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Thriller विक्षिप्त हत्यारा

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“क्यों ?”

“क्योंकि लिबर्टी बिल्डिंग की पांचवीं मन्जिल और बेसमैंट सेठ मंगत राम ने राम ललवानी के लिये लाखों रुपयों का हरजाना भरकर खाली करवाई थी । सेठ किसी अजनबी आदमी के लिये भला इतना बखेड़ा क्यों करेगा ?”

“मैं चैक करवाऊंगा । दूसरा काम क्या है ?”

“दूसरा काम बहुत मामूली है । तुम यह जानने का कोशिश करो कि सुनीता क्या अभी भी राम ललवानी के साथ रहती है या मर गई ?”

“उसके मर गई होने की भी सम्भावना है ?”

“बिल्कुल है । जौहरी की रिपोर्ट के अनुसार अपनी शादी से पहले भी वह हेरोइन और मारिजुआना और एल.एस.डी. जैसे तीव्र नशों की आदी बन चुकी थी । इतने भीषण नशों की आदी औरत अगर अब तक परलोग सिधार चुकी हो तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है ।”

“अच्छी बात है । मैं चैक करवाता हूं ।”

सम्बन्ध विच्छेद हो गया ।

सुनील ने रिसीवर को क्रेडल पर रखा ही था कि फोन की घन्टी बज उठी । उसने विचित्र नेत्रों से टेलीफोन की ओर देखा और फिर बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से रिसीवर उठा लिया ।

“हल्लो ।” - वह बोला ।

“मिस्टर सुनील देअर ?” - दूसरी ओर से किसी ने प्रश्न किया ।

“बोल रहा हूं ।”

“मिस्टर सुनील, मैं सेठ मंगत राम का प्राइवेट सैक्रेट्री हूं । सेठजी आपसे मिलना चाहते हैं ।”

“किस विषय में ?”

“यह तो उन्होंने मुझे नहीं बताया लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा है कि इस मुलाकत में दोनों का लाभ है ।”

“दोनों से आपका मतलब सेठजी और मुझसे है ?”

“जी हां ।”

“कहां आना होना ?”

“उनकी कोठी पर । पता है चार, नेपियन रोड ।”

“कब आना होगा ?”

“अभी आ जाइये । सेठजी सवा दस बजे आपकी प्रतीक्षा करेंगे ।”

“सॉरी ।” - सुनील बोला - “नहीं आ सकता ।”

“वजह ?”

“वजह आपकी समझ में नहीं आयेगी ।”

“फिर भी बताइये तो ? अगर आपकी कोई समस्या हो तो शायद मैं उसका कोई हल सुझा सकूं ।”

“समस्या तो है लेकिन उसका हल आप नहीं सुझा सकेंगे ।”

“मिस्टर सुनील, आप अपनी समस्या मुझे सेठ मंगत राम का प्रतिनिधि समझ कर बताइये । मैं वर्षों से सेठजी का सैक्रेट्री हूं और मैंने सेठजी के केवल जुबान हिला देने से कितने ही असम्भव कार्य सम्भव होते देखे हैं । और अगर आप इसे गलत न समझें तो मैं यह भी कहूंगा कि आपको इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिये कि सेठजी आपसे मिलना चाहते हैं और आपको अपनी कोठी पर बुला रहे हैं ।”

“आल राइट । सेठ जी की महानता का आपने मुझे पर खासा रोब डाल दिया है । इसलिये मेरी समस्या सुन लीजिये । दस बजे मुझे पुलिस हैडक्वार्टर में पुलिस इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल के पास पहुंचना है । इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल मुझे अच्छी निगाहों से नहीं देखता । वह मुझे निहायत शरारती और क्रिमिनल माइन्डिड आदमी समझता है । अगर मैं दस बजे पुलिस हैडक्वार्टर नहीं पहुंचा तो वह मेरा पुलन्दा देगा ।”
 
“आप जरा एक मिनट होल्ड कीजियेगा ।” - सैक्रेट्री बोला ।

“सारी । मुझे पहले ही बहुत देर हो गई है । विश्वास जानिये मेरा ठीक दस बजे पुलिस हैडक्वार्टर पहुंच जाना वाकई बहुत जरूरी है ।”

“आप केवल एक मिनट होल्ड कर लीजिए । अगर इससे ज्यादा देर लगे तो सम्बन्ध विच्छेद कर दीजियेगा ।”

“ओके ।” - सुनील बोला और घड़ी देखने लगा ।

पचास सैकेंड बाद उसे फोन पर एक नई, गम्भीर और अधिकारपूर्ण आवाज सुनाई दी - “मिस्टर सुनील ?”

“यस ।”

“मैं मंगत राम बोल रहा हूं । आप बेहिचक यहां आ जाइये । पुलिस हैडक्वार्टर में लोग खुशी से आपकी प्रतीक्षा कर लेंगे । मेरा कानूनी सलाहकार पुलिस हैडक्वार्टर में उस इन्सपेक्टर से बात कर लेगा जो आपकी प्रतीक्षा कर रहा है ।”

“लेकिन साहब, यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है । मेरी गरदन दो-दो हत्याओं के मामले में फंसी हुई है ।”

“मिस्टर सुनील” - सेठ का तनिक उखड़ा किन्तु पूर्ववत् प्रभावशाली स्वर सुनाई दिया - “मैं बूढा आदमी हूं । मुझ में अधिक बोलने की हिम्मत नहीं है । आप मझे हां या ना में इतना जवाब दीजिये का आप यहां आ रहे हैं या नहीं !”

“मैं आ रहा हूं ।” - सुनील फौरन बोला ।

“थैंक्यू, मिस्टर सुनील ।”

सम्बन्ध विच्छेद हो गया ।

सुनील ने रिसीवर रखा और फ्लैट से बाहर निकल गया । नीचे आकर उसने अपनी मोटरसाइकल सम्भाल ली और नेपयन रोड की ओर उड़ चला ।

नेपयन रोड पर सेठ मंगत राम की कोठी बहुत सुन्दर थी, बहुत विशाल थी । कोठी की चारदीवारी के विशाल फाटक के सामने एक गौरखा चौकीदार खड़ा था । सुनील ने गोरखे को अपना नाम बताया । गोरखे ने तत्काल आकर गेट खोल दिया । शायद उसको सुनील के आगमन की सूचना पहले ही दी जा चुकी थी ।

सुनील ने मोटरसाइकल कोठी के अन्दर मोड़ दी । लगभग एक फर्लांग लम्बे ड्राइव-वे में से होता हुआ वह कोठी के सामने पहुंचा ।

कोठी की सीढियों पर एक सूटबूटधारी व्यक्ति यूं खड़ा था जैसे वह सुनील की ही प्रतीक्षा कर रहा हो ।

सुनील मोटरसाइकल से उतरा ।

“मिस्टर सुनील ?” - वह व्यक्ति बोला ।

“यस ।” - सुनील बोला ।

“मैं सेठजी का सैक्रेट्री हूं । मैंने ही आप से फोन पर बात की थी ।”

सुनील ने उसकी ओर दृष्टिपात किया ।

“मेरे साथ आइये । सेठजी आप ही की प्रतीक्षा कर रहे हैं ।”

सुनील उसके पीछे हो लिया ।

सैक्रेट्री उसे एक विशाल कमरे में छोड़ गया । कमरे की तीन दीवारों के साथ लगे रैकों में चमड़े की जिल्दों वाली किताबें लगी हुई थीं, चौथी दीवार की पूरी लम्बाई में एक शीशे की विशाल खिड़की थी जिसमें से बाहर का लॉन दिखाई दे रहा था ।

कमरे में एक विशाल मेज थी जिसके पीछे लगभग पचपन वर्ष का दुबला-पतला वृद्ध बैठा हुआ था । उसके हाथ में एक लम्बा सिगार था ।

सुनील ने उसे नमस्ते की ।

“तशरीफ रखिये ।” - वृद्ध बोला ।

सुनील एक कुर्सी पर बैठ गया ।

“मेरा नाम मंगत राम है ।”

सुनील केवल मुस्कुराया ।

वृद्ध ने अपनी घड़ी पर दृष्टिपात किया - “आप एकदम ठीक समय पर आये हैं । मुझे समय के पाबन्द लोग बहुत पसन्द हैं ।”
 
“धन्यवाद ।”

सेठ ने मेज पर पड़ा एक टेलीफोन उठाया । रिसीवर में उसने केवल एक शब्द कहा और फिर रिसीवर रख दिया ।

“मैंने तुम्हारे बारे में बहुत कुछ सुना है” - सेठ दुबारा उस की ओर आकर्षित होता हुआ बोला - “और मैं अनुभव कर रहा हूं कि जो कुछ मैंने सुना है उसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं थी ।”

सुनील ने पूछना चाहा कि सेठ ने उसके बारे में क्या सुना था, क्यों सुना था, किस से सुना था, लेकिन वह चुप रहा ।

“यू आर ए फाइन मैन, मिस्टर सुनील ।”

“इज दैट ए कम्पलीटमैंट ?”

“यस ।”

“थैंक्यू दैन ।”

एक वर्दीधारी वेटर कमरे में आया और सेठ और सुनील को चाय सर्व कर गया ।

“सिगरेट !” - सेठ ने पूछा और सुनील की ओर डिब्बा बढा दिया ।

“धन्यवाद । मेरे पास मेरा अपना ब्रांड है ।”

सुनील ने जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगाया ।

सेठ ने चाय का एक छोटा-सा घूंट पिया और फिर बोला - “मेरी सूचनाओं के अनुसार तुम ‘ब्लास्ट’ के विशेष प्रतिनिधि हो और लगभग आठ सौ रुपये महीना वेतन पाते हो । अपनी जानकारी के दायरे में तुम एक असाधारण प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति के रूप में जाने जाते हो, पुलिस अधिकारियों और अपने शुभचिन्तकों के विचार से तलवार की धार पर चलने जैसी रिस्क भरी और हंगामाखेज जिन्दगी गुजार रहे हो । नगर के कुछ रईस परिवारों से तुम्हारे गहरे सम्बन्ध है लेकिन तुमने आज तक उनकी मित्रता का कोई अनुचित लाभ उठाने का प्रयत्न नहीं किया । आदतन ईमानदार और मेहनतकश हो । स्त्री जाति को तकलीफ में नहीं देख पाते हो इसलिये कई बार बेहद खतरनाक हरकतें कर डालते हो । वगैरह...”

सेठ चुप हो गया और सिगार के कश लगाने लगा ।

सुनील चुप रहा ।

“मिस्टर सुनील आज की दुनिया में आप जैसे इन्सान दुर्लभ होते हैं और दुर्लभ वस्तु में मेरी हमेशा से ही दिलचस्पी रही है ।”

“और आप मेरे में एक दुर्लभ वस्तु के रूप में रुचि ले रहे हैं !”

सेठ तनिक कसमसाया और फिर बोला - “मैं एक विशेष प्रकार के व्यक्तियों को अपनी बिजनेस आर्गेनाइजेशन का अंग देखना पसन्द करता हूं ।”

“और मैं इन विशेष प्रकार के व्यक्तियों में से एक हूं ?”

“हां ।”

“इसलिये आप मुझे अपनी बिजनेस आर्गेनाइजेशन का एक अंग बनाना चाहते हैं ?”

“हां ।”

“मुझे आप कहां फिट करना चाहते हैं ?”

सेठ फिर कसमसाया । ऐसा लगता था जैसे वह सुनील के यूं सवाल करने के ढंग से असुविधा का अनुभव कर रहा था ।

“अहमदाबाद में मेरा एक भारत नाम का दैनिक अखबार निकलता है ।” - कुछ क्षण बाद सेठ बोला - “उस अखबार का प्रकाशन मैं राजनगर से भी करना चाहता हूं । अखबार के राजनगर से निकलने वाले संस्करण का सम्पादक मैं तुम्हें बनाना चाहता हूं ।”

सुनील चुप रहा ।

“तुम्हें पहले तीन महीने अहमदाबाद जाकर रहना होगा और हमारे अहमदाबाद आफिस में काम करके अखबार की पालिसी को पूरी तरह समझना होगा । उसके बाद तुम राजनगर वापिस आ जाओगे और स्वतन्त्र रूप से अखबार निकालने लगोगे ।”

“वैरी गुड ।” - सुनील भावहीन स्वर में बोला ।

“तुम्हें तीन हजार रुपये महीना वेतन मिलेगा, ‘ब्लास्ट’ की नौकरी छोड़ने की एवज में पच्चीस हजार रुपये फौरन मिलेंगे और इस बात की लिखित गारन्टी दी जायेगी कि दस साल तक तुम्हारी नौकरी पर कोई आंच नहीं आयेगी । कहने का मतलब यह है कि अगर अखबार बन्द भी हो गया तो भी तुम्हें दस साल तक तीन हजार रुपये महीना वेतन मिलता रहेगा ।”

“बहुत तगड़ी आफर दे रहे हैं आप ।”

“तुम्हें मंजूर है ?”

सुनील चुप रहा । सेठ मंगत राम बहुत आबवियस आदमी निकला था । उसका सुनील को यूं आनन-फानन इतनी तगड़ी आफर देना ही उसकी नीयत की चुगली कर रहा था ।
 
उस क्षण सुनील की दृष्टि शीशे की खिड़की से बाहर लॉन की ओर भटक गई । खिड़की के सामने से एक पहियों वाली कुर्सी गुजर रही थी । कुर्सी को पीछे से एक सफेद वर्दीधारी अर्दली धकेल रहा था । कुर्सी पर एक औरत बैठी थी जिसका शरीर कमर तक शाल से ढका हुआ था । वह खिड़की से विपरीत दिशा में देख रही थी इसीलिए सुनील को उसका चेहरा नहीं दिखाई दिया ।

“तुम्हें मेरी आफर मंजूर है ?” - सेठ ने आशापूर्ण स्वर से पूछा ।

सुनील ने जानबूझ कर तत्काल उत्तर न दिया । उसने अपना चाय का कप उठाया और उसमें बची सारी चाय एक ही सांस में हलक में उड़ेल ली । उसने सिगरेट का आखिरी कश लगा कर उसे ऐशट्रे में फेंक दिया और उठ खड़ा हुआ ।

“सेठजी” - वह गम्भीर स्वर में बोला - “मैं सोच रहा था...”

“कि तुम्हें मेरी आफर स्वीकार करनी चाहिये या नहीं ?”

“नहीं, मैं सोच रहा था कि आप ने मुझे घर बुलाकर यूं आनन-फानन इतनी तगड़ी आफर क्यों दी ?”

“क्या मतलब ?”

“मतलब यह कि क्या मैं आपको वाकई इतना भला और ईमानदार आदमी लगा हूं कि आपने मुझे अपने उस अखबार का सम्पादक बनाने का फैसला कर लिया जो अभी छः महीने बाद निकलेगा । सेठजी आपकी इतनी बड़ी आफर ही आप की नीयत की चुगली कर रही है ।”

“मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम क्या कह रहे हो ?”

“लोगों ने आपको मेरे बारे में बहुत कुछ बताया है ।” - सुनील सेठ की परवाह किये बिना बोलता रहा - “अगर आपने मेरे बारे में थोड़ी और तफ्तीश करवाई होती तो आपको इस तथ्य की भी जानकारी हो जाती कि पैसा संसार की आखिरी चीज है जो मुझे अपनी मर्जी के खिलाफ कोई काम करने पर मजबूर कर सकती है । इसलिये अगर आप यह समझते हैं कि आप मुझे एक मोटी रकम का लालच देकर राजनगर छोड़ देने पर मजबूर कर सकते हैं तो आप की गलती है ।”

“क्या बक रहे हो ?”

“मैं यह बक रहा हूं कि आप मुझे बढिया नौकरी की रिश्वत देकर राजनगर से दफा नहीं कर सकते ।”

सेठ तनिक विचलित दिखाई देने लगा ।

“सेठ जी” - सुनील गम्भीर स्वर में बोला - “आप बहुत बड़े आदमी हैं । अभी आप मेरा मुंह बन्द करने के लिये मुझे छः महीने के लिये अहमदाबाद भेजने के इन्तजाम कर रहे हैं । अगर मैं आपकी यह आफर अस्वीकार कर दूं तो आप किसी पेशेवर बदमाश को थोड़े से रुपये देकर मेरी हत्या भी करवा सकते हैं । इसीलिये सेठजी मुझे अहमदाबाद भेज देने से किसी को कोई लाभ नहीं होने वाला है और खास तौर से...”

“तुम किसकी बात कर रहे हो ?” - सेठ कम्पित स्वर से बोला ।

“मैं राम ललवानी की बात कर रहा हूं ।”

“राम ललवानी ! कौन राम ललवानी ?”

“वही राम ललवानी जिससे सन् चौंसठ के आरम्भ में आपकी इकलौती बेटी सुनीता ने बम्बई में विवाह किया था ।” - सुनील ने अन्धेरे में तीर छोड़ा ।

सेठ के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी ।

“मैं उसी राम ललवानी का जिक्र कर रहा हूं, जो आप का दामाद है, जिसके लिये आपने लाखों रुपया हरजाना भर कर लिबर्टी बिल्डिंग की पांचवी मंजिल और बेसमैंट खाली करवाई थी, जिसके छोटे भाई मनोहर ललवानी ने बम्बई में बड़ी नृशंसता से एक कसाई की तरह तीन लड़कियों को काट डाला था और जो पुलिस रिकार्ड के अनुसार बाइस मार्च सन् पैंसठ को बम्बई में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया था । लेकिन अभी सिर्फ मैं जानता हूं कि आप के दामाद का छोटा भाई मनोहर ललवानी मरा नहीं है । वह जिन्दा है और मुकुल के नाम से अपने भाई के मैड हाउस नाम के डिस्कोथेक में गाता-बजाता है । वह समझता है कि अगर मैं राजनगर से गायब हो जाऊं तो पुलिस को कभी मालूम नहीं हो पायेगा कि उसका भाई जिन्दा है और उसने फिर हत्यायें करनी आरम्भ कर दी हैं ।”
 
“फिर हत्यायें करनी आरम्भ कर दी हैं !” - सेठ का मुंह खुले का खुला रह गया - “क्या मतलब ?”

“मेरा संकेत पिछली रात को मेहता रोड पर हुई फ्लोरी नाम की लड़की की हत्या की ओर है । फ्लोरी की हत्या बिल्कुल उसी पैट्रन पर हुई है जिस प्रकार पांच साल पहले बम्बई में मनोहर ललवानी तीन हत्यायें कर चुका है । फ्लोरी की हत्या ही पुलिस के मन में यह सन्देह उपजाने के लिये काफी होगी कि मनोहर ललवानी जिन्दा है । इसलिये राम ललवानी चिन्तित है लेकिन वह राज नगर की पुलिस को निकम्मी समझकर भारी गलती कर रहा है । मैं अपनी जुबान न भी खोलूं तो भी पुलिस को सारी कहानी समझने में अधिक देर नहीं लगेगी ।”

सेठ ने अपना सिर झुका लिया ।

“सेठजी, बात बहुत बढ चुकी है । यह ऐसा मामला नहीं है जिस में आप अपने दामाद की खातिर अपना पैसा और प्रभाव इस्तेमाल करके सारा मामला रफा-दफा कर सकें ।”

इतना कहकर सुनील कुर्सी से उठा और जेब में हाथ डाले सेठ के सामने खड़ा हो गया ।

“बैठो ।” - वह कम्पितत स्वर में बोला ।

“सेठ जी” - सुनील हिचकिचाता हुआ बोला - “मैं...”

“प्लीज, मिस्टर सुनील, प्लीज सिट डाउन ।”

सुनील बैठ गया । उसके सामने एक करोड़पति सेठ का अभिमान टूटा जा रहा था । लेकिन न जाने क्यों सुनील को इससे कोई खुशी नहीं हो रही थी ।

“थैंक्यू ।”

सूनील चुप रहा ।

“तुम कैसे जानते हो कि सुनीता मेरी लड़की है ?”

“मुझे निश्चित रूप से इस बात की जानकारी नहीं है । मैं केवल इतना जानता हूं कि सुनीता अग्रवाल नगर के एक करोड़पती सेठ की इकलौती बेटी है ।”

सेठ मंगत राम ने एक गहरी सांस ली और बोला - “सुनीता मेरी इकलौती बेटी है ।”

सुनील चुप रहा ।

“बेटे” - सेठ आर्द्र स्वर में बोला - “जिस ढंग की जिन्दगी सुनीता ने आज तक गुजारी है, भगवान ऐसी जिन्दगी में किसी दुश्मन को न डाले । आज मैं अपनी बेटी की सूरत देखता हूं तो मुझे महसूस होता है कि मेरा संसार की सबस निरर्थक और निकृष्ट वस्तु का नाम है । पैसा सारा रुपया भी सुनीता को दोबारा से एक हंसती-खेलती, उमंगों और आशाओं से भरी हुई जवान लड़की नहीं बना सकता और उसकी यह हालत इसलिये हुई क्योंकि बचपन में उसकी मां मर गई थी और मुझे नोट गिनने से फुरसत नहीं थी । नतीजा यह हुआ कि वह बेहद गलत किस्म की सोहबत में पड़ गई । कोई उसे रोकने-टोकने वाला नहीं था इसलिये जो उसके जी में आता था, वह करती थी । सुनीता कोई भोली-भाली मासूम बच्ची नहीं रही है, इस बात की जानकारी मुझे तब हुई थी जब सुनीता के स्कूल की प्रिन्सीपल ने मुझे बताया कि सुनीता गर्भवती थी । और, बेटे, वह उस समय दसवीं जमात में पढती थी और मुश्किल से पन्द्रह साल की थी ।”

एक क्षण के लिये सेठ रुका और फिर बोला - “प्रिन्सीपल की सावधानी से ही मेरी इज्जत मिट्टी में मिलने से रह गई थी । एक बहुत बड़ा स्कैण्डल होते-होते रह गया था । सुनीता की उस हालत के लिये जिम्मेदार था, सुनीता के स्कूल का अंग्रेज टीचर जिसने बाद में मुझे बाकायदा ब्लैकमेल करने की कोशिश की । लेकिन मेरे रुतबे ने और ढेर सारे रुपये ने किसी प्रकार स्थिति सम्भाल ली । सुनीता का गर्भपात कराया गया । उसने स्कूल छोड़ दिया और फिर कभी पढाई-लिखाई की ओर झांक कर भी नहीं देखा । बेटे, जिस बात ने मेरा दिल दहला दिया था, वह यह थी कि जो कुछ सुनीता ने किया था, उसके लिये वह कतई शर्मिंदा नहीं थी ।”

“फिर ?” - सुनील ने मन्त्रमुग्ध स्वर में पूछा ।
 
सेठ ने बड़े नर्वस ढंग से सिगार के तीन-चार कश लिये और फिर बोला - “इक्कीस साल की आयु में वह आर्थिक रूप से भी स्वतन्त्र हो गई । उसे किसी भी सूरत में मेरी मोहताज रहने की जरूरत नहीं रही थी । जैसा कि मुझे बाद में मालूम हुआ, तब तक वह हेरोइन और एल.एस.डी. जैसे तीव्र नशा करने वाली चीजों के इन्जेक्शन लेने लगी थी और उनकी खूब आदी हो चुकी थी । जिन विलायती हिप्पियों के साथ वह घूमती-फिरती थी वे ही उसे ऐसी चीजों के सेवन की प्रेरणा देते थे और उन हरकतों को आज की तेज रफ्तार जिन्दगी का एक हिस्सा मान कर वह सब कुछ करती थी । उसके छः महीने बाद वो मुझे छोड़कर चली गई । सीधी जुबान में कह जाये तो घर छोड़ कर भाग गई ।”

“ओह !” - सुनील ने अपनी जुबान से केवल इतना ही निकाला - “कहां ? बम्बई ?”

“हां ।”

“फिर ?”

“बम्बई पहुंचने तक वह हेरोइन और एल.एस.डी. के नशे की इतनी आदी हो चुकी थी कि वह उसके बिना जीवित नहीं रह सकती थी । बेटा, मैंने सुना है कि इन तीव्र नशों का भी भिन्न-भिन्न लोगों पर भिन्न-भिन्न प्रकार का प्रभाव होता है । कुछ लोग एल. एस. डी. का इन्जेक्शन लेते हैं और फिर दो-दो दिन तक पिनक में पड़े रहते हैं । कुछ लोगों में सैक्स की भावनायें प्रबल हो उठती हैं । कुछ लोग अपने मस्तिष्क पर से अपना अधिकार खो बैठते हैं और उपद्रवी बन जाते हैं । उस स्थिति में वे बड़ी भंयकर हरकतें करते हैं । ऐसी ही स्थिति में एक बार सुनीता ने अपने ब्वायफ्रैंड की खोपड़ी पर कोका कोला की बोतल तोड़ दी थी । सुनीता को एक महीने की जेल की सजा हुई थी । एक अहसान उसने मुझ पर जरूर किया कि बम्बई जाकर उसने किसी पर यह प्रकट करने की कोशिश न की वह मेरी बेटी थी ।”

“फिर ?”

“उसी दौर में सुनीता राम ललवानी के सम्पर्क में आई । राम ललवानी बम्बई में गुलनार नाम का रेस्टोरेन्ट चलाता था लेकिन वास्तव में गुलनार मादक द्रव्यों के व्यापार का अड्डा था । राम ललवानी को किसी प्रकार मालूम हो गया कि सुनीता के पास ढेर सारी दौलत थी । उस दौलत के लालच में उसने किसी प्रकार सुनीता को फांसकर उससे शादी कर ली । शादी के बाद उसे यह भी मालूम हो गया कि उसकी बीवी मेरी लड़की थी ।”

“कैसे ?”

“उसने खुद ही बता दिया होगा । आखिर उसे अपने पति से अपनी वास्तविकता छुपाने की क्या जरूरत थी ?”

सुनील चुप रहा ।

“फिर मार्च सन पैंसठ में वह भंयकर घटना घटी जिसके बाद मुझे इन तमाम बातों की खबर हुई ।”

“कौन-सी घटना ?”

“सुनीता ने एक लड़की का खून कर दिया ।”

“खून !”

“हां, बेटे, लड़की गीगी ओब्रायन नाम की कोई नर्तकी थी जो राम ललवानी के रेस्टोरेन्ट में नृत्य करती थी ।”

“लेकिन उस लड़की का खून तो राम ललवानी के छोटे भाई मनोहर ललवानी ने किया था ?”

“दुनिया यही समझती है लेकिन वास्तव में उस लड़की का खून सुनीता ने किया था ।”

“क्यों ?”

“भगवान जाने क्यों ?”

“फिर ?”

“फिर राम ललवानी ने बम्बई से मुझे ट्रंक कॉल की थी । मैं तत्काल बम्बई पहुंच गया था एयरोड्रोम पर ही मुझे राम ललवानी मिल गया । वह मुझे सीधा सुनीता के पास ले गया । बेटे, सुनीता की हालत देखकर मेरा दिल दहल गया । इतनी उजड़ी हुई औरत मैंने अपनी जिन्दगी में कभी नहीं देखी थी । बम्बई की दो ढाई साल की मादक पदार्थों पर निर्भर जिन्दगी ने उसे तबाह करके रख दिया था । वह उस समय भी नशे में थी और मुझे एक जिन्दा लाश जैसी मालूम हो रही थी । जो कुछ मेरी निगाहें देख रही थी, उस पर मुझे विश्वास नहीं होता था । मुझे विश्वास नहीं होता था कि हेरोइन, एल. एस. डी. और मरिजुआना जैसे तीव्र नशे किसी इन्सान की इस हद तक भी दुर्गति कर सकते थे । सुनीता अपनी स्थिति से बेखबर मेरे सामने बैठी थी और उसकी हालात देखकर मेरा कलेजा फटा जा रहा था । मैंने अपनी बेटी को बुलाया । बड़ी मुश्किल से उसने मुझे पहचाना और फिर उसने मुझे बताया कि उसने एक लड़की की छाती में चाकू घोंप दिया था । उस समय एक कर्त्तव्य-परायण नागरिक की तरह चाहिये तो यह था कि मैं अपनी बेटी को पुलिस हवाले कर देता लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया । मैं अपने दिल के हाथों मजबूर था । मैंने उसे पुलिस के हवाले नहीं किया ।

बेटा, अगर तुम मेरी जगह होते तो क्या करते ?”

“मेरी कोई बेटी नहीं ।” - सुनील धीरे से बोला ।

सेठ चुप रहा ।
 
“फिर क्या हुआ ?” - सुनील ने पूछा ।

“फिर सुनीता को खून के अपराध से बचाने के लिये राम ललवानी ने मेरे सामने एक स्कीम रखी ।”

“कैसी स्कीम ?”

“स्कीम यह थी । बम्बई में दो जवान लड़कियों की हत्यायें हो चुकी थीं । हत्यारे ने दोनों बार लड़कियों के शरीर की बड़ी बेदर्दी से बोटी-बोटी काट दी थी । पुलिस के ख्याल से वह किसी विक्षिप्त मस्तिष्क के व्यक्ति का काम था । स्कीम का एक सूत्र तो यह था । दूसरा सूत्र उसका भाई मनोहर ललवानी था । मनोहर ललवानी ने बम्बई में कुछ अपराध किये थे - यह उसने मुझे नहीं बताया कि क्या अपराध किये थे - लेकिन उसने यह जरूर कहा कि अगर मनोहर ललवानी पकड़ा गया तो उसे कम-से-कम दम साल की सजा होगी । राम ललवानी ने मेरे सामने यह स्कीम रखी कि उसका भाई चाकू लेकर गीगी ओब्रायन की लाश को यूं काट-पीट देगा कि वह उसी विक्षिप्त हत्यारे का काम मालूम होगा जो पहले भी बम्बई में दो हत्यायें कर चुका था । फिर पुलिस को यह संकेत दे दिया जायेगा कि वह विक्षिप्त हत्यारा मनोहर ललवानी ही है । फिर जब पुलिस उसको पकड़ने आयेगी तो वह गोली चलाता हुआ पुलिस के घेरे से निकल कर बान्द्रा के रेलवे पुल की ओर भाग निकलेगा । बान्द्रा के पुल पर पहुंचकर वह यह जाहिर करेगा कि वह पुलिस की गोलियों का शिकार होकर पानी में गिर पड़ा । पुलिस केस बन्द कर देगी । सुनीता की ओर किसी का ध्यान नहीं जायेगा और मनोहर ललवानी को भी मरा समझा लिया जायेगा ।”

“लेकिन बाद में पानी में से मनोहर ललवानी की लाश भी तो निकाली गई थी ?”

“वह लाश एक ताजी कब्र खोदकर निकाली गई थी । लाश के शरीर में बाकायदा तीन-चार गोलियां मार दी गई थीं । एक गोली से किसी हद तक उसका चेहरा बिगाड़ दिया गया था । अगले दिन पुलिस ने पानी में से लाश बरामद की थी । शिनाख्त के लिये राम ललवानी और उससे मित्र सोहन लाल को बुलवाया गया था । दोनों ने स्वीकर किया था कि वह मनोहर ललवानी की लाश थी ।”

“सुनीता का क्या हुआ ?”

“सुनीता को मैं तभी अपने साथ ले आया था । अब बहुत बड़े-बड़े डाक्टर उसका इलाज कर रहे हैं । पिछले पांच सालों में उसमें काफी सुधार आ गया है । डाक्टर कहते हैं कि वह जल्दी ही अपने पैरों पर चलने लगेगी ।”

अपने पैरों पर चलने लगेगी - सुनील मन-ही-मन बुदबदाया - तो वह पहियों वाली कुर्सी पर बैठी औरत सुनीता ही थी ।

“बाद में राम ललवानी और मनोहर ललवानी ने क्या किया ?” - प्रत्यक्षतः सुनील ने पूछा ।

“दोनों बम्बई से निकल गये । पूरे चार साल राम ललवानी मेरे से मोटी-मोटी रकमें मांगता रहा जो मैं उसे खुशी से देता रहा । फिर पिछले साल वह राजनगर आ गया । उसने लिबर्टी बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल और बैसमैंट खाली करवाने के लिये मजबूर किया । पांचवीं मंजिल पर उसने नाइट क्लब खोल ली और बेसमैंट में उसने मैड हाउस नाम का डिस्कोथेक खोल दिया । फिर उसके पीछे-पीछे ही उसका भाई मनोहर ललवानी भी आ गया ।”

“राम ललवानी ने नाइट क्लब और मैड हाऊस का अच्छा खासा धंधा जमा लिया है । अब तो वह स्वंय ही काफी सम्पन्न आदमी हो गया है । अब तो वह आपसे रुपया नहीं मांगता होगा !”

“मांगता है । बराबर मांगता है । आखिर क्यों न मांगे ? जो चीज बिना हाथ हिलाये सहज ही प्राप्त हो, उसे भला क्यों छोड़े ? और अब पैसे से ज्यादा उसे लीगल प्रोटेक्शन की जरूरत है, जिसकी वह मुझसे हमेशा ही अपेक्षा करता है । अब भी कई काम ऐसे हैं जो उसे मेरी मदद के बिना होते दिखाई नहीं देते । जैसे उसने मुझे इस बात के लिये मजबूर किया कि मैं तुम्हें फौरन राजनगर से चलता कर दूं ।”

सुनील चुप रहा ।
 
सेठ ने सिगार को ऐश ट्रे में रख दिया और मेज की दराज खोलकर उसमें से एक लिफाफा निकाला ।

“सोहन लाल नाम के जिस आदमी की तुमने हत्या कर दी है” - सेठ लिफाफे को अपने हाथों में उलटता-पुलटता हुआ बोला - “उसने राम ललवानी के लिये एक बहुत भारी समस्या खड़ी कर दी है ।”

“मैंने सोहन लाल की हत्या नहीं की है ।” - सुनील तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोला ।

“लेकिन मेरी सूचना के अनुसार उसकी हत्या तुम्हीं ने की है ।”

“आपकी सूचना गलत है ।”

“खैर, गलत होगी । वर्तमान स्थिति में यह बात महत्वपूर्ण नहीं है कि उसकी हत्या किसने की है ! महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी हत्या हो गई है ।”

“यह बात क्यों महत्वपूर्ण है ?”

“अभी बताता हूं ।” - सेठ बोला - “सोहन लाल वह आदमी है जिसने बम्बई में समुद्र से निकाली गई मनोहर ललवानी की नकली लाश की शिनाख्त की थी । अर्थात सोहन लाल शुरू से ही जानता था कि मनोहर ललवानी मरा नहीं था बल्कि मुकुल ही मनोहर ललवानी है । अपनी इस जानकारी के आधार पर ललवानी भाइयों के लिये सोहन लाल का अस्तित्व बड़ा खतरनाक साबित हो सकता था । इस हकीकत को सोहन लाल भी समझता था । वह जानता था कि ललवानी बन्धु उसकी जुबान बन्द रखने के लिये उसकी हत्या भी कर सकते थे । अपनी सुरक्षा के लिये उसने सारी घटना की एक स्टेटमेंट बनाकर उसे एक प्रसिद्ध वकीलों की फर्म के पास जमा करवा दिया था । सोहन लाल का अपने वकील को निर्देश था कि अगर वह स्वाभाविक मौत मर जाये तो उसकी स्टेटमेंट नष्ट कर दी जाये लेकिन अगर उसकी हत्या हो जाये तो वह स्टेटमेंट पुलिस को सौंप दी जाये । सोहन लाल ने उस इन्तजाम की जानकारी ललवानी भाइयों को भी दे दी थी इसलिये ललवानी भाई तो ख्वाब में भी उसकी हत्या करने की बात सोच सकते थे । सोहन लाल की हत्या होते ही उसका लिखित बयान पुलिस में पहुंच जाता । पुलिस को मालूम हो जाता कि मुकुल ही मनोहर था और फिर दोनों भाई रगड़े जाते । सोहन लाल की स्टेटमेंट इस लिफाफे में है ।”

और सेठ ने लिफाफा सुनील की ओर उछाल दिया ।

“आप कहना क्या चाहते हैं” - सुनील नेत्र फैलाकर बोला - “कि सोहन लाल के वकीलों ने उसे धोखा दिया है ? उन्होंने उसकी स्टेटमेंट पुलिस को सौंपने के स्थान पर आपके पास भेज दी है ?”

“नहीं ।” - सेठ बोला - “इस लिफाफे में उस स्टेटमेंट की प्रतिलिपि है । सोहन लाल की हत्या के बाद वकीलों ने सोहन लाल की स्टेटमेंट वाले लिफाफे को खोल लिया था । उन्होंने सोहन लाल की स्टेटमेंट में मेरी बेटी का नाम देखा । वे मुझे अच्छी तरह जानते थे इसलिये मुझे परिस्थिति से अवगत कराने के लिये उन्होंने मुझे उस स्टेटमेंट की एक प्रतिलिपि भेज दी है । इस लिफाफे में वास्तविक स्टेटमेंट नहीं बल्कि उसकी प्रतिलिपि है ।”

“लेकिन उन्हें आपको स्टेटमेंट की एक प्रतिलिपि भी नहीं देनी चाहिये थी ।”

“नहीं देनी चाहिये थी ।” - सेठ ने स्वीकार किया ।

सुनील ने लिफाफे में से कागजात निकाले और उन्हें पढने लगा ।

वे कागजात ललवानी बन्धुओं की सलामती के लिये बारूद का ढेर थे । उस रिपोर्ट के अनुसार गीगी ओब्रायन पर केवल राम ललवानी का ही अधिकार नहीं था । वह तो एक वेश्या थी जो हर किसी का मनोरंजन करती थी लेकिन अधिकतर वह राम ललवानी के ही अधिकार में रहती थी । जब राम ललवानी उसके पास होता था तो किसी की गीगी ओब्रायन के पास भी फटकने की हिम्मत नहीं होती थी लेकिन राम ललवानी के सुनीता से शादी कर लेने के बाद राम ललवानी ने गीगी ओब्रायन में दिलचस्पी लेनी कम कर दी थी । उसके बाद गीगी ओब्रायन जिन लोगों की दिलचस्पी का केन्द्र बनी, उनमें मनोहर ललवानी और सोहन लाल प्रमुख थे हत्या की रात को सोहन लाल गीगी ओब्रायन के फ्लैट पर गया था । इमारत के बाहर उसने मनोहर ललवानी की कार खड़ी देखी थी । इमारत में प्रविष्ट होने के स्थान पर सोहन लाल बाहर ही खड़ा प्रतीक्षा करता रहा ताकि मनोहर ललवानी बाहर निकले और वह उसके बाद भीतर जाये । फिर एकाएक उसे एक चीख की आवाज सुनाई दी थी । उसके थोड़ी ही देर बाद उसने मनोहर ललवानी और सुनीता को फ्लैट से बाहर निकलते देखा था । सुनीता बुरी तरह से नशे में थी । उसे अपने आपकी खबर नहीं थी ।

मनोहर ललवानी उसे अपने साथ लगभग घसीट रह था । दोनों कार में सवार होकर फौरन वहां से रवाना हो गये थे । उनके जाने के फौरन बाद सोहन लाल गीगी ओब्रायन के फ्लैट में पहुंचा था । फ्लैट का दरवाजा खुला था और भीतर गीगी ओब्रायन की लाश बुरी तरह से कटी पड़ी थी । उसके सारे शरीर से गोश्त के बड़े-बड़े लोथड़े लटक रहे थे ।

सोहन लाल सीधा राम ललवानी के पास पहुंचा ।

एक स्टेटमेंट यहीं खत्म हो गई थी ।

दूसरी स्टेटमेंट पर एक महीने बाद की तारीख थी । उसमें सोहन लाल ने स्वीकार किया था कि उसने समुद्र में से निकाली कथित मनोहर ललवानी की लाश की गलत शिनाख्त की थी । उसी ने कब्रिस्तान में से एक ताजी कब्र खोदकर एक लाश निकाली थी और उस के शरीर के विभिन्न भागों में गोलियां मार कर उसे बान्द्रा रेलवे पुल के पास पानी में फेंक दिया । पुलिस द्वारा बरामद किये जा चुकने के बाद उसी लाश की उसने मनोहर ललवानी की लाश की रूप में शिनाख्त की थी और राम ललवानी ने उसकी शिनाख्त की पुष्टि की थी । उसी ने राम ललवानी की सहायता से गीगी ओब्रायन की लाश को ले जाकर समुद्र में फेंका था ।

सुनील ने सारे कागजों का एक बार फिर पढा और फिर उन्हें मेज पर रख दिया ।
 
सुनील ने सारे कागजों का एक बार फिर पढा और फिर उन्हें मेज पर रख दिया ।

“सेठ जी” सुनील तनिक उत्तेजित स्वर में बोला - “सोहन लाल की इस स्टेटमेंट से यह जाहिर होता है कि गीगी ओब्रायन का शरीर हत्या के समय ही बुरी तरह काटा गया था जबकि आपके कथनानुसार यह काम गीगी ओब्रायन की हत्या के कई घन्टों बाद हुआ था । आप राजनगर से बम्बई गये, वहां राम ललवानी ने सुनीता को बचाने की एक स्कीम बताई और फिर उस स्कीम के अनुसार मनोहर ललवानी बाद में जाकर गीगी ओब्रायन के शरीर की धज्जियां उड़ाकर आया जबकि वास्तव में उसके शरीर की वह हालत हत्यारे द्वारा हत्या के ही समय की जा चुकी थी । राम ललवानी ने आपको धोखा दिया ।”

सुनील चुप हो गया ।

“यह बात मुझे भी सूझी थी ।” - सेठ धीरे से सहमतिसूचक ढंग से सिर हिलाता हुआ बोला - “इस स्थिति में पुलिस के सामने इस बात का दावा कैसे किया जा सकता है कि लाश की वह हालत मनोहर ललवानी ने बनाई थी । सुनीता ने नहीं ?”

सुनील चुप रहा ।

“बेटा, तुम्हारे सामने केवल सोहन लाल की स्टेटमेंट की प्रतिलिपि पड़ी है । ओरिजिनल स्टेटमेंट अब तक सोहन लाल के वकीलों ने पुलिस को को सौंप दी होगी या सौंपने वाले होंगे । स्टेटमेंट में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि सुनीता मेरी बेटी है । लेकिन राम ललवानी से पूछताछ करने के बाद वे इस तथ्य को जरूर जान जायेंगे । अब मुझे तो दो तरीकों में सुनीता की, और किसी हद तक अपनी भी, सलामती दिखाई देती है कि या तो सुनीता कौन है इस बारे में राम ललवानी अपनी जुबान बन्द रखे, जिसकी कि मुझे आशा नहीं, और या फिर वह हत्यारा पकड़ा जाये जिसने पिछली रात को फ्लोरी नाम की उस लड़की की हत्या की है जिसका तुमने थोड़ी देर पहले जिक्र किया था ।”

“सेठ जी” - सुनील धीरे से बोला - “शायद आपको यह बात मालूम नहीं है कि मुकुल फरार हो चुका है ।”

“अच्छा ! फिर तो उसका फरार हो जाना ही पुलिस की निगाहों में सन्देह का कारण बन सकता है ।”

“जरूरी नहीं है । मुकुल अपने साथ एक लड़की भी भगा कर ले गया है । पुलिस शायद इसे इश्क का मामला ही समझे ।”

“लेकिन इतनी बड़ी दुनिया में मुकुल को तलाश कहां किया जाये ।”

“मुकुल के फरार हो जाने की जानकारी अभी किसी को नहीं है । इसलिए सम्भव है वो अभी राजनगर में ही हो । एक दो स्थान मेरी निगाहों में हैं जहां मुझे मुकुल के होने की सम्भावना दिखाई देती है ।”

“कौन से स्थान हैं वे ?”

“फोर स्टार नाईट क्लब और राम ललवानी की शंकर रोड वाली कोठी । मुकुल समझता है कि इस बात की जानकारी राजनगर में किसी को नहीं है कि वह राम ललवानी का सगा भाई है इसलिए वह इन दोनों जगहों में से कहीं होगा तो उनकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जायेगा ।”

“मुकुल फोर स्टार नाइट क्लब में है या नहीं, यह बता तो मैं दो मिनट में पता लगा देता हूं ।”

“कैसे ?”

“क्लब का एक कर्मचारी क्लब खुलने से पहले मेरा निजी नौकर था । मैं फोन करके उससे पूछता हूं ।”

“पूछिये ।”

सेठ उठा और लम्बे डग भरता दूसरे कमरे में चला गया ।

सुनील ने एक नया सिगरेट सुलगा लिया ।
 
कुछ क्षण बाद वह अपने स्थान से उठा और शीशे की खिड़की के सामने आ खड़ा हुआ ।

बाहर थोड़ी दूर उसे पहियों वाली कुर्सी पर बैठी वही औरत दिखाई दी जिसे वह पहले भी देख चुका था ।

आंखों में उदासी लिये वह अपने सामने फैले समुद्र को दूर तक देख रही थी । उसके चेहरे की खाल लटक गई थी और इतनी सफेद थी जैसे शरीर में से खून की आखिरी बूंद भी निचोड़ ली गई हो । उसके अधपके सूखे बाल हवा में उड़ रहे थे । वह कम-से-कम पैतालीस साल की जिन्दगी से हारी हुई औरत लग रही थी ।

“यह मेरी बेटी सुनीता है ।” - उसे अपने पीछे से सेठ का रुंधा हुआ स्वर सुनाई दिया - “इसकी उम्र सत्ताइस साल है ।”

सुनील ने घूम कर देखा । सेठ मंगत राम पता नहीं कब पीछे आ खड़ा हुआ था । उसकी आंखों में आंसू तैर रहे थे ।

सुनील चुप रहा ।

“सुनीता” - सेठ गहरी सांस लेकर बोला - “अपने पीछे छुट गये उच्छृंखल जीवन का बहुत बड़ा हरजाना चुका रही है और भगवान जाने कब तक चुकाती रहेगी ।”

सुनील चुप रहा ।

“मुकुल” - सेठ एकाएक स्वर बदलकर बोला - “फोर स्टार नाइट क्लब में नहीं है ।”

“आई सी । मैं राम ललवानी की शंकर रोड वाली कोठी पर पता करूंगा ।”

“ठीक है । बेटा, अब मैं तुम्हें रुपये की लालच नहीं दूंगा । रुपये का लालच तुम्हारे पर कोई भारी प्रभाव छोड़ता दिखाई नहीं देता इसलिये मैं इतना ही चाहता हूं कि अगर तुम मुकुल को तलाश कर पाये और तुम्हारी सहायता से मेरी बेटी इस जंजाल से निकल पायी तो मैं सारी जिन्दगी तुम्हारा अहसान नहीं भूलूंगा ।”

सेठ की आंखे फिर डबडबा आई ।

“मैं अपनी ओर से कोई कोशिश नहीं उठा रखूंगा, सेठ जी ।”

सुनील कोठी से बाहर निकला और अपनी मोटरसाइकल पर आ बैठा । मोटरसाइकल उसने राजनगर के भीतर की ओर दौड़ा दी ।

एक पब्लिक टेलीफोन बूथ से उसने यूथ क्लब फोन किया । दूसरी ओर से रमाकांत की आवाज सुनाई देते ही वह बोला - “रमाकांत, जो काम मैंने तुम्हें बताये थे अब उन्हें करवाने की जरूरत नहीं है ।”

“क्यों ?” - रमाकांत ने पूछा ।

“क्योंकि मुझे पहले ही मालूम हो गया है कि सुनीता सेठ मंगत राम की ही लड़की है और वह अभी जीवित है । सुनीता सेठ मंगत राम के साथ ही रहती है ।”

“तुम्हें कैसे मालूम हो गया है ?”

“मुझे अलादीन का चिराग मिल गया था । चिराग के जिन्न ने मुझे यह बताया था ।”

“अच्छा ! बधाई हो ।” - रमाकांत का व्यग्यपूर्ण स्वर सुनाई दिया ।

“अब एक काम और कर दो तो मैं शुक्रवार तक तुम्हारा अहसान नहीं भूलूंगा ।”

“क्या ?”

“एक रिवाल्वर दिला दो ।”

“पागल हुए हो !” - रमाकांत फट पड़ा - “मैंने क्या रिवाल्वरों की फसल उगाई है कि जब तुम्हें जरूरत पड़े मैं भुट्टे की तरह रिवाल्वर तोड़कर तुम्हारे हाथ में रख दिया करूं ? जो रिवाल्वर मैने तुम्हे कल दी थी, उसी को तुम इतने बखेड़े में फसा आये हो कि मुझे डर लग रहा है कि कहीं मैं भी गेहूं के साथ घुन की तरह न पिस जाऊं । बाई गॉड, तुम्हारे जैसे यार से तो भगवान ही बचाये ।”

“दिला दो न यार ।” - सुनील विनीत स्वर से बोला ।

“एक शर्त पर रिवाल्वर दे सकता हूं ।”

“क्या ?”

“कि तुम मेरी आंखों के सामने उससे आत्महत्या कर लोगे ।”

“लानत है तुम पर ।” - सुनील बोला और उसने रिसीवर हुक पर टांग दिया ।

वह दुबारा मोटरसाइकल पर सवार हुआ और सीधा बैंक स्ट्रीट पहुंच गया ।

वह अपने फ्लैट में घुसा । बैडरूम की एक अलमारी खोल कर उसने उसमें से एक लगभग नौ इन्च लम्बा बांस का खोखला टुकड़ा निकाला । सूरत में निर्दोष सा लगने वाला वह बांस का टुकड़ा एक स्लीव गन (Sleevs Gun) नामक खतरनाक चीनी हथियार था । स्लीव गन के भीतर का छेद लोहे की गर्म सलाखों की सहायता से इतना हमवार बनाया हुआ था कि वह भीतर से शीशे की तरह मुलायम और चमकदार हो जाता था । नली के भीतर एक तगड़ा स्प्रिंग और एक शिकंजा लगा हुआ होता था । शिकंजे में एक छोटा सा जहर से बुझे हुए लोहे की नोक वाला तीर फंसा होता था । शिकंजे पर हल्का सा दबाव पड़ने पर स्प्रिंग खुल जाता था और तीर तेजी से नली में से बाहर निकल जाता था । स्लीव गन चीन के पुराने कबीलों में प्रयुक्त होने वाला बड़ा पुराना हथियार था । नाम स्लीव गन इसलिये पड़ा था क्योंकि पुराने जमाने में चीनी उसे अपनी लम्बी बांहों वाले चोगे की आस्तीन (स्लीव) में छिपा कर रखा करते थे । कोहनी पर किसी प्रकार का हल्का सा दबाव पड़ने की देर होती थी कि शिंकजा हट टेशंन के जोर से नाल के बीच में रखा तीर तेजी से बाहर निकलता था और सामने खड़े आदमी के शरीर में जा घुसता था ।

सुनील ने अपना कोट उतारा और सलीव गन बड़ी मजबूती से अपनी आस्तीन के साथ बांध लिया । उसने कोट वापिस पहन लिया । स्लीव गन कोट के नीचे एकदम छुप गयी । उसने एक-दो बार अपनी बांह को स्लीव गन की पोजीशन को टैस्ट किया और फिर संतुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाता हुआ फ्लैट से बाहर निकल आया ।
 
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