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Thriller बारूद का ढेर

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' किसका मैसेज है ?'

'पार्टी हाईकमान का।'

'पार्टी हाईकमान का।'

' हां। प्लीज...शीघ्रता करें, यदि आपने देर की तो हाईकमान को मैं जवाब न दे सकूँगा।'

सैक्रेटरी ने देखा।

लिफाफे पर लाल स्याही से अर्जेट लिया था। नीचे दुग्गल का नाम।

पार्टी हाईकमान के नाम पर सैक्रेटरी घबराया हुआ सीढ़ियां चढ़कर मंच पर जा पहुंचा।

दुग्गल का भाषण आरंभ हो चुका था।

फिर भी सैक्रेटरी ने लिफाफा माइकी के पीछे रखे स्टैंड पर रख दिया। जिस पर दोनों हाथ टिकाए

दुग्गल भाषण दे रहा था।

' सर ... हाईकमान का इम्पोर्टेट मैसेज है।' पीछे हटता हुआ वह धीमे स्वर में बोला।'

दुग्गल ने अपना भाषण जारी रखते हुए धीरे-से लिफाफा उठाकर फाड़ाऔर अन्दर रखी स्लिप निकालकर डेस्की पर रख ली वह जल्दबाजी में कोई काम नहीं कर रहा था।

उसके भाषण का सिलसिला बना हुआ था। वह उस सिलसिले को तोड ना नहीं चाहता था।

स्लिप पर उसकी फिसलती हुई-सी नजर पड़ रही थी। उस पर लिखे शब्दों पर उसकी नजर ठहर नहीं पा रही थी।

फिर उसके भाषण के दौरान तालियों की गूंज उमड़ पड़ी।

उसने जनता के लिए किसी सुखद सूचना का ऐलान किया था।

तालियों के लम्बे सिलसिले के दौरान उसने स्लिप में लिखी इबारत पढ़ी ।

लिखा था।

हरामखोर दुग्गल ,

मैंने तुझे वार्मिग दी थी लेकिन तू न माना।

आखिर अपनी मौत के मुंहमें खुद चलकर आ गया है। खैर.. . मरने से पहले मैं तुझे तो खबर दूंगा ही कि तू जिन लोगों की हिटलिस्ट में था-उन लोगों ने तेरी मौत का ऐसा इंतजाम कर दिया है कि अब तू चाहे तो भी अप ने-आपको किसी तरह बचा नहीं सकेगा। अपने भगवान से अपने गुनाह बख श वा ले। तू इस वक्त बारूद के ऐसे देर पर खड़ा है जो पलकी झपकते तेरे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े बिखरा देगा। इस मंच के अंदर जिसके ऊपर

तू खड़ा है, बारूद ही बारूद भरी है।

मैं तुझे ये इन्टीमेशन महज इसलिए दे रहा हूं, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तू अपनी मौत से

नावाकिफ रहे। एक धमाका हो और तेरे चीथड़े

उड .जाएं। मैं तेरे चेहरे को मौत की दहशत

जर्द होता देखना चाहता हूं । मरने के लिए

तैयार

हो जा।

स्लिप पढते-पढ़ते दुग्गल के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। चेहरे पर राख जैसी सफेदी फैल गई।

__ मौत के खौफ ने एकाएक ही उसे पागल जैसा बना दिया।

उसके चेहरे पर बौखलाहट बढ़ती ही जा रही थी। वह एकाएक ही घबराया हुआ -सा मंच के आगे आया-। शायद नीचे कूद ही जाता मगर मंच की ऊंचाई ज्यादा थी और उसकी हिम्मत कम।

वहमंच से न कूद सका।

पब्लिकी में तालियों का सिलसिला खत्म हो चुका था वह अचाम्भित-सी अपने नेता को पागल होते देख रही थी। किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

पांच पर मौजूद दोनों कमाण्डोज आगे आ ए । उन्होंने दुग्गल को संभाला।

'बारूद ! बारूद! भागो! भागो!! ' वह चिल्लाता हुआ भागने लगा तो दोनों कमाण्डोज ने

उसे पकड़ लिया।

उन्हें लगने लगा था कि दुग्गल पागल हो चला है। दुग्गल पूरी शक्ति के साथ उनका विरोध करने लगा। ऐसा करते हुए जनता को भी यही मह सूस होने लगा कि उनका नेता पागल हो चला है।

कोलाहल के साथ भागम-भाग। त माम अधिकारी मंच की ओर दौड़ पड़े।

इसी बीच!

कानों के पर्दे फाड़ देने वारना धमाका हुआ और मंच का पेट फाड़कर आग और धुआ एक बवण्डर के रूप में आसमान की तरफ उठता चला गया।

पांच पर मौजूद तमाम लोगों के परखच्चे मलबे के साथ उदगय।

हाहाकार मच गया।

मंत्री श्याम दुग्गल की हत्या की खबर जंगल की आ ग की तरह फैलती चली गई।

जनता इधर से उधर भाग रही थी।

विस्फोट बेहद शक्तिशाली था।

उसके लपेटे में आसपास के लोग भी आ गए थे।

प्रशासन ने वहां जो सुरक्षा व्यवस्था बनाई थी , वह टूट कर बिखर गई थी। कुछ नहीं हो पा रहा था।

10 ………………………….

काली कार मैं विनायकी देश मुख अपने दो आदमियों के साथ था।

विस्फोट के फौरन बाद उसने ड्राइवर को गाड़ी बढ़ाने का आदेश दे दिया ।

अभी ड्राइवर ने कार स्टार्ट ही की थी कि कार के पिछले हिस्से के दोनों दरवाजे खुले और दाएं-बाएं से पिछली सीट पर तन्हा बैठे विनायकी देशमुख को की छ करने का अवसर दिए बिना लाम्बा और दलपत ने दबोच लिया।

आगे बैठा ज्या दा पीछे की हरकत से चौंककर पलटा।

'खबरदार ! ' लाम्बा अपनी पिस्तौल विनायकी के माथे से सटाता हुआ फुफकार चुपचाप सीधा होकर बैठ जा वरना विनायकी की बाप को तू जवाब नहीं दे पाएगा।'

दलपत ने अपना रिवाल्वर विनायकी की पसलियों में लगा रखी था।

दोनों के हाव-भाव खतरनाकी थे।

गाड़ी आगे बढाने का हुक्म दे हरामजादे! ' लाम्बा ने विनायकी को टाइट किया।

___ 'गा.. . गाड़ी आगे बढ़ाओ।' विनायकी देशमुख की म्पि त स्वर में बोला।

उसके आदेश का तुरन्त पालन हुआ।

'सुन! गौर से सु न! अगर तेरे प्यादों ने किसी तरह की हरकत की तो एक ही बार ट्रेगर दबाकर तेरा भेजा खोपड़ी से बाहर निकाल दूंगा !'

'न... न ... नहीं। ' वह कांपकर बोला-'कोई हरकत - करना। जो मिस्टर लाम्बा कहें , उसी का पालन करो।'

लैफ्ट मोड़ लो। ' लाम्बा ने ड्राईवर को आदेश दिया।

ड्राइवर ने आदेश का पालन किया।

दूसरा प्यादा भी पत्थर की मूर्ति बना चुपचाप बैठा रहा।

'स्पीड बढ़ाओ।'

कार की स्पीड पद्गाये । वह ह वा से बातें करने लगी। गाड़ी रोको ! ' एक जगह लाम्बा ने गाड़ी रुकवा दी। वह जगह एकदम वीरान थी। लम्बी सड़की दूर तक चली गई थी।

सड़की पर कोई ट्रैफिकी नहीं था।

'तुम दोनों उत्तर जाओ ! लम्बा ने विनायकी के दोनों आदमियों को आदेश देते हुए कहा यहा से तुम्हें पांच किलो मीटर पैदल चलना पड़ेगा और तब जाकर तुम टेलीफोन सुविधा जुटा सकोगे। फिर तुम अपने बाप माणिकी देशमुख को मेरे कारनामे की खबर कर देना।'

दोनों प्यादे तुरन्त ही कार से उतर गए।

'दलपत ने तुरन्त ड्राइवर की जगह संभाल

ली।

'चल काने , जितनी तेज चल सकी ता हो उतनी तेज चल।'

दलपत ने तुरन्त कार को दौड़ाना आरंभ कर दिया।

'मुझे कहां लिए जा रहे हो ?' विनयकी देशमुख ने डरते-डरते पूछा।

'तुझे अगवा किया जा चुका है बास्टर्ड! अब बेवकूफी भरे सवाल मत कर। ' लम्बा पिस्तौल की नाल उस की पसलियों में चु भाता हुआ गुर्राया।

'देखो ... मैं ..!'

'तू कुछ नहीं। तू मेरे बदले के काम में. इ स्ते माल होगा।'

' मेरे डैड तुम्हे छोड़ गे नहीं। अभी तुम्हें उनके गुस्से की वाकफियत नहीं है।'

__ 'अभी तुझे मेरी वाकफियत नहीं है। ' कहता हुआ लम्बा कार ड्राइव करते हुए दलपत से संबोधित हुआ-रफ्ता र न और बढा काने और तेज चल!'

दलपत ने एक्सीलेटर पर पर का दबाव कुछ और बढ़ा दिया।

कार तूफानी रफ्तार से दौड़ने लगी।

'देखो मुझे छोड़ दो , तुम्हें ढेर सारा रुपया दिलवा दूंगा।' विनायकी देशमुख लम्बा को समझाने

की कोशिश करता हुआ बोला।

बच्चों जैसी बातें मत कर। कहीं मेरा भेजा घूम गया तो तू वक्त से पहले ही इस फानी दुनिया से कूच

कर जाएगा।'

विलायकी देशमुख परेशान था।

उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह जो भी स्कीम लाम्बा के सामने पेश करता , वही फेल हो जाती। उसकी उलझन निरंतर बढ़त चली जा रही थी।

लम्बा को ए काएक ही उसकी तलाशी लेने का विचार आया तो उसने विना यकी की जेबें टटोलनी शुरू कर दी।

_ 'मेरी तलाशी हो चुकी है। ' उसका आशय समझता हुआ विनायकी बीच में ही बोल उठा।

'हो चुकी है ?'

' हां।'

'कब?'

'मैंने ली थी बाप, जब मैं पीछे वाली सीट पर बैठा था।

यह रिवाल्वर निकली थी इस बिंदु के पास। 'कार ड्राइव करता दलपत बीच में बोल उठा।

' रिवाल्वर अपने पास ही रख । '

अंदर वाली जेब से रिवाल्वर निकालने की कोशिश करते दलगत ने रि वा ल्व र बीच में ही छोड़ दी।

कुछ देर बाद लम्बा ने दलपत को दायीं ओर मुड़ने का आदेश दिया।

दलपत ने तुरंत ही आदेश का पालन किया।

फिर वह लम्बा के निर्देशानुसार कार ड्राइव करता रहा।

अन्त में एक निर्माणाधीन बिल्डिंग में जाकर कार रुकी।

बिल्डिंग मे निर्माण कार्य बंद था। शायद किसी कारण वश निर्माण कार्य बीच में ही रोकी दिया गया था ।

लम्बा ने विनायकी देशमुख को कार से बाहर निकाल लिया। फिर वह द लपत की ओर अकृष्ट होता हुआ बोला- इस कार को यहां से ले जा और कहीं दूर

छोड देना।'

'जो हुक्म मालिक।' 'आसपास से सावधान रहना।'

'बरोबर।'

'जल्दी जा और जल्दी लौटकर आ। '

दलपत ने कार वहां से आगे बढ़ा दी।
 
'पूनम हॉस्पिटल में नहीं ?' लाम्बा ने आश्चर्य से दलपत की ओर घूरकर देखते हुऐ कहा।

'नहीं बाप उधर चिड़िया का बच्चा भी नहीं है। ' दलपत लापरवाही से सिगरट फूलता हुआ बोला।

'आई सी... | लम्बा-विचारों में डूबता हुआ बड़बड़ाया।

क्या आई सी...मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।'

माणिकी देशमुख का ये कदम सुरक्षात्मकी है , मेरी समझ में आ रहा है।'

'मतलब?'

'मतलब यह कि विनायकी के अपहरण कि खबर के फौरन बाद वह सावधान हो गया और उसने सबसे पहले पूनम को हॉस्पिटल से हटाया। उसे डर था कि कहीं मैं विना यकी के बाद पूनम का भी अपहरण न कर लूं।'

'हां...ये बात तो है।'

'कोई बात नहीं, मजा आ एगा।'

'मजा तो आएगा बाप लेकिन सोचने वाली बात तो यह है कि चार दिन हो गए और अभी तक आपने कुछ किया नहीं। विनायकी को अगवा करके उसे चुपचाप खिलाए-पिलाए चले जा रहे है। '

लम्बा धीरे से हंसा।

'इस हंसी का राज क्या है आखिर ?' तू समझदार है काने ।' नहीं हूं।'

' सयाना है फिर भी समझ नहीं रहा है। अरे...अगवा करने के बाद फौरन पार्टी से बात कुरने से तड़प पैदा नहीं होती।'

'तड़प?'

हां.... तड़प जरूरी है काने। बहुत जरूरी है। मैं ने अब तक माणिकी देशमुख से किसी भी माध्यम से संपर्की नहीं बनाया जबकि देशमुख मुझसे बात करने के लिए परेशान होगा। वह जल्द से जल्द विनायकी की खबर हासिल कर लेना चाहता होगा।

चाहता होगा न?'

'हा।'

' उसने मुझे मार डालने में कोई कसर नहीं उठा रखी , इसलिए कम से कम मैं उसे तड़पाने का हकी तो रखता ही हु ।'

दलपत रहस्यपूर्ण ढग से मुस्कराया।

उसके चेहरे के बदले हुए भावों से स्पष्ट हो रहा था, अब वह लम्बा की बात को भली-भांति समझ रहा था।

चार दिन हो गए देशमुख को तड़पते हुए बाप। अब आप तड़प की खातिर नहीं पूनम भाभी की

खातिर खडूस से बात तो कर ही लें।'

' ऐसा ?'

'हां।'

'तू कहना है तो कर लेता हूं।'

दलपत पुन: मुस्कुराया।

'गाड़ी कहां है?'

'आ गे वाली उसी गली में।'

'ठीकी है। मैं जाता हूं। तू इधर विनयकी का ध्यान रखना। उसके खाने का वक्त हो रहा है। '

'दे दूंगा खाना।'

'होशियार रहना , कहीं वह तेरे को चोट दे

जाए।'

'दलपत नाम हे मेरा बाप। '

'तेरा नाम बब्बर शेर क्यों न हो , उससे कुछ नहीं होता। जेंब चोट होती है तो हो ही जाती है।'

'वो मुझे चोट नहीं दे पाएगा।'

'ओवर कॉन् फी डेंस में ही आदमी चोट खाता है।'

' आप निश्चिन्त रहें। मैं पूरी तरह सविधान रहूंगा।'

'फिर ठीकी है। चलता हूं। ' इतना कहकर लम्बा बिल्डिंग की सिदियों की ओर बढ़ गया! '

नीचे पहुंचते-पहुंचते उस ने अपने लिए सिगरेट सुलगा ली! वह बिल्डिंग के पिछले भाग से

बाहर निकला । रा त के अंधेरे में बिल्डिंग की अधूरी बनी बाउंड्री वॉल पार करना कोई मुश्किल काम नहीं था।

अंधेरे में चल ता हुआ वह उस छोटी गली में पहुंचा जहां उसकी किराए पर हासिल की गई कार खड़ी थी।

गली वीरान पड़ी थी।

उसने कार को गली से बाहर निकाला और फिर कार फर्राटे भरती मुख्य सड़की पर दौड़ने लगी।

शीघ्र ही उसकी कार टेलीफोन बूथ के निकट जा रुकी।

उसने नम्बर डायल किए।

'मुझे माणिकी देशमुख से बात करनी है। ' दूसरी ओर से जैसे ही किसी ने रिसीवर उठाया , वह एक दम से तीखे स्वर में बोला।

'कौन हो तुम?' दूसरी ओर से उभरने वाली कोठारी की आवाज उसने तुरन्त ही पहचान ली।

'वक्त बरदाद मत करो। मेरे पास वक्त बहुत कम है।'

'लाम्बा ?

'शुक्र है...पहचाना तो।' 'मैं कोठारी हूं। मुझे बताओ।'

' मैं ने तुमसे नहीं माणिकी देशमुख से बात करनी है।'

' विनायकी कहां है ?'

'कोठारी! ' एकाएक ही लम्बा के स्वर में चट्टान जैसी सख्ती आ गई।

'ओ० के०। मैं देशमुख साहब को बुलाता हूं ... होल्ड करो।'

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

दूसरी ओर लाइन पर खामोशी छा गई।

लम्बा ... लम्बा मेरा बेटा ...मेरा विनायकी कहां है लम्बा ?' एकाएक ही दूसरी ओर से एक हां फता हुआ बौखलाहट भूरा स्वर उभरा ।'

लाम्बा उसे पहचान गया।

वह स्वर माणिकी देशमुख का था। उसके स्वर से बेटे के वियोग की तड़प स्पष्ट झलकी रही थी।

'तेरा बेटा अभी जिन्दा है देशमुख। ' सिगरेट फूंकता लम्बा जहरीले स्वर में गुर्राया।

'मेरा बेटा वापस कर दे वापस कर दे उसे! '

'मुझे मरवाने का तेरा नया प्लान क्या है?'

'कोई नहीं कोई भी नहीं।'

कोई तो जरूर होगा , क्योंकि तू दो फ न वाला सांप है। खतरनाकी भी और मक्कार भी।'

'मेरा विश्वास कर , अब मैं तेरे खिलाफ नहीं। मुझे तो पछतावा हो रहा है तुझ पर गोली चलाने

का ।'

भेड़िया भेड़ की खाल ओढ़ ले तो भेड़ थौड़े ही बन जाता है , वह रहता तो भेड़िया ही है। '
 
.

.

'नहीं...मैं तुझ पर कभी किसी तरह का बार नहीं करूंगा।'

'पूनम कहां है ?'

दूसरी ओर खमोशी छागाई।' ' तूने जवाब नहीं दिया ?'

'पूनम जहां भी है, सकुशल है। दूसरी ओर से माणिकी देशमुख का अपेक्षाकृत कठोर स्वर उभरा।'

'मैं उससे बात करना चाहता हूं।'

' अगर मैं इंकार करू तो?'

'तो बहुत कुछ गलत हो सकत है।'

'जैसे?'

'विनायकी के जिस्म से थोड़ा-सा खून निकल सकी ता है । उसके जिस्म का कोई हिस्सा

काटकर अलग किया जा सकता है।'

'नही! ' देशमुख का तड़प भरा स्वर उभरा। 'तो , फिर मैं पूनम से बात करना चाहता हूं।

'उसे जगाना पड़ेगा। वह बड़ी मुश्किल से सो सकी है। दोबारा जागी तो न मालूम फिर कैसे संभल ।'

'क्या' उसकी तबियत ज्यादा खराब है ? '

' बाकी ठीकी है। लेकिन एक घाव गहरा है। वह तकलीफ देने लगता है।'

'हूं... I ' हुंका र भरता लाम्बा सोच में डूब

गया।

___ 'जगा दूं?' कुछ देर बाद माणिकी देशमुख का स्वर उभरा।

'नहीं।

' मेरी बेटा ?'

'तेरा बेटा तुझे मिल सकता है।'

' तेरी जो भी मांग हो , जितनी बड़ी रकम तुझे चाहिए-तू मुझसे मांग सकता है। '

'रकम । ' लम्बा जोर से हंसा।

'हां...कोई भोई रकम।'

'रकम मुझे नहीं चाहिए।'

' फिर ?'

'पूनम चाहिए। पूनम मुझे दे-दे। विनायकी मुझसे वापस ले ले।'

'यह...यह कैसे हो सकता है। '

'जैसे भी हो । यही एक शर्त है।'

'कोई भी रकम मांग ले!' ___ 'कोई रकम नहीं चाहिए। सिर्फ पूनम चाहिए। जवाब फौरन दे देशमुख...मैं बार- बार फोन करके वक्त बरबाद नहीं करना चाहता।'

'एक मौका दे। मैं फैसला करने के लिए थोड़ा-सा!' वक्त चाहता हूं।'

'ठीकी है , फैसला कर ले मगर जल्दी।'

'हां।'

'लम्बा ने रिसीवर हुकी में लटकाया और फिर वह टेलीफोन बूथ से बाहर निकल गया।'
 
रास्ते भर लम्बा सावधानी के साथ कार ड्राइव करता हुआ आया था। उसने बैकी व्यू मिरर से बहुत कम नजर हटाई थी। ' वह... नहीं चाहता था कि को ई उसका पीछा करता उसके उस ठिकाने तक पहुंच जाए जहां उसने अपनी पकड़ छिपा रखी है।

वह विनायकी को ट्रम्प कार्ड की तरह प्रयोग करना चाहता था।

रास्ते मे उसे कहीं भी पीछा किए जाने का शकी भी नहीं हुआ।

उसने अपने ठिकाने के निकट वाली अंधेरी गली में अंत में अपनी गाड़ी मोड़कर पार्की कर दी। कार के शीशे चढाकर उसे लौकी करने के बाद वह जयोंही गली के बाहरले हिस्से की तरफ मुड़ा , उसे लगा कि उस तरफ कोई था। '

वह चौंका।'

लेकिन शीघ्र ही उसने , अपने-आपको सहज कर लिया।

वह इस प्रकार गली से बाहर निकला जैसे काई बात हुई ही न हो।

बाहर आने पर वहां के सन्नाटे को देख उसे संदेह हुआ। कहीं वह व्यर्थ ही तो नहीं चौंका था।

कहीं कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।

उसने गर्दन झटकी और कदम आगे बढ़ा

दिए।

निकट ही वही निर्माणाधीन बिल्डिंग थी जिसमें उस पहुंचना था। उस्ने दूर से बिल्डिंग की ओर

देखा।

बिल्डिंग में जनहीन सन्नाटा व्याप्त था।

उसे लगा , उसका शकी निराधार था।

उसने बिल्डिंग के पिछले भाग से बाउंड्री बॉल पर की। फिर पलट कर बाहर देखा ।

कहीं कुछ नहीं था।

अस्रास्रुत होते हुए उसने बिल्डिंग में दा खिल होते हुए सीढ़ियां तय करनी शुरू कर दी। सीढ़ियां पार करके वह दूसरे माले पर पहुंचा।

दूसरे माले के पिछले भाग में उसने विनायकी देशमुख को बंद कर रखा था। उस हिसाब से दलपत काने को वहीं कहीं आसपास ही होना था।

'काने !' उसने धीमे स्वर में पुकारा ।

प्रत्युत्तर में खामोशी छायी रही।

उसने एक बार फिर अरावाज दी।

पुन: खामोशी।

वह पहले चौंका , किन्तु जिस कमरे में वह विनायकी देशमुख को कैद करके गया था , उसके दरवाजे बंद देख उसकी घबराहट खत्म हो गई।

सम झ गया कि दलपत जरूरत की कोई चीज लेने आसपास ही गया होगा।

उसने वह कोना देखा ही खाना रखा गया था।

खाना अपनी जगह नहीं था।

इसका मतलब उसके आदेशानुसार दलपत ने विनायकी को खाना दे दिया था।

वह विनायकी को देखने उसके कमरे की ओर चल पड़ा।

कमरे के दरवाजे का कुंडा लगा हुआ था।

उसने कुंडा खींचकर दरवाजा खोला।

अंदर अंधेरा जरूर था । लेकिन अंदेराइतना क्या नहीं था कि वह फश पर पड़े दलपत और विनायकी में फर्की न कर सके।

कमरा छोटा था।

और!

कमरे के फर्श पर दलपत औंधा पड़ा था।

उसकी पीठ में कितनी ही गोलियों ठुकी मलूम हो रही थीं। वह खून में फैला पड़ा था। कमरे में उसके अतिरिक्त और कोई नहीं था।

'काने लाम्बात जी से उसके निकट पहुंचा। उसका निरीक्षण करता हुआ वह बोला- ' विनायकी कहां गया और यह तुझे...? '

जवाब उसे स्वयं ही मिल गया।

दलपत मर चुका था।

एक पल के लिए उसने सोचा।

फिर वह फुर्ती के साथ उठकर बाहर निकला। कॉरडो र में आते ही अंधेरे में एक शोला चमका।

फायर की आवाज हुई।

उसके साथ ही उसे लगा कि उसके पेट में आग का गोला उतरता चला गया हो।

उसने नमकी के मोड़ पर एक काले साए को देख लिया था।

वह फर्ती से नीचे गिरा।'

उसका एक हाथ पेट के घाव पर जा पहुंचा।

गर्म चिपचिण तरल उसे अपने उस हाथ के माध्यम से बहता स्पष्ट अनुभव हो रहा था।

उसने दूसरे हाथ से माउजर निकाला और फिर फायरों के धमाके से समूची बिल्डिंग थर्स उठी।

काला साया उछलकर पीछे जा गिरा।

निश्चित रूप ऐ उसे गोली लग गई थी

लाम्बा को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसके पेट में आग ही आग भर दी गई हो।

दांत भींचे हुए वहमाउजर साम ने की ओर ताने आगे कीओर बढ़ चला।

बहता हुआ खून उसकी जांघों तक क्त पहुंचा

था।

वह पीड़ा के चूंट पीता आगे बढ़ता रहा।

सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए उसे मुख्य द्वार की ओर हलचल सुनाई दे गई।

उस ने जेब से ग्रेनेड निकाला। खून में स ने हाथ से उसने ग्रेनेड पकड़ा कर उसकी पिन दांतों से खींची और फिर ग्रेनेड फुर्ती से नीचे उछाल दिया। ,

भयंकर विस्फोट हुआ।

विस्फोट के साथ ही मलबा और दुवां उछला। बारूद की तीखी गंध फैलती चली गई।'
 
वह वि स्फोट के बाद बेखौफ सीढ़ियां उतरता चला गया।

उसे अपने पेट में उतर जाने वाली गोली से पैदा होने वाले खतरे का एहसास हो गया थी।

जब वह बाहर आया तो खून से लथपथ था।

उसे अपने दिमाग में आधियां-सी चलती महसूस हो रही थीं। आंखों के आगे रह-रहकर अंधेरे

की काली पर्ते भी गिरने लगी थीं।

बिल्डिंग के बोहर आते ही उसने दो आदमियों को वहां से भागते देखा।

उसका माउजर घूमा।

पहला आदमी निशाने पर आते ही उसने ट्रेगर दबा दिया।

गोली उसका भेजा उड़ाती हुई निकल गई। बह अचानकी कटी पतंग की तरह हवा में तैर गया।

पलकी झपकते मा उजर के एक के पीछे एक छूटे कई बुलेट तेजी से दूसरे आदमी की पीठ से ध सते चले गए। दौड़ते-दौड़ते उसने झटका खाया

और फिर वहीं ढ़े र होता चला गया

वह समझ चुका था कि वंहा फैले आदसी विनायकी देशमुख के कारण ही थे।

जो भी हुआ था , विनायकी के लिए ही हुआ था।.

क्योकि वही गायब था।

दलपत उसकी जगह लाश के रूप में पड़ा था।

दिमागी घोड़े दौड़ा ता लाम्बा बाहर भोगा

बाहर खड़ी कार को उसने चैकी किया ।

कार खाली थी।

शायद वहां मौजूद आदमी उसी कार में आए थे। वह फुर्ती से कार मैं बैठ गया। चाबी मौजूद थी। उसने कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। कुछ दूर तक कार अंधेरे में चली।

रात के अंधेरे में नहीं, उस की आंखों के आगे आजाने वाले अंधेरे में।

खून लगातार बहता जा रहा था।

उसकी आंखों का अंधेरा जब छंटा तब कार सड़की कि नारे की रेलिंग-तोड़ती हुई आगे बढ़ी थी।

उड़ाने फुर्ती से कार को मोड़कर बीच सड़की पर पहुंचाया।

कार तेज रफ्तार से दौड़ने लगी।

वह जल्दी से जल्दी माणिकी देशमुख की कोठी पर पहुंचा जान चाहता था।

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माणिकी देशमुख की कोठी का फाटकी कार की तूफानी टक्कर से टूटकर खुल गया।

लम्बा उसे ड्राइव करता कोठी के ड्राइव-वे पर 'बढ़ाता चला गया।

चारों तरफ से सर् च लाइटों का प्रकाश फैलकर कोठी के सामने वाले भाग में फैल गया। आगे बढ़ती लाम्बा की कार पर गोलियां बरसाई जाने लगीं।

पोर्टिको के करीब पूर हुंचते-पहुंचते कार रुकी गई।

गोलियां कार पर इस तरह बरस रही थीं जैसे मुस लाध र वर्षा की बौछारें।

लाम्बा कार के अन्दर स्टेयरिंग के नीचे घुस

गया।

अचानक!

अचानकी ही गोलियों की बौछारें एक झट के के साथ बन्द हो गई।

_' नहीं! नहीं! मत मारो उसे! ' पूनम का चीत्कार उभरा।

दौड़ती हुई पगचा ला म्बा ने कार की तरफ बढ़ती सुनीं।

पूनम की आवाज वह किसी भी स्थिति में पहचान सकता था। हालांकि उसकी आंखों के आगे बार-बार अंधेरा छा र हा था। फिर भी उसे पूनम कोई उपस्थिति का आभास हो रहा था।

कार का दरवाजा खुला।

'रंजीत...रंजीत पूनम की व्याकुल कर देने वाली पुकार।

लम्बा ने अपना कांपता हुआ हाथ उसकी ओर बढ़ाया।

उसने लाम्बा के खून सने हाथ को सहारा दिया।'

वह घिसटकर कर से बाहर निकला।

'सब...सब ठीकी हो जाएगा रंजीत। मेरे रहते तुम्हें कुछ नहीं होगा।'

'जो होना था...हो चुका ... पूनम ... हो ...

चुका।'

'नहीं।'

'अब तो विदाई का...आह...वक्त आ.. आपहुंचा है।'

माणिकी देशमुख अपने प्यादों समेत वहां मौजूद था।

विनायकी भी वहीं था।

'पूनम को हटा ले विनायक। ' माणिकी ने अपने बेटे को आदेश दिया।

'नहीं! मुझे रंजीत से कोई अलग नहीं कर सकता।' पूनम बिफर कर चिल्लाई।

विनायकी ने बलपूर्वकी उसे लाम्बा से अलग कर दिया।

लम्बा ने देखा।

वह चारों तरफ से घिरा हुआ था।

तभी माणिकी देशमुख ने जोजफ को इशारा किया।

जोजफ ने रिवाल्वर लाम्बा की ओर तानकर दो फायर किए।

लाम्बा की चीखें वहां गूंज कर लुप्त हो गई।

पूनम ने उस दृश्य को देखा। पागल-सी हो उठी वह।

उसकी फटी-फटी आँखें कभी खून में डूबे लम्बा को देखतीं तो कभी अपने वहशी बाप को।

उसका बायां हाथ वि ना यकी की गिरफ्त में था। दायां खाली था।

एक झटके के साथ उसने विनायकी के होलस्टर से रिवाल्वर खींच निकाला।

जब तुकी विनायकी उसे काबूर में करता तब

तक वह अपनी कनपटी से रिवाल्वर सटाकर ट्रेगर दबा चुकी थी।

' पूनम !' माणिकी देशमुख कातर भाव से आर्तनाद करता पूनम की ओर लपका ।

उसी क्षण लम्बा ने करवट बदली।

उसके माउजर ने जोजफ को निशाने पर लेकर गोलियां उगलनी शुरू कर दी।

__ चारों तरफ से लम्बा पर गोलियां बरसाई जा रही थीं। लेकिन वह गोलियों के झटके सहन करता तब तक माउजर चलाता रहा जब तक कि जोजफ पछाड़ खाकर गिर न गया।

उसके बाद उनकी गर्दन एक ओर ढुलक गई।

समाप्त
 

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