• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अंदाज़

'ओह, तो आप आत्महत्या कर रहे थे?'

__ 'हां, बेटे ।' बूढ़े की आवाज गले में सुध गई-'लेकिन तुम दोनों को देखकर लगता है कि मेरी बेटी और दामाद ने दूसरा जन्म लिया है या मरे ही नहीं हैं । तुम लोग यहां रहोगे-यहीं हनीमून मनाओगे तो मुझे भी शांति मिलेगी और मेरी बेटी और दामाद की आत्माओं को भी ।'

फिर उसने राज और डॉली के हाथ पकड़कर भारी आवाज में कहा

'मुझे वचन दो । तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगे?'

डॉली की आंखें भीग गई थी। उसने भारी आवाज में कहा

'बाबा...!'

बूढ़े ने कहा

'नहीं, बेटी! मुझे बाबा नहीं पापा कहकर पुकारो | मेरी बेटी भी मुझे इसी नाम से पुकारा करती थी । मैं इस सम्बोधन के लिए तरस गया हूं।'

'पापा...!'

बूढ़ा रो पड़ा। फिर उसने आंसू पोंछे और बोला

_ 'बेटी! यहां सब-कुछ मौजूद होगा । अपने लिए जो मन चाहे बनाओ । आज मैं कुछ नहीं खाऊंगा । नींद की गोली लेकर सोऊंगा।'

फिर उसने इशारे से बताकर कहा

'वह जीने चढ़कर ऊपर जाओ। कॉरीडोर में बिल्कुल आखिरी कमरा मेरी बेटी का था । तुम लोग भी उसी कमरे में रहोगे ।'

'जी, पापा !'

फिर राज के कहने पर डॉली खाना बनाने चली गई।

जैसे ही राज ने अंदर से दरवाजा बंद किया । डॉली उछलकर खड़ी हो गई ।

वह कंपकंपाती आवाज में बोली

'यह क्या कर रहे हो?'

'दरवाजा बंद कर रहा हूं।'

'म...म...मैं पूछती हूं, तुम इस कमरे में क्यों आए हो?'

राज ने भोलेपन से कहा 'हनीमून मनाने ।'

डॉली उछलकर कराटे की पोजीशन में आ गई और बोली

+

'खबरदार ! अगर तुमने मुझे हाथ भी लगाया । मैं अकेली दस-बारह को ठीक कर लेती हूं।'

'ठीक है...यही सही...।'

.

राज भी कराटे की पोजीशन में आ गया और बोला

'अगर तुमने मुझे मार लिया तो मैं वापस चला जाऊंगा । अगर तुम हार गई तो फिर मैं यहां से तुम्हारे साथ हनीमून मनाकर ही निकलूंगा।'

डॉली का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था । लेकिन उसने फैसला कर लिया था कि वह या तो राज को मार डालेगी या खुद मर जाएगी । मगर अपनी लाज पर आंच नहीं आने देगी । सहसा उसकी कल्पना में यशोदा का चेहरा घूम गया ।

'मैं अपने बेटे को दूर से तो देख सकती हूं, छाती से नही लगा सकती।'
 
'हे भगवान ! ऐसी देवी स्वरूप औरत का बेटा, इतना आवारा, इतना चरित्रहीन, चोर और फ्रॉड...बल्कि डाकू ।'

'लेकिन मैंने तो इसे सुधारने की प्रतिज्ञा ली है

.

'अब इसे सुधारने के लिए क्या मैं अपनी लाज भेंट चढ़ा सकती हूं?'

'अगर यह मेरे हाथों मर गया तो क्या होगा?'

'मैं आंटी को कैसे सूरत दिखाऊंगी?'

'मैं उस स्थिति में भी आत्महत्या कर लुंगी।'

'मैं आंटी को अपनी सूरत नहीं दिखा सकती

अचानक राज ने उसे ललकारा

'चलो...हमला करो।'

डॉली चौक पड़ी और संभलकर बोली 'नहीं, पहले तुम हमला करो।'

'मैं मर्द हूँ । मर्द औरतों पर हमला नहीं करते । सिर्फ अपना बचाव करते हैं।'

'इस तरह फैसला कैसे होगा?'

'जब तुम हमला करते-करते थक जाओगी तो समझ लो तुम हार गई।

'मैं जीवन भर नहीं थक सकती ।'

'फिर ठीक है । जब मैं बचाव करते-करते थककर लुढ़क जाऊं तो समझ लेना कि मैं हार गया।'

डॉली ने होंठ भींचकर गुस्से से कहा

'तुम मर्द...हम औरतों को क्या समझते हो?'

'ठंडी हवा के नर्म झोंके, झरने के गिरते पानी की गुनगुनाहट, पक्षियों का मधुर गीत और फूलों की रंगीन क्यारियां...!'



__'मिस्टर ! अब वह जमाना लद गया । जब औरत सिर्फ मर्दो की शायरी की किताबों में कैद रहती थी। अब औरत ठंडी हवा का नहीं, गर्म हवा का तूफान है । झरने की गुनगुनाहट नही सागर का भंवर है, पक्षियों का मधुर गीत नहीं, शेरनी की दहाड है। फूलों की रंगीनी नहीं, शोलों की आग है।'

'फिर भी औरत, औरत ही है, जो बच्चे पैदा करती है-संसार में आज तक किसी मर्द ने कोई बच्चा नहीं पैदा किया ।'

'ओ...यू...।'

डॉली ने खीझकर राज पर हमला किया। राज ने बड़ी खूबसूरती से वार बचा लिया और डॉली झोंक में गिरते-गिरते बची ।

राज ने हंसकर कहा

'जरा संभलकर । यह फाइट है, बच्चे का पालना नहीं ।'

इस बार डॉली ने ताबड़तोड़ हमले किए। लेकिन राज को वह हाथ भी न लगा सकी।

आखिर में उसने उछाल भरकर राज की छाती पर दोलत्ती झाड़नी चाही। मगर राज ने थोड़ा-सा पीछे हटकर उसे अपनी भुजाओं पर लपक लिया । डॉली इस तरह उसकी भुजाओं में थी, जैसे उसे बड़े प्यार से रोमांटिक अंदाज में उठाया गया हो । उसकी बाहें पता नहीं किस तरह राज के गले में चली गई थी।

राज ने बड़े रोमांटिक अंदाज में उसकी आंखें में देखा और प्यार से बोला

'अब तो हार मान लो ।'

सहसा डॉली जैसे सपने से जाग उठी हो । वह चिकनी मछली की तरह फिसलकर राज की भुजाओं से निकल गई और कूदकर फर्श पर खड़ी होती हुई पोजीशन लेकर बोली

'हर्गिज नहीं । तुम मुझे सारी उम्र नहीं हरा सकते।'

'एक बार यही बात मुस्कराकर कह दो | मैं खुद ही अपनी हार मान लूंगा।'
 
'हर्गिज नहीं । मुझे भीख की जीत नहीं चाहिए।'

उसने फिर से राज पर आक्रमण किए और राज बचाता रहा । इस बार फिर से डॉली ने धोखे से हवा में उड़ान भरकर राज की छाती पर दोलत्ती मारी । राज फुर्ती से एक तरफ हट गया ।

अगले ही पल धड़ाम-धड़ाम की दो आवाजें आई।

साथ ही किसी की चीख भी गूंजी

'अरे मर गया...मर गया...।'

पता नहीं, कब किस तरह दरवाजा खुल गया था । सिर पर पट्टी बांधे उन्हें बूढ़ा नाइट-गाऊन और स्लीपिंग सूट पहने दरवाजे के बाहर गिरा पड़ा मिला।

डॉली के मुंह से चीख निकली 'हे भगवान !'

फिर यह तुरन्त झपटती हुई बोली

'पापा...आप...?'

डॉली और राज ने बड़ी मुश्किल से बूढ़े को दोनों भुजाएं पकड़कर उठाया और बूढ़े ने कराहते हुए एक कुर्सी पर गिरकर कहा

'अरे! यह कौन-से स्टाइल का हनीमून मना रहे थे तुम लोग?'

राज ने तुरन्त जवाब दिया 'व...व...वह यूनानी स्टाइल का !'

'क्या? यूनान में इस प्रकार...हनीमून...मनाया जाता है।'

'मनाया जाता था-अब नहीं मनाया जाता ।'

_ 'तो तुम लोग अब क्यों गढ़े मुर्दे उखाड़ रहे हो?'

'वह पापा...दरअसल...जब तक पुराना दौर लौटकर नहीं आएगा, दुनिया में शांति स्थापित नही होगी । पहले फौजें तोपों, तलवारों और तीरों से लड़ती थी।

'उस लड़की के लिए भुजाओं में शक्ति और स्टैमिना की जरूरत होती थी। आजकल वनस्पति घी और एअरकंडीशड बैडरूमों में बैठकर राकेट छोड़े जाते है।'

'फिर...?'

'अब अगर यह सब रॉकेट-वॉकेट, एटमबम, आणविक हथियार वगैरह खत्म हो जाएं तो क्या आज का आदमी दस मिनट भी हथियार लेकर लड़ सकता है?

'आपने बाक्सिंग चैम्पियन देखे होंगे । फ्री स्टाइल देखी होंगी-इतने-इतने शक्तिशालियों के स्टैमिना की हालत यह है कि हर पांच मिनट बाद रेफरी दो पहलवानों को अलग करके सस्ताने का मौका देता है।'

फिर वह चौंककर बोला

'ओहो, पापा ! कहीं आप रेफरी बनने तो नहीं आए थे?'

बूढ़े ने कराहकर कहा _ 'अरे, बेटा ! मैं तो नींद की गोलियां पानी से गले के नीचे उतारने जा रहा था । धमा-चौकड़ी की

आवाज सनकर मैं समझा, बंगले में चौपाए घुस आए है।

'मगर आवाजें तम्हारे कमरे से आई थी । मैंने सोचा पहले ही दिन झगड़ा तो नहीं हो गया।'

डॉली ने जल्दी से कहा

'मगर पापा, दरवाजा तो इन्होंने अंदर से बंद कर लिया था ।'

-

-
 
___ 'अरे, बेटी । दरवाजा बंद होता तो मेरी यह हालत होती? मैंने तो दरवाजे पर जैसे ही हाथ रखा, दरवाजा खुल गया ।'

डॉली ने हड़बड़ाकर राज को देखा तो राज ने कहा-'मैडम! अच्छे पहलवान हमेशा कमजोर पहलवान के फरारी का रास्ता खुला रखते है

डॉली सन्नाटे में रह गई।

बूढ़े ने उन दोनों को हैरत से देखा और बोला-'बेटे ! तुम दोनों यह कैसी बातें कर रहे हो ?'

राज ने कहा

'ओ...पापा...आप हम लोगों की परवाह मत कीजिए। हम लोग माडर्न प्रेम-विवाह वाले पति-पत्नी है । हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली संतान सिर्फ हाथ-पैरों की लड़ाई सीखकर पैदा हो । बंदूक, चाकू, रिवाल्वर लेकर नहीं ।'

फिर राज ने डॉली से कहा 'चलो, जल्दी करो । पापा को आराम की जरूरत है ।' दोनों बूढ़े को संभालकर उसके बैडरूम में लाए और बैड पर बिठाकर पहले डॉली ने बूढ़े को नींद की गोलियां दी। फिर राज ने पानी का गिलास उसके होंठों से लगा दिया । गोलियां गले से उतारने के बाद दोनों ने बूढ़े को लिटाया । -

डॉली ने उसके बालों में हाथ फेरकर क्षमायाचक स्वर में कहा

'आई एम सॉरी पापा । आई एम वेरी सॉरी ।'

'डोंट वरी, बेटी । कैरी ऑन ।'

कहते-कहते बूढे की आंखें बंद हो गई और गहरी-गहरी सांसों की आवाजें वातावरण में गूंजने लगीं।

राज और डॉली ने एक-दुसरें की तरफ देखा । फिर बैडरूम का दरवाजा भेड़कर दोनों अपने बैडरूम में आ गए।

राज ने पोजीशन लेते हुए कहा

'कम आन...लेट अस स्टार्ट अगेन!'

डॉली ने उसे ध्यान से देखा और बोली

'मारो...मुझे...'

'नो...मैं सिर्फ बचाव करूंगा।'

डॉली ने बैड पर लेंटकर कहा

'मैं हार गई।'

राज जिस पोजीशन में था, उसी पोजीशन में रह गया।

डॉली ने फिर से कहा

'मैं हार गई।'

राज ने चौंककर सिर को जोर-जोर से झटके दिए और आंखें फाड़कर डॉली को देखता हुआ आश्चर्यचकित स्वर में बोला

'रिअल्ली...!'

डॉली ने मीठी-सी मुस्कान के साथ कहा

'रिअल्ली...।'

राज ने फिर से सिर को झटका दिया। बैड पर अपना तकिया और कम्बल उठाया और विजयी अंदाज के साथ बोला

'बहादुर सिपाही! हारे हुए सिपाही की विवशता का लाभ नहीं उठाता ।' फिर वह बाल्कनी में से निकल गया । दरवाजा बाहर की तरफ से भेड़कर जोर से बोला

'अंदर से चिटकनी लगा लेना।'

डॉली ने दरवाजे की तरफ देखा ।

उसके होंठों पर अजीब-सी मुस्कान फैल गई । उसने कम्बल खींचकर शरीर पर डाला और बड़बड़ाई

'फ्राड कहीं का !'

फिर उसने करवट बदलकर सोचा

'दरवाजे की चिटकनी खुली छोड़ दी थी।'

'बहादुर पहलवान! हारने वाले पहलवान के लिए फरारी का रास्ता खुला छोड़ देते है ।'

उसने फिर से करवट बदली और उसके दिमाग में गुंजा ___ 'बहादुर सिपाही हारे हुए सिपाही की विवशता का लाभ नहीं उठाता ।'

'बहादुर सिपाही...।' 'पहले तो मुझे डरा ही दिया था ।'

'मैं समझी थी, आज की रात मेरे जीवन की आखिरी रात होगी।'

'अगर वह सचमुच बदमाश होता तो?'

'तो क्या मुझे इस प्रकार छोड़ देता ।'

L
 
उसने फिर से करवट बदली और नींद से बोझिल दिमाग से सोचा

'डाकू है चोर है, फ्राड है-मगर बदमाश नहीं

'जरूरी नहीं कि हर डाकू चोर और फ्राड का चरित्र भी खराब हो ।'

'कोई-मजबूरी, कोई कारण, कोई जरूरत आदमी को थोड़ा-बुरा तो बना ही सकती है ।'

'अब मैंने भी तो वर्षगांठ मनाने के लिए सेठ गोपालदास से फ्रॉड किया था ।'

'क्या मेरा चरित्र खराब है?'

'उसका चरित्र भी अच्छा है।'

'आखिर, है ना यशोदा आंटी का बेटा ।'

'इसका मतलब है, उसे सुधारने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी।

'सिर्फ उसकी चोरी-चकारी की आदत ही तो छुडानी है।'

'मगर है बहादुर!' 'बहादुर भी और चतुर भी ।'

'चतुर भी और हैंडसम भी ।'

'हैंडसम...असली हीरो की तरह ।' 'अपनी जिन्दगी का तो हीरो है।'

डॉली के होंठों पर एक रोमांटिक-सी मुस्कान फैल गई । फिर उसकी आंखें खुद-ब-खुद बंद होती चली गई।

कुछ देर बाद वह गहरी-गहरी सांसें ले रही थी । साथ ही वह राज को बार-बार विभिन्न रूप में देखती और उसके होंठों पर खुद-ब-खुद मुस्कान फैल जाती।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
डॉली की नींद टूटी तो उसकी आंखों पर धूप की नर्म-नर्म सी तपिश मिली चमक पड़ रही थी । वह धूप बाल्कनी के शीशे से छन-छनकर आ रही थी।

डॉली ने दो-तीन बार पलकें झपकाई । फिर आंखें खोल दीं । निदासी आंखों में गहरी लाली झलक रही थी और होंठों का खिलापन भी बढ़ गया था ।

डॉली ने दोनों हाथों को फैलाकर एक जोरदार अंगड़ाई ली।

उसे अपने अंग-अंग में एक मीठी-सी टूटन का अहसास हुआ।

अचानक उसकी कल्पना में राज का चेहरा उभरा । फिर उसे ख्याल आया कि राज बाल्कनी में सो रहा था-इतनी ठंड और बाल्कनी ।

डॉली ने झटपट अपने ऊपर से कम्बल उतारकर फेंका और बाल्कनी के दरवाजे के पास आई।

-

शीशे में से उसने देखा।

-

राज औधा, घोड़े की तरह बना हुआ, किसी गठरी की तरह सिमटा हुआ सो रहा था ।

डॉली के दिल को धक्का -सा लगा । उसने जल्दी से बाल्कनी का दरवाजा खोला और ठंडी हवा का एक तेज झोंका, उसका गाल सहलाता हुआ अंदर घुस आया।

डॉली ने झुरझुरी-सी लेकर सोचा

'जब सुबह-सुबह ठंडक का यह हाल है तो रात में कितनी ठंडक होगी?'

.

डॉली ने राज के समीप पहुंचकर पुकारा

'राज बाबू...! ऐ...राज बाबू...!'

राज की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। डॉली की आंखों में परेशानी नजर आई।

उसने राज को पुन: पुकारकर कहा 'ऐ राज बाबू !'

फिर भी कोई जवाब न मिला ।

डॉली ने बढ़कर राज के ऊपर से कम्बल खींच लिया । राज के घुटने और कोहनियां पेट में अड़े हुए थे और गर्दन झुकी हुई, सिर तकिये पर टिका हुआ।

डॉली ने फिर उसे पुकारा

'राज बाबू!'

लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं मिला । इस बारे डॉली ने राज को हिलाकर पुकारा

'राज बाबू!'

दूसरे ही पल राज एक तरफ लुढ़ककर चित्त हो गया । उसके घुटनों और हाथों की पोजीशन में कोई अंतर नहीं आया।

डॉली ने उसे बेचैनी से बैठकर झकझोर डाला

'राज बाबू...! राज बाबू...!'

.

.

लेकिन राज के हाथ-पांव ठंडे और अकड़े हए थे, आंखें बंद, चेहरे की त्वचा के गोरेपन पर ठंडक की नीलाहट फैल गई थी।
 
डॉली का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था । उसकी छाती में उमड़-उमड़कर एक हिचकियों का तूफान आ रहा था । आंखें छलकी पड़ रही थी। वह बड़ी मुश्किल से राज को खींच-खांचकर कमरे के अंदर लाने में सफल हो सकी । राज की पीजीशन अब भी वैसी ही थी।

डॉली ने बाल्कनीका दरवाजा बंद करके एअर-कंडीशड का बटन फुल पर कर दिया । राज को बिस्तर के करीब ले आई।

फिर बैड के ऊपर पहुंचाने में से दांतों पसीना आ गया।

राज की पोजीशन बदस्तूर वैसी ही थी ।

डॉली ने उसे एक करवट से लिटाकर अपना कम्बल डाला । फिर राज का कम्बल भी उसने ऊपर डाल दिया । फिर दोनों रजाइयां भी डाल दी और हाथ डालकर राज का शरीर छुआ, जो बर्फ की तरह अब भी शीतल हो रहा था।

डॉली कुछ देर तक सोचती रही।

-

फिर वह खुद भी बैड पर लेटकर कम्बलों और रजाइयों के अंदर सरक गई और उसने अपनी छाती और पूरा शरीर राज की पीठ से लगा दिया ।

उसके दिल की धड़कनें तेज होती गई । शरीर में खून का प्रवाह भी बढ़तागया । सांसें भी तेज-तेज होती गई । धीरे-धीरे राज के शरीर में गर्मी आती गई। फिर उसके हाथ और पांव की अकड़न भी खत्म होने लगी । वे ढीले होकर फैलने लगे।

कुछ देर बाद राज के पांव फैल गए।

वह हल्की-सी कराह के साथ चित्त होने लगा तो डॉली को जैसे होश आ गया ।

वह बड़ी फुर्ती से बिस्तर से उठ गई।

एक बार फिर से रजाइयां और कम्बल अच्छी तरह ढंक दिए । अब वह अपनी सांसों और खून की गर्दिश पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी।

उसने एक गिलास ठंडा पानी जग से गिलास में निकालकर पिया और सोफे पर बैठकर सिर को पृष्ठ भाग पर रखा और आंखें बंद कर ली।

शनै:-शनै: उसका शरीर सामान्य हो गया । फिर उसके कानों से राज की हल्की-हल्की कराहें टकराई।

डॉली अब बिल्कुल सामान्य हो चुकी थी । वह उठकर राज के पास आई । बैड के किनारे पर बैठकर उसने राज का चेहरा खोल दिया ।

अब राज के चेहरे की रंगत पहले की तरह लाल-सफेद हो गई थी । उसने माथा छुआ तो माथा भी गर्म था । कंधे, छाती और भुजाएं भी गर्म थे।

डॉली उसे ध्यान से देखती रही।

फिर उसने राज के ऊपर झुककर धीरे-धीरे उसके-बालों में हाथ फेरते हुए पुकारा 'राज बाबू...ऐ राज बाबू...!'

.

.

.

'राज ने धीरे-से आंखें खोली और फिर आंखें बंद कर ली । अब उसके होंठों से बडबडाहट रूपी आवाज निकाल रही थी

'डॉली...डार्लिंग...!' 'यूं ही...मेरे सामने रही...!' 'कभी यह चांद-सा मुखड़ा नजरों से ओझल न हो ।' _ 'कहीं ऐसा न हो...मैं जागू और तुम गायब हो जाओ।'

डॉली का दिल जोर-जोर से धड़क उठा । उसने राज का हाथ धीरे-से हिलाकर पुकारा

'राज बाबू !'

राज ने उसका हाथ दोनों हाथों में ले लिया और बड़बड़ाया

'जानम! यूं ही तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में रहे । 'हम कभी एक-दूसरे का हाथ न छोड़े।'

'राज बाबू! आंखें खोलिए...।'

'नहीं, डॉली! यह सपना न टूटे । 'मेरी नींद न खुलने पाए। 'तुम यूं ही मेरी नजरों के सामने रहो।

डॉली ने दूसरे हाथ से उसका कंधा झिंझोड़कर जोर से पुकारा

'ऐ! राज बाबू!'
 
राज ने आंखें खोली और फिर बंद कर ली । फिर आंखें खोलीं । अपने हाथों में डॉली का हाथ देखा । फिर दूसरे ही पल उसने इस तरह चीख मारकर डॉली का हाथ छोड़ दिया, जैसे उसके हाथ में डॉली के हाथ की जगह कोई जहरीला सांप हो ।

साथ ही वह उछलकर पीछे हटा और तकिये पर चढ़कर बैठते हुए तेज-तेज सांसें लेने लगा ।

डॉली हड़बड़ाकर पीछे हट गई थी।

राज ने कपंकंपाती आवाज में कहा 'तुम...तुम यहां क्या कर रही हो?'

डॉली ने कहा

'आप जाग रहे हैं या सो रहे हैं ?'

'हे...मैं जाग रहा हूं या सो रहा हूं?'

उसने आंखें मलीं । फिर अपने दांतों से जोर से अपने हाथ पर काट लिया ।

साथ ही चीख पड़ा और जल्दी-जल्दी हाथ हिलाता हुआ बोला 'जाग तो रहा हूं | मूर्ख बनाती हो मुझे?'

'राज बाबू!'

'मै पूछता हूं तुम यहां क्या कर रही हो?'

डॉली ने कहा-'जाग रहे हैं या सो रहे है ?' 'राज बाबू! यह मेरा बैडरूम है ।'

'तुम्हार बैडरूम?' 'राज ने इधर-उधर देखा, फिर बोला 'और मेरा बैडरूम कहां है?'

डॉली ने बाल्कनी की तरफ इशारा करके कहा 'उधर!'

'उधर...वह तो बाल्कनी है।'

.

.

'जी, हां । वह बाल्कनी है और रात को आप वहीं सोए थे ।'

__'मैं वहां पर था तो फिर यहां कैसे पहुंच गया?'

'मैं लाई थी बड़ी मुश्किल से खींचकर!'

राज पीछे सरकता हुआ बोला 'मुझे...मुझे पहले ही संदेह था।'

'कैसा संदेह ?'

'यही कि तुम अच्छे कैरेक्टर की लड़की नहीं हो।'

'राज बाबू!'

'भ...भ...भला मैं....वहां...वहां बाल्कनी में सो रहा था तो तुम जबरदस्ती खींचकर सोते में, बेहोशी की दशा में मुझे यहां क्यों ले आई?

.

.

..
 
'अपने बैड पर, इतने कम्बलों और रजाइयों के नीचे यह भी कोई शराफत है? तुम जैसी लड़कियों के साथ किसी शरीफ लड़के की इज्जत सुरक्षित ही नही रह सकती...बिल्कुल नहीं रह सकती।'

डॉली ने ठंडी सांस ली और बोली 'श्रीमान! आप वहां ठंड में अकड़े पड़े थे।'

'अकड़ा पड़ा था । भला, किस पर अकडूंगा ? मैं तो अभी कुंवारा हूं। आदमी बीवी पर अकड़ सकता है और किस पर अकड़ सकता है?'

'आप ठिठुरे पड़े थे । आपके हाथ-पांव टेढ़े होकर रह गये थे ।'

'ओह...!'

'मैं जब सुबह जागी तो मैंने आपको बुरी हालत में देखा ।'

'सुबह...यानि आज सुबह ।'

'जी, हां । आज सुबह...'

'हलफिया बयान दे रही है न आप?'

'बिल्कुल हलफिया बयान दे रही हूं | आपको मैंने बड़ी मुश्किल से बैड पर चढ़ाया । एयरतंडीशनर तेज किया और इतने कम्बल और रजाइयां आपके ऊपर डाली...तब आपके शरीर में गर्मी आई और आपके हाथ-पांव सीधे हुए ।'

'ओहो...सचमुच...?'

'अब क्या इसके लिए भी मुझे हलफ उठाना पड़ेगा?'

'नहीं...नहीं, इसकी जरूरत नहीं । अब मुझे कुछ-कुछ विश्वास है कि मेरी इज्जत सुरक्षित है । मगर फिर वह...वह कौन लड़की थी?'

'कैसी लड़की?'

-

'आप ही जैसी थी । अरे, लडकियां भी क्या अलग-अलग जातियों की होती हैं-बाटा छाप, फ्लैक्स छाप, ईगल छाप एटसेक्ट्रा-ऐटसेक्ट्रा ।'

'आप लड़कियों को जूतियों के बराबर समझते हैं?' डॉली को गुस्सा आ गया।

राज ने कहा

'अरे, मैडम! जूतियों की बेइज्जती मत कीजिए। आप जूतियों को क्या समझती है? जरा एक कीमती सुट पहनकर नंगे पांव सड़क पर निकलकर तो दिखा दीजिए ।'

'आप किसी लड़की की बात कर रहे थे?'

'हां! वह लड़की मेरा हाथ थामकर कह रही थी, यूं ही मेरे सामने रहना । चले मत जाना । आंखें खुली तो तुम गायब हो जाओगे...एटसेक्ट्रा-ऐटसेक्ट्रा ।'

'झूठ! यह सब तो आप बोल रहे थे ।'

--

-

'हे! मैं बोल रहा था? फिर मेरे हाथों में किसका जूता था?'

'आपके हाथों में जूता नहीं था, हाथ था।'

'अरे बाप रे! हां, मेरा यही मतलब है कि मेरे हाथों में किसका हाथ था?'

'मेरा हाथ!"

राज उछल पड़ा

'हे, आपका हाथ !'

'जी, हां ।'

'और आपने अपना हाथ मेरे हाथ में दे भी दिया ? बड़ी बेशर्म लड़की हैं आप!'

'आप से ज्यादा बेशर्म नहीं हूं।'

'व्हाट?'
 
'कोई शरीफ लड़का कभी किसी लड़की को बेशर्म नहीं कहता।'

'चाहे वह लड़की बेशर्म हो ?'

'जी, हां । जैसे मैंने आपको बेशर्म नहीं कहा था ।'

'सॉरी । मुझे क्षमा कर दीजिए!"

'कर दिया।'

राज फिर से चौंककर बोला 'लेकिन मैंने क्या बेशर्मी की थी ?'

'आपने मेरा हाथ पकड़ा और मुझसे रोमांटिक डायलाग बोले ।'

'आपने मेरी जान बचाई थी ना, वरना मैं सर्दी में अकडकर मर जाता ।'

'बेशक!'

'तो फिर बात खत्म ।'

'क्या मतलब?'

'आपने फिल्मों में नहीं देखा? लड़का-लड़की की जान बचाता है और लड़की उस पर लट्ट हो जाती है। यहां उल्टी गंगा बह गई।'

डॉली ने कमर पर हाथ रखकर आंखें निकाली और कहा-'यानी आप मेरे ऊपर लट्ट हो गए ।'

'वह तो सपने में हो गया था ।'

'और अब?'

'अब तो कसम ले लीजिए । मुझे आपकी सूरत भी जहर लग रही है ।'

'क्या...मेरी सूरत जहर..?'

'उफ्फोह! शायद मेरे शरीर से ठंड का असर खत्म हो गया । लेकिन दिमाग से अभी नहीं हुआ है।'

'तो फिर आपका दिमाग भी गर्म कर दूं?'

'बड़ी मेहरबानी होगी । एक कप गरमागरम चाय मिल जाए।'

'आपको और गरमागरम चाय?'

'क्या मैं चाय नहीं पीता?'

'आप मुझे बेशर्म कह लें, जूती के बराबर समझ ले, मेरी सूरत आपको जहर लगे और मैं आपके लिए चाय बनाकर लाऊं?'

'अच्छा, मैं अपने सारे डायलॉग रिवाइंड करता हूं।'

'हर्गिज नहीं।'

'तो जो कुछ आपको मैंने कहा है वही सब आप मुझे कह लीजिए ।'

'मैं आपकी तरह बद-जुबान नहीं हूं।'

अचानक राज ने कहा

'तो आप बिस्तर पर आ जाइए ।'

'क्या...?'

'यहां मेरी जगह लेटकर मर जाइए । मैं आपके लिए चाय बनाकर लाता हूं-समझीं?'

'इतना चिल्ला क्यों रहे हैं?'

'सिर्फ-चिल्ला रहा हूं। इसलिए कि तुम्हारा मेरा कोई रिश्ता नहीं । अगर कोई रिश्ता होता तो उठाकर बाल्कनी से नीचे फेंक देता ।'

'और सारे गमले टूट जाते ।'

'क्या...?'

'बाल्कनी के नीचे पापा ने इतने बढ़िया पौधों के गमले लगाए हैं । मैं उन पर गिरती तो गमले टूट जाते, फुल मसल जाते तो पापा को कितना दु:ख होता-यह भी सोचा है आपने?'

'सोच लिया । मगर जरा देर से सोचा । शुक्र है कि तुम मेरी पत्नी नहीं हो ।'

'पत्नी होती तो क्या होता?'

राज चिल्लाकर बोला

'मैं और भी ज्यादा जोर से चिल्लाला ।'

डॉली ने झट अपने कान बंद कर लिए ।
 
Back
Top