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अमरबेल एक प्रेमकहानी

भगत का मन करता था कि एकबार कोमल को जगाकर बात कर लें लेकिन हिम्मत नहीं हुई. थोड़ी देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद उठकर फिर से गोदन्ती के पास आ बोले, “देखकर लगता है कि कोमल अभी भी बच्ची है. समझ में नही आता कैसे इसे मारने के लिए हाँ कह दूँ?"

गोदन्ती कुम्हलाते हुए बोली, “मन तो मेरा भी यही कहता है लेकिन ये उस कलमुहे मोहना के साथ गर्भ से है. अगर कुछ हो हा गया तो मुंह दिखाने के काविल नहीं रहेंगे."

भगत को लगा कि किसी ने उनके ऊपर बम गिरा दिया है. बोले, “तुम से किसने कहा कि ये गर्भ से है?

गोदन्ती घृणाभाव से बोली, “इस छोरी ने ही चिट्ठी में लिखा था."

भगत आश्चर्य से बोले, "लेकिन कल तो तुमने बताया ही नहीं था."

गोदंती फटाक से बोली, “कल आधी बात सुनते ही आपकी ये हालत हुई तो वाकी की बात बताने का ध्यान ही न रहा."

भगत निढाल हो गये. अपने सर पर हाथ मारकर कहने लगे, “ये तो अनर्थ कर दिया इस छोरी ने. क्या तुम्हारे हिसाब से कुछ हो सकता है जिससे ये लडकी पाक साफ़ हो जाय?"

गोदन्ती सोच में पड़ती हुई बोली, “अब क्या हो सकता है? शायद ओपरेशन से ही बच्चा निकला जा सके और ऐसा किया तो सबको खबर हो जायेगी. अभी जितनी भी इज्जत बची है सब की सब मिटटी में मिल जायेगी. कहीं भी मुंह दिखाने के लायक नही रहेंगे."

भगत वावलों की तरह बोले, “तो फिर इन लोगों की बात मान लें.जान से मार दे इस छोरी को?"

गोदंती के आँखों में आंसू आ गये. बोली, “में उसकी माँ हूँ. मुझसे पूछोगे तो में मना ही करूँगी. तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो लेकिन मुझे बार बार बताओ मत. दिल फटता है सुनने से."

गोदन्ती को रोते देख भगत भी भावुक हो उठे. बोले, “तुम अगर माँ हो तो में क्या उसका दुश्मन हूँ? होगा तो मुझसे भी कुछ नही लेकिन इस लड़की ने हमे इस समाज की बातों पर चलने को मजबूर कर दिया है. अब किस किस से कहें? पहले केवल भागने का हल्ला था अब गर्भवती होने का हल्ला भी हो जाएगा. इस एक लडकी की वजह से कितने लोग परेशान हो गये हैं." ____

गोदन्ती की आँखों से आंसू लगातार बह रहे थे. भगत की भयभीत आँखें भी अब रो रहीं थीं. उस बाप और माँ की स्थिति का अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल होता है जिसकी लडकी किसी रुढ़िवादी समाज में रहते हुए किसी लड़के के साथ भाग जाए. ऊपर से उसी के साथ गर्भवती भी हो जाय. ऊपर से लड़का किसी दूसरी या निम्न समझी जाने वाली जाति का हो. सारे नकारात्मक पहलु कोमल की किस्मत में ही आ लगे थे. प्यार होना फिर गर्भवती होना, जिस लडके से प्यार किया उसकी जाति दूसरी होना.

भगत बहुत बड़ी अनिश्चितताओं से घिरे हुए कोई ऐसा हल निकालने की कोशिश में लगे हुए थे जिससे कोमल की जान भी बच जाए और कोई बदनामी भी न हो, लेकिन दोनों हाथों में लड्डू नही होने वाली कहावत भगत के साथ भी हो रही थी. भगत को दोनों में से कोई एक चीज चुननी थी. बदनामी या कोमल. अब क्या करते? और भी तो लडके लडकियाँ थे भगत के पास.उनकी शादी करना. खुद भी गाँव में रहना. ये सब कारण उनकी हिम्मत को तोड़े जा रहे थे.

यह सब सोचते हुए भगत उठ खड़े हुए. आँखों में एक अजीब सा मंजर था जो कुछ अनहोनी का संकेत दे रहा था. गोदन्ती उस मंजर को भगत की बीबी होने के नाते समझ चुकी थी. वो चूल्हे के पास गर्मी में बैठी बैठी सर्दियों के मौसम की तरह काँप रही थी. भगत बाहर बैठे अपने घराने के लोगों के पास जा पहुंचे. सब लोग अपनी अपनी बातें बंद कर भगत को ऐसे देख रहे थे मानो वे कोई खास बात कहने जा रहे हों. भगत रुंधे हुए गले से बोले, "तुम लोगों को जो सही लगता है वो में करने को तैयार हूँ. लेकिन जो भी करना है आप लोगों को ही करना है. मुझसे रत्ती भर भी ये काम न हो सकेगा. जब भी करना हो मुझे बता दीजियेगा."

इतना कह भगत चुप हो गये. सब लोग अभी भी शांत बैठे थे.
 
भगत का मुंह देख किसी की हिम्मत न होती थी कि कोमल की मौत का समय तय कर दे लेकिन तभी तिलक बोल पड़े, “जो भी करना है तुरंत कर डालो. जितनी देर होगी उतना ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा. जो करना है वो जल्दी निपटा डालो. देर होने पर सौ तरह के विचार दिमाग में आते हैं." तिलक की इस बात का राजू, संतू, पप्पी और निक्कमे दडू ने भी सर हिलाकर समर्थन किया.

भगत निढाल हो वहाँ पर बैठ गये, बाकी के लोगों में कोमल को ठिकाने लगाने की बाते शुरू हो गयी. तिलक ने राजू से कहा, “राजू कोमल को मारने के लिए तुम्हारा घरठीक रहेगा. भगत के कमरे से तो बाहर तक आवाजें आती हैं लेकिन तुम्हारे अंदर वाले कमरे से किसी को कुछ भी सुनाई न देगा." राजू पहले तो सकुचाया लेकिन फिर कुछ सोचते हुए बोला, "ठीक है जैसा आप ठीक समझो."

भगत अपने सर को झुकाए अपनी बेटी को मारे जाने की योजना सुन रहे थे. तिलक ने दडू से पूंछा, “अब ये बताओ उसको मारे किस तरीके से? कोई योजना हो तो बताओ?"

दद्दू बहुत ही निर्दयी किस्म का इंसान था. औरतों की इज्जत उसने आज तक नहीं की. वो

औरतों को आदमी के हाथों की गुलाम समझता था. गाँव की एक गरीब विधवा औरत को कुछ दिन पहले ही इसने छोटी सी गलती पर बहुत बुरी बुरी गालियाँ दी थीं. जबकि वो बेचारी इससे माफी मांगती रही. कारण था उसके एक भी लडकी नहीं थी. अब कोई उसके बारे में कहे तो कैसे कहे? दद्दू मुंह सिकोड़ कर बोला, “योजना क्या बनानी? क्या हम सब पर मिलकर एक तिन्हा सी लडकी नही मारी जायेगी? उसे भगत के घर से खींचकर राजू के कमरे तक ले जायेंगे फिर वही उसका गला दवा देंगे. इसमें कौन सा सोचने वाली बात है?"

दद्दू की कोमल को खीचकर ले जाने वाली बात पर भगत अंदर तक तडप गये. उन्होंने लाचार आँखों से ददू की तरफ देखा लेकिन क्या कहते? वे तो पहले ही अपनी मंजूरी दे चुके थे. अब तो जो भी करना था इन्ही दरिंदों को करना था जो समाज और खानदान की इज्जत के रखवाले थे. जिनको अपने लडके लडकियों की शादी होने की चिंता सता रही थी. जिसका निवारण विना कोमल को जान से मारे नही हो सकता था, कोई अन्य दिन होता और कोमल के लिए कोई इस तरह की बात बोल देता तो भगत कोमल के बाप होने के नाते उसका खून पी जाते लेकिन आज तो लोग उनका ही खून पीने को तैयार खड़े थे. बात सही भी थी. दुनिया का कौन बाप होगा जो बैठा बैठा चुपचाप अपनी बेटी के लिए ऐसे शब्द सुनता रहे?

संतू सामने बैठे तिलक से बोला, "तो फिर करना कब है ये सब?"

तिलक फौरन बोले, “आज रात को ही कर डालो. ज्यादा देर हमारी मुश्किलें ही बढ़ा रही है. भगत और इसके बाल बच्चे भी परेशान हैं."

भगत की आँखों में अँधेरा छाता जा रहा था. उन्हें इस बात पर यकीन नही हो रहा था कि कोमल आज ही उनकी आँखों से दूर हो जायेगी. फिर कभी देखने को नहीं मिलेगी.

तिलक ने सब लोगों को प्लान बताना शुरू किया, “राजू तुम अपने घर संतू के साथ कोमल के आने का इन्तजार करोगे. मैं, दद्दू और पप्पी कोमल को खींच कर तुम्हारे घर तक ले आयेगे. फिर वही उसे खत्म कर डालेंगे."

भगत और राजू के घर की दीवार एक दूसरे से सटी हुई थी. गेट में दो तीन कदमों का ही फासला था. तिलक फिर से बोले, "ठीक है. सब लोग शाम तक अपना अपना काम खत्म करलो. उसके बाद ये काम निपटाना है."

इतना सुन सब लोग उठ उठ कर चले गये. भगत भी किसी बूढ़े आदमी की तरह चलते हुए घर के अंदर जा पहुंचे. घर में भगत के बच्चे और बीबी सब के सब भगत की तरफ ही देख रहे थे मानो सब पूंछना चाहते हों कि अब कोमल को लेकर क्या फैसला हुआ? वो बच तो जायेगी न? अब कोई उसे मारने की बात तो नही कहता था? भगत इन सबकी प्रश्न भरी नजरों को ज्यादा देर नही सह सके, बच्चों से नाराज़ होते हुए बोले, “तुम यहाँ ऐसे क्यों बैठे हो? चलो अपने अपने काम पर लगो."

इतना कहने के बाद भगत अपनी बीबी गोदन्ती के पास बैठ गये और बोले, “मैंने उनकी बात मान ली. अब ये सब शाम के समय कोमल को...." इतना कह भगत फफक फफक कर रो पड़े.

गोदन्ती इसके बाद चुप कैसे बैठ पाती. उसकी भी हिल्की बंध गयी. दोनों रोये जा रहे थे. उनको छुपकर देख रहे उनके बच्चे भी छुप छुप कर रो पड़े. सारा घर रो रहा था. कोमल को ये सब तो मालूम न था लेकिन वो राज को याद कर करके रो रही थी.

कोमल का तो एक भी पल ऐसा नही था जिसमे वो अपने प्यार राज को याद न करती हो. उसका तो काम ही अब रोना था. कहा जाय तो लडकी का काम ही जिन्दगी भर रोना होता है. कोख में आते ही घरवाले कोसते हैं तो रोती है. घर की हर परिस्तिथि में रोती है. घर से विदा हो तब भी रोती है. ससुराल में लोग परेशान करें तब रोती हैं. ऐसा लगता है कि एक आम लडकी जिन्दगी भर रोती ही रहती है लेकिन पूरी तरह से ऐसा भी नही कह सकते. क्योंकि समाज में हर आदमी लडकियों के खिलाफ नहीं होता.
 
भाग - 11

उधर राज के घरवाले लगातार राज को समझा रहे थे लेकिन राज की एक ही जिद थी कि कोमल को देखने जाना है. राज का पूरा घर जानता था कि अगर राज कोमल के गाँव के आसपास भी गया तो जीवित न लौटेगा.

पहले ही उन लडकों से न जाने कैसे कैसे बचाकर लाये थे. अबकी बार तो वे लोग राज को जान से ही मर डालेंगे. लेकिन राज मानने को राजी ही नही था. राज के बाप ने कई बार राज के गालों पर थप्पड़ भी मारे थे लेकिन राज की एक ही धक थी. कोमल, कोमल और कोमल.

सारे उपाय खत्म हुए तो राज के बाप महतो ने दिमाग में कुछ सोच राज से कहा, "देख राज तेरा जाना कोमल की जान के लिए भारी पड़ सकता है. कल भी वो लोग कह रहे थे कि अब तुझे उनके गाँव की तरफ देखा तो जान से मार देंगे और कोमल तुझसे मिली तो उसे जान से मार देंगे. अब तू चाहता है कि कोमल मारी जाय? चाहता है तो जाकर देख आ? हमें कोई आपत्ति नही. वैसे तो तू कहता है कि उसके विना जिन्दा नही रहेगा और वो मर गयी...."

राज तडपकर बीच में ही बोल पड़ा, “पापा ऐसी असगुनी बातें क्यों करते हों? अगर ऐसी बात है तो नहीं जाता उसके गाँव लेकिन आप किसी से खबर तो करबा सकते हो कि वो है कैसी?"

महतो मन में खुश होते हुए बोले, “ये काम तो तेरा करवा के रहूँगा लेकिन तू भूल के भी उधर जाने की कोशिश न करना."

राज ने बाप की बात पर हाँ में सर हिला दिया. महतो का दिमाग काम कर गया था. कोमल के मरने की बात ने राज के दिमाग को पूरी तरह से बदल दिया था.

महतो अब राज को इस गाँव से कुछ दिन के लिए कहीं भेज देना चाहते थे लेकिन राज को बातों में फंसाकर ही कहीं भेजा जा सकता था, राज के बाप को अब कोई ऐसी तरकीब निकालनी थी जिससे राज को यहाँ से कहीं दूर भेज सकें.

शाम हुई. भगत और घर के अन्य लोगों के दिलों की धडकनें थामे न थम रहीं थीं. भगत ने सुबह से खाना न खाया था और न ही गोदन्ती ने. बच्चे जो समझदार थे उन्होंने भी ऐसा ही उल्टा सीधा खाया. एक छोटे बच्चे जरुर थे जो पेट भर खा चुके थे क्योकि उन्हें इस देश दुनिया की खबरों से ज्यादा सरोकार नही था. कोमल की बहन देवी छुप छुप कर रोती थी. उसने कोमल को बहुत समझाया था लेकिन कोमल इस बात को न समझ सकी और आज अपने आप को खत्म सा कर बैठी.

उधर महतो ने शाम को घर पहुंचकर राज से कहा, "बेटा अब तुम्हें यहाँ से भागना पड़ेगा.”

राज ने हडबडा कर पूंछा, “क्यों पापा क्या हुआ?"

महतो झूठ बोलते हुए बोले, “मैंने खबर पायी है कि कोमल के घरवाले किसी भी वक्त तुझे मारने के लिए यहाँ आ सकते हैं. और तुम्हारे साथ साथ हमें भी मार सकते है क्योंकि तुम्हें मरते हुए हम नहीं देख पाएंगे. फिर जब हम उन लोगों से लड़ेंगे तो वो हम को भी मारेंगे."

राज हडबडा कर बोला, “तो फिर क्या किया जाय जिससे आप लोगों को कुछ न हो क्योंकि मुझे अपनी कोई चिंता नही है?

महतो उसको समझाते हुए बोले बोले, "तुम इसी वक्त अपनी बुआ जी के यहाँ के लिए रवाना हो जाओ. जब तक ये रार शांत नही होती तुम वही रहो उसके बाद यहाँ आ जाना. मैंने तुम्हारे जाने का सारा इंतजाम कर दिया है. और देखो वहां भी इधर उधर कहीं मत निकलना. कौन कब भेदी बन जाए पता नहीं चलता."

राज यहाँ से जाना तो नहीं चाहता था लेकिन घरवालों की जान उसके लिए बहुत कीमती थी इस कारण वह अपनी बुआ के यहाँ जाने के लिए तैयार हो गया. वो अपने पिता से बोला, "तो फिर में चला जाता हूँ लेकिन कोमल की कोई खबर मिली?"

महतो फिर से झूठ बोलते हुए बोले, “हाँ वो लडकी ठीक ठाक है. मैंने सब पता कर लिया है."

राज अपने बाप पर बहुत भरोसा करता था. कोमल के ठीक ठाक होने की खबर से आश्वस्त होने के बाद वह अपनी बुआ के यहाँ चलने को तैयार हो गया. राज की बुआ का गाँव पास के ही जिले में पड़ता था. एक गाँव का ही आदमी राज को मोटर साईकिल से उसकी बुआ के गाँव तक छोड़ने जा रहा था.

जाते समय महतो ने राज को समझाते हुए कहा, “पहुंचते ही खत लिख देना." राज ने हाँ में सर हिला दिया. महतो ने राज को गले से लगा विदा कर दिया. राज तो चला गया लेकिन महतो को अपने झूठ बोलने पर पछतावा हो रहा था. सोचते थे राज उन पर इतना विश्वास करता है लेकिन फिर भी उन्होंने इतना झूठ बोला. लेकिन इसके अलावा करते भी क्या? राज यहाँ रहता तो कभी न कभी कोमल के गाँव जाने की कोशिश करता. और हो सकता था मारा भी जाता? इसलिए महतो ने ये झूठ बोलकर राज को यहाँ से दूर भेज दिया. आज महतो को राज के विना पूरा घर सूना सा लग रहा था. सोचते थे अभी तो राज पूरी तरह से ठीक भी न हुआ था और घर से दूर भी भेज दिया. लेकिन राज के पिता महतो को इससे अच्छा राज के लिए कुछ और न लग रहा था.

इस वक्त महतो के दिमाग में राज का व्याह करा देने का विचार प्रवल हो रहा था. सोचते थे शादी होने से राज का ये लडकपन खत्म हो जाएगा. घर गृहस्थी का बोझ पड़ेगा तोअपने आप सब भूल जाएगा. बीबी आएगी तो कोमल की याद अपने आप भूल जाएगा, उसके बाद बच्चे होंगे फिर राज को ये सब बातें याद भी न रहेगी. में भी अपना बुढ़ापा चैन से काट लूँगा. अब बस जल्दी से जल्दी राज के हिसाब की कोई लड़की मिल जाए तो झट से राज की मंगनी करा डालू.

भगत के घर के बाहर से घराने के लोगों की आवाजें आनी शुरू हो गयीं थी. घर में बैठे भगत और गोदन्ती सहित सभी बच्चों के दिल में एक अजीब सा भय पैदा हो गया. सबको पता था कि कोमल कुछ ही देर में मार दी जायेगी.

तभी बाहर से भगत के लिए आवाज आई. ये आवाज ददू की थी. वो भगत को बाहर बुला रहा था. भगत की देह में सुरसुरी दौड़ गयी. भगत उठ खड़े हुए लेकिन उठते समय आँखों के सामने अँधेरा छा गया.
 
भगत सम्हलते हुए बाहर की तरफ चले गये. घर में बैठे लोगों की रूहें अभी भी काँप रही थीं. गोदन्ती की आँखें पल पल भीगती थी. भगत बाहर पहुंचे तो देखा घर के काफी लोग जमा हैं. शायद कोमल के मरने का तमाशा देखने आये थे. तिलक ने राजू की तरफ भगत को कुछ बताने के लिए इशारा किया.

राजू हिम्मत कर भगत से बोला, "हाँ भगत चचा? अभी कोई देर दार है क्या? अब तो रात भी हो गयी. जल्दी करो फिर उसे जलाने भी तो जाना होगा."

भगत ने कुम्हलाये नेत्रों से राजू और तिलक की तरफ देखा और बोले, “में तो आप से पहले ही कह चुका हूँ मुझसे कुछ नही होगा. सब कुछ आप लोगों को ही करना पड़ेगा. जब भी आपका मन हो तभी उसे मार दें."

तिलक राजू से बोले, “तो ठीक है. राजू तुम फटाफट अपने घर में तैयारी कराओ. अपने घर के लोगों को थोड़ी देर छत पर भेज दो और बोलना जब तक हम न बोले तब तक कोई नीचे न आये. संजू तुम मेरे साथ कोमल को लेकर चलना.” तिलक का पहले से बदला हुआ प्लान था क्योंकि इस वक्त पप्पी नही आया था.

राजू फटाफट अपने घर में गया. सब लोगों को कहा गया कि वे छत पर चले जाएँ और जब तक उनसे कहा न जाए नीचे न आयें, राजू घरवालों को छत पर जाने की कहकर फिर से वहीं आ गया जहाँ सब लोग खड़े थे. जहाँ ये पूरा खानदान रहता था उस जगह को 'घराना' बोला जाता था.

इस पूरे घराने में बस इन लोगों के परिवारों के लोग ही रहते थे. या यूँ कहें कि एक ही पुरखे की संतान रह रही थी. ये किसी पुराने महल जैसी शक्ल लिए हुए था इस कारण इन लोगों की बात को सुनने या देखने के लिए लोगों को अंदर आना पड़ता था. बाहर से कोई देख या सुन नही सकता था. इस घराने का द्वार जहाँ खुलता था वहां ठीक सामने छोटू का घर था. जो भी बात इस घराने में होती उसकी खबर गाँव में सबसे पहले छोटू के घरवालों को होती थी.

राजू ने हल्के स्वर में तिलक से कहा, "तिलक चचा मेरा तो काम हो गया. अब आगे बताओ क्या करना है?"

तिलक ने राजू की बात सुन भगत की तरफ देखा और पूछा, “हाँ भगत अभी कुछ देर रुके या शुरू कर दें काम?"

भगत को तिलक की बात किसी गर्म सलाख की तरह दिल में घुसती हुई मालुम हुई लेकिन होश में आते हुए बोले, “अभी रुको बच्चो को अलग कर दूं." यह कहकर भगत तुरंत अंदर घर में चले गये.

सभी को भगत की बात सही लगी. कोमल के पास से वाकी के लोगों को हटाया जाना बहुत आवश्यक था.

भगत घर में पहुंचे. गोदन्ती और बच्चे एक जगह गुट बनाकर बैठे थे. सब के दिलों की धडकनों में मातम का स्वर साफ़ सुनाई देता था. माहौल में घोर अनिश्चितता के साथ सिर्फ डर, डर और डर था. भगत को देख सभी सावधान हो गये.

जैसे भगत कोई भयानक बात बतायेंगे. भगत बिना कुछ बोले सब लोगों के पास बैठ गये. मुंह से कुछ सीधा जबाब निकलने को तैयार न था. बच्चों को अपनी तरफ देखते हुए देखकर गुस्से में बोले, "बच्चों तुम कहीं जाकर क्यों नहीं बैठते? जाओ छत पर जाओ. वहीं बैठो जाकर."

भगत के इतना कहने के वावजूद एक भी बच्चा वहां से नही हिला. गोदन्ती भगत को समझाते हुए बोली, "बैठने दो यहीं. अब कहाँ जाए ये लोग? आज नही कल मालूम तो सब पड़ना ही है. इन्हें भी तो पता चले कि ऐसे काम करने का अंजाम क्या होता है?" ___ इतना कह गोदन्ती आँखों में आंसू भर लायी.

भगत भी भावुक हो उठे. बच्चों में भी गम की शीतलहर दौड़ गयी. भगत भर्राए हुए गले से बोले, “वो सब लोग तैयार है. अब कुछ ही देर में कोमल को लेने आ रहे हैं. मुझे इसीलिये ही अंदर भेजा था. तुम्हे कुछ कहना है?"

गोदन्ती कोमल की माँ थी. उसे ये भी पता था कि वो लोग कोमल को लेने क्यों आ रहे थे? तडप कर भगत को देखा और रुंधे गले से बोली, “में क्या कहूँ? अब कहने को कुछ नहीं बचा लेकिन में उस छोरी को एक बार जी भर के देख लूँ."

इतना कह गोदन्ती कोमल के पास जा पहुंची. कोमल मुंह पर हाथ रखे लेटी हुई थी. गोदन्ती अपनी बेटी के सिरहाने बैठ उसे प्यार भरी नजरों से देखने लगी, गोदन्ती का दिल माँ का दिल था. पिघल कर मोम का हो गया. आँखों से टप टप आंसू बह निकले. भर्राए हुए गीले गले से बोलीं, “ऐ कोमलिया. सुनती है छोरी?"

कोमल ने घरघराती आवाज से हाँ में जबाब तो दिया लेकिन मुंह से हाथ न हटाया.

गोदन्ती अपनी बेटी कोमल की आँखों में देखना चाहती थी.
 
उसने कोमल का हाथ उसके चेहरे से हटा दिया. कोमल का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था. शायद वो लगातार रो रही थी. गोदन्ती उसका चेहरा देख सैकड़ों मौत मर गयी.

उसे कोमल पर तरस भी आया और गुस्सा भी जो अभी तक राज की याद में रोये जा रही थी. इतना सब होने के बावजूद उस लडकी में कोई अंतर ही नही आया था. लेकिन माँ का दिल ही जानता था कि वो एक बेटी के लिए क्या करना चाहती थी और क्या होने जा रहा था?

किन्तु ये प्रकृति का नियम है. चार को बचाने के लिए एक को मारना शायद अपराध नही माना जाता. जैसे एक सांपिन माँ जब बच्चों को जन्म देती है और जब उसे बच्चों को पालने के लिए खाना नही मिलता तो वह अपने बच्चों को पालने के लिए उन्ही में से एक बच्चे को खा लेती है. जिससे बाकी के बच्चे अपना जीवन पा सकें. शायद आज वही काम गोदन्ती को करना पड़ रहा था. उसे अपने वाकी के लडके लडकियों के सम्मान जनक जीवन के लिए कोमल की कुर्वानी देनी पड़ रही थी.

गोदन्ती ने कोमल के सर पर हाथ फिरते हुए बड़े प्यार और दुलार से पूंछा, "कुछ खाएगी पीयेगी नही छोरी या भूखे रहकर मरना चाहती है?" गोदन्ती ममता के नशे में भूल गयी कि कोमल को तो वैसे भी मारा ही जाना है, फिर वो भूखी मरे या पेट भरके क्या फर्क पड़ता है?

क्या फर्क पड़ता है उसे प्यार से मारा जाय या गुस्से में? मरना तो उस अभागन लडकी को पड़ेगा ही पड़ेगा. मोहब्बत करके समाज में आराम से रहना भला इतना आसान कब से हो गया? इतना आसान होता तो इस समाज में सब मोहब्बत से ही रह रहे होते. क्यों कोई लड़ता झगड़ता? क्यों ये दुश्मनी की दीवारें खींच दी जाती? और अच्छा भी है. सब लोगों में मोहब्बत होना भी समाज के लिए खतरनाक हो सकता है.

कोमल माँ से रोती हुई बोली, “माँ क्या तुम्हें भी लगता है कि मैने जो किया गलत किया और गलत भी किया तो उसकी सजा इतनी बड़ी होनी चाहिए? क्या सजा देने का हक एक इंसान को होना चाहिए जो खुद कई बार ऐसे हालातों से गुजर चुका होता है?"

गोदन्ती इस सवाल का क्या जबाब देती? उसने तो खुद बचपन में कई बार ऐसा महसूस किया था और फिर वो इतनी पढ़ी लिखी भी नही थी कि सामाजिक विज्ञान के कठिन सवाल का उत्तर दे पाती. वो कोमल को समझाते हुए बोली, "देख छबिलिया. मुझे मेरे मन से नही समाज के मन से सोचना पडेगा. समाज की नजरों में तूने बहुत बड़ा अपराध किया है.

हम औरतें है इसलिए हमे औरतों की तरह ही रहना पड़ेगा. मर्दो की तरह रहने की कोशिश करो तो पंख कतर दिए जाते हैं. यहाँ औरत ही घर की इज्जत होती है और जब वो इज्जत अपनी ही इज्जत से खेलने लगती है तो घर की इज्जत सलामत नही रहती. बस में इससे ज्यादा कुछ नही जानती."

इतना कह गोदन्ती वहां से उठकर बाहर आ गयी. जहाँ भगत अपने आंधी भरे दिल को थामे बैठे थे. गोदन्ती के पहुचने का मतलब भगत अच्छी तरह जानते थे. गोदन्ती से बोले, “जाकर उनसे कह दूँ कि अपना काम करें?"

गोदन्ती ने विना भगत की आँखों में देखे हां में सर हिला दिया. भगत कंपकपाते बदन से बाहर खड़े लोगों के पास चले गये.

एक माँ या बाप का दिल ही जानता था कि जो हालत उनके दिल की अभी है वो उसे कैसे सह रहे हैं? अगर वे अपनी बेटी की बलि दे रहे हैं तो किस स्थिति में दे रहे हैं? क्योंकि हरएक आदमी के वस में नही कि वो अपना दिल निकाल के सामने रख दे. रखे भी तो किसके सामने? क्योंकि दिल का दर्दवहीं जानता है जिसके दिल होता है. और इन घराने के कई लोगों में तो शायद दिल था ही नही.

दूसरी तरफ राज कोमल के घराने की पंचायत से बेखबर अपनी बुआ के घर पहुंच चुका था. वंहा बात तो सबसे कर रहा था लेकिन मन और दिल उसकी देह से अलग कोमल की यादों में भटक रहे थे. उसे वो वक्त याद आ रहा था जब वो कोमल के नाजुक बदन

को अपनी बाहों में भरे उस आम के पवित्र पेड़ के नीचे बड़ी फुर्सत से लेटा था. कैसे कोमल उसको देखती थी? कैसे वो कोमल को देखता था? कैसे दोनों एक दूसरे को देखते थे? कैसे दोनों की साँसे एक दूसरे से टकराती थीं? ____ राज मन ही मन कह रहा था. काश कि कोमल और में एक हो जाते? कितना आनन्द और कितना प्यार होता दोनों के बीच. कोमल जब अपने गर्भ में आये बच्चे को जन्म देती और में बाप बन जाता. कितना सुखमय जीवन हो जाता हम दोनों का? दोनों पति पत्नी की तरह रह रहे होते. किसी मन्दिर में जा प्रेम विवाह करने का विचार तो राज ने फिल्मों में देख ही लिया था. भागने के बाद वो कोमल के साथ ऐसा ही करने वाला था. किन्तु आज सब कहीं बिखर गया था.

इस वक्त राज को ये बात खाए जा रही थी कि क्यों वो क्यों उस आम के पेड़ के नीचे रुका था? तभी क्यों न चला आया? अगर चला आया होता तो आज इस स्थिति में न होता. अपने साथ साथ कोमल की भी क्या हालत कर दी. वो यह भी सोच रहा था कि शायद लोग ठीक ही कहते थे कि वो आम का पेड़ ही मनहूस है. जब भी वहां गये कोई न कोई बुरी घटना ही हुई. वहां जाना ही नही चाहिए था. सारा काम बिगड़ गया उस मनहूस पेड़ की वजह से.

इधर भगत ने अपने घराने के लोगों के पास पहुंच संकेत दे दिया कि वे अपना काम शुरू कर सकते हैं. तिलक संतू से बोले, “संतू तू मेरे साथ आ और राजू तू अपने कमरे में पहुंच. हम छोरी को लेकर आते हैं और दद्दू तुम यहाँ की रखवारी करो कोई भी अंदर न आने पाए. चल आ संतू." इतना कह तिलक संतू को लेकर भगत के उस कमरे की तरफ बढ़ गये जहाँ कोमल अपने राज को याद कर कर के रो रही थी.
 
घर में अंदर पहुंचे तो देखा कि गोदन्ती सभी बच्चों के साथ एक जगह बैठी हुई है. तिलक गोदन्ती के जेठ लगते थे. इस कारण वो धुंघट खींच कर खड़ी हो गयी. इन घराने की इज्जत के रखवालों को इतने पर भी शर्म न आई कि जिस औरत की बेटी को वे लोग मारने

जा रहे हैं वो सब जानते हुए भी उनकी इज्जत में घुघट किये खड़ी है. जबकि और कोई माँ होती तो इन लोगों का खून पी जाती तब अपनी बेटी से हाथ लगाने देती.

तिलक इस वक्त कोमल के सिरहाने की तरफ खड़े हुए थे और संतू तिलक के पीछे. तिलक ने कोमल को आवाज दी, "ओरी कोमल. सो रही है क्या?"

कोमल अपने बाप के बड़े भाई यानि अपने ताऊ तिलक की आवाज को भली भांति पहचानती थी. वो उठकर बैठ गयी और बोली, "नही ताऊ. सो नही रही."

तिलक की इस प्यार भरी पूंछताछ में उस शिकारी की जैसी चाल थी जो दाना डाल कर अपने मासूम शिकार को फंसाने की कोशिश करता है. जैसे ही शिकार दाना खाने आता है शिकारी उस मासूम शिकार का बध कर डालता है. परंतु बेचारा भोला शिकार कहाँ जानता पाता है कि किसी अपने की तरह दाना डालने वाला आदमी इतना क्रूर शिकारी निकलेगा? यही कोमल के साथ तिलक कर रहा था. ये बो तिलक था जिसने कोमल को अपने हाथों से खिलाया था.

अपने इसी मुंह से उसे बेटी कहकर बुलाया था. जिसे कोमल ने अपने होश सम्हालने से लेकर अब तक अपने हाथों से रोज खाना दिया था. सुबह की चाय और शाम को दूध दिया था. जिससे उसका अपना ताऊ ठीक ठाक रहे. लेकिन वो क्रूर ताऊ आज अपने घराने की खोखली इज्जत के लिए उसी मासूम लडकी की बलि चढ़ाने जा रहा था. वो भी धोखे से.

तिलक प्यार से बोले, "बेटा कोई परेशानी है क्या तुझे?"

कोमल के मन में परेशानी ही परेशानी थी. क्या क्या बताती लेकिन उस बाबली को लगा आज ताऊ बहुत अच्छे से पूछ रहा है तो जरुर मेरे लिए कुछ कर पाए. बोली, “ताऊ तुम्हे क्या बताऊं? तुम तो मेरी परेशानी जानते ही हो. फिर मुझे पूछते ही क्यों हो?"

तिलक ने संतू की तरफ देखा. दोनों में आखों से बातें हुई, "देख लो इस छोरी के दिमाग में अभी तक वो लड़का अटका हुआ है."

तिलक कोमल के सर पर हाथ रखते हुए बोले, “में समझता हूँ मेरी बच्ची. लेकिन बच्चा सांप मांगे तो उसे सांप तो नहीं दे सकते न. किन्तु मैंने तेरे लिए कुछ सोचा है तू मेरे साथ संतू के घर चल. वहीं बैठकर बताऊंगा.

कोमल के दिमाग में संतू के घर जाने वाली बात कुछ हलचल पैदा कर गयी. वो अपने ताऊ तिलक से जिद करती हुई बोली, "नही ताऊ तुम यहीं बताओ, अपना घर क्या उनके घर से ज्यादा सुरक्षित है? वहां भी सब लोग होगे. कम से कम यहाँ अपने लोग तो है."

लेकिन तिलक के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था. वो तो इस मासूम हिरनी को शेर की मांद तक ले जाना चाहता था. तभी तो आसानी से मार सकते थे इस चंचल कोमल को. तिलक फिर से बोले, "अरे तू चल तो सही. ऐसा कुछ नही है. सब अपने ही है. चल चल उठ जल्दी से.

लेकिन कोमल एक स्त्री होने के नाते अपने ऊपर मंडरा रही मुसीबत को शायद भांप रही थी. इसलिए अडिग हो बोली, "नही ताऊ बताना हो तो यहीं बताओ वहां नही जाउंगी. ऐसी क्या बात है जो अपने घर में नही बताई जा सकती?"

तिलक ने संतू की तरफ देखा. फिर से आँखों आँखों में बात हुई. लडकी इतनी आसानी से नही जायेगी. इसे खींचकर ही ले जाना पड़ेगा. तिलक का इशारा होना वाकी था फिर संतू कोमल को खींचकर ही ले जाता. कोमल के कमरे के बाहर खड़े उसके भाई बहिन और माँ तिलक की बातों को ध्यान से सुन रहे थे. उनके दिलों में असीमित तीव्रता का तूफ़ान चल रहा था. जाने कब क्या हो जाय? तिलक और संतू कोमल को किस वक्त मारने के लिए ले जाएँ. फिर कोमल मार दी जायेगी.

तिलक ने कोमल को अपनी इच्छा से जाते न देख संतू की तरफ खींच कर ले जाने का इशारा किया. कोमल ने संतू को आगे बढ़ते देखा तो घबरा गयी. आँखों में उस बकरी की तरह डर था जो शेर को अपने सामने देख डर जाती है. कोमल डरकर बाहर भागने को हुई लेकिन संतू ने झपटकर कोमल को दबोच लिया.

कोमल ने इस तरह अपने ही घर में अपने खानदान के एक भाई लगने वाले शख्स के इस तरह दबोचे जाने पर माँ को पुकारा, "माँ..मुझे...बचाओ...गूऊऊऊऊऊओ." तिलक का हाथ कोमल के मुह को बंद कर चुका था. मुसीबत में घिरी एक अबला लडकी हमेशा ही सबसे पहले अपनी माँ को याद करती है.जैसे कोमल कर रही थी.

माँ का दिल किसी कांच के टुकड़े से छेदा जा रहा था लेकिन आज चाहकर भी वो अपनी बेटी को बचा नही सकती थी. कैसा धर्मसंकट था एक माँ के सामने? कोमल का पूरा घर उस गेट की तरफ नजर लगाये बैठा था जिससे कि कोमल को तिलक और संतू बाहर लाने वाले थे. सबकी आँखों में किसी डरावने दृश्य को देखने का डर था. सबके दिल ममता भरे डर से डर रहे थे. और वो माँ? वो तो अपने दिल को ऐसे थामे थी जैसे वो सीने से कहीं निकल कर भाग जाएगा.

कोमल की माँ को दी गयी आवाज घर के बाहर तक गयी थी. भगत का बाप वाला दिल रोके न रुक सका. वो भी आकर बाकी लोगों के साथ आकर खड़े हो गये. उन्हें भी कोमल को देखने की इच्छा हो रही थी. इतने में संतू और तिलक कोमल को दबोचे कमरे से बाहर आ गये. संतू कोमल को अपने हाथों से जकड़ा था. तिलक कोमल के मुंह को दबाये था. कोमल के कपड़े अस्त व्यस्त थे. दुपट्टा जो गाँव में लड़की की इज्जत का प्रतीक होता है. वो तो शायद अंदर चारपाई पर ही रह गया था.

ये वो दुपट्टा होता है जिसे विना पहले अगर लडकी घर से निकल आये तो उसके घरवाले उस दिन उसका जीना हराम कर देते हैं. और आज ये पहला दिन था जब कोमल बाप के सामने विना दुपट्टे के दिखाई दी थी. अन्य दिन होता तो भगत कोमल को बहुत खरी खोटी सुनाते लेकिन आज तो वो मरने जा रही थी अब इससे बड़ा दंड और क्या होता? भगत की आँखें नीची हो गयी. शायद एक बाप यह सब न देख सकता था.

कोमल को इस हालत में देख भगत वही पर बैठ गये. तिलक चिल्लाकर बच्चो से बोले, "हटो सामने से यहाँ क्या मेला लगा है?" कोमल का मुंह दवा हुआ था लेकिन फटी हुई. डरी हुई. सहमी हुई आँखें माँ को ढूंढ रही थीं. मुंह से आवाज तो निकलती ही नही थी लेकिन कमरे से बाहर आते ही माँ दिखाई दे गयी. कोमल ने उन डरी हुई आँखों से माँ की तरफ देख 'गूगूऊउ' की आवाज में कुछ कहा. माँ की आँखें कोमल की आँखों से मिली. माँ अंदर तक सहम गयी. क्या कर सकती थी? वो तो समाज में इज्जत बनाने की खातिर उसको मारने की इजाजत दे चुकी थी. माँ ने कोमल की तरफ से मुंह फेर लिया. कोमल आज माँ की तरफ से ऐसा सौतेला व्यवहार देख खुद पर यकीन न कर पा रही थी. उसे लग रहा था जैसे वो सपना देख रही हो. लेकिन दो घर के आदमी उसे दबोचे ले जा रहे थे ये तो सपना नही हो सकता था न.
 
कोमल ने लाख हाथ पैर मारे लेकिन एक औसत लडकी दो हट्टे कट्टे आदमियों के हाथ से कैसे निकल पाती. वो दो दिन से कुछ खा भी नही रही थी. घर के मुख्य दरवाजे पर पहुंचते ही कोमल ने तिलक के हाथ से जकड़े मुंह को घरवालों की तरफ घुमाया. उसके पापा भगत सर झुकाए मन मसोस कर बैठे हुए थे. माँ मुंह फेरे खड़ी हुई थी. शायद रो भी रही थी.

उसकी बड़ी बहन देवी की आँखे आंसुओ से भरी हुई थी लेकिन वो इस वक्त कोमल को देख रही थी. कोमल और उसकी आँखे मिली. कोमल ने शायद कहा कि मुझे बचा लेकिन देवी ने आँखों से बोला अब में नहीं बचा सकती मेरी बहन, मेरी सखी. अब तो तुझे भगवान ही बचा सकता है.

ये बात कोमल भी जानती थी कि अगर देवी मुझे बचाने आई तो उसकी क्या हालत होगी? वो भी शायद मेरी तरह मार दी जाय. या उसकी बुरी तरह से पिटाई की जाय? कोमल को ये भी पता था कि जब मेरे माँ बाप ही मुझको नहीं बचा पा रहे तो ये मेरी बहन देवी कैसे बचा पायेगी?

देवी के अंदर भी एक डर था. वो तो चाहती थी कि कोमल को बचा लूँ लेकिन उसके कदम आगे नहीं बढ़ते थे. ये कोई और घटना होती तो शायद देवी उन लोगों को कच्चा चवा जाती जो कोमल को हाथ भी लगा देते. यही तो होती है एक अपने लोगों के अत्याचार सहने की मजबूरी. लोग उनका विरोध इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि वे अपने होते हैं.

तिलक और संतू अब कोमल को भगत के घर से राजू के घर ले जा चुके थे. कोमल पूरी तरह से घिर चुकी थी. उसे खुद भी महसूस हो रहा था कि अब उसे कोई नही बचा पायेगा. राजू की छत पर खडी औरतें और बच्चे इस भयावह तस्वीर को देख सहम गये थे. बच्चे तो अपनी माँओं से लिपट गये. माँओं के कलेजे भी फटे जा रहे थे लेकिन उस कोमल को बचाने की हिम्मत कौन करे?

ये खानदान और घराने की औरतें ही तो थीं जिन्होंने अपने मर्दो को कोमल के खिलाफ भड़काया था. लेकिन उनके दिल में इस समय पछतावा जरुर था कि हम बहुत बड़ी गलती कर गये. हमे इस तरह अपने घर में कोमल की चुगली नहीं करनी चाहिए थी.

सच कहा जाय तो इस महिलाओं को भी इस तरह की घटना होने का अनुमान नहीं था. वे तो अपने घराने की पुरानी आदत के मुताबिक घराने के अन्य लोगों को नीचा दिखाना चाहती थी. वे ये दिखाना चाहती थीं कि देख लो तुम्हारी लडकी ने कितना बुरा काम किया है इसलिए तुम हमसे छोटे हो, शायद इसीलिए कहा गया है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है.

कोमल अभी भी हाथ पैर चला रही थी. अब तिलक और संतू के साथ राजू ने भी उसे दबोच लिया. फिर उसे ले जाकर उस कमरे में फेंका जहाँ से अंदर की आवाजें बाहर आना बहुत मुश्किल था. लेकिन उनके हाथों से आज़ाद होते ही कोमल ने अपने माँ बाप को ऐसी आवाज दी कि बराबर के मकान में बैठे भगत, गोदन्ती और उनके बच्चों की हड्डियाँ काँप गयी. दिल कुम्हला गये. सबका ही मन हुआ कि जाकर कोमल को बचा लें लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.

कोमल की माँ गोदन्ती अपनी फूल सी बच्ची की चीखें सुन रही थी. भगत ने जिसे अपने हाथो में खिलाया. जिसकी शादी के लिए पैसा इकठ्ठा करते रहे. वो आज मारी जा रही थी. बाप की आँखों में आंसू रुकते ही नहीं थे.

भगत का मन होता था कि जा कर अपनी बेटी को बचा लें. भाड में जाए खानदान. भाड़ में जाये घराना. कम से कम अपनी बेटी तो सुरक्षित रहेगी लेकिन पैर आगे नहीं बढे. सारा शरीर बही जम गया. क्योंकि उन्होंने ही तो कोमल को मारने की मंजूरी दी थी. अब किस मुंह से रोकते? क्या कहते लोगों से?

एक बात और कोमल को मौत की तरफ धकेल गयी वो थी उसका गर्भवती होना. अगर कोमल गर्भवती न होती तो शायद भगत उसे बचाने की कोशिश भी करते लेकिन कोमल के नाजायज गर्भ ने उसे मौत के और ज्यादा करीब ला दिया था. वो बाबली ये नहीं जानती

थी कि यहाँ धार्मिक किताबों में विवाह से पहले गर्भवती होने की कहानिया जितने उत्साह से पढ़ी जाती है उतनी असल जिन्दगी में नही. यहाँ तो सिर्फ इसे पाप माना जाता है जिसकी सजा अधिकतर मौत ही होती है.

कोमल उस गहरे कमरे से लगातार अपने माँ बाप को बचाने की दुहाई दिए जा रही थी. लेकिन आज माँ बाप तो टस से मस नहीं हो रहे थी. कैसी बिडम्बना थी? घर के बगल वाले घर में अपनी लडकी मारी जा रही थी और माँ बाप चुपचाप खड़े सुन रहे थे. देख रहे थे. लेकिन माँ बाप अपनी किस्मतों को कोस कोस कर रोये जरुर जा रहे थे. आज का समय उनके लिए बहुत कठिन समय था.

ये आज का दिन इन माँ बाप के लिए, इस घराने के लिए, इस गाँव के लिए काला दिन था. जिसे इस गाँव के रहने तक भुलाया नही जा सकेगा. शायद लोग भूल जाएँ क्योंकि इन्सान बहुत जल्दी भूल जाता है लेकिन इस गाँव का इतिहास इस घटना को कभी नही भूल पायेगा. ये माँ बाप भी शायद कभी नहीं भूलेंगे. जिनकी एक पाली पोसी बेटी आज मारी जा रही थी.

राजू के कमरे में बंद कोमल इधर से उधर भाग रही थी. फिर कमरे के अँधेरे में कहीं छुप गयी. कमरे में झपाझप अँधेरा था. तिलक ने हडबडा कर संतू से कहा, "जरा दीया जला दे संतू कमरे में." संतू ने बाहर से दीया लाकर कमरे में जला दिया. कोमल एक चारपाई के नीचे किसी डरी हुई हिरनी की तरह बैठी थी. मुंह हाथों से छुपाकर जमीन पर लगा रखा था. इस घबरायी लडकी को अकेले इस तरह मारने पर भी तीनों लोगों में से किसी को भी दया न आई. तीनों के तीनों उसके खून के प्यासे थे.

कोमल के लिए बचने का अब कोई भी उपाय नही था. वह रो रो कर अपने ताऊ और रिश्ते के भाइयों संतू और राजू से कह रही थीं, *मैंने आपका क्या बिगाड़ा है ताऊ जो आप इस तरह घेरकर मुझे मार रहे हो? और संतू भैया तुम तो मुझे अपनी बहन कहते हो. फिर तुम क्यों मुझे मार रहे हो और तुम तो खुद एक लडकी के बाप हो? तुम से मेरी कोई दुश्मनी तो नही है. और राजू भैय्या तुम. तुम को तो रोज चाय बनाकर में ही देती थी. जाने कितनी बार तुमको सब्जी लाकर दी. तब तुम कहते थे कि तू ही मेरी असली बहन है लेकिन आज क्या हुआ? आज तो अपनी असली बहन को ही मार डालना चाहते हो, मैंने बिगाड़ा क्या है तुम लोगों का? मारने से पहले कम से कम ये तो बता दो?

मैंने कोई चोरी नहीं की. डांका नहीं डाला फिर मुझे किस बात की सजा दी जा रही है? ताऊ तुम तो मेरे बाप के सगे भाई हो. मुझमें तो आपका ही खून है, फिर आज अपने ही खून को मिटाने क्यों चले हो? एक अकेली लडकी को मारने में आपकी कौन सी शान होने वाली है?

___ वो लडकी जो आज तक आप लोगों से ऊँची आवाज में नही बोली. आपसे कोई अपशब्द नही कहा. कभी आपका बुरा नही चेता. फिर ऐसा क्या है जो मुझे मारने लगे? मेरे माँ बाप ने मुझे जन्म दिया है. वे चाहे तो मुझे मार दें लेकिन आप लोगों का तो ये हक नही बनता."

भगत और गोदन्ती कोमल की मद्दम सुनाई दे रही बातों को मरे हुए मन से सुन रहे थे. उन दोनों को पता था कि कोमल में कोई भी ऐब नही था सिवाय इसके कि वो राज से मोहब्बत कर बैठी. आज तक माँ या बाप को लौट कर जबाब तक नहीं दिया था.

कभी कोई ऐसी गलती भी नही की जिससे कि भगत या गोदन्ती को उसे डांटना पड़े सिवाय इस राज से प्यार करने के. लेकिन आज वो वेकसूर लडकी को अपनी आँखों से मरते देख रहे थे. कानों से उसकी मरने से पहले की बातें सुन रहे थे. क्या यही फर्ज होता है एक माँ या बाप का? जो आज भगत या गोदन्ती अदा कर रहे थे.

कोमल के लिए ये वैसा ही था जैसे कोई मासूम हिरनी किसी शेर के शासन क्षेत्र में गलती से घुस गयी हो, और जब उस हिरनी को पता चला कि वो गलती से अपनी मौत के करीब आ गयी तो वो सामने खड़े शेर को दुहाईयाँ दे दे कर अपनी जान बख्शने की भीख मांगती रही हो. जैसे कोमल अपने ताऊ और रिश्ते के भाइयों मांग रही थी. ____ इधर देर होती देख दरवाजे के बाहर रखवारी कर रहा दद्दू राजू के उस कमरे में जा पहुंचा. उसने जब कोमल की बातें सुनी तो बौखला गया और तिलक से बोला, “इस दो पैसे की लडकी के प्रवचन सुन रहे हो? मार दो डायन को तुरंत. एक तो जमाने भर में बदनामी करा दी ऊपर से प्रवचन दे रही है. मारो इस कुतिया को अभी, देख क्या रहे हो राजू और संतू? पकड़ के गला दवा दो इसका."

इतना सुन राजू और संतू कोमल पर झपट पड़े, कोमल अब भूखे भेडियों के हाथ से बचने की पूरी कोशिश करने लगी. उसकी हालत अब भूखे भेड़ियों से घिरी बकरी जैसी हो गयी थी. तिलक के साथ राजू और संतू ने कोमल को जमीन पर गिरा दबोच लिया. तिलक ने पैर पकड़े. राजू ने बीच का हिस्सा और संतू कोमल की गर्दन को अपने हाथ में ले चुका था.

कोमल अपने हाथों से संतू के पैरों को पकड़ गिडगिडा रही थी, "ओ संतू भैया तुझे भगवान की कसम. मुझे छोड़ दे. तुझे अपने बच्चो की कसम. ताऊ मुझे बचा लो में तुम्हारा एहसान जिन्दगी भर नही भूलूंगी. राजू भैय्या कम से कम तू तो दया कर मेरे ऊपर. में तो तेरी असली बहन हूँ."

लेकिन कोई नही सुनता था. किसी को क्यों दया आये? कौन सी उनकी लडकी थी? उनकी होती तो क़ानून दूसरा होता. या शायद उसे भी मार देते. भूखे भेडियों से भला कोई बच पाया है.

संतू की पकड़ कोमल के गले को दबाना शुरू कर चुकी थी. कोमल का दम घुटना शुरू हुआ. दो दिन से सिर्फ पानी पी कर जी रही लडकी भला कितनी ताकत लगा सकती थी लेकिन फिर भी तीन आदमियों का दम फुला रखा था. कोमल अंतिम बार चिल्लाकर बोली, “माँ..आआअ..पापा.पा गूऊऊओ....राज..बचाओ..गूऊऊऊओ."

लेकिन अब कोई उसे बचाने के लिए आने वाला नही था. भगत और गोदन्ती ने दिल कड़ा कर लिया. कोमल की हल्के स्वर में पहुंच रही आवाज उनके कानों में भाले सा प्रहार कर रही थी. दोनों ने कानों पर हाथ रख लिए. आँखों से आंसू किसी झरने की तरह बह रहे थे जबकि सीने का दर्द रुकने का नाम नहीं ले रहा था. ___कोमल का शरीर निश्चेत होता जा रहा था. संतू के पसीने छूट रहे थे. वो कोमल के गले को पूरी ताकत से दवाये हुए था. कोमल की आँखे बाहर आने को थी. शायद अभी एकाध सांस बाकी बची थी इसी कारण संतू पसीना पसीना होने के बावजूद कोमल के पतले नाजुक गले को दवाये हुए था. उसे जब लगा कि वो पूरी तरह मर चुकी है तो उसके गले से हाथ हटाते हुए बोला, “गयी काम से. अब नही बचा कुछ भी. छोड़ दो उसके हाथ पैर."
 
कोमल मर गयी थी. कोमल आज पहली बार इतनी शांत और कुरूप दिखाई दे रही थी लेकिन चेहरे पर हजारों कहानियाँ लिखी हुई थी. जो राज की मोहब्बत से लेकर घराने की नाइंसाफी तक का इतिहास सुना रही थीं. कोमल तो चली गयी थी लेकिन अपनी आँखों में अपने हत्यारों का चेहरा छोड़ गयी थी. शायद उसे उम्मीद रही हो कि कोई अपना आकर इन चेहरों को देख मुझे इंसाफ दिलाएगा. लेकिन ऐसा होता कब था जो आज होता? परन्तु आगे होने की उम्मीद कोमल के दिल में रही होगी.

माँ गोदन्ती और बाप भगत बेहोश हो चुके थे. भाई बहन रो रहे थे. वे ही क्या इस समय हर चीज रो रही थी. वो कमरा रो रहा था जिसमे कोमल मारी गयी थी. ये समय रो रहा था. घर की दरोदीवार रो रही थी. इस आवो हवा का हर जर्रा जर्रा रो रहा था. वो जमीन रो रही थी जिसपर कोमल मरी पड़ी थी.

ये रात का वक्त रो रहा था. दिलों को दिलों से जोड़ने वाला हर तार रो रहा था. समय का पहिया रो रहा था जिसने कोमल को ख़ुशी और गम दिया. उस घर का चप्पा चप्पा रो रहा था. वो तुलसी मैया भी रो रही थी जिसकी पूजा कर कोमल ने अपने प्यार को अमर करने का आशीर्वाद लिया था. शायद कोमल के शरीर से जुदा हुई उसकी पवित्र आत्मा भी रो रही थी. क्योंकि कोमल मरगयी थी. साथ में कोख में आई एक नन्ही जान भी.

कोमल का चुप होना. कमरे से कोई आवाज न आना. किसी का कोमल को न दुत्कारना आसपास दीवारों से कान लगाये खड़े लोगों को ये बता गया था कि अब वो लडकी नही रही. जिसकी वजह से इस घराने की नाक कटी जा रही थी. अब कोई आदमी नहीं कहेगा कि आपके घराने पर कोई बदनामी का दाग लगा हैं क्योंकि कोमल को मार इस घराने के लोगों ने आज सारे दागों को मिटा अपने आप को पाक साफ कर लिया था.

आज गाँव की सबसे खुशमिजाज लडकी मर गयी थी. मोहब्बत की एक और मूरत मर गयी थी लेकिन किसी को कोई फर्क नही पड़ा. राजू ने दद्दू की तरफ भयभीत आँखों से देख पूंछा, “अब क्या करे दद्दू दादा? ये तो मर गयी."

दद्दू का दिल पत्थर का था. बोला, “करना क्या जला डालो और नही तो तिलक चचा से पूंछ लो."

तिलक शांत भाव से बोले, “जलाना ही ठीक है लेकिन ये काम अभी रात में ही करना होगा. सुबह के समय ठीक नहीं होगा. चारो तरफ लोग होते हैं. थोड़ी सी भी खबर लगी तो जेल में सडना पड़ेगा. अब फटाफट इसे अपने खेतों तक ले जाने का प्रबंध करो."

दडू ने फौरन राजू से कहा, “तुम एक काम करो. एक टाट का बोरा लो और उसमे इस छोरी को बंद कर बाँध लो जिससे कोई देख भी ले तो शक न होगा. फिर इसे मोटर साईकिल पर डालकर भगत के खेतों पर ले चलो, वहीं इसे जला देंगे. अपने लड़कों को बुलाकर थोड़े बहुत कंडे और लकड़ी वहां पर पहुंचवा दो. ये सब काम फटाफट करो. चाहो तो भगत चचा को भी खबर कर दो. उनका मन हो तो चले चले. लडकी को जलते भी देख लेंगे."

भगत लडकी को जलते हुए क्या देखते? वो तो खुद अपनी बेटी के गम की आग में जल चुके थे. बेटी को मरा जानते ही बेहोश हो गये थे. अब कोई कहता तो भी वो न जा सकते थे. शायद होश में होते तो जरुर अपनी बेटी की चिता को जलते हुए देखना चाहते. उस बेटी की चिता जिसका गौना अपने हाथ से करने का सपना भगत ने देखा था. भगत को बेहोश देख फिर किसी ने उनसे न कहा कि चलकर बेटी को जलते हुए देख लो.

राजू ने जल्दी जल्दी कोमल की लाश को टाट के बोरे में बंद किया. लड़कों को बुलाकर खेतों पर कंडे लकड़ी ले जाने के लिए बोल दिया. फिर राजू और तिलक कोमल वाले बोरे को मोटर साईकिल पर रखकर खेतों पर चल दिए. खेत भी गाँव से थोड़ी ही दूर पर थे.

कोमल की बोरे में बंद लाश उस गाँव के बाहर खड़े इमली के पेड़ के पास से गुजरी. इमली का पेड़ शायद मन में रोता था. उसे पता चला गया था कि कोमल अब कभी नही आएगी. अब कभी उसके कोमल हाथ किसी इमली पर नहीं पड़ेंगे. अब कोई आदमी इमली के पेड़ के पास उतने उत्साह से नहीं आएगा जितना कोमल के सामने आता था.

कोमल तो गाँव से किसी और तरह विदा होके जानी थी फिर चाहे वो शादी होकर जाती या मर कर. क्योंकि शादी होकर जाती तो डोली में जाती. साथ में सोलह सृगार किये होते. यदि मरकर भी जाती तो कम से कम अर्थी में तो जाती. पूरा गाँव उसे दोनों ही तरीके से जाने पर भावुक हो विदा करता.
 
गाँव की स्त्रियाँ उसे गाँव के बाहर तक छोड़ने आती. लेकिन आज ये अपने भाग्य की मारी कोमल विना किसी अर्थी और विना किसी विदा करने वाले के बोरे में बंद हो जा रही थी. कोई पीछे से नहीं बोलता था कि 'राम नाम सत्य है' और न ही कोई कोमल की आत्मा को शांति देने का कोई वाक्य बोलता था.

भाग - 13

सब लोग खेत पर पहुंच चुके थे. कोमल रखा बोरा एक तरफ डाल दिया गया था. लडके कंडा और लकड़ी ले आये. सब चीजों को सही तरीके से लगाया गया. आज गाँव का ये पहला मुर्दा रहा होगा जो इस तरह जलाया जा रहा था. न कोई तौर तरीका. न कोई रस्म?

सब जमाने के ठेकेदारों का क़ानून था. सारी व्यवस्था करने के बाद कोमल को बोरे से निकाला गया. फिर उठाकर चिता पर रख दिया गया. अब कंडा और लकड़ी नही बचे थे जिससे कोमल को उपर से ढका जा सके.लेकिन परेशानी क्या थी? ऐसे ही सब हो गया.

चिता पर लेटी हुई कोमल कुछ अलग सी लग रही थी. बाल बिखरे हुए. आँखे अब बंद सी हो गयी थी जबकि पहले गला दबाने के कारण फटी सी थी. कपड़े अस्त व्यस्त थे. चेहरा मासूम और प्यारा सा लग रहा था. लग रहा था रात के वक्त कोमल सोयी हुई है. पतले पतले कोमल से हाथ देह के इधर उधर पड़े हुए थे. वो हाथ जिन्हें राज सबसे ज्यादा प्यार करता था. जिनपर कोमल को भी गर्व था. कोमल के होंठ अभी भी सूखे थे लेकिन गुलाबी रंग अभी भी बरकरार था. दो दिन से भूखा रहने और रोने के कारण आँखों के नीचे काले घेरे हो गये थे.

कोमल को देखकर लगता था कि कोई मरी हुई लावारिस लडकी है जिसकी कुछ लोग समाज में मर्यादा रखने के कारण उसकी चिता को अनमने मन से आग दे रहे हैं. शायद इस गाँव में पहली बार किसी की चिता को लकड़ी और कंडों की कमी हो गयी थी. क्योंकि गाँव में अकेले कोमल के ही दो बड़े बड़े बिटोरे (उपले रखने का स्थान) थे. जिनसे जाने कितने ही लोगों की चिता जलाने के लिए उपले निकाले गये थे. लेकिन आज उसी की चिता पर इन चीजों की कमी थी.

तिलक ने कोमल की चिता में आग दे दी. लेकिन हवा और ओस की वजह से आग नही जल रही थी. राजू ने मोटर साईकिल से पेट्रोल निकाल कर कोमल की चिता पर छिडक दी. फिर तिलक ने आग लगाई तो आग जल गयी. कोमल की चिता धीरे धीरे जलने लगी.

लेकिन चिता को जलाने के लिए इतने लकड़ी और कंडे काफी नही थे जो कोमल की चिता में लगे हुए थे. थोड़ी देर में ही चिता बुझने की हालत में हो गयी. तिलक ने राजू से कहा, “जल्दी से और लकड़ियों का इंतजाम करो."

सब लोग खेत के आसपास खड़े पेड़ों से लकड़ियाँ वीनने लगे लेकिन तभी कुछ लोगों की आहट कानों में पड़ी. पकड़े जाने के डर से सब लोगों के दिल कांप गये. तिलक ने हडबडा कर राजू से कहा, "अब क्या करें?"

राजू फौरन बोला, “कोमल की लाश को छुपा दो.”

लेकिन तभी दद्दू बोल पड़ा, “एक काम करो खेत के पास जो कुआं है छोरी को उसी में फेंक दो.”

सब लोगों को दद्दू की बात बड़ी अजीब लगी. भला किसी अधजली लाश को ऐसे फेंका जाता है लेकिन कोई भी किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहता था. इसीलिए कोमल

की अधजली लाश को कुए में फेंक दिया गया. ____

गाँव में किसी की लडकी का कन्यादान करना हो या किसी की चिता जलाने के लिए अपना श्रम दान देना दुनियां का सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है. और ऐसा न करना सबसे बड़ा पाप. घराने का पाप मिटाने के चक्कर में ये लोग कितना बड़ा पाप कर गये थे.

शायद ये लोग इस बात को खुद नहीं जान पाए थे. लेकिन यहाँ कोई समाज का आदमी तो उन्हें देख ही नही रहा था. फिर पाप कैसा? पाप तो वो होता है जो देख लिया जाय. पाप तो वो था जो कोमल ने किया था. बड़े लोग कहते भी हैं कि पापी को मारना पाप नही होता. हे भगवान! अब बात थी उस निशान की जो खेत के कोने पर कोमल की चिता के जलने से बना था. और ये बात ये सब लोग जानते थे कि किसी खिलाफत वाले ने पुलिस में शिकायत की तो पुलिस छानबीन अवश्य करेगी.

इसलिए इसको मिटाने की चिंता सब को थी. तिलक ने राजू से पूंछा, "इसका क्या किया जाय?"

राजू बेफिक्री से बोला, “इसकी चिंता मत करो मेरा एक रिश्तेदार है जिसके पास ट्रेक्टर है. उस ट्रेक्टर से इसको जुतवा देंगे. उसके बाद कोई भी निशान नहीं बचेगा. ये काम में कल सुबह से पहले करा दूंगा.” उसके बाद सब लोग घर को आ गये.

सुबह होने से पहले राजू अपने रिश्तेदार के पास गया. उसे सारी कहानी बताई. रिश्तेदार राजू की पीठ ठोंक कर बोला, “क्या बात है भाई साहब. ये किया है आपने असली मर्दो वाला काम. इज्जत की खातिर तो कुछ भी हो सकता है. चलिए में आपका वो खेत अभी जोतकर आता हूँ. और ऐसा जोलूँगा कि पुलिस का खोजी कुत्ता भी चाहे तो बता न सके कि यहाँ कोई लाश जली भी थी."

रिश्तेदार ने दावे के मुताबिक खेत को इतना गहरा जोता कि लगता ही नही था कि यहाँ कुछ हुआ है. जब राजू उसे पैसे देने लगा तो वह साफ़ मना करता हुआ बोला, “भाई साहब वैसे में आपसे पैसे लेता लेकिन आपने खानदान की इज्जत बचाई है. इसलिए में आज कोई पैसा नहीं ले सकता." सारा काम हो चुका था. सारे सबूत भी मिट चुके थे. गाँव में तरह तरह की चर्चाये भी होती जा रही थी.

घराने में कई दिनों तक सन्नाटा पसरा रहा. लोग आपस में कम ही बात किया करते थे. भगत और गोदन्ती तो काफी दिनों तक घर से नही निकले थे लेकिन बच्चों को पालने और पेट भरने के लिए काम करना पड़ता है और काम करने के लिए घर से निकलना पड़ता है. भगत घर से निकलते तो नजर नीची करके. शायद या तो दुःख बहुत ज्यादा था या शर्म. या फिर दोनों ही.

राजू के जिस कमरे में कोमल को मारा गया था उस कमरे को घर वालों ने पहले गंगाजल छिडक पवित्र किया. फिर उसे गाय के गोबर से लीपा और लीपने के बाद फिर से गंगाजल छिडक उसमें सत्यनारायन जी की कथा करा दी. उसके बाद उसमें रहना शुरू किया.
 
लेकिन फिर भी काफी दिन तक घर के बच्चे व औरतें उस कमरे में घुसने से डरते थे. बाद में सब सामान्य हो गया. राजू और संतू को काफी दिन तक कोमल के डरावने सपने आते थे. अगर ये दोनों कहीं जाते तो साथ में हनुमान जी का लॉकेट भी रख कर ले जाते. जिससे कोमल की आत्मा इनके ऊपर हावी न हो पाए.

ये लोग समझ रहे थे कि इन्होने सिर्फ कोमल की हत्या की है लेकिन इन्हें ये पता नही था कि उसके पेट में एक नन्ही जान भी थी. जो कोमल के साथ ही मर गयी. इस तरह इन्हें दो हत्यायों का पाप लगा था. माना कि कोमल ने इनके साथ बुरा किया लेकिन वो मासूम बच्चा जो अभी दुनियां में आया ही नहीं था. उसका हिसाब तो कोई देना ही नही चाहता था.

धीरे धीरे कोमल के मरने की चर्चाएँ फैल रही थीं. गाँव में घराने की खिलाफत वाले भी रहते थे लेकिन घराने वालों को अब उतना डर नही था क्योंकि कोई ऐसा सबूत ही नहीं बचा था जिससे पुलिस उन्हें पकड पाए. अब वे काफी निश्चिन्त हो रहते थे. लेकिन तभी एक दिन गाँव में दो पुलिस वाले आये. आकर दद्दू के चौतरे पर बैठ गये. उन्होंने बताया कि थाने में खबर मिली है कि यहाँ किसी भगत नाम के आदमी ने अपनी लडकी मार दी है.

दद्दू के बाप ने अनजान बनते हुए कहा, “अरे कैसी बात करते है दीवान जी? ऐसा कैसे हो सकता है?

पुलिस वाले ज्यादा छानबीन करने लगे. उन्होंने भगत को बुलवाया. भगत आते उससे पहले पडोस के गाँव के नेताजी आ पहुंचे. थोड़े दिन बाद इलेक्शन था. नेताजी ने भगत और उसके घराने का साथ देने की सोचली.

नेताजी के आते ही पुलिस मक्खन सी मुलायम हो गयी. सारी छानबीन धरी की धरी रह गयी. भगत के साथ साथ घराने के लोगों का वयान दर्ज हुआ कि भगत के ऐसी कोई लडकी थी ही नहीं जिसके मारने का जिक्र किया गया है.

जितने भी बच्चे भगत पर हैं सब के सब सुरक्षित हैं. नेताजी जी ने पुलिसवालों को एकांत में ले जाकर कुछ बात की फिर तिलक और राजू को बुलाया. उसके बाद राजू घर में गया और फिर लौटकर वहां आया जहाँ नेताजी और पुलिस खड़ी थी. शायद नेता जी ने पुलिस को रिश्वत दिलवाई थी.

राजू से रिश्वत ले पुलिस वाले चले गये. घराने के लोग कहते थे अब देखे कौन माई का लाल हमारी शिकायत करेगा? अब तो पुलिस भी अपनी थी और पुलिस से कौन झगड़ा मोल ले? वो तो रस्सी का सांप और सांप की रस्सी बना दे. क्या पता कोई गाँव वाला शिकायत करे और पुलिस घराने के लोगों की जगह उसे ही जेल में डाल दे?

नेताजी की जयजयकार हो गयी. सब कुछ कैसे एकदम ठीक हो गया. छोटू भी वही खड़ा सब देख रहा था. उसे सचमुच में यकीन नही होता था कि कोमल को मार दिया गया है लेकिन शाम को राजू की माँ छोटू के घर आई और उसकी माँ को वो सारी कहानी सुना दी जो कोमल के साथ घटी थी. छोटू खूब रोया. उसे यह सब गलत लगा लेकिन उसकी सुनता कौन था?

यह सब सुन छोटू को अपनी नानी के यहाँ की वो घटना भी याद आ गयी. जिसमे एक भाई ने अपनी सगी बहन को गोली मार दी थी. उसकी नानी के गाँव में एक परिवार था. उन्होंने अपनी लड़की की शादी एक जगह कर दी. लडकी का नाम जूही था. जूही को अपनी ससुराल में ही किसी लडके से प्यार हो गया. जब ये सब उसकी ससुराल वालों को पता चला तो उन्होंने मायके वालों को खबर कर दी. जूही के बाप और भाई उसे समझाने गये लेकिन जूही पर तो इश्क का भूत सवार था वो कहाँ सुनने वाली थी?

एक दिन जूही का भाई उसे बुलाने उसकी ससुराल पहुंचा. जूही ख़ुशी ख़ुशी अपने भाई के साथ आ गयी. शाम को जूही घर मैं बैठी खाना खा रही थी. उसी समय उसका भाई वहां आ पहुंचा. जूही के भाई ने खाना खाती जूही को देसी कट्टे की गोली से मार दिया. __चारो तरफ जूही के भाई की तारीफें हुई लेकिन जूही की तरफ कोई नही बोला. पुलिस आई तो सारा गाँव एक तरफ और पुलिस एक तरफ. मजबूरी में पुलिस को जूही की प्राक्रतिक मौत रजिस्टर में लिखनी पड़ी.

आज भी यही हुआ था. कोमल का नाम तो भगत की बेटियों में सुमार ही नहीं था. पुलिस चाहती तो कॉलेज में जा कोमल का पता कर सकती थी. गाँव के लोगों से चुपचाप पूंछ सकती थी लेकिन रिश्वत और नेताजी ने पुलिस को यह सब करने से रोक दिया. शायद मोहब्बत करने वाली लडकी के साथ यही होना था ताकि गाँव में फिर कोई लडकी मोहब्बत न कर सके. करना तो दूर सोच भी न सके.

जब राज को पता चला कि कोमल को मर दिया गया है तो खूब रोया. उसका मन किया कि जाकर सारे घराने में आग लगा दे लेकिन अब कोमल तो उसे नहीं मिल सकती थी. सब लोगों ने उसको समझाया कि अब लडकी तो गयी फिर क्यों खुद को और खुद के परिवार को मुसीबत में डालना चाहता है? राज के पास कोई चारा नही था. आज वो हिम्मत नही थी जो कोमल के सामने होती थी. आज राज की मर्दाना चौड़ी छाती सिकुड़कर माशे भर की हो गयी. अब राज घर के लोगों के कहने पर चलने लगा था. जो वो कहते वही करता था.

राज के बाप महतो ने जुगाड़ लगा कर राज की शादी कर डाली. राज मर्द था शायद इसीलिए जल्दी पिघल गया. एक कोमल के मुकाबले उसमे बहुत कम हिम्मत निकली. लेकिन वो भी क्या करता? उसके पीछे सारा परिवार था. उसकी मजबूरी उसे झुकाती चली गयी और लचकदार राज झुकता चला गया. राज की नई दुल्हन आ गयी थी लेकिन आज भी उसे कोमल याद आती थी.जो कोमल में उसे दिखता था वो अपनी पत्नी में नहीं दिखा.
 
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