S
StoryPublisher
Guest
“आसान काम !”
“कोट ही गायब कर देता !”
“काफी सयाने हो !”
वो खामोश रहा ।
“पढ़ने का काफी शौक है तुम्हें ।” - मैं बोला - “अच्छा कलैक्शन है बुक्स का यहां ।”
उसने सहमति में सिर हिला कर अपने शौक की और अच्छे कलैक्शन की हामी भरी ।
“कलैक्शन में एक ग्रन्थ विष विज्ञान पर भी है !”
उसकी भवें उठीं ।
मैंने शैल्फ में से पुस्तक निकाल कर उसे दिखाई ।
“अच्छा ये !” - वो बोला - “ये किसी ने गिफ्ट की थी ।”
“किसने ?”
“खुद लेखक ने ।”
“आइ सी ।”
“लेकिन ये मेरे इंटरैस्ट का सब्जेक्ट नहीं इसलिये रख छोड़ी बस ।”
“कभी पढ़ी नहीं ?”
“न ! खोल के भी न देखी ।”
“तो किसने पढ़ी ?”
“क्या मतलब ?”
मैंने पुस्तक को वहां से खोल कर उसके सामने किया जहां पन्ना मुड़ा हुआ था और कछ लाइनें रेखांकित थीं ।
उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये, जल्दी से किताब मेरे हाथ से ले कर उसने उसका मुआयना किया ।
“मैं इस बाबत कुछ नहीं जानता ।” - फिर दृढ़ता से बोला - “हो सकता है ये मुझे ऐसे ही मिली हो !”
“लेखक मार्क्ड किताब भला क्यों तुम्हें गिफ्ट करेगा ?”
“तो फिर ये मार्किंग यहां किसी ने की ।”
“किसने ?”
“किसी ने भी । पापा ने, ममी ने, सुरभि ने, किसी गैस्ट ने भी ऐसा किया हो सकता है ।”
“तुम्हारा कमरा इतना असैसिबल है ?”
“है ही । तभी तो आप लोग यहां मौजूद हैं ।”
“ठीक !”
“मुझे नीचे काम है । मैं जा सकता हूं ?”
मैंने यादव र्को तरफ देखा । यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।
शिशिर ने किताब वापिस शैल्फ पर रखी और वहां से चला गया ।
“यहां तुम्हारा मुकाम कहां है ?” - यादव ने देवीलाल से पूछा ।
“पिछवाड़े में सर्वेन्ट्स क्वार्टर है” - देवीलाल तनिक हड़बड़ाया सा बोला - “वहां एक कमरा मेरा भी है ।”
“दिखाओ । ले के चलो ।”
देवीलाल के साथ हम उसके आवास पर पहुंचे ।
वहां की भी तलाशी हुई जिसमें खुद यादव ने सक्रिय हिस्सा लिया । शिशिर का आर्म्स पैचिज वाला ट्विड का कोट तब भी उसके हाथ में था जिसे उसने एक कुर्सी पर डाला और खुद वहां की कई जगहों को टटोला ।
एक अलमारी के टॉप शैल्फ में से एक पैकेट बरामद हुआ जिस पर खोपड़ी और एक दूसरी को क्रॉस करती हड्डियों का खतरे का निशान बना हुआ था और नीचे लिखा था:
चूहे मारने की दवा
स्ट्रिकनिन
“ये क्या है ?” - यादव सख्ती से बोला ।
“वही है, सर” - देवीलाल बोला - “जो लिखा है ।”
“जवाब दे ।”
“चूहे मारने की दवा है ।”
“इतने फैंसी इलाके की इतनी फैंसी कोठी में चूहों का क्या काम ?”
“बैक यार्ड में हैं । गहरी गहरी खोह खोद ली है ।”
“इसे खाते हैं और खोह में ही मर जाते हैं !”
“नहीं, कहीं और जा के मरते हैं ।”
“क्या कह रहा है !”
“इसे खाने से प्यास लगती है । चूहे पानी के लिये तड़पते हैं । पानी की तलाश में भटकते हैं तो यार्ड से निकल जाते हैं ।”
“पढ़ा लिखा है ?”
“बारहवी पास हूं ।”
“छोटे साहब की किताबें निकाल कर पढ़ता है ?”
“निकाल कर नहीं, सर, मांग कर ।”
“क्या पढ़ता है ? क्या पढ़ना पसंद करता है ?”
“नावल । कभी कभार ।”
“वो देते हैं या खुद छांट लेने को बोलते हैं ?”
“खुद छांट लेने को बोलते हैं ।”
“इसलिये कभी नावल की जगह विष विज्ञान की पुस्तक छांट ली !”
“नहीं, सर ।”
“उसी में से ये ज्ञान अर्जित किया कि स्ट्रीकनिन चूहे मारने के भी काम आती थी ?”
“नहीं, सर । मुझे नावल के सिवाय छोटे साहब की किसी किताब में कोई दिलचस्पी नहीं ।”
“वैसे मालूम तो था न कि वैसी एक किताब वहां थी ?”
“मालूम तो था !”
“लेकिन कभी निकाली नहीं, पढ़ी नहीं, मार्क नही की ?”
उसने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया ।
********************************
“कोट ही गायब कर देता !”
“काफी सयाने हो !”
वो खामोश रहा ।
“पढ़ने का काफी शौक है तुम्हें ।” - मैं बोला - “अच्छा कलैक्शन है बुक्स का यहां ।”
उसने सहमति में सिर हिला कर अपने शौक की और अच्छे कलैक्शन की हामी भरी ।
“कलैक्शन में एक ग्रन्थ विष विज्ञान पर भी है !”
उसकी भवें उठीं ।
मैंने शैल्फ में से पुस्तक निकाल कर उसे दिखाई ।
“अच्छा ये !” - वो बोला - “ये किसी ने गिफ्ट की थी ।”
“किसने ?”
“खुद लेखक ने ।”
“आइ सी ।”
“लेकिन ये मेरे इंटरैस्ट का सब्जेक्ट नहीं इसलिये रख छोड़ी बस ।”
“कभी पढ़ी नहीं ?”
“न ! खोल के भी न देखी ।”
“तो किसने पढ़ी ?”
“क्या मतलब ?”
मैंने पुस्तक को वहां से खोल कर उसके सामने किया जहां पन्ना मुड़ा हुआ था और कछ लाइनें रेखांकित थीं ।
उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये, जल्दी से किताब मेरे हाथ से ले कर उसने उसका मुआयना किया ।
“मैं इस बाबत कुछ नहीं जानता ।” - फिर दृढ़ता से बोला - “हो सकता है ये मुझे ऐसे ही मिली हो !”
“लेखक मार्क्ड किताब भला क्यों तुम्हें गिफ्ट करेगा ?”
“तो फिर ये मार्किंग यहां किसी ने की ।”
“किसने ?”
“किसी ने भी । पापा ने, ममी ने, सुरभि ने, किसी गैस्ट ने भी ऐसा किया हो सकता है ।”
“तुम्हारा कमरा इतना असैसिबल है ?”
“है ही । तभी तो आप लोग यहां मौजूद हैं ।”
“ठीक !”
“मुझे नीचे काम है । मैं जा सकता हूं ?”
मैंने यादव र्को तरफ देखा । यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।
शिशिर ने किताब वापिस शैल्फ पर रखी और वहां से चला गया ।
“यहां तुम्हारा मुकाम कहां है ?” - यादव ने देवीलाल से पूछा ।
“पिछवाड़े में सर्वेन्ट्स क्वार्टर है” - देवीलाल तनिक हड़बड़ाया सा बोला - “वहां एक कमरा मेरा भी है ।”
“दिखाओ । ले के चलो ।”
देवीलाल के साथ हम उसके आवास पर पहुंचे ।
वहां की भी तलाशी हुई जिसमें खुद यादव ने सक्रिय हिस्सा लिया । शिशिर का आर्म्स पैचिज वाला ट्विड का कोट तब भी उसके हाथ में था जिसे उसने एक कुर्सी पर डाला और खुद वहां की कई जगहों को टटोला ।
एक अलमारी के टॉप शैल्फ में से एक पैकेट बरामद हुआ जिस पर खोपड़ी और एक दूसरी को क्रॉस करती हड्डियों का खतरे का निशान बना हुआ था और नीचे लिखा था:
चूहे मारने की दवा
स्ट्रिकनिन
“ये क्या है ?” - यादव सख्ती से बोला ।
“वही है, सर” - देवीलाल बोला - “जो लिखा है ।”
“जवाब दे ।”
“चूहे मारने की दवा है ।”
“इतने फैंसी इलाके की इतनी फैंसी कोठी में चूहों का क्या काम ?”
“बैक यार्ड में हैं । गहरी गहरी खोह खोद ली है ।”
“इसे खाते हैं और खोह में ही मर जाते हैं !”
“नहीं, कहीं और जा के मरते हैं ।”
“क्या कह रहा है !”
“इसे खाने से प्यास लगती है । चूहे पानी के लिये तड़पते हैं । पानी की तलाश में भटकते हैं तो यार्ड से निकल जाते हैं ।”
“पढ़ा लिखा है ?”
“बारहवी पास हूं ।”
“छोटे साहब की किताबें निकाल कर पढ़ता है ?”
“निकाल कर नहीं, सर, मांग कर ।”
“क्या पढ़ता है ? क्या पढ़ना पसंद करता है ?”
“नावल । कभी कभार ।”
“वो देते हैं या खुद छांट लेने को बोलते हैं ?”
“खुद छांट लेने को बोलते हैं ।”
“इसलिये कभी नावल की जगह विष विज्ञान की पुस्तक छांट ली !”
“नहीं, सर ।”
“उसी में से ये ज्ञान अर्जित किया कि स्ट्रीकनिन चूहे मारने के भी काम आती थी ?”
“नहीं, सर । मुझे नावल के सिवाय छोटे साहब की किसी किताब में कोई दिलचस्पी नहीं ।”
“वैसे मालूम तो था न कि वैसी एक किताब वहां थी ?”
“मालूम तो था !”
“लेकिन कभी निकाली नहीं, पढ़ी नहीं, मार्क नही की ?”
उसने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया ।
********************************