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Thriller विक्षिप्त हत्यारा

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उसी क्षण बत्ती हरी हुई ।

सुनील सड़क पार कर गया, लेकिन वह अपनी मोटरसाइकल के लिये पार्किंग की ओर बढने के स्थान पर टैक्सी स्टैण्ड की ओर बढा ।

एक टैक्सी ड्राइवर ने उसे अपनी टैक्सी में बैठने का संकेत किया ।

सुनील टैक्सी में जा बैठा ।

“किधर चलूं, साहब ?” - टैक्सी वाले ने पूछा ।

सुनील ने मैड हाउस की ओर देखा ।

लिबर्टी बिल्डिंग की साइड में से एक काली फियेट निकली । एक क्षण के लिये वह मैड हाउस के सामने रेलिंग के साथ सड़क पर रुकी । सुनील ने मोटे आदमी को जल्दी से फियेट का पिछला दरवाजा खोल कर भीतर बैठते देखा । फिर फियेट फौरन आगे बढी और सुनील की टैक्सी के पीछे लग गई ।

लिबर्टी बिल्डिंग से सौ गज आगे ही एक अन्य चौराहा था, जिस पर ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती चमक रही थी ।

सुनील ने मन ही मन कुछ फैसला किया और फिर ड्राइवर से बोला - “सुनो, तुम्हारा नाम क्या है ?”

“गजराज ।” - ड्राइवर बोला ।

“गजराज ।” - सुनील बोला - “यहां से हर्नबी रोड के साढे चार रुपये लगते हैं । तुम मेरा एक काम कर दो तो मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा ।”

“क्या काम, साहब ?” - ड्राइवर सशंक स्वर से बोला ।

“तुमने हर्नबी रोड पर स्थित यूथ क्लब देखी है ?”

“देखी है, साहब ।”

सुनील ने अपनी जेब से मुकुल की तस्वीरों वाला लिफाफा निकाला । लिफाफे की दो तस्वीरें में से एक उसने लिफाफे में ही रहने दी और दूसरी तस्वीर उसने वापिस अपनी जेब में रख ली, फिर उसने लिफाफा और दस रुपये का एक नोट ड्राइवर की ओर बढा दिया।

“यह लिफाफा यूथ क्ल्ब में रमाकांत नाम के साहब को दे आना ।”

“आप साथ नहीं चल रहे हैं ?”

“नहीं । मैं यहीं उतर रहा हूं ।”

“अगर रमाकांत साहब क्लब में न हुए तो ?”

“तो लिफाफा रिसैप्शन पर छोड़ आना और रिसैप्शनिस्ट को बता देना कि लिफाफा रमाकांत के लिये है ।”

ड्राइवर ने सुनील से लिफाफा और नोट ले लिया और बोला - “अच्छी बात, साहब ।”

उसी क्षण चौराहे की बत्ती लाल हो गई ।

सुनील जल्दी से टैक्सी का दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया और फुटपाथ पर आ खड़ा हुआ ।

काली फियेट थोड़ी आगे बढी, फिर रुकी और फिर मोटा आदमी भी उस में से बाहर निकल आया । फियेट आगे बढ गई ।

सुनील को अब इस विषय में कोई सन्देह नहीं था कि मोटा उसके पीछे लगा हुआ था ।

सुनील ने अपनी कलाई घड़ी पर दृष्टिपात किया ।

सवा ग्यारह बजे थे ।

सुनील दुबारा ‘मैड हाउस’ में घुस गया ।

इस बार गेटकीपर ने उसे रोकने का उपक्रम नहीं किया । पता नहीं वह नोट की रिश्वत का असर था या गेटकीपर को मालूम था कि सुनील के साथ की लड़की अभी भी भीतर ही थी ।

तहखाने में जाकर वह वापिस उस मेज की ओर बढा जहां वह फ्लोरी को छोड़ कर गया था ।

फ्लोरी अभी भी वहां पर मौजूद थी लेकिन अब उसके सामने सुनील की सीट पर एक दुबला-पतला सा चश्माधारी लड़का बैठा था ।

सुनील पर दृष्टि पड़ते ही फ्लोरी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये । फिर वह उस चश्माधारी युवक की ओर घूमी और मीठे स्वर में बोली - “स्क्रैम, बस्टर ।”

युवक ने बड़े आहत भाव से फ्लोरी को देखा, फिर सुनील को देखा, दुबारा फ्लोरी को देखा और फिर अपना कॉफी का मग हाथ में लेकर उठ खड़ा हुआ और तत्काल वहां से हट गया ।

“बैठो ।” - फ्लोरी बोली ।

सुनील बैठ गया ।

“क्या हुआ ? वापिस कैसे आ गये ? तुम्हें तो बहुत जरूरी काम था ।”

“काम हो गया ।” - सुनील बोला ।

“इतनी जल्दी ?”

“हां ।”

“और इसलिये तुम फौरन यहां वापिस आ गये ?”

“हां ।”

“कमाल है !”

“कमाल कुछ नहीं, ब्राइट आइज ।” - सुनील मधुर स्वर में बोला - “दरअसल तुम इतनी मुद्दत के बाद मिली हो कि मैं तुम्हारे संसर्ग में और समय गुजारने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं ।”

“जबकि अभी दस मिनट पहले तुम्हें यहां एक क्षण भी रुकना गंवारा नहीं था ।”

“तुम मुझे वाकई बहुत जरूरी काम था और फिर मैं फौरन वापिस आने के इरादे से ही गया था ।”

“तुमने ऐसा कहा तो नहीं था ?”

“गलती हो गई ।”

“हैरानी है ।”

सुनील चुप रहा ।

“आज तुम बड़ी रहस्यपूर्ण हरकतें कर रहे हो ।” - वह बोली ।

सुनील मुस्कराया । वह दो-तीन बार गुप्त रूप से सिढियों की ओर दृष्टिपात कर चुका था । मोटा आदमी पीछे भीतर नहीं आया था । उसने आसपास दृष्टि दौड़ाई मुकुल और बिन्दु उसे कहीं दिखाई नहीं दिये ।

“भूख लगी है ।” - एकाएक सुनील बोला ।

“तो फिर खाना खाओ ।” - फ्लोरी बोली ।

“यहां नहीं । कहीं और चलते हैं ।”

“कहां ?”

“कहीं भी । यहां से बाहर निकलो ।”

“ओके ।” - फ्लोरी बोली और उसने अपना कैमरा वगैरह मेज से उठाकर कन्धे पर लाद लिया ।

सुनील उठ खड़ा हुआ ।

वे द्वार की ओर बढे ।

“यहां से बाहर निकलने का कोई और रास्ता नहीं है ?” - एकाएक सुनील ने पूछा ।
 
फ्लोरी ने हैरानी से उसकी ओर देखा और बोली - “क्या किस्सा है, राजा ?”

“कोई किस्सा नहीं है” - सुनील हड़बड़ा कर बोला - “मैंने केवल एक सवाल पूछा है ।”

फ्लोरी कुछ क्षण चुप रही और फिर बोली - “और कोई रास्ता नहीं है ?”

“नैवर माइन्ड ।” - सुनील बोला और उसने अपनी बांह फ्लोरी की एक बांह में डाल दी ।

वे मैड हाउस से बाहर निकल आये ।

मोटा आदमी सामने रेलिंग के साथ लगा हुआ सिगरेट पी रहा था ।

“कहां चलें ?” - फ्लोरी ने पूछा ।

“कोलाबा ।” - सुनील बोला ।

“अगर कोलाबा ही जाना था तो मैड हाउस में क्या खराबी थी ?”

“वहां दम घुट रहा था ।”

फ्लोरी फिर नहीं बोली । दोनों आगे बढे । लिबर्टी सिनेमा के बगल में ही लिबर्टी बिल्डिंग की पहली मंजिल पर स्थित कोलाबा की सीढियां थीं । वे रेस्टोरेन्ट में पहुंचे और कोने की मेज पर बैठ गये ।

थोड़ी देर बाद ही मोटा आदमी भी रेस्टोरेन्ट में प्रविष्ट हुआ और उनसे थोड़ी दूर एक खाली मेज पर बैठ गया ।

एक वेटर सुनील की टेबल पर आया । उसने सुनील के सामने मीनू रख दिया ।

सुनील ने डिनर का ऑर्डर दिया ।

वेटर चला गया ।

सुनील ने जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला । उसने एक सिगरेट फ्लोरी को दिया, एक खुद लिया और फिर पहले फ्लोरी का और फिर अपना सिगरेट सुलगा लिया । दोनों छोटे-छोटे कश लगाते हुए सिगरेट का आनन्द लेने लगे ।

सुनील ने अपनी कलाई पर बन्धी घड़ी पर दृष्टिपात किया ।

पौने बारह बजने वाले थे ।

उसने मन ही मन हिसाब लगाया और यह फैसला किया कि टैक्सी ड्राइवर गजराज अब तक जरूर यूथ क्लब पहुंच चुका होगा ।

“मैं एक मिनट में आया, डार्लिंग ।” - सुनील बोला । उसने सिगरेट ऐश ट्रे में झोंक दिया और उठ खड़ा हुआ । रेस्टोरेन्ट के मुख्य द्वार के पास दीवार पर कायन बॉक्स लगा हुआ था । सुनील उसके समीप पहुंचा, उसने हुक से रिसीवर उठाया और यूथ क्लब का नम्बर डायल कर दिया ।

दूसरी ओर से उत्तर मिलते ही उसने तत्काल कायन बॉक्स में सिक्के डाले और फिर बोला - “रमाकान्त, प्लीज ।”

“जरा होल्ड कीजिये ।” - दूसरी ओर से कोई पुरुष स्वर सुनाई दिया ।

सुनील रिसीवर कान से लगाये प्रतीक्षा करने लगा ।

थोड़ी देर बाद उसके कान में रमाकांत की आवाज पड़ी - “हल्लो, रमाकांत स्पीकिंग ।”

“रमाकांत” - सुनील गम्भीर स्वर में बोला - “मैं सुनील बोल रहा हूं ।”

“बोलो, प्यारयो । कहां से बोल रहे हो ?”

“मैंने अभी एक टैक्सी ड्राइवर के हाथ तुम्हारे पास एक तस्वीर भेजी थी । वह तुम्हें मिल गई है ?”

“वह तस्वीर तुमने भेजी थी ?”

“हां ।”

“मैं तो उसे रद्दी की टोकरी में फेंकने लगा था । पहले तो मैं समझा कि किसी ने मजाक किया था । फिर सोचा शायद मामला गम्भीर हो । शायद चिड़ियाघर से कोई जानवर पिंजरा तोड़कर निकल भागा हो और चिड़ियाघर के अधिकारी नगर में हर जगह उसकी तस्वीर भेज रहे हों ताकि उसे पहचानने में आसानी रहे और जिसके हाथ में वह जानवर आ जाये वह उसे चिड़ियाघर में वापिस पहुंचा दे ।”

“रमाकांत, मजाक बन्द करो ।”

“ओके ।”

“जिस ‘जानवर’ की तस्वीर मैंने तुम्हें भेजी है, उसका नाम मुकुल है । वह मैजेस्टिक सर्कस पर लिबर्टी बिल्डिंग में स्थित ‘मैड हाउस’ नाम के डिस्कोथेक में गिटार बजाता है और विलायती गाने गाता है ।”

“यह देसी हिप्पी विलायती गाने गाता है ?”

“हां । और उसका हिप्पी का लिबास फ्रॉड भी हो सकता है ।”

“क्या मतलब ?”

“मतलब यह कि शायद वह कोई जरायमपेशा आदमी या फरार मुजरिम हो या पुलिस और परिस्थितियों की निगाहों से छुपने के लिये ही शायद उसने यह रूप धारण कर लिया हो ।”

“तुम यह सब अपने वड्डे भापा जी को क्यों बता रहे हो ?”

“मुझे इस आदमी के बारे में जानकारी चाहिये ।”

“कैसी जानकारी ?”

“इसके पिछले जीवन के बारे में जो कुछ भी जान पाओ ।”

“यह राजनगर का ही रहने वाला है ?”

“नहीं ।”

“तो फिर ?”

“वैसे तो पिछले कुछ समय में यह भारत के कई नगरों में धक्के खाता रहा है लेकिन मुझे विश्वस्त सूत्रों से मालूम हुआ है कि वास्तव में बम्बई का रहने वाला है । तुमने मुझे एक बार बताया था कि बम्बई तुम्हारा कोई कान्टैक्ट है । अगर राजनगर में तुम्हें इसके बारे में कोई जानकारी हासिल न हो पाये तो इस तस्वीर को अपने बम्बई वाले आदमी के पास भेज दो । वैसे मुझे आशा नहीं है कि राजनगर में इसके बारे में कोई जानकारी हासिल हो सके । राजनगर में वह सात-आठ महीने पहले ही आया है ।”

“यह बात पक्की है कि वह बम्बई का ही रहने वाला है ?”

“मुझे किसी दूसरे आदमी ने बताया है लेकिन मुझे बात पक्की ही मालूम होती है ! वैसे भी सुना है कि बातों में बम्बई का जिक्र आ जाने पर वह बात को टालने की कोशिश करने लगता है ।”
 
“फिर तो बड़ा आसान काम है ।” - रमाकांत एकाएक तमक कर बोला - “बस, मैं यह तस्वीर बम्बई भेज देता हूं । बम्बई में तीस चालीस लाख बालिग लोग तो रहते ही होंगे । मेरा आदमी उन तीस-चालीस लाख आदमियों को बारी-बारी यह तस्वीर दिखायेगा । कोई-न-कोई तो उसे पहचान ही लेगा । सन् 1980 की अक्टूबर तक मैं तुम्हें यह बात बताने में सफल हो जाऊंगा कि वास्तव में मुकुल क्या चीज है ! वह अपनी पतलून कौन-से दर्जी से सिलवाता है, कौन-सा टूथपेस्ट इस्तेमाल करता है, कौन-सी...”

“मजाक मत करो, रमाकांत । यह इतना कठिन काम नहीं है जितना तुम इसे सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हो ।”

“मजाक तुम कर रहे हो । यह भुस के ढेर में सूई तलाश करने जैसा काम है ।”

“भुस के ढेर में सूई तलाश करना कोई कठिन काम नहीं होता ।”

“अच्छा !” - रमाकांत के स्वर में व्यंग्य का गहरा पुट था ।

“प्यारेलाल, भुस के ढेर में सूई तलाश करना इसलिये कठिन काम माना जाता है क्योंकि सूई के मुकाबले में भुस का ढेर बड़ा कीमती होता है । लेकिन अगर कोई भुस के ढेर का नुकसान गंवारा कर ले तो सूई तलाश करना बड़ा आसान काम है ।”

“कैसे ?”

“भुस के जिस ढेर में सूई खोई है, उसको आग लगा दो । जब भुस का ढेर राख बन जाये तो राख को छान लो । तो सूई साली कहां जायेगी ? इसलिये रमाकांत साहब, अक्ल से काम लो । जब सूई, का महत्व भुस के ढेर से ज्यादा हो तो सूई ढूंढना बड़ा आसान काम होता है ।”

रमाकांत ने उत्तर न दिया ।

“मुकुल को मैंने गिटार बजाते देखा है । वह वाकई गिटार बजाना जानता है । इतना अच्छा गिटार बजाना चार छः महीने में नहीं आ सकता । गिटार बजाने की वैसी योग्यता वर्षों के निरन्तर अभ्यास के बाद ही पैदा हो सकती है । यही बात उसके गाने के ढंग पर भी लागू होती है । उसका गिटार बजाने और गाने का एक्शन, स्टेज पर आने का ढंग वगैरह भी इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि वह लोगों के मनोरंजन के लिये होटलों क्लबों वगैरह में उस प्रकार गाने बजाने का आदी है । तुम्हें सारी बम्बई में उसके बारे में पूछताछ करने को जरूरत नहीं है । वहां के मैड हाउस जैसे रेस्टोरेन्ट और क्लबों में ही पूछताछ करने से काम बन जायेगा और ऐसे ठिकाने बम्बई में कई हजारों की तादाद में नहीं होंगे । पुलिस स्टेशन पर पूछताछ करने पर भी कोई नतीजा हासिल हो सकता है ।”

“अगरचे कि उसकी पहचान के मामले में उसकी दाढी-मूंछ और उसके लम्बे बाल रुकावट न बने ?”

“करैक्ट ।”

“सम्भव है नाम भी मुकुल न हो ?”

“बिल्कुल सम्भव है । इसीलिये तो तुम्हें उसकी तस्वीर भेजी है ।”

“और नगदऊ का क्या इन्तजाम है ?”

“कोई इन्तजाम नहीं है ।”

“फिर काम भी नहीं होगा ।”

“काम होगा, डैडी, और इसलिये होगा क्योंकि इसमें तुम्हारे भूतपूर्व ग्रैंडफादर की टांग फंसी हुई है ।”

“कौन ?” - रमाकांत संशक स्वर में बोला ।

“रायबहादुर भवानी प्रसाद जायसवाल ।”

“ओह ! उनका क्या किस्सा है ?”

“किस्सा फिर बताऊंगा ।”

“ओके ।”

“ओके । गुड लक ।”

सुनील ने रिसीवर को हुक पर टांग दिया । उसने एक उड़ती दृष्टि दूर बैठे मोटे आदमी की ओर डाली । वह सुनील की ओर ही देख रहा था ।

वह वापिस फ्लोरी की बगल में आ बैठा ।

“क्या किस्सा है ?” - फ्लोरी बोली ।

“कुछ नहीं ।” - सुनील बोला - “यूं ही एक दोस्त को फोन करने गया था ।”

“आधी रात को ?”

“हां ।”

“मुकुल की तस्वीर का क्या करोगे ?”

“बच्चों को डराया करूंगा ।”

“टाल रहे हो ?”

“हां ।” - सुनील बड़ी शराफत से बोला ।

उसी क्षण वेटर खाना ले आया ।

सुनील ने देखा, दूर बैठा मोटा आदमी कॉफी पी रहा था ।

फ्लोरी और सुनील ने खाना शुरू किया ।

दो मिनट बाद सुनील एकाएक धीमे स्वर में बोला - “फ्लोरी !”

फ्लोरी ने प्रश्नसूचक नेत्रों से सुनील की ओर देखा ।

“मेरी एक मदद करोगी ?”

“क्या ?”

“एक बदमाश मेरे पीछे लगा हुआ है ।”

फ्लोरी के मुंह से सिसकारी निकल गई ।

“नहीं, नहीं । इतनी गम्भीर बात नहीं है । लेकिन मेरा उससे पीछा छुड़ाना बहुत जरूरी है ।”

“कहां है वह ?”

“वह यहीं रेस्टोरेन्ट में मौजूद है । मैं उसे बड़ी आसानी से डॉज दे सकता हूं, लेकिन इसके लिये मुझे थोड़ी-सी तुम्हारी सहायता की जरूरत है ।”

“मै क्या कर सकती हूं ।”

“मैं अभी खाना छोड़कर क्लॉक रूम की ओर जा रहा हूं और वापिस नहीं आऊंगा । उधर से भी बाहर जाने का रास्ता है । तुम यहां बैठी बदस्तूर खाना खाती रहना और यही जाहिर करना जैसे मैं अभी लौट कर आ जाऊंगा । मेरे पीछे लगा हुआ बदमाश भी यही समझेगा कि मैं खाना बीच में छोड़कर गया हूं इसलिये लौटकर आऊंगा ।”

“ओके ।”

“थैंक्यू । थैक्यू वैरी मच ।”

“लेकिन आज तुम वाकई बहुत रहस्यपूर्ण हरकतें कर रहे हो, राजा ।”

सुनील ने उत्तर न दिया । उसने अपनी जेब में हाथ डाल कर कुछ नोट निकाले और उन्हें चुपचाप सोफे पर अपने और फ्लोरी के बीच मे रख दिया ।

“यह क्या है ?”

“जब वेटर बिल लेकर आयेगा तब मैं यहां मौजूद नहीं होऊंगा इसलिये...”

“तौहीन कर रहे हो ?”

“फ्लोरी, प्लीज । आखिर तुम्हें मैंने आमंत्रित किया था ।”

“फिर क्या हुआ ?”

“देखो, बहस मत करो । बिल चुकाना मर्द का काम होता है और इसे मर्द को ही करने दो ।”

“मैं तुमसे ज्यादा कमाती हूं ।”

“फ्लोरी ! प्लीज, बहस मत करो ।”

“ओके । ओके ।”

सुनील फिर खाना खाने लगा ।

फिर एकाएक वह अपने स्थान से उठा । वह फ्लोरी की ओर देखकर मुस्कराया और फिर दूर बैठे आदमी की ओर बिना दृष्टिपात किये मेजों के बीच में से गुजरता हुआ उस द्वार की ओर बढा जिस पर हरे रंग के जगमगाते शब्दों में लिखा हुआ था - जेंट्स ।
 
सुनील वह द्वार ठेल कर बाहर पतले से गलियारे में निकल आया । उस गलियारे के एक सिरे पर सिनेमा हॉल की बाल्कनी का बाहर निकलने का दरवाजा था और दूसरे सिरे पर नीचे जाती हुई सीढियां थीं, जो अक्सर सिनेमा देखकर बाल्कनी से निकलने वाले लोगों द्वारा ही प्रयोग में लाई जाती थी । गलियारे के दूसरी ओर क्लाक रूम था ।

सुनील क्लाक रूम का द्वार ठेलकर भीतर घुस गया । क्लाक रूम की शीशे की स्क्रीन में से उसे बाहर का खाली गलियारा दिखाई दे रहा था ।

सुनील प्रतीक्षा करने लगा ।

मोटा आदमी गलियारे में प्रकट नहीं हुआ ।

सुनील क्लाक रूम से बाहर निकल आया और लम्बे डग भरता हुआ सीढियों की ओर बढा । वह तेजी से सीढियां उतरने लगा । सीढियां नीचे लिबर्टी सिनेमा के बुकिंग ऑफिस की बगल में समाप्त होती थीं ।

सुनील सिनेमा से बाहर निकला और सड़क पर आ गया ।

उसने तेजी से सड़क पार की और उस ओर बढा जिधर उसने अपनी मोटरसाइकल खड़ी की थी ।

उसने पार्किंग में से मोटरसाइकल निकाली और उसे मुख्य सड़क पर ले आया ।

मोटे आदमी का कहीं नाम निशान भी नहीं था ।

***

बैंक स्ट्रीट की तीन नम्बर इमारत के सामने सुनील ने अपनी मोटरसाइकल रोक दी । उसने मोटरसाइकल को इमारत की सीढियों के पास खड़ा करके ताला लगाया, सीढियों के रास्ते अपने फ्लैट के सामने पहुंचा और फ्लैट के मुख्य द्वार का ताला खोलकर भीतर प्रविष्ट हो गया । उसने दरवाजे को भीतर से बन्द करने के लिए हाथ बढाया तो उसी क्षण किसी ने भीतर से बन्द करने के लिए हाथ बढाया तो उसी क्षण किसी ने बाहर की ओर से दरवाजे को भरपूर धक्का दिया । दरवाजे का पल्ला भड़ाक से सुनील के चेहरे पर टकराया । फिर आनन-फानन तीन आदमी भीतर घुस गये । उनमें सबसे आगे वही मोटा आदमी था जो मैड हाउस से उसके पीछे लगा हुआ था और जिसे सुनील अपने ख्याल में ‘कोलाबा’ रेस्टोरेन्ट में डॉज देकर चला आया था ।

मोटे के हाथ में रिवाल्वर थी उसने रिवाल्वर की नाल को सुनील की छाती पर टिकाया और उसे पीछे की ओर धकेला । सुनील लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा और ड्राईंग रूम में आ गया ।

मोटे के पीछे खड़े दोनों आदमी पेशेवर बदमाश मालूम हो रहे थे । उनके चेहरों से क्रूरता टपक रही थी ।

“तुम्हारा नाम सुनील है ।” - मोटा यूं बोला जैसे उससे पूछ न रहा हो बल्कि उसे बता रहा हो ।

“हां ।” - सुनील बोला - “भले आदमी लोगों के घरों में यूं प्रविष्ट नहीं होते जैसे तुम हुए हो ।”

“चिन्ता मत करो ।” - मोटा बोला - “हम में से कोई भला आदमी नहीं है ।”

“क्या चाहते हो ?”

“तुम्हारी टांग बहुत लम्बी होती जा रही है । तुम खामखाह उसे ऐसे मामलों में अड़ाते फिरते हो जिनसे तुम्हारा कोई मतलब नहीं होना चाहिये । आज मैं तुम्हारी टांग तोड़ने आया हूं ।”

“तुम्हारे कौन-से मामले में टांग अड़ाई है मैंने ?”

“ऐसे सवाल मत करो जिनके जवाब तुम्हें मालूम हैं । आज ‘मैड हाउस’ में तुमने जो हरकत की है, वह तुम्हें नहीं करनी चाहिये थी । इस बार तो मैं सिर्फ तुम्हारी टांग ही तोडूंगा लेकिन अगर तुमने दुबारा कोई वैसी हरकत की तो तुम्हारी लाश कारपोरेशन के किसी भंगी को किसी गन्दे नाले में पड़ी मिलेगी ।”

“लेकिन मुझे पता तो लगे मैंने क्या किया है ? मैंने कौन-से तुम्हारे खेत के गन्ने उखाड़ लिये हैं ?”

मोटे ने उत्तर न दिया । वह एक ओर हट गया और अपने पीछे खड़े आदमियों से बोला - “यह आदमी बोलता बहुत है । इसका थोबड़ा बन्द करो ।”

पीछे खड़े दोनों आदमी दृढ कदमों से सुनील की ओर बढे ।

सुनील ने एकाएक मोटे आदमी पर छलांग लगा दी लेकिन मोटा सावधान था । सुनील का हाथ मोटे के रिवाल्वर वाले हाथ पर पड़ने के स्थान पर हवा में ही लहराकर रह गया । मोटा एक अनुभवी मुक्केबाज की तरह एक कदम पीछे हटा और फिर उसका रिवाल्वर वाला हाथ हवा में घूमा ।

रिवाल्वर की नाल भड़ाक से सुनील की कनपटी से टकराई । सुनील को यूं लगा जैसे उसकी कनपटी से तोप का गोला आकर टकराया हो । उसके नेत्रों के सामने लाल-पीले सितारे नाच गये । वह पीछे की ओर लड़खड़ाया और सोफे पर ढेर हो गया ।

एक आदमी ने उसे कॉलर से पकड़ लिया और एक झटके के साथ उसे सोफे से खड़ा कर दिया । फिर उसके दूसरे हाथ का भरपूर घूंसा सुनील के पेट में पड़ा । उस दौरान उसने सुनील के गिरहबान से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी थी । सुनील उसकी पकड़ में ही दोहरा हो गया । उस आदमी का दूसरा घूंसा सुनील की गरदन के पृष्ठ भाग से टकराया । साथ ही उसने सुनील का गिरहबान छोड़ दिया । सुनील मुंह के बल फर्श पर जाकर गिरा । दूसरे आदमी का पांव हवा में घूमा और उसकी भरपूर ठोकर सुनील की पसलियों में पड़ी । सुनील फुटबाल की तरह दूसरी ओर पलट गया । पीड़े के अधिक्य से उसके नेत्रों में आंसू आ गये ।

कुछ क्षण के लिये किसी ने उस पर नया प्रहार करने का उपक्रम न किया ।

“सुनील” - मोटे का प्यार भरा स्वर उसके कानों में पड़ा - “उठकर अपने पैरों पर खड़े हो जाओ ।”

सुनील ने जमीन से उठने का उपक्रम न किया ।

मोटा आगे बढा और सुनील के सिर पर आ खड़ा हुआ । उसने अपना दायां पांव ऊपर उठाया और फिर उसे यूं सुनील की खोपड़ी पर पटका जैसी ओखली में मसूल मार रहा हो लेकिन सुनील तत्काल करवट बदल गया । मोटे का पांव भड़ाक से फर्श पर टकराया और वह लड़खड़ा गया । सुनील ने लेटे-लेटे ही हाथ बढाकर उसकी टांग खींच ली । मोटा धड़ाम से फर्श पर आ गिरा । रिवाल्वर उसके हाथ से निकल गई । सुनील बिजली की तेजी से रिवाल्वर की ओर झपटा लेकिन मोटे के दोनों साथियों ने उसे रास्ते में ही दबोच लिया ।

“सुनील साहब !” - एकाएक कहीं से कोई पुरुष स्वर सुनाई दिया - “क्या उठा-पटक मचा रखी है ! आधी रात को तो आराम करने दो ।”

मोटा तब तक सम्भल चुका था । उसने फर्श से रिवाल्वर उठा ली थी ।

“जल्दी करो ।” - वह अपने साथियों से बोला - “यह शायद नीचे के फ्लैट वाला बोल रहा था । मुझे डर है कहीं वह ऊपर न आ जाये ।”

मोटे का सिग्नल मिलने की देर थी कि एक आदमी ने अपने एक हाथ से उसका मुंह दबोच लिया और दूसरे हाथ से उसकी बांह पकड़ ली । दूसरे आदमी ने अपने बायें हाथ से उसकी दूसरी बांह पकड़ी और फिर खाली हाथ से सुनील के शरीर के विभिन्न भागों पर ताबड़-तोड़ घूंसे जमाने लगा ।

सुनील को किस्तों में अपनी जान निकलती महसूस होने लगी ।

“काफी है ।” - मोटे की आवाज उसे यूं सुनाई दी जैसे किसी गहरे कुएं में निकल रही हो - “तलाशी लो ।”

किसी ने सुनील के शरीर से उसका कोट नोच लिया । सुनील की चेतना लुप्त नहीं हुई थी लेकिन वह अपनी उंगली भी हिला पाने की स्थिति में नहीं रहा था । उसके दिमाग में सायं-सायं हो रही थी और उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसका सिर अभी हजार टुकड़ों में विभक्त होकर कमरे में बिखर जायेगा । अपने शरीर का कोई अंग उसे अपने शरीर से सम्बन्धित नहीं मालूम हो रहा था । बदमाशों के रूखे और कठोर हाथ उसे अपने शरीर पर पड़ते मालूम हो रहे थे लेकिन वह किसी भी बात का रंच मात्र भी विरोध करने की स्थिति में नहीं था ।
 
किसी ने बड़ी बेरहमी से उसके शरीर को उलट दिया । फिर उसे अपनी कमीज अपने शरीर से अगल होती दिखाई दी ।

“चलो ।” - कोई जोर से बोला ।

किसी का भारी पांव सुनील के पेट पर पड़ा । सुनील के मुंह से एक कराह निकल गई । उसे भारी कदमों की धम धम सुनाई दी । फिर कोई दरवाजा भड़ाक की आवाज से बन्द होने का शोर सुनाई दिया ।

सुनील ने अपने दांत भींच लिये और अपनी बची-खुची शक्ति का संचय करने का प्रयत्न करने लगा । उसका कांपता हुआ हाथ सोफे की बांह की ओर बढा । बड़ी मुश्किल से सोफे की बांह उसकी पकड़ में आई । उसने अपने सिर को एक जोर का झटका दिया और फिर वह अपने पैरों पर खड़ा होने का उपक्रम करने लगा । बड़ी कठिनाई से वह सीधा खड़ा होने में सफल हो पाया । वह लड़खड़ाता हुआ खिड़की की ओर बढा, खिड़की के समीप आकर उसने चौखट का सहारा ले लिया और नीचे सड़क पर झांका । उसे कुछ भी स्पष्ट दिखाई न दिया । रह-रहकर उसे अपने नेत्रों के सामने सितारे नाचते दिखाई दे जाते थे । सुनील ने अपने सिर को झटका दिया, तीन-चार बार अपनी आंखें मिचमिचाई और फिर नीचे झांका ।

इमारत के समीप, लैम्प पोस्ट के एकदम नीचे एक काले रंग की एम्बैसेडर खड़ी थी । एम्बैसेडर की बायीं ओर का पिछला दरवाजा कार की बाडी के साथ एक रस्सी से बन्धा हुआ था । दरवाजे का आस-पास का ढेर सारा पैंट भी उखड़ा हुआ था । उसी दरवाजे की एकदम बीच में एक भारी डैंट दिखाई दे रहा था ।

उसी क्षण मोटा और उसके दोनों साथी इमारत से बाहर निकले । जल्दी से वे उस कार में सवार हुए । अगले ही क्षण कार स्टार्ट हुई और बैंक स्ट्रीट में दौड़ती हुई दृष्टि से ओझल हो गई ।

बहुत कोशिश करने के बावजूद सुनील उस कार का नम्बर न देख सका ।

फिर वह वहीं खिड़की के समीप फर्श पर बैठ गया । उसके नेत्र अपने आप मुंद गये ।

लगभग पांच मिनट बाद उसने नेत्र खोले । उसका सारा शरीर बुरी तरह दुख रहा था लेकिन अब उसे अपनी चेतना लुप्त होती महसूस नहीं हो रही थी । उसने कुछ लम्बी-लम्बी सांसें लीं, अपनी आंखों को अपने हाथ के पृष्ठ भाग से रगड़ा और फिर उठकर खड़ा हो गया ।

उसने देखा उसके शरीर पर केवल पतलून और बनियान मौजूद थी । पतलून की जेबें बाहर की ओर उल्टी हुई थीं और कमीज फर्श पर पड़ी थी । उसका कोट एक सोफे की पीठ पर पड़ा था । कोट और पतलून की जेबों का सारा सामान फर्श पर बिखरा पड़ा था । एक-एक करके उसने सारी चीजें समेटनी आरम्भ कर दीं ।

चश्मा ।

फाउन्टेन पैन ।

‘ब्लास्ट’ का आइडेन्टिटी कार्ड ।

डायरी ।

कुछ जरूरी कागजात ।

रूमाल ।

चाबियां ।

लगभग साढे तीन सौ रुपये के नोट ।

उसकी जेबों में से निकली गई कोई भी चीज चोरी नहीं गई थी । सब कुछ मौजूद था । मोटे के साथियों ने उसकी भरपूर तलाशी ली थी लेकिन वे कुछ भी साथ लेकर नहीं गये थे ।

फिर एकाएक उसे मुकुल की तस्वीर का ख्याल आया और फिर उसकी समझ में आ गया कि मोटे के साथी उसकी जेबों में क्या तलाश कर रहे थे ।

मुकुल की तस्वीर उसकी जेब में से गायब थी ।

वह लड़खड़ाते कदमों से चलता हुआ बैडरूम की ओर बढा ।

उसने एक अलमारी खोलकर उसमें से ब्रांडी की बोतल निकाली । उसने एक गिलास को तीन-चौथाई ब्रांडी से भरा और फिर उसमें बिना पानी मिलाये ब्रांडी को हलक में उंढेल लिया । नीट ब्रांडी उसके गले से लेकर पेट तक लकीर-सी खींचती चली गई लेकिन शीघ्र ही उसे स्वयं में शक्ति का संचार होता अनुभव हुआ ।

उसने नये कपड़े निकालकर पहने, सिर पर एक फैल्ट हैट जमाई और फ्लैट से बाहर आ गया । उसने फ्लैट को ताला लगाया और सीढियों से गुजरता हुआ इमारत से बाहर आ गया ।

वह अपनी मोटरसाइकल के समीप पहुंचा । बड़ी कठिनाई से वह मोटरसाइकल स्टार्ट कर पाया । उसके शरीर का एक-एक जोड़ बुरी तरह दुख रहा था ।

वह मोटरसाइकल पर सवार हुआ और दुबारा मैजेस्टिक सर्कल की ओर उड़ चला ।

मैजेस्टिक सर्कल से थोड़ी दूर ही उसने फुटपाथ पर चढाकर अपनी मोटरसाइकल खड़ी कर दी । उसने फैल्ट हैट का अग्र भाग अपने माथे पर और झुका लिया और फिर सर्कल की ओर बढा । उसने घड़ी पर दृष्टिपात किया । एक बजने को था ।

वह सिर झुकाये मैड हाउस के समीप से गुजरा । ‘मैड हाउस’ अभी बन्द नहीं हुआ था । बेसमेन्ट से विलायती धुनों की आवाजें अभी भी जा रही थीं ।

लिबर्टी सिनेमा के सामने एकाएक वह ठिठक गया । सिनेमा के सामने फुटपाथ के साथ-साथ तीन-चार कारें खड़ी थीं जिनमें से एक वही काले रंग की एम्बैसेडर थी जिस पर उसने मोटे को और उसके दोनों साथियों को सवार होकर बैंक स्ट्रीट से जाते देखा था । कार की बायीं ओर का पिछला दरवाजा कार की बॉडी के साथ एक रस्सी से बांध हुआ था । उसी दरवाजे के आसपास का ढेर सारा पेन्ट भी उखड़ा हुआ था और दरवाजे के एकदम बीच में एक भारी डेंट दिखाई दे रहा था ।

कार का नम्बर था - आर जे एस 2128

नम्बर सुनील के दिमाग में लिख गया ।

उसी क्षण उसकी निगाह ‘मैड हाउस’ के मुख्य द्वार पड़ी ।

वहां गेटकीपर के समीप वही मोटा आदमी खड़ा था जो सुनील के फ्लैट में उसकी मरम्मत करके भागा था । वह अपने पहले वाले दो साथियों के साथ खड़ा बातें कर रहा था ।

सुनील ने अपनी फैल्ट हैट का सामने का कोना और अपने माथे पर झुका लिया और फिर लिबर्टी सिनेमा की पोर्टिको के एक खम्बे की ओट में हो गया ।

कुछ क्षण बाद मोटे के साथी मोटे से अगल हुए और फिर मोड़ घूमकर दृष्टि से ओझल हो गये ।

मोटा सिनेमा की ओर बढा ।

सुनील खम्बे के पीछे और सिमट गया ।

मोटा चलता हुआ सिनेमा की पोर्टिको में पहुंचा । वह सुनील से केवल तीन फुट दूर से गुजरा । फिर सुनील ने उसे सिनेमा के बगल की कपड़ों की दुकान के पास के दरवाजे के भीतर प्रविष्ट होते देखा ।

सुनील खम्बे के पीछे से निकला और लपक कार आगे बढा ।

मोटा भीतर सीढियों की बगल में बनी लिफ्ट में प्रविष्ट हो रहा था । उसके देखते लिफ्ट का दरवाजा बन्द हुआ और लिफ्ट ऊपर उठने लगी ।

सुनील लिफ्ट के समीप पहुंचा । उसने लिफ्ट के इन्डीकेटर पर अपनी निगाह जमा दी । इन्डीकेटर में इमारत की मंजिलों के नम्बर लगे हुए थे । लिफ्ट जिस मंजिल से गुजरती थी, उस मंजिल के नम्बर की बत्ती जल जाती थी ।

पांचवीं मंजिल की बत्ती जली और फिर जली रह गई ।

लिफ्ट पांचवीं मंजिल पर जाकर रुक गई थी ।
 
पांचवीं मंजिल पर केवल फोर स्टार नाइट क्लब थी ।

सुनील सोचने लगा । मोटे जैसे आदमी का फोर स्टार नाइट क्लब से क्या वास्ता हो सकता था ?

उसने एक सिगेरट सुलगाया और सोचने लगा । अगर मोटा और फोर स्टार नाइट क्लब किसी भी रूप से एक-दूसरे से सम्बन्धित थे तो इतनी रात गये नाइट क्लब में जाना खतरनाक सिद्ध हो सकता था ।

उसने मोटे का थोड़ी देर वहीं इन्तजार करने का फैसला किया ।

वह लिफ्ट के पास से हटकर बाहर फुटपाथ पर आ गया ।

लगभग पांच मिनट बाद लिफ्ट के इन्डीकेटर में पांच नम्बर की बत्ती बुझ गई और कुछ क्षण बाद चार नम्बर की बत्ती जल उठी ।

लिफ्ट नीचे आ रही थी ।

सुनील ने सिगरेट का बचा हुआ टुकड़ा फेंका दिया और लपककर सड़क पार कर गया । वह सड़क के पार एक पेड़ की ओट में खड़ा हो गया ।

लिफ्ट नीचे पहुंची, उसका द्वार खुला, मोटा लिफ्ट में से निकला और लम्बे डग भरता हुआ सीधा सिनेमा के सामने फुटपाथ के साथ खड़ी अपने आर जे एस 2128 नम्बर वाली काली एम्बैसेडर की ओर बढा ।

सुनील पेड़ के पीछ से निकलकर तेजी से उस ओर बढा जहां वह अपनी मोटरसाइकल खड़ी करके आया था ।

मोटा कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ चुका था ।

सुनील अपनी मोटरसाइकल के पास पहुंचा ।

मोटे ने कार स्टार्ट की, उसे वहीं से ही यू टर्न दिया और चौराहे की तरफ बढा । चौराहे के ट्रैफिक सिग्नल की बत्तियां कब की बुझ चुकी थीं । काली एम्बैसेडर बन्दूक से छूटी गोली की तरह चौराहा पार कर गई ।

सुनील ने तत्काल अपनी मोटरसाइकल मोटे की कार के पीछे लगा दी । वह बड़ी सावधानी से कार का पीछा करने लगा ।

रास्ते में सुनसान पेड़ थे और मोटरसाइकल के साढे सात हॉर्स पावर के शक्तिशाली इंजन की आवाज उस सन्नाटे में काफी ऊंची मालूम पड़ रही थी । किसी भी क्षण मोटे को पता लग सकता था कि एक मोटरसाइकल उसका पीछा कर रही थी ।

सुनील कार और मोटरसाइकल के बीच में अधिक-से-अधिक फासला रखकर मोटरसाइकल चलाता रहा । मोटे के किसी एक्शन में उसे ऐसा आभास नहीं मिल रहा था कि उसे अपना पीछा किये जाने की जानकारी हो चुकी थी ।

मोटे की कार भगत सिंह रोड की ओर मुड़ गई । मोड़ काटते ही कार के रफ्तार कम हो गई ।

सुनील सावधान हो गया । उसने भी मोटरसाइकल की रफ्तार कम कर दी ।

भगत सिंह रोड की एक इमारत के सामने फुटपाथ पर चढाकर मोटे ने कार खड़ी कर दी ।

सुनील ने मोटरसाइकल रोक दी ।

मोटे ने कार को ताला लगाया और इमारत में प्रविष्ट हो गया ।

सुनील मोटरसाइकल से उतरकर उस इमारत की ओर भागा ।

इमारत का मुख्य द्वार खुला था । ड्योढी में से ही ऊपर की ओर सीढियां जा रही थीं । मोटा उस तीनमंजिली विशाल इमारत से कहीं गायब हो चुका था । इमारत की हर मंजिल पर कम से कम चार फ्लैट थे और सुनील के पास यह जानने का कोई साधन न था कि मोटा उन बारह फ्लैटों में से किस में घुस गया था ।

वह बाहर फुटपाथ पर आ गया । उसने इमारत की ऊंचाई की ओर निगाह दौड़ाई । इमारत अन्धकार के गर्त में डूबी हुई थी । वहां कोई बत्ती नहीं जल रही थी ।

उसी क्षण दूसरी मंजिल के दायीं ओर के फ्लैट की खिड़कियों मे प्रकाश दिखाई दिया ।

सुनील तनिक आशान्वित हो उठा । मोटा शायद उसी फ्लैट में गया था ।

वह फुटपाथ पर खड़ा उस प्रकाशित खिड़की की ओर देखता रहा ।

पांच मिनट बाद बत्ती बुझ गई और इमारत फिर पहले जैसी अंधेरी हो गई ।

मोटे के उस फ्लैट में होने की काफी सम्भावना थी । फ्लैट की बत्ती मोटे के इमारत के प्रविष्ट होने के बाद उतनी ही देर जली थी जितनी देर में कोई आदमी कपड़े बदलकर बिस्तर में प्रविष्ट हो सके ।

उसने इमारत का नम्बर देखा । द्वार के पास एक लड़की की तख्ती लगी थी जिस पर लिखा था - शान्ति सदन, साठ - भगत सिंह रोड ।

इसी क्षण इमारत के आगे एक स्कूटर आकर रुका, उसमें से एक युवक बाहर निकला, उसने स्कूटर वाले के पैसे चुकाये और फिर इमारत की ओर बढा ।

सुनील की ओर देखकर वह ठिठका ।

“भाई साहब” - सुनील आगे बढकर बोला - “आपको मालूम है यहां वर्मा जी कौन-से फ्लैट में रहते हैं ?”

“शान्ति सदन में ?” - युवक ने पूछा ।

“जी हां ।”

“वर्मा जी...” - युवक सोचने लगा ।

“ठिगने से कद के हैं । कुछ आकार में जरा डबल ही हैं । सांवले से हैं । चेहरे पर बारीक-सी मूंछे रखते हैं । उम्र लगभग पैंतीस साल है ।”

“आप तो सोहन लाल का हुलिया बयान कर रहे हैं लेकिन मैंने किसी को उसके नाम के साथ कभी वर्मा लगाते तो नहीं सुना । अगर सोहन लाल ही वर्मा है तो वह तो दूसरी मंजिल पर सामने वाले भाग में दायीं ओर के फ्लैट में रहता है ।”

“मैं जिन वर्मा जी के बारे में पूछ रहा हूं, उनका नाम तो राधे मोहन है ।”

“राधे मोहन नाम के कोई साहब इस इमारत में नहीं रहते ।”

“अच्छा ! ओके, थैंक्यू । मुझ ही से कोई गलती हो गई मालूम होती है ।” - सुनील बोला और युवक को वहीं खड़ा छोड़कर आगे बढ गया ।

युवक कुछ क्षण उलझनपूर्ण नेत्रों से उसे जाता देखता रहा और फिर कन्धे उचकाकर सीढियों की ओर बढ गया ।

सोहन लाल ! - सन्तुष्टिपूर्ण ढंग से गरदन हिलाता सुनील धीरे से बुदबुदाया ।

मोटे का नाम और पता उसे आसानी से मालूम हो गया था ।

उसने मोटरसाइकल सम्भाली और उस का रुख हर्नबी रोड की ओर मोड़ दिया ।
 
यूथ क्लब में तीन-चार लोग अभी भी हॉल में बैठे बतिया रहे थे । रमाकांत ऊपर अपने कमरे में जा चुका था । वह सीढियां चढकर पहली मंजिल पर स्थित रमाकांत के कमरे के सामने पहुंचा ।

कमरे का द्वार बन्द था । उसने द्वार खटखटाया ।

“कौन है ?” - भीतर से रमाकांत का रूखा स्वर सुनाई दिया ।

“सुनील ।” - सुनील बोला ।

“अगले साल आना ।”

“दरवाजा तो खोलो ।”

“कहा न बाबा, अगले साल आना और अगर तुम मुकुल नाम के उस हिप्पी के बारे में कुछ पूछने आये हो तो अभी उसके बारे में कुछ भी नहीं मालूम हुआ है । जब कुछ मालूम होगा तो मैं तुम्हें टेलीफोन कर दूंगा । मेरे पास कोई अलादीन का चिराग नहीं है जो मैं...”

“अरे ओ वड्डे भापा जी !” - सुनील चिल्लाकर बोला - “अब बके ही जाओगे या दरवाजा भी खोलोगे !”

“अच्छा, अगले साल नहीं तो कल सुबह आ जाना ।”

सुनील ने पूरी शक्ति से अपने कन्धे का प्रहार दरवाजे पर किया । दरवाजे की चूलें हिल गई ।

तत्काल द्वार खुला । द्वार पर उसे ड्रेसिंग गाउन में लिपटा हुआ रमाकांत दिखाई दिया ।

“यह क्या बदतमीजी है ?” - वह क्रोधित स्वर में बोला ।

“क्या कहने !” - सुनील कमरे में प्रविष्ट होता हुआ बोला - “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे ।”

“क्या आफत आ गई है ?”

“तुम इतना उखड़ क्यों रहे हो ?” - सुनील ने एक कुर्सी पर बैठते हुए पूछा ।

“आज मैं रम्मी में तीन सौ रुपये हार गया हूं ।” - रमाकांत झुंझलाये स्वर में बोला ।

“बस ! इतनी-सी बात ? मरे क्यों जा रहे हो ? आज हारे तो कल जीत जाओगे ।”

“कोई गारन्टी है ?”

“गारन्टी नहीं है लेकिन सिर्फ तीन सौ रुपये हारने से तुम्हारा हार्ट फेल क्यों हो रहा है ? इतना कमाते हो । आफत क्या आ गई ?”

रमाकांत ने गहरी सांस ली और देवदास जैसी मुद्रा बनाकर गम्भीर स्वर में बोला - “यहां बेजार बैठे हैं, तुझे अठखेलियां सूझी हैं ।”

“लो, सिगरेट पियो ।” - सुनील जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकालता हुआ बोला ।

“मैं यह घोड़े की लीद की सिगरेट नहीं पीता ।” - रमाकांत बोला - “मैं अपना ब्रांड पियूंगा ।”

और उसने ड्रैसर से अपनी चार मीनार का पैकेट उठा लिया ।

सुनील ने पहले अपना और फिर रमाकांत का सिगरेट सुलगा दिया ।

“कैसे दर्शन दिये ?” - रमाकांत ने पूछा ।

सुनील ने एक कागज पर आर जे एस 2128 लिखा और कागज रमाकांत की ओर बढा दिया ।

“यह एक काली एम्बैसेडर कार का नम्बर है । इसके मालिक का पता लगाना है ।”

रमाकांत ने कागज लेकर लापरवाही से ड्रैसर पर फेंक दिया ।

“यह काम फौरन होना है, प्यारेलाल ।”

रमाकांत ने कागज की ड्रैसर से उठाकर अपने गाउन की जेब में रख लिया और फिर बोला - “और ?”

“और सुनो ।” - सुनील ने पहले मोटे का हुलिया बयान किया और फिर बोला - “यह आदमी भगत सिंह रोड की शांति सदन नाम की साठ नम्बर इमारत में रहता है । यह लगभग निश्चित ही है कि उसका नाम सोहन लाल है और शान्ति सदन की दूसरी मंजिल के सामने भाग का दायीं और वाला फ्लैट उसका है । मैजेस्टिक सर्कल पर लिबर्टी बिल्डिंग नाम की इमारत है । उस इमारत की पांचवीं मंजिल पर फोर स्टार नाइट क्लब नाम की एक नाइट क्लब है और बेसमेंट में मैड हाउस नाम का एक डिस्कोथेक है ।”

“मुझे मालूम है । तुम जल्दी-जल्दी चलाओ और फिर यहां से दफा होने का प्रोग्राम बनाओ ।”

“ओके । तुमने यह पता लगाना है कि क्या सोहन लाल फोर स्टार नाइट क्लब से या मैड हाउस से किसी रूप में सन्बन्धित है ? और यह कि उसका मुकुल से या मुकुल का उस से क्या सम्बन्ध है !”

“अच्छी बात है । और ?”

“और मुझे एक रिवाल्वर दिलाओ ।”

“क्या ?” - रमाकांत आंखें निकालकर बोला ।

“मैंने कहा है, मुझे एक रिवाल्वर दिलाओ ।”

“क्यों ? क्या करोगे उसका ? किसी का खून करना है क्या ?”

“किसी का खून नहीं करना है, मेरे बाप । मुझे रिवाल्वर अपनी सुरक्षा के लिए चाहिये ।”

“क्यों ? एकाएक तुम्हें अपनी सुरक्षा की क्यों जरूरत महसूस होने लगी है ?”

“मैं अभी पिटकर आ रहा हूं ।”

“पिटकर आ रहे हो ?”

“हां । बुरी तरह से ।”

“कब ?”

“अभी थोड़ी ही देर पहले । जिस सोहन लाल का मैंने तुम से जिक्र किया है, वह अपने बदमाशों के साथ जबरदस्ती मेरे फ्लैट में घुस आया था और मेरी ऐसी मरम्मत करके गया है कि मुझे यूं लगता है जैसे मेरे ऊपर से स्टीम रोलकर गुजर गया हो ।”

“फिर भी तुम इतने ढीठ हो कि घर बैठकर आराम करने के स्थान पर आधी रात गये सड़कों पर कूदते फिर रहे हो !”

“हां ।” - सुनील बड़ी शराफत से बोला ।

“क्या हां ?”

“मैं इतना ढीठ हूं पिटकर आराम करने के स्थान पर आधी रात गये सड़कों पर कूदता फिरता हूं ।”

“इसका मतलब यह हुआ कि सिर्फ तुम ढीठ ही नहीं, अहमक भी हो ।”

“हूं ! अब तुम फटाफट रिवाल्वर दिलाओ ।”

“ओह माई गॉड !” - रमाकांत अपना माथा ठोक कर बोला - “सेम ओल्ड गेलेन्ट मिस्टर सुनील । सेम ओल्ड स्टोरी ऑफ ए डैमसेल इन डिस्ट्रैस ! मैं पूछता हूं तुम्हें जब अक्ल आयेगी ?”

“ओह, शटअप ।”

“कहीं तुम रायबहादुर भवानी प्रसाद जायसवाल की खूबसूरत और कड़क जवान विधवा से इश्क तो नहीं लड़ा रहे हो ?”

“अब तुम बकवास करनी बन्द करते हो या मैं तुम्हारे एक-दो दांत तुम्हारे हलक में धकेल दूं ।”

“पिटकर आने के बाद भी तुम्हारे में इतना दम है ?”

“है ।” - सुनील नथुने फुलाकर बोला ।

“फिर मैं चुप कर जाता हूं ।”

“अब रिवाल्वर निकालो ।”

“मैं तुम्हें रिवाल्वर नहीं दे सकता ।”

“क्यों ?”

“मैं नहीं चाहता कि कोई घपला हो ।”

“क्या घपला हो सकता है ?”
 
“मुझे भय है कि कहीं तुम जाकर सोहन लाल की हत्या न कर दो और तुम्हें रिवाल्वर देने की वजह से तुम्हारे साथ-साथ मैं भी न फंस जाऊं ।”

“ऐसा कुछ नहीं होगा” - सुनील झल्लाकर बोला - “अगर मुझे सोहन लाल की हत्या करनी होती तो मैं तुम्हें उसके बारे में बताता ही क्यों ?”

“यह तो तुम ठीक कह रहे हो ।”

“तो फिर निकालो रिवाल्वर ।”

रमाकांत ने सिगरेट ऐश ट्रे में डाला और कोने में रखी एक मेज के दराज का ताला खोलकर रिवाल्वर निकाल लाया ।

सुनील ने देखा वह 38 कैलिबर की छोटी नाल वाली रिवाल्वर थी । उसने रिवाल्वर का चैम्बर खोलकर देखा । चैम्बर पूरा भरा हुआ था । उस ने रिवाल्वर अपनी पतलून की बैल्ट में खोंस ली ऊपर से बटन बन्द कर लिये ।

वह उठ खड़ा हुआ ।

“एक बात तो बताते जाओ ।” - रमाकांत तनिक व्यग्र स्वर में बोला ।

“पूछो ।”

“इस मामले में कोई नगदऊ के दर्शन नहीं होंगे ?”

“नहीं होंगे ।”

“और जो खर्चा हो रहा है, उसका क्या होगा ? मैंने जौहरी को प्लेन से बम्बई भेजा है ।”

“तुम्हारे खर्चे की भरपाई हो जायेगी ।”

“कैसे ?”

“कैसे मत सोचो । तुम आम खाने से मतलब रखो, पेड़ गिनने से नहीं ।”

“फिर भी ।”

“फिर कुछ नहीं । मैं जाता हूं । अगर इस बार तुमने मुझे टोका तो मैं अगली मार्च तक तुम्हारे इस कमरे में से नहीं टलूंगा ।”

“जाओ बाबा जाओ ।” - रमाकांत बौखला कर बोला - “कहो तो मैं तुम्हें घर तक छोड़ आऊं ?”

“उसकी जरूरत नहीं । मेहरबानी । गुडनाइट ।”

“गुड मार्निंग ।” - रमाकांत मुंह बिगाड़कर बोला ।

“ओके । गुड मॉर्निंग ।” - सुनील बोला और कमरे से बाहर निकल गया ।
 
Chapter 2

अगले दिन लगभग ग्यारह बजे सुनील ‘ब्लास्ट’ के दफ्तर में अपने केबिन में बैठा था कि टेलीफोन की घन्टी बजी । उस ने रिसीवर उठाया ।

लाइन पर रमाकांत था ।

“सुनील” - दूसरी ओर से उसे रमाकांत का गम्भीर स्वर सुनाई दिया - “जो कुछ तुमने कुछ पूछा था, मैं तुम्हें उससे कुछ ज्यादा ही बताने जा रहा हूं ।”

“थैंक्यू वैरी मच ।” - सुनील बोला - “शुरू हो जाओ ।”

“आर जे एस 2128 नम्बर की काली एम्बेसेडर गाड़ी राम ललवानी के नाम रजिस्टर्ड है ।”

“और राम ललवानी कौन है ?”

“बताता हूं । मुझे पहले ही मालूम था कि तुम यह सवाल जरूर पूछोगे । राम ललवानी एक लगभग चालीस साल का मोटा-ताजा सिन्धी है और फोर स्टार नाइट क्लब और मैड हाउस डिस्कोथेक का मालिक है ।”

सुनील के मुंह से सीटी निकल गई ।

“क्या बहुत पैसे वाला आदमी है वह ?” - सुनील ने पूछा ।

“मालूम नहीं ।” - रमाकांत का स्वर सुनाई दिया - “राजनगर में कोई उसे जानता ही नहीं है । बस इतना मालूम हो सका है कि वह बम्बई से राजनगर आया है । मैजेस्टिक सर्कल जैसे इलाके में लोगों को एक कोठरी किराये पर हासिल करने में दांतों पसीने आ जाते हैं लेकिन राम ललवानी ने आनन-फानन लिबर्टी बिल्डिंग की पूरी पांचवीं मंजिल और बेसमेंट हथिया ली ।”

“बेसमेंट और पांचवीं मंजिल पर पहले क्या था ?”

“पहले बेसमेंट में किसी कम्पनी का गोदाम था और पांचवीं मंजिल पर दो बिजनेस आफिस थे ।”

“राम ललवानी उनसे जगह खाली करवाने में कैसे सफल हो गया ?”

“यही तो मजेदार बात है । राम ललवानी ने तो कुछ भी नहीं किया । वह तो केवल तमाशा देखता रहा ।”

“तो फिर यह सब कैसे सम्भव हुआ ?”

“तुम जानते हो वास्तव में लिबर्टी बिल्डिंग किसकी है ?”

“नहीं ।”

“सेठ मंगत राम की ।”

सेठ मंगत राम करोड़पति आदमी था और भारतवर्ष के गिने-चुने पांच बड़े उद्योगपतियों मे से एक था । राजनगर में और राजनगर से बाहर उसके कई कपड़े, जूट और स्टील के कारखाने थे ।

“लिबर्टी बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल और बेसमेंट सेठ मंगत राम ने खाली करवाई थी” - रमाकांत फिर बोला - “और सुनने में आया है कि उस जगह को खाली करवाने के लिये सेठ मंगत राम को किरायेदारों को लाखों रुपया हरजाना देना पड़ा था ।”

“यह सब सेठ मंगत राम ने राम ललवानी के लिये किया ?”

“हां ।”

“क्यों ?”

“मालूम नहीं ।”

“मालूम करो ।”

“कोशिश जारी है प्यारयो, लेकिन कुछ मालूम हो पाने की सम्भावना नहीं है । राम ललवानी तो बहुत ही रहस्यपूर्ण आदमी मालूम हो रहा है मुझे । कोई कुछ जानता ही नहीं उसके बारे में । अब तो वह बड़ा रईस आदमी है - शंकर रोड पर उसकी शानदार कोठी है । कई कारें हैं उसके पास - लेकिन मैंने एक बात सुनी है कि जब वह राजनगर आया था, तो उसके पास कोई खास रुपया-पैसा नहीं था । पिछले सात-आठ महीनों में ही न जाने कैसे उसने अपना काया पलट कर लिया ।”

शायद सेठ मंगत राम की वजह से ?”

“शायद ।”

“राम ललवानी सेठ मंगत राम का कोई रिश्तेदार तो नहीं है ?”

“मैं पता लगवाने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन दोनों के रिश्तेदार होने की सम्भावना मुझे कुछ कम ही दिखाई देती है । सेठ मंगत राम यू.पी. का है और राम ललवानी सिन्धी है ।”

“फिर भी तुम चैक तो करवाओ ।”

“मैंने आदमी लगा रखे हैं । अब तुम उस ठिगने के बारे में सुनो जिसने कल रात तुम्हारे फ्लैट पर तुम्हारी धुनाई करवाई थी ।”

“कहो ।”

“उसका नाम सोहन लाल ही है और वह शान्ति सदन के उसी फ्लैट में रहता है जिसका तुमने जिक्र किया था । मैड हाउस या फोर स्टार नाइट क्लब से उसका क्या सम्बन्ध है, यह मुझे नहीं मालूम हो सका लेकिन वह राम ललवानी के साथ अक्सर देखा जाता है । वह जरायमपेशा आदमी है । पहले धर्मपुरे में रहता था और नकली शराब का धन्धा करता था फिर वह छः सात साल राजनगर से गायब रहा था । आठ-दस महीने पहले से वह फिर राजनगर में दिखाई देने लगा है । आजकल वह बड़े सलीके से शान्ति सदन में रह रहा है और बड़ा सम्पन्न और मान-मर्यादा वाला आदमी मालूम होता है ।”

“यानी कि जब से वह राम ललवानी के सम्पर्क में आया है, उसका कायापलट हो गया है !”

“ऐसा ही मालूम होता है ।”

“मुकुल के बारे में कुछ मालूम हुआ ?”

“धीरज रखो, प्यारयो । जौहरी बम्बई गया हुआ है । जब वह कोई रिपोर्ट भेजेगा तो मैं फौरन तुम्हें सूचित कर दूंगा । मेरे पास कोई जादुई चिराग तो नहीं है जिसे घिसकर मैं...”

“मुझे राम ललवानी की कोई तस्वीर दिलवा सकते हो ?” - सुनील उसकी बात काटकर बोला ।

“राम ललवानी की तस्वीर तुम्हें मेरी मदद के बिना ही हासिल हो सकती है ।”

“कैसे ?”

“जब फोर स्टार नाइट क्लब खुली थी तो राजनगर से छपने वाले हर अखबार में उसका पूरे-पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपा था । उस विज्ञापन में राम ललवानी की तस्वीर भी थी । वह विज्ञापन ‘ब्लास्ट’ में भी जरूर छपा होगा । तुम ‘ब्लास्ट’ की पुरानी फाइलों टटोल लो, उनमें तुम्हें राम ललवानी की तस्वीर मिल जायेगी ।”

“ओके, थैंक्यू ।” - सुनील बोला और उसने रिसीवर रख दिया ।

***
 
सुनील ने भगत सिंह रोड पर शान्ति सदन के सामने अपनी मोटरसाइकल रोकी । वह मोटरसाइकल से उतरा और इमारत में प्रविष्ट हो गया ।

वह दूसरी मंजिल पर पहुंचा । उसने अपनी पतलून की बैल्ट में खुंसी हुई रिवाल्वर को टटोला और फिर सोहन लाल के फ्लैट का द्वार खटखटाया ।

“कौन है ?” - कोई भीतर से बोला ।

वह निसन्देह मोटे की आवाज थी ।

“दरवाजा खोलो ।” - सुनील आवाज बदल कर बोला ।

“कौन है ?”

“मुझे ललवानी साहब ने भेजा है ।”

सुनील ने रिवाल्वर की मूठ पर अपना बायां हाथ रख लिया ।

द्वारा खुला । द्वार पर मोटा खड़ा था ।

सुनील ने रिवाल्वर की नाल उसकी छाती पर रख दी और फिर धीमे स्वर में बोला - “भीतर चलो, बेटा सोहन लाल ।”

आश्चर्य के आधिक्य से सोहन लाल का मुंह खुले का खुला रह गया । उसने एक बार सुनील के चेहरे को देखा, फिर अपनी छाती पर अड़ी रिवाल्वर की नाल को देखा, फिर उसकी निगाह सुनील के चेहरे पर जम गई ।

सुनील ने रिवाल्वर की नाल से उसकी छाती से टहोका ।

सोहन लाल धीरे-धीरे पीछे हटने लगा ।

सुनील बिना उसकी छाती से रिवाल्वर हटाये सावधानी की प्रतिमूर्ति बना फ्लैट में प्रविष्ट हो गया । उसकी निगाह सोहन लाल की किसी भी गलत हरकत के प्रति पूर्णतया सतर्क थी ।

फिर एकाएक सुनील की खोपड़ी के पृष्ठ भाग से जैसे हजार मन का पत्थर आकर टकराया । रिवाल्वर उसके हाथ से निकल गई और वह मुंह के बल फर्श पर आकर गिरा । उसने भड़ाक से द्वार बन्द किये जाने की आवाज सुनी । किसी ने उस की बगलों में बांहें डालीं और उसने अनुभव किया कि उसे घसीटकर किसी अन्य कमरे में ले जाया जा रहा था, फिर एक अन्य दरवाजा बन्द किये जाने की आवाज उसके कानों में पड़ी ।

कुछ क्षण सुनील का सिर बुरी तरह घूमता रहा । उसे ऐसा लग रहा था कि जैसै कि वह हवा से भी अधिक हल्का हो और हवा में उड़ा जा रहा हो । फिर धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरने लगी । उसकी चेतना लुप्त नहीं हुई । उसने फर्श पर पड़े-पड़े ही आसपास निगाह दौड़ाई । वह एक बैडरूम में था । दूसरे कमरे में से किसी के बोलने की आवाज आ रही थी लेकिन जो कुछ कहा जा रहा था, उसका एक शब्द भी सुनील के पल्ले नहीं पड़ रहा था ।

सुनील खड़खड़ाता हुआ उठकर अपने पैरों पर खड़ा हो गया । उसने पलंग का सहारा ले लिया और स्वयं को व्यवस्थित करने का प्रयत्न करने लगा ।

उसी क्षण उसके कानों में गोली चलने की कान फाड़ देने वाली आवाज पड़ी । आवाज दूसरे कमरे में से आई थी ।

दो फायर और हुए और फिर शान्ति छा गयी ।

सुनील ने अपने सिर को एक जोर का झटका दिया और फिर लपककर द्वार की बगल में आ खड़ा हुआ । उसने बगल की मेज पर पड़ा पीतल का फूलदान अपने हाथ में थाम लिया और द्वार खुलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

द्वार न खुला ।

बाहर के कमरे में से किसी भी प्रकार की आहट नहीं मिल रही थी ।

सुनील ने हाथ बढाकर द्वार का हैंडल अपनी ओर खींचा ।

द्वार तत्काल खुल गया । वह बाहर से बन्द नहीं था । सुनील ने सावधानी से बाहर झांका । कमरे में उसे कोई दिखाई न दिया । वह फूलदान को यथास्थान रखकर बाहर निकल आया ।

एकाएक उसके नेत्र फैल गये और वह दहशत से एक कदम पीछे हट गया ।

सोफे के पीछे सोहन लाल पड़ा था और फर्श पर से उठने का प्रयत्न कर रहा था । खून से रंगी हुई उसकी उंगलियां सोफे पर पड़ीं और वह उनके सहारे अपने शरीर को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करने लगा । उसका चेहरा पीड़ा से विकृत हो उठा था, नेत्र बाहर को उबले पड़ रहे थे । बड़ी कठिनाई से वह सोफे के सहारे अपने शरीर को सीधा कर पाया । सुनील ने देखा, उसकी कमीज का सामने का सारा भाग गाढे लाल खून से बुरी तरह रंगा हुआ था । उसकी छाती में गोली के तीन भयंकर सुराख दिखाई दे रहे थे ।

सोहन लाल ने सुनील की ओर देखा । कुछ कहने के लिये उसने मुंह खोला लेकिन उसके मुंह से आवाज नहीं निकली । फिर एकाएक उसकी आंखें पथरा गई और अपना शरीर पूरी तरह सीधा कर पाने से पहले ही उसकी टांगे लड़खड़ा गई । वह धड़ाम से सोफे पर गिरा और उसका मृत शरीर सोफे सहित फर्श पर उलट गया ।

सुनील आतंकित-सा आंखें फाड़-फाड़ कर उसे देख रहा था । फिर उसकी निगाह दरवाजे के पास पड़ी अपनी रिवाल्वर पर पड़ी । सुनील ने लपक कर रिवाल्वर उठा ली ।

रिवाल्वर की नाल में से बारूद की गन्ध आ रही थी और उसमें से अभी भी हल्का-सा धुआं निकल रहा था ।

सुनील का दिल बुरी तरह से धड़कने लगा ।

उसने रिवाल्वर का चैम्बर खोलकर भीतर झांका । भीतर से तीन गोलियां गायब थीं । उसने चैम्बर बन्द कर दिया ।

“रिवाल्वर फेंक दो वरना गोली मार दूंगा ।”

सुनील ने तत्काल रिवाल्वर अपनी उंगलयों से निकल जाने दी । रिवाल्वर हल्की-सी थप्प की आवाज के साथ फर्श पर आ पड़ी । फिर वह आवाज की दिशा में घूमा ।

द्वार पर एक सब-इन्स्पेक्टर खड़ा था । उसके हाथ में रिवाल्वर थी जिसकी नाल का रुख सुनील की छाती की ओर था । सब-इन्स्पेक्टर की बगल में एक सिपाही खड़ा था ।

“अपने हाथ ऊपर उठा लो और दीवार की ओर मुंह कर लो ।” - आदेश मिला ।

सुनील ने तत्काल आदेश का पालन किया ।

“तलाशी लो ।” - सब-इन्स्पेक्टर बोला । वह आदेश सिपाही के लिये था । सिपाही ने आगे बढकर सुनील की तलाशी ली और फिर बोला - “इसके पास कोई और हथियार तो नहीं है ।”

“मेरी ओर घूमो ।” - सब-इन्स्पेक्टर में आदेश दिया ।

सुनील सब-इन्स्पेक्टर की तरफ घूम पड़ा ।

“कौन हो तुम ?” - सब-इन्स्पेक्टर ने प्रश्न किया ।

“मेरा नाम सुनील है ।” - सुनील बोला - “मैं ‘ब्लास्ट’ का रिपोर्टर हूं ।”

“यह आदमी कौन है ?” - उसका संकेत फर्श पर पड़ी सोहन लाल की लाश की ओर था ।

“इसका नाम सोहन लाल है । यह फ्लैट इसका ही था ।”

“तुमने इसकी हत्या क्यों की ?”

“मैंने इसकी हत्या नहीं की ।”

“तो फिर क्या यह अपने आप मर गया ? तुम रिवाल्वर लेकर इसके सिर पर खड़े थे । रिवाल्वर की नाल में से धुआं निकल रहा था । बारूद की गन्ध अब भी यहां तक आ रही है । फ्लैट में लाश के और तुम्हारे सिवाय और कोई मौजूद नहीं है । फिर भी तुम कहते हो कि तुमने इसकी हत्या नहीं की !”

“मैं ठीक कह रहा हूं । मैं तो...”

“देखो, मिस्टर ! मुझे मजाक पसन्द नहीं है ।

सुनील को अपनी तकदीर पर तो ताव ही आ रहा था, दो बार चोट खा चुकने के बाद वह बुरी तरह झुंझलाया हुआ भी था । एकाएक वह क्रोधित हो उठा ।

“मुझे भी मजाक पसन्द नहीं ।” - वह उखड़े स्वर में बोला - “खास तौर पर ऐसे लोगों के साथ जिनसे मेरा मजाक का कोई रिश्ता न हो ।”

“साले !” - एकाएक सब-इन्स्पेक्टर की बगल में खड़ा सिपाही मुट्ठियां भींचे उसकी ओर बढा - “बदतमीजी करता है ! मैं अभी...”

“हरी सिंह !” - सब-इन्स्पेक्टर उच्च स्वर में बोला ।

सिपाही ठिठक गया ।

“तुम मुझे हाथ लगाकर देखो” - सुनील चिल्ला कर बोला - “मैं तुम्हारा हुलिया बिगाड़ कर न रख दूं तो मेरा नाम बदल देना ।”
 
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