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“कल रात को । अपने दौलतखाने पर । मैडम के कत्ल के बाद । आप मौकायवारदात पर अपने सुपुत्र के साथ बाद में पहुंचे थे - पहले मैं और इंस्पेक्टर साहब ऊपर मैडम के बैडरूम में पहुंचे थे - आप भीतर एक निगाह ही डाल पाये थे कि बाहर कर दिये गये थे । बाद में नीचे ड्राईंग रूम में इंस्पेक्टर साहब ने आपको मौकायवारदात से बरामद श्यामली की सुजित त्रेहन के नाम चिट्ठी दिखाई थी लेकिन तब तक उस रुक्के का, नयी धमकी वाले रुक्के का, कोई जिक्र नहीं किया था जो कि लाश के दायें हाथ की मुट्ठी में जकड़ा पाया गया था । तब तक उस रुक्के की खबर या मेरे को थी या इन्स्पेक्टर साहब को थी, आपको कैसे थी ?”
“क्या बोला ?”
“नीचे ड्राईंग रूम में जब आप इंस्पेक्टर साहब की क्लास ले रहे थे, इन्हें फटकार रहे थे कि वारदात इनकी अलगर्जी से हुई थी तो आपने गॉड को याद करते फरमाया था कि अब वो कहता है अगला और आखिरी नम्बर मेरा है । आपको क्या पता कि कातिल क्या कहता था ? तब तक रुक्का तो आपने देखा नहीं था ! जैसे वारदात वाकया हो रही थी, उनकी रू में ये तो आप कह सकते थे कि अगला नम्बर आपका था लेकिन ये कैसे कह सकते थे, कैसे जान सकते थे कि अगला और आखिरी नम्बर आपका था ? और ऐसा आपने एक ही बार नहीं, दो बार कहा । जनाब, क्या बताने की जरूरत है कि कैसे जान सकते थे ? मैडम की मुट्ठी में जकड़े पाये गये उस रुक्के के ओरीजिनेटर ही आप थे, ऐसे जान सकते थे । मैं तभी समझ गया था कि सब किया धरा आपका था ।
तब पहली बार वो मुझे बद्हवास दिखाई दिया ।
लेकिन शातिर खिलाड़ी था, फौरन सम्भला ।
“बहरहाल” - मैं बोला - “बात एम्बुलेंस की हो रही थी जिसके लिये काल किसी औरत ने की थी और वो औरत.. .आप थे ।”
“क्या बकते हो !”
“डेढ़ फिकरा फोन पर बोलने के लिये आवाज महीन कर लेना कोई बड़ा करतब नहीं है ।”
“मैं मिमिकरी आर्टिस्ट नहीं हूं ।”
“तो भी एम्बुलेंस के लिये काल आपने की और सिर्फ आपने की । कैसे आप जनाना आवाज निकालने में कामयाब हुए, ये आप ही बेहतर जानते हैं, जैसे ये आप ही बेहतर जानते थे कि आपको एम्बुलेंस की जरूरत पड़ने वाली थी इसलिये जहर खाने से पहले ही आपने एम्बुलेंस के लिये काल लगा दी वर्ना बताइये कि ये क्योंकर हुआ कि इधर जहर आपके पेट में पहुंचा और उधर कोठी के गेट पर एम्बुलेंस पहुंच गयी ? ऐसी जादूगरी क्योंकर मुमकिन हुई ? बकौल आपके काल किसी औरत ने की तो आपके हाउसहोल्ड में कौन सी औरत है जिसने इस काम को अंजाम दिया ?”
“दो मेड हैं ।”
“पढी लिखी ?”
वो खामोश रहा ।
“मेड को होली एंजल की क्या खबर ! उसके फोन नम्बर की क्या खबर ! वो पढ़ी लिखी हैं तो उन्हें मालूम होता कि एम्बुलेंस के लिये काल 102 पर लगाई जाती है - जैसे पुलिस के लिये 100 पर लगाई जाती है, फायर ब्रिगेड के लिये 101 पर लगाई जाती है ।”
अब तक वार्तालाप से निर्लिप्तता दिखाते यादव का सिर सहमति में हिला ।
“लफ्फाजी है ।” - तोशनीवाल बोला - “स्मार्ट टॉक है । जुबानी जमाखर्च की तर्जुमानी सबूत के तौर पर नहीं हो सकती ।”
“मेरे पास सबूत भी है ।”
उसने सकपका कर मेरी तरफ देखा ।
यादव सचेत हुआ ।
“मारवल डिपार्टमेंट स्टोर से चॉकलेट का एक किलो का बॉक्स आपने खरीदा । वहीं से आपने चूहे मारने की दवा की सूरत में स्ट्रिकनिन भी खरीदी । दो आइटम खरीदने के लिये आपको कैशमीमो पर साइन करने पड़े । आपने विष्णु कसाना के साइन किये, नीचे उसका नाम लिखा और फर्जी फोन नम्बर लिखा । ये” - मैंने जेब से फोटो कापी निकालकर उसे दिखाई - “उस कैशमीमो की फोटोकापी है और विष्णु कसाना के दस्तखत की सूरत में आपके हैण्डराइटिंग का नमूना है । इससे कैसे मुकरेंगे ?”
यादव ने फोटोकापी मेरे हाथ से झपट ली ।
“कैसे विष्णु कसाना इस खरीद को अंजाम दे पाया जबकि उसे मरे पांच दिन हो चुके हैं ?”
पहली बार तोशनीवाल लाजवाब हुआ ।
“एक पोलखोल बात और भी है जिसका जिक्र आपको पसंद आयेगा, एंटरटेन करेगा ।”
“और क्या ?”
“स्थापित धारणा ये है कि आपकी मिसेज के कत्ल के लिये कातिल कमंद डाल कर ऊपर चढा और खिड़की के रास्ते भीतर बैडरूम में दाखिल हुआ जहां कि उसने मैडम को शूट किया । उस बैडरूम की एक खिड़की के प्रोजैक्शन पर खुरचे जाने के ताजा निशान मैंने अपनी आंखों से देखे थे जो जाहिर करते थे कि कमंद का हुक वहां टकराया था, वहां अटका था । वो रस्सी जो कमंद लगाने के काम आयी थी, बैडरूम की उस खिड़की के ऐन नीचे घास में पड़ी मिली थी और वो वैसी रस्सी थी जो पर्वतारोही इस्तेमाल करते थे जो कि फिर आपके पार्टनर सुजित त्रेहन और उसके नेपाल प्रवास की तरफ इशारा था । लेकिन ये सब बनाई हुई बातें थीं, जो एक खास स्टेज सैट करने के लिये प्लांट की गयी थी । ये स्थापित करने के लिये प्लांट की गयी थी कि कैसे कातिल ने मौकायवारदात तक अपनी पहुंच बनाई थी ।”
“आई डोंट अंडरस्टैण्ड ।” - तोशनीवाल होंठों में बुदबुदाया ।
यादव के चेहरे पर भी असमंजस के भाव थे ।
“यू विल डू नाओ ।” - मैं बोला - “जनाब, तजुर्बा करके देखा गया था कि कमंद का हुक या तो प्रोजैक्शन पर अटक ही नहीं सकता था, अटक सकता था तो मानव शरीर का भार रस्सी पर पड़ने पर अटका रह नहीं सकता था, उसका प्रोजैक्शन पर से सरक जाना, उस पर से पकड़ छोड़ जाना निश्चित था । अब आप खुद फैसला कीजिये कि कैसे कातिल - आप नहीं तो कोई और - कमंद के सहारे ऊपर चढ़ पाया ?”
“तो और कैसे वो ऊपर पहुंचा ?” - तोशनीवाल के स्वर में एकाएक आवेश का पुट आया, उसकी क्षीण आवाज एकाएक बुलंद हुईं - “ऊपर बैडरूम तक पहुंचने के दो ही रास्ते थे, एक फ्रंट से सीढ़ियों से - जिस पर इंस्पेक्टर साहब कहते हैं कि उनके एक आदमी की मुतवातर निगाह थी - और दूसरा खिड़की से । क्या इसी से साबित नहीं होता कि कमंद के साथ जो तजुर्बा किया गया था उसमें खोट थी, नुक्स था ? कमंद के अलावा और कोई तरीका नहीं था कातिल के पास ऊपर पहुंचने का ।”
“आपका ऐसा खयाल है ?”
“क्यों न हो !”
“हो । बेशक हो । इंस्पेक्टर साहब” - मैं यादव की तरफ घूमा - “यहां मैं आपसे मुखातिब हूं । आपको याद है परसों रात फार्महाउस में आपने कहा था कि बतौर कार ड्राइवर आप केयरटेकर की - अपाहिज की, एक बांह ट्विस्टिड और दूसरी से छोटी होने की वजह से अपाहिज की, उंगलियां मुड़ी और अकड़ी होने की वजह से अपाहिज की - कल्पना कार ड्राइवर के तौर पर नहीं कर सकते थे ?”
“हां ।” - यादव कठिन स्वर में बोला ।
“तो फिर उसी अपाहिज की कमंद डाल कर ऊपर मौकायवारदात की खिड़की तक चढ़ने की कल्पना कैसे कर सकते हो ? रस्सी पर चढ़ना आसान काम है या कार चलाना आसान काम है ?”
यादव का सिर पहले ही सहमति में हिलने लगा ।
“सब बकवास है, लफ्फाजी है ।” - तोशनीवाल पूर्ववत् भड़के स्वर में बोला - “अरे, जो प्रत्यक्ष है, उसको प्रमाण की कहीं जरूरत होती है ! बेशुमार काम हैं जो समझा जाता है कि नहीं किये जा सकते, फिर भी किये जाते हैं । फिर एक अहमतरीन बात को क्योंकर नजरअंदाज कर रहे हैं आप लोग ? अंजना टायलेट में सूली पर टंगी मिली या नहीं मिली ? उसके कत्ल की नौबत क्यों आयी ? क्योंकि लेडीज टायलेट की खिड़की से उसने कातिल को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ते देखा ।”
“नहीं देखा ।”
“वाट नानसेंस !”
“आपकी सिखाई पढ़ाई तोती ने महज ऐसा कहा कि देखा । तोतारटंत की कि उसने एक टेढ़ी बांह वाले को कमंद डाल कर ऊपर चढ़ते देखा ताकि पुनर्स्थापित हो जाता कि कातिल सुजित त्रेहन था । नहीं ?”
उसने जवाब न दिया ।
“अब आप अपनी पहली बात का जवाब सुनिये कि कातिल कैसे सीधे, सरल, स्वाभाविक तरीके से ऊपर मैडम के बैडरूम तक पहुंचा । क्या था सीधा, सरल, स्वाभाविक तरीका ? यही कि वो सीढ़ियां चढ़ता और ऊपर पहुच जाता । ऐन यही किया उसने ।”
“जरूर ! जरूर ! इनविजिबल मैन बन गया !”
“तब किया जब नीचे हाल में उसको देखने वाला कोई नहीं था, जब घर में अभी किसी भी मेहमान का दाखिला नहीं हुआ था । घर का मालिक कैजुअली सीढ़ियां चढ़ा, ऊपर बीवी के बैडरूम में पहुंचा और उसे शूट कर दिया । इत्मीनान से वहां बीवी के पूर्व पति की चिट्ठी और अपने बारे में फाइनल वार्निंग का रुक्का प्लांट किया और जैसे टहलता ऊपर पहुंचा था, वैसे ही टहलता लौट गया ।”
“अरे, तुम पागल तो नहीं हो ! गोली चलने की और श्यामली की चीख की आवाज सबने सुनी थी । मैंने सुनी थी, तुमने सुनी थी, इंस्पेक्टर साहब ने सुनी थी । कैसे मैं. ..मैं ऊपर गोली भी चला रहा था और नीचे सब लोगों के बीच में भी मौजूद था ? कैसे मौजूद था ?”
“क्योंकि जब गोली चलने की आवाज सुनी गयी थी, कत्ल तब नहीं हुआ था, मैंने पहले ही अर्ज किया कि कल उस घड़ी से पहले, काफी पहले तब हुआ था जब नीचे हाल में कातिल की करतूत का कोई गवाह उपलब्ध नहीं था ।”
“तो गोली चलने की आवाज ! चीख की आवाज ।”
“रिकार्डिड थी, जो किसी आटोमैटिक मकैनिज्म के जरिये एक पूर्वनिर्धारित समय पर आन हुई थी और नीचे सुनी गयी थी ।”
“अरे, ऐसी कोई मकैनिज्म, ऐसी कोई रिकार्डिंग डिवाइस श्यामली के कमरे से - इंस्पेक्टर साहब से पूछो - बरामद नहीं हुई थी ।”
“क्योंकि वो वहां नहीं थी...”
“और मैं क्या कह रहा हूं ?”
“क्योंकि उसका वहां होना जरूरी नहीं था । नीचे हाल में मौजूद सब लोगों को बस ये पता चला था कि वो आवाजें ऊपर से आयी थीं, और ऊपर क्योंकि मैडम के सिवाय तब कोई नहीं था इसलिये सहज ही ये सोच लिया गया था कि चीख मैडम की थी और मैडम के बैडरूम से वो आवाजें आयी थीं । हकीकतन वो रिकार्डिंग डिवाइस और उसका आटोमैटिक टाइमबाउंड स्विच आन - आफ ऊपरली मंजिल पर कहीं भी हो सकता था । उस रिकार्डिंग ने कत्ल का गलत वक्त निर्धारित किया और आपको एलीबाई दी कि कत्ल के उस - गलत, फैब्रिकेटिड - वक्त पर आप नीचे हाल में मेहमानों के बीच थे । कत्ल बहुत पहले हो चुका था और उस वक्त की कोई एलीबाई आपके पास होना मुमकिन नहीं ।”
“मैं बाहर था, बाहर बिजी था इसलिये मेहमानों की आमद के वक्त उनको रिसीव करने के लिये घर पर मौजूद नहीं था ।”
“हू नोज ! ये सर्वविदित है कि आपके हाउसहोल्ड के हर मेम्बर के पास मेन डोर की चाबी है । क्या मुश्किल था आपका चुपचाप घर में कदम रखना, ऊपर जा कर बीवी का कत्ल करना, शरारती चिट्ठी और रुक्का प्लांट करना, रिकार्डिंग डिवाइस पहले से ही सैट नहीं थी तो तब सैट करना और जैसे चुपचाप वहां पहुंचे, वैसे चुपचाप वहां से लौट जाना ! ये पहले ही स्थापित है कि घर से अपनी गैरहाजिरी के दौरान केयरटेकर विष्णु कसाना बन के आपने मारवल डिपार्टमेंट स्टोर से चॉकलेट के बॉक्स और जहर की खरीद की ताकि आप अगली सुबह के ड्रामे के लिये स्टेज सैट कर पाते ।”
वो खामोश रहा ।
“अब मैं दूसरी बात पर आता हूं । दूसरी बात ये कि अंजना ने लेडीज टायलेट की खिड़की से कातिल को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ते देखा । इंस्पेक्टर साहब, आप अगर मेरी इस थ्योरी पर एतबार लायें कि मैडम का कत्ल गोली की आवाज और चीख की आवाज सुनाई देने से बहुत पहले हो चुका था तो आपको रस्सी पर चढ़ते कातिल के वजूद को सिरे से नकारना पड़ेगा । कबूल करना पड़ेगा कि अंजना ने न ऐसा कुछ देखा था, न देखा हो सकता था । लेकिन सूली पर झूलती तो वो बराबर पायी गयी थी ! यहां लॉजिक ये कहती है, कॉमन सैंस भी ये कहती है, कि वो ब्लफ था, एक व्यापक स्कीम का हिस्सा था । कैसे था ? सुनिये, कैसे था ! आपने लैवेटरी स्टाल के बंद दरवाजे के भीतर की तरफ अंजना रांका को सूली से लटकते देखा था । तोशनीवाल साहब, आपने भी देखा था । साहबान, गौरतलब बात ये है कि वो फंदे से झूल नहीं रही थी, वो अधर में नहीं लटकी हुई थी, उसके दोनों पैरों के अंगूठे फर्श पर टिके हुए थे । क्या मतलब हुआ इसका ? क्या ये न हुआ कि उसके जिस्म का सारा वजन फंदे पर नहीं था, काफी सारा पांव सम्भाले थे । किसी को फांसी देने का ये कौन सा तरीका हुआ ? क्यों न आततायी ने सुनिश्चित किया कि वो बाकायदा सूली पर झूल रही थी ? जवाब ये है कि फांसी देने वाला कोई था ही नहीं, फांसी हुई ही नहीं थी । वो तमाम इंतजाम अंजना रांका ने खुद किया था । क्योंकि वो इनकी” - मैंने इलजाम लगाती उंगली तोशनीवाल की तरफ उठाई - “जोड़ीदार थी, अकम्पलिस थी । फांसी का वो ड्रामा इसलिये रचा गया था ताकि इस बात को बल मिलता कि कातिल कमंद डालकर ऊपर मैडम के बैडरूम तक पहुंचा था और फिर, फिर, फिर ये बात स्थापित होती कि सुजित त्रेहन का वजूद था ।”
“लेकिन सूली पर टंगी तो वो बराबर मिली !” - यादव ने एतराज उठाया - “हम वक्त रहते न पहुंच गये होते तो वो तो गयी थी जान से ! क्यों उसने जान का खतरा उठाया ?”
“कोई खतरा न उठाया, क्योंकि लोग लैवेटरी के बाहर पहुंच गये थे, ये सुनिश्चित कर लेने के बाद ही उसने तैयारशुदा फांसी का फंदा अपने गले में डाला था और सांस रोक कर यूं उस पर झूल गयी थी कि जिस्म का काफी सारा भार फर्श छूते अंगूठों पर होता ।”
“हम बाहर पहुंचे होने के बावजूद लैवेटरी की तरफ तवज्जो देने में वक्त लगा देते तो ?”
“तो फंदा वो गले से निकाल लेती । जब लैवेटरी के दरवाजे पर हलचल पाती तो फिर डाल लेती ।”
“हूं । तो वो लड़की इनके साथ जुर्म में शरीक थी ?”
“हर जुर्म में शरीक थी । एक जुर्म तो किया ही उसने था क्योंकि उसकी एग्जीक्यूशन ही ऐसी थी कि वो ही उसे कर सकती थी । तोशनीवाल साहब थिएट्रिकल मेकअप के कितने भी बड़े ग्रैंडमास्टर क्यो न हो अपनी बीवी का बहुरूप नहीं धारण कर सकते थे । क्योंकि इनकी कोई भी दक्षता इनका कद पौने छ: फुट नहीं बना सकती थी जो कि श्यामली तोशनीवाल मरहूम का था ।”
“तुम ये कहना चाहते हो कि सिद्धार्थ एन्क्लेव इनकी बीवी नहीं पहुंची थी, बीवी के मेकअप में वो लड़की अंजना रांका पहुंची थी ?”
“बिल्कुल ! इनके हुक्म पर खुद को सूली पर टांगने का ड्रामा उसने किया था या नहीं किया था ! इनके हुक्म पर जब वो एक खतरनाक काम कर सकती थी तो दूसरा क्यों नहीं कर सकती थी ! यादव साहब, ये न भूलो कि उस लड़की के सामने, एक मामूली शो गर्ल के सामने, बहुत बड़ा बेट था कि वो एक मल्टीमिलियनेयर की बीवी बन सकती थी । इस लिहाज से सपना टाहिलियानी का कत्ल करके उसने इनका काम थोड़े ही किया, अपना काम किया ।”
“शक्लें नहीं मिलती ?”
“मिलना जरूरी कहां था ! सिद्धार्थ एन्क्लेव में सपना के रेजीडेंशल काम्प्लेक्स के गार्ड ने सुबह सबेरे के विजिटर की शिनाख्त शक्ल से थोड़े ही की थी, फेमिनिन डेकोरेशन से की थी, हीरे जवाहरात से की थी जो वो पहने थी, खास तौर से बकौल खुद तुम्हारे, रसभरी के साइज की हीरे की अंगूठी से की थी । गलत कहा मैंने ?”
यादव ने इंकार में सिर हिलाया ।
“और वो डिस्टिंक्टिव ज्वेलरी, वो खास शिनाख्त वाले जेवरात या ऐन वैसे जेवरात अंजना रांका को कौन मुहैया करा सकता था ?”
“ठीक ! तो सपना टाहिलियानी का कत्ल उस लड़की अंजना रांका ने किया ?”
“जो कि साहब की करंट माशूक है ।”
“वहां की तलाशी भी उसी ने ली, तलाशी में बुरा हाल उसी ने किया ?”
“जाहिर है । तुम जानते हो वो कोई पौना घंटा वहां ठहरी थी । और क्या किया होगा इतना अरसा उसने वहां !”
“यानी तुम्हारी बात सही थी वो तलाशी किसी अनाड़ी का, किसी नौसिखिये का काम था ।”
“अंजना रांका को इन बातों का क्या तजुर्बा होता ?”
“हाथ तो कुछ न आया !”
“वो भी जाहिर है । तभी तो उन्होंने वो दो जमूरे - उस्ताद और शागिर्द - मेरी तलाशी के लिये मेरे फ्लैट पर भेजे...”
“दैट्स टू मच !” - तोशनीवाल फिर भड़का - “तुम समझते हो तुम कुछ भी मेरे पर थोप सकते हो।”
“जनाब, मैं साबित कर सकता हूं वो दोनों जमूरे आपके हायर्ड हैण्ड्स थे और उन्होंने आपकी और भी खिदमात की थी ।”
“करो ।”
“एक की - उस्ताद की, जिसका नाम बृजलाल था - तसवीर मैंने अभी आपको दिखाई थी, दूसरा - शागिर्द, रोशन रामपुरी” - मैंने उसे दूसरी तसवीर दिखाई - “ये है जिसने कि आपके हुक्म पर बुके और चॉकलेट का बॉक्स डिलीवर किया था ।”
“नानसैंस ।”
“उसकी बाकायदा शिनाख्त हुई है ।”
“लेकिन मेरे हुक्म पर !”
“पकड़ा जायेगा तो कुबूल करेगा न ! वो नोन क्रिमिनल है, उसका उस्ताद भी नोन क्रिमिनल है, दोनों का पकड़ा जाना महज वक्त की बात है । फिर जब वो अपनी जुबानी कुबूल करेंगे कि वो आपके लिये काम कर रहे थे तो आपकी क्या पोजीशन होगी, जनाब ?”
उसने जवाब न दिया ।
“कत्ल आपके लिए कोई नया कारोबार नहीं ।” - मैं आगे बढ़ा - “जो खूनी खेल परसों शाम से शुरू हुआ, उससे पहले भी आप खून से अपने हाथ रंग चुके थे ।”
“प-पहले भी !”
“बिल्कुल ! अंजना से इश्क का जूनून आप पर कोई परसों हावी नहीं हुआ था । उस जुनून का ही सदका था कि कत्ल का तजुर्बा आपको पहले - बहुत पहले, दो साल पहले - हो चुका था । जनाब, मेरा दो साल पहले के एक वाकये पर जोर है इसलिये मैं उस कत्ल का जिक्र नहीं कर रहा हूं जिसे आपने बाइस साल पहले अंजाम दिया था । आपका कत्ल का ही तजुर्बा पुराना नहीं, जहर का भी तजुर्बा पुराना है । तकरीबन दो साल पहले शुरू हुई अंजना से आपकी आशनाई की बुनियाद भी यूं समझिये कि एक कुर्बानी के बकरे की लाश पर टिकी थी । उस बकरे का नाम जगताप खेरा था । वो तब की - तीन साल पहले की - घुंघरू-दि नौटंकी किंगडम का मेल डांसर था जहां कि अंजना रांका उर्फ मोहना सावंत तब नौटंकी डांसर थी । तब अंजना का उस मेल डांसर से अफेयर था जिसमें आप जा दखलअंदाज हुए थे । उस दखलअंदाजी की चरम सीमा तब पहुंची थी जबकि एक रोज मेल डांसर अपने घर में मरा पड़ा पाया गया था । तब आपकी तरफ उंगली भी उठी थी लेकिन तब पुलिस की आप सरीखे बड़े आदमी पर हाथ डालने की मजाल नहीं हुई थी । नतीजतन जगताप खेरा के जहर से हुए कत्ल के केस को ख़ुदकुशी का केस बताकर ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया था । अंजना रांका यकीनन कत्ल की हकीकत से वाकिफ रही होगी लेकिन उसने इसलिये मुंह न खोला क्योंकि वो मुंह खोलती तो एक मल्टीमिलिनेयर के दिलोजान की जीनत बनने का मौका गंवा बैठती । मिस्टर मनीबैग्स की माशूक बनने का मौका एक मामूली नौटंकी डांसर को कोई रोज रोज हासिल नहीं होता । लिहाजा अपनी महत्वाकांक्षाओं के शिखर पर पहुंचने के लिये उसे जगताप खेरा जैसे नोबॉडी की कुर्बानी क़ुबूल थी । जनाब, तोशनीवाल साहब, वो स्ट्रिकनिन के साथ आपका पहला तजुर्बा था ?”
“सब जुबानी जमाखर्च है ।”
“चलिये, ऐसे ही सही । अब मैं सपना टाहिलियानी के कत्ल पर आता हूं जो कि पिछले पांच साल से आपको ब्लैकमेल कर रही थी और यही बात उसके कत्ल की वजह बनी थी ।”
“ब्लैकमेल कर रही थी ! क्यों ?”
“क्योंकि वो इस हकीकत से वाकिफ थी कि आपका पार्टनर सुजित त्रेहन नेपाल में हादसे से नहीं मरा था, उसका कत्ल हुआ था और वो कत्ल - डेलीब्रेट, कोल्डब्लडीड मर्डर - आपने किया था ।”
“बकवास !”
“उसके पास सबूत था जो कि ब्लैकमेल की बुनियाद था और जो अब मेरे पास भी है ।”
“क्या !”
“एक फिल्म क्लिप की सूरत में है वो सबूत जिसमें आप अपने पार्टनर सुजित त्रेहन को कोंटी टॉप नामक पर्वत शिखर से धक्का देते साफ दर्शाये गये हैं । ये” - मैंने जेब से सीडी निकाली - “ओरिजिनल फिल्म क्लिप की एक डुप्लीकेट कॉपी है जो मैं इंस्पेक्टर साहब को सौंपता हूं ।”
तब पहली बार तोशनीवाल बद्हवास दिखाई दिया ।
“क्या बोला ?”
“नीचे ड्राईंग रूम में जब आप इंस्पेक्टर साहब की क्लास ले रहे थे, इन्हें फटकार रहे थे कि वारदात इनकी अलगर्जी से हुई थी तो आपने गॉड को याद करते फरमाया था कि अब वो कहता है अगला और आखिरी नम्बर मेरा है । आपको क्या पता कि कातिल क्या कहता था ? तब तक रुक्का तो आपने देखा नहीं था ! जैसे वारदात वाकया हो रही थी, उनकी रू में ये तो आप कह सकते थे कि अगला नम्बर आपका था लेकिन ये कैसे कह सकते थे, कैसे जान सकते थे कि अगला और आखिरी नम्बर आपका था ? और ऐसा आपने एक ही बार नहीं, दो बार कहा । जनाब, क्या बताने की जरूरत है कि कैसे जान सकते थे ? मैडम की मुट्ठी में जकड़े पाये गये उस रुक्के के ओरीजिनेटर ही आप थे, ऐसे जान सकते थे । मैं तभी समझ गया था कि सब किया धरा आपका था ।
तब पहली बार वो मुझे बद्हवास दिखाई दिया ।
लेकिन शातिर खिलाड़ी था, फौरन सम्भला ।
“बहरहाल” - मैं बोला - “बात एम्बुलेंस की हो रही थी जिसके लिये काल किसी औरत ने की थी और वो औरत.. .आप थे ।”
“क्या बकते हो !”
“डेढ़ फिकरा फोन पर बोलने के लिये आवाज महीन कर लेना कोई बड़ा करतब नहीं है ।”
“मैं मिमिकरी आर्टिस्ट नहीं हूं ।”
“तो भी एम्बुलेंस के लिये काल आपने की और सिर्फ आपने की । कैसे आप जनाना आवाज निकालने में कामयाब हुए, ये आप ही बेहतर जानते हैं, जैसे ये आप ही बेहतर जानते थे कि आपको एम्बुलेंस की जरूरत पड़ने वाली थी इसलिये जहर खाने से पहले ही आपने एम्बुलेंस के लिये काल लगा दी वर्ना बताइये कि ये क्योंकर हुआ कि इधर जहर आपके पेट में पहुंचा और उधर कोठी के गेट पर एम्बुलेंस पहुंच गयी ? ऐसी जादूगरी क्योंकर मुमकिन हुई ? बकौल आपके काल किसी औरत ने की तो आपके हाउसहोल्ड में कौन सी औरत है जिसने इस काम को अंजाम दिया ?”
“दो मेड हैं ।”
“पढी लिखी ?”
वो खामोश रहा ।
“मेड को होली एंजल की क्या खबर ! उसके फोन नम्बर की क्या खबर ! वो पढ़ी लिखी हैं तो उन्हें मालूम होता कि एम्बुलेंस के लिये काल 102 पर लगाई जाती है - जैसे पुलिस के लिये 100 पर लगाई जाती है, फायर ब्रिगेड के लिये 101 पर लगाई जाती है ।”
अब तक वार्तालाप से निर्लिप्तता दिखाते यादव का सिर सहमति में हिला ।
“लफ्फाजी है ।” - तोशनीवाल बोला - “स्मार्ट टॉक है । जुबानी जमाखर्च की तर्जुमानी सबूत के तौर पर नहीं हो सकती ।”
“मेरे पास सबूत भी है ।”
उसने सकपका कर मेरी तरफ देखा ।
यादव सचेत हुआ ।
“मारवल डिपार्टमेंट स्टोर से चॉकलेट का एक किलो का बॉक्स आपने खरीदा । वहीं से आपने चूहे मारने की दवा की सूरत में स्ट्रिकनिन भी खरीदी । दो आइटम खरीदने के लिये आपको कैशमीमो पर साइन करने पड़े । आपने विष्णु कसाना के साइन किये, नीचे उसका नाम लिखा और फर्जी फोन नम्बर लिखा । ये” - मैंने जेब से फोटो कापी निकालकर उसे दिखाई - “उस कैशमीमो की फोटोकापी है और विष्णु कसाना के दस्तखत की सूरत में आपके हैण्डराइटिंग का नमूना है । इससे कैसे मुकरेंगे ?”
यादव ने फोटोकापी मेरे हाथ से झपट ली ।
“कैसे विष्णु कसाना इस खरीद को अंजाम दे पाया जबकि उसे मरे पांच दिन हो चुके हैं ?”
पहली बार तोशनीवाल लाजवाब हुआ ।
“एक पोलखोल बात और भी है जिसका जिक्र आपको पसंद आयेगा, एंटरटेन करेगा ।”
“और क्या ?”
“स्थापित धारणा ये है कि आपकी मिसेज के कत्ल के लिये कातिल कमंद डाल कर ऊपर चढा और खिड़की के रास्ते भीतर बैडरूम में दाखिल हुआ जहां कि उसने मैडम को शूट किया । उस बैडरूम की एक खिड़की के प्रोजैक्शन पर खुरचे जाने के ताजा निशान मैंने अपनी आंखों से देखे थे जो जाहिर करते थे कि कमंद का हुक वहां टकराया था, वहां अटका था । वो रस्सी जो कमंद लगाने के काम आयी थी, बैडरूम की उस खिड़की के ऐन नीचे घास में पड़ी मिली थी और वो वैसी रस्सी थी जो पर्वतारोही इस्तेमाल करते थे जो कि फिर आपके पार्टनर सुजित त्रेहन और उसके नेपाल प्रवास की तरफ इशारा था । लेकिन ये सब बनाई हुई बातें थीं, जो एक खास स्टेज सैट करने के लिये प्लांट की गयी थी । ये स्थापित करने के लिये प्लांट की गयी थी कि कैसे कातिल ने मौकायवारदात तक अपनी पहुंच बनाई थी ।”
“आई डोंट अंडरस्टैण्ड ।” - तोशनीवाल होंठों में बुदबुदाया ।
यादव के चेहरे पर भी असमंजस के भाव थे ।
“यू विल डू नाओ ।” - मैं बोला - “जनाब, तजुर्बा करके देखा गया था कि कमंद का हुक या तो प्रोजैक्शन पर अटक ही नहीं सकता था, अटक सकता था तो मानव शरीर का भार रस्सी पर पड़ने पर अटका रह नहीं सकता था, उसका प्रोजैक्शन पर से सरक जाना, उस पर से पकड़ छोड़ जाना निश्चित था । अब आप खुद फैसला कीजिये कि कैसे कातिल - आप नहीं तो कोई और - कमंद के सहारे ऊपर चढ़ पाया ?”
“तो और कैसे वो ऊपर पहुंचा ?” - तोशनीवाल के स्वर में एकाएक आवेश का पुट आया, उसकी क्षीण आवाज एकाएक बुलंद हुईं - “ऊपर बैडरूम तक पहुंचने के दो ही रास्ते थे, एक फ्रंट से सीढ़ियों से - जिस पर इंस्पेक्टर साहब कहते हैं कि उनके एक आदमी की मुतवातर निगाह थी - और दूसरा खिड़की से । क्या इसी से साबित नहीं होता कि कमंद के साथ जो तजुर्बा किया गया था उसमें खोट थी, नुक्स था ? कमंद के अलावा और कोई तरीका नहीं था कातिल के पास ऊपर पहुंचने का ।”
“आपका ऐसा खयाल है ?”
“क्यों न हो !”
“हो । बेशक हो । इंस्पेक्टर साहब” - मैं यादव की तरफ घूमा - “यहां मैं आपसे मुखातिब हूं । आपको याद है परसों रात फार्महाउस में आपने कहा था कि बतौर कार ड्राइवर आप केयरटेकर की - अपाहिज की, एक बांह ट्विस्टिड और दूसरी से छोटी होने की वजह से अपाहिज की, उंगलियां मुड़ी और अकड़ी होने की वजह से अपाहिज की - कल्पना कार ड्राइवर के तौर पर नहीं कर सकते थे ?”
“हां ।” - यादव कठिन स्वर में बोला ।
“तो फिर उसी अपाहिज की कमंद डाल कर ऊपर मौकायवारदात की खिड़की तक चढ़ने की कल्पना कैसे कर सकते हो ? रस्सी पर चढ़ना आसान काम है या कार चलाना आसान काम है ?”
यादव का सिर पहले ही सहमति में हिलने लगा ।
“सब बकवास है, लफ्फाजी है ।” - तोशनीवाल पूर्ववत् भड़के स्वर में बोला - “अरे, जो प्रत्यक्ष है, उसको प्रमाण की कहीं जरूरत होती है ! बेशुमार काम हैं जो समझा जाता है कि नहीं किये जा सकते, फिर भी किये जाते हैं । फिर एक अहमतरीन बात को क्योंकर नजरअंदाज कर रहे हैं आप लोग ? अंजना टायलेट में सूली पर टंगी मिली या नहीं मिली ? उसके कत्ल की नौबत क्यों आयी ? क्योंकि लेडीज टायलेट की खिड़की से उसने कातिल को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ते देखा ।”
“नहीं देखा ।”
“वाट नानसेंस !”
“आपकी सिखाई पढ़ाई तोती ने महज ऐसा कहा कि देखा । तोतारटंत की कि उसने एक टेढ़ी बांह वाले को कमंद डाल कर ऊपर चढ़ते देखा ताकि पुनर्स्थापित हो जाता कि कातिल सुजित त्रेहन था । नहीं ?”
उसने जवाब न दिया ।
“अब आप अपनी पहली बात का जवाब सुनिये कि कातिल कैसे सीधे, सरल, स्वाभाविक तरीके से ऊपर मैडम के बैडरूम तक पहुंचा । क्या था सीधा, सरल, स्वाभाविक तरीका ? यही कि वो सीढ़ियां चढ़ता और ऊपर पहुच जाता । ऐन यही किया उसने ।”
“जरूर ! जरूर ! इनविजिबल मैन बन गया !”
“तब किया जब नीचे हाल में उसको देखने वाला कोई नहीं था, जब घर में अभी किसी भी मेहमान का दाखिला नहीं हुआ था । घर का मालिक कैजुअली सीढ़ियां चढ़ा, ऊपर बीवी के बैडरूम में पहुंचा और उसे शूट कर दिया । इत्मीनान से वहां बीवी के पूर्व पति की चिट्ठी और अपने बारे में फाइनल वार्निंग का रुक्का प्लांट किया और जैसे टहलता ऊपर पहुंचा था, वैसे ही टहलता लौट गया ।”
“अरे, तुम पागल तो नहीं हो ! गोली चलने की और श्यामली की चीख की आवाज सबने सुनी थी । मैंने सुनी थी, तुमने सुनी थी, इंस्पेक्टर साहब ने सुनी थी । कैसे मैं. ..मैं ऊपर गोली भी चला रहा था और नीचे सब लोगों के बीच में भी मौजूद था ? कैसे मौजूद था ?”
“क्योंकि जब गोली चलने की आवाज सुनी गयी थी, कत्ल तब नहीं हुआ था, मैंने पहले ही अर्ज किया कि कल उस घड़ी से पहले, काफी पहले तब हुआ था जब नीचे हाल में कातिल की करतूत का कोई गवाह उपलब्ध नहीं था ।”
“तो गोली चलने की आवाज ! चीख की आवाज ।”
“रिकार्डिड थी, जो किसी आटोमैटिक मकैनिज्म के जरिये एक पूर्वनिर्धारित समय पर आन हुई थी और नीचे सुनी गयी थी ।”
“अरे, ऐसी कोई मकैनिज्म, ऐसी कोई रिकार्डिंग डिवाइस श्यामली के कमरे से - इंस्पेक्टर साहब से पूछो - बरामद नहीं हुई थी ।”
“क्योंकि वो वहां नहीं थी...”
“और मैं क्या कह रहा हूं ?”
“क्योंकि उसका वहां होना जरूरी नहीं था । नीचे हाल में मौजूद सब लोगों को बस ये पता चला था कि वो आवाजें ऊपर से आयी थीं, और ऊपर क्योंकि मैडम के सिवाय तब कोई नहीं था इसलिये सहज ही ये सोच लिया गया था कि चीख मैडम की थी और मैडम के बैडरूम से वो आवाजें आयी थीं । हकीकतन वो रिकार्डिंग डिवाइस और उसका आटोमैटिक टाइमबाउंड स्विच आन - आफ ऊपरली मंजिल पर कहीं भी हो सकता था । उस रिकार्डिंग ने कत्ल का गलत वक्त निर्धारित किया और आपको एलीबाई दी कि कत्ल के उस - गलत, फैब्रिकेटिड - वक्त पर आप नीचे हाल में मेहमानों के बीच थे । कत्ल बहुत पहले हो चुका था और उस वक्त की कोई एलीबाई आपके पास होना मुमकिन नहीं ।”
“मैं बाहर था, बाहर बिजी था इसलिये मेहमानों की आमद के वक्त उनको रिसीव करने के लिये घर पर मौजूद नहीं था ।”
“हू नोज ! ये सर्वविदित है कि आपके हाउसहोल्ड के हर मेम्बर के पास मेन डोर की चाबी है । क्या मुश्किल था आपका चुपचाप घर में कदम रखना, ऊपर जा कर बीवी का कत्ल करना, शरारती चिट्ठी और रुक्का प्लांट करना, रिकार्डिंग डिवाइस पहले से ही सैट नहीं थी तो तब सैट करना और जैसे चुपचाप वहां पहुंचे, वैसे चुपचाप वहां से लौट जाना ! ये पहले ही स्थापित है कि घर से अपनी गैरहाजिरी के दौरान केयरटेकर विष्णु कसाना बन के आपने मारवल डिपार्टमेंट स्टोर से चॉकलेट के बॉक्स और जहर की खरीद की ताकि आप अगली सुबह के ड्रामे के लिये स्टेज सैट कर पाते ।”
वो खामोश रहा ।
“अब मैं दूसरी बात पर आता हूं । दूसरी बात ये कि अंजना ने लेडीज टायलेट की खिड़की से कातिल को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ते देखा । इंस्पेक्टर साहब, आप अगर मेरी इस थ्योरी पर एतबार लायें कि मैडम का कत्ल गोली की आवाज और चीख की आवाज सुनाई देने से बहुत पहले हो चुका था तो आपको रस्सी पर चढ़ते कातिल के वजूद को सिरे से नकारना पड़ेगा । कबूल करना पड़ेगा कि अंजना ने न ऐसा कुछ देखा था, न देखा हो सकता था । लेकिन सूली पर झूलती तो वो बराबर पायी गयी थी ! यहां लॉजिक ये कहती है, कॉमन सैंस भी ये कहती है, कि वो ब्लफ था, एक व्यापक स्कीम का हिस्सा था । कैसे था ? सुनिये, कैसे था ! आपने लैवेटरी स्टाल के बंद दरवाजे के भीतर की तरफ अंजना रांका को सूली से लटकते देखा था । तोशनीवाल साहब, आपने भी देखा था । साहबान, गौरतलब बात ये है कि वो फंदे से झूल नहीं रही थी, वो अधर में नहीं लटकी हुई थी, उसके दोनों पैरों के अंगूठे फर्श पर टिके हुए थे । क्या मतलब हुआ इसका ? क्या ये न हुआ कि उसके जिस्म का सारा वजन फंदे पर नहीं था, काफी सारा पांव सम्भाले थे । किसी को फांसी देने का ये कौन सा तरीका हुआ ? क्यों न आततायी ने सुनिश्चित किया कि वो बाकायदा सूली पर झूल रही थी ? जवाब ये है कि फांसी देने वाला कोई था ही नहीं, फांसी हुई ही नहीं थी । वो तमाम इंतजाम अंजना रांका ने खुद किया था । क्योंकि वो इनकी” - मैंने इलजाम लगाती उंगली तोशनीवाल की तरफ उठाई - “जोड़ीदार थी, अकम्पलिस थी । फांसी का वो ड्रामा इसलिये रचा गया था ताकि इस बात को बल मिलता कि कातिल कमंद डालकर ऊपर मैडम के बैडरूम तक पहुंचा था और फिर, फिर, फिर ये बात स्थापित होती कि सुजित त्रेहन का वजूद था ।”
“लेकिन सूली पर टंगी तो वो बराबर मिली !” - यादव ने एतराज उठाया - “हम वक्त रहते न पहुंच गये होते तो वो तो गयी थी जान से ! क्यों उसने जान का खतरा उठाया ?”
“कोई खतरा न उठाया, क्योंकि लोग लैवेटरी के बाहर पहुंच गये थे, ये सुनिश्चित कर लेने के बाद ही उसने तैयारशुदा फांसी का फंदा अपने गले में डाला था और सांस रोक कर यूं उस पर झूल गयी थी कि जिस्म का काफी सारा भार फर्श छूते अंगूठों पर होता ।”
“हम बाहर पहुंचे होने के बावजूद लैवेटरी की तरफ तवज्जो देने में वक्त लगा देते तो ?”
“तो फंदा वो गले से निकाल लेती । जब लैवेटरी के दरवाजे पर हलचल पाती तो फिर डाल लेती ।”
“हूं । तो वो लड़की इनके साथ जुर्म में शरीक थी ?”
“हर जुर्म में शरीक थी । एक जुर्म तो किया ही उसने था क्योंकि उसकी एग्जीक्यूशन ही ऐसी थी कि वो ही उसे कर सकती थी । तोशनीवाल साहब थिएट्रिकल मेकअप के कितने भी बड़े ग्रैंडमास्टर क्यो न हो अपनी बीवी का बहुरूप नहीं धारण कर सकते थे । क्योंकि इनकी कोई भी दक्षता इनका कद पौने छ: फुट नहीं बना सकती थी जो कि श्यामली तोशनीवाल मरहूम का था ।”
“तुम ये कहना चाहते हो कि सिद्धार्थ एन्क्लेव इनकी बीवी नहीं पहुंची थी, बीवी के मेकअप में वो लड़की अंजना रांका पहुंची थी ?”
“बिल्कुल ! इनके हुक्म पर खुद को सूली पर टांगने का ड्रामा उसने किया था या नहीं किया था ! इनके हुक्म पर जब वो एक खतरनाक काम कर सकती थी तो दूसरा क्यों नहीं कर सकती थी ! यादव साहब, ये न भूलो कि उस लड़की के सामने, एक मामूली शो गर्ल के सामने, बहुत बड़ा बेट था कि वो एक मल्टीमिलियनेयर की बीवी बन सकती थी । इस लिहाज से सपना टाहिलियानी का कत्ल करके उसने इनका काम थोड़े ही किया, अपना काम किया ।”
“शक्लें नहीं मिलती ?”
“मिलना जरूरी कहां था ! सिद्धार्थ एन्क्लेव में सपना के रेजीडेंशल काम्प्लेक्स के गार्ड ने सुबह सबेरे के विजिटर की शिनाख्त शक्ल से थोड़े ही की थी, फेमिनिन डेकोरेशन से की थी, हीरे जवाहरात से की थी जो वो पहने थी, खास तौर से बकौल खुद तुम्हारे, रसभरी के साइज की हीरे की अंगूठी से की थी । गलत कहा मैंने ?”
यादव ने इंकार में सिर हिलाया ।
“और वो डिस्टिंक्टिव ज्वेलरी, वो खास शिनाख्त वाले जेवरात या ऐन वैसे जेवरात अंजना रांका को कौन मुहैया करा सकता था ?”
“ठीक ! तो सपना टाहिलियानी का कत्ल उस लड़की अंजना रांका ने किया ?”
“जो कि साहब की करंट माशूक है ।”
“वहां की तलाशी भी उसी ने ली, तलाशी में बुरा हाल उसी ने किया ?”
“जाहिर है । तुम जानते हो वो कोई पौना घंटा वहां ठहरी थी । और क्या किया होगा इतना अरसा उसने वहां !”
“यानी तुम्हारी बात सही थी वो तलाशी किसी अनाड़ी का, किसी नौसिखिये का काम था ।”
“अंजना रांका को इन बातों का क्या तजुर्बा होता ?”
“हाथ तो कुछ न आया !”
“वो भी जाहिर है । तभी तो उन्होंने वो दो जमूरे - उस्ताद और शागिर्द - मेरी तलाशी के लिये मेरे फ्लैट पर भेजे...”
“दैट्स टू मच !” - तोशनीवाल फिर भड़का - “तुम समझते हो तुम कुछ भी मेरे पर थोप सकते हो।”
“जनाब, मैं साबित कर सकता हूं वो दोनों जमूरे आपके हायर्ड हैण्ड्स थे और उन्होंने आपकी और भी खिदमात की थी ।”
“करो ।”
“एक की - उस्ताद की, जिसका नाम बृजलाल था - तसवीर मैंने अभी आपको दिखाई थी, दूसरा - शागिर्द, रोशन रामपुरी” - मैंने उसे दूसरी तसवीर दिखाई - “ये है जिसने कि आपके हुक्म पर बुके और चॉकलेट का बॉक्स डिलीवर किया था ।”
“नानसैंस ।”
“उसकी बाकायदा शिनाख्त हुई है ।”
“लेकिन मेरे हुक्म पर !”
“पकड़ा जायेगा तो कुबूल करेगा न ! वो नोन क्रिमिनल है, उसका उस्ताद भी नोन क्रिमिनल है, दोनों का पकड़ा जाना महज वक्त की बात है । फिर जब वो अपनी जुबानी कुबूल करेंगे कि वो आपके लिये काम कर रहे थे तो आपकी क्या पोजीशन होगी, जनाब ?”
उसने जवाब न दिया ।
“कत्ल आपके लिए कोई नया कारोबार नहीं ।” - मैं आगे बढ़ा - “जो खूनी खेल परसों शाम से शुरू हुआ, उससे पहले भी आप खून से अपने हाथ रंग चुके थे ।”
“प-पहले भी !”
“बिल्कुल ! अंजना से इश्क का जूनून आप पर कोई परसों हावी नहीं हुआ था । उस जुनून का ही सदका था कि कत्ल का तजुर्बा आपको पहले - बहुत पहले, दो साल पहले - हो चुका था । जनाब, मेरा दो साल पहले के एक वाकये पर जोर है इसलिये मैं उस कत्ल का जिक्र नहीं कर रहा हूं जिसे आपने बाइस साल पहले अंजाम दिया था । आपका कत्ल का ही तजुर्बा पुराना नहीं, जहर का भी तजुर्बा पुराना है । तकरीबन दो साल पहले शुरू हुई अंजना से आपकी आशनाई की बुनियाद भी यूं समझिये कि एक कुर्बानी के बकरे की लाश पर टिकी थी । उस बकरे का नाम जगताप खेरा था । वो तब की - तीन साल पहले की - घुंघरू-दि नौटंकी किंगडम का मेल डांसर था जहां कि अंजना रांका उर्फ मोहना सावंत तब नौटंकी डांसर थी । तब अंजना का उस मेल डांसर से अफेयर था जिसमें आप जा दखलअंदाज हुए थे । उस दखलअंदाजी की चरम सीमा तब पहुंची थी जबकि एक रोज मेल डांसर अपने घर में मरा पड़ा पाया गया था । तब आपकी तरफ उंगली भी उठी थी लेकिन तब पुलिस की आप सरीखे बड़े आदमी पर हाथ डालने की मजाल नहीं हुई थी । नतीजतन जगताप खेरा के जहर से हुए कत्ल के केस को ख़ुदकुशी का केस बताकर ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया था । अंजना रांका यकीनन कत्ल की हकीकत से वाकिफ रही होगी लेकिन उसने इसलिये मुंह न खोला क्योंकि वो मुंह खोलती तो एक मल्टीमिलिनेयर के दिलोजान की जीनत बनने का मौका गंवा बैठती । मिस्टर मनीबैग्स की माशूक बनने का मौका एक मामूली नौटंकी डांसर को कोई रोज रोज हासिल नहीं होता । लिहाजा अपनी महत्वाकांक्षाओं के शिखर पर पहुंचने के लिये उसे जगताप खेरा जैसे नोबॉडी की कुर्बानी क़ुबूल थी । जनाब, तोशनीवाल साहब, वो स्ट्रिकनिन के साथ आपका पहला तजुर्बा था ?”
“सब जुबानी जमाखर्च है ।”
“चलिये, ऐसे ही सही । अब मैं सपना टाहिलियानी के कत्ल पर आता हूं जो कि पिछले पांच साल से आपको ब्लैकमेल कर रही थी और यही बात उसके कत्ल की वजह बनी थी ।”
“ब्लैकमेल कर रही थी ! क्यों ?”
“क्योंकि वो इस हकीकत से वाकिफ थी कि आपका पार्टनर सुजित त्रेहन नेपाल में हादसे से नहीं मरा था, उसका कत्ल हुआ था और वो कत्ल - डेलीब्रेट, कोल्डब्लडीड मर्डर - आपने किया था ।”
“बकवास !”
“उसके पास सबूत था जो कि ब्लैकमेल की बुनियाद था और जो अब मेरे पास भी है ।”
“क्या !”
“एक फिल्म क्लिप की सूरत में है वो सबूत जिसमें आप अपने पार्टनर सुजित त्रेहन को कोंटी टॉप नामक पर्वत शिखर से धक्का देते साफ दर्शाये गये हैं । ये” - मैंने जेब से सीडी निकाली - “ओरिजिनल फिल्म क्लिप की एक डुप्लीकेट कॉपी है जो मैं इंस्पेक्टर साहब को सौंपता हूं ।”
तब पहली बार तोशनीवाल बद्हवास दिखाई दिया ।