शाम का वक्त था मौसम खुशनुमा था। निशा ओबरॉय की कार हनीमून प्वाइंट की तरफ बढ़ रही थी। आज उसकी इच्छा डूबते सूरज को देखने की हो रही थी।
हनीमून प्वाइंट पर सनसेट देखने के लिये काफी लोग आते थे। यहाँ से सनसेट देखने का अलग ही मजा था। देखते- देखते आग का गोला कैसे गायब होता है। इस नजारे को देखने माउंट में सात बजे से हनीमून प्वाइंट पर लोग इकट्ठा होते हैं। निशा की कार जब हनीमून प्वाइंट पहुँची, तो सनसेट शुरु हो गया था।
निशा कार से बाहर निकली और एक चट्टान से टेक लगा कर खड़ी हो गयी। सनसेट का मजा ले रही थी। लोग डूबते सूरज के साथ तरह-तरह की फोटो ग्राफी कर रहे थे। निशा की सुन्दरता पर अनेक मनचलों की नजर पड़ी। कुछ ने उसे आर्कषित करने की कोशिश की, लेकिन निशा इन सब से बेखबर नजारों में मस्त थी।
अचानक उसके मोबाइल की रिंगटोन बजी। निशा ने खूबसूरत हैन्डबैग से मोबाइल निकाला और स्क्रीन को देखा, तो अमन ओबरॉय का नाम दिखायी दिया। निशा ने ग्रीन बटन दबा कर फोन उठाया।
“कैसी हो स्वीट हार्ट?” दूसरी तरफ से अमन ओबरॉय का रोबिला स्वर सुनाई दिया।
अमन की आवाज में वह रोब था कि सामने वाला नमस्तक हो जाता था। निशा का शरीर तन गया।
“ठीक हूँ स्वीट हार्ट, तुम बताओ काम कैसा चल रहा है? वापस कब आ रहे हो? तुम्हारी कमी बहुत खल रही है।” निशा ने अपने शब्दों में शहद लपेटा।
“जल्द ही वापस आऊँगा स्वीट हार्ट, अभी थोड़ा काम बाकी है। तुम चिन्ता क्यों करती हो। कोई प्रॉब्लम है तो बताओ।” अमन का प्यार-भरा स्वर उसे सुनाई दिया।
“तुम्हारे होते हुए मुझे कोई दिक्कत हो सकती है? संभव ही नहीं।” निशा बोली।
“निशा एक बात ध्यान रखो मैं कहीं भी हूँ लेकिन मेरी नजरें तुम पर हमेशा रहती हैं। तुमको मैं दुखी नहीं देख सकता, यह बात तुम जानती हो।” अमन के स्वर में दिवानापन उभरा।
“मैं जानती हूँ अमन, तुम मुझे कितना चाहते हो। मुझसे कुछ छिपा हुआ नहीं है। तुम्हारा प्यार देख कर ही तो मैंने शादी करने की हामी भरी, बाकी मेरी शादी करने की कोई इच्छा नहीं थी।” निशा ने कहा।
“मैं जानता हूँ स्वीट हार्ट, तभी तो आज पूरे भारत में तुम्हारे नाम से रेस्टोरेंट और होटल खोलने का प्लान बना रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा नाम दुनिया देखे। अगर कोई प्राब्लम हो, तो तुरन्त मुझसे सम्पर्क करना।”
“तुम्हें क्यों लगता है मुझे कोई प्राब्लम है?” निशा ने सवाल किया।
“जब भी तुम प्राब्लम में होती हो, मुझे यहाँ पता लग जाता है। मेरे दिल में पिछले कुछ दिनों से गलत-गलत विचार आ रहे हैं।” अमन चिंतित स्वर में बोला।
“किसी तरह का वहम न पालो, मैं यहाँ ठीक हूँ। तुम जल्द से जल्द काम खत्म करके वापस आ जाओ। तुम्हारे बिना घर में अकेलापन लगता है।” निशा बोली।
“ठीक है स्वीटहार्ट, मैं जल्द काम खत्म कर के आ रहा हूँ। वैसे चार-पाँच दिन में मेरा आबू आने का विचार है। अपना ध्यान रखना।” कहकर अमन ने फोन काट दिया।
निशा ने मोबाइल पर्स में रखा, तब तक सनसेट हो चुका था। धीरे-धीरे लोग लौट रहे थे। निशा ने गाड़ी रिवर्स गेयर में डाल कर घुमाई। वह मन ही मन सोच रही थी। अमन उसे कितना प्यार करता है उससे और वह क्या कर रही है, उससे फरेब ! उसके मन में ख्याल आया, अगर अमन सच बोल रहा है कि वह उसके पल-पल की खबर रखता है तो सब जानता होगा। सोच कर उसका सिर भारी होने लगा। उसने कुछ पल अपने शरीर को ढीला छोड़ा और फिर एक झटके से कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी।
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थाने में किशोर सिंह भाटी और निरंजन गंभीर अवस्था में बैठे सुमित अवस्थी वाले केस के बारे में चर्चा कर रहे थे। टेबल पर रखी चाय कब ठंड़ी हो गयी, उन्हें पता भी नहीं लगा।
सोच से बाहर निकलते हुए भाटी बोला, “निरंजन केस पूरा खुला हुआ है। अब हमारे पास चार सस्पैक्ट हैं। चंद्रेश मल्होत्रा, निशा ओबरॉय और विमल जो इस कहानी में किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं।” निरंजन की गर्दन हाँ में हिली।
“इसमें दो नाम और जोड़ लीजिये सर, अयूब खान और राहुल मकरानी का।” निरंजन ने कहा।
“वैसे देखा जाये तो विमल और राहुल मकरानी को इस मामले से बाहर रख सकते हैं क्योंकि विमल, सुमित अवस्थी के मर्डर के वक्त यहाँ नहीं था और राहुल मकरानी का इस मर्डर में कोई रोल दिखायी नहीं दे रहा।” भाटी ने मूंछो पर हाथ फेरते हुए कहा।
“सर हमें हर एंगल से सोचना है तो अभी कोई भी शक के दायरे से बाहर नहीं हो सकता।” निरंजन भाटी की तरफ देख कर बोला।
भाटी की गर्दन सहमति से हिली, “तुम सही कहते हो निरंजन। हमें छानबीन शुरु से करनी है और नये सिरे से करनी है, क्योंकि अब हमारे पास कई रास्ते खुले पड़े हैं। कातिल तक पहुँचने के लिये हमें सारे सबूत वापस से देखने होंगे और शुरुवात वहीं से होगी, जहाँ सुमित अवस्थी रहता था।”
निरंजन की गर्दन सहमति में हिली।
“एक बात मुझे और परेशान कर रही है सर। यदि चंद्रेश की बात सच माने, तो जो वंशिका अभी है वो नकली है तो असली कहाँ गयी?”
“निरंजन तुम्हारी बात में दम है। मुझे लगता है यदि यह वंशिका नकली है तो हमें दो-दो मर्डर केस की छानबीन करनी पड़ेगी।”
“क्या कह रहे हो, सर?” निरंजन हैरानी से बोला।
“यदि वंशिका नकली हैं तो सौ प्रतिशत असली वंशिका इस दुनिया में नहीं है और उसे मारने के पीछे जरूर नकली वंशिका और सागर का हाथ है।” भाटी ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।
“सर मुझे सागर का रंग-ढंग समझ में नहीं आ रहा। पट्ठा हाथ भी नहीं रखने देता। कानून का पूरा नॉलेज है। हर बात का जवाब है उसके पास।” निरंजन ने कहा।
“अब मैं देखता हूँ कैसे बचता है वह? कानून के हाथ लम्बे होते हैं। मुजरिम कितना भी चालाक हो, लेकिन कुछ न कुछ सबूत जरुर छोड़ कर जाता है। हमें वही पकड़ना है।” भाटी विश्वास से बोला।
“चलो सर, शुरुवात सुमित अवस्थी के होटल से करते हैं। पता नहीं इतना पैसा होने के बाद सुमित होटल में क्यों रहता था।”
“पहले तो हम कन्फ्यूज थे पर चंद्रेश की स्टोरी से पता चलता है कि सुमित अय्याश किस्म का आदमी था। होटल में कोई रोक-टोक नहीं थी। उल्टा वहाँ तो अय्याशी के सारे साधन उपलब्ध थे।”
निरंजन का सिर सहमति से हिला। उसने भाटी की बात का समर्थन किया।
होटल हिलटाउन माउंट आबू का शानदार होटल, जो अपनी भव्यता के लिये प्रसिद्ध था, उसको इस तरह डिजाईन किया गया था कि राजा-महाराजा के महल याद आ जाये। जगह-जगह एन्टीक आईटम्स रखे हुए थे, जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। सामने ही बड़ा-सा गार्डन था, जहाँ बीच में पानी का फव्वारा लगा हुआ था, जो चालू था। रात के समय वहाँ की रंगीन लाईटें भी चालू कर दी जाती थी। रंग-बिरंगी रोशनी से वातावरण और हसीन हो जाता था। फिलहाल दिन के समय लाईटें बन्द थी। होटल के बाहर अचानक भाटी और निरंजन अपनी शानदार वर्दी के साथ जीप से उतरे और सीधा रिसेप्शनिष्ट की तरफ बढ़े। वहाँ एक खूबसूरत लड़की बैठी थी, जिसने मेकअप का शानदार इस्तेमाल किया हुआ था। वह पुलिस को देख कर चौंक कर सीधी बैठ गयी।
भाटी ने कहा “मुझे मैनेजर साहब से मिलना है।” लड़की का सिर सहमति में हिला।
वह कुछ कहने ही वाली थी कि सामने पड़े दो फोन में से एक चिल्ला उठा। उसने फोन उठाया फिर किशोर सिंह भाटी को देखा। मैनेजर के रूम की तरफ जाने का इशारा किया। भाटी और निरंजन मैनेजर रूम की तरफ मुड़े।
“सी. सी. टीवी कैमरे का कमाल है।” निरंजन मुस्कुराते हुए बोला।
दोनों मैनेजर के सामने बैठे थे। पैंतालिस वर्षीय मैनेजर शक्ल से शरीफ नजर आ रहा था। ऑफिस में AC की हवा से ठण्डापन था। मैनेजर ने दोनों के लिये कॉफी का ऑर्डर कर दिया।
“कहिये भाटी साहब, क्या सेवा कर सकता हूँ?” मैनेजर आदरपूर्ण स्वर में बोला।
“शुक्ला जी दोबारा आपको तंग करने के लिये माफी चाहता हूँ, लेकिन अब काफी टाइम हो गया है। केस सॉल्व करना जरूरी है। आप सुमित अवस्थी के बारे में वापस बताइये। कौन उससे मिलने आता था? कत्ल वाले दिन कौन-कौन मिलने आया? किसके साथ अपॉइन्टमेन्ट थी? क्या- क्या हुआ? सारी बातें दोबारा डीटेल से बताइये। कोई भी चीज बचनी नहीं चाहिये।”
“जी सर, मैं समझता हूँ आप पर केस हल करने का प्रेशर है। जहाँ तक मैं जानता हूँ सुमित अवस्थी रिजर्व रहता था। ज्यादा लोग उसके पास नहीं आते थे। लेकिन दो लड़कियाँ और दो-तीन साहब अक्सर उससे मिलने आते थे।”
“लड़कियाँ या महिलाएँ? “ निरंजन ने टोका।
“अब आजकल के फैशन में कहाँ मालूम पड़ता है साहब, कौन लड़की है और कौन शादीशुदा है?” मैनेजर ने शान्त स्वर में कहा।
निरंजन ने सहमति से सिर हिलाया।
“सुनने में आया है सुमित अवस्थी रंगीन तबियत का आदमी था।” भाटी बोला।
“भाटी साहब, उस उम्र में सभी रंगीन तबियत के रहते हैं।” मैनेजर बोला।
“सुमित अवस्थी के कत्ल वाले दिन के बारे में आपको याद है? क्या हुआ था?” भाटी ने सवाल किया।
“सर, अब तक यह बात इतनी रिपीट हो चुकी है कि ऐसा लगता है, सारा दृश्य सामने चल रहा है।” मैनेजर बोला।
“तो बताइये, उस दिन क्या हुआ था? मामूली से मामूली बात भी बताइये।”
मैनेजर ने सोचते हुए बताना शुरु किया। उस दिन होटल में ज्यादा भीड़ नहीं थी और दिनों के मुकाबले ठंड भी अधिक थी। लोग कम ही बाहर निकल रहे थे। शाम पाँच बजे एक सुन्दर-सी महिला आयी। वह सुमित साहब के साथ तीन घण्टा रही। आठ बजे के करीब वह चली गयी, तो सुमित अवस्थी साहब बाहर आये। तभी उनसे मिलने एक सज्जन आये। आधा घण्टा दोनों गार्डन में रहे। फिर किसी बात में उनमें और सुमित साहब में गरमा-गरमी हो गयी। वह साहब उन को देख लेने की धमकी देने लगे। होटल के कर्मचरियों ने उनका बीच-बचाव किया। वह व्यक्ति गुस्से में ही उनसे कहता हुआ निकला कि “तुम्हारी जिन्दगी के दिन पूरे हो गये मिस्टर सुमित अवस्थी। मुझ से बचकर रहना।” फिर वह व्यक्ति अपनी कार में बैठ कर चला गया। मैनेजर शान्त भाव से बोला।
“हाँ, यह बात तुमने पहले भी बताई थी। कौन था वह व्यक्ति?” निरंजन ने पूछा।
“मैं उन्हें नहीं जानता भाई साहब, पर रहन- सहन से लग रहा था कि वह कोई ऊँचे खानदान का बहुत ही पैसे वाला व्यक्ति होगा। उसके चेहरे से अमीरी की झलक दिख रही थी। हाव-भाव से रॉयल खानदान का लग रहा था। कोई सोच भी नहीं सकता ऐसा रॉयल आदमी हाथापाई जैसी हरकत करेगा, लेकिन जाते-जाते उसका मूड ऐसा था, जैसे वह किसी का मर्डर कर सकता था।”
“इस आदमी के बारे में हमने जानने की बहुत कोशिश की, लेकिन इसका कोई सुराग तक नहीं मिला।” भाटी निराशा भरे स्वर में बोला।
“हो सकता है इस व्यक्ति का कत्ल में हाथ हो।” निरंजन बोला।
मैनेजर कुछ क्षण चुप रहा। वह दोनों को देखने लगा।
“आगे क्या हुआ मैनेजर साहब?” निरंजन बोला।
मैनेजर ने बात आगे बढ़ाई, “झगड़े के बाद सुमित साहब अपसेट हो गये थे। उनका मूड बिगड़ गया था। मेरे लाख पूछने पर भी उन्होंने उस व्यक्ति का नाम और झगड़े की वजह नहीं बताई। आधे घण्टे में सब कुछ नॉर्मल हो गया। उस समय रात के नौ या सवा नौ का समय होगा, जब सुमित अवस्थी ने डिनर का प्रोगाम बनाया। वे डिनर के लिये जा रहे थे कि अचानक एक बला-सी हसीन लड़की होटल में आयी, जिसे देख कर सुमित साहब ने डिनर का विचार त्याग दिया, वह बला सुमित साहब के पास आयी। उनसे हँस-हँस कर बात करने लगी। फिर दोनों सुमित साहब के रुम की ओर बढ़ गये। रुम में ही इन्टरकॉम में सुमित साहब ने डिनर का आदेश दिया, साथ में व्हीस्की का ऑर्डर भी। दो से ढ़ाई घण्टे दोनों साथ में रहे, फिर ग्यारह-सवा ग्यारह बजे के बीच दोनों रूम से बाहर निकले। दोनों के चेहरे से लग रहा था कि दोनों ने छ्क कर पी है। सुमित साहब तो खड़े भी नहीं रह पा रहे थे। औरत उनको संभाल कर धीरे-धीरे बाहर लाई, फिर वह कार में बैठ कर चले गये। उसके बाद क्या हुआ, मैं नहीं जानता।” मैनेजर ने कहा।
“क्या आप दोनों महिलाओं को जानते हो, जिन्होंने उस दिन सुमित अवस्थी के साथ वक्त गुजारा?” भाटी ने पूछा।
मैनेजर की नजरें नकारात्मक ढंग से झुकी।
“क्या मैं उस वेटर से मिल सकता हूँ, जिसने उसे डिनर सर्व किया?”
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं?” मैनेजर ने इन्टरकॉम पर सुरेश को भेजने को कहा। थोड़ी देर में सफेद वर्दी पहने सुरेश हाजिर हुआ। वह पुलिस को देख कर घबरा गया।
“घबराओ नहीं सुरेश। हमें यह बताओ कि जिस दिन सुमित अवस्थी का मर्डर हुआ, तुमने उनको डिनर सर्व किया, तब अन्दर का माहौल कैसा था?” सुरेश के डरे चेहरे को देख कर भाटी बोला।
“सर, जब मैं डिनर देने गया, उस समय वहाँ हँसी-मजाक का हल्का-फुल्का माहौल था। सुमित सर बार-बार मैडम के गले में हाथ डाल रहे थे, पर मैडम मजाक भरे अंदाज में उनका हाथ झिड़क देती। दोनों ही चाहते थे कि मैं जल्द से जल्द रुम से निकल जाऊँ, ताकि उनकी प्राईवेसी में कोई दखल ना पड़े।” सुरेश ने डरते हुए कहा।
“अच्छा एक बात बताओ। तुमने व्हीस्की पहले दी थी या डिनर के साथ दी थी?” निरंजन ने पूछा।
“सर व्हीस्की, भुने काजू और रोस्टेड चिकन तो उन्होंने पहले ही मँगवा लिया था। रुम के अन्दर पहुँचने पर डिनर का मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने एक घण्टे बाद लाने को कहा।”
“यानी तुम दो बार रुम में गये थे?”
सुरेश का सर सहमति में हिला।
“अच्छा एक बात बताओ। जब डिनर देने गये, उस समय कैसा माहौल था? दोनों में से कौन ज्यादा नशे में दिख रहा था।” निरंजन ने पूछा।
“साहब नशे में तो सुमित साहब ही थे। गिलास तो दो ही रखे थे, पर लग नहीं रहा था कि मैडम पी रही हो।” सुरेश सावधानी से बोला।
“यह बात तुम कैसे कह सकते हो?” भाटी ने पूछा।
सुरेश ने रहस्यमय स्वर में कहा, “सर, वहाँ पास ही एक छोटा मिनी प्लांट रखा था। जब मैं पहली बार गया था, तो सूखा हुआ था, दूसरी बार में वह मुझे गीला दिखायी दिया, जैसे उसमें कुछ डाला गया हो।” निरंजन सीधा होकर बैठ गया।
“यह बात तुमने पहले क्यों नहीं बताई?”
“सर, मैं गरीब आदमी कहाँ पुलिस के चक्कर काटता।” सुरेश ने डरे स्वर में कहा।
“यह बात छुपा कर तुमने बहुत गलत किया है।” भाटी ने गुस्से में उसे देखते हुए कहा।
“मुझे माफ कर दो सर।” सुरेश के स्वर में घबराहट उभरी।
“और कुछ बताना चाहते हो?” निरंजन ने पूछा।
सुरेश ने नकारात्मक ढंग से गर्दन हिला दी।
“ठीक है, अब तुम जा सकते हो।” निरंजन ने कहा।
सुरेश ऐसे गायब हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग।
निरंजन ने भाटी को देखा और कहा, “अब सस्पैक्ट और बढ़ गये। एक तो वह व्यक्ति, जिससे सुमित का झगड़ा हुआ, दूसरी वह लड़की, जिसने सुमित को जबरदस्त शराब पिलाई और फिर वहाँ से सहारा देकर ले गयी।” भाटी का सिर सहमति से हिला।
“अच्छा, तो अब हम चलते है मैनेजर साहब। आपको एक बार और कष्ट देंगे। कुछ तस्वीर दिखा कर।” मैनेजर ने झट से सहमति से सिर हिलाया और दोनों से हाथ मिलाया।
वे बाहर की तरफ बढ़े ही थे, कि निरंजन ने मैनेजर का लैपटॉप देखा और बहुत जोर से चौंका और घूम गया। भाटी ने उसके चेहरे के बदलते हुए भाव देखे।
“क्या हुआ निरंजन? तुम चौंके क्यों?
निरंजन वापस आकर कुर्सी पर बैठ गया और भाटी से इशारा करके बोला, “बैठिये सर, अभी एक चमत्कार, एक धमाका होना बाकी हैं। हमें किसी को पहचानने के लिये तस्वीर लाने की कोई जरुरत नहीं हैं।”
“क्या कह रहे हो निरंजन?” आश्चर्य से भाटी बोला।
“आप बैठिये तो सर। हमसे बड़ा बेवकूफ कोई दूसरा ना होगा।” जबरन भाटी को बैठाते हुए निरंजन बोला।
मैनेजर ने उलझन पूर्ण नजरों से दोनों को देखा, “क्या कहना चाहते हो सर?”
“हमारे आने का आपको कैसे पता चला, जो आपने रिसेप्सनिष्ट को फोन कर हमें डायरेक्ट अन्दर बुला लिया? “
“मैंने यहाँ आपको देखा लैपटॉप पर।” मैनेजर ने उलझनपूर्ण ढंग से निरंजन को देखा।
भाटी भी तब तक निरंजन के कहने का मतलब समझ गया।
“वाह निरंजन, गुड जॉब।” भाटी मुस्करा कर बोला।
“आप समझ गये सर, मेरे कहने का मतलब।”
भाटी की गर्दन हाँ में हिली। मैनेजर दोनों को पागलों की तरह देख रहा था।
“मैनेजर साहब, आपके यहाँ सी. सी. टीवी कैमरे लगे हैं तो उस दिन की फुटेज भी हमें मिल जायेगी, जिस दिन सुमित अवस्थी का मर्डर हुआ।”
मैनेजर सब समझ गया, “होनी तो चाहिये सर। हम हर महीने की डी.वी.डी. बना कर साल भर अपने पास रखते हैं। ताकि जरूरत पड़ने पर काम आ जाएं। साल भर बाद उसे नष्ट कर देते हैं।”
“बन गया काम।” निरंजन मुस्कुरा कर बोला।
“तो मैनेजर साहब, उसे दिखाने का इंतजाम कीजिये।” भाटी उत्सुकता से बोला।
मैनेजर भीतर गया और कुछ डी.वी.डी. में से एक निकाल कर उसे लैपटॉप पर लगा दी। थोड़ा आगे-पीछे करने के बाद उस दिन का सीन दिखने लगा। शाम पाँच बजे जिस महिला ने कदम रखा, उसे देखकर भाटी और निरंजन दोनों ही चौंके।
“यह तो निशा ओबरॉय है।” निरंजन बोला।
डी.वी.डी. आगे बढ़ी। आठ बजे निशा वापस चली गयी। तभी थोड़ी देर बाद उन्हें स्क्रीन पर गुस्से में भरा सुमित अवस्थी दिखायी दे रहा था, लेकिन जिस व्यक्ति से झगड़ा हुआ, वह नहीं दिखायी दिया।
“वह व्यक्ति कहाँ है? कैसेट में नहीं आया।” भाटी ने पूछा।
“सर, उनका झगड़ा गार्डन में हुआ था। वहाँ सी.सी. टी.वी. कैमरा नहीं था। वो गार्डन से ही बाहर चला गया था। इसलिये नहीं आया।”
भाटी ने समझते हुए गर्दन हिलाई।
सवा नौ बजे के करीब एक कयामत दिखायी दी, जो भड़कीली ड्रैस पहने हुए स्क्रीन पर आयी, जिसने सुमित के साथ हँस-हँस कर बात की, फिर वो दोनों रुम में चले गये। सवा ग्यारह बजे वे दोनों नशे की हालत में बाहर निकले। लड़की भी नशे में लग रही थी। वह सुमित को संभाले बाहर निकल गयी। वह सब के लिये अपरिचित थी। मैनेजर ने लैपटॉप बन्द किया।
“मैनेजर साहब, एक काम कर सकते हो? इस डी.वी.डी. की एक कॉपी और इस लड़की और निशा ओबरॉय की प्रिन्टेड तस्वीर निकालने का बंदोबस्त कर दो।”
मैनेजर ने सहमति से सिर हिलाया। थोड़ी देर में उनके काम की चीज उनके हाथ में थी। दोनों का चेहरा चमक रहा था।
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