• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

नीले परिन्दे ( एक थ्रिलर उपन्यास )

“इसकी परवाह न कीजिए। मैं फ्री फ़ण्ड में मशविरा देता हूँ।” इमरान ने कहा और फिर बुलन्द आवाज़ में बोला। “मैं उसे भी मशविरा देता हूँ जो पेड़ पर मौजूद है....उसे चाहिए कि वह नीचे उतर आये....वह ज़ख्मी है....आओ....आ जाओ नीचे....मुझे यह भी मालूम है कि तुम असलहे से लैस नहीं हो....और यहाँ सब तुम्हारे दोस्त हैं....आ जाओ नीचे।"

"अरे, अरे, तुम्हें क्या हो गया सितवत जाह!" जावेद मिर्जा ने घबरायी हुई आवाज़ में कहा।

अचानक इमरान ने अपनी टॉर्च का रुख ऊपर की तरफ़ कर दिया।

“मैं सलीम हूँ!" ऊपर से एक भर्रायी हुई-सी आवाज़ आयी।

"हकीम हो या डॉक्टर! इसकी परवाह न करो। बस, नीचे आ जाओ।” सन्नाटे में सिर्फ इमरान की आवाज़ गूंजी। बाकी लोगों को तो जैसे साँप सूंघ गया था।

पेड़ पर अचानक कई टार्यों की रोशनी पड़ रही थीं....लेकिन इमरान की नज़र शौकत के चेहरे पर थी। शौकत तभी बरसों का बीमार दिखने लगा।

सलीम टहनियों से उतरता हुआ तने के सिरे पर पहुँच चुका था अचानक उसने कराह कर कहा.... "मैं गिरा....मुझे बचाओ....!'' ।

एक ही छलाँग में इमरान तने के करीब पहुँच गया।

"चले आओ....चले आओ....ख़ुद को सँभालो....अच्छा....मैं हाथ बढ़ाता हूँ अपने पैर नीचे लटका दो!” इमरान ने कहा।

जावेद मिर्जा वगैरह भी उसकी मदद को पहँच गये किसी-न-किसी तरह सलीम को नीचे उतारा गया....उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा। “मेरे दायें हाथ पर गोली लगी है।"

“मगर तुम तो जेल में थे....!" जावेद मिर्जा बोला।

“जज....जी हाँ मैं था।" सलीम आगे-पीछे झूलता हुआ ज़मीन पर गिर गया। वह बेहोश हो चुका था।

वे लोग बेहोश सलीम को कोठी की तरफ़ ले जा चके थे और अब लेबोरेटरी की इमारत के करीब इमरान के अलावा और कोई नहीं था। वह भी उनके साथ थोड़ी दूर तक गया था, लेकिन फिर उनकी बेख़बरी में लेबोरेटरी की तरफ़ पलट आया था। उन सबके ज़ेहन उलझे हुए थे और किसी को इसका होश नहीं था कि कौन कहाँ रह गया....अलबत्ता नवाब जावेद मिर्जा शौकत को वहाँ से खींचता हुआ ले गया था।

लेबोरेटरी वाली इमारत का दरवाज़ा खुला हुआ था....इमरान अन्दर घुस गया। उसकी टॉर्च जल रही थी। अन्दर घुसते ही जिस चीज़ पर सबसे पहले उसकी नज़र पड़ी वह एक रिवॉल्वर था जो इमरान ने पिछली रात शौकत के हाथ में देखा था। इमरान ने जेब से रूमाल निकाला और उससे अपनी उँगलियाँ ढकते हुए रिवॉल्वर को नाल से पकड कर उठा लिया....और फिर वह उसे अपनी नाक तक ले गया। नाल से बारूद की बू आ रही थी। साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि उससे कुछ ही देर पहले फ़ायर किया गया है....फिर इमरान ने मैगज़ीन पर नज़र डाली....दो चेम्बर ख़ाली थे। उसने अपने सिर को थोड़ा-सा हिलाया....और रिवॉल्वर को बहुत एहतियात से रूमाल में लपेट कर जेब में डाल लिया। फिर वह वहीं से लौट आया....आगे जाने की ज़रूरत ही नहीं थी। इतना ही काफ़ी था, बल्कि काफ़ी से भी ज़्यादा....

इमरान कोठी की तरफ़ चल पड़ा। उसका ज़ेहन ख़यालों में उलझा हुआ था....अचानक वह रुक गया और फिर तेज़ी से लेबोरेटरी की तरफ़ मुड़ कर दौड़ने लगा। ____

“कौन है? ठहरो!'' उसने पीछे से शौकत की आवाज़ सुनी....

लेकिन इमरान रुका नहीं, बराबर दौड़ता रहा....शौकत भी शायद उसके पीछे दौड़ रहा था।

'ठहर जाओ....ठहरो....वरना गोली मार दूंगा।” शौकत फिर चीख़ा।

इमरान लेबोरेटरी की इमारत के पास एक चक्कर लगा कर झाड़ियों में घुस गया और शौकत की समझ में न आ सका कि वह कहाँ ग़ायब हो गया।

शौकत ने अब टॉर्च जलायी और चारों तरफ़ उसकी रोशनी डाल रहा था....लेकिन उसने झाड़ियों में घुसने की हिम्मत नहीं की।

 


फिर इमरान ने उसे इमारत के अन्दर जाते देखा। इमरान ठीक दरवाज़े के सामने वाली झाड़ियों में था। उसने शौकत को दरवाज़ा खोल कर टॉर्च की रोशनी में कुछ तलाश करते देखा।

- अब इमरान शौकत को वहीं छोड़ कर धीरे-धीरे कोठी की तरफ़ जा रहा था। उसने एक बार मुड़ कर लेबोरेटरी की इमारत पर नज़र डाली....अब उसकी सारी खिड़कियों में रोशनी दिख रही थीं।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

उस केस को तीन दिन बीत गये! फ़ैयाज़ सरदारगढ़ ही में ठहरा था। इमरान उससे बराबर काम लेता रहा....लेकिन उसे कुछ बताया नहीं....फ़ैयाज़ उस पर झुंझलाता रहा

और उस वक़्त तो उसे और ज्यादा ताव आया, जब इमरान ने लेबोरेटरी में पाये जाने वाले रिवॉल्वर के दस्ते पर उँगलियों के निशान की स्टडी का काम उसके सुपुर्द किया....इमरान ने वादा किया था कि वह स्टडी के नतीजे मालूम करने के बाद उसे सब कुछ बता देगा....मगर वह अपने वादे पर क़ायम न रहा। ज़ाहिर है कि यह गुस्सा दिलाने वाली बात ही थी।

फ़ैयाज़ वापस जाना चाहता था, मगर इमरान ने उसे रोके रखा। मजबूरन फ़ैयाज़ को एक हफ्ते की छुट्टी लेनी पड़ी, क्योंकि वह सरकारी तौर पर इस केस पर नहीं था....

आजकल इमरान सचमुच पागल दिख रहा था....कभी इधर, कभी उधर....और अपने साथ फ़ैयाज़ को भी घसीटे फिरता था।

एक रात तो फ़ैयाज़ के भी हाथ-पैर फूल गये....एक या डेढ़ बजे होंगे, चारों तरफ़ सन्नाटा और अँधेरा था....और वे दोनों पैदल सड़कें नापते फिर रहे थे। इमरान क्या करना चाहता है, यह फ़ैयाज़ को मालूम नहीं था....

इमरान एक जगह रुक कर बोला। “जमील की कोठी में घुसना ज़्यादा मुश्किल काम नहीं है।"

“क्या मतलब?”

“मतलब यह कि चोरों की तरह....!"

“इसकी ज़रूरत ही क्या है....?''

“कल रात नवाब जावेद मिर्जा की कोठी में मैंने ही नकब लगायी थी....तुमने आज शाम अख़बारों में उसके बारे में पढ़ा होगा।"

"तुम्हारा दिमाग़ तो नहीं चल गया?"

“पहले चला था....बीच में फिर रुक गया था, अब फिर चलने लगा है....हाँ, मैंने नकब लगायी थी। उसके अलावा और कोई चारा नहीं था।"

“क्यों लगायी थी?''

"बहुत जल्द मालूम हो जायेगा। परवाह न करो, हाँ तो मैं कह रहा था कि जमील की कोठी...”

“बकवास मत करो?" फ़ैयाज़ ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा। “मैं इस वक़्त भी कोठी खुलवा सकता हूँ। तुम वहाँ क्या देखना चाहते हो?"

“वह लड़की....सईदा है ना....मैं बस उसकी शक्ल देख कर वापस आ जाऊँगा। तुम फ़िक्र न करो। उसकी आँख भी न खुलने पायेगी....और मैं...."

“क्या बक रहे हो?" ___

"मैं चाहता हूँ कि जब वह सुबह सो कर उठे तो उसे अपने चेहरे पर उसी किस्म के काले धब्बे दिखें। मैं उससे शर्त लगा चुका हूँ।"

“आखिर तुम करना क्या चाहते हो?" फ़ैयाज़ ने पूछा।

"कुछ भी नहीं। बस, मैं उसे यकीन दिलाना चाहता हूँ कि जमील के चेहरे पर वह सफ़ेद दाग़ सिर्फ बनावटी हैं....यानी मेक अप। खैर, तुम इन बातों को छोड़ो और दसरा लतीफ़ा सुनो!" इमरान सिर हिला कर बोला। "जिस दिन सलीम की जमानत हुई थी, उसी रात को किसी ने उस पर दो फ़ायर किये थे....एक गोली उसके दायें हाथ पर लगी थी।"

"क्या तुमने भाँग पी रखी है?" फ़ैयाज़ ने हैरान होते हुए पूछा।

 


“फ़ायर, जावेद मिर्जा के बाग़ में हुए थे, लेकिन सलीम ने पुलिस को उसकी खबर नहीं दी।”

“यह तुम मुझे आज बता रहे हो?"

“मैं! मेरा कसूर नहीं....ये कसूर सरासर उसी गधे का है....वह मरना ही चाहता है तो मैं क्या करूँ।”

“उसका खून तुम्हारी गर्दन पर होगा। तुमने ही उसे जेल से निकलवाया है।"

''उसके मुक़द्दर में यही था....मैं क्या कर सकता हूँ।"

"इमरान, ख़ुदा के लिए मुझे बोर न करो।"

"तुम्हारे मुक़द्दर में भी यही है। मैं क्या कर सकता हूँ और तीसरा लतीफ़ा सुनो। वह रिवॉल्वर मझे लेबोरेटरी वाली इमारत में मिला था....और वे निशान....जो उसके हत्थे पर पाये गये हैं, सौ फ़ीसदी शौकत की उँगलियों के निशान हैं।"

“ओ....इमरान के बच्चे....!"

“अब चौथा लतीफ़ा सुनो....सलीम अब भी जावेद मिर्जा की कोठी में ठहरा है।"

"खुदा तुम्हें गारत करे!" फ़ैयाज़ ने झल्ला कर इमरान की गर्दन पकड़ ली।

“आँ....हाँ....!'' इमरान पीछे हटता हुआ बोला। “यह सड़क है प्यारे। अगर इत्तफ़ाक़ से कोई ड्यूटी कॉन्स्टेबल इधर आ निकला तो मुसीबत आ जायेगी।"

“मैं अभी सलीम....की ख़बर लूँगा....!"

“ज़रूर....लो....अच्छा , तो मैं चला....!"

“कहाँ!"

"जमील की कोठी के पीछे एक पेड़ है जिसकी टहनियाँ छत पर झुकी हुई हैं।''

"बकवास न करो....मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलो। वहाँ से हम उसी वक़्त जावेद मिर्जा के यहाँ जायेंगे।”

“मैं कभी अपना प्रोग्राम नहीं बदलता। तुम जाना चाहो तो शौक से जा सकते हो। मगर खेल बिगड़ने की सारी ज़िम्मेदारियाँ तुम पर ही होंगी।"

“कैसा खेल.... आख़िर तुम मुझे साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताते।"

“गुड़ियों के खेल में उम्र गँवायी....जाना है इक दिन सोच न आयी!'' इमरान ने कहा और ठण्डी साँस ले कर ख़ामोश हो गया....

फ़ैयाज़ कुछ न बोला। उसका बस चलता तो इमरान की बोटियाँ उड़ा देता।

 
Zamanath Ho Jane Ke Baad Bhi Saleem

Adalath Se Nahi Tala Uske Chahre Par

Pareshaani Ke Aasaar The Wo Adalath Hi Ke Ek Baramde Mein Thahel Raha Tha Aur

Kabhi-Kabhi Khaufnaak Aankho Se Idhar-

Udhar Bhi Dekh Leta Tha

Imran Uske Liye Bilkul Ajnabi Tha,

Isliye Usse Bohath Khareen Rahe Kar

Bhi Uski Halath Ka Jayeza Kar Sakta

Tha

Shaam Ho Gayi Aur Saleem Wahi Thahelta

Raha Jisne Uski Zamanath Di Thi, Wo

Hathkadiya Khulne Se Pahle Hi Adalath

Se Khisak Gaya Tha

Fir Wo Waqt Bhi Aya Jab Saleem Uss

Baramde Mein Bilkul Akela Rahe Gaya

Imran Bhi Ab Waha Se Hatt Gaya Tha,

Lekin Ab Wo Aisi Jagaah Par Tha Jaha

Se Wo Uski Nigrani Aasaani Se Kar

Sakta Tha Saleem Ko Shak Karne Ka

Mauqa Diye Ba-Ghair

Adalath Mein Sunnata Chhaa Jane Ke

Baad Saleem Waha Se Chal Padha Imran Uska Peecha Kar Raha Tha Saleem Ne Taxiyo Ke Adde Par Pahunch

Kar Ek Taxi Ki

Imran Ki Two-Seater Bhi Waha Se Dur

Nahi Thi

Baherhaal, Peecha Jaari Raha

Lekin Imran Mehsoos Kar Raha Tha Ki

Saleem Ki Taxi Yun Hi Be-Maqsadh

Shaher Ki Sadko Ke Chakkar Kaat Rahi

Hai

Fir Andhera Failne Laga.! Sadko Par

Beejli Ki Roshni Chamakne Lagi

Imran Ne Saleem Ka Peecha Nahi Chhoda

Wo Apna Petrol Foonkta Raha

Jaise Hi Andhera Kuch Aur Gehra Hua Agli Taxi Jackson Road Par Lagi Aur

Imran Ne Jald Hi Andaaza Kar Liya Ki

Uska Rukh Nawab Jawed Mirza Ki Kothi

Ki Taraf Hai

Dono Caro Mein Lag-Bhag 40 Gaz Ka

Faasla Tha Aur Yeh Faasla Itna Kam Tha

Ki Saleem Ko Picha Kiye Jane Ka Shak

Zaroor Ho Sakta Tha.! Ho Sakta Hai Ki Saleem Ko Pahle Hi Shak Ho Gaya Ho Aur

Wo Taxi Ko Isi Liye Idhar-Udhar

Chakkar Khilata Raha Ho

Jawed Mirza Ki Kothi Se Lag-Bhag 1 Far

Long Idhar Hi Taxi Rukh Gayi

Lekin Imran Ne Sirf Raftaar Kam Kar

Di….Car Nahi Roki.! Ab Wo Dheere-

Dheere Reng Rahi Thi Sadak SunSaan Thi

Taxi Wapsi Ke Liye Mudi Imran Use

Raasta De Diya

Apni Car Ki Agli Light Mein Usne Dekha

Ki Saleem Ne Be-Tahasha Daudna Shuru

Kar Diya Hai

Imran Ne Apni Raftaar Tez Kar Di….Aur

Saath Hi Usne Jeb Se Koi Cheez Nikaal

Kar Bahar Sadak Par Fenki Ek Halka Sa Dhamaaka Hua Aur Saleem Daudte-Daudte Gir Padha, Lekin Fir Fauran Hi Uth Kar Bhaagne Laga….

Fir Imran Ne Use Jawed Mirza Ke Baagh Mein Chalaang Lagate Dekha….

Imran Ki Car Farrate Bharti Hui Aage

Nikal Gayi….Lekin Ab Uski Saari Lights

Bujhi Hui Thi

2 Far Long Aage Jaa Kar Imran Ne Car

Roki Aur Use Ek Badi Si Chattaan Ki

Oth Mein Khada Kar Diya

Ab Wo Paidal Hi Baagh Ke Uss Hisse Ki

Taraf Jaa Raha Tha Jaha Labouratory

Wali Imarath Thi

Achanak Usne Ek Fire Ki Awaaz Suni Jo

Usi Taraf Se Ayi Thi Jidhar

Labouratory Thi….Fir Dusra Fire Hua Aur Ek Cheekh Sunnate Ka Seena Cheerte Hui Andhere Mein Doob Gayi….

Imran Ne Pahle Toh Daudne Ka Irada

Kiya Fir Ruk Gaya….Ab Usne Labouratory

Ki Taraf Jane Ka Irada Bhi Chhod Diya

Tha Wo Jaha Tha Wahi Ruka Raha

Jald Hi Usne Kayi Aadmiyo Ke Daudne Ki Awaaze Suni Unme Halka Se Shor Bhi Shaamil Tha….

Imran Car Ki Taraf Palat Gaya Uska

Zahen Bohath Tezi Se Sonch Raha Tha

Lekin Achanak Uske Zahen Mein Ek Naya

Khayaal Paida Hua.! Kya Wo Akele Mein

Bhi Bewaqoofi Karne Laga Hai.? Kya Wo

Bewaqoofi Nahi Thi.? Usne Fire Ki

Awaaze Suni Aur Wo Cheekh Bhi Kisi

Zakhmi Hi Ki Cheekh Maalum Hui Thi Fir

Aakhir Wo Car Ki Taraf Kyun Palat Aya Tha….Use Awaaz Ki Taraf Be-Tahasha Daudna Chahiye Tha….

Imran Car Start Ki Aur Fir Sadak Par

Wapas Aa Gaya….Kothi Ke Khareeb

Pahunch Kar Usne Car Baagh Ki Taraf

Mod Di Aur Use Seedha Porch Mein Leta

Chala Gaya

Jawed Mirza Kothi Se Nikal Kar Porch

Mein Aa Raha Tha Uski Raftaar Tez Thi Chahre Par Hawaiya Udh Rahi Thi….Aur

Haath Mein Rifle Thi

Khairiyath Nawab Sahab.! Imran Ne

Hairath Zaahir Ki

Oh…Sithwath Jaah….Idhar….! Usne

Labouratory Ki Taraf Ishara Kar Ke

Kaha.! Koi Haadsa Ho Gaya Hai….Do Fire Hue The….Cheekh….Bhi….Aao….Aao….!

Jawed Mirza Uska Baazu Pakad Kar Use Bhi Labouratory Ki Taraf Ghaseethne Laga….!

Kothi Ke Saare Naukar Labouratory Ke

Khareeb Ikkhate The

Safdar, Irfan Aur Shaukath Bhi Waha

Maujood The

Shaukath Ne Jawed Mirza Ko Bataya Ki

Wo Andar Tha Achanak Usne Fire Ki

Awaaze Suni….Fir Cheekh Bhi Sunayi

Di….Bahar Nikla Toh Andhere Mein Koi

Bhaagta Hua Dikhayi Diya Lekin Uske Sambhalne Se Pahle Hi Wo Ghayab Ho Chuka Tha….

Aur….Laash.! Jawed Mirza Ne Pucha

Hum Abhi Tak Kisi Ki Laash Hi Talaash

Karte Rahe Hai.! Irfan Bola

Lekin Abhi Tak Kaamyaabi Nahi Hui “Laash” Imran Dheere Se Badh-Badha Kar Chaaro Taraf Dekhne Laga

Tum Ab Yaha Akele Nahi Rahoge Samjhe.!

Jawed Mirza Shaukath Ka Khaandha

Jhinjhod Kar Cheekha

Shaukath Kuch Na Bola Wo Imran Ko

Ghoor Raha Tha

Koi Bhoot-Pret Hi Hoga….Mera Daawa

Hai….! Imran Mukka Hila Kar Rahe Gaya

Aap Iss Waqt Yaha Kaise.? Shaukath Ne

Usse Pucha

Shaukath Tumhe Baat Karne Ki Tameez

Kab Ayegi.! Jawed Mirza Ne Jhallayi

Hui Awaaz Mein Kaha

Aur

Imran Hasne Laga….Achanak Uske Daaye

Gaal Par Garm-Garm Boonde Fisal Kar

Rahe Gayi Aur Imran Upar Ki Taraf

Dekhne Laga.! Fir Jeb Se Torch Nikaali

Ungilya Kisi Cheez Se Chip-Chipaane

Lagi Thi

Torch Ki Roshni Mein Use Apni Ungliyo

Par Khoon Dikha….Taaza Khoon….Sab

Apni-Apni Baato Mein Lage The Kisi Ka Dhyaan Imran Ki Taraf Nahi Tha….

Imran Ne Ek Baar Fir Upar Ki Taraf Dekha Wo Ek pedh Ke Neeche Tha Aur

Pedh Ka Upari Hissa Andhere Mein Goom

Tha

Lekin….Hume Yaha Kisi Ke Jute Mile

Hai.! Safdar Kahe Raha Tha

Shayad Bhaagne Wala Apne Jute Chhod Gaya Hai

Usne Pedh Ke Tane Ki Taraf Torch Ki

Roshni Daali….Jute Sach-Much Maujood

The
 
Imran Aage Badh Kar Unhe Dekhne Laga,

Lekin Safdar Ne Torch Bujha Di Aur

Imran Ko Apni Torch Jalani Padhi

Khatm Karo Yeh Qissa Chalo Yaha Se.!

Jawed Mirza Ne Kaha.! Shaukath Main

Tumse Khaas Taur Par Kahe Raha Hu Tum

Ab Yaha Nahi Rahoge

Mere Liye Khatra Nahi Hai.! Shaukath

Bola

Hai Kyun Nahi.! Imran Bol Padha.! Main

Bhi Aap Ko Yahi Mashwara Dunga

Maine Aap Se Mashwara Nahi Maanga

Iski Parwaah Na Ki Jiye.! Main Fre-

Fund Mein Mashwara Deta Hu.! Imran Ne Kaha Aur Fir Bulandh Awaaz Mein Bola.!

Main Use Bhi Mashwara Deta Hu Jo Pedh

Par Maujood Hai….Use Chahiye Ki Wo

Neeche Utar Aye….Wo Zakhmi

Hai….Aao….Aa Jao Neeche….Mujhe Yeh Bhi

Maalum Hai Ki Tum Aslaahe Se Lez Nahi

Ho….Aur Yaha Sab Tumhare Dost Hai….Aa

Jao Neeche

Arey, Arey, Tumhe Kya Ho Gaya Sithwath

Jaah.! Jawed Mirza Ne Ghabrayi Hui

Awaaz Mein Kaha

Achanak Imran Ne Apni Torch Ka Rukh

Upar Ki Taraf Kar Diya

Main Saleem Hu.! Upar Se Ek Bharrayi

Hui Si Awaaz Aayi

Hakeem Ho Ya Docter Iski Parwaah Na

Karo Bas, Neeche Aa Jao.! Sunnate Mein

Sirf Imran Ki Awaaz Gunji Baaqi Logon Ko Toh Jaise Saanp Sungh Gaya Tha

Pedh Par Achanak Kayi Torch Ki Roshni Padh Rahi Thi….

Lekin Imran Ki Nazar Shaukath Ke

Chahre Par Thi.! Shaukath Tabhi Barso Ka Beemaar Dikhne Laga

Saleem Thahniyo Se Utarta Hua Tane Ke

Sire Par Pahunch Chuka Tha Achanak Usne Karaah Kar Kaha….Main Gira….Mujhe Bachao….!

Ek Hi Chalaang Mein Imran Tane Ke

Khareeb Pahunch Gaya

Chale Aao….Chale Aao….Khud Ko

Sambhalo….Acha….Main Haath Badhata Hu Apne Paer Neeche Latka Do.! Imran Ne

Kaha

Jawed Mirza Waghaira Bhi Uski Madad Ko Pahunch Gaye Kisi-Na-Kisi Tarah Saleem

Ko Neeche Utara Gaya….Uske Khadam Ladh-Khada Rahe The.! Usne Bharrayi

Hui Awaaz Mein Kaha Mere Daaye Haath Par Goli Lagi Hai

Magar Tum Toh Jail Mein The….! Jawed

Mirza Bola

J J….Jee Haa Main Tha.! Saleem Aage-

Peeche Jhoolta Hua Zameen Par Gir Gaya.! Wo Be-Hosh Ho Chuka Tha

Wo Log Be-Hosh Saleem Ko Kothi Ki Taraf Le Jaa Chuke The Aur Ab

Labouratory Ki Imarath Ke Khareeb

Imran Ke Alawa Aur Koi Nahi Tha.! Wo

Bhi Unke Saath Thodi Dur Tak Gaya Tha,

Lekin Fir Unki Be-Kabri Mein

Labouratory Ki Taraf Palat Aya Tha

Unn Sab Ke Zahen Uljhe Hue The Aur

Kisi Ko Iska Hosh Nahi Tha Ki Kaun Kaha Rahe Gaya….

Albatta Nawab Jawed Mirza Shaukath Ko

Waha Se Kheenchta Hua Le Gaya Tha Labouratory Wali Imarath Ka Darwaaza

Khula Hua Tha….Imran Andar Ghoos Gaya

Uski Torch Jal Rahi Thi

Andar Ghooste Hi Jiss Cheez Par Sab Se

Pahle Uski Nazar Padhi Wo Ek Revolver Tha Jo Imran Ne Pichli Raat Shaukath

Ke Haath Mein Dekha Tha

Imran Ne Jeb Se Rumaal Nikaala Aur

Usse Apni Ungliya Dhakte Hue Revolver Ko Naal Se Pakad Kar Utha Liya….Aur

Fir Wo Use Apni Naak Tak Le Gaya Naal

Se Barood Ki Boo Aa Rahi Thi Saaf Zaahir Ho Raha Tha Ki Usse Kuch Hi Der Pahle Fire Kiya Gaya Hai….

Fir Imran Ne Magzine Par Nazar

Daali….Do Chamber Khaali The Usne Apne

Sar Ko Thoda Sa Hilaya….Aur Revolver

Ko Bohath Ehtiyaadh Se Rumaal Mein

Lapet Kar Jeb Mein Daal Liya

Fir Wo Waha Se Laut Aya….Aage Jaane Ki Zaroorath Hi Nahi Thi Itna Hi Kaafi Tha, Balki Kaafi Se Bhi Zyada….

Imran Kothi Ki Taraf Chal Padha.! Uska

Zahen Khayaalo Mein Ulajha Hua

Tha….Achanak Wo Ruk Gaya Aur Fir Tezi

Se Labouratory Ki Taraf Mudh Kar

Daudne Laga

Kaun Hai.? Thahero.! Usne Peeche Se

Shaukath Ki Awaaz Suni….Lekin Imran

Ruka Nahi, Bara-Bar Daudta

Raha….Shaukath Bhi Shayad Uske Peeche

Daud Raha Tha

Thaher Jao….Thahero….Warna Goli Maar Dunga.! Shaukath Fir Cheekha

Imran Labouratory Ki Imarath Ke Paas

Ek Chakkar Laga Kar Jhadiyo Mein Ghoos

Gaya Aur Shaukath Ki Samajh Mein Na Aa Saka Ki Wo Kaha Ghayab Ho Gaya

Shaukath Ne Ab Torch Jalayi Aur Chaaro Taraf Uski Roshni Daal Raha Tha….Lekin

Usne Jhadiyo Mein Ghoosne Ki Himmat

Nahi Ki

Fir Imran Ne Use Imarath Ke Andar Jate Dekha Imran Thik Darwaaze Ke Saamne

Wali Jhadiyo Mein Tha Usne Shaukath Ko Darwaaza Khol Kar Torch Ki Roshni Mein

Kuch Talaash Karte Hue Dekha

Ab Imran Shaukath Ko Wahi Chhod Kar

Dheer-Dheere Kothi Ki Taraf Jaa Raha

Tha Usne Ek Baar Mudh Kar Labouratory

Ki Imarath Par Nazar Daali….Ab Uski Saari Khidkiyo Mein Roshni Dikh Rahi

Thi

Uss Case Ko Teen Din beet Gaye

Fayaz Sadargarh Hi Mein Thahera Tha.!

Imran Usse Bara-Bar Kaam Leta Raha….Lekin Use Kuch Bataya Nahi….

Fayaz Uss Par Jhunjhulata Raha Aur Uss

Waqt Toh Use Aur Zyada Tav Aaya, Jab

Imran Ne Labouratory Mein Paaye Jaane

Wale Revolver Ke Daste Par Ungliyo Ke Nishaan Ki Study Ka Kaam Uske Supurd Kiya….

Imran Ne Usse Wada Kiya Tha Ki Wo Study Ke Nateeje Maalum Karne Ke Baad Use Sab Kuch Bata Dega….

Magar Wo Apne Wade Par Khayam Na Raha

Zaahir Hai Ki Yeh Ghussa Dilaane Wali

Baat Hi Thi

Fayaz Wapas Jaana Chahta Tha, Magar

Imran Ne Use Roke Rakha

Majbooran Fayaz Ko Ek Hafte Ki Chutti Leni Padhi, Kyun Ki Wo Sarkari Taur Par Iss Case Par Nahi Tha….

Aaj-Kal Imran Sach-Much Paagal Dikh

Raha Tha….Kabhi Idhar, Kabhi

Udhar….Aur Apne Saath Fayaz Ko Bhi

Ghaseethte Firta Tha

Ek Raat Toh Fayaz Ke Bhi Haath- Paer

Fool Gaye….Ek Ya Dedh Baje Honge,

Chaaro Taraf Sunnata Aur Andhera

Tha….Aur Wo Dono Paidal Sadke Naapte

Fir Rahe The

Imran Kya Karna Chahta Hai, Yeh Fayaz Ko Maalum Hai Tha….

Imran Ek Jagaah Ruk Kar Bola.! Jameel

Ki Kothi Mein Ghoosna Zyada Mushkil

Kaam Nahi Hai

Kya Matlab.?
 
Matlab Yeh Hai Ki Choro Ki Tarah….! Iski Zaroorath Hi Kya Hai….?

Kal Raat Nawab Jawed Mirza Ki Kothi

Mein Maine Hi Naqab (Sendh) Lagayi Thi….Tumne Aaj Shaam Akhbaaro Mein

Uske Baare Mein Padha Hoga

Tumhara Dimaagh Toh Nahi Chal Gaya.?

Pahle Chala Tha….Beech Mein Fir Ruk

Gaya Tha, Ab Fir Chalne Laga Hai….Haa, Maine Naqab Lagayi Thi Uske Alawa Aur

Koi Chaara Nahi Tha Kyun Lagayi Thi.?

Bohath Jald Maalum Ho Jayega.! Parwaah

Na Karo, Haa Toh Main Kahe Raha Tha Ki Jameel Ki Kothi….

Bakwaas Mat Karo.! Fayaz Bura Sa Muh

Bana Kar Bola.! Main Iss Waqt Bhi Kothi Khulwa Sakta Hu.! Tum Waha Kya Dekhna Chahte Ho.?

Wo ladki….Sayeeda Hai Na….Main Bas Uski Shakl Dekh Kar Wapas Aa Jaunga.!

Tum Fikr Na Karo.! Uski Aankh Bhi Na Khulne Payegi….Aur Main….

Kya Bak Rahe Ho.?

Main Chahta Hu Ki Jab Wo Subaah So Kar

Uthe Toh Use Apne Chahre Par Usi Qism

Ke Kaale Dhabbe Dikhe.! Main Usse

Shart Laga Chuka Hu

Aakhir Tum Karna Kya Chahte Ho.? Fayaz

Ne Pucha

Kuch Bhi Nahi.! Bas Main Use Yaqeen

Dilaana Chahta Hu Ki Jameel Ke Chahre

Par Wo Safed Daagh Sirf Banavti

Hai….Yani Make-Up

Khair Tum Inn Baato Ko Chhodo Aur

Dusra Lateefa Suno.! Imran Sar Hila

Kar Bola.! Jiss Din Saleem Ki Zamanath

Hui Thi, Usi Raat Ko Kisi Ne Uss Par

Do Fire Kiye The….Ek Goli Uske Daaye

Haath Par Lagi Thi

Kya Tumne Bhaang Pi Rakhi Hai.? Fayaz

Ne Hairath Hote Hue Pucha

Fire, Jawed Mirza Ke Baagh Mein Hue, Lekin Saleem Ne Police Ko Uski Khabar

Nahi Di

Yeh Tum Mujhe Aaj Bata Rahe Ho

Main.! Mera Kasoor Nahi….Yeh Kasoor

Sarasar Usi Gadhe Ka Hai….Wo Marna Hi

Chahta Hai Toh Main Kya Karu

Uska Khoon Tumhari Gardan Par Hoga Tumne Hi Use Jail Se Nikalwaya Hai

Uske Muqaddar Mein Yahi Tha….Main Kya

Kar Sakta Hu

Imran, Khuda Ke Liye Mujhe Bore Na

Karo

Tumhare Muqaddar Mein Bhi Yahi Hai.!

Main Kya Kar Sakta Hu Aur Teesra Lateefa Suno.! Wo Revolver Mujhe

Labouratory Wali Imarath Mein Mila

Tha….Aur Wo Nishaan….Jo Uske Hatthe

Par Paye Gaye Hai, Sau Feesadi

Shaukath Ki Ungliyo Ke Nishaan Hai “O”….Imran Ke Bachche….!

Ab Chauta Lateefa Suno….Saleem Ab Bhi Jawed Mirza Ki Kothi Mein Thahera Hai

Khuda Tumhe Gharatath Kare.! Fayaz Ne

Jhalla Kar Imran Ki Gardan Pakad Li

Aa….Aa….! Imran Peeche Hathta Hua

Bola.! Yeh Sadak Hai Pyare Agar

Ittefaaq Se Koi Duty Constable Idhar Aa Nikla Toh Musibath Aa Jayegi Main Abhi Saleem….Ki Khabar Lunga….!

Zaroor….Lo….Acha, Toh Main Chala….!

Kaha.?

Jameel Ki Kothi Ke Peeche Ek Pedh Hai

Jiski Tahniya Chhat Par Jhooki Hui Hai

Bakwaas Na Karo….Mere Saath Police

Station Chalo Waha Se Hum Usi Waqt

Jawed Mirza Ke Yaha Jayenge

Main Kabhi Apna Programme Nahi

Badalta.! Tum Jaana Chahte Hoto Shauq

Se Jaa Sakte Ho.! Magar Khel Bighadne Ki Saari Zimmedariya Tum Par Hi Hongi Kaisa Khel….Aakhir Tum Mujhe Saf-Saaf

Kyun Nahi Batate

Gudiyo Ke Khel Mein Umr Gawayi….Jana

Hai Ek Din Sonch Na Aayi.! Imran Ne Kaha Aur Thandi Saans Le Kar Khamosh Ho Gaya….

Fayaz Kuch Na Bola.! Uska Bas Chalta Toh Imran Ki Botiya Udha Deta

Ab, Main Tumhari Kisi Bewaqoofi Mein

Hissa Na Lunga.! Usne Thodi Der Baad

Kaha Jo Dil Chahe Karo Main Jaa Raha

Hu Ab Tum Apni Har Kartoot Ke Khud

Zimmedar Hoge

Bohath-Bohath Shukriya.! Tum Jaa Sakte Ho….Tata….Aur Agar Ab Bhi Nahi Jaoge Toh….Bata….Hip.!

Imran Dhoon Ka Pakka Tha….Fayaz Ke

Laakh Mana Karne Ke Ba-Wajood Wo Choro

Ki Tarah Jameel Ki Kothi Mein Daakhil

Ho Gaya
 
फ़ैयाज़ कुछ न बोला। उसका बस चलता तो इमरान की बोटियाँ उड़ा देता।

“अब, मैं तुम्हारी किसी बेवकूफ़ी में हिस्सा न लूँगा।” उसने थोड़ी देर बाद कहा।

“जो दिल चाहे करो, मैं जा रहा हूँ। अब तुम अपनी हर करतूत के ख़ुद ज़िम्मेदार होगे।"

"बहुत-बहुत शुक्रिया! तुम जा सकते हो....टाटा....और अगर अब भी नहीं जाओगे तो....बाटा....हिँप!”

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इमरान धुन का पक्का था....फ़ैयाज़ के लाख मना करने के बावजूद वह चोरों की तरह जमील की कोठी में दाखिल हो गया। फ़ैयाज़ वहीं से वापस हो गया, लेकिन उसे रात भर नींद नहीं आयी थी....इमरान की बकवास से उसके सही ख़यालों का अन्दाज़ा करना बहुत ही मुश्किल था....और यही चीज़ फ़ैयाज़ के लिए उलझन बनी हुई थी....वह सारी रात यही सोचता रहा कि मालूम नहीं इमरान ने वहाँ क्या हरकत की हो....ज़रूरी नहीं कि वह हर मामले में कामयाब ही होता रहे। हो सकता है कि वह पकड़ा गया हो....फिर उसकी क्या पोज़ीशन होगी।

सुबह होते ही सबसे पहले उसने सज्जाद को फ़ोन किया....दिखावटी मक़सद यूँ ही रस्मी तौर पर खैरियत मालूम करना था। उसे उम्मीद थी कि अगर कोई वाक़या पेश आया होगा तो सज्जाद खुद ही बतायेगा....लेकिन सज्जाद ने किसी नये वाकये की खबर नहीं दी। फ़ैयाज़ को फिर भी इत्मीनान नहीं हुआ....उसने सज्जाद से कहा कि वह किसी टॉपिक पर बातचीत करने के लिए वहाँ आयेगा और फिर नाश्ता करके जमील की कोठी की तरफ़ रवाना हो गया....उसे ड्रॉइंग-रूम में काफ़ी देर तक बैठना पडा। लेकिन फ़ैयाज़ सोचने लगा कि उसे किस टॉपिक पर बातचीत करनी है....बहरहाल, सज्जाद ड्रॉइंग-रूम में मौजूद नहीं था, इसलिए उसे सोचने का मौका मिल गया....लेकिन वह कुछ भी न सोच सका। उसकी जानकारी में अभी तक कोई नयी बात हुई ही नहीं थी....इमरान की पिछली रात की बातों को वह जज़्बे में बह रहे आदमी का बड़बोलापन समझता था और इसी बिना पर उसने सलीम के बारे में जानकारी हासिल करने की भी ज़रूरत नहीं समझी थी। इमरान का ख़याल आते ही उसे गुस्सा आ गया....और साथ ही इमरान ने ड्रॉइंग-रूम में जा कर सलाम किया।

फ़ैयाज़ की पीठ दरवाज़े की तरफ़ थी। वह एकदम से उछल पड़ा। "ये क्या बेहूदगी है....!'' फ़ैयाज़ झल्ला गया।

“परवाह न करो। मैं इस वक़्त जेम्स बॉण्ड हो रहा हूँ। प्यारे डॉक्टर वॉटसन....नीले परिन्दों के बाप का सुराग़ मुझे मिल गया है....और मैं बहुत जल्द....अस्सलाम अलैकुम...."

“वालैकुम अस्सलाम!" सज्जाद ने सलाम का जवाब दिया जो दरवाज़े में खड़ा इमरान को घूर रहा था....

“आइए....आइए....!” इमरान ने बेवकूफ़ों की तरह बौखला कर कहा।

सज्जाद आगे बढ़ कर एक सोफे पर बैठ गया। उसके चेहरे पर परेशानी झलक रही थी।

"क्यों, क्या बात है?'' फ़ैयाज़ ने कहा। “तुम कुछ परेशान दिख रहे हो।"

“मैं....हाँ....मैं परेशान हूँ। सईदा भी उसी बीमारी में फँस गयी है....!"

"क्या?'' फ़ैयाज़ उछल कर खड़ा हो गया।

"हाँ....मगर....उसके सिर्फ चेहरे पर धब्बे हैं....बाक़ी जिस्म पर नहीं!"

“काले धब्बे!' फ़ैयाज़ ने पूछा।

"फ़ैयाज़ साहब!" सज्जाद ने नाखुशी में कहा। "मेरा ख़याल है कि यह मज़ाक़ का मौका नहीं है।"

"ओह....माफ़ करना....मगर....क्या कोई नीला.... परिन्दा...."

“पता नहीं! वह सो रही थी....अचानक किसी तकलीफ़देह एहसास से जाग गयी....और जागने पर उसे महसूस हुआ जैसे कोई चीज़ दायें हाथ में चुभ गयी हो।"

“परिन्दा लटका हुआ था।” इमरान जल्दी से बोला।

“जी नहीं, वहाँ कुछ भी नहीं था।" सज्जाद ने झल्लायी हुए आवाज़ में कहा। “अचानक उसकी नज़र ड्रेसिंग टेबल के आईने पर पड़ी और बेतहाशा चीखें मारती हुई कमरे से निकल कर बाहर भागी।"

"ओह....!” इमरान अपने होंट दाँतों में चबा कर रह गया।

फ़ैयाज़ इमरान को घूरने लगा और इमरान धीरे से बड़बड़ाया। “ऐसी जगह मारूँगा जहाँ पानी भी न मिल सके।" इस पर सज्जाद भी इमरान को घूरने लगा।

“मगर....” इमरान ने दोनों को बारी-बारी से देखते हुए कहा, "जमील साहब को दाग़दार बनाने का मक़सद तो समझ में आता है। मगर सईदा साहिबा का मामला? यह मेरी समझ से बाहर है.... आख़िर शौकत को उनसे क्या दुश्मनी हो सकती है?" ।

"शौकत?" सज्जाद चौंक पड़ा।

“जी हाँ! उसकी लेबोरेटरी में ऐसे वाइरस मौजूद हैं जिनका बयान डॉक्टरों की रिपोर्ट में मिलता है।"

“आप इसे साबित कर सकेंगे?' सज्जाद ने पूछा।

“चुटकी बजाते उसके हाथों में हथकड़ियाँ डलवा दूंगा। बस, देखते रह जाइएगा।"

" आखिर क्या सबूत है तुम्हारे पास?'' फ़ैयाज़ ने पूछा।

“आहा! उसे मुझ पर छोड़ दो। जो कुछ मैं कहूँ, करते जाओ....उसके ख़िलाफ़ हुआ तो फिर मैं कुछ नहीं कर सकूँगा। बहरहाल, आज ड्रामे का ड्रॉप सीन हो जायेगा।"

“नहीं, पहले मुझे बताओ!" फ़ैयाज़ ने कहा।

“क्यों बताऊँ?' अचानक इमरान झल्ला गया। “तुम क्या नहीं जानते। बच्चों की-सी बातें कर रहे हो....क्या सलीम पर गोली नहीं चलायी गयी थी? क्या रिवॉल्वर के हत्थे पर शौकत की उँगलियों के निशान नहीं मिले? क्या मैंने उसकी लेबोरेटरी में नीले परिन्दे नहीं देखे जिन्हें वह अँगीठी में झोंक रहा था!"

“रिवॉल्वर....सलीम....नीले परिन्दे....यह आप क्या कह रहे हैं। मैं कुछ नहीं समझा।" सज्जाद हैरान हो कर बोला।

"बस, सज्जाद साहब! इससे ज़्यादा अभी नहीं! जो कुछ मैं कहूँ करते जाइए....मुजरिम के हथकड़ियाँ लग जायेंगी।"

"बताइए....जो कुछ आप कहेंगे करूँगा।" ।

“गुड....तो आप अभी और इसी वक़्त अपने भाइयों और जमील साहब के मामुओं समेत जावेद मिज़ा के यहाँ जाइए। कैप्टन फ़ैयाज़ भी आपके साथ होंगे....वहाँ जाइए और जावेद मिर्जा से पूछिए कि अब उसका क्या इरादा है? जमील से अपनी लड़की की शादी करेगा या नहीं?....ज़ाहिर है कि वह इनकार करेगा। फिर उस वक़्त ज़रूरत इस बात की होगी कि कैप्टन फ़ैयाज़ उस पर अपनी असलियत ज़ाहिर करके कहें कि उन्हें इस सिलसिले में उसके भतीजों में से किसी एक पर शक है और फ़ैयाज़ तुम उसे कहना कि वह अपने सारे भतीजों को बुलाये....तुम उनसे कुछ सवाल करना चाहते हो।"
 
फ़ैयाज़ कुछ न बोला। उसका बस चलता तो इमरान की बोटियाँ उड़ा देता।

“अब, मैं तुम्हारी किसी बेवकूफ़ी में हिस्सा न लूँगा।” उसने थोड़ी देर बाद कहा।

“जो दिल चाहे करो, मैं जा रहा हूँ। अब तुम अपनी हर करतूत के ख़ुद ज़िम्मेदार होगे।"

"बहुत-बहुत शुक्रिया! तुम जा सकते हो....टाटा....और अगर अब भी नहीं जाओगे तो....बाटा....हिँप!”

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इमरान धुन का पक्का था....फ़ैयाज़ के लाख मना करने के बावजूद वह चोरों की तरह जमील की कोठी में दाखिल हो गया। फ़ैयाज़ वहीं से वापस हो गया, लेकिन उसे रात भर नींद नहीं आयी थी....इमरान की बकवास से उसके सही ख़यालों का अन्दाज़ा करना बहुत ही मुश्किल था....और यही चीज़ फ़ैयाज़ के लिए उलझन बनी हुई थी....वह सारी रात यही सोचता रहा कि मालूम नहीं इमरान ने वहाँ क्या हरकत की हो....ज़रूरी नहीं कि वह हर मामले में कामयाब ही होता रहे। हो सकता है कि वह पकड़ा गया हो....फिर उसकी क्या पोज़ीशन होगी।

सुबह होते ही सबसे पहले उसने सज्जाद को फ़ोन किया....दिखावटी मक़सद यूँ ही रस्मी तौर पर खैरियत मालूम करना था। उसे उम्मीद थी कि अगर कोई वाक़या पेश आया होगा तो सज्जाद खुद ही बतायेगा....लेकिन सज्जाद ने किसी नये वाकये की खबर नहीं दी। फ़ैयाज़ को फिर भी इत्मीनान नहीं हुआ....उसने सज्जाद से कहा कि वह किसी टॉपिक पर बातचीत करने के लिए वहाँ आयेगा और फिर नाश्ता करके जमील की कोठी की तरफ़ रवाना हो गया....उसे ड्रॉइंग-रूम में काफ़ी देर तक बैठना पडा। लेकिन फ़ैयाज़ सोचने लगा कि उसे किस टॉपिक पर बातचीत करनी है....बहरहाल, सज्जाद ड्रॉइंग-रूम में मौजूद नहीं था, इसलिए उसे सोचने का मौका मिल गया....लेकिन वह कुछ भी न सोच सका। उसकी जानकारी में अभी तक कोई नयी बात हुई ही नहीं थी....इमरान की पिछली रात की बातों को वह जज़्बे में बह रहे आदमी का बड़बोलापन समझता था और इसी बिना पर उसने सलीम के बारे में जानकारी हासिल करने की भी ज़रूरत नहीं समझी थी। इमरान का ख़याल आते ही उसे गुस्सा आ गया....और साथ ही इमरान ने ड्रॉइंग-रूम में जा कर सलाम किया।

फ़ैयाज़ की पीठ दरवाज़े की तरफ़ थी। वह एकदम से उछल पड़ा। "ये क्या बेहूदगी है....!'' फ़ैयाज़ झल्ला गया।

“परवाह न करो। मैं इस वक़्त जेम्स बॉण्ड हो रहा हूँ। प्यारे डॉक्टर वॉटसन....नीले परिन्दों के बाप का सुराग़ मुझे मिल गया है....और मैं बहुत जल्द....अस्सलाम अलैकुम...."

“वालैकुम अस्सलाम!" सज्जाद ने सलाम का जवाब दिया जो दरवाज़े में खड़ा इमरान को घूर रहा था....

“आइए....आइए....!” इमरान ने बेवकूफ़ों की तरह बौखला कर कहा।

सज्जाद आगे बढ़ कर एक सोफे पर बैठ गया। उसके चेहरे पर परेशानी झलक रही थी।

"क्यों, क्या बात है?'' फ़ैयाज़ ने कहा। “तुम कुछ परेशान दिख रहे हो।"

“मैं....हाँ....मैं परेशान हूँ। सईदा भी उसी बीमारी में फँस गयी है....!"

"क्या?'' फ़ैयाज़ उछल कर खड़ा हो गया।

"हाँ....मगर....उसके सिर्फ चेहरे पर धब्बे हैं....बाक़ी जिस्म पर नहीं!"

“काले धब्बे!' फ़ैयाज़ ने पूछा।

"फ़ैयाज़ साहब!" सज्जाद ने नाखुशी में कहा। "मेरा ख़याल है कि यह मज़ाक़ का मौका नहीं है।"

"ओह....माफ़ करना....मगर....क्या कोई नीला.... परिन्दा...."

“पता नहीं! वह सो रही थी....अचानक किसी तकलीफ़देह एहसास से जाग गयी....और जागने पर उसे महसूस हुआ जैसे कोई चीज़ दायें हाथ में चुभ गयी हो।"

“परिन्दा लटका हुआ था।” इमरान जल्दी से बोला।

“जी नहीं, वहाँ कुछ भी नहीं था।" सज्जाद ने झल्लायी हुए आवाज़ में कहा। “अचानक उसकी नज़र ड्रेसिंग टेबल के आईने पर पड़ी और बेतहाशा चीखें मारती हुई कमरे से निकल कर बाहर भागी।"

"ओह....!” इमरान अपने होंट दाँतों में चबा कर रह गया।

फ़ैयाज़ इमरान को घूरने लगा और इमरान धीरे से बड़बड़ाया। “ऐसी जगह मारूँगा जहाँ पानी भी न मिल सके।" इस पर सज्जाद भी इमरान को घूरने लगा।

“मगर....” इमरान ने दोनों को बारी-बारी से देखते हुए कहा, "जमील साहब को दाग़दार बनाने का मक़सद तो समझ में आता है। मगर सईदा साहिबा का मामला? यह मेरी समझ से बाहर है.... आख़िर शौकत को उनसे क्या दुश्मनी हो सकती है?" ।

"शौकत?" सज्जाद चौंक पड़ा।

“जी हाँ! उसकी लेबोरेटरी में ऐसे वाइरस मौजूद हैं जिनका बयान डॉक्टरों की रिपोर्ट में मिलता है।"

“आप इसे साबित कर सकेंगे?' सज्जाद ने पूछा।

“चुटकी बजाते उसके हाथों में हथकड़ियाँ डलवा दूंगा। बस, देखते रह जाइएगा।"

" आखिर क्या सबूत है तुम्हारे पास?'' फ़ैयाज़ ने पूछा।

“आहा! उसे मुझ पर छोड़ दो। जो कुछ मैं कहूँ, करते जाओ....उसके ख़िलाफ़ हुआ तो फिर मैं कुछ नहीं कर सकूँगा। बहरहाल, आज ड्रामे का ड्रॉप सीन हो जायेगा।"

“नहीं, पहले मुझे बताओ!" फ़ैयाज़ ने कहा।

“क्यों बताऊँ?' अचानक इमरान झल्ला गया। “तुम क्या नहीं जानते। बच्चों की-सी बातें कर रहे हो....क्या सलीम पर गोली नहीं चलायी गयी थी? क्या रिवॉल्वर के हत्थे पर शौकत की उँगलियों के निशान नहीं मिले? क्या मैंने उसकी लेबोरेटरी में नीले परिन्दे नहीं देखे जिन्हें वह अँगीठी में झोंक रहा था!"

“रिवॉल्वर....सलीम....नीले परिन्दे....यह आप क्या कह रहे हैं। मैं कुछ नहीं समझा।" सज्जाद हैरान हो कर बोला।

"बस, सज्जाद साहब! इससे ज़्यादा अभी नहीं! जो कुछ मैं कहूँ करते जाइए....मुजरिम के हथकड़ियाँ लग जायेंगी।"

"बताइए....जो कुछ आप कहेंगे करूँगा।" ।

“गुड....तो आप अभी और इसी वक़्त अपने भाइयों और जमील साहब के मामुओं समेत जावेद मिज़ा के यहाँ जाइए। कैप्टन फ़ैयाज़ भी आपके साथ होंगे....वहाँ जाइए और जावेद मिर्जा से पूछिए कि अब उसका क्या इरादा है? जमील से अपनी लड़की की शादी करेगा या नहीं?....ज़ाहिर है कि वह इनकार करेगा। फिर उस वक़्त ज़रूरत इस बात की होगी कि कैप्टन फ़ैयाज़ उस पर अपनी असलियत ज़ाहिर करके कहें कि उन्हें इस सिलसिले में उसके भतीजों में से किसी एक पर शक है और फ़ैयाज़ तुम उसे कहना कि वह अपने सारे भतीजों को बुलाये....तुम उनसे कुछ सवाल करना चाहते हो।"
 
“फिर उसके बाद?” फ़ैयाज़ ने पूछा।

“मैं ठीक उसी वक्त वहाँ पहुँच कर निपट लूँगा।"

“क्या निपट लोगे?"

"तुम्हारे सिर पर हाथ रख कर रोऊँगा!” इमरान ने संजीदगी से कहा।

फ़ैयाज़ और सज्जाद उसे घूरते रहे....अचानक सज्जाद ने पूछा। “अभी आपने किसी रिवॉल्वर का हवाला दिया था। जिस पर शौकत की उँगलियों के निशान थे।"

“जी हाँ....बाकी बातें वहीं होंगी! अच्छा टाटा....” इमरान हाथ हिलाता हुआ ड्रॉइंग-रूम से निकल गया....और फ़ैयाज़ उसे पुकारता ही रहा।

“मैं नहीं समझ सकता कि ये हज़रत क्या फ़रमाने वाले हैं।" सज्जाद बोला।

"कुछ-न-कुछ तो करेगा ही। अच्छा, अब उठो। हमें वही करना चाहिए जो उसने कहा है!"

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बात बढ़ गयी....नवाब जावेद मिर्जा का पारा चढ़ गया था।

उसने फ़ैयाज़ से कहा.... “जी हाँ फ़रमाइए! मेरे सब बच्चे यहीं मौजूद हैं! यह शौकत है। यह इरफ़ान है, यह सफ़दर है....बताइए आपको इनमें से किस पर शक है और शक की वजह भी आपको बतानी पड़ेगी....? समझे आप!

फ़ैयाज़ बग़लें झाँकने लगा। वह बड़ी बेचैनी से इमरान का इन्तज़ार कर रहा था। उस वक़्त वहाँ जावेद मिर्जा के खानदान वालों के अलावा जमील के ख़ानदान के सारे मर्द मौजूद थे। बात जमील और परवीन की शादी से शुरू हुई थी। जावेद मिर्जा ने एक कोढ़ी से अपनी लड़की का रिश्ता करने से साफ़ इनकार कर दिया....इस पर सज्जाद ने काफ़ी ले-दे की, फिर फ़ैयाज़ ने उसके भतीजों में से किसी को जमील के बीमारी का ज़िम्मेदार ठहराया....

लेकिन जब जावेद मिर्जा ने तसदीक चाही तो फ़ैयाज़ के हाथ-पैर फूल गये। उसे उम्मीद थी कि इमरान वक़्त पर पहुँच जायेगा....लेकिन....इमरान....?

फ़ैयाज़ दिल-ही दिल में उसे एक हज़ार अलफ़ाज़ फ़ी मिनट की रफ़्तार से गालियाँ दे रहा था।

__“हाँ, आप बोलते क्यों नहीं। ख़ामोश क्यों हो गये!" जावेद मिर्जा ने उसे ललकारा। ___

“अमाँ चलो....यार....शर्माते क्यों हो!" कमरे के बाहर से इमरान की आवाज़ आयी और फ़ैयाज़ की बाँछे खिल गयीं।

सबसे पहले सलीम दाखिल हुआ। उसके पीछे इमरान था....और शायद वह उसे धकेलता हुआ ला रहा था। “सितवत जाह!" जावेद मिर्जा झल्लायी हुई आवाज़ में बोला। “यह क्या मज़ाक़ है....आप बगैर इजाज़त यहाँ कैसे चले आये।”

“मैं तो यह पूछने के लिए हाज़िर हुआ हूँ कि आखिर इन हज़रत की रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज करायी?" इमरान ने सलीम की तरफ़ इशारा करके कहा। “आज से चार दिन पहले....!"

“आप यहाँ से चले जाइए....जाइए!" नवाब जावेद मिर्जा गुर्राया।

“आपको बताना पड़ेगा जनाब!" अचानक इमरान के चेहरे से बेवकूफ़ी के आसार ग़ायब हो गये।

"ये मुझे ज़बर्दस्ती लाये हैं।" सलीम डरी हुई आवाज़ में बोला।

“सितवत जाह! मैं बहुत बुरी तरह पेश आऊँगा!" जावेद मिर्ज़ा खड़ा हो गया। उसी के साथ ही शौकत भी उठा।

“बैठो!' इमरान की आवाज़ ने पूरे कमरे में झंकार-सी पैदा कर दी। फ़ैयाज़ ने उसकी इस आवाज़ में अजनबियत-सी महसूस की....यह उस इमरान की आवाज़ तो नहीं थी, जिसे वह इतने लम्बे वक्त से जानता था।

“मेरा ताल्लक होम डिपार्टमेंट से है।” इमरान ने कहा। “आप लोग अभी तक ग़लतफ़हमी में फंसे थे। मुझे उन वाइरस की तलाश है जो आदमी के खून में मिलते ही उसे बारह घण्टे के अन्दर-ही-अन्दर कोढ़ी बना देते हैं। शौकत! क्या तुम्हारी लेबोरेटरी में ऐसे वाइरस नहीं हैं?"

"हरगिज़ नहीं हैं!” शौकत गुर्राया।

“क्या तुम बुधवार की रात को अपनी लेबोरेटरी में कुछ मुर्दा परिन्दे नहीं जला रहे थे? नीले परिन्दे?"

“हाँ! मैंने जलाये थे फिर?"

इमरान सलीम की तरफ़ मुड़ा, “तुम पर किसने फ़ायर किया था?"

“मैं नहीं जानता!' सलीम ने सूखे होंटों पर ज़बान फेर कर कहा।

"तुम जानते हो? तुम्हें बताना पड़ेगा?"

“मैं नहीं जानता जनाब....मुझ पर किसी ने अँधेरे में फ़ायर किया था। एक गोली हाथ पर लगी थी....और बदहवासी में मैं पेड़ पर चढ़ गया था।"

__"यह रिवॉल्वर किसका है? इमरान ने जेब से एक रिवॉल्वर निकाल कर सबको दिखाते हुए कहा।"

शौकत और जावेद मिर्जा के चेहरों पर हवाइयाँ उडने लगीं। ___

"मैं जानता हूँ कि रिवॉल्वर शौकत का है और शौकत के पास इसका लाइसेंस भी है....मैं यह भी जानता हूँ कि सलीम पर इसी रिवॉल्वर से गोली चलायी गयी थी और जिसने भी फ़ायर किया था, उसकी उँगलियों के निशान उसके हत्थे पर मौजूद थे....और वो निशान शौकत की उँगलियों के थे।" ___

“होगा, होगा....मुझे शौकत साहब से कोई शिकायत नहीं है।'' सलीम जल्दी से बोल पड़ा।

“असलियत क्या है सलीम?' इमरान ने नर्मी से पूछा।

"उन्होंने किसी दूसरे आदमी के धोखे में मुझ पर फ़ायर किया था।"

“किसके धोखे में?''

“यह वही बता सकेंगे। मैं नहीं जानता।
 
"नहीं! नहीं....यह कभी नहीं हो सकता!" जावेद मिर्ज़ा खड़ा हो कर ख़ौफनाक अन्दाज़ में चीखा।

"फ़ैयाज़ हथकड़ियाँ....!"

फ़ैयाज़ ने जेब से हथकड़ियों का जोड़ा निकाल लिया।

"ये हथकड़ियाँ सज्जाद के हाथों में डाल दो!"

“क्या....!" सज्जाद पूरे गले से चीख़ कर खड़ा हो गया।

“फ़ैयाज़....! सज्जाद को हथकड़ियाँ लगा दो।"

"क्या बकवास है?” फ़ैयाज़ झुंझला गया।

“ख़बरदार सज्जाद! अपनी जगह से हिलना नहीं।' इमरान ने रिवॉल्वर का रुख़ सज्जाद की तरफ़ कर दिया।"

“इमरान मैं बहुत बुरी तरह पेश आऊँगा।'' फ़ैयाज़ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। ___

“फ़ैयाज़ मैं तुम्हें हुक्म देता हूँ....मेरा ताल्लक सीधे होम डिपार्टमेंट से है और डायरेक्टर जनरल के अलावा सी.बी.आई. का हर अफ़सर मेरे मातहत है....चलो, जल्दी करो!"

इमरान ने अपना सरकारी आई कार्ड जेब से निकाल कर फ़ैयाज़ के सामने डाल दिया।

फ़ैयाज़ के चेहरे पर सचमुच हवाइयाँ उड़ने लगीं। उसके हाथ काँप रहे थे। आई कार्ड मेज़ पर रख कर वह सज्जाद की तरफ़ बढ़ा और हथकड़ियाँ उसके हाथों में डाल दीं।

"देखा आपने?" सलीम ने शौकत की तरफ़ देख कर पागलों की तरफ़ कहक़हा लगाया।

"ख़ुदा नाइन्साफ़ नहीं है!” शौकत के होंटों पर थोड़ी-सी मुस्कुराहट फैल गयी।

__ “तुम इधर देखो सलीम!” इमरान ने उसे मुखातिब किया! “तुमने किसके डर से जेल में पनाह ली थी?"

“जिसके हाथों में हथकड़ियाँ हैं। यह यक़ीनन मुझे मार डालता....हम जानते थे कि वह वाइरस हमारी लेबोरेटरी से इसी ने चुराये हैं, लेकिन हमारे पास कोई सबूत नहीं था....अक्सर लोग हमारी लेबोरेटरी में आते रहे हैं। एक दिन यह भी आया था....वाइरस पर बात छिड़ गयी थी....मैंने कई वाइरस भी दिखाये उनमें वो वाइरस भी थे जो सौ फ़ीसदी शौकत साहब की ईजाद हैं। फिर एक हफ़्ते के बाद ही वाइरस का डिब्बा अचानक लेबोरेटरी से ग़ायब हो गया। उससे तीन ही दिन पहले कॉलेज के साइन्स के स्टूडेंट्स हमारी लेबोरेटरी देखने आये थे....हमारा ख़याल उन्हीं की तरफ़गया....लेकिन जब गायब होने के चौथे ही दिन जमील साहब और नीले परिन्दे की कहानी मशहूर हुई तो मैंने शौकत साहब को बताया कि एक दिन सज्जाद भी लेबोरेटरी में आया था। फिर उसी शाम को हमारी लेबोरेटरी में तीन मुर्दा परिन्दे पाये गये। वो बिलकुल उसी किस्म के थे जिस किस्म के परिन्दे का बयान अख़बारों में किया गया था। हमने उन्हें आग में जला कर राख कर दिया और फिर यह बात साफ़ हो गयी कि सज्जाद यह जुर्म शौकत साहब के सिर थोपना चाहता है। दूसरी शाम किसी अनजान आदमी ने मझ पर गोली चलायी। मैं बाल-बाल बचा। शौकत साहब ने मुझे मशविरा दिया कि मैं किसी महफूज़ मुकाम पर चला जाऊँ ताकि वे इत्मीनान से सज्जाद के ख़िलाफ़ सबूत इकट्टा कर सकें। मेरा दावा है कि मुझ पर सज्जाद ही ने हमला किया था। सिर्फ इसलिए कि मैं किसी से यह कहने के लिए ज़िन्दा न रहूँ कि सज्जाद भी कभी लेबोरेटरी में आया था और उसे वो वाइरस दिखाये गये थे।"

"बकवास है!” सज्जाद चीख़ा। “मैं कभी लेबोरेटरी में नहीं गया था।"

“तुम ख़ामोश रहो! फ़ैयाज़ उसे ख़ामोश रखो!' इमरान ने कहा फिर सलीम से बोला। “बयान जारी रहे।"

सलीम कुछ पल ख़ामोश रह कर बोला। “शौकत साहब ने सिर्फ मेरी ज़िन्दगी की हिफ़ाज़त के ख़याल से मुझ पर चोरी का इल्ज़ाम लगा कर गिरफ़्तार करा दिया....लेकिन सज्जाद ने मेरा वहाँ भी पीछा न छोड़ा....एक अंग्रेज़ लड़की वहाँ पहुँची जो शायद सज्जाद ही की भेजी हुई थी और मुझे बेकार में गुस्सा दिलाने लगी ताकि मैं झल्ला कर अपने जेल आने का राज़ उगल दूँ।"

“खैर....खैर....आगे कहो!" इमरान बड़बड़ाया। वह समझ गया कि उसका इशारा रूशी की तरफ़ है।

“फिर पता नहीं क्यों और किस तरह मेरी ज़मानत हुई....ज़ाहिर है कि उस अनहोनी बात ने मुझे बदहवास कर दिया और मैंने उसी तरफ़ का रुख किया, लेकिन कोई मेरा पीछा कर रहा था....कोठी के पास पहुँच कर उसने एक फ़ायर भी किया। लेकिन मैं फिर बच गया। यहाँ बाग़ में अँधेरा था....मैं लेबोरेटरी के करीब पहुँचा....शौकत साहब समझे शायद मैं वही आदमी हूँ जो आये दिन लेबोरेटरी में मुर्दा परिन्दे डाल जाया करता था....उन्होंने उसी के धोखे में मझ पर फ़ायर कर दिया!"

“क्यों?' इमरान ने शौकत की तरफ़ देखा।

"हाँ, यह बिलकुल सही है....! सज्जाद यह चाहता था कि किसी तरह उन परिन्दों पर चचा साहब की भी नज़र पड़ जाये और वे मुझे ही मुजरिम समझने लगें। वैसे उन्हें थोड़ा-बहुत शक तो पहले भी था!"

इमरान ने जावेद मिर्जा की तरफ़ देखा। लेकिन जावेद मिर्जा ख़ामोश रहा।

“क्या बकवास हो रही है....ये सब पागल हो गये हैं!" सज्जाद गला फाड़ कर चीख़ा।

“अरे बदबख़्तो! अन्धो! मेरे साथ चल कर मेरी लड़की सईदा की हालत देखो। वह भी उसी बीमारी में फँस गयी है। क्या मैं अपनी बेटी पर भी उस किस्म के वाइरस....या ख़ुदा....ये सब पागल हैं।"

अचानक शौकत हँस पड़ा....

"खूब!'' उसने कहा। “तुम्हें बेटी या बेटे से क्या सरोकार तुम्हें तो दौलत चाहिए। दोनों कोढ़ियों की शादी कर दो। वो दोनों एक-दूसरे को पसन्द करेंगे। दूसरी हरकत तुमने सिर्फ अपनी गर्दन बचाने के लिए की है।"

“नहीं, सज्जाद! तुम कुछ ख़याल न करना।” इमरान मुस्कुरा कर बोला। “दूसरी हरकत मेरी थी।"
 
Back
Top