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Thriller फरेब

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एक फाईव स्टार होटल ग्रीन पैलेस था, जिसके एक कमरे में सुमित अवस्थी अपनी हार का गम मना रहा था। सामने ब्लैक डॉग की एक बोतल खुली पड़ी थी, जिसमें से आधी बोतल वह खाली कर चुका था। अपने पिताजी के डर से न तो वह घर गया और न ही अपने फार्म हाउस। अचानक उसके फ़ोन पर रिंग बजने लगी। उसने फ़ोन उठा कर स्क्रीन पर नंबर देखा, फिर फ़ोन को साइलेंट मोड पर डाल दिया।

“किसका फ़ोन था गुरु?” एक चेले ने पूछा।

“मेरे बाप का फ़ोन है। साले ने जीना हराम कर दिया है। सुबह से दस बार फ़ोन कर चुका है।” गुस्से में भुनभुनाते हुए सुमित बोला।

“फ़ोन तो उठा लो गुरु।”

“गाली सुनने का शौक नहीं हैं मुझे।” बड़बड़ाता हुआ सुमित बोला।

“गुरु, मुझे समझ में नहीं आता। इतने वोटर हमारे पास थे, फिर हम चुनाव हार कैसे गये? बाज़ी तो हमारे पक्ष में थी।” हैरानी दिखाते हुए एक चमचा बोला।

“अपने साथ गेम हो गया चंदू, जिन स्टूडेंट को अपने फार्म हाउस पर लाये थे, उन कमीनों ने खाया-पीया अपना और वोट दिया चंद्रेश को।” उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।

“खैर, यह तो वक़्त-वक़्त की बात है। हार-जीत तो लगी ही रहती है।” उसके चेले का सिर सहमति से हिला।

“सुना है चंद्रेश मल्होत्रा जीत की पार्टी दे रहा है।” सुमित ने घूँट भरते हुए कहा।

“सही सुना है, क्यों पूछ रहे हो गुरु?”

“भाई, जीत की बधाई तो देने जाना पड़ेगा।” सुमित अवस्थी रहस्मय ढंग से मुस्कुराया।

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होटल चन्द्रावती पैलेस अपनी भव्यता के लिये फेमस था और आज तो ज्यादा जगमगा रहा था। हर ओर सजावट का विशेष ध्यान दिया गया था। जगह-जगह गमले रखे हुए थे। खाने में हर तरह का आईटम था। पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी हर तरह के व्यंजन रखे हुए थे। एक तरफ फास्ट फ़ूड के स्टॉल लगे हुए थे। एक काउंटर अलग से आइसक्रीम का लगा हुआ था। वेटर शानदार ड्रेस पहने हुए प्लेट उठाए घूम रहे थे, जिसमें भुने काजू और ड्राई फ्रूट रखे हुए थे।

ड्रिंक का अलग से बंदोबस्त था। कुल मिला कर पार्टी को भव्यता देने की पूरी कोशिश की गयी थी। आखिर चंद्रेश मल्होत्रा भी पैसे वाली पार्टी थी। उसने विशेष रूप से कह रखा था कि किसी भी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिये। लोग खाने-पीने में व्यस्त थे, तभी चंद्रेश ने भीतर कदम रखा। ब्राउन कलर के सूट में ब्राउन ही कलर के जूते उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। रंग-बिरंगी फूलो वाली टाई उसके गले में फब रही थी। वह आते ही स्टेज पर पंहुचा और ताली बजा कर सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया।

“दोस्तो, आज दोहरी ख़ुशी का दिन है। एक तो आप ने मुझे विजयी बनाया, दूसरा मैं आप सबको एक सरप्राइज देना चाहता हूँ। कॉलेज ख़त्म करने के बाद मैं वंशिका अरोड़ा, को वंशिका मल्होत्रा बनाने वाला हूँ। प्लीज एन्जॉय दा पार्टी।” कह कर वह मंच से उतर गया।

वहाँ धीमे-धीमे म्यूजिक बजने लगा। तभी वंशिका ने प्रवेश किया। वह सफ़ेद ड्रेस में अप्सरा लग रही थी। लोग उन दोनों को बधाइयाँ देने लगे। दोनों खुले दिल से बधाई कबूल कर रहे थे। वंशिका बहुत खुश थी कि उसे चंद्रेश जैसा जीवन-साथी मिल रहा था। अपनी ख़ुशी जाहिर कर रही थी।

ये घोषणा सुनते ही सबसे ज्यादा दुःख निशा को हुआ। उसके दिल में तूफ़ान उठ रहा था, लेकिन वह किसी को बता नहीं सकती थी। उसका बस चलता तो वह वंशिका को विष दे देती, लेकिन अपने आप पर काबू कर वह ऊपर से खुश होने का दिखावा कर रही थी। वह चाहती थी, किसी तरह जोड़ी टूट जाये। तभी हाल में शानदार गुलदस्ता लेकर सुमित अवस्थी ने प्रवेश किया। उसके साथ उसके चेले-चपाटे भी थे। सुमित अवस्थी सीधा चंद्रेश के पास पहुँचा और गुलदस्ता उसके हाथ में देकर बोला, “जीत की बहुत-बहुत बधाई सरकार, साथ में आपकी होने वाली शादी की भी।”

चंद्रेश ने शांत स्वर में मुस्कुराते हुए बधाई कबूल की और उसे पार्टी में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया।

“हम तो बिन बुलाये मेहमान हैं भाई।” हँसते हुए सुमित बोला।

“नहीं भाई, ऐसी बात नहीं है। जीत तो आपकी वजह से मिली है। आप नहीं हारते, तो हम कैसे जीतते।”

सुमित कट कर रह गया। प्रत्यक्ष में वह मुस्कुरा दिया और पार्टी से विदा हो गया।

निशा को एक ही तरीका दिख रहा था। चंद्रेश और वंशिका को अलग करने का वह था।

सुमित अवस्थी एक नाम निशा कें जहन में हिलोरे मार रहा था। चंद्रेश और वंशिका को कोई अलग कर सकता था तो वह सुमित अवस्थी और सुमित वैसे ही चंद्रेश मल्हौत्रा और वंशिका पर खार खाता था। निशा को लगा चंद्रेश और वंशिका की जोड़ी सुमित अवस्थी के कारण ही टूटेगी।

सुमित अवस्थी कुछ सोचते हुए निशा मंद-मंद मुस्कुरा पड़ी।

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सुमित अवस्थी की हार के बाद रैपुटेशन खराब हो गयी थी। अब वह पहले की तरह ज्यादा उत्पात नहीं करता था। शांत रहता था और लोगों से दूर रहने की कोशिश करता था। लोग महसूस करते थे कि पहले वाले सुमित और अब वाले सुमित में अंतर आ गया है। कॉलेज में उसकी गुंडागर्दी भी बंद हो गयी थी। अब उसके पास ज्यादा चेले-चपाटे भी नहीं आते थेI अब उसकी दोस्ती चंद्रेश और विमल से हो गयी थी। इलेक्शन के बाद सारी दुर्भावना उसके मन से निकल गयी थी।

यह बात अब चंद्रेश और विमल भी महसूस करने लगे थे। विमल और चंद्रेश कई बार अलग-अलग तरह से ट्राय कर चुके थे। सुमित उन्हें धोखा देता हैं या नहीं, लेकिन सुमित को उन्होंने हर तरह से सही पाया। इसलिये वह भी इनकी दोस्ती की जमात में शामिल हो गया था।

सुमित अवस्थी में यह बदलाव कैसे आया कोई नही जानता था। सुमित के दिल में क्या चल रहा है। यह कोई नही जानता था। आज भी सुमित वंशिका पर अपना दिल रखता था। पर चंद्रेश के कारण चुप था। उसे लगता था उसे सुधरता देख वंशिका उसकी तरफ आर्कषित हो जाये और चंद्रेश का साथ छोड़ दे।

वही सुमित अवस्थी एक पेड के नीचे बैठा एक बुक पड़ने में व्यस्त था तभी बिजली गिराती निशा वहाँ पर आयी।

सुमित अवस्थी को देख कर उसके पास खड़ी हो कर ध्यान से देखने लगी। सुमित का ध्यान भटका, उसने नजर उठा कर निशा की और देखा। निशा ने छोटी सी वाइट स्कर्ट और लाल टॉप पहनी हुई थी। उसके बाल खुले हुए थे जो उसकी कमर तक जा रहे थे। उसके होठों पर सुर्ख लिपस्टिक लगी हुई थी, जो उसे पूरी तरह सेक्सी साबित कर रही थी। सुमित ने लम्बी सांस खिंची और उसे देखने लगा।

“क्या देख रहे हो।” निशा कुटिल ढंग से मुस्कुराते बोली।

“खुदा के करिश्मे को देख रहा हूँ।” साधारण स्वर में सुमित बोला।

“देखकर ही खुश हो रहे हो, पाने की इच्छा नहीं हैं क्या?” मुस्कुराती हुई निशा बोली।

सुमित की आँखों में हैरानी के भाव आ गये। मन ही मन हैरान होकर बोला, “मेरी ऐसी किस्मत कहाँ।”

“किस्मत तो कर्म करने से मिलती है।”

“क्या कर्म करने से ऐसी किस्मत मिलती है?” सुमित ने भी उसी लहजे में जवाब दिया।

“मेरा एक काम कर दो, तो यह मुमताज तुम्हारे कदमों में अपना सिर झुका देगी। जो तुम मुझसे चाहते हो, वह तुम्हें मिल जायेगा।” रहस्मय ढंग से मुस्कुराती हुई निशा बोली।

“क्या सच में तुम जानती हो कि मुझे क्या चाहिये?”

“यह भी कहने की बात है, निशा के अलावा तुम क्या चाहते हो मैं जानती हूँ?” चंचलता भरे स्वर में निशा ने जवाब दिया, “मेरा काम करने के बाद मेरे ऊपर तुम्हारा अधिकार होगा।” वह अपने होठों को दांतों से दवाकर सेक्सी ढंग से हँसने लगी।

“इसके लिये मुझे क्या करना होगा?” सुमित ने उत्तेजित स्वर में पूछा।

“चंद्रेश और वंशिका की जोड़ी तोडनी होगी। वह भले कैसे भी टूटे तुम जानो।” रहस्यमय स्वर में निशा कोठारी बोली।

सुमित की आँखें सिकुड़ गयी, “लगता है तुम लोगों को मेरे ऊपर अभी भी विश्वास नहीं आया।” सुमित शांत स्वर में बोला।

“क्या मतलब?” अब चौंकने की बारी निशा की थी।

“मेरी सच्चाई जानने के लिये तुम लोग मेरी कितनी परीक्षा लोगे। मेरे मन में तुम लोगों के खिलाफ कोई मैल नहीं है।” सिगरेट सुलगाते हुए सुमित बोला।

निशा के माथे पर बल पड़ गया। अजीब उलझन भरी निगाहों से देखती हुई निशा बोली, “यह कोई परीक्षा नहीं है। अगर तुम्हें मुझे पाना है, तो दोनों की जोड़ी तोडनी ही होगी।” गुस्से में निशा गुर्राई।

“तुम्हारी चंद्रेश और वंशिका से क्या दुश्मनी है?” हैरान होकर सुमित ने कहा।

“मैं चंद्रेश को हमेशा से चाहती थी। मैं उसकी नहीं हो सकी, तो नहीं चाहती कि कोई उसकी हो।” गुस्से से धधकती निशा कोठारी बोली।

समझने वाले ढंग से सुमित अवस्थी की गर्दन हिली। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “इस बात की क्या गारंटी है कि इन दोनों को अलग करने के बाद तुम अपने वायदे पर कायम रहो।” सुमित अवस्थी संदिग्ध स्वर में बोला। ऐसा लगा की उसे निशा की बात का भरोसा नहीं हैं।

“क्या चाहते हो? कैसा भरोसा चाहते हो?” निशा ने सवालिया निगाहों से देखा।

“मैं चाहता हूँ कि तुम आज की रात मेरे साथ मेरे फार्म हाउस पर बिताओ।” धूर्तता से सुमित अवस्थी बोला।

“वाह, ताकि मलाई चट कर के बिल्ली निकल जाये।” जले-भुने स्वर में निशा कोठारी बोली।

“फिर कैसे बीतेगी?” सुमित अवस्थी मजे लेते हुए बोला।

निशा ने सोचते हुए कहा, “कोई बीच का रास्ता तो निकालना पड़ेगा।”

“ठीक हैं मैं आज ही दोनों के बीच में कोई ग़लतफ़हमी पैदा करता हूँ। लेकिन इसमें मुझे तुम्हारा साथ चाहिये। बोलो मंजूर है।” सुमित ने हाथ आगे बढ़ाया। निशा ने उसके हाथ में हाथ देकर डन के अंदाज में हिलाया।

सुमित ने उसके हाथ पर हल्का-सा किस किया। निशा ने कोई प्रतिरोध नहीं किया।

“याद रखना दोनों के अलग होने के बाद तुम्हें मेरी बनना होगा।”

“एक बात बार-बार मत दोहराओ। मैं जानती हूँ मैंने क्या वायदा किया है।” कड़वे स्वर में निशा बोली।

सुमित और निशा सिर से सर जुडाए बात कर रहे थे। सुमित निशा को अपनी योजना सुना रहा था। योजना सुनते-सुनते निशा सहमति से सिर हिला रही थी। किसी-किसी बात पर दोनों गंभीर हो जाते, तो किसी बात पर खिलखिला कर हँस पड़ते। वह इस बात से बेखबर थे, कि दो आँखें उन्हें घूर रही थीं। उनकी हर एक्टिविटी को देख रही थी। वे इस बात से अनजान थे। दोनों आँखें इन दोनों को साथ में देख कर हैरान थी।

धीरे से दोनों उठे और अपनी-अपनी राह पर चल दिये, जैसे वे कभी मिले ही न हों। सुमित का दिल निशा को पाने का सपना देख रहा था। निशा के दिल में आग लगी थी, कि दोनों कब बिछडते हैं। इन दोनों के प्लान से बेखबर चंद्रेश मल्होत्रा और वंशिका अरोड़ा शादी के सपनो में खोये थे। वे नहीं जानते थे कि आने वाला वक्त क्या गुल खिलाने वाला हैं? दो आँखें, जो ये सब देख रही थी, वह चिन्तित थी कि भविष्य में न जाने क्या हो?

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रात के आठ बज रहे थे। हल्की हल्की ठण्ड पड़ रही थी रात गहराने लगी। इन बातों से बेखबर चंद्रेश सोफे पर अधलेटा शाल ओढ़े टीवी देख रहा था। टीवी स्क्रीन पर भारत ऑस्ट्रेलिया का वन ड़े मैच चल रहा था। भारत को मैच जीतने के लिये बाईस बॉल पर सैतालीस रन चाहिये थे। टी-ट्वेंटी क्रिकेट अधिक होने के कारण ये रन ज्यादा नहीं थे, पर सामने ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीम थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह अंत तक हार नहीं मानती।

इस समय मैचों पर सट्टो की पकड़ मजबूत थी। हर मैच में सट्टा लगता था। सट्टा बाजार ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में था। भारत मैच में बना हुआ था क्योंकि धोनी और जडेजा की जोड़ी मैदान में थी, जो भारत को जीत के करीब ले जा रही थी। ऐसे कांटे के मैच को चंद्रेश दम साधे देख रहा था, क्योंकि जीवन में पहली बार उसने अपने दोस्तों के कहने पर भारत की जीत पर दांव लगाया था। क्रिकेट का शौक तो उसे बचपन से था, पर सट्टे का शौक अपने दोस्तों को देख कर लग गया था। सो उसने अपना भी दांव आजमाया था। क्या मालूम तकदीर उसका साथ दे दे। एक-एक बॉल उसकी साँसों को ऊपर-नीचे कर रही थी।

अचानक उसके मोबाइल की रिंगटोन बजी, जिसने उसके जारी मैच में खलल डाला। उसने गुस्से भरी नज़रों से फ़ोन की तरफ देखा, फिर अचानक उसका मूड ऑफ हो गया। उसने मोबाइल उठाया और स्क्रीन पर नजर डाले बिना फ़ोन का वॉल्यूम कम कर दिया और फ़ोन उठा कर टेबल पर रख दिया। मोबाइल शांत हो गया। चंद्रेश मन ही मन बड़बड़ाया, “अब कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

उसका ध्यान पुनः टी. वी. स्क्रीन पर चला गया। मैच अपने चरम पर था। एक-एक डॉट बॉल धड़कने बढ़ा रही थी। आज उसके पचास हजार रूपए दांव पर लगे हुए थे, जो उसके लिये ज्यादा नहीं थे, पर अनुभव पहला था और जीत का अपना ही मजा होता है।

मैच खत्म होने की कगार पर था। लास्ट ओवर में तेरह रन जीतने के लिये चाहिये। धोनी के होते यह संभव भी था। साढ़े आठ बजे का वक्त था, जब चंद्रेश के चेहरे पर खुशी दिखने लगी, भारत ने एक बॉल रहते मैच जीत लिया था। ऑस्ट्रेलिया 340 रन बना कर भी मैच हार गयी थी। चंद्रेश का चेहरा खुशी से चमक उठा। उसने जोश में फ़ोन को उठाया, ताकि अपनी जीती रकम प्राप्त करने के लिये बात कर सके, तो देखा स्क्रीन पर आठ से दस मिस कॉल थी, तो उसको ध्यान आया, फ़ोन तो साइलेंट मोड पर है। मिसकॉल नए नंबर से आये थे, यह नंबर उसके लिये अपरिचित थे।

उसने कॉल बैक किया, घंटी जाने लगी, कुछ पल बीते होंगे उसे फ़ोन पर, निशा की आवाज सुनाई दी, “हैलो चंद्रेश मैं निशा।”

“हां निशा, पहचान गया कैसे फ़ोन किया था। यह नंबर भी नया है।” उसने सामान्य स्वर में पूछा।

“चंद्रेश आज घर में कोई नहीं है। मम्मी-डैडी भी बाहर गये हैं, अगर तुम मुझे कंपनी दे दो, तो अच्छा हो वैसे भी हर तरफ सन्नाटा छाया है और मुझे डर लग रहा है। तुम्हारे आने से थोड़ी हिम्मत भी मिल जायेगी।” उसके स्वर में विनती के भाव थे।

चंद्रेश ने घड़ी में टाइम देखा। घड़ी में 8.45 बज रहे थे, “अरे यार, डरने की क्या बात हैं। मैं हूँ ना, तुमने सही कॉल किया। मेरा इंतज़ार करो। आधे घंटे में पहुँच रहा हूँ। तुम्हारे फादर कब तक आ जायेंगे।” उसने सवाल पूछा।

“12.30 उनकी फ्लाइट है। एअरपोर्ट से घर आने में आधा घंटा तो लग ही जायेगा। एक-सवा एक तक आ जायेंगे।” सोचते हुए दूसरी ओर से निशा ने जवाब दिया।

“ठीक है, हमारे लिये डिनर का इंतजाम करो। दोनों दोस्त मिल कर साथ में खाएंगे।” हँसते हुए चंद्रेश ने जवाब दिया।

दूसरी तरफ निशा के खिलखिलाने आवाज सुनाई दी, “तुम आओ तो सही, तुम्हें शानदार तोहफा मिलेगा।” कह कर निशा ने फ़ोन काट दिया।

चंद्रेश ने फ़ोन सोफे पर पटका और उठ कर खड़ा हो गया। उसके दिल में किसी प्रकार का मैल नहीं था, क्योंकि निशा ने इलेक्शन में उसका साथ दिया था। इसलिये निशा को वह सच्चा दोस्त मानता था। निशा के मन में क्या था, वह यह नहीं जानता था। निशा उससे कितना नफरत करती थी, ये बात भी वह नहीं जानता था। उसने सफ़ेद शर्ट और ब्लैक जीन्स निकाली, उसे पहनी तो ठण्ड का एहसास हुआ। उसने ब्लैक कलर का कोट निकाला और कंधे पर टांग कर बाहर निकल गया। बाहर चारों तरफ सन्नाटा था।

सवा नौ बज रहे थे। उसने कार का दरवाजा खोला। कांच को बंद किया, फिर भी ठण्ड कम नहीं हो रही थी। उसने कार के अंदर हीटर चालू किया। थोड़ी गर्माहट महसूस हुई। उसने गियर डाल कर गाड़ी आगे बढ़ाई। हर तरफ सन्नाटा था। सड़क पर ठंड की वजह से इक्का-दुक्का लोग ही नजर आ रहे थे। आधी दुकाने बंद हो गयी थी। आधी बंद होने की तैयारी में थी। ट्राफिक न होने की वजह से कार स्पीड से चलती हुई निशा के बंगले पर पहुँची, क्योंकि घर में कोई नहीं था। अतः चंद्रेश ने बाहर से हार्न बजाना शुरु किया, जिसकी आवाज सुनकर निशा बाहर आयी और मेन गेट खोला। चंद्रेश कार फाटक से भीतर ले गया।

चारों तरफ सन्नाटा था। वाकई निशा ने सच कहा था। ऐसे महल में अकेली लड़की न डरे, यह संभव नही था। कुछ सोचते हुए चंद्रेश ने दरवाजा खोला। बाहर निकलकर कार का दरवाजा लॉक किया और निशा के साथ अंदर आ गया।

निशा का बंगला काफी सुंदर ढंग से सजा हुआ था। निशा उसे ड्राइंग रूम में ले आयी, तब चंद्रेश की नजर पहली बार निशा पर पड़ी। उसने आश्चर्य से निशा को देखा। निशा सफ़ेद रंग का झीना गाउन पहने थी, जिसमें उसके शरीर की बनावट साफ़ दिख रही थी। चंद्रेश के हलक सूखने लगे।

पहली बार उसे लगा कि यहाँ अकेले आकर उसने गलती कर दी। निशा यहाँ अकेली है। अगर कुछ गड़बड़ हो गयी तो सारा इल्जाम उसके ऊपर आयेगा

निशा भी उसकी हालत समझ गयी। पर अब कुछ भी नही हो सकता था। क्योकिं चिड़िया खेत चुग चुकी थी।

निशा के होठों पर कुटिल मुस्कान उभरी, जो उसने चंन्द्रेश को देख कर छिपा ली और भोलेपन से बोली, “तुम्हारे आने से पहले मैं कितनी तन्हा और अकेली थी। तुम्हारे आने के बाद यहाँ स्थिति बदल गयी। जिस चीज से मुझे डर लग रहा था, उसी चीज पर अब मुझे प्यार आ रहा है।”

चंद्रेश ने बातों का रुख मोड कर कहा, “निर्जीव चीजो से प्यार करना छोड़ो और यह बताओ हमारे लिये खाने का इंतजाम है या भूखा ही रहना पड़ेगा?”

“मेरे ख्याल से कुछ खाने से पहले पी लिया जाये?” उसकी नजर चंद्रेश पर टिक गयी।

चंद्रेश उसके देखने के ढंग से असहज हो गया। घबरा कर नज़रें चुराने लगा। निशा मुस्कुराई, “तुम तो लड़की की तरह शर्मा रहे हो, जबकि शर्माना तो मुझे चाहिये।” कह कर बिना कुछ कहे चंद्रेश का हाथ पकड़ लिया और सोफे पर सट कर बैठ गयी।

चंद्रेश ने भी शर्माना छोड़ दिया, “ठीक है क्या पिलाओगी?”

“जो तुम्हें पसंद हो, हर चीज हाज़िर है।” सिर नवा कर निशा ने जवाब दिया।

निशा ने फ्रिज खोलकर एक जोनी वॉकर की बोतल और आधा लीटर पेप्सी की बोतल निकाली और टेबल पर रख दी। अंदर किचन से वह दो कांच के गिलास ले आयी, साथ में प्लेट में नमकीन और फ्राई चिकन के पीस भी थे।

चंद्रेश ने उसकी तरफ देखा, “तुम भी पियोगी?”

“नहीं भई, पीकर हम तो बेसुध हो जाते हैं तुम तो अपना ड्रिंक बनाओ। हम तो सॉफ्ट ड्रिंक लेंगे।” इठलाकर निशा ने जवाब दिया।

चंद्रेश ने अपने लिये पैग बनाया और निशा ने एक गिलास में पेप्सी डाली, अचानक चौंक कर निशा बोली, “अरे यार मैं भी कैसी भुलक्कड़ हूँ। आइस ट्रे तो निकाली ही नहीं। जाओ यार फ्रिज से आइस ट्रे निकाल दो।” निशा अपने स्वर में चाशनी घोलते हुए बोली।

“छोड़ो ना यार, वैसे ही बोतल फ्रिज में रखी थी। ठंडी तो होगी ही, मैं मैनेज कर लूँगा।” चंद्रेश लापरवाही से बोला।

बच्चो की तरह जिद करते हुए निशा कोठारी ने कहा, “नहीं मुझे सॉफ्ट ड्रिंक में आइस चाहिये।”

“ठीक है बाबा, लाता हूँ तुम लडकियां भी ना लड़कों को नौकर बना कर ही छोड़ती हो।” चंद्रेश झुंझलाते हुए उठा और फ्रिज की तरफ बढ़ गया।

इधर निशा ने फ़ौरन अपने हाथ में छिपी दो गोलियां मसल कर चंद्रेश के पैग में मिला दी और फ़ौरन अपनी जगह बैठ गयी चंद्रेश आइस ले आया।

निशा ने मुस्कुरा कर चंद्रेश को देखा चंद्रेश ने सोफे पर बैठते-बैठते पैग अपने मुँह से लगाया और पीने लगा। निशा के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। वह मन ही मन बड़बड़ाई, “अब कैसे बचोगे बच्चू?”

चंद्रेश ने पैग समाप्त किया। बीस मिनट बाद उसे लगा वह हवा में उड़ रहा है। उसका उसके शरीर और मन से कंट्रोल हट गया। थोड़ी देर में वह सोफे पर लेट गया। उसे निशा दुनिया की सबसे खूबसूरत और सेक्सी लड़की दिखने लगी। यह निशा द्वारा दी गयी दवा का प्रभाव ही था। निशा खुल कर मुस्कुराई चंद्रेश ने उठने की कोशिश की, लेकिन संभल न सका, वह वहीं सोफे पर गिर गया।

“चलो बेडरूम की सैर की जाये।” निशा ने उसे सँभालते हुए कहा।

फिर सहारा देकर उसे बेडरूम में ले गयी बेड पर लिटाया। चंद्रेश अपने होश हवास खो चुका था। निशा ने अपने सेलफोन को उठाया, एक नंबर मिला कर फ़ोन कान से लगाया, दूसरी तरफ से सुमित अवस्थी की आवाज कानों में पड़ी “हैलो निशा।”

यह सुनते ही निशा ने एक शब्द फ़ोन पर कहा, “फतह।” और फ़ोन काट दिया।

सुमित अवस्थी के चेहरे पर जहर भरी मुस्कान उभरी “अब आयेगा कहानी में मजा। एक तीर से सुमित अवस्थी कितने शिकार करता है, यह दुनिया देखेगी।” जहाँ भर की शैतानियत उसके चेहरे पर आ गयी।

पर वह इस बात से बेखबर था कि दो आँखें लगातार उसे घूर रही हैं, जिसमें उसके लिये सिर्फ नफ़रत ही भरी हुई हैं।

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वंशिका अरोड़ा एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। वह अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थी। यूँ तो उसे किसी तरह की समस्या नहीं थी। अपने माता-पिता के साथ दो कमरों के साधारण मकान में रहती थी, जहाँ दिनभर रौनक लगी रहती थी।

वह एक कमरे में लेटी ‘मनोरमा’ पढ़ रही थी। उसका पूरा ध्यान चंद्रेश की तरफ लगा हुआ था। एक कमरे में उसके माँ-बाप आराम कर रहे थे। वंशिका के कानों में रात 10 बजे भी बस्ती वालों के लड़ने की आवाज आ रही थी। यह यहाँ रोज का माहौल था कोई शराब पीकर अपने को बादशाह समझता और पूरे मोहल्ले को सर पर उठा लेता था। वंशिका इन सब बातों से बेफिक्र थी। अतः उसका ध्यान इन सब बातों में ना था। तभी उसके मोबाइल की रिंगटोन बजी। सुन कर उसका ध्यान भंग हुआ उसने घड़ी की तरफ नज़रें घुमाई दस बज रहे थे। इस समय किस का फ़ोन आया होगा यह सोच कर उसने स्क्रीन पर नजरें गडाई स्क्रीन पर अननोन नंबर आ रहा था।

उसने मोबाइल उठा कर ग्रीन बटन पर हाथ रखा सामने से अपरिचित आवाज उसके कानों में पड़ी “ मिस वंशिका आप घर पर आराम करती रहेंगी और आपके चाहने वाले आपकी जिंदगी को तबाह कर देंगें। “ सामने से हंसने की आवाज सुनाई दी।

“कौन बदतमीज बात कर रहा हैं।” वंशिका तेज़ स्वर में बोली।

“तुम ऐसे ही लापरवाह रहोगी तुम्हारी जगह चंद्रेश के दिल में कोई और बैठा होगा।”

“क्या बकवास कर रहे हो किस चंद्रेश की बात कर रहे हो।” वंशिका उखड़े स्वर में बोली।

“या तो तुम खुद को ज्यादा बुद्धिमान समझ रही हो या मुझे मूर्ख समझ रही हो।” सामने वाले ने व्यंग्य से कहा। वंशिका तिलमिला के रह गयी

“आज तुम्हारा यार तुम्हारे साथ धोखा करके निशा को अपने आगोश में समेंट रहा हैं।” सामने वाले ने रहस्मय स्वर में कहा।

“ तुम कौन हो और मेरे और चंद्रेश के बारे में इतना कैसे जानते हो।” वंशिका ने आश्चर्य से पूछा। “ तुम आम खाने से मतलब रखो पेड गिनने के लिये हम यहाँ बैठे हैं , अगर अपनी जिन्दगी यानी चंद्रेश का दूसरा रूप देखना चाहती हो तो निशा के घर पहुँचो फिर हमें दोष मत देना।”

“मुझे तुम्हारी बात में विश्वास नहीं हैं। चंद्रेश को मैं अच्छी तरह जानती हूँ।”

“विश्वास तो कपिलदेव को भी नहीं था, जब वेस्टइंडीज को हराकर उसने वर्ल्ड कप जीता।” सामने वाले ने व्यंग्य से कहा।

“मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी।” कह कर वंशिका ने फ़ोन काट दिया।

लेकिन उसके मन में बेचैनी बढ़ गयी। वह उठी और निशा के घर जाने की तैयारी करने लगी। दूसरी और सुमित अवस्थी ने मुसकुराते हुए अपना फ़ोन रखा और मन ही मन बड़बड़ाया “अब तुझे कौन बचाएगा मि. चंद्रेश”

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वंशिका जल्दी से घर से बाहर निकली। माता-पिता को समझा कर आयी थी कि उसकी सहेली की तबियत ठीक नहीं है, मिल कर आती है। उसके पिताजी उस सहेली को जानते थे, जो अक्सर बीमार रहती थी, और वंशिका उससे मिलने जाया करती थी, सो उन्होंने इजाज़त दे दी। वंशिका घर से बाहर निकली।

चारों तरफ वातावरण में सन्नाटा छाया हुआ था। मेन रोड पर आते ही उसे टैक्सी मिल गयी। उसने उसे निशा के बंगले का पता बताया और बैठ गयी। वंशिका को विश्वास था फ़ोन कॉल फर्जी थी, फिर भी उसने देखना जरूरी समझा। उसने टैक्सी निशा के घर के बाहर रुकवाई और उसे किराया देकर बंगले की तरफ बढ़ी।

वहाँ की शान्ति आने वाले तूफ़ान का संकेत कर रही थी। वंशिका के बंगले का वातावरण रहस्यमय था। चारों और सन्नाटा और अन्धेरा छाया हुआ था। बाहर के गार्डन में भी अँधेरा था कहीं रौशनी का प्रबंध नहीं था। अगर था भी तो शायद उसे बंद कर रखा था। वंशिका ने हिम्मत दिखाते हुए दरवाजे को धकेला। वह आवाज करता हुआ खुला, फिर शान्ति छा गयी।

अचानक दूर से कुत्ते रोने की आवाज ने भय पैदा कर दिया। तभी अचानक उसकी नजरें चंद्रेश की कार पर पड़ी। उसका दिल धड़क उठा। उसे लगने लगा शायद फ़ोन करने वाले की बातों में सच्चाई है। चारों तरफ नजरें दौडाते हुए वह मेन गेट पर पहुँची। उसने दरवाजा धकेला। दरवाजा खुला हुआ था। वह भीतर आयी। नीचे कमरे में कोई नहीं था। सामने सीढियाँ दिखायी दी, जो ऊपर जा रही थी। वहाँ उसे प्रकाश होने का आभास मिला, साथ में बोलने की आवाज भी सुनाई दी।

उसने दिल को मजबूत कर के सीढियों पर कदम रखा और दबे पाँव ऊपर की तरफ बढ़ने लगी। सीढियाँ ख़त्म करने के बाद एक दरवाजा दिखायी दिया, जो अधखुला था। उसने धड़कते दिल से थोड़ा सा भीतर झाँक कर देखा, तो उसकी साँसे ऊपर की ऊपर नीचे की नीचे रह गयी। सामने बैड पर चंद्रेश लेटा था। उसके बदन पर कपडे नाम मात्र के भी नहीं थे। बाथरूम के अन्दर से निशा के गुनगुनाने की आवाज आ रही थी।

उससे यह दृश्य देखा न गया। वह भाग कर नीचे आयी और मेन दरवाजा पार करके रोड पर आ गयी। उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। उसका दिल जोर-जोर से रोने का हो रहा था। उसके सारे सपने बिखर गये थे। उसे चंद्रेश से बहुत आस थी जो पल भर में बिखर गयी।

वह थके कदमों से अपने घर की ओर चलने लगी। वह पागलों तरह चल रही थी। उसे खुद का भी भान ना था। अचानक एक गाड़ी सामने से आकर रुकी। गाड़ी में से विमल उतरा। उसने वंशिका को देखा। वंशिका उसे देख कर जोर-जोर से रोने लगी।

विमल ने कार का दरवाजा खोला और उसे आगे वाली सीट पर बिठाया। उसे पीने के लिये पानी दिया, “तुम यहाँ कैसे?” आँसू पोंछते हुए वंशिका ने विमल से पूछा।

विमल ने उसकी ओर देखते हुए कहा “मुझे यहाँ देखकर तुम्हें हैरानी हो रही होगी ना।”

वंशिका का सिर सहमति से हिला।

“तुम्हें नहीं मालूम विमल आज मैं कितना टूट चुकी हूँ। आज मैंने चंद्रेश का वह रूप देखा, जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। चंद्रेश फरेबी है। उसने मेरे साथ फरेब किया है।” वंशिका ने अपने दिल के जज़्बात उसके आगे उड़ेल दिये।

विमल चुपचाप उसे देखता रहा, फिर धीरे से उसे देखकर मुस्कुराकर कहा, “आई लव यू वंशिका।”

वंशिका चिंहुक कर विमल को देखने लगी, “क्या बकवास कर रहे हो विमल।” उसे विमल से डर लगने लगा।

विमल ने उसकी आँखों में आँखें डाल कर कहा, “मैंने जब से तुम्हें देखा है, तब से मैं तुम्हारा दीवाना हूँ। अगर चंद्रेश नहीं होता, तो आज मेरी जिन्दगी में तुम होती।” विमल ने आँखों में प्यार भरते हुए वंशिका का हाथ पकड़ा।

वंशिका ने भय से कार का लॉक खोलना चाहा, किन्तु वह मास्टर लॉक था, केवल रिमोट से खुलता था, जो विमल के पास था।

“मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी कमीने। मैं तुझे क्या समझती थी और तुम क्या निकले?” विमल ने उसकी बातें सुने बिना ही कहा।

“याद है जब तुम पहले दिन कॉलेज में आयी थी, कुछ डरी-डरी सी थी, तुम्हारे वह खुले बाल, लाल लिबास में पहली बार तुम्हें देखा, तो मेरा दिल मेरा नहीं रहा, तुम्हारा हो गया। यह तो चंद्रेश बीच में टपक पड़ा। अमीर आदमी था मेरे ऊपर बहुत अहसान थे। इसलिये मैं कुछ ना बोल सका लेकिन अब हमारे बीच में कोई नहीं हैं।” उसके शब्दों में दर्द झलक रहा था

उसने अपने प्यार का इज़हार कर दिया। उसकी आँखों में ऐसे भाव थे कि वंशिका की नजरें झुक गयी।” लेकिन मेरी जिन्दगी में चंद्रेश के अलावा दूसरा नहीं होगा वह नहीं तो मैं नहीं” वंशिका भी गुस्से में बोली।

“वाह री भारतीय नारी, चंद्रेश की बेवफाई देख कर अभी भी उससे चिपकी हुई हो।” वंशिका ने आश्चर्य से देखा।

“तुम्हें कैसे मालूम, मैं कहाँ गयी थी?” वंशिका बोली।

“वैसे तुमने क्या देखा? चंद्रेश बेवफा है, यह तुम कैसे कह सकते हो?” विमल पूछा।

वह बहुत जोर से हंसा फिर हंसता ही चला गया। उसकी हँसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

वंशिका को अब उससे और भी डर लगने लगा। “लगता है, मुझे फ़ोन करने वाले तुम ही हो। चंद्रेश मुझे धोखा दे रहा है, यह बात तुम जानते थे। तुमने मुझे फ़ोन करके जान कर यह दृश्य दिखाया ताकि तुम्हारा रास्ता साफ़ हो जाये।”

“हम प्यार को छीनने में यकीन रखते है मेरी जान ! सोचो कार में हम-तुम अकेले हैं। यहाँ अगर मैं मनमानी कर लूँ, तो कौन रोकेगा मुझे?” वंशिका थर-थर काँपने लगी।

“मैं जोर-जोर से चिल्लाऊँगी।” वह जोर से बोली।

“यहाँ तुम्हारी आवाज कौन सुनेगा जानेमन? कार के शीशे चढ़े हुए हैं। तुम्हारी आवाज दब जायेगी।” उसके स्वर में व्यंग्य झलक रहा था।

“यह मुझसे किस जन्म का बदला ले रहे हो विमल? मुझे तुमसे यह आशा नहीं थी।” घबराकर वंशिका ने हाथ जोड़ लिये।

“मुझे छोड़ दो प्लीज।” वह रोते हुए बोली।

“हे भगवान, आज मुझे कैसा दिन दिखाया। एक ही झटके में सब अपने पराये हो गये।” वह रोये जा रही थी।

अचानक विमल ने ठहाका लगाया। उसकी हँसी सुनकर वंशिका ने चेहरा ऊपर उठाया।

“यानी मैं पास हो गया। अब मुझे एक्टर बनने से दुनिया की कोई भी ताक़त नहीं रोक सकती। कैसा लगा मेरा मजाक?” विमल ने मुस्कुराते हुए पूछा।

वंशिका के मुँह से बोल नहीं निकले। वह अविश्वास भरी नज़रों से विमल को देखने लगी, “क्या तुम सच कह रहे हो। यह सब मजाक था?” वंशिका के स्वर में हैरानी थी।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि विमल मजाक कर रहा है।

“तो मैं जा सकती हूँ?” वंशिका ने पूछा।

“हां-हां बिलकुल, तुम कहो तो मैं तुम्हें घर छोड़ आता हूँ।” विमल ने सामान्य स्वर में कहा।

“तो पहले कार के दरवाजे का लॉक हटाओ और कार के शीशे खोलो।” विमल ने शराफत से लॉक हटा दिया और कार के शीशे नीचे कर दिये।

वंशिका बिना कुछ बोले कार का दरवाजा खोल रही थी। विमल ने उसे रोक दिया। उसने सिगरेट निकाली और लाइटर से उसे सुलगाया। वंशिका ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा।

“अभी तुमने दो ड्रामे देखे हैं। तीसरा ड्रामा देखना बाकी है।”

“कौन से दो ड्रामे?” वंशिका ने पूछा।

“तुमने सवाल गलत पूछा वंशिका। पहला ड्रामा चंद्रेश और निशा का, दूसरा ड्रामा मेरा और तुम्हारा, तीसरा ड्रामा बाकी है, कहानी का अंत बाकी है, क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास है?”

वंशिका का सर सहमति से हिला।

“मुझसे डर तो नहीं लग रहा?”

नकारात्मक ढंग से वंशिका का सिर हिला।

“क्या मुँह में जुबान नहीं है? गूंगी हो गयी हो अटैक तो नहीं आ जायेगा।”

वंशिका हलके से मुस्कुराई, “मुझे आप से डर नहीं लग रहा है?”

“अब तुम से आप पर आ गयी” वंशिका ने उदासी भरे चेहरे से विमल को देखा।

“अब मुझे घर छोड़ दो। रात काफी हो गयी है।” साधारण स्वर में वंशिका बोली।

विमल की दृष्टि कलाई में बंधी घड़ी से टकराई, “बस कुछ समय और तीसरा ड्रामा देखना बाकी है। वह देख कर जाना।”

वंशिका ने ना समझने वाले ढंग से सिर हिलाया

विमल ने यू-टर्न लिया और कार को निशा के बंगले की तरफ मोड़ दिया। कार निशा के बंगले से थोड़ी दूर खड़ी करने के बाद उसने उसकी सारी लाइटें बंद कर दी और चुपचाप बैठ गया।

वंशिका शांत भाव से विमल को देखने लगी, “यहाँ वापस क्यों आये? धोखेबाज़ चंद्रेश को वापस दिखाने, मुझे नफरत है चंद्रेश से।”

वह कुछ कहना ही चाहती थी, कि एक कार के आने की हल्की-हल्की आवाज उनके कानों से टकराई। विमल ने वंशिका को ऊँगली होठों पर रखकर चुप रहने का इशारा किया।

वंशिका सस्पेंस में फँसी चुप रह गयी। उसका दिल कह रहा था कुछ होने वाला है। अचानक एक कार निशा के बंगले के थोड़ी दूर आकर रुक गयी। पांच मिनट बाद उसकी सब बत्तियाँ बुझ गयी।

कार में से एक साया निकला और निशा के बंगले में दवे पाँव चला गया।

“तीसरा ड्रामा शुरू।” विमल के मुँह से निकला।

वंशिका हैरत से देखती हुई बोली, “यह तो सुमित की कार है।”

“थोड़ा इन्तजार करो मोहतरमा, कहानी तो अभी शुरू हुई है।”

फिर लगभग दस मिनट वंशिका और विमल कार में बैठे रहे।

फिर कार से निकले, कार को लॉक किया और निशा के बंगले की तरफ बढ़ गये।

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अन्दर का माहौल वैसा ही था। हर तरफ शान्ति छाई हुई थी। दबे पाँव वे लोग अंदर पहुँचे। आगे विमल, पीछे वंशिका, वे उस कमरे में पहुँचे, जहाँ वह पहले भी आयी थी। अब उस कमरे में लाल रंग का नाईट बल्ब जलता दिख रहा था। चंद्रेश दुनिया से बेसुध पड़ा हुआ था।

वंशिका की आँखों में नफरत के भाव उठे, तभी बाजू वाले कमरे से हँसी की आवाज सुनाई दी। विमल ने वंशिका को अपने पीछे आने का इशारा किया। दोनों अधखुली खिड़की के पास पहुँचे। विमल ने खिड़की के पल्ले को धीरे से धक्का दिया। वह बेआवाज खुल गया।

अब भीतर का पूरा नजारा स्पष्ट दिख रहा था। बाहर चूंकि अँधेरा था, इसलिये अन्दर से बाहर बिलकुल नहीं दिखायी दे रहा था। दोनों सांसे रोक कर अन्दर का दृश्य देखने लगे। अन्दर निशा और सुमित बातें करते हुए खूब हँस रहे थे। वह इस बात से बेखबर थे कि उनकी यह बात बाहर भी कोई सुन रहा है।

“निशा तुम्हारी स्कीम कामयाब रही। अब तुम्हारी राह का काँटा हट गया। अब चंद्रेश तुम्हारा हुआ।” घूँट भरते हुए सुमित बोला।

“वाह! क्या प्लान बनाया तुमने। एक झटके से एक तीर से दो शिकार। एक तो चंद्रेश वंशिका में फूट पड़ गयी और दूसरी तरफ मुझ जैसी नायाब चीज़ तुम्हें मिल गयी।” मुस्कुराते हुए निशा बोली।

“ज्यादा फायदा तो तुम्हें हुआ। तुम्हारे और चंद्रेश के बीच का काँटा हमेशा के लिये हट गया। अब चंद्रेश केवल तुम्हारा ही होगा।” मुँह बनाकर सुमित बोला।

सुमित निशा के होठों को चूमने के लिये उठा ही था कि निशा ने रोक दिया, “चंद्रेश जाग जायेगा।”

“उसकी फिक्र मत करो। नशे की दवाई की एक गोली ही आदमी को चार-पांच घंटे बेसुध कर देती है। तुमने तो उसे दो दे दी, यानी सात-आठ घंटे की छुट्टी।” सुमित ने हँसते हुए कहा।

“मैं बहुत दिन से इस मौके की तलाश में थी कि कब मौका मिले और चंद्रेश मेरा हो।” कुटिल मुस्कान चेहरे पर लाती निशा बोली।

“मैंने भी बड़ी आसानी से वंशिका को फ़ोन करके भड़का दिया। बेवकूफ वंशिका सपने में भी नहीं सोच सकती कि फ़ोन किसने किया था? औरत जितनी ख़ूबसूरत होती हैं, उतनी ही बेवकूफ होती हैं।” सुमित अवस्थी निशा के साथ सट गया।

उसके गाल पर जोरदार किस किया। निशा ने किसी भी तरह का प्रतिरोध नहीं किया। वह अदा से मुस्कुरायी सुमित की वाह-वाह हो गयी। बाहर खिड़की के पीछे खड़े विमल और वंशिका उनके बीच हो रहे एक-एक शब्द को सुन रहे थे। विमल शांत था, जबकि चेहरे पर भूचाल के भाव लिये वंशिका खड़ी थी। उसके चेहरे पर हैरानी के भाव थे।

उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसने जो सुना वह सही है। उसकी आँखों से खुशी के आँसू निकले। चंद्रेश के लिये उसके मन में प्यार दुगना हो गया।

विमल बुदबुदाया, “ड्रामा नंबर तीन ख़त्म।” वंशिका के चेहरे में सहमति के भाव थे।

उसने उदार दृष्टि से विमल को देखा। कमरे से आती हल्की रोशनी में विमल बड़बड़ाया, “ऐसे मत देखो, वर्ना तुम्हें मुझसे प्यार हो जायेगा।”

वंशिका के चेहरे पर धीमे से मुस्कराहट उभरी। तभी विमल बोला चलो “ड्रामे का खात्मा करते हैं।”

निशा और सुमित एक दूसरे की बाहों में खोये हुए थे। ताली बजाता हुआ विमल अंदर पहुँचा। चिहुँक कर दोनों अलग हो गये। पीछे-पीछे वंशिका भी पहुँची। सुमित और निशा के चेहरे में जहाँ भर की हैरानी भर गयी।

विमल सामने सोफे पर बैठ कर बोला, “ वाह! क्या सीन हैं।”

“तुम यहाँ कैसे?” निशा ने हैरानी से विमल को देखा।

वंशिका नफरत से निशा और सुमित को देख रही थी।

“बंदा तो शुरुआत से हर जगह उपस्थित था। पार्क में जब आप लोग बात कर रहे थे सुमित के घर में, जब वह वंशिका से बात कर रहा था, हर जगह हम ही हम थे। आपका प्लान हम शुरू से जानते हैं।” व्यंग्य से विमल ने जवाब दिया।

“तुम औरत के नाम पर कलंक हो। तुम एक नागिन हो, जिस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता।” वंशिका नफरत से बोली।

“चलो विमल, इन लोगों के क्या मुँह लगना। चंद्रेश को संभालो और साथ ले चलो।” वंशिका विमल की तरफ मुड कर बोली।

विमल का सिर सहमति से हिला, “जनाब आप दोनों को आदाब अर्ज करता है।” कह कर वंशिका और विमल चंद्रेश ओर बढे।

उसे सँभालते हुए अपनी कार तक ले गये। दूसरी तरफ निशा और सुमित के बीच सन्नाटा छा गया। निशा को ऐसा लगा जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो।

अचानक सुमित चेतना से जागा, “मैं अभी उनको रोकता हूँ।”

निशा ने हाथ पकड़ कर मना कर दिया, “अब सब कुछ ख़त्म हो गया। बाजी अपने हाथ से पलट गयी है।” सोफे से उठता हुआ सुमित धम्म से सोफे पर बैठ गया।

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विमल वंशिका के साथ चंद्रेश को सम्भाले जब अपने घर में पहुँचा, उस समय रात के एक बजे थे। वंशिका ने घड़ी देखी और बोली, “मेरे घर पर मम्मी-पापा राह देख रहे होंगे। मुझे भी मेरे घर छोड़ दो।”

“इतनी रात में घर कहाँ जाओगी? यहीं लेट जाओ। अपने घर पर मम्मी-पापा को खबर कर दो।” विमल ने कहा।

वंशिका ने उसे देखा।

चंद्रेश को सोफे पर लेटे देख विमल बोला, “तुम भी यही आराम करो वंशिका। मैं ऊपर अपने रूम में चला जाता हूँ। तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो।”

वंशिका का सिर सहमति से हिला

उसने अपने माता-पिता को फ़ोन पर खबर कर दी कि उसकी सहेली की तबियत कुछ ज्यादा ही ख़राब है और वह रात में वही रुक रही है। उसके माता पिता ने आज्ञा दे दी।

विमल अपने बेडरूम में चला गया और वंशिका वहीँ पड़े दीवान पर लेट गयी। सुबह आठ बजे चंद्रेश ने मिचमिचाते हुए आँखें खोली। तेज रोशनी सीधे उसके मुँह पर पड़ी।

“मैं यहाँ कैसे?” उसने उठते हुए वंशिका को देखते हुए आश्चर्य से पूछा।

“लो चाय पियो?” वंशिका ने उसे चाय का कप पकड़ा दिया।

चंद्रेश ने चाय का कप थामते हुए विमल को देखा, जो उसे देख कर मुस्करा रहा था। धीरे-धीरे उसे रात की घटना याद आ गयी। वैसे वह बेहोश हो गया था, तभी उसका सिर घूमा। उसे चक्कर से आने लगे उसने कप मेज पर रखा और अपना सिर थाम लिया।

वंशिका ने उसे वापस सोफे पर लिटाया। थोड़े समय बाद वह सामान्य हुआ, तब वंशिका ने उसे सारी घटना बताई और विमल के बारे में बताया कि कैसे उसकी वजह से पूरा माहौल कण्ट्रोल में आया।

चंद्रेश ने विमल को धन्यवाद दिया और वंशिका से कहा, “अब मैं सहन नहीं कर सकता। जल्द से जल्द मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”

वंशिका ने विमल की तरफ देखा। उसने सहमति से सिर हिलाया। वंशिका चंद्रेश के सीने से लिपट गयी। कुछ दिनो बाद चंद्रेश और वंशिका की शादी हो गयी, जबकि वह अभी पढ़ ही रहे थे। शादी बड़े-धूमधाम से हुई, जिसमें चंद्रेश ने निशा और सुमित को भी बुलाया। वे शादी में नहीं आये, पर उनकी तरफ से गिफ्ट पहुँचा, जिसमें उनके लिये ढेर सारी शुभकामनाएं दी हुई थी और अपनी गलती के लिये दोनों ने माफी भी मांग ली।

मैंने और वंशिका ने उन्हें माफ़ कर दिया था। यह कहता हुआ चंद्रेश अतीत के झरोखों से बाहर निकला उसकी आँखों से आँसू झिलमिला रहे थे।

भाटी और निरंजन भी उसकी कहानी सुनकर द्रवित हो गये। वंशिका के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

चंद्रेश बोला, “यह मेरी वाइफ वंशिका नहीं है।”

विमल ने भी उसका समर्थन किया। भाटी का सिर सहमति से हिला।

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भाटी उठ खड़ा हुआ और गंभीर स्वर में चंद्रेश से बोला, “मिस्टर चंद्रेश, मुझे तुम से हमदर्दी है। तुम्हारी कहानी काफी दिलचस्प और भावनाओं से भरी हुई है, लेकिन यहाँ बात एक मर्डर के छानबीन की चल रही है, जो कि आप के मुताबिक इन मोहतरमा ने किया है।” उसने वंशिका की तरफ इशारा कर के कहा।

वंशिका चिल्लाई, “यह झूठ है, मैंने कोई मर्डर नहीं किया है।”

निरंजन और चंद्रेश ने वंशिका के चेहरे को देखा, जिसमें भरी सर्दी में भी पसीना निकल रहा था।

निरंजन और भाटी पूरी तरह से चंद्रेश की बातों से प्रभावित लग रहे थे।

“लेकिन अभी का जो सबसे बड़ा सवाल है, वह है कि लाश कहाँ हैं?” निरंजन चंद्रेश की तरफ देख कर बोला।

“एक लड़की, वह भी अकेली लाश को गायब नहीं कर सकती?” भाटी ने भी निरंजन का समर्थन किया।

“आप क्या कहते हैं मिस्टर चंद्रेश? लाश कहाँ जा सकती है?”

“मैं जब यहाँ से गया, लाश इसके पास छोड़ के गया था?” चंद्रेश पक्के स्वर में बोला।

“यहाँ का माहौल समझ में नहीं आ रहा, यह अपने को वंशिका बताती है जो है नहीं।” विमल हैरानी से वंशिका को घूरे जा रहा था।

यह बातें आपस में चल ही रही थी कि बाहर से कार रुकने आवाज आयी। सब का ध्यान भंग हो गया, तभी किसी के कदमों के आने की आवाज सुनाई दी। सब का ध्यान दरवाजे की तरफ चला गया आने वाले को देख कर चंद्रेश के मुँह से सिसकारी निकल गयी।

सामने सफ़ेद पेंट और काला कोट पहने सागर खड़ा था। उसकी आँखों में काला चश्मा लगा था, जो उसकी सुन्दरता को बढ़ा रहा था।

चंद्रेश जोर से चिल्लाया, “तुम जिन्दा नहीं हो सकते? तुम तो वंशिका द्वारा दिये गये जहर से मर चुके थे। मैं खुद तुम्हारी लाश यहाँ छोड़ के गया था।”

“क्या जीजाजी, आप भी ना, भरी जवानी में ही सठिया गये हो।” सागर अपने अंदाज में बोला।

वंशिका के चेहरे पर ख़ुशी लहर आ गयी और सागर से लिपट कर बोली, “भैया, इन लोगों का मानना है कि मैंने कॉफ़ी में जहर देकर आपको मार दिया है और आपकी लाश ठिकाने लगा दी है।”

“क्या जीजाजी, आज दिन में ही चढ़ा ली हैं क्या? या ऊपर का माला खाली हो गया है।” सागर चंद्रेश के पास आकर बोला।

भाटी और निरंजन की नजरें मिली। भाटी सागर को घूरता हुआ बोला, “कहाँ से पधार रहे हैं आप?”

“अब क्या मुझे आपको बता कर जाना पड़ेगा कि इंस्पेक्टर साहब मुझे टॉयलेट जाना है?” व्यंग्य भरे स्वर में सागर बोला।

“मिस्टर सागर, वकील होने का यह मतलब नहीं कि आपको हमारी बेइज्जती करने का अधिकार मिल गया।” निरंजन ने कठोर स्वर में कहा।

“मिस्टर सागर, आपकी जानकारी के लिये बता दें कि यह साबित हो चुका है कि यह वंशिका नकली है। चंद्रेश ने हमें सारी कहानी सुना दी है और हमें उसमें विश्वास है।”

निरंजन हँस कर बोला, “मिस्टर सागर, आप जानते नहीं यह विमल हैं। इन्होंने यह पहचान कर ली है कि यह वंशिका नहीं है क्योंकि ये साथ में पढ़े हैं और वंशिका को अच्छी तरह जानते हैं।” निरंजन ने साधारण स्वर में कहा।

“बहुत खूब।” सागर ने विमल को ऊपर से नीचे घूरते हुए देखा, “इन्होंने कहा और आपने मान लिया। सबूत कहाँ हैं? कानून सबूत मांगता है। सरकारी आदमी होकर भी आप यह नहीं जानते?”

विमल कसमसा कर रह गया, जब सागर ने यह शब्द किशोर सिंह भाटी को कहे।

“क्या जीता जागता सबूत अहमियत नहीं रखता?” भाटी ने विमल की तरफ इशारा कर के कहा।

सागर जोर-जोर से हंसने लगा। वंशिका ने उसे हैरानी से देखा। चंद्रेश और विमल उसे हँसते हुए देख कर आश्चर्य चकित रह गये। फिर सागर रुका, विमल की तरफ बढ़ कर बोला, “आपका एक सबूत यह साबित कर सकता है कि यह वंशिका नहीं है और मेरे दो सबूत यह साबित करते हैं कि यह वंशिका है।”

“तुम्हारे कौन-से दो सबूत?” निरंजन हैरान होकर बोला।

“निशा ओबरॉय और राहुल मकरानी को भूल ही गये आप?”

निरंजन के होठों पर मानो ताला लग गया।

वंशिका के चेहरे की रौनक बढ़ गयी निरंजन और भाटी से कुछ कहते नहीं बना।

“क्या यह सच है निशा ने इसे वंशिका कहा?” विमल आश्चर्य चकित होकर बोला।

भाटी की गर्दन सहमति से हिली।

“मिस्टर निरंजन और मिस्टर भाटी, काइंड योर इनफार्मेशन, सारे सबूत इन्हें वंशिका साबित करते हैं। चाहे वह आधार कार्ड हो या वोटर आई डी कार्ड। वह पक्का सबूत है कि ये वंशिका हैं। ड्राइविंग लाइसेंस भी आपको मैं दिखा सकता हूँ।”

सबकी बोलती बंद हो गयी। निरंजन और विमल बगले झांकने लगे।

चंद्रेश धम्म से सोफे पर बैठ गया। भाटी ने सागर को घूरते हुए कहा, “सरकारी नौकरी में रहते हुए हम जानते हैं ये सारे सबूत कैसे पैदा किये जाते हैं। फिलहाल हम मजबूर हैं वक्त तुम्हारे साथ है।” विवशता से भाटी बोला।

“अब आप लोग जा सकते हैं।” वंशिका गुस्से में दरवाजे के पास आकर खडी हो गयी।

दुनिया भर का अपमान महसूस करते हुए विमल, निरंजन और भाटी वहाँ से निकल गये। भाटी गुस्से में सागर को घूर रहा था, लेकिन कर कुछ नहीं सकता था।

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जीप में बैठे हुए विमल, भाटी और निरंजन शांत बैठे थे, फिर अचानक चुप्पी निरंजन ने तोड़ी, “तगड़ी मात खाई आज हमने।”

भाटी का सिर सहमति से हिला।

“मैं यह जानता हूँ वह असली वंशिका नहीं है, फिर भी मैं कुछ नहीं कर सका।” अफ़सोस भरे स्वर में विमल बोला।

“इन सब चक्कर में एक चीज अच्छी हुई कि हमें सुमित अवस्थी के बारे में और जानकारी मिली, जो उसका केस सुलझाने में मदद करेगी।” निरंजन के स्वर में उत्साह भरा हुआ था।

“तुमने ठीक कहा निरंजन, अब हमारे पास और रास्ते खुल गये हैं जिनसे कातिल का सुराग मिल जायेगा।” भाटी ने लम्बी सांस ली।

“मैं आप दोनों की जानकारी में इजाफा करना चाहूँगा, शायद आपको पता नहीं है। सुमित अवस्थी का बाप नेता सुन्दर लाल अवस्थी नशे का व्यापार भी करता था और उसके सम्बन्ध अयूब खान से हो सकते हैं।” विमल रहस्यमय स्वर में बोला।

निरंजन ने आश्चर्य से विमल को देखा, “तुम्हें यह बात कैसे पता चली?”

“एक दिन जब हम दोनों कॉलेज में दोस्त बन गये थे, तो एक दिन नशे में उसके मुँह से निकल गया कि वह अपने बाप से बहुत डरता था।” विमल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी।

“और तुमने बताया था कि वह किसी लड़की को चाहने लगा था, वह कौन थी?” निरंजन ने पूछा।

“यह बात हमको लास्ट तक पता नहीं चली।”

अचानक भाटी ने अपना मौन तोडा, “तुम तो अच्छा आदमी बताते थे। चंद्रेश की कहानी के हिसाब से तो वह नेगेटिव किरदार था।”

“चंद्रेश की शादी के बाद उसमें बदलाव आया, तभी हम करीब आये।” विमल तुरंत बोला, “बस मुझे यहीं उतार दो सर, अब घर जाना चाहता हूँ।”

भाटी का ब्रेक पर पैर पड़ा, जीप झटके से रुक गयी। विमल उतरा उनका अभिवादन करते हुए बस स्टैंड की तरफ चला गया।

निरंजन और भाटी काफी देर तक जाता देखते रहे। फिर भाटी ने जीप आगे बढ़ा दी।

“सर सुमित अवस्थी का केस अब जल्द हल होने वाला हैं।” निरंजन बोला।

भाटी ने कुछ सोचते हुए ‘हाँ’ में सिर हिला दिया।

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दूसरी तरफ चंद्रेश के घर में माहौल तनावपूर्ण था। वंशिका खुल कर अपने रूप में आ गयी थी। वह सागर के पास आकर बैठ गयी थी। सागर और वंशिका की नज़रें मिली, वे हौले से मुस्कुराये।

वंशिका चंद्रेश को सुना कर बोली, “सागर डार्लिंग, अपना प्लान तो सुपर हिट रहा।”

“अपने पति की तो शर्म करो भई, इनके सामने ही मुझे डार्लिंग कह रही हो।”

“अब छिपाने से क्या फायदा? यह तो जानते ही हैं कि मैं वंशिका नहीं हूँ। क्यों पतिदेव?” चंद्रेश दाँत भींच कर रह गया।

“कैसे बेचारा रात को छुपकर हमारी रासलीला देख रहा था। जैसेकि हमें पता ही न हो, जबकि हम दिखाने के लिये ही रासलीला खेल रहे थे।” मज़े लेते हुए सागर बोला।

“तुमने मुझे उस समय सही से प्यार नहीं किया था, अब कर लो?” वंशिका चंद्रेश को उत्तेजित करने के लिये सागर से बोली।

“रहने दो, यह सीन देखकर तुम्हारे पति को अटैक ना आ जाये।”

फिर वंशिका धीरे से सागर के करीब आयी। उसके होठों को किस करते हुए चंद्रेश को देखने लगी।

चंद्रेश का पूरा शरीर गुस्से में जलने लगा। उसने गर्दन फिरा ली और क्रोध को पीने की कोशिश करने लगा।

“अब तो यह मुझे घर से बाहर भी नहीं निकाल सकता क्योंकि निरंजन और भाटी मुझे झूठा साबित नहीं कर पाए।” वंशिका इठला कर बोली।

“चलो ऊपर वाले कमरे में थोड़ा प्यार कर लिया जाये?” सागर वंशिका का हाथ पकड़ कर बोला।

“प्लीज स्टॉप नोनसेन्स। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? तुम मुझसे क्या चाहती हो?” चंद्रेश गुस्से में दाँत भीँच कर बोला।

गुस्से में उसकी लाल-लाल आँखें जलने लगी।

“ओह! पतिदेव गुस्सा हो गये?” वंशिका नकली अफ़सोस जाहिर करते हुए बोली।

“तुम लोग क्या चाहते हो? बंगला, धन, दौलत जो चाहे ले लो पर मुझे माफ़ करो?” चंद्रेश ने गुस्से में हाथ जोड़ कर कहा।

“वह तो वैसे ही हमारा हो जायेगा, जब तुम पागल हो जाओगे। चलो डार्लिंग ऊपरवाले कमरे में चलते हैं।” सागर का हाथ पकड़ कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए वंशिका बोली।

“ओह! तो यह प्लान है, मुझे पागल साबित करके मेरी दौलत हड़पना चाहते हो।” मन ही मन बड़बड़ाता चंद्रेश उन्हें ऊपर जाते देखकर बोला।

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नेता सुन्दर लाल अवस्थी बेचैनी से अपने कमरे में टहल रहा था। उसकी सबसे बड़ी समस्या थी, सरकार के द्वारा पांच सौ और हज़ार रूपए के नोट बंद करना। इस घोषणा ने उसके हाथ-पैर फुला दिये थे। उसके पास कितनी दौलत है, वह खुद भी नहीं जानता था। नेता के तौर पर उसने खूब काली कमाई जमा कर रखी थी। साथ ही खान के साथ पार्टनर होने में ड्रग्स के धंधे में भी मोटी कमाई की थी। यह तो सुमित अवस्थी की मौत के बाद खान और उसके सम्बन्ध में दरार पड़ गयी थी, पार्टनरशिप टूट गयी थी जिससे उसकी काली कमाई में कुछ कमी आयी थी।

फिलहाल उसकी एक ही चिंता थी, कि इस काली कमाई को कैसे ठिकाने लगाया जाये। यूँ तो उसने सारी सैटिंग कर रखी थी, क्योंकि सरकार में वह स्वास्थ्य मंत्री था। कई बैंक मैनेजर और पुलिस अफसरों तक को उसने सेट कर रखा था, फिर भी उसका मन घबरा रहा था। तभी उसके मोबाइल पर रिंगटोन बजी। उसने स्क्रीन पर नंबर देखा और फ़ोन को कान से लगाया, “बोल शिंदे, कैसे फ़ोन किया?”

“सर जैसा आप चाहते थे, रूपए का वैसा ही इंतजाम हो गया है।”

“कितने बोरे तैयार हुए?”

“टोटल ग्यारह बोरे भरे हैं।” उधर से जवाब आया।

सोचते हुए नेताजी ने कहा, “ ठीक है आगे मेरे आदेश का इंतज़ार करना। सुबह दूध की गाड़ी और अखबार की गाड़ियों का इंतजाम करके रखना। हमें अपनी दौलत इन्ही गाड़ियों के माध्यम से ट्रान्सफर करनी है। समझ गये।”

“जी सर, कब ट्रान्सफर करना है?” उधर से सवाल पूछा गया।

“तुम गाड़ियों का बंदोबस्त करो। पैसा इकठ्ठा हो गया है। अब ज्यादा देर करना उचित नहीं। परसों सुबह ट्रान्सफर की प्रक्रिया शुरू कर देंगे। कल मैं सबको इनफार्मेशन दे देता हूँ।” यह कह कर नेताजी ने फ़ोन काट दिया और देसाई के नंबर पर कॉल करके उससे बात की।

“देसाई सारी तैयारी हो गयी है।”

“जी नेताजी।” संक्षिप्त जवाब देसाई ने दिया।

“कब हरकत में आना है?” देसाई ने पूछा।

“परसों सुबह यह रकम दूध और अखबार की गाड़ियों में ट्रान्सफर की जायेगी, जिससे किसी को भनक भी ना लगे। यह काम सुबह छह से नौ बजे के बीच हो जायेगा।”

“बढ़िया है।” देसाई बोला।

“तुम अपनी तैयारी करके रखो। राहुल मकरानी से बात करो। मैं किसी भी तरह से इस मामले में ढील नहीं चाहता।”

“आप चिंता ना करे नेताजी। मैं सब संभाल लूँगा।” देसाई ने शांत स्वर में कहा दूसरी तरफ से फ़ोन कट गया।

देसाई कुछ सोचने लगा, फिर राहुल मकरानी को फ़ोन लगाया, “राहुल तैयार रहना। सारी तैयारी हो चुकी है।” राहुल की आवाज सुनते ही देसाई ने फ़ोन पर हुक्म सुना दिया।

“कब एक्शन में आना है?” राहुल मकरानी ने सामान्य स्वर में पूछा।

“परसों सुबह चार से छह के बीच सारे काम को अंजाम देना है।”

“ठीक है, कहाँ से कहाँ भेजना है यह तो बता दो।” राहुल अपनी उत्तेजना को छुपाते हुए बोला।

“यह बात तो नेताजी ने अभी मुझे भी नहीं बताई, तुझे कैसे बता दूं।” देसाई चिढ़कर बोला।

“ठीक है, मैं तैयार हूँ। जो भी करना हो, मुझे खबर कर देना।” कहकर राहुल मकरानी ने फ़ोन काट दिया और मन ही मन बड़बड़ाया, “साले, कमीने नेता को किसी पर भी विश्वास नहीं है। घिसा हुआ बंदा है, लेकिन मुझे अपनी गर्दन बचानी है, तो खान को खबर करनी ही पड़ेगी।”

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खान एक मीटिंग में व्यस्त था, तभी उसका फ़ोन बजा। स्क्रीन में राहुल मकरानी का नम्बर दिखा।

“खान साहब, तैयारी पूरी हो चुकी है।”

“मैं तुमसे थोड़ी देर में बात करता हूँ। अभी मीटिंग में व्यस्त हूँ।” कह कर खान ने फ़ोन काट दिया।

“साला कुत्ता।” राहुल मकरानी के मुँह से भद्दी सी गाली निकली, “साला रुआब झाड रहा है।

आधे घंटे बाद खान का रिटर्न फ़ोन आया, “कहो, क्या कहना चाहते हो?”

“माल ट्रांसफ़र की पूरी तैयारी हो गयी है खान साहब। शायद परसों सुबह कार्य शुरू हो।” जल्दी में राहुल मकरानी बोला।

“माल कहाँ से निकल कर कहाँ जायेगा।” सोचते हुए खान बोला।

“खान साहब यह जानकारी तो अभी हमें भी नहीं है। शायद नेता को शक हो, वह हद से ज्यादा सावधानी रख रहा है।” शब्दों में लाचारी भरते हुए राहुल ने कहा।

खान के मुँह से गाली निकली, “कमीने कुत्ते आधी जानकारी का क्या मैं अचार डालूँगा। तू किसी काम का नहीं रहा लगता है। बागडोर मुझे अपने हाथ में लेनी पड़ेगी।” गुस्से में खान बोला।

“मुझे जो भी पता था, आपको बता दिया।” मकरानी ने डरते हुए कहा।

“तेरी नीयत साफ़ नहीं हैं मकरानी। शायद तू सब जानता है लेकिन बताना नहीं चाहता।” खान गुस्से में बोला। मैंने तेरे पर दया करके भारी भूल की। तू हमारे किसी काम का नहीं है। अब तेरी मुझे जरूरत नहीं है।” गुस्से में फ़ोन रखते हुए खान बोला।

राहुल मकरानी का पूरा शरीर पसीने से नहा गया, “लगता है खान का भी इंतजाम करना ही पड़ेगा।” मन ही मन कुढ़ता हुआ राहुल बोला।

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दिन के दस बज रहे थे। नेताजी अपने फार्म हाउस में धूप का आनंद ले रहे थे। सामने चेयर पर राहुल मकरानी और देसाई बैठे थे। दौलत ठिकाने लगाने का नेताजी प्लान बना रहे थे। सामने टेबल पर चाय और नास्ता रखा था, जिसकी तरफ राहुल और देसाई का ध्यान नहीं था।

नेताजी गला खंखार कर बोले, “देसाई कल सुबह जब सब लोग नींद के आगोश में होंगे, तो दूध और अखबार की गाड़ियों में हमारा माल निश्चित ठिकाने पर निकल चुका होगा।” देसाई का सिर सहमति से हिला।

“लेकिन इसमें हम लोग कहाँ फिट बैठते हैं?” देसाई की नजरें नेताजी पर टिकी हुई थी।

“यूँ तो सावधानी का पूरा ध्यान रखा गया है, लेकिन अगर पुलिस को कहीं से इनफार्मेशन पहुँच जाती है, तो भी वह चुप बैठी रहेगी। सब सेटिंग हो चुकी है।” नेताजी ने शांत स्वर में कहा।

“हम लोगों की क्या भूमिका रहेगी?” राहुल उत्तेजित स्वर में बोला।

“जब सब तैयारी है, तो हमारी कहाँ जरूरत है?” देसाई ने भी अपना मुँह खोला।

नेताजी ने दोनों को देखा, “हमारे दुश्मनों की कमी नहीं है। हो सकता है कोई दौलत लूट ले या कोई नष्ट करने की तैयारी करे, जो ज्यादा सरल हो, इसलिये आप दोनों की आवश्यकता है।”

नेता कुछ क्षण रुका फिर बोला, “क्योंकि गाड़ी डेयरी और अखबार वालों की ही है, इसलिये ज्यादा सिक्योरिटी भेद खोल सकती है। अतः गाड़ी को कोई सिक्योरिटी नहीं दी गयी है। लेकिन दूर से देसाई तुम और तुम्हारे आदमियों की नज़रें वैन पर ही रहेंगी। ये कैसे करना है वह तुम्हारी जिम्मेदारी?” देसाई का सिर सहमती से हिला।

“सुबह जब ज्यादा भीड़-भाड नहीं होगी, तो तुम दूर से नजरें रखने का इंतज़ाम अच्छी तरह कर सकते हो ताकि कोई लूट-पाट ना हो सके।”

“ठीक है मेरी तरफ से पूरी तैयारी रहेगी।” देसाई ने गंभीर स्वर में कुर्सी से पहलू बदलते हुए कहा।

नेताजी का सिर हिला।

“और मैं कहाँ फिट बैठता हूँ इस योजना में?” राहुल ने पूछा।

“तुम गाड़ी के साथ उसके अन्दर होंगे राहुल, गाड़ी सही जगह पहुँचे, यह तुम्हारी जिम्मेदारी है। यह मेरे जीवन भर की पूँजी है। इसलिये सब तरफ ध्यान रखना होगा। तुम और ड्राइवर हथियारों से लैस होगे। किसी भी स्थिति से निपटने के लिये।” राहुल मकरानी ने सहमति से सिर हिलाया।

पर मन ही मन सोच रहा था, “साले नेता ने मुझे बलि का बकरा बनाया है। खान अगर अटैक करता है, तो सूली पर मुझे ही चढ़ना पड़ेगा।” उसके मन में भय के भाव थे, लेकिन वह कुछ कह नहीं सका।

नेता ने उन दोनों को घूरा, “किसी के मन में कोई सवाल हो, तो पूछ ले।” देसाई ने नकारात्मक ढंग से सिर हिलाया।

राहुल बोला, “यह दौलत हमें कहाँ लेकर जानी है।” नेता मंद-मंद मुस्कुराया।

कल सुबह तीन बजे तुम्हारे पास एक फ़ोन कॉल आयेगी। उसमें जो निर्देश दिये जाएँ, तुम्हें उसके मुताबिक़ ही चलना है।”

मन ही मन राहुल ने नेता को गन्दी-सी गाली दी। साले अभी तक विश्वास नहीं कर रहा, पर उसने सहमति से सिर हिलाया।

अचानक नेता का ध्यान चाय की तरफ गया, “अरे ! चाय तो ठंडी हो गयी।”

लेकिन अब किसी का ध्यान चाय की तरफ नहीं था। दोनों ने विदा ली। नेता ने हाथ उठा कर आज्ञा दी और फिर गंभीर रूप से सोच में डूब गया।

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अयूब खान अपने ड्राइंग रूम में बैठा था। उसके हाथ में आधा भरा गिलास था। सामने दो व्यक्ति बैठे खान को देख रहे थे। खान ने घूँट भरा, फिर बुरा-सा मुँह बना कर बोला, “राहुल पर अब मुझे ज़रा भी भरोसा नहीं है। जोशी, तुम अपने आदमियों को राहुल की निगरानी में लगाओ। मुझे उसके हर एक मूवमेंट की खबर होनी चाहिये।”

“जी खान साहब, मैंने इंतजाम कर दिया है। जागृति अपार्टमेंट के बाहर मेरे दो आदमी उस पर निगाहें रखे हुए हैं। एक आदमी लगातार उसका पीछा कर रहा है। तीनों आदमी अदल-बदल कर पीछा कर रहे हैं।” जोशी ने आदर भरे स्वर में कहा।

“बहुत अच्छे।” मुंडी हिलाते हुए खान बोला।

“अभी थोड़ी देर पहले हमारे आदमियों ने खबर दी है कि राहुल और देसाई नेता सुन्दर लाल अवस्थी के घर से निकले हैं।” जोशी शांत स्वर में बोला।

“क्या इसका मतलब है कि जल्द ही एक्शन शुरू होने वाला है। राहुल मकरानी की एक-एक गतिविधि की खबर मुझे तुरंत होनी चाहिये, चाहे रात हो या दिन।”

“जी खान साहब।” जोशी के स्वर में आदर के भाव थे।

“तुम लोग पूरी तैयारी रखो। कभी भी एक्शन में आना पड़ सकता है। नेता अपनी काली कमाई को ठिकाने लगा रहा है, तो सिक्योंरिटी तगड़ी होगी। हमें हर हालत में मुकाबला करना है। या तो दौलत लूटनी है या फिर नष्ट करनी है।” खान की नज़रों में खूंखार भाव उभरे “और गद्दार देसाई को तो मैं देखता हूँ।“

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राहुल मकरानी अपने आलीशान फ्लैट में पहुँचा। उसे रात में काम को अंजाम देना था, तो उसने नींद लेना उचित समझा। उसे यह नहीं पता था कि बाहर दो आदमी उसकी हर गतिविधि की खबर रख रहे हैं। उसके पल-पल की खबर जोशी के पास पहुँच रही है।

तभी अपार्टमेंट के बाहर निशा ओबरॉय की कार रुकी, जिसमें से शानदार ढंग से निशा उतरी। लोगों की नज़रें उस पर टिक गयी। बला सी हसीं लग रही थी। निशा ने अपने बालों को झटका दिया और बलखाती हुई राहुल मकरानी के फ्लैट पर पहुँची।

उसने कॉल बेल बजाई। अंदर से राहुल की आवाज आयी, “कौन है?”

गुस्से में निशा ने कॉल बेल से ऊँगली नहीं हटाई। वह लगातार बजती रही। झुंझलाकर राहुल ने दरवाजा खोल दिया। सामने खूबसूरत निशा को देखकर उसके होश उड़ गये।

“तुम, इस वक़्त क्या काम है?” राहुल ने दरवाजे पर खड़े-खड़े ही पूछा।

“जालिम, अन्दर आने के लिये भी नहीं कहोगे?” मुस्कुरा कर निशा बोली।

राहुल एक तरफ हट गया। निशा अन्दर आयी। उसके सुन्दर होंठ गोल हो गये, “वाह ! शानदार फ्लैट है। क्या कहने, तुम अफोर्ड कर लेते हो?” मुस्कुराकर निशा बोली।

“क्या यही कहने तुम यहाँ आयी हो। देखो मुझे नींद आ रही है, जो कहना है, जल्दी कहो और टलो।” राहुल एक प्रकार से डंडा मारने वाले लहजे में बोला।

निशा तिलमिला गयी।

“दिन में सोने की तैयारी रात में क्या पहाड़ तोड़ते हो?” व्यंग्य से निशा बोली।

राहुल चौंक पड़ा, उसे लगाकि उसकी चोरी पकड़ी गयी है।

“नहीं, ऐसी बात नहीं है।” उसने अचकचा कर कहा।

निशा उसके चेहरे के भाव देखकर ऐसे मुस्कुराई, जैसे उसने चोरी पकड़ ली हो।

राहुल झेंप गया।

“आज से तुम्हारा-मेरा मिलना बंद।” निशा बोली।

“क्यों? क्या हो गया? क्यों मिलना बंद?” हैरानी से राहुल मकरानी बोला।

“कल मेरे पति अमन ओबरॉय लौट रहे हैं। मैं नहीं चाहती कि कोई हमें डिस्टर्ब करे।” निशा शांत स्वर में राहुल के चेहरे को देखती हुई बोली।

“ओह, अमन साहब की घर वापसी हो रही है और उनकी सती-सावित्री चाहती हैं कि कोई उनको डिस्टर्ब ना करे।” व्यंग्य से राहुल बोला।

राहुल की बातों का मर्म समझ कर निशा तिलमिला उठी, “मैं जैसी भी सती-सावित्री हूँ, तुमसे तो बेहतर हूँ। लोगों के पीछे दुम हिलाती तो नहीं भागती। लोगों से डर कर तो नहीं रहती।” गुस्से में निशा बोली।

“तुम्हारा लैक्चर ख़त्म हो गया हो, तो जाओ, मुझे आराम करना है।”

“मुझे भी कोई ख़ास शौक नहीं है तुम्हारा मनहूस चेहरा देखने का।” निशा के तन-बदन में आग लग गयी।

वह तिलमिला कर खड़ी हो गयी। बिना उसकी तरफ देखे वह बाहर निकल गयी।

राहुल ने मुस्कुरा कर दरवाजा बंद किया और सोने की तैयारी करने लगा।

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