमारा राज, राज ही रहेगा।” राहुल ने कहा।

“क्या करने को कहा है उसने?” निशा ने पूछा।

राहुल उसे धीमे-धीमे शब्दों में कुछ समझाने लगा। बातें सुनकर निशा के चेहरे का रंग बदलने लगा। तभी सामने से आता हुआ चंद्रेश दिखायी दिया। वह काले रंग की पेन्ट और सफेद शर्ट पहने हुआ था। शर्ट के ऊपर काले रंग का कोट पहने था। उसके हाथ में अटैची थी। वह कुछ चिन्तित लग रहा था। कुछ सोचता हुआ वह इनके पास से निकल गया। उसका ध्यान इनकी तरफ नहीं गया।

अचानक राहुल पीछे से बोला।”हाय चंद्रेश, कैसे हो?”

चंद्रेश ने पीछे मुड़ कर देखा और खुशी से बोला, “हाय राहुल! तुम को देख कर बहुत खुशी हुई। आओ यार, ऑफिस में चलकर बात करते हैं।” चंद्रेश ने चलते हुए कहा।

“ये निशा ओबेराय हैं। मेरी फ्रेन्ड।” राहुल ने दोनों का परिचय कराया।

“आपकी शक्ल कुछ जानी पहचानी लग रही है।” चंद्रेश ने निशा से हाथ मिलाते हुए कहा। निशा के होठों पर जानलेवा मुस्कान उभरी, पर उसने कुछ नहीं कहा।

“चलो ऑफिस में चलकर बात करते हैं।” चंद्रेश ने चलते हुए कहा और तीनों के कदम चंद्रेश मल्होत्रा के ऑफिस की तरफ बढ़ गये।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
ऑफिस के अन्दर तीनों चेयर पर बैठे थे। सामने सेन्टर टेबल पर नाश्ता और कॉफी के प्याले रखे हुए थे। तीनों ने अभी तक कॉफी के प्यालों को हाथ भी नहीं लगाया था। तीनों अपने अपने विचारों में खोये हुए थे। चंद्रेश सोच रहा था, अपनी पत्नी वंशिका के बारे में, राहुल सोच रहा था अपने प्लान के बारे में और निशा सोच रही थी, फोन करने वाले और अपने पति अमन ओबेराय के बारे में। अचानक चंद्रेश का ध्यान भंग हुआ। उसने कॉफी का प्याला उठाते हुए दोनों को ध्यान से देखा।

“कहाँ खो गये तुम लोग?” हडबड़ाते हुए राहुल और निशा भी सोच से बाहर आये और उन्होंने भी अपनी अपनी कॉफी उठाई और चुस्कियाँ लेने लगे।

“आज कैसे टाइम मिल गया राहुल?”

“बस ऐसे ही, दोस्त से मिलने की इच्छा थी, तो आ गये। रास्ते में निशा मिल गयी। हमारी पुरानी जान-पहचान थी, तो इसे भी अपने साथ ले आया।” राहुल चंद्रेश की तरफ देख कर बोला।

राहुल ने चंद्रेश को देखते हुए कहा, “तुमने अमन साहब का नाम तो सुना होगा। निशा जी उन्हीं की पत्नी हैं।”

“ओह ! अमन साहब को तो मैं जानता हूँ। निशा जी से ये मेरी पहली मुलाकत है, पर शक्ल कुछ जानी- पहचानी लगती है। पर याद नहीं आ रहा।” सोचते हुए चंद्रेश बोला। उसकी कॉफी खत्म हो गयी। उसने प्याला मेज पर रख दिया।

" तुम्हारे लिये एक गिफ्ट है। " राहुल ने चंद्रेश की तरफ देख कर कहा।

" क्या ...........?" चंद्रेश ने सवाल पूछा।

"अभी यह राज है। जब खुलेगा तो तुम भी हैरान रह जाओगे " राहुल निशा की तरफ देख कर बोला।

निशा के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, वो चंद्रेश को देखने लगी।

“यार तुम खोये-खोये से हो, ऐसा क्या हो गया?” राहुल ने उसे उदास देख कर पूछा।

“कुछ नहीं यार एक मुसीबत में फँस गया हूँ।” चंद्रेश के स्वर में उकताहट के भाव थे।

“क्या हुआ चंद्रेश?” राहुल ने पूछा।

चंद्रेश ने अपनी और वंशिका की बात राहुल को बताई। निरंजन वाली बात भी बताई।

“यार, उसे हर बात का पता है। मेरे शरीर में कहां कौन-सा निशान है, मैं चाभी कहाँ रखता हूँ, वह हर बात जानती है। उसे मेरे साथ घटी एक एक घटना का पता है। मैं साबित नहीं कर सकता कि वह मेरी वाईफ नहीं है। यहाँ तक की मेरी शादी के फोटोग्राफ भी बदल दिये गये हैं। बहुत गहरी साजिश रची जा रही है मेरे खिलाफ। मैं जान कर भी कुछ नहीं कर सकता।” चंद्रेश ने जोर से मुक्का सेन्टर टेबल पर मारते हुए कहा।

“और तू यह बात मुझे अब बता रहा है।” राहुल ने गुस्से से चंद्रेश से कहा।

“हम मर गये थे क्या? ऐसे कैसे कोई किसी के घर में कब्जा कर किसी की जगह ले सकता है। चल मैं पहचान करता हूँ।” राहुल उठते हुए बोला।

“बैठ जा यार, अब कुछ नहीं हो सकता। वह इंस्पेक्टर भी मुझे ही गलत साबित कर के गया है।” चंद्रेश ने निराशा भरे स्वर में कहा। वह बहुत टूटा हुआ महसूस कर रहा था।

“बहुत खूब मिस्टर चंद्रेश।” निशा ने हँसते हुए कहा।

“तुम हँस रही हो और यहाँ मेरी जान पर बनी पड़ी है।” चंद्रेश ने निशा की तरफ देख कर गुस्से से कहा।

“आपने मुझे बड़े ध्यान से शायद देखा नहीं मिस्टर चंद्रेश। नहीं तो आप अभी खुशी से उछल पड़ते।” निशा अदा के साथ मुस्करा कर बोली।

“आप मुझे जानी-पहचानी लग रही हैं, लेकिन आपको कहाँ देखा है, कह नहीं सकता।” चंद्रेश बोला।

“पाँच-सात साल ज्यादा तो नहीं होते मिस्टर चंद्रेश, किसी को भूलने के लिये, जरा याद करो सुखाड़िया कालेज उदयपुर। मैं तो आपको एक बार में पहचान गयी थी।’’ निशा मुस्कराते हुए बोली।

“अरे तुम निशा कोठारी।” चंद्रेश उसको पहचानते हुए बोला। उसका पूरा शरीर अकड़ गया। वह तन कर बैठ गया।

“शादी के बाद लड़कियों का सरनेम चेन्ज हो जाता है मिस्टर चंद्रेश।” निशा के स्वर में हल्का सा व्यंग्य आ गया।

“ओह मैं बता नहीं सकता तुम को देख कर मैं कितना खुश हूँ।” चंद्रेश के स्वर में जहाँ भर की खुशी समा गयी।

“मैं पुराने दिनों के लिये माफी माँगती हूँ मिस्टर चंद्रेश। उस समय मेरे अन्दर बचपना था। मेरी वजह से आप लोगों को जो दिक्कत हुई, उसकी माफी तो मैं पहले ही आपकी शादी में कार्ड देकर माँग चुकी हूँ।”

“अरे मैं पुरानी बातों को भूल चुका हूँ और तुमसे और सुमित से मुझे कोई गिला नहीं हैं।” चंद्रेश शांत स्वर में बोला।

माहौल संवेदनशील हो गया था।

“यह वंशिका का क्या मामला हैं। वंशिका और तुम्हारी तो लव मैरिज थी। तुम तो किसी लड़की की तरफ देखते भी नहीं थे। मैंने कितनी लाईन मारी तुम पर, मगर सब बेकार गयी।” निशा मुस्कुराते हुए बोली।

अचानक चंद्रेश खुशी से उछल पड़ा, “अरे हाँ यार, तुम तो वंशिका से मिली हुई हो और उसे जानती भी हो। तुम नकली वंशिका को झूठा साबित कर दोगी।” और वह खुशी से खड़ा हो गया।

राहुल का हाथ अपने हाथ में लेता हुआ बोला।”तुमने निशा से मिलाकर मेरा जीवन खुशियों से भर दिया। अब में नकली वंशिका को बताऊँगा कि मैं क्या चीज हूँ।” चंद्रेश खुशी से चहकने लगा।

“वैसे तुम्हारी बात सुनकर में बहुत कुछ समझ गयी, लेकिन एक बार फिर बताओ कि क्या हुआ था?” निशा ने समान्य स्वर में कहा।

चंद्रेश मल्होत्रा ने पूरी कहानी सुना दी।”अब तुम्हें चिन्ता कि क्या जरुरत है। तुम्हारे पास दो-दो गवाह हैं, जो यह बात साबित कर देंगें कि घर में उपस्थित वंशिका नकली है।” राहुल मकरानी बोला।

चंद्रेश के दिल में खुशी के लड्डू फूट रहे थे। उसने खुशी-खुशी फोन उठाया और सौ नम्बर डायल करने लगा।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
थाने में किशोर सिंह भाटी और निरंजन इसी मसले पर चर्चा कर रहे थे।

“सर, वहाँ मिले सारे सबूत वंशिका को सच्चा सबित करते हैं।” निरंजन बोला।

“निरंजन मुझे तो चंद्रेश मल्होत्रा सही बोलता लग रहा था। थाने में उसका रात भर बैठना गलत नहीं हो सकता। उसकी बातों से नहीं लगा कि वह झूठ बोल रहा है।” भाटी ने मूंछो पर ताव देते हुए कहा। उसने अपनी मूंछो की नोक को गोल किया।

“लेकिन सर, सारे सबूत तो वंशिका के पक्ष में और चंद्रेश के खिलाफ मिले।”

“तुम को पुलिस विभाग में कितना टाइम हो गया है?”

“सर, पाँच साल पूरे हो गये, छ्ठा चल रहा है।” निरंजन ने जवाब दिया।

“मुझे सत्ताइस साल हो गये, इस विभाग में। मुजरिम द्वारा झूठे सबूत पैदा करना और सच्चे सबूत नष्ट करना, सत्ताईस साल से यहीं सब देख रहा हूँ।” भाटी ने गर्व से कहा।

“सर हो सकता है कि आप ठीक कह रहे हो, पर फिलहाल तो वंशिका के फेवर में सारा मामला जाता है।”

भाटी कुछ कहना ही चाहता था कि थाने में लगे फोन की घंटी बजने लगी। भाटी ने घूरकर फोन को देखा। दोनों की बातचीत रुक गयी।

“ये भी न, बेवक्त बजती है।”

“होगा कोई फरियादी, आपका चाहने वाला, जिसे आपका चैन से बैठना रास नहीं आता।” निरंजन ने मुस्कराकर कहा। भाटी ने मूंछो को ताव देते हुए फोन उठाया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐

“हलो....., नमस्कार सर।” दूसरी तरफ से खुशी भरा स्वर कानों में पड़ा।

“नमस्कार कौन बोल रहा है?” भाटी ने पूछा।

“निरंजन जी से बात करनी है।” दूसरी तरफ से कहा गया।

“आप कौन साहब बोल रहे हैं?” भाटी ने पूछा।

“सर मैं चंद्रेश मल्होत्रा बोल रहा हूँ।” चंद्रेश बोला।

“अरे मल्होत्रा साहेब, आप तो ऐसे खुश हो रहें हैं जैसे जन्नत मिल गयी हो, हमें तो लगा था कि गम के मारे आपको हार्टअटैक ना आ जाये।” भाटी व्यंग्य भरे स्वर में बोला।

“भाटी सर, आप भी मेरा मजाक उड़ा रहे हैं।” दु:ख भरे स्वर में चंद्रेश ने कहा।

“अरे नहीं भाई, कहो कैसे फोन किया, कहीं आप और आपकी बीवी में समझौता तो नहीं हो गया, जो इतना खुश दिखायी दे रहे हैं।” अर्थपूर्ण स्वर में पूछा गया।

“नहीं सर, मेरे पास ऐसा पक्का सबूत है जो दूध का दूध और पानी का पानी साबित कर दे।” उसके स्वर में विश्वास के भाव थे।

“लगता है हम लोगों का चैन से बैठना आप लोगों को रास नहीं आ रहा है। हमारे निंरजन जी कहते हैं कि वंशिका सच्ची है और आप झूठ बोल रहे हैं और आप सबूत लिये बैठे हैं कि वह झूठी हैं। अजीब मजाक लगा रखा है आप लोगों ने।” भाटी ने तीखे स्वर में कहा।

“सर प्लीज, एक बार मेरी बात का यकीन कीजिये।” उसके स्वर में विनती के भाव थे।

“ठीक है। हम पहुँचते हैं तुम्हारी कॉटेज पर।” भाटी ने कहा।

“नहीं सर, आप कॉटेज पर नहीं, मेरे नक्की वाले ऑफिस में पहुँचिये।” जल्दी से चंद्रेश बोला।

“क्यों भाई?” भाटी ने पूछा।

“वंशिका को अचानक झटका देना चाहता हूँ। मैं नकली वंशिका के चेहरे पर पिटे भाव देखना चाहता हूँ।”

“कहीं ऐसा न हो जाये, कि बाजी ही पलट जाये।” भाटी व्यंग्य से बोला।

“कुछ नहीं होगा सर, आप निरंजन सर को भी साथ ले आइये।” बेचैनी से कहा गया।

“क्यों? निरंजन में हीरे जड़े हुए हैं।” भाटी ने कहा

“उन्होंने कल पूरी कार्यवाही देखी। वह अच्छी तरह सही गलत का पता लगा सकते हैं।”

“ओके।” भाटी ने फोन पटका और निरंजन की तरफ देखते हुए कहा, “चलो देखते हैं, आज क्या नया नाटक देखने को मिलता है।” भाटी ने उठते हुए कहा।

“सर, आपकी बात से लगता है कि चंद्रेश का फोन है और उसे कोई सबूत मिल गया है, जिससे यह साबित हो कि वंशिका नकली है।” निरंजन बोला।

“तुम्हारा सोचना सही है निरंजन।” भाटी भी उठ खड़ा हुआ।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
“बस, हो गया काम।” चंद्रेश ने मोबाइल रखते हुए कहा।

“पुलिस यहाँ आ रही है।” राहुल के चेहरे पर घबराहट उभरी।

“तुम्हें क्या हुआ राहुल।” उसके चेहरे को घूरते हुए चंद्रेश ने पूछा।

“कुछ नहीं यार, पुलिस नाम की चिड़िया से दूर रहता हूँ।” राहुल ने कुर्सी पर पहलू बदलते हुए कहा।

निशा तटस्थ बैठी रही।

अचानक चंद्रेश राहुल के चेहरे को देखते हुए बोल उठा, “तेरे चेहरे पर यह निशान कैसे हैं राहुल?”

“यही बात मैं भी बहुत बार पूछ चुकी हूँ।” निशा ने अपनी हँसी छुपाते हुए कहा।

“कुछ नहीं यार, कल कमरे में चोर घुस आये थे। उनसे हाथापाई हो गयी थी।” राहुल ने नज़रें चुराते हुए कहा।

“पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई।” चंद्रेश ने पूछा।

“नहीं यार, वह घर से कुछ नहीं ले गये। इसलिये रिपोर्ट नहीं लिखवाई।” राहुल ने झूठ बोलते हुए कहा।

“थानेदार साहब आ रहे हैं। मैं बात करता हूँ। ऐसे तो हम लोग सुरक्षित नहीं हैं।”

“अरे यार छोड़ मैं बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहता।” राहुल ने अपनी घबराहट छुपा कर कहा।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐

एक बड़ा-सा हाँल था, जहाँ सेन्टर में यू आकार की टेबल रखी हुई थी, जिसके पीछे पन्द्रह से बीस कुर्सियाँ रखी हुई थी। यह एक मीटिंग हॉल था। कमरे में रोशनी का भरपूर प्रबन्ध था। चारों तरफ सजावट का ध्यान रखा गया था।

दोपहर के दो बज रहे थे। अचानक एक-एक कर लोगों का आना प्रारंभ हो गया। सेन्टर चेयर को छोड़ सारी कुर्सियाँ भर गयी। ढ़ाई बज रहे थे। उस समय अयूब खान ने प्रवेश किया। मजबूत कन्धे, लम्बा चेहरा, चौड़ा माथा, मोटी-मोटी आँखें, गाल पर चाकू का पुराना घाव, जो उसे और भी खूँखार बना रहा था। पैंतालीस-पचास के बीच की उसकी उम्र थी। अयूब खान के चेहरे पर कठोरता साफ दिखायी दे रही थी। उसने काले रंग का पठानी सूट पहन रखा था। सधे हुए कदमों से चलते हुए वह आया और सेन्टर चेयर पर बैठ गया। उसने सिगार जलाया, उसकी निगाह सब तरफ घूमने लगी। सब शांत भाव से उसकी तरफ देख रहे थे। कमरे में शान्ति छाई हुई थी। वहाँ उपस्थित बीस लोगों में से कोई भी शक्ल से शरीफ नजर नहीं आ रहा था, पर उनकी वेशभूषा शानदार थी।

अचानक अयूब खान ने सन्नाटे को भंग किया, “आप सब सोच रहे होंगे कि अचानक मैंने यह अर्जेन्ट मीटिंग क्यों अरेंज की और आप सबको क्यों बुलाया?”

“हम सब यही सोच रहे हैं खान साहब, सब कुछ ठीक चल रहा है, तो फिर इस मीटिंग की क्या जरुरत आ गयी?” एक ने पूछा।

“मुझे पक्की खबर मिली है कि हमारे ग्रुप में कोई पुलिस के लिये मुखबिरी कर रहा है।” खान ने कड़वे स्वर में सबको घूरते हुए कहा।

“खान साहब आप ने हमें यहाँ बेइज्जत करने के लिये बुलाया है।” देसाई ने गुस्से से कहा।

“पिछले दो महीने में चार बार हमारा माल पकड़ा गया है। पाँच साल में यह पहली बार हो रहा है।”

“लेकिन एक आदमी के लिये सब पर शक करना गलत है।” देसाई ने दोबारा कहा।

“मैं अयूब खान, आप सब से वायदा करता हूँ कि अगले तीन दिनों में उस गद्दार को इसी हाल में आप सब के सामने वह सजा दूँगा कि कोई फिर से गद्दारी का विचार भी नहीं करेगा।” बोलते-बोलते खान का चेहरा गुस्से में लाल हो गया।

खान का रौद्र रुप देख कर उपस्थित सभी लोग कांप गये। हाल में चुप्पी छा गयी। खान की नजरों ने वहाँ बैठे लोगों का निरीक्षण किया, फिर कहा, “हमारा नशे का धन्धा फल-फूल रहा है। इसमें मुनाफा भी काफी अच्छा है। मैं इसे और बढ़ाने की सोच रहा हूँ।” शांत स्वर में अयूब खान बोला।

“मैं आपकी बात का सर्मथन करता हूँ।” बशीर खान बोला। सब लोगों के सिर सर्मथन में हिले, एक को छोड़ कर।

“तुम क्या कहते हो देसाई?” अयूब खान ने देसाई से प्रश्न किया।

“आप जानते हैं खान साहब मैं नशे के व्यापार से नफरत करता हूँ। यह जहर हमारी युवा पीढी को खत्म कर रहा है।

” देसाई के स्वर में नफरत उभरी।

“तुम कब से देशभक्त हो गये देसाई?” खान बोला

“मैं अपने धन्धे से खुश हूँ खान साहब?”

“इसका मतलब तुम हमारी खिलाफत करोगे?”

“ऐसा तो मैंने नहीं कहा, लेकिन मैं नशे के धन्धे को नहीं अपनाऊँगा।” हठी स्वर में देसाई बोला।

“ऐसा कितने लोग महसूस करते हैं?” खान ने सबको घूरते हुए पूछा। किसी ने भी विरोध नहीं किया।

“देख देसाई, मुझसे अलग होकर धन्धा करना तुझे फलेगा नहीं। मैं तुझे सोचने की मोहलत देता हूँ। तू अपना जवाब बदल दे या अपना धन्धा बन्द कर दे।” खान ने चेतावनी देते हुए कहा।

“मेरा स्वर हमेशा ऐसा ही रहेगा खान साहब।” देसाई का स्वर दृढ़ हो गया।

“देखते हैं। आज से तीन दिन बाद हम यही मिलेंगे। उस दिन गद्दार आप सबके सामने होगा।” कहते हुए खान उठा और मीटिंग से बाहर निकल गया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
जीप चंद्रेश मल्होत्रा के ऑफिस के बाहर रुकी। निरंजन और भाटी बाहर निकले। चंद्रेश उन्हें लेने बाहर आया।

“आइये सर।” चंद्रेश स्वागत वाले स्वर में बोला।

भीतर पहुँच कर चंद्रेश ने भाटी का परिचय निशा और राहुल मकरानी से कराया। राहुल मकरानी को देखते ही भाटी बोल उठा, “यह आपके चेहरे को क्या हुआ मकरानी साहब? कही लड़ाई तो नहीं हो गयी।”

“नहीं सर, कल कुछ ज्यादा चढ़ गयी थी। सीढ़ियों से गिर गया था।” राहुल ने घबराते हुए कहा।

चंद्रेश ने विचित्र नज़रों से राहुल को घूरा। वह कुछ कहने ही जा रहा था कि निशा ने आँख के इशारे से उसे कहने से मना कर दिया। चंद्रेश ने अपने होंठ सी लिये।

“सीढ़ियों से गिरने के तो यह निशान नहीं लगते। यह तो ठुकाई के निशान लगते हैं। खैर, हमें क्या ...?” भाटी ने अपनी मूंछो पर हाथ फेरते हुए कहा।

“सर, यह निशा मुझे और वंशिका को तब से जानती हैं जब हम कॉलेज में पढ़ा करते थे। यह वंशिका को अच्छी तरह पहचानती है।” चंद्रेश का स्वर उत्तेजना से भरा हुआ था।

“कहाँ पढ़ती थी आप के साथ।” भाटी ने चंद्रेश से पूछा।

“जी हम सुखाड़िया कॉलेज में साथ में पढ़ा करते थे।”

यह सुनते ही निरंजन के होंठ गोल हो गये और मुँह से सीटी बज उठी।

“क्या हुआ निरंजन?” भाटी ने सवाल किया।

“कुछ नहीं सर, इसके बारे में बाद में बात करेंगे।” निरंजन ने भाटी के सवाल को टाल दिया।

भाटी ने राहुल को देखा।

“आप भी वंशिका मल्होत्रा को जानते होंगे।” भाटी ने राहुल से सवाल किया।

“जी सर, अच्छी तरह, तभी तो आपको बुलाया।” राहुल ने गहरी सांस लेते हुए कहा।

“चलो फिर देर किस बात की, दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं।” भाटी ने उठते हुए कहा।

भाटी को उठता देख चारों उठ खड़े हुए और पुलिस जीप की तरफ बढ़ गये। बाहर निकले तो राहुल मकरानी को दूर से रंगा-बिल्ला दिख गये, जो दूर टी-स्टॉल पर चाय पी रहे थे। घबराकर राहुल ने नज़रें घुमा दी। निशा ने राहुल की तरफ देखा फिर स्टॉल पर खड़े रंगा-बिल्ला को देखा। उसके चेहरे पर चिन्ता के भाव आ गये। बाकी तीनों का ध्यान इस तरफ नहीं गया। सब पुलिस जीप में सवार हो गये। जीप कॉटेज की तरफ रवाना हो गयी।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
जीप कॉटेज के बाहर आकर रुकी। चंद्रेश जीप से उतरा। बाकी सब उसके पीछे-पीछे कॉटेज के अन्दर आ गये। मल्होत्रा के चेहरे पर उत्तेजना और खुशी के भाव थे।

“कहाँ गयी मेरी प्यारी धर्मपत्नी जी, देखो आप से मिलने कितने सारे लोग आये हैं।” चंद्रेश ने जोर से चिल्ला कर कहा।

वंशिका अन्दर से बाहर आयी। उसके चेहरे पर नींद की खुमारी नजर आ रही थी। उसने सब को देखा फिर निशा ओबेराय को देख कर खुशी से बोल उठी।

“हाय निशा, कैसी हो? बहुत दिनों बाद दर्शन दिये। अपनी इस प्यारी सहेली को भूल गयी थी क्या?”

निशा ओबेराय ने चौंक कर चंद्रेश की तरफ देखा।

“कहाँ है नकली वंशिका, यह तो सच में असली वंशिका ही है।” उसने हैरानी से वंशिका को देखा और गले लग गयी।

“तुमसे मिले काफी टाइम हो गया था। मुझे नहीं मालूम हमारी मुलाकात इस तरह होगी।” अब हैरानी की बारी चंद्रेश मल्होत्रा की थी।

“क्या बक रही हो निशा? क्या तुम्हें यह वंशिका दिखायी दे रही है। अपने बाल नोंचते हुए चंद्रेश बोला।

“अपने को संभाल चंद्रेश, भाभी से कोई झगड़ा हुआ है, जो तू ऐसा कह रहा है।” राहुल ने समझाते हुए चंद्रेश से कहा।

“तू भी इससे मिल गया, हे भगवान ये क्या हो रहा है? यह कैसी सजिश है, जिसमें मैं फंस गया।” चंद्रेश ने हताश स्वर में कहा।

भाटी और निरंजन मजे लेने वाले अन्दाज में सोफे पर बैठ गये और सारा नाटक देखने लगे।

“ओह! तो अब सारी बात समझ में आ गयी।” वंशिका ने व्यंग्य भरी नज़रों से सब को देखते हुए बोली।

“क्या समझ गयी तू?” चंद्रेश ने पागलपन भरे स्वर में कहा। वह अपना माथा पकड़ कर बैठ गया।

राहुल ने चिन्तित नज़रों से उसे देखा, “क्या हो गया हैं चंद्रेश तुझे? तू अपनी पत्नी को नहीं पहचान पा रहा है। यह तू गलत कर रहा है।” अफसोस भरे स्वर में राहुल बोला।

“तू मेरा दोस्त नहीं हो सकता राहुल।” चंद्रेश ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा।

“बस बहुत हुआ नाटक।” वंशिका सबको गुस्से से घूरती हुई बोली।

“वंशिका संभाल अपने आपको।” निशा अहिस्ते से बोली।

“क्या संभालना अपने को निशा। जब पति अपनी पत्नी पर ही शक करता है। सबके सामने उसे बेइज्जत करने लगा हो। इनका आप सब को यहाँ लाने का मकसद क्या था ? मेरी पहचान करवाना ?” वंशिका रोने लगी।

“चुप कर वंशिका इस तरह रोने से काम नहीं चलेगा। यह सच है कि हम सब तेरी पहचान करने ही आये थे, पर इसमें गलत क्या है?” लम्बी सांस लेती हुई निशा बोल उठी।

“ये मेरी पत्नी नहीं हो सकती। पता नहीं आप सब लोग मुझे गलत ठहराने पर क्यों लगे हुए हैं?” चंद्रेश ने गुस्से में कहा।

“चंद्रेश, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। ये वंशिका ही है। पता नहीं तुझे क्या हो गया है?” चिन्ता भरे स्वर में राहुल बोला।

“आप लोगों का किसी बात में मनमुटाव हो गया हो, तो कृपया शान्ति से मामला निपटा लीजिये नहीं तो आप ही लोगों की इज्जत नीलाम होगी। इसमें पुलिस का कोई रोल ही नहीं होना चाहिये।” अजीब-सी उलझन भरी नजरों से सब को देखती निशा बोल उठी।

“अब कौन-सी इज्जत बाकी रह गयी है।” व्यंग्य भरी नज़रों से सब को देखती हुई वंशिका बोली।

निरंजन और किशोर सिंह भाटी शांत भाव से बैठे यह ड्रामा देख रहे थे और आनंद भी ले रहे थे। दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोल रहा था।

“मुझे समझ में नहीं आ रहा राहुल और निशा क्यों झूठ बोल रहे हैं। मेरा विश्वास कीजिये भाटी साहब ये औरत मेरी पत्नी नहीं हो सकती। कल इसे जीवन में मैंने पहली बार देखा है।” जले-भुने स्वर में चंद्रेश ने कहा।

“हम झूठ नहीं बोल रहे भाटी साहब।” दोनों ने चंद्रेश के शब्दों का विरोध किया।

“मामला काफी टेढ़ा हो गया है।” भाटी ने निरंजन को देखते हुए बैठे-बैठे कहा।

“यहाँ तो चंद्रेश साहब की वाट लग गयी है। उनके गवाह ही उनके विरोध में बोल रहे हैं।” निरंजन व्यंग्य भरी निगाहों से सब को देख कर बोला।

“हम किसी के विरोध में नहीं बोल रहे हैं। हम तो बस सच्चाई का साथ दे रहे हैं।” राहुल उखड़े स्वर में बोला।

वंशिका रोये जा रही थी और निशा उसे चुप करने का प्रयास कर रही थी। रोते-रोते वंशिका की आँखें लाल हो गयी। वंशिका ने अपने आँसू रूमाल से पोंछते हुए कहा, “मैं कल से बार-बार यही साबित कर चुकी हूँ कि मैं ही इनकी पत्नी वंशिका हूँ, फिर भी ये मुझे अपनी पत्नी नहीं मान रहे।”

“मैं तुझे मरते दम तक अपनी पत्नी स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तू मेरी पत्नी नहीं हैं। तू तो कोई नागिन है, जो मेरे घर को तबाह करने आयी हुई है।” चंद्रेश ने तेज स्वर बोला।

भाटी ने अपनी मूंछो पर हाथ फेरा और जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाई। उसने कुर्सी पर पहलू बदला और गहरी साँस लेते हुए सब को देखा। फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी। वह उठा और चहल-कदमी करता हुआ बोला, “कहानी खत्म, ड्रामा खत्म, वाह ! क्या सीन हैं। इस कहानी में सब कुछ मिला। चंद्रेश साहब के गवाह के बदलते रुप, वंशिका मैडम की शानदार अदाकारी मजा आ गया।” व्यंग्यभरी नज़रों से उसने सब को देखा।

वंशिका ने चिहुँक कर भाटी को देखा, “ आपको क्या लगता है कि मैं मजाक कर रही हूँ, नाटक कर रही हूँ?” गुस्से भरे स्वर में वंशिका बोली।

“पुलिस में नौकरी करते हुए हमें सत्ताइस साल हो गये मोहतरमा, हमने सत्ताइस साल में घास नहीं छीली है मैडम। आपको अभिनय के लिये बेस्ट एक्ट्रैस का खिताब मिलना चाहिये।”

यह शब्द सुनते ही चंद्रेश मल्होत्रा के चेहरे पर रौनक आ गयी। बोला, “धन्यवाद सर, जो आपने मेरी बात का विश्वास किया। यकीन कीजिये सर, ये झूठ बोल रही हैं। पता नहीं राहुल और निशा भी क्यों झूठ बोल रहे हैं?” लम्बी साँस लेते हुए चंद्रेश बोला।

“आपसे किस चिड़िया ने कहा कि मैंने आपकी बात का यकीन कर लिया है।” लापरवाही से भाटी ने कहा।

अब चौंकने की बारी वंशिका की थी। उसके चेहरे पर अजीब-सी उलझन के भाव आ गये।

“मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है, जो मंजूर-ए-खुदा होता है।” भाटी के स्वर में चंचलता भर गयी।

निरंजन बड़े मजे से भाटी की कार्यवाही देख रहा था। उसने पहली बार भाटी का यह रूप देखा था।
 

Similar threads

S
Replies
14
Views
15
StoryPublisher
S
S
Replies
61
Views
62
StoryPublisher
S
S
Replies
74
Views
75
StoryPublisher
S
S
Replies
108
Views
109
StoryPublisher
S
Back
Top