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चट्टानों में आग ( एक थ्रिलर उपन्यास )

Dusre din Colonel Pratap ki kothi ki compound me CIB ke DSP ki gaadi khadi dikhayi di......aur wo andar colonel ka statement le raha tha. Imran ne raat hi me colonel ko achhi tarah pakka kar liya tha. Iss samay colonel ne wahi sab kuchh duhraaya tha jo usay Imran ne sikha diya tha. Usne DS ko bataya ki usay bhi rahassyamayi Shifton ka letter mila tha.....aur wo kewal usi ke dar se chhup gaya tha. Phir usne DSP ke cross ka uttar dete huye kaha ki wo iss se pahle bhi ek baar Shifton ka shikar ho chuka hai.,,,,aur uss samay usay 5 lacs rupees se hath dhone pade the. Lekin usay aaj tak ye nahin pata chal saka ki Shifton kisi ek vyakti ka naam hai ya ek giroh ka.

Anyway colonel ne Li yo Ka aur uske maamlaat ki hawa bhi nahin lagne di. Pichhli raat ki ghatnaaon ke sambandh me usne bayan diya ki Shifton ke aadmi uspar aur uski beti ko torture kar ke 50 lac rupees ka demand kar rahe the......tabhi us imarat me ek dhamaka hua.....Shifton ke aadmi badhawaas huye aur iss prakar unhen nikal bhaagne ka mauka mil gaya. Aur chunki uska secretary Imran pahle hi se Komal ki talash me udhar ke chakkar kaat raha tha....isliye usne turant uski madad ki.

Pata nahin DSP uske bayaan se santust hua ya nahin.....anyway....phir wo aur adhik der wahaan nahin ruka. Komal abhi tak bhaybheet thi. Usne Imran se puchha...."Imran sahab ab kya hoga?"

"Ab gaana naachna sabhi kuchh hoga....tum bilkul chinta mat karo..."

"Kya aap ne sach much bomb pheka tha?"

"Arre....tauba tauba...." Imran apna muhh peet kar bola..."Aisi baaten muhh se nahin nikaaliye warna....meri mummy mujhe ghar se nikal dengi."

Komal phir kuchh kahne waali thi ki colonel ne apne kamre se Imran ko awaaz di. Imran Komal ko wahin chhod kar colonel ke kamre me chala gaya. Colonel akela tha. Usne imran ke bhitar aate hi kamre ka darwaaza band kar diya.

"Idhar dekho...." Colonel ne mez ki taraf ishara kia......jis par ek bada sa khanjar pada hua tha.

"Shayad Li yo Ka ki taraf se dhamki?" Imran muskurakar bola.

"By Godd.....tum genius ho..." colonel ne uske kandhe par hath rakh kar kaampti huyi aawaz me kaha. "Haan....Li yo Ka ki taraf se ek khula khat....aur woh khanjar iss kamre me.....mujhe hairat hai ki inhen kon laaya."

Imran ne aage badh kar khat table se utha liya.....khat ke matter ke niche "Li yo Ka" likha hua tha. Imran unchi awaaz me khat padhne laga....

"Colonel Pratap....tumhen kewal ek awasar aur diya jaata hai.....ab bhi soch lo.....warna tumhara ek bhatija kal sham tak qatle kar diya jaayega.....chaahe tum usay kahin chhupa do.....ispar bhi tumhen hosh na aaya to phir apni ladki ki lash dekhoge.....agar tum papers waapas karne par taiyar ho to aaj 5 baje sham tak ek gas bhara hua laal gubbaara apni kothi ki compound se udaa dena."

Khat khatam kar ke Imran colonel ki taraf dekhne laga.

Clonel Dixon mujh se asli baat jaanna chaahta hai." Colonel Pratap ne kaha...."Usay Shifton waali kahani par vishwas nahin aaya. Samajh me nahin aata ki ye Shifton kon hai.....aur kahan se aa tapka." "Shifton....." Imran muskura kar bola...."Kuchh bhi nahin hai....isay Li yo Ka ki kewal ek simple si chaal kah lijiye. Usne ye harkat kewal isliye ki hai ki aap police ki madad na haasil kar saken. Zara is tarah sochiye.....shahar ke saare bade bade log police se kisi Shifton ki shikayat karte hain.....achanak aap bhi police ki madad maangte hain aur aap Li yo Ka ki kahani sunaate hain....parinam spasht hai ki police Shifton aur Li yo Ka donon ko bakwas samjhegi. is se aap madad ki bajaaye yahi jawaab paayenge ki shahar ke kisi shararati vyakti ne logon ko pareshan karne ke liye ye saara dhong rachaaya hai......kyon....kya main galat kah raha hun?"

"tum thik kah rahe ho." Colonel kuchh sochta hua bola."Magar ab meri akal jawaab de rahi hai. Samajh me anhin aata ki Dixon se kya kahun. Ham donon kitne saal tah ham-niwaala aur hum-pyala rahe hain. Hamaare bich kabhi koi raaz raaz nahin raha."

"Mera vichar hai ki ab aap sab kuchh usay bata dijiye.....aur ham sab ek jagah baith kar aapas me mashwara karen......ghar bhar ko ikattha kar lijiye."

"Iss se kya hoga?"

"Ho sakta hai ki ham me se koi ek sahi suggestion de sake,"

"Kabhi sochta hun ki kyon na kaagzaat police ke hawaale kar dun." Colonel apni peshaani ragadta hua bola.

"Is sthiti me aap Li yo Ka ke intaqaam se nahin bach sakenge."

"Yahi soch kar to rah jaata hun." Colonel ne kaha...."Lekin Imran bete....mujhe vishwaas hai ki papers waapas kar dene ke baad bhi main na bach sakunga."

"Na kewal aap balki wo sab bhi khatre me pad jaayenge jo iss samay aapka sath de rahe hain." Imran kuchh sochta hua bola.

"Phir main kya karun?"

"Jo kuchh main kahun wo kijiyega....?"

"Karunga..."

"To bas aap khamoshi dhaaran kijiye.....main naukaron ke alaawa ghar ke saare logon ko ikattha kar ke un se mashwera karunga......waise is bich aap chaahen to wo filmi song gaa sakte hain......kya bol the uske.....haan....dil leke chale to na jaaoge......ho raaja jee.....ho raaja jee...."

Kya behoodagi hai?" Colonel ne jhalla kar kaha......phir achanak hasne laga.

(........Jaari)
 
कोठी के करीब पहुँच कर इमरान अपने नथुने इस तरह सिकोड़ने लगा जैसे कुछ सूंघने की कोशिश कर रहा हो। फिर वह अचानक चलते-चलते रुक कर ख़ालिद की तरफ़ मुड़ा।

'क्या आप भी किसी किस्म की बू महसूस कर रहे हैं?' उसने पूछा।

'हाँ, महसूस तो कर रहा हूँ! कुछ मीठी मीठी-सी बू! शायद यह सड़ते हुए शहतूतों की बू है।'

__ 'हरगिज़ नहीं!' वह कोठी की तरफ़ दौड़ता हुआ चला गया...फिर पिछले दरवाज़े में दाखिल होते ही दोबारा उछल कर बाहर आ गया। इतने में ख़ालिद और बारतोश भी उसके करीब पहुँच गये।

'क्या बात है?' ख़ालिद ने घबराए हुए लहजे में पूछा।

'अन्दर कुछ गड़बड़ ज़रूर है।' इमरान आहिस्ता से बोला, 'नहीं, अन्दर मत जाओ वहाँ सिंथेलिक गैस भरी हुई है!...यह मीठी-मीठी-सी बू उसी की है?'

'सिंथेलिक गैस!' ख़ालिद बड़बड़ाया। यह क्या बला है।'

'जेहन को कुछ देर के लिए सुन्न कर देने वाली गैस। मेरा ख़याल है कि अन्दर कोई भी होश में न होगा।' इमरान बोला।

अचानक उन्होंने एक चीख़ सुनी और साथ ही कर्नल डिक्सन इमारत के पिछले दरवाज़े से उछल कर नीचे आ रहा। वह बेचैनी से अपने हाथ-पैर पटक रहा था। उसका चेहरा सुर्ख हो गया था और आँखों और नाक से पानी बह रहा था।

खालिद ने उससे कुछ पूछना चाहा लेकिन इमरान जल्दी से हाथ उठा कर बोला

'कुछ पूछने का वक़्त नहीं है। हमें अन्दर वालों के लिए कुछ करना चाहिए, वरना मुमकिन है उनमें से कोई मर ही जाये। फिर उसने बारतोश को वहीं ठहरने को कहा और ख़ालिद को अपने पीछे आने का इशारा करके बेतहाशा दौड़ने लगा। वे दोनों चक्कर काट कर कोठी के बाहरी बरामदे में आये। यहाँ बू और ज़्यादा तेज़ थी। इमरान ने अपनी नाक दबायी और तीर की तरह अन्दर घुसता चला गया। ख़ालिद ने भी उसका पीछा किया। लेकिन थोडी ही दर चलने के बाद उसका दम घटने लगा। वह पलटने के बारे में सोच ही रहा था कि उसने इमरान को देखा जो किसी को पीठ पर लादे हुए वापस आ रहा था। ख़ालिद एक तरफ़ हट गया और फिर वह भी उसी के साथ बाहर चला गया।

इमरान ने बेहोश आरिफ़ को बाहर बाग़ में डालते हुए कहा, 'यार, हिम्मत करो। उन सब की ज़िन्दगियाँ ख़तरे में हैं। क्या तुम दस-पाँच मिनट साँस नहीं रोक सकते?'

फिर किसी-न-किसी तरह उन्होंने एक-एक करके उन सबको कोठी से निकाला, मगर सोफ़िया उनमें नहीं थी। इमरान ने पूरी कोठी का चक्कर लगा डाला, लेकिन सोफ़िया कहीं न मिली।

उन्हें होश में लाने और कोठी का वातावरण साफ़ होने में तकरीबन दो घण्टे लग गये।

उनमें से किसी ने भी कोई ढंग की बात न बतायी। किसी को इसका एहसास नहीं हो सका था कि वह सब क्यों और किस तरह हुआ।

'इमरान साहब।' खालिद बड़े गुस्से में बोला, 'पानी सिर से ऊँचा हो चुका है। अब आपको बताना ही पड़ेगा। यह वाकया इतना पेचीदा भी नहीं है कि मैं कुछ समझ ही न सकूँ। आख़िर कर्नल की साहबज़ादी कहाँ गायब हो गयीं?'

_ 'अगर तुम समझ गये हो तो मुझे बता दो! मैं तो कुछ नहीं जानता।' इमरान ने उम्मीद के ख़िलाफ़ बड़े ख़ुश्क लहजे में कहा।

‘या तो यह खुद साहबज़ादी ही की हरकत है या फिर किसी और की जो इस तरह उन्हें उठा ले गया।' खालिद बोला।

'उसे शिफ़्टेन ले गया।' इमरान ने कहा।

'तो आख़िर अब तक वक्त बर्बाद करने की क्या ज़रूरत थी?' ख़ालिद झुंझला गया।

'वक़्त की बर्बादी से तुम्हारा क्या मतलब है?' इमरान ने ख़ुश्क लहजे में पूछा।

'जब मैं ने शिफ़्टेन के बारे में पूछा था तो आपने कहा था कि नहीं जानता। फिर आपने इस सिलसिले में उसका नाम क्यों लिया?'

'तो फिर क्या शहंशाह बाऊडाई का नाम लेता?' 'देखिए, आप ऐसी सूरत में भी मामले को उलझाने से बाज नहीं आ रहे!'

'यार, मैं हूँ कौन।' इमरान गर्दन झटक कर बोला, 'तुम सरकारी आदमी हो। इस सिलसिले में हम लोगों के बयान नोट करो। कुछ तसल्ली-दिलासे दो। मुझ पर चन्द पर्दानशीन औरतों ने हमला किया। इसका हाल भी लिखिए, वगैरह, वगैरह।'

'मैं आपको अपने साथ ऑफ़िस ले चलना चाहता हूँ।' ख़ालिद बोला।

'देखो दोस्त, मैं वक़्त बर्बाद करने के लिए तैयार नहीं।' __'मुझे कोई सख़्त कदम उठाने पर मजबूर न कीजिए।' ख़ालिद का लहजा कुछ तेज़ हो गया।

'अच्छा...यह बात है।' इमरान व्यग्यात्मक अन्दाज़ में बोला, 'क्या कर लेंगे जनाब! क्या इस कोठी के किसी फ़र्द ने आपसे मदद तलब की है। आप हमारे मामलों में दखल देने वाले होते ही कौन हैं?'

दूसरे लोग सोफ़ों पर ख़ामोश पड़े उनकी गुफ़्तगू सुन रहे थे। किसी में भी इतनी ताकत नहीं रह गयी थी कि कुछ कहने के लिए ज़बान हिला सकता। उनकी हालत बिलकुल तमाशाइयों जैसी थी। इन्स्पेक्टर ख़ालिद ने उन पर एक उचटती-सी नज़र डाली और इमरान से बोला, 'इमरान साहब! मुझे कैप्टन फ़ैयाज़ का ख़याल है...वरना!' __
 
अचानक बारतोश ने हस्तक्षेप किया। उसने अंग्रेज़ी में कहा, 'लड़की के लिए तुम लोग क्या कर रहे हो? यकीनन यह उन्हीं बदमाशों की हरकत लगती है।' ___

'हाँ माई डियर मिस्टर ख़ालिद।' इमरान सर हिला कर बोला, 'फ़िलहाल हमें देखना चाहिए कि सोफ़िया कहाँ गयी?'

ख़ालिद कुछ न बोला। इमरान कमरे से बरामदे में आ गया। ख़ालिद ने उसका अनुसरण किया। ___

ऐसी जगह, जहाँ आबादी न हो, मकान बनाना बहुत बुरा है,' बारतोश ने कहा,

जो दरवाज़े में खड़ा चारों तरफ़ देख रहा था।

अचानक इमरान बरामदे से उतर कर एक तरफ़ चलने लगा। फिर वह गुलाब की झाड़ियों के पास रुक कर झुका।

यह एक काले रंग का ज़नाना सैंडिल था जिसने उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था।

खालिद और बारतोश भी उसके करीब पहुँच गये। 'ओह...यह तो लड़की ही का मालूम होता है।' ।

इमरान कुछ न बोला। उसकी नज़र सैंडिल से हट कर किसी दूसरी चीज़ पर जम गयी। फिर वह अचानक खालिद की तरफ़ मुड़ा।

'तुम तो सोनागिरी के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ होगे।' उसने ख़ालिद से पूछा।

'न सिर्फ सोनागिरी, बल्कि आस-पास के इलाके पर भी मेरी नज़र है।' ख़ालिद ने कहा, लेकिन उसका लहजा सहज नहीं था।

'क्या यहाँ कोई ऐसा इलाका भी है जहाँ की मिट्टी लाल रंग की हो?'

खालिद सोच में पड़ गया। कुछ देर बाद उसने कहा, 'आप यह क्यों पूछ रहे हैं?'

इमरान ने ज़मीन से लाल चिकनी मिट्टी का एक टुकड़ा उठाया, जिसमें थोड़ी नमी भी मौजूद थी। ___

'मेरा ख़याल है।' उसने कहा, 'यह मिट्टी किसी जूते के सोल और एड़ी की बीच की जगह में चिपकी हुई थी और यहाँ कम-से-कम दो-दो मील के घेरे में मैंने कहीं नर्म ज़मीन नहीं देखी। इसे देखो, इसमें अब भी नमी बाकी है।

ख़ालिद ने उसे अपने हाथ में ले कर उलटते-पलटते हुए कहा, 'पलटन के पड़ाव के इलाके में एक जगह ऐसी नर्म ज़मीन मिलती है। वहाँ दरअस्ल एक छोटी-सी नदी भी है। उसके किनारे की ज़मीन...उसकी मिट्टी में हमेशा नमी मौजूद रहती है।'

'क्या वह कोई सुनसान जगह है?'

‘सुनसान नहीं कह सकते, कम आबाद ज़रूर है। वहाँ ज़्यादातर ऊँचे तबके के लोग आबाद हैं।'

'क्या तुम मुझे अपनी मोटर साइकिल पर वहाँ ले चलोगे?' 'हो सकता है।' ख़ालिद ने सोचते हुए कहा।

'अच्छा तो ठहरो!' इमरान ने कहा और कोठी के अन्दर चला गया। उसने अनवर को सम्बोधित किया जो एक सोफे पर पड़ा अफ़ीमचियों की तरह ऊँघ रहा था।

'सुनो! मैं सोफ़िया की तलाश में जा रहा हूँ। तुम अगर अपनी जगह से हिल न सको तो पुलिस को फ़ोन पर इस वाकये की ख़बर दे देना। लेकिन ये नौकर कहाँ मर गये?'

‘बाहर हैं।' अनवर ने कमज़ोर आवाज़ में कहा, 'सुबह ही वे शहर गये थे। अभी तक वापस नहीं आये।'

कर्नल ज़रगाम का यह उसूल था कि वह हफ़्ते में एक दिन अपने नौकरों को आधे दिन की छुट्टी देता था।

इमरान चन्द लम्हे खड़ा सोचता रहा। फिर उस कमरे में चला आया जहाँ उसका सामान रखा हुआ था। उसने जल्दी से सूटकेस से कुछ चीजें निकालीं और उन्हें जेबों में ठूसता हुआ बाहर निकल गया।

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आसमान में सुबह ही से सफ़ेद बादल तैरते फिर रहे थे और इस वक़्त तो सूरज की एक किरन भी यादों के किसी कोने से नहीं झाँक रही थी। मौसम काफ़ी सुहावना था।

इन्स्पेक्टर ख़ालिद की मोटर साइकिल पलटन पड़ाव की तरफ़ जा रही थी। इमरान कैरियर पर बैठा ऊँघ रहा था और उसके चेहरे पर गहरी सोच के निशान थे। चेहरे से सादगी गायब हो चुकी थी। पलटन पड़ाव के करीब पहुँचते-पहुँचते ख़ालिद ने मोटर साइकिल की रफ़्तार कम कर दी।

'आख़िर हम वहाँ जा कर उन्हें ढूँढेंगे किस तरह?' ख़ालिद ने इमरान से कहा। 'ओफ़्फ़ोह! यह एक सी.आई.डी. इन्स्पेक्टर पूछ रहा है?' 'इमरान साहब! इस मौके पर मुझे आपसे संजीदगी की उम्मीद है।'

'आहा...किसी-न-किसी ने ज़रूर कहा होगा कि दुनिया उम्मीद पर कायम है। वैसे इस इलाके में कोई ऐसा होटल भी है जिसमें निचले तबके के लोग बैठते हों...अगर ऐसा कोई होटल हो तो मुझे वहाँ ले चलो।'

इन्स्पेक्टर ख़ालिद ने मोटर साइकिल एक पतली-सी सड़क पर मोड़ दी, लेकिन अचानक इमरान ने उसे रुकने को कहा।

खालिद ने जल्दी से मोटर साइकिल रोक दी, क्योंकि इमरान के लहजे में उसे घबराहट की झलक महसूस हुई थी। यह सुहावनी जगह थी। सड़क के दोनों तरफ़ समतल ज़मीन थी और वहाँ फूलों के बाग़ नज़र आ रहे थे। पलटन पड़ाव के उस हिस्से की गिनती सैरगाहों में होती थी।

खालिद ने मोटर साइकिल रोक कर अपने पैर सड़क पर टिका दिये।

यकायक उसने मशीन भी बन्द कर दी और फिर वह यह भल गया कि मोटर साइकिल इमरान ने रुकवायी थी। उसने दाहिनी तरफ़ के एक बाग़ में एक लड़की देख ली थी जो उसे आकर्षित करने के लिए रूमाल हिला रही थी। ख़ालिद मोटर साइकिल से उतरता हुआ बोला, 'इमरान साहब ज़रा ठहरिए।'

'क्या वह तुम्हारी जान-पहचान वाली है?' इमरान ने मुस्कुरा कर पूछा। ‘जी हाँ!...' ख़ालिद हँसता हुआ बोला।

'बहुत अच्छा! तुम जा सकते हो। मगर मोटर साइकिल अकेली रह जायेगी।' इमरान ने कहा और बायीं तरफ़ के बाग़ों पर नज़र दौड़ाता हआ बोला, 'मैं उधर जाऊँगा...उधर मेरी ममदूहा...शायद मैं ग़लत कह रहा हूँ...क्या कहते हैं उसे जिससे मोहब्बत की जाती है।'

'महबूबा।'

'महबूबा...महबूबा!...इधर मेरी महबूबा...अच्छा...तो मैं चला।' इमरान मोटर साइकिल के कैरियर से उतरता हुआ बोला।

बायीं तरफ़ के एक बाग़ में उसे कुछ ऐसी शक्लें दिखाई दी थीं जिन्होंने अचानक उसके जेहन में उस रात की याद ताज़ा कर दी जब सोफ़िया को ऑरेंज स्क्वॉश में कोई नशीली दवा दी गयी थी। उनमें से एक को तो उसने बखूबी पहचान लिया। यह वही था जिसकी टक्कर वेटर से हुई थी। दो आदमियों के बारे में उसे सन्देह था। वह यक़ीन के साथ नहीं कह सकता था कि ये दोनों उस सब-इन्स्पेक्टर के साथी थे या नहीं जिसने सुनसान सड़क पर उनकी कार रुकवा कर किसी बेहोश लड़की के बारे में पूछा था।

इमरान उन्हें देखता रहा। वे चार थे। उनके साथ कोई औरत नहीं थी। इमरान बाग़ के रखवाले से खूबानियों और सेबों की पैदावार के बारे में गुफ़्तगू करने लगा।

सोफ़िया आँखें फाड़-फाड़ कर चारों तरफ़ देख रही थी, लेकिन उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहाँ है। कमरा आलीशान ढंग से सजा था और वह एक आरामदेह बिस्तर पर पड़ी हुई थी। उसने उठना चाहा, मगर उठ न सथी उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके जिस्म में जान ही न रह गयी हो। ज़ेहन काम नहीं कर रहा था। उस पर दोबारा बेहोशी छा गयी और फिर दूसरी बार जब उसकी आँख खुली तो दीवार पर लगी घड़ी में आठ बज रहे थे। सिरहाने रखा हुआ टेबल लैम्प रौशन था।

इस बार वह पहली ही कोशिश में उठ बैठी। थोड़ी देर सिर पकड़े बैठी रही। फिर खड़ी हो गयी। लेकिन इस शिद्दत से चक्कर आया कि उसे सँभलने के लिए मेज़ का कोना पकड़ना पड़ा...सामने का दरवाज़ा खुला हुआ था। वह बाहर जाने का इरादा कर ही रही थी कि एक आदमी कमरे में दाखिल हुआ।

'आप को कर्नल साहब याद फ़रमा रहे हैं।' उसने बड़े अदब से कहा। 'क्या? डैडी!' सोफ़िया ने हैरान हो कर पूछा। 'जी हाँ!'

कमज़ोरी के बावजूद सोफ़िया की रफ़्तार काफ़ी तेज़ थी और उस आदमी के अन्दाज़ से ऐसा मालम हो रहा था जैसे वह उसी की वजह से जल्दी-जल्दी कदम उठा रहा है।

वे कई बरामदों से गुज़रते हुए एक बड़े कमरे में आये और फिर वहाँ सोफ़िया ने जो कुछ देखा वह उसे अधमरा कर देने के लिए पर्याप्त था।

उसने कर्नल ज़रग़ाम को देखा जो एक कुर्सी से बँधा हुआ था और उसके गिर्द चार आदमी खड़े उसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे।

'तुम,' अचानक कर्नल चीख़ पड़ा। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन हिल न सका। उसे मज़बूती से बाँधा गया था।

वे दोनों ख़ामोशी से एक-दूसरे की तरफ़ देखते रहे।

अचानक भारी जबड़ों वाला एक आदमी बोला, 'कर्नल तुम ली यूका से टकराने की कोशिश कर रहे हो। ली यूका...जिसे आज तक किसी ने भी नहीं देखा...!''

कर्नल कुछ न बोला। उसकी आँखें सोफ़िया के चेहरे से हट कर झुक गयी थीं। भारी जबड़ों वाला फिर बोला, 'अगर तुमने काग़ज़ात वापस न किये तो तुम्हारी आँखों के सामने इस लड़की की बोटियाँ काट दी जायेंगी। एक-एक बोटी...क्या तुम इसके तड़पने का मंजर देख सकोगे!'

'नहीं!' कर्नल बेसाख़्ता चीख़ पड़ा। उसके चेहरे पर पसीने की बँदें फूट आयी थीं।

सोफ़िया खड़ी काँपती रही। उसका सिर दोबारा चकराने लगा था। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे कमरे की रोशनी पर गर्द की तहें चढ़ती जा रही हों। और फिर उस आदमी ने, जो उसके साथ आया था, आगे बढ़ कर उसे सँभाल लिया। वह बेहोश हो चुकी

थी। _ 'उसे आराम-कुर्सी में डाल दो।' भारी जबड़ों वाले ने कहा। फिर कर्नल से बोला, 'अगर तुम्हें अब भी होश न आये तो इसे तुम्हारी बदकिस्मती समझना चाहिए।'
 
कर्नल उसे चन्द लम्हे घूरता रहा। फिर अपना ऊपरी होंट भींच कर बोला, 'उड़ा दो उसकी बोटियाँ! मैं कर्नल ज़रग़ाम हूँ...समझे!...तुम्हें काग़ज़ात का साया तक नसीब नहीं होगा।'

भारी जबड़ों वाले ने कहकहा लगाया।

‘कर्नल! तुम ली यूका की ताक़त से वाकिफ़ होने के बावजूद बच्चों की-सी बातें कर रहे हो।' उसने कहा, 'ली यूका ने तुम्हें कहाँ से खोद निकाला है। वैसे तुम ऐसी जगह पर छुपे थे जहाँ फ़रिश्ते भी पर नहीं मार सकते थे...वह ली यूका ही की ताक़त थी जो दिन-दहाड़े तुम्हारी लड़की को यहाँ उठा लायी...मैं कहता हूँ, आख़िर वह काग़ज़ात तुम्हारे किस काम के हैं?...यकीन जानो तुम उनसे कोई फायदा नहीं उठा सकते। वैसे तुम अक्लमन्द ज़रूर हो कि तुमने अभी तक वे काग़ज़ात पुलिस के हवाले नहीं किये...मुझे बताओ तुम चाहते क्या हो!'

___ 'मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहता। तुम्हारा जो दिल चाहे कर लो!' कर्नल गुर्राया।

‘अच्छा।' भारी जबड़े वाले ने अपने एक आदमी को इशारा करते हुए कहा, 'उस लड़की के पैर का अंगूठा काट दो!'

उस आदमी ने मेज़ पर से एक चमकदार कुल्हाड़ी उठायी और बेहोश सोफ़िया की तरफ़ बढ़ा।

'ठहरो!' अचानक एक गरजदार आवाज़ सुनाई दी। ‘ली यूका आ गया।'

साथ ही एक ज़ोरदार धमाका भी हुआ और सामने वाली दीवार पर आँखों को चुंधिया देने वाली चमक दिखाई दी। सारा कमरा धुएँ से भर गया। सफ़ेद रंग का गहरा धुआँ जिसमें एक बालिश्त के फ़ासले की चीज़ भी नज़र नहीं आ रही थी।

धड़ाधड़ फ़र्नीचर उलटने लगा। कर्नल ज़रग़ाम की भी कुर्सी उलट गयी। लेकिन उसे इतना होश था कि उसने अपना सिर फ़र्श से न लगने दिया। कमरे के दूसरे लोग नींद से चौंकते हुए कुत्तों की तरह शोर मचा रहे थे। अचानक कर्नल कुर्सी छोड़ कर खड़ा हो गया। कोई उसका हाथ पकड़े हुए उसे एक तरफ़ खींच रहा था। कर्नल धुएँ की घुटन की वजह से इतना बदहवास हो रहा था कि उस अज्ञात आदमी के साथ खिंचता चला गया।

और फिर थोड़ी देर बाद उसने खुद को ताज़ा हवा में महसूस किया। उसके सिर पर खुला हुआ और तारों-भरा आसमान था। उसने अँधेरे में उस आदमी को पहचानने की कोशिश की जो उसका हाथ पकड़े हुए तेज़ी से ढलान में उतर रहा था। उसने अपने कन्धे पर किसी को लाद रखा था। इसके बावजूद उसके क़दम बड़ी तेज़ी से उठ रहे थे।

'तुम कौन हो?' कर्नल ने भर्रायी हुई आवाज़ में पूछा। ‘अली इमरान, एम.एस.सी, पी-एच.डी.,' जवाब मिला। 'इमरान...!' ‘शश...चुपचाप चले आइए!'

वे जल्दी ही चट्टानों में एक सुरक्षित जगह पर पहुँच गये। ये चट्टानें कुछ इस किस्म की थीं कि उनमें घण्टों तलाश करने वालों को चक्कर दिया जा सकता था।

इमरान ने बेहोश सोफ़िया को कन्धे से उतार कर एक पत्थर पर लिटा दिया। 'क्यों!...क्या है?' कर्नल ने पूछा। 'ज़रा एक च्यूइंगम खाऊँगा।' इमरान ने अपनी जेबें टटोलते हुए कहा!...

'अजीब आदमी हो...अरे, वह इमारत यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं है।' कर्नल घबराये हुए लहजे में बोला। _ 'इसीलिए तो मैं रुक गया हूँ। लगे हाथों ये तमाशा भी देख लूँ! क्या यहाँ से फ़ायर स्टेशन नज़दीक है।'

'क्या वहाँ आग लग गयी है?' कर्नल ने पूछा।

‘जी नहीं! ख़ामख़ा बात का बतंगड़ बनेगा। वह तो सिर्फ धुएँ का एक मामूली-सा बम था। ज़रा देखिएगा धुएँ का बादल...'

कर्नल ने इमारत की तरफ़ नज़र डाली। उसके ऊपरी हिस्से पर धुएँ का घना बादल मॅडरा रहा था।

'क्या वह बम तुमने...?'

'अरे तौबा...लाहौल विला...' इमरान अपना मुँह पीटता हुआ बोला, 'मैं तो उसे टूथपेस्ट का टयूब समझे हुए था...मगर मुझे उन बेचारों पर तरस आता है, क्योंकि इमारत से बाहर निकलने के सारे रास्ते बन्द हैं। मैंने पिछली रात ख़्वाब में देखा था कि क़यामत के करीब ऐसा ज़रूर होगा। वगैरा, वगैरा।'

'इमरान! ख़ुदा की क़सम तुम हीरे हो!' कर्नल दबे हुए जोश के साथ बोला।

'ओह, ऐसा न कहिए! वरना कस्टम वाले ड्यूटी वसूल कर लेंगे।' इमरान ने कहा। लेकिन आप यहाँ कैसे आ फँसे?'

'मैं ऐसी जगह छुपा था इमरान, कि वहाँ परिन्दा भी पर नहीं मार सकता था। लेकिन उन्होंने मुझे प्लेग के चूहे की तरह बाहर निकाल लिया।'

‘गैस?' इमरान ने पूछा।

‘हाँ! मैं एक गुफा में था। उन्होंने बाहर से गैस डाल कर मुझे निकलने पर मजबूर कर दिया। लेकिन सोफ़िया यहाँ कैसे पहुँची?'

'ठहरिए।' इमरान हाथ उठा कर बोला और शायद दूर की कोई आवाज़ सुनने लगा...फिर उसने जल्दी से कहा 'इस बारे में फिर कभी बताऊँगा...उठिए...गाड़ियाँ आ गयी है।

उसने फिर सोफ़िया को उठाना चाहा। लेकिन कर्नल ने रोक दिया। वह उसे गोद में उठा कर इमरान के पीछे चलने लगा। उतराई बहुत तेज़ थी। लेकिन फिर भी वे सँभल सँभल कर नीचे उतरते रहे। फिर उन्हें पतली-सी बल खाती हुई सड़क नज़र आयी। तारों की छाँव में सड़क साफ़ दिखाई दे रही थी। अचानक नीचे से लाल रंग की रोशनी की एक किरन आ कर चट्टानों पर फैल गयी। कर्नल के मुँह से अजीब-सी आवाज़ निकली।

'ओह...फ़िक्र न कीजिए...पुलिस है!' इमरान ने कहा।

फिर जल्द ही पाँच-छ: आदमी उनकी मदद के लिए ऊपर चढ़ आये। उनमें इन्स्पेक्टर ख़ालिद भी था।

'उस इमारत में तो आग लग गयी है।' उसने इमरान से कहा।

'उन लोगों को भिजवाने का इन्तज़ाम करो।' इमरान बोला, 'और तुम मेरे साथ आओ। सिर्फ दस आदमी काफ़ी होंगे।'

फिर उसने कर्नल से कहा, 'आप बहुत कमज़ोर हो गये हैं, इसलिए इस वक़्त पुलिस को कोई बयान न दीजिएगा।

‘क्या मतलब।' ख़ालिद भन्ना कर बोला। 'कुछ नहीं प्यारे! तुम मेरे साथ आओ। आदमियों को भी लाओ।' 'सब वहीं मौजूद हैं।' ख़ालिद बोला।
 
कर्नल और सोफ़िया नीचे पहुँचाये जा चुके थे। इमरान ख़ालिद के साथ फिर उस इमारत की तरफ़ बढ़ा। जिसकी खिड़कियों से गहरा धुआँ निकल कर आकाश में बल खा रहा था। इमारत के गिर्द काफ़ी भीड़ इकट्टा हो गयी थी। ख़ालिद के आदमी जल्द ही आ मिले और इमरान उन्हें साथ ले कर अन्दर घुसता हुआ चला गया। बाहर के सारे दरवाज़े उसने पहले ही बन्द कर दिये थे, इसलिए इमारत के लोग बाहर नहीं निकल सकते थे। और बाहर वालों की अभी तक हिम्मत नहीं पड़ी थी कि इमारत में क़दम रख सकते।

इमारत में कुछ कमरे ऐसे भी थे जहाँ अभी तक धुआँ गहरा नहीं हुआ था। ऐसे कमरों में से एक में उन्हें पाँचों आदमी मिल गये थे। वे सब पसीने में नहाये हुए बुरी तरह हॉफ रहे थे।

'क्या बात है?' इमरान ने पहुँचते ही ललकारा।

उसे देख कर उन सबकी हालत और ज़्यादा ख़राब हो यी।

‘बोलते क्यों नहीं?' इमरान फिर गरजा। उनमें से कोई कुछ न बोला। इमरान ने ख़ालिद से कहा, 'ये शिफ़्टेन के आदमी हैं...धुएँ के बम बना रहे थे। एक बम फट गया।

'बकवास है।' भारी जबड़ों वाले ने चीख़ कर कहा।

'खैर, परवाह नहीं!' ख़ालिद गर्दन झटक कर बोला, 'मैं तुम्हें अपहरण के इल्ज़ाम में हिरासत में लेता हूँ।'

_ 'यह भी एक फ़िजूल-सी बात होगी।' भारी जबड़ों वाला मुस्कुरा कर बोला, 'हमने किसी को भी छुपा कर नहीं रखा।'

'हाँ! ख़ालिद साहब!' इमरान ने मूर्खतापूर्ण अन्दाज़ में आँखें फिरा कर कहा, 'इससे काम नहीं चलेगा। ज़ोर-ज़बरदस्ती का सबूत तो शायद यहाँ से उड़ चुका है, नहीं...ये लोग बम बना रहे थे।'

'हथकड़ियाँ लगा दो!' ख़ालिद ने अपने आदमियों की तरफ़ मुड़ कर कहा। 'देखो, मुसीबत में फँस जाओगे तुम लोग!' भारी जबड़े वाला झल्ला कर बोला।

'फ़िक्र न करो।' ख़ालिद ने जेब से रिवॉल्वर निकालते हुए कहा, 'चुपचाप हथकड़ियाँ लगवा लो, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा...मैं ज़रा फ़ौजी किस्म का आदमी उन सबके हथकड़ियाँ लग गयीं। जब वे पुलिस की गाड़ी में बैठाये जा चुके तो ख़ालिद ने इमरान से कहा, 'अब बताइए, क्या चार्ज लगाया जाये उनके ख़िलाफ़?

बमसाज़ी!...आस-पास के लोगों ने धमाका ज़रूर सुना होगा...दस बारह सेर गन्धक और दो-एक जार तेज़ाब के इमारत से बरामद कर लो, समझे! बस इतना ही काफ़ी है।'

'और वो शिफ़्टेन वाला मामला?' ख़ालिद ने पूछा।

‘फ़िलहाल तुम्हारे फ़रिश्ते भी उसके लिए सबूत जुटा नहीं सकते....अच्छा, मैं चला...कम-से-कम उनकी जमानत तो होने ही न देना!'
 
दूसरी सुबह कर्नल ज़रग़ाम की कोठी के कम्पाउण्ड में गुप्तचर विभाग के डी.एस की कार खड़ी दिखाई दी। वह अन्दर कर्नल का बयान ले रहा था। इमरान ने रात ही कर्नल को अच्छी तरह पक्का कर लिया था। इस वक़्त कर्नल ने वही सब कुछ दुहराया था जो उसे इमरान ने बताया था। उसने डी.एस. को बताया कि उसे भी शिफ़्टेन का खत मिला था और वह उसी के ख़ौफ़ से उड़न-छू हो गया था। फिर उसने डी.एस. की जिरह का जवाब देते हुए बताया कि वह इससे पहले भी एक बार शिफ़्टेन का शिकार हो चुका है। उस मौके पर उसे पचास हज़ार रुपयों से हाथ धोने पड़े थे। लेकिन उसे आज तक यह न मालूम हो सका कि शिफ़्टेन किसी एक आदमी का नाम है या किसी गिरोह का।

बहरहाल, कर्नल ने ली यूका और उसके मामलात की हवा भी नहीं लगने दी। पिछली रात की घटना के बारे में उसने बयान दिया कि शिफ़्टेन के आदमी उस पर और उसकी लड़की पर हमला करके एक लाख रुपये की माँग कर रहे थे कि अचानक इमारत में एक धमाका हआ शिफ़्टेन के आदमी बदहवास हए। इस तरह उन्हें निकल आने का मौका मिल गया। चूँकि उसका सेक्रेटरी इमरान पहले ही से सोफ़िया की तलाश में उधर के चक्कर काट रहा था, इसलिए उसने फ़ौरन ही उनकी मदद थी

पता नहीं डी.एस. इस बयान से मुतमईन भी हुआ या नहीं। बहरहाल, फिर वह ज़्यादा देर तक वहाँ नहीं ठहरा।

सोफ़िया अभी तक ख़ौफ़ज़दा थी। उसने इमरान से पूछा, 'इमरान साहब! अब क्या होगा?'

‘अब गाना-नाचना सभी कुछ होगा। तुम बिलकुल फ़िक्र न करो।' इमरान ने कहा। 'क्या आपने सचमुच बम फेंका था?'

'अरे तौबा-तौबा!' इमरान अपना मुँह पीट कर बोला, 'ऐसी बातें ज़बान से न निकालिए, वरना मेरी मम्मी मुझे घर से निकाल देंगी।'

सोफ़िया फिर कुछ कहने वाली थी कि कर्नल ने अपने कमरे से इमरान को आवाज़ दी।

इमरान सोफ़िया को वहीं छोड़ कर कर्नल के कमरे में चला गया। कर्नल अकेला था। उसने इमरान के दाख़िल होते ही कमरे का दरवाज़ा बन्द कर दिया।

'इधर देखो।' कर्नल ने मेज़ की तरफ़ इशारा किया जिसपर एक बड़ा-सा खंजर पड़ा हुआ था।

'ग़ालिबन...ली यूका की तरफ़ से धमकी?' इमरान मुस्कुरा कर बोला।

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_ 'ख़ुदा की क़सम तुम बड़े ज़हीन हो।' कर्नल ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर काँपती हुई आवाज़ में कहा, 'हाँ, ली यूका की तरफ़ से एक खुला ख़त...और यह खंजर!...इस कमरे में...मुझे हैरत है कि उन्हें कौन लाया?'

इमरान ने आगे बढ़ कर ख़त मेज़ से उठा लिया। ख़त के मज़मून के नीचे ‘ली यूका' लिखा था।

इमरान ऊँची आवाज़ में ख़त पढ़ने लगा: 'कर्नल ज़रगाम! तुम्हें सिर्फ एक मौक़ा और दिया जाता है। अब भी सोच लो, वरना तुम्हारा एक भतीजा कल शाम तक कल्त कर दिया जायेगा। तुम उसे चाहे कहीं छुपा दो! इस पर भी तुम्हें होश न आया तो फिर अपनी लड़की की लाश देखोगे। अगर तुम काग़ज़ात वापस करने पर तैयार हो तो आज शाम को पाँच बजे एक गैस-भरा हुआ सुखे रंग का गुब्बारा अपनी कोठी के कम्पाउण्ड से उड़ा देना।'

ख़त ख़त्म करके इमरान कर्नल की तरफ़ देखने लगा।

'कर्नल डिक्सन मुझसे सही वाकया सुनना चाहता है।' कर्नल ने कहा, 'उसे शिफ़्टेन वाली दास्तान पर यकीन नहीं आया। समझ में नहीं आता कि शिफ़्टेन कौन है

और कहाँ से आ टपका।' ____

'शिफ्टेन...!' इमरान मुस्कुरा कर बोला 'कुछ भी नहीं है। उसे ली यूका की सिर्फ़ एक मामूली-सी चाल कह लीजिए। उसने यह हरकत सिर्फ इसलिए की है कि आप पुलिस की मदद न हासिल कर सके। ज़रा इस तरह सोचिए। शहर के सारे खाते-पीते लोग पुलिस से किसी शिफ़्टेन की शिकायत करते हैं। अचानक आप भी पुलिस से मदद माँगते हैं और आप ली यूका की दास्तान सुनाते हैं। नतीजा ज़ाहिर है पुलिस शिफ़्टेन और ली यूका, दोनों को बकवास समझेगी। उससे आप मदद की बजाय यही जवाब पायेंगे कि शहर के किसी सिरफिरे आदमी ने लोगों को परेशान करने के लिए यह सारा ढोंग रचाया है। क्यों? क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?'

'तुम ठीक कह रहे हो!' कर्नल कुछ सोचता हुआ बोला, 'मगर अब मेरी अक्ल जवाब दे रही है। समझ में नहीं आता कि डिक्सन से क्या कहूँ। हम दोनों कई साल तक हमनिवाला और हमप्याला रहे हैं। हमारे बीच में कभी कोई राज़, राज़ नहीं रहा...'

'मेरा ख़याल है कि अब आप सब कुछ उसे बता दीजिए और हम सब एक जगह पर बैठ कर आपस में मशविरा करें...घर भर को इकट्ठा कर लीजिए...'

'इससे क्या होगा?'

'हो सकता है कि उन में से कोई एक सही तदबीर सोच सके।' ___

'फिर सोचता हूँ कि क्यों न वे काग़ज़ात पुलिस के हवाले कर दूं।' कर्नल अपनी पेशानी रगड़ता हुआ बोला।

'इस सूरत में आप ली यूका के इन्तकाम से न बच सकेंगे।'

'यही सोच कर तो रह जाता हूँ।' कर्नल ने कहा, 'लेकिन इमरान बेटे, यक़ीन है कि काग़ज़ात वापस कर देने के बाद भी मैं न बच सकूँगा!' । ___

'न सिर्फ आप!' इमरान कुछ सोचता हआ बोला, 'बल्कि वे लोग भी खतरे में पड़ जायेंगे जो इस वक्त आपका साथ दे रहे हैं।'

‘फिर मैं क्या करूं।' 'जो कुछ मैं कहूँ, वह कीजिएगा?' इमरान ने पूछा। ‘करूँगा?'

'तो बस, अब ख़ामोश रहिएगा। मैं नौकरों के अलावा घर के सारे लोगों को इकट्टा करके उनसे मशविरा करूँगा। वैसे अगर इस दौरान आप चाहें तो वह फ़िल्मी गीत गा सकते हैं...क्या बोल थे उसके...हाँ...दिल ले के चले तो नहीं जाओगे हो राजा जी...हो राजा जी।'

'क्या बेहूदगी है?' कर्नल ने झल्ला कर कहा। फिर यकायक हँसने लगा।

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उसी दिन पाँच बजे शाम को एक गैस-भरा गुब्बारा कर्नल की कोठी के कम्पाउण्ड से आकाश में उड़ रहा था। कम्पाउण्ड में सभी लोग मौजूद थे और इमरान तालियाँ बजा बजा कर बच्चों की तरह हँस रहा था।

कर्नल के मेहमानों ने उसकी इस हरकत को अच्छी नज़रों से नहीं देखा। क्योंकि उन सबके चेहरे उतरे हुए थे। कर्नल ने आज दोपहर को उन सब के सामने ली यूका की दास्तान दुहरा दी थी। इस पर सबने यही राय दी थी कि उस ख़तरनाक आदमी के काग़ज़ात वापस कर दिये जायें। कर्नल डिक्सन पहले भी ली यूका का नाम सुन चुका था। यूरोप वालों के लिए यह नाम नया नहीं था। क्योंकि ली यूका का कारोबार हर महाद्वीप में फैला था। यह तिजारत सौ फ़ीसदी गैरकानूनी थी, मगर फिर भी आज तक कोई ली यूका पर हाथ नहीं डाल सका था। कर्नल डिक्सन और बारतोश ली यूका का नाम सुनते ही सफ़ेद पड़ गये थे। रात के खाने के वक्त से पहले ही ली यूका की तरफ़ से जवाब आ गया। बिलकल उसी रहस्यमय ढंग से जैसे सबह वाला पैग़ाम मिला था। आरिफ़ ने दरवाजे की चौखट में एक खंजर गड़ा हुआ देखा जिसकी नोक काग़ज़ के एक टुकड़े को छेदती हुई चौखट में घुस गयी थी। __

काग़ज़ का यह टुकड़ा दरअस्ल ली यूका का ख़त था जिसमें कर्नल को निर्देश दिया गया था कि वह दूसरे दिन ठीक नौ बजे उन काग़ज़ात को देवगढ़ी वाली मशहूर सियाह चट्टान के किसी कोने में खुद रख दे या किसी से रखवा दे। ली यूका की तरफ़ से यह भी लिखा गया था कि अगर कर्नल को किसी किस्म का भय महसस हो तो वह अपने साथ जितने आदमी भी लाना चाहे ला सकता है। अलबत्ता, किसी तरह की चालाकी की सूरत में उसे किसी तरह भी माफ़ न किया जा सकेगा।

खाने की मेज़ पर इस ख़त के सिलसिले में गर्मा-गर्म बहस छिड़ गयी। 'क्या ली यूका भूत है?' कर्नल डिक्सन की लड़की मार्था ने कहा, 'आख़िर यह ख़त यहाँ कैसे आते हैं। इसका मतलब तो ये है कि ली यूका कोई आदमी नहीं, बल्कि रूह है!'

'हाँ आँ!' इमरान सिर हिला कर बोला, 'हो सकता है। यक़ीनन यह किसी अफ़ीमची की रूह है जिसने रूहों की दुनिया में भी ड्रग्स की तस्करी शुरू कर दी है।'

‘एक तरक़ीब मेरे जेहन में है!' बारतोश ने कर्नल ज़रग़ाम से कहा, 'लेकिन बच्चों के सामने मैं इसका ज़िक्र ज़रूरी नहीं समझता!' ।

‘मिस्टर बारतोश!' इमरान बोला, 'आप मुझे तो बच्चा नहीं समझते।' 'तुम शैतान के भी दादा हो!' बारतोश अनायास मुस्कुरा पड़ा। 'शुक्रिया! मेरे पोते मुझे हर हाल में याद रखते हैं।' इमरान ने संजीदगी से कहा।

कर्नल डिक्सन उसे घूरने लगा। वह अब भी इमरान को कर्नल ज़रग़ाम का प्राइवेट सेक्रेटरी समझता था, इसलिए उसे एक छोटे आदमी का बारतोश जैसे सम्मानित मेहमान से बेतकल्लुफ़ होना बहुत बुरा लगा। लेकिन वह कुछ बोला नहीं।

खाने के बाद सोफ़िया, मार्था, अनवर और आरिफ़ उठ गये। कर्नल ज़रग़ाम बड़ी बेचैनी से बारतोश के मशविरे का इन्तज़ार कर रहा था।

'मैं एक आर्टिस्ट हूँ।' बारतोश ने ठहरे हुए लहजे में कहा, 'बज़ाहिर मुझसे इस किस्म की उम्मीद नहीं की जा सकती कि मैं किसी ऐसे उलझे हुए मामले में कोई मशविरा दे सकूँगा।'

‘मिस्टर बारतोश!' कर्नल ज़रग़ाम बेसब्री से हाथ उठ कर बोला, 'तकल्लफ़ात किसी दूसरे मौके के लिए उठा रखिए।'

___ बारतोश चन्द लम्हे सोचता रहा फिर उसने कहा, ‘ली यूका का नाम मैंने बहुत सुना है और मुझे यह भी मालूम है कि वह इस किस्म की मुहिमों में खुद भी हिस्सा लेता है। उसके बारे में अब तक मैंने जो कहानियाँ सुनी हैं, अगर वे सच्ची हैं तो फिर ली यूका को इस वक्त सोनागिरी ही में मौजूद होना चाहिए।'

'अच्छा'...इमरान अपने दीदे फिराने लगा।

'अगर वह यहीं है तो...हमें इस मौके से ज़रूर फ़ायदा उठाना चाहिए।' बारतोश ने कहा।

'मैं आप का मतलब नहीं समझा।' कर्नल बोला।

'अगर हम ली यूका को पकड़ सके तो यह इन्सानियत की एक बहुत बड़ी ख़िदमत होगी।'

कर्नल घणास्पद अन्दाज़ में हँस पड़ा, लेकिन इस हँसी में झल्लाहट का तत्व ज़्यादा था। उसने कहा, 'आप ली यूका को पकड़ेंगे? उस ली यूका को, जिसकी तहरीरें मेरी मेज़ पर पायी जाती हैं। यानी वह जिस वक़्त चाहे हम सबको मौत के घाट उतार सकता है।'

‘च्च-च्च!' बारतोश ने बुरा-सा मुंह बना कर कहा, 'आप यह समझते हैं कि ली यूका या उसका कोई आदमी कुदरत की तमाम ताकत का मालिक है...नहीं, डियर कर्नल...मेरा दावा है कि इस घर का कोई आदमी ली यका से मिला हआ है।' फिर उसने अपनी बात में वज़न पैदा करने के लिए मेज़ पर घूसा मारते हुए कहा, 'मेरा दावा है कि इसके अलावा और कोई बात नहीं।'

कमरे में सन्नाटा छा गया। कर्नल ज़रग़ाम साँस रोके हुए बारतोश की तरफ़ देख रहा था।

'मैं मिस्टर बारतोश से सहमत हूँ।' इमरान की आवाज़ सुनाई दी। उसके बाद फिर सन्नाटा हो गया।

आख़िर कर्नल ज़रग़ाम गला साफ़ करके बोला, 'वह कौन हो सकता है?'

'कोई भी हो!' बारतोश ने लापरवाही से अपने कन्धे हिलाये। ‘जब वास्ता ली यूका से हो तो किसी पर भी भरोसा न करना चाहिए...'

'आपसे ग़लती हुई थी कर्नल साहब!' इमरान ने कर्नल ज़रग़ाम से कहा, 'आपको पहले मिस्टर बारतोश से बात-चीत करनी चाहिए। ली यूका के बारे में उनकी जानकारी बहुत ज़्यादा है।' ____

'बिलकुल? मैं ली यूका के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ। एक ज़माने में मेरी ज़िन्दगी इन्तहाई पिछड़े तबके में गुज़री है जहाँ चोर, बदमाश और नाजायज़ तिजारत करने वाले आम थे। ज़िन्दगी के उसी दौर में मुझे ली यूका के बारे में बहुत कुछ सुनने को मिला था। कर्नल, क्या तुम यह समझते हो कि ली यूका इन काग़ज़ात को अपने आदमियों के ज़रिये हासिल करेगा। हरगिज़ नहीं। वह उन्हें उस जगह से उठायेगा जहाँ ये रख दिये जायेंगे। ली यूका का कोई आदमी नहीं जानता कि वो कौन है और इन काग़ज़ों में है क्या?'

'जहाँ तक मेरा ख़याल है इनमें से कोई ऐसी चीज़ नहीं जिससे ली यूका की शख्सियत पर रोशनी पड़ सके।' कर्नल ज़रग़ाम ने कहा।

‘वाह!' इमरान गर्दन झटक कर बोला, 'जब आप चीनी और जापानी ज़बानों से वाक़फ़ नहीं हैं तब यह बात इतने भरोसे के साथ कैसे कह रहे हैं?'

'चीनी और जापानी ज़बानें।' बारतोश किसी सोच में पड़ गया। फिर उसने कहा, 'क्या आप मुझे वे काग़ज़ात दिखा सकते हैं?'
 
'हरगिज़ नहीं।' कर्नल ने इनकार में सिर हिला कर कहा, 'यह नामुमकिन है। मैं उन्हें एक पैकेट में रख कर सील करने के बाद ली यूका की बताई हुई जगह पर पहुँचा दूंगा।' ___

'आप इन्सानियत पर जुल्म करेंगे।' बारतोश पुरजोश लहजे में बोला, 'बेहतर तरीका यह है कि आप खुद को पुलिस की हिफ़ाज़त में दे कर काग़ज़ात उसके हवाले कर दें!'

‘मिस्टर बारतोश, मैं बच्चा नहीं हूँ।' कर्नल ने तल्ख़ लहजे में कहा, 'काग़ज़ात बहुत दिनों से मेरे पास महफूज़ हैं। अगर मुझे पुलिस की मदद हासिल करनी होती तो कभी का कर चुका होता।'

‘फिर आख़िर उन्हें इतने दिनों रोके रखने का क्या मकसद था?'

'मकसद साफ़ है।' कर्नल डिक्सन पहली बार बोला। 'ज़रगाम सिर्फ इसीलिए अभी तक ज़िन्दा है कि वे काग़ज़ात अभी तक उसके कब्जे में हैं। अगर ली यूका का हाथ उन पर पड़ गया होता तो ज़रग़ाम हम में न बैठा होता...'

'ठीक है।' बारतोश ने कुछ सोचते हुए सिर हिलाया। 'लेकिन तुम्हारी स्कीम क्या थी?' कर्नल ज़रग़ाम ने बेसब्री से कहा।

'ठहरो, मैं बताता हूँ।' बारतोश ने कहा। चन्द लम्हे ख़ामोश रहा फिर बोला, 'ली यूका बतायी हुई जगह पर अकेला आयेगा। मुझे यक़ीन है...अगर वहाँ कुछ लोग पहले ही छुपा दिये जायें तो।' ___

'तजवीज़ अच्छी है!' इमरान सिर हिला कर बोला, 'लेकिन अभी आप कह चुके हैं कि...खैर, हटाइए उसे...मगर बिल्ली की गर्दन में घण्टी बाँधेगा कौन? कर्नल साहब पुलिस को इस मामले में डालना नहीं चाहते और फिर यह भी ज़रूरी नहीं कि वह बिल्ली चुपचाप गले में घण्टी बँधवा ही ले।' ____

'तुम मुझे वह जगह दिखाओ...फिर मैं बताऊँगा कि बिल्ली के गले में घण्टी कौन बाँधेगा।' बारतोश ने अकड़ कर कहा।

थोड़ी देर ख़ामोशी रही फिर वे सरगोशियों में मशविरा करने लगे...आख़िर यह तय पाया कि वे लोग उसी वक्त चल कर देवगढी की सियाह चट्टान का जायज़ा लें। कर्नल ज़रग़ाम हिचकिचा रहा था। लेकिन इमरान की सरगर्मी देख कर उसे भी हाँ-में हाँ मिलानी पड़ी। वह अब इमरान की मूर्खताओं पर भी भरोसा करने लगा था।

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रात अँधेरी थी। कर्नल ज़रग़ाम, कर्नल डिक्सन, बारतोश और इमरान मुश्किल रास्तों पर चक्कर खाते हए देवगढी की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनके हाथों में छोटी-छोटी टॉचें थीं जिन्हें वे अक्सर रोशन कर लेते थे। डिक्सन, ज़रग़ाम और बारतोश के पास हथियार थे। इमरान के बारे में भरोसे से कुछ नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि वैसे तो उसके हाथ में एयरगन नज़र आ रही थी, लेकिन एयरगन ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसकी मौजूदगी में किसी आदमी को हथियारबन्द कहा जा सके।

काली चट्टान के करीब पहुँच कर वे रुक गये। यह एक बहुत बड़ी चट्टान थी। अँधेरे में वह बहुत ख़ौफ़नाक नज़र आ रही थी। उसकी बनावट कुछ इस किस्म की थी कि वह दूर से किसी बहुत बड़े अजगर का फैला हुआ मुँह मालूम होती थी।

तकरीबन आधे घण्टे तक बारतोश उसका जायज़ा लेता रहा। फिर उसने आहिस्ता से कहा, 'बहुत आसान है, बहुत आसान है। ज़रा उन गुफ़ाओं की तरफ़ देखो। इनमें हज़ारों आदमी एक समय में छुप सकते हैं। हमें ज़रूर इस मौके से फायदा उठाना चाहिए।'

‘ली यूका के लिए सिर्फ एक आदमी काफ़ी होगा।' इमरान ने कहा।

'मैं आज तक समझ ही नहीं सका कि तुम किसके आदमी हो।' बारतोश झुंझला गया।

'क्या मैंने कोई ग़लत बात कही है?' इमरान ने संजीदगी से कहा।

‘फ़िजूल बातें न करो।' कर्नल डिक्सन ने कहा।

'अच्छा तो आप हज़ारों आदमी कहाँ से लायेंगे, जबकि कर्नल ज़रग़ाम पुलिस को भी बीच में नहीं लाना चाहते।'

'पुलिस को बीच में लाना पड़ेगा।' बारतोश बोला।

'हरगिज़ नहीं।' कर्नल ज़रग़ाम ने सख्ती से कहा, 'पुलिस मुझे या मेरे घर वालों को ली यूका के इन्तकाम से नहीं बचा सकेगी।'

'तब तो फिर कुछ भी नहीं हो सकता।' बारतोश मायूसी से बोला। 'मैं यही चाहता कि कुछ न हो।' कर्नल ज़रगाम ने कहा।

थोड़ी देर तक ख़ामोशी रही फिर अचानक इमरान ने कहकहा लगा कर कहा। 'तुम सब पागल हो गये। मैं तुम सब को गधा समझता हूँ।'

फिर उसने एक तरफ़ अँधेरे में छलाँग लगी दी। उसके कहक़हे की आवाज़ सन्नाटे में गूंजती हुई आहिस्ता-आहिस्ता दूर होती चली गयी।

'क्या यह सचमुच पागल है?' कर्नल डिक्सन बोला, 'या फिर खुद ही ली यूका था।'

किसी ने जवाब न दिया...उनकी टॉर्चों की रोशनियाँ दूर-दूर तक अँधेरे के सीने को चीर रही थीं, लेकिन उन्हें इमरान की परछाई भी नहीं दिखाई दी।

दूसरी सुबह मेहमान और घर वाले सभी बड़ी बेचैनी से कर्नल ज़रगाम का इन्तज़ार कर रहे थे। वह ली यका के काग़ज़ात का पैकेट ले कर अकेला देवगढ़ी की तरफ़ गया था। सबने उसे समझाने की कोशिश की थी कि उसका अकेले जाना ठीक नहीं, मगर कनल किसी को भी अपने साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं हआ था। इमरान तो रात ही से गायब था। उन्होंने उसे बड़ी देर तक चट्टानों और गुफाओं में तलाश किया था और फिर थक-हार कर वापस आ गये थे।

सोफ़िया को भी इमरान की इस हरकत पर आश्चर्य था, मगर उसने किसी से कुछ नहीं कहा।

लगभग दस बजे कर्नल ज़रग़ाम वापस आ गया। उसके चेहरे से थकन ज़ाहिर हो रही थी। उसने कुर्सी पर गिर कर अपना जिस्म फैलाते हुए एक लम्बी अंगड़ाई ली।

'क्या रहा?' कर्नल डिक्सन ने पूछा।

'कुछ नहीं! वहाँ बिलकुल सन्नाटा था। मैं पैकेट एक महफूज़ जगह पर रख कर वापस आ गया।' ज़रग़ाम ने कहा। थोड़ी देर ख़ामोश रहा फिर कहने लगा, 'वहाँ से सही-सलामत वापस आ जाने का मतलब ये है कि अब ली यूका मुझे या मेरे ख़ानदान वालों को कोई नुकसान नहीं पहुँचायेगा।'

वह अभी कुछ और भी कहता, लेकिन अचानक उन सबने इमरान का कहक़हा सुना। वह कन्धे से एयरगन लटकाये हाथ झुलाता हुआ कमरे में दाखिल हो रहा था। उसके चेहरे पर उस वक़्त सामान्य से ज़्यादा मूर्खता बरस रही थी। ___

'वाह कर्नल साहब!' उसने फिर कहक़हा लगाया, 'खूब बेवकूफ़ बनाया ली यूका को...नऊजुबिल्लाह...नहीं शायद सुब्हानल्लाह कहना चाहिए...वाकई आप बहुत ज़हीन आदमी हैं।'

‘क्या बात है?' कर्नल ज़रग़ाम झुंझला गया।

'यही पैकेट रखा था न आपने!' इमरान जेब से भूरे रंग का एक पैकेट निकाल कर दिखाता हुआ बोला।

'क्या!...यह क्या किया तुमने?' कर्नल उछल कर खड़ा हो गया। इमरान ने पैकेट फाड़ कर उसके काग़ज़ात फ़र्श पर डालते हुए कहा।

‘ली यका से मज़ाक करते हुए आपको शर्म आनी चाहिए थी। इसके बावजूद भी उसने आपको ज़िन्दा रहने दिया।'
 
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