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चंद्रेश ने कार को कॉटेज के बाहर रोका। कार से उतरकर चंद्रेश ने निरंजन की ओर देख कर बोला, “आइये सर।”
निरंजन ने कॉटेज का बहुत बारीकी से मुआयना किया। फिर बोला, “चलिये।”
गार्डन पार कर के अन्दर आये, तो शान्ति थी। किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं थी। चंद्रेश ने जल्दी ही पूरी कॉटेज का चक्कर लगाया। कहीं कोई नहीं था। चंद्रेश का दिमाग चकरा गया।”कहाँ गयी” मन ही मन सोचा निरंजन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। सामने रखे सोफे पर बैठता हुआ बोला, “मुझे तो कॉटेज में कोई नहीं दिखा।”
“मैं जब गया, वह यही थी।” चंद्रेश ने आश्चर्य से कहा।
“एक बात बताओ मिस्टर मल्होत्रा, जब आप यहाँ से गये थे, तो कॉटेज खुली छोड़ कर गये थे या लॉक लगा के गये थे?” निरंजन ने कुछ सोचते हुए पूछा।
“कॉटेज तो खुली ही छोड़ कर गया था, क्योंकि वह यहाँ से जाने को तैयार नहीं थी। मेरी उससे इसी बारे में बहस हो रही थी।”
“क्या बात कर रहे हैं मल्होत्रा साहब? अन्जान महिला को अपने घर में कैसे छोड़ा आपने? यहाँ से पुलिस को फोन कर के बुला सकते थे।” निरंजन ने आश्चर्य से उसकी और देखते हुए कहा।
“मैंने पुलिस स्टेशन फोन लगाया, लेकिन वहाँ से जवाब आया यह रेलवे स्टेशन है।” चंद्रेश ने उत्तर दिया।
“अब सारी बात मेरी समझ में आ गयी। यह सारा ड्रामा शायद किसी कीमती चीज के कारण हुआ है। आप अपनी सब चीजें देख लें, कहीं कुछ गायब तो नहीं हुआ?” अपने सिर की कैप हटा कर सोफे पर रखते हुए निरंजन बोला।
“नहीं सर सब कुछ वैसा ही है, जैसा की मैं छोड़ कर गया था।” चंद्रेश ने जल्दी से कहा।
“इतनी जल्दी जवाब मत दीजिये। पहले आप एक बार चेक कर लीजिये। उसके बाद मैं चला जाऊँगा।”
“ठीक हैं सर, मैं चेक कर लेता हूँ। वैसे उसे ले जाना होता, तो पहले ही ले जा सकती थी, जब वह दरवाजा खोल चुकी थी। मुझ से मिलने की आवश्यकता नहीं थी।” चंद्रेश पिछले कमरे की तरफ जाता हुआ बोला।
चंद्रेश ने अपने कमरे का पूरा निरीक्षण किया। गुप्त तिजोरी खोली उसमें कैश वैसा ही था। कुछ भी गायब नहीं हुआ था। घर का कीमती सामान भी वैसा ही था, जैसा कि वह छोड़ कर गया था।
वह वापस बैठक में आया। सामने सोफे पर बैठते हुए निरंजन को देखता हुआ बोला।”सब ठीक है सर, कुछ भी गायब नहीं हुआ है।”
“चक्कर समझ में नहीं आया। ठीक हैं मैं चलता हूँ।” निरंजन ने सोफे से उठते हुए कहा।
“अरे सर, ऐसे कैसे जाओगे, आपने हमारे लिये इतना कष्ट किया है तो एक कॉफी मेरे साथ पीनी ही पड़ेगी।” चंद्रेश ने उठते हुए कहा।
“अरे नहीं चंद्रेश जी।” निरंजन ने उसे रोकने की कोशिश की, पर चंद्रेश नहीं रुका, बोला, “बस दो मिनट में तैयार हो जायेगी। वैसे मुझे अपने लिये भी बनानी हैं।” अन्दर से चंद्रेश की आवाज आयी।
निरंजन वापस सोफे पर बैठ गया और न्यूज पेपर के पेज पलटने लगा। दस मिनिट बाद चंद्रेश बिस्कुट, नमकीन और मिठाई के साथ हाजिर हुआ।
“अरे इसकी क्या जरूरत थी।” निरंजन शान्त स्वर में बोला।
चंद्रेश ने सेन्टर टेबल पर ट्रे रख दी और वे लोग बातें करते कॉफी पीने लगे। कॉफी समाप्त करके चंद्रेश ने कप रखा ही था कि उसकी नजर मेन डोर पर चली गयी, तो वह हैरान रह गया। चंद्रेश की नज़रों का पीछा करते हुए निरंजन ने मेन डोर पर नजरें गड़ाई तो वह भी हैरान हो गया।
उन्होंने देखा सामने एक खूबसूरत कयामत खड़ी थी। निरंजन भी उसकी सुन्दरता में खो गया। एक शानदार परी-सा चेहरा लिये हुए वंशिका खड़ी थी। चंद्रेश ने उसे कोहनी से हिलाया। निरंजन महिला के जादू से बाहर निकला।
“सर वह ही है।” चंद्रेश बोला
निरंजन ने वंशिका के चेहरे पर नजर गड़ायी। वंशिका ने भी पलके ना झपकायीं और अदा से निंरजन को देखा
“आपकी तारीफ?” निरंजन पुलिसिया अन्दाज में बोला।
“तारीफ उस खुदा की कीजिये, जिसने हमें बनाया।” महिला ने व्यंग्य से कहा।
“जो पूछा जाये, उसका सही तरीके से जवाब दो।” निरंजन का स्वर कठोर हो गया।
“मेरे घर में खड़े होकर ऐसे सवाल पूछोगे, तो ऐसे ही जवाब मिलेंगे।’’ महिला के स्वर में अकड़ के भाव आ गये। उसके चेहरे से नहीं लग रहा था कि वह पुलिस की वर्दी देख कर घबराई हो या उसके चेहरे पर कोई बेचैनी या परेशानी के भाव आये हों। निरंजन भी हैरान रह गया, ऐसी दंबगई उसने पहली बार देखी। वरना पुलिस को देख कर सच्चे लोग भी घबरा जाते हैं।
“आप का नाम क्या है?” निरंजन ने पूछा।
“क्यों मेरे पतिदेव ने नहीं बताया?” उसके स्वर में व्यंग्य के भाव आ गये।
“यह आपको अपनी पत्नी नहीं मान रहे हैं। इन्होंने आपके विरूद्ध रिपोर्ट लिखवाई है।”
“इस बारे में आप का क्या कहना है?”
“कलयुग में पतिदेव ऐसे ही होते हैं।”
“आप ढंग से जवाब दें, यह कानूनी कार्यवाही है। कोई आप स्टेज पर खड़ी होकर ड्रामा नहीं कर रही, समझीं आप।”
“ठीक है पूछो क्या पूछना चाहते हो?” महिला ने हथियार डालते हुए कहा।
“आप का नाम क्या है?”
“वंशिका अरोड़ा मल्होत्रा।”
“यह अरोड़ा और मल्होत्रा दोनों साथ में कैसे?”
“शादी से पहले मेरा नाम वंशिका अरोड़ा था, जो शादी के बाद मल्होत्रा हो गया।”
“क्या ये सच बोल रही है?” निरंजन ने चंद्रेश को देखते हुए कहा।
“हाँ सर, यह सही कह रही है, पर यह वंशिका नहीं है।” चंद्रेश ने व्यग्र भाव से कहा।
“इसका फैसला करने वाले आप कौन होते हैं? यह फैसला करना मेरा काम है।” निरंजन ने मल्होत्रा को देखते हुए कहा।
“अब मैं आपसे जो सवाल पूछूँगा, उसका जवाब ‘हाँ’ या ‘ना’ में देना। बीच में कुछ भी नहीं बोलना।’’ निरंजन ने मल्होत्रा से कहा।
“जी सर।” मल्होत्रा ने मरे स्वर में जवाब दिया।
“आपकी लव मैरिज है या अरेंज?” निरंजन ने वंशिका की तरफ देख कर पूछा।
“पहले लव, उसके बाद अरेंज।” वंशिका ने जवाब दिया।
निरंजन ने चंद्रेश की तरफ देख कर बोला, “सही या गलत?”
“सही, लेकिन.....?” मल्होत्रा ने जवाब दिया।
“बस।” निरंजन ने वंशिका की तरफ देख कर कहा।
“यह तो कह रहे हैं, मेरी वाईफ काफी दिनों से लापता है, आप का क्या कहना है?”
“मेरा एक्सीडेन्ट हो गया था। होश परसों ही आया, तो चली आयी।” वंशिका ने जवाब दिया।
“कहाँ थी इतने दिन आप?”
“एक वकील ने मेरी जान बचाई। मैं उन के यहाँ सात-आठ दिन थी।”
“आप उनका एड्रैस दे सकती हैं?”
“जी बिलकुल, आप उन से पूछ सकते हैं।”
“ठीक है, मैं पूछताछ करता हूँ।”
“सबसे अहम बात, आप अन्दर कैसे आयी? दरवाजा तो लॉक था।” निरंजन ने पूछा।
“हाँ-हाँ पूछिए निरंजन सर, ये अन्दर कैसे आयी?”
“आप चुप रहिये, आपको भी मौका मिलेगा। पहले मोहतरमा से पूछताछ करने दो।” निरंजन ने मल्होत्रा को रोकते हुए कहा।
“हाँ, तो आप बताइये वंशिका जी?”
“यह वंशिका नहीं है इंस्पेक्टर साहेब।” चंद्रेश जोर से चिल्लाया।
“चुप।” निरंजन खड़ा होकर उसकी आवाज दबाते हुए जोर से चिल्लाया, “एकदम चुप, जब तक आप से न बोला जाये, आप नहीं बोलेंगे।” निरंजन गुस्से में बोला।
चंद्रेश ने नजरें झुकाते हुए पहलू बदला। वंशिका के होंठ पर कुटिल मुस्कान उभरी, जो निरंजन की उस पर पड़ते ही लुप्त हो गयी।
“हाँ, तो मोहतरमा जी, आप अन्दर कैसे आयी?”
“वह भी इनके कारण?” वंशिका ने जबाव दिया।
“मेरे कारण? कैसे?” मल्होत्रा हैरानी से बोला।
“इंस्पेक्टर इनके भूलने की आदत की वजह से हमने घर के मेन डोर की दो चाभी बना रखी हैं, जिसकी एक चाभी बाहर पड़े गमलों में रखी रहती थी। अगर चाभी गिर जाये, तो वहाँ से निकाल ली जाती है। मैं उसी चाभी से मेन डोर खोल कर अन्दर आयी।” वंशिका ने कहा।
“क्या यह सही कह रही है?” निरंजन ने चंद्रेश से पूछा।
“जी सर, पर यह बात इन को कैसे पता चली?” चंद्रेश का स्वर हैरानी से भर गया।
“और तो और मैं कई बात बता सकती हूँ, जो केवल पति-पत्नी के बीच रहती हैं। उदाहरण के तौर पर इनकी दायी जाँघ में तिल का निशान है।” वंशिका ने कहा।
“यह सही कह रही हैं।” निरंजन ने चंद्रेश को देख कर कहा।
“हाँ, यह बात तो है, पर यह कोई भी बता सकता है। इसमें नई बात नहीं।” चंद्रेश ने कहा।
“हाँ ये तो है।” निरंजन ने उसका समर्थन किया।
“हाँ अब आप साबित करो कि यह आपकी पत्नी वंशिका नहीं है।” निरंजन ने चंद्रेश को देख कर कहा।
“यह तो मैं जानता हूँ कि ये मेरी पत्नी नहीं है।” चंद्रेश निरंजन से बोला।
“साबित करो।”
“अभी साबित हो जायेगा, मेरे पास शादी के कुछ फोटो ग्राफ्स हैं। मैं उन्हें आपको दिखाता हूँ।” चंद्रेश सोफे से उठते हुए बोला।
“लेकर आइये।” निरंजन ने कहा।
निरंजन सोफे से उठा और अन्दर कमरे में चला गया।
वंशिका के चेहरे पर खौफ उभरा।
“मैं भी जा सकती हूँ।” वंशिका ने उठते हुए कहा।
“जी नहीं मोहतरमा, आप यहीं विराजिये।” निरंजन ने शान्त स्वर में कहा।
वंशिका पुनः सोफे पर बैठ गयी और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगी। थोड़ी देर में हड़बड़ाते हुए चंद्रेश बाहर निकला। उसके हाथ में एक बीफ्रकेस था, जो उसके हाथ में लटक रहा था। पास में वह निराश होकर बैठ गया। उसका चेहरा लटका हुआ था।
“क्या हुआ मि. चंद्रेश?” निरंजन ने उसकी ओर देख कर पूछा।
“निरंजन सर, इसकी चाभी मिल नहीं रही है और फोटो की एलबम इसके अन्दर है।”
वंशिका के चेहरे पर रौनक लौटी, “यह बहानेबाजी है। कोई सबूत नहीं है मेरे खिलाफ। यह सब झूठ है।” वंशिका बोली।
“तो चाभी नहीं है आप के पास। अब क्या चाहते हैं आप?” निंरजन ने कहा।
“मैं क्या करूं, समझ नहीं पा रहा हूँ।” चंद्रेश उदास स्वर में बोला।
“आपकी इस समस्या को मैं हल कर देता हूँ।” निरंजन ने कहा।
“वह कैसे इंस्पेक्टर साहब?”
“ऐसे समय के लिये हमारे पास मास्टर की नाम की वस्तु पायी जाती है, जो कोई भी ताला खोल देती है।” निरंजन ने मजे लेते हुए कहा।
निरंजन ने अपनी पिस्तौल से एक फायर कर अटैची का ताला तोड़ दिया।
मल्होत्रा खुशी से उछल पड़ा, “अब आयेगा मजा?”
निरंजन ने वंशिका का चेहरा देखा। उसका चेहरा उतर गया। वह बेचैनी से इधर-उधर देखने लगी।
“गई भैंस पानी में। हो गया दूध का दूध पानी का पानी।” चंद्रेश ने अटैची खोली और एक एलबम निकाल कर निरंजन के हाथ में रख दी।
“देख लो सर मेरी सच्चाई सामने आ गयी।” चंद्रेश चहका।
निरंजन ने एलबम खोली और आश्चर्य से वंशिका के लटके चेहरे को देखता रहा। जैसे-जैसे वह एलबम देखता उसका गुस्सा बढ़ता चला जाता। वंशिका का चेहरा उत्तरा हुआ था।
“यह क्या मजाक बना रखा हैं आपने मि. चंद्रेश? आपको मैं पागल दिखायी देता हूँ।” उसने गुस्से में मल्होत्रा को देखते हुए कहा।
“क्या हुआ निरंजन सर?” चंद्रेश बोला।
“आप खुद पहले एलबम देख लें, फिर मुझ से बात करें।” निरंजन ने गुस्से में चंद्रेश से कहा।
चंद्रेश ने एलबम उठाई और ध्यान से एक एक पेज पलटने लगा। उसकी हैरानी बढ़ने लगी।
“यह नहीं हो सकता?” वह जोर से चिल्लाया।
“क्यों नहीं हो सकता?” निरंजन उससे भी तेज स्वर में चिल्लाया।
“क्यों नहीं हो सकता? अटैची आपकी, घर आपका?” निरंजन तेज आवाज में बोला।
निरंजन गुस्से में चंद्रेश को देख रहा था। एलबम में वंशिका और चंद्रेश की तस्वीरें थीं। सारी तस्वीरों में वही वंशिका थी, जो इस वक्त उनके सामने बैठी थी।
वंशिका के चेहरे पर कुटिल मुस्कान उभरी और पल भर में लुप्त हो गयी। उसने आखों में आँसू भरते हुए कहा, “देख लिया सर आपने, पता नहीं ये किस बात से मुझ से नाराज हैं।” उसके स्वर में भोलापन उभरा, “पहले तो ये ऐसे नहीं थे।” रोते हुए वंशिका बोली।
चंद्रेश मल्होत्रा का जी चाह रहा था कि वह अपने बाल नोच ले। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप पर काबू पाया।“यह एक चाल है इंस्पेक्टर साहब। यह फोटो ट्रिक फोटोग्राफी है।”
“अब आपके द्वारा पेश किये गये सबूत ही झूठे हैं। वाह चंद्रेश साहेब, बेशर्मी की भी हद है।” निरंजन ने गुस्से में कहा।
“पता नहीं कैसे फोटोग्राफ बदल गये, मैं नहीं जानता। शायद, मेरे पुलिस स्टेशन जाने के बाद इसने बदल दिये होंगे।’’ चंद्रेश ने वंशिका की तरफ अगुंली उठा कर कहा।
“यह मेरे ऊपर गलत इल्जाम है।” वंशिका बोली।
“चुप कर।” गुस्से में चंद्रेश वंशिका पर डपटा।
“आप मेरी बात समझिए निरंजन सर, यह मेरे खिलाफ कोई गहरी साजिश है।” चंद्रेश निरंजन से बोला।
“मैं सब समझ गया चंद्रेश साहेब। यह आप का पारिवारिक मामला है। इसमें पुलिस का कोई दखल नहीं।”
“यह गलत हो रहा है।” चंद्रेश गुस्से में तेज स्वर में बोला।
“अगर आपकी अपनी पत्नी से नहीं बन रही है, तो इसमें पुलिस क्या कर सकती है? यह आपके घर का मामला है। इसे आपको ही सुलझाना होगा।” निरंजन ने टोपी पहनते हुए शान्त स्वर में कहा।
“लगता है मुझे ऊपर कमिश्नर से बात करनी होगी।” मल्होत्रा ने हताश स्वर में कहा।
“वह आप का अधिकार है। अब मुझे इजाजत दीजिये।” कहकर निंरजन ने बाहर की तरफ कदम बढ़ाये।
अचानक घूम कर बोला, “एक बात कान खोल कर सुन लीजिये चंद्रेश साहेब। मेरे इलाके में किसी भी तरह का क्राइम में सहन नहीं करुँगा। यह आप दोनों को मेरी वैधानिक चेतावनी है।”
कह कर निरंजन मुड़ा और लम्बे कदमों से बाहर की तरफ निकल गया। चंद्रेश का चेहरा मुरझा गया और वंशिका का चेहरा खिल गया।
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निरंजन ने कॉटेज का बहुत बारीकी से मुआयना किया। फिर बोला, “चलिये।”
गार्डन पार कर के अन्दर आये, तो शान्ति थी। किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं थी। चंद्रेश ने जल्दी ही पूरी कॉटेज का चक्कर लगाया। कहीं कोई नहीं था। चंद्रेश का दिमाग चकरा गया।”कहाँ गयी” मन ही मन सोचा निरंजन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। सामने रखे सोफे पर बैठता हुआ बोला, “मुझे तो कॉटेज में कोई नहीं दिखा।”
“मैं जब गया, वह यही थी।” चंद्रेश ने आश्चर्य से कहा।
“एक बात बताओ मिस्टर मल्होत्रा, जब आप यहाँ से गये थे, तो कॉटेज खुली छोड़ कर गये थे या लॉक लगा के गये थे?” निरंजन ने कुछ सोचते हुए पूछा।
“कॉटेज तो खुली ही छोड़ कर गया था, क्योंकि वह यहाँ से जाने को तैयार नहीं थी। मेरी उससे इसी बारे में बहस हो रही थी।”
“क्या बात कर रहे हैं मल्होत्रा साहब? अन्जान महिला को अपने घर में कैसे छोड़ा आपने? यहाँ से पुलिस को फोन कर के बुला सकते थे।” निरंजन ने आश्चर्य से उसकी और देखते हुए कहा।
“मैंने पुलिस स्टेशन फोन लगाया, लेकिन वहाँ से जवाब आया यह रेलवे स्टेशन है।” चंद्रेश ने उत्तर दिया।
“अब सारी बात मेरी समझ में आ गयी। यह सारा ड्रामा शायद किसी कीमती चीज के कारण हुआ है। आप अपनी सब चीजें देख लें, कहीं कुछ गायब तो नहीं हुआ?” अपने सिर की कैप हटा कर सोफे पर रखते हुए निरंजन बोला।
“नहीं सर सब कुछ वैसा ही है, जैसा की मैं छोड़ कर गया था।” चंद्रेश ने जल्दी से कहा।
“इतनी जल्दी जवाब मत दीजिये। पहले आप एक बार चेक कर लीजिये। उसके बाद मैं चला जाऊँगा।”
“ठीक हैं सर, मैं चेक कर लेता हूँ। वैसे उसे ले जाना होता, तो पहले ही ले जा सकती थी, जब वह दरवाजा खोल चुकी थी। मुझ से मिलने की आवश्यकता नहीं थी।” चंद्रेश पिछले कमरे की तरफ जाता हुआ बोला।
चंद्रेश ने अपने कमरे का पूरा निरीक्षण किया। गुप्त तिजोरी खोली उसमें कैश वैसा ही था। कुछ भी गायब नहीं हुआ था। घर का कीमती सामान भी वैसा ही था, जैसा कि वह छोड़ कर गया था।
वह वापस बैठक में आया। सामने सोफे पर बैठते हुए निरंजन को देखता हुआ बोला।”सब ठीक है सर, कुछ भी गायब नहीं हुआ है।”
“चक्कर समझ में नहीं आया। ठीक हैं मैं चलता हूँ।” निरंजन ने सोफे से उठते हुए कहा।
“अरे सर, ऐसे कैसे जाओगे, आपने हमारे लिये इतना कष्ट किया है तो एक कॉफी मेरे साथ पीनी ही पड़ेगी।” चंद्रेश ने उठते हुए कहा।
“अरे नहीं चंद्रेश जी।” निरंजन ने उसे रोकने की कोशिश की, पर चंद्रेश नहीं रुका, बोला, “बस दो मिनट में तैयार हो जायेगी। वैसे मुझे अपने लिये भी बनानी हैं।” अन्दर से चंद्रेश की आवाज आयी।
निरंजन वापस सोफे पर बैठ गया और न्यूज पेपर के पेज पलटने लगा। दस मिनिट बाद चंद्रेश बिस्कुट, नमकीन और मिठाई के साथ हाजिर हुआ।
“अरे इसकी क्या जरूरत थी।” निरंजन शान्त स्वर में बोला।
चंद्रेश ने सेन्टर टेबल पर ट्रे रख दी और वे लोग बातें करते कॉफी पीने लगे। कॉफी समाप्त करके चंद्रेश ने कप रखा ही था कि उसकी नजर मेन डोर पर चली गयी, तो वह हैरान रह गया। चंद्रेश की नज़रों का पीछा करते हुए निरंजन ने मेन डोर पर नजरें गड़ाई तो वह भी हैरान हो गया।
उन्होंने देखा सामने एक खूबसूरत कयामत खड़ी थी। निरंजन भी उसकी सुन्दरता में खो गया। एक शानदार परी-सा चेहरा लिये हुए वंशिका खड़ी थी। चंद्रेश ने उसे कोहनी से हिलाया। निरंजन महिला के जादू से बाहर निकला।
“सर वह ही है।” चंद्रेश बोला
निरंजन ने वंशिका के चेहरे पर नजर गड़ायी। वंशिका ने भी पलके ना झपकायीं और अदा से निंरजन को देखा
“आपकी तारीफ?” निरंजन पुलिसिया अन्दाज में बोला।
“तारीफ उस खुदा की कीजिये, जिसने हमें बनाया।” महिला ने व्यंग्य से कहा।
“जो पूछा जाये, उसका सही तरीके से जवाब दो।” निरंजन का स्वर कठोर हो गया।
“मेरे घर में खड़े होकर ऐसे सवाल पूछोगे, तो ऐसे ही जवाब मिलेंगे।’’ महिला के स्वर में अकड़ के भाव आ गये। उसके चेहरे से नहीं लग रहा था कि वह पुलिस की वर्दी देख कर घबराई हो या उसके चेहरे पर कोई बेचैनी या परेशानी के भाव आये हों। निरंजन भी हैरान रह गया, ऐसी दंबगई उसने पहली बार देखी। वरना पुलिस को देख कर सच्चे लोग भी घबरा जाते हैं।
“आप का नाम क्या है?” निरंजन ने पूछा।
“क्यों मेरे पतिदेव ने नहीं बताया?” उसके स्वर में व्यंग्य के भाव आ गये।
“यह आपको अपनी पत्नी नहीं मान रहे हैं। इन्होंने आपके विरूद्ध रिपोर्ट लिखवाई है।”
“इस बारे में आप का क्या कहना है?”
“कलयुग में पतिदेव ऐसे ही होते हैं।”
“आप ढंग से जवाब दें, यह कानूनी कार्यवाही है। कोई आप स्टेज पर खड़ी होकर ड्रामा नहीं कर रही, समझीं आप।”
“ठीक है पूछो क्या पूछना चाहते हो?” महिला ने हथियार डालते हुए कहा।
“आप का नाम क्या है?”
“वंशिका अरोड़ा मल्होत्रा।”
“यह अरोड़ा और मल्होत्रा दोनों साथ में कैसे?”
“शादी से पहले मेरा नाम वंशिका अरोड़ा था, जो शादी के बाद मल्होत्रा हो गया।”
“क्या ये सच बोल रही है?” निरंजन ने चंद्रेश को देखते हुए कहा।
“हाँ सर, यह सही कह रही है, पर यह वंशिका नहीं है।” चंद्रेश ने व्यग्र भाव से कहा।
“इसका फैसला करने वाले आप कौन होते हैं? यह फैसला करना मेरा काम है।” निरंजन ने मल्होत्रा को देखते हुए कहा।
“अब मैं आपसे जो सवाल पूछूँगा, उसका जवाब ‘हाँ’ या ‘ना’ में देना। बीच में कुछ भी नहीं बोलना।’’ निरंजन ने मल्होत्रा से कहा।
“जी सर।” मल्होत्रा ने मरे स्वर में जवाब दिया।
“आपकी लव मैरिज है या अरेंज?” निरंजन ने वंशिका की तरफ देख कर पूछा।
“पहले लव, उसके बाद अरेंज।” वंशिका ने जवाब दिया।
निरंजन ने चंद्रेश की तरफ देख कर बोला, “सही या गलत?”
“सही, लेकिन.....?” मल्होत्रा ने जवाब दिया।
“बस।” निरंजन ने वंशिका की तरफ देख कर कहा।
“यह तो कह रहे हैं, मेरी वाईफ काफी दिनों से लापता है, आप का क्या कहना है?”
“मेरा एक्सीडेन्ट हो गया था। होश परसों ही आया, तो चली आयी।” वंशिका ने जवाब दिया।
“कहाँ थी इतने दिन आप?”
“एक वकील ने मेरी जान बचाई। मैं उन के यहाँ सात-आठ दिन थी।”
“आप उनका एड्रैस दे सकती हैं?”
“जी बिलकुल, आप उन से पूछ सकते हैं।”
“ठीक है, मैं पूछताछ करता हूँ।”
“सबसे अहम बात, आप अन्दर कैसे आयी? दरवाजा तो लॉक था।” निरंजन ने पूछा।
“हाँ-हाँ पूछिए निरंजन सर, ये अन्दर कैसे आयी?”
“आप चुप रहिये, आपको भी मौका मिलेगा। पहले मोहतरमा से पूछताछ करने दो।” निरंजन ने मल्होत्रा को रोकते हुए कहा।
“हाँ, तो आप बताइये वंशिका जी?”
“यह वंशिका नहीं है इंस्पेक्टर साहेब।” चंद्रेश जोर से चिल्लाया।
“चुप।” निरंजन खड़ा होकर उसकी आवाज दबाते हुए जोर से चिल्लाया, “एकदम चुप, जब तक आप से न बोला जाये, आप नहीं बोलेंगे।” निरंजन गुस्से में बोला।
चंद्रेश ने नजरें झुकाते हुए पहलू बदला। वंशिका के होंठ पर कुटिल मुस्कान उभरी, जो निरंजन की उस पर पड़ते ही लुप्त हो गयी।
“हाँ, तो मोहतरमा जी, आप अन्दर कैसे आयी?”
“वह भी इनके कारण?” वंशिका ने जबाव दिया।
“मेरे कारण? कैसे?” मल्होत्रा हैरानी से बोला।
“इंस्पेक्टर इनके भूलने की आदत की वजह से हमने घर के मेन डोर की दो चाभी बना रखी हैं, जिसकी एक चाभी बाहर पड़े गमलों में रखी रहती थी। अगर चाभी गिर जाये, तो वहाँ से निकाल ली जाती है। मैं उसी चाभी से मेन डोर खोल कर अन्दर आयी।” वंशिका ने कहा।
“क्या यह सही कह रही है?” निरंजन ने चंद्रेश से पूछा।
“जी सर, पर यह बात इन को कैसे पता चली?” चंद्रेश का स्वर हैरानी से भर गया।
“और तो और मैं कई बात बता सकती हूँ, जो केवल पति-पत्नी के बीच रहती हैं। उदाहरण के तौर पर इनकी दायी जाँघ में तिल का निशान है।” वंशिका ने कहा।
“यह सही कह रही हैं।” निरंजन ने चंद्रेश को देख कर कहा।
“हाँ, यह बात तो है, पर यह कोई भी बता सकता है। इसमें नई बात नहीं।” चंद्रेश ने कहा।
“हाँ ये तो है।” निरंजन ने उसका समर्थन किया।
“हाँ अब आप साबित करो कि यह आपकी पत्नी वंशिका नहीं है।” निरंजन ने चंद्रेश को देख कर कहा।
“यह तो मैं जानता हूँ कि ये मेरी पत्नी नहीं है।” चंद्रेश निरंजन से बोला।
“साबित करो।”
“अभी साबित हो जायेगा, मेरे पास शादी के कुछ फोटो ग्राफ्स हैं। मैं उन्हें आपको दिखाता हूँ।” चंद्रेश सोफे से उठते हुए बोला।
“लेकर आइये।” निरंजन ने कहा।
निरंजन सोफे से उठा और अन्दर कमरे में चला गया।
वंशिका के चेहरे पर खौफ उभरा।
“मैं भी जा सकती हूँ।” वंशिका ने उठते हुए कहा।
“जी नहीं मोहतरमा, आप यहीं विराजिये।” निरंजन ने शान्त स्वर में कहा।
वंशिका पुनः सोफे पर बैठ गयी और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगी। थोड़ी देर में हड़बड़ाते हुए चंद्रेश बाहर निकला। उसके हाथ में एक बीफ्रकेस था, जो उसके हाथ में लटक रहा था। पास में वह निराश होकर बैठ गया। उसका चेहरा लटका हुआ था।
“क्या हुआ मि. चंद्रेश?” निरंजन ने उसकी ओर देख कर पूछा।
“निरंजन सर, इसकी चाभी मिल नहीं रही है और फोटो की एलबम इसके अन्दर है।”
वंशिका के चेहरे पर रौनक लौटी, “यह बहानेबाजी है। कोई सबूत नहीं है मेरे खिलाफ। यह सब झूठ है।” वंशिका बोली।
“तो चाभी नहीं है आप के पास। अब क्या चाहते हैं आप?” निंरजन ने कहा।
“मैं क्या करूं, समझ नहीं पा रहा हूँ।” चंद्रेश उदास स्वर में बोला।
“आपकी इस समस्या को मैं हल कर देता हूँ।” निरंजन ने कहा।
“वह कैसे इंस्पेक्टर साहब?”
“ऐसे समय के लिये हमारे पास मास्टर की नाम की वस्तु पायी जाती है, जो कोई भी ताला खोल देती है।” निरंजन ने मजे लेते हुए कहा।
निरंजन ने अपनी पिस्तौल से एक फायर कर अटैची का ताला तोड़ दिया।
मल्होत्रा खुशी से उछल पड़ा, “अब आयेगा मजा?”
निरंजन ने वंशिका का चेहरा देखा। उसका चेहरा उतर गया। वह बेचैनी से इधर-उधर देखने लगी।
“गई भैंस पानी में। हो गया दूध का दूध पानी का पानी।” चंद्रेश ने अटैची खोली और एक एलबम निकाल कर निरंजन के हाथ में रख दी।
“देख लो सर मेरी सच्चाई सामने आ गयी।” चंद्रेश चहका।
निरंजन ने एलबम खोली और आश्चर्य से वंशिका के लटके चेहरे को देखता रहा। जैसे-जैसे वह एलबम देखता उसका गुस्सा बढ़ता चला जाता। वंशिका का चेहरा उत्तरा हुआ था।
“यह क्या मजाक बना रखा हैं आपने मि. चंद्रेश? आपको मैं पागल दिखायी देता हूँ।” उसने गुस्से में मल्होत्रा को देखते हुए कहा।
“क्या हुआ निरंजन सर?” चंद्रेश बोला।
“आप खुद पहले एलबम देख लें, फिर मुझ से बात करें।” निरंजन ने गुस्से में चंद्रेश से कहा।
चंद्रेश ने एलबम उठाई और ध्यान से एक एक पेज पलटने लगा। उसकी हैरानी बढ़ने लगी।
“यह नहीं हो सकता?” वह जोर से चिल्लाया।
“क्यों नहीं हो सकता?” निरंजन उससे भी तेज स्वर में चिल्लाया।
“क्यों नहीं हो सकता? अटैची आपकी, घर आपका?” निरंजन तेज आवाज में बोला।
निरंजन गुस्से में चंद्रेश को देख रहा था। एलबम में वंशिका और चंद्रेश की तस्वीरें थीं। सारी तस्वीरों में वही वंशिका थी, जो इस वक्त उनके सामने बैठी थी।
वंशिका के चेहरे पर कुटिल मुस्कान उभरी और पल भर में लुप्त हो गयी। उसने आखों में आँसू भरते हुए कहा, “देख लिया सर आपने, पता नहीं ये किस बात से मुझ से नाराज हैं।” उसके स्वर में भोलापन उभरा, “पहले तो ये ऐसे नहीं थे।” रोते हुए वंशिका बोली।
चंद्रेश मल्होत्रा का जी चाह रहा था कि वह अपने बाल नोच ले। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप पर काबू पाया।“यह एक चाल है इंस्पेक्टर साहब। यह फोटो ट्रिक फोटोग्राफी है।”
“अब आपके द्वारा पेश किये गये सबूत ही झूठे हैं। वाह चंद्रेश साहेब, बेशर्मी की भी हद है।” निरंजन ने गुस्से में कहा।
“पता नहीं कैसे फोटोग्राफ बदल गये, मैं नहीं जानता। शायद, मेरे पुलिस स्टेशन जाने के बाद इसने बदल दिये होंगे।’’ चंद्रेश ने वंशिका की तरफ अगुंली उठा कर कहा।
“यह मेरे ऊपर गलत इल्जाम है।” वंशिका बोली।
“चुप कर।” गुस्से में चंद्रेश वंशिका पर डपटा।
“आप मेरी बात समझिए निरंजन सर, यह मेरे खिलाफ कोई गहरी साजिश है।” चंद्रेश निरंजन से बोला।
“मैं सब समझ गया चंद्रेश साहेब। यह आप का पारिवारिक मामला है। इसमें पुलिस का कोई दखल नहीं।”
“यह गलत हो रहा है।” चंद्रेश गुस्से में तेज स्वर में बोला।
“अगर आपकी अपनी पत्नी से नहीं बन रही है, तो इसमें पुलिस क्या कर सकती है? यह आपके घर का मामला है। इसे आपको ही सुलझाना होगा।” निरंजन ने टोपी पहनते हुए शान्त स्वर में कहा।
“लगता है मुझे ऊपर कमिश्नर से बात करनी होगी।” मल्होत्रा ने हताश स्वर में कहा।
“वह आप का अधिकार है। अब मुझे इजाजत दीजिये।” कहकर निंरजन ने बाहर की तरफ कदम बढ़ाये।
अचानक घूम कर बोला, “एक बात कान खोल कर सुन लीजिये चंद्रेश साहेब। मेरे इलाके में किसी भी तरह का क्राइम में सहन नहीं करुँगा। यह आप दोनों को मेरी वैधानिक चेतावनी है।”
कह कर निरंजन मुड़ा और लम्बे कदमों से बाहर की तरफ निकल गया। चंद्रेश का चेहरा मुरझा गया और वंशिका का चेहरा खिल गया।
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