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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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“मैं टोटल रुटीन बयान करता हूं ।” - वो अप्रत्याशित नम्र स्वर में बोला - “हमेशा की तरह नौ बजे आफिस के लिये निकला, वहां रुटीन आफिस वर्क के अलावा एक कांफ्रेंस अटेंड की, फिर अपने एक परिचित प्रोफेसर मजूमदार से मिलने जवाहर लाल नेहरू यूनीवर्सिटी गया, बारह बजे वापिस आफिस लौटा और चार बजे के करीब तक वहां आफिस वर्क में मशगूल रहा । फिर पीवीआर, साकेत में मूवी देखने गया । सात बजे घर लौटा । उसके बाद कहीं न गया, घर से बाहर कदम ही न रखा ।”

“शिड्यूल अच्छा बयान किया आपने, लेकिन ये कत्ल के वक्त की सॉलिड एलीबाई तो पेश नहीं करता !”

“मुझे सॉलिड एलीबाई की - कैसी भी एलीबाई की - क्या जरूरत है जब कि ये जाहिर है कि कातिल सुजित त्रेहन है - जिसने कि अपनी धमकी पर कामयाबी से खरा उतर कर दिखाया है !”

“सुजित त्रेहन के वजूद को अपनी सहूलियत के मुताबिक आप कभी नकारते हैं, कभी स्वीकारते हैं, ऐसा कैसे चलेगा ? एक बार फैसला कर लीजिये कि आपका भूतपूर्व पार्टनर जिंदा है या बाइस साल पहले मर चुका ।”

“मौजूदा हालात में ये कहने पर मजबूर हूं कि जिंदा है किसी करिश्मासाज तरीके से । जिंदा है और अपनी धमकी पर खरा उतरकर ही मानेगा । इस लिहाज से बतौर मर्डर सस्पैक्ट अगर मेरा मुकाम जेल हो तो मुझे खुशी होगी । यूं कम से कम उस जुनूनी कातिल की पहुंच से तो मैं दूर रहूंगा ।”

“आपकी पत्नी ने भी ऐसा ही कुछ कहा था ।”

“मैं भी कह रहा हूं ।”

“ओके ।” - मैं उठ खड़ा हुआ - “थैंक्यू ।”

सहमति में सिर हिलाता वो भी उठा ।

“केस के प्रभारी अधिकारी इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव ने कहा था वो आठ बजे यहां आयेगा ।” - मैं फिर कलाई घड़ी पर निगाह डालता बोला - “आठ बजने ही वाले हैं ।”

“वो क्या पूछेगा ?”

“क्या पूछेगा ! वही सब पूछेगा जो मैंने पूछा । खानापूरी करेगा । ड्यूटी जो ठहरी उसकी । आप यूं समझिये कि उसकी आमद से पहले मेरे जरिये आप लोगों के बयानात का रिहर्सल हुआ । काम आयेगा । नहीं ?”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

“इजाजत दीजिये ।”

स्टडी से निकल कर मैंने वापिस हाल में कदम रखा तो इंस्पेक्टर यादव के मातहत नौजवान सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर को मेन डोर से भीतर दाखिल होते पाया ।

मैं लपक कर उसके करीब पहुंचा ।

“तुम !” - मुझे देख कर वो सकपकाया - “यहां भी ! सुबह सवेरे !”

“कोई ऐतराज !” - निर्दोष भाव से मुस्कराता मैं बोला ।

“ये दखलअंदाजी है पुलिस के काम में ।”

“ये मेहमानवाजी है तोशनीवाल साहब की, वर्ना बेवक्त के मेहमान को कौन मुंह लगाता है ! बहरहाल वो किस्सा फिर कभी । अभी बोलो, साहब नहीं आया तुम्हारा !”

“आता ही होगा ! हमने अलग अलग जगहों से आना था, इत्तफाकन मैं जल्दी पहुंच गया ।”

“साहब अब क्या कहता है केस की बाबत ?”

“साहब से पूछना ।”

“अरे, छोटे साहब, ऐसे पेश न आओ मेरे से । केस से ताल्लुक रखती किसी मामूली बात के जिक्र पर क्या पाबंदी होगी भला ! मीडिया को भी तो ऐसी जानकारी देते हो ! फिर मेरे से ऐसा बेरुखी किसलिये ?”

“मामूली बात है तो पूछो !”

“नीले रंग के रेशमी कपड़े की जो धज्जी छतरपुर में फार्महाउस के मेन डोर के एक कब्जे में फंसी मिली थी, उसके बारे में कुछ बताओ !”

“प्लांट थी ।”

“क्या मतलब ?”

“वो धज्जी रेशमी दुपट्टे का टुकड़ा थी जो कब्जे में अटक कर दुपट्टे से फट कर अलग नहीं हुई थी - वो कपड़ा इस किस्म का नहीं था जिसमें कोई रेशमी - या कैसा भी - कपड़ा अटक सकता और खिंचकर फट सकता । अभी यहां तफ्तीश से ये बात स्थापित होने की पूरी सम्भावना है - सम्भावना क्या, गारंटी है - कि वो धज्जी श्यामली तोशनीवाल के दुपट्टे की है और उसे फंसाने के लिये, केस में उसकी इन्वोल्वमेंट बनाने के लिये, बड़ी चतुराई से उसे वहां कब्जे में अटका छोड़ा गया था लेकिन इस बात की तरफ तवज्जो नहीं दी गयी थी कि कोई रेशमी कपड़ा उस कब्जे में नहीं फंस सकता था, खिंचने पर फट कर अलग नहीं हो सकता था ।”

“ये यादव साहब की रिसर्च है ?”

“हां ।”

“मैडम जो शलवार सूट पहने थी, वो नीला नहीं था । जो दुपट्टा वो ओढ़े थी, उसका रंग भी नीला नहीं था ।”

“हमने नहीं देखा था वो कैसी पोशाक पहने थी ।”

“मैं बता रहा हूं न !”

“क्या ? ये कि आधी रात को जब वो तुम्हारे साथ थी तो नीले रंग की पोशाक नहीं पहने थीं ?”

“हां ।”

“लेकिन कत्ल तो छ: और सात के बीच में हुआ ! तब वो कौन से रंग की पोशाक पहने थी तुम्हें क्या मालूम ?”

“बढ़िया जिरह करते हो । तरक्की करोगे ।”

वो खामोश रहा ।

“तो किसी ने मैडम को फंसाने के लिये ऐसा किया ?”

“जाहिर है ।”

“किसने ?”

“अभी नहीं मालूम । लेकिन मालूम पड़ जायेगा । पड़ के रहेगा ।”

“इस लिहाज से तो मौकायवारदात से वरामद वो पर्स भी प्लांट हो सकता है !”

“हो सकता है ।”

“कोई खास ही पीछे पड़ा है मकतूला की मां के !”

“या कोई खास ही दिमाग काम कर रहा है एक बड़े षड़यंत्र को कामयाबी से अंजाम देने में ।”

“क्या मतलब ?”

जवाब में वो बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कराया ।

“ये जो प्लांट वाली बात तुमने बताई उसकी रू में तुम इतना तो मानते हो न, कि मकतूला की मां - श्यामली - बेगुनाह है ?”

“नहीं ।”

“क्या ! लेकिन जब उसे फंसाया जा रहा है तो...”

“डबल ब्लफ !”

“क्या !”

“जो खुद को गुनहगार साबित करने के भी काम आये और बेगुनाह साबित करने के भी काम आये । इवीडेंस पहले तो मदाम एक्स की तरफ इलजाम लगाती उंगली उठाये, फिर जब सामने आये कि इवीडेंस प्लांटिड था तो वही उसकी बेगुनाही की तरफ मजबूत इशारा बन जाये ।”

“ये है डबल ब्लफ ?”

“हां ।”

“जो श्यामली ने स्टेज किया ?”

“या उसके जोड़ीदार ने - अकम्प्लिस ने - स्टेज किया । लेकिन मिली भगत बराबर ।”

“क्या किस्सा है ? क्या थ्योरी है तुम्हारे पास ?”

“यादव साहब के पास ।”

“एक ही बात है । वैसे इस डबल ब्लफ वाली बात पर आज मैं यादव साहब की दानाई का कायल हो गया । अभी तुम्हारी जगह वो सामने होते तो फर्शी सलाम करता । अब बताओ थ्योरी क्या है डबल ब्लफ नाम के जैम के पीछे ?”

“बता दूं ?”

“प्लीज यार ।”

“ठीक है, सुनो । थ्योरी ये है कि श्यामली तोशनीवाल में और सुजित त्रेहन में पुरानी आशनाई है - इतनी प्रबल कि शादी के बंधन तक पहुंची थी । क्वार्टर सेंचुरी के बाद श्यामली को पता लगता है कि सुजित त्रेहन, उसका पूर्व पति, मरा नहीं, जिंदा है । दोनों में स्थापित पुरानी, पुख्ता आशनाई जोर मारती है तो वो हसबैंड को, शिव मंगल तोशनीवाल को, रास्ते से हटाने की स्कीम बनाते हैं । कहना न होगा कि हसबैंड से श्यामली का कोई छोटा मोटा मुलाहजा था तो तभी तक का था जब तक कि उसे अपने ओरीजिनल चाहने वाले के जिंदा होने की खबर नहीं लग गयी थी ।”

“अब आगे कहीं तुम ये तो नहीं कहने वाले कि वो धमकी भरी चिट्ठी भी दोनों की गढ़ी स्कीम का, दोनों की मिलीभगत का नतीजा थी ?”
 
“यही कहने वाला हूं । मिल के तैयार की उन दोनों ने वो चिट्ठी और अरसाल की । उस चिट्ठी के बाद जो होता वो तोशनीवाल के भूतपूर्व पार्टनर का बदला जान पड़ता ।”

“क्या होता ? सब मर जाते ?”

“सिवाय श्यामली के ।”

“लेकिन मौकायवारदात पर मिले पुर्जे के मुताबिक तो अगला नम्बर उसी का है ?”

“उसका बाल नहीं बांका होने वाला । देख लेना तुम ।”

“कमाल है !”

“वो तो षड़यंत्र में शरीक है, वो कैसे मर जायेगी !”

“तो फिर श्यामली के लिये धमकी जारी करने का फायदा ?”

“ब्लफ है न भई ! मकसद जिसका ये है कि पुलिस उस धमकी को जेनुइन समझ कर अपनी तमाम तवज्जो श्यामली पर लगा दे और षड़यंत्र में श्यामली का पार्टनर आसानी से कहीं और घात लगाने में कामयाब हो जाये ।”

“घात किस पर ? पिता पर या पुत्र पर ?”

“किसी पर भी । या दोनों पर । उनकी स्कीम के मुताबिक इलीमिनेट तो दोनों का होना जरूरी है ।”

“हूं । तोमर साहब, दि थ्योरी इज गुड, बट नॉट पर्फेक्ट ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि एक फच्चर है ।”

“क्या ?”

“मकतूला सुरभि असल में तोशनीवाल की नहीं, सुजित त्रेहन की बेटी है जो कि तुम्हारी - तुम्हारे साहब की - थ्योरी के मुताबिक षड़यंत्र में पार्टनर है । इस बात की त्रेहन को खबर नहीं थी लेकिन ये नहीं हो सकता कि पुनर्मिलन पर श्यामली ने सबसे पहले यही बात त्रेहन को न बताई होती कि सुरभि उसकी बेटी थी । इस हकीकत को जान चुकने के बाद त्रेहन क्या सुरभि का बाल भी बांका होने देता ?”

तोमर हकबकाया सा मेरा मुंह देखने लगा ।

“तुम्हें कैसे मालूम” - फिर अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला - “कि सुरभि तोशनीवाल की नहीं, त्रेहन की बेटी है ?”

“मां ने बताया ।”

“और किसने बताया ?”

“और तो किसी ने नही बताया ! और कौन बताता ?”

“मां झूठ बोल रही हो सकती है ।”

“किससे ? अपने स्कीम के, षड़यंत्र के जोड़ीदार से ?”

“तुम्हारे से ।”

“वजह ?”

“होगी कोई ।”

“लेकिन...”

“अब छोड़ो ये किस्सा । कोई लेकिन वेकिन की गुंजायश तुम्हें दिखाई देती है तो उसे यादव साहब से डिसकस करना । अब बोलो, कब से हो यहां ?”

मैंने बोला ।

“इतने अरसे में तुमने भी तो यहां से कुछ जांचा परखा जाना होगा ?”

“खास कुछ नहीं जाना ?”

“आम ही बताओ, क्या जाना ?”

पिछली रात अंजना रांका जैसे मेरा बैंड बजा के गयी थी, उसकी रू में मुझे नहीं लगता था कि फिलहाल वो मुझे अपने करीब भी फटकने देती लेकिन पुलिस से पल्ला नहीं झाड़ सकती थी । मैंने उसे अंजना रांका उर्फ मोहना सावंत के बारे में और शिव मंगल तोशनीवाल से उसकी आशानाई के बारे में बताया । मैंने उसे ये भी बताया कि डिफेंस कॉलोनी में वो कहां रहतीं थी ।

“गुड !” - तोमर संतुष्टि पूर्ण स्वर से बोला ।

“है न ! यादव साहब ने कल तुम्हें कंप्यूटर विजर्ड का दर्जा दिया था, बोला था तुम आराम से ठुकी कार का अता पता निकाल लोगे । निकाल लिया ?”

“अभी नहीं ।”

“आराम से न सही, शिद्दत से सही...”

“अभी नहीं । लेकिन कोशिश छोड़ नहीं दी है मैंने ।”

“छोड़ दो ।”

“क्यों ?”

“वो कार काले रंग की ट्योटा है, यहां के गैराज में खड़ी है, श्यामली तोशनीवाल की है । बम्पर ठुका हुआ है और साफ जान पड़ता है कि हाल ही में ठुका । युअर टफ जॉब” - मैं शान से वोला - “एग्जीक्युटिड सैटिस्फैक्ट्रिली बाई राज शर्मा, दि ओनली वन ।”

तोमर भौंचक्का सा मेरा मुंह देखने लगा ।

“यादव साहब से बोलना” - मैं वोला - “कि मेरे इस सहयोग का कोई सिला भी मुझे दें ।”

“कैसा सिला ?” - तोमर के माथे पर बल पड़े ।

“कोई कारआमद जानकारी हाथ लगे तो मेरे से शेयर करें ।”

“ओह ! मैं बोलूंगा ।”

“शुक्रिया ।”

***

मैं जेएनयू पहुंचा ।

प्रोफेसर मजूमदार की बाबत मैंने दरयाफ्त किया तो मालूम पड़ा कि वो साढ़े नौ बजे यूनीवर्सिटी में पहुंचते थे ।

जबकि तब अभी साढ़े आठ बजे थे ।

लेकिन साथ ही ये भी मालूम पड़ा कि उनका आवास यूनीवर्सिटी परिसर में ही था ।

मैं उनके फ्लैट पर पहुंचा ।

प्रोफेसर साहब भले आदमी निकले, मेरे से मुलाकात के मामले में न सिर्फ उन्होंने कोई हुज्जत न की बल्कि बड़ी मनुहार से मुझे चाय पेश की ।

चाय चुसकते मैंने अपने आगमन का मंतव्य बयान किया ।

“आप मिस्टर शिव मंगल तोशनीवाल से वाकिफ हैं” - मैं बोला - “उनकी बेटी सुरभि के कत्ल की खबर आपको लगी ?”

“हां, भई, लगी ।” - वृद्ध प्रोफेसर उदास भाव से बोले - “अभी तुम्हारे आने से पांच मिनट पहले एक म्युचुअल फ्रेंड ने फोन करके बताया । बोला, टीवी पर न्यूज थी । मैं तो मार्निंग में टीवी चलाता नहीं इसलिये....”

“आई अंडरस्टैण्ड, सर । मिस्टर तोशनीवाल कल आपसे मिले थे ?”

“हां । तुम्हें कैसे मालूम ?”

“कब ?”

“सुबह ग्यारह बजे के करीब यूनीवर्सिटी में मेरे आफिस में पहुंचे थे, पौने घंटे के करीब मेरे साथ रहे थे ।”

“आमद की वजह क्या थी ?”

“तुम क्यों जानना चाहते हो ?”

उसने वो सवाल खुंदक में या असहिष्णुता से नहीं पूछा था, किशोरों जैसी उत्सुकता से पूछा था ।

“सर, जैसा कि मैंने अर्ज किया था कि मैं डिटेक्टिव हूं मैं इस मर्डर केस पर काम कर रहा हूं और मेरी तफ्तीश के दायरे में हतप्राण का पिता भी आता है । ये रूटीन पूछूताछ है, आप जवाब नहीं देंगे तो मैं आप पर कोई दबाव नहीं डालूंगा ।”

“वैरी नोबल आफ यू ! नहीं, जवाब देने से मुझे कोई ऐतराज नहीं । खास तौर से इसलिये भी क्योंकि मुझे यकीन है कि मिस्टर तोशनीवाल का अपनी बेटी की हौलनाक मौत से कोई लेना देना नहीं ।”

“इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ! तो क्या थी आमद की वजह ?”

“मिस्टर तोशनीवाल ड्रामा एंथुजियास्ट हैं । यहां जब किसी ड्रामे की तैयारी होती है तो वो तैयारी को सुपरवाइज करने के लिये, रिहर्सल में हैल्प करने के लिये गाहेबगाहे आते रहते हैं । उनकी तरह कभी कभार उनका बेटा भी आता है, उनका बटलर भी आता है ।”

“बटलर ?”

“देवीलाल नाम है ।”

“बेटे की तो होगी कोई वजह लेकिन देवीलाल किसलिये ?”

“मिस्टर तोशनीवाल के सहायक के तौर पर । थियेट्रिकल मेकअप में, स्टेज लाइटिंग अरेंजमेंट्स में, हैल्प की जरूरत होती है । वो हैल्प मिस्टर तोशनीवाल को बेटा या बटलर या दोनों मुहैया कराते थे ।”

“इन कामों का मिस्टर तोशनीवाल को ज्ञान है ?”

“व्यापक ज्ञान है । और तजुर्बा है । तभी तो हमारे स्टुडेंट्स के बेनीफिट के लिये यहां आते है !”

“आई सी । कल वो दोनों भी यहां थे ?”

“नहीं, कल नहीं । कल उनमें से कोई नहीं आया था, कल सिर्फ मिस्टर तोशनीवाल आये थे ।”

“कब से आ रहे हैं ?”
 
“तीन साल हो गये हैं । यहां के ड्रामा ग्रुप में उनकी भारी रुचि है इसलिये उनका रोल डोनर का भी है । कई प्लेज को फाइनांस कर चुके हैं, कई स्टुडैंट्स के लिये स्कालरशिप्स एनाउंस कर चुके हैं ।”

“क्या बात है ! ऐसी दरियादिली तो आज के जमाने में दुर्लभ है ! वो भी एक व्यापारी की ! भले आदमी हुए फिर तो !”

“नो डाउट ।”

“वैसे मिजाज के कैसे हैं ?”

“क्या मतलब ?”

“वायलेंट टैम्पर रखते थे ? भड़कने वाला ! आपे से बाहर होने वाला !”

“तुम्हारे सवाल की मंशा क्या है, कुछ कुछ मैं समझ तो पा रहा हूं । फिर भी साफ बोलो, क्या है तुम्हारे मन में ?”

“साफ बोलना ठीक न होगा ।”

“क्यों ?”

“आप खफा हो जायेंगे । जो मेहमानवाजी मुझे हासिल है, उससे महरूम कर देंगे ।”

“ऐसा नहीं होगा ।”

“डू आई हैव युअर वर्ड, सर ?”

“यस ।”

“वो कत्ल कर सकते हैं ?”

“ये नाजायज सवाल है । वो क्या, हालात के हवाले कोई भी कत्ल कर सकता है - मैं भी, तुम भी, कोई भी । ऐसी बेशुमार मिसालें हैं जबकि मक्खी न मार सकने के काबिल किसी शख्स ने हालात के हवाले हो कर खून से हाथ रंगे ।”

“हालात के हवाले हो कर न ! मिजाज के बारे में क्या कहते हैं ? जैसे मेरा मिजाज लड़कपन से आशिकाना है, वैसे मिस्टर तोशनीवाल का मिजाज कातिलाना लगा था आपको कभी ?”

बुजुर्गुवार ने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।

“मैं” - फिर कठिन स्वर में बोले - “मिस्टर तोशनीवाल जैसे कलाप्रेमी शख्स की कल्पना बतौर कातिल नहीं कर सकता ।”

“जरूर नहीं कर सकते होंगे लेकिन इन जनरल उनके मिजाज की आपकी क्या रीडिंग है ।”

“इन जनरल ?”

“हां ।”

“देखो, भई, तोशनीवाल सैल्फमेड मैन है, जिस ऊंचे मुकाम पर वो इस घड़ी है, उस पर वो खुद, अपनी मेहनत से, अपनी मशक्कत से पहुंचा है, इसलिये अपनी हस्ती का, अपनी हैसियत का उसे बड़ा मान है बड़ा गुमान है और इसी वजह से मिजाजी भी है । आई मीन, टोकाटाकी से, दखलअन्दाजी से भड़कता है । भड़कता है तो ऐसी बेजा हरकत भी कर बैठता है जो उस जैसे बड़े, बाहैसियत, बारसूख आदमी को नहीं करनी चाहिये । मसलन पिछली बार रिहर्सल में एक लड़का बार बार गलती कर रहा था तो उसे थप्पड़ मार दिया था । बट दिस ओनली इज बैड बिहेवियर इररिस्पांसिबल बिहेवियर, नाट होमीसिडल बिहेवियर । यू अंडरस्टैण्ड माई पॉइंट ?”

“आई थिंक आई डू ।”

“मेरी स्टडी ये कहती है कि बदमिजाजी के तीन रंग होते हैं । पहला, भड़काऊ । माचिस की तीली जलाओ तो लपट एकदम उठती है और फिर खुद ही मद्धम पड़ जाती है, बुझ कर खत्म हो जाती है । पहला रंग ऐसा ही होता है, आदमी एकदम भड़कता है, यूं मन का गुबार निकाल लेता है तो एकदम ही शांत हो जाता है । नो ?”

“यस ।” - फिर मैंने जल्दी से जोड़ा - “सर । दूसरा ?”

“दूसरा, विस्कोटक । इसको तुम पहले रंग का मैनी टाइम्स मैग्नीफाइड वर्शन कह सकते हो । इसमें आदमी की जुबान भी जहर उगलती है और वो मरने मारने पर भी उतर आता है, यानी जो सामने पड़ जाये, विवेक खो कर उस पर हाथ उठा बैठता है । यूं आपे से बाहर हो कर जरूरी नहीं, वो मारता ही है, मार खाता भी है लेकिन क्योंकि विवेक पर पर्दा पड़ा होता है इसलिये जो करता है अंजाम से बेखतर, बेखबर हो कर करता है । समझे मेरी बात ?”

“जी हां ।”

“तीसरा रंग पहले दोनों रंगों की चरम सीमा होता है । इसमें आदमी की पाशविक प्रवृत्ति प्रबल हो उठती है, उसके भीतर का जानवर जाग जाता है और खूंरेजी और प्रतिकार के सिवाय उसे कुछ नहीं सूझता । जो लोग कत्ल की, खूनखराबे की वारदातों को अंजाम देते हैं, वो तकरीबन ऐसे ही होते हैं जिन्हें कि अपने किये का कोई पश्चाताप नहीं होता क्योंकि ढिठाई में, जिद में, कमअक्ली में विवेकहीनता में समझते हैं जो किया, ठीक किया । फांसी के फंदे तक पहुंच जाते हैं लेकिन मजाल है अपनी करतूत पर पछता कर दिखायें !”

“वैरी वैल सैड, सर । बहुत उम्दा तरीके से आपने बदमिजाजी को बयान किया । अब ये बताइये, इन युअर कनसिडर्ड ओपीनियन, मिस्टर तोशनीवाल किसी कैटेगरी में आते हैं ?”

“फर्स्ट में ।”

“भड़कते हैं लेकिन शांत हो जाते हैं ?”

“हां । '
 
“ऐसा तो हर कोई होता है !”

“हर कोई नहीं तो तकरीबन हर कोई होता है ।”

“यू सैड इट, सर ।”

“और पूछो, क्या पूछना चाहते हो ?”

“कुछ नहीं, जनाब, और तो बस चाय का और सहयोग का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं ।”

“यू आर वैलकम ।”

“थैंक्यू सर ।”

***

मैं भीकाजी कामा प्लेस पहुंचा ।

जहां कि तोशनीवाल एंटरप्राइसिज का आफिस था ।

जैसी कि मुझे अपेक्षा थी, आफिस में तोशनीवाल नहीं था ।

बाजरिया रिरिसैप्शनिस्ट - हसीन रिसैप्शनिस्ट - मैं उसकी प्राइवेट सैक्रेट्री तक पहुंचा ।

जो कि हसीनतरीन निकली ।

इतनी कि चेहरे से हटाने पर भी नजर न हटी ।

पता नहीं उसका एफ-टीवी मैटीरियल होना इत्तफाक था या तोशनीवाल एंटरप्राइसिज में नौकरी पाने की वो प्राइम क्वालीफिकेशन थी ।

रिसैप्शन से मुझे मालूम हुआ था कि उसका नाम शिल्पी तायल था जो आपके लवर-आफ-ब्यूटी खादिम के दिल पर लेसर बीम से ऐच हो गया था ।

शिल्पी तायल नाम के उस आग के गोले की उम्र का मेरा अंदाजा छब्बीस सत्ताइस का था लेकिन कमीबेशी सरासर मुमकिन थी । वो बैठी हुई थी फिर भी फुट की गर्दन बता रही थी कि खूब लम्बी थी । उसके चेहरे पर हर तरह का मेकअप था जो कि इतनी दक्षता से किया गया था कि आसानी से मालूम ही नहीं पड़ता था कि लिपीपुती थी - सिवाय माथे पर लगी हरी - रिपीट, हरी - बिंदी के । वजह शायद यही थी कि पोशाक हरी थी । हकीकतन वो बिंदी नाम को ही थी, असल में बिदा था, पैप्सी की बोतल के ढ़क्कन के साइज का, विज्ञप्ति थी कैनीबाल्स के लिये कि वो निरामिष भोजन थी ।

भोजन तो बराबर थी, बस चलता तो वहीं हज्म कर जाता, डकार न लेता ।

“हो गया ?” - वो विनोदपूर्ण भाव से बोली ।

“क्या ?” - मैं हड़बड़ाया ।

“रसपान !”

“बोहनी कर ली है, अप्रूवल का ठप्पा जड़ लिया है, आगे...देखेंगे ।”

वो दांतों में निचला होंठ दबा कर हंसी ।

“देखेंगे न ?” - मैं आशापूर्ण स्वर में बोला ।

“देखेंगे ।” - वो बोली ।

“गुड ! आई लाइक इट । अब बोलो चांद का टुकड़ा हो या चांद तुम्हारा टुकड़ा है ?”

वो फिर हंसी ।

“बिल्कुल कैटरीना कैफ लग रही हो !”

“ओ, माई गॉड !”

“क्या हुआ ?”

“आपको नहीं पता क्या हुआ ! मवाली लोग कैटरीना कैफ को उठाने आयेंगे, मेरे को उठा के ले जायेंगे, ये हुआ ।”

जैसी खूबसूरत थी, वैसी ही हाजिरजवाब भी थी ।

ऐन रजनी जैसी ।

इसीलिये पहली निगाह में भा गयी थी ।

“रहती कहां हो ?”

“चितरंजन पार्क ।”

“अरे ! इतनी खूबसूरत हो के पार्क में रहती हो !”

“वहां के एक फ्लैट में ।”

“ओह ! मैं भी तो कहूं...अपना है ?”

“नहीं, किराये का है ।”

“पड़ोस में वैसा कोई फ्लैट खाली है ?”

“पता नहीं । शायद हो ! क्यों पूछ रहे हो ?”

“मैं लूंगा न किराये पर ! ताकि पड़ोस में बस सकूं ।”

“ओह ! लाइन मार रहे हो !”

“थर्टी इयर्स एक्सपीरियंस है, जी ।”

“इतनी तो तुम्हारी उम्र नहीं लगती ।”

“इतनी ही है ।”

“यानी कि पैदा होते ही सीख लिया ये कारोबार !”

“हुनर ! आर्ट ! तभी तो मेरा मिजाज लड़कपन से आशिकाना है । लाइन मारने के मामले में इंगलैंड अमेरिका तक मशहूर है आपका ये गोल्ड मैडलिस्ट लेटेस्ट बायफ्रेंड ।”

“खामखाह ।”

“ओके, खाली फ्रेंड ।”

“खामखाह !”

“अरे, भई, कुछ फुट-होल्ड तो बनाने दो । फुट-होल्ड नहीं तो टो-होल्ड तो बनाने दो ।”

वो फिर हंसी - इस बार अभिसार के वादे जैसी हंसी ।

“बचपन से दो ही ख्वाहिशें थी, एक ताजमहल देखने की और दूसरी ताजमहल जैसी हसीनतरीन, मलिकायेहुस्न प्राइवेट सैक्रेट्री के रूबरू होने की...”

“तो दूसरी आज पूरी हो गयी । अब पहली...”

“पहली परसों पूरी हो गयी थी । हो के आया न आगरा !”

“यानी अब कोई ख्वाहिश बाकी नहीं !”

“यू सैड इट, माई डियर ।”

“फिर खामखाह जीते रहने का क्या फायदा !”

“तुम्हारी बात में दम है, मैं सोचूंगा इस बारे में ।”

“मिस्टर शर्मा, आप बेहद हाजिरजवाब आदमी हैं, इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकतीं । इस बारे में भी कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि आपको अपना वक्त जाया करने में कोई गुरेज नहीं, परहेज नहीं । लेकिन मैं इतनी खुशकिस्मत नहीं हूं । मैं यहां मुलाजिम हूं, मालिक होती तो पॉइंट टु पॉइंट आपसे वर्बल डुएल करती । ऐसा मुमकिन नहीं है इसलिये बराय मेहरबानी बोलिये, क्या चाहते हैं ?”

“तुम्हारे एम्प्लायर की” - मैं भी संजीदा हुआ - “कल की आफिस रुटीन की फुल डिटेल चाहता हूं ।”

“मैं ऐसा कुछ आपको नहीं बता सकती ।”

“बता सकती हो । मुझे अथारिटी है जानने की ।”

“किसने दी अथारिटी ?”

“तुम्हारे एम्प्लायर ने ।”

“कब ?”

“आज सुबह । अर्ली इन द मार्निंग । जब मैं वसंत कुंज उनके दौलतखाने पर जा कर उन से मिला था ।”

उसके चेहरे पर विस्मय के भाव आये ।

“और बतौर पीडी उन्होंने मुझे एंगेज किया था ।”

“ऐसा था तो जो कुछ मेरे से पूछ रहे है, वो उन्हीं से पूछा होता !”

“पूछा था । जवाब भी मिला था ।”

“तो फिर ?”

“मैं जवाब को क्रॉस चैक करना चाहता हूं ।”

“ओह ! तो सुनिये । मिस्टर तोशनीवाल कल सुबह नौ बजे यहां पहुंचे थे जो कि उनके आफिस पहुंचने का हमेशा का टाइम है । पौने ग्यारह तक यहां ठहरे थे जिसके दौरान उन्होंने कुछ रूटीन आफिस वर्क किया था और एक कांफ्रेंस अटेंड की थी । फिर प्रोफेसर मजूमदार से मिलने के लिये जेएनयू के लिये रवाना हो गये थे और जहां से बारह बजे वापिस यहां लौटे थे, फिर आफिस वर्क में मशगूल रहे थे, लंच किया था और पोस्ट लंच दो क्रांफ्रेंस अटेंड की थी । पौने चार बजे के करीब ये बोल के यहां से निकले थे पीवीआर में कोई मूवी देखने साकेत जा रहे थे । दैट्स आल आई कैन टैल यू । आई होप इट क्रॉस चैक्स ।”

“इट डज वैरी वैल ।”

उसने वही कुछ अक्षरश: दोहराया था जो मैं पहले उसके एम्प्लायर से सुन चुका था । पता नहीं सब कुछ स्ट्रेट था, नार्मल था या वो खास ही पढ़ाई तोती थी ।

“और कोई सेवा बताइये !”
 
“है तो सही” - मैं मुस्कराता, अपलक उसे देखता बोला - “लेकिन आप करेंगी नहीं ।”

“मिस्टर शर्मा, प्लीज !”

लड़की शरीफ भी हो तो बेहूदा इशारा झट समझती है - जैसे कि उसने समझा था - चालू हो तो कहना ही क्या !

“ओके । ओके । सहयोग का शुक्रिया, मैडम, बहुत बढिया रिसीव किया मुझे । थैंक्स अगेन ।”

“वैलकम ।”

“इस बात की मुझे खुशी हुई - साथ ही मलाल भी हुआ - कि तोशनीवाल एंटरप्राइसिज के हर विजिटर को आप ऐसा ही बढिया रिसीव करती होंगी ।”

“इट्स माई जॉब । माई ड्यूटी ।”

“मैं रोज आऊंगा । हो सका तो दिन में दो बार ।”

“क्यों भला ?”

“कनफर्म करने के लिये कि ड्यूटी ही करती हो, कुछ और नहीं ।”

“ठीक है, आना ।”

“कुछ चैलेंज सा महसूस हुआ मुझे तुम्हारी आवाज में !”

“रिसैप्शन नहीं लांघ पाओगे ।”

“यानी ठीक महसूस हुआ ।”

उसने जवाब न दिया, बड़े दर्शनी अंदाज से वो अपने सामने टेबल पर पड़े कागजात पर झुक गयी ।

डोज काफी हो गया था ।

“एक आखिरी बात और है” - फिर भी आदत से मजबूर मैं बोला - “उसके बाद चलता हूं ।”

“कहिये वो भी ।”

“बल्कि कॉम्प्लीमेंट है । तुम्हारे लिये ।”

“कहिये ।”

“तुम्हारी ड्रैस बहुत शानदार है ।”

“मेरे में बैड के पायताने फर्श पर ढ़ेर हुई पड़ी और भी बढ़िया लगेगी ।”

“क्या !”

“कुछ नहीं । नमस्ते ।”

मैंने रुखसत पायी ।

नो नानसेंस लड़की थी । बड़े साहब की मुंह लगी थी इसलिये बहुत ज्यादा ही ऊंचा उड़ने की आदी हो गयी थी, समझती थी कोई राज शर्मा उस बुलंदी तक नहीं पहुंच सकता था ।

हजरात, नजर और नसीब का इत्तफाक ऐसा है कि नजर को अमूमन वही चीज पसंद आती है जो नसीब में नहीं होती ।

क्या फर्क पड़ता था वैसे !

समंदर में बहुत मछलियां थी ।

बाहर आकर मैंने डायरेक्ट्री इंक्यायरी से तोशनीवाल की कोठी की लैंडलाइन का पता किया और फिर उस पर काल लगाई ।

जवाब में मुझे देवीलाल की आवाज सुनाई दी ।

मैंने उसे खुद को जनवाया और बोला - “पुलिस वाले अभी वहां है ?”

“जी हां, है ।” - जवाब मिला ।

“इंस्पेक्टर यादव से बात कराओ ।”

“वो तो यहां नहीं हैं !”

“क्या ! चले गये ?”

“आये ही नहीं ।”

“अच्छा ! और सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर ! जो मेरे सामने वहां पहुंचा था ?”

“वो हैं ।”

“उसी से बात कराओ ।”

तोमर लाइन पर आया ।

“क्या बात है, भई ?” - मैं बोला - “यादव साहब नहीं पहुंचे ?”

“पहुंचेंगे भी नहीं ।” - अप्रत्याशित जवाब मिला ।

“वजह ?”

“एक और कत्ल हो गया है ।”

मुझे कोई हैरानी न हुई । ऐसे ही तो दिल्ली रेप्स और मर्डर्स की राजधानी मशहूर नहीं थी । ऐसे ही तो दिल्ली का दूसरा नाम ‘मौकायवारदात’ नहीं था ।

“कहां ?” - मैं बोला ।

“सिद्धार्थ एंक्लेव में ।”

“वो कहां है ?”

“रिंग रोड पर । आश्रम क्रासिंग पर ।”

“किसका ?”

“सपना टाहिलियानी नाम की एक औरत का ।”

नाम ने मुझे चौंकाया ।

“पता बोलो ।” - मैं बोला ।

“नहीं मालूम । लेकिन वो कोई बहुत बड़ा इलाका नहीं है । चक्कर लगाना, जहां पुलिस का, पब्लिक का जमघट दिखाई दे, समझ लेना वही हैं पता ।”

“ठीक है । शुक्रिया ।”

***

सिद्धार्थ एन्क्लेव में मौकायवारदात तक पहुंचने में मुझे कोई खास दिक्कत न हुई । वो एक आलीशान बारह मंजिला इमारत थी जिस के टॉप फ्लोर पर कत्ल की नयी वारदात वाकया हुई थी और जहां पहुंचने में मुझे मैजिक वर्ड ‘यादव का यार’ इस्तेमाल करना पड़ा ।

टॉप फ्लोर पर जो पैंथाउस अपार्टमेंट था वो भी इमारत जैसा ही - बल्कि उससे ज्यादा - आलीशान निकला । वहां पुलिसियों का जमघट्टा था जिनमें यादव भी एक था । मुझे उस आलीशान फ्लैट की बेशकीमती फरनिशिंग्स का ऐसा बुरा हाल दिखाई दिया जैसे की कि कल्पना करना मुहाल था । शायद ही कोई चीज थी जो वहां साबुत बाकी बची थी, शायद ही कोई चीज थी जो चाक चाक नहीं थी । किसी तीखी धार वाले औजार का किसी ने वहां बाखुबी इस्तेमाल किया था । कोई मैट्रेस, कोई पिलो, कोई कुशन काटे फाड़े उधेड़े बिना नहीं छोड़ा था ।

“किस चीज की तलाश होगी आततायी को ?” - मेरे मुंह से निकला ।

इंस्पेक्टर यादव ने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।

“मिली होगी ?”

“उम्मीद नहीं ।”

“वजह !”

“सोचो । मिल गयी होती तो यहां की कोई तो चीज साबुत बची होती !”

“ठीक ! कत्ल कैसे हुआ ?”

“बताता हूं । पहले तुम बोलो, यहां कैसे पहुंच गये ? बल्कि क्यों पहुंच गये ? क्या ये मकतूला भी तुम्हारी क्लायंट है ?”

“नहीं । मैं तो उसकी सूरत तक से वाकिफ नहीं ।”

“तो फिर ?”

“इसका पहले - सुरभि तोशनीवाल के - कत्ल से कोई रिश्ता हो सकता है ।”

“कैसे ?”

“छतरपुर में लाश के करीब श्यामली तोशनीवाल का जो पर्स पड़ा पाया गया था उसमें श्यामली को पांच दिन पहले लिखी सपना टाहिलियानी की चिट्ठी थी ।”

यादव की सूरत पर ऐसे भाव आये जैसे कोई भूली बात याद आ गयी हो ।

“इत्तफाक” - फिर बोला - “वो इत्तफाक हो सकता है । यहां के हालात इसके चोरी की वारदात होने की ज्यादा चुगली करते दिखाई देते हैं ।”

“यादव साहब, चोरी कहीं यूं तबाही मचा कर होती है ! चोर को कीमती, हैण्डी, पोर्टेबल माल की तलाश होती है और उस तलाश को खामोशी से अंजाम दिया जाता है, न कि वैसा धमाल मचा कर जो कि यहां मचा दिखाई दे रहा है ।”

“धमाल कवर अप हो सकता है ।”

“क्यों भला ?”

“होगी कोई वजह !”

“शायद हो लेकिन खाकसार की तुच्छ राय में तो चोर को यहां किसी खास ही चीज की तलाश थी - ऐसी चीज की जो कि साइज में कोई खास बड़ी नहीं थी और जो कि किसी पिलो में, किसी कुशन में, बाखूबी छुपाई जा सकती थी । और घुसपैठिया लगता है कोई अनाड़ी था, नौसिखिया था वर्ना यहां की इतनी दुर्गत न हुई होती ।”

यादव के होंठों की बायीं कोर जरा यूं खिंची जैसे कि मुस्कराने लगा हो और फिर खयाल बदल गया हो ।

यानी सरकार मेरा इम्तहान ले रही थी; मेरी सोच, मेरी रीजनिंग को परख रही थी ।

“अब ये तो बताओ” - मैं बोला - “कत्ल कैसे हुआ ?”

“गला घुंटने से । रेशमी डोरी से । जैसी फैंसी पर्दों में या शलवार, पेटीकोट जैसे गारमेंट्स में इस्तेमाल होती है ।”

“पहले कत्ल हुआ या यहां की उथलपुथल ?”

“कहना मुहाल है । हो सकता है कत्ल पहले हुआ हो और फिर कातिल ने अपना तलाशी का अभियान चलाया हो ! या तलाशी जारी हो और वो ऊपर से आ गयी हो ! लाश और उसके आसपास के माहौल को देख कर लगता है कि उसने जान जाने से पहले काफी हाथपांव पटके थे । इस लिहाज से इस बात की ज्यादा सम्भावना जान पड़ती है कि चोरी की अपनी करतूत को अंजाम देने के लिये चोर खाली फ्लैट में घुसा था और उसकी बद्किस्मती से फ्लैट की मालकिन ऊपर से आ गयी थी ।”

“वारदात की खबर कैसे लगी ? किसको लगी ?”

“मेड को लगी, जो कि सुबह सात बजे यहां आती है और शाम सात-आठ बजे तक यहां ठहरती है ।”

“लिव-इन मेड या सर्वेंट कोई नहीं ?”

“न ! बस ये एक डे टाइम मेड ही हार्यड हैल्प थी जो मकतूला का, फ्लैट का तमाम काम काज करती थी । मकतूला अकेली यहां रहती थी, मेड कहती है कि काम काज कोई खास नहीं था, खुद उसके लिये ही दिन भर का नहीं होता था ।”

“आई सी ।”

“अपने मुकर्रर टाइम पर वो यहां आयी थी, बैडरूम में पहुंची थी तो उसने वहां मालकिन को मरी पड़ी पाया था ।”

“वो अब कहां है ?”

“ऊपर छत पर भी एक कमरा है, जो मकतूला के पोजेशन में है, वहां है । वो कमरा एक तरह से मेड के ही हवाले है । कहती है यहां कोई काम न हो तो वो वहां जा कर रैस्ट करती है, टीवी देखती है । मैडम को जरूरत होती थी तो घंटी बजा कर बुला लेती थीं ।”

“मैं उससे मिल सकता हूं ?”

“क्या करोगे मिल कर?'

“सर जी, जो करूंगा, तुम्हारे सामने करूंगा ।”

यादव के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव आये, फिर उसका सिर सहमति में हिला ।

“थैंक्यू, सर जी ।”

यादव के आदेश पर एक सिपाही मेड को वहां बुला कर लाया ।

वो कोई बाइस-तेइस साल की सांवली लेकिन सुथरे नयननक्श वाली लड़की निकली । वो साफ साफ भयभीत जान पड़ रही थी और उसकी निगाह बार बार उस बैडरूम के अधखुले दरवाजे की ओर उठ रही थी जो कि मौकायवारदात था ।

तभी मेनडोर खुला और एक और व्यक्ति ने वहां कदम रखा ।

मैं उसका नाम नहीं जानता था लेकिन सूरत से वाकिफ था इसलिये मुझे मालूम था कि वो पुलिस का फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट था ।

“आता हूं ।” - यादव बोला ।

और नवागंतुक के साथ बैडरूम की ओर बढ़ चला ।

पीछे मैं मेड की तरफ आकर्षित हुआ ।

“नाम क्या है ?” - मैं बोला ।

“किरण है ।” - वो फुसफुसाई ।

“ऊंचा बोलो, भई ।”

“किरण ।” - फुसफुसाहट से जरा ही ऊंची आवाज में उसने दोहराया ।

“झाड़खंड से हो ?”

“हां ।”

“गुमला से ?”

उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये और गायब हुए ।

“हां ।”

जैसे केरल नर्स मैनूफैक्चरिंग स्टेट थी, झाड़खंड - खास तौर से गुमला - मेड स्टेट थी ।

“कब से मैडम की सर्विस में हो ?”

“पांच साल से ।”

“मैडम कब से यहां रह रही थीं ?”

“पांच साल से ।”

“यानी जब से मैडम यहां आ कर बसी थी, तभी से तुम्हारा उनका साथ था ?”

“हां ।”

“रोज क्यों आती जाती हो ? जब ऊपर एक स्पेयर, अलग, कमरा है तो मैडम ने कभी न कहा कि यहीं रहो ?”

“कहा । लेकिन जिद न की । शर्त न लगाई । मैं करीब ही अपनी मौसी के साथ रहती हूं । मेरे को वहां.. .वहां ठीक है ।”

“आई सी । लाश सबसे पहले तुमने देखी ?”

“हां ।”

“हमेशा की तरह सुबह तुम यहां आयी थी, बैडरूम में गयी थी तो तुमने मैडम को वहां बैड पर मरी पाया था ?”

“बैड पर नहीं ।”

“नहीं !”

“फर्श पर । फर्श पर पड़ी थीं । बैड के बाजू में । सिर बैड के नीचे । बाकी बदन बाहर ।”

उसके शरीर ने जोर से झुरझुरी ली ।

“ऐसा तो नहीं कि वो बैड पर पड़ी थीं लेकिन तुमने उन्हें हिलाया डुलाया - ये जानने की कोशिश में कि नींद के हवाले थी, बेहोश थी या मरी पड़ी थीं - तो वो बैड से नीचे आ गिरीं ?”

“नहीं । नहीं । नहीं ।”

वो रोने लगी, सुबकने लगी ।
 
“किरण, तुम चाहती हो कि कातिल को उसके किये की सजा मिले ?”

“हां । दामुल झूले नासमारा ।”

“तो काबू में करो अपने आपको और गौर से जो मैं पूछूं उसकी तरफ तवज्जो दो ।”

उसका रोना सुबकना थमा ।

“पांच साल से तुम यहां हो, इतने लम्बे अरसे में तो तुम्हें यहां की पूरी पूरी वाकफियत हो चुकी होगी !”

“हां ।”

“यहां जो मालकिन को मालूम, वो तुम्हें मालूम ?”

“हां ।”

“फिर तो मालूम होगा, नोट किया होगा कि यहां से क्या गायब है ?”

“मुझे नहीं मालूम ।”

“क्या नहीं मालूम ?”

“कि यहां से कुछ गायब है । मेरे खयाल से तो कुछ गायब नहीं ।”

“अच्छा !”

“यहां एक तिजोरी है । बैडरूम में । दीवार में जड़ी । ऊपर मैडम की बड़ी वाली फोटो ताकि तिजोरी दिखाई न दे । अपना सब कीमती सामान मैडम उस तिजोरी में रखती थीं । अगर वो तिजोरी टूटी नहीं पड़ी हुई, ऐसे ही जैसे...”

उसकी निगाह खामोशी से चारों तरफ घूमी ।

“तुमने देखा नही वो टूटी पड़ी थीं या नहीं ?”

“नहीं ।”

“तसवीर - फोटू तुम्हारी जुबान में - हटा कर उस पर निगाह तो डाली होगी !”

“नहीं ।”

“नहीं ?”

“नहीं ।”

“तुमने बैडरूम में कदम ही नहीं रखा था ?”

“रखा था । लपक के मैडम के पास पहुंची थी - क्योंकि पहले मैंने यही समझा था कि मैडम सोते में बैड से नीचे आ गिरी थी और बेहोश पड़ी थीं । मैंने मैडम की बांह को छुआ था तो उसे गर्म पाया था इसलिये मुझे और भी लगा था कि मैडम बेहोश थीं ।”

“बांह को छुआ था ?”

“हां ।”

“क्यों ?”

“मैं मैडम को उठाकर वापिस बैड पर लिटाना चाहती थी न ! लेकिन जब झुकी तो मुझे मैडम की गर्दन दिखाई दी और...और...गर्दन से लिपटी डोरी दिखाई दी....हलक से बाहर निकली, काली पड़ गयी, फूल गयीं जुबान दिखाई दी...देवा ! देवा रे !”

उसका शरीर पत्ते की तरह सिर से पांव तक कांपा ।

“मेरे को जाने दो” - वो गिड़गिड़ाई - “नहीं तो मैं भी इधर ही..गयी ! ढ़ेर ! खतम !”

“ठीक है ।”

उसके चेहरे पर कृतज्ञता के भाव आये ।

“लेकिन ऊपर ही जाना - जहां से अभी आयीं - घर न चल देना ।”

उसने एक बार सहमति में सिर हिलाया और फिर सिर नीचा किये बाहर को लपकी ।

तभी यादव वापिस लौटा ।

“बात कर ली मेड से ?” - वो बोला ।

“हां ।”

“कहां गयी ?”

“जहां से आयी थी । ऊपर ।”

“बड़ी जल्दी निपटा दिया ! क्या हाथ आया ?”

“कुछ भी नहीं ।”

“पुलिस को लल्लू समझते हो ! कुछ हाथ आना होता तो हमारे न आया होता !”

“ठीक कह रहे हो, यादव साहब । सारी ।”

“ठीक है, ठीक है ।”

“वो कहती थी कि उसने लाश को छुआ था तो गर्म पाया था । इसका क्या ये मतलब न हुआ कि कत्ल बस उसके आगे आगे होकर ही हटा था ?”

“हुआ ।”

“फिर भी उसने न कुछ देखा, न सुना ?”

“ऐसा ही था ।”

“न किसी और ने कुछ देखा सुना ?”

“हां ।”

“किसी ने यहां टॉप फ्लोर तक कोई आवाजाही भी न नोट की ?”

“नहीं की लेकिन...”

“लेकिन किया ?”

“शर्मा, यहां जो लिफ्ट है, वो आटोमैटिक है । लेकिन नीचे लॉबी में एक गार्ड हमेशा होता है । वो कहता है कि सवा छ: बजे के करीब एक औरत यहां पहुंची थी और लिफ्ट में सवार हो कर ऊपर गयी थी । गार्ड कहता है कि नाहक उसकी निगाह इंडीकेटर पर थी और उसने लिफ्ट को ऊपर जा कर दसवीं मंजिल पर रुकते देखा था ।”

“दसवीं मंजिल ! यानी यहां से दो मंजिल नीचे ?”

“हां । क्या समझे ?”

“वो यहां पैंथाउस की ही पैसेंजर थी, जानबूझकर दो मंजिल पहले उतरी थी और फिर बाकी की दो मंजिल सीढ़ियों के रास्ते तय करके यहां पहुंची थी ?”

“काफी समझदार हो !”

“लौटी कब ?”

“बकौल गार्ड, सात बजने से थोड़ी देर पहले ।”

“यानी वो गयी और मेड आयी !”

“यही समझ लो ।”

“कोई हुलिया बयान किया गार्ड ने ?”

“किया । बहुत बढ़िया बयान किया । बहुत एक्यूरेसी से किया ।”

“यादव साहब, लगता है पहचान में आ गयी वो मार्निंग की मोहतरमा ।”

यादव मुस्कराया ।

“कौन ?”

“तुम्हारा क्या खयाल है ?”

“जब असलियत का सोर्स सामने है तो क्या खयाल जाहिर करूं !”

“फिर भी ?”

“क्यों कलपा रहे हो, यार ?”

“यार !”

“सर ! सर जी !”

“बताता हूं - इसलिये नहीं कि तुम फरियाद कर रहे हो, अपना मतलब हल करने के लिये फर्जी फरियाद कर रहे हो...”

“फर्जी ! अरे नहीं !”

“...बल्कि इसलिये कि मैं ये बता चुका हूं कि शिनाख्त का जरिया गार्ड है । मैं नहीं बताऊंगा, तो तुम जा कर उससे उस औरत का हुलिया निकलवा लोगे, और फिर शिनाख्त कोई प्रॉब्लम नहीं रह जायेगी ।”

“अब नाम तो लो !”

“श्यामली तोशनीवाल ।”

मुझे उसी बात का अंदेशा था ! नाम सुनने से पहले ही मेरे जेहन में बज रहा था कि क्या नाम सुनाई देने वाला था ।

“फिल्दी रिच घरानों की मेमसाहबान की अपनी शिनाख्त होती है ।” - यादव कह रहा था - “शक्ल भले ही भूल जाये या मुकम्मल तौर से न याद रहे लेकिन हीरे जवाहरात की नुमायश नहीं भूलती । खासतौर से रसभरी के साइज की हीरे की अंगूठी जो वो पहने थी । आयी बात समझ में ?”

“आयी तो सही ! शिनाख्त में गलती की कोई गुंजायश नहीं ?”

“कतई कोई गुंजायश नहीं ।”

“मतलब क्या हुआ इसका ?”

“तुम्हें नहीं मालूम ! या कुबूल करते दिल हिलता है !”

“क्या हुआ ?”

“यही कि दोनों कत्ल श्यामली तोशनीवाल ने किये हैं ।”

मेरा सिर स्वयंमेव इंकार में हिलने लगा ।

“अब छोड़ दो अपना नारा कि जो राज का क्लायंट है, वो बेगुनाह है ।”

“यादव साहब, मेरी सुनो । प्लीज, जरा मेरी सुनो ।”

“कुछ है सुनाने लायक तो सुनाओ ।”

“शिनाख्त शक्ल से होती है फेमिनिन डेकोरेशन से, जनाना लकदक से नहीं । श्यामली की शक्ल सूरत वाली, उसकी उम्र से मैच करती मैं सौ ऐसी औरतें पेश कर सकता हू जो श्यामली जैसे डायमंड्स पहनती हैं ।”

“हजार कर सकते होगे । दस हजार कर सकते होगे । लेकिन क्या सब ये...बड़े डायमंड वाली अंगठी पहनने वाली ! वो भी बायें हाथ की तर्जनी उंगली में ! गले में नवरत्नों का हार पहनने वाली ! कानों में डिस्क जैसे हीरों के टॉप्स पहनने वाली !”

“ये सब भी मुमकिन है ।”

“तुम तो ऐसा कहोगे ही ! क्लायंट की पूंछ से जो बंधे हो !”

“श्यामली सुबह सवा सात बजे मेरे सामने वसंत कुंज अपनी कोठी में पहुंची थी । पंद्रह मिनट में यहां से वसंत कुंज नहीं पहुंचा जा सकता ।”

“पहुंचा जा सकता है । आजकल की सर्दियों में अली मार्निंग सड़कें खाली होती हैं ।”

“वसंत कुंज पहुंचने से पहले वो सफदरजंग की मोर्ग में थी ।”

“हमें नहीं मालूम वो कब वहां से निकली थी ! मालूम करेंगे ।”

“वो आदतन तेज गाड़ी चलाने से परहेज करती है ।”

“करती होगी । कल रात वो ड्राइव नहीं कर रही थी । छतरपुर वो तुम्हारे साथ पहुंची थी, वहां से तुमने उसे जहां भेजा था, टैक्सी पर भेजा था ।”

“आप तो पंजे झाड़ के श्यामली के पीछे पड़े हैं !”

“ऐसी कोई बात नहीं । जब उसकी यहां हाजिरी स्थापित हुई है...”

“स्थापित तो नहीं हुई है, फिर भी आप समझते हैं कि हुई है तो इससे कुछ साबित होता है तो सिर्फ ये कि श्यामली यहां थी, उसने इस इमारत में कदम रखा था ।”

“क्यों रखा था ? मार्निंग वाक को निकली भटक गयी थी ?”

मैंने बेचैनी से पहलू बदला ।

“मैं सिग्रेट पी सकता हूं ?” - फिर बोला ।

“नहीं । मुंह बंद रखने का कोई और तरीका सोचो ।”

“और तरीका ?”

“सोच ही लोगे ! आखिर टॉप के हरामी हो दिल्ली शहर के !”

“वो तो मैं हूं बराबर । आदमी का बच्चा हो तो टॉप का हो वर्ना न हो ।”
 
“मैं तुम्हें टोक नहीं रहा, शर्मा, क्योंकि दिख रहा है कि आजू बाजू की बातें करके झेंप मिटा रहे हो ।”

“श्यामली यहां आयी हो सकती है...”

“शुकर है ।”

“...लेकिन ये भी हो सकता है कि यहां उसने वही नजारा किया हो, जो कि मेड ने किया ।”

“क्या कहने !”

“और इसी वजह से उलटे पांव वापिस लौट गयी ।”

“शर्मा, पैंतालीस मिनट का वक्फा है उसकी आवाजाही के बीच ! इसको उलटे पांव लौटना बोलते हैं ?”

“लाश देखकर बड़ों बड़ों के हवास उड़ जाते हैं, किसी आम शख्स की - वो भी एक औरत की - तो बात ही क्या ! हो सकता है यहां से बाहर वो अपने होश ठिकाने लाने को रुकी हो और बड़ी देर में कामयाब हो पायी हो !”

“हो सकता है” - यादव के स्वर में व्यंग्य का पुट आया - “नहीं हो सकता तो वही नहीं हो सकता जो पुलिस कहती है, केस का इनवैस्टिगेटिंग आफिसर कहता है !”

“यहां तक पहुंचने का लिफ्ट के अलावा और कोई रास्ता नहीं ?”

“सीढ़ियां हैं न !”

“मैंने उनको लिफ्ट में शामिल करके सवाल किया था । लिफ्ट होगी तो सीढ़ियां तो होगी ही !”

“फायर एस्केप है ।”

“यहां तक पहुंचता ?”

“क्या मूर्खों जैसा सवाल है ! और क्या रास्ते में खत्म हो जायेगा ! फिर मकसद क्या रह जायेगा फायर एस्केप का !”

“लॉबी में कोई गार्ड की निगाह में आये बिना यहां कदम रख सकता है !”

“नहीं ।”

“क्यों नहीं ?”

“गार्ड हर वक्त लॉबी में होता है ।”

“उसे कोई रिलीवर हासिल है ?”

“नहीं ।”

“तो फिर हर वक्त कोई माई का लाल अपने ठिकाने पर नहीं हो सकता ।”

“मैं बहस नहीं करना चाहता । ये बात उस औरत के वकील को समझाना, और बोलना अदालत में उठाये ।”

“तिजोरी की क्या स्टोरी है ?”

“तिजोरी !”

“वाल सेफ ! मरने वाली की पोट्रेट के पीछे !”

“कौन बोला ? मेड ?”

“हां ।”

“गलती की मैंने तुम्हें उसके साथ अकेला छोड़ कर ।”

“क्या स्टोरी है ?”

“वाल सेफ है, और क्या !”

“क्या बरामद हुआ ?”

“कुछ नहीं ।”

“वजह ?”

“खुल नहीं पा रही । काफी कोशिश कर चुके हैं । हाई क्वालिटी आइटम है । इम्पोर्टिड । चब की । कोई स्पैशलिस्ट ही खोल सकता है । नहीं मिल रहा ।”

“पुलिस के महकमे में तो होगा नहीं !”

“बकवास न करो ।”

“पुलिस का काम मौका लगे तो तिजोरी साफ करना है, तिजोरी तोड़ना नहीं है - होता तो इस कैटेगरी में महकमे में बाकायदा वैकेंसी होती ।”

“शर्मा, शट अप ।”

“सॉरी ! बहरहाल तलाश जारी है ?”

“हां ।”

“कामयाबी की कोई उम्मीद ?”

उसने संजीदगी से इंकार में सिर हिलाया ।

“कौन अपनी जुबानी कबूल करेगा” - फिर बोला - “कि वो तिजोरीतोड़ है ! सेफबस्टर है ! वो भी पुलिस के सामने !”

“फिर भी कोशिश जारी है !”

“हां । मालूम पड़ा है कि जामा मस्जिद के इलाके में ऐसे उस्ताद मिलते हैं । पता कर रहे हैं फिर भी ।”

“इस मामले में मैं कुछ मदद करूं तो ?”

“तुम ! तुम मदद करो ! तुम चब की कम्बीनेशन सेफ खोल सकते हो ?”

“मैं सोडे की बोतल के अलावा कुछ नहीं खोल सकता लेकिन एक ऐसे शख्स से वाकिफ हूं जो खोल सकता है ।”

“चब की वाल सेफ ?”

“कोई भी सेफ ! वाल्ट ! भले ही रिजर्व बैंक का हो !”

“बड़ा बोल बोल रहे हो !”

“मौका दो खिदमत का । फिर फैसला करना कि बोल बड़ा है कि छोटा...कि सच्चा !”

“कौन है ?”

“हुनरमंद शख्स है, किसी वजह से मेरा अहसान मानता है इसलिये मेरे एक इशारे पर दौड़ा आयेगा ।”

“अरे, नाम बोलो ।”

“नाम का कोई रोल नहीं, यादव साहब, काम का रोल है ।”

“फिर भी बोलो ।”

“इमरान डिप्टी ।”

“वो चोर ! सेंधमार। सजायाफ्ता मुजरिम !”

मैं खामोश रहा ।

“वो तो मैंने सुना था मुम्बई शिफ्ट कर गया हुआ था !”

“यहीं है ।”

“लौट आया ?”

“कभी गया ही नहीं था ।”

“कमाल है ! तीन साल पहले सुना था कि छोड़ गया दिल्ली हमेशा के लिये । पट्ठा गया ही नहीं, फिर भी पुलिस को खबर न लगी !”

“मुखबिरों को, खबरियों को कसो करारा ।”

“वो आ जायेगा यहां...”

“मेरे बुलाने पर ।”

“और पुलिस के सामने वाल सेफ खोल के दिखायेगा !”

“उस पर पुलिसगिरी न आजमाने का वादा करोगे तो, वर्ना...”

मैं जानबूझ कर खामोश हो गया ।

“वर्ना क्या ?” - यादव सख्ती से बोला ।

“वर्ना मैं ही नहीं बुलाऊंगा उसे ।”

“क्या कहने ! मुर्गा बांग नहीं देगा तो सवेरा नहीं होगा !”

“फिलहाल तो होता दिखाई नहीं दे रहा !”

“अब जब हमें मालूम पड़ गया है कि इमरान डिप्टी दिल्ली में ही है तो....पकड़ मंगवायेंगे ।”

“दो चार दिन में शायद पता निकाल पाओ । तब मालूम पड़ेगा कि दिल्ली में था ।” - ‘था’ पर मैंने विशेष जोर दिया ।

“तो ये बात है !”

“क्या बात है ?”

“उसे खबरदार कर दोगे कि पुलिस को उसकी तलाश है !”

“जिससे फेवर हासिल करनी हो, उसको फेवर मुहैया भी करानी पड़ती है । एक हाथ दूसरे हाथ को धोता है ।”

“मैं ऐसा हाथ कोहनी से अलग कर दूंगा । दूसरे से हाथ धोना तो क्या, कुछ भी धोने लायक नहीं छोडूंगा ।”

“हाकिम हो, मालिक हो, कछ भी कर सकते हो !”

“बिल्कुल ठीक पहचाना । मैं पहले तुम्हें अंदर करता हूं और फिर तलाश करवाता हूं इमरान डिप्टी की ।”

“चार्ज क्या लगाओशे ।”

“पहले पहला काम तो हो, फिर चार्ज भी सोच लेंगे ।”

“ठीक है ।”

“क्या ठीक है ?”

“डिप्टी को फिर भी नहीं ढूंढ़ पाओगे ।”

“परवाह नहीं । सेफ गैस कटर से भी खुल सकती है ।”

“शायद खुल सकती हो । लेकिन जिस चीज की कातिल को तलाश थी, फिर वो स्वाहा ही मिलेगी ।”

“क्या बोला ?”

“यहां के बुरे हाल से साफ जाहिर हो रहा है कि कातिल की तलाश कामयाब नहीं हुई थी । लिहाजा वो चीज फ्लैट में कही थी तो वाल सेफ में ही हो सकती थी जिसकी कि या तो कातिल को खबर नहीं लगी थी या वो उससे खुली नहीं थी । वो चीज कत्ल को हल करने में बड़ा - बल्कि इकलौता - क्लू साबित हो सकती है जिसको नुकसान पहुंचाने की कोशिश करना या जिस तक फौरन पहुंच बनाने की जरूरत को नजरअंदाज करना इनवैस्टिगेटिंग आफिसर की हिमाकत ही होगी !”

“शर्मा !”

“समझदारी तो न होगी ! दानाई तो न होगी !”

वो खामोश हो गया, उसके चेहरे पर दुविधा के भाव आये ।

“वो खोल लेगा ?” - आखिर बदले स्वर में बोला ।

“हां ।”

“बहुत यकीन से साथ कह रहे हो !”

“हां ।”

“यकीन की वजह ? बुनियादी यही कि चोर चोर मौसेरे भाई !”

“हाकिम हो, मालिक हो, कुछ भी कह सकते हो ।”

“कितनी देर लगेगी उसको यहां पहुंचने में ?”

“बड़ी हद आधा घंटा ।”

“कहां से आयेगा ?”

मैं खामोश रहा ।

“कांटेक्ट न हुआ तो ?”

“होगा ।”

“शर्मा, यूं पुलिस की बांह मरोड़ना....”

“मैं पुलिस की बांह नहीं मरोड़ रहा, उस पर अहसान कर रहा हूं...”

“क्या कहने !”

“आई एम डूइंग ए फेवर टु दि पुलिस सो दैट इन रिटर्न पुलिस मे डू ए फेवर टू मी ।”

“है तो ये ब्लैकमेल ही लेकिन...ठीक है, बुला ।”

“ब्लैकमेल किसी हासिल की खातिर होती है...”

“है न हासिल ! फेवर चाहता है न !”

“फेवर के बदले में । यूं ही नहीं ।”

“अब बहस न कर । बुला ।”

सहमति में सिर हिलाता मैं बाहर की ओर बढ़ा ।

“कहां चल दिया ?” - वो अप्रसन्न भाव से बोला ।

मैंने जवाब न दिया । मैं उसके सामने मोबाइल पर नम्बर पंच करता तो वो मोबाइल ही झपट लेता ।

अपनी काल से फारिग होकर मैं वापिस भीतर पहुंचा ।

“आ रहा है ?” - उम्मीद में शक के तड़के के साथ यादव बोला ।

“हां ।”

“आधे घंटे में ?”

“उससे पहले ।”

“पक्की बात ?”

“हां । अब मैं लाश देख सकता हूं ?”

“देखी नहीं अभी तक ?”

“चौखट से भीतर झांका बराबर । बैडरूम का हाल देखा लेकिन लाश न देख पाया क्योंकि वो बैड की परली तरफ थी ।”

“हूं । जाओ । देखो ।”

“मैं जाऊं ?”

“क्यों ? लाश से डर लगता है ? उठके लिपट जायेगी ?”

“नौजवान है ?”

“नहीं । पचपन से ऊपर की जान पड़ती है ।”

“फिर तो डर लगता है । लाश से नहीं, उसके लिपट जाने के खयाल से । कोई उम्रदराज औरत आज तक नहीं लिपटी मेरे से । अभी इतने बुरे दिन नहीं आये इस पंजाबी पुत्तर के ।”

वो हंसा ।

“ठीक है” - फिर बोला - “चल ।”

भीतर जा कर मैंने लाश पर निगाह डाली ।

वीभत्म नजारा था ।
 
उसका सिर बैड के नीचे घुसा हुआ था इसलिये खड़े खड़े उसको गर्दन से ऊपर नहीं देखा जा सकता था । खड़े खड़े जो मुझे दिखाई दिया वो ये था कि वो भारी भरकम, रोली पोली औरत थी, झुक कर देखा तो मैच करता डबल चिन वाला चेहरा दिखाई दिया जो गले में तब भी मौजूद फंदे की वजह से और डबल हो गया जान पड़ता था । रेशम की डोरी उसके गले की खाल में गहरी नहीं धंसी थी, चमड़ी को काट नहीं गयी थी, लेकिन चमड़ी पर डोरी के साथ साथ एक नीली लकीर उभर आयी साफ दिखाई दे रही थी । जुबान मुंह से बाहर लटक रही थी और तब तक काली पड़ चुकी थी । आंखें कटोरियों से बाहर निकली हुई थी । उस नजारे से मुझे उबकाई आ रही थी, फिर भी मैंने और झुक कर गले का मुआयना किया तो मुझे गले पर, सारी गर्दन पर खरोंचों के निशान दिखाई दिये ।

“इसी के बनाये बने ।” - मेरे पीछे से यादव धीरे से बोला - “छटपटाहट में दोनों हाथों से गले पर से रस्सी खींचने की कोशिश की तो अपने ही नाखुनों से खरोंचे लगी ।”

“ये किसी औरत का काम नहीं हो सकता ।” - उठ कर सीधा होता मैं बोला ।

“फिर लगे क्लायंट की हिमायत करने !”

“यूं गले में डोरी डाल के कसना ताकत का काम है, तजुर्बे का काम है ! श्यामली तोशनीवाल में ऐसी ताकत, ऐसा तजुर्बा कहां रखा है ! ये सरासर किसी मर्द का काम है ।”

“अब सुजित त्रेहन का हिंट ड्राप कर रहे हो !”

“वो तो प्रीड्रॉपड है ।”

“मैं बताता हूं ये औरत का काम कैसे हो सकता है !”

“कैसे हो सकता है ? बताओ !”

“डोरी से इसका गला घोंटने में मर्दाना ताकत का इस्तेमाल उजागर नहीं है । इसी वजह से डोरी गले में न धंस पायी और इसी वजह से मरने वाली के प्राण तत्काल न निकले ।”

“ये कैसे कह सकते हो ?”

“साफ दिखाई देता है कि ये डोरी इसकी गर्दन के गिर्द कसकर छोड़ दी गयी थी और मकतूला ने इसको खोलने की, ढ़ीली करने की भरपूर कोशिश की थी । उसी कोशिश में इसके गले पर, गर्दन पर खरोंचों के खुद के बनाये निशान बने । जब वो इतनी स्ट्रगल कर सकती थी तो जाहिर है कि उसके प्राण निकलने में वक्त लगा था । शर्मा, इसी वजह से मेड को लाश गर्म मिला थी । फंदा मकतूला के गले में सवा छ: के बाद किसी वक्त कसा गया था लेकिन प्राण उसके सात के करीब, मेड के यहां पहुंचने से जरा पहले निकले थे ।”

वो ठीक कह रहा था ।

“क्या हुआ ?” - यादव व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - “बंद हो गयी बोलती ?”

मैंने जवाब न दिया । मेरी निगाह पैन होती हुई बैडरूम में घूमी ।

दरवाजे पर से बैडरूम का बुरा हाल पहले मैं देख ही चुका था, इस बार मुझे खुले, बाहर फर्श पर गिरे पड़े दराज भी दिखाई दिये और मैंने ये भी नोट किया कि वार्डरोब के तीनों दरवाजे खुले थे और कपड़े - जनाना पोशाकें - बाहर बिखरे पड़े थे, जैसे कि आततायी ने भीतर से बारी बारी एक एक कपड़ा निकाला हो, टटोला हो और बाहर फेंका हो ।

मैंने कबाड़ का बारीक मुआयना किया ।

यादव मूक दर्शक बना खडा रहा, गनीमत थी कि उसने मुझे टोकने की, दखलअंदाज होने की कोशिश नहीं की थी ।

अपनी लम्बी तलाश में एक चीज आखिर मेरे हाथ आयी ।

कैमरा फोटोग्राफ्स की एक पुरानी, खस्ताहाल एलबम जिसमें लगी तसवीरें बदरंग हो चुकी थीं ।

“सर” - तभी बाहर से एक हवलदार ने पुकार लगाई - “जरा ये देखिये ।”

यादव और मैं आगे पीछे बाहर ड्राइंगरूम में पहुंचे ।

हवलदार के हाथ में एक नन्हा सा गुलाबी रंग का जनाना रूमाल था जिस पर महरून धागे से ‘एस टी’ कढ़ा हुआ था ।

मेरे दिल ने गोता लगाया ।

मुझे वो वही रूमाल जान पड़ा जिसमें मुंह छुपाकर श्यामली पिछली रात मेरे फ्लैट पर सुबकती रही थी ।

फिर एकाएक मुझे अहसास हुआ कि यादव रूमाल को नहीं, गौर से मुझे देख रहा था ।

मैं हड़बड़ाया, मैंने खुद पर काबू पाया ।

“क्या प्राब्लम है ?” - वो अपलक मुझे देखता बोला ।

“कोई नहीं ।” - मैं भरसक सुसंयत स्वर में बोला ।

“मैंने तो समझा था कि रूमाल पहचान में आ गया !”

“ऐसी कोई बात नहीं ।”

“इस पर ‘एस टी’ कढा है जो कि श्यामली तोशनीवाल के प्रथम अक्षर हैं ?”

“मकतूला के नाम के भी हैं । और हजारों नामों के भी मुमकिन हैं ।”

“और किसी ‘एस टी’ का रिश्ता इस केस से नहीं है ।”

“तुम्हें क्या मालूम ?”

“एलबम क्यों थामे हो ?”

“देखना चाहता हूं ।”

“क्या देखना चाहते हो ?”

“देखने पर पता लगेगा ।”

“इधर लाओ ।”

“क्या !”

“अरे, दोनों देखते हैं न !”

“ओह !”

डायनिंग टेबल पर पहुंच कर, अगल बगल दो कुर्सियों पर बैठकर हमने एलबम के पन्ने पलटने शुरू किये ।

कुछ पृष्ठों के बाद बर्फ से ढ़ंके पर्वत शिखर, बर्फीले रास्ते और रास्तों पर चलते पर्वतारोही और शेरपा दिखाई देने लगे ।

“नेपाल की तसवीरें हैं ।” - मैं धीरे से बोला ।

“दिख रहा है मेरे को ।” - यादव भुनभुनाया - “लेकिन किस काम की हैं ?”

मैं क्या जवाब देता !

“तसवीरें नेपाल की हैं, इतने से तो एलबम की मालकिन का रिश्ता पहले मर्डर से या सुजित त्रेहन से या शिव मंगल तोशनीवाल से नहीं जुड़ जाता !”

“श्यामली से पहले से जुड़ा हुआ है ।”

“क्या बोला ?”

“मकतूला श्यामली को चिट्ठी लिखती थी । मोबाइल, एसएमएस, ई-मेल के जमाने में चिट्ठी लिखती थी ।”

“तो क्या हुआ ? इतना बड़ा डाक का महकमा चलता है तो लिखते ही हैं न लोग बाग चिट्ठी !”

“शौक से लिखती हो मकतूला भी, लेकिन मैं कुछ और कह रहा हूं ।”

“क्या ? और क्या ?”

“बाजरिया चिट्ठी मकतूला का रिश्ता श्यामली से जुड़ा न !”

“सो ?”

“श्यामली को जानती थी तो हसबैंड को नहीं जानती होगी ?”

“जानती होगी । लेकिन मैं सामूहिक बात कर रहा था । नेपाल के कॉन्टेक्स्ट में बात कर रहा था । सुजित त्रेहन का वजूद बाइस साल पहले था, बाइस साल पहले भी वो तोशनीवाल पति पत्नी से वाकिफ थी, ये स्थापित होता नहीं दिखाई दे रहा ।”

“अभी बहुत पेज बाकी हैं, शायद आगे दिखाई दे ।”

“उम्मीद नहीं ।”

मैं खामोशी से पन्ने पलटता रहा ।

एलबम के एक पृष्ठ पर मैं ठिठका । उस पर तीन तसवीरें लगी हुई थीं ।

“ये” - मैं तनिक उत्तेजित भाव से बोला - “बीच वाली तसवीर देखो ।”

“क्या है ?”

“बहुत कुछ है - बल्कि सारा कुछ है - जो रिश्ता ढूंढ रहे थे, वो है । देखो ।”

उसने गौर से तसवीर को देखा और तत्काल संजीदा हुआ ।

तसवीर में दो महिलायें एक दूसरे को बर्फ के गोले मार रही थीं ।

बैकग्राउंड में बर्फ से ढ़ंकी पहाड़ी चोटियों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ।

तसवीर बहुत पुरानी थी, उन दोनों महिलाओं की जवानी की थी, फिर भी दोनों उसमें साफ पहचानी जा रही थीं ।

एक भीतर बैडरूम में मरी पड़ी थी और दूसरी -

श्यामली थी ।

यादव ने एलबम में से वो तसवीर उखाड़ कर अपने कब्जे में कर ली ।

“रुको !” - मैं जल्दी से बोला ।

“क्या है ?”

“इसे जरा हाथ में थामो । मेरी तरफ रुख करके ।”

“क्यों ?”

“अरे, करो तो !”

उसने किया तो उसका अक्स मैंने अपने मोबाइल में उतार लिया ।

“यादव ने ऐतराज करना चाहा लेकिन फिर खयाल बदल दिया, उसने तसवीर को सहेज कर अपनी वर्दी की जेब में रख लिया ।

“अब ये स्थापित हुआ” - फिर बोला - “कि मकतूला से तुम्हारी क्लायंट का रिश्ता पुराना था, बाईस साल पुराना था, नेपाल से बना चला आ रहा था । ये बात तुम्हारी क्लायंट का रिश्ता मौजूदा मर्डर से जोड़ती है ।”

“मर्डर से नहीं जोड़ती, मर्डर्ड पर्सन से जोड़ती है ।”

“एक ही बात है ।”

“खामखाह !”

“जब वो यहां थी...”

“इस बाबत पहले बहस हो चुकी है । इस कत्ल के वक्त श्यामली या सफदरजंग की मोर्ग में थी या वसतकुंज में अपनी कोठी पर थी ।”

“तोता अच्छा पकड़ा श्यामली ने !”

“तोता ! मैं !”

“और कौन ! अभी कत्ल का वक्त निर्विवाद रूप से निर्धारित नहीं है । कत्ल के वक्त के बारे में जो हमारा कयास है, उसकी कनफर्मेशन होना अभी बाकी है । कनफर्मेशन पोस्टमार्टम से होगी ।”

“लेकिन...”

“एलबम को आगे पलट । या इधर मुझे दे ।”

मैंने वरके पलटने शुरू किये । हम दोनों की निगाह हर तसवीर पर थी लेकिन कोई किसी दिलचस्पी के काबिल नहीं थी ।

आखिरी चार पन्ने खाली थी और उनसे पहले के पन्ने पर सिर्फ एक तसवीर थी जो कि एक दस साल की सुंदर लड़की की थी । वो बर्फीले माहौल का मुकाबला कर सकने लायक फर की लाइनिंग वाली चमड़े की पोशाक पहने थी और एक आंख से कैमरा लगाये जिसकी तसवीर खींच रही थी, प्रत्यक्षत: उसके पास भी कैमरा था और वो उसकी तसवीर खींच रहा था - दोनों एक की तसवीर खींच रहे थे । वो बर्फ में खड़ी थी और उस तसवीर की बैकग्राउंड में बर्फीले पर्वत शिखर थे ।

यादव ने उस तसवीर में कोई रुचि न ली और उस तसवीर को आखिरी जान कर वो एलबम से विमुख हो गया लेकिन मुझे वो तसवीर पहचानी सी लगी ।

उसी नन्हीं लड़की की तसवीर पीछे एलबम के शुरू में मैंने मकतूला के साथ भी देखी थी लेकिन तब मैंने उसकी तरफ तवज्जो नहीं दी थी ।

तभी मेन डोर खुलने लगा और यादव की निगाह उधर गयी ।

अपने मोबाइल से मैंने एलबम के उस पृष्ठ की फोटो खींची और फिर जल्दी से वो पहली तसवीर तलाश करके उसकी भी फोटो खींची ।

फिर मैंने यादव की निगाह का अनुसरण किया ।

मेन डोर से इमरान डिप्टी भीतर दाखिल हो रहा था ।

इमरान डिप्टी एक बहुत आकर्षक व्यक्तित्व वाला, उम्र में कोई पैंतीस साल का, हंसमुख व्यक्ति था जो आदतन सजा धजा रहता था और वाल्ट बस्टर लगने की जगह किसी बड़ी कम्पनी का बिजनेस एग्जीक्युटिव जान पड़ता था । किसी बात में उसका व्यक्तित्व मात खा गया था तो वो उसका कद था जिसकी कसर वो एक्स्ट्रा हाई हील्स पहन कर पूरी करता था ।

कोई बात उसकी असलियत की पोल खोलती थी तो वो उसका लहजा और खास ओल्ड दिल्ली वाली जुबान थी ।

उस घड़ी वो एक टाइट जींस गोल गले की स्कीवी और चमड़े की जैकेट पहने था और सिर पर चमड़े की गोल्फ कैप पहने था । वो काली पोशाक उसके सुथरे नयन नक्श और गोरी रंगत के साथ ऐसी फब रही थी कि फिल्म स्टार सरीखा जान पड़ता था ।

उसने मेरा अभिवादन किया और फिर खास मुसाहिबी जुबान से यादव से सम्बोधित हुआ - “आदाब अर्ज है, हुजूर ।”

यादव ने सहमति में सिर हिला कर आदाब कुबूल किया ।

“मेरे को नहीं मालूम था कि हुजूर भी इधर जलवाअफरोज थे वर्ना...”

“वर्ना क्या ?” - यादव सख्त लहजे से बोला ।

“मैं नहीं आने का था ।”

“शर्मा के कहने पर भी ?”

“अब इतनी बड़ी गुस्ताखी तो खाकसार नहीं कर सकता था । इनका हुक्म तो खादिम के सिर माथे है हमेशा । लेकिन” - उसने शिकायत करती निगाह से मेरी तरफ देखा - “जनाब, बोलना तो था कि सरकार की हाजिरी थी !”

“मेरे खयाल से” - मैं बोला - “मैंने बोला था ।”

“नहीं बोला था, जनाब ।”

“फिर तो सारी ।”

“कोई मुजायका नहीं, जनाब ।”

“बोला होता तो” - यादव उसे घूरता बोला - “न आता ?”

“बराबर आता, हुजूर, सिर के बल आता । लेकिन... होशियार, खबरदार होकर आता ।”

“अब बस कर ।”

“हुक्म सिर माथे, हुजूर । अब खिदमत फरमाइये नाचीज के वास्ते ।”

हम बैडरूम में पहुंचे । वहां यादव ने दीवार पर से मकतूला की तसवीर हटाकर एक ओर रखी ।

“वाल सेफ देखी ?” - मैं बोला ।

“देखी ।” - डिप्टी बोला - “अब नाबीना तो मैं हूं नहीं, जनाब, काली कमली वाले के करम से !”

“खोल सकते हो ?”

उसने गौर से, संजादगी से, पारखी निगाह से सेफ को देखा ।

“कम्बीनेशन सेफ है ।” - फिर बोला - “है कम्बीनेशन ?”

“इमरान भाई, कम्बीनेशन होता तो तुम्हारे को बुलाते ?”

“नहीं है ?”
 
“वो तो होगा ही लेकिन यहां किसी को मालूम नहीं है । इस सेफ का अभी खुलना जरूरी है और ये काम करना है ।”

“ये... ये गैरकानूनी काम है” - छुपी निगाह से यादव की ओर देखता वो बोला - “मैं कैसे कर सकता हूं ? करना चाहूं भी तो कैसे कर सकता हूं ? नप नहीं जाऊंगा ?”

“नप नहीं चुका पहले ही !” - यादव सख्ती से बोला - “इसी वजह से तीन साल जेल में काटे, इतनी जल्दी भूल गया !”

“नाजायज काटे, हुजूर ! गरीबमार हुई ! आपने, कोर्ट कचहरी ने, किसी ने फरियाद न सुनी गरीब की कि बेगुनाह था; मेरे को गलत, नाजायज तौर पर तिजोरीतोड़ करार...”

“बंद कर ड्रामा !”

डिप्टी ने होंठ भींचे ।

“जो करतूत कर चुका है, जिसकी सजा काट चुका है, उसके लिये कहता है कुछ नहीं किया, कुछ नहीं आता ।”

“सजा काटी तो हिसाब बराबर हुआ न, हुजूर ! अब कौन सा हिसाब बाकी है जिसकी सजा के लिये मेरे को यहां तलब किया है ?”

“हमने नहीं किया ।”

“मैंने किया ।” - मैं जल्दी से बोला - “मैंने किया । यादव साहब, जरा बाहर चलो ।”

मैंने जबरन यादव की बांह थामी और उसे ड्राइंगरूम में लाया ।

“अरे, क्यों बनता काम बिगाड़ रहे हो ?” - मैं भिंचे दांतों में से बोला - “जरा कंट्रोल रखो अपने मिजाज पर । होने दो काम को ।”

“होगा ?”

“यकीनन होगा । लेकिन पुलिसिया धौंसपट्टी से नहीं होगा । मेरा कहना मानो, थोड़ी देर यहीं ठहरो और मुझे सब हैंडल करने दो ।”

उसने ऐतराज जताने को मुंह खोला, सप्रयास वापिस भींचा और फिर कठिन भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

“थैंक्यू ।”

मैं वापिस बैडरूम में लौटा । इस बार मैंने बीच का दरवाजा भिड़का दिया ।

“सेफ खोल, यार ।” - मैं डिप्टी के करीब जा कर बोला - “कोई सवाल नहीं होगा । मेरी गारंटी है ।”

“जनाब” - डिप्टी दबे स्वर में बोला - “इसी ने मुझे जेल की हवा खिलाई थी । तब सब-इन्स्पेक्टर था । अब तो एक सितारा और बढ़ गया है । बर्बाद कर देगा ।”

“कुछ नहीं करेगा । कुछ नहीं होगा । मेरे पर भरोसा रखो । सेफ बंद है, थोड़ी देर बाद खुली पायी गयी तो मैं गारंटी करता हूं कि इंस्पेक्टर बोलेगा पहले से खुली थी, किसी को ठीक से ढ़क्कन खींचना न आया ।”

“ऐसा ?”

“हां ।”

“आप पर ही ऐतबार है मेरे को । आप की ही खिदमत के लिये हाजिर हुआ हूं ।”

“शुक्रिया । अब जो करना है, करो । कर तो लोगे न !”

“बच्चे की गुल्लक खोलने वाला काम है ।”

“बिना आजमाये कह रहे हो !”

“निगाह से आजमा लिया न सब !”

“गुड !”

“अब आप भी जरा मुंह फेर कर खड़े होइये वर्ना मेरी तवज्जो भटकेगी ।”

मैंने उसकी तरफ पीठ फेर ली ।

थोड़ी देर बाद ही वो मेरी पीठ पर दस्तक दे रहा था ।

“खुल भी गयी !” - मैं हैरानी से बोला ।

वो शान से मुस्कराया, फिर उसने थियेट्रिकल अंदाज से सिर नवाया ।

“मजा आ गया” - फिर बोला - “कानून के मुहाफिजों की हाजिरी में कानून तोड़ने की लज्जत का । ऐसा चैलेंज महसूस किया कि परवरदिगार ने आधे टाइम में कामयाबी का मुंह दिखा दिया ।”

“कमाल किया । अब...”

तभी भिड़का दरवाजा मुझे खुलता दिखाई दिया । मैं खामोश हो गया ।

मेड किरण ने भीतर कदम रखा । हिरणी की तरह उसने भीतर निगाह दौड़ाई ।

“क्या है ?” - मैं कदरन सख्त लहजे में बोला ।

“साहब जी” - वो कातर स्वर में बोली - “मैं जाऊं ?”

“जाऊं ! कहां जाऊं ?”

“घर ।”

“इंस्पेक्टर साहब से पूछो, भई ।”

“वो...वो मना कर रहे हैं ।”

“तो हो जाओ मना ।”

“आप कह दीजिये मुझे जाने दें ।”

“अरे, काहे को ?”

“मेरे को यहां डर लग रहा है ।”

“खामखाह ! पुलिस की मौजूदगी में डरने का क्या काम !”

“उन्हीं से डर लग रहा है ।”

“नानसेंस !”

“साहब जी, मेहरबानी करो न !”

“मैं कुछ नहीं कर सकता । इन्स्पेक्टर साहब मेरी नहीं सुनने वाले । मेरी नहीं मानने वाले ।”

“साहब जी...”

“वही हैं साहब जी । वो मना कर रहे हैं तो तू नहीं जा सकती । अब जा यहां से ।”

तीव्र अनिच्छा का प्रदर्शन करती वो घूमी और यहां से रुखसत हुई ।

डिप्टी की भवें उठी ।

“मकतूल की मेड है ।” - मैं बोला - “इसी ने लाश बरामद की थी ।”

“ओह !”

“इमरान भाई, अब मेरा शुक्रिया कुबूल करो और निकल लो ।”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“क्या बात है ?” - मैं तनिक हैरानी से बोला ।

“बात करनी है ।” - वो दबे स्वर में वोला - “आपके मतलब की ।”

“अच्छा !”

“हां । जनाब, यूं ही तो दौड़ा नहीं चला आया !”

“क्या बात ?”

“बोलूंगा न !”

“ठीक है । यहां से निकल लो । बाहर पार्किंग में मेरा इंतजार करना ।”

उसने सहमति से सिर हिलाया ।

मैंने खुद उसे फ्लैट से बाहर किया और वापिस यादव के पास पहुंचा ।

“वाल सेफ तो पहले ही खुली थी !” - मैं बोला ।

“क्या बकते हो ?”

“देखो जा कर ।”

वो लपक कर बैडरूम में पहुंचा, वाल सेफ पर जा कर उसने उसका ढ़क्कन खींचा ।

ढ़क्कन निशब्द खिंचा ।

“क्या माजरा है ?” - वो संदिग्ध भाव से बोला ।

“कोई माजरा नहीं । तुम्हारे आदमियों को ढ़क्कन खींचना नहीं आया । हैंडल को पहले ट्विस्ट करना होता है - जैसे कि तुमने अभी किया - और फिर खींचना होता है ।”

“गोली है । लेकिन मुझे कबूल है । हज्म है ।”

मैंने चैन की सांस ली ।

“वो साला वाकेई अपने हुनर का उस्ताद है । न सिर्फ बड़ा करतब किया, आनन फानन किया । जैसे फूंक मारी हो और सेफ खुल गयी हो ।”

“अब देखो तो सही खुल चुकी सेफ में ! क्या रखा है उसमें ?”

उसने देखा । हम दोनों ने देखा । बारीकी से ।

कुछ भी नहीं रखा था ।

ऐसा कोई क्लू सेफ में से बरामद न हुआ जो मौजूदा कत्ल को पिछली शाम हुए छतरपुर वाले कत्ल से जोड़ पाता ।

“खोदा पहाड़” - मैं बोला - “निकला चूहा ।”

“वो भी कहां निकला !” - यादव बड़बड़ाया - “क्यों हुआ इस औरत का कत्ल !”

“मैं अपना अंदाजा बताऊं ?”

“बताओ । सालिड तो कुछ हाथ आ नहीं रहा इसलिये अंदाजों से ही काम चलाते हैं ।”

“ये औरत नेपाल के टाइम से सुजित त्रेहन को जानती पहचानती थी । इतने सालों बाद दिल्ली में कहीं उससे टकरा गयी । त्रेहन नहीं चाहता था कि किसी को पता चलता कि वो जिंदा था और दिल्ली में था, क्योंकि अपनी धमकी की रू में अभी उसने तीन कत्ल और करने थे ।”

“इसलिये उसने इस औरत का - इसका मुंह बंद करने के लिये - कत्ल कर दिया ?”

“ऐसा ही जान पड़ता है ।”

“गलत जान पड़ता है । उसका मिशन औरत का मुंह बंद करना ही था तो उसके फ्लैट का कबाड़ा क्यों किया ?”

“क्यों किया ?”

“अरे, पूछ मैं रहा हूं ।” - वो झल्लाया ।

“सोचना पड़ेगा । अभी चलता हूं ।”

“कुछ सूझे तो फोन लगाना । बहुत छूट दी है मैंने तुम्हें । उसका बदला उतारने की कोशिश करना कोई शर्म हया लिहाज बाकी हो तो ।”

“जरूर । जरूर ।”

मैंने वहां से रुखसत पायी ।

Chapter 3

पार्किंग में एक खम्बे से टेक लगाये खड़ा डिप्टी मुझे सिग्रेट के कश लगाता मिला । मुझे देखकर अदब दिखाता वो प्रत्यक्षत: तभी सुलगाया सिग्रेट फेंकने लगा तो मैंने उसे रोका और फिर उसका साथ देने के लिये खुद भी एक सिग्रेट सुलगा लिया ।

“अब बोलो, क्या बात है ?” - मैं बोला ।

“आपने टीवी देखा ?” - वो संजीदगी से बोला ।

“नहीं । रात से अब तक भटक ही रहा हूं टाइम नहीं लगा । क्यों पूछ रहे हो ?”

“अखबार में तो कुछ छपा नहीं लेकिन टीवी पर छतरपुर वाले मर्डर का काफी जिक्र है । ‘आज तक’ पर तो बड़ी वसीह कवरेज थी ।”

“तुमने खुद देखा ?”

“हां ।”

“क्या ?”

“वो केयरटेकर, विष्णु कसाना, उसको ले कर पुलिस की बहुत छीछालेदारी हो रही है कि इन लोगों ने क्यों उसे निकल जाने दिया । महरौली थाने का एसएचओ और ये घना फू फा इन्स्पेक्टर यादव, देखना दोनों की वाट लगेगी ।”

“लगे । मुझे क्या ?”

“है न !”

“क्या !”

“टीवी में आपका भी जिक्र था । जिक्र था कि बतौर पीडी आपका केस में दखल है, मकतूला की मां ने आपको बतौर पीडी एंगेज किया था । ये भी जिक्र था कि सबसे पहले आपने - पुलिस ने नहीं - ये बात उठाई थी कि केयरटेकर विशनी कसाना कातिल हो सकता था ।”

“तो ?”

“वो अभी भी गायब है ।”

“अरे, तो ?”

“मैं उसे जानता हूं ।”

“क्या !”

“बाखूबी वाकिफ हूं ।”

“कैसे ?”

“मैं आजकल महरौली गांव में रहता हूं । महरौली में कुतुब के करीब एक दारू का अड्डा है जहां इस शख्स की आवाजाही अक्सर होती थी । वहीं वाकफियत हुई ।”

“अड्डे का कोई नाम ?”

“सुलतान बार ।”

“कौन चलाता है ?”

“वही, जिसके नाम पर बार का नाम है ।”

“सुलतान ?”

“हां । अली सुलतान ।”

“हूं । तो तुम कसाना से वाकिफ हो और तुम्हारा खयाल है वो वहां फिर आ सकता है ?”

“है भी, नहीं भी ।”

“पहेलियां न बुझाओ, यार ।”

“कोई पहेली नहीं है । टीवी पर न्यूज देखने के बाद उसकी बाबत मैं वहां पता करने गया था । वहां से मालूम पड़ा था कि तीन चार दिन से वो वहां नहीं आया था ।”

“फिर क्या बात बनी ?”

“अभी सुनिये तो !”

“ओह ! सारी !”

“मैंने तीन चार दिन पहले की उसकी आमद की बाबत और दरयाफ्त किया था तो मालूम पड़ा था कि तब वो हमेशा की तरह आया तो अकेला था लेकिन अकेला रहा नहीं था ।”

“मतलब ?”

“कोई उससे मिलने वहां पहुंचा था जिसकी सोहबत में थोड़ी देर के लिये कइयों ने उसे वहां देखा था ।”

“थोड़ी देर के लिये क्यों ?”

“उसका वहां मन नहीं लगा था न...”

“दूसरे शख्स का जो विष्णु कसाना के बाद वहां पहुंचा था ?”

“हां । मन नहीं था या उसे वो जगह पसंद नहीं आयी थी, वो कहता सुना गया था - कहीं और चलते हैं ।”

“और कहां ?”

“घाट पर ।”

“घाट पर ! कौन से घाट पर ?”

“पता नहीं । लेकिन उनका प्रोग्राम यकीनन लम्बी तफरीह का था क्योंकि उन्होंने वहां से विस्की की पूरी बोतल, दो गिलास, मिनरल वाटर की बोतल और नमकीन हासिल किया था ।”

“तफरीह ! घाट पर !”

“हां ।”

“लेकिन ये नहीं पता घाट क्या ? कहां ?”
 
“घाट तो, जवाब, दरिया किनारे ही होते हैं ! अपनी दिल्ली में है न दरिया ! जमना !”

“जो दिल्ली के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक बहती है और जिस पर पता नहीं कितने घाट होंगे । क्या पता वो कहीं किसी धोबी घाट पर गये हों ।”

“धोबी घाट ! हें हें हें ।”

“जिसके करीब कहीं उनका ठिकाना होगा जहां कि वो बाटली मार ! सकते होंगे !”

“ये हो सकता बराबर, जनाब ।”

“उस दूसरे शख्स की बाबत और कुछ दरयाफ्त न किया ?”

“दरयाफ्त तो किया, जनाब, चंद चश्मदीदों से ।”

“क्या पता लगा ?”

“लम्बा था, मोटा था । ठिगना था, पतला था । लम्बा था, पतला था । ठिगना था, मोटा था । सिर पर टोपी पहने था । बाल घने थे, स्याह काले थे । आधा गंजा था, बाल अधपके थे । भवें भारी थी, मूंछ पतली थी । भवें पतली थीं, मूंछ मोटी थी । भवें थीं, मूंछ नहीं थीं । काला सूट पहने था, ब्राउन सूट पहने था । पतलून काली थी, कोट ब्राउन था । कोट नीला था, पतलून सलेटी थी । क्या समझे, जनाब ?”

“जितने मुंह, उतनी बातें !”

“बिल्कुल ! जवाब देने वाले नामाकूल यूं जवाब देते थे जैसे नहीं देंगे तो पुलिस पकड़ कर ले जायेगी । हर किसी ने मुंह से मवाद निकाली । किसी से फूटे मुंह ये कहते नहीं बना था कि उन्हें कुछ नहीं मालूम था, उन्होंने इन बातों की तरफ तवज्जो नहीं दी थी ।”

“होता है । दिल्ली शहर में तो खास तौर से होता है । कुछ पूछा जाने पर जवाब न देने में हेठी महसूस करते हैं लोग बाग । किसी जगह के बारे में पूछो, दायां हाथ उठ गया तो दायीं तरफ है, बायां उठ गया तो बायीं तरफ है । सब ज्ञानी हैं । ‘नहीं मालूम’ कैसे कह दें टोपी न उतर जायेगी !”

“सही फरमाया, जनाब । उधर ऐसी ही बीती मेरे साथ ।”

“बहरहाल तुम्हारी बातों से इतना तो स्थापित हुआ कि केयरटेकर विष्णु कसाना कोई तनहा शख्स नहीं था । उसकी नयी नौकरी वाले उस इलाके में उसको भी जानने पहचानने वाला कोई था । इमरान भाई, अब मेरी तुम्हारे से एक दरख्वास्त है ।”

“हुक्म फरमाइये, जनाब !”

“उस दारू के अड्डे की एक दो दिन निगाहबीनी करो । किसी और को साथ लगा सको तो और भी अच्छा होगा । इस बात की मुझे पूरी पूरी सम्भावना जान पड़ती है कि आइंदा दिनों में केयरटेकर का नहीं तो उसके जोड़ीदार का वहां फेरा लग सकता है । तुम समझ रहे हो न मेरी बात !”

“जी हां, बराबर ।”

“ये भी कि मैं क्या चाहता हूं ?”

“बिल्कुल ! पहुंचे तो सही कोई वहां, आपकी नजर करेंगे ।”

“थैंक्यू ।”

“जनाब, इस केयरटेकर का हुलिया बड़ा स्पैशल, न छुप पाने वाला है । आप कहें तो मैं उसकी तलाश की भी कोई जुगाड़ करूं ?”

“कर सकते हो ?”

“करवा सकता हूं । अकेला चना तो भाड़ नहीं फोड़ सकता न !”

“तो क्या करोगे ?”

“बहुत शागिर्द हैं मेरे दिल्ली शहर में ।”

“ओह !”

“आज तो मैं ये काम उन्हीं में से किसी के हवाले करूंगा, कल...देखूंगा खुद ।”

“आज क्या है ?”

“थोड़ा बिजी हूं ।”

“थोड़े बिजी हो न ! शाम तक तो...”

“शाम को भी । बल्कि शाम को ही खास अपोइंटमेंट है ।”

अपोइंटमेंट शब्द वो एक खास शान से बोला ।

“ठीक है” - मैं बोला - “जो हो सके, करना ।”

“हुक्म सिर माथे, जनाब । कुछ मालूम पड़ा तो कल आपने दौलतखाने पर हाजिरी भरूंगा ।”

“अरे, नाहक जहमत...”

“कोई जहमत नहीं, जनाब, उधर जीके वन में मुझे काम पड़ता रहता है ।”

“इमरान भाई, आज कल मैं वहां नहीं हूं ।”

“अच्छा ! शिफ्ट कर लिया ?”

“हां ।”

“कहां ?”

“भगवान दास रोड पर ।”

मैंने उसे अपना नया विजिटिंग कार्ड थमाया जिस पर कि मेरा नया आवासीय पता दर्ज था ।

“कोई मुजायका नहीं, जनाब” - वो बोला - “बंदा वहां हाजिर हो जायेगा ।”

“ओके । थैंक्यू ।”

मैंने उसे रुखसत किया और अपनी कार में सवार हुआ । वहां से रवाना होने से पहले मैंने अपने आफिस काल लगाई ।

कुछ क्षण बाद घंटी बजनी बंद हो गयी लेकिन जवाब में कोई आवाज मुझे न आयी ।

“हल्लो !” - मैं बोला - “हल्लो !”

“जिस नम्बर पर आप संपर्क साध रहे हैं” - मशीनी आवाज आयी - “वो अभी सर्विस क्षेत्र से बाहर है । कृपया आगामी सोलर एक्लिप्स पर पुन: संपर्क स्थापित करने की चेष्टा करें । धन्यवाद ।”

ऑफिस फोन कालर आइडेंटिटी सुविधा वाला था, मेरी कम्बख्त सैक्रेट्री को मालूम था लाइन पर कौन था इसलिये उसे मसखरी सूझ रही थी ।

मैं प्रतीक्षा करता रहा ।

“यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस, गुड मार्निंग ।” - आखिर मुझे रजनी का बदला, मधुर स्वर सुनायी दिया ।

“गुड मार्निंग ।” - मैं बोला - “मैं तेरा एम्प्लायर बोल रहा हूं ।”

“वो तो आप जम जम बोलिये, आपका अधिकार है बोलने का, लेकिन खसम की तरह क्यों बोल रहे हैं ?”

“प्रैक्टिस कर रहा हूं । क्योंकि कभी तो ये दर्जा मुझे हासिल होना ही है !”

“ख्वाब देखते रहिये ।”

“कोई हर्ज है ख्वाब देखने में ! जो शख्स ख्वाब नहीं देख सकता, वो कभी तरक्की नहीं कर सकता । मालूम !”

“मालूम । सर्र, अगर आपकी निगाह में तरक्की की पराकाष्ठा यही है कि आप मेरे...वो बन सकें तो मजबूरन मुझे कहना पड़ेगा कि आपकी महत्वाकांक्षा बहुत छोटी है, आप का टार्गेट बहुत लो है ।”
 
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