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“मैं टोटल रुटीन बयान करता हूं ।” - वो अप्रत्याशित नम्र स्वर में बोला - “हमेशा की तरह नौ बजे आफिस के लिये निकला, वहां रुटीन आफिस वर्क के अलावा एक कांफ्रेंस अटेंड की, फिर अपने एक परिचित प्रोफेसर मजूमदार से मिलने जवाहर लाल नेहरू यूनीवर्सिटी गया, बारह बजे वापिस आफिस लौटा और चार बजे के करीब तक वहां आफिस वर्क में मशगूल रहा । फिर पीवीआर, साकेत में मूवी देखने गया । सात बजे घर लौटा । उसके बाद कहीं न गया, घर से बाहर कदम ही न रखा ।”
“शिड्यूल अच्छा बयान किया आपने, लेकिन ये कत्ल के वक्त की सॉलिड एलीबाई तो पेश नहीं करता !”
“मुझे सॉलिड एलीबाई की - कैसी भी एलीबाई की - क्या जरूरत है जब कि ये जाहिर है कि कातिल सुजित त्रेहन है - जिसने कि अपनी धमकी पर कामयाबी से खरा उतर कर दिखाया है !”
“सुजित त्रेहन के वजूद को अपनी सहूलियत के मुताबिक आप कभी नकारते हैं, कभी स्वीकारते हैं, ऐसा कैसे चलेगा ? एक बार फैसला कर लीजिये कि आपका भूतपूर्व पार्टनर जिंदा है या बाइस साल पहले मर चुका ।”
“मौजूदा हालात में ये कहने पर मजबूर हूं कि जिंदा है किसी करिश्मासाज तरीके से । जिंदा है और अपनी धमकी पर खरा उतरकर ही मानेगा । इस लिहाज से बतौर मर्डर सस्पैक्ट अगर मेरा मुकाम जेल हो तो मुझे खुशी होगी । यूं कम से कम उस जुनूनी कातिल की पहुंच से तो मैं दूर रहूंगा ।”
“आपकी पत्नी ने भी ऐसा ही कुछ कहा था ।”
“मैं भी कह रहा हूं ।”
“ओके ।” - मैं उठ खड़ा हुआ - “थैंक्यू ।”
सहमति में सिर हिलाता वो भी उठा ।
“केस के प्रभारी अधिकारी इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव ने कहा था वो आठ बजे यहां आयेगा ।” - मैं फिर कलाई घड़ी पर निगाह डालता बोला - “आठ बजने ही वाले हैं ।”
“वो क्या पूछेगा ?”
“क्या पूछेगा ! वही सब पूछेगा जो मैंने पूछा । खानापूरी करेगा । ड्यूटी जो ठहरी उसकी । आप यूं समझिये कि उसकी आमद से पहले मेरे जरिये आप लोगों के बयानात का रिहर्सल हुआ । काम आयेगा । नहीं ?”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
“इजाजत दीजिये ।”
स्टडी से निकल कर मैंने वापिस हाल में कदम रखा तो इंस्पेक्टर यादव के मातहत नौजवान सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर को मेन डोर से भीतर दाखिल होते पाया ।
मैं लपक कर उसके करीब पहुंचा ।
“तुम !” - मुझे देख कर वो सकपकाया - “यहां भी ! सुबह सवेरे !”
“कोई ऐतराज !” - निर्दोष भाव से मुस्कराता मैं बोला ।
“ये दखलअंदाजी है पुलिस के काम में ।”
“ये मेहमानवाजी है तोशनीवाल साहब की, वर्ना बेवक्त के मेहमान को कौन मुंह लगाता है ! बहरहाल वो किस्सा फिर कभी । अभी बोलो, साहब नहीं आया तुम्हारा !”
“आता ही होगा ! हमने अलग अलग जगहों से आना था, इत्तफाकन मैं जल्दी पहुंच गया ।”
“साहब अब क्या कहता है केस की बाबत ?”
“साहब से पूछना ।”
“अरे, छोटे साहब, ऐसे पेश न आओ मेरे से । केस से ताल्लुक रखती किसी मामूली बात के जिक्र पर क्या पाबंदी होगी भला ! मीडिया को भी तो ऐसी जानकारी देते हो ! फिर मेरे से ऐसा बेरुखी किसलिये ?”
“मामूली बात है तो पूछो !”
“नीले रंग के रेशमी कपड़े की जो धज्जी छतरपुर में फार्महाउस के मेन डोर के एक कब्जे में फंसी मिली थी, उसके बारे में कुछ बताओ !”
“प्लांट थी ।”
“क्या मतलब ?”
“वो धज्जी रेशमी दुपट्टे का टुकड़ा थी जो कब्जे में अटक कर दुपट्टे से फट कर अलग नहीं हुई थी - वो कपड़ा इस किस्म का नहीं था जिसमें कोई रेशमी - या कैसा भी - कपड़ा अटक सकता और खिंचकर फट सकता । अभी यहां तफ्तीश से ये बात स्थापित होने की पूरी सम्भावना है - सम्भावना क्या, गारंटी है - कि वो धज्जी श्यामली तोशनीवाल के दुपट्टे की है और उसे फंसाने के लिये, केस में उसकी इन्वोल्वमेंट बनाने के लिये, बड़ी चतुराई से उसे वहां कब्जे में अटका छोड़ा गया था लेकिन इस बात की तरफ तवज्जो नहीं दी गयी थी कि कोई रेशमी कपड़ा उस कब्जे में नहीं फंस सकता था, खिंचने पर फट कर अलग नहीं हो सकता था ।”
“ये यादव साहब की रिसर्च है ?”
“हां ।”
“मैडम जो शलवार सूट पहने थी, वो नीला नहीं था । जो दुपट्टा वो ओढ़े थी, उसका रंग भी नीला नहीं था ।”
“हमने नहीं देखा था वो कैसी पोशाक पहने थी ।”
“मैं बता रहा हूं न !”
“क्या ? ये कि आधी रात को जब वो तुम्हारे साथ थी तो नीले रंग की पोशाक नहीं पहने थीं ?”
“हां ।”
“लेकिन कत्ल तो छ: और सात के बीच में हुआ ! तब वो कौन से रंग की पोशाक पहने थी तुम्हें क्या मालूम ?”
“बढ़िया जिरह करते हो । तरक्की करोगे ।”
वो खामोश रहा ।
“तो किसी ने मैडम को फंसाने के लिये ऐसा किया ?”
“जाहिर है ।”
“किसने ?”
“अभी नहीं मालूम । लेकिन मालूम पड़ जायेगा । पड़ के रहेगा ।”
“इस लिहाज से तो मौकायवारदात से वरामद वो पर्स भी प्लांट हो सकता है !”
“हो सकता है ।”
“कोई खास ही पीछे पड़ा है मकतूला की मां के !”
“या कोई खास ही दिमाग काम कर रहा है एक बड़े षड़यंत्र को कामयाबी से अंजाम देने में ।”
“क्या मतलब ?”
जवाब में वो बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कराया ।
“ये जो प्लांट वाली बात तुमने बताई उसकी रू में तुम इतना तो मानते हो न, कि मकतूला की मां - श्यामली - बेगुनाह है ?”
“नहीं ।”
“क्या ! लेकिन जब उसे फंसाया जा रहा है तो...”
“डबल ब्लफ !”
“क्या !”
“जो खुद को गुनहगार साबित करने के भी काम आये और बेगुनाह साबित करने के भी काम आये । इवीडेंस पहले तो मदाम एक्स की तरफ इलजाम लगाती उंगली उठाये, फिर जब सामने आये कि इवीडेंस प्लांटिड था तो वही उसकी बेगुनाही की तरफ मजबूत इशारा बन जाये ।”
“ये है डबल ब्लफ ?”
“हां ।”
“जो श्यामली ने स्टेज किया ?”
“या उसके जोड़ीदार ने - अकम्प्लिस ने - स्टेज किया । लेकिन मिली भगत बराबर ।”
“क्या किस्सा है ? क्या थ्योरी है तुम्हारे पास ?”
“यादव साहब के पास ।”
“एक ही बात है । वैसे इस डबल ब्लफ वाली बात पर आज मैं यादव साहब की दानाई का कायल हो गया । अभी तुम्हारी जगह वो सामने होते तो फर्शी सलाम करता । अब बताओ थ्योरी क्या है डबल ब्लफ नाम के जैम के पीछे ?”
“बता दूं ?”
“प्लीज यार ।”
“ठीक है, सुनो । थ्योरी ये है कि श्यामली तोशनीवाल में और सुजित त्रेहन में पुरानी आशनाई है - इतनी प्रबल कि शादी के बंधन तक पहुंची थी । क्वार्टर सेंचुरी के बाद श्यामली को पता लगता है कि सुजित त्रेहन, उसका पूर्व पति, मरा नहीं, जिंदा है । दोनों में स्थापित पुरानी, पुख्ता आशनाई जोर मारती है तो वो हसबैंड को, शिव मंगल तोशनीवाल को, रास्ते से हटाने की स्कीम बनाते हैं । कहना न होगा कि हसबैंड से श्यामली का कोई छोटा मोटा मुलाहजा था तो तभी तक का था जब तक कि उसे अपने ओरीजिनल चाहने वाले के जिंदा होने की खबर नहीं लग गयी थी ।”
“अब आगे कहीं तुम ये तो नहीं कहने वाले कि वो धमकी भरी चिट्ठी भी दोनों की गढ़ी स्कीम का, दोनों की मिलीभगत का नतीजा थी ?”
“शिड्यूल अच्छा बयान किया आपने, लेकिन ये कत्ल के वक्त की सॉलिड एलीबाई तो पेश नहीं करता !”
“मुझे सॉलिड एलीबाई की - कैसी भी एलीबाई की - क्या जरूरत है जब कि ये जाहिर है कि कातिल सुजित त्रेहन है - जिसने कि अपनी धमकी पर कामयाबी से खरा उतर कर दिखाया है !”
“सुजित त्रेहन के वजूद को अपनी सहूलियत के मुताबिक आप कभी नकारते हैं, कभी स्वीकारते हैं, ऐसा कैसे चलेगा ? एक बार फैसला कर लीजिये कि आपका भूतपूर्व पार्टनर जिंदा है या बाइस साल पहले मर चुका ।”
“मौजूदा हालात में ये कहने पर मजबूर हूं कि जिंदा है किसी करिश्मासाज तरीके से । जिंदा है और अपनी धमकी पर खरा उतरकर ही मानेगा । इस लिहाज से बतौर मर्डर सस्पैक्ट अगर मेरा मुकाम जेल हो तो मुझे खुशी होगी । यूं कम से कम उस जुनूनी कातिल की पहुंच से तो मैं दूर रहूंगा ।”
“आपकी पत्नी ने भी ऐसा ही कुछ कहा था ।”
“मैं भी कह रहा हूं ।”
“ओके ।” - मैं उठ खड़ा हुआ - “थैंक्यू ।”
सहमति में सिर हिलाता वो भी उठा ।
“केस के प्रभारी अधिकारी इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव ने कहा था वो आठ बजे यहां आयेगा ।” - मैं फिर कलाई घड़ी पर निगाह डालता बोला - “आठ बजने ही वाले हैं ।”
“वो क्या पूछेगा ?”
“क्या पूछेगा ! वही सब पूछेगा जो मैंने पूछा । खानापूरी करेगा । ड्यूटी जो ठहरी उसकी । आप यूं समझिये कि उसकी आमद से पहले मेरे जरिये आप लोगों के बयानात का रिहर्सल हुआ । काम आयेगा । नहीं ?”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
“इजाजत दीजिये ।”
स्टडी से निकल कर मैंने वापिस हाल में कदम रखा तो इंस्पेक्टर यादव के मातहत नौजवान सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर को मेन डोर से भीतर दाखिल होते पाया ।
मैं लपक कर उसके करीब पहुंचा ।
“तुम !” - मुझे देख कर वो सकपकाया - “यहां भी ! सुबह सवेरे !”
“कोई ऐतराज !” - निर्दोष भाव से मुस्कराता मैं बोला ।
“ये दखलअंदाजी है पुलिस के काम में ।”
“ये मेहमानवाजी है तोशनीवाल साहब की, वर्ना बेवक्त के मेहमान को कौन मुंह लगाता है ! बहरहाल वो किस्सा फिर कभी । अभी बोलो, साहब नहीं आया तुम्हारा !”
“आता ही होगा ! हमने अलग अलग जगहों से आना था, इत्तफाकन मैं जल्दी पहुंच गया ।”
“साहब अब क्या कहता है केस की बाबत ?”
“साहब से पूछना ।”
“अरे, छोटे साहब, ऐसे पेश न आओ मेरे से । केस से ताल्लुक रखती किसी मामूली बात के जिक्र पर क्या पाबंदी होगी भला ! मीडिया को भी तो ऐसी जानकारी देते हो ! फिर मेरे से ऐसा बेरुखी किसलिये ?”
“मामूली बात है तो पूछो !”
“नीले रंग के रेशमी कपड़े की जो धज्जी छतरपुर में फार्महाउस के मेन डोर के एक कब्जे में फंसी मिली थी, उसके बारे में कुछ बताओ !”
“प्लांट थी ।”
“क्या मतलब ?”
“वो धज्जी रेशमी दुपट्टे का टुकड़ा थी जो कब्जे में अटक कर दुपट्टे से फट कर अलग नहीं हुई थी - वो कपड़ा इस किस्म का नहीं था जिसमें कोई रेशमी - या कैसा भी - कपड़ा अटक सकता और खिंचकर फट सकता । अभी यहां तफ्तीश से ये बात स्थापित होने की पूरी सम्भावना है - सम्भावना क्या, गारंटी है - कि वो धज्जी श्यामली तोशनीवाल के दुपट्टे की है और उसे फंसाने के लिये, केस में उसकी इन्वोल्वमेंट बनाने के लिये, बड़ी चतुराई से उसे वहां कब्जे में अटका छोड़ा गया था लेकिन इस बात की तरफ तवज्जो नहीं दी गयी थी कि कोई रेशमी कपड़ा उस कब्जे में नहीं फंस सकता था, खिंचने पर फट कर अलग नहीं हो सकता था ।”
“ये यादव साहब की रिसर्च है ?”
“हां ।”
“मैडम जो शलवार सूट पहने थी, वो नीला नहीं था । जो दुपट्टा वो ओढ़े थी, उसका रंग भी नीला नहीं था ।”
“हमने नहीं देखा था वो कैसी पोशाक पहने थी ।”
“मैं बता रहा हूं न !”
“क्या ? ये कि आधी रात को जब वो तुम्हारे साथ थी तो नीले रंग की पोशाक नहीं पहने थीं ?”
“हां ।”
“लेकिन कत्ल तो छ: और सात के बीच में हुआ ! तब वो कौन से रंग की पोशाक पहने थी तुम्हें क्या मालूम ?”
“बढ़िया जिरह करते हो । तरक्की करोगे ।”
वो खामोश रहा ।
“तो किसी ने मैडम को फंसाने के लिये ऐसा किया ?”
“जाहिर है ।”
“किसने ?”
“अभी नहीं मालूम । लेकिन मालूम पड़ जायेगा । पड़ के रहेगा ।”
“इस लिहाज से तो मौकायवारदात से वरामद वो पर्स भी प्लांट हो सकता है !”
“हो सकता है ।”
“कोई खास ही पीछे पड़ा है मकतूला की मां के !”
“या कोई खास ही दिमाग काम कर रहा है एक बड़े षड़यंत्र को कामयाबी से अंजाम देने में ।”
“क्या मतलब ?”
जवाब में वो बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कराया ।
“ये जो प्लांट वाली बात तुमने बताई उसकी रू में तुम इतना तो मानते हो न, कि मकतूला की मां - श्यामली - बेगुनाह है ?”
“नहीं ।”
“क्या ! लेकिन जब उसे फंसाया जा रहा है तो...”
“डबल ब्लफ !”
“क्या !”
“जो खुद को गुनहगार साबित करने के भी काम आये और बेगुनाह साबित करने के भी काम आये । इवीडेंस पहले तो मदाम एक्स की तरफ इलजाम लगाती उंगली उठाये, फिर जब सामने आये कि इवीडेंस प्लांटिड था तो वही उसकी बेगुनाही की तरफ मजबूत इशारा बन जाये ।”
“ये है डबल ब्लफ ?”
“हां ।”
“जो श्यामली ने स्टेज किया ?”
“या उसके जोड़ीदार ने - अकम्प्लिस ने - स्टेज किया । लेकिन मिली भगत बराबर ।”
“क्या किस्सा है ? क्या थ्योरी है तुम्हारे पास ?”
“यादव साहब के पास ।”
“एक ही बात है । वैसे इस डबल ब्लफ वाली बात पर आज मैं यादव साहब की दानाई का कायल हो गया । अभी तुम्हारी जगह वो सामने होते तो फर्शी सलाम करता । अब बताओ थ्योरी क्या है डबल ब्लफ नाम के जैम के पीछे ?”
“बता दूं ?”
“प्लीज यार ।”
“ठीक है, सुनो । थ्योरी ये है कि श्यामली तोशनीवाल में और सुजित त्रेहन में पुरानी आशनाई है - इतनी प्रबल कि शादी के बंधन तक पहुंची थी । क्वार्टर सेंचुरी के बाद श्यामली को पता लगता है कि सुजित त्रेहन, उसका पूर्व पति, मरा नहीं, जिंदा है । दोनों में स्थापित पुरानी, पुख्ता आशनाई जोर मारती है तो वो हसबैंड को, शिव मंगल तोशनीवाल को, रास्ते से हटाने की स्कीम बनाते हैं । कहना न होगा कि हसबैंड से श्यामली का कोई छोटा मोटा मुलाहजा था तो तभी तक का था जब तक कि उसे अपने ओरीजिनल चाहने वाले के जिंदा होने की खबर नहीं लग गयी थी ।”
“अब आगे कहीं तुम ये तो नहीं कहने वाले कि वो धमकी भरी चिट्ठी भी दोनों की गढ़ी स्कीम का, दोनों की मिलीभगत का नतीजा थी ?”